Kundali Bhagya को Dheeraj Dhoopar ने कहा अलविदा! होगी नई एंट्री

सीरियल ‘कुंडली भाग्य’ (Kundali Bhagya) के करण लूथरा यानी एक्टर धीरज धूपर (Dheeraj Dhoopar) इन दिनों सुर्खियों में हैं. जहां हाल ही में एक्टर ने अपनी वाइफ के लिए बेबी शॉवर पार्टी रखकर फैंस को तोहफा दिया था तो वहीं अब खबरें हैं कि उन्होंने अपने 5 साल पुराने शो को अलविदा कहने का फैसला लिया है. आइए आपको बता दें पूरी खबर….

धीरज धूपर ने छोड़ा शो

 

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करीब 5 साल पहले ‘कुंडली भाग्य’ से जुड़ने वाले एक्टर धीरज धूपर कपूर ने शो छोड़ने का फैसला किया है. वहीं इस पर सीरियल के एक सोर्स ने बताया है कि धीरज धूपर ने शो से आगे बढ़ने का फैसला कर लिया है और वह अब वेंचर्स एक्सप्लोर करना चाहते हैं, जिसके चलते धीरज ने मेकर्स के साथ बात करके शो छोड़ने का फैसला किया. वहीं मेकर्स ने भी उनके फैसले का सम्मान किया है. हालांकि अभी इसमें एक्टर का कोई अधिकारिक बयान सामने नहीं आया है.

शो में होगी नई एंट्री

 

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इसके अलावा सीरियल में लीड एक्टर के शो छोड़ने की खबरों के बीच एक नए हीरो की एंट्री होने जा रही हैं. दरअसल, मेकर्स ने ‘कुंडली भाग्य’ के लिए शक्ति अरोड़ा (Shakti Arora) को साइन कर लिया है. लेकिन अभी तक यह पक्का नहीं है कि वह धीरज धूपर की जगह लेंगे. हालांकि मेकर्स सीरियल की नई कहानी पर जोर दे रहे हैं. कई सीरियल्स में काम कर चुके एक्टर शक्ति अरोड़ा के फैंस उनकी एंट्री के लिए काफी एक्साइटेड हैं.

बता दें, हाल ही में धीरज धूपर ने अपनी वाइफ विन्नी धूपर के लिए बेबी शॉवर पार्टी रखी, जिसकी फोटोज और वीडियो सोशलमीडिया पर वायरल हुई थीं. वहीं कहा जा रहा है कि सीरियल को अलविदा कहने के बाद वह अपनी वाइफ के संग वक्त बिताते नजर आएंगे, जिसके चलते वह बेहद एक्साइटेड हैं. दरअसल, एक्टर का ये 2016 में हुई शादी के बाद ये पहला बच्चा है, जिसके चलते वह बेहद एक्साइटेड नजर आ रहे हैं.

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REVIEW: दिल को छू लेने वाली गाथा है ‘मेजर’

रेटिंगः साढ़े तीन स्टार

निर्माताः महेश बाबू और सोनी पिक्चर्स

निर्देशकः शशि किरण टिक्का

लेखकः अदिवी शेष

कलाकारः अदिवी शेष,सई मांजरेकर, शोभिता धूलिपाला,प्रकाश राज,रेवती, डॉ. मुरली शर्मा व अन्य

अवधिः दो घंटे 28 मिनट

26/11 को मुंबई में एक साथ कई जगह हुए आतंकवादी हमले में ताज होटल में छिपे आतंकियों से  बेकसूर आम जनता को बचाने के लिए मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के नेतृत्व में एनएसजी कमांडो ताज होटल में घुसकर आतंकियों को ढूंढ ढूंढ़कर मार रहे थे. पर कुछ आतंकियों की घेरे बंदी में मेजर संदीप उन्नीकृष्णन इस कदर अकेले फंसे कि वह शहीद हो गए. ऐसे ही वीर के जीवन पर फिल्मकार शशि किरण टिक्का व लेखक व अभिनेता अदिवी शेष फिल्म ‘‘मेजर’’ लेकर आए हैं. जो कि तमिल, तेलगू मलयालम व हिंदी में एक साथ तीन जून को प्रदर्शित हुई है. पूरी फिल्म देखने के बाद एक बात उभर कर आती है कि यह फिल्म सिर्फ मेजर संदीप के बलिदानों के लिए श्रद्धांजलि नही है,बल्कि यह फिल्म एक अकेली पत्नी के बलिदानों और अपने बेटे को खोने वाले माता पिता के बलिदानों को भी श्रृद्धांजली है.  फिल्म सैनिकों के परिवार की मनः स्थिति व दर्द का सटीक चित्रण करती है.

कहानीः

स्व. मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की बायोपिक फिल्म ‘‘मेजर’’ की कहानी की शुरूआत संदीप के बचपन से होती है,जिन्हे हर चीज से डर लगता है. लेकिन जब किसी की जिंदगी बचानी हो,तो वह खुद को नुकसान पहुंचाने से पहले दो बार नहीं सोचता. उसे वर्दी से प्यार है. इसलिए उसे जेल में खेलना पसंद है. उसे जेल में कैदियों से बात करना पसंद है. यही वजह है कि वह बचपन  से ‘वर्दी’,‘नेवी’ व सैनिक की जीवन शैली से मोहित है. कालेज में पहुॅचने के बाद भी संदीप उन्नीकृष्णन (आदिवी शेष) के डीएनए में एक सुरक्षात्मक प्रवृत्ति अंतर्निहित है. स्कूल दिनों में ही संदीप की मुलाकात ईशा से हो जाती है,जो कि अपने माता पिता की व्यस्तता के चलते घर में अकेले पन के चलते दुःखी रहती है. . फिर दोनों के बीच प्यार पनपता है और विवाह भी करते हैं. संदीप के पिता चाहते है कि बेटा डाक्टर बने,मगर संदीप तो सैनिक बनना चाहता है. और उसका एनडीए की ट्रेनिंग के लिए चयन हो जाता है. ट्रेनिंग के बाद संदीप एनएसजी कमांडो बन जाता है. बहुत जल्द वह मेजर ही नहीं बल्कि नए एनसीजी कमांडो को टे्निंग देने लगते हैं. अचानक 2008 में मुंबई पर आतंकवादी हमला होता है. जब ताज होटल के लिए कमांडो रवाना होते हैं,तो मेजर संदीप खुद से उनका नेतृत्व करते हैं और महज 31 वर्ष की अल्प उम्र में वह वीरगति को प्राप्त होते हैं.

लेखन व निर्देशनः

इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि 26/11 के दुःखद आतंकवादी हमले (जिससे सभी परिचित हैं ) के गड़े मर्दे उखाड़ने में समय बर्बाद करने की बजाय लेखक अदिवि शेष  व निर्देशक शशि किरण टिक्का अपना सारा ध्यान एक इंसान के तौर पर शहीद मेजर संदीप के ही इर्द गिर्द सीमित रखते हैं. लेकिन संदीप की अपने सेना के साथियों के बारे में कुछ ट्रैक अधूरे लगते हैं. फिल्म की पटकथा जिस अंदाज में लिखी गयी है,उसके चलते ढाई घ्ंाटे तक फिल्म दर्शकों को कुछ भी सोचने का वक्त नही देती. इंटरवल से पहले फिल्म कुछ ज्यादा ही फिल्मी हो गयी है. पर इंटरवल के बाद तो हर दृश्य कमाल का है. मगर संदीप और ईशा की पहली मुलाकात का दृश्य प्रभावित नहीं करता,यह कमजोर लेखन के साथ ही कमजोर निर्देशन की वजह से होता है. इतना ही नही संदीप व ईशा के रोमांस को ठीक से उकेरा नही गया. मतलब रोमांस को कुछ वक्त दिया जा सकता था. यह अलग बात है कि बाद में दोनों की कैमिस्ट्री कमाल की उभरकर आती है.

अमूमन इस तरह की युद्ध परक या सैनिक पर बनी फिल्मों में जबरन देशभक्ति को ठॅूंसा जाता है. मगर फिल्म ‘मेजर’ में कहीं भी उपदेशात्मक देशभक्ति नही है. फिल्म रोमांचक शैली में बनी है. रोमांच के पल व एक्शन दृश्य शानदार बन पड़े हैं.  फिल्म तो मेजर के विचारों और उनकी बहदुरी का सेलीब्रेशन है. इतना ही नही फिल्म का क्लायमेक्स भी एकदम हटकर व शानदार है. यह फिल्म शहीद के पार्थिव शरीर के वक्त रूदन दिखाकर दर्शको को इमोशनल ब्लैकमेल नही करती है. क्लामेक्स में शहीद मेजर संदीप पिता के संवाद काफी प्रभाव छोड़ते हैं.

अक्षत अजय शर्मा के संवाद दिल तक पहुंचते हैं. कुछ जगहों पर श्रीचरण पकाला का संगीत कमजोर पड़ जाता है.

अभिनयः

फिल्म की कहानी व पटकथा लिखने के साथ ही चिकने चेहरे वाले किशोर संदीप के किरदार में अदिवि शेष ने जान डाल दी है. कहा जाता है कि जब अभिनेता खुद ही कहानी,पटकथा व किरदार लिखता है,तो वह किरदार लिखते लिखते उस किरदार का हिस्सा बन चुका होता है,उसके बाद उस किरदार को परदे पर पेश करना उसके लिए अति सहज होता है. कम से कम यह बात यहां अदिवि शेष के संदर्भ में एकदम सटीक बैठती है. जीवन से क्या चाहिए,इसकी समझ के साथ उसके लिए विपरीत परिस्थितियों में भी लड़ने को तैयार मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के किरदार को अपने अभिनय से अदिवी शेष ने जीवंतता प्रदान की है.

सही मायनों में देखा जाए तो सई मंाजरेकर को पहली बार एक बेहतरीन किरदार निभाने का अवसर मिला है. ईशा के किरदार में वह न सिर्फ खूबसूरत लगी हैं, बल्कि ईशा के अकेले मन की बेबसी को बहुत ही अच्छे ढंग से परदे पर उकेरने में सफल रही हैं. मगर भावनात्मक दृश्यों में वह विफल रही हैं और उनकी अनुभवहीनता उभरकर सामने आती है. इतना ही नही आर्मी आफिसर की पत्नी के दर्द को भी व्यक्त करने में वह बुरी तरह से असफल रही हैं. इस फिल्म की कमजोर कड़ी तो सई मांजरेकर ही हैं. एक बिजनेस ओमन व एक छोटी बच्ची की मां प्रमोदा के छोटे किरदार में शोभिता धूलिपाला अपनी छाप छोड़ जाती हैं. मुरली शर्मा भी छोटी सी भूमिका में याद रह जाते हैं.

संदीप के पिता के किरदार में प्रकाश राज और मंा के किरदार में रेवती ने अपनी तरफ से सौ प्रतिशत दिया है. वैसे भी यह दोनो माहिर कलाकार हैं. यह दोनों जिस तरह से अपने बेटे से प्यार करते हैं या उसकी मौत पर बारिश में भीगते हुए शोक करते हैं,यह दृश्य अति यथार्थ परक व  दिल दहला देने वाले हैं. इन्हे रोते देख दर्शक की आंखे भी नम हो जाती हैं. मुरली शर्मा और अनीश कुरुविला का अभिनय ठीक ठाक है.

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पथभ्रष्ठा- भाग 2: बसु न क्यों की आत्महत्या

मुझे यों अचानक बिना किसी पूर्व सूचना के अपने घर पर देख कर शुभेंदु अचरज में पड़ गए. राजेश और महेश अपनीअपनी पत्नी को ले कर काम पर निकल गए थे. इसीलिए मुझे अपने मन की बात कहने के लिए विशेष भूमिका नहीं बांधनी पड़ी. बातचीत को लंबा न खींच कर मैं ने शुभेंदु से मुसकान के बारे में प्रश्न किया, तो उन्होंने मुझे बताया कि मुसकान उन की गोद ली हुई बेटी है. यह बात तो मैं भी जानती थी, पर किस की बेटी है. मैं यह जानना चाह रही थी.

‘‘मुसकान, बसु की बेटी है… बसु और रवि…’’ उन्होंने नजरें नीची कर के बताया. तो ऐसा लगा, मानो एकसाथ कई हथौड़ों ने मेरे सिर पर प्रहार कर दिया हो. सब कुछ तो सामने था. उजली धूप सा. कुछ देर के लिए हम दोनों के बीच मौन सा छा गया.

शुभेंदु ने धीमे स्वर में अपनी बात कही, ‘‘तुम जानती हो, बसु ने रवि की हत्या कर के खुद भी नींद की गोलियां खा कर आत्महत्या कर ली थी… इस बच्ची को पुलिस अपने साथ ले गई और नारी सेवा सदन में डाल दिया. ऐसे बच्चों का आश्रय स्थल ये अनाथाश्रम ही तो होते हैं. समझ में नहीं आता इस पूरी वारदात में मुसकान का क्या दोष था. मैं अनाथाश्रम संचालक से बातचीत कर के मुसकान को अपने घर ले आया. थोड़ी देर चुप रहने के बाद फिर शुभेंदु ने मुझे आश्वस्त किया. चारु मुसकान की रगों में मेरा खून प्रवाहित नहीं हो रहा है. पर उस में मेरे ही संस्कार हैं. वह मेरी देखरेख में पली है. उस के अंदर तुम्हें अंगरेजी और हिंदू संस्कृति का सम्मिश्रण मिलेगा. संभव और मुसकान का विवाह 2 संस्कृतियों, 2 विचारधाराओं का सम्मिश्रण होगा. मुझे पूरा विश्वास है, मुसकान एक आदर्श बहू और पत्नी साबित होगी.’’

मैं ने पुन: प्रश्न किया, ‘‘मुसकान को यह सब मालूम है?’’

‘‘नहीं. शुरू में मुसकान हर समय डरीसहमी रहती थी. उस ने अपनी आंखों के सामने हत्या और अगले ही दिन मां की मौत देखी थी. वह कई बार रात में भी चिल्लाने लगती थी. उस के मन से उस भयानक दृश्य को मिटाने में मुझे काफी परिश्रम करना पड़ा था. इसीलिए पहले मैं ने शहर छोड़ा और फिर देश. लंदन में आ कर बस गया. नन्हे बच्चों का दिल स्लेट सा होता है. जरा सो पोंछ दो तो सब कुछ मिट जाता है.’’

उस के बाद वे नन्ही मुसकान की कई तसवीरें ले आए जिन से स्पष्ट हो गया कि मुसकान बसु की ही बेटी है. घटनाएं यों क्रम बदलेंगी, किस ने सोचा था?

उस रात मैं सो नहीं पाई थी. मन परत दर परत अतीत में विचर रहा था. बसु मेरी आंखों के सामने उपस्थित हो गई थी. जिस के साथ मेरा संबंध सगी बहन से भी बढ़ कर था.

30 वर्ष पूर्व बसु मां के पास मकान किराए पर लेने आई थी. साथ में शुभेंदु भी थे. वह सुंदर थी, स्मार्ट थी. मृदुभाषिणी इतनी कि किसी को भी अपना बना ले. शुभेंदु सिविल इंजीनियर थे. स्वभाव से सहज सरल थे और सलीकेदार भी थे. थोड़ीबहुत बातचीत के बाद पुरानी जानपहचान भी निकल आई तो मां पूरी तरह आश्वस्त हो गई थीं और मकान का पिछला हिस्सा उन्होंने किराए पर दे दिया था.

शुभेंदु सुबह 8 बजे दफ्तर के लिए निकलते तो शाम 8 बजे से पहले नहीं लौटते थे. बसु अपने दोनों बेटों को स्कूल भेज कर हमारे घर आ जाती थी. मां से पाक कला के गुर सीखती. नएनए डिजाइन के स्वैटर बनाना सीखती. बसु कुछ ही दिनों में हमारे परिवार की सदस्य जैसी बन गई थी. मां उसे बेटी की तरह प्यार करतीं. मुझे भी उस के सान्निध्य में कभी बहन की कमी महसूस नहीं होती थी.

कुछ ही दिनों के परिचय में मैं इतना जान गई थी कि बसु बेहद महत्त्वाकांक्षी है. उस में आसमान को छूने की ललक है. जो कुछ अब तक जीवन में नहीं मिला था, उसे वह अब किसी भी कीमत पर हासिल करना चाहती थी. चाहे इस के लिए उसे कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े.

एक दिन बसु बहुत खुश थी. पूछने पर उस ने बताया कि शुभेंदु को दुबई में नौकरी मिल रही है. 50 हजार प्रतिमाह तनख्वाह मकान, गाड़ी, बोनस सब अलग. लेकिन शुभेंदु जाना नहीं चाहते. कह रहे हैं कि कभी तो यहां भी नहीं है. अच्छी गुजरबसर हो ही रही है.

‘‘सिर ढको तो पैर उघड़ जाते हैं और पैर ढको तो सिर उघड़ जाता है,’’ बसु ठठा कर हंस दी थी, ‘‘बच्चे बड़े हो रहे हैं. धीरेधीरे खर्चे भी बढ़ेंगे. इस मुट्ठी भर तनख्वाह से क्या होगा?’’ फिर गंभीर स्वर में से मां बोली, ‘‘चाची आप ही समझाइए इन्हें. ऐसे मौके जिंदगी में बारबार नहीं मिलते.’’

‘‘तुम भी जाओगी शुभेंदु के साथ?’’ मां के चेहरे पर चिंता के भाव दिखाई दिए थे.

‘‘नहीं, सब के जाने से खर्च ज्यादा होगा… बचत कहां हो पाएगी?’’ यह सुन मां के मन का कच्चापन सख्त हो उठा. बोलीं, ‘‘भरी जवानी में पति को अकेले विदेश भेजना कहां की समझदारी है?’’

लेकिन बसु अपनी ही बात पर अटल थी, ‘‘जवानी में ही तो इंसान चार पैसे जोड़ सकता है. एक बार आमदनी बढ़ी तो जीवन स्तर भी बढ़ेगा. सुखसुविधा के सारे साधन जुटा सकेंगे हम… छोटीछोटी चीजों के लिए तरसना नहीं पड़ेगा.’’

शुभेंदु चुपचाप पत्नी की बातें सुनते रहे. बसु की धनलोलुपता के कारण अकसर उन के आपसी संबंधों में कड़वाहट आ जाती थी. शुभेंदु तीव्र विरोध करते. अपनी सीमित आय का हवाला देते. पर बसु निरंतर उन पर दबाव बनाए रखती थी.

आखिर शुभेंदु दफ्तर से इस्तीफा दे कर दुबई चले गए. उन का फोन हमेशा ही घर आता था. उन की बातों में ऐसा लगता था जैसे दुबई में उन का मन नहीं लग रहा है.

बसु उन्हें समझाती, दिलासा देती, ‘‘अपने परिवार से दूर, नए लोगों के साथ तालमेल स्थापित करने में कुछ समय तो लगता ही है. 1 साल का ही तो प्रोजैक्ट है. देखते ही देखते समय बीत जाएगा.’’

शभेंदु नियमित पैसा भेजने और बसु बड़ी ही समझदारी से उस पैसे को विनियोजित करती. कुछ ही दिनों में उन की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो गई. नोएडा में उन्होंने 200 गज का एक प्लाट भी खरीद लिया.

एक दिन अचानक बसु निर्णयात्मक स्वर में बोली, ‘‘पूरा दिन बोर होती रहती हूं. सोच रही हूं, आधे प्लाट पर शेड डाल कर एक छोटा सा बुटीक खोल लूं.’’

‘‘बच्चे बहुत छोटे हैं बसु. उन्हें छोड़ कर इतनी दूर कैसे संभाल पाओगी बुटीक? आनेजाने में ही अच्छाखासा समय निकल जाएगा,’’ मां ने अपने अनुभव से उसे सलाह दी.

‘‘मैं तो हफ्ते में 2-3 दिन ही जाऊंगी. बाकी दिन काम रवि संभाल लेंगे?’’

‘‘कौन रवि,’’ मां की भृकुटियां तन गईं, माथे पर बल पड़ गए.

‘‘मेरे राखी भाई. दरअसल, उन्हीं के प्रोत्साहन से मैं ने यह काम शुरू करने की योजना बनाई है?’’

‘‘शुभेंदु से अनुमति ले ली है?’’ मां ने पूछा.

मां शुरू से ही शंकालु स्वभाव की थीं. उन्हें इन राखी भाइयों पर विश्वास नहीं था. बसु ने मां को आश्वस्त किया था, ‘‘चाची, आप क्यों घबरा रही हैं? रवि शुभेंदु के भी परिचित हैं और शादीशुदा भी… मैं जानती हूं इस काम के लिए कभी मना नहीं करेंगे.’’

कच्चे चावल खाने की आदत से कैसे छुटकारा पाएं?

सवाल-

मैं 44 साल की महिला हूं. 1 साल से एक विचित्र समस्या से परेशान हूं. मैं रोजाना 1 कटोरी कच्चे चावल खाती हूं. इन्हें खाए बिना मुझे चैन नहीं मिलता. मैं ने इस आदत को छोड़ने की बहुत कोशिश की पर लत है कि छूटे नहीं छूट रही है. इस बीच मुझे त्वचा रोग ऐग्जिमा भी हुआ, जो दवा खाने से ठीक हो गया. 2 बार यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फैक्शन भी हुआ. वह भी दवा लेने से ठीक हो गया. कहीं ऐग्जिमा और यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फैक्शन कच्चे चावल खाने की लत से तो नहीं हुआ या फिर यह कहीं शरीर में किसी विटामिन की कमी का लक्षण तो नहीं? कृपया बताएं कि कच्चे चावल खाने की अपनी इस आदत से छुटकारा पाने के लिए क्या करूं?

जवाब-

आप जिस समस्या से गुजर रही हैं वह पाइका नामक विकार का ही एक रूप नजर आता है. यह तन से अधिक मन का विकार है, जो वयस्कों में कम बच्चों में अधिक देखा जाता है. गर्भवती स्त्रियों में भी यह विकार देखा जाता है. अकसर इस में मिट्टी, दीवार का चूना, पेंट, लकड़ी का चूरा आदि चीजें खाने की आदत पड़ जाती है. यह तो गनीमत है कि आप की लत कच्चे चावल खाने तक ही सीमित है. यह विकार किन कारणों से जन्म लेता है, यह कोई ठीकठीक नहीं जानता. पर अत्यधिक मानसिक स्ट्रैस, शरीर में विटामिन और खनिज आदि तत्त्वों की कमी, औब्सेसिव कंपल्सिव डिसऔर्डर जैसी कई भिन्नभिन्न स्थितियां इस के लिए दोषी पाई गई हैं. आप के शरीर में किसी विटामिन या खनिज तत्त्व की कमी है, यह सहीसही जानकारी तो डाक्टरी जांच से ही प्राप्त हो सकती है. शारीरिक जांच और विशेष रक्त जांच कर के डाक्टर विटामिन और खनिज तत्त्वों की कमी की पुष्टि का उपाय बता सकता है. अगर समस्या मनोवैज्ञानिक है, तब इस का समाधान किसी योग्य साइकोलौजिस्ट की मदद से किया जा सकता है. बिहेवियर थेरैपी और कुछ दवाएं इस स्थिति में लाभकारी सिद्ध होती हैं.

हां, ऐग्जिमा या यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फैक्शन से पाइका का कोई संबंध होने की कोई गुंजाइश नहीं है. अत: इस विषय में आप मन में किसी प्रकार की ग्रंथि न पालें. बहुत संभव है कि कुछ समय तक मल्टीविटामिन टैबलेट लेने और अपने मन को समझाने से ही आप इस विकार पर जीत हासिल कर लें.

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अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

हो जाने दो- भाग 3: कनिका के साथ क्या हुआ

एक दिन फेसबुक पर सैम की फ्रैंड रिक्वैस्ट देख कर कनिका को बहुत आश्चर्य हुआ. कुछ सोच कर उस ने उसे स्वीकार कर लिया.“थैंक्स फौर ऐक्सेप्टिंग मी ऐज फ्रैंड.” तुरंत ही मैसेंजर पर सैम का मैसेज उभरा. कनिका बिना कोई रिप्लाई दिए औफलाइन हो गई.

“हेलो.”“हाउ आर यू?”“हैव यू स्टार्टेड औफिस?”“कैन वी चैट औन फोन?”“प्लीज, गिव योर मोबाइल नंबर.”दूसरे दिन सुबह सैम के इतने सारे मैसेज देख कर कनिका मुसकराए बिना न रह सकी. उस ने अपना मोबाइल नंबर उसे मैसेज कर दिया.

रात 11 बजे जब सब सो गए, तब कनिका औनलाइन थी.“मे आई कौल यू?” सैम का मैसेज दिखाई दिया.

“ओके,” कनिका ने रिप्लाई करने से पहले मोबाइल को साइलैंट मोड पर कर दिया. मोबाइल घरघराया. अनजान नंबर था. कनिका ने कौल रिसीव की. यह सैम ही था. थोड़ी देर औपचारिक बातें हुई. कनिका को सैम से बात कर के अच्छा लगा. आगे भी टच में रहने की अनुमति लेने के बाद सैम ने फोन रख दिया.

अब हर रोज देररात सैम के फोन आने लगे. कनिका को भी उस के कौल्स का इंतज़ार रहने लगा था. सैम टूटीफूटी हिंदी में उस से पूरे दिन का ब्योरा पूछता और कनिका टूटीफूटी इंग्लिश में उसे बताती. हो सकता है यह बातचीत सैम के लिए उस के शोध का एक हिस्सा मात्र हो, लेकिन कनिका उस से बात कर के बेहद तनावमुक्त महसूस करती थी. अनजान व्यक्ति के सामने खुलना वैसे भी काफी राहत भरा होता है क्योंकि यहां राज के जगजाहिर होने का भय नहीं होता.

“जलज तो अब रहे नहीं. कनिका का यहां अकेले दम घुटता होगा. आप कहें तो हम इसे अपने साथ ले जाएं,” एक दिन बेटी से मिलने आए कनिका के मांपापा ने माधवी से इजाजत मांगी. कनिका भी इस बोझिल माहौल से निकलना चाहती थी.

“अभी तो सबकुछ बिखरा पड़ा है. कुछ दिनों बाद पंकज इसे आप के पास छोड़ आएगा,” माधवी ने कुछ सोचते हुए कहा. कनिका के मांपापा खाली हाथ लौट गए.

“क्यों न कनिका को जलज के नाम की चुनरी ओढ़ा दी जाए… बात घर की घर में ही रह जाएगी,” एक रात माधवी ने पति रमेश से जिक्र किया. रमेश को भी पत्नी की बात में दम लगा.

“लेकिन क्या पंकज और भाईसाहब इस बात के लिए राजी हो जाएंगे? उन के भी तो अपने बेटे की शादी को ले कर कुछ अरमान होंगे. कौन जाने पंकज ने किसी को पसंद ही कर रखा हो,” रमेश ने आशंका जताई.

“मैं कल पंकज से बात कर के देखती हीन,” माधवी ने पति को आश्वस्त किया.“चाची, मैं भाभी को अपनाने के लिए सोच तो सकता हूं लेकिन यह बच्चा? मुझे लगता है कि बच्चे को ले कर आज भावनात्मक आवेश में लिया गया फैसला मेरी आने वाली पूरी जिंदगी के लिए नासूर बन सकता है. यह किसी के भी हित में नहीं होगा, न मेरे न कनिका और ना ही बच्चे के,” पंकज ने व्यावहारिकता भरा अपना मत स्पष्ट किया.

“तो ठीक है न, अभी तो ज्यादा वक्त नहीं हुआ है, मैं किसी डाक्टर से बात कर के इसे अबौर्ट करवाने की व्यवस्था करती हूं,.” माधवी ने कहा. सुनते ही कनिका के पांवों के नीचे से जमीन खिसक गई. अनजाने ही फैमिली मीटिंग में उठे इस मुद्दे पर हो रही बहस उस के कानों में पड़ गई थी.

“सैम, आय एम इन ट्रबल. माय फैमिली हैज डिसाइडेड टू अबौर्ट माय बेबी,” रात में कनिका ने सिसकते हुए सैम को फोन पर बताया.

“ओ माय गौड़, हाउ कैन दे डू दिस? कनिका, माय डियर, आय एम फीलिंग सो हैल्पलैस. बट लिसन, यू शुड गो टू योर मौम. शी मस्ट हैल्प यू,” सैम ने कनिका को अपनी मजबूरी तो बताई लेकिन साथ ही उसे रास्ता भी सुझा दिया. दूसरे दिन कनिका ने अपनी मां को फोन कर के मायके जाने की इच्छा जताई और 2 दिनों बाद ही उस के पापा उसे ससुराल से ले गए.

“वैसे कनिका, तुम्हारी सास और पंकज का फैसला मुझे व्यावहारिक लगता है. अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है. तुम्हें अपने भविष्य के बारे में सोचना चाहिए. बच्चे तो और हो जाएंगे. तुम्हें पंकज के फैसले में सहयोग करना चाहिए,” मां ने भी जब कनिका को दुनियादारी समझाने की कोशिश की, तो वह टूट गई.

“प्लीज सैम, जस्ट गाइड मी. व्हाट शुड आई डू नाऊ? आय वांट टू कीप माय चाइल्ड,” रात को कनिका सैम से बातें करते हुए फफक पड़ी.

“वुड यू लाइक टू मैरी मी. आय विल ऐक्सेप्ट दिस बेबी,” सैम ने बिना किसी लागलपेट के कहा तो कनिका चौंक गई.

“आर यू ओके? यू नो व्हाट यू से?” कनिका ने पूछा.“येस, आय नो व्हाट आय सेड,” सैम ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा.“ओके, दैन कम टू मीट माय फैमिली,” कनिका ने उस का प्रस्ताव स्वीकार करते हुए उसे आमंत्रित किया. अगले ही सप्ताह सैम और महेश कनिका के घर आए.

“तुम पागल हुई हो कनिका, तुम जानती भी हो कि इस फैसले के दूरगामी परिणाम क्या हो सकते हैं. सैम तो आज यहां है, कल अपने देश चला जाएगा. क्या तुम हम से दूर पराए देश में रह पाओगी? कहीं तुम्हारे प्रति सैम का मन बदल गया तो हम तुम्हारी मदद करने की स्थिति में भी नहीं होंगे,” पापा ने उसे समझाया.

“कल किस ने देखा है पापा. क्या हम ने जलज को ले कर कभी यह कल्पना की थी कि हमें यह दिन देखना पड़ेगा. नहीं ना. तो फिर जो हो रहा है उसे हो जाने दीजिए. मुझे अपना बच्चा चाहिए पापा. यह जलज की आखिरी निशानी है,’ कनिका लगभग रो ही पड़ी थी.

पापा निशब्द थे. कमरे में सिर्फ कनिका की सिसकियां गूंज रही थीं. “हम तुम्हारी बेवकूफी में साथ नहीं दे सकते कनिका. जान न पहचान, ऐसे ही कैसे किसी परदेसी के साथ शादी के तुम्हारे फैसले को मान लें? तुम खुद भी सैम को कितना जानती हो? एक बार तो उजड़ चुकी हो, तुम्हें दोबारा उजड़ता हुआ नहीं देख पाएंगे. बेहतर है, तुम पंकज के बारे में ही सोचो. बच्चों का क्या है, और हो जाएंगे,” मां ने भी शब्दों को कठोर करते हुए पापा की हां में हां मिलाई.

बात नहीं बनी. न तो कनिका मम्मीपापा के सामने अपना पक्ष ठीक से रख पाई और न ही भाषा की समस्या के कारण सैम उन का भरोसा जीत सका. महेश की मध्यस्थता भी काम न आई. दोष किसी का भी नहीं कहा जा सकता. बेटी के मांबाप थे, फिक्रमंद होना लाजिमी था. सभी मांबाप शायद ऐसे ही होते होंगे. सैम को निराश ही वापस लौटना पड़ा.

बातें के पांव भले ही न हों लेकिन उन की गति बहुत तीव्र होती है. कनिका और सैम के बारे में जब उस की ससुराल वालों को पता चला तो बहुत बवाल मचा. सास ने तो कुलच्छनी कहते हुए उस के लिए घर के दरवाजे ही बंद कर दिए. कनिका अकेली जरूर हो गई थी लेकिन कमजोर नहीं. उस ने अपनी नौकरी वापस जौइन कर ली. हालांकि, मां अब भी चाहती थीं कि कनिका पंकज से शादी कर के उसी घर में वापस चली जाए. आखिर देखाभाला परिवार है. अनहोनी तो किसी के भी साथ हो सकती है.

इधर कनिका के गर्भ का आकार बढ़ता जा रहा था और उधर उस पर मां का दबाव भी. दबाव था पंकज से शादी करने और बच्चा गिराने का, लेकिन कनिका किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकी. तनाव अधिक बढ़ने लगा, तो उस ने घर छोड़ दिया और वर्किंग वीमेन होस्टल में रहने लगी. सैम का शोधकार्य लगभग पूरा होने को ही था. इस के बाद यदि वह चाहे तो उसे स्थायी तो फिलहाल नहीं पर गेस्ट फैकल्टी के रूप में वहीं यूनिवर्सिटी में ही जौब मिल जाएगी. किसी और को भरोसा हो न हो, कनिका को उस पर पूरा भरोसा था.

प्रसव का समय नजदीक आ रहा था. बच्चे की दादी ने तो उस से नाता तोड़ ही लिया था, नानी भी कनिका के पास नहीं थीं. सैम और महेश ने ही आ कर सारा काम संभाला. कनिका ने बेटी को जन्म दिया. उस नर्म सी बच्ची को गोद में ले कर सैम आश्चर्य से अपनी भूरी आंखें चौड़ी कर रहा था.

‘इज दिस रियली माइन?” सैम ने बच्ची को चूमते हुए कहा.“किस के साथ किस का रिश्ता कब और कैसे बंध जाता है, कोई नहीं जानता. बीज किस ने डाला और फल किस के हाथ लगा. सब संयोग की बातें हैं,” यह सोच कर कनिका मुसकरा दी.

“सैम, कनिका और यह बच्चा, मेरे दोस्त की निशानी हैं. इन्हें हिफाजत से रखना मेरे दोस्त,” महेश ने सैम को गले लगा कर नई जिंदगी की शुभकामनाएं दीं.सैम कुछ समझा, कुछ नहीं समझा लेकिन इतना तो समझ ही गया था कि अब कनिका उस की हो चुकी है. उस ने कनिका को बांहों के घेरे में ले लिया. कनिका ने मुसकरा कर अपना हाथ एक तरफ सैम और दूसरी तरफ बच्ची के इर्दगिर्द लिपटा लिया.

बंद आंखों से खुशी की बूंदें छलकने लगीं.

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7 टिप्स: खूबसूरत स्किन और बालों के लिए वोदका

पार्टी आदि में वोदका खूब पी जाती है लेकिन क्‍या आप जानती हैं कि यह वोदका आपके बालों तथा त्‍वचा के लिये कितनी ज्‍यादा फायदेमंद है. हम इसे पीने के लिये नहीं कह रहे हैं बल्‍कि हम इसे चेहरे पर लगाने तथा शैंपू की तरह प्रयोग करने की सलाह दे रहे हैं.

वोदका एक रशियन ड्रिंक है. क्‍या आपने कभी नोटिस किया है कि रशियन लेडिज के चेहरे हर वक्‍त चमकते क्‍यूं रहते हैं? ऐसा इसलिये क्‍योंकि वे वोदका को एक सौंदर्य सामग्री के रूप में प्रयोग करती हैं.

चेहरे को चमकदार बनाना हो या फिर चाहे मुंहासे हटाने हों, वोदका की बस कुछ बूंदे अपना असर दिखा सकती हैं. यह बालों को मजबूत बनाता है तथा बालों से रूसी का भी सफाया करता है. तो चलिये जानते हैं वोदका किस प्रकार से चेहरे तथा बालों के लिये अच्‍छी मानी जाती है.

1. चेहरे पर चमक भरे: चेहरे पर चमक भरनी हो तो आप थोड़े से वोदका को कॉटन बॉल में लगा कर चेहरे पर लगा सकती हैं. इससे मुर्झाया हुआ चेहरा बिल्‍कुल खिल उठेगा और चेहरे पर चमक आ जाएगी.

2. स्‍किन को टोन करे: इसे चेहरे पर लगाने से स्‍किन के खुले पोर्स बंद हो कर टाइट हो जाते हैं, जिस्‍से स्‍किन स्‍मूथ दिखने लगती है.

3. झुर्रियां मिटाए: वोदका में स्‍टार्च होता है जो लटकती हुई त्‍वचा को टाइट बनाने में मदद करता है. इसके नियमित प्रयोग से बारीक धारियां गायब हो जाती हैं.

4.एक्‍ने और मुंहासों से छुट्टी: वोदका में एंटीबैक्‍टीरियल गुण होते हैं इसलिये मुंहासों पर वोदका लगाने से मुंहासे जल्‍द ही सूख जाते हैं.

5. बालों और त्‍वचा को साफ करे: इसमें त्‍वचा तथा बालों से गंदगी साफ करने की क्षमता होती है. इसे लगाने से त्‍वचा और बाल सुंदर और स्‍वस्‍थ बनते हैं.

6. बाल बनें मुलायम: अपने शैंपू में थोड़ा सा वोदका मिला कर लगाने से बाल मुलायम बनते हैं तथा उनमें नमी आती है. साथ ही रूखे-सूखे बाल ठीक हो जाते हैं.

7. रूसी से मुक्‍ति: वोदका में एंटीमाइक्रोबियल गुण होते हैं, जो फंगस और बैक्‍टीरिया का खात्‍मा करता है. यही बैक्‍टीरिया सिर में रूसी का कारण बनते हैं. इसके लिये आपको अपने शैंपू में कुछ बूंद वोदका की मिलानी होंगी और फिर उससे सिर धोना होगा.

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घर संभालता प्यारा पति

सुबह के 8 बजे हैं. घड़ी की सूइयां तेजी से आगे बढ़ रही हैं. स्कूल की बस किसी भी क्षण आ सकती है. घर का वातावरण तनावपूर्ण सा है. ऐसे में बड़ा बेटा अंदर से पापा को आवाज लगाता है कि उसे स्कूल वाले मोजे नहीं मिल रहे. इधर पापा नानुकुर कर रही छोटी बिटिया को जबरदस्ती नाश्ता कराने में मशगूल हैं. इस के बाद उन्हें बेटे का लंचबौक्स भी पैक करना है. बेटे को स्कूल भेज कर बिटिया को नहलाना है और घर की डस्टिंग भी करनी है.

यह दृश्य है एक ऐसे घर का जहां बीवी जौब करती है और पति घर संभालता है यानी वह हाउस हसबैंड है. सुनने में थोड़ा विचित्र लगे पर यह हकीकत है.

पुरातनपंथी और पिछड़ी मानसिकता वाले भारतीय समाज में भी पतियों की यह नई प्रजाति सामने आने लगी है. ये खाना बना सकते हैं, बच्चों को संभाल सकते हैं और घर की साफसफाई, बरतन जैसे घरेलू कामों की जिम्मेदारी भी दक्षता के साथ निभा सकते हैं.

ये सामान्य भारतीय पुरुषों की तरह नहीं सोचते, बिना किसी हिचकिचाहट बिस्तर भी लगाते हैं और बच्चे का नैपी भी बदलते हैं. समाज का यह पुरुष वर्ग पत्नी को समान दर्जा देता है और जरूरत पड़ने पर घर और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी उठाने को भी हाजिर हो जाता है.

हालांकि दकियानूसी सोच वाले भारतीय अभी भी ऐसे हाउस हसबैंड को नाकारा और हारा हुआ पुरुष मानते हैं. उन के मुताबिक घरपरिवार की देखभाल और बच्चों को संभालने की जिम्मेदारी सदा से स्त्री की रही है, जबकि पुरुषों का दायित्व बाहर के काम संभालना और कमा कर लाना है.

हाल ही में हाउस हसबैंड की अवधारणा पर आधारित एक फिल्म आई थी ‘का एंड की.’ करीना कपूर और अर्जुन कपूर द्वारा अभिनीत इस फिल्म का मूल विषय था- लिंग आधारित कार्यविभेद की सोच पर प्रहार करते हुए पतिपत्नी के कार्यों की अदलाबदली.

लिंग समानता का जमाना

आजकल स्त्रीपुरुष समानता की बातें बढ़चढ़ कर होती हैं. लड़कों के साथ लड़कियां भी पढ़लिख कर ऊंचे ओहदों पर पहुंच रही हैं. उन के अपने सपने हैं, अपनी काबिलीयत है. इस काबिलीयत के बल पर वे अच्छी से अच्छी सैलरी पा रही हैं. ऐसे में शादी के बाद जब वर्किंग कपल्स के बच्चे होते हैं तो बहुत से कपल्स भावी संभावनाओं और परेशानियों को समझते हुए यह देखते हैं कि दोनों में से किस के लिए नौकरी महत्त्वपूर्ण है. इस तरह आपसी सहमति से वे वित्तीय और घरेलू जिम्मेदारियों को बांट लेते हैं.

यह पतिपत्नी का आपसी फैसला होता है कि दोनों में से किसे घर और बच्चों को संभालना है और किसे बाहर की जिम्मेदारियां निभानी हैं.

यहां व्यवहारिक सोच महत्त्वपूर्ण है. यदि पत्नी की कमाई ज्यादा है और कैरियर को ले कर उस के सपने ज्यादा प्रबल हैं तो जाहिर है कि ऐसे में पत्नी को ब्रैड अर्नर की भूमिका निभानी चाहिए. पति पार्टटाइम या घर से काम करते हुए घरपरिवार व बच्चों को देखने का काम कर सकता है. इस से न सिर्फ बच्चों को अकेला या डेकेयर सैंटर में छोड़ने से पैदा तनाव कम होता है, बल्कि उन रुपयों की भी बचत होती है जो बच्चे को संभालने के लिए मेड या डेकेयर सैंटर को देने पड़ते हैं.

हाउस हसबैंड की भूमिका

हाउस हसबैंड होने का मतलब यह नहीं है कि पति पूरी तरह से पत्नी की कमाई पर निर्भर हो जाए या जोरू का गुलाम बन जाए. इस के विपरीत घर के काम और बच्चों को संभालने के साथसाथ वह कमाई भी कर सकता है. आजकल घर से काम करने के अवसरों की कमी नहीं. आर्टिस्ट, राइटर्स ज्यादा बेहतर ढंग से घर पर रह कर काम कर सकते हैं. पार्टटाइम काम करना भी संभव है.

सकारात्मक बदलाव

लंबे समय तक महिलाओं को गृहिणियां बना कर सताया गया है. उन के सपनों की अवहेलना की गई है. अब वक्त बदलने का है. एक पुरुष द्वारा अपने कैरियर का त्याग कर के पत्नी को अपने सपने सच करने का मौका देना समाज में बढ़ रही समानता व सकारात्मक बदलाव का संदेश है.

एकदूसरे के लिए सम्मान

जब पतिपत्नी अपनी ब्रैड अर्नर व होममेकर की पारंपरिक भूमिकाओं को आपस में बदल लेते हैं, तो वे एकदूसरे का अधिक सम्मान करने लगते हैं. वे पार्टनर की उन जिम्मेदारियों व काम के दबाव को महसूस कर पाते हैं, जो इन भूमिकाओं के साथ आते हैं.

एक बार जब पुरुष घरेलू काम और बच्चों की देखभाल करने लगता है तो खुद ही उस के मन में महिलाओं के लिए सम्मान बढ़ जाता है. महिलाएं भी उन पुरुषों को ज्यादा मान देती हैं जो पत्नी के सपनों को उड़ान देने में अपना योगदान देते हैं और स्त्रीपुरुष में भेद नहीं मानते.

जोखिम भी कम नहीं

समाज के ताने: पिछड़ी और दकियानूसी सोच वाले लोग आज भी यह स्वीकार नहीं कर पाते कि पुरुष घर में काम करे व बच्चों को संभाले. वे ऐसे पुरुषों को जोरू का गुलाम कहने से बाज नहीं आते. स्वयं चेतन भगत ने स्वीकार किया था कि उन्हें ऐसे बहुत से सवालों का सामना करना पड़ा जो सामान्यतया ऐसी स्थिति में पुरुषों को सुनने पड़ते हैं. मसलन, ‘अच्छा तो आप की बीवी कमाती है?’ ‘आप को घर के कामकाज करने में कैसा महसूस होता है? वगैरह.’

पुरुष के अहं पर चोट: कई दफा खराब परिस्थितियों या निजी असफलता की वजह से यदि पुरुष हाउस हसबैंड बनता है तो वह खुद को कमजोर और हीन महसूस करने लगता है. उसे लगता है जैसे वह अपने कर्त्तव्य निभाने (कमाई कर घर चलाने) में असफल नहीं हो सका है और इस तरह वह पुरुषोचित कार्य नहीं कर पा रहा है.

मतभेद: जब स्त्री बाहर जा कर काम कर पैसे कमाती है और पुरुष घर में रहता है तो और भी बहुत सी बातें बदल जाती हैं. सामान्यतया कमाने वाले के विचारों को मान्यता दी जाती है. उसी का हुक्म घर में चलता है. ऐसे में औरत वैसे इशूज पर भी कंट्रोल रखने लगती है जिन पर पुरुष मुश्किल से ऐडजस्ट कर पाते हैं.

सशक्त और अपने पौरुष पर यकीन रखने वाला पुरुष ही इस बात को नजरअंदाज करने की हिम्मत रख सकता है कि दूसरे लोग उस के बारे में क्या कह रहे हैं. ऐसे पुरुष अपने मन की सुनते हैं न कि समाज की.

स्त्रीपुरुष गृहस्थी की गाड़ी के 2 पहिए हैं. आर्थिक और घरेलू कामकाज, इन 2 जिम्मेदारियों में से किसे कौन सी जिम्मेदारी उठानी है, यह कपल को आपस में ही तय करना होगा. समाज का दखल बेमानी है.

जानेमाने हाउस हसबैंड्स

ऐसे बहुत से जानेमाने चेहरे हैं, जिन्होंने अपनी इच्छा से हाउस हसबैंड बनना स्वीकार किया है-

भारतीय लेखक चेतन भगत, जिन के उपन्यासों पर ‘थ्री ईडियट्स’, ‘2 स्टेट्स’, ‘हाफ गर्लफ्रैंड’ जैसी फिल्में बन चुकी हैं, ने अपने जुड़वां बच्चों की देखभाल के लिए हाउस हसबैंड बनने का फैसला लिया.

वे ऐसे दुर्लभ पिता हैं, जिन्होंने आईआईटी, आईआईएम से निकलने के बाद अपने बच्चों को अपने हाथों बड़ा किया. हाउस हसबैंड बनने का फैसला उन्होंने तब लिया था जब वे अपने कैरियर में ज्यादा सफल नहीं थे जबकि उन की पत्नी यूबीएस बैंक की सीईओ थीं. चेतन भगत ने नौकरी छोड़ कर भारत आने का फैसला लिया और खुशीखुशी घर व बच्चों की देखभाल में समय लगाने लगे. साथ में लेखन का कार्य भी चलता रहा. आज उसी चेतन भगत के उपन्यासों का लोगों को बेसब्री से इंताजर रहता है.

इसी तरह की कहानी जानेमाने फुटबौलर डैविड बैकहम की भी है, जिन्होंने प्रोफैशनल फुटबौल की दुनिया से अलविदा कह कर हाउस हसबैंड बनने का फैसला लिया. एक टैलीविजन शो के दौरान उन्होंने स्वीकारा था कि वे अपने 4 बच्चों के साथ समय बिता कर ऐंजौय करते हैं. बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना, स्कूल छोड़ कर आना, लंच बनाना, सुलाना जैसे सभी कामों को वे बड़ी सहजता से करते हैं.

न्यूटन इनवैस्टमैंट मैनेजमैंट की सीईओ हेलेना मोरिसे लंदन की चंद ऐसी महिला सीईओ में से एक हैं जो 50 बिलियन पाउंड्स से ज्यादा का कारोबार संभालती हैं और करीब 400 से ज्यादा कर्मचारियों पर हुक्म चलाती हैं. वे 9 बच्चों की मां भी हैं. जब हेलेना ने बिजनैस वर्ल्ड में अपना मुकाम बनाया तो उन के पति रिचर्ड ने खुशी से घर पर रह कर बच्चों की जिम्मेदारी उठाना स्वीकारा.

कुछ इसी तरह की कहानी भारत की सब से शक्तिशाली बिजनैस वूमन, इंदिरा नूई की भी है. पेप्सिको की सीईओ और चेयरमैन इंदिरा नूई के पति अपनी फुलटाइम जौब को छोड़ कर कंसलटैंट बन गए ताकि वे अपनी दोनों बच्चियों की देखभाल कर सकें.

इसी तरह बरबेरी की सीईओ ऐंजेला अर्हेंड्स के पति ने भी अपनी पत्नी के कैरियर के लिए अपना बिजनैस समेट लिया और बच्चों की देखभाल व घर की जिम्मेदारियां अपने ऊपर ले लीं.

डिप्लोमैट जेम्स रुबिन ने भी खुशीखुशी अपनी हाई प्रोफाइल जौब छोड़ दी ताकि वे अपनी पत्नी जर्नलिस्ट क्रिस्टीन अमान पोर को सफलता की सीढि़यां चढ़ता देख सकें. उन्होंने जौब छोड़ कर अपने बेटे की परवरिश करने की ठानी.

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Anupama बनने के बाद काफी बदल चुकी हैं Rupali Ganguly, देखें फोटोज

सीरियल अनुपमा (Anupamaa) की कहानी में जहां नए-नए ट्विस्ट आ रहे हैं तो वहीं टीआरपी में भी सीरियल कमाल करता दिख रहा है. इन दिनों सीरियल में फैंस को अनुपमा और अनुज की रोमांटिक कैमेस्ट्री काफी पसंद आ रही हैं. हालांकि बुढापे में अनुपमा के मां बनने को लेकर मेकर्स को ट्रोलिंग का सामना भी करना पड़ रहा है. हालांकि अनुपमा यानी रुपाली गांगुली (Rupali Ganguly) और सीरियल के दूसरे सितारे (Anupamaa Serial Cast) शो को हिट बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. इसी बीच, रुपाली गांगुली का लेटेस्ट पोस्ट सोशलमीडिया पर छा गया है, जिसमें उनका नया अवतार देखने को मिल रहा है.

अनुपमा को बनाया खूबसूरत

 

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सीरियल में इन दिनों कपाड़िया खानदान की बहू बनने के बाद अनुपमा का नया अवतार देखने को मिलने वाला है. दरअसल, हाल ही में रुपाली गांगुली ने अनुपमा के लुक में नई फोटोज शेयर की हैं, जिसे फैंस काफी पसंद कर रहे हैं. खूबसूरत बनारसी साड़ी पहने और बालों में गजरा औऱ गोल्ड की ज्वैलरी पहने अनुपमा के लुक में रुपाली गांगुली बेहद खूबसूरत लग रही हैं.

 

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 काफी वजन घटा चुकी हैं रुपाली गांगुली

 

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सीरियल अनुपमा के लिए रुपाली गांगुली काफी वजन घटा चुकी हैं, जिसका अंदाजा उनकी लेटेस्ट फोटोज से लगाया जा सकता है. मौर्डन लुक में रुपाली गांगुली का ट्रांसफौर्मेशन फैंस को काफी पसंद आ रहा है और वह एक्ट्रेस के पोस्ट पर कमेंट करते हुए तारीफें कर रहे हैं.

 

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बेहद ग्लैमरस हैं रुपाली

 

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सीरियल अनुपमा में जहां एक्ट्रेस रुपाली गांगुली का रोल बेहद सिंपल है तो वहीं रियल लाइफ में वह नए-नए अवतार में नजर आती हैं. किसी अवौर्ड शो में गाउन हो या बर्थडे पार्टी में वेस्टर्न अवतार हर लुक में एक्ट्रेस रुपाली गांगुली बेहद खूबसूरत लगती हैं. हाल ही में एक फोटोशूट में एक्ट्रेस का ग्लैमरस लुक सोशलमीडिया पर काफी वायरल हुआ था. वहीं फैंस ने भी इस लुक की काफी तारीफें की थीं.

 

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Customized Furniture से घर को सजाएं कुछ ऐसे

क्या आप घर में पुराने फ़र्निचर देखकर थक चुके है, क्या उसे आप बदलना चाहते है? बजट कम है? आइये बताते है कुछ आसान बातें, जिससे आप घर की फर्नीचर को अपने बजट और टेस्ट के अनुसार बदल सकते है या फिर नए घर को सजा सकते है.

मुंबई जैसे शहर में, जहाँ फ्लैट्स बाकी शहरों की तुलना में काफी छोटे होते है,कस्टमाइज्डफर्नीचर का प्रचलन अधिक है. सही ढंग से फर्नीचर रखे होने पर हर कमरे की जगह सही तरीके से उपयोग करना संभव होता है.साथ ही कमरे बड़े और अच्छे लगते है, जिसे आजकल फ्लैट या मकान मालिक करवाना पसंद करते है. इसके अलावा घर की फर्नीचर को बदलने के लिए भी अनुकूल फर्नीचर मार्केट से रेडीमेड खरीदकर या जगह के अनुसार कारीगर के द्वारा बनाया जा सकता है, इसमें सभी काम बजट के अनुसार ही किया जाता है. इस बारें में कारपेंटर श्यामलाल कहते है कि मैं उत्तरप्रदेश का रहने वाला हूँ, मुंबई आकर कम जगह में फर्नीचर बनाने की कला सीखी और अब मैंने कई फ्लैट्स में कस्टमाइज्ड फर्नीचर बनाए है, जिसे फ्लैट मालिक बहुत पसंद करते है, वे कहते है कि इसमें पहले ओनर के साथ मिलकर फर्नीचर का खाका तैयार करना पड़ता है,इसके बाद लकड़ियों का चयन और बनाने का कॉस्ट बताता हूँ,मैं अधिकतर अच्छी लकड़ियों से ही फर्नीचर बनाता हूँ, जो काफी सालों तक चलती है. बजट कम हो तो इंजिनीयर वुड से भी फर्नीचर बनता हूँ.

कस्टमाइज्डफर्नीचर है क्या

  • इस तरह के फर्नीचर ओनर अपने स्टाइल से आर्डर देकर अपने पसंद के अनुसार कारपेंटर को बुलाकर फ़र्निचर बनाते है.
  • ऐसे फर्नीचर एक्सक्लूसिव होते है, क्योंकि वैसी डिजाईन मार्केट में नहीं मिलता.
  • कस्टमाइज्डफर्नीचर अधिकतर ट्रेडिशनल होते है, जिसमे कारपेंटर की कारीगरी खास होती है, क्योंकि इसे बनाने के लिए स्किल्ड कारीगर और शिल्पी की जरुरत होती है, इसलिए ऐसे काम करने वाले कारीगर भी कम है और इसका खर्चा भी बाकी फर्नीचर से अधिक होता है, क्योंकि इसमें प्रयोग किये जाने वाले मटेरियल और लकड़ियाँ भी बहुत खास होती है.

लाभ

  • ऐसे फर्नीचर को टेलर मेड फर्नीचर भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें व्यक्ति की खास स्टाइल और टेस्ट को अधिक महत्व मिलता है.
  • कस्टमाइज्ड फर्नीचरके द्वारा कमरे के जगह का अधिक से अधिक प्रयोग किया जा सकता है, क्योंकि जगह के अनुसार ही फर्नीचर का निर्माण होता है.
  • कमरे में पहले से रखे सामानों के साथ ऐसे फर्नीचर को मिक्स एन मैच किया जा सकता है, जिसमे उनके कलर,टेक्सचर, डिजाईन आदि कई चीजों को व्यक्ति पसंद के अनुसार बना सकते है, जो यूनिक और स्टाइलिश लगता है.
  • कस्टमाइज्ड फर्नीचर काफी दिनों तक टिकता है, क्योंकि इसमें प्रयोग किये जाने वाले रॉ मटेरियल, प्रीमियम क्वालिटी की होती है, इसलिए ऐसे फर्नीचर पर किये गए खर्च, सालों बाद भी इसकी ओरिजिनालिटी को बनाए रखते है.
  • ऐसे फर्नीचर जल्दी ख़राब नहीं होते, इसलिए इसे करवाने वाला व्यक्ति बाहरी फिनिशिग और रॉ मटेरियल को अपने बजट के अनुसार फिक्स कर सकता है.

हानि

  • कस्टमाइज्ड फ़र्नीचर बाकी फर्नीचर से महंगा होता है.
  • ऐसे फर्नीचर बनाने में काफी समय लगता है, क्योंकि इसके लिए कई बार लकड़ियों की क्वालिटी, टेक्सचर और बनावट को ओनर से अप्रूवल लेने के बाद फाइनल प्रोडक्ट बनाना पड़ता है, जिसमे समय अधिक लग जाता है, जबकि रेडीमेड फर्नीचर को शो रूम में देखकर तुरंत घर पर लाया जा सकता है. साथ ही ये मूवेबल होते है, लेकिन रॉ मटेरियल की कोई गारंटी नहीं होती.

फर्नीचर बनाने में योगदान ठोस और इंजीनियर लकड़ी का

इसके अलावा आजकल फ़र्निचर कई प्रकार के लकड़ियों से बनते है, जिसमें ठोस लकड़ी और इंजीनियर लकड़ीखास है. ठोस लकड़ी से बने फ़र्नीचर टिकाऊ और मजबूत होते है, जबकि इंजीनियर लकड़ी से बने फर्नीचर कम समय तक टिकते है. ठोस लकड़ी पर दीमक का हमला जल्दी होता है. ये प्राकृतिक होने की वजह से मौसम का अनुसार फूलने और सिकुड़ने लगती है, इससे उसका मूल रूप बदल जाता है,इसलिए इसे धूप और नमी से बचाना पड़ता है , जबकि इंजीनियर लकड़ी नमी या नमी के प्रभाव का सामना कुछ हद तक कर सकती है और इंजीनियर लकड़ी प्राप्त करने के लिए ताजी लकड़ी की आवश्यकता नहीं होती है. यह पर्यावरण के अनुकूल विकल्प है. ये ठोस लकड़ी से हलकी होती है, इसलिए इसे आसानी से हिलाया जा सकता है.

पथभ्रष्ठा- भाग 4: बसु न क्यों की आत्महत्या

अब बाई भी सच पर उतर आई थी, ‘‘इंसान की शक्ल में भेडि़या है भेडि़या. दिनरात गाली बकता है, दारू पीता है.’’

‘‘बसु कहां है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अस्पताल में है. बिटिया हुई है.’’

मैं ने बाई की बात सुन कर मां को बताया और फिर औटो कर के हम अस्पताल पहुंच गईं.

बसु सरकारी अस्पताल के बिस्तर पर अकेली लेटी थी. मैं ने जैसे ही उस के सिर पर हाथ फेरा. उस की आंखों से अश्रुधारा बह निकली. पता नहीं ये आत्मग्लानि के आंसू थे या पश्चात्ताप के… पास ही झूले में लेटी उस की बिटिया को गोद में उठा कर मैं ने बसु से पूछा, ‘‘रवि कहां हैं?’’

‘‘व्यस्त होंगे वरना जरूर आते,’’ उस ने बिना मेरी ओर देखे अपना मुंह दूसरी ओर मोड़ लिया.

बसु मुझे धोखे में रखना चाह रही थी या खुद धोखा खा रही थी. पता नहीं, क्योंकि जिस रात बसु प्रसव पीड़ा से छटपटा रही थी उस रात रवि अपनी पत्नी के साथ था.

एक बार बसु ने बताया था कि अपने दोनों बेटों के प्रसव के समय शुभेंदु पूरी रात अस्पताल के कौरिडोर में दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड में चहलकदमी करते रहे थे. अपनी पत्नी या बच्चों की जरा सी भी पीड़ा वे बरदाश्त नहीं कर पाते थे. आज बसु खुद को कितना अकेला महसूस कर रही होगी. उधर रेगिस्तान में लू के थपेड़ों के बीच शुभेंदु ने भी कितने अनदेखे दंश खाए होंगे. यहां भी उन के लिए मरुभूमि के अतिरिक्त क्या था?

औरत विधवा हो या परित्यक्ता, पुनर्विवाह करने पर बरसों अपने पूर्व पति को भुला नहीं पाती. यादें कोई स्लेट पर लिखी लकीरें तो नहीं होतीं कि जरा सा पोंछने पर ही मिट जाएं. सहज नहीं होता एक नीड़ को तोड़ कर, दूसरे नीड़ की रचना करना. बसु ने कैसे भुलाया होगा शुभेंदु को? अपने बच्चों की नोकझोंक, उठतेबैठते शुभेंदु की बसुबसु की गुहार क्या उसे पुराने परिवेश में लौट जाने के लिए बाध्य नहीं करती होगी या फिर जानबूझ कर शुभेंदु को भुलाने का नाटक कर रही है?

2 वर्ष का अंतराल चुपचाप दरक गया. उन दिनों अतुल की अंशकालिक पोस्टिंग देहरादून हो गई. मैं नन्हे संभव को ले कर थोड़ाबहुत जरूरत का सामान ले कर देहरादून पहुंच गई थी. 6 महीने के लिए अतुल को देहरादून के अतिरिक्त मसूरी और सहारनपुर का भी अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया था. काम की व्यस्तता उन्हें हर समय घेरे रहती. ऐसे में घरगृहस्थी के हर छोटेबड़े काम को निबटाने का दायित्व मुझ पर आ गया था.

एक दिन मैं अतुल के साथ फिल्म देख कर लौट रही थी तभी सामने एक गाड़ी से एक स्मार्ट, आकर्षक व्यक्तित्व के व्यक्ति को उतरते देखा. हालांकि मैं उन्हें काफी समय बाद देख रही थी, फिर भी मैं ने उन्हें तुरंत पहचान लिया. वे शुभेंदु थे. मन में संशय जगा कि शुभेंदु यहां कैसे? क्या दुबई का बिजनैस समेट दिया या मन भर गया वहां की चकाचौंध और पैसा कमाने की लालसा से? फिर मन ही मन सोचा कि उकसाने वाली पत्नी ही साथ छोड़ गई तो क्यों भटकते फिरते उस रेगिस्तान में? चलो देर से ही सही अपनी आत्मशक्ति और पौरुष का इजहार तो किया उन्होंने वरना तो सारी जिंदगी बसु के ही हाथों की कठपुतली बने रहे थे.

अगली सुबह अतुल दफ्तर के लिए निकल ही रहे थे कि शुभेंदु का फोन आ गया. मैं अचरज में पड़ गई. इन्हें मेरा नंबर कहां से मिला? शायद टैलीफोन डाइरैक्टरी से ढूंढ़ निकाला हो.

तभी उन का हताश स्वर सुनाई दिया, ‘‘चारु मैं तुम से मिलना चाहता हूं.’’

‘‘मैं कुछ देर बाद आप को फोन करती हूं,’’ मैं ने टालने की गरज से कहा और फिर फोन काट दिया.

अतुल मेरे पास आ कर खड़े हो गए थे. सब कुछ जानने के बाद उन्होंने मुझे समझाया. ‘‘चारु, किसी की निजी जिंदगी से हमें क्या लेनादेना? मिल लो उन से.’’

दफ्तर पहुंच कर अतुल ने अपनी गाड़ी मेरे पास भेज दी. मैं ने संभव को आया के पास छोड़ा और कुछ ही देर में शुभेंदु के मसूरी रोड स्थित भव्य बंगले पर पहुंच गई.

शुभेंदु बेहद गर्मजोशी से मिले. बेशकीमती सामान से सजे उस बंगले को देख कर मेरी आंखें चौंधिया गईं. द्वार पर दरबान, माली और घर के अंदर दौड़ते नौकर, रसोइए. सामने वाली दीवार पर उन्होंने अपने परिवार का बड़ा सा चित्र टांगा हुआ था. साइड स्टूल, शोकेस पर हर जगह बसु के ही फोटो रखे थे. हंसतीखिलखिलाती बसु, राजेशमहेश को गोद में उठाए बसु, शुभेंदु के कंधों पर झूलती बसु, विदेशी पहनावा पहने हुए कैरियर वूमन बसु. घर के चप्पेचप्पे पर बसु का आधिपत्य था. शुभेंदु ने उस की अनुपस्थिति में भी उस की पसंदनापसंद का पूरा ध्यान रखा था. खिड़कियों पर आसमानी रंग के परदे, गमलों में सजे मनीप्लांट. जैसे किसी भी पल बसु आएगी और कहेगी कि शुभेंदु देखो मैं उस दरिंदे को छोड़ कर तुम्हारे पास लौट आई.

‘‘बसु कैसी है?’’ शुभेंदु का स्वर मुझे कल्पना लोक से यथार्थ में लौटा गया था. नजरें उन के उदास चेहरे पर अटक गईं. क्षण भर के लिए मुझे बसु के प्रति रवि का बर्बरतापूर्ण व्यवहार याद आ गया था. कदमकदम पर बेइज्जती, तानेउलाहने, गालीगलौज, मारपीट… क्या शुभेंदु कायर हैं, जो अभी भी उस की यादों को सीने से चिपकाए बैठे हैं? मानसम्मान, सब कुछ तो ले डूबी यह औरत. क्षमाप्रार्थी तो वह कदापि नहीं थी.

क्या उत्तर देती शुभेंदु के प्रश्न का? बस इतना ही कहा था मैं ने, ‘‘बस यह समझ लीजिए अपने किए की सजा भुगत रही है… इंसान जो बोता है वही काटता है.’’

6 माह की अवधि समाप्त हुई और हम दिल्ली लौट आए. न अब बसु से मेरा या मेरे परिवार का कोई संबंध रह गया था. मां और भैयाभाभी सभी लखनऊ चले गए थे. शुभेंदु अकसर फोन करते रहते थे. हर बार बसु के विषय में पूछते, लेकिन मैं सहजता से टाल जाती. क्या जवाब थे मेरे पास उन के प्रश्नों के?

एक दिन अचानक बसु मेरे घर आ गई. गोद में मुसकान थी. मन में प्रश्नों के नाग फन उठा कर खड़े हो गए कि क्यों आई है बसु यहां? कहीं रवि ने भी तो इसे नहीं निकाल दिया? हमेशा ही तो अश्लील भाषा में बात करता था इस से. प्रकृति का नियम है कि जीवन में हम जिन लोगों से दूर भागना चाहते हैं, वे हमें उतना ही अपने पास खींचते हैं. बसु के साथ मेरा रिश्ता भी तो ऐसा था… कुछ प्यार का, कुछ नफरत का, कुछ सहानुभूति का.

मैं ने उस की खूब आवभगत की. कटाक्ष भी किए. अपने सुखद गृहस्थ जीवन का रेखाचित्र खींचते हुए मैं उसे जताना चाह रही थी कि इंसान यदि अपनी इच्छाओं और कामनाओं पर नियंत्रण रखे तो जिंदगी सुख से कट जाती है. महत्त्वाकांक्षी होना बुरा नहीं, लेकिन उस के लिए रिश्तों को दांव पर लगाना सही नहीं. रिश्तों की चादर ओढ़ कर भी सपनों को सच किया जा सकता है.

बसु मेरी बातें चुपचाप सुनती रही. जैसे शतरंज का खिलाड़ी अपनी ढेर सारी चालों के बावजूद यकायक विपक्षी की एक ही चाल से मात खा कर उठ जाता है कुछ ऐसा ही भाव लिए वह मुझे घूरती रही.

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