कटु सत्य: भाग 2- क्या हुआ था छवि के साथ

छवि ने उस औरत को अपने हाथ में पकड़ा गन्ने का टुकड़ा देना चाहा पर वह औरत, ‘‘मैं डायन नहीं हूं, डायन नहीं हूं. मैं बड़े ठाकु र को नहीं छोड़ूंगी,’’ कहते हुए भाग कर झाडि़यों में छिप गई. उस के चेहरे पर डर स्पष्ट नजर आ रहा था.

‘बड़े ठाकुर को नहीं छोड़ूंगी,’ ये शब्द छवि के दिल पर हथौडे़ की तरह प्रहार कर रहे थे. उस ने नील की तरफ देखा. वह इस सब से बेखबर गन्ना चूस रही थी.

उस औरत की बातें तथा गांव वालों का व्यवहार देख कर वह समझ नहीं पा रही थी कि लोगों के मन में दादाजी के प्रति डर उन के प्रति सम्मान के कारण है या उन के आंतक के कारण. दादाजी गांव के सर्वेसर्वा हैं. लोग कहते हैं उन की मरजी के बिना इस गांव में एक पत्ता भी नहीं हिलता. तो क्या दादाजी का इन सब में हाथ है. अगर दादाजी न्यायप्रिय होते तो न छोटी दादी के साथ ऐसी घटना घटती और न ही लोग उस औरत को डायन कह कर मारतेपीटते. अजीब मनोस्थिति के साथ वह घर लौटी. मन की बातें मां से करनी चाही पर वे ताईजी के साथ विवाह की तैयारियों में इतना व्यस्त थीं कि बिना सुने ही कहा, ‘‘मैं बहुत व्यस्त हूं. कुछ चाहिए तो जा शिखा या नील से कह, वे दिलवा देंगी. शिखा के मेहंदी लगने वाली है, तू भी नीचे आ जा.’’

मां की बात मान कर वह नीचे आई. मेहंदी की रस्म चल रही थी. वह कैमरा औन कर वीडियो बना रही थी. तभी एक आदमी की आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘माईबाप, मेरे बेटे को क्षमा कर दीजिए, वे उसे फांसी देने वाले हैं.’’

‘‘तेरे बेटे ने काम ही ऐसा किया है. उसे यही सजा मिलनी चाहिए जिस से दूसरे लोग सबक ले सकें और दोबारा इस गांव में ऐसी घटना न हो,’’ दादाजी कड़कती आवाज में बोले.

‘‘माईबाप, सूरज की कोई गलती नहीं थी. वह तो कल्लू की बेटी ने उसे फंसा लिया. इस बार उसे क्षमा कर दीजिए, आगे वह कोई ऐसा काम नहीं करेगा.’’

‘‘सिर्फ उसे ही नहीं, कल्लू की बेटी को भी फांसी देने का फैसला पंचायत सुना चुकी है. मैं उस में कोई फेरबदल कर समाज को गलत संदेश नहीं देना चाहता.’’ इतना कह कर दादाजी अंदर चले गए औैर वह आदमी वहीं सिर पटकने लगा. नौकर लोग उसे घसीट कर बाहर ले जाने लगे.

पूरा परिवार मूकदर्शक बना पूरी घटना देख रहा था. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उस आदमी के लड़के ने किया क्या है जो वह आदमी, दादाजी से अपने पुत्र का जीवनदान मांग रहा है. तभी बूआजी का स्वर गूंजा, ‘‘लड़कियो, रुक क्यों गईं, अरे भई, नाचोगाओ. ऐसा मौका बारबार नहीं आता. ’’

इतनी संवेदनहीनता, ऐसा आचरण वह भी गांव के लोगों का, जिन के  बारे में वह सदा से यही सुनती आई है कि गांव में एक व्यक्ति का दुख सारे गांव का दुख होता है. उसे लग रहा था कैसे हैं इस गांव के लोग, कैसा है इस गांव का कानून जो एक प्रेमी युगल को फांसी पर लटकाने का आदेश देता है. इस को रोकने का प्रयास करना तो दूर, कोई व्यक्ति इस के विरुद्ध आवाज भी नहीं उठाता मानो फांसी देना सामान्य बात हो.

जब उस से रहा नहीं गया तब वह नील का हाथ पकड़ कर उसे अपने कमरे में ले आई. इस पूरे घर में एक वही थी जो उस के प्रश्न का उत्तर दे सकती थी. कमरे में पहुंच कर छवि ने उस से प्रश्न किया तब नील ने उस का आशय समझ कर उस का समाधान करने का प्रयास करते हुए कहा, ‘‘दीदी, गांव में हम सब एक परिवार की तरह रहते हैं, उस आदमी के बेटे ने इस गांव की ही एक लड़की से प्रेम किया तथा उस के साथ विवाह करना चाहता था. उन का गोत्र  एक है. एक ही गोत्र में विवाह करना हमारे समाज में वर्जित है. उसे पता था कि उन के प्यार को गांव वालों की मंजूरी कभी नहीं मिल सकती. सो, उन दोनों ने भागने की योजना बनाई. इस का पता गांव वालों को लग गया. पंचायत ने दोनों को मौत की सजा सुना दी. अगर दादाजी चाहते तो वे बच सकते थे पर दादाजी गांव के रीतिरिवाजों के विरुद्ध नहीं जाना चाहते हैं.’’

नील ने जो कहा उसे सुन कर उस के रोंगटे खड़े हो गए. भावनाओं पर अंकुश न रख पाई और कहा, ‘‘गांव वाले कानून अपने हाथ कैसे ले सकते हैं, दादाजी ने पुलिस को क्यों नहीं बुलाया?’’

‘‘दीदी, हमारे गांव में पुलिस का नहीं, दादाजी का शासन चलता है. कोई कुछ नहीं कर सकता.’’

‘‘दादाजी का शासन, क्या दादाजी इस देश के कानून से ऊपर हैं?’’

‘‘यह तो मैं नहीं जानती दीदी, पर दादाजी की इच्छा के विरुद्ध हमारे गांव का एक पत्ता भी नहीं हिलता.’’

‘‘अरे, तुम दोनों यहां बैठी गपशप कर रही हो. नीचे तुम्हें सब ढूंढ़ रहे हैं,’’ ताईजी ने कमरे में झांकते हुए कहा.

‘‘चलो दीदी, वरना डांट पड़ेगी,’’ सकपका कर नील ने कहा.

 

छवि उस के पीछे खिंची चली गई. शिखा को मेहंदी लगाईर् जा रही थी. कुछ औरतें ढोलक पर बन्नाबन्नी गा रही थीं. सब को हंसतेगाते देख कर उसे लग रहा था कि वह भीड़ में अकेली है. गाने की आवाज के साथ हमउम्र लड़कियों को थिरकते देख उस के भी पैर थिरकने को आतुर हो उठे थे पर मन ने साथ नहीं दिया.

अवसर पा कर मन की बात मां से की तो उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, यह गांव है, यहां के रीतिरिवाज पत्थर की लकीर की तरह हैं. यहां हमारा कानून नहीं चलता.’’

‘‘तो क्या दबंगों का राज चलता हैं?’’ तिक्त स्वर में छवि ने कहा.

‘‘चुप रह लड़की, मुंह बंद रख. अगर तेरे दादाजी ने तेरी बात सुन ली या किसी ने उन तक पहुंचा दी तो तुझे अंदाजा भी नहीं है कि हम सब के साथ कैसा व्यवहार होगा?’’

‘‘मां, क्या इसी डर से सब उन की गलत बात का भी समर्थन करते रहें.?’’

‘‘नहीं बेटा, वे बड़े हैं, उन्होंने दुनिया देखी है. वे जो कर रहे हैं वही शायद गांव के लिए उचित हो,’’ मां ने स्वर में नरमी लाते हुए कहा.

‘‘मां कहने को तो हम 21वीं सदी में पहुंच चुके हैं पर 2 प्यार करने वालों को इतनी बेरहमी से मृत्युदंड?’’

‘‘बेटा, मैं मानती हूं यह गलत है, लेकिन जिन बातों पर हमारा वश नहीं, उन के बारे में  सोचने से कोई लाभ नहीं.’’

‘‘मां, बात हानिलाभ की नहीं, उचितअनुचित की है.’’

‘‘कहां हो छवि की मां, शिखा का सूटकेस पैक करा दो,’’ ताईजी की आवाज आई.

‘‘आई दीदी,’’ कह कर मां शीघ्रता से चली गईं.

उस के प्रश्नों का उत्तर किसी के पास नहीं है, विचारों का झंझावात उस का पीछा नहीं छोड़ रहा था. पहले सती दादी, फिर डायन और अब यह खाप पंचायत का फैसला, कहीं तो कुछ गलत हो रहा है जिसे उस का मासूम मन पचा नहीं पा रहा था. मन की शांति के लिए वह अकेली ही मंदिर की ओर चल दी.

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पुरसुकून की बारिश : मायके के कारण जब बर्बाद हुई बेटी की शादीशुदा गृहस्थी

पूरे 2 वर्षों के बाद उसे देखा, सरेराह, भीड़ भरे बाजार में, रोमरोम से मानो आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा था. बमुश्किल नयनों के कोरों पर उन्हें सहेजा. पिछली बार जब मिली थी, उसे दो बोल धन्यवाद के फूल भी अर्पित नहीं कर पाई थी. कितना एहसान था उस का मुझ पर. कालेज से लौट रही थी, जैसे ही गली की नुक्कड़ पर सहेली के अपने घर मुड़ने पर अकेली हुई थी कि इंसानी खाल में छिपे कुछ दरिंदों ने हमला कर दिया था. इस से पहले कि उन के नाखून मेरी अस्मिता को क्षतविक्षत करते, जाने कहां से यह रक्षक प्रकट हुआ था.

जहां अकेली नारी का बल कौडि़यों का मोल होता है वहीं एक पुरुष की उपस्थिति उसे दस हाथियों का बल दे जाती है. हुआ भी यही, उस के आते ही सभी नरपिशाच अपने पंजे समेट अदृश्य हो गए. जब दुपट्टा खींचा गया, किसी ने नहीं देखा, पर जब उसे ओढ़ाया गया, लोगों ने देख लिया. उस के नाम से मैं अपने दकियानूसी परिवार में बदनाम हो गई. जिस की हिम्मत और नेकदिली की ढाल ने परिवार की बेटी के स्वाभिमान की रक्षा की थी, उसी ढाल को गलत समझा गया.

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बड़ी मुश्किल से मां को सारा हाल बताया था. मां ने मेरे होंठों पर चुप्पी का ताला टांग ताकीद की कि यदि गली वाली बात का जिक्र घर में किया तो कल से ही पढ़ाई रोक दी जाएगी. बिना किसी गुनाह के अगले दिन से गुनाहगारों सरीखी सिर झुकाए कालेज जाना अनवरत चलता रहा. कभी 7 वर्षीय भाई मेरा अंगरक्षक बनता तो कभी 80 वर्षीया दादी.

हां, एक साया था जो बिला नागा, मेरा हमसाया बना चलता था. कभी नजरें भी नहीं मिलती थीं पर मालूम रहता था कि वह है. उस के होने का एहसास मात्र ही मुझे अगले कुछ महीने कालेज जाने और परीक्षा देने की हिम्मत देता रहा. नहीं जानती कि उस के लिए मेरा क्या महत्त्व था पर वह तो मेरे लिए कुछ खास ही था, जिस की उपस्थिति मात्र की परिकल्पना मुझे उन भेडि़यों व नरपिशाचों के बीच से गुजरने का हौसला देती थी.

बहरहाल, येनकेनप्रकारेण स्टडी सैशन पूरा किया, आती गरमी में मेरी शादी करा दी गई. अब गायबकरियों या भेड़ों से राय तो ली नहीं जाती है, सो मुझ से पूछने का तो कोई औचित्य ही नहीं था. सुन रही थी बड़ा ही भरापूरा परिवार है. पति का बहुत बड़ा कारोबार है. काफी संपन्न लोग हैं. रोका की रस्म के वक्त एक बड़े भारी जरीदार दुपट्टे से लंबा घूंघट कर एक वजनी सतलड़ा हार को गले में डाल दिया गया. इसी पगहे को पकड़ मायके के खूंटे से खोल ससुराल के खूंटे में बांध दी गई.

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यों कहा जाए कि एक जेल से दूसरे जेल में शिफ्ंिटग हो गई. मायके में भी सिर झुका जमीन ताकती ही चलती थी, यहां भी घूंघट से बस उतनी ही धरती दिखती थी जहां अगला पग रखना होता था. सुना था आसमान का रंग नीला होता है पर मैं ने तो आज तक कभी देखा ही नहीं था.

नए परिवार में सामंजस्य बैठाने में कोई खास समस्या नहीं आई क्योंकि बचपन से बस यही तो सिखाया गया था कि जब शादी हो, अपने घर जाऊंगी तो कैसे तालमेल बैठाना है. बस, एक बात खटकती थी, घर के पुरुषों की नीयत. मुझे हर वक्त लगता जैसे आज भी मायके की उन्हीं गलियों से कालेज जा रही हूं. हर वक्त देवर का स्पर्श गलत जगह हो जाना अनायास तो नहीं था. मानसिक रूप से अविकसित कुंआरे जेठ की लोलुपता से बचना दिनोंदिन दूभर हो रहा था. फिर सास का बारबार मुझे गाहेबगाहे बिना मतलब जेठजी के पास भेजना, अब मुझे खटकने लगा था. घर में हर वक्त लगता मैं किसी दोधारी तलवार पर चल रही थी. आज बच भी गई तो जाने कल क्या होगा.

मेरे पति का घर में बड़ा रोब था. उन के आते सब पलकपांवड़े बिछा शालीनता की प्रतिमूर्ति बन जाते. पर उन के रोब तले मेरा दम घुटता था. हमारा आपसी संबंध मित्रवत न हो कर दासी और मालिक का होता था.

मैं ने कई बार बताना चाहा कि आज देवर की दृष्टता सीमा लांघ गई या सास ने उसी वक्त मुझे जेठ के पास जाने को मजबूर किया जब वे नहा रहे थे. पर मेरे अतिसफल समृद्घ कारोबारी पति के लिए ये सारी बातें मेरी कपोलकल्पना थीं. मैं हर दिन उन गंदी कामुक निगाहों से दोचार होती, बचतीबचाती एकएक दिन काटती. इतने सफल, समृद्ध पति के होते हुए भी मुझे पुरसुकून मयस्सर नहीं था.

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उन दिनों 2 बातें हुई, एक अच्छी और एक बुरी. मैं मां बनने वाली हूं, यह मेरे लिए एक बड़ी खुशी की बात थी. नन्हे की आहट ने मुझे फिर से उसी बल से समृद्ध कर दिया जो मुझे कालेज जाते वक्त उस अनजान हमसाए से मिलती थी. एक नवीन ऊर्जा और बल से संचारित मैं, अनचाहे स्पर्शों को झटकने और कामुक नजरों को आंखें दिखाने का साहस करने लगी. मेरे बदलते अंदाज जाने किनकिन लांछनों के साथ नमकमिर्च छिड़क मेरे पति को परोसे जाने लगे. पति नाम का वह महान, बलशाली व्यक्तित्व न पहले मेरा था, न अब. उस के समक्ष मेरी हैसियत तुच्छ थी.

दूसरी बुरी बात यह हुई कि मेरे मायके में विभिन्न कारणों से द्वेष और कलह की अग्नि भड़क गई. उस की आंच से मैं भी अछूती नहीं रह पाई. यह उन दिनों की बात थी, जब मेरे बेटे के जन्म को अभी 2 महीने ही हुए थे और उस दिन मैं खुद को एक अर्धविकसित मानसिक पुरुष के पाश्विक पंजों से आजाद नहीं कर पाई थी.

पर गोद के बालक के बल से संचारित ऊर्जावान मैं ने इस बात पर बहुत कुहराम मचाया. मूक गुडि़या की जबान उस दिन देख सभी चकित थे. दुख इसी बात का था कि मेरे भगवान, मेरे देव, मेरे पतिदेव ने एक रहस्यमय चुप्पी लगा ली थी.

इस बीच, मायके में रिश्तों के बीच घमासान हुआ और आग लग गई मेरी गृहस्थी में. ताऊ के बेटे ने मेरे पति के जाने क्या कान भरे कि बीच आंगन में मेरे बेटे की वैधता को फिर उस के नाम से कलंकित किया गया, उसी के नाम से जिसे 2 सालों से देखा भी नहीं था.

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सीता, अहल्या के बाद अब मेरी बारी थी. गृह निष्कासन की सजा सुनाई गई थी. आज फिर इज्जत की चीथड़ों में लिपटी मैं जीवन के मुहाने पर खड़ी थी कि वह दिख गया. अपने आंसुओं को तो मैं ने जज्ब कर लिया पर उसी वक्त कुदरत मूसलाधार बारिश के रूप में बिलख पड़ी. दीवार की ओट में बेटे को गोद में लिए बारिश से बचने का प्रयास विफल साबित हो रहा था कि अचानक भीगना बंद हो गया. दरअसल, वह छतरी थामे, खुद भीगता, मुझे बचा रहा था. उस के एहसानों की बारिश तले मैं सुकूनमंद हो, नयनों से मोती लुटाने लगी.

सोशल मीडिया Etiquette का पालन करें कुछ इस तरह

सोशल मीडिया की भूमिका और महत्व को आज शायद ही कम करके आंका या अनदेखा किया जा सकता है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि हर कोई सोशल मीडिआ प्लेटफार्म के ज़रिये अपनी बहुत अच्छी इमेज सामने रखना चाहता है और इमेज कॉन्शीयसनेस के दौर में हर कोई इस बात का भी ध्यान रखना चाहता है की वो किस तरह खुद के ओपिनियन सोशल मीडिया के ज़रिये रखते हैं और या फिर खुद को प्रेजेंट करते हैं. आये दिन हमें ऐसे भी किस्से देखने को मिलते हैं जब किसी पुरुष द्वारा सोशल मीडिया पर किसी महिला फ्रेंड की लुक्स या फिर व्यक्तित्व पर जाने अनजाने में की गयी टिप्पड़ी या तो किसी अप्रिय घटनाक्रम और या फिर अलग ही प्रतिस्पर्धा को पैदा कर देती हैं और या फिर एक विचित्र स्थिति उत्पन्न कर देते हैं.

सावधानियाऔर एटिकेट्स का ध्यान

इसके अतिरिक्त कई और ऐसी सावधानिया हैं और एटिकेट्स हैं जिनका ध्यान हमें रख कर कई बार हम अपने सोशल मीडिया पर किए गए व्यवहार और तालमेल से भी अपनी छवि खराब कर लेते हैं. हम जो भी छवि अपनी बनाते हैं, उसका असर हमारे आत्मसम्मान पर भी पड़ता है. सोशल मीडिया खासकर जेंडर बुलिंग पर धमकाना आज के दौर में आम बात हो गई है और सोशल मीडिया पर व्यक्त भावनाओं का मजाक सिर्फ इमोजी के जरिए ही उड़ाया जा सकता है. सोशल मीडिया पर की गयी शरारते, अनुचित व्यवहार, अवांछित टैगिंग, कमेंट्स, हैकिंग आदि के मामले भी सामने आ रहे हैं, जेंडर बुलिंग एक ऐसी समस्या है जो एक महिला के लिए ही नहीं बल्कि पुरुषों के लिए भी परेशान करने वाली है.

इसलिए कुछ सोशल मीडिया शिष्टाचार का पालन करके अपने आप को व्यक्त करना बहुत महत्वपूर्ण है जिसे हर आदमी को सोशल मीडिया पर पालन करना चाहिए, मूल बातें सभी को पता हैं, फिर भी कई पुरुष उनका पालन नहीं करते हैं और अनजाने में उन्हें अनदेखा कर देते हैं.

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सोशल मीडिया शिष्टाचार –

श्री विमल और प्रीति डागा से – प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ और युवा कोच ऐसे ही महत्वपूर्ण टिप्स आपसे शेयर कर रहे हैं- जो सोशल मीडिया पर आपके छवि को निखारने में आपकी मदद करेंगे.

खास टिप्स

सोशल मीडिया पर महिलाओं के पर्सनल स्पेस का सम्मान करें, यह जरूरी नहीं है कि अगर किसी महिला ने आपकी फ्रेंड रिक्वेस्ट को स्वीकार कर लिया है, तो आप किसी भी समय और समय पर उन्हें मैसेज करना शुरू कर दें, या उन्हें स्टॉक करना शुरू कर दें. गोपनीयता के उल्लंघन से बचें.

यदि आपको भेजे गए संदेश का कोई उत्तर नहीं मिलता है, तो आप संदेश की प्रतीक्षा करें और फिर दुबारा से संदेश न भेजें, थोड़े को बहुत समझे और वहा से खुद का ध्यान हटा दें.

किसी को भी कॉल करने या मीटिंग के लिए समय का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी होता है , और सोशल मीडिआ पर भी यह रूल अप्लाई होता है , समय का ध्यान रखें, जहा तक मुमकीन हो देर रात तक फेसबुक कॉल आदि न करें. हां यदि आपका सोशल मीडिया फ्रेंड बहुत खास है या आपका सम्बन्ध बहुत अटूट है वहा यह नियम अप्प्लाई नहीं होता है. कहा जाता है कि इज्जत दोगे तो इज्जत मिलेगी, सोशल मीडिया पर भी वैसा ही व्यवहार करो.

आपका लहजा न केवल फोन पर, बल्कि आपकी भाषा से भी पता चलता है, चाहे वह ट्विटर हो या फेसबुक अपनी भाषा और शब्दों के साथ विनम्र और चयनात्मक रहें.

अपनी प्रोफाइल पिक्चर को ओरिजिनल ही रखें, और अपनी जानकारी भी ओरिजिनल के रूप में दर्ज करें, कई बार पुरुष अपनी प्रोफाइल पिक्स पोस्ट करने के बजाय बॉलीवुड स्टार्स या उनकी पसंदीदा हस्तियों की तस्वीरें लगाते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि आप अपने बारे में सब कुछ वैसे ही साझा करें जैसे वह है, लेकिन वास्तविक बनें और अपने बारे में सही जानकारी दर्ज करें.

किसी के साथ जहा तक हो सोशल मीडिआ पर सार्वजनिक टूर पर चैट न करें, चाहे वह पेशेवर हो या व्यक्तिगत, सार्वजनिक.

जब तक आप नहीं जानते, आपको अनावश्यक संदेश भेजने और टिप्पणियों को इंडेंट करने से बचना चाहिए, या सिर्फ इसलिए कि आपके संदेश का उत्तर नहीं दिया गया था, खराब टिप्पणी नहीं करनी चाहिए.

किसी को टैग करने से पहले सोचें, हो सकता है कि कई लोग आपको सीधे तौर पर बाधित न करें लेकिन टैग किया जाना हर किसी को पसंद नहीं होता है, बेहतर है की टैगिंग से पहले आप मैसेज कर के टैग करने की परमिशन ले लें.

जहां तक संभव हो, शराब पीते समय अपनी बहुत सारी व्यक्तिगत तस्वीरें, पार्टी की तस्वीरें और अपनी तस्वीरें पोस्ट करने से बचें.

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जहां तक संभव हो सोशल मीडिया पर वाद-विवाद से बचें, आप अपने विचार रख सकते हैं लेकिन जानबूझ कर किसी से वाद-विवाद में न पड़ें, जरूरी नहीं कि आप उनसे हर विवाद को जीत लें, भले ही वाद-विवाद का मंच किसी के साथ आ जाए, तो पूरी शालीनता से अपनी बात और दूसरे व्यक्ति की बात के साथ तर्क से बाहर निकलें और अपनी बात समझाएं और उसका सम्मान करें.

अपनी भाषा के साथ-साथ सोशल मीडिया पर अपने व्याकरण का ध्यान रखें, हमेशा वर्तनी और व्याकरण की जांच करें.

अगर कोई आपकी पोस्ट पर टिप्पणी या ट्वीट करता है, तो बातचीत शुरू करने के लिए धन्यवाद कहना न भूलें, सोशल मीडिया पर किसी को भी नजरअंदाज करना पसंद नहीं है.

कुछ लोग सोशल मीडिया पर बहुत लंबे कमेंट करते हैं या लंबी पोस्ट डालते हैं, उन्हें भी ऐसी लंबी पोस्ट या कमेंट पढ़ना पसंद नहीं है, कोशिश करें कि आपकी पोस्ट सटीक हो और आप कम समय में अपनी बात कह सकें.

Valentine’s Special: प्यार जताना भी है जरूरी

पतिपत्नी के नाजुक रिश्ते की डोर प्यार से बंधी होती है. वैवाहिक जीवन खुशीखुशी बीते, इस के लिए प्यार का इजहार बेहद जरूरी है. आपसी रिश्ते में गरमाहट बनी रहे, इस के लिए पतिपत्नी को एकदूसरे के सामने प्यार को जताते रहना चाहिए. वरिष्ठ पत्रकार विवेक सक्सैना ने लव मैरिज की है. वे अपनी पत्नी से बेहद प्यार करते हैं. अकसर वे शाम को अपनी पत्नी को लेने औफिस जाते हैं. महीने में 2-3 बार उन्हें शौपिंग के अलावा रेस्तरां में खाना खिलाने भी ले जाते हैं. नेपाल के पूर्व गृहमंत्री एवं सांसद खड़का ने दूसरी जाति में 26 साल पहले लव मैरिज की. जब भी उन्हें लगता है कि बहुत दिन हो गए हैं अपनी पत्नी से प्यार जताए, तो वे उन्हें न सिर्फ बेशकीमती तोहफा देते हैं, बल्कि दोनों नेपाल से 10-15 दिनों के लिए बाहर चले जाते हैं. उन का रोमांटिक पल दोनों को बेहद करीब लाता है.

यौवन को रखें जीवंत

प्यार जताने में उम्र कभी भी बाधक नहीं होती. अगर आप की उम्र ज्यादा लग रही हो, तो ब्यूटी पार्लर, योगाभ्यास को अपनाएं. थोड़े से प्रयास से आप युवा दिख सकती हैं. आत्मविश्वास से भरे कदम, पहननेओढ़ने का सलीका, बातव्यवहार का कशिश भरा अंदाज आप दोनों के आकर्षण को ही नहीं दर्शाता, बल्कि एकदूसरे के प्रति प्यार को भी जताता है. बस, दिनचर्या के रूटीन को झटकें और प्रेम में सराबोर हो जाएं. नए लुक को देख कर पति महोदय आप की मुसकराहट से आप के नैनों की शरारती भाषा को समझ कर प्यार जताना नहीं भूलेंगे.

प्यार भरा स्पर्श

जब भी आप के साथी को लगे कि आपस में प्यार के मिठास की चाशनी कम हो रही है, नीरसता आहिस्ताआहिस्ता कदम बढ़ा रही है, तो बहुत जरूरी होता है प्यार को सलीके से जताना. एकदूसरे को प्यार भरा स्पर्श करें, बांहों में भर कर आहिस्ताआहिस्ता सहलाएं, आलिंगन में कस लें, केशों को उंगलियों से सहलाएं, प्यार भरे चुंबन लें. आप का यह सौफ्ट प्यार जताना उन के दिल को छू लेगा. प्यार को महसूस कराने का एक तरीका यह भी है कि आप का चेहरा हमेशा खिलाखिला रहे. होंठों पर मुसकराहट हो. आप चाहे हाउसवाइफ हों या कामकाजी महिला, आप के कपड़ों, हाथों से प्याजलहसुन, मसाले की गंध न आए. औफिस से पति के आने पर सजसंवर कर प्यार भरे अंदाज में उन्हें मिलें.

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भेजें संदेश भी

ईमेल पर अपना प्यार भरा संदेश कभीकभी जरूर भेजें. एस.एम.एस. में ‘आई लव यू’, ‘विदाउट यू आई एम नथिंग’, ‘यू आर माई हार्ट बीट’ आदि रोमांटिक शब्दों से उन्हें प्यार का एहसास कराएं. उन्हें फोन कर के रेस्तरां, तो कभी पार्क, तो कभी पिक्चर हाल पर बुलाएं. ग्रीटिंग कार्ड में ‘मिसिंग यू’, ‘कम सून’, ‘लव यू’ लिख कर कार्ड पति महोदय के औफिस के बैग में रख दें. बैडरूम, ड्राइंगरूम, ड्रैसिंग टेबल पर ग्रीटिंग कार्ड ऐसे रखें कि उन की निगाह जरूर पड़े. आप का प्यार जताना उन्हें जरूर भाएगा.

पति की पसंद का ध्यान रखें

कहावत है कि पुरुषों के दिल तक पहुंचने का रास्ता पेट से हो कर ही जाता है. उन की मनपसंद डिश बनाएं, उन्हें प्यार से खिलाएं. कई बार फोन पर ही पूछ लें कि खाने में क्या बनाना है. उन्हें अच्छा लगेगा कि आप उन्हें कितना चाहती हैं और उन की पसंदनापसंद का ध्यान रखती हैं. हाईकोर्ट के सीनियर ऐडवोकेट आर.एम. तुफैल का मानना है कि पतिपत्नी को आपसी संबंधों में मजबूती के लिए एकदूसरे से प्यार का इजहार बारबार करते रहना चाहिए. वरना कभीकभी जीवन ऐसे मोड़ पर आ जाता है जहां दोनों एकदूसरे के प्रति निराश ही नहीं हो जाते, बल्कि प्यार के अभाव में लड़ाईझगड़े भी होने लगते हैं. डिप्रैशन के चलते तलाक तक की भी नौबत आ जाती है.

आलिंगन एवं चुंबन

प्यार जताने का यह सशक्त माध्यम है. भागमभाग भरी जिंदगी में कुछ पल अपने लिए निकालने चाहिए. औफिस जाते वक्त, बैडरूम या स्टडीरूम में जैसे ही वे आएं उन के होंठों पर चुंबन कर प्यार से सराबोर कर दें. उन्हें अपने नजदीक होने का एहसास कराएं. आप का यह रूप उन के अंदर नई ऊर्जा भर देगा.

खास होने का एहसास कराएं

एकदूसरे के चेहरे को पतिपत्नी बखूबी पढ़ लेते हैं. औफिस से आने पर पति को परेशान देख कर उन के साथ प्यार जताएं. उन के हाथों को अपने हाथों में ले कर उन की काबिलीयत की तारीफ करें. उन की बातें प्यार से सुनें. उन के आराम पर ध्यान दें. परेशानी को दूर करने व उन का मूड बदलने के लिए उन्हें रोमांटिक एहसास कराएं. अंतरंग पलों में ले जाएं. उन की परेशानी भी दूर होगी, साथ ही उन्हें प्यार का वह क्षण नया भी लगेगा.

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फूलों से करें स्वागत

प्यार का प्रतीक फूल भी हैं, जो आप के अंदर मस्ती और जोश को भर देते हैं. नईनई शादी के बाद औफिस से फोन करना, फूलों का गजरा लाना, जैसी छोटीछोटी चीजों को कतई नजरअंदाज न करें. कभीकभी पत्नी को चाय की प्याली के साथ लाल गुलाब दे कर ‘आई लव यू’ कहें. तकिए के पास फूलों की पंखुडि़यां बिखेर दें. बैडरूम में फूलों का गुलदस्ता रख कर कमरे में रोमैंटिक एहसास लाएं. अपने प्यार का इजहार कुछ अलग अंदाज में करें.

यौन इच्छाएं जाग्रत रखें

पतिपत्नी एकदूसरे की यौन इच्छाओं के प्रति स्नेहपूर्ण बर्ताव रखें. एकदूसरे को संतुष्ट रखें. आंखों से, मुसकरा कर अपनी भावनाओं को व्यक्त करें. बौद्धिक ही नहीं, बल्कि शारीरिक और मानसिक संतुष्टि के लिए प्यार को बरकरार रखें. इसे कह कर जताएं.

उन्हें महक से करें मदहोश

अच्छी खुशबू वाला परफ्यूम लगाएं. खुशबू से वे आप तक खिंचे चले आएंगे. उन्हें भी अच्छी क्वालिटी का डियो या परफ्यूम दें.

एकदूसरे को उपहार दें

साथ रहते हुए एकदूसरे की पसंदनापसंद का पता लग ही जाता है. उन का मनपसंद गिफ्ट दे कर प्यार को जताएं.  

करें कुछ नया

आप दोनों एकदूसरे को चाहे बेहद प्यार क्यों न करते हों फिर भी कभीकभी ‘आई एम योर्स’, ‘प्लीज लव मी’, ‘हग मी’, ‘किस मी’ जैसे प्यार भरे शब्दों को कह कर अपने प्यार की गहराई को महसूस कराएं.

यदि पति कुछ दिनों के लिए बाहर जा रहे हैं, तो उन्हें प्यारा सा कार्ड अवश्य दें.

घर में आतेजाते एकदूसरे को हलका स्पर्श करें, अपने चुलबुलेपन और शरारती प्यार को उन्हें दिखलाएं.

उन के बालों में कलर करें. उन का फेशियल करें, उन्हें खुद कभीकभी नहलाएं.

छुट्टी के दिन दोनों ही एकदूसरे की पसंदनापसंद हर इच्छा को पूरा करने को तैयार रहें.

मनपसंद ड्रैस पहनें और छुट्टी के दिन का प्लान उन के मुताबिक करें.

पत्नी के लिए समय पर पहुंचें, चाहे वह घर पर हो या बाहर.

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Valentine’s Special: फैशन के मामले में ‘काव्या’ को टक्कर देती हैं ‘मालविका’, देखें फोटोज

सीरियल अनुपमा (Anupama) में इन दिनों मालविका (Aneri Vajani) और वनराज (Sudhanshu Panday) की दोस्ती से अनुज नाराज नजर आ रहा है. वहीं अनुपमा (Rupali Ganguly) पूरी कोशिश कर रही है कि मालविका को वनराज के जाल से निकाल सके. हालांकि मालविका के सिर पर वनराज के प्यार का भूत चढ़ा हुआ है. लेकिन आज हम सीरियल में किसी आने वाले ट्विस्ट की नहीं बल्कि मालविका के रोल में नजर आने वाली एक्ट्रेस अनेरी वजानी के फैशन (Aneri Vajani Fashion) की बात करें. अनेरी वजानी कई पौपुलर टीवी सीरियल्स में नजर आ चुकी हैं, जिसमें वह एक से बढ़कर एक लुक में फैंस का दिल जीत चुकी हैं. इसी के चलते आज हम आपको वैलेंटाइन डे (Valentine’s Day) के लिए अनेरी वजानी के इंडियन से लेकर वेस्टर्न कलेक्शन (Indian to Western)की झलक दिखाएंगे….

साड़ी में ढाती हैं कहर

 

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सीरियल अनुपमा में हाल ही के एपिसोड में मालविका यानी अनेरी साड़ी लुक में नजर आईं थी, जिसकी फोटोज उन्होंने सोशलमीडिया पर शेयर की थीं. वहीं फैंस ने उनके इस लुक की काफी तारीफें की थी. लुक की बात करें तो पर्पल कलर की प्लेन साड़ी किसी कैजुअल पार्टी में जाने के लिए अच्छा औप्शन है. वहीं अगर आप शादीशुदा हैं और वेलेंटाइन डे के मौके पर पति के साथ इंडियन लुक ट्राय करना चाहती हैं तो ये औप्शन परफेक्ट रहेगा.

 

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वेस्टर्न लुक में लगती हैं खूबसूरत

 

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एक्ट्रेस अनेरी वजानी को ट्रैवलिंग काफी शौक है, जिसका अंदाजा उनके सोशलमीडिया पेज को देखकर लगाया जा सकता है. वहीं ट्रैवलिंग में वह एक से बढ़कर एक लुक में नजर आती है, जिनमें शर्ट ड्रैसेस का कलेक्शन बेहद खास होता है.

 

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ड्रैसेस भी हैं खास

 

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अनेरी वजानी के वेस्टर्न लुक में ड्रैसेस की बात करें तो वह एक से बढ़कर एक ड्रैसेस ट्राय करती हैं, जिसमें फ्लोरल से लेकर स्लिम फिट ड्रैसेस शामिल हैं. इन लुक्स में वह बेहद खूबसूरत लगती हैं.

 

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डैनिम भी कर सकती हैं ट्राय

 

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ड्रैसेस के अलावा अनेरी वजानी के पास डैनिम जींस और ड्रैसेस का फी अच्छा कलेक्शन मौजूद हैं, जिन्हें वह फैंस के साथ शेयर करना नहीं भूलती हैं. वहीं फैंस भी वेलेंटाइन डे हो या आउटिंग. हर मौके पर अनेरी वजानी के इंडियन व वेस्टर्न कलेक्शन को ट्राय कर सकती हैं.

मेरी मंगेत्तर ने किसी और से शादी कर ली, मैं क्या करुं?

सवाल

मैं 28 साल का हूं. जिस लड़की से मेरी शादी तय हुई थी, वह 6 महीने तक मेरे संपर्क में रही और मेरे साथ सोई भी. मुझ से पहले उस की शादी कहीं और तय हुई थी, पर दहेज के चलते टूट गई थी. लड़की चोरीछिपे उस लड़के के संपर्क में भी रही और उसे चचेरी बहन का मंगेतर बताती रही. वह यह भी कहती थी कि उस का अंग खराब है. मगर आखिरकार उस ने उसी लड़के से शादी कर ली. मैं उसे बहुत प्यार करता हूं. अब मैं क्या करूं?

जवाब

वह लड़की हमबिस्तरी की काफी शौकीन है. अच्छा हुआ, जो आप बच गए. उस ने आप को चखा और शायद उस लड़के को भी. आखिर में उसे बेहतर पा कर उस से शादी कर ली. आप झूठी और कामुक लड़की के जाल से बच गए, लिहाजा, उस का फरेब वाला प्यार भी भूल जाएं.

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अगर पत्नी पसंद न हो तो आज के जमाने में उस से छुटकारा पाना आसान नहीं है. क्योंकि दुनिया इतनी तरक्की कर चुकी है कि आज पत्नी को आसानी से तलाक भी नहीं दिया जा सकता. अगर आप सोच रहे हैं कि हत्या कर के छुटाकारा पाया जा सकता है तो हत्या करना तो आसान है, लेकिन लाश को ठिकाने लगाना आसान नहीं है. इस के बावजूद दुनिया में ऐसे मर्दों की कमी नहीं है, जो पत्नी को मार कर उस की लाश को आसानी से ठिकाने लगा देते हैं. ऐसे भी लोग हैं जो जरूरत पड़ने पर तलाक दे कर भी पत्नी से छुटकारा पा लेते हैं. लेकिन यह सब वही लोग करते हैं, जो हिम्मत वाले होते हैं. हिम्मत वाला तो पुष्पक भी था, लेकिन उस के लिए समस्या यह थी कि पारिवारिक और भावनात्मक लगाव की वजह से वह पत्नी को तलाक नहीं देना चाहता था. पुष्पक सरकारी बैंक में कैशियर था. उस ने स्वाति के साथ वैवाहिक जीवन के 10 साल गुजारे थे. अगर मालिनी उस की धड़कनों में न समा गई होती तो शायद बाकी का जीवन भी वह स्वाति के ही साथ बिता देता.

उसे स्वाति से कोई शिकायत भी नहीं थी. उस ने उस के साथ दांपत्य के जो 10 साल बिताए थे, उन्हें भुलाना भी उस के लिए आसान नहीं था. लेकिन इधर स्वाति में कई ऐसी खामियां नजर आने लगी थीं, जिन से पुष्पक बेचैन रहने लगा था. जब किसी मर्द को पत्नी में खामियां नजर आने लगती हैं तो वह उस से छुटकारा पाने की तरकीबें सोचने लगता है. इस के बाद उसे दूसरी औरतों में खूबियां ही खूबियां नजर आने लगती हैं. पुष्पक भी अब इस स्थिति में पहुंच गया था. उसे जो वेतन मिलता था, उस में वह स्वाति के साथ आराम से जीवन बिता रहा था, लेकिन जब से मालिनी उस के जीवन में आई, तब से उस के खर्च अनायास बढ़ गए थे. इसी वजह से वह पैसों के लिए परेशान रहने लगा था. उसे मिलने वाले वेतन से 2 औरतों के खर्च पूरे नहीं हो सकते थे. यही वजह थी कि वह दोनों में से किसी एक से छुटकारा पाना चाहता था. जब उस ने मालिनी से छुटकारा पाने के बारे में सोचा तो उसे लगा कि वह उसे जीवन के एक नए आनंद से परिचय करा कर यह सिद्ध कर रही है. जबकि स्वाति में वह बात नहीं है, वह हमेशा ऐसा बर्ताव करती है जैसे वह बहुत बड़े अभाव में जी रही है. लेकिन उसे वह वादा याद आ गया, जो उस ने उस के बाप से किया था कि वह जीवन की अंतिम सांसों तक उसे जान से भी ज्यादा प्यार करता रहेगा.

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अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

सौत से सहेली: भाग 2- क्या शिखा अपनी गृहस्थी बचा पाई

लेखिका-दिव्या साहनी

उस दिन नीरजा ने छोलेभूठूरे बनाने की तैयारी करी हुई थी. चोट लगने से पहले छोले उस ने तैयार कर लिए थे. अब भठूरे बनाने की जिम्मेदारी शिखा के ऊपर आ पड़ी.

‘‘मैं ने अपनी मम्मी के साथ मिल कर ही हमेशा भठूरे बनवाए हैं. पता नहीं आज अकेले बनाऊंगी, तो कैसे बनेंगे,’’ शिखा का आत्मविश्वास डगमगा गया था.

अंजु आई ही आई, पर साथ में उस के दोनों बच्चे व पति भी लंच करने आ गए. अंजु ने एक बार शिखा को भठूरे बेलने व तलने की विधि ढंग से समझा दी और फिर किचन से गायब हो गई.

सब को छोलेभठूरों का लंच करातेकराते शिखा बहुत थक गई. राजीव को जब मौका मिलता रसोई में आ कर उस का हौसला बढ़ा जाता. जरूरत से ज्यादा थक जाने के कारण शिखा खुद अपने बनाए भठूरों का स्वाद पेटभर कर नहीं उठा सकी.

सदा बनसंवर कर रहने वाली शिखा ने अपने घर में कभी इतना ज्यादा काम नहीं किया था. उस दिन नीरजा के यहां इतना ज्यादा काम करने का उसे कोई मलाल नहीं था क्योंकि उस ने नीरजा की आंखों में अपने लिए ‘धन्यवाद’ के और राजीव की आंखों में गहरे ‘प्रेम’ के भाव बारबार पढ़े थे.

‘‘अगर नीरजा रात को रुकने के लिए कहे, तो रुक जाना. उस की अच्छी दोस्त बन जाओगी, तो हमें मिलने और मौजमस्ती करने के ज्यादा मौके मिला करेंगे,’’ राजीव की इस सलाहको शिखा ने फौरन मान लिया.

शाम को नीरजा की शह पर चारों छोटे बच्चों ने अपनी शिखा आंटी के साथ आइसक्रीम खाने जाने की रट लगा दी.

शिखा अपनी थकावट व दर्द को भुला कर उन के साथ बाजार गई. बच्चों को आइसक्रीम खिलाने के बाद उस ने घर में बचे बड़े लोगों के लिए ‘ब्रिक’ भी खरीदी. करीब 6 सौ रुपए का खर्चा कर वह घर लौट आईर्.

उस के घर में कदम रखते ही नीरज ने उसे सूचित किया, ‘‘मैं ने तुम्हारी मम्मी से फोन पर बात कर के उन की इजाजत ले ली है, शिखा.’’

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‘‘किसलिए?’’ शिखा ने चौंक कर पूछा.

‘‘तुम्हारे कुछ दिनों के लिए यहां रुकने को. उन्हें कोई एतराज नहीं है. बस, अब तुम इनकार न करना, प्लीज. तुम्हारी हैल्प के बिना तो हम सब बहुत परेशान हो जाएंगे.’’

सोनू, मोनू और अंजु के दोनों बच्चों ने फौरन ‘‘शिखा आंटी, रुक जाओ’’ का नारा बारबार लगाते हुए इतना ज्यादा शोर मचाया कि शिखा को फौरन ‘हां’ कहनी पड़ी.

राजीव के साथ शाम को शिखा अपने घर कुछ जरूरी सामान और कपड़े लाने गई. लौटते हुए उन्होंने कौफी पी. दोनों कुछ दिन एक ही छत के नीचे गुजारने की संभावना के बारे में सोच कर काफी खुश नजर आ रहे थे.

लौटते हुए दोनों ने बाजार से सप्ताहभर

के लिए सब्जी खरीदी. इस काम को करने

की याद नीरजा ने ही शिखा को फोन कर के दिलाई थी.

शिखा ने बड़े जोश के साथ सब के लिए पुलाव बनाया. कुछ होमवर्क करने में सोनू की सहायता भी खुशीखुशी करी. उस के सोने का इंतजाम गैस्टरूम में हुआ था. रात को राजीव से गैस्टरूम के एकांत में मुलाकात हुई, तो क्या होगा? इस सवाल के मन में उभरते ही शिखा के मन में अजीब सी गुदगुदी पैदा हो जाती थी.

सोनू और मोनू शिखा आंटी के जबरदस्त फैन बन गए थे. उन्होंने सोने से पहले उस से

2 कहानियां सुनीं. शिखा को अंगरेजी फिल्में देखने का शौक था. उस ने बैंक डकैती, मारधाड़ और कुछ अन्य सनसनीखेज घटनाओं को जोड़ कर जो कहानी सोनू, मोनू को सुनाई वह दोनों बच्चों को पसंद तो काफी आई पर साथ ही साथ उन्हें डर भी लगा.

इस का नतीजा यह हुआ कि दोनों रातभर अपनी शिखा आंटी से लिपट कर सोए. नींद में डूबने से पहले बेहद थकी शिखा ने राजीव के गैस्टरूम में आने का इंतजार किया, पर उस से मुलाकात किए बिना ही वह सो गई थी.

नीरजा को दर्द के कारण नींद नहीं आ रही थी. राजीव को उस के पास बैठना

पड़ा. चाह कर भी वह शिखा के साथ कुछ

समय नहीं गुजार सका. उसे भी नींद ने एक बार दबोचा तो नीरजा के जगाने पर ही नींद सुबह

6 बजे खुली.

शिखा को भी नीरजा ने ही उस के मोबाइल की घंटी बजा कर 6 बजे उठा दिया.

‘‘मेरी प्यारी बहन, सोनू और मोनू को

स्कूल भेजना है. उन्हें जरा सख्ती से उठाओ… नाश्ते में ब्रैडबटर ही दे देना. राजीव दूध लेने

जा रहे हैं. दोनों की यूनीफौर्म यहां मेरे कमरे में

है. उन्हें भेजने के बाद हम दोनों साथसाथ

तसल्ली से चाय पीएंगे, माई डियर,’’ शिखा को

ये सब हिदायतें देते हुए नीरजा की आवाज में इतनी मिठास और अपनापन था कि शिखा ने बड़े जोश के साथ मुसकराते हुए पलंग छोड़ा था.

वक्त के साथ रेस लगाते हुए शिखा ने बड़ी कठिनाई से ही सोनू और मोनू को

स्कूल भेजा. कई बार उन की लापरवाही से तंग आ कर उस ने उन्हें डांटा भी, पर दोनों डांट सुन कर बेशर्मी से हंस पड़ते थे.

नीरजा ने बाद में उस के साथ चाय पीते हुए उस की भूरिभूरि प्रशंसा करी, ‘‘तुम बड़ी कुशल गृहिणी बनोगी किसी दिन, शिखा. बच्चों का दिल जीतने की कला आती है तुम्हें.’’

नीरजा का व्यवहार शिखा के प्रति बहुत दोस्ताना और प्रेमपूर्ण था. उसे अपने पास बैठा कर नीरजा उस का प्यार से हाथ पकड़ लेती. शिखा की प्रशंसा करते हुए उस का चेहरा फूल सा खिल जाता. कभीकभी आभार प्रकट करते हुए नीरजा की आंखें डबडबा उठतीं, तो शिखा भी भावुक हो जाती. ऐसे क्षणों में शिखा को नीरजा के बहुत करीब होने का एहसास होता. फिर उसे राजीव का खयाल आता. उस के साथ अपने अवैध प्रेम संबंध का ध्यान आते ही वह अजीब सा खिंचाव महसूस करते हुए इन कोमल भावों को दबा लेती थी.

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शिखा ने नीरजा के घर की लगभग सभी जिम्मेदारियों को संभाल लिया था. शाम को वह राजीव के साथ ही घर लौटती. दोनों का दिल तो करता था कि कुछ देर किसी पार्क या रेस्तरां में साथसाथ बैठें, पर नीरजा की ‘हैल्प’ के लिए फोन शिखा को लंच के बाद से ही मिलने लगते थे.

ऐसी ही भागमभाग में पहला हफ्ता कब निकल गया, शिखा को पता ही नहीं चला. रविवार फिर से आ गया और उस दिन सुबह उठने को उस का मन ही नहीं किया. शिखा को न अपने शरीर में भागदौड़ करने की जान महसूस हो रही थी और मन में भी अजीब सी खीज का एहसास छाया हुआ था.

अपनी आदत के अनुरूप रविवार सुबह देर तक सोना चाहती थी, पर कामवाली ने न आ कर ऐसी किसी भी संभावना का अंत कर दिया.

‘‘कल दोपहर में मैं ने कामवाली को डांट दिया था. वह कामचोर सफाई से काम जो नहीं कर रही थी. उस ने काम छोड़ दिया तो बड़ी गड़गड़ हो जाएगी, शिखा तुम प्लीज उसे किसी भी तरह से मना लाओ,’’ नीरजा ने उसे जब कामवाली को मना लाने की जिम्मेदारी सौंपी, तो एक बार को शिखा का रोमरोम गुस्से की आग में सुलग उठा.

कामवाली राधा से मिलाने के लिए सोनू

उसे पड़ोस में रहने वाली निर्मल आंटी के घर ले गया. उस से बातें करते हुए शिखा को बड़ा धैर्य रखना पड़ा क्योंकि वह काफी बदतमीजी से पेश आ रही थी.

‘‘सब से कम पैसा देती हैं नीरजा मैम और सब से ज्यादा डांटती और बेकार के नुक्स निकालती हैं. बिना पगार बढ़ाए मैं नहीं आऊंगी काम पर,’’ शिखा की कोई दलील सुने बिना राधा अपनी इस जिद पर अड़ी रही.

‘‘देख, जब तक नीरजा मैम का प्लस्तर कट नहीं जाता, तुम काम पर आती रहो. मैं उन से छिपा कर तुम्हें 2 सौ रुपए दूंगी?’’ इस समस्या का यही समाधन शिखा को समझ में आया.

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‘‘आप की खातिर मैं आ जाऊंगी, पर 5 सौ रुपए अलग से लूंगी,’’ राधा ने मौके का फायदा उठाते हुए अपनी शर्त बता दी.

‘‘2 सप्ताह के लिए 5 सौ रुपए. इतना लालच ठीक नहीं है, राधा,’’ शिखा गुस्सा हो उठी.

‘‘आप को 5 सौ रुपए ज्यादा लग रहे हैं, तो कोई बात नहीं. किसी दूसरी कामवाली को ढूंढ़ लो या खुद बरतन व सफाई कर लेना.’’

खुद बरतन व घर की सफाई की बात सोच कर ही शिखा की जान निकल गई. उस ने राधा को 5 सौ रुपए अपनी तरफ से देना स्वीकार किया और मन ही मन उसे गालियां देती सोनू के साथ घर लौट आई.

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अब जुड़वां बच्चे पाना हुआ आसान

कोलकाता की रहने वाली 32 साल की रिया की शादी हुए 7 साल बीत चुके थे,लेकिन बच्चा नहीं हुआ, सबकी ताने से अधिक, उसे ही अपने बच्चे की चाहत थी. उन्होंने हर जगह लेडी डॉक्टर से जांच करवाई, पर वजह कोई भी नहीं बता पाया, क्योंकि सबकुछ नार्मल था. उसकी इस हालत को देख, पति राजीव ने रिया से अनाथ आश्रम से किसी अनाथ बच्चे को गोद लेने की सलाह दी. इससे उसका ये तनाव दूर हो सकेगा, लेकिन रिया अपना बच्चा चाहती थी, ऐसे में रिया की सहेली ने आईवीऍफ़ यानि इन विट्रो फ़र्टिलाईजेशन से उन्हें अपना बच्चा पाने की सलाह दी. रिया ने अपने पति से इस बारें में चर्चा की और अगले एक साल में ही रिया और राजीव, जुड़वाँ बच्चे, एक बेटी और एक बेटे के पेरेंट्स बने. दोनों को अब ख़ुशी का ठिकाना न रहा.

सही उम्र में शादी न कर पाना

दरअसल आज की भागदौड़ की जिंदगी में खुद को स्टाब्लिश करने की कोशिश में लड़के और लड़कियां सभी की शादी की उम्र अधिक हो जाती है, ऐसे में शादी के बाद वे नार्मल तरीके से बच्चा पैदा करने में असमर्थ होते है. बच्चा न हो, तो भी जिंदगी वीरान लगने लगती है, पति-पत्नी दोनों सहजता महसूस नहीं करते,आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहता है,दोनों तनावग्रस्त होते है,इससे गर्भधारण में समस्या आने लगती है, बात काउंसलर तक पहुँचने के बाद उन्हें पता चलता है कि उनके बीच में एक बच्चे की कमी है, जिसे एडॉप्शन,असिस्टेड कन्सेप्शन या आईवीऍफ़ के द्वारा ही पूरा किया जा सकता है. इसके अलावा आईवीऍफ़ बेहद खर्चीला प्रोसेस है, इसलिए एक बार में ही दो बच्चे पा लेने को पेरेंट्स बेहतर मानते है और इसके लिए ही वे डॉक्टर के पास आते है. साथ ही देर से बच्चे होने की वजह से दोनों बच्चे एक ही समय में पल जाते है, जो पेरेंट्स के लिए भी आसान होती है.

एक इंटरव्यू में निर्माता, निर्देशक और एक्ट्रेस फरहा खान ने कहा था कि मेरी शादी 32 साल की उम्र में हुई है, जबकि शिरीष कुंदर 25 साल के थे. मैंने सोच लिया था कि मेरा प्राकृतिक रूप से इस उम्र में गर्भधारण करना आसान नहीं, इसलिए मैंने आइवीऍफ़ का सहारा लिया और शादी के 4 साल बाद तीन बच्चों, एक बेटा और दो बेटी की माँ बनी. मैंने और शिरीष ने उस पल को बहुत एन्जॉय किया था, जब हमें एक नहीं बल्कि तीन बच्चों के पेरेंट्स बनने का मौका मिला.

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मल्टीपल प्रेगनेंसी

इस बारें में मुंबई की कोकिलाबेन धीरूबाई अंबानी हॉस्पिटल की आईवीऍफ़ कंसल्टेंट डॉ. पल्लवी प्रियदर्शिनी कहती है कि आईवीऍफ़ या असिस्टेड कन्सेप्शन, गर्भधारण का ऐसा तरीका है, जिसमें प्रकृति की मदद की जाती है. कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि प्राकृतिक रूप से गर्भधारण से जुड़वा बच्चें कम पैदा होतेहै,जबकि आईवीएफ में मल्टिपल प्रेगनेंसी होने की संभावना अधिक होती है, लेकिन सिंगल एम्ब्रायो ट्रांसफर को विकास कर सिर्फ एक रेसल्टिंग एम्ब्रायो को स्थानांतरित करने की कोशिश की जा रही है,जिससे एक बच्चा पाना आसान हो सकेगा. इसके अलावा एक बार किसी को जुड़वाँ बच्चे होने पर, प्राकृतिक रूप से भी अगली जेनरेशन में जुड़वां बच्चे होने की संभावना अधिक होती है.साथ ही किसी परिवार में बिना आईवीऍफ़ के भी जुड़वां बच्चें होने की प्रवृत्ति होती है,तो प्राकृतिक रूप से भी जुड़वां गर्भधारण करने की संभावना थोड़ी बढ़ जाती है.

सही उम्र है जरुरी

इसके आगे डॉ. पल्लवी कहती है कि अधिकतर महिलाएं आईवीऍफ़ की सही उम्र के बारें में पूछती है. मेरे हिसाब से आईवीऍफ़ हर किसी के लिए नहीं होता,इसके लिए उम्र बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि एक महिला में खासतौर से 35 वर्ष की आयु के बाद, ओवेरियन रिज़र्व कम हो जाता है. साथ ही सफल प्रत्यारोपण की संभावना भी उम्र के साथ कम हो जाती है. 35 वर्ष से कम उम्र की महिला में सिंगलटन प्रेगनेंसी (एक गर्भधारण में एक बच्चा पैदा होना) की संभावना 38 से 40 प्रतिशत अधिक हो सकती है, लेकिन 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिला में गर्भधारण की संभावना 11प्रतिशत से भी कम हो सकती है.

है कुछ भ्रांतियां

आईवीएफ के बारे में कई गलतफहमियां हैऔर कुछ दम्पतियों को काफी चिंता भी रहती है. इस बारें में डॉक्टर कहती है कि कुछ पति-पत्नी को आईवीऍफ़ नैचुरल प्रोसेस न होने की वजह से वे इसे करने से डरती है, उन्हें लगता है कि इससे उनके बच्चे में कुछ न कुछ समस्या अवश्य आएगी. मैं इनमें से कुछ शंकाओं को दूर करने का प्रयास करूंगी, ताकि जरूरतमंद दंपतियों को आईवीऍफ़ के बारे में अपना निर्णय सही समय पर सही तरीके से ले सकें, उनके मन में किसी प्रकार की दुविधा न हो.

  • आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि आईवीएफ से होने वाला गर्भधारण और उससे होने वाला बच्चा मानसिक रूप से असामान्य होने की संभावना बढ़ सकती है,लेकिन सबूतों से पता चलता है कि आईवीएफ या आईसीएसआई के ज़रिए पैदा हुए बच्चों को बचपन मेंसाइकोसोशल बीमारी का कोई बड़ा खतरा नहीं होता. कुछ न्यूरोडेवलपमेंटल में देर हो सकती है, लेकिन इसका कारण आईवीएफ या आईसीएसआई की प्रक्रिया नहीं, बल्कि समय से पहले प्रसव (प्रीमैच्यूअर डिलीवरी) हो सकता है.

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करें डॉक्टर से संपर्क 

डॉ. पल्लवी आगे कहती है कि अगर किसी दंपति ने एक वर्ष से अधिक समय तक प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करने की कोशिश की है, यदि महिला की उम्र 35 से कम है या 6 महीने के बाद उसकी उम्र 35 से ज़्यादा होने वाली है, तो उन्हें फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से सलाह लेनी चाहिए, ताकि उनके अनुसार हर दंपति की व्यक्तिगत इलाज की जा सकें. अधिक देर होने पर आईवीऍफ़ भी अपनी पूरी क्षमता से मदद नहीं कर सकता.

Sunrise Pure स्वाद और सेहत उत्सव में आज बनाते हैं पाव भाजी

पाव भाजी को घर पर आसानी से बहुत जल्दी बनाया जा सकता हैं. नाश्ते में पाव भाजी बनाकर परोसें, आपको और आपके परिवार को यह बहुत पसन्द आयेगा.

सामग्री

– 250 ग्राम लौकी छिली व कटी

– 2 गाजरें

– 150 ग्राम फूलगोभी

– 6 फ्रैंचबींस

– 1/4 कप मटर के हरे दाने

– 1 शिमला मिर्च

– 250 ग्राम टमाटर कद्दूकस किया

– 1 छोटा चम्मच अदरकलहसुन पेस्ट

– 1/2 कप प्याज बारीक कटा

– 2 बड़े चम्मच Sunrise Pure पावभाजी मसाला

– 2 बड़े चम्मच टोमैटो कैचअप

– लालमिर्च स्वादानुसार

– 2 छोटे चम्मच मक्खन यानी बटर

– थोड़ी सी धनियापत्ती कटी सजावट के लिए

– थोड़ा सा पनीर कटा सजावट के लिए

– 6 पाव

– 1 छोटा चम्मच नमक स्वादानुसार

विधि

एक नौनस्टिक कड़ाही में बटर गरम कर प्याज को सुनहर होने तक भूनें और उसके बाद शिमला मिर्च को काटकर प्याज के साथ डालकर भूनें. दूसरी तरफ गाजरों को छील कर मोटे टुकड़ों में व फूलगोभी, को भी मोटे टुकड़ों में काट लें. फ्रैंचबींस को भी 1/2 इंच टुकड़ों में काट लें. अब सभी सब्जियों को 1/2 कप पानी और 1/2 चम्मच नमक के साथ प्रैशरकुकर में पकाएं. 1 सीटी आने के बाद लगभग 7 मिनट धीमी आंच पर और पकाएं.

फिर अदरकलहसुन पेस्ट डालें. 2 मिनट बाद टमाटर और Sunrise Pure पावभाजी मसाला डाल कर भूनें. जब मसाला भुन जाए तब इस में उबली सब्जियां डालें व मैशर से मैश करें. अच्छी तरह पकाएं. इस में टोमैटो कैचअप भी मिला दें. भाजी तैयार हो जाए तो सर्विंग बाउल में निकालें. पनीर के टुकड़ों और धनियापत्ती से सजाएं. एक नौनस्टिक तवे को मक्खन से चिकना कर उस पर पावभाजी मसाला बुरक तुरंत पाव को बीच से काट कर तवे पर डालें. अच्छी तरह सेंक लें. भाजी के साथ सर्व करें.

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प्रकाश स्तंभ: भाग 1- क्या पारिवारिक झगड़ों को सुलझा पाया वह

‘‘दीदी, जरा गिलास में पानी डाल दो,’’ रम्या ने खाने की मेज के दूसरी ओर बैठी अपनी बड़ी बहन नंदिनी से कहा था.

‘‘आलस की भी कोई सीमा होती है या नहीं? तुम एक गिलास पानी भी अपनेआप डाल कर नहीं पी सकतीं,’’ नंदिनी ने टका सा जवाब दिया था.

‘‘पानी का जग तुम्हारे सामने रखा था इसीलिए कह दिया. भूल के लिए क्षमा चाहती हूं. मैं खुद ही डाल लूंगी,’’ रम्या उतने ही तीखे स्वर में बोली थी.

‘‘वही अच्छा है. तुम जितनी जल्दी अपना काम खुद करने की आदत डाल लो तुम्हारे लिए उतना ही अच्छा रहेगा,’’ नंदिनी सीधेसपाट स्वर में बोली थी.

‘‘मैं सब समझती हूं, इतनी मूर्ख नहीं हूं. ईर्ष्या करती हो तुम मुझ से.’’

‘‘लो और सुनो. मैं क्यों ईर्ष्या करने लगी तुम से?’’

‘‘बड़ी बहन कुंआरी बैठी रहे और छोटी का विवाह हो जाए, क्या यह कारण कम है?’’ रम्या तीखे स्वर में बोली थी पर इस से पहले कि नंदिनी कुछ बोल पाती, उन की मां रचना ने दोनों का ध्यान आकर्षित किया था.

‘‘तुम दोनों अपने झगड़े से थोड़ा सा समय निकाल सको तो मैं भी कुछ बोलूं?’’

‘‘क्या मां? आप भी मुझे ही दोष दे रही हैं?’’ नंदिनी ने शिकायत की थी.

‘‘मैं किसी को दोष नहीं दे रही बेटी. मैं तो भली प्रकार जानती हूं कि मेरी 30-30 साल की दोनों बेटियां 5 मिनट के लिए भी आपस में लड़े बिना नहीं रह सकतीं.’’

‘‘30 साल की होने का ताना आप मुझे ही दे रही हैं न? रम्या तो मुझ से 2 साल छोटी है और मैं बड़ी हूं तो सारा दोष भी मेरा ही होगा,’’ नंदिनी ने आहत होने का अभिनय किया था.

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‘‘मेरा ऐसा कोई तात्पर्य नहीं था. मैं जो कहने जा रही हूं उस का तुम दोनों से कुछ भी लेनादेना नहीं है. मैं तो केवल यह कहना चाहती हूं कि मैं ने यह शहर या यों कहूं कि यह देश ही छोड़ कर जाने का निर्णय कर लिया है,’’ रचना ने मानो शांत जल में पत्थर दे मारा था.

‘‘क्या? कहां जा रही हैं आप?’’ खाने की मेज पर बैठे पति नीरज के विस्फारित होते नेत्रों को उस ने देखा था. रम्या के पति प्रतीक का मुंह खुला का खुला रह गया था और दोनों बेटियों की नजर मां पर ही गड़ी हुई थी.

‘‘हमारे बैंक की एक नई शाखा ‘सीशेल्स’ में खुलने जा रही है. मैं ने वहीं जा कर नई शाखा का कार्यभार संभालने की स्वीकृ ति दे दी है. हमारे बैंक से और 2-3 कर्मचारी भी साथ जा रहे हैं,’’ रचना ने अपनी बात पूरी की थी.

‘‘क्यों उपहास कर रही हैं मां? अब इस आयु में आप देश छोड़ कर जाएंगी?’’ रम्या हंस पड़ी थी पर नंदिनी केवल उन का मुंह ताकती रह गई थी.

‘‘यह उपहास नहीं वास्तविकता है बेटी. दिनरात की इस कलह में मेरा मन घुटने लगा है. मैं शायद मां की भूमिका सफलतापूर्वक नहीं निभा पाई. तुम दोनों का व्यवहार इस का प्रमाण है. फिर भी मैं कहूंगी कि मैं ने अपनी ओर से पूरा प्रयत्न किया था. नंदिनी की पढ़ाई में कभी कोई रुचि नहीं रही. फिर भी पीछे पड़ कर उसे स्नातक तक की पढ़ाई करवाई. कंप्यूटर कोर्स करवाया. एकदो जगह नौकरी भी लगवाई पर यह मेरा और उस का…या कहें हम दोनों की बदनसीबी है कि वह अब तक जीवन में व्यवस्थित नहीं हो सकी.

‘‘तुम्हारे लिए भी मैं ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार सबकुछ किया पर तुम ने अच्छीभली नौकरी छोड़ कर विवाह कर लिया और अब तुम और तुम्हारे पति प्रतीक दोनों बेकार बैठे हैं,’’ रचना का स्वर बेहद निरीह प्रतीत हो रहा था.

‘‘और ऐसे में आप ने हम सब को छोड़ कर जाने का फैसला ले लिया?’’ रम्या और नंदिनी ने समवेत स्वर में प्रश्न किया था.

‘‘यहां रह कर भी मैं तुम दोनों के लिए कहां कुछ कर पाई. वहां थोड़ा अधिक पैसा मिलेगा तो शायद मैं तुम लोगों की कुछ अधिक सहायता कर पाऊंगी. वैसे भी ऐसे अवसर कभीकभी ही मिलते हैं. वह तो सीशेल्स जैसे छोटे से द्वीप पर कोई जाना नहीं चाहता वरना तो मुझे यह भी मौका नहीं मिलता.’’

‘‘आप कब तक  जाएंगी, मम्मीजी?’’ प्रतीक ने प्रश्न किया था.

‘‘1 माह तो जाने में लग ही जाएगा, थोड़ा अधिक समय भी लग सकता है,’’ परिवार के अन्य सदस्यों को गहरी सोच में डूबे छोड़ कर रचना अपने कमरे में चली गई थीं.

आरामकुरसी पर पसर कर रचना देर तक शून्य में ताकती रही थीं. कमरे के अंधेरे में वह काल्पनिक आकृतियों को बनतेबिगड़ते देखती रही थीं. साथ ही अतीत की अनेक बातें उन के मानसपटल से टकराने लगी थीं.

‘क्या हुआ रचना? इस तरह सिर थामे क्यों बैठी हो?’ उस दिन उन की सहेली निमिषा ने रचना को आंखें मूंदे स्वयं में ही डूबे देख कर पूछा था.

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उत्तर में रचना ने अपनी आंखें खोल दी थीं. उन की डबडबाई आंखें लगातार बरसने लगी थीं.

‘क्या हुआ? कुशलमंगल तो है? मैं ने तुम्हें इस तरह स्वयं पर नियंत्रण खोते कभी नहीं देखा,’ निमिषा हैरान हो गई थी.

‘तुम स्वयं पर नियंत्रण की बात कर रही हो, मैं ने तो अपने सारे जीवन को अनियंत्रित होते देखा है.’

‘क्यों, क्या हुआ? कोई विशेष बात?’

‘सप्ताह भर से रम्या के फोन पर फोन आ रहे हैं. अपने पति के साथ यहीं हमारे पास रहना चाहती है,’ रचना धीमे स्वर में बोली थीं.

‘क्यों? प्रतीक का स्थानांतरण यहीं हो गया है क्या?’

‘किस का स्थानांतरण, निमिषा. वही हुआ जिस का डर था. फोन पर रम्या बता रही थी कि प्रतीक की नौकरी छूट गई है. मुझे तो पहले ही संदेह था कि वह नौकरी करता भी था या नहीं. अब वह नौकरी नहीं करना चाहता. व्यापार करेगा और व्यापार उसे मेरे अलावा करवाएगा कौन? एक और राज की बात बताऊं तुम्हें?’

‘क्या?’

‘प्रतीक खुद कोई बात नहीं करता. हर बात में रम्या को आगे करता है. पहले उसी की चिकनीचुपड़ी बातों में आ कर रम्या यहां अच्छीभली नौकरी छोड़ कर गुंइर चली गई. अब दिन में 2-3 बार फोन आता है. मैं सप्ताह भर से समझा रही हूं कि मेरी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि उस की सहायता कर सकूं तो रोने लगी. बोली कि आप तो बैंक में अफसर हैं, क्या कर्ज नहीं ले सकतीं?’

‘नीरज भाई साहब क्या कहते हैं?’

‘वह क्या कहेंगे? आज तक कुछ कहा है जो अब कहेंगे? उन पर तो जीवन भर व्यापार का भूत सवार रहा. पर व्यापार में कमाया कम और गंवाया अधिक. अब तो उन का शरीर ही साथ नहीं देता. अस्थमा तो पुराना रोग है ही पर हर दिन कुछ न कुछ लगा ही रहता है. बेटीदामाद के आने के समाचार से भी उन्हें कोई अंतर नहीं पड़ता. वह तो, बस अपनी ही दुनिया में खोए रहते हैं.’

‘फिर तुम क्यों चिंता में घुली जा रही हो? आ रही है तो आने दो. उन दोनों के आने से भला कितना अंतर पड़ जाएगा,’ निमिषा ने समझाना चाहा था.

‘प्रश्न केवल भोजनकपड़े का नहीं है. व्यापार के लिए पूंजी कहां से जुटाऊं. ऊपर से मेरी दोनों बेटियों में बिलकुल नहीं पटती. नंदिनी को कोई वर अपने उपयुक्त लगता ही नहीं. संसार के सब से अधिक धनवान, सुदर्शन और प्रसिद्ध वर से ही विवाह करेगी वह. हम तो उस के विवाह की उधेड़बुन में खोए थे कि रम्या ने अपनी इच्छा से विवाह कर लिया. जगहंसाई न हो इसलिए हम ने परंपरागत रूप से विवाह करवा दिया. वर पक्ष से तो कोई औपचारिकता निभाने भी नहीं आया.’

‘विवाह के पहले तो प्रतीक बड़ी डींगें हांकता था. विवाह को 6 माह भी नहीं हुए कि नौकरी छूट गई. घर वालों ने घर से निकाल दिया. अब वह हमारी शरण में आना चाहते हैं. अब स्थिति यह है कि मेरी नौकरी न हो तो हमारा परिवार भूखों मर जाए,’ रचना अपनी रामकहानी सुनाती रही थी.

‘तुम्हारी समस्या तो वास्तव में विकट है. मैं तो केवल सलाह दे सकती हूं पर उस पर अमल तो तुम को ही करना है. मैं तुम्हारे स्थान पर होती तो कब की भाग खड़ी होती. तनिक सोचो, यदि तुम उन्हें छोड़ कर चली जाओ तो क्या वे भूखे मरेंगे? अपना पेट भरने के लिए तो हाथपैर हिलाएंगे ही न,’ निमिषा ने बात सच कही थी पर रचना को लगा कि उस की सलाह मानने की शक्ति उस में नहीं थी.

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‘तुम ठीक कहती हो. मेरी नियति ही ऐसी है. कालिज में प्रवेश लेते ही मातापिता चल बसे. अपने छोटे भाई और स्वयं को व्यवस्थित करने में मैं ने कठिन परिश्रम किया. संतोष इसी बात का है कि उस का जीवन पूरी तरह से व्यवस्थित है, व्यावसायिक रूप से भी और पारिवारिक तौर पर भी. उसे देख कर बड़ी संतुष्टि मिलती है. पर मुझे तो विवाह के बाद भी चैन नहीं मिला. मुझे तो लगता है कि मेरी दोनों बेटियां अभिशाप बन कर मेरे जीवन में आई हैं. थकीहारी घर पहुंचती हूं तो नंदिनी एक प्याली चाय को भी नहीं पूछती. सर्वगुण संपन्न वर न जुटा पाने के लिए शायद वह मुझे ही दोषी समझती है. सदा मुंह फूला ही रहता है उस का.’

‘भूल जाओ यह सब, रचना. अपनी ओर से तुम ने दोनों बेटियों के लिए कर्तव्य पूरा कर दिया. हो सके तो उन पर जिम्मेदारी डाल कर उन में परिवर्तन लाने का प्रयत्न करो. कभीकभी परिस्थितियां स्वयं बदलने लगती हैं अत: प्रतीक्षा करो.’

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