जानें ऐश्वर्या राय बच्चन के मेकअप टिप्स

उम्र के 45वें पड़ाव को पार करने के बाद भी ऐश्वर्या की खूबसूरती पर कोई फर्क नहीं पड़ा है. नैचुरल रूप से खूबसूरत विश्वसुंदरी ऐश्वर्या का मेकअप और हेयरस्टाइल हमेशा आकर्षक होता है. ऐश्वर्या राय न केवल औनस्क्रीन शानदार दिखती हैं बल्कि उन के रैड कारपेट लुक भी मेकअप लवर्स के लिए ब्यूटी लैसंस का जरीया होते हैं. आप ऐश्वर्या से सीख सकती हैं कि मेकअप से अपनी प्राकृतिक सुंदरता में चार चांद कैसे लगाए जाएं:

विंग्ड आई मेकअप:

आंखों का यह मेकअप आप की आंखों को अच्छी शेप देने में मदद करता है खासकर बादाम के आकार की आंखों वाली महिलाओं को विंग्ड आईलाइनर जरूर ट्राई करना चाहिए. ऐश्वर्या की आंखें विंग्ड आईलाइनर के प्रयोग से और भी खूबसूरत व लंबी दिखती हैं. इस के साथ ही उन की घनी पलकें उन के लुक को और अधिक खूबसूरत बना देती हैं.

ब्लो ड्राई हेयर:

ऐश्वर्या हमेशा क्लासिक सिंपल ब्लो ड्राई हेयर में दिखती हैं. यह एवरग्रीन हेयरस्टाइल न केवल उन्हें सूट करता है बल्कि किसी को भी अट्रैक्ट कर सकता है. एक क्लासिक लुक के लिए आप भी ऐश की तरह एक बाउंसी ब्लो ड्राई हेयर स्टाइल चुन सकती हैं. इस से आप के बाल शाइनी और घने दिखेंगे, साथ ही स्मूद भी होंगे.

ओवरऔल ग्लो:

ज्यादातर महिलाएं चीकबोन, नाक और ब्रो बोन पर हाइलाइटर लगाती हैं, लेकिन ऐश्वर्या ओवरऔल ग्लो पर विश्वास रखती हैं. उन के हर लुक में यह देखने को भी मिलता है. यह एक ऐसा ट्रिक है जिस से उन के चेहरे का बीच का हिस्सा ग्लो करता है और यह वही हिस्सा होता है जिस पर सब से ज्यादा लाइट पड़ती है. इस से वे हमेशा पिक्चर परफैक्ट लुक में दिखती हैं.

शेप्ड आईब्रोज:

आजकल लड़कियों और सैलिब्रिटीज की पहली पसंद हेवी और स्ट्रेट ब्रोज हैं. लेकिन ऐश्वर्या हमेशा शेप्ड आईब्रोज के औप्शन को ही चुनती हैं. यह सच है कि अगर ब्रोज ठीक से शेप में न हों तो चेहरे का आकर्षण कम हो जाता है. मगर शेप्ड आईब्रोज लुक को स्मार्टनैस देता है.

रैड लिप्स:

ओवरऔल मेकअप कैसा भी हो, मगर ऐश्वर्या रैड लिप्स पसंद करती हैं. आप उन्हें रैड लिपस्टिक के लगभग सभी शेडस में देख चुकी होंगी. डार्क रैड हो, वाइन रैड हो या फायरी रैड शेड, हर एक मौके के लिए रैड कलर परफैक्ट होता है.

क्या जरूरी है शादी करना

सोनिया 20 साल की हुई नहीं कि उस की मां को उस की शादी की चिंता सताने लगी. लेकिन सोनिया ने तो ठान लिया है कि वह पहले पढ़ाई पूरी करेगी, फिर नौकरी करेगी और तब महसूस हुआ तो शादी करेगी वरना नहीं. सोनिया की इस घोषणा की जानकारी मिलते ही परिवार में हलचल मच गई. सभी सोनिया से प्रश्न पर प्रश्न पूछने लगे तो वह फट पड़ी, ‘‘बताओ भला, शादी में रखा ही क्या है? एक तो अपना घर छोड़ो, दूसरे पराए घर जा कर सब की जीहुजूरी करो. अरे, शादी से पतियों को होता आराम, लेकिन हमारा तो होता है जीना हराम. पति तो बस बैठेबैठे पत्नियों पर हुक्म चलाते हैं. खटना तो बेचारी पत्नियों को पड़ता है. कुदरत ने भी पत्नियों के सिर मां बनने का बोझ डाल कर नाइंसाफी की है. उस के बाद बच्चे के जन्म से ले कर खानेपीने, पढ़ानेलिखाने की जिम्मेदारी भी पत्नी की ही होती है. पतियों का क्या? शाम को दफ्तर से लौट कर बच्चों को मन हुआ पुचकार लिया वरना डांटडपट कर दूसरे कमरे में भेज आराम फरमा लिया.’’

यह बात नहीं है कि ऐसा सिर्फ सोनिया का ही कहना है. पिछले दिनों अंजु, रचना, मधु, स्मृति से मिलना हुआ तो पता लगा अंजु इसलिए शादी नहीं करना चाहती, क्योंकि उस की बहन को उस के पति ने दहेज के लिए बेहद तंग कर के वापस घर भेज दिया. रचना को लगता है कि शादी एक सुनहरा पिंजरा है, जिस की रचना लड़कियों की आजादी को छीनने के लिए की गई है. स्मृति को शादीशुदा जीवन के नाम से ही डर लगता है. उस का कहना है कि यह क्या बात हुई. जिस इज्जत को ले कर मांबाप 20 साल तक बेहद चिंतित रहते हैं, उसे पराए लड़के के हाथों निस्संकोच सौंप देते हैं. उन की बातें सुन कर मन में यही खयाल आया कि क्या शादी करना जरूरी है. उत्तर मिला, हां, जरूरी है, क्योंकि पति और पत्नी एकदूसरे के पूरक होते हैं. दोनों को एकदूसरे के साथ की जरूरत होती है. शादी करने से घर और जिंदगी को संभालने वाला विश्वसनीय साथी मिल जाता है. व्यावहारिकता में शादी निजी जरूरत है, क्योंकि पति/पत्नी जैसा दोस्त मिल ही नहीं सकता.

सामाजिक सम्मान

पतिपत्नी का रिश्ता एक आवश्यकता है. दुनिया में हर आदमी अच्छे स्वस्थ संबंधों की कामना करता है. अच्छे संबंध पतिपत्नी को बेहतर इनसान बनाने में मदद करते हैं. इस बात से आप मुंह नहीं मोड़ सकते. लंबी आयु के लिए भी शादीशुदा होना जरूरी है. इस सुझाव में न तो खानपान पर रोक है न ही कोई बंदिश. यानी हींग लगे न फिटकरी रंग भी आए चोखा. लंदन स्कूल आफ इकोनोमिक्स के जानेमाने रिसर्चर प्रोफैसर माइक मर्फी के मुताबिक शादी खुद ही एक तरह का फायदा है. उन की रिसर्च के अनुसार अविवाहित लोगों के मुकाबले शादीशुदा लोग न केवल लंबी जिंदगी जीते हैं, बल्कि उन की सेहत भी ज्यादा ठीक रहती है.

उम्र ढलने पर उन्हें ज्यादा देखभाल भी हासिल होती है. जहां 34 साल से कम उम्र के अविवाहित पुरुषों में मृत्युदर इस उम्र के शादीशुदा पुरुषों के मुकाबले ढाई गुना ज्यादा पाई गई, वहीं अविवाहित बुजुर्ग महिलाओं में भी उन की शादीशुदा साथियों के मुकाबले मृत्युदर कहीं ज्यादा पाई गई. विवाह तो इनसानी सभ्यता की न जाने कितनी पुरानी रस्म है. हजारों सालों से विवाह होते आ रहे हैं. यदि शादी नाम की संस्था न होती तो क्या होता? जंगलराज. कोई भी किसी के साथ जब तक मन होता रहता, फिर छोड़ कर अपना अलग रास्ता नापता, जबकि स्त्रीपुरुष शादी के बंधन में बंध कर सम्मान का रास्ता बनाते हैं. यह सच है कि इस संस्था में दहेज जैसी कुरीति का प्रवेश हो गया है, जिस से लड़कियों की खुशियों का मोल लगाया जाता है और उस से उन्हें लगता है कि जैसे उन का कोई वजूद ही नहीं है. पर यह कुरीति तो जानेअनजाने हम सभी ने अपनाई है और इसे बढ़ावा दिया है. आज जरूरत है तो दहेज जैसी कुरीति को समाप्त करने की न कि विवाह संस्था को समाप्त करने की.

सामंजस्य जरूरी

वे दिन लद गए जब पत्नियों से पति और ससुराल वालों के हर जुल्म को सहने की उम्मीद की जाती थी. अब तो बराबरी का जमाना है. गलत बात पर आवाज उठाना और अपने हक के लिए लड़ना पत्नियों का अधिकार है. फिर आज की युवा लड़कियों को विवाहित जिंदगी में पांव रखने में हिचकिचाहट क्यों? दरअसल, घरपरिवार बनाना और विवाहित जीवन सफल बनाना पति और पत्नी दोनों के ही हाथ में होता है, जो बातें कुदरत ने अलगअलग दी हैं, वे तो हमेशा ही रहेंगी. जरूरत है आपसी सामंजस्य, सूझबूझ और प्रेम की. इस धरती पर कोई भी 2 लोग एकजैसे नहीं होते. खून के रिश्तों में यहां तक कि जुड़वा जन्मे बच्चों में भी कोई भिन्नता अवश्य होती है. फिर पतिपत्नी जो एकदूसरे से विपरीत पारिवारिक माहौल में रहने वाले व अलगअलग संस्कार वाले होते हैं, उन में परस्पर वैचारिक और स्वभावगत भिन्नता हो तो अचरज कैसा. इसलिए विवाह संस्था पर उंगली उठाने से पूर्व निम्न पूर्वाग्रहों से मुक्त हो जाएं :

कोई भी पूर्ण नहीं होता. अत: दूसरे को उस की कमियों के साथ ही स्वीकारें.

सिर्फ लड़के/लड़कियों की कमियों का ही विश्लेषण न करें, बल्कि अपनी कमियों पर भी गौर करें और उन्हें दूर करने का प्रयास करें.

किसी को सुधारने के चक्कर में उस के अहं को ठेस न पहुंचाएं.

परस्पर सम्मान और भावनात्मक लगाव बनाएं.

समानता का अर्थ टक्कर लेना नहीं बल्कि एकदूसरे के लिए समान रूप से उपयोगी साबित होने से है, इस सचाई को समझें और खुले दिल से स्वीकारें.        

शादी न करने पर होने वाले अभाव

व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं हो पाता.

स्वभावगत भिन्नता से मिलने वाला आत्मविकास नहीं हो पाता.

विवाहित लोगों की जिंदगी लंबी होती है अविवाहितों की कम.

शादीशुदा रिश्ता जिंदगी की अहम जरूरतों को पूरा करता है, जो गैरशादीशुदा होने पर पूरी नहीं हो पातीं.

कठिन वक्त पर सब से विश्वसनीय साथी की कमी बेहद खलती है.

एज्यूकेशन सिस्टम के घोटाले का पर्दाफाश करेगी वेब सीरीज ‘‘शिक्षा मंडल’’

‘आश्रम’, ‘ मत्स्य कांड’ और ‘कैंपस डायरीज’ जैसी हार्ड हीटिंग कहानियों से युक्त सफलतम वेब सीरीज प्रसारित करने के बाद ओटीटी प्लेटफार्म अब ‘‘शिक्षा मंडल’’ नामक वेब सीरीज लेकर आ रहा है.  जिसकी हार्ड-हीटिंग कहानी भारत में एजुकेशन सिस्टम में हो रहे घोटाले की सत्य कथा पर आधारित है.

सईद अहमद अफजल निर्देशित वेब सीरीज ‘शिक्षा मंडल’ में पैसे की ताकत के साथ शिक्षा केंद्र में हो रही मक्कारी.  घोटाला.  धोखा और आपराधिक षडयंत्र को उजागर करेगी.  जिसकी चपेट में आज के युवा विद्यार्थी और उनके अनजान मां-बाप आ रहे हैं. ‘एम एक्स प्लेआर’ पर स्ट्रीम होने वाली इस वेब सीरीज में गौहर खान.  गुलशन देवैया और पवन मल्होत्रा अहम किरदरों में नजर आने वाले हैं.

शिक्षा मंडल’’ में गौहर खान  एक कठोर पुलिस अफसर के किरदार में नजर आएंगी.  जबकि गुलशन देवैया एक मेहनती युवा का किरदार निभा रहे हैं.  जो अपने परिवार की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए एक कोचिंग सेंटर चलाता है. वहीं पवन मल्होत्रा खलनायक है. वही सारी काली करतूतों और गैरकानूनी हलचल के पीछे के मास्टर माइंड है.

एम एक्स प्लेअर के मुख्य कंटेंट अधिकारी गौतम तलवार ने कहा-“हमें अपनी आगामी सामाजिक थ्रिलर ‘ शिक्षा मंडल’ को स्ट्ीम करने में खुशी होगी. हम भारत की सबसे प्रामाणिक कहानियों को बताने और अपने दर्शकों के लिए भरोसेमंद.   और वास्तविक कहानी लाने का प्रयास करते हैं और ‘शिक्षा मंडल’ भी एक ऐसी वेब सीरीज है.  जो इन सभी दायरे में न्याय करती है. ”

शो छोड़ने की खबर से परेशान हुए अनुज के फैंस, Anupama के लिए कही ये बात

सीरियल ‘अनुपमा’ (Anupama) की टीआरपी जहां पहले नंबर पर बनी हुई है तो वहीं सीरियल से जुड़े सितारों के शो छोड़ने की खबरे फैंस को परेशान कर रही है. वहीं अब किंजल यानी निधि शाह के बाद अनुपमा के प्यार अनुज यानी एक्टर गौरव खन्ना (Gaurav Khanna) की शो छोड़ने की खबरों ने फैंस को हैरान कर दिया है और सोशलमीडिया पर वह मेकर्स से ऐसा ना करने की गुजारिश करते दिख रहे हैं. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…

इस कारण परेशान हुए फैंस

 

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सीरियल में इन दिनों पाखी और अधिक के कारण अनुपमा परेशान नजर आ रही है तो वहीं वनराज और बा की कपाड़िया परिवार से नाराजगी बढ़ती दिख रही है. इसी बीच अनुज का सीरियल के लेटेस्ट एपिसोड में ना होना फैंस को खलता दिख रहा है. दरअसल, हाल ही के एपिसोड में एक्टर गौरव खन्ना यानी अनुज नहीं दिखे थे, जिसके चलते सोशलमीडिया पर उनके शो छोड़ने के कयास लग रहे हैं.

फैंस ने कही ये बात

अनुज यानी गौरव खन्ना (Gaurav Khanna) का सीरियल में स्क्रीन स्पेस कम होने के बाद फैंस कहते दिख रहे हैं कि वह शो के मेकर्स अनुपमा की टीआरपी कम कर रहे हैं क्योंकि अनुज के आने के बाद ही कई लोगों ने शो देखना शुरु किया है तो वहीं कुछ लोगों का कहना है कि वह अनुज को देखना चाहते हैं लेकिन मेकर्स क्यों अनुज के किरदार को खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं.

इन स्टार्स ने कहा शो को अलविदा

गौरव खन्ना के शो छोड़ने की खबर से पहले किंजल यानी निधि शाह के भी शो को अलविदा कहने की खबरें थीं. हालांकि एक्ट्रेस ने इन खबरों को अफवाह बताया था. बता दें, नंदिनी यानी अनघा भोसले और मालविका कपाड़िया यानी एक्ट्रेस अनेरी वजानी पहले ही शो को अलविदा कह चुकी हैं. हालांकि खबरें हैं कि खतरों के खिलाड़ी से निकलने के बाद अनेरी सीरियल अनुपमा में दोबारा एंट्री ले सकती हैं. हालांकि देखना होगा कि गौरव खन्ना का इन खबरों पर क्या रिएक्शन होगा.

REVIEW: जानें कैसी है Ranbir Kapoor की फिल्म Shamshera

रेटिंगः एक स्टार

निर्माताः आदित्य चोपड़ा

निर्देशकः करण मल्होत्रा

लेखकः एकता पाठक मलहोत्रा,नीलेश मिश्रा,खिला बिस्ट,पियूष मिश्रा

कलाकारः रणबीर कपूर,संजय दत्त, वाणी कपूर, रोनित रौय,सौरभ शुक्ला,क्रेग मेक्गिनले व अन्य

 अवधिः दो घंटे 40 मिनट

सिनेमा एक कला का फार्म है. सिनेमा समाज का प्रतिबिंब होता है. सिनेमा आम दर्शक के लिए  मनोरंजन का साधन है. मगर इन सारी बातों को वर्तमान समय का फिल्म सर्जक भूल चुका है. वर्तमान समय का फिल्मकार तो महज किसी न किसी अजेंडे के तहत ही फिल्म बना रहा है. कुछ फिल्मकार तो वर्तमान सरकार को ख्ुाश करने या सरकार की ‘गुड बुक’ में खुद को लाने के ेलिए अजेंडे के ही चलते फिल्म बनाते हुए पूरी फिल्म का कबाड़ा करने के साथ ही दर्शकों को भी संदेश दे रहे हंै कि दर्शक उनकी फिल्म से दूरी बनाकर रहे. कुछ समय पहले फिल्म ‘‘सम्राट पृथ्वीराज ’’ में इतिहास का बंटाधार करने के बाद अब फिल्म निर्माता आदित्य चोपड़ा ने जाति गत व धर्म के अजेंडे के तहत पीरियड फिल्म ‘‘शमशेरा’’ लेकर आए हैं,जिसमें न कहानी है, न अच्छा निर्देशन न कला है. जी हॉ! फिल्म ‘शमशेरा’ 1871 से 1896 तक नीची जाति व उंची जाति के संघर्ष की अजीबोगरीब कहानी है,जो पूरी तरह से बिखरी और भटकी हुई हैं. इतना ही नही फिल्म ‘शमशेरा’’ में नीची जाति यानीकि खमेरन जाति के लोगों को नेस्तानाबूद करने का बीड़ा उठाने वाल खलनायक का नाम है-शुद्धि सिंह. इससे भी फिल्मकार की मंशा का अंदाजा लगाया जा सकता है. अब यह बात पूरी तरह से साफ हो गयी है कि इस तरह अजेंडे के ेतहत फिल्म बनाने वाले कभी भी बेहतरीन कहानी युक्त मनोरंजक फिल्म नही बना सकते. वैसे इसी तरह आजादी से पहले चोर कही जाने वाली अति पिछड़ी जनजाति ‘क्षारा’  गुजरात के कुछ हिस्से मंे पायी जाती थी. इस जनजाति के लोगो ने अपने मान सम्मान के लिए काफी लड़ाई लड़ी. इनका संघर्ष आज भी जारी है.

आदित्य चोपड़ा की पिछले कुछ वर्षों से लगातार फिल्में बाक्स आफिस पर डब रही हैं. सिर्फ तीन माह के अंदर ही ‘जयेशभाई भाई जोरदार’ व ‘सम्राट पृथ्वीराज’ के बाद बाक्स आफिस पर दम तोड़ने वाली ‘शमशेरा’ तीसरी फिल्म साबित हो रही है. मजेदार बात यह है कि आदित्य चोपड़ा निर्मित यह तीनों फिल्में धर्म का भ्रम फैलाने के अलावा कुछ नही करती. इसकी मूल वजह यह भी समझ में आ रही है कि अब फिल्म निर्माण नहीं बल्कि फैक्टरी का काम हो रहा है. मुझे उस वक्त बड़ा आश्चर्य हुआ जब एक बड़ी फिल्म प्रचारक ने कहा-‘‘अब क्वालिटी नही क्वांटीटी का काम हो रहा है,जिसकी सराहना की जानी चाहिए. ’ ’ वैसे फिल्म प्रचारक ने एकदम सच ही कहा. पर क्वांटीटी के नाम पर उलजलूल फिल्मों का सराहना तो नही की जा सकती. ऐसी पीआर टीम किसी फिल्म या निर्माता निर्देशक या कलाकारों को किस मुकाम पर ले जाएगी, इसका अहसास हर किसी को कर लेना चाहिए.

कहानी:

कहानी 1871 में शुरू होती है. उत्तर भारत के किसी कोने में एक खमेरन नामक बंजारी कौम थी,जिसने मुगलों के खिलाफ राजपूतों का साथ दिया.  लेकिन मुगल जीत गए और राजपूतों ने खमेरनों को नीची जाति बता कर हाशिये पर डाल दिया. इससे शमशेरा(रणबीर कपूर) के नेतृत्व में खमेरन बागी हो गए और वह हथियार उठाकर डाकू बन गए.  शमशेरा और उसके साथियों ने अमीरों की नाक में दम कर दिया. तब अमीरों ने अंग्रेज अफसरों से मदद की गुहार लगायी.  अंग्रेज पुलिस बल में नौकरी कर रहा दरोगा शुद्ध सिंह (संजय दत्त) अपने हुक्मनारों से कहता है कि वह शमशेरा को ठीक कर देगा. शुद्ध सिंह,शमशेरा को समझाता है कि सभी खमेरन के साथ वह सरकार के सामने आत्म समर्पण कर दें,जिसके बदले में अंग्रेज उन्हे अमीरो से दूर एक नए इलाके में बसाएंगे.  पैसा भी देंगे.  इससे वह और उसकी पूरी कौम सम्मान और इज्जत का जीवन फिर शुरू कर सकते हैं. शमशेरा समझौते को मंजूर कर लेता है. लेकिन आत्मसमर्पण करते ही शमशेरा को अहसास होता है कि उसके और खमेरन कौम को धोखा मिला है.  शुद्ध सिंह ने इन सभी को काजा नाम की जगह पर बनी विशाल किलेनुमा जेल में कैद कर देता है और फिर इनके साथ गुलामों से भी बदतर व्यवहार किया जाता है. इस किले के तीन तरफ से अति गहरी आजाद नदी बहती है. शमशेरा को शुद्ध सिंह समझाता है कि अंग्रेज लालची हैं. अमीरों ने पांच हजार करोड़ सोने के सिक्के दिए हैं,वह दस हजार करोड़ सोने के सिक्के दे,तो उसे व उसकी पूरी खमेरन कौम को आजादी मिल जाएगी. स्टैंप पेपर पर लिखा पढ़ी हो जाती है. सोना जमा करने के लिए किले से बाहर निकलना जरुरी है. इसी चक्कर में शुद्ध सिंह की चाल में फंसकर शमशेरा न सिर्फ मारा जाता है,बल्कि खमेरन कौम उसे भगोड़ा भी कहती है.

शमशेरा की मौत के वक्त उसकी पत्नी गर्भवती होती है,जो कि बेटे बल्ली (रणबीर कपूर) को जन्म देती है. बल्ली 25 वर्ष का हो गया है. मस्ती करना और जेल के अंदर डांस करने आने वाली सोना(वाणी कपूर ) के प्यार में पागल है. अब तक उसे किसी ने नहीं बताया कि उसे भगोड़े का बेटा क्यों कहा जाता है. बल्ली भी अंग्रेजों की पुलिस में अफसर बनना चाहता है. शुद्धसिंह उसे अफसर बनाने के लिए परीक्षा लेने के नाम पर बल्ली की जमकर पिटायी कर देता है. तब उसकी मां उसे सारा सच बाती है कि उसका पिता भगोड़ा नही था,बल्कि सभी खमेरन को आजाद करने की कोशिश में उन्हे मौत मिली थी. तब बल्ली भी अपने पिता की ही राह पकड़कर उस जेल से भागने का प्रयास करता है,जिसमें उसे कामयाबी मिलती है. वह काजा से निकलकर नगीना नामक जगह पहुॅचता है,जहां उसके पिता के खमेरन जाति के कई साथी रूप बदलकर शमशेरा के आने का इंतजार कर रहे हैं. उसके बाद बल्ली उन सभी के साथ मिलकर सभी खमेरन को आजाद कराने के लिए संघर्ष शुरू करता है. सोना भी उसके साथ है. कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. अंततः शुद्धसिंह मारा जाता है.

लेखन व निर्देशनः

फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी इसके चार लेखक व निर्देशक करण मल्होत्रा खुद हैं. फिल्म में एक नहीं चार लेखक है और चारों ने मिलकर फिल्म का सत्यानाश करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है. इनचारों ने 2013 की असफल हौलीवुड फिल्म ‘‘द लोन रेंजर’’ की नकल करने के साथ ही डाकू सुल्ताना,फिल्म ‘नगीना’ व असफल फिल्म ‘ठग्स आफ हिंदुस्तान’ का कचूमर बनाकर ‘शमशेरा’ पेश कर दिया. लेखकों व निर्देशक के दिमागी दिवालियापन की हद यह है कि इस जेल के अंदर सभी खमेरन मोटी मोटी लोहे की चैन से बंधे हुए हैं. इन्हे नहाने के लिए पानी नहीं मिलता. दरोगा शुद्ध सिंह इनसे क्या काम करवाता है,यह भी पता नही. सभी के पास ठीक से पहनने के लिए कपड़े नही है. इन सब के बावजूद बल्ली अच्छे कपड़े पहनता है. बल्ली ने अंग्रेजी भाषा की पढ़ाई कहां व कैसे की. वह अंग्रेजों और शमशेरा के बीच हुआ अंग्रेजी में लिखा समझौता पढ़-समझ लेता है. वह नक्शा पढ़ लेता है. आसमान में देखकर दिशा समझ जाता है. सोना जैसी डंासर से इश्क भी कर लेता है.

हौलीवुड फिल्म ‘‘ द लोन रेंजर’’ में ट्ेन,सफेद घोड़ा व लाखों कौए,बाज पक्षी के साथ ही पिता की मृत्यू के बदले की कहानी भी है. यह सब आपको फिल्म ‘‘शमशेरा’’ में नजर आ जाएगा.  शमशेरा और बल्ली पर जब भी मुसीबत आती है,उनकी मदद करने लाखों कौवे अचानक पहुॅच जाते हैं,ऐसा क्यांे होता है,इस पर फिल्म कुछ नही कहती. लेकिन जब बल्ली किले से भाग कर एक नदी किनारे बेहोश पड़ा होता है, तो उसे होश में लाने के लिए कौवे की जगह अचानक एक बाज कैसे आ जाता है? मतलब पूरी फिल्म बेसिर पैर के घटनाक्रमों का जखीरा है. एक भी दृश्य ऐसा नही है जिससे दर्शकों का मनोरंजन हो. इंटरवल से पहले तो फिल्म कुछ ठीक चलती है,मगर इंटरवल के बाद केवल दृश्यों का दोहराव व पूरी फिल्म का विखराव ही है.

2012 में फिल्म ‘अग्निपथ’ का निर्देशन कर करण मल्होत्रा ने उम्मीद जतायी थी कि वह एक बेहतरीन निर्देशक बन सकते हैं. मगर 2015 में फिल्म ‘‘ब्रदर्स’’ का निर्देशन कर करण मल्होत्रा ने जता दिया था कि उन्हे निर्देशन करना नही आता. अब पूरे सात वर्ष बाद ‘शमशेरा’ से जता दिया कि वह पिछले सात वर्ष निर्देशन की बारीकियां सीखने की बजाय निर्देशन के बारे में उन्हे जो कुछ आता था ,उसे भी भूलने का ही प्रयास करते रहे. तभी तो बतौर निर्देशक ‘शमशेरा’ में वह बुरी तरह से असफल रहे हैं. फिल्म के कई दृश्य अति बचकाने हैं. निर्देशक को यह भी नही पता कि 25 वर्ष में हर इंसान की उम्र बढ़ती है,उसकी शारीरिक बनावट पर असर होता है. मगर यहां शुद्ध सिंह तो ‘शमशेरा’ और ‘बल्ली’ दोनो के वक्त एक जैसा ही नजर आता है.

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी पीयूष मिश्रा लिखित संवाद हैं. कहानी 1871 से 1896 के बीच की है. उस वक्त तक देश में खड़ी बोली का प्रचार प्रसार होना शुरू ही हुआ था.  अवधी और ब्रज बोलने वाला फिल्म में एक भी किरदार नहीं है जो उत्तर भारत की उन दिनों की अहम बोलियां थी.

फिल्म की मार्केटिंग और पीआर टीम ने इस फिल्म को आजादी मिलने से पहले अंग्रेजों से देश की आजादी की कहानी के रूप में प्रचार किया. जबकि यह पूरी फिल्म देश की आजादी नही बल्कि एक कबीले या यॅंू कहें कि एक आदिवासी जाति की आजादी की कहानी मात्र है.  जी हॉ!यह स्वतंत्रता की लड़ाई नही है. इस फिल्म में अंग्रेज शासक विलेन नही है. फिल्म में अंग्रेजांे यानी श्वेत व्यक्ति की बुराई नही दिखायी गयी है. बल्कि कहानी पूरी तरह से देसी जातिगत संघर्ष पर टिकी है,जिसका विलेन भारतीय शुद्ध सिंह ही है.

फिल्म का वीएफएक्स भी काफी घटिया है. फिल्म का गीत व संगीत भी असरदार नही है. फिल्म के संगीतकार मिथुन ने पूरी तरह से निराश किया है. फिल्म का बैकग्राउंड संगीत कान के पर्दे फोड़ने पर आमादा है. यह संगीतकार की सबसे बड़ी असफलता ही है.

अभिनयः

जहां तक अभिनय का सवाल है तो यह फिल्म और यह किरदार उनके लिए नही था. उन्हें फिलहाल रोमांस और डांस ही करना चाहिए. जितना काम यहां उन्होंने किया, उतना कोई भी कर सकता था. वैसे भी यह रणबीर कपूर वही है जो आज भी अपने कैरियर की पहली फिल्म का नाम नही बताते. उनकी इच्छा के अनुसार सभी को पता है कि रणबीर कपूर की पहली फिल्म ‘‘सांवरिया’’ थी,जिसके लिए उन्होने अपनी पहली फिल्म को कभी प्रदर्शित नही होने दिया. पर ‘सांवरिया’ असफल रही थी. वैसे रणबीर कपूर ने अपनी 2018 में प्रदर्शित अपनी पिछली फिल्म ‘‘संजू’’ में बेहतरीन अभिनय किया था. मगर चार वर्ष बाद ‘शमशेरा’ से अभिनय में वापसी करते हुए वह निराश करते हैं.

वाणी कपूर ने 2013 में प्रदर्शित अपनी पहली ही फिल्म ‘‘शुद्ध देसी रोमांस’’ से जता दिया था कि उन्हे अभिनय नही आता. उनके पास दिखाने के लिए सिर्फ खूबसूरत जिस्म है. उसके बाद ‘बेफिक्रे’,‘वार’,‘बेलबॉटम’ और ‘चंडीगढ़ करे आशिकी’ में भी उनका अभिनय घटिया रहा. फिल्म ‘शमशेरा’ में भी वही हाल है.  उनके कपड़े डिजाइन और मेक-अप करने वाले भूल गए कि कहानी साल 1900 से भी पुरानी है. इस फिल्म में भी कई जगह उन्होने बेवजह अपने जिस्म की नुमाइश की है. देखना है इस तरह वह कब तक फिल्म इंडस्ट्ी मंे टिकी रहती हैं. इरावती हर्षे का अभिनय ठीक ठाक है.

कुछ मेकअप की कमियों को नजरंदाज कर दें तो संजय दत्त ने कमाल का अभिनय किया है. वैसे उनका किरदार काफी लाउड है.  संजय दत्त का किरदार फिल्म का खलनायक है,पर वह क्रूर कम और कॉमिक ज्यादा नजर आते हैं.  फिर भी उनका अभिनय शानदार है. पूरी फिल्म में सिर्फ संजय दत्त ही अपनी छाप छोड़ जाते हैं. सौरभ शुक्ला जैसे शिक्षित कलाकार ने यह फिल्म क्यों की,यह बात समझ से परे है. शायद रोनित राय ने भी महज पेसे के लिए फिल्म की है.

क्या होना चाहिएः

यश राज चोपड़ा की कंपनी ‘यशराज फिल्मस’’ की अपनी एक गरिमा रही है. यह प्रोडक्शन हाउस उत्कृष्ट सिनेमा की पहचान रहा है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ‘यशराज फिल्मस’ की छवि काफी धूमिल हुई है. इस छवि को पुनः चमकाने और  अपने पिता यशराज चोपड़ा के यश को बरकरा रखने के लिए आवश्यक हो गया है कि अब आदित्य चोपड़ा गंभीरता से विचार करें. बौलीवुड का एक तबका मानता है कि अब वक्त आ गया है,जब आदित्य चोपड़ा को अपने प्रोडक्शन हाउस की रचनात्मक टीम के साथ ही मार्केटिंग व पीआर टीम में अमूलचूल बदलाव कर सिनेमा को किसी अजेंडे की बजाय सिनेमा की तरह बनाएं.  माना कि ‘यशराज फिल्मस’ के पास बहुत बड़ा सेटअप है. पर आदित्य चोपड़ा को चाहिए कि वह अपनी वर्तमान टीम में से कईयों को बाहर का रास्ता दिखाकर सिनेमा की समझ रखने वाले नए लोगों को जगह दे, वह भी ऐसे नए लोग, जो उनके स्टूडियो में कार से स्ट्रगल करने न आएं.  जिनका दिमाग विदेशी सिनेमा के बोझ तले न दबा हो.  कम से कम इतनी असफल फिल्मों के बाद आदित्य को समझ लेना चाहिए कि एक अच्छी फिल्म सिर्फ पैसे से नहीं बनती.

Breakup: सुखद प्यार का दुखद अंत

बौलीवुड अभिनेत्री सुष्मिता सेन अपनी पर्सनल लाइफ को ले कर सुर्खियों में रहती हैं. ऐक्ट्रैस ने अपने बौयफ्रैंड रोहमन शौल के साथ ब्रेकअप कर लिया. सुष्मिता ने अपने ब्रेकअप के बाद पहला पोस्ट शेयर कर लिखा शांति सब से खूबसूरत है. मैं आप सभी से प्यार करती हूं. इस के साथ उन्होंने स्माइली इमोजी शेयर करते हुए लिखा कि रिश्ता तो काफी पहले खत्म हो चुका था, लेकिन हम दोस्त बने रहे.

रिपोर्ट्स के अनुसार, कपल के बीच सबकुछ सही नहीं चल रहा था इसलिए दोनों का ब्रेकअप हो गया.

सुष्मिता और रोहमन करीब 3 सालों से रिलेशनशिप में थे. रोहमन ने यहां तक कहा था कि वे सुष्मिता और उन की बेटियों को अपना परिवार मानते हैं. फिर ऐसा क्या हुआ कि दोनों अगल हो गए? जो भी हो पर सुष्मिता सेन के ब्रेकअप की खबर से उन के फैंस टूट गए.

मगर सवाल यह उठता है कि आखिर क्यों गहरे प्यार और विश्वास के बाद कपल एकदूसरे से अलग हो जाते हैं? ब्रेकअप की नौबत क्यों आ जाती है उन के बीच? कुछ का तर्क होता है हम एकदूसरे के लिए बने ही नहीं थे तो कुछ का यह कि हम से उसे सम झने में गलती हो गई.

प्यार जितना सुखद होता है, ब्रेकअप उतना ही दुखद. 2 प्यार करने वाले रिश्ते में इतने जुड़ चुके होते हैं कि उनका अलग होना मुश्किल हो जाता है. कई बार प्यार को शादी की मंजिल तक ले जाना हो तो धर्म, जैंडर और उम्र आड़े आ जाती है, जिन की वजह से 2 प्यार करने वाले बीच रास्ते में ही अलग हो जाते हैं. लेकिन वक्त के साथ बदलाव हुए हैं. लोग अब इन सब चीजों को नहीं मानते. लेकिन कई बार कुछ ऐसा होता है कि प्यार शादी तक नहीं पहुंच पाता और ब्रेकअप हो जाता है. रिलेशनशिप मुश्किल से कुछ साल ही टिक पाती है और फिर दोनों की राहें जुदा हो जाती हैं.

ऐसे रिश्तों पर ऐक्सपर्ट्स का कहना है कि 70% अविवाहित कपल का ब्रेकअप पहले ही साल में हो जाता है. यह भी पाया गया कि रिलेशनशिप के 5 साल बीत जाने के बाद ब्रेकअप की संभावना केवल 20% तक ही रह जाती है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकतर लोगों का ब्रेकअप शुक्रवार के दिन होता है. एक इंग्लिश वैबसाइट द्बद्यद्यद्बष्द्बह्ल द्गठ्ठष्शह्वठ्ठह्लद्गह्म्ह्य ने लोगों पर यह रिसर्च की जिस में पाया गया कि शुक्रवार को पार्टनर्स एकदूसरे से सब से ज्यादा  झगड़ते हैं. साथ ही इस दिन रिश्ते टूटने का खतरा सब से ज्यादा होता है. रिपोर्ट के अनुसार, शुक्रवार के दिन 75% लोगों का ब्रेकअप होता है. लेकिन सवाल यह है कि पहले 1-2 साल में ऐसा क्या होता है कि 2 प्यार करने वाले अलग हो जाते हैं?

पार्टनर का सच सामने आना

रिलेशनशिप ऐक्सपर्ट नील स्ट्रास कहते हैं कि किसी भी रिलेशनशिप का पहला साल चुनौतियों से भरा होता है. शुरूशुरू में सब खयालों में खोए होते हैं यानी वास्तविकता से दूर होते हैं. अपने पार्टनर में आप वही देखते हैं जो आप देखना चाहते हैं. लेकिन कुछ महीने बाद आप वास्तविकता के करीब आने लगते हैं तो तसवीर साफ होने लगती है. सामने वाले व्यक्ति की आदतें, व्यवहार, तौरतरीका, बात करने का ढंग वगैरह सब दिखने लगता है और तब आप का उस से मोहभंग होने लगता है क्योंकि तब आप को वह सब दिखने लगता है जो असल में उस व्यक्ति में है. फिर उस के बाद शुरू हो जाता है टकराव. अगर उसे पार कर लिया तो रिश्ता आगे बढ़ जाता है वरना बीच रास्ते में ही दम तोड़ देता है.

ब्रेक का सीजन

एक स्टडी में पाया गया है कि वैलेंटाइन डे के आसपास ही सब से ज्यादा ब्रेकअप होते हैं क्योंकि इस दिन प्रेमी एकदूसरे से सब से ज्यादा उम्मीद रखते हैं कि वे उस के लिए क्या खास करने वाले हैं, क्या गिफ्ट मिलेगा और जब उम्मीद टूट जाती है, तब बात ब्रेकअप तक पहुंच जाती है. वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपने ब्रेकअप को प्लान करते हैं खास वैलेंटाइन डे के लिए. जो लोग प्यार में खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं, बदला लेने की नियत से वैलेंटाइन पर ही ब्रेकअप करते हैं.

प्यार अंधा होता है

वैज्ञानिक इस बात की पुष्टि कर चुके हैं कि प्यार सच में अंधा होता है. उन्होंने पाया कि प्रेमी की भावनाएं मस्तिष्क के उन हिस्सों को दबाती हैं जिन में गंभीर विचार नियंत्रित किए जाते हैं. इसलिए जब हम खुद को किसी व्यक्ति के करीब महसूस करते हैं तो हमारा मस्तिष्क तय करता है कि उस व्यक्ति के चरित्र या व्यक्तित्व का गहराई से आकलन करना उतना आवश्यक नहीं है. लेकिन एक समय आता है जब व्यक्ति आकलन करता है.

ब्रेकअप का कारण

लाइफ कोच केली रौजर्स ने अपनी रिसर्च में पाया कि महिलाएं अपने रिश्तों में जो देती हैं उस के बदले भावनात्मक लाभ पाना चाहती हैं. एक रिलेशनशिप में 6 महीने कमिटेड रहने के बाद महिलाएं यह सम झती हैं कि उन्होंने इस रिश्ते में अपना प्यार, एटैंशन, पैसा और समय दिया है तो उस के बदले में उन्हें कुछ मिलना ही चाहिए. ज्यादा ऐक्सपैक्टेशन भी कभीकभी ब्रेकअप की वजह बन जाती है.

जब बीच में पैसा आ जाए

आप का पार्टनर पैसे के मामले में कितने दिलदार है या कंजूस है यह बात आप को कुछ समय बाद पता चलती है. उस के साथ 2-4 बार डेट्स पर जाने और बर्थडे बिताने के बाद ही आप जान पाते हैं कि पैसे के मामले में आप का पार्टनर कितना दिलदार है. अगर वह आप की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता तो ब्रेकअप की नौबत आ जाती है. कुछ साल किसी भी रिलेशनशिप में रहने के बाद आर्थिक असंगति बीच में आ जाती है. रिश्ते में पैसा बीच में आया तो फिर भरोसा और सुरक्षा जैसे सवाल उठने लगते हैं. छोटेछोटे खर्चे की तो कोई बात नहीं है, लेकिन जब बड़े खर्चे हों या आप साथ में ट्रिप पर जा रहे हों तो प्यार से ज्यादा पैसा मैटर करने लगता है.

कमिटमैंट न मिले तो

ऐक्सपर्ट्स का कहना है कि ज्यादातर लोग 1 साल की रिलेशनशिप के बाद अपने रिश्ते के बारे में सब को बता देते हैं. 1 साल के बाद कुछ लोगों को पक्का कमिटमैंट चाहिए होता है. लेकिन पार्टनर रिलेशनशिप के बारे में किसी को बताना नहीं चाहता या शादी के लिए बात नहीं करता तो कमिटमैंट चाहने वाला पार्टनर रिश्ता खत्म कर लेता है. ज्यादातर लड़कियां इस तरह का कमिटमैंट लड़कों से चाहती हैं क्योंकि वे अपने रिश्ते को सिक्योर करना चाहती हैं. मगर लड़के कोई न कोई कारण बता कर ऐसा करने से अकसर भागते हैं.

जब रिश्ते की उम्र पता हो

कुछ लोगों को पता होता है कि उन का रिश्ता बहुत आगे तक नहीं जाने वाला. उन्हें अपने रिश्ते को कितने समय के लिए रखना है या नहीं रखना है यह बात वे जानते हैं. तभी तो ब्रेकअप होने का उन्हें कोई मलाल नहीं होता है. प्यार वे सिर्फ टाइम पास या दोस्तों को दिखाने के लिए रखते हैं. बहुतों को देखा होगा, किसी नए शहर में पढ़ने या नौकरी करने गए तब तक के लिए पार्टनर ढूंढ़ लिया और फिर ब्रेकअप कर लिया.

कम उम्र का प्यार

किसी अफेयर की शुरुआत बहुत ही अच्छी होती है. उस वक्त इंसान दिमाग से नहीं, बल्कि दिल से सोचता है. लेकिन एक दिन जब उसे सम झ आ जाता है कि इस प्यारव्यार के चक्कर में पड़ कर वह सिर्फ अपना समय बरबाद कर रहा है क्योंकि अभी उसे अपना भविष्य संवारना है, कैरियर बनाना है, तो वह ब्रेकअप कर लेता है. यह ज्यादातर कम उम्र लोगों में होता है जहां उन के बड़े उन्हें सम झाते हैं कि यह समय अपना भविष्य बनाने का है न कि प्यारव्यार के चक्कर में पड़ने का.

जब इंसान बदलने लगता है

रिलेशनशिप की शुरुआत में आप वही करते हैं जो आप का पार्टनर करता है. सिर्फ उसे यह दिखाने के लिए कि आप उस में दिलचस्पी ले रहे हैं. जैसे वीकैंड पर घूमने जाना, फिल्में देखना, डिनर पर जाना, पार्टी करना. लेकिन कुछ समय बाद जब आप को पता चलता है कि आप के पार्टनर को वीडियो गेम खेलना पसंद है या टीवी पर चिपके रहना, तो फिर रिलेशनशिप आगे बढ़ने के बजाय पीछे खिसकने लगती है और फिर इस का अंत ब्रेकअप होता है.

परिवार भी बन सकता है ब्रेकअप का कारण

इस बात में कोई दोराय नहीं है कि जब 2 लोग लंबे समय तक एक रिलेशन में रहते हैं तो एकदूसरे की फैमिली से भी उनका रिश्ता बन जाता है. वे न केवल एकदूसरे के सुखदुख में बराबर के भागीदार होते हैं, बल्कि एकदूसरे के परिवार के साथ भी जुड़ाव महसूस करने लगते हैं, जोकि बहुत हद तक रिलेशन को आगे बढ़ाने का काम करता है. लेकिन कभीकभी जब एक पार्टनर का परिवार दूसरे को पसंद नहीं करता, उस की वजह से घर में कलह होने लगती है तब भी रिश्ता टूट जाता है.

ज्यादातर रिलेशनशिप उस समय टूटने के कगार पर आ जाते हैं जब लड़का या लड़की के परिवार वालों के विचार आपस में नहीं मिल पाते. ऐसी सिचुएशन में कपल्स को ऐसा लगने लगता है कि उन की वजह से घर में लड़ाई झगड़े हो रहे हैं और फिर वे अपने रिलेशनशिप से पीछे हटने लगते हैं, यह जानते हुए भी कि वे एकदूसरे के बिना खुश नहीं रह पाएंगे.

हालांकि ऐसी स्थिति में उन्हें स्टैंड लेने की जरूरत है, साथ ही परिवार को सम झाने की कि वे एकदूसरे से प्यार करते हैं साथ ही साथ परिवार के बीच मधुर संबंध बनाने की कोशिश भी करनी चाहिए.

दिमागों को रंगने का काम चालू है

दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान के सब से पास गंगा गढ़मुक्तेश्वर में बहती है और लंबे समय से यह भक्तों की डुबकी लगाने की या मृतकों को फूंकने की जगह है. पर अब सरकार और मंदिरवादियों के जबरदस्त प्रचार के कारण यहां का भी धंधा देश के दूसरे तीर्थों की तरह फूलफल रहा है. इस बार जेठ दशहरा पर 12 लाख से अधिक अंधभक्तों ने जम कर मैली गंगा में स्नान किया और पहले व बाद में दान में करोड़ों रुपए दिए. गंगा को और ज्यादा गंदा किया वह अलग क्योंकि हर भक्त एक दोने में फूलपत्ती, दीए रख कर बहाता है.

इस बार इस दिन मेन सड़क पर जाम न होने पर पुलिस वाले अपनी पीठ खुद थपथपा रहे हैं. पुलिस ने जेठ दशहरे के लिए हफ्तों पहले प्लानिंग शुरू कर दी. सड़कों पर बीच की पटरी में कट बंद किए गए. खेतों में पार्किंग बनाई गई. मेरठ और मुरादाबाद मंडल के अफसरों ने कईकई मीटिंगें कीं और हर बार आनेजाने पर पैट्रोल फूंका ताकि भक्तों और हाईवे इस्तेमाल करने वालों का पैट्रोल बेकार न जाए.

जहां पुलिस के मैनेजमैंट की तारीफ की जानी चाहिए, वहीं यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि आखिर इस जेठ दशहरे पर डुबकी लगाने से भक्तों का कौन सा व्यापार चमक उठता है? कौन सी नौकरी में प्रमोशन मिल जाती है? किस के ऐग्जाम में ज्यादा नंबर आ जाते हैं? किस की बीमारी ठीक हो जाती है? कहां रिश्वतखोरी बंद हो जाती है? कौन सा सरकारी दफ्तर अच्छा काम करने लगता है? किस के खेत की उपज बढ़ जाती है? किस कारखाने में प्रोडक्ट ज्यादा बनने लगते हैं?

गढ़गंगा हो, हर की पौड़ी हो, चारधाम हों, अमरनाथ यात्रा हो, वैष्णो देवी हो, अजमेर का उर्स हो या कुछ भी हो, धर्म के नाम पर कहां कुछ अच्छा होता है? धर्म के नाम पर तो झगड़ा होता है. हमारे यहां वे यही चैनल जो इन तीर्थों का गुणगान हर दूसरेतीसरे दिन करते हैं, हर रोज पिछले कई सालों से धर्म के नाम पर जहर उगल रहे हैं और लगातार उकसा रहे हैं. नतीजा नूपुर शर्मा और नवीन कुमार की बहती जबान है जिस से न केवल पूरे देश में हंगामा मच गया, भारत के दूतावासों के अफसर कितने ही देशों में बेमतलब में सफाई देते बयान जारी करते रहे.

गढ़गंगा के हाईवे पर जाम नहीं लगा, यह अच्छा है पर दिमागों पर जो जाम लगवा दिया गया है, उस से कैसे मुक्ति मिलेगी? दिमागों को रंगने का काम चालू है और जलती आग में घी डालने वाले चुप नहीं हैं. चुपचाप अपनी साजिश में लगे हैं कि कैसे हिंदुओं को उकसा कर बचीखुची जायदाद भी उन से हड़प लें. हर तीर्थ पर बड़ेबड़े भवन दिख जाएंगे और तीर्थ से 5-7 किलोमीटर पहले दिखने लग जाएंगे. यह मन के जाम का नतीजा है.

यूरिनरी इन्फैक्शन: न करें अनदेखा

महिलाओं के लिए यूरिन से जुड़ी दिक्कतें परेशानी का सबब बनती हैं. ऐसी ही एक परेशानी है यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फैक्शन (यूटीआई). शरीर में मौजूद मूत्रमार्ग जिंदगी भर ऐसे जीवाणुओं को पेशाब की थैली में जाने का रास्ता देता रहता है, जिन की वजह से यूटीआई दिक्कत होती है. इसी वजह से हर दूसरी महिला को जीवन में कभी न कभी यूटीआई से जरूर जूझना पड़ता है.

दरअसल, मेनोपौज के बाद ऐस्ट्रोजन हारमोन में कमी की वजह से इन्फैक्शन पैदा करने वाले जीवाणुओं के पनपने की संभावना काफी बढ़ जाती है. महिलाओं के प्रजनन काल के समय ऐस्ट्रोजन हानिकारक जीवाणुओं को वैजाइना में घर बनाने से रोकता है. उस के पीएच स्तर को कम रखता है और उस के लिए जरूरी जीवाणुओं की वृद्धि में मदद करता है. यही जीवाणु यूटीआई से लड़ते हैं. ऐस्ट्रोजन में कमी और बढ़ोतरी दोनों से ही यूटीआई होता है, क्योंकि दोनों ही स्थितियों में योनि की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं.

क्या है यूटीआई ?

यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फैक्शन यानी मूत्रमार्ग के संक्रमण को बोलचाल की भाषा में यूटीआई कहते हैं. यह दरअसल, बैक्टीरिया का संक्रमण है. यह मूत्रमार्ग के किसी हिस्से को प्रभावित कर सकता है. मुख्यतया ई-कोलाई नामक बैक्टीरिया से यूटीआई की समस्या पैदा होती है. अन्य कई किस्म के बैक्टीरिया, फंगस और परजीवियों से भी यूटीआई की समस्या होती है.

यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फैक्शन जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है हमारे यूरिनरी सिस्टम का संक्रमण है. इस सिस्टम के अंग हैं किडनी, यूरिनरी ब्लैडर और यूरेथ्रा. इन में कोई अंग संक्रमित हो जाए तो उसे यूटीआई कहते हैं. इस संक्रमण के अधिकांश मरीजों के यूरिनरी टै्रक्ट का निचला हिस्सा प्रभावित होता है और यह संक्रमण यूरेथ्रा और ब्लैडर तक फैल जाता है. यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फैक्शन वैसे तो अधिक गंभीर  समस्या नहीं है, पर समय पर इलाज न हो तो इस संक्रमण के चलते कई अन्य गंभीर समस्याएं जन्म ले सकती हैं.

यूटीआई के कुछ आम कारण हैं- पीरियड्स के दिनों में योनि और गुदामार्ग की साफसफाई में कमी, प्रौस्टेट का बड़ा होना और शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता में कमी.

मूत्र मार्ग के अंदर और आसपास मौजूद बैक्टीरिया मौनसून में बहुत तेजी से बढ़ते हैं, जिस से संक्रमण का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है. यह समस्या महिला और पुरुष दोनों में होती है. मगर महिलाओं में अधिक होती है. इस की वजह है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं का यूरिनरी ट्रैक्ट छोटा होना.

रोकथाम के उपाय

– शारीरिक साफ-सफाई पर ध्यान देना जैसे यौन संबंध से पहले और बाद में पेशाब कर लेना.

– अधिक मात्रा में तरल पदार्थ का सेवन करना और पेशाब देर तक न रोकना.

– क्रैनबैरीज खाना या उन का जूस पीना, अनन्नास का जूस पीना भी इस बीमारी और इस के खतरे को कम करने में सहायक होता है.

– पर्याप्त विटामिन सी लेने से भी पेशाब में बैक्टीरिया नहीं पनपता है.

-डा. अनुभा सिंह

गाइनोकोलौजिस्ट व आईवीएफ ऐक्सपर्ट

बौलीवुड एक्ट्रेस से सीखें मेकअप से लेकर स्टाइलिंग टिप्स

लोग हमेशा फिल्मी हस्तियों से प्रभावित होते आए हैं. खासकर महिलाएं और लड़कियां हीरोइनों के पहनावे और फैशन की कौपी करने की कोशिश करती हैं. आखिर खूबसूरत लगना किसे पसंद नहीं? जब हमें किसी का स्टाइल अच्छा लगता है तो जाहिर है कि हम वैसा ही करने का प्रयास करेंगे. वैसे भी बौलीवुड दीवाज की फैशन सैंस हमेशा शानदार रही है. उन की अदाएं, जलवे और खूबसूरती लोगों के सिर चढ़ कर बोलती है. ऐसी बहुत सी हीरोइनें हैं जो यंग जैनरेशन को प्रभावित करती हैं.

आइए, ऐसी कुछ हीरोइनों के स्टाइल पर गौर करते हैं जिन से आप स्टाइलिंग टिप्स सीख सकती हैं:

करीना कपूर खान से सीखें मेकअप टिप्स

करीना कपूर बेहतरीन ऐक्ट्रैस होने के साथसाथ हमेशा स्टाइल आइकौन भी रही हैं. वे हर लुक में कमाल की लगती हैं. अगर आप भी करीना की तरह स्टाइलिश दिखना चाहती हैं तो उन के मेकअप लुक्स से ये टिप्स ले सकती हैं:

काजल का जादू: करीना कपूर को काजल काफी पसंद है. अगर आप मेकअप करने के मूड में नहीं हैं तो करीना की तरह बस आंखों में काजल लगा सकती हैं. इस से आप की आंखें बड़ी लगेंगी और इस का आकर्षण पूरे चेहरे पर दिखेगा.

दिन में लाइट मेकअप: वैसे तो करीना को बोल्ड मेकअप और रैड लिप्स बहुत पसंद हैं, लेकिन जब किसी डे फंक्शन में जाना होता है तो वे न्यूड शेड की लिपस्टिक या लिपग्लौस लगाना पसंद करती हैं. आप भी करीना के इस मेकअप टिप से इंस्पिरेशन ले सकती हैं.

सही कंटूरिंग: करीना कपूर के उभरे चीकबोंस उन्हें अलग लुक देते हैं. इस के लिए कंटूर पाउडर का सही इस्तेमाल करना जरूरी है. सही कंटूरिंग के लिए अच्छा बेस होना भी बहुत जरूरी है.

हाइलाइटर का कमाल: करीना जैसी चमकदार स्किन के लिए अच्छे स्किनकेयर रूटीन के अलावा किसी अच्छे हाइलाइटर की जरूरत होगी. गालों पर थोड़ा सा हाइलाइटर लगाने से आप के चीकबोंस उन की तरह शार्प और अपलिफ्टेड दिख सकते हैं. आप चाहें तो अपने फाउंडेशन में हाइलाइटर मिला कर भी लगा सकती हैं.

आलिया भट्ट से सीखिए स्टाइलिंग टिप्स

आलिया भट्ट फिल्मी दुनिया की ऐसी अदाकारा हैं जो हमेशा अपने स्टाइल स्टेटमैंट के लिए जानी जाती हैं. उन का चुलबुला अंदाज तो लोगों को पसंद आता ही है उन का गौर्जियस लुक भी कम अट्रैक्ट नहीं करता.

आइए, जानते हैं उन के कुछ स्टाइलिंग टिप्स:

स्टाइलिश दुपट्टा लुक: आलिया भट्ट जब भी अनारकली या फिर लौंग सूट पहनती हैं तो उस के साथ एक स्टाइलिश दुपट्टा लेना नहीं भूलतीं. यह सीखने की बात है. दरअसल, एक सिंपल सी कुरती पर भी अगर आप ने स्टाइलिश सा दुपट्टा लिया है तो इस से आप का लुक गौर्जियस लगेगा खासकर दुपट्टे पर हैवी वर्क हो या वह पारदर्शी हो तो पूरे सूट का लुक बदल जाता है. वहीं दुपट्टे को लेने का अंदाज भी आलिया का थोड़ा अलग ही है. वे अपने दुपट्टे के एक हिस्से को अपने कंधे पर तो दूसरे हिस्से को नीचे लटकता छोड़ देती हैं. इस से ऐलिगैंट लुक आता है.

खूबसूरत इयररिंग्स: ड्रैस के साथसाथ ज्वैलरी भी आप के ओवरऔल लुक को आकर्षक बनाने में अहम भूमिका निभाती है. आलिया अकसर अपनी ज्वैलरी के लिए बड़े मैचिंग इयररिंग्स का चुनाव करती हैं और इस के अलावा कोई और ज्वैलरी नहीं पहनती है. इस से सिम्पल सी ड्रैस भी लाजवाब लगती है.

बालों में गजरा: जब भी ट्रैडिशनल लुक के साथ कहीं जाना हो और आप ने साड़ी या लहंगाचोली पहनी हो तब गजरे से आप अपने लुक में चार चांद लगा सकती हैं. आलिया भट्ट का ट्रैडिशनल ड्रैसेज के साथ बालों में गजरे वाला लुक काफी पसंद किया गया है. बालों को ऊपर बांध कर सिंपल जूड़ा और आसपास गजरे की सजावट लुक को ऐलिगैंट बनाती हैं.

करिश्मा कपूर के स्टाइलिंग टिप्स

करिश्मा कपूर भी लंबे समय तक स्टाइल आइकौन रही हैं. आज भी उन के लुक आकर्षित करता है. आप उन से कई तरह के स्टाइलिंग टिप्स सीख सकती हैं:

रैड लुक: करिश्मा कपूर अकसर लाल रंग की ड्रैस में नजर आती हैं. चाहें वह परिधान की बात हो या फिर मेकअप की वे लाल रंग को शामिल करना कभी नहीं भूलती हैं. होंठों पर सुर्ख रंग की लिपस्टिक हो या लाल रंग की खूबसूरत मौडर्न ड्रैस, करिश्मा लाल रंग में अकसर जलवे बिखेरती नजर आती हैं. इसी तरह आप भी लाल रंग के संग प्रयोग कर अपने लिए एक बैस्ट लुक चुन सकती हैं. वैसे भी लाल का आकर्षण हमेशा से रहा है.

अनारकली सूट के साथ खुले बाल: करिश्मा कपूर जब भी सूट या कोई ऐथनिक ड्रैस पहनती हैं तो अपने बालों पर आगे से डिजाइन बना कर उन्हें पीछे की तरफ खुला छोड़ देती हैं खासकर अनारकली सूट के साथ वे ऐसा जरूर करती हैं. इस से ओवरऔल लुक और भी खिल कर आता है. खुले लहराते बाल वैसे भी आप की खूबसूरती को बढ़ाते हैं और जब इन का कौंबिनेशन ऐथनिक ड्रैसेज के साथ हो तो कहना ही क्या.

स्टाइलिश बैग: आप के लुक को आकर्षक बनाने में ऐक्सैसरीज का बड़ा योगदान होता है खासकर स्टाइलिश हैंडबैग की वजह से आप और भी ज्यादा स्मार्ट और गौर्जियस नजर आती हैं. करिश्मा या फिर दूसरी हीरोइनें भी हमेशा परिधान के रंग से मैचिंग करता हुआ स्टाइलिश हैंड बैग साथ ले कर निकलती हैं, जो उन के लुक में ऐक्स्ट्रा शाइन ले आता है.

जब पेरैंट्स ऐजुकेशन लोन चुकाने को कहें

पेरैंट्स बच्चों की खुशी के लिए क्या कुछ नहीं करते. यहां तक कि उन की पढ़ाई के लिए अपनी सेविंग तक तोड़ देते हैं ताकि उन का बच्चा पढ़लिख कर अच्छी नौकरी करे. लेकिन जब कई बार बच्चे की पढ़ाई के लिए एफडी, म्यूच्युअल फंड्स के द्वारा जमा की गई राशि कम पड़ जाती है तो उन्हें ऐजुकेशन लोन लेना पड़ता है ताकि वे बच्चे का सपना पूरा कर सकें.

ऐसा ही रोहन के मातापिता ने किया. उन्होंने बच्चे को टौप यूनिवर्सिटी से डाक्टरी का कोर्स करवाया. जिस के लिए उन्होंने अपनी सारी सेविंग लगाने के साथसाथ ऐजुकेशन लोन भी लिया. लेकिन जब रोहन के पिता को लोन चुकाने में परेशानी होने लगी तो उन्होंने रोहन से ऐजुकेशन लोन की ईएमआई अब खुद चुकाने को कहा. इस पर रोहन ने जवाब दिया कि यह मेरी ड्यूटी नहीं है बल्कि मु झे पढ़ाना आप का कर्तव्य था. ऐसा सिर्फ आप ने ही नहीं किया बल्कि सभी पेरैंट्स अपने बच्चों के लिए करते हैं.

यह सुन रोहन के पिता को बहुत दुख हुआ कि जिस बेटे के लिए हम ने खुद की सेविंग उस की पढ़ाई पर लगाने के साथसाथ ऐजुकेशन लोन भी ले लिया, वह रोहन आज लाखों कमाने के बावजूद ऐजुकेशन लोन की ईएमआई चुकाने से मना कर रहा है, जबकि वह पिता की हालत से अच्छी तरह वाकिफ है.

ऐसा सिर्फ रोहन के पिता के साथ ही नहीं बल्कि बहुत पेरैंट्स के साथ होता है. ऐसे में बच्चों को उन की स्थिति को सम झते हुए खुद ऐजुकेशन लोन चुकाना चाहिए ताकि आप अपने पेरैंट्स का सहारा बन सकें न कि उन के बो झ को और बढ़ाएं.

किनकिन परिस्थितियों में पेरैंट्स ऐसा बोल सकते हैं, आइए जानते हैं:

नौकरी जाने पर

आप के घर में ब्रीडएनर अगर पिता ही हैं और किसी कारणवश उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़े या फिर ऐक्सिडैंट की वजह से वे काम करने में असमर्थ हों, तो वे आप से ऐजुकेशन लोन की ईएमआई भरने को कह सकते हैं. ऐसे में आप रिएक्ट न करें बल्कि आप अपने पिता की हालत को सम झें कि उन्होंने आप की पढ़ाई के लिए ही लोन लिया था. अत: अब उस की ईएमआई चुकाना आप की ड्यूटी है.

बहन की शादी के समय

हो सकता है आप के पेरैंट्स ने आप की बहन से ज्यादा आप की ख्वाहिशों को पूरा करने पर ध्यान दिया हो, जिस कारण से वे आप की बहन की शादी के लिए उतना पैसा जमा न कर पाए हों, जितना करने की जरूरत थी.

ऐसे में अब जब आप की बहन की शादी के लिए उन्हें पैसों की जरूरत है और वे आप को लिए हुए ऐजुकेशन लोन की ईएमआई चुकाने के लिए बोल रहे हैं, तो ऐसे में आप उन्हें मना न करें बल्कि उन्हें हिम्मत दें कि अब आप को मेरा ऐजुकेशन लोन चुकाने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि मैं अब इस लायक हो गया हूं कि लोन का पैसा चुका सकूं. साथ ही मैं बहन की शादी में भी आप की पूरीपूरी मदद करूंगा.

बीमारी की स्थिति में

परिवार में कब कौन बीमार हो जाए, कब परिवार में इमरजैंसी की स्थिति आ जाए, किसी को नहीं पता होता. ऐसे में हो सकता है कि अचानक आप की मां बीमार हो जाए और उन के इलाज के लिए पैसों की जरूरत हो या फिर मैडिकल इंश्योरैंस लेने के कारण उन का इलाज तो हो गया, लेकिन अब उन के दवा के बढ़ते खर्च के कारण पिता पर आर्थिक बो झ बढ़ता जा रहा है, जो उन्हें परेशान कर रहा हो.

ऐसे में पिता ने आप से अपना ऐजुकेशन लोन खुद चुकाने की बात कही हो, तो आप उन की इस बात से नाराज न हों, बल्कि उन की स्थिति को सम झने की कोशिश करें. वैसे अब लोन चुकाना आप की ड्यूटी है, इसलिए इसे मजबूरी या बो झ न सम झें. साथ ही आप अपने पेरैंट्स की फुल सपोर्ट करें.

जिन पेरैंट्स ने आप को कुछ बनाने की खातिर अपनी सेविंग तक खत्म कर दी, आज जब उन्हें जरूरत है तो आप न सिर्फ लोन की ईएमआई भरें बल्कि उन्हें घर खर्च व मां की बीमारी पर भी खर्च करें ताकि आप के पिता पर अकेले भार न पड़े और आप अपनी फैमिली का सहारा बन पाएं.

आप के आर्थिक रूप से सक्षम होने पर

जिंदगी भर पेरैंट्स अपने शौक को मार कर अपने बच्चों की इच्छाओं को पूरा करने में लगे रहते हैं. लेकिन अब जब उन्हें लगने लगता है कि आप अच्छीखासी जौब में सैटल हो गए हैं तो वे आप से आप के लिए गए ऐजुकेशन लोन का पैसा खुद चुकाने की बात कह सकते हैं ताकि आप अपनी जिम्मेदारी को सम झने के साथसाथ अपने पेरैंट्स के लोड को भी कम कर पाएं. ऐसा ही सुरेश के साथ हुआ. सुरेश के पापा ने उसे उस की पसंद के कोर्स में एडमिशन दिलवाने के लिए लाखों का लोन लिया. इस का परिणाम यह हुआ कि सुरेश की लाखों की नौकरी लग गई.

लेकिन उस के बावजूद एक साधारण सी नौकरी करने वाले सुरेश के पिता ही लोन की ईएमआई चुका रहे थे. पिता ने जब देखा कि सुरेश सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में ही सोच रहा है, अब भी अपनी ही इच्छाओं को पूरा करने पर ध्यान दे रहा है, तो उन्होंने उसे अपनी जिम्मेदारियों का एहसास दिलवाने के लिए आगे से उसे लोन की ईएमआई चुकाने को कहा. सही भी है कि सक्षम होने के बाद बच्चे अपना लोन खुद चुकाएं.

अकेले छोड़ जाने की स्थिति में

अधिकांश बच्चे तब तक ही अपने पेरैंट्स का हाथ थामे रहना पसंद करते हैं, जब तक कि उन्हें उन की जरूरत होती है. लेकिन जैसे ही वे अपने पैरों पर स्टैंड हो जाते हैं उन्हें अपने ही पेरैंट्स बो झ लगने लगते हैं और तब वे उन्हें उन के हाल पर अकेला छोड़ने में भी पीछे नहीं रहते है.

ऐसे में कई पेरैंट्स इस दुख को सहन नहीं कर पाते और मन ही मन बस यही सोचते हैं कि जिस बच्चे के लिए हम ने इतना त्याग किया, वही बच्चा नौकरी लगते हमें हमारे हाल पर छोड़ कर चला गया है. ऐसे में वे दुखी मन से ही सही, लेकिन अपने बच्चे को खुद ही अपने ऐजुकेशन लोन की ईएमआई चुकाने के लिए कहते हैं

ताकि उन्हें पेरैंट्स के सैक्रिफाइस के बारे में सम झ आने के साथसाथ अपनी गलती का भी एहसास हो सके.

समय पर ईएमआई देना जरूरी

ऐजुकेशन लोन महंगी पढ़ाई को सुविधाजनक बनाने में मदद करता है. यह लोन बच्चे के नाम से अभिभावक को मिलता है. लेकिन अगर इस की ईएमआई समय पर नहीं चुकाई जाती तो यह आप के क्रैडिट स्कोर को बिगाड़ सकता है, जिस से आप को आगे लोन मिलने में परेशानी हो सकती है. अकसर हम सभी यही सम झते हैं कि लोन अभिभावक ने लिया है, तो इस से बच्चे का कोई लेनादेना नहीं है. जबकि ऐजुकेशन लोन एक ऐसा लोन है, जिस की ईएमआई समय पर नहीं देने पर बच्चा व अभिभावक दोनों का क्रेडिट स्कोर खराब होता है. इसलिए एजुकेशन लोन की ईएमआई देने में लापरवाही न करें.

पेरैंट्स क्या ध्यान रखें

पेरैंट्स के पास इतनी सेविंग नहीं होती है कि वे उस से बच्चे को बाहर या फिर अपने शहर में ही हायर ऐजुकेशन दिला सकें. ऐसे में उन्हें बच्चे के भविष्य की खातिर ऐजुकेशन लोन लेना ही पड़ता है. लेकिन ऐजुकेशन लोन लेने का यह मतलब नहीं कि पेरैंट्स ही उस लोन को चुकाएं बल्कि पहले ही बच्चे से बात कर लें कि हम यह लोन तुम्हें पढ़ाने के लिए ले रहे हैं और इसे तब तक चुकाएंगे जब तक तुम अच्छी तरह सैटल न हो जाओ. उस के बात तुम्हें ही लोन चुकाना होगा. ऐसे में आप के साथसाथ बच्चा भी मैंटली तैयार होगा कि उसे ही जौब में सैटल होने पर अपना ऐजुकेशन लोन भरना होगा. इस से बाद में प्रौब्लम आने के चांसेज काफी कम रह जाते हैं.

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