कैंसर रोगियों को मानसिक और शारीरिक रूप से फिट बनाएगी डांस थेरेपी

– डाॅ. तेजिन्दर कटारिया, कैंसर इंस्टीच्यूट, मेदांता-द मेडिसिटी

जब किसी व्यक्ति को कैंसर होने का पता चलता है तो उन के मन में यह सवाल जरूर होता है कि क्या वह कभी सामान्य जीवन जी सकेगा. कैंसर के इलाज में केवल रेडिएशन ही शामिल नहीं होता बल्कि और भी कई चीजें शामिल होती हैं जैसे कीमोथिरेपी और जरूरत पड़ने पर सर्जरी भी.

कैंसर के मरीज भी अच्छा जीवन जीना चाहते हैं. ऐसे में डांस थिरेपी कैंसर मरीजों के लिए बहुत ही उपयोगी साबित हो सकती है. आज अस्पताल तथा कैंसर चिकित्सा केन्द्र कैंसर के मरीजों को शारीरिक एवं भावनात्मक पीड़ा से उबारने के लिए डांस थिरेपी के फायदों को लेकर अध्ययन कर रहे हैं.

ऑस्ट्रेलिया और अमरीका में डांस थिरेपी को डांस मूवमेंट थिरेपी (डीएमटी) के रूप में तथा ब्रिटेन में डांस मूवमेंट साइकोथिरेपी (डीएमपी) के रूप में जाना जाता है. डांस थिरेपी का कैंसर के मरीजों की सामान्य मानसिक और शारीरिक बेहतरी पर समग्र सकारात्मक प्रभाव देखा गया है. हालांकि यह याद रखा जाना चाहिए कि कैंसर का पता चलने पर ओंकोलाॅजिस्ट अगर सर्जरी, रेडिएशन या कीमोथिरेपी की सलाह देते हैं तो उस के विकल्प के तौर पर डीएमटी/डीएमपी को अपनाया नहीं जाना चाहिए. दरअसल डीएमटी/डीएमपी एक ऐसा माध्यम है जिस के जरिए मरीज अपनी मानसिक वेदना से राहत पा सकता है.

डीएमटी/डीएमपी कैसे काम करता है

यह ज्ञात हो चुका है कि डीएमटी/डीएमपी एंडोर्फिन नामक न्यूरोट्रांसमीटर के उत्पादन को बढ़ाता है जिस से शरीर में विभिन्न प्रणालियों की सक्रियता में वृद्धि होती है. कैंसर के मरीजों में होने वाले साकारात्मक भावनात्मक एवं व्यवहारात्मक सुधार का यही आधार है और इस से शरीर की प्रतिरक्षा क्षमता भी बढ़ती है.

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नृत्य की भंगिमाओं एवं गतियों में क्रिएटिव डांस, इंटरैक्टिव गेम्स, रिलैक्सेशन तकनीकें, एक्सप्रेसिव गतिविधियां, इम्प्रोवाइजेशन और अभिनय प्रस्तुति शामिल है. इन शारीरिक और मानसिक गतिविधियों से चिकित्सीय या मनोचिकित्सा संबंधी प्रभाव पैदा होते हैं. इस का लाभदायक प्रभाव मन पर पड़ता है जो शरीर को शारीरिक एवं मानसिक तौर पर स्वस्थ्य रखता है तथा अलगाव और दोबारा कैंसर होने के भय को दूर करता है.

कैंसर के ज्यादातर मरीजों में सर्जरी के बाद अपने शरीर की छवि को लेकर नकारात्मक भावना होती है जिस का मरीज के ठीक होने पर नाकारात्मक प्रभाव पड़ता है. डीएमटी/डीएमपी किसी व्यक्ति के आत्मसम्मान को बढ़ा सकता है, अभिव्यक्ति में सुधार करता है और कैंसर के मरीजों को हंसा कर उन में बेहतर होने की भावना को भरता है। मानसिक तनाव को घटाता है. शारीरिक दर्द को कम करता है. मैस्टेक्टोमी सर्जरी कराने वाली महिलाओं में एक सप्ताह में दो से तीन बार डांस थिरेपी के डेढ़ घंटे के सत्र के बाद ये फायदे देखे गए.

ग्रुप डीएमटी / डीएमपी

इस के अलावा समूह में दी जाने वाली डांस थिरेपी अलगाव की भावना को दूर कर सकती है तथा आत्मविश्वास को मजबूत कर सकती है. डीएमटी/डीएमपी बातचीत के कौशल को बेहतर बनाने में मदद करता है तथा कैंसर रोगियों को स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, अन्य कैंसर रोगियों और अपने स्वयं के देखभालकर्ताओं और परिवारजनों के साथ जीवंत संबंध बनाए रखने के लिए प्रेरित करती है. ये मरीज अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना तथा उन्हें अभिव्यक्त करना शुरू करते हैं. इन समूहों में एक ही तरह के कैंसर के मरीज होते हैं या अलग-अलग तरह के मरीज मिले-जुले होते हैं.

डीएमटी/डीएमपी के हीलिंग चरण

नृत्य के लय एवं हाव-भाव का शरीर एवं मन से घनिष्ठ संबंध होता है. यह सबंध विभिन्न नृत्य चरणों या गतियों का उपयोग करके स्थापित किया जाता है जिसमें मुख्य रूप से चार चरण शामिल होते हैं, जैसे कि नियोजन, परिपक्वता, जागरूकता और मूल्यांकन.

1.   नियोजन में चिकित्सक किसी खास मरीज की शारीरिक और मानसिक स्थिति को समझने का प्रयास करता है. इस में कुछ वार्मअप व्यायाम शामिल हो सकते हैं.

2.  लयबद्ध गतियों के माध्यम से शांति एवं एकाग्रता प्राप्त होने पर परिपक्वता की प्राप्ति होती है. वे तनाव तथा एंग्जाइटी को बेहतर तरीके से नियंत्रण कर पाते हैं.

3.  जागरूकता के चरण में मरीज को पर्याप्त शारीरिक एवं मानसिक ताकत प्राप्त होती है जिस से रोग का मुकाबला करने की क्षमता विकसित होती है और उसमें आशा की भावना जागृत होती है.

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4. मूल्यांकन के दौरान, रोगियों में डांस थेरेपी के स्पष्ट लाभ स्पष्ट तौर पर प्रकट होते हैं तथा एक दूसरे के बीच संपूर्ण अनुभवों को साझा करने के साथ सत्र का समापन किया जा सकता है. पूरा सत्र 9 से 10 सप्ताह से अधिक का हो सकता है.

इसी तरह जीवनशैली में थोड़ा सा बदलाव रोगियों को बेहतर जीवन स्तर की ओर ले जाता है और उन्हें कैंसर जैसी कई बीमारियों से दूर रहने में मदद करता है. सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने दैनिक आहार में फलों को शामिल करें. नियमित रूप से योग बहुत प्रभावी है. सूर्य नमस्कार अतिरिक्त कैलोरी को खपाने का एक प्रभावी उपाय है. अधिक कैलोरी के सेवन का संबंध कैंसर के विकास से है.

कांटों भरी ग्लैमर की डगर

हाल ही में तमिल अदाकारा विजयालक्ष्मी ने एक नेता के फौलोअर्स के द्वारा हैरस किए जाने के चलते आत्महत्या की कोशिश की. उन को बचा लिया गया. मगर भोजपुरी अदाकारा अनुपमा पाठक, सुशांत सिंह राजपूत और उन की मैनेजर रही दिशा को बचाया नहीं जा सका. चमकदमक की दुनिया में खुद को खत्म करने का यह सिलसिला नया नहीं है. जिया खान, प्रत्यूषा बनर्जी जैसे कई नाम हैं, जो बेहद कम उम्र में खुद को खत्म कर बैठे.

इन की आत्महत्याओं की वजह चाहे जो भी रही हो, मगर एक सवाल जरूर छोड़ जाती हैं कि आज का युवा इतना कमजोर क्यों है. आज सिर्फ बौलीवुड ही नहीं, बल्कि हर क्षेत्र चुनौतियों से भरा हुआ है. नैक टु नैक कंपीटिशन का जमाना लद गया अब तो हैड टु हैड कंपीटिशन का जमाना है. जब

क्षेत्र चुनौती भरा है तो लड़ने का हौसला भी रखना चाहिए.

हजारों लड़कियां पहुंचती हैं मुंबई

स्क्रीन पर किसी फिल्म को देख कर बहुत सी गर्ल्स उन किरदारों में खुद को फिट कर देती हैं. जेहन में ख्वाहिशें पनपने लगती हैं. हर साल हजारों लड़कियां ऐक्ट्रैस बनने का सपना ले कर छोटे शहरों से मुंबई पहुंचती हैं. कुछ को ऐंटरटेनमैंट इंडस्ट्री में ऐंट्री मिल जाती है, लेकिन फिल्मी दुनिया में खुद को आजमाना कई लड़कियों के लिए एक बुरा सपना बन कर रह जाता है.

कई बार तो ऐसा भी होता है कि 1 या 2 फिल्मों में काम करने के बाद ही कैरियर चौपट हो जाता है. ऐसे में ग्लैमरस और शोहरत की आदी हो चुकी अभिनेत्रियां डिप्रैशन की शिकार भी हो जाती हैं. कई लड़कियों को कास्ंिटग एजेंट्स और डाइरैक्टर्स द्वारा यौन शोषण का सामना भी करना पड़ता है, लेकिन कैरियर को बचाने के लिए ये अभिनेत्रियां अपनी आपबीती नहीं बताती हैं. क्योंकि उन्हें फिल्में छिनने से ले कर बायकौट होने तक का भी खतरा रहता है.

हालांकि ऐसी भी कई अभिनेत्रियां हैं, जो किसी भी मुद्दे पर खुल कर बात करती हैं, जिन में राधिका आप्टे और कंगना रनौत का नाम सब से ऊपर आता है, जो बेबाक अंदाज में अपनी बात रखने से हिचकिचाती नहीं हैं. तनुश्री दत्ता के मीटू कैंपेन के बाद कई अभिनेत्रियों ने यौन शोषण के मुद्दे पर अपनी बात रखी थी, जिस के बाद बौलीवुड गलियारे में हंगामा मच गया था.

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सैक्सुअल फैवर्स की डिमांड

बौलीवुड में जाना है तो ये सब तो करना ही पड़ेगा, यह लाइन बड़ी ही आसानी से बौलीवुड गलियारे में इस्तेमाल की जाती है. कई लोगों का मानना है कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में रोल के बदले में सैक्सुअल फैवर्स मांगा जाना कोई बड़ी बात नहीं है. पुलिस से शिकायत करने पर वे कहते हैं कि फिल्मी दुनिया वाले तो कुछ भी कर सकते हैं. हम आप को कुछ दे रहे हैं, आप को भी हमें बदले में कुछ देना पड़ेगा. ये घिसीपिटी लाइनें इस जगत में सालों से चली आ रही हैं.

नो कौंटैक्ट नो आइडिया

आजकल किसी भी फील्ड में अच्छी जौब चाहिए तो सिफारिश लगवानी पड़ती है और सिफारिश लगवाने के लिए कौंटैक्ट की जरूरत पड़ती है. जिन युवतियों के पास कौंटैक्ट नहीं होता उन्हें आइडिया ही नहीं होता कि करना क्या… शुरुआत कहां से करें. ऐसे में फिल्मों में रोल के लिए उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ती है. ऐसे में लोग फायदा भी उठा सकते हैं. नेपोटिज्म पर अभी बहस छिड़ी हुई है कि स्टार किड्स को बड़ी आसानी से फिल्में मिल जाती हैं, क्योंकि उन के कौंटैक्ट तगड़े होते हैं. हालांकि अगर दर्शकों को कोई ऐक्टर या ऐक्ट्रैस पसंद न आए तो उन्हें नकार भी देते हैं भले ही वे किसी बड़े डाइरैक्टर या ऐक्टर की संतान क्यों न हों.

नौलेज की कमी

वह दौर गुजर गया जब किसी डाइरैक्टर की नजर आप पर पड़ी और उस ने आप को फिल्म में रोल औफर कर दिया. आजकल औडिशन होते हैं. कई लड़कियां बिना किसी तैयारी के ही सिर्फ सुनहरे सपनों के साथ मुंबई या दिल्ली पहुंच तो जाती हैं, लेकिन नौलेज की कमी के कारण उन्हें यह भी नहीं पता होता कि औडिशन कैसे, कब और कहां देना है.

पैसों की समस्या

अगर कैरियर के रूप में बात करें तो जैसे हमें पता होता है कि पायलट, डाक्टर, इंजीनियरिंग क्षेत्र में जाने के लिए पैसे लगेंगे तो फिर हम उसी आधार पर पैसे रखते हैं उसी तरह बौलीवुड में भी कैरियर बनाने के लिए अच्छेखासे अमाउंट की जरूरत पड़ती है. अगर आप सोच रही हैं कि ट्रेन में 500 रुपए ले कर मुंबई जाने से आप ऐक्ट्रैस बन जाएंगी तो बता दें कि पोर्टफोलियो, फोटोशूट, फिटनैस, ट्रेनिंग, मेकअप के लिए काफी पैसों की जरूरत पड़ती है.

ऐसे मिलेगी बौलीवुड में ऐंट्री

माना कि मुंबई नगरी पहुंचने के बाद बौलीवुड में ऐंट्री लेने के लिए स्ट्रगल का दौर शुरू हो जाता है. कुछ को कामयाबी मिल जाती है तो कुछ को ऐंटरटेनमैंट इंडस्ट्री में लंबी जद्दोजहद करनी पड़ती है. कई बार ऐसा भी होता है लंबे समय तक मेहनत करने के बाद भी कामयाबी नहीं मिलती. ऐसे में अपने कौन्फिडैंट को डगमगाने नहीं देना है, बल्कि हौसला बुलंद कर सिर्फ अपने उद्देश्य पर नजर रखनी है. जब कामयाबी न मिले तो हताश होने की बजाय अपना मनोबल मजबूत रखना है. कौन सी मंजिल है जो आसानी से मिल जाती है, इसलिए इस की तैयारी बहुत अच्छी तरह प्लानिंग के अनुसार करनी है.

आइए जानते हैं कि बौलीवुड में कैरियर चमकाने के लिए क्या करें:

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खुद को पहचानें

अगर आप को लगता है कि आप बौलीवुड के लिए बनी हैं तो अपने अंदर के छिपे टैलेंट को पहचानें और सोचें कि शुरुआत कहां से करनी चाहिए. आप कालेज में हैं तो पढ़ाई के साथसाथ एक्टिंग के लिए भी औडिशन देना सही रहेगा.

पर्सनैलिटी पर दें ध्यान

एक सफल अभिनेत्री बनने के लिए टैलेंट और ऐक्टिंग के साथ ही लुक भी काफी हद तक मैटर करता है. इसलिए खुद पर ध्यान दें. इस के लिए अपनी स्किन, हेयर पर ध्यान दें. हैल्दी डाइट लें और पर्याप्त मात्रा में पानी पीना न भूलें. जूस भी पी सकती हैं. इस से स्किन हाइड्रेट रहेगी. आप ने फिल्मी सितारों को तो देखा ही होगा कि वे कितने फिटनैस फिक्र होते हैं और फिट रहने के लिए कितनी मेहनत करते हैं, आप एक्सरसाइज, ऐरोबिक्स और जिम का सहारा ले सकती हैं.

ड्रैसिंग सैंस डैवलप करें

सब से पहले कोई भी व्यक्ति जब हमें देखता है तो हमारे पहनावे को देख कर काफी कुछ अनुमान लगा लेता है और बौलीवुड में स्टाइल के साथसाथ खुद की पर्सनैलिटी को अच्छी तरह ग्रूम करना होगा. इस के लिए वही कपड़े पहने जो आप की बौडी को सूट करते हों. वहीं हेयर स्टाइल का हमारी पर्सनैलिटी में काफी ञ्जामिका होती है. इसलिए किसी प्रोफैशनल हेयर स्टाइलिस्ट से अपने फेस कट के हिसाब से एक बढि़या सा हेयर कट लें और उन की सलाह के हिसाब से ही हेयरस्टाइल बनाएं.

छोड़ दो  झिझक

जब आप ने फिल्मी दुनिया में आने का सोच ही लिया है तो  िझ झक किस बात की. सोचिए जब आप स्टार बन जाएंगी तो सब की नजर आप की अभिनय पर होगी. इसलिए औडिशन देते समय स्क्रिप्ट के किरदार में खुद को पूरी तरह रमा कर ऐक्टिंग करें. कैमरे के सामने नर्वस होना आप के लिए ठीक नहीं है, साथ ही फेशियल ऐक्सप्रैशन भी बहुत मायने रखता है.

प्रैक्टिस है जरूरी

एक बेहतर ऐक्टर बनने के लिए पै्रक्टिस बहुत जरूरी है, ताकि आप किरदार के हिसाब से फेशियल ऐक्सप्रैशन देने में ऐक्सपर्ट हो सकें. ऐक्टर को सीन और सिचुएशन के हिसाब से खुद को ढालना पड़ता है. इस के लिए आप को आइने के सामने रोज किसी किरदार की ऐक्टिंग करनी होगी और अपनी बौडी लैंग्वेज पर ध्यान देना होगा. ऐसा करने से खामियों का पता चलेगा जिन्हें आप सुधार सकेंगे.

ऐक्टिंग स्कूल जौइन करने से मिलेगा लाभ

जिस तरह किसी भी क्षेत्र में कैरियर के लिए एजुकेशन की जरूरत पड़ती है ठीक उसी तरह एक्टर बनने के लिए भी स्किल सीखना जरूरी है. आज बौलीवुड में कई ऐसे ऐक्टर भी हैं जो किसी ऐक्टिंग स्कूल में नहीं गए, लेकिन अगर आप ऐक्टिंग स्कूल में जाते हैं तो अभिनय सीखने में काफी मदद मिलती है.

पोर्टफोलियो से बनेगी बात

अगर आप ऐक्टिंग की दुनिया में कदम रखने की सोच रही हैं तो सब से पहले अपना एक पोर्टफोलियो बनवाएं क्योंकि इस के जरीए ही किसी भी प्रोडक्शन हाउस या कास्टिंग डाइरैक्टर को आप अप्रोच कर पाएंगी. पोर्टफोलियो हमेशा किसी प्रोफैशनल फोटोग्राफर से बनवाएं.

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स्ट्रौंग होना है जरूरी

हम सक्सैस को तो पौजिटिव लेते हैं, लेकिन थोड़ी असफलता देख कर निराश हो जाते हैं. मायानगरी में अकसर काम न मिलने पर या तो लोग स्ट्रैस में आ जाते हैं या नशे के आदी हो जाते हैं. इसलिए खुद को मोटिवेट करते रहें और मजबूती से सभी चीजों का सामना करें. सफलता और असफलता दोनों को स्वीकार करना सीखें. लोगों की बातों में न आ कर अपना नजरिया बनाएं. फैमिली से अटैच रहें, उस से मिलनाजुलना करें, मिलना संभव न हो तो फोन पर बात करना न छोड़ें, क्योंकि जो लोग परिवार से दूर हो जाते हैं या उन के खिलाफ जा कर बिना सोचेसम झे मुंबई चले जाते हैं उन्हें ज्यादा परेशानी होती है, फैमिली सपोर्ट बहुत जरूरी है.

भाषा पर पकड़

लुक और बौडी लैंग्वेज के साथ ही आप की भाषा पर भी पकड़ होनी चाहिए. भले ही आप हिंदी बोलें या अंगरेजी आप का उच्चारण सही और स्पष्ट होना चाहिए, साथ ही कम्यूनिकेशन स्ट्रौंग होने से आप का कौन्फिडैंस भी बढ़ेगा.

कौंटैस्ट में लें भाग

अगर आप ने सोच लिया है कि आप को फिल्मी परदे पर अपनी ऐक्टिंग का लोहा मनवाना है तो इस की तैयारी पहले से ही कर लें, क्योंकि आखिर में अपना टैलेंट ही काम आता है. इसलिए आप के शहर में छोटेबड़े जो भी ब्यूटी कौंटैस्ट, हो उस में पार्टिसिपेट कर लें. इस से लोगों का सामना करने की क्षमता बढ़ेगी और आप का व्यक्तित्व भी निखरेगा. आज के समय में ऐसी बहुत सी अभिनेत्रियां हैं जो बौलीवुड में आने से पहले मौडलिंग, एड शूट और थिएटर में काम करती थीं यानी जो भी काम मिले छोटा या बड़ा करना शुरू कर दें, साथ ही सहनशक्ति रखना बेहद जरूरी है.

इन बातों को करें इग्नोर

– फिल्मी जगत में कुछ लोग आप को सपोर्ट करेंगे तो कुछ आप की आलोचना करेंगे. इन सब के लिए आप को पहले से ही मानसिक रूप से तैयार रहना पड़ेगा.

– ऐसा भी नहीं है कि इंडस्ट्री में सिर्फ  झांसा देने वाले लोग हैं, यहां अच्छे लोग भी हैं, बस आप को जरूरत है सही जगह पहुंचने की, सही और गलत में फर्क महसूस करने की.

– खुद पर भरोसा रखें, अपनी मेहनत पर शक न करें और प्रतिभा को निखारें.

– आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ें.

– वैल स्पोकेन बनें ताकि अपनी बात रख सकें.

‘‘नेपोटिज्म पर अभी बहस छिड़ी हुई है कि स्टार किड्स को बड़ी आसानी से फिल्में मिल जाती हैं, क्योंकि उन के कौंटैक्ट तगड़े होते हैं. हालांकि अगर दर्शकों को कोई ऐक्टर या ऐक्ट्रैस पसंद न आए तो उन्हें नकार भी देते हैं भले ही वे किसी बड़े डाइरैक्टर या ऐक्टर की संतान क्यों न हों…’

 बौलीवुड में छोटे शहर से आई अभिनेत्रियों का डंका

आज के समय में कई ऐसी बौलीवुड अभिनेत्रियां हैं, जिन्होंने कड़ी मेहनत के बाद आज वह मुकाम हासिल कर लिया है कि बडे़ से बड़े ऐक्टर्स को भी टक्कर देती हैं.

प्रियंका चोपड़ा

आज बौलीवुड के साथ हौलीवुड में भी प्रियंका ने अपनी अलग पहचान बनाई है. प्रियंका एक बेहद छोटे शहर से संबंध रखती हैं.  झारखंड में जन्मी प्रियंका अपने परिवार के साथ यूपी के बरेली में रहती थीं.

प्रियंका ने यह मुकाम अपनी मेहनत से हासिल की है.

मिस वर्ल्ड का खिताब जीतने के बाद प्रियंका ने बौलीवुड का रुख किया.

कंगना रनौत

बौलीवुड में क्वीन नाम से फेमस कंगना मंडी, हिमाचल प्रदेश की रहने वाली हैं. वे कई बार अपने संघर्ष के बारे में बात कर चुकी हैं. कंगना ने यह भी बताया है कि उन की अंगरेजी की वजह से बौलीवुड में उन का खूब मजाक उड़ाया जा चुका है. कड़ी मेहनत के बाद कंगना ने अपनी अंगरेजी के साथसाथ अपनी बाकी चीजों को भी सही कर लिया. आज वे कौन्फिडैंस से लबरेज दिखती हैं.

विद्या बालन

विद्या बालन एक ऐसी अभिनेत्री हैं, जिन्होंने बौलीवुड में अपनी एक अलग छवि बनाई है. उन की ऐक्टिंग से ले कर उन के लुक तक के सभी दीवाने हैं. विद्या के लिए ये सब इतना आसान नहीं था, क्योंकि उन की परवरिश केरल के पलक्कडके पुथुर कसबे में बसे एक छोटे से गांव पूथमकुरुस्सी में हुई है. विद्या ने ‘हम पांच’ टीवी सीरियल से अपने अभिनय की शुरुआत की थी और आज वे एक जानीमानी स्टार हैं

.बौलीवुड में ब्रौडमाइंड का मतलब क्या है

इस विषय पर बात करते हुए ऐक्ट्रैस स्मिता गर्ग ने अपनी कहानी बताई. स्मिता के अनुसार, ऐक्ट्रैस बनने के लिए आप को पहले ही तैयारी करनी चाहिए और अपना इरादा मजबूत रखना चाहिए. आप को काफी स्ट्रौंग बनना पड़ता है. साथ ही फैमिली सपोर्ट की भी काफी जरूरत होती है. स्मिता का मानना है कि गर्ल्स हों या बौएज अच्छी ऐजुकेशन के बाद बौलीवुड में जाने से बहुत सारी चीजें आसान हो जाती हैं. मैं ने पहले अपनी पढ़ाई पूरी की, इस के बाद लोगों से इंस्पायर्ड होने के बाद ऐक्ंिटग में मेरा रु  झान बढ़ता गया. मैं ने पहले मौडलिंग और कई फैशन शोज में पार्टिसिपेट किया. इवेंट होस्ट किए, कई ब्रैंड्स के लिए ऐंकरिंग भी की और आखिरकार मुंबई पहुंच गई.

जहां मैं ने 4-5 सालों में ‘नादानियां,’ ‘भयभीत,’ ‘सावधान इंडिया,’ ‘वैबसीरीज रंगबाज-2’ में काम करने के अलावा थिएटर और लघु फिल्मों में भी काम किया. इस के बाद मैं मुंबई से अपने शहर लौट आई. कुछ दिन मैं यहीं से काम करूंगी.

मेरा मानना है कि अगर आप को इस फील्ड में जाना है तो पहले थिएटर करें उस के बाद मुंबई जाने की सोचें, साथ ही पौजिटिव लोगों की टच में रहें.

ये मेरे अपने विचार हैं. वहां जाने के बाद लोग आप को डाइरैक्टली माइंडवाश करते हैं और कंप्रोमाइज करने के लिए बोलते हैं. आप भले घर से कितना भी सोच कर जाएंगे कि मु झे सही दिशा में काम करना है, लेकिन वहां वे लोग जिन की आप के सामने कोई औकात भी नहीं है वे भी कंप्रोमाइज करने के लिए बोलेंगे. यह मैं ने भी बहुत सुना है कि यह वहां का कल्चर है.

मैं ने यह देखा है कि कोई कंप्रोमाइज करने के लिए आप को फोर्स नहीं करता, वे आप के सामने चौइस रखते हैं कि आप यह कर लो हम आप को लीड रोल दे देंगे. कहींकहीं फोर्सफुली भी होता है. लेकिन अगर कभी किसी के साथ ऐसी घटना हुई तो उस के बारे में मैं नहीं बता सकती.

मैं कई बड़े लोगों से भी मिली थी. उन का बस यही इच्छा रहती है कि उन के साथ लंच करो, डिनर करो यही होता है. काम की बात कोई नहीं करता. यह काफी स्लो प्रोसैस है, इस के लिए आप के लिए धैर्य रखना बहुत जरूरी है.

यह भी है कि अगर आप ने कंप्रोमाइज कर लिया तो आप को सिर्फ एक प्रोजैक्ट में काम मिल जाएगा. आखिर में कैमरे के सामने आप का टैलेंट, आप की भाषा, ऐक्टिंग और लुक ही काम आएगा.

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वहीं अगर आप मुंबई जा रहे तो फाइनैंशियल सपोर्ट और फैमिली सपोर्ट की काफी जरूरत होती है, क्योंकि मुंबई में कोई आप का साथ नहीं देता और अगर आप की बैकग्राउंड नहीं है तो आप के लिए वहां के ग्लैमरस माहौल में सर्वाइव करना मुश्किल हो जाता है, जो भी आप की प्रौब्लम हो उसे अपनी फैमिली से जरूर शेयर करें.

मुंबई में यह जरूरी नहीं है कि आप को हमेशा काम मिलता रहे, यह भी हो सकता है कि कोई बड़ा प्रोजैक्ट मिल जाए जहां आप सालों काम करते हैं, वहीं यह भी हो सकता है आप के पास कोई काम ही न हो, कई बार ब्लाइंड खबरों की वजह से भी आप के कैरियर को नुकसान पहुंचता है. इसलिए अच्छे और बुरे दोनों वक्त के लिए पहले से ही तैयार होना पड़ेगा. वहां आप को फाइट करनी है न कि गलत रास्ता अपनाना है.

बौलीवुड का मैंटली माहौल देखा जाए जो वहां आप को दबाया जाता है. आउटसाइडर के साथ अलग तरह का व्यवहार किया जाता है. मैं ने खुद भी ये चीजें फेस की हैं खासकर गर्ल्स के लिए जो भी मिलेगा यही कहेगा कि अरे यार कंप्रोमाइज कर लो. एक बार का तो काम है फिर आप मना करोगे तो अरे तुम तो छोटे शहर की लड़की हो, तुम तो बहुत नैरो माइंड हो, ब्रौडमाइंड बनो. ऐसी लड़कियां नहीं चलतीं. उन की नजर में ब्रौडमाइंड का मतलब है जाओ बिस्तर पर सो जाओ और काम हो जाएगा. यह वहां का रूल है लेकिन यह आप की चौइस है कि आप इसे स्वीकार करती हैं या नहीं.

स्नैक्स में परोसें पनीर बॉल्स

पनीर बॉल्स छोटे बच्चो के लिए एक बेहतरीन स्टार्टर रेसिपी है. छोटे बच्चे अक्सर स्नैक्स, फास्ट फूड्स और स्टार्टर के दीवाने होते है और बड़े चाव से उन्हें खाते भी है. लेकिन सभी फास्ट फूड्स और स्नैक्स सेहत के लिए अच्छे नहीं होते लेकिन यह पनीर के बॉल्स स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पोषनीय और स्वास्थ्यवर्धक भी होते हैं, तो आप बेझिझक इसे अपने बच्चों के लिए बनाकर उन्हें खुश कर सकती हैं.

हमें चाहिए

100 ग्राम फ्रेश पनीर

1 मध्यम आकार का उबला आलू

2 बड़े चम्मच मकई का आटा

8-10 पापड़ का चुरा

1 बड़ा चम्मच अदरक लहसुन का पेस्ट

1 बड़ा चम्मच ब्रेड क्रम्स

¼ छोटा चम्मच हल्दी पाउडर

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1 छोटा चम्मच चाट मसाला

1 छोटा चम्मच लाल मिर्च पाउडर

½ छोटा चम्मच काली मिर्च पाउडर

1/8 छोटा चम्मच गरम मसाला

2 बड़ा चम्मच हरी धनिया

½ कप पानी में 2-3 बड़े चम्मच मकई का आटा घोलकर बनाई स्लरी

स्वाद अनुसार नमक

1 बड़ा चम्मच तेल, तलने के लिए तेल

विधि

सबसे पहले एक नॉनस्टिक पैन में तेल डाले फीर उसमे अदरक लहसुन का पेस्ट डालकर थोडा भून लें, अब गैस की आंच कम कर के उसमे हल्दी पाउडर, नमक, लाल मिर्च पाउडर, गरम मसाला डाले और उसे थोडा भून लें फिर गैस की आंच बंद कर दें.

अब उसमें उबला हुआ आलू स्मैश करके डालें फिर उसमें चाट मसाला, काली मिर्च पाउडर, फ्रेश पनीर और ब्रेड क्रम्स डालें, अब उसमें में हरा धनिया डालें और उसे अच्छे से मिला कर मिश्रण तैयार करें.

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अब मिश्रण में से थोड़ा-थोड़ा मिश्रण लेकर उसके एक सम्मान बॉल्स बना लें, अब सभी बॉल्स को कॉर्नफ्लोर में रोल कर ले फिर तीन-चार बॉल्स को कॉर्नफ्लोर स्लरी में डाल कर उसे काटा चमच की सहायता से निकाल के पापड़ के चूरे में रोल करे और अपने हाथों से उस पर पापड़ का चुरा अच्छे से लगाएं.

अब एक कढ़ाई में तेल गर्म करें फिर उसमें पापड़ में रोल किए पनीर के बॉल्स को डालें और पापड़ के फ्राय होने तक ही तले, यानि की उसे तेल में डाल के तुरन्त निकाल दें, यदि ज्यादा देर तक रखा तो पापड़ जल जाएंगे, इस प्रकार चार-चार बॉल्स डालके उसे तले, सभी बॉल्स को तलने के बाद सर्विंग प्लेट में निकालकर मीठी चटनी के साथ सर्व करें.

थायराइड के कारण मुझे अकसर कब्ज रहता है?

सवाल-

मैं 42 वर्षीय थायराइड का रोगी हूं. मुझे अकसर कब्ज रहता है. इस समस्या से कैसे छुटकारा पाऊं?

जवाब-

जिन लोगों में थायराइड हारमोनों का स्तर कम होता है अर्थात जिन्हें हाइपोथायराइडिज्म होता है उन में अकसर कब्ज की समसया देखी जाती है. हाइपोथायराइडिज्म में बड़ी आंत की कार्यप्रणाली धीमी पड़ जाती है, जिस से उस का संकुचन प्रभावित होता है और भोजन से अधिक मात्रा में जल का अवशोषण होने लगता है, जो बड़ी आंत में पचे हुए भोजन की धीमी गति का कारण बन जाता है. जब भोजन बड़ी आंत में सामान्य गति से आगे नहीं बढ़ता है तो मल त्यागने की आदत में बदलाव आ जाता है.

हाइपोथायराइडिज्म से ग्रस्त लोग शारीरिक रूप से सक्रिय रहें. अपने भोजन में सब्जियां, फ लों, साबूत अनाज और दही जरूर शामिल करें. थायराइड हारमोनों के स्तर को नियंत्रित रखने के लिए अपनी दवा सही समय पर लें. तनाव न पालें, क्योंकि यह भी कब्ज का एक प्रमुख कारण है.

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आजकल के समय में कब्ज की शिकायत होना कोई असमान्य बात नहीं है. हर 10 में से 5वे व्यक्ति को आज के समय में कब्ज की शिकायत होती है. कब्ज जिसे लोग आमतौर पर कॉन्स्टिपेशन के नाम से जानते हैं, इसका मुख्य कारण आपका स्ट्रेस लेना, लो फाइबर डायट का होना, रोजाना ठीक से फीजिकल एक्सरसाइज ना करना और लिक्विड चीजों का कम सेवन करना, जैसे ज्यादा पानी ना पीना हो सकता है.

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बेवजह: दूसरे का अंतर्मन टटोलना आसान है क्या?

‘‘तू ने वह डायरी पढ़ी?’’ प्राची ने नताशा से पूछा.

‘‘हां, बस 2 पन्ने,’’ नताशा ने जवाब दिया.

‘‘क्या लिखा था उस में?’’

’’ज्यादा कुछ नहीं. अभी तो बस 2 पन्ने ही पढ़े हैं. शायद किसी लड़के के लिए अपनी फीलिंग्स लिखी हैं उस ने.’’

‘‘फीलिंग्स? फीलिंग्स हैं भी उस में?‘‘ प्राची ने हंसते हुए पूछा.

‘‘छोड़ न यार, हमें क्या करना. वैसे भी डायरी एक साल पुरानी है. क्या पता तब वह ऐसी न हो,’’ नताशा ने कुछ सोचते हुए कहा.

‘‘अबे रहने दे. एक साल में कौन सी कयामत आ गई जो वह ऐसी बन गई. तू ने भी सुना न कि उस के और विवान के बीच क्या हुआ था. और अब उस की नजर तेरे अमन पर है. मैं बता रही हूं उसे तान्या के साए से भी दूर रख, तेरे लिए अच्छा होगा.’’

‘‘हां,’’ नताशा ने हामी भरी.

‘‘चल तू यह डायरी जल्दी पढ़ ले इस से पहले कि उसे डायरी गायब होने का पता चले. कुछ चटपटा हो तो मु झे भी बताना,’’ कहते हुए प्राची वहां से निकल गई.

नताशा कुछ सोचतेसोचते लाइब्रेरी में जा कर बैठ गई. 2 मिनट बैठ कर वह तान्या के बारे में सोचने लगी. उस के मन में तान्या को ले कर कई बातें उमड़ रही थीं. आखिर तान्या की डायरी में जो कुछ लिखा था उस की आज की सचाई से मिलताजुलता क्यों नहीं था? क्यों तान्या उसे कभी भी अच्छी नहीं लगी. वह एक शांत स्वभाव की लड़की है जो किसी से ज्यादा मतलब नहीं रखती. लेकिन, विवान के साथ उस का जो सीन था वह क्या था फिर.

पिछले साल कालेज में हर तरफ तान्या और विवान के किस्से थे. तान्या और विवान एकदूसरे के काफी अच्छे दोस्त थे. हालांकि, हमेशा साथ नहीं रहते थे पर जब भी साथ होते, खुश ही लगते थे. पर कुछ महीनों बाद तान्या और विवान का व्यवहार काफी बदल गया था. दोनों एकदूसरे से कम मिलने लगे. जबतब एकदूसरे के सामने आते, यहांवहां का बहाना बना कर निकल जाया करते थे. किसी को सम झ नहीं आया असल में हो क्या रहा है. फिर 2 महीने बाद नताशा को प्राची ने बताया कि तान्या और विवान असल में एकदूसरे के फ्रैंड्स विद बैनिफिट्स थे. उन दोनों ने कानोंकान किसी को खबर नहीं होने दी थी, लेकिन उसे खुद विवान ने एक दिन यह सब बताया था. उन दोनों के बीच यह सब तब खत्म हुआ जब तान्या ने ड्रामा करना शुरू कर दिया. ड्रामा यह कि वह हर किसी को यह दिखाती थी कि वह बहुत दुखी है और इस की वजह विवान है. वह तो बिलकुल पीछे ही पड़ गई थी विवान के.

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नताशा को यह सब सुन कर तान्या पर बहुत गुस्सा आया था. उस जैसी शरीफ सी दिखने वाली लड़की किसी के साथ फ्रैंड्स विद बैनिफिट्स में रहेगी और फिर पीछे भी पड़ जाएगी, यह उस ने कभी नहीं सोचा था. जब क्लासरूम में डैस्क के नीचे उसे तान्या की डायरी पड़ी मिली तो वह उसे पढ़ने से खुद को रोक नहीं पाई. वह बस यह जानना चाहती थी कि आखिर यह तान्या डायरी में क्या लिखती होगी, अपने और लड़कों के किस्से या कुछ और.

लाइब्रेरी में बैठेबैठे ही नताशा ने वह डायरी पढ़ ली. डायरी पूरी पढ़ते ही उस ने अपना फोन उठाया और प्राची को कौल मिला दी.

‘‘हैलो,’’ प्राची के फोन उठाते ही नताशा ने कहा.

‘‘हां, बोल क्या हुआ,’’ प्राची ने पूछा.

‘‘जल्दी से लाइब्रेरी आ.’’

‘‘हां, पर हुआ क्या?’’

‘‘अरे यार, आ तो जा, फिर बताती हूं न.’’

‘‘अच्छा, रुक, आई,’’ प्राची कहते हुए लाइब्रेरी की तरफ बढ़ गई.

प्राची नताशा के पास पहुंची तो देखा कि वह किसी सोच में डूबी हुई है. प्राची उस की बगल में रखी कुरसी पर बैठ गई.

‘‘बता, क्या हुआ,’’ प्राची ने कहा.

‘‘यार, हम ने शायद तान्या को कुछ ज्यादा ही गलत सम झ लिया.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि तू यह डायरी पढ़. तू खुद सम झ जाएगी कि मैं क्या कहना चाहती हूं और यह भी कि तान्या के बारे में हम जो कुछ सोचते हैं, सचाई उस से बहुत अलग है. तू बस यह डायरी पढ़, अभी इसी वक्त,’’ नताशा ने प्राची को डायरी थमाते हुए कहा.

‘‘हां, ठीक है,’’ प्राची ने कहा और डायरी हाथ में ले कर पढ़ना शुरू किया.

5/9/18

कितना कुछ है जो मैं तुम से कहना चाहती हूं, कितना कुछ है जो तुम्हें बताना चाहती हूं, तुम से बांट लेना चाहती हूं. पर तुम कुछ सम झना नहीं चाहते, सुनना नहीं चाहते, कुछ कहना नहीं चाहते. मैं खुद को बहुत छोटा महसूस करने लगी हूं तुम्हारे आगे. ऐसा लगने लगा है कि मेरी सारी सम झ कहीं खो गई है. मेरी उम्र उतनी नहीं जिस में मु झे बच्चा कहा जा सके. बस, 18  ही तो है. उतनी भी नहीं कि मु झे बड़ा ही कहा जाए. इस उम्र में कुछ दीनदुनिया भुला कर जी रहे हैं, कुछ नौकरी कर रहे हैं, कुछ पढ़ रहे हैं तो कुछ प्यारव्यार में पड़े हैं.

मैं किस कैटेगरी की हूं, मु झे खुद को सम झ नहीं आ रहा. शायद उस कैटेगरी में हूं जिस में सम झ नहीं आता कि जिंदगी जा किस तरफ रही है. ऐसा लग रहा है कि बस चल रही है किसी तरह, किसी तरफ. मेरे 2 रूप बन चुके हैं, एक जिस में मैं अच्छीखासी सम झदार लड़की हूं और अपने कैरियर के लिए दिनरात मेहनत कर रही हूं. दूसरा, जहां मैं किसी को पाने की चाह में खुद को खो रही हूं और ऐसा लगने लगा है कि मेरा दिमाग दिनबदिन खराब हुआ जा रहा है.

कैसी फिलोसफर सी बातें करने लगी हूं मैं, है न? तुम हमेशा कहते रहते हो कि मैं इस प्यार और दोस्ती जैसी चीजों में माथा खपा रही हूं, यह सब मोहमाया है जिस में मैं जकड़ी जा रही हूं. पर तुम यह क्यों नहीं देखते कि मैं अपने कैरियर पर भी तो ध्यान दे रही हूं, पढ़ती रहती हूं, हर समय कुछ नया करने की कोशिश करती हूं. तुम्हारी हर काम में मदद भी तो करती हूं मैं, अपने खुले विचार भी तो रखती हूं तुम्हारे सामने. यह सबकुछ नजर क्यों नहीं आता तुम्हें?

शायद तुम सिर्फ वही देखते हो जो देखना चाहते हो. लेकिन, अगर मेरे इस प्यारव्यार से तुम्हें कोई मतलब ही नहीं है, फिर मु झ में तुम्हें बस यही क्यों नजर आता है, और कुछ क्यों नहीं?

13/9/18

मैं सम झ चुकी हूं कि तुम्हें मु झ से कोई फर्क नहीं पड़ता. अच्छी बात है. मैं ही बेवकूफ थी जो तुम्हारे साथ पता नहीं क्याक्या ही सोचने लगी थी. जो कुछ भी था हमारे बीच उसे मैं हमारी दोस्ती के बीच में नहीं लाऊंगी. लेकिन, तुम्हें नहीं लगता कि उस बारे में अगर हम कुछ बात कर लेंगे तो हमारा कुछ नहीं बिगड़ेगा. मु झे ऐसा लगने लगा है जैसे तुम ने मु झे खुद को छूने दिया, लेकिन मन से हमेशा दूर रखा. मैं तुम्हारे करीब हो कर भी इतना दूर क्यों महसूस करती हूं. जो सब मैं लिखती हूं, वह कह क्यों नहीं सकती तुम से आ कर.

5/10/18

हां, मैं ने हां कहा तुम्हें बारबार, पर सिर्फ तुम्हें ही कहा, यह तो पता है न तुम्हें. मैं तुम्हें तब गलत क्यों नहीं लगी जब मैं ने यह कहा था कि मैं तुम्हें चाहने लगी हूं, लेकिन तुम्हें मजबूर नहीं करना चाहती कि तुम मु झ से जबरदस्ती रिश्ते में बंधो. याद है तब तुम ने क्या कहा था कि तुम भी मु झ में इंटरेस्टेड हो लेकिन किसी रिश्ते में पड़ कर मु झे खोना नहीं चाहते. मैं इतना सुन कर भी बहुत खुश हुई थी. मु झे लगा था अगर 2 लोग एकदूसरे में इंटरैस्ट रखते हों, तो फिर तो कोई परेशानी ही नहीं है.

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मैं ने बस इतना सोचा कि तुम्हें मेरी फिक्र है, तुम मु झे खोना नहीं चाहते और इतना शायद दोस्ती से बढ़ कर कुछ सम झने के लिए काफी है. फिर, जब तुम मु झे अचानक से ही नजरअंदाज करने लगे, मु झ से नजरें चुराने लगे, और मैं ने गुस्से में तुम्हें यह कहा कि तुम ने मु झे तकलीफ पहुंचाई है, तो तुम मु झे ही गलत क्यों कहने लगे?

23/10/18

एक दोस्त हो कर अगर तुम एक दोस्त के साथ सैक्स करने को गलत नहीं मानते, तो मैं क्यों मानूं? नहीं लगा मु झे कुछ गलत इस में, तो नहीं लगा. पर मैं ने यह भी तो नहीं कहा था न कि मेरे लिए तुम सिर्फ एक दोस्त हो. यह तो बताया था मैं ने कि तुम्हारे लिए बहुतकुछ महसूस करने लगी हूं मैं. फिर तुम ने यह क्यों कहा कि मेरी गलती है जो मैं तुम से उम्मीदें लगाने लगी हूं.

26/10/18

नहीं, तुम सही थे. ऐसा कुछ था ही नहीं जिसे ले कर मु झे दुखी होना चाहिए. आखिर हां तो मैं ने ही कहा था. फैं्रड्स विद बैनिफिट्स ही था वह. अगर कुछ दिन पहले पूछते तुम मु झ से कि मैं दुखी हूं या नहीं तो मैं कहती कि मैं बहुत दुखी हूं, मर रही हूं तुम्हारे लिए. लेकिन अब मैं ऐसा नहीं कहूंगी. बल्कि कुछ नहीं कहूंगी. और कहूं भी क्यों जब मु झे पता है कि तुम्हें फर्क नहीं पड़ेगा. मैं भी कोशिश कर रही हूं कि मु झे भी फर्क न पड़े.

हां, जब भी कालेज की कैंटीन में तुम्हें किसी और से उसी तरह बात करते देखती हूं जिस तरह खुद से करते हुए देखा करती थी तो बुरा लगता है मु झे. वह हंसी जो तुम मेरे सामने हंसा करते थे. सब याद आता है मु झे, बहुत याद आता है. पर यह सब मैं तुम्हें नहीं बताना चाहती, अब नहीं.

2/11/18

तुम्हारी गलती नहीं थी, मु झे सम झ आ गया है. तुम मु झे नहीं चाहते और इस में तुम्हारी गलती नहीं है और न ही मेरी है. उस वक्त हम एकदूसरे को छूना चाहते थे, महसूस करना चाहते थे, सीधे शब्दों में सैक्स करना चाहते थे, जो हम ने किया. मैं न तुम्हें सफाई देना चाहती हूं कोई और न किसी और को. अब अगर तुम ने या किसी ने भी मु झ से यह पूछा कि मैं ने हां क्यों की थी तो मेरा जवाब यह नहीं होगा कि मैं तुम्हें चाहने लगी थी.  मेरा जवाब होगा कि मैं तुम्हारे साथ सैक्स करना चाहती थी, जो मैं ने किया, और मु झे नहीं लगता कि इस में कुछ भी गलत है.

तुम किसी को बताना चाहो तो बता दो, अब मु झे फर्क पड़ना बंद हो चुका है. मु झे अगर अपनी इच्छाओं और  झूठी शान में से कुछ चुनना हो तो मैं अपनी इच्छाएं ही चुनूंगी, हमेशा. लेकिन, मैं तुम से अब कभी उस तरह नहीं मिलूंगी जिस तरह कभी मिलती थी. उस तरह बातें नहीं करूंगी जिस तरह किया करती थी. तुम्हारे लिए वैसा कुछ फील नहीं करूंगी जो कभी करती थी. सब बेवजह था, मैं सम झ चुकी हूं.

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कुकरिया: क्या बेजुबानों से सबक ले पाए मानव?

हमारा घर बन रहा था, गुमानसिंह और रानो नए घर की चौकीदारी भी करते और मजदूरी भी. उन के 3 छोटेछोटे बच्चों के साथ एक कुतिया भी वहीं रहती थी जिसे वे ‘कुकरिया’ के नाम से बुलाते थे. इधर मेरे घर में भी एक पामेरियन पपी ‘पायल’ थी, जब से वह मेरे घर आई तब से मैं कुकरा जाति की बोली, भाषा सीख गई और मुझे इस जाति से लगाव भी हो गया. इन की भावनाएं और सोच भी मनुष्य जैसी होती हैं, यह सब ज्ञान मुझे पायल से मिला इसलिए मैं उसे अपना गुरु भी मानती हूं.

शुरू में पायल कुकरिया को देखते ही भगा देती थी, वह ‘कूंकूं’ कर गुमानसिंह की झोंपड़ी में छिप जाती, लेकिन धीरेधीरे दोनों हिलमिल गए. हमारे घर पहुंचते ही कुकरिया अपने दोनों पंजे आगे फैला कर अपनी गरदन झुका देती और प्यार से वह पांवों में लोट कर अपनी पूंछ हिलाती. मैं अपना थैला उसे दिखा कर कहती, ‘‘हांहां, तेरे लिए भी लाई हूं. चल, पहले मुझे आने तो दे.’’

मैं अपने निर्माणाधीन मकान के पिछवाड़े झोंपड़ी की ओर चल देती. रानो मेरे लिए झटपट खाट बिछा देती. रानो और उस के बच्चे भी कुकरिया के साथ मेरे पास आ कर जमीन पर बैठ जाते. अपनाअपना हिस्सा पा कर बच्चे छीनाझपटी करते, लेकिन पायल अपना अधिकतर हिस्सा छोड़ अपने पापा (मेरे पति) के पास चली जाती. कुकरिया अपना हिस्सा खा कर कभी भी पायल का हिस्सा नहीं खाती थी. बस, गरदन उठा कर पायल की ओर ताकती रहती, मैं 2-3 बार पायल को पुकारती.

‘‘ऐ पायलो, पायलिया…चलो बेटा, मममम खाओ. अच्छा, नहीं आ रही है तो मैं यह भी कुकरिया को दे दूं?’’

इस बीच मेरे पति को यदि मेरी बात सुनाई दे जाती तो वे भी पायल को टोकते, लेकिन पायल आती और अपने अधखाए खाने को सूंघ कर वापस चली जाती. पर कभीकभी तो वह इन के दुलारने पर भी नहीं आती. वे उस की हठीली मुद्रा देख वहीं से पूछते, ‘‘क्या है? पायल पापा के साथ काम करा रही है, उसे नहीं खाना. तुम कुकरिया को दे दो, वह खा लेगी.’’

तब मेरा ध्यान उन दोनों से हट कुकरिया की ओर जाता और मैं उस से कहती, ‘‘चल, ऐ कुकरिया, चल बेटी, यह भी तू ही खा ले. वह एक बार मुझे देखती और फिर पायल को, उस की मौन स्वीकारोक्ति को वह समझ जाती और निश्ंिचत हो उस चीज को खाने लगती. ऐसा रोज ही होता था. अपनी चीज को इतनी आसानी से कुकरिया को देने के पीछे पायल की शायद यह ही मंशा रही होगी कि घर में जो मुझे मिलता है वह इस बेचारी को कहां मिलता है जबकि घर में पायल अपनी मनपसंद वस्तु पाने के लिए मेरे आगेपीछे घूमती या मेरे दोनों बच्चों के पास जा, गरदन को झटका दे तिरछी नजरें कर उन्हें अपने स्वर में बताती कि मुझे और चाहिए. हम शाम 6 बजे वहां से चलते तो कुकरिया हमें गली के नुक्कड़ तक छोड़ने आती और जब हमारी गाड़ी सड़क पर भागने लगती तो पायल और कुकरिया एकदूसरी को नजरों से ओझल होने तक देखती रहतीं.

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एक बार मैं बीमार पड़ गई. 15 दिन तक वहां नहीं गई. जिस दिन गई उस दिन रविवार था. मैं ने देशी घी के परांठे सेंक कर रख दिए, उस दिन मेरे बच्चे भी साथ गए. कुकरिया मुझे देखते ही मेरे पांवों में ऐसी झपटी कि अपने बचाव में मेरा थैला तक हाथ से छूट गया. मेरा एक कदम बढ़ाना भी दूभर हो गया, बारबार उस के पंजे मेरे ऊपर तक आते, वह बारबार मेरी पीठ, कंधे, गरदन तक चढ़ी जा रही थी, मेरे बच्चे भी डर से चीख उठे, ‘‘मां, मां…पापा बचाओ.’’

कुछ मजदूर, गुमानसिंह और मेरे पति मेरी तरफ दौड़े, सब ने उसे अपनेअपने ढंग से धमकाया, फिर न जाने कैसे वह शीघ्र ही मुझे छोड़ अपनी झोंपड़ी में घुस गई. सभी आश्चर्यचकित थे कि आखिर ऐसा उस ने क्यों किया? हम सभी को उस की यह हरकत बड़ी दिल दहला देने वाली लगी, लेकिन मुझे एक खरोंच तक नहीं आई थी, मुझे ठीकठाक देख धीरेधीरे सभी अपने काम में लग गए. मेरी बेटी ने अपने गालों पर हाथ रख कर कहा, ‘‘बाप रे, यह आप को खा जाती तो?’’

कुकरिया मुझे खाट पर बैठा देख बड़ी शालीनता से मेरे पास आई लेकिन अब उस की दशा ऐसी हो गई मानो उस पर घड़ों पानी पड़ा हो, गरदन झुका कर वह तेजी से मेरी खाट के नीचे घुस गई. मेरे बेटे को पायल से बदला लेने का आज अच्छा मौका मिला था, इसलिए उस ने पायल को पुकारा क्योंकि मुझे ले कर उस का और पायल का पहले से ही बैर था. मेरी बेटी के मुझ से चिपक कर लेटने पर पायल भी हमारे बीच घुस कर अपनी जगह बना लेती, लेकिन बेटा कभी पास बैठना भी चाहता तो पायल से सहन नहीं होता, उस के भूंकने पर भी जब वह मुझे नहीं छोड़ता तो पायल उस के पैरों में ऐसे लोटपोट हो जाती कि वह अपने बचाव में दरवाजा पकड़ कर लटक जाता और पैर ऊपर सिकोड़ लेता.

‘‘सौरी पायल, सौरी पायल,’’ कह वह अपनी जान बचाता, कभी वह उसे चिढ़ाने के लिए कहता, ‘‘मां, मेरी मां.’’

तब पायल उसे गुर्रा कर चेतावनी देती, वक्रदृष्टि और मसूढ़ों तक चमके दांतों को दिखा कर वह सावधान कर देती, ऐसी स्थिति में और दरवाजे से कूदने पर वह पैर पटक हट या धत कहता पर इस से अधिक उस का वश नहीं चलता. 3 ईंटों की कच्ची दीवार को पार करते हुए पायल को अपनी ओर आता देख उस ने पायल को डांट लगाई, ‘‘क्यों, यहां उस से डर गई. टीले पर खड़ी तमाशा देखती रही नालायक, मुझ पर तो बड़ी शेरनी बनती है.’’

बेटे की डांट खा वह मेरी खाट के पास मौन हो और कुकरिया खाट के नीचे से एकदूसरे को टुकुरटुकुर देखती रहीं. मैं ने नीचे झांक कर देखा तो कुकरिया की दृष्टि लज्जित और पायल की विवशता उस की भारी हो आई पलकों से झलक रही थी. बायोटैक्नोलौजी और 12वीं में पढ़ने वाले बुद्धिजीवी भाईबहन जिस बात को नहीं समझ सके वह पायल जान गई थी कि कुकरिया ने ऐसा क्यों किया? वह उस का आक्रमण नहीं बल्कि आग्रह था कि इतने दिन आप क्यों नहीं आईं? मैं बोल नहीं सकती वरना जरूर पूछती कि आप कहां थीं?  रानो चाय बना कर लाई थी, मैं ने साथ लाई चीजें ठंडे परांठों सहित सब को बांट दीं. बच्चे उठ कर घर देखने चले गए. तब वह खाट के नीचे से निकली और सहमते हुए एक टुकड़ा मुंह में दबाया, परांठा चबाते हुए थोड़ी गरदन तिरछी कर उस की खुली आंखें मुझ से उस कृत्य के लिए क्षमा याचना कर रही थीं. उस की मनोदशा देख मैं ने उस का सिर सहला दिया.

11 महीने तक हमारा गृहनिर्माण कार्य चला, इस दौरान कई बार ऐसा हुआ कि मैं वहां नियमित रूप से नहीं जा पाई, ये मुझे आ कर बताते, ‘‘मैं उसे खाना देता हूं तो वह खाती नहीं है, तुम्हें ढूंढ़ती है, जब मैं उस से कहता हूं कि मां आज नहीं आई है बेटा, तब वह खाना खाती है.’’ अगले दिन जब मैं वहां पहुंचती तो कुकरिया रिरिया कर अजीब आवाज में अपनी नाराजगी व्यक्त करती.

‘‘तुम्हें मेरी जरा भी चिंता नहीं है मां, मैं तुम्हें रोज याद करती हूं,’’ मैं उसे अपनी भाषा में बता उस का सिर सहलाने लगती, तब वह सामान्य होतेहोते अपना कूंकूंअंऊं का स्वर मंद कर देती और अपनी बात खत्म कर कहती, ‘‘चलो, ठीक है, लेकिन आप से मिले बिना रहा नहीं जाता. एक आप ही तो हैं जो मुझे प्यार करती हैं,’ उस की हांहूंऊंआं को मैं अब अच्छी तरह समझने लगी थी.

घर बन चुका था, पर अभी गृहप्रवेश नहीं हो पाया था. चौकीदार अपना हिसाब कर सप्ताह के अंदर कहीं और जाने वाला था. मुझे कुकरिया से लगाव हो गया था, मैं ने रानो से पूछा, ‘‘क्या तुम इसे भी अपने साथ ले जाओगी?’’ उस ने न में सिर हिलाया और अपनी निमाड़ी मिश्रित हिंदी भाषा में उत्तर दिया, ‘‘इस को वां नईं ले जाइंगे.’’

मैं पल भर के लिए खुश तो हुई लेकिन तुरंत ही व्याकुल हो कर पूछ बैठी, ‘‘तो यह यहां अकेली कैसे रहेगी?’’ रानो उदास हो कर बोली, ‘‘अब किया करेंगे? अम्म जहां बी जाते हैं, ऐसे कुत्ते म्हां आप ही आ जाते हैं.’’

अब मुझे कुकरिया की चिंता सताने लगी क्योंकि यह कालोनी शहर से दूर थी, अभी तक यहां सिर्फ 3 ही घर बने थे, बाकी 2 घरों में भी अभी कोई नहीं आया था, वे बंद पड़े थे और अब हमारे घर में भी ताला लग जाएगा, फिर यहां रोज कौन आएगा. अभी तक वहां पायल और कुकरिया के खौफ से कोई परिंदा भी पर नहीं मारता था, भूलाभटका कोई आ भी जाता तो इन की वजह से दुम दबा कर भागता नजर आता. मेरी दृष्टि में अकेलापन एक अवांछित दंड है, अब मुझे कुकरिया की चिंता सताने लगी, क्योंकि किराए के घर में तो हम उसे ले नहीं जा सकते.

चलते समय बड़ी व्यग्र दृष्टि से कुकरिया ने मुझे देखा. घर पहुंच कर इन्होंने मेरी परेशानी का कारण पूछा तो मैं ने बता दिया. सुन कर ये भी चिंतित हो गए लेकिन जल्दी ही इन्होंने एक रास्ता निकाला और मुझ से कहा, ‘‘गुमानसिंह को हम कुछ समय तक ऐसे ही 200 रुपए सप्ताह देते रहेंगे, वह जहां भी जाएगा उसे यही मजदूरी मिलेगी, यहां हमारे सूने घर की रखवाली भी होती रहेगी और कुकरिया को भी फिलहाल आश्रय मिल जाएगा.’’

दूसरे दिन गुमानसिंह के आगे हम ने यह प्रस्ताव रखा तो वह भी सहज तैयार हो गया. अगले महीने हमारी कालोनी में सड़क किनारे एक होटल, होस्टल और 4 घरों का निर्माण कार्य शुरू हुआ. हमारे घर के पास के 2 घरों का काम भी गुमानसिंह को मिला. ईंटसीमेंट का ट्रक आनेजाने के लिए उन लोगों ने उधर का कच्चा और ऊबड़खाबड़ रास्ता भी ठीक करवा लिया. अब रोज ही वहां पड़ोसी गांव के चरवाहे, उन के पशु हमारी कालोनी में भी घूमते दिख जाते. यह वातावरण देख मुझे बहुत संतोष होता.

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एक बार दीवाली की छुट्टियों में हम लोग पूरे 1 महीने बाद मथुरा से लौट कर आए. मैं मिठाई ले वहां पहुंची, तब रानो ने बताया, ‘‘तुम्हारे जाने के बाद कुकरिया ने बच्चे दिए हैं.’’ इतने में कुकरिया भी भीतर से निकली और मुझे देखते ही मेरे पैरों में लिपट गई. मैं उसे खाने की चीजें डाल पुलिया में झांक कर उस के बच्चे देखने लगी. पूरे 6 बच्चों की मां कुकरिया फिर मेरे पैर चाट अपने बच्चों को दूध पिलाने बैठ गई.

यह देख रानो ने कहा, ‘‘यहां ये किसी को नईं आने देती. बूंकती है, तुम्म पर नईं बूंकी.’’

कुछ दिन बाद हम ने भी अपने नए घर में प्रवेश किया, वहां जा कर हम सब ने कुकरिया का भी खयाल रखा. लेकिन तब तक वहां बाहर के और भी बड़े कुत्ते आने लगे थे, वे कुकरिया और उस के बच्चों की रोटी झपट कर खा जाते, 10-10 रोटियों में से भी कुकरिया को कभी एक टुकड़ा तक नहीं मिल पाता. उन आवारा कुत्तों को भगाने के सारे प्रयास विफल हो रहे थे. मेरा डंडा देख वे बरामदे पर नहीं चढ़ते लेकिन उन छोटे पिल्लों और कुकरिया को ऐसे डराते कि उन की खाई रोटी अंग नहीं लगती.

हम सब में प्रचंड शक्ति है, लेकिन पारिवारिक दायित्वों के बोझ तले मनुष्य तो क्या पशुपक्षी भी कमजोर पड़ जाते हैं, कुकरिया जब तक अकेली रही, शेरनी की तरह रही, लेकिन अब अपने बच्चों की खातिर वह भी कमजोर पड़ी. उसे अपनी चिंता नहीं थी, पर जब उस के निर्बल, अबोध बच्चों को बड़े कुत्ते काटते तो उन के बचाव में वह बेचारी भी लहूलुहान हो जाती, पायल भी कुकरिया का जम कर साथ देती, लेकिन आखिर जान सब को प्यारी होती है.

उन के रहनेखाने को तो हमारा घर था, लेकिन जब पायल, कुकरिया और पिल्ले कभी बाहर निकलते तब हमारी रखवाली में भी वे सहमे रहते. एक दिन मैं इसी चिंता में रसोई का द्वार खोल बरामदे में कुरसी पर बैठी थी. शाम के 6 बजे होंगे, मौसम सुहावना था. कुकरिया पहले से ही वहां उदास बैठी थी. आज मजूदरों ने बाहर के कुत्तों को इस ओर फटकने तक नहीं दिया था. पायल और पिल्ले आज बहुत दिन बाद चैन की सांस ले कर बाहर सड़क पर खेल रहे थे, मैं ने झुक कर कुकरिया के सिर पर हाथ फेरा और कहा, ‘‘जाओ बेटा, तुम भी खेलो, छोटे पिल्ले तो पायल मौसी के साथ खेल रहे हैं, अब कोई डर नहीं, पापा ने सब को कह दिया है, अब यहां कोई नहीं आएगा.’’

लेकिन वह अपने आगे फैले पंजों पर मुंह रखे बैठी ही रही. मैं एक परांठा ले कर दोबारा आई, एक टुकड़ा डाला, फिर धीरेधीरे पूरा परांठा उस के आगे रख दिया, पर उस ने उन टुकड़ों को सूंघा तक नहीं. वह यों ही गहरी सोच में डूबी अपने पंजों को पनीली आंखों से निहारती रही. मैं ने उसे छू कर देखा, शायद बुखार हो, लेकिन वह सरक कर बिलकुल मेरे पैरों पर आ कर पसर गई. मुझे बैठा देख पिल्ले और पायल भी बरामदे में आ कर उछलकूद करने लगे.

अब पिल्ले 5 महीने के हो चुके थे. उन की भूख भी बढ़ गई. मैं उन का बढ़ता कद देख कर फूली नहीं समाती थी किंतु अपनी नौकरी और घर संभालते हुए उन के लिए दोनों समय रोटी बनाना अब मुझे अखरने लगा. अब तक यहां 5-6 घर बस चुके थे. वे सुरक्षा सब की करते. मैं कभी सोचती कि सब के घर से 2-2 रोटी मांग कर लाऊं और कभी सोचती कि इन्हें एक ही समय खाना दूं, पर ऐसा कर नहीं पाती थी. मैं चाहे कितनी भी थकी होती लेकिन घर वालों से पहले उन की व्यवस्था करती थी.

बचपन में मेरे नानाजी मुझे एक कुत्ते की कहानी सुनाते थे कि वह अपने मालिक के मन की बात जान लेता था और उस की मदद भी करता था, शायद कुकरिया भी मेरे मन की बात जान गई थी. एक दिन शाम को मैं पक्षियों का कलरव सुन रही थी, बरामदे के दक्षिणी छोर पर पायल और कुकरिया की गहरी मंत्रणा चल रही थी, मैं भी अपनी कुरसी वहीं ले आई. दोनों के चेहरे गंभीर थे. मैं ने उन के पास बैठते हुए पूछा, ‘‘क्या हुआ बेटा? तू खाने की चिंता मत कर, मम्मी थक जाती हैं न इसलिए ऐसा सोचती है. बस और कोई बात नहीं है.’’

पायल एक मूकदृष्टि मुझ पर डाल पांचों सीढि़यों पर पसरे उस के पिल्लों के पास जा बैठी और कुकरिया अपनी अश्रुपूरित नजरों से मुझे एकटक देखती रही. यह देख कर मेरा दिल दुखी हो गया. वातावरण शांत हो चला था, मैं अनमनी हो पढ़ने को एक किताब ले आई कि अचानक मुझे सुनाई दिया, ‘‘अब मैं चली जाऊंगी मां, आप पर बोझ नहीं बनूंगी.’’  किताब एक झटके से मेरे हाथ से छूट गई. मैं ने हड़बड़ा कर अपने चारों ओर देखा, मेरे आसपास पायल, कुकरिया और उन पिल्लों के अतिरिक्त कोई भी नहीं था, मैं तत्काल कुरसी छोड़ खड़ी हो गई, नीचेऊपर, आगेपीछे ताकझांक करने लगी और दोबारा कुरसी पर आ कर बैठ गई.

कुकरिया गरदन झुकाए मेरे पैरों के पास सरक आई, मैं ने स्थिर हो फिर उसे गौर से देखा. पायल मेरी ओर पीठ कर के बैठी थी, बाकी पिल्ले भी कभी अपनी बोझिल पलकें झपकाते और कभी बिलकुल ही बंद कर लेते. इस बीच मुझे दोबारा कुछ और सुनाई दिया, ‘‘मैं जानती हूं कि आप मेरे बच्चों का पूरा ध्यान रखेंगी. आप हैं न इन के पास, बस, अब मुझे इन की कोई चिंता नहीं है. अब मैं हमेशा के लिए चली जाऊंगी,’’ दूसरी बार के झटके से मैं बुरी तरह कांप गई.

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बड़बड़ाती हुई मैं एक सांस में खड़ी हो गई और चहलकदमी करने लगी. दिमाग तेजी से चल रहा था क्योंकि सही में मैं ने एक के बाद एक ये बातें सुनी थीं. इसी दम पर कि इस बार तो मैं उसे पकड़ ही लूंगी, लेकिन जब कोई हाथ नहीं लगा तो मैं घबरा गई. मैं लपकती सी भीतर घुस आई, अपनी बेटी को साथ ले फिर वहीं आ गई.  कुकरिया बारीबारी से अपने सोए पिल्लों को चाट रही थी. किसी का कीड़ा मुंह से निकालती तो किसी को मुंह से ऐसे स्पर्श करती जैसे हम अपने बच्चों के सिर पर हाथ फेरते हैं. कुकरिया की ये गतिविधियां बड़ी लुभावनी थीं किंतु मेरा मन अनगिनत आशंकाओं से भर गया था.

अचानक फोन की घंटी बज उठी, मैं भीतर आ कर घरेलू कार्यों में व्यस्त हो गई. दूसरे दिन सुबह 6 बजे के बाद द्वार खुलते ही सारे पिल्ले लपकझपक दौड़े आए, पर कुकरिया नहीं आई. मैं पुकारती रही.

‘‘कुकरिया, ओ कुकरिया.’’ उस की 2 रोटियां हाथ में दबा घर की परिक्रमा करते दूरदूर तक नजर दौड़ाई, फिर दोनों रोटियां कटोरे में रख दीं. 3 बजे के बाद मैं बचा भोजन एकत्र कर बाहर आई तब कुकरिया मुझे बरामदे की सीढि़यां चढ़ती दिखाई दी. मैं खुशी से चिल्ला उठी, ‘‘मेरी कुकरिया आ गई…तू कहां चली गई थी बेटी?’’

मैं ने अपने हाथों से एकएक कौर कुकरिया को खिलाया, उस की मनपसंद खीर भी. इस के बाद वह पायल और अपने बच्चों के साथ खूब खेली. कई बार गले मिली. कई बार वह मेरे आगेपीछे घूमी. मैं मगन और निश्ंिचत हो कर भीतर आ रही थी कि कुकरिया अपने बच्चों को छोड़ कर मेरे पैरों से लिपट गई. अपना माथा और मुंह कई बार आड़ीटेढ़ी हो मेरे पैरों से रगड़ा, कई बार मुझे चाटा.  इस के बाद वह सीधी सीढि़यों से नीचे उतरी और फिर उस ने पलट कर भी किसी को नहीं देखा, अपनी पीठ और पूंछ पर चढ़ते अपने बच्चों तक को भी नहीं और फिर वह सदासदा के लिए कहीं चली गई.

कुछ दिन हम सब उसे ढूंढ़ते रहे. मेरे पति और बच्चे अपनी बाइक और स्कूटी से जाते, लेकिन निराश हो दूर से मुझे ‘न’ में हाथ हिला आ जाते. उस के पिल्लों ने भी उसे 4-5 दिन ढूंढ़ा, मैं घंटों बाहर बैठी उस की राह देखती, तब पायल की आंखों में मुझे बहुत से भाव दिखाई देते, जैसे वह कह रही हो, ‘‘मां, वह अब नहीं आएगी, आप से कह कर तो गई है. उस के बच्चों का अब हमें ही खयाल रखना है.’’

पायल उन पिल्लों को अपने कटोरे में से दूधपानी पिलाती और बाद में खुद पीती. एक मां की तरह वह एक छोटी सी आहट पर उन के पास दौड़ी चली आती.

कालोनी की आबादी अब और बढ़ गई. ये मूक जानवर आदर और स्नेह की भाषा ही नहीं, मनुष्य की दृष्टि को भी समझते हैं. आज हम अपनी संस्कृति भूल भावनाविहीन हो गए हैं, मानव का निष्कपट आचरण और शुद्ध मन उसे सभ्य बनाता है, उच्च ज्ञान और उच्च पद पा कर भी यदि हम में संवेदना नहीं है, दूसरों के प्रति समझ नहीं है, तो हम क्या हैं?  हम सब सदियों से कुत्ते के साथ रह रहे हैं. यह कुकरा जाति की उदारता ही है कि वह नित्य हमेशा द्वार पर एकटूक आशा में बैठा मानवता की पशुता को मौन ही झेलता रहता है, यह सोच कर कि शायद कभी इसे मेरी याद आ जाए. पर मनुष्य है कि सोचता है, ‘मेरा पेट भर गया तो संसार में सब का पेट भर गया.’ अपने कुकरामोह के कारण मैं ने बहुत से बुद्धिजीवियों की चुभती निगाहों और व्यंग्यबाणों का अपनी पीठ पीछे कई बार सामना किया है, पर मुझे उन की कोई परवा नहीं क्योंकि मैं जानती हूं कि यदि मुझे मानवता का निर्वाह सही अर्थों में करना है तो पशुपक्षियों के बच्चों का खयाल भी अपने बच्चों की तरह रखना होगा.

एक दिन अचानक कुकरिया का सब से हृष्टपुष्ट पिल्ला कलुवा चल बसा, पड़ोस से कहीं हड्डी खा आया था. हम लोग उस दिन शहर से बाहर गए थे, शाम को घर आए, उस को बचाने के अनेक जतन किए पर डाक्टर भी कुछ न कर सके. 3 दिन की भूखप्यास से निढाल उसे अपनी ही चौखट पर पड़े देख हम आंसू बहाते रहे और अपने बच्चे की तरह हम ने उसे विदा किया. कलुवा के सभी साथी और पायल मेरे पास सिमट आए, कलुवा को जमीन में गाड़ते देख मेरे बेटे ने सिसकते हुए कहा, ‘‘इस की मां कितनी अच्छी थी, रसोई में रखी चीजों को भी कभी मुंह नहीं मारती थी.’’

बेटी ने भी तड़प कर कहा, ‘‘अपना घर बनते समय कुकरिया सारी रात अकेली पहरा देती थी, जरा सा खटका होता तो वह गुमानसिंह को जगा देती थी.’’ आएदिन वह हमें रात में चोर आने की खबर देता था. इन्होंने दोनों बहनभाई को समझाया, ‘‘ऐसे जी छोटा नहीं करते बेटा, प्रकृति बैलेंस करती चलती है.’’

इस तरह कलुवा के साथ कुकरिया को भी हम सब की ओर से उस दिन भावभीनी तरबतर विदाई हुई. कुकरिया आज जीवित है भी या नहीं, मैं नहीं जानती. जाऊं तो किस के पास जाऊं? किसे पता होगा? आज के दौर में तो लोगों के पास अपने सगेसंबंधियों से बात करने तक का समय और फुरसत नहीं है तो कुकरिया की खबर मुझे कौन देगा? किंतु कुकरिया की 2-3 पीढि़यां अभी भी पायल मौसी के साथ धमाचौकड़ी मचाती घूमती रहती हैं.

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मैं कभी गहरे सोच में पड़ जाती हूं कि क्या सचमुच कुकरिया ने उस दिन मुझ से मेरी भाषा में कहा था या वह मेरा भ्रम था? यदि भ्रम ही है तो वह अपने कहे अनुसार चली क्यों गई? अर्थात वह भ्रम नहीं था, अकाट्य सत्य था. एक ऐसा सत्य कि जिस पर कोई विश्वास नहीं करेगा, किंतु मैं, पायल और कुकरिया ही इस सत्य को जानते हैं.  अब जब भी मुझे कुकरिया की याद विचलित करने लगती है तो मैं उस के बच्चों के बीच बैठ अपना मन बहला लेती हूं. उस की ये धरोहर कुकरिया की स्मृतियां बन कर रह गई हैं. पायल और मैं एकदूसरे के हमदर्द होने के नाते व्याकुल क्षणों में एकदूसरे का सहारा बनते हैं.

मां की दखलंदाज़ी जब ज्यादा हो जाए

हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट में एक मामले की सुनवाई हुई. यह मामला एक दंपत्ति का था. पति का कहना था कि शादी के कुछ महीने बाद से ही वह अपने इनलौज की हद से अधिक दखलंदाजी की वजह से पत्नी के साथ अपने रिश्ते में आई खटास से जूझ रहा था. हाईकोर्ट जज कैलाश गंभीर ने पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए और तलाक की अर्जी स्वीकार करते हुए कहा कि लड़की के मांबाप को उस की शादी के बाद एक दूरी बना कर रखनी चाहिए ताकि बेटी खुशहाल वैवाहिक जीवन का आनंद ले सके. बेटी को घरेलू मामलों में मॉनिटर करते रहना उचित नहीं. बेटी की विवाहित जिंदगी में अभिभावक की दखलअंदाजी युगल दंपत्ति के अलग होने की मुख्य वजहो में एक है.

दरअसल ज्यादातर मां अपनी बेटी के बहुत करीब होती हैं. कुछ महिलाएं तो बेटी को सब से अच्छी दोस्त मानती हैं. दोनों एकदूसरे से दिल की हर बात शेयर करती हैं. मगर जब यह नजदीकी जरूरत से ज्यादा हो जाए तो युवा होती या विवाहित बेटी के जीवन को नकारात्मक रूप से प्रभावित भी कर सकती है.

ऐसा ही कुछ हुआ गीता के साथ. गीता और उस की मां एकदूसरे के बहुत करीब थीं. बचपन और किशोरावस्था में तो सब कुछ ठीक चला मगर जब गीता हाई स्कूल और फिर कॉलेज में आई तो उसे हर चीज में मां की दखलअंदाजी परेशान करने लगी. वह मां से बहुत प्यार करती थी मगर उन से थोड़ी दूरी चाहती थी ताकि अपने व्यक्तित्व को सही विकास का अवसर दे सके.

इधर उस की मां हर वीकएंड पर उसे हॉस्टल से घर बुलाती और उस के पास जिन चीज़ों की कमी होती तुरंत वे चीज़ें ले कर आतीं. यही नहीं वह बेटी के कपड़े धोतीं, अलमारी साफ करतीं, उस के पासबुक वगैरह का हिसाब रखतीं, खानेपीने की चीजें बनातीं. जबकि गीता अब इतनी मैच्योर थी कि वह अपने सारे काम खुद कर सकती थी.

वैसे तो बेटी के लिए यह सब करने के पीछे मां का इंटेंशन केवल उस का ख्याल रखना था पर कहीं न कहीं मां बदले में बेटी का समय जरूर चाहती थी. गीता के पिता का व्यवहार उस की मां के प्रति उतना अच्छा नहीं था. मां गीता से अपनी सारी तकलीफें शेयर करना चाहती थीं. कई दफा उस के कंधे पर सर रख कर रो पड़ती थीं. गीता अपनी मां को इमोशनल सपोर्ट देती. इस के लिए कई दफा उसे अपने दोस्तों के साथ मस्ती करने का मौका छोड़ना पड़ता. ऐसी बातें गीता के व्यक्तित्व के विकास में बाधक बन रही थीं. उस की जिंदगी को प्रभावित कर रही थीं. मां के कारण गीता खुल कर जी नहीं पा रही थी.

बहुत सोचने के बाद गीता जानबूझ कर मां से थोड़ी दूरी बनाने लगी ताकि वीकेंड में दोस्तों के साथ कैंपस फन एंजॉय कर सके या कहीं घूमने जा सके. इस पर मां उस से ऐसे सवाल पूछने लगतीं कि गीता को अपराध बोध महसूस होता जैसे,” क्या दोस्त तुम्हारे लिए मुझ से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए?”

ऐसे में वह मां के लिए अपनी खुशियों का गला घोटने लगती ताकि मां को कंपनी दे सके. गीता की मां यह नहीं समझ पा रही थी कि ऐसा कर के वह अपनी बेटी के स्टेबल और हेल्दी एडल्ट बनने की राह में बाधा पैदा कर रही हैैं. मां का जरूरत से ज्यादा जुड़ाव न सिर्फ गीता की जिंदगी पर बुरा असर डाल रहा था बल्कि उन के रिश्ते को भी प्रभावित करने लगा था.

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हाल यह था कि थर्टीज़ में आ कर भी गीता शादी का फैसला नहीं ले सकी न ही कोई बॉयफ्रेंड ही उस की जिंदगी में आ सका. इन बातों का प्रभाव मां बेटी के रिश्ते पर पड़ा. धीरेधीरे गीता अपनी मां की तरफ से उदासीन होने लगी. वह मां को अवॉयड करने लगी. जब दोनों साथ होते तो भी गीता खामोशी से बैठी रहती. उसे एक काउंसलर की जरूरत महसूस होने लगी. वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे.

शुरुआत में गीता के व्यवहार में आए परिवर्तन ने मां को बहुत परेशान कर दिया. वह रोने लगतीं और खुद को कोसतीं. समय के साथ मां को भी बात समझ आ गई कि उन्हें खुद से मतलब रखना चाहिए. वह अपनी बेटी के सहारे नहीं जी सकतीं.

तब मां ने समाज सेवा के कुछ कामों से जुड़ना शुरू किया. कुछ संस्थाओं की सदस्या बनीं और कुछ नए दोस्त बनाए. दोनों ने आपस में कुछ दूरियां बनाईं और अपनीअपनी जिंदगी जीने लगीं . इस से उन के रिश्ते में भी सहजता आने लगी. गीता मां का साथ पहले से ज्यादा इंजॉय करने लगी. अब उसे यह महसूस नहीं होता था कि मां के करीब रहना उस की मजबूरी है.

आप की बड़ी होती बेटी के व्यक्तित्व के विकास के लिए जरूरी है कि आप खुद को उस से थोड़ा दूर कर लें. अपनी बेटी से यह अपेक्षा कतई न रखें कि वह हमेशा आप की जिंदगी की परेशानियों का हिस्सा बनेगी या आप की भावनात्मक पीड़ा को आत्मसात करेगी. उसे अपने पिता या घर वालों के खिलाफ बातें न सुनाएं. याद रखें वह आप की थैरेपिस्ट नहीं जो आप अपने गमों का बोझ उस के सीने पर रखें.

इस बात का भी ख्याल रखें कि वह आप की बेटी है न कि आप उस की छोटी सी बच्ची है जिसे वह चुप कराती फिरे या इमोशनल सपोर्ट देती रहे. इसी तरह उस की जिंदगी को मॉनिटर करना भी छोड़ दीजिये. वह मैच्योर है और अपना भला बुरा खुद समझ सकती है. खासकर शादी के बाद उसे सिखाना बिलकुल छोड़ दीजिये.

मायके की धमकी

अमूमन ऐसा देखा जाता है कि यदि शादीशुदा लड़की के मांबाप थोड़ी अच्छी स्थिति में है तो लड़की की मां अपनी बेटी को हर वक्त घर छोड़ आने की सलाह देती रहती है. वह घर को जोड़ने नहीं बल्कि तोड़ने वाली बातें ज्यादा करती हैं और यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जब एक ही बात को बारबार कहा जाए तो लड़की के मन में भी यह बात बैठ जाती है कि उस पर बहुत अत्याचार हो रहे हैं और उसे घर छोड़ कर चले जाना चाहिए या अपने पति को तलाक दे देना चाहिए. ऐसे में लड़कियां बात पीछे पति को मायके जाने की धमकी देने लेती हैं. कई बार लड़कियां मायके चली भी आती हैं और फिर धीरेधीरे वापस जाने के सारे रास्ते बंद होते जाते हैं. फिर बात तलाक या आत्महत्या तक पहुँच जाती है. जाहिर है कि इस तरह की जो वारदात होती है उस में कहीं न कहीं मां की जरुरत से ज्यादा दखलअंदाजी का हाथ जरूर होता.

मां के लिए कठिन है हालातों को समझना

ज्यादातर लड़कियों को ससुराल की बातें मां को बताने की आदत होती है. बेटी अपनी मां से सच कह रही है या झूठ और किस बात को अपनी सोच के हिसाब से कैसे मोल्ड कर के मां तक पहुंचा रही है इन बातों का बहुत असर पड़ता है. मां बेटी का पक्ष सुन कर किसी भी घटना को उसी अनुरूप गलत तरीके से इंटरप्रेट करती है और फिर उस हिसाब से रिएक्शन देती है. वह बेटी को समझाती है कि उसे क्या करना चाहिए. अपनी स्थिति कैसे मजबूत रखनी है.

इस तरह जो झगड़े घर में बहुत आसानी से सुलझ सकते हैं वे भी बहुत लंबे खिंच जाते हैं. कई दफा बेटी का घर भी टूट जाता है. यहां गलती मां की भी नहीं है क्योंकि जब बेटी ने मां को सारी बात ही नहीं बताई तो मां हकीकत कैसे जान पाएगी. गलती बेटी की है जो एकएक बात मां से डिसकस कर रही है. एक बार बेटियां ससुराल की बातें बताने लगती हैं तो मां भी खोदखोद कर पूछती हैं और बेटी की जिंदगी में अपनी दखल बढ़ाती जाती है. यह प्रवृत्ति सही नहीं. हर इंसान को अपनी लड़ाई खुद लड़नी चाहिए.

ऐसा नहीं है कि मां गलत कह रही है. मां अपने हिसाब से सही है. पर लड़की को यह समझना चाहिए कि वह अपनी परिस्थितियां ज्यादा बेहतर तरीके से समझ सकती है. उन परिस्थितियों को अपने हिसाब से भी ज्यादा अच्छे तरीके से हल कर सकती है. मां की सलाह पर अमल करते हुए उसे कई बार लेने के देने पड़ जाते हैं. कितने ही रिश्ते मां की जरुरत से ज्यादा दखलंदाज़ी की वजह से टूट जाते हैं. बात तलाक तक आ जाती है. बाद में सिवा पछतावे के कुछ भी हासिल नहीं होता. इसलिए कभी छोटीछोटी बातें अपनी मां को नहीं बतानी चाहिए.

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मां की दखलअंदाजी कितनी हो

1. मां को अपनी तकलीफ तभी बताएं जब आप उसे सह नहीं पा रही है. जब आप को वास्तव में कोई बड़ी समस्या हो, कोई बड़ी घटना घट जाए, कोई एक्सीडेंट हो जाए, तबियत खराब हो, दहेज़ उत्पीड़न किया जा रहा हो या ससुराल वालों के द्वारा किसी और तरह की मानसिक या शारीरिक पीड़ा पहुंचाई जा रही हो. ऐसे में हकीकत अपनी मां तक जरूर पहुंचाएं. लेकिन यदि आप अपने साथ हो रही समस्या की वजह खुद है तो उसे खुद ही सॉल्व करें. हमेशा पति या सास की गलती हो यह जरूरी नहीं. अपनी मां को ससुराल की बात तब बताएं जब आप ने अपनी तरफ से समस्या सुलझाने का प्रयास कर लिया हो पर आप को अब कोई रास्ता नजर न आ रहा हो या घरवालों का रिएक्शन गलत रहा हो.

2. अपनी मां को ससुराल की अच्छी बातें भी बताएं. घर में कोई आयोजन हो रहा है, किसी की तरक्की हुई है या और कोई ख़ुशी की बात है तो ऐसी चीज़ें अपनी मां से जरूर शेयर करें. सास या पति ने आप के लिए कुछ अच्छा किया हो, ननद ने आप का ख़याल रखा हो, ससुर बेटियों सा प्यार लुटा रहे हों तो ऐसी बातें बढ़ाचढ़ा कर बताएं न कि झगड़े. माँ को वे बातें बताएं जिस से आप के ससुराल का नाम हो न कि रुसवाई. हर घर की कुछ खूबियां होती हैं तो कुछ कमजोरियां. अपने परिवार की कमजोरियां बाहर न पहुचाएं.

जब दखल ज्यादा हो जाए

देखा जाए तो दंपतियों के बीच होने वाले अलगाव के 60 से 80 फीसदी मामले में मायके पक्ष के अधिक दखल से उत्पन्न विवाद होते हैं. कई बार दंपती साथ रहना चाहते हैं लेकिन ससुराल और मायके वाले अपनी प्रतिष्ठा की बात पर अड़ जाते हैं और रिश्ता टूट जाता है.

कई बार परिवारों के बीच विवाद इतना बढ़ जाता है कि पतिपत्नी चाहते हुए भी अपनी बात नहीं रख पाते हैं और परिवार की भावनाओं में बह कर रिश्ता तोड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं.

नोएडा में रहने वाली 36 वर्षीया प्रिया को उस का पति सुधीर गुप्ता काफी परेशान करता था और अक्सर मारपीट भी करता रहता था. इस मामले में प्रिया की मां अक्सर फोन कर के अपनी बेटी को समझाती थी लेकिन फिर भी घर में विवाद और बढ़ता गया. जिस से दोनों ने अलग होने की ठान ली. पुलिस के पास मामला पहुंचा तो पति ने उन के आगे अपना दुखड़ा रोते हुए बताया,” मेरी सास मेरी पत्नी से बात करना बंद कर दें तो मुझ को कोई परेशानी नहीं है. मेरी पत्नी एकएक बात अपनी मां को बताती हैं. ऐसे में सासु मां अपनी बेटी को समझाने के बजाय उसे और शह दे देती हैं जिस से मेरे अंदर सहने की क्षमता कम हो जाती है. वह मायके का सपोर्ट मिलने पर लड़ने पर आमदा रहती हैं. अनबन होने पर मायके जाने की धमकी देती हैं. इसी वजह से मैं चिढ़ जाता हूँ. ”

बात प्रिया की समझ में आ गई. उस ने मां को बीच में लाना छोड़ दिया. अब दोनों काफी समय से बिना झगड़े एक साथ रह रहे हैं. दरअसल कई बार माँ की दखल कहीं न कहीं पतिपत्नी के झगड़े की आग में घी का काम करती है. बात दंपति के बीच रहे तो मामला आसानी से सुलझ जाता है. इसी तरह

मां रखे इन बातों का ख़याल

यदि आप को लगे कि आप अपनी बेटी के ज्यादा करीब हो गई हैं जिस से वह कंफर्टेबल महसूस नहीं कर रही या उदासीन हो गई है तो समझ जाइए कि समय आ गया है जब आप को उस से थोड़ी दूरी बना कर खुद से जुड़ना है. खुद को समय देना है. अपने सपनों और उम्मीदों को पंख देना है. इस के लिए अपने दोस्तों और परिचितों की संख्या बढ़ाइए. सामाजिक कार्यों में मन लगाइए. अपनी हॉबी को अपनाइये.

अपने रिश्ते में संतुलन बना कर रखें. हर वक्त उस की जिंदगी में दखल देना उचित नहीं. पर थोड़ी दूरी कायम रखते हुए भी यह विश्वास जरूर दिलाएं कि जब उसे मां की जरूरत होगी तो आप उस के लिए हाजिर रहेंगी. जब उसे अपना दर्द बांटना होगा, कुछ कहना होगा तब आप सुनने और सलाह देने के लिए तैयार मिलेंगी. वस्तुतः मांबेटी दोनों एकदूसरे को सपोर्ट करते हुए भी थोड़ी दूरी बना कर अपनी जिंदगी बेहतर ढंग से जीना सीख सकती हैं.

शादी के बाद लड़की को ससुराल में अपनी जगह बनाने में कुछ समय लगता है. उसे वह समय दीजिए. उसे बारबार मायके न बुलाएं. रोज फ़ोन कर के उस की जिंदगी की हर छोटीबड़ी बात जानने का प्रयास न करें. हर बात पर अपनी सलाह न दे. वरना ऐसा करना उस की आदत बन जायेगी. विवाह के बाद उस का असली घर ससुराल है. उसे ससुराल में घुलमिल जाने का मौका दें.

विवाह के पश्चात् बेटी की आवश्यकता से अधिक देखभाल न करें. उस की सहायता करें पर उन्हीं परिस्थितियों में जब उसे अपने परिवार से सहायता न मिल रही हो.

बेटी के गृहस्थ जीवन में ज्यादा हस्तक्षेप न करें. बेटी को अपनी समस्याएं उस के अपने हिसाब से सुलझाने को प्रोत्साहित करें. ध्यान रहे आप अपनी सीखों से अपनी बेटी की गृहस्थी को सुखमय भी बना सकती हैं और उजाड़ भी सकती हैं. इसलिए अपनी बेटी की सोच को बड़ा व सकारात्मक बनाने की कोशिश करें ताकि उस के ससुराल वाले उस पर नाज कर सकें.

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यदि मां को दखल देनी ही है तो पॉजिटिव वे में देनी चाहिए. जैसे यदि बेटी कह रही है कि वह झगड़े की वजह से अपसेट है और घर छोड़ कर आ रही है तो मां का फर्ज है कि बेटी को जल्दबाजी न करने और धैर्य रखने की बात समझाए. ऐसे में यदि वह मां की बात मान तुरंत कोई बड़ा कदम न उठा कर थोड़ा धैर्य रखती है तो पति को खुद अपनी गलती महसूस होगी और वह उस के प्रति नम्र हो जाएगा. बात आगे नहीं बढ़ेगी.

मां जब बेटी से मिलने उस के घर जाएं तो बेटी के कमरे में ही बैठे रहने के बजाय घर के सभी सदस्यों के साथ बात करें. वरना ससुराल वालो को लगेगा कि आप बेटी को उन के खिलाफ सिखापढ़ा रही हैं.

बेटी को उस की सास या ननद के खिलाफ न भड़काएं. उसे हमेशा सीख दें कि उस का व्यवहार अपनी ननद से बहन की तरह और सास से बेटी की तरह ही होना चाहिए.

अगर आप का दामाद अपने परिवार वालों पर कोई खर्चा करता है तो अपनी बेटी को दामाद के इस खर्चे में कटौती करने के लिए न उकसाएं. जब आप की बेटी अपने भाईबहनों पर खर्च कर सकती है तो आप का दामाद अपने परिवार पर खर्च क्यों नहीं कर सकता.

रिश्ता: अकेले मां-बाप को नए रिश्ते में जोड़ते बच्चों की कहानी

Serial Story: रिश्ता (भाग-1)

अशोकजी शाम को अपने घर की छत पर टहल रहे थे. एक मोटरसाइकिल सवार गेट के सामने आ कर रुका, जिस का चेहरा हैलमेट में ढका हुआ था.

उस ने पहले अपनी जैकट की जेब से एक लिफाफा निकाल कर लैटर बौक्स में डाला, फिर सिर उठा कर अशोकजी की ओर देखा और हाथ हिलाने के बाद चला गया.

उस लिफाफे में अशोकजी को एक पत्र मिला जिस में लिखा था, ‘सर, आप के डर के कारण आप की बेटी अलका मुझ से रिश्ता नहीं जोड़ रही है. उस की तरह मैं भी 2 महीने बाद नौकरी करने अमेरिका जा रहा हूं. वहां मेरा सहारा पा कर वह सुरक्षित रहेगी.

‘मेरी आप से प्रार्थना है कि आप अलका से बात कर उस का भय दूर करें. आप ने हमारे रिश्ते को स्वीकार करने में अड़चनें डालीं तो जो होगा उस के जिम्मेदार सिर्फ आप ही होंगे.

‘मैं अलका का सहपाठी हूं. अपना फोन नंबर मैं ने नीचे लिख दिया है. आप जब चाहेंगे मैं मिलने आ जाऊंगा. आप के आशीर्वाद का इच्छुक-रोहन.’

पत्र पढ़ कर अशोकजी बौखला गए. उन के लिए रोहन नाम पूरी तरह से अपरिचित था. उन की इकलौती संतान अलका ने कभी किसी रोहन की चर्चा नहीं छेड़ी थी.

पत्र में जो धमकी का भाव मौजूद था उस ने अशोकजी को चिंतित कर दिया. अलका का मोबाइल नंबर मिलाने के बजाय उन्होंने अपने हमउम्र मित्र सोमनाथ का नंबर मिलाया.

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अशोकजी के फौरन बुलावे पर सोमनाथ 15 मिनट के अंदर उन के पास पहुंच गए. रोहन का पत्र पढ़ने के बाद उन्होंने चिंतित स्वर में टिप्पणी की, ‘‘यह तो इश्क का मामला लगता है मेरे भाई. अलका बेटी ने कभी इस रोहन के बारे में तुम से कुछ नहीं कहा?’’

‘‘एक शब्द भी नहीं,’’ अशोकजी भड़क उठे, ‘‘मुझे लगता है कि यह मजनू की औलाद मेरी बेटी को जरूर तंग कर रहा है. अलका ने इस के प्यार को ठुकराया होगा तो इस कमीने ने यह धमकी भरी चिट्ठी भेजी है.’’

‘‘दोस्त, यह भी तो हो सकता है कि अलका भी उसे चाहती…’’

सोमनाथ की बात को बीच में काटते हुए अशोकजी बोले, ‘‘अगर ऐसा होता तो मेरी बेटी जरूर मुझ से खुल कर सारी बात कहती. तू तो जानता ही है कि तेरी भाभी की मृत्यु के बाद अपनी बेटी से अच्छे संबंध बनाने के लिए मैं ने अपने स्वभाव को बहुत बदला है. वह मुझ से हर तरह की बात कर लेती है, तो इस महत्त्वपूर्ण बात को क्यों छिपाएगी?’’

‘‘अब क्या करेगा?’’

‘‘तू सलाह दे.’’

‘‘इस रोहन के बारे में जानकारी प्राप्त करनी पड़ेगी. अगर यह गलत किस्म का युवक निकला तो इस का दिमाग ठिकाने लगाने को पुलिस की मदद मैं दिलवाऊंगा.’’

सोमनाथ से हौसला पा कर अशोकजी की आंखों में चिंता के भाव कुछ कम हुए थे.

रोहन के बारे में जानकारी प्राप्त करने की जिम्मेदारी अशोकजी ने अपने भतीजे साहिल को सौंपी. उस की रिपोर्ट मिलने  तक उन्होंने अलका से इस बारे में कोई बात न करने का निर्णय किया था.

‘‘अंकल, रोहन सड़क छाप मजनू नहीं बल्कि बहुत काबिल युवक है,’’ साहिल ने 2 दिन बाद अशोकजी को बताया, ‘‘अलका दी और रोहन कक्षा के सब से होशियार विद्यार्थियों में हैं. तभी दोनों को अमेरिका में अच्छी नौकरी मिली है. पहले इन दोनों के बीच अच्छी दोस्ती थी पर करीब 2 सप्ताह से आपस में बोलचाल बंद है, रोहन के घर का पता इस कागज पर लिखा है.’’

साहिल ने एक कागज का टुकड़ा अशोकजी को पकड़ा दिया था.

‘‘तुम ने मालूम किया कि रोहन के घर में और कौनकौन हैं?’’

‘‘बड़ी बहन की शादी हो चुकी है और वह मुंबई में रहती है. रोहन अपनी विधवा मां के साथ रहता है. उस के पिता की सड़क दुर्घटना में जब मृत्यु हुई थी तब वह सिर्फ 10 साल का था.’’

‘‘और किसी महत्त्वपूर्ण बात की जानकारी मिली?’’ अशोकजी ने साहिल से पूछा.

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‘‘नहीं, चाचाजी, मैं ने जिस से भी पूछताछ की है, उस ने रोहन की तारीफ ही की है. हमारी जातबिरादरी का न सही पर लड़का अच्छा है. मेरी राय में अगर रिश्ते की बात उठे तो आप हां कहने में बिलकुल मत झिझकना,’’ अपनी राय बता कर साहिल चला गया था.

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47 की उम्र में भी फैशन के मामले में कम नहीं तब्बू

बौलीवुड में अपनी एक्टिंग से दिल में जीतने वाली एक्ट्रेस तब्बू 47 साल की उम्र में जितनी खूबसूरत हैं उतनी ही फैशनेबल भी हैं. तब्बू भले ही फिल्मों में सीरियस किरदार निभाने के लिए जानी जाती हैं, लेकिन रियल लाइफ में उनकी लुक घर बैठीं लेडिज को इंस्पायर करता है. आज हम तब्बू के फैशन के बारे में बताएंगे, जिसे 40 से 47 साल की महिला हो या कोई औफिस वर्किंग वूमन आसानी से ट्राय कर सकते हैं.

1. लौंग ड्रेस है ट्रेडी

आजकल लौंग ड्रैसेस मार्केट में पौपुलर हैं. अगर आप हेल्दी और लम्बी हैं तो ड्रेस आपके लिए परफेक्ट है. लौंग ड्रेसेस में आपके लुक को फैशनेबल के साथ-साथ कम्फरटेबल बनाएगा. आप चाहें तो इस ड्रेस के साथ हिल्स के साथ ट्राय करने की बजाय शूज के साथ भी ट्राय कर सकती हैं. तब्बू का ये लुक आपके लिए बेस्ट औप्शन रहेगा. वाइट शर्ट ड्रेस आपके लुक के लिए बेस्ट रहेगा.

 

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White lies beneath….

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2. फ्रिल ड्रेस है परफेक्ट

 

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फ्रिल ड्रेस आजकल पौपुलर है. अगर आप भी कुछ नया ट्राय करना चाहते हैं तो लौंग फ्रिल ड्रेस आपके लिए परफेक्ट रहेगा. ये आपके लुक को फैशनेबल के साथ-साथ ट्रैंडी भी बनाएगा.  तब्बू की ये रेड कलर की फ्रिल ड्रेस को आप वेकेशन में भी पहन सकते हैं.

3. वेडिंग पार्टी के लिए परफेक्ट है तब्बू की ये ड्रेस

 

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अगर आप किसी वेडिंग पार्टी में कुछ नया ट्राय करने का सोच रही हैं तो तब्बू की ये ड्रेस एकदम परफेक्ट है. औफ शोल्डर गाउन के साथ सिंपल हेयर स्टाइल आपके लुक को सभी के सामने फ्लौंट करने में मदद करेगा. जिससे आपको नए-नए स्टाइल कौपी करने में कौन्फिडेंस आ जाएगा.

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बता दें, तब्बू की फिल्म अंधाधुन हाल ही में औस्ट्रेलिया में होने वाले मेलबर्न फेस्टिवल का भी हिस्सा बनी थी, जहां पर उनकी सुपरहिट फिल्म को पब्लिक के बीच दिखाया गया. वहीं अब खबरें हैं कि फिल्म अंधाधुन को चाइना में भी ‘पियानो प्लेयर’ के नाम से रिलीज किया जाएगा, जिसे तब्बू ने अपने सोशलमीडिया पर अपने फैंस के साथ शेयर किया.

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