Anupama को अधिक का सच बताएगी बरखा की बेटी! छोटी अनु की होगी एंट्री

सीरियल अनुपमा (Anupama) के हाल ही में रिलीज किए गए प्रोमो ने #MaAn फैंस का दिल तोड़ दिया था. दरअसल, प्रोमो में अनुज के ऊपर शीशा गिरते हुए दिखाया गया था, जिसके कारण खबरें फैली थीं कि अनुज कोमा में चला जाएगा. वहीं फैंस भी इस बात से परेशान नजर आए थे और मेकर्स से ट्रैक बदलने के लिए कह रहे थे. हालांकि अब शो नई एंट्री के साथ अनुज और अनुपमा की जिंदगी बदलती हुई नजर आने वाली है. आइए आपको बताते हैं क्या होगा सीरियल में आगे (Anupama Hindi Written Update)…

अनुज की बची जान

 

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अब तक आपने देखा कि अनुपमा को साइनिंग अथौरिटी किसी को ना देने का वादा करने के दौरान एक शीशा अनुज के पीछे गिर जाता है. हालांकि अनुज के केवल थोड़ी चोट लगती है. लेकिन अनुपमा का दिल टूट जाता है. दूसरी तरफ, काव्या, पाखी को लेकर वनराज को समझाने की कोशिश करती है, जिसके चलते वनराज शांत नजर आता है.

 

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छोटी अनु की होगी एंट्री


अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि अनुज और अनुपमा जहां क्वालिटी टाइम बिताएंगे तो वहीं उन्हें छोटी अनु के गोद लेने की खबर मिलेगी, जिसके चलते दोनों डांस करते दिखेंगे. वहीं इस सेलिब्रेशन में समर और सारा भी अनुज-अनुपमा का साथ देते हुए नजर आएंगे. दूसरी तरफ पाखी के दिल में अधिक के लिए प्यार बढेगा और अधिक, पाखी को भड़काने का काम करता दिखेगा.

सारा कहेगी सच

इसके अलावा आप देखेंगे कि अनुपमा, अनुज से छोटी अनु के बारे में पूरे परिवार को बताने के लिए कहेगी. लेकिन अनुज इस बात को शेयर करने से मना कर देगा. वहीं अधिक, बरखा से कहेगा कि अगर वह पाखी से शादी करता है तो बरखा को अनु का रिमोट कंट्रोल मिल जाएगा, जिसे सारा सुन लेगा और अनुपमा और अनुज को इस बात को बताने के लिए जाएगी. हालांकि देखना होगा कि सारा क्या अपनी मां के खिलाफ जाकर अधिक का सच बताएगी.

सूदखोरों के चंगुल में महिलाएं

जबलपुर के कटरा इलाके में रहने वाले महेश रैकवार एक वकील के यहां मुंशीगिरी करते हैं. उन की पत्नी उमा टिफिन सैंटर चलाती हैं. दोनों की आमदनी से घर खर्च तो पूरा हो जाता था, लेकिन बचत नहीं हो पाती थी. कोविड-19 के दौरान उमा का टिफिन का काम बंद हो गया, जिस से घर में पैसों की किल्लत होने लगी. इस किल्लत को दूर करने के लिए उमा ने मानसरोवर कालोनी में रहने वाली सपना प्रजापति से ₹50 हजार और काकुल प्रजापति से ₹30 हजार ब्याज पर लिए.

ब्याज 10 फीसदी महीने की दर से तय हुई.  उमा सपना को ₹5 हजार महीना और काकुल को ₹3 हजार महीना चुकाने को तैयार हो गई इस उम्मीद के साथ कि जल्द ही टिफिन सैंटर का काम फिर चल निकलेगा जिस की आमदनी से वह इन दोनों की पाईपाई चुका देगी.

वक्त गुजरता गया और उमा ने सपना को डेढ़ लाख और काकुल को ₹60 हजार चुकाए यानी मूल रकम से दोगुना और 3 गुना, फिर भी मूल रकम ज्यों की त्यों थी और ब्याज का पहिया घूमता जा रहा था. जब उमा और ब्याज नहीं दे पाई तो काकुल ने उस के घर वसूली के लिए फूटा ताल निवासी गोवर्धन कश्यप उर्फ जीतेंद्र को भेजना शुरू कर दिया जो पैसा वसूलने में माहिर था. उस का पेशा ही ऐसे इज्जतदार लोगों से पैसा वसूलना था.

जितेंद्र उसे आए दिन डरानेधमकाने लगा कि पैसा दो नहीं तो अंजाम भुगतने को तैयार हो जाओ. मैं तुम्हारे पूरे परिवार की हत्या कर दूंगा. डरीसहमी उमा कुछ सोचसमझ पाती उस के पहले ही एक दिन सपना भी उस के यहां आ धमकी और धमकी दी कि 11 जनवरी तक पूरी रकम नहीं चुकाई तो तेरे घर पर हम कब्जा कर लेंगे. जीतेंद्र ने भी इसी धमकी के साथ पैसा चुकाने की तारीख 15 जनबरी मुकर्र कर रखी थी.

सूदखोरों का कहर

इन सूदखोरों के कहर से बचने का इकलौता रास्ता उमा को आत्महत्या कर लेने का दिख रहा  था. लिहाजा उस ने जहर पी लिया. तबीयत बिगड़ी तो उस की बेटी पूनम ने उसे गोल बाजार स्थित एक प्राइवेट अस्पताल में भरती करा दिया. मामला चूंकि खुदकुशी की कोशिश का था, इसलिए अस्पताल में पुलिस की ऐंट्री हुई जिस ने उमा और पूनम के बयानों पर सपना और जीतेंद्र को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन काकुल फरार हो गई.

सूदखोरों के कहर का यह मुकदमा भी अब अदालत में है जिस का फैसला जो भी आए, लेकिन यह तो साफ दिख रहा है कि महिलाएं भी अब बाजार से तगड़े ब्याज पर पैसा उठाने लगी हैं जो उन्हें सहूलियत से मिल भी जाता है, लेकिन एवज में उन से स्टांप पेपर पर लिखापढ़ी करवा ली जाती है और अकसर उन के नाम की जायदाद या गहने भी गिरवी रखवा लिए जाते हैं. इस तरीके में ब्याज की दर थोड़ी कम हो जाती है, लेकिन वह इतनी कम नहीं होती है कि जबलपुर की उमा रैकवार या भोपाल की रश्मि सक्सेना (बदला नाम) जैसी महिलाएं उसे आसानी से चुका सकें.

निगलना भी मुश्किल और उगलना भी

28 वर्षीय अविवाहित रश्मि को एमए करने के बाद कहीं नौकरी नहीं मिल रही थी सो उस ने होशंगाबाद में अपने फ्लैट में ही छोटा सा ब्यूटीपौर्लर खोल लिया जो उस के बूढ़े पिता के नाम है और वे उस के साथ ही रहते हैं. पार्लर चला तो लेकिन आमदनी उम्मीद के मुताबिक नहीं हो रही थी. इस पर एक सीनियर ब्यूटीशियन ने उसे सलाह दी कि किसी पौश इलाके में बड़ा पार्लर खोलो तो लक्ष्मी छमाछम बरसने लगेगी क्योंकि वहां ग्राहक ज्यादा होते हैं.

आइडिया रश्मि को भा गया पर बड़े पार्लर के लिए ₹4-5 लाख कहां से आएं? इस के लिए पहले तो उस ने बैंक लोन के लिए भागदौड़ की, लेकिन 3 महीने में ही उसे समझ आ गया कि यह लोन उसे इस जन्म में तो नहीं मिलने बाला. इस दौरान उस की एक क्लाइंट ने उसे बाजार से पैसा उठाने की न केवल सलाह दी बल्कि उसे फाइनैंसर यानी सूदखोर के पास ले कर भी गई. फाइनैंसर अग्रवाल समाज के संभ्रांत दंपत्ती थे जिन्होंने रश्मि को समझया कि देखो ₹5 लाख हम दे तो देंगे, लेकिन इस के एवज में कुछ गिरवी रखना पड़ेगा और ब्याज वक्त पर देना पड़ेगा.

रश्मि ने अपने पापा को मना कर उन का फ्लैट सूदखोरों के पास गिरवी रखवा दिया और पैसा हाथ में आते ही एक पौश इलाके में दुकान ले कर उस में अपने सपनों का पार्लर खोल लिया जो ठीकठाक चलने लगा. ₹5 लाख पर ब्याज की रकम 4 फीसदी महीने की दर से वह ₹20 हजार देती रही. 6 महीने बाद ही रश्मि को समझ आ गया कि ऐसे तो वह पापा का गिरवी रखा फ्लैट कभी नहीं छुड़ा पाएगी क्योंकि सारे खर्चे निकालने के बाद पार्लर से ₹30 हजार महीने से ज्यादा की कमाई नहीं हो रही थी. इन में से ₹20 हजार ब्याज के देने के बाद उस के पल्ले ₹10 हजार ही पड़ रहे थे.

लुटतेपिटते कर्जदार

अब 2 साल गुजर जाने के बाद मूल रकम के बराबर ब्याज दे चुकी रश्मि तनाव में है क्योंकि ऐग्रीमैंट के मुताबिक उसे मूल रकम ₹5 लाख 5 साल में चुकानी है नहीं तो फ्लैट सूदखोरों का हो जाएगा. अब वह उस घड़ी को कोसती है जब ब्याज पर पैसा लेने का शौक या लालच जो भी कह लें उसे यह सोचते चर्राया था कि 1 साल में ही इतना कमा लेगी कि फ्लैट वापस ले लेगी. पर अब ऐसा होना मुमकिन नहीं हो रहा तो वह न तो पापा से नजरें मिला पाती और न ही पहले जैसे उत्साह से पार्लर चला पाती.

रश्मि या उमा ने शायद ही करीब 45 साल पहले रिलीज हुई रेखा विनोद खन्ना द्वारा अभिनीत हिंदी फिल्म ‘आप की खातिर’ देखी होगी. लेकिन उन की हालत इस फिल्म की नायिका सरिता जैसी ही है जो पति से छिप कर एक सूदखोर से तगड़े ब्याज पर ₹10 हजार ले कर मुनाफे के लालच में शेयर बाजार में लगा देती है और पैसा न चुकाने पर एक के बाद एक कई मुसीबतों में न केवल खुद फंसती जाती है बल्कि अपने टैक्सी ड्राइवर पति को भी जोखिम में डाल देती है.

चूंकि हिंदी फिल्म थी, इसलिए अंत सुखद ही हुआ लेकिन रियल लाइफ में ऐसा नहीं होता. तब यह होता है कि कर्जदार लुटपिट जाते हैं. सूद में अपना बचाखुचा भी खो देते हैं और कई तो घबरा कर आत्महत्या ही कर लेते हैं.

आत्महत्या करने को मजबूर

ऐसी खबरें आए दिन हर किसी को चिंता और हैरत में डाल देती हैं.

– भोपाल के नेहरू नगर इलाके में बीती 7 जनवरी को एक महिला रजनी (बदला नाम) ने सूदखोरों से तंग आ कर जहर खा लिया. गंभीर हालत में अस्पताल में भरती होने के बाद पुलिस की छानबीन में पता चला कि रजनी ने 2 महिला सूदखोरों से 7 साल पहले ब्याज पर ₹1 लाख लिए थे. वह इस राशि का ब्याज कभीकभार देती रही, लेकिन कुछ दिनों से सूदखोरनियां उस से ₹10 लाख की मांग करने लगी. न देने पर रजनी को धमकियां देने लगीं थी. इस की शिकायत रजनी ने कमला नगर थाने में की भी थी पर पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की.

– रजनी के मामले से 3 महीने पहले एक और सनसनीखेज मामला भोपाल से ही उजागर हुआ था जिस में पिपलानी इलाके के एक ही परिवार के 5 सदस्यों ने एकसाथ जहर खा लिया और इन सभी की एक के बाद एक मौत हो गई. इस मामले में पेशे से मैकैनिक संजीव जोशी की पत्नी अर्चना जोशी ने बबली नाम की महिला से ₹3 लाख 70 हजार ब्याज पर लिए थे. ये पैसे घर खर्च और बेटियों की पढ़ाई के लिए किश्तों में लिए गए थे. ‘आप की खातिर’ फिल्म की नायिका की तरह अर्चना ने भी पति से छिप कर यह कर्ज तगड़े सूद पर लिया था. एक दिन संजीव ने बबली और उस की गुंडी टाइप सहयोगियों को घर पर पैसे का तकाजा करते देखा तो उसे हकीकत पता चली.

– चूंकि अर्चना ने ब्याज पर पैसा घर की जरूरतों के लिए लिया था, इसलिए संजीव ने ₹80 हजार दे कर उन्हें टरकाया और थोड़ाथोड़ा कर बाद में भी चुकाते रहे, लेकिन इस से समस्या हल नहीं हो गई अब तो इस बबली गैंग की मैंबर आए दिन घर आ कर गालीगलौच करती धमकियां भी देने लगीं. महल्ले और रिश्तेदारी

में बदनामी होने लगी तो जोशी परिवार ने जहर खा कर सामूहिक आत्महत्या कर ली. मरने वालों में जोशी दंपती की 2 मासूम बेटियां और बुजुर्ग मां भी थीं.

– गाजियाबाद के विजय नगर में जनरल स्टोर मालिक ललित कुमार ने कुछ सूदखोरों से 2019 में ₹20 लाख ब्याज पर लिए थे जिन में से थोड़ाथोड़ा कर के 4 गुना चुका भी चुके थे, लेकिन यह ब्याज था असल नहीं. लालची सूदखोरों का दबाव बढ़ा तो घबराए ललित ने फांसी लगा ली जिस से बीती 15 मई को उन की मौत हो गई. लोग लाखोंकरोड़ों भी तगड़े ब्याज पर लेते हैं और न चुकाने पर मौत को गले लगा लेते हैं.

– सूदखोरी के धंधे में महिलाओं के बढ़ते दखल और भागीदारी का एक मामला बीती 22 मई को उदयपुर से आया. नवरत्न कौंप्लैक्स निवासी कपड़ों के व्यापारी दीपक मेहता का सूरजपोल में कपड़ों का बड़ा शोरूम है. उन्होंने हेमलता काकारिया नाम की महिला से ₹30 लाख कारोबार के लिए लिए थे और ब्याज में ₹2 करोड़ दे चुके थे इस पर भी हेमलता और उस के पति निरंजन मोगरा उसे आए दिन परेशान करते रहते थे जिस से आजिज आ कर दीपक ने फांसी लगा ली.

– यह तो थी करोड़ों की बात, लेकिन महज ₹5 हजार के कर्ज का बोझ भी जानलेवा साबित हो सकता है यह तेलांगना के सिद्धिपेठ कसबे के भारत नगर में रहने वाली 23 वर्षीय किर्नी मोनिका जोकि राजगोपालपेठ में कृषि विस्तार अधिकारी थीं की आत्महत्या से सामने आया.

उन्होंने किसानों के लिए कर्ज देने वाले एक एप के जरीए ₹5 हजार का लोन लिया था. इस का ब्याज बढ़तेबढ़ते ₹2 लाख 60 हजार हो गया. इस का पता उन्हें अप्रत्याशित तरीके से उस वक्त चला जब लोन देने वाली कंपनी के रिकवरी एजेंटों ने उन का फोटो सोशल मीडिया पर वायरल करते हुए यह लिखा कि मोनिका ने उन से लोन लिया है.

अगर वे आप को कहीं दिखाई दें तो उन से लोन लौटाने के लिए कहें. यह ठीक वैसी ही बात थी जैसेकि किसी ने गुमशुदा की तलाश के पोस्टर शहर की दीवारों पर चिपकवा दिए हों. इस वेइज्जती को मोनिका बरदाश्त नहीं कर पाई और उन्होंने पिछले साल 16 दिसंबर को आत्महत्या कर ली.

इज्जत है बड़ी दिक्कत

मोनिका और रजनी जैसी महिलाओं को चिंता और तनाव सुरसा के मुंह की तरह बढ़ते ब्याज के साथसाथ प्रतिष्ठा की भी रहती है, इसलिए उन्होंने जानलेवा रास्ता चुना. हालांकि यह हालत हर उस शख्स की होती है जो सूदखोरों के चंगुल में फंस जाता है. लोग कर्ज तो चाहते हैं, लेकिन उस के सार्वजनिक होने से डरते हैं. ऐसा इसलिए कि हमारे समाज में सूदखोरों से ब्याज पर पैसा लेना अच्छा नहीं माना जाता. उलट इस के बैंकों से लिए गए कर्ज को आजकल इतने शान की बात समझ जाती है कि लोग खुद यह ढिंढोरा पीटते नजर आते हैं कि आमदनी में से इतने हजार तो होम या कार लोन की किश्त चुकाने में चले जाते हैं.

यानी बैंक से कर्ज लेना अब हरज की बात नहीं, लेकिन सूदखोरों से लेना अच्छी बात नहीं समझ जाती. इस मानसिकता की जड़ में खास बात यह है कि बैंक ग्राहक को हमेशा उस की आमदनी और लौटाने की क्षमता को देख कर लोन देते हैं और जायदाद गिरवी रख लेने के अलावा भी गारंटी लेते हैं, जबकि सूदखोर को इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं होता.

पैसा वापस न मिलने पर सख्ती ये दोनों ही करते हैं पर सूदखोर ज्यादा कानूनी पचड़े में नहीं पड़ते. वे नोटिस के बजाय खुद घर आ धमकते हैं या फिर अपने गुर्गों जिन्हें बाउंसर कहते हैं को भेजते हैं. इन का खास काम कर्जदार को धमकाते रहने के अलावा उस की इज्जत का पंचनामा बनाना भी रहता है. यह तरीका कुछ साल पहले तक क्रैडिट कार्ड देने बाली कंपनियों और बैंकों ने भी अपना रखा था जो कमोबेश अभी भी चलन में है.

एक बड़ा फर्क ब्याज दर का है. क्रैडिट कार्ड देने बाले बैंक और सूदखोर बहुत ज्यादा दर पर पैसा देते हैं और उन्हें इस बात से भी कोई मतलब नहीं रहता कि लेने वाला इन्हें कहां और कैसे खर्च कर रहा है. वजह उन्हें पैसा वसूलना अच्छी तरह आता है फिर किसी की इज्जत या जान जाए इन की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता.

आत्मनिर्भरता के साइड इफैक्ट्स

महिलाओं की आत्मनिर्भरता और आर्थिक स्वतंत्रता अच्छी बात है. शहरी इलाकों में हर तीसरे घर में एक कमाऊ महिला सदस्य है. पारिवारिक बदलावों के चलते बड़ा फर्क यह देखने में आ रहा है कि महिलाएं न केवल सूद पर पैसा लेती हैं बल्कि देती भी हैं. करीब 4 दशक पहले तक घर का मुखिया जाहिर है आमतौर पर पुरुष शादीब्याह के मौके और उच्छ शिक्षा के लिए कब किस से ब्याज पर पैसे ला कर कब कैसे चुका भी देता था घर के बाकी सदस्यों को इस की भनक भी नहीं लगती थी.

अब हालत यह है कि हर कमाऊ मैंबर किसी न किसी रूप में कर्जदार है, लेकिन सूदखोरों के चंगुल में जो एक बार फंसा उस का सलामत निकलना किसी चमत्कार से कम नहीं होता.

असल में तमाम पेशेवर सूदखोर और पुलिस बाले मौसरे भाई होते हैं. भोपाल के अशोका गार्डन इलाके के एक सूदखोर की मानें तो हर थाने में समयसमय पर चढ़ावा हम लोग पहुंचाते हैं. काररवाई तभी होती है जब कोई देनदार आत्महत्या कर लेता है और मीडिया इस को ले कर हल्ला मचाता है, इसलिए हम भी नहीं चाहते कि कोई खुदकुशी करे, हमें तो ब्याज से प्यार होता है जो मिलता रहे नहीं तो मजबूरी में हमें दूसरे हथकंडे अपनाना पड़ते हैं.

यह सोचना भी बेमानी है कि चूंकि सूदखोर महिला है इसलिए पैसा न चुकाने की स्थिति में रहम खाएगी. अभी तक के मामले तो यह बताते हैं कि महिला सूदखोर पुरुष सूदखोर की तरह् ही बेरहम होती है जिस के जाल में महिलाएं आसानी से फंस जाती हैं.

धमकियां मिलने पर इज्जत की परवाह न कर पुलिस और कानून का सहारा लें भले ही कुछ हो या न हो इस से आप की झिझक दूर होगी और सूदखोर जितना मिल जाए उतना दे दो पर समझता करने तैयार हो सकता है.

कैसे बचें

– सूदखोरों से बचने का सब से आसान रास्ता यह है कि उन के जाल में पड़ा पैसों का दाना चुगा ही न जाए और चुगना मजबूरी हो जाए तो हड़बड़ाहट दिखाने के बजाय ब्याज की दर पर मोलभाव किया जाए. देशभर में आमतौर पर 10 फीसदी का ब्याज चलन में है. इस का गणित सम?ों कि आप अगर किसी से ₹1 लाख ब्याज पर लेती हैं तो एवज में हर महीने ₹10 हजार चुकाना होंगे. पैसा लेते वक्त यह बेहद हलका लगता है, लेकिन जब चुकाया जाने लगता है तो इस का भारीपन समझ में आता है पर तब तक काफी देर हो चुकी होती है.

– महिलाएं पुरुषों जैसी ही एक गलती यह करती हैं कि एक सूदखोर से छुटकारा पाने के लिए दूसरे से उसी ब्याज दर पर पैसा ले लेती हैं. ‘आप की खतिर’ फिल्म की नायिका सरिता ने भी यही किया था पर उसे कर्ज चुकाने के लिए पैसा देने वाली समाजसेवी महिला वसूली के लिए उस से देह व्यापार करवाना चाहती थी जो किसी भी महिला के लिए जलालत की बात होती है. इसलिए नौकरी की तरह ब्याज स्विच करना फायदे का सौदा नहीं है.

– धमकियों से बचने के लिए इकलौता रास्ता पुलिस का बचता है, लेकिन वहां से भी कुछ हासिल नहीं होता क्योंकि सूदखोरी पर कोई असरदार कानून बहुत से कानून होने के बाद भी नहीं है इसलिए खुद पुलिस वाले हाथ खड़े कर देते हैं कि इस में हम क्या करें पैसा लिया है तो लौटाओ.

फेस क्रीम चुनते वक्त रखें इन बातों का ख्याल

कई ब्यूटी प्रोडक्ट्स में सल्फेट मिला होता है, जो स्किन को नुकसान पहुंचाता है. इन प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल से कोई सुंदर तो दिखने से रहा, उल्टा स्किन खराब हो सकती है. कई शैंपू, माउथवॉश और टूथपेस्ट में भी ये मिला होता है. इनसे स्किन एलर्जी के अलावा, फेस और चिन पर पानी वाले एक्ने होने जैसी प्रॉब्लम्स हो सकती है. जानिए, सल्फेट प्रोडक्ट्स किस तरह स्किन को नुकसान पहुंचा सकते हैं.

जानलेवा भी हो सकते हैं साबित

आज कई छोटी कंपनियां ब्यूटी प्रोडक्ट्स में सल्फेट की क्वांटिटी ज्यादा मिला देती है, जिससे वे यूज करते समय लगेंगे तो अच्छे, लेकिन नुकसान बेहद करेंगे. शैंपू और फेश वॉश जैसी चीजों में अगर झाग ज्यादा आ रहा है, तो समझ जाएं कि उनमें सल्फेट की मात्रा अधिक मिली है. सल्फेट मिलने से दूसरी चीजें कम मिलानी पड़ती हैं, जिससे प्रोडक्ट की लागत कम हो जाती है. सल्फेट के साथ ही वे टॉक्सिक इंग्रेडिएंट्स प्रोडक्ट्स में मिला देते हैं, जिनका इस्तेमाल आपके लिए खतरनाक हो सकता है. दरअसल, ब्यूटी प्रोडक्ट्स लगाते ही आपकी स्किन पर काम करना शुरू कर देते हैं, ऐसे में कई बार ये प्रोडक्ट स्किन के अंदर समाकर आपके लिए घातक भी हो जाते हैं. सल्फेट स्किन को ड्राई और डल भी कर देता है.

बैक्टीरिया रोकता है

सल्फेट मिलने से प्रोडक्ट में बैक्टीरिया को रोकने और डिओ, लोशन, लिपस्टिक, शैंपू, स्क्रब्स आदि प्रोडक्ट्स में प्रिजर्वेटिव के लिए इस्तेमाल होने वाली चीजें कम हो जाती है, जिससे आपको स्किन इन्फेक्शन, दाग धब्बे और पिंपल्स जैसी प्रॉब्लम्स आ सकती है.

बालों का नेचुरल रंग फेड

अधिक सल्फेट मिले शैंपू से बालों का नेचुरल रंग फेड हो जाता है. यही नहीं, इससे बालों के क्यूटिकल खुल जाते हैं और इनके कमजोर होने और टूटने का खतरा बढ़ जाता है. सल्फेट से बालों के ड्राई होने और स्कैल्प में खुजली होने जैसी परेशानियां सामने आती हैं.

प्रोटेक्टिव लेयर को नुकसान

यह हाथों की त्वचा, बालों या मुंह के लिए ठीक नहीं होता. ज्य़ादा फोमिंग से त्वचा की नमी और प्रोटेक्टिव बैरियर नष्ट हो जाते हैं. सल्फेट युक्त टूथपेस्ट से त्वचा की तरह मुंह की बाहरी प्रोटेक्टिव लेयर नष्ट होती है.

ऑक्सीबेनजॉन

ये सनक्रीम में अधिक मिलाया जाता है. रिसर्च के मुताबिक, ऑक्सीबेनजॉन हमारे हार्मोनल सिस्टम को पूरी तरह बर्बाद कर सकता है. यह प्रोडक्ट स्किन पर एक ऐसी लेयर बना देता है, जिससे इसकी टॉक्सिन्स रिलीज करने की एबिलिटी कम हो जाती है. एक्ने होने के अलावा ये स्किन फंक्शन और सेल्स का डेवलपमेंट भी धीमा कर देता है. यह पारा, कोलतार, एल्युमिनियम, डीट, डाइऑक्सिन, फॉर्मल्डिहाइड, पारा-अमीनोबेन्जॉइक एसिड, कैंफर और कार्बन ब्लैक भी ब्यूटी प्रोड्क्ट्स में इस्तेमाल होने वाले कुछ कॉमन टॉक्सिक इंग्रीडिएंट्स हैं.

टोनर

अगर आपकी स्किन ड्राई है, तो ऐसे प्रोडक्ट का बिल्कुल भी इस्तेमाल न करें, जिसमें अल्कोहल या एथनोल का इस्तेमाल हो. इनके बजाय आप यूज करें नेचरल टोनर का.

क्लींजर

क्लीनजिंग प्रोडक्ट्स में सोडियम लायरल सल्फेट के रूप में सल्फेट पाया जाता है. ये सल्फेट्स फोमिंग एजेंट होते हैं और ये आपकी त्वचा की ड्राईनैस को बढ़ा देते हैं.

स्क्रब्स

अगर स्किन ड्राई है, तो किसी भी तरह के स्क्रब का प्रयोग न करें. हां, हफ्ते में एक बार किसी ऐसे स्क्रब का इस्तेमाल करें, जिसमें किसी दानेदार चीज का इस्तेमाल न हो.

सनस्क्रीन

जेल बेस्ड सनस्क्रीन आपकी रुखी त्वचा पर टिक नहीं पाती है इसलिए यह आपके त्वचा के लिए असरदार नहीं है.

अवाइड करें इन्हें भी

पैराबेन

मेकअप प्रोडक्ट्स, मॉइश्चराइज़र, शेविंग जेल, शैंपू, पर्सनल ल्यूब्रिकैंट्स और स्प्रे टैन प्रोडक्ट्स (स्किन टैन करने लिए इस्तेमाल किए जाने वाले स्प्रे) में पैराबेन की मात्रा डाली जाती है. कई रिसर्च में ये बात सामने आई है कि लॉन्ग चेन वाले पैराबेन (प्रोपाइल और ब्यूटाइल पैराबीन्स) और इस ग्रुप के दूसरे केमिकल्स जैसे आइसोप्रोपाइल और आइसोब्यूटाइल पैराबीन्स एंडोक्राइन सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकता है और रिप्रोडक्टिव सिस्टम में गड़बड़ियां आने के साथ ही इससे मेंटल ग्रोथ भी रुक सकती है. पेग्स ये भी फेस वॉश, स्क्रब्स, बॉडी वॉश, मेकप और टूथपेस्ट बनाने में इस्तेमाल होता है. फेस वॉश और स्क्रब्स में मौजूद रहने वाले ये बेहद छोटे प्लास्टिक बीड्स पॉलिथिलीन से बने होते हैं.

एक सफल लक्ष्य: जब मां के जाने पर टूट गया बेटा

सुबह सुबह फोन की घंटी बजी.  अनिष्ट की आशंका से मन धड़क गया. मीना की सास बहुत बीमार थीं. रात देर वे सब भी वहीं तो थे. वैंटिलेटर पर थीं वे…पता नहीं कहां सांस अटकी थी. विजय मां को ऐसी हालत में देख कर दुखी थे. डाक्टर तो पहले ही कह चुके थे कि अब कोई उम्मीद नहीं, बस विजय लंदन में बसे अपने बड़े भाई के बिना कोई निर्णय नहीं लेना चाहते थे. मां तो दोनों भाइयों की हैं न, वे अकेले कैसे निर्णय ले सकते हैं कि वैंटिलेटर हटा दिया जाए या नहीं.

निशा ने फोन उठाया. पता चला, रात 12 बजे भाईसाहब पहुंचे थे. सुबह ही सब समाप्त हो गया. 12 बजे के करीब अंतिम संस्कार का समय तय हुआ था.

‘‘सोम, उठिए. विजय भाईसाहब की मां चली ?गईं,’’ निशा ने पति को जगाया. पतिपत्नी जल्दी से घर के काम निबटाने लगे. कालेज से छुट्टी ले ली दोनों ने. बच्चों को समझा दिया कि चाबी कहां रखी होगी.

दोनों के पहुंचने तक सब रिश्तेदार आ चुके थे. मां का शव उन के कमरे में जमीन पर पड़ा था. लंदन वाले भाईसाहब सोफे पर एक तरफ बैठे थे. सोम को देखा तो क्षणभर को आंखें भर आईं. पुरानी दोस्ती है दोनों में. गले लग कर रो पड़े. निशा मीना के पास भीतर चली आई जहां मृत देह पड़ी थी. दोनों बड़ी बहनें भी एक तरफ बैठी सब को बता रही थीं कि अंतिम समय पर कैसे प्राण छूटे. मां की खुली आंखें और खुला मुंह वैसा ही था जैसा अस्पताल में था. अकड़ा शरीर आंखें और मुंह बंद नहीं होने दे रहा था. वैंटिलेटर की वजह से मुंह खुला ही रह गया था.

मां की सुंदर सूरत कितनी दयनीय लग रही थी. सुंदर सूरत, जिस पर सदा मां को भी गर्व रहा, अब इतनी बेबस लग रही थी कि…

विजय भीतर आए और मां का चेहरा ढकते हुए रोने लगे. अभी 4 महीने पहले की ही बात है. कितना झगड़ा हो गया था मांबेटे में. सदा सब भाईबहनों की सेवा करने वाले विजय एक कोने में यों खड़े थे मानो संसार के सब से बड़े बेईमान वही हों. मां को लगता था कि उन का बड़ा बेटा, जो लंदन में रहता है, कहीं खाली हाथ ही न रह जाए और विजय पुश्तैनी घर का मालिक बन जाए. पुश्तैनी घर भी वह जिसे विजय ने कर्ज ले कर फिर से खड़ा किया था.

वह घर जो बहनों का मायका है और भाईसाहब का भी एक तरह का मायका ही है. लंदन तो ससुराल है जहां वे सदा के लिए बस चुके हैं और जीवन भर उन्हें वहीं रहना भी है.

‘तुम्हें क्या लगता है, तुम पतिपत्नी सब अकेले ही खा जाओगे, भाई को कुछ नहीं दोेगे?’ दोनों बहनों और मां ने प्रश्न किया था.

‘खा जाएंगे, क्या मतलब? मैं ने क्या खा लिया? कर्ज ले कर खंडहर मकान खड़ा किया है. पुश्तैनी जमीन को संवारा है, जहां तुम सब आआ कर रहते हो. तनख्वाह का मोटा हिस्सा लोन चुकाने में चला जाता है. हम दोनों पतिपत्नी हाड़तोड़ मेहनत करते हैं तब कहीं जा कर घर चलता है. इस में मैं ने क्या खा लिया किसी का?’

‘जमीन की कीमत का पता किया है हम ने. 60 लाख रुपए कीमत है जमीन की. 30 लाख रुपए तो उस का बनता है न. आगरा में फ्लैट ले कर दे रहे हैं हम बड़े को. तुम 30 लाख रुपए दो.’

‘मैं 30 लाख कहां से दूं. अपने ही घर में रहतेरहते मैं बाहर वाला कैसे हो गया कि आप ने झट से मेरे घर की कीमत भी तय कर दी.’

‘तुझे क्या लगता है, चार दिन भाईबहनों को रोटी के टुकड़े खिला देगा और लाखों की जमीन खा जाएगा.’

मां के शब्दबाण विजय का कलेजा छलनी कर गए थे और यही दोनों बहनें भाईसाहब के साथ खड़ी उन से जवाब तलब कर रही थीं.

भाईसाहब, जिन्हें वे सदा पिता की जगह देखते रहे थे, से इतनी सी आस तो थी उन्हें कि वे ही मां को समझाएं. क्या मात्र रोटी के टुकड़े डाले हैं उन्होंने सब के सामने? पिता की तरह बहनों का स्वागत किया है. प्यार दिया है, दुलार दिया है मीना और विजय ने सब को. गरमी की छुट्टियों में स्वयं कभी कहीं घूमनेफिरने नहीं गए. सदा भाईबहनों को खिलायापिलाया, घुमाया है. बड़े भाईसाहब ने तो कभी मांबाप को नहीं देखा क्योंकि वे तो सदा बाहर ही रहे. पिताजी अस्पताल में बीमार थे तब उन के मरने पर ही 2 लाख रुपए लग गए थे. पिछले साल मां अस्पताल में थीं, 3 लाख रुपए लग गए थे, हर साल उन पर 1 लाख रुपए का बोझ अतिरिक्त पड़ जाता है जो कभी उन का अपना पारिवारिक खर्च नहीं होता. इन तीनों भाईबहनों ने कभी कोई योगदान नहीं किया. कैसे होता है, किसी ने नहीं पूछा कभी, 30 लाख रुपए हिस्सा बनता है सब से आगे हो कर मां ने कह दिया था. तो क्या वह घर का नौकर था जो सदा परिवार सहित सब की ताबेदारी ही करता रहा? बेशर्मी की सभी हदें पार कर ली थीं दोनों बहनों व भाईसाहब ने और मां का हाथ उन तीनों के ऊपर था.

उसी रात पसीने से तरबतर विजय को अस्पताल ले जाना पड़ा था. सोम और निशा ही आए थे मदद को. तनाव अति तक जा पहुंचा था, जिस वजह से हलका सा दिल का दौरा पड़ा था. क्या कुसूर था विजय का? क्यों छोटे भाई को ऐसी यातना दे रहे हैं परिवार के लोग?

भाईसाहब की लंदन जाने की तारीख पास आ रही थी और आगरा में दोनों बहनों ने भाई के लिए जो फ्लैट खरीदने का सोच रखा था वह हाथ से निकला जा रहा था. विजय बीमार हो गए थे. अब पैसों की बात किस तरह शुरू की जाए.

मां ने ही मीना से पूछा था.

‘क्या सोच रहे हो तुम दोनों? पैसे देने की नीयत है कि नहीं?’

‘होश की बात कीजिए, मांजी. जो आदमी दिल का मरीज बन कर अस्पताल में पड़ा है उस से आप ऐसी बातें कर रही हैं.’

‘बहुत देखे हैं मैं ने इस जैसे दिल के मरीज.’

अवाक् रह गई थी मीना. जिस बेटे के सिर पर बैठ कर पूरा परिवार नाच रहा था उसी के जीनेमरने से किसी का कोई लेनादेना नहीं. किस जन्म की दुश्मनी निभा रहे हैं भाईसाहब. हिंदुस्तान में फ्लैट लेना ही चाहते थे तो विजय से बात करते. दोनों भाई कोई रास्ता निकालते, बैठ कर हिसाबकिताब करते. यह क्या तरीका है कि हथेली पर सरसों जमा दी. सोचने और कुछ करने का समय ही नहीं दिया. क्या 3 दिन में सब हो जाएगा?

मीना बड़ी ननदों के सामने कभी बोली नहीं थी. उस के सिर पर एक तरह से 3-3 सासें थीं और बड़े जेठ ससुर समान. जब अपने ही पति के सर पर काल मंडराने लगा तब जबान खुल गई थी मीना की.

‘मां, अगर हिसाब ही करना है तो हर चीज का हिसाब कीजिए न. प्यार और ममता का भी हिसाब कीजिए. जोजो हम आप लोगों पर खर्च करते हैं उस का भी हिसाब कीजिए. हर साल आप की इच्छा पूरी करने के लिए पूरा परिवार इकट्ठा होता है, उस पर हमारा कितना खर्च हो जाता है उस का हिसाब कीजिए. पिताजी और आप की बीमारी पर ही लाखों लगते रहे हैं, उस का भी हिसाब कीजिए. जमीन की कीमत तो आप ने आज 30 लाख रुपए आंकी है, विजय जो वर्षों से खर्च कर रहे हैं उस का क्या हिसाबकिताब?

‘दोनों बहनें बड़े भाई को अपने शहर में फ्लैट ले कर दे रही हैं. इस भाई को काट कर फेंक रही हैं. क्या भाईसाहब लंदन से आ कर बहनों की आवभगत किया करेंगे? और मां, आप अब क्या लंदन में जा कर रहेंगी भाईसाहब की मेम पत्नी के साथ, जिस ने कभी आ कर आप की सूरत तक नहीं देखी कि उस की भी कोई सासू मां हैं, ननदें हैं, कोई ससुराल है जहां उस की भी जिम्मेदारियां हैं.’

‘कितनी जबान चल रही है तेरी, बहू.’

‘जबान तो सब के पास होती है, मां. गूंगा तो कोई नहीं होता. इंसान चुप रहता है तो इसलिए कि उसे अपनी और सामने वाले की गरिमा का खयाल है. अगर आप मेरा घर ही उजाड़ने पर आ गईं तो कैसी शर्म और कैसा जबान को रोकना. विजय को दिल का दौरा पड़ा है, आप उन्हें परेशान मत कीजिए. अब जब हिसाब ही करना है तो हमें भी हिसाब करने का समय दीजिए.’

मीना ने दोटूक बात समाप्त कर दी थी. गुस्से में मां और भाईसाहब दोनों बहनों के पास आगरा चले गए थे. लेकिन पराया घर कब तक मां को संभालता. भाईसाहब वहीं से वापस लंदन चले गए थे और बीमार मां को बहनें 4-5 दिन में ही वापस छोड़ गई थीं.

4 महीने बीत गए उस प्रकरण को. वह दिन और आज का दिन. मीना और विजय मां से लगभग कट ही गए. अच्छाभला हंसताखेलता उन का घर ममत्व से शून्य हो गया था. बच्चे भी दादी से कटने लगे थे. समय पर रोटी, दवा और कपड़े देने के अलावा अब उन से कोई बात ही नहीं होती थी उन की. बुढ़ापा खराब हो गया था मां का. कोई उन से बात ही नहीं करना चाहता था.

क्या जरूरत थी मां को बेटियों की बातों में आने की. अब क्या बुढ़ापा लंदन में जा कर काटेंगी या आगरा जाएंगी?

समय बीता और 5 दिन पहले ही फिर से मां को अस्पताल ले जाना पड़ा. हालत ज्यादा बिगड़ गई जिस का परिणाम उन की मृत्यु के रूप में हुआ.

विजय मां की मौत से ज्यादा इस सत्य से पीडि़त थे कि उन के भाईबहनों ने मिल कर उन की मां का बुढ़ापा बरबाद कर दिया. उन के  जीवन के अंतिम 4-5 महीने नितांत अकेले गुजरे. आज मृत देह के पास बैठ कर आत्मग्लानि का अति कठोर एहसास हो रहा है उन्हें. क्यों मीना ने मां से सवालजवाब किए थे? क्यों वह चुप नहीं रही थी? फिर सोचते हैं मीना भी क्या करती, पति की सुरक्षा में वह भी न बोलती तो और कौन बोलता. उस पल की जरूरत वही थी जो उस ने किया था. कहां से लाते वे 30 लाख रुपए. कहीं डाका मारने जाते या चोरी करते. रुपए क्या पेड़ पर उगते हैं जो वे तोड़ लाते.

अच्छाभला, खुशीखुशी उन का घर चल रहा था जिस में विजय मानसिक शांति के साथ जीते थे. हर साल कंधों पर अतिरिक्त बोझ पड़ जाता था जिसे वे इस एहसास के साथ सह जाते थे कि यह घर उन की बहनों का मायका है जहां आ कर वे कुछ दिन चैन से बिता जाती हैं.

बुजुर्गों की दुआएं और पिताजी के पैरों की आहट महसूस होती थी उन्हें. उन्होंने कभी भाईसाहब से यह हिसाब नहीं किया था कि वे भी कुछ खर्च करें, वे भी तो घर के बेटे ही हैं न. अधिकार और जिम्मेदारी तो सदा साथसाथ ही चलनी चाहिए न. कभी जिम्मेदारी नहीं उठाई तो अधिकार की मांग भी क्यों?

कभी विजय सोचते कि क्यों मां दोनों बेटियों की बातों में आ कर उन के प्रति ऐसा कहती रहीं कि वे दिल के मरीज बन कर अस्पताल पहुंच गए. मां की देह पर दोनों भाई गले लग कर रो ही नहीं पाए क्योंकि कानों में तो वही शब्द गूंज रहे हैं :

‘क्या तुम दोनों पतिपत्नी अकेले ही सब खा जाओगे?’

बेटाबहू बन कर सब की सेवा, आवभगत करने वाले क्षणभर में मात्र पतिपत्नी बन कर रह गए थे. एकदूसरे से पीड़ा सांझी न करतेकरते ही मां का दाहसंस्कार हो गया. 13 दिन पूरे हुए और नातेरिश्तेदारों के लिए प्रीतिभोज हुआ.

सब विदा हो गए. रह गए सिर्फ भाईसाहब और दोनों बहनें.

‘‘आइए भाईसाहब, हिसाब करें,’’ विजय ने मेज पर कागज बिछा कर उन्हें आवाज दी. बहनें और भाईसाहब अपनाअपना सामान पैक कर रहे थे.

‘‘कैसा हिसाब?’’ भाईसाहब के हाथ रुक गए थे. वे बाहर चले आए. विजय के स्वर में अपनत्व की जगह कड़वाहट थी जिसे उन्होंने पूरी उम्र कभी महसूस नहीं किया था. बचपन से ले कर आज तक विजय ने सदा बच्चों की तरह रोरो कर ही भाई को विदा किया था. सब हंसते थे विजय की ममता पर जो भाई को पराए देश विदा नहीं करना चाहता था. मां की देह पर दोनों मिल कर रो नहीं पाए, क्या इस से बड़ा भी कोई हिसाब होता जो वे कर पाते?

‘‘30 लाख रुपए का हिसाब. पिछली बार मैं हिसाब नहीं दे पाया था न, अब पता नहीं आप से कब मिलना हो.’’

मीना भी पास चली आई थी यह सोच कर कि शायद पति फिर कोई मुसीबत का सामना करने वाले हैं. बच्चों को उन के कमरे में भेज दिया था ताकि बड़ों की बहस पर उन्हें यह शिक्षा न मिले कि बड़े हो कर उन्हें भी ऐसा ही करना है.

पास चले आए भाईसाहब. भीगी थीं उन की आंखें. चेहरा पीड़ा और ममत्व सबकुछ लिए था.

‘‘हां, हिसाब तो करना ही है मुझे. मैं बड़ा हूं न. मैं ही हिसाब नहीं करूंगा तो कौन करेगा?’’

जेब से एक लिफाफा निकाला भाईसाहब ने. मीना के हाथ पर रखा. असमंजस में थे दोनों.

‘‘इस में 50 लाख रुपए का चैक है. तुम्हारी अंगरेज जेठानी ने भेजा है. उसी ने मुझे मेरी गलती का एहसास कराया है. यह हमारा घर हम दोनों की हिस्सेदारी है तो जिम्मेदारी भी तो आधीआधी बनती है न. तुम अकेले तो नहीं हो न जो घर की दहलीज संवारने के लिए जिम्मेदार हो. हमारा घर संवारने में मेरा भी योगदान होना चाहिए.’’

अवाक् रह गए विजय. मीना भी स्तब्ध.

‘‘13 दिन पहले जब एअरपोर्ट पर पैर रखा था तब एक प्रश्न था मन में. एक घर है यहां जो सदा बांहें पसार कर मेरा स्वागत करता है. ऐसा घर जो मेरे बुजुर्गों का घर है, मेरे भाई का घर है. ऐसा घर जहां मुझे वह सब मिलता है जिसे मैं करोड़ों खर्च कर के भी संसार के किसी कोने में नहीं पा सकता. यहां वह है जो अमूल्य है और जिसे मैं ने सदा अपना अधिकार समझ कर पाया भी है. मुझे माफ कर दो तुम दोनों. मुझे अपने दिमाग से काम लेना चाहिए था. अगर आगरा में घर लेना ही होगा तो किसी और समय ले लूंगा मगर इस घर और इस रिश्ते को गंवा कर नहीं ले सकता. तुम दोनों मेरे बच्चों जैसे हो. तुम्हारे साथ न्याय नहीं किया मैं ने,’’ मानो जमी हुई काई किसी ने एक ही झटके से पोंछ दी. स्नेह और रिश्ते का शीशा, जिस पर धूल जम गई थी, साफ कर दिया किसी ने.

‘‘मां को भी माफ कर देना. उन्हें भी एहसास हो गया था अपनी गलती का. वे अपनी भूल मानती थीं मगर कभी कह नहीं पाईं तुम से. हम सब तुम से माफी मांगते हैं. मीना, तुम छोटी हो मगर अब मां की जगह तुम्हीं हो,’’ बांहें फैला कर पुकारा भाईसाहब ने, ‘‘हमें माफ कर दो, बेटा.’’

पलभर में सारा आक्रोश कहीं बह गया. विजय समझ ही नहीं पाए कि यह क्या हो गया. वह गुस्सा, वह नाराजगी, वह मां को खो देने की पीड़ा. मां के खोने का दुख भाई की छाती से लग कर मनाते तो कितना सुख मिलता.

बहरहाल, जो चीत्कार एक मां की आखिरी सांस पर होनी चाहिए थी वह 13 दिन बाद हुई जब चारों भाईबहन एकदूसरे से लिपट कर रोए. उन्होंने क्या खो दिया तब पता चला जब एक का रोना दूसरे के कंधे पर हुआ. अब पता चला क्या चला गया और क्या पा लिया. जो खो गया उस का जाने का समय था और जो बचा लिया उसे बचा लेने में ही समझदारी थी.

शाश्वत सत्य है मौत, जिसे रोक पाना उन के बस में नहीं था और जो बस में है उसे बचा लेना ही लक्ष्य होना चाहिए था. एक हंसताखेलता घर बचा कर, उस में रिश्तों की ऊष्मा को समा लेने का सफल लक्ष्य.

Monsoon Special: फैमिली के लिए बनाएं वैजिटेरियन सीख कबाब

नौनवेज के सीख कबाब तो आपने कई बार खाए होंगे. लेकिन क्या आपने वैजिटेरियन सीख कबाब ट्राय किया है. आज हम आपको वैजिटेरियन सीख कबाब की रेसिपी बताएंगे, जिसे आप घर पर बनाकर अपनी फैमिली को खिला सकते हैं.

सामग्री

1 मध्यम आकार का आलू पका और मैश किया हुआ

1 गाजर कटी हुई

1/2 कप मटर कुचले हुए

1/2 कप गोभी कटी हुई

1 छोटा चम्मच अदरक का पेस्ट

1 बड़ा चम्मच लहसुन का पेस्ट

2 हरीमिर्चें लंबी कटी हुई

1 छोटा चम्मच अमचूर पाउडर

2 छोटे चम्मच चाटमसाला

3 बड़े चम्मच बेसन भुना हुआ

1 कप पनीर कटा हुआ

पकाने के लिए तेल, नमक और कालीमिर्च स्वादानुसार.

विधि

एक मध्यम आकार की कड़ाही में लहसुन और अदरक पेस्ट को तेल में कुछ मिनट पकाएं. अब इस में मैश किया आलू, गाजर, मटर और गोभी डाल कर मुलायम होने तक पकाएं. अब अमचूर, चाटमसाला, मिर्च और भुना बेसन डाल कर 2 से 3 मिनट पकाएं. फिर पनीर डाल कर पकाएं. फिर आवश्यकतानुसार नमक, कालीमिर्च डाल कर मिलाएं. आंच से उतार कर ठंडा होने पर इसे 8 बराबर भागों में काट लें और प्रत्येक भाग को सीखचे में बेलनाकार आकार में दबा दें. अब मौडरेट हौट ग्रिलर पर सीखचे को घुमाघुमा कर इन्हें चारों तरफ सुनहराभूरा होने तक सेंकें.

पुरानी साड़ियों को ऐसे करें दोबारा इस्तेमाल

आपके वार्डरोब में कई ऐसी पुरानी साड़ियां होंगी, जिन्हें वर्षों से आपने पहना नहीं होगा. मगर उनके साथ जुड़ा इमोशन उन्हें बेकार कहने की इजाजत नहीं देता. आप चाहें तो थोड़ी-सी क्रिएटिविटी से इन्हें फिर से इस्तेमाल में ला सकती हैं. जानिए कैसे.

शादी की पुरानी साड़ियां दिल को उतनी ही अजीज होती हैं, जितनी कि उस वक्त के वो यादगार पल. जिस प्रकार ये पल कभी दिल से निकाले नहीं जा सकते, उसी प्रकार इन साड़ियों को खुद से जुदा करना मुश्किल है. मगर फैशन ट्रेंड्स में चेंज आने से पुरानी साड़ियों को पहनना मुश्किल हो जाता है. कई उपाय हैं, जो इन्हें री-यूज में ला देते हैं.

पुरानी साड़ी को दें मौडर्न टच

वेस्टर्न आउटफिट की आप दीवानी है, तो एथनिक साड़ियों को आप खुद से या फिर टेलर की मदद से मौडर्न टच दिलवा सकती हैं. हेवी वर्क से सजी इन साड़ियों से आप मिडील, लांग स्कर्ट्स, प्लाजो जैसी कई चीजें बनवा सकती हैं और इन पुरानी साड़ियों को ट्रेंडी व फैशनेबल बना सकती हैं.

लेकिन अगर आप वेस्टर्न नहीं पहनतीं, तो इन साड़ियों का सलवार-सूट, चूड़ीदार-सूट, अनारकली या फिर पटियाला भी बनवा सकती हैं. बनारसी साड़ियों के बौर्डर को नेक, बाजू व दुपट्टे पर लगाकर उसे हैवी और खूबसूरत दिखा सकती हैं. इसके साथ ही आप इन रेशमी साड़ियों से अपनी बिटिया की फ्रौक भी बनवा सकती हैं. इसके अलावा आप जरदोजी, हेवी बौर्डर, गोटा व पैच वर्कवाली साड़ियों को अन्य ड्रेसेज जैसे सूट, पलाजो, स्कर्ट व लहंगे या फिर घर के इंटीरियर में भी यूज कर सकती हैं.

कतरनों का भी इस्तेमाल

ये सब कुछ करने के बाद सभी साड़ियों से कतरन बचना संभव है. इन कतरनों को फेंकने की बजाय आप इनका भी सदुपयोग कर सकती हैं. सभी कतरनों को आपस में जोड़ लें और फिर इस खूबसूरत डिजाइन को कौटन के प्लेन कपड़े पर सिलाई लगा दें. इस कपड़े को ऊपर से लगाकर आप सोफे व बच्चों की गद्दियां बना सकती हैं. इन गद्दियों में आप रूई या फिर फोम का इस्तेमाल कर सकती हैं. साड़ियों से बनी ये गद्दियां आपके कमरे को एथनिक अंदाज में सुंदर दिखायेंगी.

पैच का कमाल

बनारसी व कांजीवरम साड़ियां अपने वर्क के लिए जानी जाती हैं. इन साड़ियों के खूबसूरत वर्क को आप निकाल कर कौटन के कपड़े पर स्टिच कर दें और इसे पैच की तरह अपनी किसी भी ड्रेस में लगवा सकती हैं. वैसे केवल ड्रेस ही नहीं, कपड़ों के इन टुकड़ों को दीवार पर भी फ्रेम करवाकर या फिर कुशन कवर पर लगाकर भी सजाया जा सकता है.

साड़ी के पर्दे

गोल्डन, सिल्वर बीड्स व बेशकीमती कढ़ाई से सुसज्जित साड़ियां घर के इंटीरियर को नया रूप दे सकती हैं. आप इनसे ड्राइंग रूम के परदे बना सकती हैं, लेकिन परदे बनाते वक्त आपको ढ़ेर सारी साड़ी की जरूरत पड़ेगी. इसलिए बेहतर होगा कि आप परदों के लिए मिक्स एंड मैच का तरीका अपनाएं. ये कलरफुल व रेशमी परदे कमरे की रौनक को दोगुना कर देंगे. इसके अलावा इन साड़ियों से आप बेड या फिर रजाई कवर भी बना सकती हैं.

ब्यूटीफुल बुकमार्क

आप अपनी साड़ियों को बुकमार्क के रूप में भी सहेज सकती हैं. साड़ी के बौर्डर को आयातकार शेप में काट लें और ग्लू की मदद से कार्ड बोर्ड पर चिपका दें. अब इसमें होल करके साटिन का छोटा-सा रिबन बांध दें.

क्या आपको पता हैं महिलाओं के ये 12 सीक्रेट

बहुत सी ऐसी बातें है जिसकी चाहत हर महिला को होती है लेकिन वो स्‍वयं इन्हें अपनी जुबां से कभी नहीं कहती. जैसे उनका प्रेमी उनके नखरे उठाएं, उनके आगे-पीछे घूमें, उन्हें महत्‍वपूर्ण समझें, उनकी हर बात मानें.

1. महिलाओं के सीक्रेट

महिलाओं का स्‍वभाव बहुत शार्मिला होता है. इसलिए उनके दिल की बात को जुबां तक आने में काफी समय लगता हैं. लेकिन बहुत सी बातें ऐसी है जो हर महिला चाहती हैं. जैसे अपने प्रेमी से प्‍यार और देखभाल की उम्‍मीद, साथ ही यह भी की उनका प्रेमी उनके नखरे उठाएं, उनके आगे-पीछे घूमें, उन्हें महत्‍वपूर्ण समझें, उनकी हर बात मानें. आइये इसके अलावा महिलाओं की सीक्रेट के बारे में जानें.

2. अपनी तारीफ सुनना

महिलाओं को हमेशा उनकी तारीफ करने वाले पुरुष बहुत अच्‍छे लगते हैं. ऐसे में उन्‍हें बहुत अच्‍छा लगता है जब प्रेमी उनमें किसी भी तरह का बदलाव दिखने पर तुरंत उनकी प्रशंसा करें. जैसे अगर महिला फिट दिखें, कोई नया हेयरकट करवाया हो या आकर्षक लगें, तो उनकी तारीफ जरुर करें.

3. ध्यान रखने वाला पुरुष

महिलाओं को केयर करने वाले पुरुष बहुत पसंद होते है. महिलाएं संवेदनशील होती है इसलिए उन्‍हें ऐसे ही पुरुष बहुत अच्‍छे लगते है. जो परेशानी के समय उनकी अच्‍छे से देखभाल कर सकें.

4. कपड़ों से प्रभावित होना

ज्‍यादातर महिलाएं पुरूषों को उनके पहनावे से भी पसंद करती है. इसलिए पुरुषों को चाहिए कि वह महिलाओं को अपने कपड़ों से प्रभावित करने की कोशिश करें. पुरुषों को हमेशा अपने सौंदर्य और कपडों पर ध्यान देना चाहिए. अगर, महिलाएं आपको टाइट जींस में देखना पसंद करती है, तो उनके लिए ज्यादातर टाइट जींस पहनें.

5. पुराने संबंधों के बारे में जानना

अगर महिलाएं आप से आपके पुराने संबंधों के बारे में बात करना चाहे, तो इसका अर्थ यह नहीं कि आपने कुछ गलत किया है. अपने संबंधों के बारे में बात करने से ना डरें. यह तो आप दोनों के लिए अच्छी बात है, क्‍योंकि सच्चाई और लंबी बातचीत आप लोगों को एक दूसरे के करीब ला सकती है.

6. सुझावों को थोपें नहीं

अकसर पुरुष महिलाओं की समस्‍या सुने बिना अपने सुझावों को उनपर थोपने लगते हैं. पुरुष, अपने राय को उन पर थोप कर उनकी दुनिया को सीमित कर देते हैं. इसलिए अगर वह किसी बात से परेशान है, तो उन्हें सलाह देने से पहले उनकी बात को अच्‍छे से सुनें.

7. रिश्‍ते में रोमांस

महिलाएं अपने रिश्‍ते की कद्र करने के साथ रिश्‍ते में रोमांस को निरंतर बनाये रखना चाहती हैं. इसलिए यह जरूरी है कि आपका रिश्‍ता चाहे वह 5 म‍हीने से हो या 5 सालों से उसमें रोमांस को हमेशा बनाये रखें.

8. कमियों को जानना

महिलाओं को प्रशंसा करने वाले पुरुषों के साथ-साथ कमियां बताने वाले पुरुष भी पसंद होते हैं. जैसे, अगर महिला लंबे समय तक काम करने के बाद काफी थक गई हैं और चिडचिडापन महसूस कर रहीं हैं तो उस समय उनकी कमी को बताने वाले पुरुष पसंद आते हैं.

9. बातों को ध्‍यान से सुनना

महिलाएं अकसर यह जानने की कोशिश करती हैं कि उनकी बातों को आप कितनी ध्‍यान से सुनते हो और कैसे प्रतिक्रिया देते हैं. इसलिये महिलाओं से बात करते समय केवल सर हिलाना काफी नहीं है उनकी बात को महत्वपूर्ण ढंग से सुने.

10. सेक्स में उनकी चाहत

महिला अकसर सेक्‍स के बारे में बात करना और अपने साथी को खुश करना चाहती हैं. इसलिए आप भी सेक्‍स के दौरान वह करें जो महिला साथी चाहती है. इसके लिए विनम्र दृष्टिकोण अक्सर सबसे अच्छा होता है. पहले, यह पूछे कि वह क्या चाहती है. फिर अपनी इच्छा को सकारात्मक और सही तरीके से उनके सामने व्यक्त करें.

11. शिष्टता का व्‍यवहार

जब रोमांस की बात आती है तो बहुत सारी महिलाएं पुरुषों की पारंपरिक मर्दाना भूमिका ही पसंद करती है. जैसे लड़की बैठने के लिये खुद ही कुर्सी खीच सकती हो, लेकिन वह आपका इंतजार करती है कि आप उसको कुर्सी खींच कर दें. तो समय आ गया है कि आप उसकी नजरों में सज्जन पुरुष बन जाएं.

12. आपकी शर्ट उनके लिए प्यार का चुंबक

क्‍या आपकी महिला साथी आपके स्‍वेटर में सिकुड़ने या शर्ट में घुसने का प्रयास करती हैं. कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार, महिलाओं को पुरुष के पसीने की गंध से आरामदायक प्रभाव पड़ता है. क्‍या आप महिलाओं के इस सीक्रेट के बारे में जानते हैं.

बोया पेड़ बबूल का: क्या संगीता को हुआ गलती का एहसास

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पुनर्मिलन- भाग 1: क्या हो पाई प्रणति और अमजद की शादी

ृ‘‘बंदापरवर थाम लो जिगर बन के प्यार फिर आया हूं. खिदमत में आप की हुजूर फिर वही दिल लाया हूं.’’

रेडियो पर आ रहे कर्णप्रिय गाने के बोलों को सुन कर प्रणति को लग रहा था कि मानो गाने  बोल उस के लिए ही लिखे गए हैं. एक संगीत ही तो है जिस के बोलों को गुनगुनाते हुए वह अपनी सारी थकान भूल जाती है. इसीलिए रात को सोने से पहले वह साइड स्टूल पर रखा अपना रेडियो औन करती है, फिर दूसरे काम. यों तो रोज ही पुराने गाने आते हैं पर आज के इस गाने ने तो उस का दिल ही मोह लिया था. अमजद से अचानक हुई मुलाकात ने मानो उस की वीरान सी जिंदगी में उथलपुथल मचा दी थी. गाना गुनगुनाते हुए उस ने हलदी वाला दूध गिलास में डाला और बैड पर बैठ कर मोबाइल देखने लगी.

मोबाइल स्क्रीन को स्क्रोल करतेकरते उसे याद आने लगा लाइब्रेरी में अमजद का अपनी ओर अपलक ताकना, कालेज के पार्क में तोतामैना की तरह एकदूसरे की आंखों में आंखें डाल कर बैठे रहना, सहपाठियों के द्वारा उन्हें लैलामजनू कह कर मजे लेना, अपनी क्लास समाप्त होने के बाद भी उस की क्लास खत्म होने के इंतजार में अमजद का उस की क्लास के बाहर टकटकी लगाए रहना, कालेज समाप्त होने के बाद भी मिलने के बहाने खोजना, सैटल होने पर भविष्य के सुनहरे सपने बुनना, उस दिन अपने प्यार को इजहार करने और अमजद के प्रपोज करने के अद्भुत तरीके के बारे में सोच कर उस के गुलाबी होंठों पर मुसकराहट आ गई… पर उस के बाद… यह सोचते ही मानो उस के मन में ही नहीं मस्तिष्क में भी छन्न से कुछ टूट गया… वह नहीं सोचना चाहती अभी कुछ और… अपने मन में यह वाक्य दोहराते हुए उस ने खुद को यादों के साए से बाहर निकाला और बस अपनी अमजद से अगली मुलाकात के बारे में सोचने लगी. अमजद के विचारों में खोएखोए उसे कब नींद ने अपने आगोश में ले लिया पता ही नहीं चला.

पंचायत विभाग की डिप्टी डाइरैक्टर

40 वर्षीय औफिसर प्रणति को जब भी अपना अतीत याद आता उस का मन कटुता से भर उठता अतीत को भूलने के लिए ही उस ने इस समाज से स्वयं को अलग कर के काम में मशीन की भांति खुद को इस कदर डुबो दिया था कि हंसना, मुसकराना, खिलखिलाना और खुश होने जैसी भावनाओं ने तो मानो उस के जीवन से मुंह ही फेर लिया था.

गोरा रंग, 5 फुट 6 इंच लंबी, 40 की उम्र में भी कमनीय काया, कमर तक लंबे घने बाल, सुंदर कजरारे नैननक्श तथा सदैव सौम्य और शालीन पहनावे को धारण करने वाली आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी प्रणति किसी सुंदरी से कम नहीं लगती थी, परंतु अपने शांत स्वभाव और एकाकी जीवन के कारण वह सदैव औफिस कर्मियों के बीच चर्चा का विषय बनीं रहतीं क्योंकि आज तक किसी ने उसे मुसकराते या हंसते नहीं देखा था और न हीं किसी को उस के घर आतेजाते.

ऐसा लगता था मानो उस ने समाज से एक निश्चित दूरी बना रखी है. सुबह घर से आ कर शाम 6 बजे तक फाइलों और काम में ही डूबी रहती थी. इसी व्यस्ततम दिनचर्या के मध्य एक दिन औफिस में जब अपनी फाइलों के ढेर में वह आकंठ डूबी हुई थी कि अचानक उस का मोबाइल बज उठा. जैसे ही उठाया तो उधर से आवाज आई, ‘‘हैलो एम आई स्पीकिंग टू प्रणति?’’

‘‘यस आई एम. स्पीकिंग, कहिए क्या बात है? कौन बोल रहा है?’’ उस ने कुछ कड़क स्वर में कहा.

‘‘ओहो तो मैडम हमें भूल ही गईं. यह तो अच्छी बात नहीं है,’’ उधर से

उभरा स्वर उसे कुछ जानापहचाना सा लगा तो अपनी याददाश्त पर जोर डालते हुए बोली, ‘‘आप की आवाज कुछ सुनीसुनी सी तो लग रही है पर… पर नाम… नाम. याद नहीं आ रहा.’’

‘‘पहचानिए… पहचानिए मैं तो आप को अपना नाम बताने से रहा… आप ऐसे किसी अपने को कैसे भूल सकती हैं,’’ सामने वाले ने जैसे ही प्यार से शरारत की तो वह खिलखिला कर हंस पड़ी और बोली, ‘‘ओहो… अमजद… अमजद खान… रियली इतने सालों बाद भी तुम बिलकुल नहीं बदले. आज भी वैसे ही हो मजाकिया.’’

‘‘सालों से क्या फर्क पड़ता है मैडम, इंसान तो वही रहता है न, अब मिलनाविलना है कि बस फोन पर ही बात करोगी. बताओ कब मिल रही हो?’’ उधर से अमजद ने उत्साह से भर कर कहा.

प्रणति चौंकती हुई सी बोली, ‘‘अरे… मिलना मतलब… तो तुम क्या यहां इंदौर में

ही हो?’’

‘‘हां भई आप के शहर इंदौर में ही हूं बड़ी मुश्किल से तो तुम्हारा नंबर ढूंढ़ पाया हूं. कल शाम 7 बजे होटल साया में मिलें?’’

‘‘हां… हां… क्यों नहीं… बिलकुल मंजूर हैं.’’

‘‘ठीक है तो कल ठीक 7 बजे होटल साया. बाकी बातें मिलने पर,’’ कह कर अमजद ने फोन रख दिया.

प्रणति के कानों में निरंतर अमजद की आवाज गूंज रही थी… 5 मिनट बाद उसे होश आया कि फोन कट चुका है. कोरोना के कारण मिलनेजुलने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाए रखने वाली प्रणति उस एक फोन से इतनी अधिक रोमांचित हो उठी कि कोरोना तो उस के दिमाग

में ही नहीं आया. जब होश आया तब तक तो वह प्रौमिस कर ही चुकी थी पर कहते हैं न 2 प्रेमियों के बीच में तीसरे की आवश्यकता नहीं होती सो इस तीसरे कोरोना को भी एक झटके से उस ने

परे कर दिया और आने वाले कल के बारे में सोचने लगी.

औफिस से घर आते समय भी उसकी नजरों के सामने केवल अमजद की छवि और कानों में उस की हंसी की खिलखिलाहट ही गूंजती रही. पूरी रात यह सोचतेसोचते ही निकल गई कि कल क्या पहनूंगी, कैसे मिलूंगी उस से, कितना बदल गया होगा… अब उस से मिलने से भी क्या… मतलब… इतने सालों बाद क्याक्या बात करूंगी. वह रात उसे अन्य रातों की अपेक्षा बहुत लंबी लगी.

अगले दिन सुबह गुलाबी रंग का अनारकली सूट, उस से मैच करते बूंदे और शैंपू किए बालों को खोल कर जब वह औफिस पहुंची तो अपनी बौस को पहली बार इस नए रूप में देख कर सहकर्मियों की नजरें मानो आपस में ही खुसरपुसर करने लगीं. वह तो अच्छा था उस की पक्की सहेली रंजीता 2 दिनों के अवकाश पर थी वरना तो वह छेड़छेड़ कर उस की मुसीबत कर देती…

आज तक सादे कपड़ों में बिना मेकअप के और चेहरे पर सदा उदासी ओढ़े रहने वाली प्रणति को यों सजेधजे खुशमिजाज देख कर सब को अचरज होना ही था.

विनोद बाबू ने तो व्यंग्य कर ही दिया, ‘‘क्या बात है आज तो मैडम बड़ी खिलीखिली नजर आ रही हैं.’’

मैं उन की बातों को अनसुना करती वह अपने कैबिन में चली गई. टेबल पर पड़ी अनेक फाइलें उस के दर्शनार्थ पड़ी थीं पर आज उस का काम में मन ही नहीं लग पा रहा था वह तो बस किसी तरह शाम होने का इंतजार कर रही थी. जैसे ही घड़ी में 5 बजे वह फटाफट अपनी कार ले कर साया रवाना हो गईं क्योंकि औफिस टाइम में सड़कों पर बहुत रश हो जाता है, जिस से 1 घंटे की दूरी तय करने में 2 घंटे लगना सामान्य सी बात है. अमजद गेट के बाहर ही उस का इंतजार कर रहा था.

‘‘अरे अमजद तुम तो इन सालों में जरा भी नहीं बदले… वही हैल्थ और वही बोलने की अदा… वही मुसकराता चेहरा जिस पर मैं हमेशा…’’ कहतेकहते न जाने वह क्यों रुक गई.

‘‘बदली तो तुम भी नहीं हो वही नकचढ़ी और तुनकमिजाजी बरकरार है मैडम की, पर हां कुछ दुबली अवश्य हो गई हो. क्या हुआ कोई परेशानी है?’’ अमजद ने प्रणति की ओर प्रश्नवाचक नजरों से देखते हुए कहा.

‘‘मैं यहां तुम से मिलने आई हूं, अपनी परेशानियों का रोना रोने नहीं, चलो अंदर भी ले चलोगे या यहीं से वापस कर देने का इरादा है,’’ प्रणति कुछ उलाहना देती हुई बोली.

‘‘चलो अंदर चलकर ही बातें करते हैं,’’ और फिर अंदर जा कर एक टेबल पर दोनों आमनेसामने बैठ गए. 2 हौट काफी का और्डर दे कर अमजद उस की ओर ऊपर से नीचे की ओर देखते हुए बोला, ‘‘और घर में सब कैसे हैं?’’

‘‘सब अच्छे हैं. तुम सुनाओ क्या हाल हैं… कितने बच्चे है. पत्नी कैसी है और कहां की है?’’ प्रणति ने कुछ व्यंग्यात्मक स्वर में कहा.

अमिताभ बच्चन से लेकर शिल्पा शेट्टी तक, इतने अन्धविश्वासी हैं ये सेलेब्स

सफलता और स्वास्थ्य लाभ के लिए आम इंसान की तरह सेलेब्स भी अन्धविश्वासी होते है. अधिकतर कलाकार बॉक्सऑफिस पर सफलता पाने के लिए फिल्मों के रिलीज से पहलेकिसी टोटके या पूजा-अर्चना का सहारा लेते है और इस गुड लक के लिए उन्हें जो भी करने पड़े, वे करते रहते है.इसके अलावा फिल्मों में किसी खास रंग या सीन को भी जानबूझकर डाला जाता है. इन सबमें एकता कपूर सबसे आगे है,उसके बाद अमिताभ बच्चन, सलमान खान, शाहरुख़ खान, आमिर खान, दीपिका पादुकोण जैसे कई सितारें है, जो अन्धविश्वासी होने के साथ-साथ इसे फोलो करने मेंबहुत अधिक रिजिड है. हालाँकि इसका दर्शकों पर कोई असर नहीं पड़ता, उनके लिए सही कहानी, निर्देशन और एक्टिंग ही खास होती है,जिसके बलबूते पर फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट साबित होती है.

असल में जब व्यक्ति अपने जीवन में सफलता, स्वास्थ्यऔर रिश्ते की मजबूती को अपने बलबूते पर हल खोजमें असमर्थ होते है, तो तर्क छोड़कर अन्धविश्वास का सहारा लेते है, जिसमे कई बार जान-माल की क्षति भी होने पर व्यक्ति उसमे अपनी ही कुछ गलती निकालकर खुद को संतुष्ट कर लेते है. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के ऐसे कई सितारें है, जो तर्क को साइड में रख अंधविश्वासी है.इसमें कुछ सेलेब्स अपनी किस्मत को चमकानेके लिए गहनों के तौर पर लकी चार्म पहनते है, तो कुछ ऐसे है, जिनके पास कुछ अजीबोगरीब अन्धविश्वास है. आइये जानते है सेलेब्स के अन्धविशवासी होने की वजह क्या है?क्या आज भी वे इसे मानते है?

अमिताभ बच्चन –

अपने अंधविश्वास को लेकर मेगास्टार अमिताभ बच्चन ने खुद एक इंटरव्यू में बताया कि वह क्रिकेट खेल के प्रेमी है लेकिन वह कभी लाइव मैच नहीं देखते है, क्योंकि उनको लगता है कि वह मैच देखेंगे, तो विकेट गिरेंगे और भारत हार जाएगा. वहीं वह एक नीलम की अंगूठी भी पहनते है, जिसको लेकर वह मानते है कि इस अंगूठी को पहनने के बाद ही उनके जीवन से बुरा वक्त खत्म हुआ था और उनकी किस्मत चमकी थी.

सलमान खान 

अभिनेता सलमान खान अपना लकी चार्म सेफायर ब्रेसलेट को मानते है, इसे उनके पिता ने गिफ्ट के रूप में दिया है. एक बार एक पार्टी में सलमान की ब्रेसलेट खो गयी, तब इसे अस्मित पटेल ने खोज कर उसे दिया. सलमान ने ऐसी एक ब्रेसलेट गोविंदा को उनके कैरियर को ठीक करने के लिए गिफ्ट के रूप में दिया है. हालाँकि गोविंदा पहले से ही ब्लू ब्रेसलेट पहनते है, पर उन्हें सलमान का दिया हुआ ब्रेसलेट भी बहुत पसंद है. सूत्रों की माने तो सलमान ने रमजान के दौरान फिल्म ‘किक’ के लिए इस गुड लॉक को पहना था और उस फिल्म में भी इसे पहना हुआ ही दिखाया गया है, हालाँकि फिल्म फ्लॉप रही.

शाहरुख़ खान

बादशाह खान का लकी नंबर उनके कार की है. वे नंबर की शक्ति को मानते है, इसलिए उनके कार का स्पेशल सीरियल नंबर 555 है.उनके गाड़ी में इस नंबर प्लेट का होना अनिवार्य है. वे इस नंबर की कार के बिना कही जाना पसंद नहीं करते. फिल्म ‘’चेन्नई एक्सप्रेस’ की पोस्टर के लिए उन्होंने जिस बाइक की सवारी की थी, उसका नंबर प्लेट पर भी 555 ही था.

कैटरिना कैफ

अभिनेत्री कैटरिना कैफ अपनी सफलता का श्रेय अजमेर शरीफ को देती है. वह बहुत ही अन्धविश्वासी है. हर फिल्म की रिलीज से पहले दरगाह जाती है और वह इसे जरुरी भी मानती है. दरगाह जाते वक्त वह ट्रेडिशनल कपडे पहनती है और चेहरे को जितना हो सके ढककर जाती है. वहां कैटरिना भीड़ से बचने के लिए अपने गार्ड्स द्वारा बनाये गए सर्किल के बीच में घूमती है. फिल्मों में छोटे ड्रेस पहनने को लेकर वह कई बार कंट्रोवर्सी की शिकार हुई, लेकिन उन्हें दरगाह जाने से कोई रोक नहीं सका.

आमिरखान

परफेक्शनिस्ट आमिरखान खुद को अन्धविश्वासी नहीं कहते, लेकिन वे किसी भी फिल्म को क्रिसमस के अवसर पर रिलीज करना पसंद करते है. साल 2007 में फिल्म ‘तारे जमीन पर’ की अपार सफलता के बाद उन्होंने फिल्म गजनी, 3 इडियट्स, धूम 3 आदि को दिसम्बर के महीने में ही रिलीज किया है. इस बारें में पूछने पर उनका कहना है कि वे अपने फैन्स को क्रिसमस पर फिल्म के ज़रिये गिफ्ट देते है.

रणवीरसिंह

अभिनेता रणवीर सिंह एक सफल कलाकार है, उनकी प्रतिभा जग जाहिर है,जिसे उन्होंने मेहनत के बल पर पाया है, लेकिन वे भी अपने पैर पर एक काला धागा बांधते है. इसे वे अपना लकी चार्म मानते है. इसे उनकी माँ ने पहनाया था, क्योंकि उन दिनों रणवीर काफी स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे थे.

 

एकता कपूर

एकता कपूर के ‘क’अक्षर के प्रति दीवानगी किसी से छिपी नहीं है. उन्होंने कैरियर की शुरुआत‘क’ से शुरू होने वाली नामों से सीरियल बनाया, क्योंकि सास भी कभी बहू थी, कहानी घर घर की, कुंडली, कोई अपना सा आदि शोज किये,जो सफल रही. इसके अलावा एकता के हाथों में कई आध्यात्मिक धागे और अंगूठियां पहने देखा जा सकता है, जिसे वह अपने लिए शुभ मानती है. उनके इस अंधविश्वास के बारें में पूछने पर एकता इसे दुष्ट शक्ति बताती है, जिसे देखा नहीं, महसूस किया जाता है और उन सबसे खुद को दूर रखने के लिए ये सब पहनती है.

ऋत्विक रोशन

बॉलीवुड एक्टर ऋतिक रोशन अपने काम को लेकर हमेशा ही बहुत कमिटमेंट रखते हैं और  हमेशा पॉजिटिव माइंडसेट से रहते हैं. ऋतिक अपने एक्स्ट्रा अंगूठे को लकी मानते हैं और वो फिल्मों से लेकर इवेंट्स तक सभी में इसे एक बार अवश्य दिखाते हैं, क्योंकि वे इसे भाग्यशाली मानते है और इसकी सर्जरी करवाना नहीं चाहते.

रणवीर कपूर

रणबीर कपूर की बात करें तो नंबर 8 को वो अपने लिए लकी मानते है. आलिया भट्ट के शादी के कलीरे से लेकर गाड़ी के नंबर प्लेट तक 8 नंबर की बहुत ज्यादा अहमियत दिया गया है, इसे रणवीर इन्फिनिटी साइन के हिसाब से भी देखते हैं.

अक्षय कुमार

खिलाडियों के खिलाडी अक्षय कुमार वैसे तो खुद को अन्धविश्वासी नहीं कहते, लेकिन जब भी अपनी फीस तय करते है, उसका जोड़ 9 होना जरुरी है. साथ ही किसी खाली शीट पर ओम लिखकर दिन की शुरुआत करते है. इसके अलावा अक्षय कुमार को लगता है कि उनके यहाँ रहने पर बॉक्स ऑफिस कलेक्शन ठीक नहीं होगी, इसलिए रिलीज से पहले वह विदेश चले जाते है.

शिल्पा शेट्टी

फिटनेस फ्रिक सफल अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी क्रिकेट की फैन हैं और उनके पास अपनी क्रिकेट टीम भी है.वह जब भी क्रिकेट ग्राउंड पर जाती हैं, तो अपनी कलाई पर दो घड़ियां पहनती हैं. इतना ही नहीं जब दूसरी टीम बैटिंग कर रही होती है, तो वह बैठते समय अपने पैरों को क्रॉस कर लेती हैं और जब उनकी खुद की टीम होती है, तो वो अपने पैरों को खोल लेती है.

बिपाशा बासु

हॉट और टैलेंटेड एक्ट्रेस बिपाशा बसु को बुरी नजर से बचने के लिए ईवल आई का इस्तेमाल करना बहुत पसंद है.वह हर शनिवार के दिन अपनी गाड़ी में नींबू मिर्च लगाने का रिवाज  फॉलो करती हैं.

विद्या बालन

अभिनेत्री विद्या बालन की अन्धविश्वासी एक अलग तरीके की है, एक खास ब्रांड का काजल वह आँखों पर लगाती है, उसे लगाये बिना वह घर से नहीं जाती. इसे वह लकी मानती है.

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