टोमैटो फेस मास्क दें कुदरती खूबसूरती

सेहत बनाने के लिए तो हम सभी टमाटर खाते हैं लेकिन क्या आपने कभी रूप निखारने और त्वचा की देखभाल के लिए टमाटर का इस्तेमाल किया है?

टमाटर में कई ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो त्वचा के लिए फायदेमंद होते हैं. ये त्वचा को कुदरती तौर पर निखारने का काम करता है. बढ़ती उम्र के लक्षणों को कम करता है और सनस्क्रीन की तरह त्वचा की देखभाल करता है.

टमाटर में विटामिन ए, सी और एंटी-ऑक्सीडेंट की भरपूर मात्रा होती है. ये त्वचा की नमी को बनाए रखता है और पोषित करने का काम करता है. टमाटर का इस्तेमाल कई प्रकार से किया जा सकता है.

आप चाहें तो अपनी आवश्यकता और सहूलियत के अनुसार टमाटर का फेस मास्क तैयार कर सकते हैं. टमाटर का फेस मास्क तैयार करना बहुत ही आसान है. आप अपनी जरूरत के आधार पर इनमें से कोई भी चुन सकते हैं.

टमाटर और छाछ का फेस मास्क

दो चम्मच टमाटर के रस में 3 चम्मच छाछ मिला लें. इन दोनों को अच्छी तरह मिलाकर चेहरे पर लगाएं. थोड़ी देर इसे यूं ही लगे रहने दीजिए. जब ये सूख जाए तो इसे साफ कर लें. टमाटर और छाछ के फेसपैक के नियमित इस्तेमाल से दाग-धब्बों की समस्या दूर हो जाती है.

ओटमील, दही और टमाटर का फेस मास्क

ओटमील, टमाटर का रस और दही ले लें. इन सभी चीजों को अच्छी तरह मिला लें. इस पेस्ट को चेहरे पर लगाकर कुछ देर के लिए यूं ही छोड़ दें. उसके बाद हल्के गुनगुने पानी से चेहरा धो लें. एक ओर जहां टमाटर के इस्तेमाल से त्वचा में निखार आता है वहीं ओटमील डेड स्कि‍न को दूर करने का काम करता है. दही से चेहरा मॉइश्चराइज हो जाता है.

टमाटर और शहद का फेस मास्क

एक चम्मच शहद और टमाटर ले लें. इन दोनों को अच्छी तरह मिला लें और चेहरे पर लगाएं. 15 मिनट तक इस मास्क को लगा रहने दें. फिर गुनगुने पानी से चेहरा धो लें. इससे चेहरे पर निखार आ जाएगा.

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बच्चों को वित्तीय जानकारी कैसे दें?

तकनीकी में हो रहे बदलाव और जीवन यापन की लागत में हो रही वृद्धि के मद्देनजर हमें खुद से सवाल पूछना चाहिए कि क्या आज के बच्चों को हम वित्तीय उत्पादों व सेवाओं के बारे में पर्याप्त जानकारी दे रहे हैं. बच्चों को अब पैसे के लेनदेन व निवेश प्रबंधन की शिक्षा देना काफी अहम हो गया है.

कुछ वर्ष पहले उद्योग चैंबर एसोचैम ने एक सर्वेक्षण के आधार पर कहा था कि अब बच्चों को 3,000 रुपये से लेकर 12 हजार रुपये मासिक तक की राशि बतौर पॉकेट मनी मिलने लगी है.इस पैसे को वे मॉल में खरीददारी करने में या फोन रिचार्ज करने जैसे चीजों पर खर्च कर रहे हैं. एक दशक पहले बच्चों को 400 से 500 रुपये जेब खर्च के तौर पर मिलते थे. इस बदलाव से पता चलता है कि पैसे का हिसाब-किताब रखने की मानसिकता को विकसित करना कितना जरूरी है.

1. नकद खरीदारी की आदत डालें

वैसे तो अब क्रेडिट व डेबिट कार्ड सामान्य सी बात है. इसके जरिये खरीदारी करना कई मामले में आसान भी होता है, लेकिन शुरुआत में बेहतर होगा कि आप बच्चों को नकदी में खरीदारी करने की आदत डालें. मसलन चाय-काफी का भुगतान और किराना दुकानों पर छोटी खरीदारी करना वगैरह. इससे उन्हें पैसे का हिसाब-किताब रखने की व्यावहारिक जानकारी मिलेगी.

2. एटीएम के जरिये पैसे के स्नोत की जानकारी दें

तीन-चार साल के बच्चों को पैसे के स्नोत की जानकारी देने के लिए एटीएम एक बेहतर जगह है. बच्चे दरअसल यह समझते हैं कि पैसे के स्नोत की कोई सीमा नहीं होती. एटीएम ले जाकर उन्हें बताया जा सकता है कि पैसा कहां से आता है और यह असीमित आपूर्ति का केंद्र नहीं है, बल्कि जितने रुपये निकालेंगे आपके बैंक खाते में उतनी ही कम राशि बचेगी.

3. सुपरमार्केट में भी पाठशाला

अक्सर हम बच्चों को सुपरमार्केट ले जाते हैं. वहां भी कई तरह की शिक्षा दी जा सकती है मसलन कैसे किफायती सामान खरीदें, कैसे महंगे-सस्ते पर फैसला करें. इससे उनमें ब्रांड व उत्पादों की गुणवत्ता को लेकर भी जागरूकता बढ़ेगी.

4. छोटी उम्र से बचत की आदत

अगर आप बच्चों को छोटी उम्र से ही इच्छा, चाह और जरूरत के बीच अंतर समझाने की कोशिश करें तो यह अच्छी शुरुआत होगी. अगर संबंधियों की तरफ से कोई मौद्रिक उपहार मिलता है तो उसका प्रबंध कैसे करें, कैसे उसे बचत में शामिल करें, कैसे उसे सोच समझ कर खर्च करें. इन छोटी-छोटी बातों की जानकारी देकर आप उनमें बचत की आदत डाल सकते हैं.

5. वित्तीय तौर पर आजादी दें

बच्चों को जितनी जल्दी वित्तीय आजादी की समझ आ जाए, उतना ही बेहतर होगा. इससे उनमें आत्मविश्वास बढ़ेगा. वे यह समझेंगे कि हर चीज के लिए माता-पिता पर आश्रित नहीं रहा जा सकता. अगर आपका बच्चा दस वर्ष का हो गया है तो उसका अपना बैंक खाता खोल दीजिए. बैंक खाते के साथ उसका अपना डेबिट कार्ड आ जाएगा. उसे यह देखने दीजिए कि किस तरह से राशि ब्याज के साथ बढ़ती है?

6. खुद बनिए आदर्श

सबसे अहम सीख आप बच्चों को उनका आदर्श बनकर दे सकते हैं. आपातकालीन स्थिति के लिए बचत कीजिए और बच्चों के सामने एक उदाहरण पेश कीजिए. वैसे इस तरह के उदाहरण हमारे देश में हमेशा से रहे हैं. अगर आप पैसे को लेकर एक जिम्मेदारी का अनुभव करते हैं तो यह सीख जरूर बच्चों तक पहुंचेगी.

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जानें अस्थमा के कारणों को

ग्लोबल बर्डन औफ डिजीज स्टडी के अनुसार, दुनिया भर में 334 मिलियन लोग अस्थमा से पीडि़त हैं. चैस्ट स्पैशलिस्ट डा. सुशील मुंजाल कहते हैं, ‘‘अस्थमा में सांस की नलियों में सूजन आ जाती है. इस के लक्षण प्रत्येक व्यक्ति में भिन्न हो सकते हैं. लेकिन एक कारक आम होता है वह यह कि जब भी सांस की नलियां किसी भी तरह की ऐलर्जी के संपर्क में आती हैं तो उन में सूजन हो जाती है, जिस से वे सिकुड़ कर चिपचिपा पदार्थ बनाती हैं. उस से सांस की नलियां बाधित होती हैं और सांस लेने में तकलीफ होती है. इस के साथसाथ खांसी भी होती है.’’

हालांकि अस्थमा होने के कारण स्पष्ट नहीं हैं, फिर भी माना जाता है कि यह ऐलर्जी और पारिवारिक इतिहास से जुड़ा होता है.

विशेषज्ञ मानते हैं कि अस्थमा से पीडि़त लोगों या उन्हें मैनेज करने वालों के लिए यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि रोगी को किन कारणों से अस्थमा की समस्या तेज होती है. इस से न सिर्फ अस्थमा को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी. वरन अस्थमा अटैक में भी कमी आएगी. पर्यावरणीय कारकों भोजन और सांस लेते समय किसी चीज से ऐलर्जी होने का पता चलने पर रोगी गंभीर अस्थमा अटैक को रोक सकता है. अस्थमा रोगियों को निम्नलिखित ट्रिगर के बारे में जानना महत्त्वपूर्ण है:

पराग: ये पेड़, खास तरह की घास या अन्य पर्यावरणीय कारकों से पैदा होने वाले बहुत छोटे कण होते हैं. पराग के इन कणों को खासतौर से वसंत के मौसम में एअर कंडीशनर के इस्तेमाल से रोका जा सकता है. वसंत ऋतु के दौरान हवा में पराग की मात्रा काफी होती है. दोपहर में जब पराग का स्तर ज्यादा होता है तब बाहर निकलते समय नाक और मुंह पर मास्क लगा लें. सोने से पहले बालों को धोएं. अगर दिन में आप पराग के संपर्क में आए हैं तो रात में बाल धोना फायदेमंद रहेगा.

प्रदूषक और अस्थमा बढ़ाने वाले पदार्थ:ये पदार्थ अंदर व बाहर दोनों जगह हो सकते हैं. स्टोव, परफ्यूम, स्प्रे इत्यादि से अस्थमा रोगियों को समस्या हो सकती है. नए फर्नीचर, फर्श, दीवारों, छत इत्यादि से आने वाली गंध भी ट्रिगर का काम कर सकती है. बालों वाले जानवर: कुत्ते, बिल्ली, पक्षी, चूहे, गिलहरी इत्यादि से हवा में अस्थमा के ट्रिगर हो सकते हैं. इन पक्षियों के बालों, त्वचा, पंखों, लार, मूत्र इत्यादि से अस्थमा रोगी को घरघराहट, खांसी हो सकती है या फिर आंखों से पानी आ सकता है. इस तरह के ट्रिगर से बचने के लिए अस्थमा के रोगियों को घने बालों वाले जानवरों या पंखों वाले पक्षियों से दूर रहना चाहिए. इस के अलावा पालतू जानवरों को हफ्ते में 1 बार जरूर नहलाना चाहिए.

धूम्रपान: यह सांस की नलियों को अवरुद्ध कर के फेफड़ों को स्थाई रूप से क्षतिग्रस्त कर सकता है. जब तंबाकूयुक्त धूम्रपान को सांस द्वारा अंदर किया जाता है तो यह अस्थमा अटैक का ट्रिगर हो सकता है. इस समस्या को नियंत्रित करने के लिए अस्थमा रोगियों को न सिर्फ धूम्रपान छोड़ना होगा, बल्कि ऐसे स्थानों पर भी जाने से परहेज करना होगा जहां धूम्रपान हो रहा हो या धुंआ हो. अगर घर में कोई सदस्य धूम्रपान करता है तो उसे इसे छोड़ने को कहें.

स्पे्र और प्रसाधन सामग्री: अस्थमा अटैक कई बार गीले पेंट, ऐरोसोल स्प्रे या किसी भी साफसफाई करने वाले उत्पाद से हो सकता है. कई बार परफ्यूम या डियो भी अस्थमा के ट्रिगर का काम कर सकता है, इसलिए अस्थमा के रोगी ऐसी जगहों पर जाने से परहेज करें जहां नया पेंट हुआ हो. पेंट सूखने के बाद ही उस स्थान पर जाएं. घर में बिना गंध वाले सफाई उत्पादों का प्रयोग करें.

व्यायाम: व्यायाम करना सेहत के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है, लेकिन अस्थमा के रोगियों को डाक्टर से परामर्श ले कर ही सही तरीके से व्यायाम करना चाहिए. विशेषज्ञ मानते हैं कि हालांकि अस्थमा को पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता, लेकिन लक्षणों को रोक कर इसे नियंत्रित जरूर किया जा सकता है. इन्हेलेशन थेरैपी में कोरटिकोस्टेराइड से अस्थमा को मैनेज किया जाता है. इस के अलावा ओरल दवाओं के मुकाबले इन्हेल्ड कोरटिकोस्टेराइड बहुत कम मात्रा में फेफड़ों में सीधे पहुंच कर काम करता है. यह चिपचिपे पदार्थ को बनने से रोकता है और सूजन कम करता है, जिस से सांस की नलियां अधिक संवेदनशील नहीं रहतीं और अस्थमा अटैक कम होता है.

डा सुशील मुंजाल कहते हैं, ‘‘अस्थमा को नियंत्रित करने में इन्हेलेशन थेरैपी बेहतरीन विकल्प है. इस के बावजूद लोगों में इस की प्रभावशीलता को ले कर कई तरह के संदेह हैं. मैं ने कई मामलों में देखा है कि अभिभावक अपनी अविवाहित लड़की को थेरैपी देने से रोकते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इस से लोगों को पता चल जाएगा कि उन की बेटी को अस्थमा की समस्या है, जिस से विवाह करने में दिक्कत होगी. मगर कारगर तकनीकों से अस्थमा को बेहतरीन तरीके से मैनेज किया जा सकता हो तो सामाजिक शंकाओं को परे कर जिंदगी को खुली हवा में जीना चाहिए.’’

-डा. सुशील मुंजाल नैशनल इंस्टिट्यूट औफ ट्यूबरक्लोसिस

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कम जगह में कैसे बढ़ाएं प्यार

परिवार एक एकल इकाई है, जहां पेरैंट्स और बच्चे एकसाथ रहते हैं. इन्हें प्रेम, करुणा, आनंद और शांति का भाव एकसूत्र में बांधता है. यही उन्हें जुड़ाव का एहसास प्रदान करता है. उन्हें मूल्यों की जानकारी बचपन से ही दी जाती है, जिस का पालन उन्हें ताउम्र करना पड़ता है. जो बच्चे संयुक्त परिवार के स्वस्थ और समरसतापूर्ण रिश्ते की अहमियत समझते हैं, वे काफी हद तक एकसाथ रहने में कामयाब हो जाते हैं.

साथ रहने के फायदे

बच्चों के साथ जुड़ाव और बेहतरीन समय बिताने से हंसीठिठोली, लाड़प्यार और मनोरंजक गतिविधियों की संभावना काफी बढ़ जाती है. इस से न सिर्फ सुहानी यादें जन्म लेती हैं बल्कि एक स्वस्थ पारिवारिक विरासत का निर्माण भी होता है.

इस का मतलब यह नहीं है कि हमेशा ही सबकुछ ठीक रहता है. एक से अधिक बच्चों वाले घर में भाईबहनों का प्यार और उन की प्रतिद्वंद्विता स्वाभाविक है. कई बार स्थितियां मातापिता को उलझन में डाल देती हैं और वे अपने स्तर पर स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं तथा घर में शांतिपूर्ण स्थिति का माहौल बनाते हैं.  कम जगह में आपसी प्यार बढ़ाने के खास टिप्स बता रही हैं शैमफोर्ड फ्यूचरिस्टिक स्कूल की फाउंडर डायरैक्टर मीनल अरोड़ा :

व्यक्तिगत स्वतंत्रता की व्यवस्था : प्रत्येक बच्चे के लिए एक कमरे में व्यक्तिगत आजादी का प्रबंध करने से उन में व्यक्तिगत जुड़ाव की भावना का संचार होता है. प्रत्येक बच्चे के सामान यानी खिलौनों को उस के नाम से अलग रखें और उस की अनुमति के बिना कोई छू न सके. बच्चों में स्वामित्व की भावना परिवार से जुड़ने के लिए प्रेरित करती है जिस से अनेक सकारात्मक परिवर्तन होते हैं. कमरे को शेयर करने के विचार को दोनों के बीच आकर्षक बनाएं.

नकारात्मक स्थितियों से बचाएं बच्चों को : भाईबहनों में दृष्टिकोण के अंतर के कारण आपस में झगड़े होते हैं. इस के कारण वे कुंठा को टालने में कठिनाई महसूस करते हैं और किसी भी स्थिति में नियंत्रण स्थापित करने के लिए झगड़ते रहते हैं, आप अपने बच्चों को ऐसे समय इस स्थिति से दूर रहने के लिए गाइड करें.

हमें अपने बच्चों को झगड़े की स्थिति को पहचानने में सहायता करनी चाहिए और इसे शुरू होने के पहले ही समाप्त करने के तरीके बताने चाहिए.  व्यक्तिगत सम्मान की शिक्षा दें : प्रत्येक व्यक्ति का अपना खुद का शारीरिक और भावनात्मक स्थान होता है, जिस की एक सीमा होती है, उस का सभी द्वारा सम्मान किया जाना चाहिए. बच्चों को समर्थन दे कर उन की सीमाओं को मजबूत करें.

उन्हें दूसरे बच्चों की दिनचर्या और जीवनशैली का सम्मान करने की शिक्षा भी दें. यदि दोनों भाईबहन पहले से निर्धारित सीमाओं से संतुष्ट हैं तो उन के बीच पारस्परिक सौहार्द बना  रहता है.

क्षतिपूर्ति सुनिश्चित करें : कभी ऐसा भी समय आता है, जब एक बच्चा दूसरे बच्चे की किसी चीज को नुकसान पहुंचा देता है या उस से जबरन ले लेता है. ऐसे में पेरैंट्स को चाहिए कि जिस बच्चे की चीज ली गई है उस बच्चे की भावनाओं का खयाल कर उस के लिए नई वस्तु का प्रबंध करें और गलत काम करने वाले बच्चे को उस की गलती का एहसास करवाएं.

इस से परिवार में अनुशासन और ईमानदारी सुनिश्चित होगी. इस से भाईबहनों को भी यह एहसास होता है कि  पेरैंट्स उन का खयाल रखते हैं और घर में न्याय की महत्ता बरकरार है.  चरित्र निर्माण में सहयोग : एकदूसरे के नजदीक रहने से दूसरे के आचारव्यवहार पर निगरानी बनी रहती है. किसी की अवांछनीय गतिविधि पर अंकुश लगा रहता है. यानी कि बच्चा चरित्रवान बना रहता है. किसी समस्या के समय दूसरे उस का साथ देते हैं. दूसरी और, सामूहिक दबाव भी पड़ता है और बच्चा गलत कार्य नहीं कर पाता. अत: मौरल विकास अच्छा होता है.

बच्चे की जागरूकता की प्रशंसा करें : यदि कोई बच्चा समस्या के समाधान की पहल करता है और नकारात्मक स्थिति से बाहर निकलने की कोशिश करता है तो उस की प्रशंसा करें.

समस्या के समाधान के सकारात्मक नजरिए को सम्मान प्रदान करें, क्योंकि इस से उस का बेहतर विकास होगा और वह परिपक्वता की दिशा में आगे बढ़ेगा. प्रोत्साहन मिलने  से हम अपने लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित होते हैं.  इस से बच्चों को अपनी उपलब्धियों पर गर्व का एहसास होगा और वे इस स्वभाव को दीर्घकालिक रूप से आगे बढ़ाएंगे. हमेशा बच्चे द्वारा नकारात्मक स्थिति में सकारात्मक समाधान तलाशने के प्रयास की प्रशंसा करें.  याद रखें इन नुस्खों को अपना कर आप अपने बच्चों को संभालने में आसानी महसूस करेंगे. भाईबहन एकदूसरे के पहले मित्र और साझीदार होते हैं, जो एक सुंदर व स्वस्थ समरसता को साझा करते हैं, इस से कम जगह में भी पूरा परिवार खुशीखुशी जीवन व्यतीत कर सकता है.

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इन 5 स्टाइल से बनाएं साड़ी को मौडर्न

साड़ी भारतीय महिलाओं का सर्वाधिक पसंदीदा परिधान है. साड़ी को और अधिक आकर्षक बनाने के तरीके इस प्रकार हैं:

1. धोती स्टाइल ड्रैपिंग

अपनी 12 यार्ड्स की साड़ी को धोती में ढाल कर मराठी स्टाइल की साड़ी ड्रैपिंग को एक ऊंचे पायदान पर ले जाया जा सकता है. पल्लू को अपने पैरों के बीच क्रौस करें और इसे किसी भी फ्रीफौल डाइरैक्शन में अपने कंधों पर छोड़ दें. इसे ब्लिंगी अलंकरण से बड़े ब्लाउज के साथ आकार दें.

2. हौल्टर स्टाइल ड्रैपिंग

हौल्टर टौप्स एक पारंपरिक साड़ी के लिए एकदम सही ब्लाउज हो सकता है. तो क्या हो अगर आप की साड़ी एक हैंडलूम पिक या अत्यधिक इंडी समान हो? एक सुंदर इंडी चिक लुक के लिए इसे हौल्टर के साथ जोड़ कर देखें.

3. पैंट स्टाइल ड्रैपिंग

सोनम कपूर से प्रेरित हो कर पैरों तक लंबाई वाले ट्राउजर्स के एक जोड़े को एक साड़ी के साथ जोड़ें. आप इस की तह को 2 बार मोड़ सकती हैं और लंबाई को कम कर सकती हैं. पल्लू को अपने कंधों पर गिरने दें. जैजी आउटफिट जोकि सजीला है साथ ही विचित्र है.

4. क्रौप स्टाइल ड्रैपिंग

पारंपरिक ब्लाउज के बजाय साड़ी के साथ एक क्रौप टौप का जोड़ा बनाया जा सकता है. इस के परिणामस्वरूप एक सुंदर आकृति उत्पन्न होगी. इस से साड़ी को एक नया स्वरूप मिलेगा.

5. बैस्ट स्टाइल ड्रैपिंग

अपने अंदर छिपी हुई विलक्षण दिवा को प्रकट करने के लिए साड़ी बांधें. बैल्ट अत्यधिक पारंपरिक कमरबंद के लिए एक विकल्प है, लेकिन अगर यह थोड़ा विचित्र एवं इतना मजेदार नहीं है तो फिर फैशन का क्या मतलब हुआ?

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मानसून में एक्ने और आयल फ्री स्किन पाइये

हर किसी को मानसून के मौसम का इंतजार होता है. क्योंकि गर्मी से राहत जो मिलती है. फिर चाहे हलकी बूंदाबांदी हो या फिर हैवी रेन , दिल को अलग ही सुकून मिल जाता है. लेकिन ये मौसम जितना सुहावना होता है, उतनी ही इस मौसम में नमी भी होती है, जो एक्ने का कारण बनती है. खासकर के ये मौसम ऑयली व कोम्बिनेशन स्किन वालों के लिए किसी मुसीबत से कम नहीं होता है. लेकिन परेशान होने से समस्या का समाधान नहीं निकलता , बल्कि इस समय पर सही ब्यूटी प्रोडक्ट का इस्तेमाल करने की जरूरत होती है,  जो स्किन को क्लीन करने के साथ उसके पीएच लेवल को भी बैलेंस में बनाए रखे, ताकि आप मानसून के सीजन को खुशीखुशी एंजोय भी कर सके और स्किन पर एक्ने जैसी कोई समस्या भी न हो. इसके लिए बायोडर्मा का सेबियम जैल मोशेंट बेस्ट प्रोडक्ट है, जो स्किन को क्लीयर व हैल्दी बनाने का काम करता है.

क्यों होती है एक्ने की समस्या 

मानसून के मौसम में बहुत ज्यादा नमी होती है, जिसके कारण त्वचा में सीबम का अत्यधिक उत्पादन होने के कारण स्किन तेलिए लगने लगती है. जो बैक्टीरिया के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण माना जाता है. क्योंकि चिपचिपे व तेलिए फेस पर गंदगी, पसीना आसानी से चिपकने के कारण एलर्जी व  पोर्स के क्लोग होने के साथ एक्ने व ब्रेअकाउट्स का कारण बनता है. खासकर के ऑयली व कोम्बिनेशन स्किन वालों को एक्ने की समस्या का ज्यादा सामना करना पड़ता है. क्योंकि स्किन केयर के अभाव में स्किन बैरियर ठीक से कार्य करने में सक्षम नहीं होने के कारण उस पर तुरंत एलर्जी का कारण बनने के साथ पोर्स को ब्लोक भी कर देता है. जिससे चेहरे पर एक्ने आने के साथ धीरेधीरे आपके चेहरे की रंगत भी फीकी पड़ने लगती है. ऐसे में सही स्किन प्रोडक्ट यानि क्लीन्ज़र से स्किन की केयर करने की जरूरत है.

बायोडर्मा का सेबियम जैल मोशेंट  

ये खास इसलिए है , क्योंकि ये स्किन को बिना ड्राई किए क्लीन करने का काम करता है. इसमें है जिंक सलफेट व कॉपर सलफेट जैसे इंग्रीडिएंट , जो स्किन को बिना कोई नुकसान पहुंचाए , उसकी एपिडर्मिस लेयर यानि स्किन की आउटर लेयर को क्लीन करके सीबम सेक्रेशन को भी कम करने का काम करता है , जिससे एक्ने की समस्या नहीं होती है. साथ ही ये चेहरे पर एक्ने के कारण होने वाले दागधब्बों को भी कम करता है. इसका सोप फ्री फार्मूला स्किन के पीएच लेवल को भी बैलेंस में रखता है. जिससे स्किन पर कोई प्रोब्लम हुए बिना  स्किन प्रोब्लम्स ठीक हो जाती हैं.  

यूएसपी जानकर खरीदें 

जेंटली क्लीन योर स्किन 

स्किन के लिए वही प्रोडक्ट अच्छा होता है, जो उस पर हार्श इफेक्ट डाले बिना स्किन को क्लीन करता है. क्योंकि जेंटल प्रोडक्ट्स स्किन से गंदगी को न सिर्फ आसानी से रिमूव करने का काम करते हैं , बल्कि स्किन के नेचुरल आयल को भी स्किन में बनाए रखते हैं. जिससे स्किन हाइड्रेट भी बनी रहती है, साथ ही स्किन से डस्ट, गंदगी भी रिमूव हो जाती है. जो स्किन को खूबसूरत बनाने के साथ एक्ने फ्री स्किन देने का काम करती है.

पीएच लेवल को बनाए रखे 

ये सेबियम जैल मोशेंट स्किन के पीएच लेवल को बैलेंस में रखने के साथ स्किन पर प्रोटेक्टिव बैरियर का काम करता है. इससे स्किन पर इंफेक्शन व बैक्टीरिया के पनपने के चांसेस काफी कम हो जाते हैं. साथ ही स्किन को बाहरी वातावरण से होने वाले नुकसान से भी प्रोटेक्शन मिलती है. और स्किन का मोइस्चर भी बना रहता है. जो हैल्दी व अट्रैक्टिव स्किन के लिए बहुत जरूरी होता है.

सीबम के अत्यधिक उत्पादन को रोके 

जब त्वचा पर अत्यधिक सीबम का उत्पादन होने लगता है, तो ये न सिर्फ स्किन पर ग्रीसी इफेक्ट देने का काम करता है, साथ ही पोर्स को भी क्लोग करके एक्ने का कारण बनता है. लेकिन इस सेबियम जैल मोशेंट में जिंक सल्फेट की मौजूदगी स्किन पर ज्यादा आयल को उत्पन्न होने से रोकने में मदद करता है. साथ ही इसमें कॉपर सलफेट स्किन पर बैक्टीरिया को पनपने से रोकने के साथ स्किन को हैल्दी बनाने में मददगार है.

पोर्स को क्लोग होने से रोके 

ये प्रोडक्ट नोन कॉमेड़ोजेनिक , नोन डाई और इसका सोप फ्री फार्मूला  होने के कारण ये एक्ने प्रोन, ऑयली व कोम्बिनेशन स्किन के लिए बेस्ट प्रोडक्ट है. क्योंकि अगर आप बिना सोचेसमझें व फिर इंग्रीडिएंट्स को बिना देखे ब्यूटी प्रोडक्ट्स खरीद लेते हैं , तो कई बार उनमें ज्यादा केमिकल्स का इस्तेमाल होने के कारण ये पोर्स के क्लोग करने का कारण बनते हैं. जो एक्ने व स्किन एलर्जी का बड़ा कारण है. जबकि इस प्रोडक्ट को आप सेफली यूज़ कर सकते हैं.

–  डर्मेटोलोजिस्ट  टेस्टेड 

जो भी ब्यूटी प्रोडक्ट आप मार्केट से खरीदें, देखें कि वो  डर्मेटोलोजिस्ट  टेस्टेड होना चाहिए. आपको बता दें कि ये प्रोडक्ट  डर्मेटोलोजिस्ट  टेस्टेड है, जिससे इसका स्किन पर किसी भी तरह का कोई रिएक्शन नहीं होने के साथ ये एक्ने को ट्रीट भी करेगा और स्किन के नेचुरल आयल को भी बनाए रखेगा. दुनियाभर में सेलिब्रिटीज भी इस प्रोडक्ट को यूज़ करने की सलाह देते हैं.  ये माइल्ड होने के साथ स्किन के लिए अच्छा होने के साथ आंखों को भी किसी तरह का कोई नुकसान नहीं पहुंचाता है.

कैसे अप्लाई करें 

इसे आप हफ्ते में सातों दिन अपने मोर्निंग व इवनिंग रूटीन में शामिल करें. बस आपको जरूरत है इस क्लीन्ज़र को अपने गीले चेहरे पर लगाने की. ध्यान रखें ये फोम वे में वर्क करेगा. फिर आप पानी से चेहरे को अच्छे से धो कर आराम से चेहरे को साफ कर लें. इससे आपका चेहरा क्लीन होने के साथसाथ आपको कुछ ही दिनों में एक्ने  फ्री स्किन मिल जाएगी.  तो फिर आज ही इसे अपने ब्यूटी रूटीन में शामिल करके पाएं हैल्दी व एक्ने फ्री स्किन.

युवती भी बन जाए कभी युवक

सैक्स की इच्छा युवक व युवती दोनों की होती है. पर देखा यह गया है कि युवक ही इस की शुरूआत करते हैं पर यदि युवती सैक्स की शुरुआत करे तो युवक को भरपूर आनंद मिलता है लेकिन समस्या यह है कि सैक्स की पहल करे कौन? इस बारे में किए गए एक शोध में पता चला है कि तकरीबन 80 प्रतिशत युवक सैक्स की शुरुआत और इच्छा जाहिर करते हैं. 10 प्रतिशत ऐसे युवक भी हैं जो सैक्स की इच्छा होने पर भी बिस्तर पर पहुंच कर युवती की इच्छाअनिच्छा जाने उस पर टूट पड़ते हैं. कई इस दुविधा में रहते हैं कि पहल करें या न करें.

सैक्स की इच्छा

 सैक्स युवकयुवती का सब से निजी मामला है. दोनों आपसी सहमति से इस का मजा लेते हैं. इस मामले में देखा गया है कि सैक्स की पहल युवक ही करते हैं. इस का मतलब यह नहीं कि युवतियों में सैक्स की इच्छा नहीं होती या वे सैक्स संबंध के लिए उत्सुक नहीं रहतीं.

सच तो यह है कि हमारे देश (मुसलिम देशों में भी) में युवतियों के दिमाग में बचपन से ही यह बात भर दी जाती है कि सैक्स अच्छी बात नहीं होती. इस से बचना चाहिए. अपने प्रेमी के सामने भी कभी सैक्स की इच्छा जाहिर नहीं करनी चाहिए. न ही खुद इस की पहल करनी चाहिए. यह बात उन के दिमाग में इस कदर बैठ जाती है कि प्रेम के बाद वे अपने प्रेमी से इस बारे में बात नहीं कर पाती और न ही खुल कर इच्छा जाहिर कर पाती हैं.

एक महत्त्वपूर्ण बात और है, सबकुछ भूल कर साहस के साथ यदि कोई युवती अपने प्रेमी से सैक्स की पहल कर दे तो उस के लिए आफत आ सकती है, क्योंकि उस का प्रेमी उसे खाईखेली समझ सकता है. इसी भय से सैक्स की इच्छा होते हुए भी युवती इस की पहल नहीं करती. यह बात सच है कि युवकों में युवतियों के सैक्स की पहल को ले कर गलत धारणा है कि जो युवती सैक्स की पहल करती है वह खेलीखाई होती है. देश में आज भी सैक्स को बुराई ही समझा जाता है इसलिए भी युवतियां अपनी ओर से पहल करने से कतराती हैं जबकि विदेशों की युवतियां बराबर शरीक होती हैं.

कनाडा के एक मनोचिकित्सक डा. भोजान ने हाल ही में सैक्स की पहल को ले कर औनलाइन सर्वे करवाया, जिस में यह पता करना था कि सैक्स को ले कर युवक और युवतियों का नजरिया क्या है. अधिकतर युवतियां सैक्स को भरपूर ऐंजौय करना तो चाहती हैं, पर सैक्स की पहल उन के ऐंजौय में आड़े आती है. इच्छा होने पर भी वे पहल नहीं कर पातीं और अनिच्छा होने पर मना भी नहीं कर पाती हैं. डा. भोजान का कहना है, युवतियों को सैक्सुअली ऐक्टिव बनाने के लिए उन में इमोशंस की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है. सैक्स का आनंद वे तभी उठा पाती हैं.

मजेदार बात यह है कि सैक्स की पहल को ले कर युवकों का नजरिया काफी बदला है. अब युवक भी चाहता है कि उस की पार्टनर सैक्स के बारे में उस से खुल कर बात करे. उस से सैक्स की इच्छा जाहिर करे.

यह जान कर अधिकतर युवतियों को विश्वास नहीं होगा कि औनलाइन सर्वे में पता चला है कि युवक अपने मन में युवती की तरफ से पहल की चाह संजोए रहते हैं, लेकिन उन की चाह बहुत कम ही पूरी हो पाती है. युवतियों द्वारा पहल न करने की वजह से मजबूरन युवकों को अपनी तरफ से पहल करनी पड़ती है.

युवती करे पहल

 जब सैक्स की चाह युवती और युवक दोनों में समान होती है तो ऐसे में सिर्फ युवक ही सैक्स की पहल क्यों करें? युवतियों को भी कभीकभी सैक्स की पहल करनी चाहिए ताकि वे सैक्स को अपनी तरह से ऐंजौय कर सकें.

सर्वे में यह भी पता चला है कि युवतियों को ले कर उन की सोच बदल रही है. युवक भी यह बात समझने लगे हैं कि सैक्स की इच्छा सिर्फ उन में ही नहीं युवतियों में भी होती है. ऐसे में युवती अपने पति से सैक्स की पहल करती है तो इस में बुराई क्या है? सर्वे में अनेक युवकों का कहना था कि अपनी पार्टनर की ओर से की गई पहल उन की रगरग में जबरदस्त जोश भर देती है.

डा. भोजान कहते हैं कि युवक के जोश का युवती के सैक्सुअल सैटिस्फैक्शन से सीधा संबंध होता है. मतलब अपनी ओर से की गई पहल का फायदा उन्हें सीधे तौर पर मिलता है.

युवतियों को अब जान लेना चाहिए कि जमाना बदल गया है. दुनिया भर के युवकों की सोच भी बदल रही है. अपनी झिझक और डर को दूर कर बेझिझक हो कर आप भी कभीकभी युवक बन जाएं और सैक्स ऐंजौय करें.

यहां कुछ तरीके बताए जा रहे हैं, जिन्हें अपना कर आप पार्टनर को सैक्स के लिए उत्साहित कर सकती हैं.

आत्मविश्वास लाएं : सब से पहले अपने अंदर आत्मविश्वास लाएं, ताकि बेझिझक सैक्स की पहल कर सकें.

मूड बनाएं : अपने पार्टनर के मूड को देखें और उस के साथ प्यार भरी बातें करें. आप की बातें ऐसी होनी चाहिए कि इस में तैरते हुए सैक्स में डूब जाएं. लव मेकिंग के दौरान खुल कर सैक्स की बातें करें. यदि आप शर्मीली हैं तो डबल मीनिंग वाले नौटी जोक्स उन पलों का मजा बढ़ा देंगे.

तारीफ करें : आज की रात आप खुद ही लगाम थामिए. सब से पहले उन की तारीफ की झड़ी लगा दें. फिर कान में फुसफुसा कर  अचानक किस कर उन्हें हैरान करें. कान में की गई फुसफुसाहट उन की रगों में खून का लावा भर देगी. जब हर कहीं ऐक्सपैरिमैंट की बहार चल रही है तब सैक्स लाइफ में इसे क्यों न आजमाएं.

छेड़छाड़ करें : लव मेकिंग के लिए छेड़छाड़ को मामूली क्रिया न समझें. अपनी ओर से पहल करते हुए पार्टनर के साथ छेड़छाड़ करें. इस दौरान कमरे की लाइट धीमी कर दें. साथ में हलका रोमांटिक हौट म्यूजिक बजा दें. कमरे की धीमी लाइट में आंखों की पुतलियां फैल जाती हैं, जिस से रोमांस हार्मोंस शरीर में तेजी से बढ़ने लगता है. साथ में हौट म्यूजिक. इस पल के लिए पूरी रात भी आप के लिए कम पड़ेगी.

आकर्षक लगें : सैक्स की इच्छा अपने पार्टनर से जाहिर करनी है तो अट्रैक्टिव व सैक्सी मेकअप करें. फिर देखें बैडरूम में अपनी बोल्ड ब्यूटी को देख कर उन्हें आज की रात का प्लान समझते देर नहीं लगेगी.

माहौल बनाएं : अपने आसपास का माहौल खुशबूदार व रोमांटिक बनाएं. इस के लिए बेहद हौट म्यूजिक बजाएं. रोमांटिक सौंग गुनगुनाएं. तेज परफ्यूम का छिड़काव करें. ऐेसे माहौल में उन के अंदर आग भड़काने में देर नहीं लगेगी. आप के शरीर की भीनीभीनी खुशबू और गरम सांसें उन को बेचैन करने के लिए काफी हैं. क्यों न उन की पसंद की खुशबू का इस्तेमाल कर उन्हें कहर ढाने के लिए मजबूर कर दें.

खुलापन लाएं : अपने पार्टनर पर खुल कर प्यार लुटाएं. किस करें, गले लगें, बांहों में जकड़ लें. आहें या सिसकियां भरें, ब्लाउज या ब्रा के बटन लगाने या खोलने के बहाने उन्हें अपने पास बुलाएं, टौवेल में उन के सामने हाजिर हो जाएं. आप के खुलेपन को देख कर आप की भावनाओं को वे बड़ी आसानी से समझ जाएंगे. मूड न होने पर भी उन का मूड बन जाएगा.

सैक्सी लौंजरी : लौंजरी, नाइटी या अंडरगारमैंट की खूबी को ऐसे मौके पर इस्तेमाल करें. इन्हें खरीदते वक्त खासकर इस के फैब्रिक पर ध्यान दें. महीन, मुलायम और फिसलन वाले फैब्रिक हो, जिन पर हाथ फेरते ही उन के हाथ खुदबखुद फिसलने लगेंगे. इस के आकार और रंग का भी ध्यान रखें. यह आप की नहीं उन की पसंद की हो.

हौलेहौले : यदि आप रात को कुछ खास बनाना चाहती हैं तो देर न करें. उन के बैडरूम में आते ही उन के नजदीक जा कर प्यार जताएं. एकएक कर उन के कपड़े उतारना शुरू करें. आप का बदला रूप देख कर वे ऐक्साइट हो जाएंगे. उन्हें हौट होने में देर नहीं लगेगी. यह उन्हें शारीरिक रूप से ही नहीं मानसिक रूप से भी उत्तेजित करता है.

पोर्न ट्रंप : अगर आप सचमुच में सैक्स के क्लाइमैक्स को ऐंजौय करना चाहती हैं तो पोर्न को ट्रंप कार्ड की तरह इस्तेमाल करें. उन के सामने पोर्न फिल्म, साइट, मैगजीन या अन्य सामग्री ले कर बैठ जाएं. फिर देखें उन में कैसे जोश भरता है.

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फ्रीजी हेयर नो प्रौब्लम

औफिस के लिए तैयार होते वक्त मोहिनी का 1 घंटा सिर्फ अपने बाल संवारने में लग जाता है. अब यह सुन कर आप को और हैरानी होगी कि इस 1 घंटे में मोहिनी कोई स्टाइलिश हेयरस्टाइल नहीं बनाती, बल्कि साधारण तरीके से 1 पोनीटेल ही बना पाती है. 1 पोनीटेल बनाने में मोहिनी को इतना वक्त इसलिए लग जाता है, क्योंकि उस के बालों में फ्रीजी बेबी हेयर की समस्या है. इस समस्या को कई नामों से पुकारा जाता है. मसलन, बेबी हेयर, फ्लायवेज आदि.

दरअसल, फ्रीजी बेबी हेयर समस्या सिर्फ मोहिनी की ही नहीं, बल्कि हर उस महिला की है जिस के बाल रूखे और घुंघराले होते हैं. फिर चाहे बाल छोटे हों या बड़े. डर्मेटोलौजिस्ट वरुण कतियाल इस समस्या को ऐलोपेशिया बताते हैं. वे कहते हैं, ‘‘यह समस्या जैनेटिक भी हो सकती है और खराब वातावरण की वजह से भी महिलाएं इस समस्या का शिकार हो सकती हैं.’’

वैसे यह समस्या अधिकतर सर्दी के मौसम में होती है. लेकिन इस बाबत एशियन इंस्टिट्यूट में डर्मेटोलौजिस्ट डाक्टर अमित बांगिया का कहना है, ‘‘मनुष्य के सिर पर बालों की संख्या लगभग 1 से 2 लाख के बीच होती है. हर बाल का जीवन 1 से 3 वर्ष होता है. वैसे यह बाल की गुणवत्ता पर भी निर्भर करता है कि कितने समय तक वह जीवित रहेगा. जैसे-जैसे बाल की उम्र पूरी होती जाती है वह टूट जाता है और उस के स्थान पर नया बाल निकल आता है. इस बात की जानकारी भी कम ही महिलाओं को होती है कि  रोज लगभग 100 बाल टूटते हैं और 50 नए बाल उगते हैं. इसलिए हर बाल की एक लैंथ नहीं हो सकती है.’’

मगर अधिकतर महिलाओं को यह समस्या हेयरलाइन पर होती है. डाक्टर वरुण कहते हैं, ‘‘जहां अधिकतर महिलाओं की फ्रंट हेयरलाइन पर बालों की लैंथ बहुत कम होती है, वहीं कुछ महिलाओं के कानों के पीछे और नैक हेयरलाइन पर फ्लायवेज हेयर होते हैं. इन की लैंथ बढ़ाने का वैसे कोई वैज्ञानिक तरीका नहीं है, लेकिन थोड़ी देखभाल और सही उत्पादों के इस्तेमाल से इन्हें व्यवस्थित किया जा सकता है.’’

जानें क्या हैं कारण

फ्रीजी बेबी हेयर की सब से बड़ी वजह होती है लो ह्यूमिडिटी और शुष्क हवा. डाक्टर अमित के अनुसार, बालों में मौइश्चर की कमी होने से वे रूखे हो जाते हैं, साथ ही उन का एकदूसरे से जुड़ाव भी खत्म हो जाता है. ऐसे में डीप कंडीशनिंग बालों की फ्रीजीनैस खत्म करने का सब से अच्छा विकल्प है. डीपकंडीशनिंग के लिए नारियल का गरम तेल काफी फायदेमंद रहता है. गरम तेल से मालिश करने के लगभग 1 घंटे बाद शैंपू से बाल धोए जा सकते हैं. ध्यान रहे बाल ऐंटीसैप्टिक फौर्मूला बेस्ड शैंपू से ही धोएं.

हेयर स्प्रे का करें इस्तेमाल

हेयरस्टाइल बनाते वक्त अकसर छोटी लैंथ के बाल लुक को खराब कर देते हैं. ऐसे में स्ट्रौंग मगर अच्छी क्वालिटी का हेयर स्प्रे लगा कर फ्रीजी बेबी हेयर को दबाया जा सकता है. यदि हेयर स्प्रे का इस्तेमाल न करना चाहती हों, तो सिलिकौन बेस्ड हेयर जैल या हेयर सीरम का भी इस्तेमाल कर सकती हैं. ये दोनों ही उत्पाद बालों को स्मूद और शाइनी फिनिश देते हैं. इस के अतिरिक्त बहुत ही कम मात्रा में बौडी लोशन भी फ्रीजी बेबी हेयर पर लगाया जा सकता है. लेकिन ध्यान रहे कि लोशन सिर्फ बालों को दबाने के लिए लगाएं न कि उन्हें ग्रीसी बनाने के लिए.

ड्रायर शीट और स्टैटिक फ्री ब्रश की लें मदद

बालों को इंस्टैंट फिक्स करने के लिए हाथों में हलका पानी लगा कर बालों में फिराएं और फिर स्टैटिक फ्री ब्रश से कंघी करें. स्टैटिक फ्री ब्रश इसलिए, क्योंकि यह स्कैल्प में रक्तसंचार को सुधारता है, जिस से दोमुंहे बाल और फ्रीजी बेबी हेयर की समस्या काफी हद तक कम हो जाती है.

बालों में अधिक पिनें लगाना भी है एक कारण

कई महिलाएं हेयरस्टाइल बनाने के लिए तरहतरह की पिनों का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन ये बालों को खींचती हैं और उन्हें कमजोर बना देती हैं. ब्यूटीशियन रेनू महेश्वरी कहती हैं, ‘‘कभी पिनें ऐसे न लगाएं कि बाल खिंचने लगें, बल्कि बालों में ऐसे लगाएं कि बाल बंधे रहें. पिनें लगाने की ही तरह उन्हें निकालने का भी तरीका होता है. कभी उन्हें खींच कर बालों से न निकालें और साथ ही ऐसी पिनों का चुनाव करें, जो बालों में फंस कर उन्हें तोड़ें नहीं.’’

इन बातों का भी रखें ध्यान

– चेहरा धोते वक्त साबुन या फेसवाश बालों में न लगे. बारबार साबुन लगने से बालों से नमी चली जाती है और वे टूटने लगते हैं.

– बालों में कंघी करते वक्त हमेशा नीचे से ऊपर की तरफ को पहले उन्हें सुलझा लें, फिर ब्रश करें.

– रात में सोते वक्त बालों को हमेशा हलका बांध कर सोएं.

– फ्रीजी बेबी हेयर की औलिव औयल से मालिश करें.

– ऐसे बालों पर अच्छी तरह कंडीशनर लगाएं.

– गीले बालों को उंगलियों से सुलझाएं.

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विदेश में पढ़ाई से पहले जानें 7 बातें

बीते 2 सालों में कोरोना ने पूरी दुनिया में कुहराम मचाया है और इस महामारी की दोहरी मार झेली विदेशों में पढ़ने वाले छात्रों ने. कई छात्रों को अपने देश वापस आने के लिए पहले विदेशी नियमों की मुश्किलों से गुजरना पड़ा और फिर बाद में अपने देश आ कर क्वारंटाइन के सख्त नियमों से. आप के बच्चे के लिए विदेश में पढ़ाई करना मुश्किल न हो इस के लिए इन बातों का ध्यान जरूर रखें:

1. करें पूरी रिसर्च

जिस देश में बच्चा पढ़ने जा रहा है उस देश के रहनसहन के तौरतरीकों और नियमों के बारे में पूरी जानकारी जमा करें. इस के लिए सिर्फ गूगल के भरोसे न रहें बल्कि ऐसे किसी बच्चे से मिलने की कोशिश करें जो पहले वहां रह कर पढ़ाई कर चुका हो. वहां करंसी ऐक्सचेंज करने के क्या नियम हैं यह भी जरूर पता करें. जिस यूनिवर्सिटी में बच्चा पढ़ने जा रहा है वह रहने और खाने की क्या सुविधा देती है यह भी जानना जरूरी है. सब से जरूरी बात यह कि वहां का मौसम कैसा रहता है और आप के बच्चे को किसी खास मौसम से कोई स्वास्थ्य समस्या तो नहीं, यह जानकारी भी रखें.

2. पेपर वर्क

पासपोर्ट के साथसाथ वे सभी पेपर्स संभाल कर रख लें जो आप को विदेश में पढ़ाई की अनुमति देते हैं. उस देश में अपना बैंक अकाउंट खुलवाने के लिए जरूरी प्रूफ्स का पहले से पता कर लें और उन्हें भी संभाल कर रख लें. अपने हैल्थ इंश्योरैंस से जुड़े पेपर्स साथ रखें और यदि वे विदेश में मान्य नहीं हैं तो उन्हें कैसे अपडेट कराना है यह जानकारी भी आप को होनी चाहिए. एटीएम इत्यादि इंटरनैशनल ट्रांजैक्शन के लिए पहले ही मान्य करवा लें.

3. बैग पैक

आस्ट्रेलिया, अमेरिका, जरमनी और रूस जैसे देशों में विंटर सीजन भारत के विंटर सीजन से बिलकुल अलग होता है. यदि इन देशों में जा रहे हैं तो पहले से रिसर्च करने के बाद ही कपड़े तैयार करें. इलैक्ट्रौनिक उपकरणों को चार्ज करने वाले अडौप्टर इत्यादि के बारे में भी पता कर लें क्योंकि हर देश में स्विच पौइंट्स का पैटर्न अलगअलग होता है. जिस देश में जा रहे हैं वहां की ट्रैवल गाइड अपने साथ जरूर रखें.

4. विदेश में रहने की तैयारी

हर देश सांस्कृतिक रूप से अलग होता है. भाषा, पहनावा और कुछ नियम ऐसे होते हैं जिन्हें ले कर वहां के लोग सैंसिटिव होते हैं. सही रहेगा यदि आप उस देश की भाषा को सीख लें. हर देश में सिर्फ अंगरेजी बोलने से काम नहीं चलेगा. विदेश जाने से पहले अपने ट्रैवल डाक्टर से जरूरी दवाओं की प्रिस्क्रिप्शन जरूर ले लें. विदेश में रहना और आसान बनाना है तो वहां के इतिहास और राजनीति के बारे में भी थोड़ी जानकारी जमा कर लें.

5. विदेश पहुंचने पर

विदेश पहुंचने पर 24 घंटों के अंदर अपना रजिस्ट्रेशन जरूर करवा लें. वैसे तो हर देश में इस के नियम अलग हैं, मगर यदि आप भारतीय दूतावास में अपना पंजीकरण करा लेंगे तो आगे आप को बहुत सुविधा होगी. बीते 2 सालों में कोरोना या रूसयूक्रेन युद्ध के चलते उन छात्रों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा जिन की जानकारी दूतावास के पास नहीं थी.

6. पढ़ाई भी कमाई भी

वैसे यह कल्चर भारत में कम देखने को मिलता है, लेकिन विदेशों में यह बहुत है. यदि आप का शिक्षण संस्थान अनुमति दे तो आप पढ़ने के साथसाथ कुछ पैसा भी कमा सकते हैं जो आप की आगे की पढ़ाई में काम आ सकता है. कुछ देशों में इस के लिए लोकल परमिशन लेनी पड़ती है तो कहीं वर्क परमिट की जरूरत होती है. ऐक्स्ट्रा पैसा रहेगा तो युद्ध और महामारी की स्थिति में आप के बेहद काम आएगा.

7. इंटरनैशनल स्टूडैंट आइडैंटिटी कार्ड

इस कार्ड के सफर के दौरान कई फायदे हैं. लोकल ट्रैवलिंग के साथसाथ कुछ शौपिंग सैंटर्स पर भी इस कार्ड से डिस्काउंट पा सकते हैं. इसे पाने के लिए आईएसआईसी की वैबसाइट विजिट करें. कुछ पू्रफ अपलोड करने के बाद यहां से इसे औनलाइन भी बनवाया जा सकता है. कुछ देशों में इस कार्ड का इस्तेमाल कर के आप फूडिंग और लौजिंग में भी डिस्काउंट पा सकते हैं.

इन सब बातों के साथसाथ सब से जरूरी है खुद को विदेश में रहने के लिए मानसिक तौर पर तैयार करना. वहां शुरुआती कुछ दिनों तक आप को हर काम में अपनी सहायता खुद ही करनी होगी, इसलिए मानसिक रूप से खुद को पहले से तैयार रखें.

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ब्रेन ट्यूमर के 10 सामान्य लक्षण

क्या आपको लगातार सिरदर्द, मितली, धुंधला दिखाई देना और शारीरिक संतुलन में परेशानी हो रही है? इन लक्षणों को नजर अंदाज ना करें, यह ब्रेन ट्यूमर जैसी बड़ी समस्या हो सकती है. ब्रेन ट्यूमर में दिमाग में कोई बहुत सी कोशिकाएं या कोई एक कोशिका असामान्य रूप से बढ़ती है. सामान्यतः दो तरह के ब्रेन ट्यूमर होते हैं कैंसर वाला (घातक) या बिना कैंसर वाला (सामान्य) ट्यूमर.

दोनों ही मामलों में दिमाग की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होती हैं, जो कि कई बार घातक सिद्ध होता है. इसके साथ सबसे बड़ी परेशानी है कि इसके कोई विशेष कारण नहीं हैं, केवल कुछ शोधकर्ताओं ने इसके कुछ रिस्क फैक्टर्स का पता लगाया है.

ब्रेन ट्यूमर किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन बढ़ते उम्र के साथ इसका जोखिम भी बढ़ जाता है. कई मामलों में तो यह आनुवांशिक कारण हो सकता है और कई बार किसी केमिकल के ज्यादा इस्तेमाल या रेडिएशन से हो सकता है. बहुत से लोगों को पता ही नहीं चलता है कि उन्हें ब्रेन ट्यूमर है क्यों कि उनमें कोई लक्षण दिखाई ही नहीं देते हैं.

जब ये ट्यूमर बड़ा हो जाता है और स्वास्थ्य पूरी तरह बिगड़ जाता है तब लोग चैक-अप करवाते हैं और तब इसका पता चलता है. हम आपको इसके 10 लक्षणों से अवगत करा रहे हैं, जिनको जानने की आवश्यकता है.

1. सिरदर्द

यह ब्रेन ट्यूमर का सबसे बड़ा लक्षण है. यह दर्द मुख्यतः सुबह होता है और बाद में यह लगातार होने लगता है, यह दर्द तेज होता है. यदि ऐसा लक्षण दिखाई दे तो जांच कराएं.

2. उबाक या उल्टी का मन होना

सिरदर्द की तरह यह भी सुबह होता है, खास तौर पर जब व्यक्ति एक जगह से दूसरी जगह जाता है तब यह ज्यादा होता है.

3. कम दिखना

जब किसी को आक्सिपिटल के आस पास ट्यूमर होता है तो चीजें कम दिखाई देती हैं. उन्हें धुंधला दिखाई देने लगता है और रंगों व चीजों को पहचानने में परेशानी होती है.

4. संवेदना कम महसूस होना

जब किसी व्यक्ति के दिमाग के पराइअटल लोब पे ट्यूमर होता है तो उसे अपनी बाजुओं और पैरों पर संवेदना कम महसूस होती है, क्यों कि ट्यूमर से कोशिकाएं प्रभावित होती हैं.

5. शरीर का संतुलन बनाने में परेशानी

जब किसी को ट्यूमर होता है तो उसके शरीर का संतुलन नहीं बन पाता है, क्यों कि यदि सेरिबैलम में ट्यूमर है तो वह मूवमेंट को प्रभावित करता है.

6. बोलने में परेशानी

यदि किसी को टैंपोरल लोब में ट्यूमर होता है तो बोलने में परेशानी होती है, सही तरह बोला नहीं जाता है.

7. रोजाना के कामों में गड़बड़ी करना

पराइअटल लोब में ट्यूमर होने पर संवेदना प्रभावित होती है, इससे व्यक्ति को दैनिक क्रियाओं में परेशानी होती है.

8. व्यक्तिगत और व्यवहारिक बदलाव

जिन्हें फ्रन्टल लोब में ट्यूमर होता है वे अपने व्यवहार पर नियंत्रण नहीं रख पाते हैं. इन्हें नई चीजें सीखने में परेशानी होती है.

9. दौरे पड़ना

ब्रेन ट्यूमर में दौरे पड़ना एक आम समस्या है. जब भी दौरा पड़ता है तो व्यक्ति बेहोश हो जाता है.

10. सुनने में समस्या

जिन लोगों को दिमाग के टैंपोरल लोब में ट्यूमर होता है उन्हें सुनने में परेशानी होती है, कभी कभी सुनना पूरी तरह प्रभावित हो जाता है.

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