Family Story: साक्षी के बाद- संदीप ने जल्दबाजी में क्यों की दूसरी शादी

Family Story: भोर हुई तो चिरैया का मीठासुरीला स्वर सुन कर पूर्वा की नींद उचट गई. उस की रिस्टवाच पर नजर गई तो उस ने देखा अभी तो 6 भी नहीं बजे हैं. ‘छुट्टी का दिन है. न अरुण को दफ्तर जाना है और न सूर्य को स्कूल. फिर क्या करूंगी इतनी जल्दी उठ कर? क्यों न कुछ देर और सो लिया जाए,’ सोच कर उस ने चादर तान ली और करवट बदल कर फिर से सोने की कोशिश करने लगी. लेकिन फोन की बजती घंटी ने उस के छुट्टी के मूड की मिठास में कुनैन घोल दी. सुस्त मन के साथ वह फोन की ओर बढ़ी. इंदु भाभी का फोन था.

‘‘इंदु भाभी आप? इतनी सुबह?’’ वह बोली.

‘‘अब इतनी सुबह भी नहीं है पुरवैया रानी, तनिक परदा हटा कर खिड़की से झांक कर तो देख, खासा दिन चढ़ गया है. अच्छा बता, कल शाम सैर पर क्यों नहीं आई?’’

‘‘यों ही इंदु भाभी, जी नहीं किया.’’

‘‘अरी, आती तो वे सब देखती, जो इन आंखों ने देखा. जानती है, तेरे वे संदीप भाई हैं न, उन्होंने…’’

और आगे जो कुछ इंदु भाभी ने बताया उसे सुन कर तो जैसे पूर्वा के पैरों तले की जमीन ही निकल गई. रिसीवर हाथ से छूटतेछूटते बचा. अपनेआप को संभाल कर वह बोली, ‘‘नहीं इंदु भाभी, ऐसा हो ही नहीं सकता. मैं संदीप भाई को अच्छी तरह जानती हूं, वे ऐसा कर ही नहीं सकते. आप से जरूर देखने में गलती हुई होगी.’’

‘‘पूर्वा, मैं ने 2 फुट की दूरी से उस मोटी खड़ूस को देखा है. बस, लड़की कौन है, यह देख न पाई. उस की पीठ थी मेरी तरफ.’’

इंदु भाभी अपने खास अक्खड़ अंदाज में आगे क्या बोल रही थीं, कुछ सुनाई नहीं दे रहा था पूर्वा को. रिसीवर रख कर जैसेतैसे खुद को घसीटते हुए पास ही रखे सोफे तक लाई और बुत की तरह बैठ गई उस पर. सुबहसुबह यह क्या सुन लिया उस ने? साक्षी के साथ इतनी बड़ी बेवफाई कैसे कर सकते हैं संदीप भाई और वह भी इतनी जल्दी? अभी वक्त ही कितना हुआ है उस हादसे को हुए. बमुश्किल 8 महीने ही तो. हां, 8 महीने पहले की ही तो बात है, जब भोर होते ही इसी तरह फोन की घंटी बजी थी. वह दिन आज भी ज्यों का त्यों उस की यादों में बसा है…

उस रात पूर्वा बड़ी देर से अरुण और सूर्य के साथ भाई की शादी से लौटी थी. थकान और नींद से बुरा हाल था, इसलिए आते ही बिस्तर पर लेट गई थी. आंख लगी ही थी कि रात के सन्नाटे को चीरती फोन की घंटी ने उसे जगा दिया. घड़ी पर नजर गई तो देखा 4 बजे थे. ‘जरूर मां का फोन होगा… जब तक बेटी के सकुशल पहुंचने की खबर नहीं पा लेंगी उन्हें चैन थोड़े ही आएगा,’ सोचते हुए वह नींद में भी मुसकरा दी, लेकिन आशा के एकदम विपरीत संदीप का फोन था.

‘पूर्वा भाभी, मैं संदीप बोल रहा हूं,’ संदीप बोला.

वह चौंकी, ‘संदीप भाई आप? इतनी सुबह? सब ठीक तो है न?’

‘कुछ ठीक नहीं है पूर्वा भाभी, साक्षी चली गई,’ भीगे स्वर में वह बोला था.

‘साक्षी चली गई? कहां चली गई संदीप भाई? कोई झगड़ा हुआ क्या आप लोगों में? आप ने उसे रोका क्यों नहीं?’

‘भाभी… वह चली गई हमेशा के लिए…’

‘क्या? संदीप भाई, यह क्या कह रहे हैं आप? होश में तो हैं? कहां है मेरी साक्षी?’ पागलों की तरह चिल्लाई पूर्वा.

‘पूर्वा, वह मार्चुरी में है… हम अस्पताल में हैं… अभी 2-3 घंटे और लगेंगे उसे घर लाने में, फिर जल्दी ही ले जाएंगे उसे… तुम समझ रही हो न पूर्वा? आखिरी बार अपनी सहेली से मिल लेना…’ यह सुनंदा दीदी थीं. संदीप भाई की बड़ी बहन.

फोन कट चुका था, लेकिन पूर्वा रिसीवर थामे जस की तस खड़ी थी. तभी अपने कंधे पर किसी हाथ का स्पर्श पा कर डर कर चीख उठी वह.

‘अरेअरे, यह मैं हूं पूर्वा,’ अरुण ने सामने आ कर उसे बांहों में भर लिया, ‘बहुत बुरा हुआ पूर्वा… मैं ने सब सुन लिया है. अब संभालो खुद को,’ उसे सहारा दे कर अरुण पलंग तक ले गए और तकिए के सहारे बैठा कर कंबल ओढ़ा दिया, ‘सब्र के सिवा और कुछ नहीं किया जा सकता है पूर्वा. मुझे संदीप के पास जाना चाहिए,’ कोट पहनते हुए अरुण ने कहा तो पूर्वा बोली, ‘मैं भी चलूंगी अरुण.’

‘तुम अस्पताल जा कर क्या करोगी? साक्षी तो…’ कहतेकहते बात बदल दी अरुण ने, ‘सूर्य जाग गया तो रोएगा.’

अरुण दरवाजे को बाहर से लौक कर के चले गए. कैसे न जाते? उन के बचपन के दोस्त थे संदीप भाई. उन की दोस्ती में कभी बाल बराबर भी दरार नहीं आई, यह पूर्वा पिछले 9 साल से देख रही थी. पिछली गली में ही तो रहते हैं, जब जी चाहता चले आते. यों तो संदीप अरुण के हमउम्र थे, लेकिन विवाह पहले अरुण का हुआ था. संदीप भाई को तो कोई लड़की पसंद ही नहीं आती थी. खुद तो देखने में ठीकठाक ही थे, लेकिन अरमान पाले बैठे थे स्वप्नसुंदरी का, जो उन्हें सुनंदा दीदी के देवर की शादी में कन्या पक्ष वालों के घर अचानक मिल गई. बस, संदीप भाई हठ ठान बैठे और हठ कैसे न पूरा होता? आखिर मांबाप के इकलौते बेटे और 2 बहनों के लाड़ले छोटे भाई जो थे. लड़की खूबसूरत, गुणवान और पढ़ीलिखी थी, फिर भी मां बहुत खुश नहीं थीं, क्योंकि उन की तुलना में लड़की वालों का आर्थिक स्तर बहुत कम था. लड़की के पिता भी नहीं थे. बस मां और एक छोटी बहन थी.

बिना मंगनीटीका या सगाई के सीधे विवाह कर दुलहन को घर ले आए थे संदीप भाई के घर वाले. साक्षी सुंदर और सादगी की मूरत थी. पूर्वा ने जब पहली बार उसे देखा था, तो संगमरमर सी गुडि़या को देखती ही रह गई थी.

संदीप भाई के विवाह के 18वें दिन बाद सूर्य का पहला जन्मदिन था और साक्षी ने पार्टी का सारा इंतजाम अपने हाथों में ले लिया था.

संदीप भाई बहुत खुश और संतुष्ट थे अपनी पत्नी से, लेकिन घोर अभावों में पली साक्षी को काफी वक्त लगा था उन के घर के साथ सामंजस्य बैठाने में. फिर 5 महीने बाद जब साक्षी ने बताया कि वह मां बनने वाली है तो संदीप भाई खुशी से नाच उठे थे. पलकों पर सहेज कर रखते थे उसे.

डाक्टर ने सुबहशाम की सैर बताई थी साक्षी को और यह जिम्मेदारी संदीप भाई ने पूर्वा को सौंप दी थी यह कहते हुए कि पूर्वा भाभी, आप तो सुबहशाम सैर पर जाती हैं न, मेरी इस बावली को भी ले जाया करें. मेरी तो ज्यादा चलने की आदत नहीं.

और सुबहशाम की सुहानी सैर ने पूर्वा और साक्षी के दिलों के तारों को जैसे जोड़ दिया था. साक्षी चलतेचलते थक जाती तो पार्क की बेंच पर बैठ जाती और छोटी से छोटी बात भी उसे बताती, ‘पूर्वा भाभी, बाकी सब तो ठीक है. संदीप तो जान छिड़कते हैं मुझ पर, लेकिन मम्मीजी मुझे ज्यादा पसंद नहीं करतीं. गाहेबगाहे सीधे ही ताना देती हैं कि मैं खाली हाथ ससुराल आई हूं, एक से एक धन्नासेठ उन के घर संदीप के लिए रिश्ता ले कर आते रहे पर… और दुनिया में गोरी चमड़ी ही सब कुछ नहीं होती वगैरहवगैरह.’

‘बसबस, तुम्हें इस हाल में टैंशन नहीं लेनी है, साक्षी. मम्मीजी भी जल्द ही बदल जाएंगी. तुम इतनी प्यारी हो कि कोई भी तुम से ज्यादा दिन नाराज नहीं रह सकता.’

साक्षी को बेटी हुई. परियों सी प्यारी, गुलाबी, गोलमटोल. बिलकुल साक्षी की तरह. मां को पोते की चाह थी शिद्दत से, लेकिन आई पोती. साक्षी डर रही थी कि न जाने उसे क्याक्या सुनना पड़ेगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. मम्मीजी ने नवजात कन्या को झट से उठा कर सीने से लगा लिया. खुशी से उन की पलकें भीग गईं, ‘मेरी सोनीसुहानी बच्ची,’ वे बोलीं और बस, उसी दिन से बच्ची का नाम ‘सुहानी’ हो गया.

अच्छी जिंदगी गुजर रही थी साक्षी की. वह न के बराबर ही मायके जाती थी. 4 बरस की थी सुहानी, जब फिर से साक्षी गर्भवती हुई पर इस बार वह बेटा चाहती थी.

‘पूर्वा भाभी, मैं सोनोग्राफी करवाऊंगी, अगर लड़का हुआ तो रखूंगी, नहीं तो…’

‘नहीं तो क्या?’

साक्षी ने खामोशी से सिर झुका लिया.

‘इतनी पढ़ीलिखी हो कर कैसी सोच है तुम्हारी साक्षी? मुझे तुम से यह उम्मीद नहीं थी. ऐसा कभी सोचना भी नहीं, समझीं?’

‘भाभी, लड़कियों के साथ कितने झंझट हैं, आप क्या जानें. आप की तो कोई बहन नहीं, बेटी नहीं, आप के पास तो बेटा है भाभी, इसीलिए आप ऐसा कह रही हैं.’

‘मैं भी लड़की चाहती थी साक्षी, सूर्य आया तो इस में मेरा क्या कुसूर? रही बात बेटी की तो क्या सुहानी मेरी बेटी नहीं?’

‘वह तो है भाभी, फिर भी…’

‘जाने दो न. कौन जाने बेटा ही हो तुम्हें.’

बात आईगई हो गई. अभी तो कुछ ही दिन चढ़े थे साक्षी को.

‘‘पूर्वा, लो चाय लो.’’

पूर्वा जैसे गहरी बेहोशी से बाहर आई. अरुण कब लौटे, कब ताला खोल कर भीतर आए और कब चाय भी बना लाए, वह जान ही नहीं पाई.

‘‘पी लो पूर्वा, थोड़ा आराम मिलेगा, फिर हमें चलना भी है. साक्षी घर आ गई है.’’

पूर्वा के पेट में जैसे एक गोला सा उठा. दर्द की एक तीखी लहर पोरपोर दुखा गई. नहीं भर सकी वह चाय का 1 घूंट भी.

वह दिसंबर की एक सुबह थी. हड्डियां कंपा देने वाली ठंड पड़ रही थी, लेकिन पूर्वा पर जैसे कोई असर नहीं कर रही थी ठंड. जब अरुण का हाथ थामे वह साक्षी के घर पहुंची, तो उस का कलेजा मुंह को आ गया यह देख कर कि उस हाड़ कंपा देने वाली ठंड में बर्फीले संगमरमर के फर्श पर मात्र एक चटाई पर साक्षी की निष्प्राण देह पड़ी थी.

साक्षी की सास बिलख रही थीं. अब तक रुके पूर्वा के आंसू जैसे बांध तोड़ कर बह निकले. साक्षी से लिपट कर चीखचीख कर रोने लगी वह. इसी ड्राइंगरूम में ही तो 6 साल पहले, पहला पग धरा था साक्षी ने. यहीं, इसी जगह बिछे कालीन पर बैठ कर ही तो कंगना खुलवाया था संदीप से साक्षी ने. सहसा पीठ पर एक स्नेहिल स्पर्श का आभास हुआ और किसी ने सुबकते हुए उसे बांहों में बांध लिया. वह सुनंदा दीदी थीं.

साक्षी की मां सूना मन और भरी आंखें लिए उस के सिरहाने बैठी थीं मौन भाव से, एकटक बेटी को निहारती. एक आंसू भी नहीं टपका उन की आंखों से.

साक्षी की बहन स्वाति कंबल में लिपटी सोई हुई सुहानी को कस कर सीने से लगाए एक कोने में बैठी थी… खामोश… बस आंखों से आंसुओं की धारा बह रही थी.

हाय, कितनी बार मना किया बिटिया को पर एक न सुनी इस ने… कहते हुए साक्षी की सास फिर से रोने लगीं.

पूर्वा का जी चाहा कि चीख कर कहे कि नहीं मम्मीजी, झूठ न बोलिए. आप ने बिलकुल मना नहीं किया साक्षी को, बल्कि उस से ज्यादा तो आप चाहती थीं कि दूसरी बेटी न आए.

उसे याद आया, उस के आगरा जाने से 1 दिन पहले की ही तो बात है. संदीप और सुहानी को दफ्तरस्कूल भेज कर सुबह 9 बजे ही आ गई थी साक्षी. चेहरे का रंग उड़ा हुआ था. बोली, ‘पूर्वा भाभी, वही हुआ जिस का मुझे डर था.’

‘क्या हुआ साक्षी?’

‘सोनोग्राफी रिपोर्ट आ गई है, पूर्वा भाभी. लड़की ही है. मुझे अबौर्शन करवाना ही होगा.’

‘एक मां हो कर अपने ही बच्चे को मारोगी साक्षी, तो क्या चैन से जी पाओगी?’

‘मुझे नहीं चाहिए लड़की बस,’ दोटूक फैसला सुना दिया दृढ़ स्वर में साक्षी ने.

‘क्यों नहीं चाहिए? क्या संदीप भाई नहीं चाहते?’

‘नहीं, ऐसा होता तो प्रौब्लम ही क्या थी. संदीप को तो बहुत पसंद हैं बेटियां, भाभी.’

‘तो क्या मम्मीजी नहीं चाहतीं?’

‘पूर्वा भाभी, बहुत सहा है लड़की बन कर मैं ने, मेरी मां ने औैर बहन स्वाति ने भी. जानती हैं भाभी, हम 3 बहनें थीं. पापा जब गए तब मैं सिर्फ 10 साल की थी, स्वाति 6 साल की और सब से छोटी सिमरन, जो बेटे की आस में हुई थी, सिर्फ सवा साल की थी. पापा के गम में डूबी मां उस की ठीक से देखभाल नहीं कर पाईं और उसे डायरिया हो गया.

इलाज के लिए पैसे नहीं थे मां के पास…

उस का डायरिया बिगड़ता गया और वह मर गई. मैं ने, मां और स्वाति ने बहुत तकलीफें उठाई हैं. मैं तो निकल आई पर वे दोनों अब भी… उन के दर्द की आंच हर पल झुलसाती है मुझे, पूर्वा भाभी. संघर्षों की आग में झोंकने के लिए एक और लड़की को मैं दुनिया में नहीं ला सकती.’

फिर साक्षी एक तटस्थ भाव चेहरे पर लिए चली गई थी और पूर्वा अगली सुबह अरुण और सूर्य के साथ आगरा चली गई भाई की शादी में. 5 दिन बाद लौटी तो ये सब. वहां मौजूद लोगों से पता चला कि वह अबौर्शन के लिए अकेली ही अस्पताल पहुंच गई थी. सास को पता चला तो वह भी पीछेपीछे पहुंच गईं और उस की मरजी देखते हुए उसे इजाजत दे दी. फिर अबौर्शन ऐसा हुआ कि बच्ची के साथसाथ वह भी चली गई.

देखते ही देखते साक्षी विदा हो गई सदा के लिए. कई दिन तक हर दिन पूर्वा वहां जाती और कलेजे को पत्थर बना कर वहां बैठी रहती. उस दौरान स्वाति और उस की मां कई दिन पूर्वा के घर ही रहीं. एक दिन पारंपरिक रस्म अदायगी के बाद साक्षी का अध्याय बंद हो गया. सुहानी मौसी के साथ इन दिनों में इतना घुलमिल गई थी कि पल भर भी नहीं रहती थी उस के बिना, इसलिए फैसला यह हुआ कि फिलहाल तो मौसी व नानी के साथ ही जाएगी वह.

एक दौर गुजरा और दूसरा दौर शुरू हुआ उदासी का, साक्षी के संग गुजारे अनगिनत खूबसूरत पलों की यादों का. संदीप भाई भी जबतब इन यादों में हिस्सा बंटाने चले आते और सिर्फ और सिर्फ साक्षी की बातें करते तो पूर्वा तड़प उठती. लगता था संदीप भाई कभी नहीं संभल पाएंगे, लेकिन हर अगले दिन रत्तीरत्ती कर दुख कम होता जा रहा था. यही तो कुदरत का नियम भी है.

‘‘अरे, ऐसे कैसे बैठी हो गरमी में, पूर्वा और इतनी सुबह क्यों उठ गईं तुम?’’ अरुण ने पंखा चलाते हुए कहा तो पूर्वा वर्तमान में लौट आई.

‘‘लोग कितनी जल्दी भुला देते हैं उन्हें, जिन के बिना घड़ी भर भी न जी सकने का दावा करते हैं, है न अरुण?’’ एक सर्द सांस लेते हुए सपाट स्वर में कहा पूर्वा ने.

‘‘किस की बात कर रही हो पूर्वा?’’

‘‘इंदु भाभी का फोन आया था. आप के संदीप ने दूसरी शादी कर ली.’’

सुन कर चौंके नहीं अरुण. बस तटस्थ से खामोश बैठे रहे.

हैरानी हुई पूर्वा को. पूछा, ‘‘आप कुछ कहते क्यों नहीं अरुण? हां, क्यों कहोगे, मर्द हो न, मर्द का ही साथ दोगे. अच्छा चलो, एक बात का ही जवाब दे दो. यही हादसा अगर संदीप भाई के साथ गुजरा होता तो क्या साक्षी दूसरी शादी करती, वह भी इतनी जल्दी?’’

‘‘नहीं करती, बिलकुल नहीं करती, मैं मानता हूं. औरत में वह शक्ति है जिस का रत्ती भर भी हम मर्द नहीं छू सकते. तभी तो मैं दिल से इज्जत करता हूं औरत की और इंदु भाभी या उन जैसी कोई और रिपोर्टर तुम्हें नमकमिर्च लगा कर कल को कुछ बताए, उस से पहले मैं ही बता देता हूं तुम्हें कि मैं भी संदीप के साथ था. कल मैं औफिस के काम से नहीं, संदीप के लिए बाहर गया था.’’

‘‘क्या, इतनी बड़ी बात छिपाई आप ने मुझ से? लड़की कौन है?’’ घायल स्वर में पूछा पूर्वा ने.

‘‘साक्षी की बहन स्वाति.’’

‘‘क्या, ऐसा कैसे कर सकते हैं संदीप भाई और वे साक्षी की मां, कैसा दोहरा चरित्र है उन का? उस वक्त तो सब की नजरों से बचाबचा कर यहां छिपा रही थीं स्वाति को. कहती थीं, बिटिया गरीब हूं तो क्या जमीर बेच दूं? खूब समझ रही हूं मैं इन सब के मन की बात, पर कैसे कर दूं अपनी उस बच्ची को इन के हवाले, जहां से मेरी एक बेटी गई. जीजूजीजू कहते जबान नहीं थकती लड़की की, अब कैसे उसे पति मान पाएगी? और संदीप भाई

का क्या यही प्यार था साक्षी के प्रति कि वह चली गई तो उसी की बहन ब्याह लाए? और कोई लड़की नहीं बची थी क्या दुनिया में?’’ अपने स्वभाव के एकदम विपरीत अंगारे उगल रही थी पूर्वा.

अरुण ने आगे बढ़ कर उस के मुंह पर अपनी हथेली रख दी. बोले, ‘‘शांत हो जाओ, पूर्वा. यह सब इतना आसान नहीं था संदीप के लिए और न ही स्वाति के लिए. रही बात साक्षी की मां की, तो यह उन की मरजी नहीं थी, स्वाति का फैसला था. उस का कहना था कि मेरे लिए साक्षी दीदी अब सिर्फ सुहानी में बाकी हैं. उस के सिवा और कोई खून का रिश्ता नहीं बचा मेरे पास. मैं सुहानी के बिना नहीं जी सकती. अगर इस की नई मां आ गई तो सुहानी के साथ नहीं मिलनेजुलने देगी हमें. तब इसे देखने तक को तरस जाऊंगी मैं और शादी तो मुझे कभी न कभी करनी ही है, तो क्यों न जीजू से ही कर लूं. सब समस्याएं हल हो जाएंगी.

‘‘साक्षी की मां ने मुझे अलग ले जा कर कहा था कि मैं अपने ही कहे लफ्जों पर शर्मिंदा हूं अरुणजी, संदीपजी के साथ स्वाति का रिश्ता न जोड़ने की बात एक मां के दिल ने की थी और अब जोड़ने का फैसला एक मां के दिमाग का है. कहां है मेरे पास कुछ भी, जो स्वाति को ब्याह सकूं. होता तो कब की ब्याह चुकी होती. और भी बहुत कुछ था, जो अनकहा हो कर भी बहुत कुछ कह रहा था. तुम ने उन की गरीबी नहीं देखी पूर्वा, मैं ने देखी है. एक छोटे से किराए के कमरे में रहती हैं मांबेटी. एक नर्सरी स्कूल में नौकरी करती हैं आंटी और थोड़ी तनख्वाह में से घर भी चला रही हैं और स्वाति को भी पढ़ा रही हैं.

‘‘अब रही बात संदीप की, तो उस का कहना था कि अरुण, मम्मीजी मेरा ब्याह किए बिना तो मानेंगी नहीं, इकलौता जो हूं मैं. फिर कोई और लड़की क्यों, स्वाति क्यों नहीं? एक वही तो है, जो मेरा दर्द समझ सकती है, क्योंकि यही दर्द उस का भी है. और एक वही है, जो मेरी सुहानी को सगी मां की तरह पाल सकती है. कोई और आ गई तो सब कुछ तहसनहस हो जाएगा.’’

पूर्वा खामोश बैठी रही बिना एक शब्द बोले, तो अरुण ने तड़प कर कहा, ‘‘यों खामोश न बैठो पूर्वा, कुछ तो कहो.’’

‘‘बसबस, बहुत हो गया. मैं चाय बना कर लाती हूं. चाय पी कर घर के कामों में मेरी मदद करो. आज बाई छुट्टी पर है. साथ ही, यह सोच कर रखो कि स्वाति को शगुन में क्या देना है. यह काम भी सुबहसुबह निबटा आएंगे और स्वाति और संदीप भाई को भी अच्छा लगेगा.’’

एक मीठी मुसकराहट के साथ पूर्वा उठ खड़ी हुई तो राहत भरी मुसकान अरुण के होंठों पर भी बिखर गई. Family Story

लेखक- कमल कपूर

Drama Story: अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का

Drama Story: ‘‘अरेवाह मां, ये झुमके तो बहुत सुंदर हैं. कब खरीदे? रंजो ने अपनी मां प्रभा के कानों में झूलते झुमके को देख कर पूछा.

‘‘वो पिछले महीने हमारी शादी की सालगिरह थी न, तभी अपर्णा बहू ने मुझे यह झुमके और तुम्हारे पापा को घड़ी ले कर दी थी. पता नहीं कब वह यह सब खरीद लाई,’’ प्रभा ने कहा.

अपनी आंखें बड़ी कर रंजो बोली, ‘‘भाभी ने? क्या बात है. फिर आह भरते हुए कहने लगी, मुझे तो कभी इस तरह से कुछ नहीं दिया उन्होंने. हां भाई, सासससुर को मक्खन लगाया जा रहा है, लगाओलगाओ खूब मक्खन लगाओ.’’ लेकिन उस का ध्यान तो उन झुमकों पर ही अटका हुआ था. कहने लगी, ‘‘जिस ने भी दिया हो मां, पर मेरा दिल तो इन झुमकों पर आ गया.’’

हां तो ले लो न बेटा, इस में क्या है, कह कर प्रभा ने तुरंत झुमके उतार कर अपनी बेटी रंजो को दे दिए. लेकिन उस ने एक बार यह नहीं सोचा कि अपर्णा को कैसा लगेगा जब वह जानेगी कि उस के दिए झुमके उस की सास ने अपनी बेटी को दे दिए.

प्रभा के देने भर की देरी थी कि रंजो ने झट से झुमके अपने कानों में डाल लिए, फिर बनावटी सा मुंह बना कर कहने लगी, ‘‘मन नहीं है तो ले लो मां, नहीं तो फिर मेरे पीठ पीछे घर वाले, खास कर पापा कहेंगे, जब आती है रंजो, कुछ न कुछ तो ले कर ही जाती है.’’

‘‘कैसी बातें करती हो बेटा, कोई क्यों कुछ कहेगा? और क्या तुम्हारा हक नहीं है इस घर पर? तुम्हें पसंद है तो रख लो न इस में क्या है. तुम पहनो या मैं बात बराबर है.’’

‘‘सच में मां? ओह… मां आप कितनी अच्छी हो’’, कह कर रंजो अपनी मां के गले में झूल गई. हमेशा से तो वह यही करते आई है जो पसंद आया उसे रख लिया. यह भी नहीं सोचा कि वह चीज किसी के लिए कितना मायने रखती है. कितने प्यार से और किस तरह से पैसे जोड़ कर अपर्णा ने अपनी सास के लिए वे झुमके खरीदे थे, पर प्रभा ने बिना सोचेसमझे झुमके अपनी बेटी को दे दिए. कह तो सकती थी न कि ये झुमके तुम्हारी भाभी ने बड़े शौक से मुझे खरीद कर दिए इसलिए मैं तुम्हें दूसरा बनवा कर दे दूंगी, पर नहीं, कभी उस ने बेटी के आगे बहू की भावना को समझा है जो अब समझेगी.

‘‘मां देखो तो मेरे ऊपर ये झुमके कैसे लग रहे हैं, अच्छे लग रहे हैं न, बोलो न मां?’’ आईने में खुद को निहारते हुए रंजो कहने लगी, ‘‘वैसे मां, आप से एक शिकायत है.’’

‘‘अब किस बात की शिकायत है?’’ प्रभा ने पूछा.

‘‘मुझे नहीं, बल्कि आप के जमाई को है. कह रहे थे आप ने वादा किया था उन से ब्रैसलैट देने का जो अब तक नहीं दिया.’’

‘‘अरे हांहां याद आया.’’ अपने दिमाग पर जोर डालते हुए प्रभा बोली, ‘‘पर अभी पैसे की थोड़ी तंगी है बेटा, और तुझे तो पता ही है तेरे पापा को कितनी कम पेंशन मिलती है. घर तो अपर्णा बहू और मानव की कमाई से ही चलता है,’’ अपनी मजबूरी बताते हुए प्रभा ने कहा.

‘‘वो सब मुझे नहीं पता है मां, वह आप जानो और आप के जमाई. बीच में मुझे मत घसीटो,’’ झुमके अपने पर्स में सहेजते हुए रंजो ने कहा और चलती बनी.

‘‘बहू के दिए झुमके तुम ने रंजो को दे दिए?’’ प्रभा के कान में वे झुमके न देख कर भरत ने पूछा. उन्हें समझ में आ गया कि अभी रंजो आई थी और वह वे झुमके ले कर चली गई.

‘‘आ… हां उसे पसंद आ गया तो दे दिया,’’ हकलाते हुए प्रभा ने कहा और वहां से जाने लगी. क्योंकि जानती थी अब भरत चुप नहीं रहने वाले.

‘‘क्या कहा तुम ने, उसे पसंद आ गया? हमारे घर की ऐसी कौन सी चीज है जो उसे पसंद नहीं आती है, बोलो? जब भी आती है कुछ न कुछ उठा कर ले ही जाती है. क्या जरा भी शर्म नहीं है उसे? उस दिन आई थी तो बहू का पर्स, जो उस की दोस्त ने उसे दिया था, वह उठा कर ले गई. कोई कुछ नहीं कहता, इस का मतलब यह नहीं कि वह अपनी मनमरजी करेगी,’’ गुस्से से आगबबूला होते हुए भरत ने कहा.

अपने पति की बातों पर तिलमिला उठी प्रभा. बोली, ‘‘ऐसा कौन सा जायदाद उठा कर ले गई वह जो तुम इतना सुना रहे हो? अरे एक जोड़ी झुमके ही तो ले गई, वह भी तुम से सहन नहीं हुआ? जाने क्यूं रंजो हमेशा तुम्हारी आंखों में खटकती रहती है?’’

लेकिन आज भरत का गुस्सा सातवें आसमान पर था इसलिए कहने लगे, ‘‘किस ने मना किया तुम्हें जायदाद देने से, दे दो न जो देना है. लेकिन किसी का प्यार से दिया हुआ उपहार यूं ही किसी और को देना, क्या यह सही है? अगर बहू ऐसा करती तो तुम्हें कैसा लगता? कितने अरमानों से वह तुम्हारे लिए झुमके खरीद कर लाई थी और तुम ने एक मिनट भी नहीं लगाया उसे किसी और को देने में.’’

‘‘ये किसी और किसी और क्या लगा रखा है? अरे, बेटी है वह हमारी और मैं ने अपनी बेटी को दिया जो दिया, समझे, बड़े आए बहू के चमचे, हुंह,’’ मुंह बिचकाते हुए प्रभा बोली.

‘‘अरे तुम्हारी बेटी तुम्हारी ममता का फायदा उठा रही है और कुछ नहीं. किस बात की कमी है उसे? हमारे बेटेबहू से ज्यादा कमाते हैं वे दोनों पतिपत्नी, फिर भी कभी हुआ उसे की अपने मांबाप के लिए 2 रुपए का भी उपहार ले कर आए कभी, नहीं? हमारी छोड़ो, क्या कभी उस ने अपनी भतीजी को एक खिलौना भी खरीद कर दिया है आज तक, नहीं? बस लेना जानती है. क्या मेरी आंखें नहीं है? देखता हूं मैं, तुम बहूबेटी में कितना फर्क करती हो. बहू का प्यार तुम्हें ढकोसला लगता है और बेटी का ढकोसला प्यार. ऐसे घूरो मत मुझे, पता चल जाएगा तुम्हें भी एक दिन देखना.’’

‘‘कैसे बाप हो तुम सच में. जो बेटी के सुख पर भी नजर लगाते रहते हो. पता नहीं क्या बिगाड़ा है रंजो ने तुम्हारा जो हमेशा वह तुम्हारी आंखों की किरकिरी बनी रहती है?’’ अपनी आंखें लाल करते हुए प्रभा बोली.

ओ… कमअक्ल औरत, रंजो मेरी आंखों की किरकिरी नहीं बनी है, बल्कि अपर्णा बहू तुम्हें फूटी आंख नहीं सुहाती है. पूरे दिन घर में बैठी आराम फरमाती रहती हो, हुक्म चलाती रहती हो कभी यह नहीं होता कि बहू के कामों में थोड़ा हाथ बटा दो और तुम्हारी बेटी, वह तो यहां आ कर अपना हाथपैर हिलाना भी भूल जाती है. क्या नहीं करती है बहू इस घर के लिए. बाहर जा कर कमाती भी है और अच्छे से घर भी संभाल रही है फिर भी तुम्हें उस से कोई न कोई शिकायत रहती ही है. जाने क्यों तुम बेटीबहू में इतना भेद करती हो?’’

‘‘कमा कर लाती है और घर संभालती है तो कौन सा एहसान कर रही है हम पर. घर उस का है तो संभालेगा कौन?’’ झुंझलाते हुए प्रभा बोली.

‘‘अच्छा, सिर्फ उस का घर है तुम्हारा नहीं? बेटी जब भी आती है उस की खातिरदारी में जुट जाती हो, पर कभी यह नहीं होता कि औफिस से थकीहारी आई बहू को एक गिलास पानी ही पकड़ा दो. बस ताने मारना आता है तुम्हें. अरे, बहू तो बहू उस की दोस्त को भी तुम देखना नहीं चाहती हो. जब भी आती है कुछ न कुछ सुना ही देती हो. तुम्हें लगता है कहीं वह अपर्णा के कान न भर दे तुम्हारे खिलाफ, तुम्हारी बेटी के खिलाफ, इसलिए उसे देखना नहीं चाहती हो. जाने दो, मैं भी किस पत्थर पर अपना सिर फोड़ रहा हूं तुम से तो बात करना ही बेकार है,’’ कह कर भरत अपना पैर पटकते हुए वहां से चले गए. और प्रभा बड़बड़ाती रही. सहन नहीं हुआ उसे की भरत ने रंजो के खिलाफ कुछ बोल दिया.

लेकिन सही तो कह रहे थे भरत, अपर्णा क्या कुछ नहीं करती है इस घर के लिए, पर फिर भी प्रभा को उस से शिकायत ही रहती थी. नातेरिश्तेदार हों या आसपड़ोस, हर किसी से वह यही कहती फिरती थी, भई, अब बहू के राज में जी रहे हैं तो मुंह बंद कर के ही जीना पड़ेगा न, वरना जाने कब बहूबेटे हम बूढ़ेबूढ़ी को वृद्धाश्रम भेज दें. आज कल उलटा जमाना है. अब बहू नहीं, बल्कि सास को बहू से डर कर रहना पड़ता है सुन कर कैसे अपर्णा अपना चेहरा नीचे कर लेती थी पर अपने मुंह से एक शब्द भी नहीं बोलती थी. पर उस की आंखों से बहते आंसू उस के मन के दर्द को जरूरत बयां कर देते थे.

अपर्णा ने तो प्रभा को आते ही अपनी मां मान लिया था पर प्रभा तो आज तक उसे पराए घर की लड़की ही समझती रही. अपर्णा जो भी करती प्रभा के लिए, वह उसे बनावटी ही लगता था और रंजो का एक बार सिर्फ यह पूछ लेना, ‘‘मां आप की तबीयत तो ठीक है न?’’ सुन कर प्रभा खुशी से फूल कर कुप्पा हो जाती और अगर जमाई ने हालचाल पूछ लिया तो फिर प्रभा के पैर ही जमीन पर नहीं पड़ते थे.

उस दिन सिर्फ इतना ही कहा था अपर्णा ने, ‘‘मां, ज्यादा चाय आप की सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकती है और वैसे भी डाक्टर ने आप को चाय पीने से मना किया है. होर्लिक्स लाई हूं आप यह पी लीजिए. कह कर उस ने गिलास प्रभा की ओर बढ़ाया ही था कि प्रभा ने गिलास उस के हाथों से झटक लिया और टेबल पर रखते हुए तमक कर बोली, ‘‘तुम मुझे ज्यादा डाक्टरी का पाठ मत पढ़ाओ समझी, जो मांगा है वही ला कर दो, फिर बुदबुदाते हुए कहने लगी, ‘बड़ी आई मुझे सिखाने वाली, अच्छे बनने का नाटक तो कोई इस से सीखे.’ अपर्णा की हर बात उसे नाटक और बनावटी ही लगती थी.

मानव औफिस के काम से शहर से बाहर गया हुआ था और अपर्णा भी अपने कजिन भाई की शादी में गई हुई थी. लेकिन मन ही मन अपर्णा यह सोच कर डर रही थी कि अकेले सासससुर को छोड़ कर जा रही हूं कहीं इन की तबीयत खराब हो गई तो. यही सोच कर जाने से पहले उस ने रंजो को दोनों का खयाल रखने और दिन में कम से कम एक बार उन्हें देख आने को कहा. जिस पर रंजो ने आग उगलते हुए कहा, ‘‘आप नहीं भी कहती न भाभी, तो भी मैं अपने मांपापा का खयाल रखती. आप को क्या लगता है एक आप ही हैं इन का खयाल रखने वाली? अरे, बेटी हूं मैं इन की, बहू नहीं समझीं.’’ रंजो की बातों से अपर्णा बेहद आहत हुई थी, मगर चुप रही. मगर अपर्णा के जाने के बाद वह एक बार भी अपने मायके नहीं आई. क्योंकि यहां उसे काम जो करना पड़ जाता. कभीकभार फोन पर हालचाल जरूर पूछ लेती और साथ में यह बहाना भी बना देती कि वक्त नहीं मिलने के कारण वह उन से मिलने नहीं आ पा रही, पर वक्त मिलते आएगी जरूर. और प्रभा सोचती, बेटी को सच में उन से मिलने का समय नहीं मिलता होगा, वरना आती जरूर.

एक रात अचानक भरत की तबीयत बहुत बिगड़ गई. प्रभा इतनी घबरा गईं कि उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे. उस ने मानव को फोन लगाया पर उस का फोन नैटवर्क क्षेत्र से बाहर बता रहा था, फिर उस ने अपनी बेटी रंजो को फोन लगाया. लेकिन घंटी तो बज रही थी पर कोई उठा नहीं रहा था. जमाई को भी फोन लगाया उस का भी वही हाल था. जितनी बार भी प्रभा ने रंजो और उस के पति को फोन लगाया उन्होंने नहीं उठाया, ‘शायद वे सो गए होंगे इसलिए फोन की आवाज उन्हें सुनाई नहीं दे रही होगी.’ प्रभा के मन में यह ख्याल आया. फिर हार कर उस ने अपर्णा को फोन लगाया. इतनी रात गए प्रभा का फोन आया देख कर अपर्णा घबरा उठी.

प्रभा कुछ बोलती उस से पहले ही वह बोल पड़ी, ‘‘मां… क्या हुआ पापा ठीक है न?’’ लेकिन जब उसे प्रभा की सिसकियों की आवाज आई तो वह समझ गई कि कुछ बात जरूरत है. घबरा कर वह बोली, ‘‘मां, मां आप रो क्यों रही हैं? कहिए न क्या हुआ मां?’’ लेकिन फिर अपने ससुर के बारे में सब जान कर वह कहने लगी, ‘‘मां, आप घबराइए मत कुछ नहीं होगा पापा को. मैं कुछ करती हूं. उस ने तुरंत अपनी दोस्त शोना को फोन लगाया और सारी बातों से उसे अवगत कराते हुए कहा कि तुरंत वह पापा को अस्पताल ले कर जाए.’’

अपर्णा की जिस दोस्त को प्रभा देखना तक नहीं चाहती थी और उसे बंगालन बंगालन कह कर बुलाती थी आज उसी की बदौलत भरत की जान बच पाई, वरना पता नहीं क्या हो जाता. डाक्टर का कहना था कि मेजर अटैक था. अगर और थोड़ी देर हो जाती मरीज को लाने में तो इन्हें बचाना मुश्किल हो जाता.

तब तक अपर्णा और मानव भी अस्पताल पहुंच चुके थे, फिर कुछ देर बाद रंजो भी अपने पतिबेटे के साथ वहां आ गई. बेटेबहू को देख कर बिलखबिलख कर रो पड़ी प्रभा और कहने लगी, आज अगर शोना न होती तो शायद तुम्हारे पापा जिंदा न होते.

अपर्णा के भी आंसू रुक नहीं रहे थे. उसे लगा उस के ससुर को कुछ हो जाता, तो वह खुद को कभी माफ नहीं कर पाती. सास को अपने सीने से लगा कर ढाढ़स बंधाया कि अब सब ठीक हो जाएगा. अपनी दोस्त शोना को तहे दिल से धन्यवाद दिया कि उस की वजह से उस के ससुर कि जान बच पाई.

इधर अपनी भाभी को मां के करीब देख कर रंजो भी मगरमच्छ के आंसू बहाते हुए कहने लगी, ‘‘मां, मैं तो मर ही जाती अगर पापा को कुछ हो जाता तो. कितनी खराब हूं मैं जो आप का कौल नहीं देख पाई. वह तो सुबह आप की मिस्डकाल देख कर वापस आप को फोन लगाया तो पता चला, वरना यहां तो कोई कुछ बताता भी नहीं मुझे,’’ अपर्णा की तरफ घूरते हुए रंजो बोली. उस का इशारा उस की तरफ ही था. चिढ़ हो रही थी उसे अपर्णा को प्रभा के करीब देख कर.

अभी वह बोल रही थी कि तभी उस का 7 साल का बेटा अमोल बोला पड़ा, मम्मी आप झूठ क्यों बोल रही हो? नानी, ‘‘मम्मी झूठ बोल रही है. जब आप का फोन आया था हम टीवी पर फिल्म देख रहे थे. मम्मी यह कह कर फोन नहीं उठा रही थी कि पता नहीं कौन मर गया जो मां इतनी रात को हमें परेशान कर रही है. पापा ने कहा भी उठा लो हो सकता है कोई जरूरी बात हो. मगर फिर भी मम्मी ने आप का फोन नहीं उठाया और फिल्म देखती रही.’’

अमोल की बातें सुन सब हतप्रभ रह गए. और रंजो को तो काटो तो खून नहीं. प्रभा एकटक कभी अपने नातिन को देखती तो कभी अपनी बेटी को. उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि अमोल जो कह रहा है वह सही है.

सचाई खुलते ही रंजो की तो सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. उसे तो जैसे सदमा लग गया. अपने बेटे को एक थप्पड़ लगाते हुए बोली, ‘‘पागल कहीं का, कुछ भी बकवास करता रहता है. फिर हकलाते हुए कहने लगी, अ… अरे वो तो किसी और का फोन आ रहा था, मां. और मैं ने उस के लिए कहा था,’’ वो शब्द, फिर दांत निपोरते हुए कहने लगी, ‘‘देखो न मां कुछ भी बोलता है, बच्चा है न इसलिए.’’

प्रभा को अब भी अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि उस ने जो कुछ सुना सही है. कहने लगी, ‘‘इस का मतलब तुम उस वक्त जागी हुई थी और तुम्हारा फोन भी तुम्हारे आसपास ही था? तुम ने एक बार भी यह नहीं सोचा कि इतनी रात को तुम्हारी मां किसी कारणवश ही तुम्हें फोन कर रही होगी? अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार और विश्वास का बेटा. आज मेरा सुहाग उजड़ गया होता अगर ये शोना न होती तो. जिस बहू के प्यार को मैं ढकोसला और बनावटी समझती रही, आज पता चल गया कि वह असल में प्यार ही था. मैं तो आज भी इस भ्रम में ही जीती रहती अगर तुम्हारा बेटा हमें सचाई न बताता तो.’’

अपने हाथों से सोने का अंडा देने वाली मुर्गी निकलते देख कहने लगी रंजो, ‘‘नहीं, मां, आप गलत समझ रही हैं.’’

‘‘समझ रही थी बेटा, पर अब मेरी आंखों पर से पर्दा हट चुका है. सही कहते थे तुम्हारे पापा की तुम मेरी ममता का सिर्फ फायदा उठा रही हो. कोई मोह नहीं है तुम्हारे दिल में मेरे लिए,’’ कह कर प्रभा ने अपना चेहरा दूसरी तरफ फेर लिया और अपर्णा से बोली, ‘‘चलो बहू, देखें तुम्हारे पापा को कुछ चाहिए तो नहीं?’’ रंजो, मां मां कहती रही पर पलट कर एक बार भी प्रभा ने फिर उसे नहीं देखा, क्योंकि मोहभंग हो चुका था उस का. Drama Story

Magazines on the Move : अब गृहशोभा और चंपक तेजस एक्सप्रेस के पैसेंजर्स को भी मिलेंगे

Magazines on the Move :  पुराने दिनों की यादें फिर से ताजा होने जा रही है.  रेलयात्रा के दौरान पैसेंजर्स पत्रिकाओं को एंजॉय कर सकेंगे.
एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगजीन्स ( AIM ) ने प्रसार भारती के WAVES OTT और ONDC (ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स) डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर मैगजीन स्टोर को लॉन्च किया. इस स्टोर में 100 से अधिक मैगजीन ब्रांड्स  पूरे भारत में उपलब्ध होंगे. इसे क्लिक करते ही आप अपनी पसंदीदा पत्रिका को एंजौय कर सकेंगे. 

 8 अगस्त 2025 को दिल्ली में 14वां इंडियन मैगज़ीन कांग्रेस 2025 का आयोजन किया गया. इस अवसर पर कई मशहूर प्रकाशन समूहों के प्रकाशक, संपादक, डिजिटल मीडिया प्रमुख, नीति निर्माता, मार्केटर मौजूद थे.  The Deep Connect – Building Communities. Nurturing Trust. Re-imagining the Future विषय पर आयोजित कांग्रेस में इस बात पर जोर दिया गया कि आज भी पत्रिकाएं  तेजी से भाग रही डिजिटल दुनिया की नकल करने की बजाय गहराई से जुड़ने में यकीन करती है और इसी वजह से उसने अपने रीडर्स का भरोसा कायम कर रखा है.

एसोसिएशन ऑफ इंडियन मैगजीन्स यानि ‘एआईएम’, देशभर में 40 से अधिक पब्लिशर्स और 300 से भी अधिक मैगजीन्स का प्रतिनिधित्व करती है. एआईएम की ओर से आयोजित इस कांग्रेस में 3 ऐतिहासिक डिजिटल और भौतिक वितरण पहल की घोषणा की गई. वे हैं –

1. WAVES OTT पर मैगजीन स्टोर – यह सौ से अधिक मैगजीन को एक क्लिक में रीडर्स को उपलब्ध कराएगा. 

2. ONDC पर सेलर-साइड ऐप लॉन्च किया गया, इसकी मदद से विक्रेता यानि सेलर्स सीधे प्लेटफॉर्म के माध्यम से प्रिंट या डिजिटल मैगजीन बेच सकेंगे.  DigiHaat पर भी मैगजीन की शुरुआत की गई है.  यह ओएनडीसी आधारित डिजिटल बाजार है. 

3. “Magazines on the Move” नाम से एक बेहद रोचक पहल की शुरुआत IRCTC  (भारतीय रेलवे खान-पान एवं पर्यटन निगम) के साथ की गई है. इसके तहत तेजस एक्सप्रेस के यात्रियों को उनकी सीट पर ही पत्रिकाएं उपलब्ध कराई जाएगी.  फिलहाल यह सुविधा मुंबई–अहमदाबाद और दिल्ली–लखनऊ रूट के तेजस ट्रेनों में उपलब्ध है. इस सुविधा के तहत पैसेंजर्स को एक क्यूरेटेड मेन्यू मिलेगा, जिससे वे अपनी पसंद की मैगजीन चुन सकेंगे. इन्हें आईआरसीटीसी स्टाफ के जरिए पैसेंजर की सीट तक पहुंचाया जाएगा.  जल्दी ही इस पहल को 100 से अधिक प्रीमियम ट्रेनों में उपलब्ध कराए जाने की योजना है. 

एआईएम के प्रेसिडेंट और दिल्ली प्रेस के एग्जीक्यूटिव पब्लिशर अनंत नाथ ने कहा कि ‘द इंडियन मैगजीन कांग्रेस’ हमेशा से विचारों और अवसरों को जोड़ने का जरिया रहा है. इन नई पहलों का उद्देश्य हर किसी के लिए मैगजीन उपलब्ध करना है फिर चाहे वह प्रिंट हो या डिजिटल. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एआईएम का उद्देश्य वितरण के अलग अलग माध्यमों का इस्तेमाल कर रीडर्स से कनेक्ट करना है.
प्रसार भारती के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और अध्यक्ष गौरव द्विवेदी ने WAVES OTT पर मैगजीन स्टोर शुरू किए जाने को एक ऐतिहासिक पल बताया.  वहीं आरआरसीटीसी के निदेशक राहुल हिमालयन ने मैग्जीन्स ऑन द मूव पहल की शुरआत की. इस अवसर पर दिल्ली प्रेस के एडिटर इन चीफ परेश नाथ, बी डब्लू बिजनेस वर्ल्ड और एक्सचेंज 4 मीडिया ग्रुप के चेयरमैन डॉ अनुराग बत्रा भी उपस्थित रहे.  इस मौके पर AIM-e4m Magzimise Awards के दौरान दिल्ली प्रेस की मैगजीन  गृहशोभा, चंपक और मोटारिंग वर्ल्ड को कई अलगअलग श्रेणियों में अवार्ड दिया गया.

Hair Serum: मुलायम और शाइनी बालों के लिए जानें इस्तेमाल का सही तरीका

Hair Serum: आप के चारों ओर लोग हेयर सीरम के गुणों की बात करते नहीं थकते, क्योंकि आज हर यूथ इसे हेयरवाश के बाद इसे नियमित रूप से लगाना पसंद करते हैं. हेयर सीरम से केश सिल्की और खूबसूरत बन जाते हैं, जिस से बिना किसी हेयरस्टाइल के आप खूबसूरत लगने लगते हैं.

असल में स्किन सीरम की तरह हेयर सीरम को ऐक्टिव इनग्रेडिऐंट के साथ फौर्मूलेट किया जाता है, ताकि यह आप के बालों की गहराई में जा सके. हेयर सीरम बालों में फ्रिज को कंट्रोल करने, हेयरस्टाइल को सैट करने और बाहरी प्रदूषण से सुरक्षित रखने के लिए प्रयोग किया जाता है.

हेयर औयल, जहां स्कैल्प को अंदरूनी पौष्टिकता देता है, वहीं सीरम ऊपरी स्तर पर काम करता है. इस के अलावा हेयर सीरम मुख्य रूप से सिलिकन बेस्ड प्रोडक्ट्स हैं, जो आप के बालों पर कोटिंग कर, उन के फ्रिज को स्मूद करते हैं. इसलिए आप को अपने बालों के प्रकार को ध्यान में रखते हुए हेयर सीरम का सही प्रयोग करना चाहिए.

औयली हेयर

जिन लोगों के बाल औयली होते हैं, उन के बारे में अमूमन कहा जाता है कि उन्हें हेयर सीरम का प्रयोग नहीं करना चाहिए, जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है. औयली हेयर वाले भी अपने बालों पर हेयर सीरम लगा सकते हैं, लेकिन उन्हें लाइट फौर्मूला वाले हेयर सीरम का इस्तेमाल करना चाहिए. इन लोगों को ग्रेप सीड, एलोवेरा जैसे लाइट इनग्रेडिऐंट वाले हेयर सीरम का इस्तेमाल केशों पर करना चाहिए.

ड्राई हेयर

ड्राई और फ्रिज केश वाले लोगों को ऐसे हेयर सीरम का प्रयोग करना चाहिए, जिस में रोजवुड, कैस्टर और मारूला जैसे इनग्रेडिऐंट होते हैं. ये आप के बालों को इंटैंस हाइड्रेशन प्रदान करते हैं. क्रीम बेस्ड सीरम को भी आप अपने बालों पर लगा सकते हैं. इन्हें रातभर बालों में लगा कर छोड़ देने से ड्राइनैस कम हो जाती है.

नौर्मल हेयर

नौर्मल हेयर वाले लोग किसी भी तरह के हेयर सीरम का इस्तेमाल अपने बालों पर कर सकते हैं.

कब लगाएं

हेयर सीरम का मुख्य लाभ प्रदूषण के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करना होता है. हेयर सीरम को फ्रैश, धुले हुए और गीले बालों पर लगाना चाहिए, ताकि इस की सुरक्षा परत केशों पर आ जाए.

लगाने के तरीके

अपने बालों के अंतिम छोर से शुरुआत करें और फिर बालों के बीच वाले हिस्से पर पहुंचे. स्कैल्प पर हेयर सीरम न लगाएं, क्योंकि इस से आप के बाल औयली और चिपचिपे दिखते हैं. याद रखें कि आप के बाल के अंतिम छोर को सब से ज्यादा चमक की जरूरत पड़ती है, इसलिए सीरम वहीं लगाएं. सीरम थोड़े थिक होते हैं, इसलिए इसे तुरंत बालों पर रगड़ने की बजाय अपनी हथेलियों पर 5 से 6 सैकंड तक रहने दें. इस से हेयर सीरम लिक्विफाई होगा, सौफ्ट बनेगा और आसानी से आप के बालों में ग्लाइड करेगा.

कितना अमाउंट लगाना सही

कभी भी हेयर सीरम को जरूरत से ज्यादा अपने बालों पर न लगाएं. अगर आप के बाल पतले या तैलीय हैं, तो आप को एक मटर के दाने जितने सीरम की जरूरत है. अगर आप के बाल थोड़े मोटे और ड्राई हैं, तो आप को इस से थोड़ा सा अधिक हेयर सीरम की जरूरत होती है.

मिथक और उस के पीछे की सचाई

यह माना जाता है कि पतले बालों को सीरम की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि इस से बाल फ्लैट दिखने लगते हैं. सच तो यह है कि कोई भी अपने बालों पर हेयर सीरम का प्रयोग कर सकता है. यदि आप के बाल पतले या औयली हैं, तो लाइट फौर्मूला वाले सीरम को लगाएं. यदि आप के बाल बहुत ड्राई हैं, तो ही हैवी और अल्ट्रा मोइस्चराइजिंग फौर्मूला वाले हेयर सीरम का प्रयोग करना सही होता है.

फायदे

हेयर सीरम कई तरह से आप के बालों को लाभ पहुंचाते हैं, जिन में से मुख्य हैं :

ड्राई बालों को करता है स्मूद : ड्राई बाल रफ दिखने के साथ ही बेजान भी दिखते हैं. ऐसे में एक बढ़िया हेयर सीरम आप के बालों को आवश्यक पोषण देने के साथ इसे सौफ्ट और स्मूद करता है.

केशों में लाती है चमक : बालों को हैल्दी और चमकदार बनाना सभी को पसंद होता है, ऐसे में हेयर सीरम आप के बालों में चमक लाने में आप की सहायता करता है. बालों में चमक लाने और बेजान बालों से लड़ने के लिए आप को फिनिशिंग टच के तौर पर अपने बालों को शाइन बढ़ाने वाले हेयर सीरम से पौलिश करना चाहिए.

फ्रीजि केश होते है कंट्रोल : आज की अधिकतर लड़कियां केशों की फ्रिज को ले कर बहुत परेशान रहती हैं और हेयरकट करवा लेती हैं. ऐसे में हेयर सीरम ट्राई करना सही होता है. एक बढ़िया हेयर सीरम फ्रिज वाले बालों को पोषण के साथ ग्लोइंग बना सकता है.

सुलझते है रूखे केश : रूखे केशों में हेयर सीरम की सिर्फ सौफ्ट और सिल्की बना सकती है. कुछ हद तक हेयर डैमेज की करता है मरम्मत.

जब आप हेयर स्टाइलिंग प्रोडक्टस का इस्तेमाल करते हैं या अपने बालों पर कलर लगाते हैं, तो यह अंदर से रूखी और बेजान होने लगता है, ऐसी स्थिति में अपने बालों से निकली नमी को रीस्टोर करने के लिए हेयर सीरम का प्रयोग एक आसान तरीका है.

ह्यूमिडिटी से होती है सुरक्षा : जब आप घर से बाहर कदम रखते हैं, तो कई बार बाहर का उमस भरा मौसम आप के केशों पर नकारात्मक असर डालता है, हालांकि इस में बालों का प्रकार भी अहम भूमिका निभाता है, लेकिन आप उस को नहीं बदल सकते हैं, पर मैनेज जरूर कर सकते हैं. इस के लिए हेयर सीरम एक अच्छा विकल्प माना जा सकता है.

रखें ध्यान

हेयर सीरम को आप के हेयर शौफ्ट के लिए विशेषतौर पर फौर्मूलेट किया जाता है, जड़ों के लिए नहीं. यह ध्यान रखें कि सीरम में निहित कैमिकल्स आप के केशों को नुकसान पहुंचा सकते हैं, इसलिए इसे समयसमय पर प्रयोग करना सही होता है. अगर इन के इस्तेमाल के बाद से केश टूट रहे हैं या केश अधिक गिर रहे है, तो हेयर ऐक्सपर्ट की राय लेना सही रहता है.

हेयर सीरम को अकसर लोग हेयर औयल समझने की भूल कर देते हैं, जबकि दोनों बिलकुल अलग चीजें हैं. आप को वही हेयर सीरम लेना चाहिए, जो आप के बालों के प्रकार को सूट करता हो. अगर कोई हेयर सीरम आप के स्कैल्प पर रैश का कारण बन रहा है, जिस से केश बहुत ज्यादा गिर रहे हैं, तो उस का इस्तेमाल तुरंत बंद कर देना चाहिए.

इस प्रकार हेयर सीरम का प्रयोग कर आप सौफ्ट और सिल्की केश के हकदार तभी बन सकते हैं, जब आप इस का प्रयोग सही तरीके से करें. Hair Serum

Salima Tete: हौकी ने कैसे दी सलीमा टेटे के सपनों को उड़ान

Salima Tete: सलीमा टेटे की बातचीत में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है. वे दुनिया को एक पर्यवेक्षक के तौर पर देखना पसंद करती हैं. लेकिन 23 साल की उम्र में भारतीय महिला हौकी टीम की सब से कम उम्र की कप्तान एक अलग प्रवृत्ति की ओर झाक रही हैं. इन दिनों अपनी बात रखना उन की जिम्मेदारी का हिस्सा है.

कभीकभी इस का मतलब ऐसे तर्क में दखलंदाजी करना हो सकता है जिस के खेल के मैदान से बाहर फैलने का डर हो. उन का मकसद होता है अपनी टीम की खिलाड़ियों को यह एहसास दिलाना कि उन के पास सहारा है. ‘‘अभी मैं उन को बोलती हूं, ‘तू यह कर सकती है’ क्योंकि अभी बोलना बहुत जरूरी है और जो मुझे रिस्पौंसिबिलिटी मिली है, मैं उसे पूरी तरह से अपनी तरफ से (निभाने की) कोशिश करूंगी,’’ उन्होंने मुझे बताया कि जब हम ने जुलाई में एक सुबह वीडियो कौल पर बात की थी.

बात सलीमा ने गहरी की, लेकिन उन के बोलने का अंदाज हलका था जो उन्होंने मुझे एक कोमल, मानो आत्मजागरूक हंसी के साथ बताई. उन्होंने आगे कहा, ‘‘मैं यही चाहती हूं कि मैं और बोलूं खिलाड़ियों को ताकि आत्मविश्वास आए खिलाड़ियों को भी.’’

इस से पहले कि वे बैंगलुरु स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण केंद्र में 1 महीने के सीनियर महिला राष्ट्रीय कोचिंग कैंप के लिए रवाना होतीं, वे रांची में थोड़ी देर रुक कर आराम कर रही थीं.

सलीमा हौकी को भी उतनी ही शिद्दत से खेलती हैं. मैदान के बाहर भले ही ये युवा मिडफील्डर शांत रहना पसंद करती हों, लेकिन अंदर उतरते ही उन की रफ्तार बिजली की तरह चमकती है. उन की रफ्तार इतनी तेज है कि कथित तौर पर भारत के पूर्व हौकी कोच, डच श्योर्ड मारिन ने उन्हें ‘फेरारी’ उपनाम दिया था.

उल्लेखनीय यात्रा

महज एक दशक से कुछ अधिक के कैरियर में सलीमा ने एक उल्लेखनीय यात्रा तय की है. वे 2014 में झारखंड की सबजूनियर टीम में शामिल हुई थीं, जिस में उन का राज्य एक राष्ट्रीय महिला टूरनामैंट में उपविजेता रहा. 2016 में वे अपनी किशोरावस्था से बाहर निकली ही थीं कि वे थाईलैंड में अंडर-18 एशिया कप के लिए जूनियर भारतीय महिला टीम की उपकप्तान बनीं और टीम को कांस्य पदक दिलाया. 2 साल बाद सलीमा ने उसी टीम की कप्तानी करते हुए अर्जेंटीना में 2018 युवा ओलिंपिक में रजत पदक जीता.

जैसेजैसे सलीमा ने सीनियर टीम में कदम रखा, उन के उभार की गति और तेज हो गई. 2020 के टोक्यो ओलिंपिक्स में जो कोविड-19 महामारी के चलते 2021 में आयोजित किया- भारतीय महिला हौकी टीम एक शानदार जीत के करीब तक पहुंची थी. हालांकि टीम चौथे स्थान पर रही और पदक से चूक गई, उन्होंने एक ऐतिहासिक रचना रची.

टीम के खिलाड़ियों जिन में से कई वंचित समुदायों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आती हैं, ने इतनी मजबूती से संघर्ष किया कि सामने खड़ी कई बाधाओं को झाका दिया. वे कहती हैं, ‘‘हमेशा आगे बढ़ रही थीं, यह भारतीय महिला ऐथलीटों की सब से बेहतर टीम थी जो हम ने किसी भी खेल के मैदान पर देखी है,’’ वरिष्ठ खेल पत्रकार शारदा उगरा ने टोक्यो में टीम के प्रदर्शन के बारे में लिखा.

उन्होंने आगे कहा, ‘‘हर बार जब वे मैदान छोड़ती थीं, चाहे जीत में हों या हार में, चाहे हंस रही हों या निराश, वे ऐसे दिखती थीं जैसे उन्होंने अपनी पूरी ताकत लगा दी हो.’’

सलीमा उन खिलाड़ियों में से थीं जिन को ओलिंपिक्स के चलते प्रसिद्धता मिली. 2024 तक जब उन्हें टीम की कप्तानी सौंपी गई, वे ओलिंपिक्स, राष्ट्रमंडल खेल, विश्व कप और एशियाई खेल जैसे टूरनामैंट और 100 से अधिक अंतर्राष्ट्रीय मैच खेल चुकी थीं.

2020 टोक्यो ओलिंपिक्स में अर्जेंटीना और इंडिया और इंडिया के सेमीफाइनल मैच के दौरान सलीमा पैनल्टी कौर्नर डिफेंड करने की तैयारी में.                                                                                Image : Alexander Hassenstein/Getty Images

कई सम्मान भी मिल चुके

उन्हें कई व्यक्तिगत सम्मान भी मिल चुके हैं- 2021 में हौकी इंडिया असुंता लाकड़ा अपकमिंग प्लेयर औफ द ईयर अवार्ड, 2023 में बलबीर सिंह सीनियर प्लेयर औफ द ईयर अवार्ड और हाल ही में भारत का सर्वोच्च खेल सम्मान अर्जुन पुरस्कार.

पिछले कई साक्षात्कारों में सलीमा अपनी प्रशंसा को अकसर यह कह कर टाल देती रही हैं कि कोई भी सम्मान पूरी टीम का हक है. लेकिन असुंता लाकड़ा पुरस्कार मिलना उन के लिए गर्व की बात है, उन्होंने मुझे बताया. छोटी उम्र में सलीमा, असुंता को अपना आदर्श मानती थीं. झारखंड की एक प्रतिष्ठित मिडफील्डर और 2000 में राष्ट्रीय महिला टीम की कप्तान.

‘‘वे हमारे होस्टल आती थीं. लंबीचौड़ी थीं और उन की ऊंचाई भी इतनी अच्छी थी. शरीर भी इतना फिट,’’ सलीमा ने याद किया, ‘‘उन को देख कर मुझे भी वैसा ही बनना था. मैं जो सोचती थी तब, अभी मैं वह कर रही हूं.’’ सब कुछ आसान नहीं रहा है.

सलीमा और उन की टीम गंभीर झाटकों से जूझा रही हैं. वे पिछले साल पैरिस ओलिंपिक्स के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाईं और इस साल उन्हें एफआईएच प्रो लीग अंतर्राष्ट्रीय हौकी महासंघ द्वारा आयोजित एक वार्षिक प्रतियोगिता में लगातार हार का सामना करना पड़ा. टीम की कप्तान होने के नाते सलीमा को अपेक्षा और जवाबदेही, दोनों का भार उठाना होगा. उन्होंने एक आशावादी दृष्टिकोण पेश किया.

‘‘हम टीम हैं, हारजीत तो चलती रहेगी, हम अच्छा खेल कर हार गए तो कोई बात नहीं, हार के साथ हम सीख सकते हैं कि हम क्या अच्छा कर सकते हैं,’’ उन्होंने कहा.

महिला हौकी टीम की ट्रेनिंग, फिटनैस स्तर और तकनीकी कौशल पर लगातार कड़ी नजर रखी जा रही है. लेकिन इस के साथ ही उन्होंने एक ऐसे खेल पर फिर से कब्जा कर लिया है, जिस पर कभी पुरुषों का दबदबा माना जाता था. महिला टीम ने इसे अपनी सफलता का प्रतीक बना दिया है, जिस से भविष्य में और भी बहुत कुछ हासिल करने का वादा है.

कामयाबी का सफर

सलीमा की कामयाबी का सफर उन की सहनशक्ति से परिभाषित होता है. उस लगन से, जिस से उन्होंने अपने आसपास खेले जाने वाले खेल को सीखना शुरू किया. उन सालों से जो उन्होंने अपने हुनर को निखारने में लगाए और उस शांतिपूर्ण विरोध से, जिस से उन्होंने कैरियर की शुरुआत में मिली संस्थागत अस्वीकृति का सामना किया. अब जब वे अपनी कुछ सब से मुश्किल पेशेवर चुनौतियों का सामना कर रही हैं, तो शायद यही सहनशक्ति उन्हें इस से पार दिलाएगी.

सलीमा ने कहा, ‘‘मैं ने यही एक चीज सीखी है कि कुछ भी हो जाए, हमें गिवअप नहीं करना है. अगर आप गिवअप नहीं करोगे तो आप लाइफ में कुछ भी कर सकते हो.’’

भारत में हौकी की शुरुआत औपनिवेशिक शासनकाल के दौरान लगभग 1850 के दशक में हुई. उस के बाद देश ने इस खेल को पूरी तरह से अपना बना लिया और बहुत जल्दी खुद को एक वैश्विक शक्ति के रूप में भी स्थापित कर लिया.

खेलों के उतारचढ़ाव के बावजूद भारत में इस की लोकप्रियता बनी हुई है. हौकी इंडिया के आंकड़ों के अनुसार, जो पुरुष और महिला हौकी से जुड़ी सभी राष्ट्रीय गतिविधियों को देखता है- 2024-2025 सीजन में हौकी इंडिया लीग में महिला वर्ग के 13 मैचों को 1.51 करोड़ दर्शक और पुरुषों के टूरनामैंट के 44 मैचों को 3.29 करोड़ दर्शकों ने देखा.

सलीमा के गृह राज्य झारखंड में हौकी की लोकप्रियता को केवल दर्शकों की संख्या से नहीं नापा जा सकता है. यह प्यार पीढ़ी दर पीढ़ी संचारित होता रहा है. सिमडेगा जिले के बरकीछापर गांव में पलीबढ़ी सलीमा का खेल की तरफ रुझान लगभग तय था.

यह जिला अपने कई खिलाड़ियों के कारण अकसर ‘हौकी का पालना’ कहा जाता है. यहां से निकले कुछ सब से प्रसिद्ध नामों में असुंता लाकड़ा और ओलिंपियन्स माइकल किंडो और सिल्वानुस डुंगडुंग प्रमुख हैं. हौकी सलीमा के जीवन में तब से शामिल है, जब उन्होंने हौकी स्टिक को छुआ भी नहीं था.

उन के पिता सुलक्षण टेटे हौकी खेलते थे. उन के दादा भी और उन की माता के पिता भी. उन के जानने वाले ज्यादातर लोग भी हौकी ही खेलते थे. बचपन में वे सुलक्षण के साथ जाती थीं, जो एक धान (पैडी) किसान थे ताकि वे उन्हें स्थानीय प्रतियोगिताओं में भाग लेते देख सकें. उन के आसपास के माहौल में हौकी हर जगह थी.

छोटी और स्थाई खुशी

बरकीछापर के कई और परिवारों की तरह सलीमा का परिवार भी एक आदिवासी समुदाय से है, जो अपनी आजीविका के लिए खेती पर निर्भर है. घर की आर्थिक स्थिति खराब थी, लेकिन हौकी छोटी और स्थाई खुशी ले कर आई.

‘‘मैं फादर के साथ साइकिल पर पीछे बैठ कर जाती थी, तो अच्छा लगता था उन के साथ टाइम बिताना, मैच देखना उन का,’’ सलीमा ने कहा. यह आकर्षण जल्द ही जिज्ञासा में तबदील हो गया. सलीमा भी खेलना चाहती थीं. उन की 5 बहनें और 1 भाई पहले से ही इस खेल से परिचित थे. सलीमा के पिता ने उन के लिए बांस की एक स्टिक बनाई. वही उन के पहले कोच थे.

सलीमा कहती हैं कि गांव के ज्यादातर लोग हौकी स्टिक नहीं खरीद पाते थे. वजह यह थी कि उन की कीमत आमतौर पर 2 हजार से 3 हजार रुपए के बीच होती है. बांस से बनी स्टिक अभी भी एक बढि़या विकल्प है. सलीमा ने मुझे बताया, ‘‘कोई बच्चा अगर जिद कर रहा है कि हौकी स्टिक चाहिए तो उसे को बांस की हौकी स्टिक बना कर दे देते हैं और वह इतनी अच्छी बनती है कि उसे छोड़ने का मन नहीं करता.’’

युवावस्था में सलीमा 2020 में नैशनल वूमंस टीम की कप्तान रह चुकीं असुंता लाकड़ा को अपना आइडल मानती थीं.                                          Image : Mohd Zakir/ Getty Image

सलीमा अभी भी मौका मिलने पर अपने पिता के मैच देखने जाती हैं. यह उन के अपने बचपन की यादों को दोबारा देखने जैसा है. सलीमा के पिता उन्हें समयसमय पर उन के मैचों के बारे में सलाह भी देते हैं.

सलीमा ने बताया, ‘‘अभी भी मैं जब खेलती हूं और कुछ मिस्टेक होता है तो वह बताते हैं कि इस पोजीशन में तू यह कर सकती है.’’ सलीमा को याद है कि कभी उन के पिता भी हौकी को पेशेवर रूप से खेलना चाहते थे लेकिन उस टाइम की सिचुएशन कुछ अलग थी.

सलीमा की मां सुभानी जो एक गृहिणी हैं, अपने सभी बच्चों को जब भी समय मिलता, हौकी खेलने के लिए प्रोत्साहित करती थीं. वे कभीकभी अपने बच्चों को खेलते हुए देखने भी आती थीं. सलीमा को याद है कि जब वे ऐसा करती थीं तो उन का चेहरा खिल उठता था.

सलीमा ने बताया, ‘‘अब भी मैं घर पर जाती हूं तो उन के फेस पर एक अलग हैप्पीनैस रहती है तो मुझे बहुत अच्छा लगता है कि पहले और अब में बहुत ज्यादा डिफरैंस है हमारी लाइफ में.’’

समय के साथ सलीमा ने स्थानीय टूरनामैंटों में भाग लेना शुरू कर दिया, जैसेकि लोकप्रिय ‘खस्सी’ प्रतियोगिताएं, जिन का नाम ‘बकरी’ के लिए ओडिया शब्द पर रखा गया है. इन प्रतियोगिताओं में विजेताओं को पुरस्कार के रूप में बकरी या मुरगियों जैसे पशुधन मिलते थे.

खेल के प्रति जनून

खेल के प्रति सलीमा का जनून स्कूल तक उन के साथ रहा. मैदान पर कई घंटे बिताने के बाद वे कक्षा में अकसर ऊंघने लगती थीं और अपने शिक्षकों से खूब डांट खाती थीं. वे हंसते हुए कहती हैं, ‘‘वैसे तो पढ़ने में इंटरैस्ट नहीं था मेरा, मैं तो यही चाहती थी कि मैं (हौकी) खेलूंगी. मैं ने ठान लिया कि मैं ने खेलना है.’’

उन के मातापिता ने हमेशा उन का साथ दिया, चाहे परिवार किसी भी समस्या से क्यों न गुजर रहा हो. उन की बड़ी बहन जो मुंबई में काम करती थीं, जरूरत पड़ने पर पैसों से मदद करती थीं. सलीमा ने हौकी के जरीए इस भरोसे को चुकाने का दृढ़ संकल्प कर लिया था.

सलीमा की प्रतिभा पर सब से पहले सिमडेगा हौकी ऐसोसिएशन के वर्तमान अध्यक्ष और हौकी झारखंड के उपाध्यक्ष मनोज कोनबेगी ने ध्यान दिया. साल 2011 में वे एक जिला स्तरीय प्रतियोगिता में खेल रही थीं, जिसे आयोजित करने में मनोज ने मदद की थी. उस प्रतियोगिता में तब 10 साल की सलीमा ने सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का पुरस्कार जीता.

पिछले साक्षात्कारों में मनोज ने याद किया कि उन्होंने सलीमा के पिता से आग्रह किया था कि वे उसे सिमडेगा शहर में स्थित हौकी आवासीय केंद्र भेजें. यह उभरते हौकी खिलाड़ियों के लिए एक राज्य द्वारा संचालित आवासीय सुविधा थी जो बरकीछापर से लगभग 40 किलोमीटर दूर थी. अंतत: 2013 में सुलक्षण सहमत हो गए. लेकिन आवासीय केंद्र में सलीमा को अप्रत्याशित रूप से कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ा. Salima Tete (3)

शुरुआत में तो उन्हें अकादमी में आधिकारिक तौर पर प्रवेश ही नहीं मिला, हालांकि वह वहां प्रशिक्षण ले पा रही थीं. इस का मतलब था कि सलीमा आवास या भोजन जैसी सुविधा का लाभ नहीं उठा सकती थीं जो वहां अभ्यास करने वालों को मिलती थी. उन्होंने याद करते हुए बताया कि वे डे स्कौलर के रूप में अभ्यास करती थीं और घर से दालचावल लाया करती थीं.

सलीमा ने बताया, ‘‘मुझे भी नहीं पता था कि (मुझे) क्यों नहीं रखा जा रहा था लेकिन मैं यही सोचती थी कि मैं अपना (खाना) ले कर जाऊंगी और अपनी प्रैक्टिस करूंगी.’’

एक अच्छी बात यह थी कि उन्हें अकेलापन महसूस नहीं हुआ. रजनी सोरेंग और संगीता कुमारी जैसी खिलाड़ियों ने, जो आगे चल कर राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बनीं, उन का हौसला बनाए रखा. सलीमा ने याद किया कि वे उन से कहती थीं कि और जोर लगाइए और अच्छा खेलिए तो कैसे नहीं रखेंगे आप को.

उन्हें घर की याद आती थी. उन के पिता हर सप्ताह के आखिर में उन से मिलने आते थे. जब वे चले जाते तो वे फूटफूट कर खूब रोती थीं.

‘‘मुझे लगता है कि अगर आप इतने ज्यादा मुश्किल हालात को संभाल सकते हो, तो जीवन में कुछ भी हासिल कर सकते हो,’’ उन्होंने बताया. सलीमा को अंतत: प्रवेश मिल गया. वे अपने गांव से केंद्र में अकेली थीं. उन्हें कोच प्रतिमा बरवा मंस एक गुरु मिलीं. वे एक पूर्व हौकी खिलाड़ी थीं जिन्हें पैर में चोट लगने के बाद खेल से संन्यास लेना पड़ा.

खिलाड़ियों के साथ मजबूत रिश्ता

सलीमा ने याद किया कि प्रतिमा एक सख्त कोच थीं. वे जो मानक उम्मीद करती थीं, उन में बहुत स्टिक थीं और अकसर दंड देती थीं. लेकिन खिलाड़ियों के साथ उन का मजबूत रिश्ता भी था. 40वें दशक के मध्य में चल रहीं प्रतिमा का इस साल जून में मस्तिष्क रक्तस्राव (ब्रेन हैमरेज) के कारण निधन हो गया.

सलीमा कहती हैं, ‘‘अफसोस होता है कि इतनी अच्छी कोच थीं और उन की मृत्यु हो गई. लेकिन कुछ नहीं कर सकते. जिस को जाना है उसे रोक नहीं सकते.’’

कोच की विरासत उन महिलाओं में जीवित है, जिन पर उन्होंने प्रभाव डाला. इंडियन ऐक्सप्रैस की एक खबर में बताया गया कि प्रतिमा ने झारखंड में कई आदिवासी लड़कियों को प्रशिक्षित किया और सलीमा टेटे, संगीता कुमारी और ब्यूटी डुंगडुंग जैसी ओलिंपियनों को आकार देने में मदद की.

ट्रेनिंग सैंटर में युवा खिलाड़ी दिन की शुरुआत भोर होते ही कर देती थीं. सुबह 4.30 बजे मैदान पर पहुंच जाती थीं. वे 7.30 बजे तक स्कूल के लिए दौड़ती थीं और शाम को फिर से अभ्यास करती थीं. सलीमा हंसते हुए कहती हैं कि ग्राउंड से जब स्कूल आते थे तो बहुत नींद आती थी.

खेलने के साथ पढ़ना भी जरूरी

मगर प्रतिमा स्पष्ट थीं कि हौकी पढ़ाई में ढील देने का बहाना नहीं हो सकती थी.

सलीमा ने कहा, ‘‘उस समय हम लोग इतना ज्यादा सीरियस नहीं होते थे पढ़ाई के लिए. बाद में समझा आया कि खेलने के साथ पढ़ना भी बहुत जरूरी है.’’

हौकी की कठिन प्रैक्टिस और शैक्षणिक दबाव के बीच होस्टल की युवा लड़कियों ने एक गहरी दोस्ती बनाई. सलीमा ने याद किया, ‘‘हम बहुत ऐंजौय करते थे, हमारी होस्टल की बौंडिंग बहुत अच्छी थी.

सभी एकसाथ कार्यक्रमों में भाग लेती थीं, एकदूसरे को सहारा देती थीं और अपने खेल का विश्लेषण करती थीं.’’ जल्द ही सलीमा की छोटी बहन महिमा भी सैंटर में शामिल हो गईं. केंद्र में दाखिला लेने के कुछ ही महीनों के भीतर सलीमा का चयन स्कूल गेम्स फैडरेशन औफ इंडिया की राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए झारखंड टीम में हो गया.

एक दशक के भीतर सलीमा ओलिंपिक्स के लिए हौकी इंडिया की क्वालीफाइंग टीम में शामिल होने वाली झारखंड की दूसरी महिला बन गईं. तब से झारखंड से 4 और खिलाड़ी राष्ट्रीय महिला टीम में शामिल हुई हैं, जिन में से एक सलीमा की बहन महिमा भी हैं. ये सभी खिलाड़ी सिमडेगा के आदिवासी समुदायों से आती हैं.

खेल लेखक विनायक मोहनरंगन ने इंडियन ऐक्सप्रैस में लिखा, ‘‘झारखंड में महिला हौकी सफलता की एक कहानी है, जो ऐथलीटों, उन के परिवारों और मेहनती कोचों की प्रतिभा के माध्यम से हासिल की गई है. हौकी को राज्य के कई दूरदराज के गांवों के लिए आजीविका का स्रोत माना जाता है और इन कहानियों से उभरने वाले कुछ सामान्य पहलू महिलाओं के खेल अपनाने को ले कर बनी कई धारणाओं को तोड़ते हैं.’’

जब सलीमा घरेलू से अंतर्राष्ट्रीय सर्किट में आईं, उन्हें अपने खेल में कमियों का सामना करना पड़ा. सलीमा ने कहा, ‘‘घरेलू मैचों के मुकाबले अंतर्राष्ट्रीय खेलना मुश्किल था. कारण कि घरेलू मैच इतना ज्यादा स्ट्रक्चर से नहीं खिलाया जाता है लेकिन अंतर्राष्ट्रीय में स्ट्रक्चर के साथ खेलते हैं.’’

सलीमा को अपने परिवार की मुश्किलों से जूझाने के साहस से हिम्मत मिलती है, खासकर इस बात से कि उन्होंने कितनी मेहनत की ताकि सलीमा हौकी की ट्रेनिंग ले सके. ‘‘अगर कोई चीज मातापिता के पास नहीं होती थी तो वे किसी और से ला कर मुझे देते थे. होती है डिफिकल्ट सिचुएशन लाइफ में, लेकिन हम उस सिचुएशन को कैसे हैंडल कर सकते हैं, यह चीज लाइफ में बहुत जरूरी है,’’ सलीमा ने बताया.

इस दृढ़ता के पीछे उन के गांव में चल रही चुनौतियों की भी बड़ी भूमिका है, जहां बुनियादी ढांचा एक सतत परेशानी बना हुआ है. सलीमा ने मुझे बताया, ‘‘पहले गांव में लाइट नहीं रहती थी क्योंकि बारिश होती थी तो हवा चलती थी और लाइट के तार छूट जाते थे.

गांव बहुत अंदर की साइड है तो पहले कच्ची सड़क थी. बहुत ज्यादा कीचड़ हो जाता था. गांव जाने में दिक्कत होती थी. अब भी फोन नैटवर्क अविश्वसनीय है. जब घर वापस आती हूं तो अकसर अपने मोबाइल पर बात नहीं कर पाती हूं.’’

अपनी तरह की पहली घटना

2020 के टोक्यो ओलिंपिक्स के दौरान जब दुनिया भारतीय महिला हौकी टीम के असाधारण प्रदर्शन को देख रही थी, तब बरकीछापर में कोई मैच नहीं देख पाया.
कारण किसी एक के भी घर में टैलीविजन नहीं था. सलीमा के परिवार द्वारा सार्वजनिक रूप से अपनी निराशा व्यक्त करने के बाद झारखंड के अधिकारियों ने हस्तक्षेप किया और सेमीफाइनल से ठीक पहले उन के घर में एक स्मार्ट टीवी लगवाया गया.

यह गांव के लिए अपनी तरह की पहली घटना थी. जब भारत सेमीफाइनल मैच अर्जेंटीना से हार गया, जिस से ओलिंपिक पदक के लिए उस की दावेदारी समाप्त हो गई तो पूरा गांव बिखर सा गया.

सलीमा ने याद किया, ‘‘गांव वाले रोए भी थे. वह समय बहुत दुखद समय था क्योंकि हम जीततेजीतते हार गए थे.’’ सलीमा की सब से कठिन चुनौती पिछले साल आई जब टीम 2024 पैरिस ओलिंपिक क्वालीफिकेशन के लिए जगह न बना पाने में अपनी विफलता से जूझा रही थी. हरेंद्र सिंह को दूसरे कार्यकाल के लिए मुख्य कोच के रूप में नियुक्त किया गया. यह बदलाव का समय था.

तभी सलीमा को कप्तान नियुक्त किया गया. इस बदलाव के बारे में उन्होंने कहा कि सच बताऊं तो मुझे डर लग रहा था. हालांकि सलीमा ने पहले जूनियर महिला हौकी टीम का नेतृत्व किया था, लेकिन सीनियर टीम की कप्तानी बिलकुल नया अनुभव था. वे अपनी कम उम्र के प्रति सचेत थीं.

उन्होंने कहा, ‘‘मैं अंदर से बोल रही थी कि मुझे नहीं चाहिए. यह होता है अंदर से कि मुझे अभी खेलना है, कप्तानी तो बाद में भी मिल जाएगी. लेकिन अभी जो मुझे मिला है तो मैं ऐक्सैप्ट करती हूं और अभी जो आगे आएगा उस को भी मैं ऐक्सैप्ट कर के मैं अच्छा कप्तानी का रोल निभाऊंगी.’’

बदलाव की लहर

जैसे ही सलीमा ने अपने नए कर्तव्यों को संभाला बदलाव की लहर भी चल पड़ी. नेतृत्व ने महसूस किया कि कई खिलाड़ी चोटों से जूझा रहे हैं, और उन्होंने उन के फिटनैस स्तर को बेहतर बनाने पर ध्यान केंद्रित किया. सलीमा कहती हैं, ‘‘हौकी में भागना बहुत जरूरी है.

अगर आप के पास फिटनैस है तो आराम से 10 मिनट खेल सकते हो. हम अभी 3-3 मिनट में चेंज करते हैं, लेकिन अगर आप के पास फिटनैस है तो 6 मिनट आराम से खेल सकते हैं. अभी हमें होमवर्क मिला है कि घर में भी वर्कआउट करना है.

अब महिलाओं को हर सत्र के दौरान न्यूनतम 8 किलोमीटर दौड़ना होता है. यदि वे अभ्यास के दौरान आवश्यक दूरी पूरी नहीं करती हैं तो उन से बाद में उसे पूरा करने की उम्मीद की जाती है.’’ कोच हरेंद्र सिंह पिछले साल टीम को कन्नूर, केरल में भारतीय नौसेना अकादमी ले गए, जहां खिलाड़ियों को सेना स्टाइल के फिटनैस सत्रों का अभ्यास कराया गया.

धीमी गति की दौड़ से ले कर नाव खींचने जैसे अभ्यास तक. हरेंद्र ने द इंडियन ऐक्सप्रैस को बताया, ‘‘विचार यह था कि न्यूनतम सुविधाओं में भी उन्हें अच्छा प्रदर्शन करने का दृढ़ संकल्प दिखाना होगा.’’

2022 कौमनवेल्थ गेम्स में न्यूजीलैंड के खिलाफ पहला गोल करने के बाद टीम के साथ सैलिब्रेट करती सलीमा.

एक बड़ा झटका

इन रणनीतिक बदलावों के बावजूद टीम को इस साल जून में एक बड़ा झाटका लगा, जब 9 प्रतिस्पर्धी टीमों में सब से निचले स्थान पर रहने के बाद उसे एफआईएच प्रो लीग से बाहर कर दिया गया.

सलीमा ने कहा, ‘‘सच बताऊं हारने के बाद एकदूसरे की शक्ल भी देखने का मन नहीं करता. कोई भी खिलाड़ी हारना नहीं चाहता. टीम ने बहुत ऐफर्ट किया पर स्कोर नहीं हो पाया.’’

टीम अपनी हार की समीक्षा कर रही थी. ‘‘पूछना बहुत जरूरी है कि हम क्यों हारे,’’ सलीमा ने कहा. भारत में किसी खेल में हार का खमियाजा खिलाड़ियों को भारी कीमत चुका कर देना पड़ता है.

यह खासकर हाशिए पर मौजूद खिलाड़ियों के खिलाफ नफरत भरा विरोध भी भड़का सकता है. जब भारत 2020 ओलिंपिक में अर्जेंटीना से सेमीफाइनल हार गया तो यह उन पूर्वाग्रहों की एक कड़वी याद दिलाता है जिन से खिलाड़ियों को जूझाना पड़ता है.

उत्पीड़ना का सामना

उस साल वंदना कटारिया ने ओलिंपिक में हैट्रिक लगाने वाली पहली भारतीय महिला बन कर इतिहास रचा. लेकिन सेमीफाइनल मैच के बाद उन के गृहनगर में उन के परिवार को जातिवादी उत्पीड़न का सामना करना पड़ा.

खबरों के मुताबिक, तथाकथित उच्च जाति के 2 लोगों ने उन के घर के बाहर पटाखे फोड़े, उन्हें गालियां दीं और कहा कि टीम इसलिए हारी क्योंकि उस में ‘बहुत ज्यादा दलित खिलाड़ी’ थे.

तत्कालीन टीम की कप्तान रानी रामपाल ने पत्रकारों से कहा, ‘‘यह कितनी बुरी बात है, हम इस में अपनी जान और आत्मा लगा देते हैं, अपने देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए इतना संघर्ष और त्याग करते हैं और फिर हम देखते हैं कि क्या हो रहा है.

वंदना के परिवार के साथ जो हुआ मैं लोगों से बस इतना कहना चाहती हूं कि कृपया यह धार्मिक विभाजन और जातिवाद बंद करें.’’ रानी ने बताया कि टीम के खिलाड़ी विभिन्न क्षेत्रों और धर्मों से आते थे. लेकिन यहां हम भारत के लिए काम करते हैं. खेलने के अलग दृष्टिकोण, अलग शैली और ताकत की बहुलता टीम के सब से बड़े फायदों में से एक है.

लेकिन इस का यह भी मतलब है कि कप्तान को कई आवाजों को समझाना और एकजुट करना होता है. सलीमा ने कहा, ‘‘सब की बात सुनना एक चैलेंज है पर हो जाता है. सब की अलगअलग सोच है और सब का खेलने का तरीका भी अलग है.

सारे अलगअलग राज्यों से भी हैं और अलगअलग लोग हैं. सब की संस्कृति है. मगर जब हम ग्राउंड में आते हैं तो एकसाथ हो जाते हैं.’’ सलीमा ने बताया कि खिलाड़ियों ने एकदूसरे की शैलियों की गहरी समझा विकसित कर ली है.

उन्होंने मुझे बताया, ‘‘सब को पता है कि सलीमा के पास स्पीड है तो जब मेरे पास बौल होता है उन को पता है मेरे पास नहीं आने के लिए, मैं पास करूंगी.’’ हौकी की एक शैली सलीमा ने आगे कहा कि संगीता कुमारी जो झारखंड से ही हैं, अपनी प्रभावी डाजिंग के लिए जानी जाती हैं.

यह हौकी की एक शैली है

जिस का उपयोग डिफैंडरों को मात देने और गेंद पर कब्जा बनाए रखने के लिए किया जाता है. साथ ही, सलीमा ने कहा कि हरियाणा की खिलाड़ी उदिता दूहन किसी भी तरह की हिट को टैकल कर सकती हैं.

अभी से सलीमा का ध्यान आगे के रास्ते पर है. टीम महिला एशिया कप की तैयारी कर रही है, जो सितंबर की शुरुआत में चीन में होने वाला है. इस से आगे का कुछ भी बहुत दूर लगता है. हालांकि उन के परिवार ने उन पर कोई उम्मीदें नहीं थोपी हैं.

वे अंतत: शादी करना और परिवार शुरू करना चाहेंगी. उन्होंने मुझे बताया, ‘‘हमारे गांव में शादी का प्रेशर नहीं होता.’’

सलीमा का गांव और पैतृक घर उन के लिए सुकून की जगह बने हुए हैं. यहीं उन्हें शांति मिलती है जो उन्हें जमीन से जोड़े रखती है. धान के खेतों की सरसराहट के बीच उन के छोटे भतीजेभतीजियों की खेलते समय खिलखिलाहट में और अपनी बहन और पिता के साथ एक नए खुले जिम में समय बिताने में सुकून मिलता है. गांव में जौब करने वाले बहुत कम हैं पर यहां सब के खेत हैं. धान के खेत हैं, सब्जी है. जब मैं घर जाती हूं तो जंगलखेत देख कर अच्छा लगता है.

इन जड़ों के बिना सलीमा की यात्रा की कल्पना करना मुश्किल है. आखिर उन के खेल को ऊपर उठाने में उन के पूरे गांव का सहयोग था.  Salima Tete

Makeup Tips: वॉटर पार्क में परफेक्ट मेकअप, रखेगा खूबसूरत और फ्रेश

Makeup Tips: गरमियों के मौसम में वाटर पार्क जाना सब से मजेदार अनुभव होता है. पानी की मस्ती, धूप और दोस्तों के साथ बिताए पल हर किसी को यादगार लगते हैं. लेकिन ऐसे में लड़कियों के मन में एक सवाल अकसर आता है कि पानी और धूप में मेकअप कैसे टिकेगा?

लेकिन अब आप को टैंशन लेने की जरूरत नहीं है क्योंकि अगर आप सही तरीके से मेकअप करें तो पूरे दिन ताजगी और खूबसूरती आप के चेहरे पर बनी रहेगी.

क्यों जरूरी है वाटर पार्क मेकअप

वाटर पार्क में अकसर पानी, धूप और क्लोरीन की वजह से चेहरे की रंगत फीकी पड़ जाती है. इसलिए वहां परफैक्ट मेकअप कर के जाना बेहद जरूरी है.

ध्यान दें

  • पानी और धूप से चेहरा फीका पड़ सकता है.
  • लंबे समय तक बाहर रहने से स्किन टैन हो सकती है.
  • सही प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल आप को फ्रैश और ग्लोइंग लुक देता है.

आप के लिए ये मेकअप टिप्स बङे काम के साबित होंगे :

सनस्क्रीन है सब से जरूरी

  • एसपीएफ 50 वाला वाटरप्रूफ सनस्क्रीन इस्तेमाल करें.
  • हर 2-3 घंटे में दोबारा लगाएं.

बेस रखें हलका

* फाउंडेशन से बचें.

* टिंटेड सनस्क्रीन या बीबी क्रीम लगाएं. इस से चेहरा नैचुरल और स्मूद दिखेगा.

आंखों के लिए वाटरप्रूफ प्रोडक्ट्स

  • वाटरप्रूफ काजल और मसकारा लगाएं.
  • आईशैडो की जगह हलका न्यूड टोन क्रीम आईशैडो चुनें.

होंठों को दें नैचुरल रंगत

* एसपीएफ वाला टिंटेड लिप बाम लगाएं.

* वाटरप्रूफ लिक्विड टिंट यूज करें जो होंठ और गाल दोनों पर लगाया जा सकता है.

फ्रैश लुक के लिए टिंट का जादू

* गालों पर क्रीम या लिक्विड टिंट लगाएं. यह पानी में भी आसानी से नहीं उतरता और नैचुरल ब्लश देता है.

मेकअप सेट करें

* वाटरप्रूफ सेटिंग स्प्रे से मेकअप को लौक कर लें. इस से धूप और पानी दोनों से सुरक्षा मिलेगी.

छोटा सा मेकअप किट वाटर पार्क के लिए

* एसपीफ 50 वाटरप्रूफ सनस्क्रीन.

* बीबी क्रीम/ टिंटेड सनस्क्रीन.

* वाटरप्रूफ काजल और मसकारा.

* लिप चीक टिंट.

* टिंटेड लिप बाम.

* कौंपैक्ट पाउडर.

वाटर पार्क में मजे के साथसाथ अगर मेकअप प्लानिंग करें तो पूरे दिन खूबसूरत और फ्रेश दिख सकती हैं. बस, ध्यान रखें कि मेकअप हलका, वाटरप्रूफ और स्किन फ्रैंडली हो. Makeup Tips

फिल्म ‘मन्नू क्या करेगा’ से ललित पंडित का डैब्यू, लेकर आए ‘Hamnava’ ट्रैक

Hamnava Song: एक समय की मशहूर जोड़ी संगीतकार जतिन ललित ने कई सारे हिट गाने दिए थे- ‘कुछकुछ होता है…’ ‘चांद सिफारिश…’ ‘तुझे देखा तो ये जाना सनम…’ वगैरह. लेकिन फिर किन्हीं कारणवश यस जोड़ी टूट गई, जिस के बाद ललित पंडित ने 2010 में फिल्म ‘दबंग’ के लिए संगीत दिया जो सुपरहिट रहा.

बाद में कुछ और फिल्मों में संगीत देने के बाद ललित पंडित गायब हो गए. लेकिन अब काफी अरसे बाद संगीतकार ललित पंडित फिल्म ‘मन्नू क्या करेगा’ से अपनी संगीतमय यात्रा फिर से शुरू कर रहे हैं.

म्यूजिकल जर्नी

ललित पंडित अब एक बार फिर  रोमांटिक म्यूजिकल फिल्म ‘मन्नु क्या करेगा’ के लिए रोमांटिक ट्रैक ‘हमनवा’ ले कर आए हैं.

फिलहाल, इस फिल्म की  फ्रैश और दिलकश जोड़ी व्योम और साची बिंद्रा का एक टीजर रिलीज हुआ है. निर्माता शरद मेहरा और क्यूरियस आइज सिनेमा ने फिल्म की संगीतमय यात्रा की शुरुआत करते हुए सब से पहले ‘हमनवा’ को रिलीज किया है. इस गीत को ललित पंडित ने कंपोज किया है.

यह तो वक्त बताएगा

अपनी सदाबहार धुनों के लिए मशहूर इस संगीतकार ने एक बार फिर अपने जादू से इसे संवार दिया है.

नवोदित ऐक्टर व्योम और साची बिंद्रा की मोहक कैमिस्ट्री इस फिल्म में नजर आएगी. दोनों की खूबसूरत औनस्क्रीन मौजूदगी इस गीत को जीवंत बना देती है.

दून की हरीभरी वादियों और दिलकश नजारों के बीच फिल्माए गए ‘हमनवा’ के बोल और धुन दोनों ही दिल को गहराई से छू जाते हैं.

फिल्म में विनय पाठक, कुमुद मिश्रा और चारू शंकर जैसे सशक्त कलाकार भी नजर आएंगे. गौरतलब है कि फिल्म ‘मन्नु क्या करेगा’ 12 सितंबर, 2025 को सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही है. फिल्म और फिल्म का संगीत दर्शकों को कितना लुभा पाएंगे, यह तो वक्त ही बताएगा. Hamnava Song

Hindi Family Story: सारा जहां अपना- मयंक ने अंजलि को कैसे समझाया

Hindi Family Story: मयंक बेचैनी से कमरे में चहल- कदमी कर रहा था. रात के 10 बज चुके थे. वह सोने जा रहा था कि दीप के स्कूल से आए प्रधानाचार्य के फोन ने उसे परेशान कर दिया. प्रधानाचार्य ने कहा था कि दीप बीमार है और आप को याद कर रहा है.

‘‘उसे हुआ क्या है?’’ घबरा कर मयंक ने पूछा.

‘‘वायरल फीवर है.’’

‘‘कब से?’’

‘‘सुस्त तो वह कल शाम से ही था, पर फीवर आज सुबह हुआ है,’’ प्रधानाचार्य ने बताया.

‘‘क्या बेहूदा मजाक है,’’ मयंक के स्वर में सख्ती घुल गई थी, ‘‘तुरंत आप ने चैकअप क्यों नहीं करवाया? बच्चों की ऐसी ही देखभाल करते हैं आप लोग? मेरे बेटे को कुछ हो गया तो…’’

‘‘आप बेवजह नाराज हो रहे हैं,’’ प्रधानाचार्य ने उस की बात बीच में काट कर विनम्रता से कहा था, ‘‘यहां रहने वाले सभी बच्चों का घर की तरह खयाल रखा जाता है, पर उन्हें जब मांबाप की याद आने लगे तो उदास हो जाते हैं. यद्यपि हम पूरी कोशिश करते हैं कि ऐसा न हो, पर नए बच्चों के साथ अकसर ऐसी समस्या आ जाती है.’’

‘‘दीप अब कैसा है?’’ प्रधानाचार्य की विनम्रता से प्रभावित हो कर मयंक सहजता से बोला था.

‘‘चिंता की कोई बात नहीं है. डाक्टर के साथ मैं लगातार उस की देखभाल कर रहा हूं. आप सुबह आ कर उस से मिल लें तो बेहतर रहेगा.’’

वह तो इसी वक्त जाना चाहता था पर पिछले 2 घंटे से तेज बारिश हो रही थी. अब तक तो पूरा शहर टापू बन चुका होगा. रास्ते में कहीं स्कूटर फंस गया तो मुसीबत और बढ़ जाएगी. फिलहाल जाने का विचार छोड़ कर वह सोफे पर पसर गया. सामने फे्रम में जड़ी अंजलि की मुसकराती तसवीर रखी थी. उस के बारे में सोच कर उस के मुंह का स्वाद कसैला हो गया.

अंजलि सिर्फ बौस, आफिस और अपने बारे में ही सोचती थी और किसी विषय में सोचनेसमझने का उस के पास समय ही नहीं था. उस पर तो हर पल काम, तरक्की और अधिक से अधिक पैसा कमाने की धुन सवार थी. मशीनी युग में वह मशीन बन गई थी, शायद इसीलिए उस के दिल में बेटे और पति के लिए कोई संवेदना नहीं थी. अब तो मयंक अकेला रहने का अभ्यस्त हो गया था. कभीकभी न चाहते हुए भी समझौता करना पड़ता है. यही तो जिंदगी है.

अचानक बिजली चली गई. कमरा घने अंधकार के आगोश में सिमट गया. वह यों ही निश्चल और निश्चेष्ट बैठा अपने जीवन के बारे में सोचता रहा. अब उस के भीतर और बाहर फैली स्याही में कोई फर्क नहीं था. कुछ देर बाद गरमी से घुटन होने पर वह उठा और दीवार का सहारा लेते हुए खिड़की खोली. ठंडी हवा के झोंकों से उस के तपते दिमाग को राहत मिली.

बाहर बारिश का तेज शोर शांति भंग कर रहा था. सहसा तेज ध्वनि के साथ बिजली चमक कर कहीं दूर गिरी. उसे लगा कि ऐसी ही बिजली उस के आंगन में भी गिरी है, जिस में उस का सुखचैन, अंजलि का प्रेम और दीप का चुलबुला बचपन राख हो चुका है. उस ने तो सहेजने की बहुत कोशिश की पर सबकुछ बिखरता चला गया.

6 साल का दीप पहले कितना शरारती था. उस के साथ घर का हर कोना खिलखिलाता था पर अब तो वह हंसना ही भूल गया था. उस के और अंजलि के बीच आएदिन होने वाले झगड़ों में दीप का मासूम बचपन खो चुका था. विवाद टालने के लिए वह कितना एडजस्ट करता था और अंजलि थी कि छोटी से छोटी बात पर आसमान सिर पर उठा लेती थी. उस का छोटा सा घर, जिसे उस ने बड़े प्यार से सींचा था, ज्वालामुखी बन चुका था, जिस की आंच में अब वह हर पल सुलगता था. मयंक की आंखों में आंसुओं के साथ बीती यादें चुपके से उतर कर तैरने लगीं.

वह अपने आफिस की ओर से जिस मल्टी नेशनल कंपनी में फाइनेंशियल डील के लिए गया था, अंजलि वहां अकाउंटेंट थी. हायहैलो के साथ शुरू हुई औपचारिक मुलाकात रेस्तरां में चाय की चुस्कियों के साथ दिल की गहराई तक जा पहुंची थी. 1 साल के भीतर दोनों विवाह के बंधन में बंध गए. मयंक हनीमून के लिए किसी हिल स्टेशन पर जाना चाहता था. उस ने आफिस में छुट्टी के लिए अर्जी दे दी थी, पर अंजलि तैयार नहीं हुई.

‘पहले कैरियर सैटल हो जाने दो, हनीमून के लिए तो पूरी जिंदगी पड़ी है.’

‘अच्छीखासी तो नौकरी है,’ मयंक ने उसे समझाने का प्रयास किया, ‘मोटी तनख्वाह मिलती है, और क्या चाहिए?‘

‘जो मिल जाए उसी में संतुष्ट रहने से इनसान कभी तरक्की नहीं कर सकता,’ अंजलि ने परोक्ष रूप से उस पर कटाक्ष किया, ‘मिडिल क्लास की सोच सीमित दायरे में सिमटी रहती है, इसीलिए वह हाई सोसायटी में एडजस्ट नहीं हो पाता.’

मयंक तिलमिला कर रह गया.

‘बड़ा आदमी बनने के लिए बड़े ख्वाब देखने पड़ते हैं और उन्हें साकार करने के लिए कड़ी मेहनत,’ अंजलि बोली, ‘अभी स्टेटस सिंबल के नाम पर हमारे पास क्या है? कार, बंगला, ए.सी. और नौकरचाकर कुछ भी तो नहीं. इस खटारा स्कूटर और 2 कमरे के फ्लैट में कब तक खटते रहेंगे?’

‘तुम्हें तो किसी अरबपति से शादी करनी चाहिए थी,’ मयंक कुढ़ कर बोला, ‘मेरे साथ यह सब नहीं मिल सकेगा.’

मयंक को मन मार कर छुट्टी कैंसिल करानी पड़ी. घर की सफाई और खाना बनाने के लिए बाई थी. कई जगह काम करने के कारण वह शाम को कभीकभार लेट हो जाती थी.

मयंक कभी चाय की फरमाइश करता तो अंजलि टीवी प्रोग्राम पर निगाह जमाए बेरुखी से जवाब देती, ‘तुम आफिस से आए हो तो मैं भी घर में नहीं बैठी थी. 2 कप चाय बनाने में थक नहीं जाओगे.’

‘ये तुम्हारा काम है.’‘मेरा क्यों?’ वह चिढ़ जाती, ‘तुम्हारा क्यों नहीं? तुम से पहले आफिस जाती हूं और काम भी तुम से अधिक टिपिकल करती हूं. अकाउंट संभालना हंसीखेल नहीं है.’

इस के बाद तो मयंक के पास 2 ही रास्ते बचते थे, खुद चाय बनाए या बाई के आने का इंतजार करे. दूसरा विकल्प उसे ज्यादा मुफीद लगता था. वह नारीपुरुष समानता का विरोधी नहीं था. पर अंजलि को भी तो उस के बारे में कुछ सोचना चाहिए. जब वह शांत हो जाता तो अंजलि अपने लिए एक कप चाय बना कर टीवी देखने में मशगूल हो जाती और वह अपमान के घूंट पी कर रह जाता था. उस के वैवाहिक जीवन की नौका डोलने लगी थी.

मयंक ने सदा ऐसी पत्नी की कल्पना की थी जो उस के प्रति समर्पित रहे. केवल अहं की तुष्टि के लिए समानता की बात न करे, बल्कि सुखदुख में बराबर की भागीदार रहे. उस के मन को समझे, हृदय की गहराई से प्यार करे और जिस के आंचल की छांव तले वह दो पल सुखशांति से विश्राम कर सके. बाई के बनाए खाने से पेट तो भर जाता था, पर मन भूखा ही रह जाता था. काश, अंजलि कभी अपने हाथ से एक कौर ही खिला देती तो वह तृप्त हो जाता.

एक सुबह अंजलि आफिस के लिए तैयार हो रही थी कि तेज चक्कर आने लगे. मयंक उसे तुरंत अस्पताल ले गया. चैकअप कर के डाक्टर ने बधाई दी कि वह मां बनने वाली है.

‘मैं अभी बच्चा अफोर्ड नहीं कर सकती.’

‘तो पहले से सेफ्टी करनी थी.’

‘आगे से ध्यान रखूंगी,’ उस ने लापरवाही से कंधे उचकाए, ‘फिलहाल तो इस बच्चे का गर्भपात चाहती हूं.’

‘ये खतरनाक हो सकता है,’ डाक्टर गंभीरता से बोली, ‘संभव है आप भविष्य में फिर कभी मां न बन सकें.’

‘अपना भलाबुरा मैं बेहतर समझती हूं. आप अपनी फीस बताइए.’

‘अंजलिजी,’ वह सख्ती से बोली, ‘डाक्टर के लिए मरीज का हित सर्वोपरि होता है. आप के लिए जो उचित था, मैं ने बता दिया. वैसे भी यहां भू्रणहत्या नहीं की जाती है.’

‘आप नहीं करेंगी तो कोई और कर देगा.’

‘बेशक, शहर में ऐसे डाक्टरों की कमी नहीं है जो रुपयों के लालच में इस घिनौने काम को अंजाम दे देंगे, पर मैं ने कइयों को जिद पूरी होने के बाद औलाद के लिए तड़पते देखा है.’

उस दिन घर में तनाव का माहौल रहा. मयंक चाहता था कि आंगन मासूम किलकारियों से गुलजार हो. हो सकता है मां बनने के बाद अंजलि के स्वभाव में परिवर्तन आ जाए, तब गृहस्थी की बगिया महक उठेगी, पर अंजलि तैयार नहीं थी. उस का तर्क था कि यही तो उम्र है कुछ कर गुजरने की. अभी से बालबच्चों के भंवर में उलझ गई तो लक्ष्य तक कैसे पहुंच सकेगी? सफलता की सीढि़यां चढ़ने के लिए टैलेंट के साथ आकर्षक फिगर भी चाहिए, वरना कौन पूछता है.

मयंक बड़ी मुश्किल और मिन्नतों के बाद उसे राजी कर सका.

अंजलि ने ठीक समय पर स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया. अपने प्रतिरूप को देख मयंक निहाल हो गया. बेटे ने उस का उजड़ा मन प्रकाश से भर दिया था इसलिए बड़े प्यार से उस का नाम दीप रखा. दिन में उस की देखभाल करने के लिए मयंक ने एक अच्छी आया का प्रबंध कर लिया था.

बेटे को जन्म तो अंजलि ने दिया था, पर मां की भूमिका मयंक निभा रहा था. दीप सुबहशाम उस की बांहों के झूले में झूल कर बड़ा होने लगा.

वह 4 साल का हो गया था.

रात के 10 बज चुके थे, अंजलि आफिस से नहीं लौटी थी. मयंक उस के मोबाइल पर कई बार फोन कर चुका था. घंटी जा रही थी, पर वह रिसीव नहीं कर रही थी. उस ने आफिस फोन किया, वहां से भी कोई उत्तर नहीं मिला. वैसे भी इस वक्त वहां किसी को नहीं होना था. दीप को सुला कर वह जागता रहा. अंजलि 12 बजे के बाद आई.

‘कहां थी अब तक?’ मयंक ने सवाल दागा, ‘मैं कितना परेशान हो गया था.’

‘मेरा प्रमोशन बौस की प्राइवेट सेके्रटरी के पद पर हो गया,’ उस की चिंता से बेफिक्र वह मुदित मन से बोली, ‘कंपनी की ओर से शानदार बंगला और ए.सी. गाड़ी मिलेगी. प्रमोशन की खुशी में बौस ने पार्टी दी थी, वहीं बिजी थी.’

‘फोन तो रिसीव कर लेती.’

‘शोरशराबे में आवाज नहीं सुनाई दी.’

‘तुम ने ड्रिंक ली है?’ उस के मुंह से आती महक ने उसे आंदोलित कर दिया.

‘कम आन डियर,’ अंजलि ने लापरवाही से कहा, ‘बौस नहीं माने तो थोड़ी सी लेनी पड़ी. उन्हें नाराज तो नहीं कर सकती न, सब का खयाल रखना पड़ता है.’

‘शर्म आती है तुम्हारी बातें सुन कर. मेरी कभी परवा नहीं की और दूसरों की खुशी के लिए मानमर्यादा ताक पर रख दी.’

‘व्हाट नौनसेंस,’ वह बिफर पड़ी, ‘यू आर मेंटली इल. मेरा कद तुम से ऊंचा हो गया तो जलन होने लगी.’

‘तुम सिर्फ अपने बारे में सोचती हो इसलिए ऐसे घटिया विचार तुम्हारे दिमाग में ही आ सकते हैं.’

‘तुम ने मुझे नीच कहा,’ वह क्रोध से कांपने लगी.

‘अभी तुम होश में नहीं हो,’ मयंक ने विस्फोटक होती स्थिति को संभालने की कोशिश की, ‘सुबह बात करेंगे.’

‘तुम्हारा असली रूप देख कर होश में तो आज आई हूं. मुझे आश्चर्य हो रहा है कि तुम जैसे संकीर्ण इनसान के साथ मैं ने इतने दिन कैसे गुजार लिए.’

पानी सिर के ऊपर बहने लगा था. मयंक की इच्छा हुई कि उस का नशा हिरन कर दे, पर इस से बात बिगड़ सकती थी.

दीप जाग गया था और मम्मीपापा को चीखतेचिल्लाते देख सहमा सा खड़ा था. मयंक उसे ले कर दूसरे कमरे में चला गया. अंजलि इस के बाद भी काफी देर तक बड़बड़ाती रही.

अब वह अकसर देर रात को लौटती और कभीकभी अगले दिन. मयंक पूछता तो पार्टी या टूर की बात कह कर बेरुखी से टाल देती. अब तो डिं्रक लेना उस के लिए रोजमर्रा की बात हो गई थी. मयंक समझाने की कोशिश करता तो दंगाफसाद शुरू हो जाता था. इस दमघोंटू माहौल में दीप अंतर्मुखी होता जा रहा था. उस का बचपन जैसे उस के भीतर सिमट चुका था. मयंक ने हर संभव कोशिश की पर उस के होंठों पर मुसकान न ला सका. वह घबरा कर उसे मनोचिकित्सक के पास ले गया.

पूरी बात सुन कर डाक्टर बोले, ‘बच्चों में फूल सी कोमलता और मासूमियत होती है, जिस की खुशबू से घर का उपवन महकता है. वह जिस डाल पर खिलते हैं, उस की जड़ मातापिता होते हैं. जब जड़ को घुन लग जाए तो फूल खिले नहीं रह सकते.’

थोड़ा रुक कर डाक्टर फिर बोले,

‘मि. मयंक आप इस तरह भी समझ सकते हैं कि बच्चा अपने आसपास के वातावरण को बारीकी से महसूस करता है और उसी के अनुरूप ढलता है. मांबाप के झगड़े में वह स्वयं को भावनात्मक रूप से असुरक्षित महसूस करता है, इस स्थिति में उस के भीतर कुंठा या हिंसा की प्रवृत्ति पनपने लगती है. कभीकभी वह विक्षिप्त अथवा कई तरह के मानसिक रोगों का शिकार भी हो जाता है. पतिपत्नी के ईगो में उस का वर्तमान व भविष्य दोनों अंधकारमय हो जाते हैं. मेरी राय में आप घर में शांति स्थापित करें या दीप को इस माहौल से कहीं दूर ले जाएं.’

मयंक ने अंजलि को सबकुछ बताया पर उस के स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं हुआ. उसे बेटे से अधिक अपने कैरियर से लगाव था. मयंक ने बहुत सोचसमझ कर उसे शहर से दूर आवासीय विद्यालय में एडमिशन दिला दिया था. इस के अलावा और कोई चारा भी तो नहीं था.

सफलता का नशा अंजलि के सिर इस कदर चढ़ कर बोल रहा था कि एक दिन मयंक से नाता तोड़ कर नए बंगले में शिफ्ट हो गई. उस ने मयंक को जीवन के उस मोड़ पर छोड़ दिया था जिस के आगे कोई रास्ता नहीं था. बेवफाई से वह टूट चुका था. वह तो दीप के लिए जी रहा था, वरना उस के मन में कोई चाह शेष नहीं थी.

बिजली आ गई थी. खिड़की बंद कर उस ने गालों पर ढुलक आए आंसू पोंछे और वापस सोफे पर आ कर बैठ गया.

वह सुबह स्कूल पहुंचा. बेटे को सहीसलामत देख कर उस की जान में जान आई. दीप भी उस से ऐसे लिपट गया मानो वर्षों बाद मिला हो.

‘‘पापा,’’ उस ने सुबकते हुए कहा, ‘‘आप भी यहीं आ जाओ. मैं आप के बिना नहीं रह सकता.’’

‘‘तुझे लेने ही तो आया हूं, सदा के लिए,’’ उसे प्यार कर के वह बोला, ‘‘मेरा बेटा हमेशा पापा के पास रहेगा.’’

‘‘मैं घर नहीं जाऊंगा,’’ दीप की आंखों में आतंक की परछाइयां तैरने लगीं, ‘‘मम्मी से बहुत डर लगता है.’’

‘‘हम दोनों के अलावा वहां कोई नहीं रहेगा. अब सारा जहां अपना है, खूब खेलेंगे, खाएंगे और मस्ती करेंगे. दीप अपनी मर्जी की जिंदगी जिएगा.’’

‘‘सच, पापा,’’ वह खिल गया. मयंक ने उस का माथा चूम लिया. Hindi Family Story

Hindi Story: निष्कलंक चांद- क्या था सीमा की असलियत

Hindi Story: ‘‘मुझे ये लड़की पसंद है.’’

राकेश के ये शब्द सुनते ही पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ गई. रामस्वरूप को ऐसा भान हुआ जैसे उन के तपते जीवन पर वर्षा की पहली फुहार पड़ गई हो. वह राकेश के दोनों हाथ थाम गदगद कंठ से बोले, ‘‘यकीन रखो बेटा, तुम्हें अपने फैसले पर कभी पछतावा नहीं होगा. मेरी सीमा एक गरीब बाप की बेटी जरूर है लेकिन तन और मन की बड़ी भली है. हम ने खुद आधा पेट खाया है पर उसे इंटर तक पढ़ाया है. घर के सारे कामकाज जानती है. तुम्हारे घर को सुखमय बना देगी.’’

राकेश मुसकरा दिया. वह खुद जानता था कि सीमा का चांदनी सा झरता रूप उस के घर को उजाले से भर देगा. यहां उसे दहेज चाहे न मिल रहा हो लेकिन सोने की मूरत जैसी जीवनसंगिनी तो मिल रही थी.

गरीब घर की बेटी होना राकेश की नजरों में कोई दोष न था. वह जानता था कि गरीब बाप की बेटी खातीपीती ससुराल में पहुंच कर हमेशा सुखी रहेगी. बड़े बाप की घमंडी बेटी के नखरे उठाना उस जैसे स्वाभिमानी युवक के बस के बाहर था. इसीलिए उस ने विवाह के लिए यहां निस्संकोच हां कर दी थी.

इधर विवाह तय हुआ, उधर शहनाई बज उठी. आंखों में सतरंगी सपनों का इंद्रधनुष सजाए सीमा ससुराल पहुंची. ससुराल में सासससुर ने उसे हाथोंहाथ लिया. तीनों ब्याहता ननदें भी उसे देख कर खुशी से फूली न समाईं. आसपड़ोस में धूम मच गई, ‘‘बहू क्या है, चांद का टुकड़ा है. लगता है, कोई अप्सरा धरती पर उतर आई हो.’’

सीमा के कानों तक यह प्रशंसा पहुंची तो वह इठलाते हुए बड़ी ननद से बोली, ‘‘लोग न जाने क्यों मेरे रूप की तारीफ करते हैं. कुछ भी तो खास नहीं है मुझ में. अपने परिवार में सब से गईगुजरी हूं. मेरी मां तक अभी ऐसी खूबसूरत हैं कि हाथ लगाते मैली होती हैं. चारों बहनें ऐसी हैं जिन्हें देख लोग पलक झपकना तक भूल जाते हैं.’’

विस्मय से बड़ी ननद रश्मि की आंखें फैल गईं. रहा न गया तो राकेश से पूछा उस ने, ‘‘क्या सचमुच सीमा का मायका इंद्रलोक की परियों का अखाड़ा है?’’

‘‘मैं समझा नहीं.’’

‘‘वह कहती है कि अपने घर में सब से गईगुजरी वही है. यदि यह सच है तो उस की मां और बहनें कितनी खूबसूरत होंगी, मैं सोच नहीं पा रही हूं.’’

राकेश हंस दिया. अल्हड़ प्रिया की यह अदा उसे बड़ी भायी.

‘पगली कहीं की,’ उस ने सोचा, जानबूझ कर अपनेआप को तुच्छ बता रही है. ऐसा रूप क्या कदमकदम पर बिखरा मिलता है? असाधारण सुंदरी न होती तो क्या मेरे यायावर चित्त को बांध सकती थी? उस घर में ही क्या, पूरे नगर में ऐसा रूप दीया ले कर ढूंढ़ने से नहीं मिलेगा.’

पर 2-4 दिन में ही राकेश समझ गया कि जिसे वह नवेली प्रिया की अल्हड़ अदा समझ रहा था, वह उस का मायके के प्रति अतिशय मोह है. रूप ही क्या, धन, वैभव किसी भी क्षेत्र में वह अपने मायके को छोटा नहीं बताना चाहती थी. लड़कियों में पिता के घर के प्रति कैसा उत्कट मोह होता है, इसे 3 बहनों का भाई राकेश अच्छी तरह जानता था. परंतु इस मोह का यह मतलब तो नहीं कि रात को दिन और स्याह को सफेद घोषित कर दिया जाए?

जल्दी ही सीमा की बढ़चढ़ कर कही जाने वाली बातें उस में खीज उत्पन्न करने लगीं. रिश्तेदारों की भीड़ खत्म होते ही एक दिन वह मां के कहने से सीमा को सिनेमा दिखाने ले गया.

फिल्म अच्छी थी. देख कर पैसे वसूल हो गए. लौटते समय एक रेस्तरां में उस ने सीमा को शीतल पेय भी पिलाया.

उमंग और उत्साह से भरे वे दोनों गली में घुसे ही थे कि पड़ोस की नीता सामने पड़ गई. सजीधजी सीमा को देख, उत्सुक स्वरों में पूछने लगी, ‘‘कहां से आ रही हो, भाभी? शायद सिनेमा देखने गई थीं.’’

उत्तर में स्वीकृति सूचक ‘हां’ कह कर भी काम चलाया जा सकता था लेकिन सीमा बीच रास्ते में ठहर कर कहने लगी, ‘‘सिनेमा देखने ही गए थे, लेकिन भीड़भाड़ में मजा किरकिरा हो गया. हमारे मायके में तो बाबूजी नई फिल्म लगते ही पहले से आरक्षण करवा देते थे. बस, ठाट से गए और फिल्म देख आए. लाइन में लग कर भीड़ के धक्के खाने की कोई मुसीबत नहीं उठानी पड़ती थी.’’

राकेश कोई चुभती बात कहने ही वाला था पर चुप रह गया. इतना ही बोला, ‘‘रास्ते में ही सारी बातें कर लोगी क्या? कुछ घर के लिए भी छोड़ दो.’’

सीमा हंस दी तो स्वर की मधुरता ने राकेश का क्रोध उतार दिया.

पर यह तो रोज की बात बन चुकी थी. दूसरे दिन राकेश दफ्तर जाने की हड़बड़ी में था. वह नहाते ही चीखपुकार मचाने लगा, ‘‘मेरा खाना परोस दो, मां. सवा 9 बज चुके हैं.’’

मां ने रसोई में जा कर खाना बनाती सीमा से पूछा, ‘‘दाल और सब्जी बन चुकी है क्या? तवा चढ़ा कर रोटी सेंक दो.’’

‘‘अभी केवल सब्जी बनी है,’’ सिर उठा कर सीमा ने उत्तर दिया.

मां बाहर निकल कर अपराधी स्वर में बोलीं, ‘‘जाड़े के दिन भी कितने छोटे होते हैं. चायपानी निबटता नहीं कि दफ्तर का समय हो जाता है. इस समय सिर्फ सब्जी तैयार हो पाई है.’’

‘‘कोई बात नहीं,’’ बाल काढ़ते हुए राकेश सहज भाव से बोला.

मां निश्चिंत हो कर थाली लगाने चल दीं. सीमा रोटी बेलतेबेलते हाथ रोक कर कहने लगी, ‘‘हमारे घर में तो कोई एक सब्जी से नहीं खा सकता. जब तक थाली में 4-5 चीजें न हों. खाने वालों के मुंह ही सीधे नहीं होते हैं.’’

राकेश कब आ कर मां के पीछे खड़ा हो गया था, सीमा नहीं जान पाई थी. वह कुछ और बोलने ही जा रही थी कि किंचित रूखे स्वर में राकेश ने डांट दिया, ‘‘तुम्हारे पीहर में छप्पन व्यंजनों का थाल रहता होगा. हम गरीब आदमी एक ही सब्जी से रोटी खा लेते हैं. बातें बंद करो, रोटी सेंको.’’

सीमा संकुचित हो उठी. चुपचाप रोटी बेलने लगी.

पर शाम को दफ्तर से लौटने पर राकेश ने उसे बड़े मनोयोग से बातें करते पाया. वह मां के सिर में तेल डालते हुए बोलती जा रही थी, ‘‘मेरी यह साड़ी ढाई सौ रुपए की है. असल में बाबूजी को साधारण कपड़ा पसंद नहीं आता. घर के कामकाज में भी मां 200 से कम की साड़ी नहीं पहनतीं.’’

‘‘भले ही उस में पचास पैबंद लगे हों,’’ जबान को रोकतेरोकते भी भीतर आते हुए राकेश के मुंह से निकल पड़ा.

सीमा सन्न रह गई. उस की सीप जैसी आंखों में मोती डबडबा आए.

मां ने झिड़का, ‘‘तू कमरे में जा. तुझ से तो कुछ नहीं कह रही है वह. बेकार में सारा दिन बेचारी को रुलाता रहता है.’’

राकेश को भी पछतावा हुआ. सुबह तो डांट कर गया ही था, आते ही फिर ताना दे दिया.

लेकिन मन ने कहा, ‘वह भी इतना झूठ क्यों बोलती है? उसे भी तो सोचसमझ कर बात करनी चाहिए.’

लेकिन सोचसमझ कर बात करना शायद सीमा से हो ही नहीं सकता था. हर बात में वह अपने मायके की श्रेष्ठता सिद्ध करने पर तुल जाती थी. उस की ये बातें राकेश को जहर बुझे तीर जैसी लगती थीं.

उस दिन फिर ऐसा ही मौका उपस्थित हो गया.

मां बेसन के लड्डू बना रही थीं. राकेश को बेसन के लड्डू बड़े पसंद थे, इसलिए मां अकसर इन्हें घर पर बनाती थीं.

सीमा पास बैठी काम में हांथ बंटा रही थी. अचानक मां के मुंह से निकल पड़ा, ‘‘क्यों बहू, लड्डूओं में घी तो कम नहीं है? तुम्हें लड्डू बांधने में दिक्कत तो नहीं हो रही है?’’

सीमा ने माथे पर बिखर आई एक नटखट लट को पीछे झटकते हुए जवाब दिया, ‘‘नहीं, घी तो ठीक है. वैसे घी खाने का भी कुछ लोगों को बेहद शौक होता है. मेरे पिताजी दाल, साग, रोटी सब में इतना घी इस्तेमाल करते हैं कि खाने के बाद थाली, कटोरी में घी ही घी नजर आता है. असल में यह हर एक आदमी के बस की बात नहीं है. खाने को मिल भी जाए तो पचा कितने पाते हैं?’’

राकेश कब कमरे से निकल कर आंगन में आ गया है और इस बात को सुन रहा है, सीमा जान नहीं पाई थी.

परंतु अचानक भूचाल आ गया.

शायद कई महीनों से सुनतेसुनते सब्र का बांध टूट चुका था. शायद कई बार इशारोंइशारों में रोकने पर भी सीमा नहीं मानी थी. शायद इतना बड़ा झूठ सहन करना राकेश के लिए असंभव था.

अचानक न जाने क्या हुआ, वह गरज कर बोला, ‘‘तुम्हारे पीहर में घीदूध की नदियां बह रही हैं न, इस गरीब आदमी के घर में तुम्हारा गुजारा नहीं हो सकता, जाओ, अपने बाप के घर रहो जा कर.’’

मां घबरा उठीं. सीमा के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थीं. उस की आंखें भीग आई थीं. लेकिन क्रोध से कांपते राकेश ने हुक्म दिया, ‘‘अभी और इसी समय तुम्हें अपने मायके जाना है. उठो, अपनी अटैची ले कर मेरे साथ चलो.’’

सीमा रो पड़ी. मां की हिम्मत न पड़ी कि बीचबचाव कर सकें.

गुस्से से उफनता राकेश घर से निकला और 10 मिनट में रिकशा ले कर आ पहुंचा, ‘‘तुम उठीं नहीं?’’ आग्नेय दृष्टि से सीमा को घूरते हुए कुछ इस  प्रकार कहा उस ने कि सीमा थरथरा उठी.

यह जलती हुई निगाह तब तक सीमा पर टिकी रही, जब तक वह अटैची में कुछ कपड़े रख कर उस के साथ नहीं चल दी.

6 महीने बीत गए. न राकेश सीमा को लिवाने गया, न उस की खुद आने की हिम्मत पड़ी.

किंतु जैसेजैसे दिन बीत रहे थे, राकेश उद्विग्न होता जा रहा था. भोली प्रिया की चंपई देह उस की रातों की नींद चुराने लगी थी. उसे अपने क्रोध पर क्रोध आता? क्यों इस तरह वह एकदम उसे मायके छोड़ आया? पिता के बंद दरवाजे पर खड़े हो कर अंतिम बार जिस करुण दृष्टि से सीमा ने देखा था उसे वह चाह कर भी भूल नहीं पा रहा था. किंतु अब खुद ही जा कर सीमा को लिवा लाना भी स्वाभिमान के खिलाफ महसूस हो रहा था.

राकेश की मुश्किल आखिर एक दिन मां ने ही हल कर दी.

उसे हुक्म देते हुए वह बोलीं, ‘‘सुनो, राकेश, आज ही जा कर बहू को लिवा लाओ. बेचारी सारा दिन इतनी मीठीमीठी बातें किया करती थी.’’

राकेश ने ऐसा जतलाया जैसे अनिच्छा होते हुए भी वह केवल मां के आदेश का पालन करने के लिए सीमा को लिवाने जा रहा है. उसे अचानक आया देख कर ससुराल में चहलपहल मच गई. 4 छोटी सालियां इर्दगिर्द मंडराने लगीं. मीठी लाजभरी मुसकान लिए सीमा देहरी पर खड़े हो कर अपने पांव के अंगूठे से धरती कुरेदने लगी.

रामस्वरूप घर पर न थे. सीमा की मां चाय का प्याला ला कर थमाते हुए बोलीं, ‘‘तुम्हारी ट्रेनिंग पूरी हो गई, बेटा?’’

राकेश ने अबूझ भाव से निगाह उठाई.

सीमा तुरंत बोल पड़ी, ‘‘तुम्हें 6 महीने के लिए टे्रनिंग पर जाना था न इसीलिए तुम मुझे जल्दीजल्दी में यहां छोड़ गए. रुके तक नहीं थे.’’

‘‘अरे, हां, वह हो गई है,’’ राकेश मुसकरा दिया.

सास हाथ का पंखा ले कर पास बैठते हुए बोलीं, ‘‘तुम ने इस लड़की का दिमाग बिगाड़ दिया है, बेटा. यहां हम गरीब आदमी ठहरे. तुम ने इस में कुछ ही महीनों में शहजादियों जैसी नजाकत भर दी है. अब इसे फ्रिज और कूलर के बिना चैन नहीं पड़ता है.’’

‘‘पर कूलर और फ्रिज तो…’’ राकेश ने कहना चाहा कि सीमा बीच में ही बोल  पड़ी, मां और बाबूजी ने गरमियों की मेरी परेशानी का विचार कर के जाड़े में ही फ्रिज और कूलर खरीद लिया था, वही बात मैं ने इन लोगों को बतला दी है.’’

राकेश के मन में अपनी मासूम दुलहन के लिए ढेर सा प्यार उमड़ आया. मायके की तारीफ यह हमें छोटा दिखाने के लिए नहीं करती थी. ससुराल की प्रशंसा में भी जमीनआसमान एक किए रही है.

उसी दिन सीमा को ले कर राकेश लौट आया. रात के एकांत में कमरे में प्रिया के चिबुक को उठाते हुए हंस कर उस ने पूछा, ‘‘क्यों जी, कहां है तुम्हारा कूलर और फ्रिज? मुझे तो इस कमरे में बिजली का पंखा ही नजर आ रहा है.’’

सीमा की कमजोर आंखों में मोती झिलमिला उठे.

राकेश ने लाड़ से उस का सिर अपने कंधे से टिकाते हुए कहा, ‘‘बस, अब बहुत हो चुकी मायके और ससुराल की तारीफ. ठीक है, दोनों जगह की इज्जत रखना तुम्हें अच्छा लगता है पर इतना बढ़चढ़ कर भी न बोलो जो यदि जाहिर हो जाए तो जगहंसाई हो.’’

सीमा की आंखों से आंसू पोंछ दिए उस ने, ‘‘बस, रोना बंद. अब हंस दो.’’

सीमा मुसकराई, उस के गालों के गड्ढे में राकेश का चित्त जा फंसा.

सुबह सासबहू चाय की तैयारी कर रही थीं. राकेश ने मां को कहते सुना, ‘‘आज चाय के साथ कोई नाश्ता नहीं है. खाली चाय सब को कैसे दी जाए?’’

पहले की सीमा होती तो टेप रिकार्डर की तरह बजने लगती, ‘‘हमारे यहां तो…’’

पर आज वह मधुर स्वर में बोल पड़ी, ‘‘रात की रोटियां बची हैं, मां. उन्हें ही महीन कर के कड़ाही में तले देती हूं. नमक मिलाने से बढि़या सी दालमोठ तैयार हो जाएगी. बासी रोटियों का सदुपयोग भी हो जाएगा.’’

राकेश गुसलखाने में मुंह धोते हुए मुसकरा पड़ा. वह मन ही मन बोला, ‘कल तक तुम चांद थीं, आज निष्कलंक चांद हो’. Hindi Story

Motivational Story: स्टैपनी- क्या वह खुद को बदल पाई?

Motivational Story: धुन ने सुबह उठते ही सब से पहले अपने कमरे के परदे हटाए. रविवार की सुबह, भीनीभीनी ठंड और उगता हुआ सूरज, इस से बेहतर और क्या हो सकता हैं?

गुनगुनाते हुए धुन ने चाय का पानी चढ़ाया और घर पर कौल लगाई.

उधर से मम्मी की आवाज आई, ‘‘तू कब आएगी घर पर? दीवाली पर भी बस 2 दिनों के लिए आई थी. 30 की होने वाली है, कब शादी करेगी और कब बच्चे होंगे.’’

अब तो धुन को ऐसा लगता था मानो यह भी हर हफ्ते का एक रिचुअल बन गया हो. मम्मी यह हर हफ्ते कहती मगर परिवार की तरफ से कोई प्रयत्न नहीं होता था. धुन के परिवार की चिंता बस शब्दों में ?ालकती थी.

इस शाब्दिक प्यार के पीछे धुन को मालूम था उस की मम्मी की मजबूरी है. पिता की मृत्यु के बाद बड़े भाई ने आगे बढ़ कर मम्मी की जिम्मेदारी तो अपने कंधों पर ले ली थी, मगर धुन के विवाह के लिए बड़ा भाई उदासीन था.

ऐसा नहीं है कि धुन विवाह के लिए बहुत आतुर थी मगर अपने परिवार की यह शाब्दिक परवाह उसे अंदर से नागवार गुजरती थी.

तभी धुन के मोबाइल पर मनु का नंबर फ्लैश हुआ. मनु धुन की सोसायटी में ही रहता था. मनु विवाहित और 1 बच्चे का पिता था मगर अपनी बीवी भानु से उस की पटरी सही नहीं बैठती थी.

सोसायटी के जिम में ही दोनों की जानपहचान हुई और फिर दोनों में धीरेधीरे दोस्ती हो गई थी.

मनु की साफगोई और बेलौस हंसी ने धुन के जीवन की धुन ही बदल दी थी. मगर यह जरूर था कि धुन को मनु के मूड के अनुसार ही अपनी धुन रखनी पड़ती थी.

धुन मनु से कोई उम्मीद नहीं रखती थी और यही बात थी जो मनु को धुन के प्रति आकर्षित करती थी.

दोनों को जब मौका मिलता तो दोनों मिल लेते थे. शुरूशुरू में तो धुन को सबकुछ बहुत अच्छा लग रहा था मगर थी तो वह हाड़मांस की औरत, बिना किसी उम्मीद के भी धीरेधीरे धुन के दिल में एक छोटा सा दीया जल गया था. यह उम्मीद कि मनु सब के सामने न सही मगर बुरे समय में शायद उस का साथ अवश्य देगा.

धुन को यह धीरेधीरे सम?ा में आ गया था कि मनु के जीवन में धुन तभी जरूरी है जब उस की पत्नी किसी औफिशियल ट्रिप या अपने घर चली जाती है. तब मनु को धुन के दिन और रात दोनों पर अपना अधिकार लगता था मगर जब मनु का परिवार शहर में होता तो मनु बेहद औपचारिक रहता. वे लोग बस जिम में मिलते और कभीकभार बाहर मिल लेते.

‘‘धुन को मनु से ऐसी कोई अपेक्षा भी नहीं थी मगर पत्नी के न रहने पर मनु का यों धौंस जमाना धुन को पसंद नहीं आता था.

आज धुन के औफिस में बहुत इंपौर्टैंट मीटिंग थी लेकिन मनु बारबार फोन कर रहा था. धुन ने बीच में एक बार फोन उठाया और बड़े प्यार से मनु से कहा, ‘‘अभी बिजी हूं, शाम को बात करूंगी.’’

फिर भी मनु एक के बाद एक मैसेज कर रहा था. शाम को औफिस से निकलते हुए धुन

ने मनु को कौल की तो मनु गुस्से में बोला,

‘‘तुम्हें तो बस अपना काम प्यारा है, सुबह से पागलों की तरह तुम्हें फोन कर रहा हूं ताकि तुम्हारे साथ समय बिता सकूं मगर तुम्हें तो फुरसत ही नहीं हैं.’’

धुन बेहद थकी हुई थी मगर मनु के कारण वह सीधे उस के फ्लैट पर चली गई. मनु ने जब थकीहारी धुन को देखा चिढ़ कर बोला, ‘‘तुम्हें इतनी भी तमीज नहीं है प्रेमी से मिलने कैसे आते हैं. यार बीवी और प्रेमिका में कुछ तो फर्क होना चाहिए,’’ और यह कह कर मनु धुन के नजदीक जाने लगा.

धुन मनु को धकेलते हुए बोली, ‘‘मैं तुम से मिलने आई हूं, सैक्स करने नहीं. बेहद थकी हुई हूं और भूख भी लगी हुई है.’’

मनु ने यह सुन कर धुन को एक तरफ कर दिया और कहा, ‘‘मेरा समय क्यों बरबाद किया? क्या मैं ने अपने फ्लैट पर तुम्हें खाना खिलाने बुलाया था?’’

धुन अपमानित सी खड़ी रही और फिर वह जैसे ही दरवाजा खोल कर बाहर जाने लगी मनु ने उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘अरे चलो आई एम सौरी. तुम जल्दी से नहा लो, मैं खाना और्डर करता हूं.’’

खाना खाने के दौरान धुन के घर से बारबार कौल आ रही थी. मगर मनु बारबार उसे कौल लेने से मना कर रहा था.

‘‘यह समय बस मेरा हैं और वैसे भी तुम्हारे घर वालों को तो किसी काम के कारण ही तुम्हारी याद आती है.’’

खाने के बाद फिर से मनु ने धुन के नजदीक आने की कोशिश करी. धुन थकी हुई थी मगर फिर भी उस ने मनु को कुछ नहीं कहा.

प्रेमक्रीड़ा के पश्चात मनु धुन से बोला, ‘‘अरे तुम तो ठंडी लाश की तरह पड़ी हुई थी. तुम ने तो भानु को भी माफी कर दिया.’’

मनु के इस कथन पर धुन आंखों में पानी भरते हुए बोली, ‘‘तो फिर क्यों आते हो मेरे पास? भानु के साथ ही क्यों नहीं खुश रहते हो?’’

मनु फिर से धुन को बांहों में भरते हुए बोला, ‘‘मर्द का दिल क्या एक ही औरत से भरा है?’’ फिर भानु मेरी बीवी है, बच्चे की मां है.’’

धुन को मनु के शब्दों को सुन कर ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने पिघलता हुआ सीसा उस के कानों में डाल दिया हो.

धुन को लगा मानो वह एक स्टैपनी हो मनु की जिंदगी में जिस की जरूरत उसे तब ही पड़ती है जब उस की गाड़ीरूपी जिंदगी का मेन टायर नहीं होता है. ऐसा नहीं था कि मनु ने धुन के साथ ऐसा पहली बार किया हो मगर न जाने क्यों आज धुन के अंदर कुछ कीरच गया था.

उस घटना के बाद 2 हफ्ते बीत गए मगर मनु का न कोई फोन आया और न ही मैसेज. धुन सम?ा गई थी कि मनु की बीवी घर पर ही होगी और वह एक खुशहाल जिंदगी बिता रहा होगा. धुन की जरूरत तो मनु को तभी पड़ती है जब उस की खुशी में पंक्चर हो जाता है. धुन अभी इन सब बातों पर मनन कर ही रही थी कि घर से भाभी का फोन आ गया.

‘‘धुन कुछ नहीं सुनूंगी, इस बार तुम भी हमारे साथ घूमने चल रही हो. इतनी गरमी हैं

कुछ दिन तुम भी मनाली की ठंडी हवा में आराम कर लेना.’’

धुन को भी लगा, इस घुटनभरे वातावरण से बाहर निकलना जरूरी है. मन ही मन वह सोच रही थी वह बेकार में अपने परिवार के बारे में उलटासीधा सोच रही थी.

जब धुन घर पहुंची तो सारी पैकिंग हो चुकी थी. धुन परिवार के प्यार में भीगी हुई मन ही मन सोच रही थी कि अपने तो आखिर अपने ही होते हैं. क्या मनु कभी उसे कहीं घुमाने ले जाएगा? कभी नहीं. एक बार धुन ने मनु से कहा भी था तो उस ने रूखे स्वर में कहा, ‘‘ये सब नखरे उठाने के लिए पहले से मेरे पास एक बीवी है. दूसरी बीवी नहीं चाहिए मु?ो.’’

धुन और उस का परिवार जब दोपहर को मनाली पहुंचा तो भाई की बेटी आराना को बुखार हो गया और मम्मी के पैरों में भी बहुत दर्द हो रहा थे. 2 कमरे थे. 1 कमरे में भाईभाभी और दूसरे में धुन, उस की मम्मी और आराना थी.

शाम को घूमने का प्रोग्राम था, मगर आराना बुखार से तप रही थी. धुन को

भैयाभाभी के लिए बुरा लग रहा था कि कैसे वे लोग घूमफिर पाएंगे?

मगर मम्मी ने ऐलान कर दिया कि धुन मम्मी और आराना के पास रुक जाएगी, भैयाभाभी घूम आएंगे.

भाभी ने हालांकि ऊपरी तौर पर कहा भी, ‘‘अरे मम्मीजी, ये भाईबहन चले जाएंगे, मैं आराना के पास ही रुक जाऊंगी.’’

मम्मी बोली, ‘‘अरे तुम लोगों ने ही सारा प्रोग्राम बनाया था और अब तुम ही लोग नहीं घुमोगे तो क्या अच्छा लगेगा? वैसे भी तुम्हें तो घर, दफ्तर और मेरी और आराना की देखभाल से फुरसत कहां मिलती है?’’

भैयाभाभी के निकलते ही धुन अपनी मम्मी पर बरस पड़ी, ‘‘क्या मैं यहां पर आप की और आराना की केयर टेकर बन कर आई हूं?’’

मम्मी फुसफुसाते स्वर में बोली, ‘‘बेटे के साथ रहती हूं तो बहू को कैसे नाराज कर सकती हूं. फिर अगर आराना का बुखार तेज हो जाता तो मैं अकेले कैसे संभालती?’’

धुन मन मसोस कर रह गई और रिजोर्ट के इधरउधर घूमने लगी. रिजोर्ट की पूरी

परिक्रमा करने के बाद धुन ने देखा, एक युवक किताब पढ़ने में डूबा हुआ है. आधा घंटे पहले भी वह यहीं बैठा था. तभी उस के मोबाइल पर मम्मी का फोन आया कि भैयाभाभी वापस आ गए हैं.

अगले दिन आराना का बुखार ठीक थामगर मम्मी को तेज सर्दीजुकामहो गया था. भैयाभाभी थोड़े शर्मिंदा होते हुए बोले, ‘‘धुन आज तू घूमने चली जा, हम मम्मी के पास रुक जाते हैं.’’

धुन थोड़े चिढ़े स्वर में बोली, ‘‘मैं अकेली कहां जाऊंगी?’’

फिर जब मम्मी सो गई तो धुन फिर से रिजोर्ट की परिक्रमा करने लगी. आज फिर से

वह युवक वहीं बैठा था और आज भी एक किताब में डूबा था.

धुन उस के करीब जा कर बोली, ‘‘आप यहां घूमने आए हैं या किताब पढ़ने?’’

युवक ने पहली बार किताब से चेहरा हटा कर धुन की तरफ देखा और बोला, ‘‘अगर मैं कहूं आप यहां घूमने आई हैं या लोगों की खोजखबर करने तो? वैसे मु?ो गीत कहते हैं, लिखता हूं, थोड़ा पढ़ता हूं, जिंदगी के अनुभवों को अपने शब्दों में पिरोता हूं.’’

धुन बैठते हुए बोली, ‘‘तो फिर ये सब तो तुम अपने घर पर भी कर सकते थे, यहां घूमने के बजाय इधर क्यों बैठे हो?’’

गीत हंसते हुए बोला, ‘‘यात्रा जरूरी नहीं देशविदेश की करी जाए, विचारों की यात्रा के लिए शांत जगह चाहिए और लेखक को देशविदेश की नहीं अपने अंदर के विचारों के साथ ही शांति में भ्रमण करना होता है.’’

धुन बोली, ‘‘काश मैं भी तुम्हारे जैसा सोच पाती और लिख पाती. यहां आई थी घूमनेफिरने मगर लोगों की सेवा में लगी हुई हूं.’’

तभी बारबार धुन के मोबाइल पर मनु का कौल आने लगी.जब चौथी बार मनु का नंबर फ्लैश हुआ तो

गीत बोला, ‘‘अरे फोन तो उठा लो, कोई तुम से बात करने के लिए इतना बेकरार है. मैं तो तुम्हें यहीं बैठे हुए फिर मिल जाऊंगा.’’

धुन फोन काटते हुए बोली, ‘‘मैं इस शख्स की जिंदगी में स्टैपनी का रोल करती हूं.’’

गीत धुन को गहरी नजरों से देखते हुए बोला, ‘‘तुम्हारे पति हैं?’’

धुन सोचते हुए बोली, ‘‘मै शादीशुदा नहीं हूं और ये पति जरूर हैं मगर किसी और के.’’

गीत बोला, ‘‘तो फिर यह स्टैपनी का रोल किस ने दिया है तुम्हें?’’

धुन ने कहा, ‘‘जिन लड़कियों की शादी नहीं होती है न वो स्टैपनी ही बन जाती हैं.’’

गीत हंसते हुए बोला, ‘‘यह विक्टिम कार्ड मत खेलो यार, तुम्हें कोई फोर्स नहीं कर सकता है जब तक तुम खुद राजी न हो. तुम चाहो तो किसी के साथ टायर भी बन सकती हो. पढ़ीलिखी लगती है, खुशशक्ल भी दिखती हो, अपने पर तरस क्यों खाती हो.’’

धुन और गीत काफी देर तक अपनीअपनी जिंदगी के नगमे सुनाते रहे. धुन की तंद्रा तब टूटी जब मम्मी का फोन आया.

आज धुन न जाने क्यों अंदर से अच्छा महसूस कर रही थी. मम्मी अगले दिन पहले से बेहतर महसूस कर रही थी और वह आज खुद चाह रही थी कि धुन भैया, भाभी के साथ चली जाए.

मगर धुन को बाहर घूमने से ज्यादा गीत के साथ बातें करने का मन था. कल गीत के

साथ बात करते हुए धुन को ऐसा महसूस हो रहा था मानो वह खुद से ही रूबरू हो रही हो.

आज धुन बिना किसी शिकायत के खुद ही रुक गई. मम्मी को नाश्ता और दवाई देने के बाद उस के कदम फिर से उस दिशा की ओर बढ़ गए जहां पर गीत बैठा रहता था.

धुन इस अजनबी के साथ सबकुछ सा?ा करना चाहती थी. धुन को पता था कि गीत उसे कभी जज नहीं करेगा.

धुन की पूरी कहानी सुनने के बाद गीत बोला, ‘‘प्यार की उम्मीद करना कोई बुरी बात नहीं है मगर एक शादीशुदा आदमी से ऐसी उम्मीद रखना बेवकूफी है. देखो धुन, मनु के साथ तुम अपनी शारीरिक जरूरतें पूरी कर सकती हो मगर भावनात्मक जरूरतें मनु जैसा अधूरा इंसान कैसे पूरा कर पाएगा.

‘‘तुम क्यों उस के जीवन में स्टैपनी बनती हो. बल्कि मनु जैसे कितने अधूरे इंसान तुम्हारी जिंदगी में स्टैपनी बन सकते हैं. तुम पढ़ीलिखी हो, नौकरीपेशा हो, क्या दिक्कत है? धुन यह तुम पर निर्भर है कि तुम्हें अपनी जिंदगी की गाड़ी का ड्राइवर बनना है या फिर स्टैपनी बन कर जिंदगीभर रोना है.

‘‘कौन कहता है कि घूमने के लिए परिवार, बौयफ्रैंड या पति चाहिए. घूमने के लिए प्लानिंग, पैसा और सेहत चाहिए. तुम्हारी इच्छा थी कि तुम फ्री में अपने भाई के साथ घूम लो, इसलिए तुम आई थी और क्योंकि भाई ने पैसे लगाए थे, इसलिए तुम्हारी मम्मी ने उन्हें वरीयता दी थी.

‘‘मनु को पता है कि उस की एक तारीफ पर तुम बिछ जाओगी, इसलिए वह तुम्हें भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करता है. तुम चाहो तो यही पैतरा उस के साथ अपना सकती हो. मनु के पास औप्शंस की कमी हो सकती है, तुम्हारे पास नहीं. मगर चुनाव तुम्हें खुद ही करना होगा. इस के लिए कोई भी जिम्मेदार नहीं है.

धुन ने तो ऐसा कभी सोचा ही नहीं था.

उसे तो अब तक यही लगता था कि जिंदगीभर उसे स्टैपनी बन कर रहना होगा चाहे वह किसी पुरुष के साथ रिश्ता हो या फिर परिवार के साथ.

धुन और गीत ने एकदूसरे के नंबर ले लिए मगर गीत ने कभी धुन को न तो मैसेज किया और न ही कौल. गीत को पता था कि धुन अकेली है मगर फिर भी उस ने कभी फायदा उठाने की कोशिश नहीं करी है. हां, जब कभी मन करता धुन महीने में एक बार गीत से बात कर लेती.

मनाली से लौटने के बाद धुन की जिंदगी की धुन सुरीली हो गई. अब उस ने अपनी जिंदगी का फोकस बस खुद पर कर लिया था.

मनु से अब वह तब ही मिलती जब उस का मन होता. खुद पर दया करने के बजाय धुन ने खुद पर काम करना शुरू कर दिया. अब धीरेधीरे वह अपनी जिंदगी की गाड़ी का एक मजबूत पहिया बनने की दिशा में अग्रसर थी और इस पहिए को कोई भी स्टैपनी में नहीं बदल सकता  है. Motivational Story

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