खुशी का गम- भाग 2: क्या परिवार को दोबारा पा सका वह

मेरी इस बात को सुन कर खुशी बहुत रोई थी और उस दिन घर जा कर उस ने अपने दोनों हाथों की नसें काट कर खुदकुशी करने का प्रयास किया था.

उस दिन खुशी के घर वालों को मेरी और खुशी की दोस्ती के बारे में पता चल गया. अगले ही दिन उस के घर वाले उस की और मेरी शादी का प्रस्ताव ले कर मेरे मातापिता से मिले थे.

नेहा ने मेरी और खुशी की दोस्ती के बारे में पहले ही मेरे मातापिता को सबकुछ बता दिया था, सो मेरे मातापिता ने मेरी राय बिना पूछे उस से मेरा रिश्ता पक्का कर दिया था. बाद में मैं ने अपने मातापिता से इस रिश्ते को तोड़ने की लाख मिन्नतेंकीं लेकिन उन्होंने मेरी बातों पर ध्यान नहीं दिया और आखिरकार मेरी शादी खुशी से हो गई.

विवाह के बाद खुशी ने मुझे वे सारी खुशियां दी थीं जिन की एक पति को अपने पत्नी से अपेक्षा होती है. शादी के बाद के पहले 2-3 वर्ष बहुत अच्छे बीते. वक्त के साथ मैं एक प्यारे से बेटे का पिता बन गया था. उस को गोद में उठा कर मैं बेपनाह खुशियों से भर जाता. उसे लाड़दुलार कर मुझे बहुत सुकून मिलता लेकिन लगभग 3 सालों के विवाहित जीवन के बाद हमारे दांपत्य जीवन में कुछ ठहराव सा आने लगा था. हमारे संबंधों में एकरसता और ऊब की शुष्कता पसरती जा रही थी.

मैं शुरू से ही रसिक स्वभाव का था. नईनई लड़कियों से दोस्ती करना मेरा प्रिय शगल था.

गुवाहाटी में मेरा काफी पुराना अच्छा- खासा साडि़यों का शोरूम था. मुझे व्यापार के लिए अधिक समय नहीं देना पड़ता था, पुराने कर्मचारी मेरी दुकान बहुत अच्छी तरह से संभाल रहे थे. गुवाहाटी के अलावा शिलांग में भी मेरा साडि़यों का एक बड़ा शोरूम था, सो मैं सप्ताह में एक बार शिलांग जरूर जाया करता था. वहां कई लड़कियां मेरी मित्र थीं. शिलांग में एक दोस्त के यहां मेरा परिचय फ्लोरेंस नाम की एक खासी जाति की लड़की से हुआ था. पहली ही नजर में वह लड़की मेरी निगाहों में चढ़ गई थी. उस से पहले मैं जितनी खासी लड़कियों के संपर्क में आया वे सब महज कागजी गुडि़याएं थीं, जिन के जीवन का उद्देश्य सिर्फ मौजमस्ती तथा सैरसपाटा हुआ करता था, लेकिन फ्लोरेंस बेहद जिंदादिल और बिंदास होने के साथसाथ मानसिक रूप से बहुत परिपक्व थी. वह कभी अर्थहीन बातें नहीं करती थी. उस का व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली था.

एक दिन बातों ही बातों में फ्लोरेंस ने मुझे बताया कि वह एक अच्छी नौकरी की तलाश में है, क्योंकि वह कंपनी, जिस में वह काम कर रही थी, उस की शिलांग की शाखा बंद होने वाली थी.

फ्लोरेंस ने जैसे ही मुझे यह बताया मैं ने उसे अपने शिलांग वाले साड़ी के शोरूम में मैनेजर के पद पर रख लिया था. अब जैसेजैसे मैं उस के संपर्क में आ रहा था, मेरा उस के प्रति खिंचाव बढ़ता ही जा रहा था. दूसरी लड़कियां जहां मेरी अमीरी और आकर्षक व्यक्तित्व की वजह से मेरे आसपास तितलियों की तरह मंडराया करती थीं वहीं फ्लोरेंस मुझ से पर्याप्त दूरी बनाए रखती, जिस की वजह से मैं उस की ओर शिद्दत से खिंचता जा रहा था.

इधर उस की ओर मेरे खिंचाव का एक कारण और था. फ्लोरेंस के नाम कई एकड़ जमीन थी. अगर मैं फ्लोरेंस से रिश्ता कायम कर लेता तो मैं उस की जमीन का मालिक बन जाता. सो जमीन के लालच में मैं उस से रिश्ता कायम करना चाहता था और एक दिन मुझे वह मौका मिल गया जिस की मुझे चाहत थी.

उस दिन फ्लोरेंस मेरे पास बहुत खराब मूड में आई और मेरे कुरेदने पर रो पड़ी. मुझ से बोली, ‘मेरे भाई बहुत जल्लाद हैं. हम खासियों में मां परिवार की मुखिया होती है. बेटियां वंश आगे चलाती हैं. बेटियों को ही मां की जमीनजायदाद मिलती है. मैं अपनी मां की इकलौती बेटी हूं. इसलिए मां की सारी जमीन मुझे मिली है. मेरे दोनों भाइयों की निगाहें मेरी जमीन पर उगने वाले फलों से होने वाली आमदनी पर गड़ी हुई हैं.

‘मैं तो नौकरी पर आ जाती हूं तो मेरे भाई ही खेतों में मजदूरों से काम करवाते हैं. खेती से होने वाली आमदनी पर अपना नियंत्रण रखने के लिए मेरे भाई मेरी शादी एक निकम्मे, नाकारा खासी आदमी से कराने पर जोर दे रहे हैं.’

उसे इस तरह रोते देख मैं ने उसे अपनी बांहों में भर लिया और उस से बोला, ‘अरे, मेरे होते हुए तुम क्यों चिंता करती हो? मैं तुम्हारे भाइयों से बातें करूंगा और उन्हें धमकाऊंगा. तुम बिलकुल भी मत डरो. मेरे होते हुए कोई तुम पर अपनी मरजी नहीं थोप सकेगा.’

यह कह कर मैं ने उसे चूमना शुरू कर दिया. तब फ्लोरेंस ने मेरे चंगुल से छूटने के लिए बहुत हाथपांव मारे लेकिन उस दिन मेरे ऊपर उस का नशा इस कदर हावी था कि मैं ने उस की एक न सुनी और आखिरकार कुछ प्यार और कुछ जोरजबरदस्ती करते हुए मैं ने उसे आत्मसमर्पण करने पर विवश कर दिया. उस दिन मैं ने महसूस किया कि मेरी इस जबरदस्ती से फ्लोरेंस बहुत अधिक नाराज नहीं थी. धीरेधीरे वह मुझे दिलोजान से चाहने लगी थी.

फ्लोरेंस के शोख बिंदास व्यक्तित्व के सामने खुशी का सीधासादा व्यक्तित्व मुझे नीरस लगने लगा था. फ्लोरेंस बातें करने में इतनी वाक्पटु थी कि मामूली बात को भी वजनदार और आकर्षक बना कर सामने रखती. मुझे उस से महज बातें करना बहुत अच्छा लगता था.

अब व्यापार के काम के बहाने मैं हफ्तों फ्लोरेंस के घर पड़ा रहता था. धीरेधीरे शिलांग के साडि़यों के शोरूम की पूरी बागडोर उस ने अपने हाथों में ले ली थी. इधर मुझे यह खुशखयाली भी रहने लगी कि फ्लोरेंस की सारी जमीन अब मेरी है. मैं ही उस का असली मालिक हूं.

फ्लोरेेंस से मेरे संबंधों की खबर खुशी और मेरे परिवार वालों को लग गई थी जिस की वजह से खुशी बहुत दुखी रहने लगी थी. मैं जब भी घर जाता, वह मुझ से कहती, ‘देखो, तुम क्यों उस खासी युवती को इतनी अहमियत दे रहे हो? क्या मुझे और मेरे बेटे को तुम्हारा साथ, तुम्हारा वक्त नहीं चाहिए? आज तुम मानो या न मानो पर देखना, एक दिन वह खासी औरत तुम्हारा साडि़यों का शोरूम हड़प लेगी. तुम ने यहां का शोरूम भी नौकरों के भरोसे छोड़ दिया है. वहां की आमदनी पहले से आधी रह गई है. तुम क्यों अपना सर्वनाश करने पर तुले हुए हो?’

खुशी की बातें सुन कर मैं गुस्से में भर उठा था और उस को चांटा मार कर घर से बाहर निकल आया था.

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वक्त की साजिश- भाग 1: क्या अभिषेक को मिला सच्चा प्यार

आज भी वह नौकरी न मिलने की हताशा के साथ घर लौटा. कल ही गांव से खत आया कि आर्थिक स्थिति बिगड़ रही है. पिताजी से अब काम नहीं होता. वहां कुछ जल्दी करो वरना यहीं आ जाओ. जो 3-4 बीघा जमीन बची है उसी पर खेती करो, उसी को संभालो. आखिर बिट्टी की शादी भी तो करनी है. अब जल्दी कुछ भी करो.

उस की कुछ समझ में नहीं आ रहा था. 3-4 बीघा जमीन में क्या होगा? कितनी हसरतों से इधरउधर से कर्ज ले कर उस के पिता ने उसे शहर भेजा था कि बेटा पढ़लिख जाएगा तो कोई नौकरी कर लेगा और फिर बिट्टी की शादी खूब धूमधाम से करेंगे…पर सोचा हुआ कभी पूरा होता है क्या?

‘आखिर मेरी भी कुछ अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारियां हैं. मैं उन से मुंह तो नहीं मोड़ सकता न. और कब तक यहां नौकरी की तलाश में भटकता रहूंगा. कुछ करना ही पडे़गा.’ वह सोचने लगा, ‘मैं कल ही घर चला जाऊंगा.’

‘पर रंजना?’ खयालों में यह नाम आते ही वह कांप सा गया, ‘क्या कहूंगा रंजना से? क्या मैं उस से अलग रह पाऊंगा?’

‘अलग रहने की जरूरत क्या है, वह भी मेरे साथ चलेगी,’ मन ने सहज उत्तर दिया.

‘साथ चलेगी?’ जैसे उस के मन ने प्रतिप्रश्न पूछा, ‘तुम उसे क्या दे पाओगे. एक उदास, बोझिल सी जिंदगी.’

‘तो क्या उसे छोड़ दूं?’ यह सवाल मन में आते ही वह सिहर सा गया, पर यह तो करना ही पड़ेगा. आखिर मेरे पास है ही क्या जो मैं उसे दे सकता हूं. उसे अपने से अलग करना ही पडे़गा.’

‘पर कैसे?’

वह कुछ समझ नहीं पा रहा था.

इन्हीं खयालों में डूबतेउतराते उसे अपनी छाया से डर लगने लगा था.

कितनी अजीब बात थी कि वह अपनेआप से ही भयभीत था. उसे ऐसा लगने लगा था कि खोना ही उस की नियति है. जो इच्छा उस के मन में पिछले 7 सालों से कायम थी, आज उसी से वह डर रहा था.

कोई नदी अविरल कितना बह सकती है, अगर उस की धारा को समुद्र स्वीकार न करे तो? हर चीज की एक सीमा होती है.

उसे लगा कि वह कमरे में नहीं बल्कि रेत के मैदान पर चल रहा हो. दिमाग में रेगिस्तान याद आते ही उसे वह कहानी याद आ गई.

एक मुसाफिर रास्ता भटक कर रेगिस्तान में फंस गया. उस का गला प्यास से सूखा जा रहा था. वह यों ही बेदम थके कदमों से अपने को घसीटता हुआ चला जा रहा था. वह प्यास से बेहाल हो कर गिरने ही वाला था कि उसे लगा कोई सोता बह रहा है. उस के कदम पुन: शक्ति के साथ उठे दूर कहीं पानी था वह तेजी से उस तरफ बढ़ चला. पास जाने पर पता चला कि वह तो मरीचिका थी.

निराश, थकाहारा वह तपती रेत पर घुटनों के बल बैठ गया. तभी दूर उसे एक झोंपड़ी दिखाई दी. उस ने सोचा शायद उस की प्यास वहां बुझ जाए. वह झोंपड़ी तक पहुंचतेपहुंचते गिरने ही वाला था कि तभी किसी के कोमल हाथ उसे सहारा दे कर झोंपड़ी के अंदर तक ले आए और पूछा, ‘ऐ अजनबी, तू क्यों भटक रहा है? और तुझे किस की चाह है?’

उस के मुंह से केवल 2 शब्द निकले,  ‘पानी, प्यासा.’ इन्हीं शब्दों के साथ वह गिर पड़ा.

उस कोमल हाथ वाले व्यक्ति ने अपनी अंजलि में जल भर कर उसे पिलाया. पानी की चंद बूंदों से उसे होश आ गया पर उस की प्यास अभी बुझी नहीं थी. वह अभी और पानी पीना चाहता था. तभी एक वहशी आवाज उस के कानों में गूंज उठी :

‘कौन है, और यहां क्या कर रहा है? तू किसे पानी पिला रही है? क्या तुझे पता नहीं है कि यह पानी कितनी मुश्किल से यहां तक आता है?’ इतना कह कर उस वहशी आवाज के मालिक ने उस अजनबी को झोपड़ी से बाहर धकेल दिया, और वह फिर उसी रेगिस्तान में भटकने लगा. कहते हैं मरते वक्त उस भटके युवक के होंठों पर यही बात थी कि ऐ अजनबी, जब तुझे प्यासा ही मारना था तो फिर दो घूंट भी क्यों पिलाया?

इस कहानी की तरह ही उसे अपना हाल भी लगा. कहीं वही तो उस कहानी के 2 पात्र नहीं हैं? और वे कोमल हाथ रंजना ही के तो नहीं जो दो घूंट पी कर फिर प्यासा मरेगा इस जन्म में.

उस का मन उस के वश में नहीं हो पा रहा था. वह अपने मन को शांत करने के लिए रैक से कोई पुस्तक तलाशने लगा. एक पुस्तक निकाल कर वह बिस्तर पर लेट गया और किताब के पन्नों को पलटने लगा. तभी पुस्तक से एक सूखा फूल उस की छाती पर गिरा, वह जैसे अपनेआप से ही चीख उठा, ‘यार, यादें भी मधुमक्खियों की तरह होती हैं जो पीछा ही नहीं छोड़तीं.’

अतीत की एक घटना आंखों में साकार हो उठी.

रंजना का हाथ उस की तरफ बढ़ा और उस ने मुसकरा कर उसे सफेद गुलाब यह कहते हुए पकड़ा दिया, ‘मिस्टर अभिषेक, आप के जन्मदिन का तोहफा.’

उस ने हंसते हुए रंजना से फूल ले लिया.

‘जानते हो अभि, मैं ने तुम्हें सफेद गुलाब क्यों दिया? क्योंकि इट इज ए सिंबल आफ प्योर स्प्रिचुअल लव.’

उस ने मुड़ कर बिस्तर पर देखा तो वही फूल पड़ा था. पर अब सफेद नहीं, सूख कर काला हो चुका था.

‘इस ने भी रंग बदल दिया,’ यह सोच कर वह हंसा, ‘प्योरिटी चेंज्ड वोन कलर. काला रंग अस्तित्वविहीनता का प्रतीक है. प्रेम के अस्तित्व को शून्य करने के लिए…जाने क्यों रातें काली ही होती हैं, जाने क्यों उजाले का अपना कोई रंग नहीं होता और कितनी अजीब बात है कि उजाले में ही सारे रंग दिखाई देते हैं. मुझे भी तो रंजना की आंखों में अपने सारे रंग दिखाई देते हैं, क्योंकि वह सुबह के उजाले की तरह है. और मैं…काली रात की कालिमा की तरह हूं.’

‘मिस्टर अभिषेक, यू आर एलोन विद योर ग्रेट माइंड’ जैसे शब्दों के सहारे उस ने खुद अपनी ही पीठ थपथपाई पर हर जगह दिमाग काम नहीं आता. बहुत कुछ होता है प्योर हार्टिली. मैं क्यों नहीं कर पाता ऐसा.

मैं क्यों समझ रहा हूं स्थितियों को. क्यों नहीं बन पाता एक अबोध शिशु, जो चांद को भी खिलौना समझ कर लेने की जिद कर बैठता है.

‘मेरा घर आने वाला है, कब तक साथ चलते रहोगे?’ रंजना ने पूछा.

‘तुम्हारे साथ चलना कितना अच्छा लगता है.’

‘हां, अभी तक तो.’

‘क्या कहा, अभी तक, इस का क्या मतलब?’

‘कुछ नहीं ऐसे ही,’ वह हंसी.

‘मैं तुम्हारे साथ सदियों तक बिना रुके चल सकता हूं, समझी.’

‘कौन जाने,’ रंजना ने माथे पर बल डाल कर कहा.

वह यह सोच कर कांप सा गया, क्या रंजना अपने भविष्य को जानती थी?

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शुक्रगुजार- भाग 2: क्या अपने मकसद में कामयाब हो पाई अन्नया

कई बार वह मन ही मन सोचती कि कब तक लोग इस गोरे रंग के पीछे भागते रहेंगे. अर्णव के साथ चैटिंग करने के बाद वह भी उसे मन ही मन पसंद करने लगी थी.

वसुधाजी चूंकि दोनों पक्षों से परिचित थीं, इसलिए उन्होंने सब की

सुविधा को ध्यान में रखते हुए संडे को एक रैस्टोरैंट में मिलने का प्रोग्राम बना लिया.

अनन्या के मन में भी प्यार का अंकुर फूट चुका था. वह भी थोड़ी घबराई हुई रैस्टोरैंट में अपनी मां और वसुधाजी के साथ पहुंची.

अपनी उंगली में अर्णव के नाम की अंगूठी पहन कर मन ही मन बहुत खुश थी.

मीराजी ने कहा था कि वे किसी तरह का लेनदेन नहीं करेंगी. अब अनन्या उन की बहू है, इसलिए अब उस के लिए भी फिक्र करने की आप को कोई आवश्यकता नहीं है.

उन की इन बातों को सुन कर सरलाजी की आंखें भर आई थीं.

उत्साहित सरलाजी बेटी की शादी धूमधाम से करने के लिए तैयारी में जुट गई थीं. वे सोचतीं कि इकलौती बेटी की शादी इतनी शानों शौकत से करें कि सब देखते रह जाएं.

टौप का मैरिज हौल, डैकोरेशन, इवैंट मैनेजमैंट आदि सबकुछ पर उन्होंने पानी की तरह पैसा बहाया.

शौपिंग तो पूरी ही नहीं हो पा रही थी. कभी बुटीक तो कभी ज्वैलर, तो

कभी कुछ और. मांबेटी और उन की वसुधा दी शादी की तैयारियों में लगी हुई थीं. लेकिन तैयारियां थीं कि पूरी ही नहीं हो पा रही थीं.

शादी के 5 दिन बचे थे. तभी एक दिन उस ने बताया कि आज मम्मीजी ने उस से व्रत करने को बोला है. उन्होंने उस के लिए पूजा रखी है. उस के राहु के घर में शनि बैठा है और सूर्य की अंतर्दशा में मंगल नीच घर में है, इसलिए शादी से पहले ग्रहशांति के लिए पंडितजी ने यह पूजा जरूरी बताई है.

वे स्वयं धार्मिक विचारों की थीं, इसलिए उन लोगों को इस में कुछ गलत नहीं लगा था. वसुधा दी और वे उसे ले कर उन के बताए हुए मंदिर में गईं. 3 घंटे तक लंबी पूजा चली. उस का तो पूरे दिन का उपवास हो गया था. मगर सुखद भविष्य की कल्पना में उस दिन वह भूखप्यास सब भूल गई थी.

शादी खूब धूमधाम से हुई. मीराजी उस के लिए बहुत सुंदर जेवर और साडि़यां ले कर आई थीं.

भारी साड़ी और जेवर से लदीफंदी मन में अनेक अरमान संजोए अर्णव की बांह पकड़ कर वह अपनी नई दुनिया में आई थी.

शादी की भीड़भाड़, रस्मोंरिवाज, हंसीठहाकों में पूरा दिन कब बीत

गया, पता ही नहीं लगा. आखिर वह खूबसूरत घड़ी आ गई, जब वह अर्णव की बांहों में समाने का ख्वाब संजोए अपने कमरे में आई. वह उस की बांहों में समाने को बेकरार बैठी थी, फिर जाने कब नींद के आगोश में समा गई, पता ही नहीं चला.

सुबह मम्मीजी की आवाज से उस की आंख खुली. वह हड़बड़ा कर उठी.

‘‘अनन्या जल्दी से तैयार हो जाओ. पंडितजी आने वाले हैं.’’

‘‘जी.’’

फिर वे उस के सूटकेस में रखे कपड़ों को उलटपुलट कर बोलीं, ‘‘तुम हरे रंग की कोई साड़ी नहीं लाई हो? आज बुद्धवार है. पंडितजी ने हरे रंग

के कपड़े पहनने को बोला है. वे स्वयं भी हरे रंग की साड़ी पहने थीं.’’

अनन्या चुपचाप उन की ओर देख रही थी.

‘‘कोई बात नहीं, मैं अपनी साड़ी ला कर दे देती हूं.’’

एक साधारण सी प्रिंटेड चटक हरे रंग की साड़ी देख कर उस का मन रो पड़ा. लेकिन ससुराल का पहला दिन था, इसलिए उस ने चुपचाप पहन ली. उस की आंखें डबडबा उठी थीं. वह जानती थी कि उस के सांवले रंग को यह साड़ी और सांवला बना देगी.

अर्णव ने उस पर एक नजर डाली और फिर मुसकराते हुए उस की बगल में बैठ गया. वह भी मुसकरा उठी.

‘‘सौरी अन्नी, कल पंडितजी ने कहा था कि नए जोड़े का भद्रा काल में मिलन अशुभ होता है.’’

वह उस की ओर देखते हुए बोली, ‘‘मुझ से बता तो देते, मैं सारी रात तुम्हारा इंतजार करती रही.’’

‘‘मैं थका हुआ था. मम्मी के कमरे में लेटा तो वहीं सो गया.’’

अपने प्यारे पति के भोलेपन पर वह मुसकरा उठी, क्योंकि प्यार ऐसा ही होता है.

आखिर वह घड़ी आ ही गई… एकदूसरे की बांहों में खो कर 2 जिस्म एक जान बन गए. प्यार के पल इतने खूबसूरत होते हैं, यह एहसास अपनेआप में ही बहुत सुंदर होता है.

‘‘एक बात कहूं, तुम बुरा तो नहीं मानोगी?’’

प्रियतम की बांहों के झूले में प्यार में डूबती हुई अनन्या बोली, ‘‘आप का हुकुम सिरमाथे मेरे हुजूर.’’

हिचकिचाते हुए अर्णव अटकतेअटकते हुए बोला, ‘‘अपनी सैलरी मम्मी को दोगी?’’ वह उस समय अनन्या से आंखें नहीं मिला पारहा था.

‘‘अर्णव, तुम्हारे प्यार के लिए सैलरी क्या, मैं तो अपनी जान भी कुरबान कर दूं.’’

अर्णव ने तुरंत अपना हाथ उस के मुंह पर रख दिया.

जब उस ने सरप्राइज गिफ्ट के तौर पर हनीमून पैकेज के टिकट और प्रोग्राम उसे बताया तो वह खुश तो हुआ, लेकिन चेहरे पर घबराहट दिखाई दे रही थी.

‘‘परेशान क्यों हो? कोई प्रौब्लम हो तो बताओ?’’

‘‘नहीं… नहीं…’’

दोनों कश्मीर की वादियों में श्रीनगर, पहलगाम, खिलनमर्ग घूम कर वैष्णोदेवी के दर्शन करने भी गए.

अर्णव की एक बात अनन्या को बहुत खटकी कि हनीमून के दिनों में भी वह पूजापाठ करता और घंटों तक माला जपता.

बर्फबारी के कारण फ्लाइट कैंसिल हो जाने की वजह से वे 1 दिन देर से घर लौटे. जैसे ही उन्होंने मम्मीजी को फोन किया कि वे लोग घर पहुंच रहे हैं, वे नाराज स्वर में बोलीं, ‘‘आज 9वां दिन है, इसलिए आज की रात कहीं होटल में रुक जाओ. कल सुबह आना.’’

अनन्या बोल पड़ी, ‘‘यह क्या बेवकूफी है?’’

‘‘तुम नहीं समझोगी. आज 9वें दिन घर लौटना अशुभ होता है.’’

उसे अर्णव की सोच पर गुस्सा आ रहा था, लेकिन चुप रही.

अब अनन्या चुपचाप अपनी ससुराल की दिनचर्या समझने की कोशिश कर रही

थी, क्योंकि अभी उस की छुट्टियां बाकी थीं.

रोज सुबह 7-8 बजे के बीच एक पंडितजी का आगमन होता, उन की सेवा के लिए फूलफल और नियमित रूप से मिठाई मंगाई जाती. स्वाभाविक था कि उन पंडितजी को महीने का पारिश्रमिक भी दिया जाता रहा होगा.

मम्मीजी भी घंटों न जाने क्याक्या पाठ करतीं. फिर माला जपतीं. अर्णव भी पीछे नहीं रहते. उन का पूजापाठ तो हनीमून पीरियड में भी चलता रहा था.

‘‘अनन्या ध्यान रहे, मेरे यहां उन खास दिनों में किचन में प्रवेश करना वर्जित है. हमारा घर पूजापाठ वाला घर है. तुम उन दिनों अर्णव से दूर रहना.’’

सास की बातें सुन अनन्या को झटका लगा कि आज 21वीं सदी में भी लोगों की सोच ऐसी है. आज भी परिवारों में इस तरह का अंधविश्वास जड़ें जमाए है. मासिकधर्म के

दिनों के दौरान यह करो, यह न करो सुनसुन कर उस की इच्छा हुई कि वह अपना माथा पीट ले. उसे अफसोस था तो इस बात का कि उस का पति अर्णव भी उसी कट्टर सोच को मानने वाला है.

अच्छाई यह थी कि मम्मीजी और अर्णव दोनों ही उस का बहुत खयाल रखते थे. मम्मीजी उसे चाय भी नहीं बनाने देतीं, न ही घर का और कोई काम करने को कहतीं.

अनन्या की छुट्टियां खत्म हो गई थीं. इसलिए वह घड़ी में अलार्म लगा कर सोई, क्योंकि उसे 8 बजे घर से निकलना था. वह नहाधो कर किचन में अपना नाश्ता और चाय बनाने के लिए गई तो देखा कि मम्मीजी ने उस का फैवरिट पोहा तैयार कर रखा है और टिफिन भी तैयार था. लेकिन अंधविश्वास में डूबी मम्मीजी ने उस की ड्रैस के कलर के लिए टोक कर उस का मूड खराब कर दिया.

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शुक्रगुजार- भाग 1: क्या अपने मकसद में कामयाब हो पाई अन्नया

सुबह के 8 बजे थे. सरलाजी बेटी अनन्या के साथ मंदिर के बाहर दुकान से लड्डू खरीद रही थीं. तभी वहां वसुधाजी आ गईं. बोलीं, ‘‘आज सुबहसुबह मांबेटी दोनों मिल कर किस बात के लिए भगवानजी को घूस देने जा रही हैं?’’

‘‘दी, मैं आप को फोन करने ही वाली थी. अपनी अनन्या को बैंक में नौकरी मिल गई है.’’

‘‘यह तो बड़ी अच्छी खबर है. बधाई हो. बधाई अनन्या.’’

‘‘थैंक्स आंटी.’’

‘‘दी, ये सब तो ठीक है, लेकिन अब इस के लिए कोई अच्छा सा लड़का मिल जाए. बस फिर मैं अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाऊं . इस के पापा का अधूरा सपना पूरा हो जाए.’’

‘‘ऐसी भी क्या जल्दी है? कुछ दिन तो इसे मस्ती कर लेने दो.’’

‘‘इस साल 26 की पूरी हो जाएगी. लड़का ढूंढ़ने में समय लगता है.’’

‘‘अनन्या, किसी मैट्रीमोनियल साइट पर अपना बायोडेटा रजिस्टर करवा कर उस पर सरला का फोन नंबर डाल दो. लड़के वाले खुद ही तुम लोगों से संपर्क करते रहेंगे.’’

‘‘वह तो मैं ने डलवा रखा है, लेकिन आप की नजर में कोई लड़का हो तो बताइएगा जरूर, क्योंकि जानपहचान में रिश्ता होगा तो दिल को तसल्ली रहेगी.’’

‘‘इतनी चिंता क्यों करती हो… नौकरी लग गई है… लड़का भी मिल जाएगा. आजकल तो नौकरी करने वाली लड़कियों को लोग बहुत पसंद कर रहे हैं. सोने की मुरगी जो होती है… जिंदगीभर घर भरती रहेगी.’’

‘‘तब भी न तो दहेज कम हो रहा है और न ही लड़कियों पर अत्याचार’’

‘‘हां… हां… वह तो है पर अनन्या क्या मेरी बेटी नहीं है. कोई लड़का समझ में आएगा तो जरूर बताऊंगी.’’

‘‘मम्मी, आप भी कभी खुश नहीं रह सकतीं. अब कुछ नहीं तो मेरी शादी की चिंता में घुलने लगीं.’’

वसुधाजी और सरलाजी दोनों प्रौढ़ महिलाएं थीं. मंदिर में होने वाली मुलाकात आपस में प्रगाढ़ रिश्ते में बदल चुकी थी.

वसुधाजी संपन्न परिवार से थीं. दोनों बेटे ऊंचे ओहदों पर थे. बहूबच्चों से घर भरा था, लेकिन पति के निधन के बाद से वे अपनेआप को नितांत अकेला पाती थीं. इसीलिए स्वयं को व्यस्त रखने के लिए रोज मंदिर, कथा, पूजा आदि में व्यस्त रखती थीं.

सरलाजी के पति एक ऐक्सीडैंट के दौरान रीढ़ की हड्डी में चोट लगने के कारण बिस्तर पर आ गए थे. उन की दुकान पर छोटे भाई ने कब्जा कर लिया था. अच्छा यह था कि पति ने अपना मकान बना लिया था. उस में 2 किराएदार थे. उस पैसे से खींचतान कर किसी तरह खर्च चल जाता था.

मगर जिस समय अनन्या 12 वर्ष की थी, उन के पति उन्हें अकेला छोड़ गए थे. अब उन के जीवन का लक्ष्य बेटी को पढ़ालिखा कर उसे अपने पैरों पर खड़ा करना था.

भगवान के प्रति अगाध श्रद्धा के कारण वे मंदिर, व्रत, उपवास आदि कर्मकांडों पर अटूट विश्वास रखती थीं. पति के स्वस्थ होने की कामना से भी रोज मंदिर जाती थीं.

वसुधाजी चूंकि सरलाजी से उम्र में बड़ी थीं तो स्वत: वे उन की दीदी बन गई थीं. ससुराल पक्ष में देवर के दुकान हड़पने पर भी उन की सास देवर के पक्ष में खड़ीं थीं. इसलिए ससुराल वालों के साथ उन के रिश्ते खराब हो गए थे और मायके में बूढ़ी मां और भाई का परिवार था, जो स्वयं अपने जीवनयापन के लिए सदा संघर्षरत रहते थे.

इन हालात में वसुधाजी उन्हें बड़ी बहन या कह लो, गार्जियन सी लगतीं, क्योंकि पति

के निधन के समय उन्होंने आगे बढ़ कर उन्हें अपने गले से लगाया था और बड़ी बहन की तरह हर समय उन की मदद के लिए तैयार रहती थीं.

सरलाजी बेटी की शादी के लिए प्रयास तो कर ही रही थीं. अब वह परेशान भी रहने लगी थीं. तभी एक मैट्रीमोनियल साइट पर एक लड़के का प्रोफाइल उन्हें पसंद आ गया. उन्होंने बात बढ़ाते हुए बेटी का प्रोफाइल और फोटो भेज दिया. उन का ओके आते ही उन्होंने फोन से बात की और जब उन्होंने दहेज न लेने की बात की तब तो वे उतावली हो उठीं.

उन्होंने जल्दी से लड़के का फोटो और बायोडाटा वसुधा दी को दिखाया. यह सुनते ही कि लड़के के परिवार से वे परिचित हैं तो तुरंत अपनी दी को ले कर लड़के को देखने उस की दुकान पर पहुंच गईं.

प्रतिष्ठित मौल में बड़ा शोरूम और गोरेचिट्टे आकर्षक 6 फुट के अर्णव की सादगी पर वे मुग्ध हो उठीं. उस ने वसुधा दी को बूआजी कहते हुए पैर छुए. फिर उन के भी चरण स्पर्श कर के आशीर्वाद लिया. उस ने इशारे से ही किसी से कह कर उन के लिए कोल्ड ड्रिंक मंगवा लिया था.

इतने बड़े शोरूम और आकर्षक अर्णव के हाथ में बेटी के भविष्य को सुरक्षित और खुशहाल समझ वे खुश हो गईं.

अब वे अपनी दी पर जल्दी रिश्ता करवाने के लिए दबाव डालने लगीं.

अर्णव की मां मीराजी ने जन्मकुंडली मिला कर शादी करने की अपनी इच्छा जाहिर की. सरलाजी जन्मकुंडली भेज कर बेसब्री से उन के उत्तर का इंतजार कर रही थीं. वैसे उन के विचार से भी जन्मपत्री का मिलान आवश्यक था.

अगले दिन ही मीराजी का फोन आया, ‘‘बधाई हो सरलाजी. बस बच्चे

आपस में मिल लें और एकदूसरे को समझ लें, फिर हम लोग आपस में रिश्तेदार बन जाएंगे.’’

वे खुशी से खिल उठी थीं. वसुधा दी ने उन्हें बताया था कि जन्मकुंडली तो मिल गई है, लेकिन शादी से पहले अनन्या को एक छोटी सी पूजा करनी होगी. उन्हें भला पूजा से क्या एतराज होता. वे खुशी से अपनी दी के साथ मीराजी से मिलने पहुंचीं.

मीराजी ने शालीनतापूर्वक उन का स्वागतसत्कार किया.

भोली और सीधीसादी सरलाजी के लिए बड़ी सी कोठी और भव्य शोरूम का मालिक आकर्षक अर्णव को देखने के बाद कुछ सोचनेविचारने को बचा ही नहीं था.

मीराजी ने अपने मन का दर्द साझा करते हुए बताया कि चूंकि अपनी बेटी की शादी में उन्होंने भारी दहेज दिया था… दहेज के कारण ही उन की बेटी ने परेशान हो कर आत्महत्या कर ली थी… दहेज के दंश की पीड़ा के दर्द की अनुभूति उन्होंने बहुत करीब से की है. अत: उन्होंने प्रण कर लिया है कि बेटे की शादी में

वे दहेज नहीं लेंगी और उस का विवाह सादगीपूर्वक करेंगी.

मीराजी ने अनन्या की मेल आईडी मांगी थी ताकि दोनों आपस में चैटिंग कर के एकदूसरे को समझ लें.

फिर क्या था. दोनों के बीच चैटिंग शुरू हो गई. पर अब सरलाजी के मन में डर

बना रहता कि कहीं उन की सांवली बेटी को गोराचिट्टा अर्णव और मीराजी नापसंद न कर दे.

वे बेटी से तरहतरह के उबटन और ब्यूटी प्रोडक्ट्स इस्तेमाल करने को कहतीं और ब्यूटीपार्लर जाने को मजबूर करतीं.

इसी बात पर एक दिन वह नाराज हो कर बोली, ‘‘मम्मी, मैं जैसी हूं वैसी पसंद करनी है तो करें अन्यथा मैं खुश हूं.

‘‘आप को उन लोगों के पसंद करने की इतनी फिक्र है, कभी आप ने अपनी बेटी से भी उस की पसंद पूछी है?’’

‘‘अर्णव, तो हीरा है, तुम उसे नापसंद ही नहीं कर सकतीं.’’

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अनोखा हनीमून- भाग 3: मिस्टर माथुर और सिया का क्या रिश्ता था

कुछ कहते न बना वीरेन और नमिता से, वे दोनों अपना सा मुंह ले कर मिस्टर माथुर के घर से निकल आए.माथुर दंपती ने जब अनाथालय से बच्ची को गोद लिया था, तब उन की उम्र 55 साल के आसपास थी, एक बच्ची को गोद लेने की सब से बड़ी वजह थी कि मिस्टर माथुर के भतीजों की नजर उन की संपत्ति पर थी और माथुर दंपती के निःसंतान होने के नाते उन के भतीजे उन की दौलत को जल्दी से जल्दी हासिल कर लेना चाहते थे.

मिस्टर माथुर ने बच्ची को गोद लेने के बाद उस का नाम ‘सिया‘ रखा और उसे खूब प्यारदुलार दिया. उन्होंने सिया के थोड़ा समझदार होते ही उसे ये बात बता दी थी कि सिया के असली मांबाप वे नहीं हैं, बल्कि कोई और हैं और वे लोग उसे अनाथालय से लाए हैं.

इस बात को सिया ने बहुत ही सहजता से लिया और वह माथुर दंपती से ही अपने असली मांबाप की तरह प्यार करती रही.आज माथुर दंपती के इस प्रकार के रूखे व्यवहार से नमिता बुरी तरह टूट गई थी. वह होटल में आ कर फूटफूट कर रोने लगी. वीरेन ने उसे हिम्मत दी, “तुम परेशान मत हो नमिता… मैं माथुर साहब से एक बार और मिल कर उन से प्रार्थना करूंगा, उन के सामने अपनी झोली फैलाऊंगा. हो सकता है कि उन्हें दया आ जाए और वे हमारी बेटी से हमें मिलने दें,” वीरेन ने कहा.

अगले दिन वीरेन एक बार फिर मिस्टर माथुर के सामने खड़ा था. उसे देखते ही मिस्टर माथुर अपना गुस्सा कंट्रोल करते हुए बोले, “अरे भाई, क्यों बारबार चले आते हो हमें डिस्टर्ब करने…? क्या कोई और काम नहीं है तुम्हारे पास? हम तुम्हें अपनी बेटी से नहीं मिलवाना चाहते… अब जाओ यहां से?”

एक बार फिर वीरेन अपना सा मुंह ले कर वापस आ गया था.वीरेन को बारबार सिया से मिलने के लिए परेशान और मिस्टर माथुर के रूखे व्यवहार को देख कर मिस्टर माथुर की पत्नी ने उन से कहा, “आप उन लोगों को सिया से मिला क्यों नहीं देते?”

“आज को तुम बेटी को मिलाने को कह रही हो, कल को उसे उन लोगों के साथ जाने को कहोगी… और क्या पता कि ये लोग भला उस के असली मांबाप हैं भी या नहीं,” मिस्टर माथुर ने अपनी पत्नी से कहा.

“वैसे, अपनी सिया की शक्ल उस युवक से काफी हद तक मिलती तो है,” मिसेज माथुर ने कहा, तो मिस्टर माथुर ने भी अपनी आंखें कुछ इस अंदाज में सिकोड़ीं, जैसे वे वीरेन और सिया की शक्लें मिलाने का प्रयास कर रहे हों और कुछ देर बाद वे भी मिसेज माथुर की बात से संतुष्ट ही दिखे.

“अब यहां रुके रहने से क्या फायदा वीरेन? हम ने जो गलत काम किया है, उस की सजा हमें इस रूप में मिल रही है कि हम अपनी बेटी के इतने करीब आ कर भी उस से नहीं मिल पाएंगे,” नमिता ने दुखी स्वर में कहा.

“हां नमिता… पर, एक बार मुझे और कोशिश करने दो. हो सकता है कि उन का मन पसीज जाए… और फिर तुम ने ही तो एक बार किसी कवि की चंद पंक्तियां सुनाई थीं न… ‘फैसला होने से पहले मैं भला क्यों हार मानूं… जग अभी जीता नहीं है… मैं अभी हारा नहीं हूं’,” वीरेन ने कहा.

“तो फिर मैं भी तुम्हारे साथ हूं,” नमिता ने भी दृढ़ता से कहा.एक बार फिर से वीरेन और नमिता माथुर दंपती के सामने बैठे हुए थे. मिस्टर माथुर का लहजा भी थोड़ा नरम लग रहा था.

“तो वीरेनजी, हम आप को आप की बेटी से मिलने तो देंगे, पर हम ये कैसे मान लें कि आप ही सिया के असली मांबाप हैं?”“जी, मैं किसी भी तरह के टैस्ट के लिए तैयार हूं,” वीरेन का स्वर अचानक से चहक उठा था.

“तो फिर ठीक है, आप लोग अपना डीएनए टेस्ट करवा लाइए और आज मैं आप लोगों को सिया से मिलवा देता हूं.”मिसेज माथुर अपने साथ सिया को ले कर आईं, 15 साल की सिया कितनी भोली लग रही थी, उस के चेहरे पर वीरेन की झलक साफ नजर आ रही थी.नमिता ने दौड़ कर सिया को अपनी बांहों में भर लिया और उसे चूमने लगी. वीरेन तो सिर्फ सिया को निहारे जा रहा था. उन का इस तरह से अपनी बेटी से मिलना देख कर माथुर दंपती की आंखें भी भर आई थीं.

कुछ दिनों बाद डीएनए टेस्ट की रिपोर्ट से यह साफ हो गया था कि सिया ही नमिता और वीरेन की बेटी है.

“देखो गलती हर एक से होती है, पर अपनी गलती का अहसास हो जाए तो वह गलती नहीं कहलाती… सिया तुम्हारी ही बेटी है, ये तो टैस्ट से साबित हो गया है, पर अब कानूनन हम ही उस के उस के मांबाप हैं और हम अपनी बेटी को अब किसी को गोद नहीं देंगे… तुम लोगों को भी नहीं…

“पर, मैं तुम दोनों से सब से पहले तो ये गुजारिश करूंगा कि तुम दोनों शादी कर लो और आगे का जीवन प्यार से बिताओ.‘‘

मिस्टर माथुर की ये बात सुन कर नमिता के गालों पर अचानक शर्म की लाली घूम गई थी. साथ ही साथ ये भी कहूंगा कि तुम दोनों अपनी सारी संपत्ति सिया के नाम करो, तभी मुझे ये लगेगा कि तुम लोगों का अपनी बेटी के प्रति यह प्रेम कहीं  क्षणभंगुर तो नहीं…, कहीं यह कोई दिखावा तो नहीं है, जैसे वक्तीतौर का प्यार होता है…” मिस्टर माथुर ने मुसकराते हुए कहा.

मिस्टर माथुर की किसी भी बात से वीरेन और नमिता को कोई गुरेज नहीं था. वीरेन ने नमिता की तरफ प्रश्नवाचक नजरों से देखा, नमिता खामोश थी, पर उस की मुसकराती हुई खामोशी ने वीरेन को जवाब दे दिया था.

“माथुर साहब, आप ने हमें हमारी बेटी से मिलने की अनुमति दे कर हम पर बहुत बड़ा अहसान किया है, भले ही हम सिया को दुनिया में लाने का माध्यम बने हैं, पर उस को मांबाप का प्यार तो आप लोगों ने ही दिया है… सिया आप की बेटी बन कर ही रहेगी… इसी में हम लोगों की खुशी है,” वीरेन ने कहा.

“और हम लोगों की खुशी तुम दोनों को दूल्हादुलहन के रूप में देखने की है… अब जल्दी करो शादी तुम लोग…” मिसेज माथुर ने मुसकराते हुए कहा. कमरे में सभी के चेहरे पर मुसकराहट दौड़ गई थी.

नमिता और वीरेन दोनों ने एक मंदिर में एकदूसरे को जयमाल पहना कर शादी कर ली. दोनों बहुत सुंदर लग रहे थे. सिया अपने वीडियो कैमरे से वीरेन और नमिता को शूट कर रही थी, जो उस के जैविक मातापिता थे.

वीरेन और नमिता ने आगे बढ़ कर माथुर दंपती के पैर छू कर आशीर्वाद लिया.“माथुर साहब, आप ने मेरी इतनी बातें मानीं, इस के लिए आप का शुक्रिया, पर, मैं अब एक निवेदन और करना चाहता हूं कि आप दोनों और सिया हमारे साथ शिमला चलें, जहां हम सब मानसिक रूप से रिलेक्स कर सकें,” वीरेन ने कहा.

“अरे भाई, शिमला तो लोग हनीमून मनाने जाते हैं… हम लोग तो बूढ़े हो चुके हैं.” हंसते हुए मिस्टर माथुर ने कहा.

‘‘माथुर साहब, उम्र तो सिर्फ एक नंबर है… और फिर हम भी हनीमून ही तो मनाने जा रहें हैं, जिस में आप लोग हमारे साथ होंगे और हमारी बेटी सिया भी हमारे साथ होगी… होगा न यह एक एक अनोखा हनीमून.”माथुर दंपती ने मुसकरा कर हामी भर ली.

कुछ दिनों बाद माथुर दंपती, सिया और नमिता और वीरेन शिमला में अपना अनोखा हनीमून मना रहे थे और सिया अपने वीडियो कैमरे में नजारे कैद कर रही थी.

 

घोंसले के पंछी- भाग 3: क्या मिल पाए आदित्य और ऋचा

अंकिता ने जब शिवम को बताया कि उस की मम्मी को उस के प्रेम के बारे में सब पता चल गया है तो वह घबरा गया.

‘‘इस में घबराने की क्या बात है? मम्मी ने तुम्हारे डैडी का फोन नंबर व पता मांगा है. वह तुम्हारे घर वालों से हमारी शादी की बात करना चाहती हैं.’’

‘‘अरे मर गए, क्या तुम्हारे पापा को भी पता है?’’ उस के माथे पर पसीने की बूंदें छलक आईं.

‘‘जरूर पता होगा. मम्मी ने बताया होगा उन को. परंतु तुम इतना परेशान क्यों हो रहे हो? हम एकदूसरे से प्रेम करते हैं, शादी करने में क्या हरज है? कभी न कभी करते ही, कल के बजाय आज सही,’’ अंकिता बहुत धैर्य से यह सब कह रही थी.

‘‘अरे, तुम नहीं समझतीं. यह कोई शादी की उम्र है. मेरे डैडी जूतों से मेरी खोपड़ी गंजी कर देंगे. शादी तो दूर की बात है,’’ वह हाथ मलते हुए बोला.

‘‘अच्छा,’’ अंकिता की अक्ल ठिकाने आ रही थी. वह समझने का प्रयास कर रही थी. बोली, ‘‘तुम मुझ से प्रेम कर सकते हो तो शादी क्यों नहीं. प्रेम मांबाप से पूछ कर तो किया नहीं था. अगर वे हमारी शादी के लिए तैयार नहीं होते, तो शादी भी उन से बिना पूछे कर लो. आखिर हम बालिग हैं.’’

‘‘क्या बकवास कर रही हो, शादी कैसे कर सकते हैं?’’ वह झल्ला कर बोला, ‘‘अभी तो हम पढ़ रहे हैं. मांबाप से पूछे बगैर हम इतना बड़ा कदम कैसे उठा सकते हैं?’’

‘‘अच्छा, मांबाप से पूछे बगैर तुम जवान कुंआरी लड़की को बरगला सकते हो. उस को झूठे प्रेमजाल में फंसा सकते हो. शादी का झांसा दे कर उस की इज्जत लूट सकते हो. यह सब करने के लिए तुम बालिग हो परंतु शादी करने के लिए नहीं,’’ वह रोंआसी हो गई.

उसे मम्मी की बातें याद आ गईं. सच कहा था उन्होंने कि इस उम्र में लड़कियां अकसर बहक जाती हैं. लड़के उन को बरगला कर, झूठे सपनों की दुनिया में ले जा कर उन की इज्जत से खिलवाड़ करते हैं. शिवम भी तो उस के साथ यही कर रहा था. समय रहते उस की मम्मी ने उसे सचेत कर दिया था. वह बच गई. अगर थोड़ी देर होती तो एक न एक दिन शिवम उस की इज्जत जरूर लूट लेता. कहां तक अपने को बचाती. वह तो उस के लिए पागल थी.

शिवम इधरउधर ताक रहा था. अंकिता ने एक प्रयास और किया, ‘‘तुम अपने घर का पता और फोन नंबर दो. तुम्हारे मम्मीडैडी से पूछ तो लें कि वे इस रिश्ते के लिए राजी हैं या नहीं.’’

‘‘क्या शादीशादी की रट लगा रखी है,’’ वह दांत पीस कर बोला, ‘‘हम कालेज में पढ़ने के लिए आए हैं, शादी करने के लिए नहीं.’’

‘‘नहीं, प्यार करने के लिए…’’ अंकिता ने उस की नकल की. वह भी दांत पीस कर बोली, ‘‘तो चलो, नाचेगाएं और खुशियां मनाएं,’’ अब उस की आवाज में तल्खी आ गई थी, ‘‘कमीने कहीं के, तुम्हारे जैसे लड़कों की वजह से ही न जाने कितनी लड़कियां अपनी इज्जत बरबाद करती हैं. मैं ही

बेवकूफ थी, जो तुम्हारे फंदे में फंस गई. थू है तुम पर.. भाड़ में जाओ. सब कुछ खत्म हो गया. अब कभी मेरे सामने मत पड़ना. गैरत हो तो अपना काला मुंह ले कर मेरे सामने से चले जाओ.’’

उस दिन शाम को अंकिता जल्दी घर पहुंच गई. बहुत दिनों बाद ऐसा हुआ था. ऋचा और आदित्य ने भेदभरी नजरों से एकदूसरे की तरफ देखा. अंकिता चुपचाप अपने कमरे में चली गई थी. आदित्य ने ऋचा को इशारा किया. वह पीछेपीछे अंकिता के कमरे में पहुंची. आदित्य भी बाहर आ कर खड़े हो गए थे.

‘‘आज बहुत जल्दी आ गईं बेटी,’’ ऋचा अंकिता से पूछ रही थी.

‘‘हां मम्मी, आज मैं अपने मन का बोझ उतार कर आई हूं. बहुत हलका महसूस कर रही हूं,’’ फिर उस ने एकएक बात मम्मी को बता दी.

मम्मी ने उसे गले से लगा लिया. उसे पुचकारते हुए बोलीं, ‘‘बेटी, मुझे तुम पर गर्व है. तुम्हारी जैसी बेटी हर मांबाप को मिले.’’

‘‘मम्मी यह सब आप की समझदारी की वजह से हुआ है. समय रहते आप ने

मुझे संभाल लिया. मैं आप की बात समझ गई और पतन के गर्त में जाने से बच गई. आप थोड़ा सी देर और करतीं तो मेरी बरबादी हो चुकी होती. मैं आप से वादा करती हूं कि मन लगा कर पढ़ाई करूंगी. आप की नसीहत और मार्गदर्शन से एक अच्छी बेटी बन कर दिखाऊंगी.’’

‘‘हां बेटी, तुम्हारे सिवा हमारा और कौन है? तुम चली जातीं तो हमारे जीवन में क्या बचता?’’

‘‘मम्मी, ऐसा क्यों कह रही हैं? मैं आप के साथ हूं और भैयाभाभी भी तो हैं.’’

ऋचा ने अफसोस से कहा, ‘‘वे अब हमारे कहां रहे? हम ने एकदूसरे को नहीं समझा और वे हम से दूर हो गए.’’

‘‘ऐसा नहीं है मम्मी, वे पहले भी हमारे थे और आज भी हमारे हैं.’’

‘‘ये क्या कह रही हो तुम?’’

‘‘मम्मी, मैं आप को राज की बात बताती हूं. भैया और भाभी से मैं रोज बात करती हूं. भाभी खुद फोन करती हैं. मैं ने उन्हें देखा नहीं है परंतु वे बातें बहुत प्यारी करती हैं. वे हम सब को देखना चाहती हैं. भैया तो एक दिन भी बिना मुझ से बात किए नहीं रह सकते. वे और भाभी यहां आना चाहते हैं लेकिन डैडी से डरते हैं, इसीलिए नहीं आते. मम्मी, आप एक बार…सिर्फ एक बार उन से कह दो कि आप ने उन्हें माफ किया, वे दौड़ते हुए आएंगे.’’

‘‘सच…’’ ऋचा ने उसे अपने सीने से लगा लिया, ‘‘बेटी, आज तू ने मुझे दोगुनी खुशी दी है,’’ वह खुशी से विह्वल हुई जा रही थी.

‘‘हां, मम्मी, आप उन्हें फोन तो करो,’’ अंकिता चहक रही थी, ‘‘मैं भाभी से मिलना चाहती हूं.’’

‘‘अभी करती हूं. पहले उन को बता दूं. सुन कर वे भी खुशी से पागल हो जाएंगे. हम लोगों ने न जाने कितनी बार उन को बुलाने के बारे में सोचा. बस हठधर्मिता में पड़े रहे. बेटे के सामने झुकना नहीं चाहते थे परंतु आज हम बेटे के लिए और उस की खुशी के लिए छोटे बन जाएंगे. उसे फोन करेंगे.’’

वह बाहर जाने के लिए मुड़ी. कमरे के बाहर खड़े आदित्य अपनी आंखों से आंसू पोंछ रहे थे. आज उन्हें खोई हुई खुशी मिल रही थी. बेटी भी वापस अंधेरी गलियों में भटकने से बच गई थी. वह सहीसलामत घर लौट आई थी. बेटा भी मिल गया था. आज उन की हठधर्मिता टूट गई थी. उन्हें अपनी गलती का एहसास हो चुका था.

ऋचा ने आदित्य को बाहर खड़े देखा. वे समझ गईं कि अब कुछ कहने की जरूरत नहीं थी. वे सब सुन चुके थे. उन के पास जा कर भरे गले से बोली, ‘‘चलिए, बेटे को फोन कर दें और बहू के स्वागत की तैयारी

करें. आज हमें दोगुनी खुशी मिल रही है.

ऐसा लग रहा है, जैसे घोंसले के पंछी वापस आ गए हैं. अब हमारा आशियाना वीरान

नहीं रहेगा.’’

‘‘हां, ऋचा,’’ आदित्य ने उसे बांहों के घेरे में लेते हुए कहा, ‘‘घोंसले के पंछी घोंसले में ही रहते हैं, डाल पर नहीं. प्रतीक को वापस आना ही था. हमारी बगिया के फूल यों ही हंसतेमुसकराते रहें. उन की सुगंध चारों ओर फैले और वे अपनी महक से सब के जीवन को गुलजार कर दे.

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मुंहासे और झाइयों से मेरी स्किन खराब हो गई है, मैं क्या करुं?

सवाल-

मेरी उम्र 35 वर्ष है. काफी पहले मेरे चेहरे पर मुंहासे हुए थे जिन के दाग अभी तक हलके नहीं हुए हैं. चेहरे पर झांइयां भी हैं. मेरा रंग बहुत गोरा है. ऐसे में दाग ज्यादा दिखाई देते हैं. ऐसा कोई उपाय बताएं जिस से मेरा चेहरा एकसार दिखाई दे?

जवाब-

मुंहासों के दाग व झांइयों को हटाने के लिए आप एक पैन में 1 कप पानी डाल कर मध्यम आंच पर रखें. इस में ओट मील व नीबू का रस डाल कर धीरेधीरे पकाएं. जब पेस्ट थोड़ा गाढ़ा होने लगे तो इसे आंच से उतार लें. दालचीनी मिला लें. इस पेस्ट को चेहरे पर लगाएं. 20 मिनट बाद कुनकुने

पानी से धो लें. इस के बाद मौइस्चराइजर लगाएं. ऐसा हफ्ते में 1 बार करें तो आप के दाने धीरेधीरे ठीक होने लग जाएंगे. मगर झांइयों के लिए किसी कौस्मैटोलौजिस्ट या डाक्टर से जरूर मिलें. वह आप की मैडिकल हिस्ट्री ले कर यह बता पाएंगे कि आप के हारमोन में इंबैलेंस तो नहीं. अगर है तो उस के लिए दवा खाना जरूरी है. तभी आप इन से पूरी तरह छुटकारा पाएंगी. घर से बाहर निकलते वक्त सनस्क्रीन जरूर लगा लें.

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उम्र बढने के साथ ही शरीर में कई तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं. इसमें बाहरी से लेकर अंदरूनी समस्याएं भी होती हैं. सबसे ज्यादा आसानी से लोग आपकी स्किन या स्किन को देखकर अंदाजा लगाते है. ऐसे में जरूरी है कि आप अपनी स्किन का ध्यान रखें और खुद को काॅन्फिडेंट महसूस करें.

एक्सपर्ट सौमाली अधिकारी ब्यूटी एंड लाइफ़स्टाइल एक्सपर्ट की मानें तो 30 के बाद स्किन पर समस्याएं दिखने लगती हैं. इनमें

सुस्त स्किन (स्किन डलनेस)

फाइन लाइंस

अर्ली एजिंग (जल्दी बुढापा)

झाइयां

झुर्रियां

मॉइश्चराइजर लगाएं

यदि आप भी इन समस्याओं से परेशान हैं तो सबसे पहले स्किन को पहचानें कि ये ऑयली है या ड्राई. घर से बाहर या धूप में निकलने से पहले स्किन के हिसाब से फेसवॉश चुनें. इसके बाद मॉइश्चराइजर लगाएं. मॉइश्चराइजर के बाद चाहें तो आप अपनी पसंद की कोई भी क्रीम लगा सकती हैं. मॉइश्चराइजर लगाने से स्किन को नमी मिलती है. इससे झु्र्रियां कम दिखाई देती है. विटामिन सी और बायो-ऑयल्स से भरे मॉइश्चराजर का इस्तेमाल करने से स्किन सॉफ्ट बनी रहेगी.

आंखों की देखभाल सबसे ज्यादा जरूरी

उम्र बढने के साथ ही सबसे पहले आंखों के आसपास वाली स्किन पर असर दिखने लगता है. बहुत बारीक रेखाएं इसके आसपास दिखने लगती है, जो उम्र बढने का संकेत देती हैं. इसीलिए आंखों की क्रीम का इस्तेमाल करें, इससे आंखों के आसपास मौजूद स्किन हमेशा नम रहेगी और इससे आंखों की थकान भी दूर होगी. साथ ही ध्यान रखें कि आंखों को बार-बार न रगड़ें और न ही बार-बार पानी का छींटा मारें. इससे आंखों को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है.

पूरी खबर पढ़ने के लिए- 30 की उम्र में Skin की देखभाल – हमेशा रहेेंगी जवान

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

Mother’s Day Special: लंच में चावल के साथ परोसें पीनट करी

मदर्स डे के मौके पर अगर आप अपनी मां या बच्चों के लिए हेल्दी रेसिपी ट्राय करना चाहते हैं तो पीनट करी की रेसिपी बनाएं.

सामग्री

250 ग्राम आलू उबले व बारीक कटे,

100 ग्राम मूंगफली भुनी हुई,

1 बड़ा चम्मच देगीमिर्च,

1 छोटा चम्मच हलदी पाउडर,

लालमिर्च स्वादानुसार,

1 छोटा चम्मच धनिया पाउडर,

1/2 छोटा चम्मच राई,

1/4 छोटा चम्मच अजवाइन,

2 छोटे चम्मच तिल,

1/4 छोटा चम्मच कलौंजी,

1/2 छोटा चम्मच गरममसाला,

2 टमाटर लंबाई में कटे हुए,

2 प्याज लंबाई में कटे हुए,

1 छोटा चम्मच अमचूर,

2 बड़े चम्मच तेल,

नमक स्वादानुसार.

विधि

कड़ाही में तेल गरम कर राई, अजवायन, मूंगफली व कलौंजी डालें. तड़कने तक भूनें फिर प्याज को 1 मिनट भूनें. अब तिल व टमाटर भूनें. जैसे ही टमाटर व प्याज मुलायम हो जाएं आंच बंद कर दें. मिश्रण के ठंडा होने पर उसे मिक्सर में पीस लें. अब फिर कड़ाही में 1 चम्मच तेल गरम कर के पेस्ट को भूनें और फिर हलदी, नमक, मिर्च, अमचूर, देगीमिर्च व गरममसाला डाल कर 1 मिनट चलाएं. फिर धनिया पाउडर डालें. अब आलू डाल कर धीमी आंच पर कुछ देर पका लें. थोड़ा पानी मिला कर फिर से थोड़ी देर पकाएं. इच्छानुसार गाढ़ा या पतला रख कर धनियापत्ती से सजा कर गरमगरम परोसें.

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YRKKH: अक्षरा-अभिमन्यू की शादी के बाद वायरल हुआ Shivangi Joshi का साड़ी लुक

स्टार प्लस के हिट सीरियल्स में से एक ये रिश्ता क्या कहलाता है (Yeh Rishta Kya Kehlata Hai) आए दिन सुर्खियों में रहता है. जहां शो का लेटेस्ट ट्रैक फैंस को पसंद आ रहा है तो वहीं नायरा यानी शिवांगी जोशी (Shivangi Joshi) के नये सोशलमीडिया अपडेट ने फैंस का चैन चुरा लिया है. दरअसल, एक्ट्रेस के नए पोस्ट को देखकर फैंस कयास लगा रहे हैं कि वह अक्षरा और अभिमन्यू की शादी का हिस्सा बनने वाली हैं. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…

साड़ी में एक्ट्रेस को देख फैंस हुए दिवाने

हाल ही में एक्ट्रेस शिवांगी जोशी ने खूबसूरत साड़ी में अपनी एक फोटो शेयर की है, जिसके कैप्शन में उन्होंने फैंस को जल्दी ही एक सरप्राइज देने की बात कही है. वहीं सोशलमीडिया पर ये फोटो शेयर करते ही फैंस कयास लगाने लग गए हैं कि एक्ट्रेस जल्द ही ये रिश्ता क्या कहलाता है में अभिमन्यू और अक्षरा की शादी में शामिल होंगी. दरअसल, फोटो में एक्ट्रेस का लुक बड़ी उम्र की महिला जैसा है, जिसके चलते फैंस का कहना है कि वह शो में नजर आने वाली हैं. हालांकि अभी तक किसी भी तरह की औफिशियल अनाउंसमेंट या सीरियल के सेट से फोटो नहीं आई हैं.

वीडियो भी की शेयर

साड़ी के अलावा एक्ट्रेस शिवांगी जोशी ने अपनी एक वीडियो भी फैंस के साथ शेयर की है, जिसमें वह ग्रीन कलर के शरारा में नजर आ रही हैं. वहीं अपनी वीडियो में वह लोकेशन की झलक भी दिखाती नजर आ रही हैं. एक्ट्रेस की इस वीडियो पर फैंस फिदा हो रहे हैं और उन्हें ये रिश्ता क्या कहलाता है या फिर किसी और सीरियल में एक्टर मोहसिन खान के साथ काम करने की गुजारिश कर रहे हैं.

बेहद बदल चुकी हैं शिवांगी

ये रिश्ता क्या कहलाता है को छोड़ने के बाद से एक्ट्रेस शिवांगी जोशी का लुक काफी बदल चुका है. वह जहां नए-नए लुक फैंस के साथ शेयर करती हैं तो वहीं इंडियन से ज्यादा वेस्टर्न अवतार में फैंस का दिल जीतती हैं.

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Mother’s Day Special: Healthy प्रैग्नेंसी के लिए 5 नियमित जांच

गर्भधारण करना किसी भी महिला के लिए सब से बड़ी खुशी की बात और शानदार अनुभव होता है. जब आप गर्भवती होती हैं, तो उस दौरान किए जाने वाले प्रीनेटल टैस्ट आप को आप के व गर्भ में पल रहे शिशु के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी देते हैं. इस से ऐसी किसी भी समस्या का पता लगाने में मदद मिलती है, जिस से शिशु के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ सकता है जैसे संक्रमण, जन्मजात विकार या कोई जैनेटिक बीमारी. ये नतीजे आप को शिशु के जन्म के पहले ही स्वास्थ्य संबंधी फैसले लेने में मदद करते हैं.

यों तो प्रीनेटल टैस्ट बेहद मददगार साबित होते हैं, लेकिन यह जानना भी महत्त्वपूर्ण है कि उन के परिणामों की व्याख्या कैसे करनी है. पौजिटिव टैस्ट का हमेशा यह मतलब नहीं होता है कि आप के शिशु को कोई जन्मजात विकार होगा. आप टैस्ट के नतीजों के बारे में अपने डाक्टर से बात करें और उन्हें समझें. आप को यह भी पता होना चाहिए कि नतीजे मिलने के बाद आप को सब से पहले क्या करना है.

डाक्टर सभी गर्भवती महिलाओं को प्रीनेटल टैस्ट कराने की सलाह देते हैं. कुछ महिलाओं के मामले में ही जैनेटिक समस्याओं की जांच के लिए अन्य स्क्रीनिंग टैस्ट कराने की जरूरत पड़ती है.

5 नियमित टैस्ट

गर्भावस्था के दौरान कुछ नियमित टैस्ट यह सुनिश्चित करने के लिए होते हैं कि आप स्वस्थ हैं. आप का डाक्टर आप के खून और पेशाब की जांच कर कुछ परिस्थितियों का पता लगाएगा. इन में निम्नलिखित टैस्ट शामिल हैं

1. हीमोग्लोबिन (एचबी)

2. ब्लड शुगर एफ और पीपी

3. ब्लड ग्रुप टैस्ट

4. वायरल मार्कर टैस्ट

5. ब्लड प्रैशर

अगर आप गर्भधारण करने के बारे में सोच रही हैं, तो डाक्टर आप को फौलिक ऐसिड (सप्लिमैंट्स) टैबलेट्स लेने की सलाह दे सकता है. ये टैबलेट लेने की सलाह आप को तब भी दी जा सकती है, जब आप स्वस्थ हों और अच्छा आहार भी ले रही हों. विटामिन बी सप्लिमैंट्स और कैल्सियम लेने की सलाह सभी गर्भवती, स्तनपान करा रही महिलाओं और स्तनपान कर रहे शिशुओं को दी जाती है. इन्हें शुरू करने से पहले डाक्टर से सलाह जरूर ले लें.

अन्य टैस्ट

स्कैनिंग टैस्ट

अल्ट्रासाउंड आप के शिशु और आप के अंगों की पिक्चर लेने के लिए ध्वनि तरंगों का इस्तेमाल करता है. अगर आप की गर्भावस्था सामान्य है, तो आप को 2-3 बार यह कराना होगा. पहली बार शुरुआत में यह देखने के लिए कि क्या स्थिति है, दूसरी बार शिशु का विकास देखने के लिए करीब 18-20 सप्ताह का गर्भ होने पर, जिस से यह सुनिश्चित हो सके कि शिशु के शरीर के सभी अंग अच्छी तरह विकसित हो सकें.

जैनेटिक टैस्ट

प्रीनेटल जैनेटिक टैस्ट विशेष तौर पर उन महिलाओं के लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं, जिन के शिशु को जन्मजात विकार या जैनेटिक समस्या होने का जोखिम ज्यादा होता है. ऐसा निम्न परिस्थितियों के दौरान होता है.

– आप की उम्र 35 वर्ष से अधिक है.

– आप को कोई जैनेटिक बीमारी है या आप के व आप के साथी के परिवार में किसी जैनेटिक बीमारी का इतिहास हो.

– आप का पहले गर्भपात हुआ हो या मृत शिशु पैदा हुआ हो.

डा. मोनिका गुप्ता, एमडी, डीजीओ गाइनोकोलौजिस्ट के अनुसार, स्वस्थ गर्भावस्था के लिए इन जांचों के बारे में जानकारी होनी जरूरी है. प्रीनेटल टैस्ट में ब्लड टैस्ट शामिल है, जिस से आप के ब्लड टाइप, आप को ऐनीमिया है या नहीं इस के लिए आप के हीमोग्लोबिन का स्तर, डायबिटीज की जांच के लिए ब्लड ग्लूकोज का स्तर, आप का आरएच फैक्टर (अगर आप का ब्लड आरएच नैगेटिव है और शिशु के पिता का ब्लड आरएच पौजिटिव है, तो शिशु में भी पिता का आरएच पौजिटिव ब्लड हो सकता है, जिस से आप के शरीर में ऐंटीबौडीज बननी शुरू हो सकती हैं और उस से आप के गर्भ में पल रहे बच्चे को नुकसान पहुंच सकता है) जांचा जाएगा. एचआईवी, हैपेटाइटिस सी और बी जैसी बीमारियों के लिए आप का वायरल मार्कर टैस्ट भी होगा, क्योंकि गर्भावस्था के दौरान ये बीमारियां हो सकती हैं.

अगर आप को पहले से जानकारी हो कि आप को व आप के साथी को एक खास बीमारी है, तो आप पहले से ही भावनात्मक तौर पर तैयार हो सकती हैं. पहले से जानकारी होने पर आप

को परिस्थितियों पर बेहतर नियंत्रण रखने में आसानी होगी.

-डा. सुनीता यादव

प्रमुख क्वालिटी कंट्रोल, डालमिया मैडिकेयर

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