फेशियल के बाद ये काम न करें वरना हो सकता है चेहरे पर रिएक्शन!

किसी भी पार्टी में जाना हो या कोई फंक्शन हो तो आप सबसे पहले पार्लर जाती हैं और फेशियल करवाती हैं. पार्लर में आपकी स्किन और रंग के हिसाब से कई तरह के फेशियल किए जाते हैं. माना जाता है 30 की उम्र के बाद आप को महीने में एक बार तो फेशियल करवाना ही चाहिए. लेकिन अब कम उम्र में  लड़कियां भी महीने में कम से कम एक बार तो फेशियल करवा ही लेती हैं. फेशियल करवाने से आपकी स्किन की टैनिंग तो हटती ही है इसके अलावा स्किन भी अच्छी रहती है.

लेकिन क्या आप जानती हैं फेशियल करने के बाद आपको कुछ काम बिल्कुल नहीं करनी चाहिए, वरना फेशियल का रिएक्शन भी हो सकता है. जी हां, लोगों को इस बारे में कम जानकारी होती है कि फेशियल करवाने के कम से कम एक हफ्ते बाद तक कुछ ऐसी चीजें है जिनसे आपको बचना चाहिए लेकिन लोग अक्सर ये गलती कर बैठते हैं. जिसका नतीजा ये होता है कि कभी-कभी चेहरे पर उसका रिएक्शन भी हो जाता है. आइए बताते है, फेसियल करवाने के बाद आपको क्या नहीं करना चाहिए.

धूप में ना जाएं–  फेशियल करवाने के तुंरत  बाद भूलकर भी धूप में ना जाएं वरना चेहरे पर इसका रिएक्शन हो सकता है. अगर आपको बाहर जाना बहुत ही जरूरी है तो चेहरे पर कपड़ा बांधकर जाएं.

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फेशियल करवाने के 4 घंटे तक मुंह ना धोए– फेशियल करवाने के बाद कम से कम 4 घंटे तक तो  साबुन से भूलकर भी मुंह ना धोएं. अगर चेहरा साफ करना है तो पानी की हल्की छीटें मारकर पोछ लें लेकिन साबुन का इस्तेमाल ना करें.

थ्रेडिंग ना करवाएं– फेशियल करवाने के बाद थ्रेडिंग नहीं करवानी चाहिए. दरअसल फेशियल करवना के बाद स्किन बहुत सौफ्ट हो जाती है जिससे थ्रेडिंग करवाते समय कट लगने के चांसेज ज्यादा हो जाते हैं. इसलिए अगर आपको थ्रेडिंग और फेशियल दोनों चीजें करवानी हैं तो पहले थ्रेडिंग करवाएं उसके बाद फेशियल.

फेस मास्क ना लगाएं– जब भी फेशियल करवाएं उसके एक  बाद एक हफ्ते तक किसी भी तरह मास्क चेहरे पर ना लगाएं इससे फेशियल ग्लो खत्म हो जाता है.

वैक्सिंग ना करवाएं– फेशियल करवाने के बाद चेहरे पर कभी वेक्सिंग नहीं करवानी चाहिए. क्योंकि फेशियल करवाने के बाद त्वचा मुलायम हो जाती है जिसके बाद वैक्सिंग करवाने से त्वचा छिल सकती है.

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कम से कम तीन दिन तक स्क्रब ना करें– फेशियल कराने के बाद कम से कम तीन दिन तक चेहरे पर स्क्रब नहीं करना चाहिए. फेशियल कराने के बात वैसे ही आपकी स्किन साफ और सेंसिटिव हो जाती है जिसके बाद जल्दी स्क्रब करने से चेहरे पर दाने हो सकते हैं या चेहरा छिल सकता है.

क्षितिज ने पुकारा: क्या पति की जिद के आगे झुक गई नंदिनी?

Serial Story: क्षितिज ने पुकारा (भाग-2)

अब तक आप ने पढ़ा:

 दिल की कोमल नंदिनी थिएटर आर्टिस्ट थी. नंदिनी का थिएटर में काम करना पति रूपेश को पसंद नहीं था. एक दिन रिहर्सल के दौरान देर हो गई. घर जाने के लिए बस नहीं मिली तो उस के साथ काम करने वाला प्रीतम अपने स्कूटर पर उसे घर तक छोड़ने गया. घर पर उस का पति रूपेश गुस्से से भरा बैठा उस का इंतजार कर रहा था, जिस ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई. रूपेश उसे बहुत कष्ट देता था. सास की मृत्यु के बाद घर में बूआ सास की हुकूमत चलती थी, जिस की खुद की जिंदगी काफी संघर्ष से बीती थी.

अभाव में पलीबढ़ी जिंदगी से बूआ सास हमेशा नकारात्मक सोच ही रखती थीं, जिस का प्रतिबिंब पति रूपेश पर भी गहरा पड़ा था.

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ज्योत्सना की खिलीखिली अनुभूतियां कितनी ही रातें नंदिनी को आसमान की सैर करा देती थीं, मगर आज रिसते दर्द पर शूल सा चुभ रहा था यह चांद. भूखीप्यासी वह तंद्राच्छन्न होने लगी ही थी कि अचानक लड़ाकू सैनिक सा रूपेश कमरे में आ धमका. बत्ती जला दी उस ने. वितृष्णा और प्रतिशोध से धधकते रूपेश को नंदिनी की शीलहीनता और कृतध्नता ही दिखाई देने लगी थी.

टूटी, तड़पती नंदिनी उठ कर बिस्तर पर बैठ गई.

‘‘महारानी इधर आराम फरमा रही हैं… यह नहीं कि देखे बूआ सास और पति को क्या दिक्कतें हैं? बहुत सह ली मैं ने तुम्हारी मनमानी… बूआ ने सही चेताया है… ब्राह्मण परिवार की बहू को पराए मर्दों के साथ हजारों लोगों के सामने नौटंकी कराना हमारी बिरादरी में नहीं सुहाता. हमारे घर बेटी है. कभी बेटी की फिक्र भी करती हो? तुम्हारे 4-5 हजार रुपयों से हमें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला… सोच लो वरना चली जाना हमेशा के लिए.’’

रूपेश ने नंदिनी के थिएटर के प्रेम पर, उस के काम पर दफन की आखिरी मिट्टी डाल दी थी.

थिएटर का काम अब फायदे वाला नहीं रह गया. इस में खर्चे तो बहुत पर कला के कद्रदान कम हो गए हैं. ऐसे में थिएटर में काम करने वालों को बहुत कम पैसे दिए जाते हैं. जो पुराने कलाकार हैं, जो कला के प्रति समर्पित हैं, उन्हें अपने फायदे का त्याग करना पड़ता है.

औडिटोरियम, लाइट्स, स्टेज सज्जा, वस्त्र सज्जा, साउंड इफैक्ट, स्पैशल इफैक्ट पर हर स्टेज शो के लिए कम से कम क्व30-40 हजार का खर्चा बैठता ही है और वह भी कम पैमाने के नाटक के लिए. ऊपर से प्रचार और विज्ञापन का खर्चा अलग से.

ऐसे में शुभंकर दा या प्रीतम जैसे लोग अपना पैसा तो लगाते ही हैं, बाहर से भी मदद का जुगाड़ करते हैं. उन के समर्पण को देखते हुए नंदिनी जैसे कलाकार जो सिर्फ अपना थोड़ा समय और थोड़ी सी कला ही दे सकते हैं कैसे उन के साथ पैसे के लिए जिद करें?

अपने परिवार की ओछी सोच के आगे अगर नंदिनी जैसे लोग हार मान लें तो थिएटर जैसा रचनात्मक क्षेत्र लुप्तप्राय हो जाए.

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नंदिनी निढाल सी बिस्तर पर पड़ी रही. रूपेश नीचे जा चुका था. सुबह के 5 बज रहे थे. नंदिनी बिस्तर समेट नहाधो आई. फिर वेणु को उठाया,

सोई निबटा कर वेणु को स्कूल बस तक छोड़ आई. आ कर सब को नाश्ता कराया. किसी ने उस से नहीं पूछा. वह खा नहीं पाई. घर के बाकी काम निबटाती रही.

रूपेश के औफिस जाने से पहले जिस का फोन आया, उस से वह बहुत उत्साहित हो कर बातें करने लगा.

नंदिनी के पास इतना अधिकार नहीं रह गया था कि वह रूपेश से कुछ पूछ सके. फोन रख कर जैसाकि हमेशा बात करता था एक बौस की तरह अभी भी उसी अंदाज में नंदिनी से बोला, ‘‘ये रुपए पकड़ो, बाजार से जो भी इच्छा लगे ले आना. बढि़या व्यंजन बना कर रखना. शाम को मेरा दोस्त नयन और उस की पत्नी शहाना आ रहे हैं. कहीं जाने की गलती न करना वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’ यह कहीं का मतलब थिएटर ही था.

पत्नी से बात करना रूपेश ने कभी सीखा ही नहीं. अत: नंदिनी ने भी अपनी जिंदगी के अभावों से समझौता कर लिया था.

मगर कल तक उस के नाटक का आखिरी रिहर्सल था. परसों से शो. कोलकाता के 2 हौल्स में टिकट बिकने को दिए गए थे. अब यह धोखा नंदिनी कैसे करे?

शाम को घर का माहौल काफी बदला सा था. करीने से सजे घर में महंगे डिजाइनर सैटों की साजसज्जा के बीच सलीके से सजी नंदिनी इतने शोर के बीच बड़ी शांत सी थी. शहाना शोरगुल के बीच भी नंदिनी पर नजर रखे थी. वेणु को भी वह काफी कटाकटा सा पा रही थी. कौफी का कप हाथ में लिए शहाना नंदिनी के पास जा पहुंची. फिर उस का हाथ पकड़ते हुए बोली, ‘‘चलो कहीं घूम आती हैं. अभी तो शाम के 6 ही बजे हैं… खाना 10 बजे से पहले खाएंगे नहीं.’’

‘‘आप कहें तो मेरी पसंदीदी जगह चलें?’’

‘‘नंदिनी मुझे तुम आप न कहो. चलो, चलें.’’

शहाना नंदिनी को ले पति बिरादरी के पास पहुंच चुकी थी. उन की बातें सुन नंदिनी अवाक रह गई. नयन भी तो पुरुष हैं, पति हैं, यह कैसे संभव हो पाया.

नयन कह रहे थे, ‘‘इतना ही नहीं शहाना अपनी साल भर की बेटी को मेरी मां के घर राजोरी गार्डन छोड़ती, तब डांस ऐकैडेमी जा कर डांस के गुर सीखती. हफ्ते में 3 दिन उसे ग्रेटर नोएडा से आनाजाना पड़ता… बहुत संघर्ष कर के उस ने अपने डांस के शौक को बचाया है. यह इस के संघर्ष का फल है कि कल कोलकाता के टाउनहौल में इस की एकल प्रस्तुति है. मैं बहुत गर्वित हूं शहाना पर.’’

‘‘अरे नयन, तुम ज्यादा बोल रहे हो… ये सब तुम्हारे बिना बिलकुल संभव नहीं होता. अगर तुम घर में मेरी गैरमौजूदगी में घर को न संभालते तो मैं कहां आगे बढ़ पाती? सासूमां ने भी बेटी को संभालने के लिए कभी मना नहीं किया.’’

‘‘एक स्त्री के लिए घर और अपने शौक दोनों को एकसाथ संभालना कितना मुश्किल भरा काम है, मैं ही समझ सकती हूं. नौकरी एक बार में छोड़ी जा सकती है, पर कला, हुनर और जनून से मुंह मोड़ना नामुमकिन है. लेखन, नाटक, गायन, नृत्य क्षेत्र बेहद समर्पण मांगते हैं. ऐसे में एक समझदार, स्नेही और निस्वार्थ पति के संरक्षण में ही विवाहित स्त्री का शौक फूलफल सकता है,’’ कह शहाना थोड़ी रुक कर फिर बोली, ‘‘रूपेश भाई साहब हम घूमने जा रहे हैं. नंदिनी भी साथ जा रही हैं,’’ भाई साहब.

‘‘हांहां, क्यों नहीं?’’

पति के इस उदारवाद के पीछे की मानसिकता भी नंदिनी से छिपी नहीं थी. रूपेश अपनी छवि को ले कर दूसरों के सामने बहुत सचेत रहता था. उसे अभिनय का सहारा लेना पड़ता.

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ये भी विडंबना ही है. अन्य के चरित्र चित्रण में नंदिनी ने स्वयं को वास्तव में कभी नहीं खोया, लेकिन स्वयं के चरित्र में रूपेश को अन्य को धारण करना पड़ता है, खुद को छिपाना पड़ता है. नंदिनी शहाना को टौलीगंज के ड्रामा स्कूल ले गई.

आगे पढ़ें- ड्रामा स्कूल में प्रवेश करते हुए नंदिनी शहाना से..

Serial Story: क्षितिज ने पुकारा (भाग-3)

‘‘अरे वाह, यह हमारा मनपसंद इलाका है. बंगाल के चलचित्र महानायक उत्तम कुमार का कर्मस्थान.’’

‘‘तुम्हें पसंद आएगा, मैं जानती थी.’’

‘‘तुम यहां किसी को जानती हो?’’

ड्रामा स्कूल में प्रवेश करते हुए नंदिनी शहाना से मुखातिब हुई, ‘‘यह ड्रामा स्कूल शुभंकर दा का है… मैं यहां सदस्य हूं.’’

‘‘तुम? तुम तो बड़ी सीधी सी बेजबान कोमलांगिनी, शरमीली, गृहवधू हो.’’

‘‘चलो, अंदर चलो,’’ नंदिनी ने मृदु स्वरमें कहा.

शुभंकर की टीम को नंदिनी का आगमन स्वयं कला की देवी के आविर्भाव सा प्रतीत हुआ.

इधरउधर बैठे टीम के सदस्य अपनेअपने रोल की प्रैक्टिस कर रहे थे. नंदिनी का रोल ही आधार चरित्र था. उस के बिना नाटक कर पाना असंभव था. नंदिनी को देख सभी बड़े खुश हुए, मगर नंदिनी कल की चिंता में बेचैन थी.

शुभंकर दा ने नंदिनी की बेचैनी को भांप लिया. आज शुभंकर दा की पत्नी अनुभा भाभी भी यहां थीं. जब से इन का बेटा अमेरिका गया था नौकरी के लिए, अनुभा भाभी कोई न कोई नया कुछ पकवान बना कर यहीं ले आती.  शुभंकर दा ने जब नंदिनी से बेचैनी का कारण पूछा तो उस की आंखों से आंसू बहने लगे.

अनुभा भाभी ने उसे अपने पास बैठाया. शहाना और टीम के सभी सदस्य भी पास आ गए, जब नंदिनी के संघर्ष का सच खुला तो शहाना अवाक रह गई कि इतनी जिल्लतें, इतनी धमकियां, दुर्व्यवहार झेलते हुए भी वह घर और अपने शौक के जनून दोनों के साथ न्याय कैसे कर पा रही हैं?

शहाना ने कहा, ‘‘नंदिनी तुम अब सब कुछ मुझ पर छोड़ दो. तुम्हारे शो का टाइम 8 बजे से है और मेरा शाम 4 से 6 बजे तक… सब ठीक हो जाएगा,’’ और फिर घर लौट आईं.रात को शहाना ने नयन को ऐसी जादुई खुशबू सुंघाई कि नयन ने कहा, ‘‘बस देखती जाओ.’’

सुबह होते ही नयन ने कहा, ‘‘यार मैं सोफे में धंस कर बंद दरवाजे के अंदर सुबह के सूरज को खोना नहीं चाहता. चल बाहर सैर को चलें.’’

दोनों पास के बगीचे की तरफ निकल गए. चलतेचलते नयन ने कहा, ‘‘यार रूपेश तुम्हारी बिरादरी में तो अकसर बीवियां गुणी होती हैं. घरगृहस्थी और पतिसेवा के अलावा भी उन की जिंदगी के कुछ मकसद होते हैं… नंदिनी भाभी क्या कुछ नहीं करतीं?’’

‘‘अरे छोड़ न तू भी क्या ले कर बैठ गया?’’

‘‘क्यों इस बात में क्या बुराई है?’’

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‘‘बुराई है… न मुझे और न ही बूआ को यह रास आता कि औरतें घर संभालने के अलावा भी कुछ करें और अगर करें तो इतना पैसा कमाएं कि उन का घर से बाहर निकलना परिवार वालों को भा जाए.’’

‘‘यार बुरा मत मानना. तुम लोगों की इन्हीं छोटी सोचों की वजह से पीढि़यां बस घिसट रही हैं. वास्तविक उन्नति नहीं हो पा रही है.’’

‘‘स्वार्थ, अहंकार, ईर्ष्या, जिद के वश में हो कर तुम लोग जो भी नियम बनाते हो उसे पत्नी पर थोप देते हो.’’

‘‘यार रूपेश तेरी सोच से 3 दशक पुरानी बू आ रही है. तेरी बूआ से बातें कर के लगा कि उन्होंने अपनी पूरी सोच तुझ में स्थानांतरित कर दी है. तू तो हमारी पीढ़ी का लगता ही नहीं.’’

‘‘अच्छा.’’

‘‘और क्या… बापदादों सा अकड़ू, तर्कहीन, निर्दयी… क्या खाख आधुनिक है तू? नए आधुनिक उपकरणों के इस्तेमाल से स्वयं को आधुनिक नहीं बना सकते दोस्त… विचारों के बंद दरवाजे से सूरज लौट रहा है… बूआ की छोड़ रूपेश… उन्हें जो न मिला वह शायद उन के हिस्से में न था. तू अपना पारिवारिक जीवन क्यों नष्ट कर रहा है? बूआ की हर बात से प्रेरित हो कर तुम अपनी बेटी और पत्नी के साथ क्यों दुखद रवैया अपनाते हो?’’

वैसे तो जिद्दी लोगों का कायापलट जल्दी नहीं होता, फिर भी रूपेश ने सोचना शुरू कर दिया. बूआ सारा दिन टीवी सीरियलों के चालाक पात्रों से सीख लेती रहती हैं. अत: वे घर में ही जमी रहीं.

6 बजे शहाना का सफल शो खत्म होने के बाद शहाना और नंदिनी हौल पहुंची. शहाना कोलकाता के थिएटर के प्रति अपनी गहरी रुचि बता कर सभी को यहां ले आई थी. सभी अंदर गए तो नंदिनी ग्रीनरूम चली गई.

रूपेश की आंखें बारबार नंदिनी को ढूंढ़ रही थीं. नाटक शुरू होने पर रूपेश को भ्रम होने लगा कि क्या यह नंदिनी है… हां वही है.

मंच पर पूरी साजसज्जा में अदाकारा नंदिनी को देख वह हैरान था. इतनी डांट, अपमान यहां तक कि शारीरिक यातना के बाद भी जिस की जबान तक नहीं फूटती थी वह कब इतने लंबे डायलौग याद करती होगी? वह तो मानसिक पीड़ा में पेपर भी नहीं पढ़ सकता… कितनी प्रतिभाशाली है यह? उसे इतनी खीज और ईर्ष्या क्यों हो रही है? वह अपने सवालों में उलझ कर दीवाना सा होने लगा.

उस की अब तक की भावना उस के बाहर जाने, मर्दों के साथ गुलछर्रे उड़ाने की काल्पनिक सोच पर ही आधारित थी.

बगल में बैठे नयन ने अचानक उस की बाजू पर अपना हाथ रखा. फिर कहा, ‘‘दोस्त, मैं समझ रहा हूं कि तुम विचलित हो… तुम्हारे लिए अपनी पुरानी सोचों पर विजय पाना कठिन है. मगर तुम पिंजरे में घुट कर मर रहे हो. प्रकृति ने जिसे जो गुण दिया है, उसे विकसित होने के पूरे मौके दो.’’

‘‘वेणु को भी नया सवेरा दो. क्या तुम ने नंदिनी को स्त्री होने की सजा देने का ठेका ले रखा है? वक्त रहते बदल जाओ नहीं तो वक्त की मार पड़ेगी.’’

रात बिस्तर पर चांदनी फिर आई. दोनों के बीच आज शांति की एक झीनी सी दीवार थी, लेकिन रूपेश का उद्वेलित मन पुरुष के कवच में सिमटा ही रह गया, पर चांदनी नंदिनी को महीनों बाद सुकून की नींद दे गई थी.

सुबह शहाना और नयन के जाने के बाद रूपेश भी औफिस निकलने को हुआ.

नंदिनी से दोपहर के खाने का डब्बा पकड़ते हुए रूपेश ने कहा, ‘‘शाम को थिएटर से आते वक्त सब्जियां ले आना. मेरी मीटिंग है… देर हो जाएगी लौटने में. और हां, कल थिएटर नहीं जाना, शोरूम चलेंगे स्कूटी देखने… थिएटर से वापसी में औटो का झंझट ही न रहे तो बेहतर.’’

पुरुष का पति बनना आज पृथ्वी की सब से मीठी घटना लग रही थी. नंदिनी की आंखों से विह्वल प्रेम की मीठी बयार जहां संकोच की दीवार लांघ रूपेश की नजरों से जा टकराई, रूपेश की नजरों ने प्रेयसी के होंठों का लावण्य भरा स्पर्श किया.

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नि:शब्द अनुभूतियों के आलिंगन में बंधी नंदिनी आज ज्योत्सना भरी उसी रात का बेसब्री से इंतजार करने लगी. हो भी क्यों न. यह तो धरती और आसमां का वह मिलन होगा जहां दायरे खत्म हो जाएंगे… क्षुद्र सीमाओं का असीम में विलय हो जाएगा.

Serial Story: क्षितिज ने पुकारा (भाग-1)

शुभंकर सर के ड्रामा स्कूल के गेट से निकल कर नंदिनी औटोस्टैंड की ओर बढ़ी ही थी कि पीछे से प्रीतम प्यारे ने आवाज दी, ‘‘कहां चली नंदिनी? रात हो रही है… शायद ही औटो मिले. चलो, मैं छोड़ देता हूं.’’

नंदिनी रुक गई. एक शालीन मनाही की खातिर. बोली, ‘‘नहीं प्रीतम, अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है. 9 ही तो बजे हैं.’’

‘‘तुम्हारी तरफ वाले औटो अब ज्यादा कहां?’’

नंदिनी ने अपनी चलने की गति बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मिल जाएंगे.’’

प्रीतम पास ही बाइक की स्पीड धीमी कर के चल रहा था.

नंदिनी चिंतित सी बोली, ‘‘प्रीतम, तुम चले जाओ… रूपेश ने देख लिया तो मैं…’’

‘‘ठीक है… चलो तुम्हें औटो में बैठा कर मैं निकल जाऊंगा. अकेले छोड़ दिया और फिर औटो नहीं मिला तो बड़ी मुश्किल होगी,’’ प्रीतम बोला.

कोलकाता शहर का टौलीगंज इलाका नृत्य, संगीत, सिनेमा, थिएटर के नशे में पूरी तरह विभोर. रोजगार देने वाला शहर होने की वजह से जनसंख्या अत्यधिक थी.

नंदिनी का घर सोनारपुर में पड़ता था. अपेक्षाकृत कुछ अविकसित इलाका. रात होते ही औटो की आवाजाही उधर कम हो जाती.

नंदिनी ने चुप्पी तोड़ी. बोली, ‘‘आज तुम अभी घर जा कर फिर एक बार शुभंकर दा के घर जाने वाले हो न स्क्रिप्ट फाइनल करने?’’

‘‘हां जाना ही पड़ेगा. शुक्रवार को शो है. फिर मालदा और रानाघाट भी शो फाइनल करने जाना पड़ेगा… सारी बातें उन के साथ करनी ही पड़ेंगी. चौकीदार के रोल के लिए कोई राजी नहीं हो रहा जबकि छोटा होने के बावजूद वह अहम रोल है.’’

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‘‘हां शुभंकर दा भले ही डाइरैक्टर हैं, लेकिन तुम्हारे बिना तो सारा कुछ असंभव सा है… वैसे टीम मैंबर सब अच्छे ही हैं.’’

‘‘नई त्रिशला अभी अकुशल है. उस के लिए शुभंकर दा की मेहनत थोड़ी ज्यादा हो गई है.’’

‘‘कोलकाता के 2 हौलों के टिकट की व्यवस्था कब तक हो जाएगी?’’

‘‘देखो शुभो दा क्या कहते हैं.’’

‘‘आधा घंटा होने को आया पर अभी तक कोई औटो नहीं आया. चलो बैठो नंदिनी अब जिद से कोई लाभ नहीं,’’ प्रीतम प्यारे बोला.

नंदिनी लाचार हो गई थी, पर प्रीतम का उस के लिए ठहरना उसे गवारा नहीं था… उस के साथ जाने या मतलब रूपेश के हाथों मौत को निमंत्रण देना था.

जैसे ही नंदिनी प्रीतम की बाइक पर पीछे बैठी रूपेश की आंखें, उस के गाल, उस के कान, उस के बाल, उस की मूंछें, उस की भौंहें सब कुछ धीरेधीरे किसी दैत्य सा उस की आंखों के सामने घूमने लगा. वह समझ नहीं पाती कि पता नहीं वे लोग उस पर थोड़ी भी दया क्यों नहीं दिखाते.

नंदिनी के पिता की किराने की छोटी सी दुकान थी. दोनों बेटियों की शादी उन्होंने इसी दुकान के सहारे बड़ी धूमधाम से की थी. लेकिन आसपास बड़ेबड़े मौल्स, शौपिंग सैंटर्स आदि खुल जाने पर उन का महल्ला भी शहर की चकाचौंध में ऐसा गुम हुआ कि उन की दुकान बस मक्खियों का अड्डा बन कर रह गई.

पिता की दुकान से जब घर में फाके की नौबत आ गई तो फाइन आर्ट्स में ग्रैजुएशन करने की नंदिनी ने सोची. वह शौकिया थिएटर करती रहती थी. एक दिन प्रयोजन ने शुभंकर दत्ता के थिएटर स्कूल से उसे जोड़ दिया. शुभंकर दत्ता थिएटर से जुड़े समर्पित व्यक्तित्व थे. प्रीतम उन का दाहिना हाथ था, जो प्राइवेट फर्म में नौकरी के साथसाथ थिएटर और रंगमंच के प्रति भी पूरी तरह समर्पित था.

इस के अलावा यहां स्त्रीपुरुष मिला कर करीब 20 लोगों की टीम थी, जो थिएटर मंचन के लिए बाहर भी जाती और कोलकाता के अंदर भी हौल बुक कर टिकट बेच अपना शो चलाती.

ये सब भले ही पैसों की जरूरत के मारे थे, लेकिन जनून इतना था कि न इन्हें अपना न स्वास्थ्य दिखता न पैसा… न समय दिखता, न परिवार यानी थिएटर ही इन का सब कुछ बन गया था. लेकिन जितना ये इस थिएटर से कमाते, उस से कहीं ज्यादा इन्हें इस में लगाना पड़ जाता. खासकर शुभंकर और प्रीतम तो जैसे इस यूनिट को चलाए रखने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार रहते. वहां टीम के बाकी लोग भी कभी अपना समर्पण कम न करते.

रचनात्मकता के स्रोत जैसे इन के बीच लगातार फूटते रहते.

‘‘रुकोरुको प्रीतम… मैं यहीं उतर जाऊंगी,’’ कहते नंदिनी गाड़ी के धीरे होने से पहले ही उतरने की कोशिश करने लगी.

‘‘इतनी दूर अंदर तक अकेले जाओगी?’’

‘‘तुम चले जाओ प्रीतम…मैं रूपेश को फोन करती हूं.’’

कई बार फोन मिलाने के बावजूद कोई उत्तर नहीं. प्रीतम को न चाहते हुए भी अनदेखा कर वह घर की ओर चल पड़ी. प्रीतम प्यारे बड़ा खुशमिजाज, सच्चा और मददगार इनसान है. वह समझ गया था कि नंदिनी पति की ओर से काफी परेशानी है.

कई बार शादीशुदा व्यक्ति भी संवेदनशील न होने पर स्त्री की दशा बिना समझे उस पर ज्यादती करता है और कई बार प्रीतम प्यारे जैसे लोग शादीशुदा न हो कर भी संवेदनशील होने के कारण अपने आसपास की स्त्रियों की दशा भलीभांति समझ पाते हैं.

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प्रीतम पाल की इसी नर्मदिली की वजह से टीम की सारी महिलाएं उसे प्रीतम प्यारे कहतीं.

नंदिनी को घर में प्रवेश करते ही रूपेश बैठक में सोफे पर बैठा मिला. अखबार के पीछे छिपे रूपेश के चेहरे को यद्यपि वह पढ़ नहीं पा रही थी, लेकिन उस की मनोदशा से वह अनजान भी नहीं थी.

नंदिनी ने डरते हुए पूछा, ‘‘खाना लगा दूं?’’

शाम 5 बजे नंदिनी थिएटर रिहर्सल के लिए निकलती है तो खाना बना कर ही जाती है.

रूपेश की ओर से कोई जवाब न पा कर उस ने फिर पूछा, ‘‘खाना दे दूं.’’

रूपेश ने बहुत शांत स्वर में कहा, ‘‘खाना हम ले लेंगे. बूआ तो हैं ही नौकरानी… वे ही सब काम कर लेंगी अब से… बेटी भी खुद ही पढ़ लेगी. तुम महारानी बाहर गुलछर्रे उड़ाओ और हमारी थाली में छेद करो.’’

नंदिनी के लिए वह कठिन वक्त होता जब उस के वापस आने से पहले ही रूपेश घर आ चुका होता.

वह इलैक्ट्रिक विभाग में इंजीनियर है. पैसा, रूतबा, घर, गाड़ी सब कुछ है.

दिल की कोमल नंदिनी झगड़ों से बहुत घबराती है, लेकिन अब उस की जिंदगी में झगड़ा, तानेउल्लाहने अहम हिस्सा हैं.

‘‘मुझे माफ कर दो, आज औटो नहीं मिल रहा था.’’

‘‘कैसे आई फिर?’’

‘बिना दोष के कलंकिनी साबित हो जाएगी वह, झूठ का ही सहारा लेना पड़ेगा… मगर शातिर रूपेश ने पकड़ लिया तो,’ पसीने से तरबतर नंदिनी ने सोचा. फिर बोली, ‘‘औटो काफी देर बाद मिला.’’

‘‘जरूरत ही क्या है बाहर जाने की? रोजीरोटी कमाने जा रही हो? हमें पालना पड़ रहा है तुम्हें? कितने पैसे आते हैं महीने में? मुश्किल से 7-8 हजार… इन के न आने से हमें क्या फर्क पड़ेगा? घर में रह कर घर का खयाल नहीं रख सकती? बाप के घर में खाने के लाले पड़े होंगे, जो बेटी का कमाया खाया… यहां हम बीवी का कमाया देखते तक नहीं.’’

‘‘इस की बेटी भी ज्यादा दिन घर में नहीं रहेगी, देख लेना… अभी ही अगर इस की मां को कुछ कह दें तो तुरंत जवाब देती है,’’ बूआ ने आग में घी का काम किया.

नंदिनी का दिल बैठा जा रहा था. ये लोग ऐसे ही बोलते रहेंगे तो 13 साल की बेटी भी जीने का उत्साह खो देगी. पति न समझे तो कैसे वह अपने जनून और कला को जिंदा रखे? कैसे रूपेश को समझाए कि यह 7-8 हजार की बात नहीं है. उस की नसों में, उस के खून के उबाल में अभिनय तड़पता है. उस तड़प की अभिव्यक्ति बिना वह मृतप्राय है.

पत्नी के मन को छुए बिना पति यह कैसे समझे कि यह न तो बाहरी मर्दों को पाने की चाह है, न पैसों की लालसा, न जिम्मेदारियों से भागने की मंशा और न ही पति के साथ प्रतियोगिता.

इस सब के बीच अपनी बेटी को वह कैसे स्त्री होने के मान और गौरव से सजाए यह भी नंदिनी के लिए एक बड़ा प्रश्न था.

बेटी वेणु ने डाइनिंग टेबल पर 2-4 मिनट रुक कर अपना खाना खत्म कर ऊपर अपने कमरे में चली गई. वह बहुत कम बोलती थी. न हंसतीखेलती थी और न ही किसी बात पर अपनी राय देती थी.

बूआ और रूपेश खाना खाते हुए व्यंग्यबाणों से नंदिनी का कलेजा छलनी कर रहे थे..

आए दिन खाते वक्त ही इन का यह सिलसिला शुरू होता और नंदिनी भूखे

पेट ही रह जाती. रसोई का काम निबटा कर वह अपने कमरे में चली गई. बेटी को झांका. वह

सो चुकी थी. अपने कमरे में आ कर वह बिस्तर पर लेट गई. आज उम्मीद नहीं थी कि रूपेश ऊपर आए. शायद नीचे बाबूजी के कमरे में ही सो जाए.

खुली खिड़की से आती ठंडी हवा उसे सहलाने लगी. निर्मम बूआ और उन्हीं की शिक्षा से पलेबढ़े रूपेश का चेहरा बारबार उस की आंखों के सामने आ रहा था.

आंसुओं के तूफान में नंदिनी को अपनी सास की हर बात याद आने लगी. उस की शादी के 2 साल बाद ही सास गुजर गई थीं, लेकिन उन के साथ बिताए पल उस की स्मृति में अब भी ताजा हैं. सास से सुना था उस ने…

बूआ सास अर्थात हिरन्मयी की शादी खातेपीते पुजारी ब्राह्मण से हुई थी. 70 के दशक के शुरुआती वर्ष में वह कच्चे यौवन से मदमाती खिलती कली थी. उम्र का 17वां पड़ाव घूंघट के नीचे आकंठ प्यास, शरीर में भौंरों का गुंजन, मन कामनाओं से सराबोर…

ससुराल में सास और पति के अलावा एक चंचल सा देवर जिस के होंठों में भरपूर रसीला सा आमंत्रण सदैव पारिवारिक कायदे में छिपा दबा रहता था.

30 साल के पति को परमेश्वर मानने की परंपरा ने हिरन्मयी को बस पति के भोग का साधन ही बना रखा था. जिंदगी चलती जा रही थी.

एक दिन अचानक ‘बस के खाई में गिरने से 50 की मौत’ के समाचार में पति का नाम देख उस की जिंदगी खत्म हो गई.

अब वह घर की बहू न रह गई थी. विधवा बहू सास के लिए बेटे के मौत की साक्षात तसवीर थी. सफेद साड़ी में लिपटी बहू हमेशा सास की आंखों के सामने बेटे की मौत की गवाह बनी रहती.

पंडिताई कर के ससुरजी ने बहुत कमाया था. घर में 2 गाएं भी थीं. अपनी जमीन थी, जो उन के शहर से दूर गांव में थी. सास वहां अपने खेत के चावल लेने जाया करतीं. अन्नसंपन्न घर था, लेकिन विधवा की स्थिति तब बहुत खराब थी. दिन भर दोमंजिले मकान में काम करते वह थकती नहीं थी, लेकिन सास को संतुष्ट कर पाना अब उस के वश में नहीं था.

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तानोंउलाहनों से उस के पंख कटे यौवन पर हर वक्त चोट करती रहती. बड़े बेटे की मौत ने उन्हें प्रकृति से प्रतिशोध का यही सहज तरीका सुझाया था. जहां सहानुभूति इनसान को जोड़ती है, कृतज्ञ बनाती है वहीं क्रूरता बगावत को निमंत्रण देती है. हिरन्मयी देवर के आकर्षण के प्रति सचेत सहने लगीं. रसोई हो या बरतन मांजने की जगह, छत पर कपड़े सुखाने हों या कमरों की सफाई करनी हो, साए की तरह देवर पीछे रहता.

ऐसे ही एक दिन सूखे कपड़े छत से उतारते वक्त देवर ने पीछे से आ जकड़ा. प्यासी हिरन्मयी चेतनाशून्य सी होने लगी. देवर उसे कमरे में ले गया और फिर दोनों दीनदुनिया से बेखबर एकदूसरे में समा गए.

छत से सास की सहेली गायत्री ने सारा नजारा अपनी आंखों में कैद कर लिया.

अचानक दरवाजे पर जोरजोर से ठकठक होने लगी तो दोनों कपड़े समेटते हुए खड़े हुए.

फिर बहू के लिए घर का दरवाजा हमेशा के लिए बंद हो गया. पर बेटा अपना था. अत: उसे माफ कर दिया गया.

गनीमत यह रही कि बड़े बेटे की इज्जत और छोटे ब्याह की खातिर बात दबा दी गई. शीघ्रातिशीघ्र हिरन्मयी के पिता को बुला कर बेटी सौंप दी गई. एक अध्याय समाप्त.

पिता और भाई ने उस के वैधव्य की हताश को छेड़े बिना उसे सहारा दिया. पिता के साथ वाले नीचे के कमरे में उसे हमेशा के लिए जगह दे दी गई. पिता की ओर से फिर कभी उस की शादी की कोशिश नहीं की गई. इसलिए कि कहीं दबीढकी बात खोजबीन में सामने न आ जाए और रहीसही शांति भी नष्ट हो जाए. निजी हताशा हिरन्मयी के पलपल में बसने लगी.

इधर रूपेश की मां अचानक बीमार रहने लगी. उसे क्या हुआ है डाक्टर पकड़ नहीं पा रहे थे. कभी मुंह में छाले, कभी बुखार तो कभी पेट दर्द. वह ज्यादातर वक्त या तो स्वयं को ले कर पस्त रहती या फिर परिवार के कामकाज को ले कर. अकेली बूआ ने अपनी सार्थकता सिद्ध करने के लिए इस परिवार का भार अपने कंधों पर लेना शुरू कर दिया.

रूपेश से लगाव और स्नेह की मात्रा में स्वयं का आधिपत्य भी समाने लगा. ‘मुझे जिंदगी ने दिया ही क्या है’ के भाव की जगह ‘मुझे सब कुछ अपना बनाना होगा’ का भाव गहरा होता गया. बारबार उसे देवर की याद आती. सोचती कि अगर सास चाहती तो देवर के साथ उस का ब्याह कर सकती थी. देवर भी तो उस से 4 साल बड़ा ही था. लेकिन कलंकित मान कर बुरी तरह निकाल दिया.

इधर नंदिनी की सास की कायामात्र ही इस परिवार में बची रह गई थी. बूआ थीं वर्चस्व की अधिकारिणी.

रूपेश के जीवन पर बूआ की हर मानसिकता की गहरी छाप थी. बूआ का हरे से जीवन का अचानक पतझड़ में बदल जाना संतप्त और नकारात्मक व्यक्तित्व के निर्माण का मूल कारण बन गया था और इसी बूआ के सांचे में ढला रूपेश आज की आधुनिक जीवनशैली में भी सामंती सोच का प्रतिनिधि था.

आखिर रूपेश की शादी के 2 साल बाद लंबी बीमारी के बाद रूपेश की मां चल बसी. रूपेश का अपनी मां से लगाव न के बराबर रह गया था. उस के पूरे निर्णय और सोच बूआ की सत्तासीन सोचों से प्रेरित थे.

सास की मौत के कुछेक सालों में नंदिनी के ससुर भी गुजर गए.

– क्रमश:

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शादी के बाद इतनी बदल चुकी हैं ‘रसोड़े में कुकर’ चढ़ाने वाली राशि, देखें फोटोज…

बीते दिनों सीरियल ‘साथ निभाना साथिया’ के सीजन 2 का प्रोमो जारी हो चुका है, जिसमें गोपी बहू यानी देवोलिना नजर आईं, जिसके बाद सोशलमीडिया पर इस शो की चर्चा लगातार हो रही हैं. हालांकि उससे पहले शो से जुड़े एक मीम ने फैंस को काफी एंटरटेन किया था, जिसके बाद शो के कलाकारों के साथ-साथ फैंस दोबारा पुराने एक्टर्स की सीरियल में वापसी के लिए कह रहे हैं. लेकिन आज हम आपको राशि के रोल में नजर आ चुकीं एक्ट्रेस रुचा हसब्निस जगदाले के मेकओवर के बारे में बताएंगें…

इतनी बदल गई है राशि

इन दिनों टीवी सीरियल साथ निभाना साथिया की जमकर चर्चाएं चल रही है. इसकी वजह वायरल हुआ वो वीडियो है जिसमें कोकिलाबेन यानी रुपल पाटेल रसोड़े में कुकर चढ़ाने वाली गुनहगार को ढूंढ रही है. टीवी सीरियल में राशी यानी रुचा हसब्निस जगदाले की कुछ फोटोज दिखाने जा रहे हैं, जिसमें वह बेहद बदल गई हैं.

अब ऐसी दिखती हैं रुचा हसब्निस जगदाले

आपको यकीन नहीं होगा लेकिन ये वही रुचा हसब्निस जगदाले हैं जिन्होंने टीवी सीरियल साथ निभाना साथिया में राशी का किरदार निभाया है. रुचा हसब्निस जगदाले ने टीवी सीरियल को अलविदा करने के बाद ही अपने बॉयफ्रेंड राहुल जगदाले से शादी रचा ली थी.

 

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💚💚💚💚 . . 📸- @acapture_wedding @a__capture

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हाल ही में मॉम बनी हैं रुचा हसब्निस जगदाले

अदाकारा रुचा हसब्निस जगदाले हाल ही में मॉम बनी हैं. उन्होंने अपने प्रेग्नेंसी के वक्त ये खूबसूरत फोटोज क्लिक करवाई थी. रुचा हसब्निस जगदाले ने बीते साल दिसंबर में ही अभी करीब 2 महीने पहले ही अपनी बेटी को जन्म दिया है.

सीरियल छोड़ लिया था शादी का फैसला

रुचा हसब्निस जगदाले ने जिस वक्त टीवी सीरियल साथ निभाना साथिया छोड़ा था वो उस वक्त काफी हिट शो था. बावजूद इसके अदाकारा ने अपनी नई जिंदगी शुरू करने के लिए इस टीवी सीरियल को अचानक बाय-बाय कर दिया था.

महाराष्ट्रियन रीति-रिवाज से हुई थी शादी

खास बात ये है कि रुचा हसब्निस जगदाले ने अपने बॉयफ्रेंड संग महाराष्ट्रियन रीति-रिवाज से शादी की थी. हालांकि इस टीवी सीरियल में रुचा हसब्निस जगदाले ने राशी का किरदार निभाया था. जिसे खूब पसंद किया गया था.

 

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WOH MAIN THI 🙋🏻‍♀️😂🤦🏻‍♀️ . . Saw the memes today… @yashrajmukhate crazy stuff 😅 #rashi

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बता दें, भले ही इस टीवी सीरियल को छोड़ अपनी नई जिंदगी में ढल चुकीं एक्ट्रेस रुचा हसब्निस जगदाले भले ही खुश हैं, लेकिन वह समय समय पर फैंस के लिए पोस्ट शेयर करती रहती हैं और अपनी यादों को फैंस के साथ शेयर करती रहती हैं.

‘KKK 10’ स्टार बलराज स्याल ने गुपचुप रचाई शादी, शहनाज गिल संग कर चुके हैं रोमांस

कोरोनावायरस के बढ़ते मामलों के बीच टीवी सेलेब्स की शादी का सिलसिला जारी है. बीते दिनों ससुराल सिमर का फेम एक्टर मनीष रायसिंघानिया ने अपनी गर्लफ्रेंड संगीता से शादी रचाई थी. वहीं अब खबरें हैं की ‘खतरों के खिलाड़ी 10’ स्टार बलराज स्याल ने भी गुपचुप तरीके से शादी कर ली है. वहीं खास बात यह है कि उनकी लाइफ पार्टनर बौलीवुड की एक सिंगर हैं. आइए आपको बताते हैं कौन हैं ‘खतरों के खिलाड़ी 10’ स्टार बलराज स्याल की लाइफ पार्टनर…

बॉलीवुड सिंगर दीप्ति तुली के साथ लिए फेरे

टीवी के जानेमाने कॉमेडियन बलराज स्याल ने सबको अपनी शादी की खबर देकर चौंका दिया है. बलराज स्याल ने 7 अगस्त को बॉलीवुड सिंगर दीप्ति तुली के साथ सात फेरे ले लिए हैं. इस बात का खुलासा खुद बलराज स्याल ने ही एक इंटरव्यू के दौरान किया है.

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शूटिंग के दौरान मिले थे दोनों

 

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बलराज स्याल ने एक इंटरव्यू में बताया कि, ‘हम पिछले साल चंडीगढ़ में एक शूटिंग के दौरान मिले थे. मैं इस शो में एंकर था और दीप्ति तुली परफॉर्म करने आईं थीं. पहली नजर में वह मुझे बहुत पसंद आई. वो अक्सर मेरे मैसेजेस का जवाब नहीं देती थीं. शायद तब वो मुझे कुछ खास पसंद नहीं करती थीं.’

दीप्ति को शादी के लिए प्रपोज किया लेकिन…

आगे बलराज ने कहा कि, ‘तुर्की और ग्रीस की ट्रिप के दौरान हम दोनों की लम्बी लंबी बातें होने लगी जिसके बाद हम दोनों की 2 मुलाकातें भी हुई हैं. अपने जन्मदिन पर मैंने दीप्ति को शादी के लिए प्रपोज किया लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया. उसके बाद मैं एक टीवी शो की शूटिंग करने चला गया. मेरे वापस आने के बाद दीप्ति तुली ने शादी के लिए हामी भर दी. इसके बाद परिवार ने हम दोनों की कुंडली मिलवाई.’

 

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Lakh lakh vadaiyan paaji @balrajsyal @deeptitulimusic bhabhi 😍 kinni soni Jodi hai #deepraj ☺️ kisi di vi nazar na lag jave 🙈 baba ji tuhanu vadiyan khooshiyan bakshein 🙏🏻❤ Waheguru ji meher kari 🔱😇🙏🏻 Pehle wo dost the🤗 phir pyaar hua😍 aur umar bhar ke liye humsafar ban Gaye 😉😘🙈❤ 2 lines for you by me 🙈 #balrajsyal #deeptituli #bhaarsh_lover_varu #bhaarsh #bhaarshkimohabbatein #bhartisingh #harshu_the_legend #haarshlimbachiyaa #HumariPyariBharti #humarepyarehaarsh #bharsh #wewantkhatrashowbacksoon #comebackkkkhatra #laughterqueen #kkkhatra #thekhatrashow #KhatraKhatraKhatra #bhartisinghonsharechat #bhartikahaarsh #haarshkibharti #humtumaurquarantine #lyricisthaarsh #bhaarshthepowercouple #bhartiholics #bharshians #bhartians #haarshuthecutu #haarshians

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बता दें, ‘खतरों के खिलाड़ी 10’ में नजर आ चुके बलराज स्याल कई कौमेडी शोज का हिस्सा रह चुके हैं. और फैंस उनकी कौमेडी काफी पसंद करते हैं. वहीं दीप्ति भी बौलीवुड की कई फिल्मों में गाना गा चुकी हैं.

‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ के नट्टू काका हुए अस्पताल में एडमिट, जानें क्या है वजह

कोरोनावायरस के कहर के बीच सीरियल्स की शूटिंग शुरू हो चुकी है. वहीं सीरियल में काफी बदलाव देखने को मिल रहे हैं. बीते दिनों तारक मेहता का उल्टा चश्मा की कास्ट में फेरबदल देखने को मिला. जहां अंजलि भाभी और सोड़ी के किरदार निभाने वाले नेहा मेहता और गुरचरण सिंह ने सीरियल को अलविदा कहा तो वहीं नए किरदारों की एंट्री नें फैंस को एंटरटेन किया. इसी बीच खबर है कि शो के एक खास किरदार की बिगड़ी तबियत के चलते अस्पताल में भर्ती कराया गया है. आइए आपको बताते हैं क्या है पूरा मामला…

नट्टू काका हुए बीमार

शो में नट्टू काका (Nattu Kaka) का किरदार निभाने वाले एक्टर घनश्याम नायक (Ghanashyam Nayak) को अस्पताल में भर्ती कराया गया है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, उनके गले में परेशानी होने के कारण सर्जरी होगी. दरअसल, घनश्याम नायक ने लॉकडाउन के बाद से शूटिंग शुरू नहीं की है. लेकिन गले की गलैंड्स में परेशानी के चलते सर्जरी की नौबत आ गई है.

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गले में गांठ का होगा औपरेशन

खबरों से पता चला है कि कुछ दिनों पहले घनश्यान नायक के गले में गांठ डिटेक्ट हुई. डॉक्टर ने जिसके लिए सर्जरी बोला है वह जल्द ठीक होकर वापस आएंगे. नट्टू काका शो में एक दिलचस्प किरदार निभाते हैं और लोग उनके इस रोल को काफी पसंद भी करते हैं.

बता दें,  बीते दिनों बॉम्बे हाई कोर्ट ने 65 साल से ज्यादा उम्र के एक्टर्स को शूटिंग करने की अनुमति दे दी थी, जिसके बाद इस खबर से खुश घनश्‍याम नायक ने शूटिंग पर लौटने के बारे में एक्टर ने कहा था कि मैं अपनी आखिरी सांस तक काम करना चाहते हैं.

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Serial Story: रिश्ता (भाग-2)

पिछला भाग पढ़ने के लिए- रिश्ता भाग-1

उस शाम अशोकजी ने जब अलका से इस विषय पर बातचीत आरंभ की तो सोमनाथ भी वहां मौजूद थे.

सारी बात सुन कर अलका ने साफ शब्दों में अपना मत उन दोनों के सामने जाहिर कर दिया, ‘‘पापा, रोहन से मैं प्यार नहीं करती. फिर ऐसी कोई बात होती तो मैं आप को जरूर बताती.’’

‘‘बेटी, क्या तुम किसी और से प्यार करती हो?’’ सोमनाथजी ने सचाई जानने का मौका गंवाना उचित नहीं समझा था.

‘‘नहीं, अंकल, अभी तो अपना अच्छा कैरियर बनाना मैं  बेहद महत्त्वपूर्ण मानती हूं.’’

‘‘यह रोहन तुम्हें तंग करता है क्या?’’ अशोकजी की आंखों में गुस्से के भाव उभरे.

‘‘मुझे जैसे ही इस बात का एहसास हुआ कि वह मुझ से अलग तरह का रिश्ता बनाना चाहता है, तो मैं ने उस से बोलचाल बंद ही कर दी. उस ने मेरा इशारा न समझ आप को पत्र भेजा, इस बात से मैं हैरान भी हूं और परेशान भी.’’

‘‘तू बिलकुल परेशान मत हो, अलका. कल ही मैं उस से बात करता हूं. उस ने तुझे परेशान किया तो गोली मार दूंगा उस को,’’ अशोकजी का चेहरा गुस्से से भभक उठा.

‘‘यार, गुस्सा मत कर…नहीं तो तेरा ब्लड प्रेशर बढ़ जाएगा,’’ सोमनाथ ने अशोकजी को समझाया पर वह रोहन को ठीक करने की धमकियां देते ही रहे.

‘‘पापा,’’ अचानक अलका जोर से चिल्ला पड़ी, ‘‘आप शांत क्यों नहीं हो रहे हैं. एक बार हाई ब्लड पे्रशर के कारण नर्सिंग होम में रह आने के बाद भी आप की समझ में नहीं आ रहा है? आप फिर से अस्पताल जाने पर क्यों तुले हैं?’’

अपनी बेटी की डांट सुन कर अशोकजी चुप तो जरूर हो गए पर रोहन के प्रति उन के दिल का गुस्सा जरा भी कम नहीं हुआ था.

रोहन ने उस रात सोने से पहले अपनी मां मीनाक्षी को शर्मीली सी मुसकान होंठों पर ला कर जानकारी दी, ‘‘कल लंच पर मैं ने अलका और उस के पापा को बुलाया है. उन की अच्छी खातिरदारी करने की जिम्मेदारी आप की है.’’

‘‘यह अलका कौन है?’’ खुशी के मारे मीनाक्षी एकदम से उत्तेजित हो उठीं.

‘‘मेरे साथ पढ़ती है, मां.’’

‘‘प्यार करतेहो तुम दोनों एकदूसरे से?’’

रोहन ने गंभीर लहजे में जवाब दिया, ‘‘उस के पापा को तुम ने मना लिया तो रिश्ता पक्का समझो. वह गुस्सैल स्वभाव के हैं और अलका उन से डरती है.’’

‘‘अपने बेटे की खुशी की खातिर मैं उन्हें मनाऊंगी शादी के लिए. तू फिक्र न कर, मुझे अलका के बारे में बता,’’ मीनाक्षी की प्रसन्नता ने उन की नींद को कहीं दूर भगा दिया था.

अशोकजी ने फोन कर के रोहन को अपने घर बुलाया था, पर उस ने सुबह व्यस्तता का बहाना बना कर उन्हें व अलका को दोपहर के समय अपने घर आने को राजी कर लिया था.

‘‘बेटी, किसी के घर में बैठ कर उसे डांटनाडपटना जरा कठिन हो जाता है, पर वह लफंगा आसानी से सीधे रास्ते पर नहीं आया तो आज उस की खैर नहीं,’’ अशोकजी ने अपनी इस धमकी को एक बार फिर दोहरा दिया.

‘‘पापा, अपने गुस्से को जरा काबू में रखना, खासकर रोहन की मम्मी को कुछ उलटासीधा मत कह देना, क्योंकि रोहन उन्हें पूजता है. अपनी मां की हलकी सी बेइज्जती भी उस से बर्दाश्त नहीं होगी,’’ अलका बोली.

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‘‘मैं पागल नहीं हूं जो बिना बात किसी से उलझूंगा. रोहन तुम्हारा नाम अपने दिल से निकालने का वादा कर ले, तो बात खत्म. अगर वह ऐसा नहीं करता है तो मुझे सख्ती बरतनी ही पडे़गी,’’ अशोकजी ने अपनी बेटी की सलाह को पूरी तरह मानने से इनकार कर दिया.

‘‘पापा, समझदारी से काम लोगे तो इस मामले को निबटाना आसान हो जाएगा. हमें रोहन की मां को अपने पक्ष में करना है. बस, एक बार उन्होंने समझ लिया कि यह रिश्ता नहीं हो सकता तो रोहन को सीधे रास्ते पर लाने के लिए उन का एक आदेश ही काफी होगा.’’

‘‘मैं समझ गया.’’

‘‘गुड और गुस्से को काबू में रखना है.’’

‘‘ओके,’’ अपनी बेटी का गाल प्यार से थपथपा कर अशोकजी ने घंटी का बटन दबा दिया था.

मीनाक्षी ने मेहमानों की आवभगत के लिए पड़ोस में रहने वाली गायत्री को भी बुला लिया था.

वह अपनी भावी बहू व समधी की खातिर में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती थी. इतने अपनेपन से मीनाक्षी ने अशोकजी व अलका का स्वागत किया कि तनाव, शिकायतों व नाराजगी का माहौल पनपने ही नहीं पाया.

रोहन बाजार से मिठाई लेने चला गया था. वह कुछ ज्यादा ही देर से लौटा और तब तक मीनाक्षी ने मेज पर खाना लगा दिया था.

खाना इतना स्वादिष्ठ बना था कि अशोकजी ने सारी चिंता व परेशानी भुला कर भरपेट भोजन किया. मीनाक्षी के आग्रह के कारण शायद वह जरूरत से ज्यादा ही खा गए थे.

भोजन कर लेने के बाद ही मुद्दे की बात शुरू हो पाई. गायत्री आराम करने के लिए अपने घर चली गई थी.

‘‘मीनाक्षीजी, हम कुछ जरूरी बातें रोहन और आप से करने आए हैं,’’ अशोकजी ने बातचीत आरंभ की.

‘‘भाई साहब, मैं तो इतना कह सकती हूं कि अलका को सिरआंखों पर बिठा कर  रखूंगी मैं,’’ मीनाक्षी ने अलका को बडे़ प्यार से निहारते हुए जवाब दिया.

‘‘आंटी, मैं रोहन से प्यार नहीं करती हूं, इसलिए आप कोई गलतफहमी न पालें,’’ अलका ने कोमल लहजे में अपने दिल की बात उन से कह दी.

‘‘मुझे रोहन ने सब बता दिया है, अलका. अपने पापा से डर कर तुम अपनी इच्छा को मारो मत. मुझे विश्वास है कि भाई साहब आज इस रिश्ते के लिए ‘हां’ कर देंगे,’’ अपनी बात समाप्त कर मीनाक्षी ने प्रार्थना करने वाले अंदाज में अशोकजी के सामने हाथ जोड़ दिए.

‘‘आप बात को समझ नहीं रही हैं, मीनाक्षीजी. मेरी बेटी आप के बेटे से शादी करना ही नहीं चाहती है, तो फिर  मेरी ‘हां’ या ‘ना’ का सवाल ही पैदा नहीं होता,’’ अशोकजी चिढ़ उठे.

‘‘पापा, डोंट बिकम एंग्री,’’ अलका ने अपने पिता को शांत रहने की बात याद दिलाई.

‘‘अंकल, आप इस रिश्ते  के लिए ‘हां’ कह दीजिए. अलका को राजी करना फिर मेरी जिम्मेदारी है,’’ रोहन ने विनती की.

‘‘कैसी बेहूदा बात कर रहे हो तुम भी,’’ अशोकजी को अपना गुस्सा काबू में रखने में काफी कठिनाई हो रही थी, ‘‘जब अलका की दिलचस्पी नहीं है तो मैं कैसे और क्यों ‘हां’ कर दूं?’’

‘‘वह तो आप से डरती है, अंकल.’’

‘‘शटअप.’’

‘‘पापा, प्लीज,’’ अलका ने फिर अशोकजी को शांत रहने की याद दिलाई.

‘‘लेकिन यह इनसान हमारी बात समझ क्यों नहीं रहा है?’’

‘‘अलका के दिल की इच्छा मैं अच्छी तरह से जानता हूं, अंकल.’’

‘‘तो क्या वह झूठमूठ इस वक्त ‘ना’ कह रही है?’’

‘‘जी हां, मुझे आप के घर से रिश्ता जोड़ना है और वैसा हो कर रहेगा, अंकल.’’

‘‘मैं तुम्हें जेल भिजवा दूंगा, मिस्टर रोहन,’’ अशोकजी ने धमकी दी.

‘‘भाई साहब, ऐसी अशुभ बातें मत कहिए. आप की बेटी इस घर में बहुत सुखी रहेगी, इस की गारंटी मैं देती हूं,’’ मीनाक्षी की आंखों में आंसू छलक आए तो अशोकजी चुप रह कर रोहन को क्रोधित नजरों से घूरने लगे.

‘‘पापा, आप इन्हें समझाइए और मैं रोहन को बाहर ले जा कर समझाती हूं,’’ अलका झटके से खड़ी हुई और बिना  जवाब का इंतजार किए दरवाजे की तरफ चल पड़ी.

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रोहन उस के पीछेपीछे घर से बाहर चला गया. मीनाक्षी और अशोकजी के बीच कुछ देर खामोशी छाई रही. सामने बैठी स्त्री की आंखों में छलक आए आंसुओं के चलते अशोकजी की समझ में  नहीं आ रहा था कि वह उस के मन को चोट  पहुंचाने वाली चर्चा को कैसे शुरू करें.

लेकिन एक बार उन के बीच बातों का जो सिलसिला शुरू हुआ तो दोनों को वक्त का एहसास ही नहीं रहा. अपनेअपने खट्टेमीठे अनुभवों को एकदूसरे के साथ उन्होंने बांटना जो शुरू किया तो 2 घंटे का समय कब बीत गया पता ही नहीं चला.

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किस काम का धर्म

एक दृष्टिकोण से तो यह मामला छोटा सा है, जिस में एक 19 साल की लड़की की जान गई. इस तरह की सैकड़ों जानें हर साल इस देश में जाती हैं. लड़की उत्तर प्रदेश के एक कसबे से दूसरे कसबे में अपने रिश्तेदार के साथ बाइक पर जा रही थी जिस के गिरने से वह मर गई. गिरने का कारण भी आम ही है.

इन 2 जनों को बाइक पर देख कर 2 युवकों ने अपनी बाइक पर से इन्हें छेड़ना शुरू कर दिया. इस इलाके में यह आम सोच है कि अगर एक लड़कालड़की बाइक पर जा रहे हैं तो दोनों प्रेमी हैं और उन्हें छेड़ने का मौलिक अधिकार हर उस जने के पास है जो ज्यादा मजबूत और दबंग है.

इस युवती के बड़े सपने थे. वह एक छोटे से कसबे दादरी के पास डेरी स्वैनर की रहने वाली थी और 99% अंक पा कर अमेरिका में बैक्सन कालेज, मैसाचूसेटस में फु ल स्कौलरशिप पर पढ़ रही थी. एक सुनहरा सपना दबंगों की हरकतों के कारण कुचल दिया गया.

इस तरह की घटनाएं तब से बढ़ गईं हैं जब से देश के कई हिस्सों में रोमियो स्क्वायड बन गए हैं. इन का ऊ पर से कहें तो उद्देश्य गैरजाति में प्रेम होने को ही रोकना नहीं है, किसी तरह का प्रेम होने से रोकना भी है ताकि शादियां सिर्फ  पंडितों के कहने पर कुं डलियां मिला कर हों.

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इन स्क्वायडों का दूसरा लाभ भगवा गैंगों को लगभग पुलिस पावर देना है ताकि ये धर्म के नाम पर मुसलमानों, दलितों और लड़कियों को लूट सकें और फि र लूट के पैसे से बड़े आलीशान धार्मिक आयोजन कर सकें. आखिर जो आशियाने, झांकियां, फू लों की मालाएं, बत्तियां, भंडारे हर थोड़े से दिनों के बाद लगते हैं, उन का पैसा आया कहां से है. यह लूट का पैसा होगा या उस चंदे का जो बाइकों पर सवार दबंग पे्रमी जोड़ो से है, मुसलमानों से, दलितों से, दुकानदारों स??े वसूलते हैं.

ये दबंग हर ताकत हाथ में रखते हैं. पुलिस वाले भी इन से डरते हैं क्योंकि आज शासन पर इन की पकड़ मजबूत है. थानेदारों का तबादला कराना उन की भीड़ के बाएं हाथ का काम है.

ये भगवाधारी गैंग वैसे जम कर भक्ति संगीत सुनते हैं और भजनकीर्तन में नाचते हैं पर धर्म भक्ति का अर्थ यह कब है कि वे शराफ त से पेश आएंगे? धर्म तो हिंसा सिखाता है. हमारे यहां हिंदू गैंग हैं तो इसलामी देशों में मुसलिम युवकों के और अमेरिका तक में ईसाई कट्टर गैंग हैं. अमेरिका में युवा कम हैं इन गैंगों में, वहां यह बीमारी 30-35 के बाद लगती है जब 1-2 गर्लफ्रैं ड छोड़ कर जा चुकी हों और नौकरी नहीं लग रही हो.

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धर्म अगर सद्व्यवहार सिखाता तो दुनिया में कहीं पुलिस की जरूरत ही नहीं होती. हर देश की जेलों में पादरियों, मुल्लाओं, पंडितों की पूजाप्रार्थना कराने वालों की जरूरत रहती है क्योंकि कैदी आमतौर पर कट्टर होते हैं. धर्म किस काम का अगर वह ढंग से जीना न सिखा सके, यह पूछने वाले का मुंह ही बंद कर दिया जाता है.

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