अंधेरे के हमसफर: भाग 3- क्या था पिंकी के बदले व्यवहार की वजह

लेखक- निर्मल कुमार

‘‘अच्छा मां, माफ कर दो,’’ कहते हुए पिंकी की आंखें भर आईं और वह अपने कमरे में चली गई. पिंकी के आंसू देख सोमांश के मन में परिवर्तन आ गया. अब पिंकी का पलड़ा भारी हो गया. अब पूरी घटना उन्हें एक मामूली सी बात लगने लगी जिसे कजली अकारण तूल दे बैठी थी. अब उन का गुस्सा धीरेधीरे कजली की तरफ मुड़ रहा था कि कजली कुछ नहीं समझती. ग्रेजुएट होते हुए भी अपने जमाने से आगे नहीं बढ़ना चाहती. समझती है कि जो भी अच्छाई है, सारी उस की पीढ़ी की लड़कियों में थी. जरा भी लचीलापन नहीं. समझने को तैयार नहीं कि अब पिंकी नए जमाने की युवती है, जो उस की परछाईं नहीं हो सकती. रात को बिस्तर पर काफी देर तक उन्हें नींद नहीं आई. वे यही बातें सोचते रहे. उधर कजली उन का इंतजार करती रही. कोई एक स्पर्श या कोई प्रेम की एक बात. यह इंतजार करतेकरते उस की कितनी रातें वीराने में लुटी थीं. मगर यह हसरत जैसे पूरी न होने के लिए ही उस की जिंदगी में अब दफन होती जा रही थी. शायद औरतों का मिजाज इसीलिए कड़वा हो जाता है कि वह कभी भी अपने भीतर की युवती को भुला नहीं पाती. वह उस का अभिमान है. देह ढल जाती है मगर वह अभिमान नहीं ढलता. यदि उस का पति उसे थोड़ा सा एहसास भर कराता रहे कि उस की नजरों में वह सब से पहले प्रेमिका है, फिर पत्नी और फिर बाद में किसी की मां, तो उस का संतुलन शायद कभी न बिगड़े मगर पति तो उसे मातृत्व का बोझ दे कर प्रेमिका से अलग कर देता है.

कजली सिसकने लगी. सोमांश झुंझला उठे. वे पहले से ही गुस्से में थे. उन की समझ में नहीं आया कि वह चाहती क्या है. पिंकी पर पूरी विजय पा लेने के बाद भी अभी कुछ कसर रह गई, शायद तभी वह रो रही है. पिंकी को यह अपनी नासमझी से कुचल देगी. वह भी एक भयभीत, दबी, कुचली भारतीय नारी बन कर रह जाएगी. वे कजली की ओर मुड़े मगर उन्हें बोलने से पहले अपने गुस्से पर काबू पाना पड़ा क्योंकि वे जानते थे कि यदि गुस्से में बोला तो कजली सारी रात रोरो कर गुजार देगी. न सोएगी न सोने देगी. कठोर शब्द उस से बरदाश्त नहीं होते और असुंदर परिस्थितियां सोमांश से बरदाश्त नहीं होतीं.

‘‘देखो कजली,’’ सोमांश अपनी आवाज को संयत करते हुए बोले, मगर कजली की नारी सुलभ प्रज्ञा फौरन समझ गई कि वे वास्तव में कु्रद्ध हैं, ‘‘हमें समझना होगा कि यह एक नई पीढ़ी है, कुछ पुराने मूल्य हमारे पास हैं, कुछ नए मूल्य इन के पास हैं. अगर मूल्य इसी तरह आपस में टकराते रहे तो वे विध्वंसक हो जाएंगे. हमें नए और पुराने मूल्यों के बीच समझ पैदा करनी होगी.’’

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‘‘कैसे?’’ कजली ने पूछा.

‘‘मान लो, पिंकी कहती है कि यह क्या फूहड़पन है मां. अब पुराने मूल्यों से देखो तो यह एक गाली है और यदि नए मूल्यों से देखो तो स्पष्ट अभिव्यक्ति. स्पष्ट अभिव्यक्ति की खूबी यह होती है कि वह मन में कोई जहर पलने नहीं देती. स्पष्ट अभिव्यक्ति के कारण ही अमेरिका में लोग स्पष्ट सुनने और कहने के आदी हैं. वहां कोई ऐसी बातों का बुरा नहीं मानता. सब जानते हैं कि स्पष्टता की तलाश में अभिव्यक्ति इतनी कड़वी हो ही गई है. इस में दिल की कड़वाहट नहीं है. ‘‘इस के विपरीत मेरा और अपना जमाना लो. बहुत सी कड़वी बातें जबान पर आ कर रह जाती थीं. वे कहां जाती थीं, सब की सब दिल में. जब कड़वी बात जबान से दिल में लौट आती है तो वह दिल में लौट कर गाली बन जाती है.’’

‘‘मैं समझती हूं,’’ कजली बोली, ‘‘मगर क्या करूं, मेरे दिमाग को यह सूझता ही नहीं. जब तुम कहते हो तो दूसरा पहलू दिखता है वरना मुझे लगता है, बच्चे बड़े हो गए हैं, किसी को मेरी जरूरत नहीं अब. बस, कोको है. यह भी बड़ा हो जाएगा. फिर मैं क्या करूंगी? इतनी अकेली होती जाऊंगी मैं…’’

‘‘ऐसा क्यों सोचती हो?’’ सोमांश का हृदय करुणा से भर आया. कजली को उस ने बांहों में भर लिया. तब तक चांद पेड़ों पर चढ़ताचढ़ता खिड़की के सामने आ गया था. चांदनी पेड़ों से छनती कुछ शय्या पर आ रही थी. उस उजाले में कजली का आधा मुंह दमक रहा था और आधे पर स्वप्निल साए थे. उस की विशाल आंखों में न आंसू थे न थकान और न ही निराशा. उन की जगह थी एक स्निग्ध चमक, वासना का वह पवित्र आलोक जो कामकलुषित मन से नहीं, शरीर के अंग गहन स्रोतों से निकलता है. यह वह साफ पाशविकता थी जो प्रकृति को दोनों हाथों से पकड़ कर बरसता नभ उमड़उमड़ कर उस के असंख्य गर्भकोषों में उतार देता है. सोमांश को लगा, यौन की पूर्णता के सर्वथा दैहिक होने में है. मन इस का साक्षी न बने, लजा कर छिप जाए अन्यथा मन इसे देख कर कामकलुषित हो जाता है. विप्लव नहीं, एक संयमित, यौन सुरभ्य क्रिया थी, उम्र ने कामविप्लव को झेल कर सुंदर बनाना सिखा दिया था. जो यौवन में उन्मुक्त मद था, प्रौढ़ावस्था में एक कोमल अनुराग विनिमय बन गया था. तृप्ति दोनों में है मगर यह तृप्ति प्रवृत्त होने वालों पर आश्रित है जो प्रौढ़ता को यौवन का अभाव नहीं, एक परिपक्वता की प्राप्ति समझाते हैं, वे इस की देन से जीवन संवारते हैं. सौंदर्य के तार चांद की किरणों के साथ यौनकर्म भी शय्या पर बुन रहा था. आकाश पर दूर छितरे बादलों को देख अब कजली के मन में उठते विचार बदल गए थे. इतनी पीड़ा थी बादलों के मन में, उस ने सोचा गरजगरज कर जी खोल कर आंसू बहाए थे उन्होंने, मगर अब वे दूरदूर थके बच्चों की तरह सो रहे थे. सफेद बादलों से दुख के श्यामल स्पर्श दूर नहीं हुए थे किंतु उन के पाश से अब बादल बेखबर थे. चांदनी में चमकती उन की रुई जैसी सफेदी को श्यामलता का अब जैसे कोई एहसास ही नहीं था.

दुखों से निकलने की राह क्या यही ह? दुखों से लड़ी तो दुख अनंत लगे और दुखों पर साहसपूर्वक आत्मबलि दी तो वे निष्प्रभ हो गए. उधर सोमांश मूल्यों के इस संघर्ष में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने में असमर्थ थे. न तो पत्नी को दबा सकते थे न बेटी को. एक के साथ शताब्दियां थीं, संस्कृति थी तो दूसरी के साथ वह ताजगी, वह चिरनूतन जीवन था जिस से मूल्य और संस्कृति जन्म लेते हैं. दोनों में संघर्ष अनिवार्य है क्योंकि यह दौर अनिश्चितता के नाम है. जब काल के ही तेवर ऐसे हैं तो मैं संभावनाओं के कालरचित खेल को एक निश्चित हल दे कर रोकने वाला कौन हूं. ये छोटेछोटे पारिवारिक संघर्ष ही नए मूल्यों को जन्म देंगे शायद. अपने छोटे से परिवार का हर सदस्य उन की आंखों के आगे अपनी सारी शरारत के साथ आया. हम सब अंधेरे के हमसफर हैं. रोशनी कहां है? कभीकभी इतिहास में ऐसा दौर भी आता है जब पूरी श्रद्धा से अपनेअपने अंधेरे के सहारे चलना पड़ता है.

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अगली सुबह चारों एकसाथ मानो किसी अज्ञात प्रेरणा के अधीन नाश्ता करने बैठे, ‘‘पिताजी, आज आप ने ब्रिल क्रीम लगाई है या तेल?’’ कोको ने पूछा.

‘‘ब्रिल क्रीम.’’

‘‘बहुत सारी लगाई होगी,’’ कोको बोला, ‘‘तभी तो चेहरा इतना चमक रहा है.’’

पिंकी हंसने लगी. कजली भी हंसने लगी और बोली, ‘‘या तो लगाते नहीं और जब लगाते हो तो थोक के भाव.’’ सोमांश की ऐसी बचकानी हरकतों पर अकसर घर में हंसी बिखर जाती थी. पुराने मूल्यों और नए मूल्यों के बीच अमूल्य कोको भी था जिस के मूल्य अभी प्रकृति ने समन्वित कर रखे थे, जो सनातन थे कालजन्य नहीं. उस के बचपन का भोलापन अकसर दोनों मूल्यों के बीच ऐसे संगम अकसर रच दिया करता था. कुछ देर में ही कोको और पिंकी की लड़ाई होने लगी, ‘‘देखो मां,’’ पिंकी बोली, ‘‘अब की बार जो रस्कीज (शकरपारे) लाई हो, सब कोको ने छिपा लिए हैं. हमें भी दिलवाओ.’’

‘‘मांमां…’’ कोको बोला, ‘‘पहले दीदी से मेरे 30 रुपए दिलवाओ.’’

‘‘वाह, इसे मैं कहीं ले जाऊं तो ठंडा पिलवाऊं और आइसक्रीम खिलवाऊं…’’

‘‘जो खिलाते हैं, उस के दाम क्या छोटे भाई से वसूल किए जाते हैं?’’ कजली बोली.

‘‘मां, मेरे रुपए दिलवाओ,’’ कोको फिर बोला.

‘‘मैं नहीं दूंगी,’’ कहती हुई पिंकी कमरे में भागी और उस के पीछेपीछे कोको.

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अंधेरे के हमसफर: भाग 2- क्या था पिंकी के बदले व्यवहार की वजह

लेखक- निर्मल कुमार

अब भी उस का मन करता कि उस के पति दफ्तर से लौटते ही उसे उसी तरह बांहों में लें जैसे शुरू में लेते थे. उस का शरीर चाहता अठखेलियां हों, कुछ रातों को जागा जाए, कुछ फुजूल की बातें हों और सुबह की रोशनी में धुंधला चांद हो जब वे दोनों सोएं. मगर ये इच्छाएं अब एकतरफा थीं. उसे ग्लानि होने लगी थी अपनी दैहिकता पर. वह अगर खुल कर अपने व्यक्तित्व को जीए तो दुनिया हंसेगी और अगर व्यक्तित्व को न जीए तो शरीर का पोरपोर घुटता है और वह स्थूल होता जाता है. अजब मूल्य है आधुनिक समाज का भी, जो युवावर्ग को तो पूरी आजादी देता है मगर वही युवा वर्ग अपने मातापिता की जरा सी शारीरिक अल्हड़ता बरदाश्त नहीं करता. वह चाहता है कि मातापिता आदर्श मातापिता बने रहें, यह भूल जाएं कि वे स्त्रीपुरुष हैं. 3 बजे पिंकी कालेज से लौटी. वह खाना खा रही थी कि तभी फोन आया. कजली ने फोन उठाया. पिंकी का मित्र संजय था. कजली उस से बातें करने लगी, ‘‘कैसे हो बेटे? मां कैसी हैं? पढ़ाई कैसी चल रही है? तुम कोको की पार्टी में नहीं आए, मुझे बहुत दुख हुआ.’’

‘‘उफ, मां,’’ खीज कर पिंकी उठी और मां से फोन छीन लिया. रिसीवर हाथ से ढकते हुए बरसी, ‘‘यह क्या मां, क्या जरूरत है आप को इतनी बातें करने की?’’

तब तक फोन कट गया. ‘‘यह लो, फोन भी कट गया. सारा वक्त तो फोन पर आप ले लेती हैं. फोन पर चाहे मेरा ही मित्र हो, उसे भी आप अपना ही मित्र समझती हैं. ऐसे ही जब अनीता आती है तो ऐसे प्यार करने लगती हो जैसे वह आप की दोस्त है.’’ ‘‘तो इस में क्या हुआ? मुझे अच्छी लगती है, सीधी और नाजुक सी लड़की है.’’

‘‘बस भी कर मां, मुझे बहुत बुरा महसूस हुआ कि तुम संजय को कह रही थीं, तुम कोको की पार्टी में नहीं आए. अब कोको खुद यह बात कहे तो और बात है. आप कौन होती हैं यह बात कहने वाली?’’

‘आप कौन होती हैं’ यह वाक्य तीर की तरह चुभा कजली को, ‘‘मैं कौन होती हूं?’’ वह बोली, ‘‘मैं कोको की मां हूं.’’

‘‘मेरा यह मतलब नहीं था, मां.’’

‘‘तुम क्या अपनी जबान को थोड़ा भी नियंत्रण नहीं कर सकतीं? बाहर वालों के सामने तो ऐसी बन जाती हो जैसे मुंह से फूल झड़ रहे हों और घर वालों से कितनी बदतमीजी से बोलती हो?’’

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‘‘आप को कुछ समझाना बेकार है, मां,’’ कह कर पिंकी अपने कमरे में चली गई. बाद में कजली भी अपने कमरे में चली गई. अब दोनों को शाम तक, गृहस्वामी के लौटने तक, अपनाअपना अवसाद जीना था, अपनीअपनी खिन्नता को अकेले झेलना था. दोनों दुखी थीं मगर अपने दुखों को बांट नहीं सकती थीं. कोई दीवार थी जो दुखों ने ही चुन दी थी या फिर अभिमान था, एक मां का सहज अभिमान और एक युवा लड़की के तन में बसे उभरते यौवन का अभिमान जो उसे एक अलग पहचान बनाने को मजबूर कर रहा था, जो मां को आहत सिर्फ इसलिए कर रहा था ताकि वह उस के साए से निकल सके और अपना नीला आसमान खुद बना सके. स्कूल से आते ही कोको ने अपना बस्ता फेंका और बिना जूते खोले मां के पास लेट गया. मां से चिपट गया जैसे इतनी देर दूर रहने मात्र से उस के शरीर के कण प्यासे हो गए थे. उस रस के लिए जो सिर्फ मां के शरीर से झरता था. रात को खाने के बाद कजली ने पति से शिकायत की, ‘‘पिंकी बहुत बदतमीज हो गई है. आज इस ने मुझे फूहड़ आदि न जाने क्याक्या कहा.’’

पति सोमांश, जो पेशे से जज हैं, कुछ देर चुप रहे और पत्नी के दुख को कलेजे में उतर जाने दिया और जब उन के भी कलेजे को इस का लावा झुलसाने लगा तो बोले, ‘‘पिंकी, अब तुम बच्ची तो नहीं रहीं. अगर तुम अपनी मां का आदर नहीं कर सकतीं तो किस का करोगी? जो व्यक्ति अपनी भाषा को नहीं निखारता, उस का व्यक्तिव नहीं निखरता. क्या तुम गंवार लड़की बनी रहना चाहती हो? संस्कार कौन बताएगा? कोई और तो आएगा नहीं. वाणी और करनी पर सौंदर्य का संयम रखोगी तो संस्कार बनेंगे वरना वाणी और कर्म दोनों जानवर बना देंगे. तुम मनोवेगों में जीती हो. मनोवेगों में जीना प्राकृतिक जीवन नहीं है. बुद्धि और संयम भी तो प्राकृतिक हैं, केवल मनोवेग ही प्राकृतिक हो ऐसा तो नहीं.’’ पिंकी रोंआसी हो गई, ‘‘पिताजी, मैं किसी की शिकायत नहीं करती और मां रोरो कर रोज मेरी शिकायत करती हैं. रो पड़ती हैं तो लगता है ये सच बोल रही हैं. यदि मैं भी रोऊं तो आप समझोगे कि सच बोल रही हूं वरना आप मुझे झूठी समझोगे.’’

‘‘तो क्या मैं झूठ बोल रही हूं?’’ कजली बोली.

‘‘आप जिस तरह बात को पेश कर रही हैं, मैं ने उस तरह नहीं कहा था. आप के मुंह से सुन कर तो लगता है, जैसे मुझे जरा भी तमीज नहीं है, मैं पागल हूं.’’ ‘‘तुम पिताजी के सामने निर्दोष बनने की कोशिश मत करो. तुम जिस तरह का बरताव करती हो वह किसी भी लड़की को शोभा नहीं देता. हम तो बरदाश्त कर लेंगे मगर तुम्हें पराए घर जाना है. सब यही कहेंगे कि मां ने कुछ नहीं सिखाया होगा.’’

पिता बोले, ‘‘यह तो मैं भी देखता हूं पिंकी कि तुम ‘मम्मी’ को कुछ नहीं समझती हो.’’

‘‘पिताजी, आप भी ‘मम्मी’ कह रहे हैं,’’ पिंकी हंसने लगी.

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‘‘यह हंसी में टालने की बात नहीं है, पिंकी,’’ पिता ने गंभीर आवाज में कहा, ‘‘तुम ने अमेरिकन संस्कृति अपना ली है. वह भारत में नहीं चलेगी. हमारी संस्कृति की जड़ें बहुत मजबूत हैं अमेरिका के मुकाबले. जिस घर में जाओगी वहां की भारतीय जड़ें तुम्हारी अमेरिका की वाहियात बातों को बरदाश्त नहीं करेंगी.’’ पिंकी बोली, ‘‘अमेरिकन संस्कृति कोई संस्कृति नहीं, प्रेग्मेटिज्म है, उपयोगितावाद है यानी जो वक्त का तकाजा है वही करो. इस आदर्श को अपना लेने में हर्ज ही क्या है? जिन भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की दुहाई आप देते हैं उन्होंने हमें दिया ही क्या? सदियों की गुलामी, औरतों की दुर्दशा, दहेज व जातिवाद के अलावा और क्या? इस संस्कृति को भी तो खुल कर नहीं जी पाते हम लोग. जीएं तो विदेशों से हुकूमत करने आए लोग सांप्रदायिकता का आरोप लगाते हैं. कितना अस्तव्यस्त कर डाला है आप की पीढ़ी के मूल्यों ने. इस से तो हम ही अच्छे हैं. जो भीतर हैं वही बाहर हैं. अगर हम बहुत मीठी बातें नहीं करते तो हमारे दिल भी तो काले नहीं हैं. वे मूल्य क्या हुए कि दिल में जहर भरा है और ऊपर से सांप्रदायिक एकता का ढोंग रच रहे हैं?’’

‘‘बात तुम्हारी हो रही है,’’ पिता बोले, ‘‘अपनी बात करो, पूरे समाज की नहीं. सारांश यह है कि तुम्हें अपनी मां से माफी मांगनी चाहिए और आइंदा बदतमीजी न करने का वादा करना चाहिए.’’

‘‘मां को भी तो हमारी बात समझनी चाहिए. हम उन की पीढ़ी तो हो नहीं सकते. हमारी सब बातों को वे अपनी पीढ़ी से क्यों तोलती हैं? हमें परखें नहीं. हम से प्यार करें तो समझें हमें.’’

‘‘तुम सचमुच जबानदराज हो गई हो, पिंकी,’’ सोमांश को गुस्सा आ गया, ‘‘अब तुम मां से प्रेम का सुबूत मांगती हो. अरे, कौन मां है जो अपने बच्चों से प्यार नहीं करती?’’

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अंधेरे के हमसफर: भाग 1- क्या था पिंकी के बदले व्यवहार की वजह

लेखक- निर्मल कुमार

पिंकी के कालेज जाने के बाद बादल घिर आए. आज फिर वह कजली से लड़ी थी. इसी बात को ले कर कजली दुखी थी. कपड़े धोते हुए कई बार उसे रुलाई आई. उस से खाना भी नहीं खाया गया और वह बैडरूम में चली गई. कुछ देर बादलों के घुमड़ते शोर और कजराए नभ ने उस के मन को बहलाए रखा. मगर जैसे ही बूंदें गिरने लगीं उसे फिर पिंकी की बदतमीजी याद आई कि मैं उस की मां हूं और वह मुझे ऐसे झिड़कती है जैसे मैं उस की नौकरानी हूं. पिंकी का व्यवहार अपनी मां के प्रति अच्छा नहीं था. कई बार कजली ने अपने पति से रोते हुए शिकायत की थी. जवाब में वे एक उदास, बेबस सी गहरी सांस लेते और पूरी समस्या का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करते हुए उसे धीरज न खोने की राय देते, ‘पुराने मूल्य टूट रहे हैं, नए बन नहीं पाए. नई पीढ़ी इसी दोहरे अंधेरे से घिरी है. अगर हम उन्हें डांटेंगे तो वे भयाक्रांत हो, नए मूल्य ढूंढ़ना छोड़ देंगे. उन का व्यक्तित्व पहले ही मूल्यहीनता की कमी के एहसास से हीनताग्रस्त है. डांटफटकार से वे टूट जाएंगे. उन का विकास रुक जाएगा. बेहतर यही है कि उन के साथ समान स्तर पर कथोपकथन चलता रहे. इस से उन्हें अपने लिए नए मूल्य ढूंढ़ने में मदद मिलेगी.’

पति की इस कमजोर करती, असहाय बनाती प्रतिक्रिया को याद कर कजली की आंखों से विवशता के आंसू बहने लगे. उसे अपना छोटा बेटा कोको याद आया, जो स्कूल गया हुआ था. बड़ा बेटा आईआईटी में इंजीनियरिंग कर रहा था. वह पिंकी की तरह दुर्व्यवहार तो नहीं करता था मगर उस में भी आधुनिक युवावर्ग की असहनशीलता और वह पुरानेपन के प्रति निरादर था. केवल नन्हा कोको ही ऐसा था जो नए और पुराने मूल्यों के भेद से अनभिज्ञ था, जो सिर्फ यह देखता था कि मां की प्यारी आंखें ढुलक रही हैं और यह वह देख नहीं सकता था क्योंकि मां के आंसू देख उस का उदर रोता था. वह अपने मायूस हाथों से उस के आंसू पोंछते हुए उस के गले से लग जाता था  बात कुछ नहीं थी. बात कभी भी कोई खास नहीं होती थी. बस, छोटीछोटी बातें थीं जिन्हें ले कर अकसर पिंकी दुर्व्यवहार करती. आज वह देर तक सोती रही थी. कजली ने उसे जगाया तो वह झुंझला कर बोली, ‘‘उफ, मां, तुम इतनी अशिष्ट क्यों हो गई हो?’’

‘‘क्यों, इस में क्या अशिष्टता हो गई?’’

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‘‘अच्छा, इतनी जोर से मुझे हिलाया और ऊपर से कह रही हो कि इस में क्या अशिष्टता हो गई? क्या प्यार से नहीं जगा सकती थीं?’’

‘‘मुझ से ये चोंचले नहीं होते.’’

‘‘ये चोंचले नहीं, मां, आधुनिक संस्कृति है. मेरा सारा मूड आप ने खराब कर दिया. मैं ने कई बार कहा है कि जब मैं सो रही होऊं तो ऐसी कठोर आवाज में मत बोला करो. सुबह उठने पर पहला बोल प्यार का होना चाहिए.’’

‘‘तो अब तुम मुझे सिखाओगी कि कैसे उठाया करूं, कैसे तुम से बात किया करूं? एक तो 9 बजे तक सोई रहती हो ऊपर से मुझे उठाने की तमीज सिखा रही हो. हमारे जमाने में सुबह 6 बजे उठा दिया जाता था. हमारी हिम्मत नहीं होती थी कि कुछ कह सकें.’’

‘‘वह पुराना जमाना था, तब लड़कियों को घर की नौकरानी समझा जाता था. मेरे साथ यह सब नहीं चलेगा.’’

‘‘क्या नहीं चलेगा? तू बहुत जबान चलाने लगी है. जरा सी भी तमीज है तुझ में? मैं तेरी मां हूं.’’

‘‘मां, आप हद से आगे बढ़ रही हो. मैं ने आप को ऐसा कुछ नहीं कहा है. आप मुझे गालियां दे कर निरुत्साहित कर रही हो. आप क्या समझती हो कि मैं आप के इस मूर्खतापूर्ण व्यवहार को बरदाश्त कर जाऊंगी.’’

‘मूर्खतापूर्ण’ शब्द सुनते ही कजली आश्चर्यचकित रह गई. उस की समझ में नहीं आया कि वह क्या कहे. अपना सारा उफान उसे पीना पड़ा. नाश्ते की मेज पर फिर पिंकी ने अपने नखरे शुरू कर दिए, ‘‘यह क्या नाश्ता है, मां? परांठे और दूध, क्या यह क्रौकरी लगाने का ढंग है? प्लेटें हरे रंग की हैं तो डोंगे भूरे रंग के. मां, मैं तो ऐसे नहीं खा सकती. खाने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है खाना परोसने का तरीका. फूहड़ तरीके से परोसने से वैसे ही भूख मर जाती है.’’ अब यह दूसरा कठोर शब्द था, ‘फूहड़’. यानी मां फूहड़ है. ‘‘तू अब मां को फूहड़ कहना सीख गई. मैं भी ग्रेजुएट हूं. इस घर में बस यही मेरी इज्जत है?’’

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कजली की आंखों में आंसू भर आए. ये ऐसे आघात थे, जो उस ने कभी बचपन में जाने नहीं थे. जिस संस्कृति में वह पली थी उस में मां की शान में गुस्ताखी अक्षम्य थी. कोई भी मां अपनी बेटी से ‘फूहड़’ शब्द सुन कर शांत नहीं रह सकती थी. मां को रोते देख पिंकी सहम गई, ‘‘मैं ने आप को नहीं कहा, मां. मैं तो कुंदन को कह रही थी. इस को कुछ सिखाओ, मां. यह कुछ भी नहीं सीखना चाहता. जैसा गंवार आया था वैसा ही है.’’

‘‘मैं सब समझती हूं. बेवकूफ नहीं हूं. क्या यहां कुंदन था जब तू यह सब बोल रही थी?’’ पिंकी अवाक् हो गई और अपना उतरता चेहरा छिपाने के लिए कालेज के लिए देरी होने का बहाना करते हुए बाहर हो गई. एक पीड़ा थी, एक गहन पीड़ा, एक अनंत सी लगती पीड़ा, जिस का उद्गम पेट के गड्ढे में था, जहां से वह लावे की तरह उबल रही थी. जो आंसू कजली की आंखों से बरस रहे थे वे देखने में तो पानी थे लेकिन वे पिघले लावे की तरह आंखों को लग रहे थे. इस दुख में और सारे दुख आ मिले थे. सब से बड़ा यह था कि गृहस्थ जीवन ने उसे क्या दिया? 3 बच्चे, दुनियाभर की चिंताएं. दुनियादारी के दबाव, भय व दिन पर दिन आकर्षण खोता शरीर और सैक्स से विरक्त होते पति. पूरीपूरी रात वह थक कर, दफ्तर

की चिंताओं और जिंदगी की उलझनों को हफ्ते में 2-3 बार 3 पैगों में गर्त कर के ऐसे सोते रहते जैसे स्त्री शरीर के प्रति उन में केवल मातृभाव था. वासना जैसे थी ही नहीं, किंतु चोट तब लगती जब पार्टियों में या कार में साथ जाते हुए वे जी खोल कर सुंदर युवतियों की रूपसुधा से मोटे चश्मे के पीछे आंखों की वीरानी दूर करते. अब उम्र की ढलान पर उतरते हुए कजली को लगता जैसे इतनी धूप में वह अकेली रह गई है.

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71 की उम्र में ‘ड्रीम गर्ल’ संग इश्क लड़ाते दिखे Mithun

कलर्स का रियलिटी शो ‘हुनरबाज’ (Hunarbaaz) में जल्द ही ‘ड्रीम गर्ल’ (Dream Girl) हेमा मालिनी (Hema Malini) दिखाई देने वाली हैं, जिसके चलते शो के मेकर्स ने नया प्रोमो शेयर किया है. वहीं प्रोमो की बात करें तो मिथुन चक्रवर्ती (Mithun Chakraborty) हेमा मालिनी संग इश्क लड़ाते नजर आ रहे हैं. आइए आपको दिखाते हैं प्रोमो की झलक…

हेमा मालिनी संग किया डांस

 

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दरअसल, प्रोमो की बात करें तो इस बार एक्ट्रेस हेमा मालिनी मदर्स डे के मौके पर शो में मस्ती करती हुई नजर आने वाली हैं. वहीं वह 90 के दशक के सॉन्ग पर शो के जज मिथुन चक्रवर्ती संग इश्क लड़ाते दिखाई देंगी. हालांकि होस्ट भारती सिंह (Bharti Singh) और हर्ष लिम्बाचिया (Haarsh Limbachiyaa) इस मौके पर दोनों के साथ मजाक करते हुए नजर आएंगे.

 

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भारती खींचती हैं मिथुन दा की टांग

 

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शो के बात करें तो भारती सिंह प्रैग्नेंसी में भी शो को होस्ट करती हुई नजर आ रही हैं. हालांकि इस दौरान भी वह कौमेडी करती नजर आती हैं और दर्शकों को एंटरटेन करती हैं. इसी के साथ वह शो के जज मिथुन दा के साथ मस्ती करती हैं और उनकी टांग खींचती हुई नजर आथी हैं.

 

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बता दें, एक्टर मिथुन चक्रवर्ती और हेमा मालिनी की आइकॉनिक जोड़ी कई पुरानी फिल्मों में देखने को मिली हैं. ‘आंधी-तूफान’, ‘तकदीर’, ‘गलियों का बादशाह’, ‘हिरासत’, ‘साधु संत’ और ‘सहारा’ जैसी फिल्मों में दोनों स्क्रीन शेयर करते हुए नजर आ चुके हैं. वहीं फैंस को दोनों की कैमेस्ट्री भी काफी पसंद आती हैं. अब देखना होगा कि शो में दोनों के इस डांस पर फैंस कैसा रिएक्शन देते हैं.

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पिता बने Aditya Narayan, फैंस के साथ शेयर की खुशी

एक्टिंग से लेकर होस्टिंग के लिए जाने जाने वाले सिंगर आदित्य नारायण (Aditya Narayan) ने बीते दिनों वाइफ श्वेता अग्रवाल की प्रैग्नेंसी की खबर दी थीं. वहीं अब पापा बनने की खबर फैंस के साथ शेयर कर दी है. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…

पोस्ट किया शेयर

दरअसल, जहां कुछ दिनों पहले खबरें थीं कि 24 फरवरी को मुंबई के एक नर्सिंग होम में श्वेता अग्रवाल ने बेटी को जन्म दिया है तो वहीं अब एक्टर आदित्य नारायण ने औफिशियली अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर खुशी जाहिर करते हुए एक फोटो शेयर की है और फोट के साथ कैप्शन में लिखा है कि यह बात शेयर करते हुए मुझे बेहद खुशी महसूस हो रही है कि मेरी पत्नी श्वेता ने एक सुंदर बच्ची को जन्म दिया है. आदित्य नारायण के ये पोस्ट शेयर करते ही सेलेब्स और फैंस उन्हें बधाईयां दे रहे हैं.

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बेटी की थी चाहत

इसके अलावा आदित्य नारायण ने एक इंटरव्यू में बेटी के पिता बनने की खुशी को जाहिर करते हुए कहा है कि ‘वह एक बेटी होने की दुआ कर रहे थे और उनकी दुआ कुबूल हो गई है. हर कोई मुझे यही कह रहा था कि हमें बेटा होगा. लेकिन मैं मन ही मन दुआ कर रहा था कि हमारे घर बेटी आए. मुझे लगता है कि पिता अपनी बेटियों के बहुत करीब होते हैं, मुझे खुशी है कि हमारे घर एक नन्हीं परी आ गई है. श्वेता और मैं बहुत ज्यादा खुश हैं कि हम अब माता-पिता बन गए हैं.’ वहीं कपल की पेरेंट्स बनने की खुशी का कोई ठिकाना नहीं है.


बता दें, कोरोना के मुश्किल समय में आदित्य नारायण ने अपनी लौंगटाइम गर्लफ्रेंड से 1 दिसंबर 2020 को शादी करने का फैसला किया था. वहीं इन दो सालों में वह अपनी लाइफ को खुशनसीब मानते रहे हैं. हालांकि देखना होगा कि वह फैंस के सामने कब अपनी बेटी का चेहरा दिखाते हैं.

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कुंआ ठाकुर का: क्या कभी बच पाई झुमकी

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

“तुम्हारे कष्टों का हल तब ही मिलेगा, जब तुम हमारे साथ भाग कर शहर चलोगी, वरना रोज़ रात की यही कहानी रहेगी तुम्हारे साथ,” कलुआ ने झुमकी को बांहों में लेते कहा.

“हां रे, मन तो हमारा भी यही कहता है कि अब हम वापस घर न जाएं लेकिन अगर न गए तो हमारा बाप हमारी मां को भूखा मार डालेगा,” झुमकी ने एक सर्द आह भरते हुए कहा.

“तेरा बाप, छी, मुझे तो घिन आती है तेरे बाप के नाम से. भला कोई बाप अपनी बीवी और बेटी से ऐसा काम भी करा सकता है? वह कम्बख्त मर जाए तो ही अच्छा है,” कलुआ ने गुस्से से कहा.

“ऐसा मत कहो. वह मेरा बाप है. मेरी मां उसी के नाम का सिंदूर लगाती है. और तुम क्या समझते हो, अगर अम्मा या मैं ने उस की बात मानने से इनकार किया तो, पहले तो वह गालीगलौच करता है और फिर कहता है कि हम लोग ने नीच जाति वाले घर में पैदा हो कर गलती कर दी है और अब ये सब करना तो हमारे करम में लिखा है. हम जब तक जिंदा रहेंगे तब तक हमें ये ही सब करना पड़ेगा,” सिसक उठी थी झुमकी.

झुमकी के बदन पर नोचनेखसोटने के निशान बने हुए थे. उन्हें प्यार से सहलाते हुए कलुआ  बोला, “हां, हम तुम्हारी इतनी मदद कर सकते हैं कि तुम्हें यहां  से खूब दूर अपने साथ शहर ले जाएं और वहां हम दोनों मजदूरी कर के अपना पेट पालें. तभी तुम इस नरक से मुक्ति पा सकती हो,” झुमकी को बांहों में समेट लिया  था कलुआ ने.

झुमकी की उम्र 20 बरस थी. छरहरी काया, पतली नाक और चेहरे का रंग ऐसा जैसे कि तांबा और सोना आपस में  घोल कर उस के चेहरे पर लगा दिया गया हो.

झुमकी के बाप को शराब की लत लग गई थी. गांव के पंडित और ठाकुर उसे शराब पिलाते और  बदले में वह अपनी पत्नी को इन लोगों का बिस्तर गरम करने के लिए भेज देता. दिनभर दूसरों के खेत और अपने घर के चूल्हेचौके में जान खपाने के बाद जब झुमकी की मां ज़रा आराम करने जा रही होती, तभी नशे में धुत हो कर झुमकी का बाप आता और झुमकी की अम्मा  को इन रसूखदार लोगों के यहां जाने को कहता. विरोध करने पर उन्हें उन की नीची जाति का हवाला देता और कहता कि ऐसा करना तो उन के समय में ही लिखा है. इसलिए उन्हें ये सब तो करना ही पड़ेगा. झुमकी की अम्मा समझ जाती कि उस की इज़्ज़त को तो पहले ही शराब पी कर  बेच आया है, इसलिए मन मार कर उन लोगों के बिस्तर पर रौंदी जाने के लिए चली जाती.

झुमकी जैसे ही 13 साल की हुई, तो ठाकुर ने तुरंत ही अपनी गिद्ध दृष्टि उस पर जमा दी और झुमकी के बाप से मांग करी कि आज के बाद वह अपनी पत्नी को नहीं, बल्कि झुमकी को उस के पास भेजा करेगा  और झुमकी को खुद ठाकुर के पास पहुंचा कर आया था झुमकी का बाप.

एक बार ऐसा हुआ, तो फिर तो मानो यह चलन हो गया. जब भी ठाकुरबाम्हन लोगों का मन होता, बुलवा भेजते झुमकी को और रातरातभर रौंदते उस के नाज़ुक जिस्म को.

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वह तो उस दिन झुमकी ने गांव की नदी में डूब कर आत्महत्या ही कर ली   होती, अगर उस मल्लाह के लड़के कलुआ ने उसे सही समय पर बचाया न होता. कलुआ ने जान बचाने के बाद जब जरा डांट और जरा पुचकार से झुमकी से ऐसा करने का कारण पूछा तो कलुआ के प्यार के आगे उस की आंसू की धारा बह निकली और रोरो कर  सब बता दिया कलुआ को.

“हम नीच जात के हैं, तो भला इस में हमारा का दोष है. और अगर वे लोग बाम्हन और ठाकुर हैं तो वे हमारे साथ जो चाहे, कर सकते हैं का?” झुमकी के इस सवाल का कोई जवाब नहीं था कलुआ के पास.

झुमकी को कलुआ से थोड़ा  स्नेह मिला और इस स्नेह में उसे वासना के कीड़े नहीं दिखाई दिए. तो, मन ही मन वह उसे अपना सबकुछ मान बैठी थी. कलुआ भी तो झुमकी पर ही जान न्योछावर किए रहता था. पर उसे ऐसे झुमकी का बाह्मन और ठाकुर द्वारा शोषण किया जाना पसंद नहीं था और इसीलिए वह शहर जाने की ज़िद करता था पर हर बार झुमकी अपनी मां की दुहाई दे कर बात टाल जाती थी.

लेकिन, कल जब झुमकी दालान में बैठी अपने शरीर पर रात में आई खरोंचों पर कड़वा तेल का लेप लगा रही थी, तभी झुमकी की अम्मा आई और बोली, “बिटिया, हम तुम को जने हैं, इसलिए तुम्हारा दर्द सब से अच्छी तरह जानते हैं. और यह भी जानते हैं कि वह कलुआ तुम्हें पसंद करता है. तुम अगर यहां गांव में ही रह गई, तो इसी तरह  पिसती रहोगी. शायद, नीच जाति में पैदा होना ही हमारा कुसूर बन गया है. पर अगर सच में ही जीना चाहती तो यहां से कहीं और भाग जाओ और हमारी  चिंता मत करो. हम तो बस काट ही लेंगे अपना जीवन. पर तुम्हारे सामने अभी पूरा जीवन है, तू यहां रह गई तो ये मांस के भेड़िए तुझे रोज़ रात में नोचेंगे. इसलिए चली जा यहां से, चली जा…”

अभी  झुमकी की मां उसे समझा ही रही थी कि झुमकी का बाप अंदर आ गया. उस ने सारी बातें सुन ली थीं, बोला, “हां, झुमकी ज़रूर जाएगी पर कलुआ के साथ नहीं, बल्कि संजय कुमार के साथ. मैं ने  इस की शादी संजय कुमार के साथ तय कर दी है. चल री झुमकी, जल्दी तैयार हो जा. तेरा दूल्हा  बाहर बैठा हुआ है.”

यह कैसी  शादी थी, न बरात, न धूम, न नाच, न गाना.

झुमकी और उस की मां समझ गई थीं कि झुमकी का सौदा कर डाला गया है. पर झुमकी के लिए आगे कुंआ और पीछे खाई जैसी हालत थी. फिर भी उस के मन में एक दूल्हे के नाम से यह उम्म्मीद जगी कि यहां रोज़रोज़ इज़्ज़त नीलाम होने से तो कुछ सही ही रहेगा कि किसी एक मर्द से बंध कर रहे.

और इसी उम्मीद में झुमकी उस आदमी के साथ चली गई. जाते समय झुमकी का मन तो भारी  था पर इतनी खुशी ज़रूर थी कि उसे बेचने के बदले में उस के पिता को जो पैसे मिल जाएंगे उन के बदले वह कुछ दिन आराम से शराब पी सकेगा.

और इस तरह बिहार के एक गांव से चल कर झुमकी उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर में पहुंच गई.

“यह रहा हमारा कमरा,” संजय ने एक छोटे से कमरे में घुसते हुए कहा.

उस कमरे में कोई भी बिस्तर नहीं था, सिर्फ एक गद्दे पर चादर डाल कर उसे लेटने की जगह में तबदील कर दिया गया था. और इस समय उस गददे पर  2 आदमी बैठे हुए झुमकी को फाड़खाने की नज़रों से देख रहे थे.

“अरे, इन से शरमाने की ज़रूरत नहीं है. ये दोनों हमारे बड़े भाई हैं- विजय भैया और मनोज भैया. हम लोग  मजदूरी करते हैं और ये दोनों भी हमारे साथ इसी कमरे में रहते हैं. और एक बात बता  दें तुम्हें कि तुम्हें हमारे साथसाथ इन का भी ध्यान रखना होगा,” संजय कुमार ने ज़मीन पर बैठते हुए कहा.

“हम भाइयों ने दिन बांट रखे हैं. हफ्ते के पहले 2 दिन तुम को बड़े भैया के साथ सोना होगा और उसके बाद के 2 दिन तुम  मझले भैया के साथ सोओगी और मैं सब से छोटा हूं, इसलिए सब से बाद में मेरा नंबर आएगा.  तुम को शर्म न आए, इस के लिए हम बीच में एक परदा डाल लेंगे,” संजय ने बड़ी सहजता से ये सारी बातें कह डाली थीं.

“क….क्या मतलब,” चौंक उठी थी झुमकी.

“यही कि हम 3 भाई हैं और हमारे आगेपीछे माईबाप कोई नहीं हैं जो हम लोगों का ब्याह करवा सके  और न ही हम लोगों के पास इतना पैसा है कि हम लोग अलगअलग रहें और अपने लिए अलगअलग बीवी रख सकें. इसीलिए हम ने 3 भाइयों के बीच में एक ही बीवी खरीद कर रखने का प्लान  बनाया.”

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संजय कुमार की बात सुन कर जब झुमकी ने 3 पतियों की बीवी बनने से इनकार किया

तो तीनों ने उस के पिता को पूरे पैसे देने की बात कह कर बारीबारी से झुमकी के साथ मुंह काला किया और बाद में तृप्त हो कर गहरी नींद में सो गए और जब वे तीनों  आधी रात के बाद नींद की आगोश में थे, तब झुमकी दबेपांव वहां से भाग निकली और ढूंढतेढांढते पुलिस स्टेशन पहुंची और थानेदार को पूरी कहानी बताई.

“अरे, तो इस में बुराई ही क्या थी. और फिर, तुम्हें तो गांव में भी ऊंची जाति के लोगों के साथ सोने की आदत थी ही. यहां भी तीनों को खुश कर के रहतीं, तो वे सब रानी बना कर रख़ते. तुम छोटी जाति वालों के साथ यही समस्या है कि ज़रा सी बात में ही शोर मचाने लगते हो. अब रात के 3 बजे तू यहां आई है और मैं ने तेरी रिपोर्ट  भी लिख ली है. अब अगर बदले में तू मुझे थोड़ा खुश कर देगी, तो तेरा कुछ घिस थोड़े ही जाएगा,” यह कह कर थानेदार ने मेज़ पर ही झुमकी को लिटा दिया और उस का बलात्कार कर डाला.

रोती रही झुमकी. आज उसे कलुआ बहुत याद आ रहा था. उस ने एक नज़र थानेदार पर डाली

जो अपनी शर्ट और पैंट को संभालने की कोशिश कर रहा था.

सुबह हो रही थी. झुमकी भारी मन से उठी और बाहर निकल गई. कमज़ोरी, थकान और अपने ऊपर हुए जुल्मों के कारण उस से चला भी न जा रहा था. झुमकी किसी तरह सड़क तक पहुंची और सड़क पर ही गिर कर बेहोश हो गई.

झुमकी को होश आया, तो उस ने अपनेआप को बिस्तर पर पाया और उस की आंखों के सामने एक युवक खड़ा मुसकरा रहा था.

युवक की आंखों पर हलके लैंस का चश्मा और चेहरे पर घनी दाढ़ी थी.

“घबराओ नहीं, तुम सुरक्षित जगह हो. तुम सड़क पर बेहोश हो गई थीं. संयोग से मैं वहीं से गुज़र रहा था. तुम्हें देखा, तो यहां ले आया.” वह युवक इतना बोल कर चुप हो गया.

झुमकी अब भी उस को प्रश्नवाचक नज़रों से देख रही थी.

“मैं एक समाजसेवक हूं. मेरा नाम मलय है  और तुम जैसे गरीब व पिछड़े लोगों की मदद करना ही मेरा काम है. थोड़ा आराम कर लो और फिर मैं तुम से पूछूंगा कि तुम्हारी यह हालत किस ने कर दी है.”

वह मुसकराता हुआ वहां से चला गया और झुमकी की देखभाल के लिए एक नर्स वहां आ गई. कुछ घंटों बाद जब मलय वहां आया तो झुमकी अपनेआपको तरोताज़ा महसूस कर रही थी और पहली बार उसे ऐसा लग रहा था कि वह सुरक्षित हाथों में है.

झुमकी ने अपने साथ बीती हुई सारी बातें मलय को बता दीं. सुन कर मलय काफी दुखी हुआ और उस को न्याय दिलाने का वादा किया.

झुमकी की सेहत भी अब ठीक हो रही थी और अब भी वह मलय के सर्वेंटरूम में ही रह रही थी.

एक रात को 10 बजे मलय उस सर्वेंटरूम में आया. वह अपने साथ एक बाम ले कर आया था.

“मेरे सिर में बहुत दर्द है, ज़रा बाम तो लगा दो झुमकी, ” मलय ने झुमकी के बिस्तर पर लेटे हुए कहा.

झुमकी बाम लगाने लगी मलय के माथे पर. मलय उसे लगातार घूरे जा रहा था. अचानक कुछ अच्छा नहीं लगा  झुमकी को.

“मैं सोच रहा हूं कि भले ही तुम नीच जाति की हो, तुम्हारे साथ इतने लोगों ने बलात्कार किया, तो ज़रूर तुम में कोई कशिश रही होगी और मुझे लगता है कि उन्होंने कोई गलती नहीं करी,” कह कर मलय चुप हो गया.

झुमकी ने बाम लगाना बंद कर दिया और दूर जाने लगी.

तभी पीछे से उस ने अपनी पीठ पर मलय का हाथ महसूस किया. वह कुछ बोल पाती, इस से पहले ही मलय ने झुमकी को पकड़ कर बिस्तर पर गिरा दिया और उस का बलात्कार कर दिया.

झुमकी एक बार फिर उस नरक के अनुभव से गुज़र रही थी. लेकिन इस बार वह सहेगी नहीं,

वह बदला लेगी. पर कैसे?

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गुस्से में झुमकी ने कोने में पड़ा हुआ एक छोटा सा चाकू उठाया और पूरी ताकत से मलय पर वार कर दिया. मलय के हाथ पर हलाकि सी खरोंच आई. मलय नशे में तो था ही, खरोंच लगने से उसे और क्रोध आ गया और उस ने अपने दोनों हाथ झुमकी के गरदन पर कस दिए और अपना दबाव बढ़ाता गया. एक समाजसेवक  बलात्कारी के साथसाथ खूनी भी बन गया था.

और झुमकी, जो एक गांव में जन्म ले कर शहर तक आई, पिता से ले कर उस के जीवन में जो भी आया उसे झुमकी में सिर्फ वासनापूर्ति का साधन दिखाई दिया. यह उस के एक औरत होने की सज़ा थी या एक गरीब होने की या एक दलित महिला होने की एक प्रश्नचिन्ह अब भी बाकी है???

Holi Special: फैमिली के लिए बनाएं करारी भिंडी

अगर आप फैमिली के लिए लंच या डिनर में टेस्टी और हेल्दी रेसिपी ट्राय करना चाहते हैं तो करारी भिंडी की रेसिपी ट्राय करना ना भूलें.

सामग्री

– 500 ग्राम भिंडी

– 2 प्याज

– 1 कप दही

– 1/2 छोटा चम्मच हलदी

– 1/2 छोटा चम्मच हींग

– 1 छोटा चम्मच जीरा

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– 2-3 कलियां लहसुन

– 1/2 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर

– 2 बड़े चम्मच मूंगफली पाउडर

– 1/2 छोटा चम्मच धनिया पाउडर

– तेल आवश्यकतानुसार

– नमक स्वादानुसार.

विधि

भिंडी को धोपोंछ कर लंबाई में काट लें. एक पैन में 2 बड़े चम्मच तेल गरम कर जीरा डालें. हलदी और हींग डालें. प्याज के लच्छे डाल कर कुछ गलने तक पकाएं. भिंडी डाल कर 4-5 मिनट तक लगातार चलाते हुए भिंडी को कुरकुरा होने तक पकाएं. नमक डाल आंच से उतार लें. 2 बड़े चम्मच तेल गरम करें. पिसा लहसुन, लालमिर्च पाउडर, धनिया पाउडर व हलदी डाल कर अच्छी तरह भूनें. मूंगफली का पाउडर मिलाएं. कुछ देर भूनें. दही डाल कर अच्छी तरह भुन जाने तक पकाएं. इस मसाले में भिंडी मिक्स कर अच्छी तरह मिला लें. ऊपर से धनियापत्ती बुरक कर गरमगरम परोसें.

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6 Tips: गर्मियों में ऐसे रहेगा आपका आशियाना ठंडा

इस आग बरसाते मौसम में घर और बाहर का अंतर तब कम हो जाता है, जब आपका आशियाना ठंडा नहीं हो. बेहद छोटी-छोटी चीजों से बड़ा फर्क लाया जा सकता है और भट्टी बन चुके घर को कूल किया जा सकता है. बिजली की बचत तो होगी ही क्योंकि इन उपायों से घर नैचुरली ठंडा रहेगा. कुछ ऐसे उपाए जिनसे आपका आशियाना गर्मी में रहेगा ठंड़ा.

1. छत न हो गर्म

छत का ठंडा रहना बेहद जरूरी है. कितने भी उपाय घर के अंदर कर लें लेकिन छत गर्म है तो ज्यादा फर्क नहीं महसूस कर पाएंगे. इसलिए रूफ पर पौधों का इंतजाम करें या घास लगवाएं. इससे पूरे घर का तापमान कम बना रहेगा. छत को टूटे हुए गमलों के टुकड़ों से भी कवर किया जा सकता है.

2. आस-पास हरियाली

घर के अंदर तो कुछ पौधे हों ही, आस-पास भी हरियाली बनाएं रखें. इससे आपका घर काफी ठंडा रह सकता है. अगर घर के आसपास इतनी जगह नहीं है तो हर संभव जगह पर छोटे पौधे उगाए जा सकते हैं. दीवार पर इस मौसम में बेल चढ़ाना भी मददगार होगा.

3. जमीन पर बिस्तर

कमरे में गर्म हवा ऊपर की तरफ रहती हैं. कोशिश करें कि आपके बिस्तर का लेवल नीचे हो. ऐसा करने पर गर्मी कम लगेगी. गर्मियों में ग्राऊंड फ्लोर पर सबसे ज्यादा ठंडक हो जाती है. अगर संभव हो तो इसी मंजिल पर सोने का इंतजाम करना बिजली का काफी खर्च बचा सकता है. क्योंकि एसी को भी तल मंजिल का कमरा ठंडा करने में कम देर लगेगी.

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4. चादरें हों सूती

बिस्तर पर लेटते वक्त ही महसूस हो जाता है कि चादर मौसम के लायक है या नहीं. सैटिन और पॉलिस्टर शीट का मौसम गया. कॉटन का दौर है. सूती चादरें बिछाएं. हलके रंग की शीट्स गर्मी नहीं सोखती हैं.

5. पर्दे का फर्क

परदों का सिर्फ यह काम नहीं होता कि वे घर को बाहर वालों की नजर से बचाएं. वे घर के अंदर की ठंडक को घर में ही बनाए रखने में मददगार हैं. ब्लाइंड्स या पर्दे मौसम अनुसार होने चाहिए. इन्हें बदलेंगे तो खुद फर्क महसूस करेंगे. इस मौसम में हल्का रंग काफी ठंडक पहुंचाएगा. भारी पर्दे अंदर की ठंडक को बाहर नहीं जाने देंगे इसलिए कोशिश करें कपड़ा मोटा हो.

6. चिक से मिलेगी ठंडक चकाचक

बालकनी खुली रहेगी तो गर्माहट को न्यौता देती रहेगी. बालकनी और गलियारों में बांस के चिक लगवाएं. ये चिक ऐसे हो जिन्हें आप पानी से तर कर सकें. इससे कूलर चलाने का खर्चा भी आप बचा सकते हैं.

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अब हां कह दो: क्या हुआ था नेहा के साथ

लंचके समय समीर ने नेहा के पास आ कर उसे छेड़ा, ‘‘क्या मुझ जैसे स्मार्ट बंदे को आज डिनर अकेले खाना पड़ेगा?’’

‘‘मुझे क्या पता,’’ नेहा ने लापरवाही से जवाब दिया.

‘‘मैं ने एक बढि़या रेस्तरां का पता मालूम किया है.’’

‘‘यह मुझे क्यों बता रहे हो?’’

‘‘वहां का साउथ इंडियन खाना बहुत

मशहूर है.’’

‘‘तो?’’

‘‘तो आज रात मेरे साथ वहां चलने को ‘हां’ कह दो, यार.’’

‘‘सौरी, समीर मुझे कहीं…’’

‘‘आनाजाना पसंद नहीं है, यह डायलौग मैं तुम्हारे मुंह से रोज सुनता हूं. इस बार सुर बदल कर ‘हां’ कह दो.’’

‘‘नहीं, और अब मेरा सिर खाना बंद करो,’’ नेहा ने मुसकराते हुए उसे डपट दिया.

नेहा के सामने रखी कुरसी पर बैठते हुए समीर ने आहत स्वर में पूछा, ‘‘क्या हम अच्छे दोस्त नहीं हैं?’’

‘‘वे तो हैं.’’

‘‘तब तुम मेरे साथ डिनर पर क्यों नहीं चल सकती हो?’’

‘‘वह इसलिए क्योंकि तुम दोस्ती की सीमा लांघ कर मुझे फंसाने के चक्कर में हो.’’

‘‘अगर हमारी दोस्ती प्रेम में बदल जाती है तो तुम्हें क्या ऐतराज है? आखिर एक न एक दिन तो तुम्हें किसी को जीवनसाथी बनाने का फैसला करना ही पड़ेगा न… अब मुझ से बेहतर जीवनसाथी तुम्हें कहां मिलेगा?’’ कह समीर ने बड़े स्टाइल से अपना कौलर खड़ा किया तो नेहा हंसने को मजबूर हो गई.

‘‘तो कितने बजे और कहां मिलोगी?’’ उसे हंसता देख समीर ने खुश हो सवाल किया.

‘‘कहीं नहीं.’’

‘‘अब क्या हुआ?’’ समीर ने अपना चेहरा लटका दिया.

‘‘अब यह हुआ कि मुझे लड़कियों पर लाइन मारने वाले लड़के पसंद नहीं और न ही मैं उन लड़कियों में से हूं जिन की झूठीसच्ची तारीफ कर कोईर् उन्हें अपने प्रेमजाल में फंसा ले. अब क्या तुम मेरी जान बख्शोगे?’’ नेहा ने नाटकीय अंदाज में उस के सामने हाथ जोड़ दिए.

‘‘अभी नहीं. देखो, पहली बात तो यह कि मैं लड़कियों पर नहीं, बल्कि सिर्फ 1 लड़की पर अपने प्यार का जादू चलाना चाहता हूं और दूसरी बात यह कि मैं ने कभी तुम्हारी झूठी तारीफ नहीं करी है. मेरी नजरों में तुम संसार की सब से खूबसूरत और आकर्षक लड़की हो.’’ समीर की आंखों में अपने लिए गहरी चाहत के भावों को पहचान कर नेहा कोई चटपटा या तीखा जवाब नहीं दे पाई.

गहरी सांस लेने के बाद उस ने कोमल स्वर में कहा, ‘‘समीर, तुम मेरे बारे में ज्यादा नहीं जानते हो. प्रेम और शादी दोनों के बारे में मेरे विचार अच्छे नहीं हैं. तुम दिल के अच्छे इंसान हो. जाओ किसी और लड़की का दिल जीतने की कोशिश करो. मैं तुम्हारे लिए सही जीवनसंगिनी साबित नहीं हूंगी.’’

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‘‘क्या हम इस बारे में डिनर करते हुए बातें नहीं कर सकते हैं?’’

‘‘आज मुझे अपने पापा के साथ डिनर करना है. सौरी, फिर किसी दिन…’’

‘‘तो आज अपने पापा से ही मिलवा दो, तुम्हारा हाथ मांगने के लिए. एक दिन मुझे तुम्हारे मम्मीपापा से मिलना तो पड़ेगा ही न?’’

समीर ने अपनी यह इच्छा मजाक में बताई थी पर नेहा ने अचानक निर्णय लेते हुए उस से कहा, ‘‘ओके, आज तुम मिल ही लो मेरे मम्मीपापा से. रात को 9 बजे इस पते पर पहुंच जाना,’’ कह नेहा ने एक कागज पर अपने घर का पता लिखा और हैरान नजर आ रहे समीर के हाथ में पकड़ा दिया.

‘‘थैंक यू… थैंक यू… मैं आज तुम्हारे मम्मीपापा का दिल जरूर जीत लूंगा,’’ बहुत खुश नजर आ रहे समीर ने नेहा से जोशीले अंदाज में हाथ मिलाया तो वह गहरी सांस छोड़ कर जबरदस्ती मुसकराने लगी.

रात को समीर वक्त से नेहा के घर पहुंच गया. उसे बनठन कर आया देख नेहा हंस पड़ी.

‘‘स्मार्ट लग रहा हूं न?’’ समीर ने बड़ी अदा से कहा.

‘‘बहुत,’’ नेहा फिर हंसी और उस का हाथ पकड़ कर ड्राइंगरूम की तरफ चल दी.

‘‘अब इस हाथ को कभी मत छोड़ना,’’ समीर धीमी व रोमांटिक आवाज में बोला.

‘‘शटअप,’’ नेहा ने उसे हंसते हुए डपटा और फिर वहां उपस्थित 3 व्यक्तियों से परिचय कराने को तैयार हो गई.

‘‘समीर, अपनी उम्र से 10 साल छोटी दिखने वाली ये खूबसूरत लेडी मेरी मम्मी हैं… और ये मेरे पापा हैं. आजकल इन के सिर पर चुनाव लड़ने का भूत सवार है और इसीलिए खादी का कुरतापाजामा पहने हैं… और ये मेरे स्टैप फादर अरुणजी हैं. जब मैं 12 साल की थी तब मम्मीपापा का तलाक हुआ और मेरे 13 साल की होने से पहले मम्मी ने अरुण अंकल से शादी कर ली थी. यह कोठी इन्हीं की है.

‘‘और यह समीर है…मेरे साथ काम

करता है और औफिस खत्म होने के बाद का समय भी मेरी कंपनी में बिताने की इच्छा मन में रखता है. मेरे काफी हतोत्साहित करने के बावजूद यह मुझ से शादी करने का इच्छुक है. अब आप सब एकदूसरे को समझो और परखो. तब तक मैं मेज पर खाना लगवाती हूं,’’ अपने होंठों पर व्यंग्यभरी मुसकान सजाए नेहा रसोई की तरफ चल दी.

समीर को नेहा के मातापिता के तलाक के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. इस वक्त उसे यह एहसास हुआ कि नेहा की व्यक्तिगत जिंदगी के बारे में वह सचमुच बहुत कम जानता था.

अपने मन को हैरान होने का वक्त दिए बिना वह उन तीनों के सवालों के जवाब देने को तैयार हो गया.

नेहा की मम्मी सीमा ने उस के घर वालों के बारे में कई सवाल पूछे. वे उस के

शौक और मनोरंजन करने के तरीकों के बारे में जानकारी चाहती थीं. उन के सवाल पूछने के ढंग से समीर को जल्दी एहसास हो गया कि वह उन्हें प्रभावित करने में खास सफल नहीं हो रहा है.

नेहा के असली पिता नीरजजी ने उस के काम से जुड़े कई सवाल पूछे. वे उस की अपने भविष्य को संवारने की योजनाओं के बारे में जानने को बहुत उत्सुक थे. समीर को लगा कि वह उन का दिल जीतने में सफल रहा.

अरुण कम ही बोल रहे थे, लेकिन वहां चल रहे वार्त्तालाप में उन की पूरी दिलचस्पी है, यह तथ्य उन की चौकन्नी आंखों से साफ जाहिर हो रहा था. समीर जब भी उन की तरफ देखता

तो वे उस का हौसला बढ़ाने वाले अंदाज में मुसकरा पड़ते.

समीर ने उन सभी से भावुक लहजे में एक ही बात कई तरह से घुमाफिरा कर कही, ‘‘मैं नेहा को दिल की गहराइयों से प्यार करता हूं. आप सब उसे मेरे साथ शादी करने के लिए राजी करने में मेरी सहायता करें. मैं उसे बहुत खुश और सुखी रखने का वचन देता हूं.’’

नेहा उन सब के बीच आ कर एक बार भी नहीं बैठी. उस ने ऊंची आवाज में खाना लग जाने की सूचना दी तो सब उठ कर डाइनिंगटेबल की तरफ चल पड़े.

खाना खा कर समीर ने सब से विदा ली. नेहा के कान में उस ने फुसफसा कर इतना ही कहा, ‘‘अपनी मम्मी को तुम्हें मनाना पड़ेगा. तुम्हारे डैडी और अरुण अंकल को मैं पसंद आ गया हूं.’’

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‘‘अरुण अंकल अभी तुम्हारे साथ जाएंगे. वे जैसा कहें, तुम वैसा ही करना,’’ नेहा ने भी बहुत धीमी आवाज में जब उस से ऐसा कहा तो समीर जबरदस्त उलझन का शिकार बन गया.

‘‘मैं जरा बाजार तक जा रहा हूं,’’ ऐसा कह कर अरुण समीर की मोटरसाइकिल पर बैठ उस के साथ चले गए.

अंदर आने के बाद नेहा ने पहले डाइनिंग टेबल की सफाई करी और फिर

ड्राइंगरूम में वापस आ कर बिना कोई भूमिका बांधे अपने मातापिता से कहा, ‘‘मैं समीर से शादी करने को खास उत्सुक नहीं हूं पर वह ऐसा करने के लिए मेरी जान महीनों से खा रहा है. अब आप दोनों समीर और हमारी भावी शादी के बारे में अपनी सीधीसच्ची राय इसी समय मुझे बता दें.’’

‘‘मुझे समीर समझदार और गुणी लड़का लगा है. मेरी राय में वह अच्छा पति साबित होगा,’’ नीरज ने फौरन समीर को अपने भावी दामाद के रूप में स्वीकार कर लिया.

‘‘मेरी समझ से तुम्हें जल्दबाजी में काम नहीं लेना चाहिए. जब तक तुम्हारा दिल इस

शादी के लिए पूरे जोश से हां न कहे, तब तक इंतजार करना बेहतर होगा,’’ सीमा की गंभीर आवाज में समीर के प्रति उन की नापसंदगी साफ झलक रही थी.

‘‘मम्मी, यों घुमाफिरा कर बात मत करो. साफसाफ बताओ कि समीर तुम्हें क्यों पसंद नहीं आया है?’’ नेहा ने आवाज में तीखापन पैदा कर मां को सच बोलने के लिए उकसाया.

‘‘समीर का स्वभाव ठीक ही है, पर मुझे तुम दोनों की जोड़ी नहीं जंच रही है. यह दुबला बहुत है और चश्मा भी लगाता है… पर्सनैलिटी में जान नहीं है,’’ सीमा ने अपनी आपत्तियां जाहिर कर दीं.

‘‘नेहा, तुम इस कमअक्ल की बात पर ध्यान मत देना,’’ नीरज एकदम गुस्सा हो उठे, ‘‘यह किसी इंसान की काबिलीयत उस की शारीरिक सुंदरता से ही नाप सकती है और ज्यादा गहरा देखने की समझ इस के पास नहीं है. समीर तुम्हें प्यार करता है, इस बात का इस की नजरों में कोई महत्त्व नहीं है.’’

‘‘अकेले उस के प्यार करने से क्या होगा? अरे, उस का व्यक्तित्व आकर्षक होता तो क्या हमारी नेहा उस की दीवानी न होती?’’ सीमा अपने भूतपूर्व पति से भिड़ने को फौरन तैयार ?हो गईं.

‘‘दोनों अच्छा कमा रहे हैं. मुझे विश्वास है कि नेहा को वह सुखी रखेगा.’’

‘‘पत्नी को सुखी रखने के लिए दौलत से ज्यादा आपसी समझ जरूरी है. एकदूसरे को पसंद करना महत्त्वपूर्ण है.’’

‘‘विवाहित जिंदगी में सुरक्षा और स्थिरता के लिए बैंक में मोटी रकम का होना ज्यादा जरूरी है. घर में सुखशांति हो तो प्यार और आपसी समझ अपनेआप पैदा हो जाती है.’’

‘‘तब हमारा तलाक क्यों हुआ?’’ सीमा ने चिड़ कर पूछा.

‘‘तुम्हारी एहसानफरामोशी और चरित्रहीनता के कारण,’’ नीरज ने चुभते स्वर में कहा तो सीमा की आंखों से चिनगारियां फूटने लगीं.

‘‘तुम्हारे हाथों दिनरात की बेइज्जती से

बचने के  लिए मैं ने तुम से तलाक लिया था.

तुम पैसा कमाने की मशीन थे. मेरे लिए तुम्हारे पास वक्त ही कहां था? जब भी मैं ने तुम से अपने मन की बात कहनी चाही, तुम मारपीट

कर मेरा मुंह बंद कर देते थे. हमारी शादी न

टूटती तो या तो मैं पागल हो जाती या फिर आत्महत्या कर लेती.’’

‘‘तुम्हारी ऐसी बातों पर नेहा विश्वास नहीं करती है तो क्यों अब भी झूठ बोल रही हो? सब को मालूम है कि मुझे धोखा देने के लिए तुम्हें अरुण की फिल्म स्टार जैसी शक्लसूरत ने उकसाया था. तुम्हें शरीर की सुंदरता के अलावा न पहले कुछ भाता था, न अब भाता है और इसीलिए नेहा को गलत सलाह दे रही हो? ’’

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‘‘अपने को ज्यादा होशियार मत दिखाओ…’’

करीब 15 मिनट तक नेहा ने एक शब्द नहीं बोला और वे दोनों एकदूसरे

को नीचा दिखाने की कोशिश करते खूब झगड़े.

नेहा अचानक उठी और मुख्यद्वार की तरफ बढ़ी तो दोनों झटके से खामोश हो गए.

‘‘तुम कहां जा रही हो?’’ सीमा के इस सवाल का नेहा ने कोई जवाब नहीं दिया और दरवाजा खोल कर बाहर चली गई.

वह तुरंत जब अंदर आई तो उस के साथ अरुण और समीर भी थे. वह बोली, ‘‘इन दोनों ने खिड़की के बाहर खड़े हो कर आप दोनों को झगड़ते सुना है. अब मैं समीर से बात करूंगी और आप दोनों में से कोई बीच में बोला तो मैं यह घर छोड़ कर अलग रहने चली जाऊंगी,’’ मातापिता को गुस्से से घूरते हुए जब नेहा ने ऐसी चेतावनी दी तो उन दोनों की आगे कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं हुई.

नेहा ने फिर समीर की तरफ घूम कर चिड़े से लहजे में कहा, ‘‘अब तो तुम समझ ही गए होंगे कि मुझे शादी करने के नाम से इतनी नफरत…इतनी ऐलर्जी क्यों है. मैं ने 12 साल की उम्र तक शायद ही कभी इन दोनों के आपसी व्यवहार में प्यार की मिठास देखी हो. जब पापा मां पर हाथ उठाते थे तो उन्हें बचाने के चक्कर मेें मैं ने अपनी बहुत पिटाई कराई थी. तलाक के बाद मम्मी सारी दुनिया के सामने यह साबित करना चाहती थीं कि मुझे अकेली भी बहुत अच्छी तरह पाल सकती हैं. मेरा कैरियर अच्छा बनाने के नाम पर इन्होंने मुझे शारीरिक और मानसिक रूप से बहुत सताया था.

‘‘ये न अच्छे पतिपत्नी थे न अच्छे मातापिता हैं. इन के कारण मैं ने कभी शादी न करने का फैसला किया है. मुझे उम्मीद है कि अब तुम

मेरे जीवनसाथी बनने का सपना देखना हमेशा के लिए छोड़ दोगे.’’

समीर की समझ में नहीं आया कि वह नेहा को क्या जवाब दे. सीमा और नीरज की लड़ाई ने उसे काफी ज्यादा परेशान और तनावग्रस्त कर दिया था.

उसे कुछ न कहते देख अरुण संजीदा लहजे में बोलने लगे, ‘‘तुम दोनों के साथ इस वक्त मैं अपने दिल में उठ रही कुछ बातों को बांटना चाहता हूं. शायद वे बातें तुम्हें सही फैसला लेने में सहायता करें. तलाक होने से पहले सीमा और मैं अच्छे दोस्त थे. यह अपने दुख, तनाव और परेशानियों को मेरे साथ बांटती थी. अच्छा दोस्त होने के नाते मैं इसे खुश देखना चाहता था और इसीलिए इस का मनोबल ऊंचा रखने के लिए जो संभव होता, वह खुशी से करता. सीमा को खुश रखना, उसे हंसतेमुसकुराते देखना मुझे तब भी बहुत खुशी देता था और आज भी. वह काफी मूडी इंसान है, पर इस बात से मुझे कोई फर्क

नहीं पड़ता. मैं तो उसे हर हाल में प्रसन्न देखना चाहता हूं.

‘‘मैं चाहता हूं कि तुम दोनों मेरे कुछ सवालों के जवाब ईमानदारी से दो. समीर, क्या नेहा को खुश कर के तुम्हें खुशी मिलती है?’’

‘‘बहुत ज्यादा, अंकल यह मेरी किसी बात पर हंस पड़े…मैं इस का कैसा भी काम कर पाऊं…यह मुझ से अपनेपन की मिठास के साथ बोल लेती है तो मेरा मन खुशी से नाच उठता है,’’ समीर भावुक हो उठा.

‘‘नेहा, तुम्हें समीर का कौन सा गुण सब से ज्यादा प्रभावित करता है?’’ अरुण ने कोमल स्वर में नेहा से पूछा.

कुछ देर सोचने के बाद नेहा ने छोटी सी मुसकान होंठों पर ला कर समीर की

तरफ देखते हुए जवाब दिया, ‘‘यह सिरफिरा इंसान मुझे हर हाल में हंसा सकता है. यह पूरा जोकर है.’’

‘‘मेरी तारीफ करने के लिए धन्यवाद,’’ समीर ने झुक कर नाटकीय अंदाज में नेहा को सलाम किया तो वह खुल कर हंस पड़ी.

‘‘देखा आप ने अंकल?’’

‘‘यह तुम्हें हंसा सकता है, इस बात की अहमियत को कम कर के मत आंको. नेहा तुम दोनों अच्छे दोस्त तो हो ही. इस दोस्ती की नींव को कभी कमजोर न पड़ने देने का पक्का संकल्प कर विवाहबंधन में बंध जाओ.

‘‘तुम अपने मम्मीपापा की कार्बन कौपी

नहीं हो जो अपने विवाह को सफल नहीं बना पाओगी. समीर तुम्हारा जीवनसाथी बनना चाहता है तो उसे ऐसा करने का मौका जरूर दो. शादी टूटने के कारणों की अच्छीखासी समझ तुम्हारे पास है. उस समझ के कारण शादी न करने का फैसला करने के बजाय अपनी शादी को सफल बनाना. तुम्हारी मम्मी को मैं समझाऊंगा. हम

सब का आशीर्वाद तुम दोनों को जरूर मिलेगा,’’ अरुण ने प्यार से नेहा के सिर पर हाथ रखा

और फिर समीर को खींच कर अपने सीने से

लगा लिया.

‘‘समीर के साथ शादी कर ले, मेरी

बच्ची. अकेले जिंदगी काटना बहुत कठिन है. अपने अकेलेपन से मैं इतना तंग आ चुका हूं

कि तुम्हारी मां अगर अरुण को छोड़ कर मेरे पास लौटना चाहे तो मैं इस बददिमाग औरत को फिर से अपना लूंगा,’’ नीरज के इस मजाक पर सभी हंस पड़े तो माहौल में व्याप्त तनाव छंट गया.

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‘‘यार, जल्दी से हां कहो, प्लीज. फिर हमें कल की पार्टी के बारे में चर्चा भी करनी है,’’ समीर ने अपने हाथों में नेहा के हाथ ले कर जबरदस्त आत्मविश्वास का प्रदर्शन किया.

‘‘तुम किस पार्टी की बात कर रहे हो?’’ नेहा ने उलझनभरे स्वर में पूछा.

‘‘अपनी मंगेतर का औफिस वालों से परिचय कराऊंगा तो क्या वे बिना पार्टी लिए हमारी जान बख्श देंगे?’’

नेहा ने उस की आंखों की गहराई में झांका तो उसे वहां अपने लिए प्यार, सम्मान और अपनेपन के भाव साफ नजर आए. उस ने

अपने दिल की बात सुनी और फिर समीर के

गले लग कर अपनी हां कही तो उस ने भावविभोर हो कर उसे गोद में उठा लिया.

जब Tour पर हों पति

बड़े चाव से मेरे मातापिता ने मेरी शादी सुधीर से की. हमारी अरेंज मैरिज थी. घरबार और लड़का मेरे मातापिता को पसंद थे, बस सुधीर के घर वालों ने पहले ही बोल दिया था कि लड़के ने इंजीनियरिंग अभीअभी पूरी की है. जल्द ही उसे नौकरी के लिए दूसरे शहर जाना पड़ेगा. वहां सैटल होते ही आप की बेटी को भी वहां ले जाएगा. मेरे मातापिता भी राजी हो गए और मैं भी, क्योंकि मातापिता अपने बच्चे के लिए अच्छा ही सोचते हैं. लेकिन शादी होते ही सुधीर का बाहर रहना मेरी बरदाश्त के बाहर हो गया. हम दोनों में खटपट शुरू हो गई. लेकिन इस में सुधीर की कोई गलती नहीं थी. वे भी तो अपने कैरियर पर ही फोकस कर रहे थे. इसी बीच मेरी स्कूल की

एक दोस्त मिली, जिस ने मुझे कुछ ऐसी बातें समझाईं कि उन से मेरी शादीशुदा जिंदगी में बदलाव आ गया.

यदि आप के पति भी ज्यादातर टूअर पर रहते हैं या फिर कुछ समय के लिए बाहर रहने गए हैं तो कैसे आप दोनों अपनी रिलेशनशिप को मजबूत बना कर रख सकते हैं, आइए जानें:

भावनात्मक रूप से जुड़ें

जरूरी नहीं है कि जब हम आमनेसामने बैठे हों तभी अपने भाव प्रकट कर सकते हैं. जब हम एकदूसरे से दूर होते हैं तो पूरे दिन में हलकीफुलकी बात फोन पर कर के भी अपने भाव प्रकट कर सकते हैं. इस तरह की हलकीफुलकी बातचीत यह दर्शाती है कि आप एकदूसरे की बहुत परवाह करते हैं. रिश्ते को बड़ी समझदारी से निभाते हैं. पूरा दिन व्यस्त रहने के बाद यदि आप रात को थोड़ी देर एकदूसरे से फोन पर बात कर लेते हैं तो भी मन हलका हो जाता है, साथ ही आप को अकेलापन भी महसूस नहीं होता.

न हो बातचीत में लंबा गैप

यदि आपस में बातचीत किए लंबा समय हो जाता है, तो आप दोनों के बीच एक लंबा फासला आ जाता है, जिस से मनमुटाव आना स्वाभाविक है. आप रोज बात करते हैं, तो आप को एकदूसरे के बारे में पता चलता रहता है. इसलिए जरूरी है कि आपसी बातचीत में लंबा गैप न आने दें.

एकदूसरे को समझें

किसी भी रिश्ते में फूट जरूरी नहीं कि दूर रहने से ही पड़े. यदि आप उस रिश्ते को समझेंगे नहीं तो तनाव आना ही है. ऐसे में जरूरी है कि एकदूसरे को समझने के लिए एकसाथ समय बिताएं, फिर चाहे वह फोन पर बात करने में बिताएं या ईमेल अथवा मैसेज करें. बात करते समय ध्यान दें कि साथी को किन बातों को करने से खुशी मिलती है. उन पर रिसर्च करें. अगली बार फोन पर बात करने पर उन से जुड़े टौपिक पर बात करें.

हमेशा साथ दें

ध्यान रखें कि आप का पार्टनर किसी समस्या में फंसा है, तो उसे मानसिक तौर से धैर्य बंधाएं. जितना हो सके अपना सहयोग दें, क्योंकि यदि उसे समस्याओं को अकेले झेलने की आदत हो जाएगी तो उसे आप की भी परवाह नहीं होगी. उसे ऐसे समय में खुश रहने की सलाह देते रहें. साथ ही कुछ ऐसी बातें भी करें, जिन से साथी का मूड फ्रैश हो जाए.

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विश्वास बनाए रखें

किसी भी रिश्ते में बेहद जरूरी है कि एकदूसरे पर विश्वास रखें. लौंग डिस्टैंस रिलेशनशिप में यह थोड़ा कठिन कार्य हो जाता है, लेकिन आपसी मतभेद न हों इस का पूरा प्रयास करें. एकदूसरे पर विश्वास बनाए रखें. झूठ बोलने से कभी न कभी झूठ सामने आ ही जाता है, जो बाद में आप के रिश्ते को प्रभावित कर सकता है, इसलिए बेहतर है अपने पार्टनर को पहले ही सच बता कर चलें.

रिश्तों में बनी रहती है गरमाहट

दूर रहने पर रिश्तों में और भी अधिक मजबूती आ जाती है, क्योंकि आप को दूर रहने पर ही पता चलता है कि आप एकदूसरे से कितना प्यार करते हैं. इस के अलावा आप को मिलने का एक अलग सा उत्साह बना रहता है. घंटों साथ बैठ कर बात करने की चाहत के लिए आप तरहतरह की प्लानिंग करते रहते हैं.

कैसे रखें खुद को व्यस्त

यदि आप के हसबैंड टूअर पर या बाहर रहते हैं, तो इस तरह खुद को व्यस्त रखें:

– अपनेआप को किसी भी कार्य में व्यस्त रखें. यदि वर्किंग हैं तो बेहद अच्छी बात है और अगर नहीं हैं तो अपनी पसंद के किसी कार्य को अपना टाइमपास बना लें.

– फिट रहने की कोशिश करें. यदि आप फिट रहेंगी तो नकारात्मक विचार भी मन में नहीं आएंगे. इस के लिए शाम या सुबह थोड़ा समय अपनेआप को दें.

– क्रिएटिव बनें. कुछ अलग हट कर करें. हसबैंड के टूअर से आने से पहले घर की अच्छी तरह साफसफाई कर के रखें. इस से

उन को और आप को दोनों को अच्छा महसूस होगा.

– कुकिंग में नया ऐक्सपैरिमैंट करें जो आप के हसबैंड को पसंद हो. उन के आने पर कुछ नया बनाएंगी तो उन्हें अच्छा लगेगा.

– घिसीपिटी बातों में अपना वक्त बेकार न करें. कई लोग मनोबल को गिराने की कोशिश करते हैं. आप उन की बातों को एक कान से सुनें दूसरे से निकाल दें, जो आप को सही लगता हो, वही करें.

– यदि आप के बच्चे हैं तो उन की पढ़ाई पर ध्यान दें. बच्चों के साथ तो वैसे भी वक्त का पता  नहीं चलता है.

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लाएं कुछ नयापन

रिश्तों में मिठास और नयापन बनाए रखने के लिए पेश हैं कुछ टिप्स:

– हमेशा ध्यान रखें कि यदि आप के हसबैंड टूअर या जौब के सिलसिले में बाहर रहते हैं, तो आप उन से हमेशा सकारात्मक तरीके से ही बात करें.

– आप दोनों एकदूसरे को दिन की शुरुआत गुड मौर्निंग के मैसेज से कर सकते हैं.

– कुछ ऐसे मैसेज या टैक्स्ड एकदूसरे को भेज सकते हैं, जिन से मन खुश हो जाए.

– किसी दिन सरप्राइज दें. साथ ही बताए बिना उन के पास पहुंच जाएं. फिर देखिएगा उस की खुशी का ठिकाना नहीं रहेगा.

– विडियो चैट करें. इस से आप को लगेगा आप आमनेसामने ही बैठे हैं.

– जब आप के पति छुट्टी पर घर आ रहे हों, तो कुछ नया प्लान करें जहां आप फुरसत से एकदूसरे के लिए समय निकाल सकें.

– हमेशा शिकायतों को ही एकदूसरे के सामने न रखें. अगर शिकायत रखनी भी है, तो कुछ इस तरह कि कल तुम मुझ से बिना बात किए ही सो गए.

– एकदूसरों के परिवार की चिंता जाहिर करें. इस से महसूस होता है कि आप को एकदूसरे के पविर की भी चिंता है.

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