शादी होते ही पति संग्राम संग ताजमहल पहुंची पायल रोहतगी, देखें फोटोज

टीवी एक्ट्रेस पायल रोहतगी (Payal Rohatgi) ने हाल ही में अपने लौंग टाइम बौयफ्रेंड और रेसलर संग्राम सिंह (Sangram Singh) के साथ आगरा में शादी कर ली है. वहीं अपनी शादी होते ही वह ताजमहल घूमती हुई भी नजर आईं हैं. आइए आपको दिखाते हैं एक्ट्रेस के शादी की वीडियो और फोटोज की झलक…

शादी की फोटो हुई वायरल

 

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बीते दिनों कंगना रनौत के रियलिटी शो लॉक में नजर आ चुकीं एक्ट्रेस पायल रोहतगी ने पारंपरिक हिंदू रीति रिवाज के साथ संग्राम सिंह के साथ (Payal Rohatgi and Sangram Singh Wedding) सात फेरे लिए हैं. इसके साथ उन्होंने अपने 12 साल पुराने रिश्ते को नाम दे दिया है, जिसकी फोटोज और वीडियोज फैंस को काफी पसंद आ रही हैं.

दुल्हन बनीं पायल रोहातगी

37 साल की उम्र में दुल्हनियां बनीं पायल रोहातगी अपनी शादी में लाल रंग का हैवी लहंगा कैरी किया था, जिसके साथ हैवी ज्वैलरी और मिनिमल मेकअप ने एक्ट्रेस के ब्राइडल लुक पर चार चांद लगा दिया था. फैंस को एक्ट्रेस का ब्राइडल लुक बेहद खूबसूरत लग रहा था.

आगरा में की शादी

 

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शादी को लेकर सोशलमीडिया पर सुर्खियों में रहने वाली एक्ट्रेस पायल रोहातगी ने आगरा में शादी की है, जिसके बाद वह पति संग प्यार की निशानी ताजमहल की सैर करती हुई भी नजर आईं. वहीं इस दौरान एक्ट्रेस ने अपना ब्राइडल लुक ही कैरी किया था. इसी के साथ एक्ट्रेस ने अपने इस खुशी के पलों को फैंस के साथ भी शेयर किया है.

 

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बता दें, हाल ही में एक्ट्रेस पायल ने अपनी प्रीवेडिंग रस्मों की फोटोज भी सोशलमीडिया पर शेयर की थीं, जिसमें वह अपनी मेहंदी से लेकर हल्दी की फोटोज और वीडियो को फ्लौंट करती हुई दिखी थीं. वहीं फैंस भी एक्ट्रेस की शादी का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.

GHKKPM: ‘पाखी’ ने की शहनाज गिल की नकल, वीडियो वायरल

सीरियल गुम है किसी के प्यार में (Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin) का ट्रैक इन दिनों सुर्खियों में है. जहां कई लोग सरोगेसी के ट्रैक के चलते मेकर्स के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं तो वहीं सीरियल की पाखी यानी एक्ट्रेस ऐश्वर्या शर्मा को ट्रोल करते नजर आ रहे हैं. इसी बीच सेट से एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वह शहनाज गिल की नकल करती दिख रही हैं.

शहनाज के डॉयलॉग को किया रिक्रिएट

 

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गुम है किसी के प्यार में की पाखी यानी एक्ट्रेस ऐश्वर्या शर्मा ट्रोलिंग के बावजूद अपने फैंस के लिए नए नए रील्स शेयर करती रहती हैं, जिसके चलते फैंस भी उन्हें काफी पसंद करते हैं इसी बीच एक्ट्रेस ऐश्वर्या शर्मा ने  बिग बौस 13 के घर में शहनाज गिल का एक पौपुलर डायलॉग रीक्रिएट किया है. दरअसल, वीडियो में ऐश्वर्या शर्मा (Aishwarya Sharma) कहती दिख रही हैं कि ‘कैरेक्टरलेस क्या होता है? यहां क्या सारे कैरेक्टर मोर है?’ एक्ट्रेस की इस वीडियो पर विराट यानी एक्ट्रेस के पति नील भट्ट भी मजेदार रिएक्शन देते दिख रहे हैं.

मेकर्स के खिलाफ हुआ था केस दर्ज

 

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हाल ही में सरोगेसी ट्रैक के चलते मेकर्स के खिलाफ कुछ लोगों ने केस दर्ज करवाया था, जिसके चलते फैंस ने शो को बॉयकॉट करने की मांग की थी. हालांकि दर्शकों की मांग से परे मेकर्स सीरियल में नया ट्विस्ट लाने के लिए तैयार हैं. हाल ही में शो के अपकमिंग प्रोमो में सई से परेशान होकर पाखी नया प्लान बनाती दिखी है. दरअसल, प्रोमो में पाखी विधवा की तरह सादे कपड़े पहनने की बजाय शादीशुदा औरतों की तरह तैयार हुई नजर आ रही है. वहीं सई से कहती दिख रही है कि वह अब अपने बच्चे के लिए शादीशुदा की तरह रहेगी, जिसे सुनकर सई गुस्से में दिख रही है.

 

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बता दें, सीरियल में इन दिनों सरोगेसी ट्रैक के बाद पाखी, विराट के करीब जाने की कोशिश करती दिख रही है. हालांकि सई उसका हर कदम पर प्लान बर्बाद करती हुई नजर आ रही है.

लड़की ही नहीं लड़का भी हो संस्कारों वाला

दिनेश और उन की पत्नी उर्मिला अपनी बेटी सीमा के विवाह के 3 माह बाद उस की घरगृहस्थी देखने जयपुर जा रहे थे. पूरे रास्ते उन की बातचीत का विषय यही रहा कि उन की लाडली घरगृहस्थी कैसे संभालती होगी? शादी से पहले तो उसे पढ़नेलिखने से ही फुरसत नहीं थी. उन्होंने अपनी बेटी को सिखाया तो सब कुछ है, लेकिन जानने में और जिम्मेदारी उठाने में फर्क होता है और यही फर्क उन्हें परेशान कर रहा था कि पता नहीं वहां जा कर क्या देखने को मिले.

मगर उन की हैरानी का उस वक्त ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने सीमा का घर खूब सजाधजा और व्यवस्थित देखा. कारण बहुत जल्दी उन की समझ में आ गया. घर के कामकाज जितना सीमा जानती थी, उतना ही उन का दामाद रवि भी जानता था. जिम्मेदारी का अनुभव दोनों को ही था. अत: दोनों ही इस जिम्मेदारी का लुत्फ उठा रहे थे.

उर्मिला हैरान थीं कि उन की बेटी की गृहस्थी में दामाद बराबरी की भूमिका अदा कर रहा है. दोनों कभी अपनी अज्ञानता पर मिल कर ठहाके लगाते, तो कभी कुशलता पर एकदूसरे की पीठ ठोंकते. ‘फलां औरत वाले काम’, ‘फलां मर्दों वाले काम’ के पचड़े के बजाय जिसे जो काम आता करता और जो काम नहीं आता उसे करने की कोशिश दोनों ही करते. दिनेश हैरानी से बेटी को गाड़ी धोते, उस की सर्विसिंग करवाते और दामाद को झाड़ू लगाते, सब्जियां काटते देख रहे थे.

पति ही नहीं साथी

रवि शुरू से ही कभी तालीम की वजह से, तो कभी नौकरी की वजह से परिवार से दूर अकेला रहा, जहां उसे अपना हर काम खुद करना पड़ता था. बाहर का खाना पसंद न होने की वजह से वह खाना भी खुद ही बनाने लगा. सीमा से शादी के बाद अच्छी बात यह हुई कि वह खालिस पति बनने के बजाय सीमा का सही माने में साथी बन गया.

मा के मातापिता ने बेटीदामाद को ऐसेपतिपत्नी के रूप में देखने की कल्पना सपने में भी नहीं की होगी. उन्हें खुशहाल देख कर दिनेश सोचने पर मजबूर हो गए कि कभी यह बात उन की समझ में क्यों नहीं आई?

परिवर्तन समाज के सिर्फ ढांचे या स्वरूप में ही नहीं आता, बल्कि उस के सदस्यों की भूमिका में बदलाव की मांग भी करता है. अगर हम इस नई भूमिका के मुताबिक ढल जाएं, तो जीवन सरल, सहज, आसान हो जाता है.

पहले के जमाने में जो भी था, वर्तमान में जो भी है असंगत है. इस थ्योरी से अलग अगर सोचो, तो पाएंगे पहले परिवार में महिलाओं की संख्या इतनी ज्यादा होती थी कि उन्हें पुरुषों की मदद की आवश्यकता ही नहीं होती थी. घरेलू मामलों से उन्हें दूर ही रखा जाता था. छोटीबड़ी उलझनें वे सभी आपस में मिलजुल कर ही सुलझा लिया करती थीं. यहां तक कि कई बातें घर के पुरुष सदस्यों तक पहुंचती भी नहीं थी.

अपना काम खुद करने की आदत

इस के विपरीत आज पतिपत्नी के बीच में पूरी गृहस्थी का जंजाल है. न कोई मदद मिले, न कोई सलाह दे, ऐसे में पत्नी चाहती है कि पति मदद करे और पति झुंझला उठता है कि उसे क्या पता इन के बारे में.

कई बड़ेबुजुर्ग कहते हैं कि आज के नवविवाहितों को देखो, विवाह होते ही एकदूसरे से झगड़ने लगते हैं. हम ने तो विवाह के 10 साल बाद तक एकदूसरे से ऊंची आवाज में भी बात नहीं की थी.

अगर विवाह होते ही झगड़ने के कारणों पर गौर करें, तो पाएंगे कि वे निहायत छोटीछोटी बातें होती हैं जैसे ‘तुम सामान क्यों फैलाते हो?’, ‘तुम ने आज सिर्फ एक सब्जी क्यों बनाई?’, ‘तुम ने नल बंद नहीं किया?’, ‘तुम ने शर्ट प्रैस नहीं की?’, ‘तो क्या मैं प्याज छीलूं?’

यह ऐसी स्थिति होती है, जिस में महिला छोटीबड़ी जिम्मेदारियों से बेहाल है और पुरुष समझ नहीं पा रहा कि वह बेहाल है, तो क्यों? महिलाओं का यही तो काम है. उस की मां भी करती थी. फिर उस की पत्नी को ये सब करने में झल्लाहट क्यों? वह सिर्फ इतनी सी बात नहीं समझ पाता कि उस की मां अकेली ये सब नहीं करती थीं. उन के साथ चाची, दादी, भाभी सभी हुआ करती थीं और अगर जीवन में कभी किया भी, तो गृहस्थी जब कम से कम 10-15 साल पुरानी हो चुकी थी.

आज भी ज्यादातर लड़कियां घरगृहस्थी से संबंधित हाईटैक ज्ञान से लैस हो कर ही ससुराल आती हैं. बेटी को ऊंची से ऊंची शिक्षा दिलाने के साथसाथ मातापिता उसे वह व्यावहारिक ज्ञान भी देते हैं, जिस में घरेलू कामकाज से ले कर ऊंचे संस्कार सब कुछ शामिल होता है.

व्यक्तित्व विकास पर ध्यान

मगर अपना काम खुद करना चाहिए, यही मामूली सा ज्ञान मातापिता अपने बेटे को नहीं दे पाते. उस की जरूरतें मां या बहनें सहज रूप से पूर्ण कर देती हैं. कपड़ों से ले कर जूतेमोजे तक विवाह से पहले मां, बहनें संभालती हैं, इस उम्मीद से कि विवाह के बाद ये सब काम उस की बहू करेगी.

परंपरागत सोच रेत की तरह होती है, जिस पर न केवल हम चलते हैं, बल्कि पीछे पद्चिह्न भी छोड़ जाते हैं. किसी भी महिला मंडली में बातचीत का यह आम विषय होता है कि अपने व्यवसाय में निपुण उन के पति घर के कामकाज में कितने अनाड़ी हैं.

आत्मनिर्भरता जरूरी

पत्नी कामकाजी हो या घरेलू, अगर पति सिर्फ अपनी देखभाल करना खुद सीख ले यानी कपड़े, जूतेमोजे, तौलिया वगैरहवगैरह के लिए पत्नी का मुंह ताकने के बजाय इन सब मामलों में आत्मनिर्भर बन जाए, तो कई समस्याओं का समाधान अपनेआप हो जाता है. इस से पुरुषों में जहां आत्मविश्वास आएगा, वहीं पत्नियां खुद के लिए भी वक्त निकाल पाएंगी. ‘मेरा क्या, मैं तो कुछ भी खा लूंगी, कुछ भी पहन लूंगी’ जैसी भावना से उबर कर वे भी व्यक्तित्व विकास पर ध्यान देंगी.

इस संदर्भ में कावेरी का उदाहरण खास है. पतिपत्नी दोनों डाक्टर हैं. कहते हैं व्यवसाय एक होने से पतिपत्नी में सहज तालमेल की गुंजाइश ज्यादा होती है. पर डा. कावेरी के साथ ऐसा नहीं है. उन के पति डा. प्रभात अपनी हर छोटीबड़ी जरूरत के लिए कावेरी पर निर्भर हैं. सफाई पसंद हैं, इसलिए दरवाजों पर डस्ट नहीं देख सकते, पर खुद कभी डस्टर को हाथ नहीं लगाते.

‘कावेरी के हाथों से बने व्यंजनों की बात ही अलग है’ यह कह कर नौकरों को फटकने नहीं देते. दूसरी ओर कावेरी पति की इन ख्वाहिशों को पूरा करने में ऐसी जुटी कि डिस्पैंसरी उस के लिए सपना बन कर रह गई. एक दिन एक मित्र ने कहा कि कावेरी की मदद कर दिया कर तो सुन कर

डा. साहब कहते हैं कि क्या करूं, मुझे कुछ आता ही नहीं. अगर डाक्टर अमन अपना काम खुद करना जानते और घरेलू दायित्वों को निभाने में जरा सा भी साथ देते, तो न केवल घर व्यवस्थित होता, कावेरी भी एक सफल डाक्टर होती.

अभिप्राय यह है कि अगर जरूरत हो तो किसी भी परंपरा की शुरुआत कभी भी की जा सकती है. नए जमाने की नई खुशबूदार मिट्टी में एक नई परंपरा के बीजारोपण का सही समय यही है. संतान बेटा हो या बेटी ऊंची शिक्षा, ऊंचे कैरियर के अलावा भावी पारिवारिक जीवन के लिए अब बेटी के समान ही बेटे को भी तैयार करना होगा.

जैसे संस्कारों से लैस बहू हमें चाहिए वैसे ही संस्कार बेटे में डालने का होमवर्क भी पहले ही कर लेना चाहिए. अगर हम सभी क्षेत्रों में बेटी को आत्मनिर्भर देखना चाहते हैं, तो बेटे को क्यों नहीं? आज जब महिलाएं घर से ले कर बाहर तक सभी जगह अपनी सफल और मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रही हैं, तो घर का मोरचा पुरुषों के लिए वर्जित क्यों रहे? गृहस्थी से ले कर दफ्तर तक, आत्मनिर्भर तो दोनों को ही बनना होगा, फिर चाहे बेटा हो या बेटी.

प्रैग्नेंसी के बाद वजन कम करने का तरीका बताएं?

सवाल-

मैं एक गृहिणी हूं, मेरी उम्र 35 वर्ष है. मेरा वजन 98 किलोग्राम है. मेरी बेटी के जन्म के बाद मेरा वजन लगभग 27 किलोग्राम बढ़ गया है. मैं ने वजन कम करने के लिए काफी प्रयास किए, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ. मेरी लंबाई 5 फुट 1 इंच है. कृपया मुझे बताएं कि मेरा आदर्श वजन क्या होना चाहिए और इसे पाने के लिए मैं क्या कर सकती हूं?

जवाब-

आप को अपना आदर्श वजन पाने के लिए कम से कम अपना वजन 40-45 किलोग्राम कम करना पड़ेगा. इतना वजन कम करने के लिए आप को काफी मेहनत करनी पड़ेगी. पहले किसी डाइटिशियन की देखरेख में आप ऐक्सरसाइज और डाइट के द्वारा 10 किलोग्राम वजन कम करने का लक्ष्य रखें.

इस के बाद वजन कम करने के लिए हम कुछ दवाइयां लेने का सुझाव भी देते हैं, लेकिन आप को शुरुआत डाइट और ऐक्सरसाइज से ही करनी चाहिए. नाश्ता हैवी करें, लंच और डिनर हलका लें. खाने के बीच में थोड़ा सलाद और फल खाएं. 1 सप्ताह में 500 ग्राम वजन कम करने का लक्ष्य रखें. 3-4 महीने तक यह प्रयास करें और परिणाम देखें.

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दिल्ली की 32 वर्षीय गृहिणी शुचिका चौहान अपने बढ़ते वजन को अपनी शारीरिक सुंदरता में एक बड़ी कमी मानते हुए कहती है, ‘‘खाने की अधिकता और शारीरिक श्रम की कमी के कारण बढ़ता मोटापा ही मेरी परेशानी की वजह है और मु झे डर है

कि कहीं आगे यह और न बढ़ जाए, इसलिए मैं ने इसे नियंत्रित करने पर ध्यान देना शुरू कर दिया है.’’

मगर उच्च रक्तचाप, कैंसर, मधुमेह, हृदय संबंधी रोग आदि भयंकर बीमारियों को बुलावा देने वाले इस मोटापे की चपेट में आने के कई कारण हो सकते हैं जिन्हें नजरअंदाज कर लोग बढ़ते वजन की समस्या का शिकार होते चले जाते हैं.

इस की असल वजह है अस्वास्थ्यकर खुराक भरी स्टार्चयुक्त भोजन, फलों तथा सब्जियां रहित खाना और शारीरिक श्रम का अभाव. महिलाओं के लिए भी खतरा कम नहीं है. देश में पुरुषों से ज्यादा स्त्रियां खासकर 35 से ज्यादाकी आयु वाली अधिक वजन की है.

पूरी खबर पढ़ने के लिए- बढ़ते वजन पर रखें नजर

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

नया सवेरा: बड़े भैया के लिए पिताजी का क्या था फैसला

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5 Tips: अपनी खास स्किन का रखें खास ख्याल

खूबसूरत दिखना हर किसी की चाहत होती है. खास मौकों पर सज-संवरकर चेहरे की सुंदरता बढ़ाने में वैसे तो कोई बुराई नहीं, लेकिन कई बार लोगों की रोजाना भारी-भरकम मेकअप करने की आदत होती है जिससे आपकी त्वचा में इंफेक्शन का खतरा हो सकता है.

ब्यूटी उत्पाद में कई सारे केमिकल होते हैं जिनका ज्यादा या हर रोज प्रयोग करना आपकी कोमल त्वचा को नुकसान पहुंचाता है. ज्यादातर लोगों को इस बात की जानकारी नहीं होती है कि ब्यूटी उत्पाद जिनका आप हर रोज प्रयोग कर रहे वो आपको खूबसूरत बनाने की बजाय आपकी त्वचा को नुकसान पहुंचा रहा है. आइए जानें ऐसे ही उत्पादों के बारे में.

1. ब्लीच

लोग स्किन की टैनिंग कम करने के लिए या चेहरे के बालों को छिपाने के लिए ब्लीच की मदद लेते हैं.  कई बार लोग इसे कम दिनों के अंतर पर प्रयोग करने लगते हैं जबकि ऐसा करना आपकी त्वचा को ना सिर्फ बेजान बनाता है बल्कि इससे कई बार स्किन एलर्जी की समस्या भी हो जाती है.

उपाय: ब्लीच को 24 घंटे पहले कान के पीछे लगाकर टेस्ट कर लें, अगर कोई एलर्जी न हो तभी ब्लीच करें.  टेनिंग दूर करने के लिए ब्लीच कर रहे हैं तो संतरे, पपीते का पल्प या चंदन पाउडर लगा सकते हैं.

2. डियो और परफ्यूम

डियोड्रेंट का ज्यादा प्रयोग अंडर आर्म्स की त्वचा को काला कर उसे नुकसान पहुंचाता है.  खुजली की समस्या हो, परफ्यूम से छींके आती हों या सांस के रोगी हों तो इनका प्रयोग न करें क्योंकि उन लोगों के लिए यह काफी खतरनाक हो सकता है.

उपाय: डियो या परफ्यूम में कैमिकल्स होते हैं, इन्हें सीधे बॉडी पर न लगाकर कपड़ों पर लगाएं.

3. नेलपॉलिश

नेलपॉलिश लगाने के बाद हमें नाखूनों की मैल नहीं दिखती जिससे पेट में इंफेक्शन हो सकता है.  इसके अलावा नाखूनों पर हमेशा नेलपॉलिश लगाने से नाखूनों में पीलापन भी आ जाता है जो संक्रमण का कारण हो सकता है.

उपाय: नाखूनों की सफाई का ध्यान रखें और खाना बनाने या खाने से पहले नेलपॉलिश को सुखा लें.

4. फाउंडेशन और ब्लशर

इनके रोजाना प्रयोग से चेहरे के रोमछिद्र बंद हो जाते हैं.  त्वचा के अंदर जमी गंदगी और तेल बाहर नहीं आ पाते, जिससे छिद्रों में मवाद जमने से कील-मुहांसे होने लगते हैं.

उपाय: ब्यूटी प्रोडक्ट की क्वॉलिटी का खयाल रखें.  त्वचा ऑयली है तो वॉटर बेस प्रोडक्ट और रूखी है तो ऑयल बेस स्किन प्रोडक्ट का प्रयोग करें.  चेहरा नॉन-कॉमेडोजॉनिक क्लींजर से साफ करें, इससे रोमछिद्र खुलने से गंदगी निकल जाती है.

5. आई मेकअप के नुकसान

अगर आप आई मेकअप करने के बाद आंखों में कॉन्टेक्ट लैंस लगाते हैं तो ऐसे में बैक्टीरिया कॉर्निया तक पहुंच जाता है जिससे कोर्नियल इंफेक्शन का खतरा रहता है.  कई बार मेकअप करने से बैक्टीरिया का मैंब्रेन (झिल्ली) से संपर्क होता है, जिससे कंजक्टिवाइटिस हो जाता है. इसमें आंखें लाल हो जाती हैं और आंखो से पानी आने लगता है.

उपाय: मस्कारे व आई लाइनर का प्रयोग कम करें.  मस्कारे को कम से कम 4 महीने के अंतराल और आईशैडो को दो साल में बदल लें.

तो अब जब भी आप आगे से मेकअप के सामान का प्रयोग करें तो अपनी त्वचा का भी खास खयाल रखना चाहिए क्योंकि आपकी त्वचा है खास.

कलाकारों का कैरियर बरबाद करता कट्टरवाद

‘100करोड़ मूर्ख हिंदुओं के बीच 4 मुसलमान बौलीवुड में सुपर स्टार हैं तो गलती किस की.’’सोशल मीडिया पर यह पोस्ट सम्राट ‘पृथ्वीराज’ फिल्म के रिलीज होने के तुरंत बाद वायरल होनी शुरू हुई थी जिस में एक विदेशी युवती हाथ में एक तख्ती लिए खड़ी है, जिस में इस सवाल नसीहत या खिसियाहट कुछ भी कह लें लिखी हुई है. इस पोस्ट का मकसद यह मैसेज देना था कि हिंदुओ जागो और दौड़ कर ‘पृथ्वीराज’ फिल्म देख कर आओ नहीं तो हिंदू धर्म खतरे में पड़ जाएगा.

इस के पहले भी ऐसी दर्जनों पोस्टें वायरल हुई थीं, जिन में अपील की गई थी कि सभी सच्चे हिंदुओं को यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए. इस से हिंदुत्व को ताकत मिलेगी. सभी पोस्ट हिंदू डिजिटल वारियर्स की देन हैं जो सोशल मीडिया के जरीए पौराणिक राज जिस में वर्ण व्यवस्था रामायण युग की हो लागू की जा सके.

अब 100 करोड़ हिंदुओं के बीच एक भी हिंदू सुपर स्टार नहीं है तो गलती किस की इस सवाल के कई सटीक जवाब हैं जिन में से पहला यह है कि आप मारमार कर गधे को घोड़ा नहीं बना सकते. दूसरा यह है कि इस देश में सच्चे या पौराणिकवादी हिंदुओं की तादाद 3-4 करोड़ भी नहीं है. तीसरा यह है कि इन दिनों हिंदू ही हिंदू को मूर्ख बना रहा है. सभी एकदूसरे को उकसाते रहे कि फिल्म जरूर देखना, लेकिन खुद देखने नहीं गए.

चौथा जवाब यह है कि बुढ़ाते अक्षय कुमार में अब वह बात नहीं है जो दर्शकों को आकर्षित कर पाए. 5वां जवाब यह है कि आम दर्शक वाकई मूर्ख नहीं हैं जो महंगाई के इस दौर में एक रद्दी फिल्म देखने के लिए मल्टीप्लैक्स में क्व500 खर्चता. हिंदुत्व को मजबूत करने के लिए तो किसी मंदिर की दान पेटी में क्व11 की दक्षिणा डालना ही बहुत है.

छठा जवाब यह है कि फिल्म में इतिहास तोड़मरोड़ कर पेश किया जाना है यह बात लोगों को इस के ताबड़तोड़ प्रमोशन से ही समझ आ गई थी कि अब इस फिल्म में इतिहास का कचरा बेचा जाएगा जो हमें नहीं खरीदना. 7वां जवाब यह है कि फिल्म के निर्देशक चंद्र प्रकाश द्विवेदी सहित निर्माता आदित्य चोपड़ा को यह गलतफहमी हो गई थी कि देश में हिंदुत्व का माहौल गरम है, इसलिए उस के नाम पर कुछ भी बना कर सिनेमाघरों में टांग दो अच्छा पैसा बन जाएगा.

ब्रैंड बने दिग्गज भी हाशिए पर

यह और बात है कि किसी को कुछ नहीं मिला सब बेबसी से हाथ मल रहे हैं और फिल्म के सुपर फ्लौप होने के बाद सभी एकदूसरे का मुंह ताक रहे हैं कि यह क्या हो गया. खासतौर से अक्षय कुमार जिन्हें पौराणिकवादी चारों खानों के मुकाबले हीरो बनने चले थे, लेकिन वे मुरारी साबित हो कर रह गए. रिलीज के पहले इस फिल्म को आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा गृहमंत्री अमित शाह ने भी पत्नी सहित देखा और सभी ने उम्मीद के मुताबिक फिल्म की तारीफ की.

हालांकि यह वे बिना देखे भी कर सकते थे पर रिएलिटी के लिए जरूरी हो गया था कि पहले वे वाकई फिल्म देखें और फिर इस का हल्ला मचे और फिर वे इतराते हुए कहें ‘वी हैव सीन ए नाइस मूवी.’

इधर सोशल मीडिया पर मुसलमानों को कोसने वाली पोस्टों को फौरवर्ड करने में व्यस्त हिंदुओं के कान पर जूं तक नहीं रेंगी कि जब हिंदुत्व के ये बड़ेबड़े पैरोकार तारीफ कर रहे हैं, फिल्म को प्रमोट कर रहे हैं तो हम भी 100 रुपए की आहुति इस यज्ञ में डाल ही दें.

नतीजा सामने है कि यह फिल्म उतना पैसा भी नहीं बटोर पाई जितनी कि अक्षय कुमार की एक फिल्म की फीस होती है. यशराज फिल्म्स को झटका तो तगड़ा लगा है, लेकिन हारे हुए खिलाड़ी अक्षय कुमार का क्या होगा जो कट्टरता के झांसे में आ कर अपने कैरियर की सब से खराब फिल्म दे कर झींकते कह रहे हैं ‘ओ माई गौड.’

पाखंड और पाखंडियों को लताड़

अभी बहुत ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब 2012 में परेश रावल द्वारा अभिनीत फिल्म ‘ओ माई गौड’ रिलीज हुई थी. इस बौद्धिक और तार्किक फिल्म में अक्षय कुमार कृष्ण की भूमिका में थे. फिल्म हिट इसलिए हुई थी क्योंकि इस में न केवल ईश्वर के अस्तित्व पर सटीक सवाल उठाए गए थे बल्कि धर्म के दुकानदारों की भी जम कर बिना किसी डर या लिहाज के पोल खोली गई थी. ‘ओएमजी’ खूब चली थी क्योंकि इस ने दर्शकों को तबीयत से लताड़ते हुए उन की धूर्तता दर्शाई गई थी. चूंकि यह सच था और लोगों के इर्दगिर्द रोजरोज होता है इसलिए दर्शक खुद से जुड़ी बात देख प्रभावित भी हुए थे और उन्हें काफी कुछ सीखने को भी मिला था.

धर्म और उस के खोखले रीतिरिवाजों तथा पाखंडों की पोल शोमैन राजकूपर ने भी अपनी हर फिल्म में खोली है. याद करिए ‘प्रेम रोग’ फिल्म के वे 2 दृश्य जिन में हीरो ऋषि कपूर का मामा ब्राह्मण ओम प्रकाश कैसे शनि के नाम पर गांव वालों को चूना लगाया करता है और फिर भानजे से कहता है कि ये लोग डरेंगे तो हमारे घर का चूल्हा कैसे जलेगा. दूसरा दृश्य मार्मिक था जिस में विधवा हो गई नायिका पद्मिनी कोल्हापुरे का मुंडन करने ठाकुरों का पूरा कुनबा इकट्ठा हो जाता है. यह और इस तरह की तमाम फिल्में बौक्स औफिस पर अच्छा कलैक्शन कर गई थीं तो इस की वजह थी धर्म से जुड़ा सच दिखाया जाना.

सिलसिला जारी है

यह सिलसिला अब ओटीटी पर जारी है. आश्रम सरीखी वैब सीरीज में और अंदर का सच दिखाया जा रहा?है. इन का विरोध कट्टर हिंदूवादी करते हैं, इस के बाद भी ये देखी जाती हैं तो वजह इन में उस वीभत्स सचाई को दिखाया जाना है जिसे आज का सवर्ण हिंदू ढके रखना चाहता है क्योंकि इस से धर्म की पोल खुलती है.

इन फिल्मों और सीरीजों के निर्मातानिर्देशकों और अभिनेताओं को किसी पीएम, सीएम या हिंदुत्व के दूसरे ठेकेदार से मिलने की जरूरत नहीं पड़ी थी जैसीकि पिछले 3 साल से अक्षय कुमार को पड़ रही है. कभी वे पत्रकार बन नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू लेते हैं तो कभी लखनऊ में योगी आदित्यनाथ से गुफ्तगू करते नजर आते हैं. इन दोनों के बीच खिचड़ी पकी और भगवा गैंग के जाल में फंसे जा रहे अक्षय कुमार ‘रामसेतु’ फिल्म में काम करते दिखेंगे. हैरानी नहीं होनी चाहिए अगर भगवा राज्यों में टैक्सफ्री होने के बाद भी इन का हश्र ‘पृथ्वीराज’ जैसा हो.

‘ओएमजी’ और ‘पीके’ नरेंद्र मोदी के राष्ट्रवाद के पहले की फिल्में हैं. अब ऐसी तो ऐसी, वैसी फिल्में भी बनाने का जोखिम कोई निर्मातानिर्देशक नहीं उठा रहा जिन में हिंदूमुसलिम यानी सांप्रदायिक एकता का संदेश दिया जाता था. ऐसी फिल्में जिन में हिंदू परिवार का खैरखाह कोई नेकदिल रहीम चाचा हुआ करता था. हीरो उन की बेटी से राखी बंधवाया करता था और ईद पर दोनों परिवार सेवइयां खाते दिखते थे.

शोहरत का फ्लौप टोटका

आदित्य चोपड़ा भूले नहीं होंगे कि यशराज बैनर तले ही 1959 में ‘धूल का फूल’ फिल्म बनी थी जिस का एक गाना आज भी शिद्दत से गुनगुनाया जाता है. इस गाने के बोल हैं ‘न हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा इंसान की औलाद है तू इंसान बनेगा…’ इस गाने की आज ज्यादा जरूरत है. लेकिन आदित्य ले आए सम्राट पृथ्वीराज चौहान जिन के बारे में कहा गया है कि यह आखिरी निडर हिंदू सम्राट की वीरता की कहानी है.

उन का और अक्षय कुमार का वह सपना टूट गया कि फिल्म रिलीज होते ही लोग टिकट खिड़कियों पर टूटे पड़ेंगे. टिकट ब्लैक में बिकेंगे और चारों तरफ पृथ्वीराज यानी अक्षय कुमार की जयजयकार हो रही होगी ठीक वैसे ही जैसे ‘रामायण’ सीरियल के वक्त राम बने अरुण गोविल की होती थी. यकीनन अक्षय कुमार गच्चा खा गए हैं.

गच्चा इसलिए खाया कि उन्होंने धर्म और वैचारिक हिंदुत्व के जरीए हिट होने की बात सोची और यह सोचते सोची कि उन्मादी हिंदू जैसाकि कह रहे हैं और जिस जनून से प्रचार कर रहे हैं इस फिल्म को 2-4 दफा नहीं तो एक बार जरूर देखेंगे.

धंधा चोखा है

धर्म और इतिहास बेच कर पैसा हरकोई नहीं कमा सकता. इस के लिए योग गुरु बाबा रामदेव की सी चालाकी चाहिए जिन्होंने पहले तो योग का धार्मिक ढिंढोरा पीटा और फिर धीरे से दवाइयां बेचने लगे. धंधा चल निकला तो वे अब सबकुछ बेचते हैं. अब लोग चकरा रहे हैं कि बाबा तो कहते थे कि योग भगाए रोग, फिर यह तरहतरह की आयुर्वेदिक दवाओं की मैन्युफैक्चरिंग क्यों? बाबा रामदेव बहुत बड़े कारोबारी बन गए और अक्षय कुमार फर्श पर आ गिरे.

यह हुनर वे श्रीश्री रवि शंकर और जग्गी बाबा से भी सीख सकते हैं.

दरअसल, अक्षय पृथ्वीराज का रोल चुन कर अपने कैरियर का कचरा कर बैठे हैं जिस से उन की आने वाली फिल्मों ‘राम सेतु,’ ‘रक्षा बंधन,’ ‘सैल्फी’ और ‘गोरखा’ पर भी संकट का साया लहराने लगा है. फिल्म इंडस्ट्री में जो एक बार बहुत बड़े बजट की भव्य फिल्म में काम कर फ्लौप होता है तो उस के दोबारा हिट होने की उम्मीदें बेहद कम हो जाती हैं.

‘जौली एलएलबी 2’ के बाद अक्षय एक हिट फिल्म के लिए तरस रहे हैं. उन की 2.0, ‘बैड मैन,’ ‘मिशन मंगल,’ ‘हाउस फुल 4’ और ‘बच्चन पांडे’ औंधे मुंह लुढ़कीं तो घबराहट और डिप्रैशन में वे पृथ्वीराज बन बैठे, लेकिन इस रोल में भी दर्शकों ने उन्हें भाव नहीं दिया.

कलाकारी पर हावी कट्टरता

मार्शल आर्ट और कुकिंग में माहिर अक्षय बेशक प्रतिभाशाली ऐक्टर हैं जिन के खाते में कई हिट और सफल फिल्में दर्ज हैं. इन में ‘खिलाड़ी’ 1992, ‘मोहरा’ 1994, ‘खिलाडि़यों का खिलाड़ी’ 1996, ‘हेराफेरी’ 2000, ‘वैलकम’ 2008, ‘हौलिडे’ 2014 उल्लेखनीय हैं.

अपने दौर के सुपर स्टार राजेश खन्ना उन के ससुर थे, लेकिन यह अक्षय की लगन और मेहनत ही थी कि उन्हें कभी राजेश खन्ना या उन के नाम के सहारे की जरूरत नहीं पड़ी. फिर क्यों कामयाबी के लिए उन्हें भगवा गैंग से हाथ मिलाना पड़ा और क्यों उन्हें कामयाबी नहीं मिली इस का जवाब हैं उन के दोहरे व्यक्तित्व के चलते ऐसा हुआ.

बचपन से ही अक्षय पेरैंट्स के साथ वैष्णोदेवी सहित तमाम ब्रैंडेड मंदिरों में जाते रहे हैं, लेकिन 2 साल पहले उन्होंने एक बयान में कहा था कि मैं किसी धर्म में विश्वास नहीं करता हूं. मैं केवल भारतीय होने में विश्वास करता हूं.

यह वह वक्त था जब हिंदू दर्शक उन्हें खान अभिनेताओं के विकल्प के तौर पर देखने और पेश करने लगे थे.

कट्टरवादियों की मंशा

चंद कट्टरवादियों की मंशा यह थी कि बौलीवुड भी खुलेतौर पर 2 हिस्सों में बंट जाए इस के लिए आए दिन आमिर, सलमान, शाहरुख और सैफ अली खान की फिल्मों के बहिष्कार की बात इस खोखली दलील के साथ सोशल मीडिया पर उठती रहती है कि हम हिंदुओं का पैसा मुसलमान अभिनेताओं की जेब में जा रहा है जो अपनी फिल्मों में हिंदू और हिंदुत्व को बदनाम करते रहते हैं.

अक्षय ने हड़बड़ाहट में और कुछ दौलत और शोहरत के लालच में इस दबाव को स्वीकार कर लिया जिस का नतीजा सामने है. दर्शक खान लोगों की फिल्में तो देखते रहे, लेकिन ‘पृथ्वीराज’ जैसी कट्टर हिंदूवादी फिल्म देखने की बारी आई तो उन्होंने अपना असली रंग दिखा दिया.

इतना ही नहीं भगवा गैंग से नजदीकियों का कोई मौका उन्होंने नहीं छोड़ा. कोविड-19 के दौरान जैसे ही नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री राहत कोष का एलान किया तो अक्षय ने तुरंत 25 करोड़ का भारीभरकम दान दे डाला. तालीथाली वाले पाखंड के दिन भी वे अपने घर के बाहर तालीथाली बजाते नजर आए थे.

ढलता कैरियर

जल्द ही उन पर भी कंगना राणावत की तरह भगवा गैंग का हिस्सा होने का ठप्पा लग गया. अब लगता नहीं कि इस ठप्पे से उन्हें आसानी से छुटकारा मिलेगा क्योंकि धार्मिक और ऐतिहासिक किरदार की पहचान में एक बार जो फंस गया दर्शक उसे फिर दूसरे किसी शेड में स्वीकार नहीं करते हैं. बीते दौर के धार्मिक भूमिकाओं वाले अभिनेता भारत भूषण और साहू मोडक और नए दौर के अरुण गोविल इस की बेहतर मिसाल हैं. कट्टरवाद किस तरह किसी अच्छेखासे कलाकार के कैरियर पर ग्रहण लगा सकता है नायिकाओं में कंगना इस का उदाहरण हैं.

धाकड़ ने निकाली हेकड़ी

कंगना ने अपने 16 साल के कैरियर में ऐसी कोई फिल्म नहीं दी है जिसे सुपरडुपर हिट कहा जा सके. 2006 में प्रदर्शित अपनी पहली फिल्म ‘गैंगस्टर’ से वे पहचानी जरूर जाने लगी थीं, लेकिन हमेशा उन्हें अभिनय के बजाय खूबसूरती के लिए देखा और सराहा गया.

‘फैशन’ फिल्म जो 2008 में प्रदर्शित हुई थी में जरूर उन्हें थोड़ी तारीफ मिली थी, लेकिन वह भी तात्कालिक थी. 2010 में आई ‘काइट्स’ फिल्म से भी काम चलाऊ रिस्पौंस उन्हें मिला था. पहली बार 2011 में ‘तनु वैड्स मनु’ फिल्म में उन्हें पसंद किया गया था, लेकिन इस का पार्ट 2 फ्लौप गया था.

2019 में ‘मणिकर्णिका’ को भी लोगों ने पसंद किया था पर यह फिल्म आम आदमी की नहीं थी. इस फिल्म की अर्ध सफलता के बाद कंगना को समझ आ गया था कि कुछ भी कर ले वह ज्यादा चलने वाली नहीं. इसलिए उन्होंने कट्टर हिंदुत्व धारण कर लिया जिस से उन्हें फिल्मों से ज्यादा स्पेस मीडिया और आम लोगों ने दिया. कट्टरवादियों ने उन्हें और उन के बड़बोलेपन को जम कर प्रोत्साहन दिया, लेकिन पिछले दिनों प्रदर्शित फिल्म ‘धाकड़’ को भाव नहीं दिया.

फिल्म की बदहाली

इस फिल्म की बदहाली तो रिलीज के पहले दिन ही उजागर हो गई थी जब कमाई का आंकड़ा क्व10 लाख भी नहीं छू पाया था. इस के बाद भी दर्शक नहीं मिले तो फिल्म को सिनेमाघरों से उतार लिया गया था. हाल तो यह था कि शुरू के 5 दिनों में ‘धाकड़’ का कलैक्शन क्व25 लाख के लगभग था.

समीक्षकों की निगाह में प्रदर्शन से पहले ही सुर्खियों में आई ‘धाकड़’ जैसा हश्र शायद ही किसी फिल्म का हुआ हो. अब तो उन की आने वाली फिल्म ‘इमरजेंसी’ को अभी से सुपर फ्लौप मान लिया गया है.

‘धाकड़’ के औंधे मुंह गिरने की वजह फिल्म की विषय वस्तु कम बल्कि दर्शकों की कंगना से ऐलर्जी ज्यादा है. उन की हिंदूवादी इमेज खुद उन हिंदूवादियों को ही रास नहीं आ रही जो उन्हें सूली पर चढ़ाने को उकसाते रहते हैं. साबित यह भी हुआ कि पर्सनल लाइफ में एक खास इमेज में बंध गए कलाकार को भी लोग देखने थिएटर तक नहीं जाते.

कंगना अगर राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के झमेले से दूर रहतीं तो शायद कामयाब हो भी सकती थीं. वे एक ऐसी सनक का शिकार हो कर रह गईं  जिस की गिरफ्त में लाखों आम लोग हैं जो यह नहीं देखते कि उन के किए का उन की ही जिंदगी, व्यवहार और कैरियर पर कितना बुरा असर पड़ रहा है.

‘पृथ्वीराज’ में अक्षय और ‘धाकड़’ में कंगना इसी सनक के चलते स्वभाविक अभिनय नहीं कर पाए. देश के करोड़ों लोग इसी चिंता और तनाव में सहज जिंदगी नहीं जी पा रहे. वे दिनरात नफरत की आग में झुलस रहे हैं जो धर्म की लगाई हुई है. अब इस से बचना लोगों के ही हाथ में है.

बड़बोली कंगना

खूबसूरत और सैक्सी अभिनेत्री कंगना राणावत अक्षय की तरह छिप कर या अप्रत्यक्ष रूप से भगवा गैंग, हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की वकालत और प्रचार नहीं करतीं वे खुलेतौर पर मैदान में रहती हैं और कुछ भड़काऊ कहने के लिए खुद नएनए मौके पैदा कर लेती हैं.

पिछले दिनों जब भाजपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता नूपुर शर्मा ने मुसलमानों के आराध्य पैगंबर मोहम्मद के बारे में अपमानजनक टिप्पणी की थी तो कंगना विवाद के तीसरे दिन ही बोल पड़ी थीं कि जब हिंदू भगवानों को अपमानित किया जाता है तो हम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं, लेकिन यह सब के लिए एकजैसा होना चाहिए. अपनेआप को डौन समझने की कोशिश न करें. यह अफगानिस्तान नहीं भारत है. यहां सबकुछ एक सिस्टम के साथ होता है. यहां पर एक अच्छी सरकार है जिसे लोकतांत्रिक तरीके से तैयार किया गया है. यह बात उन लोगों के लिए है जो सारी बातें भूल बैठे हैं.

उन लोगों यानी मुसलमानों को नूपुर शर्मा जैसी नेत्री को तो कुछ भी बकने की आजादी इस देश का वह संविधान देता है जिसे लिखने की कोई जरूरत नहीं. समझने वाले सब समझते हैं. हिंदुत्व की पोस्टर गर्ल के खिताब से नवाज दी गई यह ऐक्ट्रैस नूपुर शर्मा को पछाड़ते कुछ भी बोलने का माद्दा रखती है मसलन:

– भारत को 1947 में आजादी नहीं बल्कि भीख मिली थी. आजादी 2014 में मिली है जब नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में आई.

– पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद कंगना ने एक ट्वीट में ममता बनर्जी को निशाने पर लेते हुए लिखा था- वे खून की प्यासी ताड़का हैं. जिन लोगों ने इन्हें वोट दिया उन के हाथ भी खून से रंगे हुए हैं. इस ट्वीट के बाद उन्हें हालांकि ट्विटर से हाथ धोना पड़ गया था लेकिन तब तक वे अपनी गंवारू, घटिया और छिछोरी मानसिकता प्रदर्शित कर चुकी थीं.

– सुशांत सिंह राजपूत की कथित आत्महत्या के बाद तो बौखलाई इस ऐक्ट्रैस ने मुंबई की तुलना पीओके से कर दी थी. इस पर शिवसेना नेता संजय राउत ने उन्हें मुंबई न आने की सलाह दी थी.

– किसान आंदोलन के दौरान भी बड़बोली कंगना ने ट्वीट किया था कि शाहीन बाग वाली दादी भी किसान आंदोलन से जुड़ गई है. किसान आंदोलन की सफलता नहीं पचा पा रही इस ऐक्ट्रैस ने यह आरोप भी लगाया था कि क्व100-100 में लोग इस आंदोलन में शामिल हो रहे हैं. मशहूर फिल्मकार जावेद अख्तर और करण जौहर पर भी अनर्गल आरोप लगा चुकीं कंगना पर करीब 10 मामले अदालतों में चल रहे?हैं, लेकिन उन्हें किसी की परवाह या चिंता नहीं.

भाजपा सरकार द्वारा इन बेतुके भड़काऊ बयानों के एवज में उन्हें पद्मश्री दे कर उपकृत किया जा चुका है पर कंगना की भूख और बढ़ रही है. वे और बड़ा कुछ चाहती हैं और इस के लिए वे किसी भी हद तक गिर सकती हैं. यह एक कलाकार का नहीं बल्कि कट्टरवाद की मानसिकता की गिरफ्त में आ गई एक ऐसी हिंदू युवती की भड़ास है जिस का बस चले तो वह कांग्रेस और मुसलमानों को देश निकाला दे दे लेकिन सोशल मीडिया पर मुंह चलाना आसान काम है जो देश के करीब 4 करोड़ सनातनी हिंदू रोज सुबह ब्रश करने के पहले करते हैं.

Monsoon Special: फैमिली के लिए बनाएं राइस ढोकला

ढ़ोकला कई लोगों को पसंद आता है. वहीं मार्केट में कई तरह की वैरायटी मौजूद है. लेकिन आज हम आपको राइस ढोकला की रेसिपी के बारे में बताएंगे, जिसे आप आसानी से अपनी फैमिली को खिला सकते हैं.

सामग्री

1 कप चावल

2 बड़े चम्मच धुली उरद दाल

1 बड़ा चम्मच बारीक सूजी

1/4 कप दही

1 छोटा चम्मच चीनी

1/8 छोटा चम्मच सोडा

2 छोटे चम्मच अदरक हरीमिर्च पेस्ट

चुटकी भर हींग पाउडर

1 बड़ा चम्मच रिफाइंड औयल

2 छोटे चम्मच नीबू का रस

1 छोटा चम्मच ईनो फ्रूट साल्ट

नमक स्वादानुसार.

मग्री तड़के की

8-10 करीपत्ते

3 हरीमिर्चें लंबाई में कटी

1 बड़ा चम्मच रिफाइंड औयल

1 छोटा चम्मच राई

1/2 कप पानी.

विधि

दाल व चावल को 4 घंटे पानी में भिगोए रखें. फिर पानी निथार कर दही के साथ पीस लें. इस में ईनो फू्रट साल्ट को छोड़ कर बाकी सारी सामग्री मिलाएं. मिश्रण गाढ़ा लगे तो थोड़ा पानी डाल लें. रात भर ढक कर रखें. सवेरे ईनो फ्रूट साल्ट डालें और मिक्स कर के तुरंत चिकनाई लगे बरतन में मिश्रण डाल कर भाप में लगभग 8-10 मिनट पकाएं. ढोकला थोड़ा ठंडा हो जाए तो मनचाहे आकार में टुकड़े काटें. तड़का तैयार कर ढोकले के टुकड़ों पर फैला दें.

बिचौलिए- भाग 1: क्यों मिला वंदना को धोखा

सोमवार की सुबह सीमा औफिस पहुंची तो अपनी सीट की तरफ जाने के बजाय वंदना की मेज के सामने जा खड़ी हुई. उस के चेहरे पर तनाव, चिंता और गुस्से के भाव अंकित थे. अपना सिर झुका कर मेज की दराज में से कुछ ढूंढ़ रही वंदना से उस ने उत्तेजित लहजे में कहा, ‘‘वंदना, वह तुझे बेवकूफ बना रहा है.’’ वंदना ने झटके से सिर उठा कर हैरान नजरों से सीमा की तरफ देखा. उस के कहे का मतलब समझने में जब वह असमर्थ रही, तो उस की आंखों में उलझन के भाव गहराते चले गए. कमरे में उपस्थित बड़े बाबू ओमप्रकाश और सीनियर क्लर्क महेश की दिलचस्पी का केंद्र भी अब सीमा ही थी.

‘‘क….कौन मुझे बेवकूफ बना रहा है, सीमा दीदी?’’ वंदना के होंठों पर छोटी, असहज, अस्वाभाविक मुसकान उभर कर लगभग फौरन ही लुप्त हो गई.

‘‘समीर तुझे बेवकूफ बना रहा है. प्यार में धोखा दे रहा है वह चालाक इंसान.’’

‘‘आप की बात मेरी समझ में कतई नहीं आ रही है, सीमा दीदी,’’ मारे घबराहट के वंदना का चेहरा कुछ पीला पड़ गया.

‘‘मर्दजात पर आंखें मूंद कर विश्वास करना हम स्त्रियों की बहुत बड़ी नासमझी है. मैं धोखा खा चुकी हूं, इसीलिए तुझे आगाह कर भावी बरबादी से बचाना चाहती हूं.’’

‘‘सीमा दीदी, आप जो कहना चाहती हैं, साफसाफ कहिए न.’’ ‘‘तो सुन, मेरे मामाजी के पड़ोसी हैं राजेशजी. कल रविवार को समीर उन्हीं की बेटी रजनी को देखने के लिए अपनी माताजी और बहन के साथ पहुंचा हुआ था. रजनी की मां तो पूरे विश्वास के साथ सब से यही कह रही हैं कि समीर ही उन का दामाद बनेगा,’’ सीमा  की बात का सुनने वालों पर ऐसा प्रभाव पड़ा था मानो कमरे में बम विस्फोट हुआ हो.

ओमप्रकाश और महेश अब तक सीमा के दाएंबाएं आ कर खड़े हो गए थे. दोनों की आंखों में हैरानी, अविश्वास और क्रोध के मिश्रित भाव झलक रहे थे.

‘‘मैं आप की बात का विश्वास नहीं करती, जरूर आप को कोई गलतफहमी हुई होगी. मेरा समीर मुझे कभी धोखा नहीं दे सकता,’’ अत्यधिक भावुक होने के कारण वंदना का गला रुंध गया.

‘‘मेरी मां कल मेरे मामाजी के यहां गई थीं. उन्होंने अपनी आंखों से समीर को राजेशजी के यहां देखा था. समीर को पहचानने में वे कोई भूल इसलिए नहीं कर सकतीं क्योंकि उसे उन्होंने दसियों बार देख रखा है,’’ सीमा का ऐसा जवाब सुन कर वंदना का चेहरा पूरी तरह मुरझा गया. उस की आंखों से आंसू बह निकले. किसी को आगे कुछ भी टिप्पणी करने का मौका इसलिए नहीं मिला क्योंकि तभी समीर ने कमरे के भीतर प्रवेश किया. ‘नमस्ते,’  समीर की आवाज सुनते ही वंदना घूमी और उस की नजरों से छिपा कर उस ने अपने आंसू पोंछ डाले. उस के नमस्ते के जवाब में किसी के मुंह से कुछ नहीं निकला. इस बात से बेखबर समीर बड़े बाबू ओमप्रकाश के पास पहुंच कर मुसकराता हुआ बोला, ‘‘बड़े बाबू, यह संभालिए मेरा आज की छुट्टी का प्रार्थनापत्र, इसे बड़े साहब से मंजूर करा लेना.’’

‘‘अचानक छुट्टी कैसे ले रहे हो?’’ उस के हाथ से प्रार्थनापत्र ले कर ओमप्रकाश ने कुछ रूखे लहजे में पूछा.

‘‘कुछ जरूरी व्यक्तिगत काम है, बड़े बाबू.’’

‘‘कहीं तुम्हारी सगाई तो नहीं हो रही है?’’ सीमा कड़वे, चुभते स्वर में बोली, ‘‘ऐसा कोई समारोह हो, तो हमें बुलाने से…विशेषकर वंदना को बुलाने से घबराना मत. यह बेचारी तो ऐसे ही किसी समारोह में शामिल होने को तुम्हारे साथ पिछले 1 साल से प्रेमसंबंध बनाए हुए है.’’

‘‘यह…यह क्या ऊटपटांग बोल रही हो तुम, सीमा?’’ समीर के स्वर की घबराहट किसी से छिपी नहीं रही.

‘‘मैं ने क्या ऊटपटांग कहा है? कल राजेशजी की बेटी को देखने गए थे तुम. अगर लड़की पसंद आ गई होगी, तो अब आगे ‘रोकना’ या ‘सगाई’ की रस्म ही तो होगी न?’’

‘‘समीर,’’ सीमा की बात का कोई जवाब देने से पहले ही वंदना की आवाज सुन कर समीर उस की तरफ घूमा.

वंदना की लाल, आंसुओं से भरी आंखें देख कर वह हड़बड़ाए अंदाज में उस के पास पहुंचा और फिर चिंतित स्वर में पूछा, ‘‘तुम रो रही हो क्या?’’

‘‘इस मासूम के दिल को तुम्हारी विश्वासघाती हरकत से गहरा सदमा पहुंचा है, अब यह रोएगी नहीं, तो क्या करेगी?’’ सीमा का चेहरा गुस्से से लाल हो उठा.

‘‘यह आग तुम्हारी ही लगाई लग रही है मुझे. अब कुछ देर तुम खामोश रहोगी तो बड़ी कृपा समझूंगा मैं तुम्हारी,’’ सीमा  को गुस्से से घूरते हुए समीर नाराज स्वर में बोला.

‘‘समीर, तुम मेरे सवाल का जवाब दो, क्या तुम कल लड़की देखने गए थे?’’ वंदना ने रोंआसे स्वर में पूछा.

‘‘अगर तुम ने झूठ बोलने की कोशिश की, तो मैं इसी वक्त तुम्हें व वंदना को राजेशजी के घर ले जाने को तैयार खड़ी हूं,’’ सीमा ने समीर को चेतावनी दी. सीमा के कहे पर कुछ ध्यान दिए बगैर समीर नाराज, ऊंचे स्वर में वंदना से बोला, ‘‘अरे, चला गया था तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा है? मांपिताजी ने जोर डाला, तो जाना पड़ा मुझे मैं कौन सा वहां शादी को ‘हां’ कर आया हूं. बस, इतना ही विश्वास है तुम्हें मुझ पर. खुद भी खामखां आंखें सुजा कर तमाशा बन रही हो और मुझे भी लोगों से आलतूफालतू की बकवास सुनवा रही हो.’’ समीर की क्रोधित नजरों से प्रभावित हुए बगैर सीमा व्यग्ंयभरे स्वर में बोली, ‘‘इश्क वंदना से कर रहे हो और सुनते हो मातापिता की. कल को जनाब मातापिता के दबाव में आ कर शादी भी कर बैठे, तो इस बेचारी की तो जिंदगी बरबाद हो जाएगी या नहीं?’’

‘‘समीर, तुम गए ही क्यों लड़की देखने और मुझे बताया क्यों नहीं इस बारे में कुछ?’’ वंदना की आंखों से फिर आंसू छलक उठे.

‘‘मुझे खुद ही कहां मालूम था कि ऐसा कुछ कार्यक्रम बनेगा. कल अचानक ही मांपिताजी जिद कर के मुझे जबरदस्ती उस लड़की को दिखाने ले गए.’’

‘‘झूठा, धोखेबाज,’’ सीमा बड़बड़ाई और फिर पैर पटकती अपनी सीट की तरफ बढ़ गई.

‘‘सीमा की बातों पर ध्यान न देना, वंदना. तुम्हारी और मेरी ही शादी होगी…जल्दी ही मैं उचित माहौल बना कर तुम्हें अपने घरवालों से मिलाने ले चलूंगा. अभी जल्दी में हूं क्योंकि बाहर मांपिताजी टैक्सी में बैठे इंतजार कर रहे हैं मेरा. कल मिलते हैं, बाय,’’  किसी और से बिना एक भी शब्द बोले समीर तेज चाल से चलता हुआ कक्ष से बाहर निकल गया. उस के यों चले जाने से सब को ही ऐसा एहसास हुआ मानो वह वहां से उन सब से पीछा छुड़ा कर भागा है. ओमप्रकाश और महेश रोतीसुबकती वंदना को चुप कराने के प्रयास में जुट गए. सीमा क्रोधित अंदाज में समीर को भलाबुरा कहती लगातार बड़बड़ाए जा रही थी.

जब जागो तभी सवेरा- भाग 3: क्या टूट पाया अवंतिका का अंधविश्वास

संजय का इतना कहना था कि अनुकृति और अधिक रोने लगी यह देख संजय घबरा गया कि आखिर क्या बात हो गई.

तभी अनुकृति दोबारा सिसकती हुई बोली, ‘‘पापा 1 महीने के बाद मेरा फाइनल एग्जाम है और मुझे फिजिक्स, कैमिस्ट्री बिलकुल समझ नहीं आ रहे.’’

‘‘अरे तो इस में रोने वाली क्या बात है  तुम इन के लिए ट्यूशन कर लो और फिर तुम ने मुझे या अपनी मम्मी को पहले क्यों नहीं बताया? हम तुम्हारी ट्यूशन क्लास पहले ही शुरू करा देते?’’ संजय सांत्वना देते हुए बोला.

अनुकृति सुबकती हुई बोली, ‘‘पापा मैं ने मम्मी को बताया था, लेकिन मम्मी ने कहा कि ट्यूशन की कोई जरूरत नहीं है, ज्योतिषाचार्यजी के द्वारा दिया रत्न पहनने से ट्वैल्थ में मेरे अच्छे मार्क आएंगे, लेकिन पापा ऐसा कुछ नहीं हो रहा और अब लास्ट टाइम में कोई भी ट्यूशन लेने को तैयार नहीं है.’’

यह सुन संजय ने अपना सिर पकड़ लिया. अवंतिका का दिनप्रतिदिन

अंधविश्वास, ज्योतिष और रत्न के प्रति सनक बढ़ती ही जा रही थी, जो अब बच्चों के

भविष्य के लिए भी खतरे की घंटी थी क्योंकि अवंतिका न तो घर पर ध्यान दे रही थी और न ही बच्चों पर.

संजय स्वयं को संभालता हुआ अनुकृति को समझते हुए बोला, ‘‘बेटा, तुम चिंता मत करो मैं सब ठीक कर दूंगा. मैं तुम्हारे टीचर्स से बात करूंगा कि वे तुम्हें फिजिक्स और कैमिस्ट्री की ट्यूशन पढ़ाएं.’’

संजय के ऐसा कहने पर अनुकृति का रोना बंद हुआ और वह वहां से चली गई, लेकिन संजय दुविधा में पड़ गया कि वह कहां से लाएगा 4 महीने की स्कूल फीस, ट्यूशन फीस और घर खर्च के लिए रुपए, पहले ही वह कर्ज से दबा हुआ था. उस की छोटी सी प्राइवेट नौकरी में 1 महीने में इतना सब कर पाना आसान नहीं था और अवंतिका है कि बिना सोचविचार के ज्योतिष, आचार्य और रत्नों पर पैसे गंवा रही है.

संजय यदि अवंतिका से इस बारे में कुछ भी कहता या उसे रोकने की कोशिश करता तो वह उस से लड़ने पर आमादा हो जाती. संजय को कुछ सूझ नहीं रहा था कि वह क्या करे. अवंतिका को इस अंधविश्वास के जाल से कैसे बाहर निकाले.

तभी कुछ देर में अवंतिका घर से नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए न जाने क्याक्या सामान ले कर आ गई. यह देख संजय ने अवंतिका को बहुत समझने की कोशिश की कि वह ये सब बेकार के खर्चे करना बंद करे, केवल घरपरिवार पर ध्यान दे, लेकिन अवंतिका नहीं मानी वह अपनी मनमानी करती रही.

अवंतिका की मनमानी देख संजय को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह अवंतिका के सिर से यह ज्योतिषाचार्य और रत्नों का भूत कैसे उतारे. संजय ने कर्ज ले कर दोनों बच्चों की फीस भर दी. अनुकृति की टीचर्स से अनुरोध कर  ट्यूशन पढ़ाने के लिए भी उन्हें राजी कर लिया, जिस का नतीजा यह हुआ कि जिस दिन 12वीं कक्षा का रिजल्ट घोषित हुआ अनुकृति फिजिक्स और केमिस्ट्री के साथसाथ सभी विषयों में अच्छे नंबरों के साथ पास हो गई.

अनुकृति को जब इस बात का पता चला कि वह अच्छे नंबरों से पास हो गई है तो उस की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. अनुकृति पिता के गले लग कर बोली, ‘‘थैंक्यू पापा…’’

यह देख अवंतिका थोड़ी नाराजगी जताती हुई बोली, ‘‘अरे वाह आचार्यजी के पास मैं गई, घंटों लाइन में मैं खड़ी रही और तुम अपने पापा के गले लग कर थैंक्यू बोल रही हो?’’

यह सुन अनुकृति बोली, ‘‘मम्मी, मेरा ट्वैल्थ पास होना कोई आचार्यजी का प्रताप या रत्नों का कमाल नहीं है. देखो मैं ने तो कोई रत्न पहना ही नहीं है. यह तो मेरी मेहनत और पापा

का मुझे ट्यूशन के लिए टीचर को मनाने का नतीजा है.’’

यह सुन अवंतिका बड़ी नाराज हुई और वह आचार्यजी की पैरवी करने लगी. तभी संजय का मोबाइल बजा. फोन किसी अनजान नंबर से था. संजय के फोन उठाते ही उसे फौरन पुलिस स्टेशन आने को कहा गया. यह सुन संजय भागता हुआ पुलिस स्टेशन पहुंचा तो उसे पता चला कि पुलिस ने अनुज को जुआ खेलने के अपराध में गिरफ्तार कर लिया है.

इधर संजय पुलिस स्टेशन में अनुज को छुड़वाने के प्रयास में लगा हुआ था और उधर जब अवंतिका को इस बात का पता चला कि पुलिस ने अनुज को जुआ खेलने के जुर्म में जेल में बंद कर दिया है तो वह रोती हुई भाग कर सर्व समस्या निवारण केंद्र ज्योतिषाचार्यजी के पास अपनी समस्या के निवारण के लिए जा पहुंची, लेकिन आचार्यजी ने अवंतिका से बिना चढ़ावा चढ़ाए मिलने से इनकार कर दिया. तब जा कर आज अवंतिका को यह स्पष्ट हो पाया कि आचार्यजी के लिए उस की समस्या या उस से कोई लेनादेना नही है.

वह तो केवल एक पैसा कमाने का जरीया थी. जब तक वह चढ़ावा चढ़ाती रही आचार्यजी उस से मिलते रहे और आज उन्होंने मुंह फेर लिया. अवंतिका आचार्यजी से बिना मिले ही घर लौट आई.

संजय जब बड़ी मुश्किलों से अनुज को पुलिस से छुड़ा कर घर पहुंचा तो उस ने जो देखा उसे देख कर उस की आंखें खुली की खुली रह गईं, उस ने देखा अवंतिका घर में रखा सारे टोटकों का सामान बाहर फेंक रही थी जो उस ने स्वयं ही घर की सुखशांति, बच्चों की पढ़ाई और उस की प्रमोशन के लिए रखा था.

संजय और अनुज को देखते ही अवंतिका दौड़ कर उन के करीब आ गई और

उस ने अनुज को अपने गले से लगा लिया. उस के बाद वह अनुज की उंगलियों और गले से वे सारे रत्न निकाल कर फेंकने लगी जो ज्योतिषाचार्य के द्वारा दिए गए थे.

सारे रत्न और टोटकों के सामान फेंकने के उपरांत अवंतिका हाथ जोड़ कर संजय से बोली, ‘‘मुझे माफ़ कर दीजिए, मैं भटक गई थी. जिस परिवार की सलामती के लिए सुख, शांति और खुशहाली के लिए मैं ज्योतिष, आचार्य और रत्नों को महत्त्व देती रही, उन के पीछे भागती रही वह मेरी मूर्खता थी, अज्ञानता थी. मैं अंधविश्वास में कुछ इस तरह से पागल थी कि मैं एक भ्रमजाल में फंस गई थी, लेकिन अब मैं समझ चुकी हूं कि अंधविश्वास एक ऐसा जहर है जो किसी भी खुशहाल परिवार में घुल जाए तो उस परिवार को पूरी तरह बरबाद कर देता है, तबाह कर देता और ये ज्योतिषाचार्य, साधु, संत, महात्मा, आचार्य अपना उल्लू सीधा करने के लिए, अपनी जेबें भरने के लिए हमारी भावनाओं के साथ, हमारी आस्था और विश्वास के साथ खेलते हैं. मैं आप से वादा करती हूं कि अब मैं कभी किसी ज्योतिषी, आचार्य या रत्नों के चक्कर में नहीं पड़ूंगी. केवल अपने घरपरिवार और बच्चों पर ध्यान दूंगी.’’

अवंतिका से ये सब सुन संजय ने हंसते हुए अवंतिका को गले से लगा लिया और फिर बोला, ‘‘जब जागो तभी सवेरा.’’

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