गर्लफ्रैंड के कारण उठाने पड़ सकते हैं नुकसान

सुरेश को पम्मी से पहली मुलाकात में ही प्यार हो गया. सुरेश अपनी गर्लफ्रैंड का इतना दीवाना हो गया कि वह अपने फ्रैंड्स को भूल गया. उन से मिलनाजुलना बंद कर दिया. उस ने अपनी पढ़ाई पर भी ध्यान देना बंद कर दिया. सुरेश को हर वक्त सिर्फ एक ही बात का ध्यान रहता था प्यार, प्यार और सिर्फ प्यार.

इश्क, प्यार, मुहब्बत के चक्कर में पड़ कर अनेक युवा अपनी गर्लफ्रैंड के इतने दीवाने हो जाते हैं कि वे खानापीना, पढ़ाईलिखाई, सोना या घूमना, मिलनाजुलना आदि सबकुछ भूल जाते हैं. अनेक युवा इश्क के चक्कर में अपने कैरियर व फ्यूचर को दांव पर लगा देते हैं. वे फुलटाइम आशिक बन कर अपना सारा वक्त किसी पार्क, सी बीच, रैस्टोरैंट, पिक्चर हौल या मौल आदि जगहों पर बिताने लगते हैं.

माना कि जीने के लिए प्यार भी जरूरी है, मगर प्यार में पूरी तरह से डूब कर दिनरात सिर्फ प्यारप्यार की रट लगाना समझदारी नहीं है. आप ने किसी से प्यार किया है, अच्छी बात है. सही मौका मिलने पर प्यार करने में कोई बुराई नहीं है. प्यार की अहमियत अपनी जगह बहुत कुछ है. पर ध्यान रहे प्यार के चक्कर में अपना समय, स्वास्थ्य, पैसा, रिश्ते आदि को न भूल जाएं. कहीं ऐसा न हो कि आप को बाद में पछताना पड़े.

इन को न भूलें

इस बात का ध्यान रखें कि जीवन में सफल होने के लिए पढ़ाई जरूरी है. प्यार के चक्कर में अपनी पढ़ाई न छोड़ें.

गर्लफ्रैंड के चक्कर में अपने कैरियर को दांव पर न लगाएं. कैरियर बिगड़ा तो आप की लाइफ ही पूरी तरह डगमगा सकती है. प्यार अपनी जगह, कैरियर अपनी जगह.

गर्लफ्रैंड को किसी भी हाल में पाना या उसे हर हाल में खुश रखने को लाइफ का मकसद न बनाएं. इस के अलावा भी बहुत कुछ है, इस दुनिया में.

‘मैं सबकुछ भुला दूंगा, तेरी चाहत में…’ वाली सोच न रखें. गर्लफ्रैंड की चाहत में सबकुछ भुला देना कोई समझदारी की बात नहीं है.

गर्लफ्रैंड के चक्कर में अपने पेरैंट्स, भाईबहन, सगेसंबंधी, यारदोस्तों को न भूल जाएं. इन के बिना जीवन अधूरा है. इन से दूर रह कर जीवन का कोई सुख नहीं मिलेगा.

प्यार के चक्कर में पड़ कर खानापीना, घूमनाफिरना आदि न भूल जाएं. ऐसा करना प्यार नहीं पागलपन समझा जाएगा. शारीरिक स्वास्थ्य के लिए खानापीना, घूमनाफिरना जरूरी है. इस के बिना आप अस्वस्थ हो जाएंगे.

किसी से प्यार होने पर अपना कामधंधा न छोड़ दें. जीवनयापन के लिए काम करना बहुत जरूरी है. इस के बिना आप अस्वस्थ हो जाएंगे.

गर्लफ्रैंड पर अपनी पूंजी दोनों हाथों से न लुटाएं. जिस दिन आप की पूंजी खत्म हो जाएगी, उस दिन प्यार नाम की चिडि़या भी आप के पास से उड़ जाएगी.

गर्लफ्रैंड के चक्कर में अपना फर्ज, जिम्मेदारी, ईमानदारी जैसी बातों को अपने जीवन से दूर न करें.

गर्लफ्रैंड के चक्कर में लापरवाह, आलसी व निकम्मा न बनें. लाइफ में आगे बढ़ने के लिए इन से दूर रहना बेहद जरूरी है.

अधिकतर वक्त गर्लफ्रैंड के साथ बिता कर जीवन के कीमती समय को नष्ट न करें.

अपने काम, कैरियर व पढ़ाई को प्राथमिकता दें. निश्चित करें कि फिर से कहां, कब, कितने समय के लिए मिलना है. समय कम होने पर फोन, मोबाइल या इंटरनैट द्वारा इसे ऐडजस्ट करें.

छुट्टी के दिन अपनी गर्लफ्रैंड को कुछ अधिक समय दे कर उस के साथ वक्त बिता सकते हैं, पर ध्यान रखें, इस चक्कर में छुट्टी वाले दिन के जरूरी काम न भूल जाएं.

गर्लफ्रैंड की अधिक याद आने पर मन को काबू में लाएं. मुंह पर पानी के छींटें मारें. कमरे से बाहर घूमने निकल जाएं. फ्रैंड्स या फैमिली के साथ थोड़ा वक्त गुजारें.

अपना ध्यान बंटाने के लिए म्यूजिक सुनें. स्टोरी बुक या नौवेल पढ़ें. कोई क्रिएटिव काम करें या फिर अपनी हौबी पर ध्यान दें.

यदि आप नौकरी कर रहे हैं, तो मन लगा कर करें. ऐसा न हो गर्लफ्रैंड के चक्कर में समय से औफिस नहीं जा रहे हैं. ऐसा करने पर नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है. ऐसा न करें क्योंकि नौकरी बड़ी मुश्किल से मिलती है.

परीक्षा या किसी कंपीटिशन की तैयारी कर रहे हैं, तो अपना सारा वक्त गर्लफ्रैंड के चक्कर में बरबाद न करें. उसे भी इस की जानकारी दें, जिस से वह भी आप के समय को नष्ट न करे.

मेरी जीवनसाथी: नवीन का क्या था सच

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दो कदम तन्हा: भाग-2

कैंटीन के पीछे थोड़ी सी जगह है जहां कुरसियां रखी रहती हैं, उस के बाद रेलिंग है. बालक की उदासी दूर हो गई. वह दौड़ कर वहां गया और रेलिंग पकड़ कर गंगा के बहाव को देखने लगा.

डा. दास और अंजलि भी कुरसी मोड़ कर उधर ही देखने लगे. गरमी नहीं आई थी, मौसम सुहावना था. मोतियों का रंग ले कर सूर्य का मंद आलोक सरिता के शांत, गंभीर जल की धारा पर फैला था. कई नावें चल रही थीं. नाविक नदी के किनारे चलते हुए रस्सी से नाव खींच रहे थे. कई लोग किनारे नहा रहे थे.

मौसम ऐसा था जो मन को सुखद बीती हुई घडि़यों की ओर ले जा रहा था. वेटर चाय का आर्डर ले गया. दोनों नदी की ओर देखते रहे.

‘‘याद है? हम लोग बोटिंग करते हुए कितनी दूर निकल जाते थे?’’

‘‘हां,’’ डा. दास तो कभी भूले ही नहीं थे. शाम साढ़े 4 बजे क्लास खत्म होने के बाद अंजलि यहां आ जाती थी और दोनों मेडिकल कालिज के घाट से बोटिंग क्लब की नाव ले कर निकल जाते थे नदी के बीच में. फिर पश्चिम की ओर नाव खेते लहरों के विरुद्ध महेंद्रू घाट, मगध महिला कालिज तक.

सूरज जब डूबने को होता और अंजलि याद दिलाती कि अंधेरा हो जाएगा, घर पहुंचना है तो नाव घुमा कर नदी की धारा के साथ छोड़ देते. नाव वेग से लहरों पर थिरकती हुई चंद मिनटों में मेडिकल कालिज के घाट तक पहुंच जाती.

डूबती किरणों की स्वर्णिम आभा में अंजलि का पूरा बदन कंचन सा हो जाता. वह अपनी बड़ीबड़ी आंखें बंद किए नाव में लेटी रहती. लहरों के हलके छींटे बदन पर पड़ते रहते और डा. दास सबकुछ भूल कर उसी को देखते रहते. कभी नाव बहती हुई मेडिकल कालिज घाट से आगे निकल जाती तो अंजलि चौंक कर उठ बैठती, ‘अरे, मोड़ो, आगे निकल गए.’

डा. दास चौंक कर चेतन होते हुए नाव मोड़ कर मेडिकल कालिज घाट पर लाते. कभी वह आगे जा कर पटना कालिज घाट पर ही अनिच्छा से अंजलि को उतार देते. उन्हें अच्छा लगता था मेडिकल कालिज से अंजलि के साथ उस के घर के नजदीक जा कर छोड़ने में, जितनी देर तक हो सके साथ चलें, साथ रहें. वेटर 2 कप चाय दे गया. अंजलि ने बेटे को पुकार कर पूछा, ‘‘क्या खाओगे? बे्रडआमलेट खाओगे. यहां बहुत अच्छा बनता है.’’

बालक ने नकरात्मक भाव से सिर हिलाया तो डा. दास ने पूछा, ‘‘लस्सी पीओगे?’’

‘‘नो…नथिंग,’’ बालक को नदी का दृश्य अधिक आकर्षित कर रहा था.

चाय पी कर डा. दास ने सिगरेट का पैकेट निकाला.

अंजलि ने पूछा, ‘‘सिगरेट कब से पीने लगे?’’

डा. दास ने चौंक कर अपनी उंगलियों में दबी सिगरेट की ओर देखा, मानो याद नहीं, फिर उन्होंने कहा, ‘‘इंगलैंड से लौटने के बाद.’’

अंजलि के चेहरे पर उदासी का एक साया आ कर निकल गया. उस ने निगाहें नीची कर लीं. इंगलैंड से आने के बाद तो बहुत कुछ खो गया, बहुत सी नई आदतें लग गईं.

अंजलि मुसकराई तो चेहरे पर स्वच्छ प्रकाश फैल गया. किंतु डा. दास के मन का अंधकार अतीत की गहरी परतों में छिपा था. खामोशी बोझिल हो गई तो उन्होंने पूछा, ‘‘मृणालिनी कहां है?’’

‘‘इंगलैंड में. वह तो वहीं लीवरपूल में बस गई है. अब इंडिया वापस नहीं लौटेगी. उस के पति भी डाक्टर हैं. कभीकभी 2-3 साल में कुछ दिन के लिए आती है.’’

‘‘तभी तो…’’

‘‘क्या?’’

‘‘कुछ भी नहीं, ब्रिलियंट स्टूडेंट थी. अच्छा ही हुआ.’’

मृणालिनी अंजलि की चचेरी बहन थी. उम्र में उस से बड़ी. डा. दास से वह मेडिकल कालिज में 2 साल जूनियर थी.

डा. दास फाइनल इयर में थे तो वह थर्ड इयर में थी. अंजलि उस समय बी.ए. इंगलिश आनर्स में थी.

अंजलि अकसर मृणालिनी से मिलने महिला होस्टल में आती थी और उस से मिल कर वह डा. दास के साथ घूमने निकल जाती थी. कभी कैंटीन में चाय पीने, कभी घाट पर सीढि़यों पर बैठ कर बातें करने, कभी बोटिंग करने.

डा. दास की पहली मुलाकात अंजलि से सरस्वती पूजा के फंक्शन में ही हुई थी. वह मृणालिनी के साथ आई थी. डा. दास गंभीर छात्र थे. उन्हें किसी भी लड़की ने अपनी ओर आकर्षित नहीं किया था, लेकिन अंजलि से मिल कर उन्हें लगा था मानो सघन हरियाली के बीच ढेर सारे फूल खिल उठे हैं और उपवन में हिरनी अपनी निर्दोष आंखों से देख रही हो, जिसे देख कर आदमी सम्मोहित सा हो जाता है.

फिर दूसरी मुलाकात बैडमिंटन प्रतियोगिता के दौरान हुई और बातों की शुरुआत से मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ. वह अकसर शाम को पटना कालिज में टेनिस खेलने जाते थे. वहां मित्रों के साथ कैंटीन में बैठ कर चाय पीते थे. वहां कभीकभी अंजलि से मुलाकात हो जाती थी. जाड़ों की दोपहर में जब क्रिकेट मैच होता तो दोनों मैदान के एक कोने में पेड़ के नीचे बैठ कर बातें करते.

मृणालिनी ने दोनों की नजदीकियों को देखा था. उसे कोई आपत्ति नहीं थी. डा. दास अपनी क्लास के टापर थे, आकर्षक व्यक्तित्व था और चरित्रवान थे.

बालक के लिए अब गंगा नदी का आकर्षण समाप्त हो गया था. उसे बाजार और शादी में आए रिश्तेदारों का आकर्षण खींच रहा था. उस ने अंजलि के पास आ कर कहा, ‘‘चलो, ममी.’’

‘‘चलती हूं, बेटा,’’ अंजलि ने

डा. दास की ओर देखा, ‘‘चश्मा लगाना कब से शुरू किया?’’

‘‘वही इंगलैंड से लौटने के बाद. वापस आने के कुछ महीने बाद अचानक आंखें कमजोर हो गईं तो चश्मे की जरूरत पड़ गई,’’ डा. दास गंगा की लहरों की ओर देखने लगे.

अंजलि ने अपनी दोनों आंखों को हथेलियों से मला, मानो उस की आंखें भी कमजोर हो गई हैं और स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा है.

‘‘शादी कब की? वाइफ क्या करती है?’’

डा. दास ने अंजलि की ओर देखा, कुछ जवाब नहीं दिया, उठ कर बोले, ‘‘चलो.’’

मैदान की बगल वाली सड़क पर चलते हुए गेट के पास आ कर दोनों ठिठक कर रुक गए. दोनों ने एकदूसरे की ओर देखा, अंदर से एकसाथ आवाज आई, याद है?

मैदान के अंदर लाउडस्पीकर से गाने की आवाज आ रही थी. गालिब की गजल और तलत महमूद की आवाज थी :

‘‘आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक…’’

तलत महमूद पटना आए थे.

50th जयंती वर्ष में कौन Yashraj Films को डुबाने पर है आमादा?

मशहूर फिल्मकार यश चोपड़ा ने 1970 में अपनी प्रोडक्शन कंपनी ‘‘यशराज फिल्मस’’ की स्थापना की थी, जिसके तहत उन्होने पहली फिल्म ‘‘दागःए पोयम आफ लव’’ का निर्माण व निर्देशन किया था, जो कि 27 अप्रैल 1973 को प्रदर्शित हुई थी. तब से अब तक ‘यशराज फिल्मस’’ के बैनर तले ‘कभी कभी ’, ‘नूरी’, ‘काला पत्थर’,  ‘सिलसिला’,  ‘मशाल’, ‘ चांदनी’, ‘ लम्हे’,  ‘दोस्ती’,  ‘वीरजारा’, ‘दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे’,  ‘मोहब्बतें’, ‘रब ने बना दी जोड़ी’, ‘एक था टाइगर’,  ‘मर्दानी’,  ‘सुल्तान’ सहित लगभग अस्सी फिल्मों का निर्माण किया जा चुका है.

‘‘यशराज फिल्मस’’ अपनी स्थापना के समय से ही लगातार उत्कृष्ट फिल्में बनाता आ रहा है. जिसके चलते लगभग सभी फिल्में बाक्स आफिस पर सफलता दर्ज कराती रही हैं. लेकिन अब जबकि ‘‘यशराज फिल्मस’’ अपनी पचासवीं जयंती मना रहा है, तो लगातार इस बैनर की छवि धूमिल होती जा रही है. ‘मर्दानी 2’, ‘बंटी और बबली 2’, ‘जयेशभाई जोरदार’, ‘सम्राट पृथ्वीराज’ और 22 जुलाई को प्रदर्शित फिल्म ‘‘शमशेरा’’ ने बाक्स ऑफिस पर बुरी तरह से दम तोड़ा है. ‘यशराज फिल्मस’’ जैसे बौलीवुड के बड़े बैनर की लगातार छह फिल्मों की बाक्स आफिस पर हुई दुर्गति से ‘यशराज फिल्मस’ के साथ ही बौलीवुड को पांच सौ करोड़़ का नुकसान हो चुका है. हर निर्माता पहली फिल्म की असफलता के बाद ही फिल्म की असफलता का पोस्टमार्तम कर गलतियों को सुधारना शुरू कर देता है. लेकिन यहां ‘यशराज फिल्मस’’ की एक दो नहीं बल्कि लगातार छह फिल्में असफल हो चुकी हैं, मगर कोई हलचल नही है. मजेदार बात यह है कि यह सब तब हो रहा है, जब इसकी बागडोर ‘यशराज फिल्मस’ के संस्थापक स्व.  यश चोपड़ा के बेटे आदित्य चोपड़ा ने संभाल रखी है. आदित्य चोपड़ा कोई नौसीखिए नही हैं. आदित्य चोपड़ा को सिनेमा की बेहतरीन समझ है.  आदित्य चोपड़ा स्वयं अब तक ‘दिल वाले दुलहनिया ले जाएंगे’(1995),  ‘मोहब्बतें’(2000 ),  ‘रब ने बना दी जोड़ी’(2008) जैसी बेहतरीन व सफलतम फिल्मों का लेखन व निर्देशन कर चुके हैं. लेकिन अब एक तरफ ‘यशराज फिल्मस’ की फिल्में असफल होकर ‘यशराज फिल्मस’ को डुबाने में लगी हुई हैं, तो वहीं आदित्य चोपड़ा चुप हैं. उनकी तरफ से कोई हरकत नजर नही आ रही है. बौलीवुड के एक तबके का मानना है कि भारतीय सिनेमा पर से आदित्य चोपड़ा की पकड़ खत्म हो चुकी हैं. कुछ लोगों की राय में आदित्य चोपड़ा का 2012 के बाद दूसरी व्यस्तताओं के चलते आम लोगों से शायद संवाद कम हो गया है, जिसके चलते समाज व दर्शकों  की पसंद व नापसंद को वह ठीक से अहसास नही कर पा रहे हैं. जबकि तब से दर्शकों की रूचि में तेजी से बदलाव आया है. अब दर्शक सिर्फ भारतीय सिनेमा ही नहीं,  बल्कि हौलीवुड के अलावा दूसरी भारतीय भाषाओं में बन रहे सिनेमा को भी देख रहा है. बौलीवुड से ही जुड़े कुछ लोगों की राय में आदित्य चोपड़ा के इर्द गिर्द चंद चमचे इकट्ठे हो गए हैं, जिन्हे ‘यशराज फिल्मस’ के आगे बढ़ने से कोई मतलब नही है, उन्हें महज अपने स्वार्थ की चिंता है. कम से कम ऐसे लोगों से आदित्य चोपड़ा जितनी जल्दी दूरी बनाकर समाज व दर्शकों के साथ संवाद स्थापित करेंगे, उतना ही ‘यशराज फिल्मस’ के लिए बेहतर होगा.

बहरहाल, ‘यशराज फिल्मस’ के पतन की शुरूआत तो 2017 में ही हो गयी थी. इस बैनर तले 2017 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘मेरी प्यारी बिंदू’’ और ‘कैदी बैंड’’ ने भी बाक्स आफिस पर पानी नही मंागा था. पर 22 दिसंबर 2017 को प्रदर्शित फिल्म ‘‘टाइगर जिंदा है’’ने जरुर सफलता दर्ज कराकर ‘यशराज फिल्मस’ की लाज बचा ली थी. उसके बाद 2018 में ‘हिचकी’, ‘सुई धागा’, ‘ठग्स आफ हिंदुस्तान’ ने बाक्स आफिस पर बुरी तरह से मात खा गयी थीं. 2019 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘वार’’ ने थोड़ी सी राहत दी थी. पर उसके बाद प्रदर्शित सभी फिल्में बाक्स आफिस मंुह के बल गिरती चली आ रही हैं.

क्यों डूबी ‘‘शमशेरा’’

बड़े बजट की मेगा पीरियड फिल्म ‘‘शमशेरा’’ को डुबाने में फिल्म के चार लेखक,  निर्देशक करणमल्होत्रा और कलाकारों के साथ ही फिल्म की मार्केटिंग और पीआर टीम ने कोई कसर बाकी नहीं रखी. यह कितनी शर्मनाक बात है कि भव्यस्तर पर बनी फिल्म ‘शमशेरा’ रविवार के दिन महज ग्यारह करोड़(निर्माता के दावे के अनुसार,  अन्यथा सूत्र दावा कर रहे है कि ‘शमशेरा’ ने रवीवार को भी आठ करोड़ से ज्यादा नही कमाए. )़ ही कमा सकी. मजेदार बात यह है कि हिंदी, तमिल, तेलगू व मलयालम भाषा में फिल्म ‘‘शमशेरा’’ को 22 जुलाई के दिन एक साथ भारत के 4300 सिनेमाघरों स्क्रीन्स और विदेशो में 1500 स्क्रीन्स पर रिलीज किया गया था. पर पहले ही दिन कुछ शो कैंसिल हुए. दूसरे दिन भी शो कैंसिल हुए. यानी कि हर दिन स्क्रीन्स की संखा घटती गयी. कई थिएटरों से इस फिल्म को उतार दिया गया. सिर्फ भारत ही नही विदेशों भी इसकी दुर्गति हो गयी. प्राप्त आंकड़ो के अनुसार आस्ट्ेलिया में ‘शमशेरा’ कुल तिहत्तर स्क्रीन में रिलीज हुई थी, जिससे महज 41 हजार डालर ही कमा सकी.  जबकि इस फिल्म में रणबीर कपूर,  संजय दत, रोनित रॉय,  वाणी कपूर,  सौरभ शुक्ला सहित कई दिग्गज कलाकारों ने अभिनय किया है. यह फिल्म रणबीर कपूर की पूरे चार वर्ष बाद अभिनय में वापसी है. मगर वह भी इस फिल्म को डूबने में योगदान देने में पीछे नहीं रहे. यॅूं भी जब फिल्म के कंटेंट मंे ही दम नही है, तो फिर दर्शक फिल्म देखने के लिए अपनी गाढ़ी कमायी क्यांे फुंकने लगा?लेखकों ने तो इतिहास के साथ भी छेड़खानी की. आदिवासियों के शौर्य का अपना इतिहास है, मगर लेखकांे ने तो उसे भी नकार कर सिर्फ गोरी चमड़ी यानी कि ब्रिटिश शासकों की मानवता व उनकी उदारता का गुणगान करते रहे. तो वहीं यह फिल्म धर्म को लेकर भ्रम फैलाने के अलावा कुछ नही करती. बल्ली यानी कि रणबीर कपूर के किरदार को देखकर लेखकों व निर्देशक के दिमागी दिवालिएपन का अहसास किया जा सकता है.

फिल्म का गलत प्रचार भी ले ‘‘शमशेरा’’ को ले डूबाः

फिल्म की मार्केटिंग और पीआर टीम ने फिल्म ‘‘शमशेरा’’ को आजादी मिलने से पहले अंग्रेजों से देश की आजादी के संघर्ष की कहानी के रूप में प्रचार किया था. जबकि यह फिल्म देश की आजादी नही बल्कि एक कबीले या यॅंू कहें कि एक आदिवासी जाति की आजादी की कहानी मात्र है. जी हॉ!यह देश की स्वतंत्रता की लड़ाई नही है. कहानी पूरी तरह से देसी जातिगत संघर्ष पर टिकी है, जिसका विलेन एक भारतीय शुद्ध सिंह ही है.

‘यशराज फिल्मसः कौन डुबाने पर उतारू

सबसे अहम सवाल यह है कि ‘‘यशराज फिल्मस’’ को कौन डुबाने पर उतारू है? ‘‘यशराज फिल्मस’’ की 2017 से ही लगातार बुरी तरह से डूबते जाने की एक नहीं कई वजहें हैं. यदि गंभीरता से विश्लेषण किया जाए, तो ‘यशराज फिल्मस’ को डुबाने में आदित्य राय के इर्दगिर्द जमा हो चुके कुछ चमचे, मार्केटिंग टीम, पीआर टीम,  रचनात्मक टीम, टैलेंट मनेजमेंट’के साथ ही आदित्य चोपड़ा का समाज व दर्शकों से पूरी तरह कट जाना ही जिम्मेदार है. बौलीवुड का एक तबका मानता है कि अब वक्त आ गया है, जब आदित्य चोपड़ा को अपने प्रोडक्शन हाउस की रचनात्मक टीम के साथ ही मार्केटिंग व पीआर टीम में अमूलचूल बदलाव कर सिनेमा को किसी अजेंडे की बजाय दर्शकों की रूचि के अनुसार सिनेमा बनाएं.

टैलेंट मनेजमेंटः

2012 में ‘‘यशराज फिल्मस’’  का चेअरमैन का पद संभालने के साथ ही आदित्य चोपड़ा ने नए कलाकारों को आगे बढ़ाने के नेक इरादे से ‘टैलेंट मनेजमेंट’ की शुरूआत की थी.  और 2013 के बाद ‘यशराज फिल्मस’ ने स्थापित व नए कलाकारों को मिलाकर फिल्में बनानी शुरू की. बौलीवुड से जुड़े अधिसंख्य सूत्र मानते हैं कि 2012 के बाद ‘यशराज फिल्मस ’ का रचनात्मकता से मोहभ्ंाग होने लगा था. सब कुछ एक फैक्टरी की तरह होेने लगा था. ‘टैलेंट मैनेजमेंट’ के तहत वाणी कपूर, परिणीत चोपड़ा सहित ऐसे कलाकारांे को जोड़ा गया जिनमें संुदरता के अलावा कोई गुण नही है. इन कलाकारों का अभिनय से कोई नाता ही नही है. बाक्स आफिस पर बुरी तरह से धराशाही हो चुकी फिल्म ‘शमशेरा’ के दो मुख्य कलाकार रणबीर कपूर व वाणी कपूर यशराज के ही टैलेट मैनेजमेंट का हिस्सा हैं. असफलतम फिल्म ‘‘बंटी और बबली’’ की अभिनेत्री शारवरी वाघ, ‘जयेशभाई जोरदार ’ की शालिनी पांडे व रणवीर सिंह और ‘सम्राट पृथ्वीराज’ की मानुषी छिल्लर भी टैलेंट मैनेजमंेट का हिस्सा हैं. तो क्या यह माना जाए कि टैलेंट मैनेजमेंट की जिम्मेदारी संभाल रहे लोग अपने काम को सही ढंग से अंजाम देने में असमर्थ रहे हैं?इस पर आदित्य चोपड़ा को  गंभीरता से सोचना व विश्लेषण करना चाहिए.

मार्केटिंग टीमः

‘यशराज फिल्मस’ की मार्केटिंग टीम जिस तरह से कामकर रही है, उस पर वर्तमान हालात को देखते हुए विचार व विश्लेषण करना जरुरी है. वर्तमान समय में मार्केटिंग टीम फिल्म के लिए दर्शक बटोरने के लिए जिस तरह से सिटी टूर करती है और सोशल मीडिया पर पैसे खर्च करती है, वह वास्तव में ‘क्रिमिनल वेस्टेज आफ मनी’ के अलावा कुछ नही है. सिटी टूर के लिए कलाकार व उनकी टीम के अलावा कई लोग हवाई जहाज से यात्रा करते हैं, फाइव स्टार होटलो मंे ठहरते हैं और किसी माल या सिनेमाघर में हजारों लोगांे की भीड़ के बीच उटपटंाग हरकते करके वापस आ जाते हैं. इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि किसी भी सिटी मंे फिल्म के कलाकारों को देखने या सुनने आने वाले लोगों में से दस प्रतिशत लोग भी फिल्म देखने क्यों नहीं आते? आॅन ग्राउंड इवेंट में दस बीस हजार लोग जुड़ते हैं, जिसके वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल किए जाते हैं. इसके बावजूद इनमें से हजार लोग भी फिल्म देखने थिएटर के अंदर नहीं आते? जबकि मार्केटिंग टीम के अनुसार इस तरह उस शहर के सभी लोग फिल्म देखने आएंगे. इसी तरह यह बात साबित हो चुकी है कि कलाकार के सोशल मीडिया के फालोवअर्स की संख्या बल पर फिल्म की सफलता का दावा नही किया जा सकता. महानायक अमिताभ बच्चन के सोशल मीडिया पर करोड़ों फालोवअर्स हैं, पर उनकी फिल्म को उनमें से कुछ लाख भी टिकट लेकर फिल्म देखने सिनेमाघर के अंदर नही जाते. तो मार्केटिंग टीम सोशल मीडिया पर फिल्म के टीजर, ट्ेलर व गानों को मिल रहे व्यूज के आधार पर फिल्म की सफलता को लेकर गलत आकलन पेश करती है. इससे फिल्म को सिर्फ नुकसान ही होता है.

पी आर टीम का  अधकचरा ज्ञान व कार्यशैलीः

कुछ दिन पहले हमने एक बड़े बैनर की फिल्म के पीआरओ को ‘‘गृहशोभा’’ और ‘‘सरिता’’ में छपे इंटरव्यू की फोटोकापी भेजी, तुरंत उसका फोन आया कि यह मैगजीन है या वेब साइट है और कब से निकलना शुरू हुई है. यह मैगजीन कहंा बिकती है? इससे हमारे दिमाग में सवाल उठा कि इस इंसान को फिल्म का प्रचारक कैसे नियुक्त कर दिया गया? फिल्म के प्रचारक का काम होता है कि वह फिल्म का प्रचार कर उसे एक ‘ब्रांड’ के रूप में स्थापित कर दे. मगर इस कसौटी पर सभी फिल्म प्रचारक बहुत पीछे हैं. इन प्रचारको @पीआरओ को खुद नहीं पता होता कि उनकी फिल्म का विषय क्या है? वह तो गलत ढंग से फिल्म का प्रचार कर फिल्म का बंटाधार करने में अहम भूमिका निभाते हैं. पीआरओ को इस बात की समझ होनी चाहिए कि वह कब किस पत्रकार को कलाकार या निर्देशक से इंटरव्यू करवाए? पर यहां तो फिल्म के प्रदर्र्शन से एक सप्ताह पहले सभी फिल्म पत्रकारों को बुलाकर एक साथ बैठा दिया जाता है. इस ग्रुप इंटरव्यू में 20 से 57 पत्रकार भी होते देखे हैं. इतना ही नहीं इसमें मैगजीन, दैनिक अखबार, वेब सहित सभी पत्रकार होते हैं. पीआरओ हमेशा एक ही रोना रोता रहता है कि क्या करंे कलाकार के पास समय नही है.  अथवा क्या करें हमें मार्केटिंग टीम की तरफ से कलाकार का सिर्फ एक दिन या दो घंटे का ही वक्त मिला है. सच तो प्रोडक्शन हाउस व कलाकार को ही पता होता है. यदि कलाकार सिटी टूर करने में वक्त बर्बाद करने की बजाय पत्रकारों के साथ अपनी फिल्म पर चर्चा करना शुरू करें, तो शायद फिल्म को लेकर सही बता दर्शक तक पहुॅचेगी,  जिससे स्थिति बदल सकती है.

वास्तव में जरुरत है कि बौलीवुड का हर फिल्म निर्माता दस बारह वर्ष पहले की तरह अपनी मार्केटिंग टीम व पीआर टीम की जवाब देही तय करे.  आज समय की सबसे बड़ी मांग यही है कि हर इंसान की जवाबदेही तय हो. कम से कम इस दिशा में ‘‘यशराज फिल्मस’’ के आदित्य चोपड़ा को गंभीरता से पहल करते हुए अपनी पूरी क्रिएटिब टीम, मार्केटिंग टीम व पीआर टीम की जांच परख कर आवश्यक कदम उठाने चाहिए, तभी वह ‘‘यशराज फिल्मस’’ की डूबती प्रतिष्ठा को वापस ला सकते हैं. अब वक्त आ गया है जब आदित्य चोपड़ा को स्वयं मंथन करने के बाद खुलकर सामने आना होगा. मंथन कर,  दूसरों पर यकीन करने की बजाय अपने अंदर नई उर्जा को जगाकर आदित्य चोपड़ा को स्वयं ऐसी फिल्म निर्देशित करनी चाहिए, जिसे दर्शक स्वीकार करें.

Anupama का नया प्रोमो देख टूटा फैंस का दिल, अनुज की होगी मौत!

सीरियल अनुपमा (Anupama) की कहानी से इन दिनों फैंस परेशान दिख रहे हैं. जहां शो में इन दिनों पाखी की बद्तमीजी बढ़ रही हैं तो वहीं अनुज का शो में कम दिखना फैंस को परेशान कर रहा है. वहीं हाल ही में मेकर्स के प्रोमो ने फैंस की नींद और चैन चुरा लिया है, जिसके बाद अब शो का नया प्रोमो  (Anupama New Promo) सामने आ गया है, जिसे देखकर फैंस को यकीन हो गया है कि शो से अनुज की छुट्टी होने वाली है. आइए आपको दिखाते हैं नया प्रोमो…

प्रोमो में देख चौंके फैंस

हाल ही में जहां शो के अपकमिंग ट्रैक में पाखी और अधिक की दोस्ती गहरी होती दिख रही है तो वहीं नए प्रोमो में अनुपमा से उसका परिवार और अनुज दूर होता दिख रहा है. दरअसल, शो का अपकमिंग प्रोमो सामने आया है, जिसमें अनुपमा सोचती दिख रही है कि वह अपने किसी भी बच्चों को खुद से अलग नहीं होने देगी . लेकिन वह एक-एक रिश्ते को खोती हुई दिख रही है. इसी के साथ अनुज का साथ पाने के बावजूद वह उससे दूर होता दिख रहा है. जहां प्रोमो देखकर दर्शक हैरान हैं तो वहीं #Maan फैंस कयास लगा रहे हैं कि अपकमिंग एपिसोड में अनुज की मौत होने वाली है, जिसके चलते वह परेशान हैं और मेकर्स से ट्रैक चेंज करने की बात कर रहे हैं.

 

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कपाड़िया हाउस में हंगामा करेगा वनराज

 

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अब तक आपने देखा कि वनराज, कपाडिया हाउस पहुंचता है. जहां वह हंगामा करता है और अनुपमा और अनुज पर इल्जाम लगाता है. दरअसल, वनराज, पाखी और अधिक के साथ होने पर गुस्से में झगड़ा करता है, जिसके चलते अंकुश और बरखा उससे लड़ते हुए दिखते हैं. वहीं वनराज, पाखी को शाह हाउस से निकलने की बात कहता है, जिसे सुनते ही अनुपमा, पाखी को वापस जाने के लिए कहती है.

पाखी की बात से टूटेगी अनुपमा

 

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अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि वनराज और अनुपमा के गुस्से करने के बाद पाखी शाह हाउस जाएगी और जाते-जाते अनुपमा को गले लगाकर कहेगी कि वह अपनी असली बेटी को अपनी नई बेटी के लिए भेज रही है और क्या पता वह हमेशा के लिए यहां रहने आ जाए. पाखी की बात सुनकर अनुपमा का दिल टूट जाएगा. हालांकि अनुज उसे दिलासा देता दिखेगा. वहीं दूसरी तरफ पाखी गुस्से में बा और वनराज संग लड़ती दिखेगी और घर से भाग जाने की बात कहेगी.

Alia Bhatt के चेहरे पर दिखा प्रेगनेंसी ग्लो, फैंस कर रहे तारीफ

 बौलीवुड एक्ट्रेस आलिया भट्ट ( Alia Bhatt) इन दिनों अपनी प्रैग्नेंसी के चलते फैंस के बीच छाई हुई हैं. वहीं पति रणबीर कपूर के साथ उनकी पहली प्रैग्नेंसी के चलते वह मीडिया की सुर्खियों में हैं. इसी बीच एक्ट्रेस आलिया भट्ट ने प्रैग्नेंसी अनाउंसमेंट के बाद पहली बार मीडिया के सामने पहुंची हैं, जिसे देखकर फैंस उनके लुक की तारीफ कर रहे हैं. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…

ट्रेलर लॉच पर पहुंची आलिया

 

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हाल ही में अपनी पहली प्रोडक्शन ‘डार्लिंग्स’ (Darlings) के ट्रेलर लौंच पर एक्ट्रेस आलिया भट्ट का लुक सुर्खियों में आ गया है. दरअसल, अपकमिंग फिल्म ‘डार्लिंग्स’ के ट्रेलर लौंच पर पहुंची आलिया भट्ट ने पीले रंग की ड्रेस पहनी थीं, जिसमें उनका बेबी बंप तो नहीं नजर आ रहा था. लेकिन प्रैग्नेंसी के कारण चेहरे का ग्लो देख फैंस उनकी तारीफें करते दिख रहे थे.

 

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रणवीर सिंह के सवाल पर कही ये बात

 

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फिल्म के ट्रेलर लौंच पर जहां अपनी ग्लोइंग स्किन के चलते एक्ट्रेस आलिया भट्ट सुर्खियों में हैं तो वहीं रणवीर सिंह के हाल ही में वायरल हुए बोल्ड फोटोशूट पर क्यूट रिएक्शन के चलते मीडिया में छाई हुई हैं. दरअसल, एक्ट्रेस ने एक्टर के सवाल पर क्यूट अंदाज में कहा कि वह रणवीर सिंह के फोटोशूट पर कुछ नहीं कहना चाहती हैं.

फोटोज क्लिक करवाती दिखीं आलिया

 

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पीले कलर की ड्रैस के अलावा एक्ट्रेस आलिया भट्ट शरारा पहने मीडिया के सामने पोज देती हुई भी नजर आईं. काले कलर के शरारा में जहां एक्ट्रेस चुन्नी से अपना बेबी बंप छिपाती दिखीं तो वहीं फोटोज क्लिक करवाने के लिए कभी गार्डन तो कभी बिल्डिंग के सामने पोज देती नजर आईं. आलिया भट्ट का ये क्यूट अंदाज फैंस को काफी पसंद आ रहा है.

बता दें डार्लिंग्स आलिया भट्ट के प्रौडक्शन में बनीं पहली फिल्म है, जो 5 अगस्त 2022 को नेटफ्लिक्स पर रिलीज होने वाली है, जिसके चलते वह सुर्खियों में हैं.

Photo And Video Credit- Viral Bhayani

Monsoon Special: फैमिली के लिए बनाएं दाल पनीरी

फैमिली के लिए हैल्दी रेसिपी ट्राय करना चाहते हैं तो आज हम आपको दाल पनीरी के रेसिपी के बारे में बताएंगे, जिसे आप आसानी से बनाकर खिला सकते हैं.

सामग्री

–  1 कप उरद दाल छिलके वाली

–  50 ग्राम पनीर

–  1 छोटी गांठ अदरक बारीक कटा

–  1 हरीमिर्च बारीक कटी

–  2 बड़े चम्मच टमाटर पिसे

–  2 बड़े चम्मच प्याज पिसे

–  1 बड़ा चम्मच नीबू का रस

–  1 छोटा चम्मच जीरा

–  1 छोटा चम्मच धनिया पाउडर

–  6 कालीमिर्च

–  3 लौंग

–  1/2 छोटा चम्मच हलदी पाउडर

–  1/4 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर

–  1/4 छोटा चम्मच अमचूर पाउडर

–  1/2 छोटा चम्मच गरममसाला

–  1 बड़ा चम्मच घी

–  नमक स्वादानुसार.

विधि

दाल को धो कर 1/2 घंटे के लिए पानी में भिगो दें. पनीर को मनचाहे आकार के टुकड़ों में काट लें. दाल को 4 गुना पानी और नमकहलदी के साथ प्रैशर कुकर में उबालें. कड़ाही में घी गरम कर के जीरा, कालीमिर्च, लौंग व हरीमिर्च डालें. जीरा चटकने पर पिसा प्याज डाल कर ब्राउन होने तक भूनें. टमाटर पेस्ट, धनिया, लालमिर्च व अमचूर मिला कर भूनें. मसाला कड़ाही छोड़ने लगे तब पनीर व दाल मिला दें. 1 मिनट पकाएं. गरममसाला और नीबू का रस मिला कर सर्व करें.

कैसे करें स्मार्ट निवेश

भारतीय मध्यमवर्ग को अच्छे बचतकर्ता के रूप में जाना जाता है. विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार वह अपनी आय का लगभग 25% बचाता है. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वर्ग अपनी बचत को स्मार्ट तरीके से निवेश कर रहा हैं? अधिकतर भारतीय लौकर या बैंकों में नकदी रखना पसंद करते हैं. तो सवाल यह उठता है कि उस नकदी को अपने लौकर में रखने से ज्यादा अच्छा विकल्प क्या है?

समय के साथ नकद कम मूल्यवान हो जाता है. उदाहरण के लिए 10 साल पहले के 100 रुपए का मूल्य आज के 100 रुपए से अधिक था. इसलिए नकदी अपने पास रखने के बजाय हमें नकदी का निवेश करना चाहिए ताकि हम मुद्रास्फीति को मात दे सकें. इस के बावजूद अधिकांश निवेशक मुद्रास्फीति को ध्यान में नहीं रखते हैं. मनोवैज्ञानिक इसे धन का मोह बताते हैं.

अगर मुद्रास्फीति में 7% की वृद्धि हुई है तो वेतन में 5% की वृद्धि प्रभावी रूप से हमारे पास उपलब्ध धन में एक ‘कटौती’ है. इस के बावजूद आम तौर पर लोग इस परिदृश्य में 1 वर्ष के दौरान 1% वेतन कटौती करना पसंद करते हैं जब मुद्रास्फीति शून्य होती है. इसलिए अपनी निवेश की सफलता को इस बात से मापें कि मुद्रास्फीति के बाद आप कितना अपने पास रख रहे हैं बजाय इस के कि आप अपने निवेश से कितना कमा रहे हैं.

निवेश करना कैसे शुरू करें

शेयर बाजार में कदम रखने से पहले बुनियादी बातों को जानना जरूरी है. इसलिए यूट्यूब वीडियो देख कर या किताबें पढ़ कर खुद को शिक्षित करें. शेयर बाजारों को सम झने से आप को बेहतर वित्तीय निर्णय लेने में मदद मिलेगी. नए वित्तीय उत्पादों की जानकारी रखें और उद्योग के विशेषज्ञों द्वारा निवेश पर लिखी पुस्तकें पढ़ें. वित्तीय समाचारों के बारे में सामान्य जागरूकता भी स्मार्ट तरीके से निवेश करने का एक अच्छा तरीका है.

अगला कदम यह है कि जल्दी निवेश शुरू करना, जो निश्चित रूप से बचत देता है और भले ही आप ने अपने जीवन के उस बिंदु को पार कर लिया हो परंतु कभी न करने से अच्छा देरी से निवेश करना भी है. शुरुआती निवेश यह सुनिश्चित कर सकता है कि आप के पैसे को पर्याप्त कौर्पस फंड में विकसित होने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है जो आप को जरूरत के समय या जब आप रिटायर होने का फैसला करते हैं तो आप की अच्छी हैल्थ करेगा.

जीवन में किसी भी अन्य चीज की तरह निरंतरता माने रखती है और इसलिए स्मार्ट निवेश के लिए भी निरंतरता बनाए रखें. साल में सिर्फ एक बार या छिटपुट रूप से निवेश न करें क्योंकि यह काफी नहीं है. पैसे को अच्छी तरह से बढ़ाने और अनुशासित तरीके से निवेश करने के लिए हर महीने एक निर्धारित राशि को अलग रखें. इस अनुशासन का पालन करने के लिए व्यवस्थित निवेश योजना (एसआईपी) और औटोभुगतान विकल्प कुछ बेहतरीन विकल्प हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि बिना किसी असफलता के हर महीने एक निश्चित राशि निवेश के लिए रख ली जाए.

आगे क्या करना है

आप को एसआईपी के जरीए कहां निवेश करना चाहिए? इस का सामान्य नियम एक विविध पोर्टफोलियो बनाना है. एक कहावत है कि अपने सभी अंडे कभी भी एक टोकरी में न रखें. बस यही विविधता है. यह जोखिम के प्रबंधन में मदद करता है. केवल एक स्टौक में निवेश पर ध्यान केंद्रित नहीं करने और विविध पोर्टफोलियो रखने वाले निवेशकों के लिए कोविड एक आंख खोलने वाली स्थिति है.

इसलिए हमेशा सलाह दी जाती है कि आप अपने निवेश को अलगअलग एसेट क्लास में डायवर्सिफाई करें. एसआईपी के माध्यम से निवेश करना आप के निवेश दृष्टिकोण में अनुशासन लाता है. अच्छे निवेशक अकसर सलाह देते हैं कि आप की दिनप्रतिदिन की वित्तीय गतिविधियों को एक सरल फौर्मूले (कमाई+बचत=व्यय) के इर्दगिर्द तैयार किया जाना चाहिए.

मान लीजिए कि आप हर महीने क्व30 हजार कमाते हैं और यदि आप एक निश्चित बजट के भीतर अपने खर्च को नियंत्रित करने में असमर्थ हैं, तो ऐसा हो सकता है कि महीने के अंत में आप के पास बचाने के लिए कुछ भी न बचे. लेकिन अगर आप एसआईपी में निवेश करते हैं, तो आप एक अनुशासित निवेश व्यवस्था का पालन करने के लिए मजबूर होंगे. अगर आप को पता है कि आप के खर्चे क्या हैं तो आप तय बजट के भीतर खर्च करने की आदत डाल लेंगे. उस में पहले आप बचत करेंगे और फिर खर्च करेंगे.

यदि आप अपनी वित्तीय गतिविधियों को इस के इर्दगिर्द बनाते हैं यानी पहले बचत करें और फिर खर्च करें, तो आप को कभी भी किसी भी वित्तीय कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ेगा क्योंकि आप एक अनुशासित निवेश दृष्टिकोण का पालन कर रहे हैं. अपने निवेश दृष्टिकोण में नियमितता बनाए रखने से आप को अपने वित्तीय लक्ष्य या वित्तीय उद्देश्य को प्राप्त करने में मदद मिलती है.

एसआईपी क्यों

यह सब गणित में है. चक्रवृद्धि ब्याज की शक्ति गणित द्वारा हमें दिए गए सर्वोत्तम उपकरणों में से एक है. समय एक निवेशक के पास उपलब्ध सब से बड़ी संपत्ति में से एक है और इसे वित्तीय लाभ के लिए उपयोग करना बुद्धिमानी है. एक उदाहरण के तौर पर, क्व5 हजार का निवेश प्रतिमाह लगातार 10 वर्षों तक 12% के निवेश रिटर्न पर करने से 11.50 लाख रुपए की राशि एकत्रित हो सकती है.

अनुरूपता और धैर्य कुंजी है. कम से कम समय में अधिकतम संभावित रिटर्न के पीछे न भागें. स्मार्ट निवेश कम जोखिम और स्थिर निवेश के बारे में है जो लंबी अवधि के लिए किए जाते हैं. ये सब से अच्छे होते हैं.

शेयर बाजार में निवेश करते समय जोखिम उठाने की क्षमता विकसित करने की आवश्यकता होती है: सभी निवेशों में जोखिम शामिल होता है. यह निवेश का एक अनिवार्य पहलू है, हालांकि कोई कितना जोखिम लेने को तैयार है, इसे मापा जा सकता है. अपने वित्तीय लक्ष्य निर्धारित करते समय जोखिम सहनशीलता को ध्यान में रखें. वित्तीय नुकसान की उस सीमा को जानना, जो आप सहन कर सकते हैं और अशांत बाजारों के लिए आप की सहनशीलता महत्त्वपूर्ण है, जो आप के वित्तीय भविष्य को सुरक्षित करने में मदद करेगी. यदि जोखिम उठाने की क्षमता कम है, तो डिबैंचर और बौंड में निवेश करें.

 झुंड की मानसिकता से बचें

‘‘क्रिप्टोकरंसी अच्छी है. मेरे किसी परिचित ने बहुत पैसा कमाया है,’’ इस तरह की सलाह का पालन न करें. बैंजामिन ग्राहम ने अपनी पुस्तक ‘द इंटैलिजैंट इन्वैस्टर’ में कहा है, ‘‘यहां तक कि बुद्धिमान निवेशक को भी भीड़ का अनुशरण करने से बचने के लिए पर्याप्त इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है.’’

वित्तीय निवेश करते समय बाकी जो कर रहे हैं उस का पालन करना आसान है, लेकिन यह हमेशा आप के लिए सही रास्ता नहीं हो सकता है. वित्तीय लक्ष्य बेहद व्यक्तिपरक होते हैं. वे आप की जोखिम सहनशीलता, धन के प्रति आप के विचार और आप के परिवार की जरूरतों पर निर्भर करते हैं. प्रत्येक व्यक्ति अलग है और सभी दृष्टिकोण के लिए कोई एक आ कर फिट नहीं होता है. इसलिए उस हौट टिप का अनुसरण करना जिस के पीछे बाकी सभी लोग जा रहे हैं, शायद सब से बुद्धिमान विकल्प न साबित हो.

‘सब्र का फल मीठा होता है’ इस कहावत को वित्तीय दुनिया पर भी लागू किया जा सकता है. अधिकांश निवेशक तत्काल लाभ की तलाश में रहते हैं. हालांकि इस तरह की जल्दबाजी से महत्त्वपूर्ण वित्तीय नुकसान हो सकता है. इस के बजाय निवेश को लंबी अवधि की कवायद के रूप में देखना ज्यादा फायदेमंद है क्योंकि अच्छा मुनाफा बनने में समय लगता है. धैर्य एक गुण है.

निवेश को नियमित रूप से ट्रैक करें

निवेश में बहुत अधिक पोषण शामिल होता है. यही कारण है कि अपने पैसे की निगरानी रखना महत्त्वपूर्ण है. उपलब्धि को ट्रैक करने और उस का विश्लेषण करने के लिए आप के पास स्प्रैडशीट्स बनाने के लिए नि:शुल्क टूल उपलब्ध हैं जिन में आप के सभी निवेश सूचीबद्ध हो जाते हैं. मासिक व्यय रिपोर्ट बनाने से बचत रणनीतियों को बढ़ाने और यह सम झने में मदद मिल सकती है कि कितनी तरलता की आवश्यकता है. इन सभी छोटे विषयों को जब एकसाथ मिलाया जाता है तो ये आप के एक अच्छे वित्तीय भविष्य के लिए एक मजबूत स्मार्ट निवेश और वित्तीय प्रणाली बना सकते हैं.

 -डाक्टर समीर कपूर

फाइनैंस ट्रेनर और कंसल्टैंट –

स्मार्ट निवेश क्या है

यह सही निवेश विकल्प है जो आप के भविष्य के वित्तीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में आप की मदद करने के लिए आप की जरूरी आवश्यकताओं को पूरा करता है. एक भीड़भाड़ वाले बाजार और आसपास निवेश के अवसरों के बहुत अधिक शोर के बीच अपने समय और धन की अच्छी तरह से योजना बनाने के लिए एक स्मार्ट निवेशक होना जरूरी है.

स्मार्ट निवेश निम्न में मदद करता है:

–  आय का एक अतिरिक्त स्रोत बनाने में.

–  वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने में.

–  धन का निर्माण करने में.

आप कैसे निवेश करते हैं, यह चुनने से पहले आप को निम्नलिखित कारकों पर विचार करना चाहिए:

–  क्या आप अविवाहित हैं या विवाहित हैं? क्या आप का साथी काम करता है और वह कितना पैसा कमाती है?

–  क्या आप के बच्चे हैं? यदि नहीं तो क्या आप बच्चे चाहते हैं? उच्च लागत जैसेकि कालेज शिक्षा, कब शुरू होगी?

–  क्या आप को कभी  विरासत में धन मिलेगा या क्या आप को मातापिता को केयर होम में रखने के लिए पैसे खर्च करने होंगे?

–  क्या आप की नौकरी सुरक्षित है या यदि आप स्वनियोजित हैं तो समान कंपनियां आमतौर पर कितने समय तक चलती हैं?

–  क्या आप को अपने जीवनयापन के लिए अपनी नकद आय की पूर्ति करने के लिए अपने निवेश की आवश्यकता है? यदि हां तो आप के पास स्टौक के बजाय बौंड में अधिक पैसा होना चाहिए

–  आप निवेश में कितना पैसा गंवा सकते हैं?

जनता का बेड़ा पार तो रामजी करेंगे

जब घर में आग लगी हो तो क्या आप को यह देखने की फुरसत होती है कि पड़ोसिन की बेटी ने आज स्लीवलैस टौप और शौर्ट क्यों पहने हैं या आप अमरनाथ यात्रा के लिए बैंक में जा कर बचाखुचा पैसा निकालने दौड़ती हैं? नहीं न. पर भारत सरकार को इसी की चिंता है. जब देश महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रहा हो, भारत सरकार की सत्तारूढ़ पार्टी के मुख्य काम क्या हैं- मंदिर बनवाना, मुहम्मद साहब का इतिहास खोजना, मसजिदों में खुदाई कर के शिवलिंग ढूंढ़ना, ईडी से छापे मरवाना ताकि विपक्ष का सफाया हो सके. दूसरे दलों में सेंध लगाना कि राज्यसभा की 4 सीटें ज्यादा मिल जाएं बगैरा.

ऐसा लगता ही नहीं है कि सरकार चलाने वाले प्रधानमंत्री या किसी और नाम के बने मंत्री को देश की बढ़ती महंगाई की कोई चिंता है. ठीक है, कुछ रुपए डीजल और पैट्रोल पर कम कर दिए पर उस से ज्यादा तो अनाज और खानेपीने की चीजों के दाम बढ़ने से जेब से निकल गए. जिन्हें हम ने चुना था वे सफाई नहीं दे रहे, रिजर्व बैंक के गवर्नर दे रहे हैं जो सिर्फ अफसरी करते रहे हैं.

देशभर में हिंदूमुसलिम अलगाव को फैलाने की कोशिशें जारी हैं, भड़काऊ भाषणों से अखबारों के पन्ने और चैनलों की सुर्खियां भरी पड़ी हैं. आम औरत किस तरह अपना पेट काट कर गुजारा कर रही है, इस का कोई खयाल नहीं रख रहा.

सरकार का कोई विभाग अपने खर्चे में कटौती नहीं कर रहा. पुलिस पर बेहद खर्च किया जा रहा है पर आप के घर को सुरक्षित करने के लिए नहीं, आप के पड़ोस के मंदिर को या मुसलमानों को पकड़नेधकड़ने में. चप्पेचप्पे पर पुलिस का जो पहरा है वह मुफ्त नहीं होता. उस पर जनता का टैक्स लगता है, यह नहीं बचाया जा रहा.

उत्तर प्रदेश में वाराणसी पर गंगा की दूसरी तरफ सड़क बन रही है ताकि आरतियां देखी जा सकें जो थोक में हो रही हैं और जिन पर अरबों बरबाद होंगे. दिल्ली में नया संसद भवन बन रहा है जिस पर सैकड़ों करोड़ बेबात में खर्च होंगे. गौशालाओं के लिए सरकार के पास पैसे हैं पर स्कूलों को, किताबों को मुफ्त करने के लिए नहीं. अस्पताल सरकार नहीं खोलेगी, निजी क्षेत्र खोलेगा जो एक इंजैक्शन लगाने के क्व1,000 झटक लेगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 जून को अस्पतालों में पैसा लगाने वालों से कहा कि अगला साल उन के लिए अच्छा होगा. शायद इसलिए कि सरकार अपनी जनता के प्रति सरकारी अस्पताल खोलने की ड्यूटी में और ढीलढाल करेगी.

महंगाई से निबटने के लिए सरकार को अपने सरकारी ढांचे का क्या करना चाहिए, जनता व सिर पर बैठे इंस्पैक्टरों को क्या करना चाहिए? बेकार के कानूनों को लागू करने में लगने वाले पैसे को बचाना चाहिए. मंत्रियों और नेताओं को सुरक्षा के नाम पर मिल रही फौज में कटौती करनी चाहिए, सरकारी कर्मचारियों के वेतन काटने चाहिए, सरकारी स्कूल ठीक करने चाहिए ताकि लोग अपने बच्चों को महंगे प्राइवेट स्कूलों में न भेजें. सरकार यह सबकुछ न कर के सिर्फ  जय राम, जय राम कर रही है. यह भगवान को चाहे खुश करता हो, भगवानों के दुकानदारों को ज्यादा दक्षिणा दिलाता हो, आम घरवाली की आफतों में कमी नहीं करता.

दो कदम तन्हा: भाग-1

‘‘दास.’’ अपने नाम का उच्चारण सुन कर

डा. रविरंजन दास ठिठक कर खड़े हो गए. ऐसा लगा मानो पूरा शरीर झनझना उठा हो. उन के शरीर के रोएं खड़े हो गए. मस्तिष्क में किसी अदृश्य वीणा के तार बज उठे. लंबीलंबी सांसें ले कर डा. दास ने अपने को संयत किया. वर्षों बाद अचानक यह आवाज? लगा जैसे यह आवाज उन के पीछे से नहीं, उन के मस्तिष्क के अंदर से आई थी. वह वैसे ही खड़े रहे, बिना आवाज की दिशा में मुड़े. शंका और संशय में कि दोबारा पीछे से वही संगीत लहरी आई, ‘‘डा. दास.’’

वह धीरेधीरे मुड़े और चित्रलिखित से केवल देखते रहे. वही तो है, अंजलि राय. वही रूप और लावण्य, वही बड़ी- बड़ी आंखें और उन के ऊपर लगभग पारदर्शी पलकों की लंबी बरौनियां, मानो ऊषा गहरी काली परतों से झांक रही हो. वही पतली लंबी गरदन, वही लंबी पतली देहयष्टि. वही हंसी जिस से कोई भी मौसम सावन बन जाता है…कुछ बुलाती, कुछ चिढ़ाती, कुछ जगाती.

थोड़ा सा वजन बढ़ गया है किंतु वही निश्छल व्यक्तित्व, वही सम्मोहन.  डा. दास प्रयास के बाद भी कुछ बोल न सके, बस देखते रहे. लगा मानो बिजली की चमक उन्हें चकाचौंध कर गई. मन के अंदर गहरी तहों से भावनाओं और यादों का वेग सा उठा. उन का गला रुंध सा गया और बदन में हलकी सी कंपन होने लगी. वह पास आई. आंखों में थोड़ा आश्चर्य का भाव उभरा, ‘‘पहचाना नहीं क्या?’’

‘कैसे नहीं पहचानूंगा. 15 वर्षों में जिस चेहरे को एक पल भी नहीं भूल पाया,’ उन्होंने सोचा.

‘‘मैं, अंजलि.’’

डा. दास थोड़ा चेतन हुए. उन्होंने अपने सिर को झटका दिया. पूरी इच्छा- शक्ति से अपने को संयत किया फिर बोले, ‘‘तुम?’’

‘‘हां, मैं. गनीमत है पहचान तो लिया,’’ वह खिलखिला उठी और

डा. दास को लगा मानो स्वच्छ जलप्रपात बह निकला हो.

‘‘मैं और तुम्हें पहचानूंगा कैसे नहीं? मैं ने तो तुम्हें दूर से पीछे से ही पहचान लिया था.’’

मैदान में भीड़ थी. डा. दास धीरेधीरे फेंस की ओर खिसकने लगे. यहां कालिज के स्टूडेंट्स और डाक्टरों के बीच उन्हें संकोच होने लगा कि जाने कब कौन आ जाए.

‘‘बड़ी भीड़ है,’’ अंजलि ने चारों ओर देखा.

‘‘हां, इस समय तो यहां भीड़ रहती ही है.’’

शाम के 4 बजे थे. फरवरी का अंतिम सप्ताह था. पटना मेडिकल कालिज के मैदान में स्वास्थ्य मेला लगा था. हर साल यह मेला इसी तारीख को लगता है, कालिज फाउंडेशन डे के अवसर पर…एक हफ्ता चलता है. पूरे मैदान में तरहतरह के स्टाल लगे रहते हैं. स्वास्थ्य संबंधी प्रदर्शनी लगी रहती है. स्टूडेंट्स अपना- अपना स्टाल लगाते हैं, संभालते हैं. तरहतरह के पोस्टर, स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां और मरीजों का फ्री चेकअप, सलाह…बड़ी गहमागहमी रहती है.

शाम को 7 बजे के बाद मनोरंजन कार्यक्रम होता है. गानाबजाना, कवि- सम्मेलन, मुशायरा आदि. कालिज के सभी डाक्टर और विद्यार्थी आते हैं. हर विभाग का स्टाल उस विभाग के एक वरीय शिक्षक की देखरेख में लगता है. डा. दास मेडिसिन विभाग में लेक्चरर हैं. इस वर्ष अपने विभाग के स्टाल के वह इंचार्ज हैं. कल प्रदर्शनी का आखिरी दिन है.

‘‘और, कैसे हो?’’

डा. दास चौंके, ‘‘ठीक हूं…तुम?’’

‘‘ठीक ही हूं,’’ और अंजलि ने अपने बगल में खड़े उत्सुकता से इधरउधर देखते 10 वर्ष के बालक की ओर इशारा किया, ‘‘मेरा बेटा है,’’ मानो अपने ठीक होने का सुबूत दे रही हो, ‘‘नमस्ते करो अंकल को.’’

बालक ने अन्यमनस्क भाव से हाथ जोड़े. डा. दास ने उसे गौर से देखा फिर आगे बढ़ कर उस के माथे के मुलायम बालों को हलके से सहलाया फिर जल्दी से हाथ वापस खींच लिया. उन्हें कुछ अतिक्रमण जैसा लगा.

‘‘कितनी उम्र है?’’

‘‘यह 10 साल का है,’’ क्षणिक विराम, ‘‘एक बेटी भी है…12 साल की, उस की परीक्षा नजदीक है इसलिए नहीं लाई,’’ मानो अंजलि किसी गलती का स्पष्टीकरण दे रही हो. फिर अंजलि ने बालक की ओर देखा, ‘‘वैसे परीक्षा तो इस की भी होने वाली है लेकिन जबरदस्ती चला आया. बड़ा जिद्दी है, पढ़ता कम है, खेलता ज्यादा है.’’

बेटे को शायद यह टिप्पणी नागवार लगी. अंगरेजी में बोला, ‘‘मैं कभी फेल नहीं होता. हमेशा फर्स्ट डिवीजन में पास होता हूं.’’

डा. दास हलके से मुसकराए, ‘‘मैं तो एक बार एम.आर.सी.पी. में फेल हो गया था,’’ फिर वह चुप हो गए और इधरउधर देखने लगे.

कुछ लोग उन की ओर देख रहे थे.

‘‘तुम्हारे कितने बच्चे हैं?’’

डा. दास ने प्रश्न सुना लेकिन जवाब नहीं दिया. वह बगल में बाईं ओर मेडिसिन विभाग के भवन की ओर देखने लगे.

अंजलि ने थोड़ा आश्चर्य से देखा फिर पूछा, ‘‘कितने बच्चे हैं?’’

‘‘2 बच्चे हैं.’’

‘‘लड़के या लड़कियां?’’

‘‘लड़कियां.’’

‘‘कितनी उम्र है?’’

‘‘एक 10 साल की और एक 9 साल की.’’

‘‘और कैसे हो, दास?’’

‘‘मुझे दास…’’ अचानक डा. दास चुप हो गए. अंजलि मुसकराई. डा. दास को याद आ गया, वह अकसर अंजलि को कहा करते थे कि मुझे दास मत कहा करो. मेरा पूरा नाम रवि रंजन दास है. मुझे रवि कहो या रंजन. दास का मतलब स्लेव होता है.

अंजलि ऐसे ही चिढ़ाने वाली हंसी के साथ कहा करती थी, ‘नहीं, मैं हमेशा तुम्हें दास ही कहूंगी. तुम बूढ़े हो जाओगे तब भी. यू आर माई स्लेव एंड आई एम योर स्लेव…दासी. तुम मुझे दासी कह सकते हो.’

आज डा. दास कालिज के सब से पौपुलर टीचर हैं. उन की कालिज और अस्पताल में बहुत इज्जत है. लोग उन की ओर देख रहे हैं. उन्हें कुछ अजीब सा संकोच होने लगा. यहां यों खड़े रहना ठीक नहीं लगा. उन्होंने गला साफ कर के मानो किसी बंधन से छूटने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘बहुत भीड़ है. बहुत देर से खड़ा हूं. चलो, कैंटीन में बैठते हैं, चाय पीते हैं.’’

अंजलि तुरंत तैयार हो गई, ‘‘चलो.’’

बेटे को यह प्रस्ताव नहीं भाया. उसे भीड़, रोशनी और आवाजों के हुजूम में मजा आ रहा था, बोला, ‘‘ममी, यहीं घूमेंगे.’’

‘‘चाय पी कर तुरंत लौट आएंगे. चलो, गंगा नदी दिखाएंगे.’’

गेट से निकल कर तीनों उत्तर की ओर गंगा के किनारे बने मेडिकल कालिज की कैंटीन की ओर बढ़े. डा. दास जल्दीजल्दी कदम बढ़ा रहे थे फिर अंजलि को पीछे देख कर रुक जाते थे. कैंटीन में भीड़ नहीं थी, ज्यादातर लोग प्रदर्शनी में थे. दोनों कैंटीन के हाल के बगल वाले कमरे में बैठे.

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