Interview: इंटिमेट सीन्स में न्यूडिटी पर बोलीं Laxmi Bomb की ये एक्ट्रेस

संगीत से अभिनय कैरियर की तरफ रुख करने वाली अभिनेत्री और सिंगर अमिका शैल कोलकाता की है. उसने 5 साल की उम्र से संगीत का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया था और 9 साल की उम्र में संगीत की रियलिटी शो लिटिल चैंप्स में भाग लिया है. बचपन से ही उसे कला से जुड़े काम करने की इच्छा रही है. उसने संगीत की कई रियलिटी शो में भाग लेकर अवार्ड भी जीता है. जिसमें सा रे गा मा पा नेशनल टेलेंट हंट, स्टार वौइस ऑफ़ इंडिया, इंडियन आइडल आदि है, मृदु भाषी और विनम्र अमिका सब टीवी पर बालवीर रिटर्न में वायु परी की भूमिका निभाने के अलावा फिल्म ‘लक्ष्मी बॉम्ब’ में एक भूमिका निभाई है ,जिसे लेकर वह बहुत खुश है, पेश है उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश.

सवाल- लक्ष्मी बॉम्ब में आपकी भूमिका क्या है?

इसमें अक्षय कुमार के भाई की गर्लफ्रेंड की भूमिका निभा रही हूं. नार्मल लड़की की भूमिका निभा रही हूं. जो बिलकुल मुझ जैसी ही है. अक्षय कुमार के साथ कुछ सीन्स थे. मुझे बहुत अच्छा लगा. बड़े कलाकार के साथ काम करने से बहुत कुछ सीखने को मिलता है.

सवाल-संगीत से अभिनय की तरफ मुड़ना कैसे संभव हुआ?

मैं मुंबई संगीत की कई रियलिटी शो में परफॉर्म करने आई थी. ग्रेजुएशन के बाद मैं मुंबई शिफ्ट हो गयी और कई फिल्मों में प्ले बैक सिंगर के रूप में गाने गायें. म्यूजिक वीडियो बनायी. विदेशों में बहुत सारें परफोर्मेंस दिए. एक्टिंग की तरफ नहीं सोचा था. 5 साल के बाद मुझे सिंगर एक्टर का ऑफर आया. मैने ऑडिशन दिया और चुनी नहीं गयी. फिर मैंने अपने आपको ग्रूमिंग की और सीरियल्स के लिए ऑडिशन दिया. ‘उडान’ धारावाहिक मिली, फिर ‘दिव्य दृष्टि’ इसके बाद बाल वीर रिटर्न में वायु परी की भूमिका कर रही हूं, इसके अलावा कई सारे विज्ञापनों में भी अभिनय किया है, ऐसे मुझे काम मिलता गया. वेब सीरीज भी मैंने की है.

सवाल-कोलकाता से मुंबई आने की बात पर माता-पिता की क्या प्रतिक्रिया रही ? आपने मुंबई में कैसे सरवाईव किया?

बचपन से ही माता-पिता का सहयोग संगीत की तरफ रहा है. मैंने क्लासिकल संगीत की पूरी ट्रेनिंग ले रखी है. पहले मेरे पिता राजी नहीं थे, क्योंकि वे खुद डॉक्टर है और मुझे भी वे डॉक्टर बनने के लिए कहा करते थे. माँ बहुत सपोर्टिव थी, उनकी वजह से मैं यहाँ तक पहुँच पायी हूं, लेकिन पिता ने जब मेरी कामयाबी और पैसा सबकुछ देखा तो वे खुश हुए और आज बहुत गर्व महसूस करते है. मुंबई आने पर सबसे पहले मैंने जॉब ढूढना शुरू किया और कई स्कूलों में जाकर संगीत की टीचर के लिए इंटरव्यू दिए और मुझे जॉब मिला. 6 महीने तक मैंने काम किया. इससे मुझे पैसे मिले और मेरा मुंबई रहना आसान हुआ. बाद में मैंने काम छोड़ दिया. एक संगीत का बड़ा कॉन्सर्ट मिला और एक महीने विदेश में रही. मेरी वित्तीय अवस्था अच्छी हो गयी.

 

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सवाल-क्या अभिनय की वजह से संगीत पीछे नहीं छूट रहा?

संगीत छूटा नहीं है, जब भी समय मिलता है, मैं संगीत की रियाज करती हूं. संगीत की दुनिया में नेपोटिज्म सालों से है और न्यू कमर को अच्छा चांस मिलना बहुत मुश्किल होता है. एक्टिंग में जाने की वजह भी यही है, क्योंकि मुझे संगीत में उतनी सफलता नहीं मिल रही थी. जितनी आज अभिनय में है. यहाँ काम ,पैसा, शोहरत सब मुझे मिला है.

सवाल-तनाव होने पर रिलीज कैसे करती है?

तनाव इस इंडस्ट्री में हर किसी को होता है. आउटसाइडर को थोडा अधिक होता है. इसलिए मैं जिम,मैडिटेशन, साइकिलिंग आदि से इसे कम करने की कोशिश करती हूं.

सवाल-कोरोना के बाद एक्टिंग में सावधानी कितनी है?

अभी सेट पर काफी सावधानी बरती जा रही है. साफ़ सफाई और सेनीटाईजेशन पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है. सबके हाथ में ग्लव्स, मुंह पर मास्क और हाथ में सेनिटाईजर होता है. सेट पर कोविड इंस्पेक्टर होते है, जो सेट पर नियमों का पालन सही से हो रहा है या नहीं इसकी देखभाल करते है. केवल शॉट के समय मास्क उतारा जाता है. एम्बुलेंस हमेशा सेट पर मौजूद है. केवल 30 प्रतिशत लोग ही काम कर रहे है. आर्टिस्ट के लिए रूम शेयरिंग अब नहीं होता. सबको सिंगल रूम दिया गया है.

सवाल-इसके आगे कौन सी प्रोजेक्ट है?

वेब सीरीज मिर्ज़ापुर 2 में काम कर रही हूं. इसके अलावा एक हिंदी फिल्म में काम करने वाली हूं.

सवाल-आउटसाइडर को अच्छा काम मिलना क्या अधिक मुश्किल होता है?

मैंने देखा है कि टीवी इंडस्ट्री में आउटसाइडर को अच्छा काम मिलता है. यहां अधिक नेपोटिज्म फिल्मों की तरह अधिक नहीं है, क्योंकि यहां फ्रेश चेहरे को अधिक महत्व दिया जाता है. वेब सीरीज में भी अधिक अवसर नए लोगों को मिलता है. फिल्मों मैं आउटसाइडर को मौका बहुत कम मिलता है. ऑडिशन भी बहुत कम होता है.

सवाल-क्या कोई ड्रीम है?

उम्मीद अधिक नहीं रखती और आगे मिलेगा तो अच्छी परफोर्मेंस वाली फिल्म करना चाहती हूं. निर्देशक संजय लीला भंसाली के साथ काम करना चाहती हूं.

सवाल-इंटिमेट सीन्स को करने में कितनी सहज होती है?

पहले मैं इंटिमेट सीन्स के लिए ना कहती थी, लेकिन अब कई वेब सीरीज इंटिमेट सीन्स के साथ अच्छे बने है और ये कहानी को सूट भी करती है. इंटिमेट सीन्स में अगर न्यूडिटी न हो, तो करने में कोई एतराज नहीं.

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सवाल-आप कितनी फैशनेबल है?

फैशन का सेन्स मुझे अधिक नहीं था. सिंगर के रूप में मैं बहुत कैजुअल थी. एक्टिंग में आने के बाद मैंने अडॉप्ट किया और अच्छा सेन्स रखने लगी हूं.

सवाल-अभिनय के इच्छुक यूथ के लिए क्या मेसेज देना चाहती है?

अभिनय में पैशन, मेहनत, धीरज और आत्मविश्वास होने की बहुत जरुरत होती है, ताकि आप अपने मकसद में कामयाब हो सकें.

Independence Day Special: जानें आज़ादी पर क्या कहते हैं टीवी सितारे

देश एक बार फिर 74 वां स्वाधीनता दिवस मनाने जा रहा है, भारत के विभाजन के बाद जो राजनीतिक सत्ता देश में आई, उसे ही आज़ादी का नाम दे दिया गया, लेकिन 73 सालों बाद भी देश गरीबी, भुखमरी, कुपोषणता, बेरोजगारी के चंगुल से आज भी आजाद न हो सका. ये सही है कि अंग्रेजों के चंगुल से भारत आज़ाद हुआ, लेकिन आज़ादी का लाभ और आजादी किसे मिली? इस पर आज विचार करने की जरुरत है. इतना ही नहीं आज भी देश रुढ़िवादिता और सदियों पुराने रीतिरिवाजों में कैद है. समाज की कुप्रथाएं और बंद विचारधाराएं आज भी मौजूद है, ऐसे में आजादी सिर्फ कहने भर है, वास्तव में कही भी नहीं है. कठिन संघर्ष से मिली इस आजादी को किसी ने संजोया नहीं बल्कि जाति, धर्म, वर्ण, भाषा आदि का नाम देकर कभी इसे एक नहीं होने दिया. कहने के लिए भारत के नागरिक सर्वशक्तिशाली है, लेकिन इसका उदहारण देखने को नहीं मिला, कोरोना कहर में सब कुछ आँखों के सामने स्पष्ट है. बेसिक धरातल पर इस पर मंथन करने की आज जरुरत है. इसी बात पर टीवी जगत के कलाकारों ने अपनी-अपनी विचारधाराएं रखी है, आइये जानते है क्या कहते है वे.

ये रिश्ता क्या कहलाता है फेम एक्ट्रेस शिल्पा रायजादा कहती है कि आज़ादी की बात अगर मैं करूं तो महिलाओं के बारें में ही करना चाहूंगी. लड़कियों को आज़ादी आज भी नहीं मिली है. कई ऐसे परिवार है जहां बेटी और बहू में फर्क महसूस करवाया जाता है. बेटी अगर बिना सिर ढके घूम सकती है तो बहू क्यों नहीं. इसे बहुएं कहने से भी डरती है, क्योंकि पारिवारिक समस्या हो सकती है. मैं चाहती हूं कि आज़ादी लोगों के माइंड सेट में होने की जरुरत है, ताकि उनके विचार विकास के लिए हो, घुटन के लिए नहीं.

 

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एक्टर विजयेन्द्र कुमेरिया कहते है कि 74 साल के इस स्वाधीनता में बहुत कुछ विकास करने की जरुरत है. जिसमें हेल्थकेयर,गरीबी, शिक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आगे लाना, सेनिटेशन आदि पर ध्यान देने की जरुरत है. फ्रीडम ऑफ़ स्पीच की बात कही जाय तो इसमें कभी आजादी मिलती है कभी नहीं, क्योंकि इसमें लोग सोशल मीडिया का अधिक प्रयोग करते है, जिसमें वे इसके नियमावली और फैक्ट को जाने बिना कुछ भी ट्रोल करते है, जो अच्छा नहीं लगता.

विकास सेठी के हिसाब से 7 दशक की इस आज़ादी के बाद भी हम आज ये सोचने पर मजबूर है कि हम कितने आज़ाद है? हमें आज़ादी उतनी नहीं मिली, जितनी मिलनी चाहिए थी. मीडिया और राजनीति की दबाव की वजह से फ्रीडम ऑफ़ स्पीच अब नहीं रही. हमें और समाज को खुले विचारों के साथ इस बारें में सोचने की जरुरत है. जजमेंटल होने की आवश्यकता नहीं है. साथ ही कलाकार, गायक, लेखक सभी को आगे बहुत कुछ कहने की जरुरत है.

आशना किशोर कहती है कि आज़ादी 74 वर्ष में कदम रख दिया है, हम आजाद कहे जाते है, पर मानसिक सोच, विचारधारा में आज़ादी के लक्षण नहीं दिखते. बेटा बेटी में फर्क, धर्म, जाति, रंग भेद आज भी हर रूप में कही न कही मौजूद है. इससे बाहर निकल कर अगर हम कुछ सोच सकेंगे तभी सही मायने में हम आजाद होंगे. ये बदलाव तभी संभव हो पायेगा, जब लोग खुद इसमें पहल करेंगे.

ध्रुवी हल्दंकर कहती है कि मैं अपने आपको आजाद समझती हूं, क्योंकि मैं अपने शहर से दूर वर्किंग वुमन हूं और अपने सपनो को आगे ले जारही हूं. इसमें मुझे पति की सरनेम की जरुरत किसी फ्लैट को किराये पर लेने के लिए नहीं चाहिए , क्योंकि ये बड़ी शहर है, लेकिन गांव में अभी भी मजदूरों को सम्मान नहीं मिलता, किसान आत्महत्या करते है, ऑनर किलिंग होती है, रेप विक्टिम आज भी है. इसके अलावा बेसिक जरुरत की सारी चीजे, मसलन सही टॉयलेट, सेनिटेशन, गरीबी आदि पूरे देश में दिखाई पड़ती है, जो मेरे लिए दुखद है. ‘फ्रीडम ऑफ़ स्पीच’ आज नहीं है, ये केवल रसूखदार इन्सान को ही मिलता है.

जान्हवी सेठी के हिसाब से मैं ‘माई जिंदगी फाउंडेशन’ की को फाउंडर हूं और ये मानती हूं कि आजादी के इतने सालों बाद भी व्यक्ति अपनी मानसिक अवस्था के बारें में खुलकर बात नहीं कर सकता. समाज इसे स्वीकारता नहीं. मैं चाहती हूं कि आगे लोग इस बारें में बेझिझक बात करें और मानसिक अवसाद से अपने आप को मुक्त कर सकें.

jahnvi

आर्विका गुप्ता कहती है कि हमारा कर्तव्य केवल 15 अगस्त को एक दिन मनाना नहीं ,बल्कि उसके अर्थ को समझना है, क्योंकि इसमें हर इंसान को ये सोचने की जरुरत है कि वह अपने तरीके से देश में क्या बदलाव ला सकता है, ताकि पूरा देश उसके साथ चल सकें. कुछ व्यक्ति हमारे अधिकारों की बाते करते है, जो सुनने में अच्छा लगता है, पर वे खुद उसे फोलो नहीं करते. लड़कियों को सम्मान आज भी नहीं है. एक अकेली लड़की आज भी सडक पर अकेले चलने से डरती है. उसकी आजादी कहाँ है?भ्रष्टाचार को हटाना केवल सरकार का काम नहीं, हर इंसान को उस दिशा में कदम बढ़ाने की जरुरत है.

 

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धारावाहिक ‘हमारी देवरानी’ फेम उर्वशी उपाध्याय शारले का कहना है कि इस बार का 15 अगस्त 74 वा आज़ादी का वर्ष है. इस दिन हम सब अंग्रेजी शासन से मुक्त हुए थे, लेकिन जितनी आज़ादी हमें अब तक मिल जानी चाहिए थी वह अभी तक नहीं मिली है. हमारी बुनियादी जरूरते और अधिकार तक नहीं मिल पाया है. शिक्षा जो आज तक सही नहीं है. सरकारी स्कूलों और प्राइवेट स्कूल्स की पढाई में जमीन आसमान का अन्तर है. उसे ठीक करने की आवश्यकता है. इसके अलावा सरकारी अस्पताल और प्राइवेट अस्पताल की चिकित्सा पद्यति में भी काफी अंतर है. ऐसा क्यों है? जबकि विदेशों में सरकारी और प्राइवेट में अंतर न के बराबर है. क्या देश इन दो बेसिक राइट्स भी जनता को नहीं दे सकती, फिर हम आज़ाद कैसे हुए? सोचने वाली बात है.

 

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15 August Special: 1947 में जिन्होंने भुगता दुनिया का सबसे बड़ा विस्थापन कहानी उन रिफ्यूजियों की….!

उनके बारे में अनगिनत कहानियां हैं. ज्यादातर सच, कुछ झूठी और बहुत सारी काल्पनिक. उन पर अब तक लाखों लेख लिखे जा चुके हैं,हजारों  कहानियाँ छप चुकी हैं. सैकड़ों उपन्यास, दर्जनों फिल्में, बीसियों धारवाहिक और उनके अनगिनत जुबानी किस्से लोगों ने सुन रखे हैं. फिर भी लगता है उनका दर्द अभी भी पूरी तरह से बयां नहीं हुआ. हो भी नहीं सकता. आज भी किसी बूढ़े रिफ्यूजी को कुरेद दीजिये तो उसकी आपबीती आपको रुला देगी. विस्थापन के इतिहास में भारत-पाक बंटवारे के की कहानी सबसे त्रासद है. यह मानव इतिहास का सबसे बड़ा विस्थापन था. दोनों तरफ के 1 करोड़ 60 लाख से ज्यादा लोग इससे सीधे-सीधे प्रभावित हुए थे. विभिन्न दस्तावेजों के मुताबिक़ 15 लाख से ज्यादा लोग मारे गए थे. लाखों लोग हमेशा के लिए अपाहिज हो गए थे. इस बंटवारे से जहाँ 1.20 करोड़ हिंदू तात्कालिक पूर्वी पाकिस्तान या मौजूदा बांग्लादेश में दोयम दर्जे के नागरिक बन जाने को मजबूर हो गए थे वहीं  4 करोड़ से ज्यादा भारत में रह गए मुसलमानों को भी अतिरिक्त डर के साथ जीना पड़ा.

भारत और पाकिस्तान के इतिहास में यह वैसी ही त्रासदी है जैसे पोलैंड और हंगरी के खाते में पहला और दूसरा विश्व-युद्ध. किसी को नहीं लगता था कि विभाजन हो ही जाएगा. यहाँ तक कि जिन्ना को भी. पाकिस्तान बनने के बाद उन्होंने एक बार मीडिया वालों के सामने और कहते हैं एक बार नेहरू से बात करते हुए भी यह कहा था. भले बाद में लोगों ने इसे जिन्ना का मजाक समझा हो मगर हकीकत यही थी की कि लोगों के साथ-साथ नेताओं को भी आखिरी तक लगता था कि शायद बंटवारा नहीं होगा. अंत आते आते बात बन ही जायेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अंततः बंटवारा हो ही गया. जिसकी सबसे वजनदार दस्तक फरवरी 1938 में ऐसा न चाहने वाले लोगों ने तब सुनी जब महात्मा गाँधी और मोहम्मद अली जिन्ना के बीच विभाजन को रोकने वाली बातचीत बिना किसी नतीजे के खत्म हो गयी.

गांधी-जिन्ना बैठक के बेनतीजा हो जाने या नाकामयाब हो जाने के बाद ही साल 1938 के अंत और 1939 की शुरुआत में मुस्लिम लीग ने “मुसलमानों के उत्पीड़न” की जाँच के लिए एक समिति बनाई. इस समिति ने मानों विभाजन की आशंकित कहानी में जान डाल दी. यह विभाजन की सबसे मजबूत कड़ी साबित हुई. इसी के बाद 23 मार्च 1940 का वह दिन आया, जब मुस्लिम लीग ने अपने लाहौर अधिवेशन में पकिस्तान को लेकर एक प्रस्ताव रखा. यह प्रस्ताव पाकिस्तान की तरफ कदम बढाने का पहला ठोस व दस्तावेजी कदम था. अगर वास्तव में हमारे राजनेता मुस्लिम लीग को लेकर खुशफहमी का शिकार न होकर दूरदर्शी होते तो इसे ठोस रूप न लेने देते. जिन्ना-गांधी की बातचीत के कई और दौरों की कोशिश करते तो यह कदम रुक जाता जिसके बाद मुस्लिम लीग वालों के लिए पाकिस्तान हासिल करना प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया.

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इसी प्रस्ताव को बाद में ‘पाकिस्तान प्रस्ताव’ के नाम से जाना गया. इसके तहत एक पूरी तरह आजाद मुस्लिम देश बनाए जाने का प्रस्ताव रखा गया. ठीक उन्हीं दिनों भारत स्थित ब्रिटिश वायसराय लिनलिथगो ने अगस्त प्रस्ताव की घोषणा की. जिसे कांग्रेस और लीग दोनों ने एक जैसे तर्कों के साथ खारिज कर दिया जो इस बात का सबूत था कि अब भी दोनों कई बातों पर एक जैसी राय रखते थे यानी उनके बीच सहमति की गुंजाइश थी. हालाँकि जब कांग्रेस ने उन्हीं दिनों अंग्रेजी शासन के खिलाफ असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ दिया तो मुस्लिम लीग ने साथ तो नहीं दिया, लेकिन विरोध भी नहीं किया. जो एक किस्म से अंग्रेजों की खिलाफत ही थी. 11 मार्च 1942 को ब्रिटिश संसद में घोषणा की गई कि इंग्लैंड के प्रसिद्ध समाजवादी नेता सर स्टिफर्ड क्रिप्स को जल्द ही नए सुझावों के साथ भारत भेजा जाएगा जो राजनीतिक सुधारों के लिए भारतीय नेताओं से बातचीत करेंगे. घोषणा के मुताबिक 22-23 मार्च 1942 को सर स्टिफर्ड क्रिप्स दिल्ली आए. उन्होंने भारतीय नेताओं से लंबी बातचीत की और 30 मार्च को क्रिप्स प्रस्ताव प्रकाशित हुआ.

कांग्रेस ने क्रिप्स मिशन के प्रस्तावों को सिरे से खारिज कर दिया. अब भी मुस्लिम लीग अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस के साथ ही थी, यह अलग बात है कि बयानबाजी में अब लीग कांग्रेस से अपनी दुश्मनी दिखाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देती थी. गाँधी और जिन्ना ने सितंबर 1944 में पाकिस्तान की मांग पर फिर बातचीत शुरू की जिसकी इस बार भी बैठक के पहले न तो कोई ठोस भूमिका बनाई गयी और न ही पोस्ट डिस्कशन के बारे में कुछ अनुमान लगाया गया. बहुत कैजुअल बातचीत शुरू हुई कुछ इस अंदाज में जैसे दोनों पक्षों को पहले से ही पता हो कि यह तो टूटनी ही है. गांधी-जिन्ना बैठकों को लेकर अगर गंभीरता से होम वर्क किया गया होता तो शायद बंटवारा रुक जाता. जिन्ना अपनी कामयाबियों से अब उत्साहित हो गए थे और उन्हें पाकिस्तान पहले चाहिए था आजादी बाद में. दरअसल उन्हें टूट रही वार्ताओं के बीच कांग्रेस में न दिखने वाली बेचैनियों ने हौसला भर दिया था.

जिन्ना बुद्धिमान व्यक्ति थे वह समझ गए थे कि कांग्रेस ने मन ही मन पाकिस्तान को मान्यता दे दी है. क्योंकि गांधी 5 सालों से उसी टेक में अटके थे कि पहले आजादी मिल जाए फिर हिंदू बहुमत वाली अस्थायी सरकार,मुसलमानों की पहचान सुरक्षित रखने का ठोस आश्वासन दे. जाहिर है इस बातचीत में रचनात्मकता का अभाव था. नतीजतन 1946 में मुस्लिम लीग ने कैबिनेट मिशन की योजना से खुद को अलग कर लिया और आंदोलन छेड़ दिया इसी के बाद से बाद देश भर में मारकाट शुरू हो गई और बंटवारा रोकना करीब-करीब असम्भव हो गया. त्रासद बंटवारे का खौफनाक टेलर तब के कलकत्ता में 16 से 18 अगस्त 1946 के बीच दिखा जब ‘ग्रेट कैलकटा किलिंग्स’ हुई. इस त्रासद घटना में 4000 से ज्यादा लोग मारे गए. हजारों घायल हुए और लगभग एक लाख लोग बेघर हुए.

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इसी हिंसा की आग पूर्वी बंगाल के नोआखाली जिले और बिहार तक फैली. आजादी वाले साल की शुरुआत बिलकुल बेरौनक और खौफ से भरी थी. 28-29 जनवरी1947 की एक लंबी मीटिंग के बाद मुस्लिम लीग ने संविधान सभा को भंग करने की मांग की और एक हफ्ते बाद ही पंजाब में भी सांप्रदायिक हिंसा शुरू हो गई. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने घोषणा की कि ब्रिटेन जून 1948 तक भारत छोड़ देगा और लॉर्ड माउंटबेटन वायसराय का पद संभालेंगे. 24 मार्च को लॉर्ड माउंटबेटन ने वायसराय  और गवर्नर जनरल के पद की शपथ ली. 15 अप्रैल को गांधी और जिन्ना ने मिलकर आम लोगों से हिंसा और अव्यवस्था से दूर रहने की अपील की. अब तक गांधीजी जी भी बंटवारे को नियति मान चुके थे. 2 जून को माउंटबेटन ने भारतीय नेताओं से विभाजन की योजना पर बात की और 3 जून को नेहरू, जिन्ना और सिख समुदाय के प्रतिनिधि बलदेव सिंह ने ऑल इंडिया रेडियो के प्रसारण में इस योजना के बारे में जानकारी दी.

आखिरकार 14 अगस्त को एक नया मुल्क पाकिस्तान बन गया. भारत का बंटवारा हो गया. आजादी देने के नाम पर अंग्रेज अपने षड्यंत्र में कारगर हो गए और दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा मानव विस्थापन इस उपमहाद्वीप को विरासत के रूप में सौंप दिया. जिसे आज भी दोनों देश आजादी के बोझ के रूप में ढो रहे हैं.

Suicide के बढ़ते मामलों को रोकने के लिए CINTAA ने उठाया ये कदम, पढ़ें खबर

बॉलीवुड के कलाकारों के चेहरे पर लगे मेक-अप के पीछे छिपा असली चेहरा तब सामने आता है, जब किसी के खुदकुशी करने जैसी भयावह खबर और उनके स्वास्थ्य की असलियत सबके सामने आ जाती है. उल्लेखनीय है कि बॉलीवुड के ऐसे चेहरों को समाज के लिए आदर्श माना जाता है.

CINTAA के ज्वाइंट अमित बहल कहते हैं, “एक एक्टर के मेक-अप की परतों के मुक़ाबले दबाव की परतें अधिक होती है.” वे कहते हैं, “सोशल मीडिया अक्सर कलाकारों के मन में सबकी नज़रों में बने रहने से संबंधित तनाव पैदा करता है. इंडस्ट्री महज़  सतत शोहरत और सतत आय का ज़रिया नहीं है. लॉकडाउन ने यकीनन लोगों की ज़िंदगी में काफ़ी तनाव पैदा कर दिया था, जिसने लोगों में अनिश्चित भविष्य के मद्देनजर डिप्रेशन में जाने पर मजबूर कर दिया. मगर सिने और टीवी आर्टिस्ट्स एसोसिशन (CINTAA) एक अमीर संस्था नहीं है.” वे कहते हैं, “हम अपने सदस्यों तक पहुंचने के लिए हर मुमकिन कोशिश करते हैं और सिर्फ़ महामारी के दौरान ही नहीं, बल्कि हमेशा एक-दूसरे के काम आते हैं. CINTAA ने अब ज़िंदगी हेल्पलाईन के साथ साझेदारी की है जो ऐसे जानकारों व हमदर्दों के केयर ग्रुप से बना है जो काउंसिंग कर लोगों की मदद करता है. CINTAA की कमिटी में साइकियाट्रिस्ट, साइकोथेरेपिस्ट, साइकोएनालिस्ट और साइकोलॉजिस्ट का शुमार है. हम इस मुद्दे को लेकर काफ़ी गंभीर हैं और इसे लेकर लोगों की सहायता करना चाहते हैं.”

CINTAA ने खुदकुशी जैसे मुद्दे को उस वक्त गंभीरता से लिया जब संस्था की सदस्य प्रत्युशा बैनर्जी ने 2015 को आत्महत्या कर ली थी. तब से लेकर अब तक संस्था की केयर कमिटी और आउटरीच कमिटी ने कई सेमिनारों और काउंसिंग सत्रों का आयोजन किया है, जिसके तहत मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक स्वास्थ्य व योग के सत्रों व साथ ही तनाव, डिप्रेशन, आत्महत्या से बचाव जैसे उपायों पर अमल किया जाता रहा है.”

वे कहते हैं, “हमने यौन उत्पीड़न और #MeToo मूवमेंट में भी अग्रणी भूमिका निभाई थी. हमने इसपर एक वेबिनार भी किया था. ऐसे ही एक वेबिनारों का आयोजन हमने अंतर्राष्ट्रीय स्तर की मनोचिकित्सक अंजलि छाबड़िया के साथ भी किया है. हमने सोशल मीडिया पर कई सुइसाइड हेल्पलाइन और नंबर भी साझा किये हैं.” अमित कहते हैं कि CINTAA ऐसे बड़े फ़िल्म स्टूडियोज़, हितधारकों, ब्रॉडकास्टरों और कॉर्पोरेट कंपनियों को भी संपर्क करने की कोशिश कर रही है जो अपने CSR के तहत पैसों का योगदान दे सकते ताक़ि कलाकारों और तकनीशियनों के लिए एक 24/7  हेल्पलाइन स्थापित की जा सके.”

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ज़िंदगी हेल्पलाइन की संस्थापक अनुषा श्रीनिवासन कहती हैं, “अपने देश मानसिक बीमारी को कलंक समझा जाता है. कलाकारों को अमर शख़्सियतों के तौर पर देखा जाता है और डिप्रेशन और उत्कंठा को कुछ यूं समझा जाता है जैसे ये शब्द शब्दकोश में हैं कि नहीं. लेकिन उनकी ज़िंदगी व शोहरत संक्षिप्त होती है. वो दूसरों से मदद मांगने में भी असमर्थ होते हैं. गौरतलब है कि हाल के दिनों में दीपिका पा्दुकोण मानसिक बीमारी को लेकर काफ़ी सक्रिय रही हैं और लोगों के सामने वो एक मिसाल के तौर पर उभरी हैं और उन्होंने दूसरों की राह को और आसान बना दिया है. ऐसे में ज़िंदगी हेल्पलाइन एक अहम बदलाव लाने में कारगर साबित होगा.”

वे कहती हैं, “इस ग्रुप में जानकार और हमदर्द होंगे और मानसिक परेशानी से जूझ रहे लोगों की अच्छी देखभाल की जाएगी और उन्हें समय पर सहूलियतें मुहैया कराई जाएंगी. एक-दूसरे की मदद करना ही हमारा उद्देश्य है.

मनोचिकित्सक व साइकोथेरेपिस्ट, अमेरिका में REBT की एसोसिएट फेलो व सुपरवाइजर और ज़िंदगी हेल्पलाइन की मुख्य संस्थापक सदस्यों में से एक डॉ. श्रद्धा सिधवानी कहती हैं, “टेलीविज़न और फिल्म इंडस्ट्री में काफ़ी उतार-चढ़ाव आते हैं. कोरोना महामारी के पहले भी यही स्थिति थी. अब मनोचिकित्सकों का दखल देना ज़रूरी हो गया है. एक बार जब आपकी फिल्म रिलीज हो जाती है, तो आप नाम, शोहरत, पैसा बटोरने में व्यस्त हो जाते हो, लोगों से घिरे रहते हो और प्रमोशन के लिए लगातार यात्राएं करनी पड़ती हैं. फ़िल्म की रिलीज़ से पहले औए बाद में भी एक ख़ास किस्म की चिंता सताती रहती है. लोगों के आलोचनात्मक रवैये से जूझना भी एक अहम काम होता है. कोई भी शख्स ऐसी टिप्पणियों को निजी तौर पर ले सकता है. ऐसे में उसमें नकार दिये जाने की भावना घर कर जाती है और अगर प्रोजेक्ट सफ़ल साबित न हो, तो उन्हें ख़ुद की क़ाबिलियत पर भी शक होने लगाता है.”

सिधवानी का कहना है कि हम में से  अधिकांश लोग अपने काम के आधार पर ख़ुद को परिभाषित करते हैं, लेकि‍न कलाकारों को दर्शकों की नकारात्मक प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ता है. ऐसे में कलाकार ख़ुद  भी असहाय और बेकार मानने लगते हैं.”

वो कहती हैं, “एक्टिंग की दुनिया सामाजिक स्वीकृति और प्रतिद्वंद्वीता के इर्द-गिर्द घूमती है. कामयाब बनने की दौड़ में अथवा एक किरदार निभाने के लिए एक कलाकार अक्सर ख़ुद को भुला बैठते हैं. आप क्या हो और पर्दे पर आप कौन सा रोल निभाते हो, उसके बीच एक संकरी सी रेखा होती है.

चूंकि इस इंडस्ट्री में काम‌ मिलने में एक प्रकार की अनिश्चितता है, ऐसे में लोग इसी अनिश्चितता और अपनी ज़िंदगी को असुरक्षित ढंग से जीने पर मजबूर हो जाते हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि कलाकारों को अपनी लाइफ़स्टाइल मेनटेन करने में काफी खर्च करना पड़ता है. ऐसे में उन्हें पीआर के द्वारा अपनी सामाजिक मौजूदगी दर्ज कराने के लिए भी काफी खर्च करना पड़ता है. अक्सर इस सबका दबाव कलाकारों की बेचैनी का सबब सा बन जाता है.”

डिप्रेशन से जूझ रहे छात्र और लेखक वेदांत गिल कहते हैं कि खुदकुशी और मानसिक बीमारी को लेकर लोगों की सोच अक्सर बहुत अटपटी सी होती है. वो कहते हैं, “लोगों को लगता है कि हम अपने काम से पलड़ा झाड़ रहे हैं और हमारा बर्ताव सही नहीं है. कई बार तो वो धर्म और भगवान को भी बीच में ले आते हैं. लेकिन ऐसा नहीं कतई नहीं है कि डिप्रेशन का शिकार हर व्यक्ति खुदकुशी करना चाहता है और अगर कोई ऐसा करता भी है तो अपने दर्द के खात्मे के लिए करता है, न कि मौत को गले लगाने के लिए. ऐसे में सही समय पर कोई सहारा देनावाला, काउंसिलिंग करनेवाला और नियमित तौर पर ज़रूरी दवाइयां देनेवाला मिल जाये, तो यकीनन उसे इससे काफ़ी मदद मिलेगी. किसी व्यक्ति के लिए कमाना ना सिर्फ़ जीने का साधन होता है, बल्कि अपने होने का भी एहसास कराता है. थेरेपी में काफ़ी वक्त लगता है और ऐसे में धैर्य रखना काफ़ी अहम हो जाता है. इस नाज़ुक घड़ी में अभिभावकों, परिवार व समाज की सहायता किया जाना आवश्यक हो जाता है. उसे ऐसे व्यक्ति की तलाश होती है जो उसे जज किये बग़ैर उसकी बातों को सुने. मानसिक रूप से परेशान शख्स इससे अधिक कुछ नहीं चाहता है.”

सिधवानी इसका बेहद आसान तरीका बताते हुए कहती हैं, “किसी तरह के नुकसान और अकेलापन‌ भी इस सफ़र‌ के अहम पड़ाव होते हैं. कई दफ़ा किसी शख्स पर नजरें गढ़ी होती हैं, तो कभी उसे अकेले छोड़ दिया जाता है और उनके पास कोई काम भी नहीं होता है. हर शख्स को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अकेले होने का मतलब अकेलापन नहीं है और ऐसे में अन्य तरह के शौक का विकसित किया जाना बेहद ज़रूरी हो जाता है. अपने परिवार के सदस्यों और पुराने दोस्तों से बेहतर ढंग से जुड़ा होना बेहद ज़रूरी होता है. इस बात को भी अच्छी तरह से समझना जरूरी है कि शो बिज़नेस के अलावा भी एक असली दुनिया है.”

ये भी पढ़ें- नागिन-5: शो शुरू होते ही हुईं हिना खान की विदाई! जानें क्या है मामला

CINTAA के ज्वाइंट सेक्रेटरी अमित बहल कहते हैं, “CINTAA इस तरह की पहल के लिए तैयार है,‌ लेकिन इस काम के लिए पूरी इंडस्ट्री को साथ आना चाहिए, इसका मिलकर मुक़ाबला करना चाहिए और सभी की भलाई के लिए एक बेहतर वातावरण का निर्माण कर‌ना चाहिए. हम ठीक उसी तरह से काम करना चाहते हैं जैसे कि यूके और अमेरिका में हमारे सहयोगी काम कर रहे हैं. यूके में इक्विटी यूके और अमेरिका SAG-AFTRA US नाम से हेल्पलाइन मौजूद है, जो उनके सदस्यों के लिए काफ़ी लाभकारी है. उम्मीद है कि इस तरह की हेल्पलाइन की स्थापना में हम स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन और FWICE से जल्द गठजोड़ करेंगे. हम प्रोड्यूसर्स काउंसिल और इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फ़ोरम के सदस्यों से भी लगातार इस संबंध में बातचीत कर रहे हैं ताक़ि भविष्य में कोई भी इस तरह का भयावह कदम न उठाए.

मनोचिकित्सक व साइकोथेरेपिस्ट, अमेरिका में REBT की एसोसिएट फेलो व सुपरवाइजर और ज़िंदगी हेल्पलाइन की मुख्य संस्थापक सदस्यों में से एक डॉ. श्रद्धा सिधवानी कहती हैं, “टेलीविज़न और फिल्म इंडस्ट्री में काफ़ी उतार-चढ़ाव आते हैं. कोरोना महामारी के पहले भी यही स्थिति थी. अब मनोचिकित्सकों का दखल देना ज़रूरी हो गया है. एक बार जब आपकी फिल्म रिलीज हो जाती है, तो आप नाम, शोहरत, पैसा बटोरने में व्यस्त हो जाते हो, लोगों से घिरे रहते हो और प्रमोशन के लिए लगातार यात्राएं करनी पड़ती हैं. फ़िल्म की रिलीज़ से पहले औए बाद में भी एक ख़ास किस्म की चिंता सताती रहती है. लोगों के आलोचनात्मक रवैये से जूझना भी एक अहम काम होता है. कोई भी शख्स ऐसी टिप्पणियों को निजी तौर पर ले सकता है. ऐसे में उसमें नकार दिये जाने की भावना घर कर जाती है और अगर प्रोजेक्ट सफ़ल साबित न हो, तो उन्हें ख़ुद की क़ाबिलियत पर भी शक होने लगाता है.”

सिधवानी का कहना है कि हममें अधिकांश लोग अपने काम के आधार पर ख़ुद को परिभाषित करते हैं, लेकिन कलाकारों को दर्शकों की नकारात्मक प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ता है. ऐसे में कलाकार ख़ुद  भी असहाय और बेकार मानने लगते हैं.”

वो कहती हैं, “एक्टिंग की दुनिया सामाजिक स्वीकृति और प्रतिद्वंद्वी के इर्द-गिर्द घूमती है. कामयाब बनने की हदौड़ में अथवा एक किरदार निभाने के लिए एक कलाकार अक्सर ख़ुद को खो देते हैं. आप क्या हो और पर्दे पर आप कौन सा रोल निभाते हो, उसके बीच एक पतली सी रेखा होती है.

चूंकि काम‌ मिलने में एक प्रकार की अनिश्चितता है, ऐसे में लोग इसी अनिश्चितता और अपनी ज़िंदगी को असुरक्षित ढंग से जीने पर मजबूर हो जाते हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि कलाकारों को अपनी लाईफ़स्टाइल मेनटेन करने में काफी खर्च करना पड़ता है. ऐसे में उन्हें पीआर के द्वारा अपनी सामाजिक मौजूदगी दर्ज कराने के लिए भी काफी खर्च करना पड़ता है. अक्सर इस सबका दबाव कलाकारों की बेचैनी का सबब सा बन जाता है.”

डिप्रेशन से जूझ रहे छात्र और लेखक वेदांत गिल कहते हैं कि खुदकुशी और मानसिक बीमारी को लेकर लोगों की सोच अक्सर बहुत अटपेट से होते हैं. वो कहते हैं, “लोगों को लगता है कि हम अपने काम से पलड़ा झाड़ रहे हैं और हमारा बर्ताव सही नहीं है. क ई बार तो वो धर्म और भगवान को भी बीच में ले आते हैं. लेकिन ऐसा नहीं कतई नहीं है कि डिप्रेशन का शिकार हर व्यक्ति खुदकुशी करना चाहता है और अगर कोई ऐसा करता भी है तो अपने दर्द के खात्मे के लिए करता है, न कि मौत को गले लगाने के लिए. ऐसे में सही समय पर कोई सहारा देनावाला, काउंसिलिंग करनेवाला और नियमित तौर पर ज़रूरी दवाइयां देनेवाला मिल जाये, तो यकीनन उसे इससे काफ़ी मदद मिलेगी. किसी व्यक्ति के लिए कमाना ना सिर्फ़ जीने का साधन होता है, बल्कि अपने होने का भी एहसास कराता है. थेरेपी में काफ़ी वक्त लगता है और ऐसे में धैर्य रखना काफ़ी अहम हो जाता है. इस नाज़ुक घड़ी में अभिभावकों, परिवार व समाज की सहायता किया जाना आवश्यक हो जाता है. उसे ऐसे व्यक्ति की तलाश होती है जो उसे जज किये बग़ैर उसकी बातों को सुने. मानसिक रूप से परेशान शख्स इससे अधिक कुछ नहीं चाहता है.”

सिधवानी इसका बेहद आसान तरीका बताते हुए कहती हैं, “किसी तरह के नुकसान और अकेलापन‌ भी इस सफ़र‌ के अहम पड़ाव होते हैं. क ई दफ़ा किसी शख्स पर नजरें गढ़ी होती हैं, तो कभी उसे अकेले छोड़ दिया जाता है और उनके पास कोई काम भी नहीं होता है. हर शख्स को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अकेले होने का मतलब अकेलापन नहीं है और ऐसे में अन्य तरह के शौक का विकसित किया जाना बेहद ज़रूरी हो जाता है. अपने परिवार के सदस्यों और पुराने दोस्तों से बेहतर ढंग से जुड़ा होना बेहद ज़रूरी होता है. इस बात को भी अच्छी तरह से समझना जरूरी है कि शो बिज़नेस के अलावा भी एक असली दुनिया है.”

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CINTAA के ज्वाइंट सेक्रेटरी अमित बहल कहते हैं, “CINTAA इस तरह के बहल के लिए तैयार है,‌ लेकिन इस काम के लिए पूरी इंडस्ट्री को साथ आना चाहिए, इसका मुक़ाबला करना चाहिए और सभी की भलाई के लिए एक बेहतर वातावरण का निर्माण कर‌ना चाहिए. हम ठीक उसी तरह से काम करना चाहते हैं यूके और अमेरिका में हमारे सहयोगी काम कर रहे हैं. यूके में इक्विटी यूके और अमेरिका SAG-AFTRA US नाम से हेल्पलाइन मौजूद है, जो उनके सदस्यों के लिए काफ़ी लाभकारी है. उम्मीद है कि इस तरह की हेल्पलाइन की स्थापना में हम स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन और FWICE से जल्द गठजोड़ करेंगे. हम प्रोड्यूसर्स काउंसिल और इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फ़ोरम के सदस्यों से भी लगातार इस संबंध में बातचीत कर रहे हैं ताक़ि भविष्य में कोई भी इस तरह का भयावह कदम न उठाए.

 

नई Hyundai Verna का शानदार लुक आपको हैरान कर देगा

नई हुंडई वरना कार ग्राहकों को काफी लुभा रही है. कंपनी ने पुराने मौडल की जहग इस गाड़ी को ज्यादा बोल्डएडवांस्ड, अट्रैक्टिव और परफॉर्मेंस अवतार में उतारा है.

नई हुंडई वरना अब डुअल-टोन डायमंड-कट अलॉय व्हील 16-इंच रबर में मिलेगी. वहीं इसके बाहरी लुक को कंपनी ने काफी लग्जरी लुक दिया है. साथ ही कार को नए रियर बंपर के साथ अपडेट भी किया है.

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वरना पहली ऐसी ऐसी कार है जो लुक के मामले से पहले से ही अट्रैक्टिव है. इसे और ज्यादा आकर्षक बनाने के लिए ट्विन टिप मफलर का इस्तेमाल किया है. यानी इसकी डिजाइन ऐसी है जो आपको हैरान कर सकती है. तो अब आपको कोई और कार देखने की जरूरत नहीं हैक्योंकि Hyundai Verna #BetterThanTheRest है.

सुशांत सिंह राजपूत केस में वरुण धवन ने की CBI जांच की मांग तो KRK ने लगाई लताड़

बौलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत के सुसाइड का मामला फिल्म इंडस्ट्री ही नहीं राजनीति में भी सुर्खियों में हैं. जहां सुशांत का परिवार और फैंस उन्हें न्याय दिलाने के लिए हर तरह से कोशिश कर रहे हैं. वहीं फैंस के साथ-साथ कई स्टार्स भी उनका सपोर्ट कर रहे हैं. बीते दिनों सुशांत की एक्स गर्लफ्रेंड अंकिता लोखंडे और एक्ट्रेस कृति सेनान जैसे बॉलीवुड के और कई सितारों ने सरकार से सुशांत सिंह राजपूत केस की सीबीआई जांच करने की गुहार लगाई थी. वहीं अब इन सितारों में एक्टर

वरुण धवन का भी नाम शामिल हो गया है. लेकिन लोगों को उनकी यह मांग कुछ खास पसंद आ रही है. आइए आपको बताते हैं क्या है पूरा मामला…

सुशांत के लिए वरुण ने की थी मांग

दरअसल, कुछ समय पहले ही वरुण धवन ने इंस्टाग्राम स्टोरी पर ‘सीबीआई फॉर एसएसआर’ लिखकर इस मुहिम में हिस्सा लिया था. वह बात अलग है कि सुशांत सिंह राजपूत के लिए पोस्ट लिखकर वरुण धवन केआरके के निशाने पर आ गए हैं.

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केआरके ने कसा तंज

वरुण धवन की इस मांग पर तंज करते हुए केआरके ने लिखा कि, ‘सड़क 2 के ट्रेलर को जनता ने बहुत बुरी तरह से नकार दिया है. फिल्म सड़क 2 के ट्रेलर को देखकर बॉलीवुड के सभी स्टार किड्स यहां की जनता से बुरी तरह से डर गए हैं, जिसके बाद ये सभी सितारे जमीन पर आ चुके हैं. अब ये सभी सुशांत सिंह राजपूत केस की सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं. अब ये लोग भी चाहते हैं कि सुशांत सिंह राजपूत की मर्डर मिस्ट्री को सुलझा लिया जाए. पिछले 60 दिनों से ये सभी स्टारकिड्स मुंह में दही जमा कर बैठे थे. अब इन लोगों को इंसाफ चाहिए.’

सड़क 2 के ट्रेलर को इतने लोग कर चुके हैं नापसंद

बीते दिनों रिलीज किए गए स्टार किड आलिया भट्ट और संजय दत्त की अपकमिंग फिल्म ‘सड़क 2’ के ट्रेलर को 2 दिनों में 8 मिलियन से भी ज्यादा लोग नापसंद कर चुके है. इतना ही नहीं कुछ लोग ट्रेलर पर भद्दे कमेंट्स भी लिख रहे हैं, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सुशांत के फैंस का बौलीवुड के स्टारकिड्स पर कितना गुस्सा है.

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पिता की हालत के लिए नायरा को जिम्मेदार ठहराएगा कार्तिक! क्या फिर अलग होंगे ‘कायरा’

बीते दिनों सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ टीआरपी देखकर लगता है कि फैंस को सीरियल में आने वाले ट्विस्ट खास पसंद नहीं आ रहे हैं, जिसके चलते मेकर्स नायरा-कार्तिक को एक बार फिर अलग करने का मन बना रहे हैं. हालांकि सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ 3000 एपिसोड पूरे होने के बाद भी शो के किरदारों की फैन फॉलोइंग में अभी भी कोई कमी नहीं आई है. लेकिन फैंस को एंटरटेन करने के लिए मेकर्स कहानी को नया ट्विस्ट लाने का मन बना लिया है, जिसका अंदाजा हाल ही में रिलीज किए गए प्रोमो से लगाया जा सकता है. आइए आपको बताते हैं क्या है पूरा मामला….

क्या एक बार फिर अलग होगी नायरा कार्तिक की जोड़ी

यह टीवी की दुनिया का सबसे ज्यादा लम्बा चलने वाला शो है, जिसे दर्शक बेशुमार प्यार करते हैं. ताजा रिपोर्ट की बात करें तो कार्तिक और नायरा की जोड़ी में एक बार फिर से दरार आने वाली है. ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ के मेकर्स ने एक प्रोमो जारी किया है, जिसमें कार्तिक और नायरा दोनों लड़ाई करते नजर आ रहे हैं.

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पिता का एक्सीडेंट बनेगा वजह

दरअसल, प्रोमो की मानें तो नायरा की कार से हुआ एक एक्सीडेंट इसकी वजह बनेगा, जिस कारण कार्तिक का गुस्सा सांतवा आसमान पार कर जाएगा. वहीं बीते दिनों एक प्रोमो में कार्तिक को उसके पिता का ख्याल रखते हुए दिखाया गया था, जिसमें यह भी देखने को मिला था कि कार्तिक के पिता अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं.

 

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That difference in their speech “mere paapa” and “hamaare papa” 😭😭😭😭😭😭😭😭😭😭 PS: if kartik had to do this again then what is the use of again bringing them together…I don’t understand this patch up and separation game…. How many more times will a person commit the same mistake..I’m really fed up of kartik’s actions… sometimes feel like kartik’s love is timely,…. Ps2: no negativity just my review will see what happens 🙏🙏🙏🙏 ______________________________________________ #yrkkh #yehrishtakyakehlatahai #kaira #kairav #shivangijoshi #mohsinkhan #kartikgoenka #nairagoenka #shivin #starplus #serial #kairalove #kairaromance _______________________________________________ @shivangijoshi18 @khan_mohsinkhan @vyasbhavna @abdulwaheed5876 @mehzabin.khan_ @yashoda.joshi.33

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बता दें, जल्द ही शो में तीज का सेलिब्रेशन देखने को मिलने वाला है, जिसमें नायरा को एक नई खुशी का पता लगने वाला हैं. हालांकि इस खुशी के साथ नायरा का एक फैसला कार्तिक और उसकी जिंदगी बदलने वाला है.

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Freshwrapp Aluminium Foil: जो रखे आपको बीमारियों से दूर

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आज के समय में किसी भी कीमत पर हाइजीन के साथ समझौता नहीं किया जा सकता, क्योंकि एक तो महामारी का दौर और दूसरा मौसमी बीमारियां भी सेहत खराब कर सकती हैं. खासकर ये डर महिलाओं में सबसे ज्यादा देखने को मिलता है. वे नहीं चाहतीं कि हाइजीन से समझौता करने के कारण उनका परिवार और उनके बच्चे किसी भी बीमारी की गिरफ्त में आएं . परिवार की खुशहाली का आधा राज परिवार के स्वस्थ रहने में छिपा रहता है. ऐसे में फूड हाइजीन , फूड सेफ्टी और फूड पैकिंग जैसी बातों का ध्यान रखकर आप खुद को व अपने परिवार को बीमारियों से दूर रख सकते हैं. तो आइए जानते हैं उन बातों के बारे में-

फूड हाइजीन

वर्ल्ड हैल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार , दुनिया में हर साल 10 में से एक व्यक्ति दूषित भोजन खाने की वजह से बीमार पड़ जाता है. और दूषित भोजन की वजह से हर साल 4 लाख के करीब लोगों की मौत होती है. यही नहीं बल्कि हर साल लाखों छोटे बच्चे खाद्य संबंधित बीमारियों की वजह से मरते हैं. जोकि एक बड़ा खतरा है.

फूड पैकिंग हो सही

आज न सिर्फ महिलाएं खाना बनाने के समय हाइजीन का ध्यान रखती हैं, बल्कि उसकी पैकिंग पर भी विशेष ध्यान देती हैं ताकि खाना फ्रेश, सुरक्षित व गरम भी रहे. तभी तो पिछले कई सालों से एल्युमीनियम फॉयल की मांग बढ़ती जा रही है, क्योंकि प्लास्टिक को पर्यावरण के लिए सुरक्षित जो नहीं माना जाता. जबकि खाने को सुरक्षित व फ्रेश रखने के लिए एल्युमीनियम फॉयल बेस्ट है, तभी तो लोगों की पसंद बनता जा रहा है.

बेस्ट है फ्रैशरैप

जब बात हो एल्युमीनियम फॉयल की और फ्रैशरैप का जिक्र न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता, क्योंकि अपनी खूबियों के कारण ये खास जो है. ये बहुत ही आसानी से रीसाइकिल होने के साथ अगर इसे वैल्यू फॉर मनी कहा जाए तो गलत नहीं होगा. बता दें कि ये अब लोगों की पसंद बनता जा रहा है. तभी तो आज मिलियंस के लगभग किचन में फ्रैशरैप पहुंच चुका है. 2020 में आदित्य बिरला ग्रुप की सहायक कंपनी हिंडालको के एल्युमीनियम फॉयल ब्रांड फ्रैशरैप को भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के अनुसार, भारतीय मानक 15392:2003 एल्युमीनियम खाद्य पैकेजिंग सामग्री के अनुसार प्रमाण प्राप्त हुआ. ये पहला ऐसा प्लेयर है, जिसे बीआईएस अनुपालन सर्टिफिकेशन हासिल हुआ है. जिसके कारण इस ब्रांड ने इंडियन फूड ग्रेड एल्युमीनियम फॉयल मार्केट में क्रांति लाने का काम किया है.

क्या हैं खूबियां

– पैकिंग में आसान- एल्युमीनियम फॉयल में खाने को पैक करना बहुत आसान है. बस उसमें खाने को फोल्ड किया और खाना आसानी से पैक हो जाता है.

– बैक्टीरिया से बचाए – एल्युमीनियम फॉयल खाने को बैक्टीरिया के संपर्क में आने से बचाता है.

– खाने को रखे फ्रेश – एल्युमीनियम फॉयल गर्मी व प्रकाश के खिलाफ अवरोध प्रदान करने का काम करता है. इसलिए इसको फूड पैकेजिंग में इस्तेमाल किया जाता है. और ये लंबे समय तक खाने को फ्रेश रखने का काम करता है.

– खराब होने से बचाए – इसमें खाना लंबे समय तक फ्रेश रहता है, क्योंकि ये नमी को फॉयल के बाहर नहीं निकलने देता. तो फिर खाने की फ्रेशनेस, हाइजीन व उसे सुरक्षित रखने के लिए चुनें फ्रैशरैप एल्युमीनियम फॉयल . जो रखे आपका व आप के अपनों का खयाल.

वर्जिनिटी शरीर की नहीं ग्रसित मानसिकता की उपज

इस साल जनवरी में मेरा रिश्तेदार की शादी में गुजरात जाना हुआ. वहां जाने के लिए मैंने हमेशा की तरह ट्रेन का सफ़र चुना. ट्रेन का सफ़र मुझे हमेशा रोमांचित करता है खासकर तब जब नयी जगह जाना हो. सरसराती हवाएं, दूर दूर तक खेतों में पड़ती नजर, उगता-डूबता सूरज यह सब चीजें अच्छा अनुभव कराती हैं. ट्रेन ने जैसे ही दिल्ली पार की तो मैंने सफ़र में समय काटने के लिए जेन ऑस्टिन की चर्चित नॉवेल प्राइड एंड प्रेज्यूडिस पढने के लिए निकाली. जैसे ही कुछ देर तक पढ़ा, कि सामने वाली सीट पर दो लड़के, यूँही कोई 20-22 के करीब, आपस में बात कर रहे थे और उनकी आवाज मेरे कानों तक आने लगी. उनकी बातों में प्रमुखता से सेक्स, ठरक, वर्जिनिटी वे कुछ शब्द थे जो किताब से मेरा ध्यान हटा रहे थे.

एक लड़का दुसरे को कहता “शादी ऐसी लड़की से होनी चाहिए जो वर्जिन हो. इससे लड़की की लोयालिटी का पता चलता है कि वह आपके प्रति कितनी ईमानदार रहेगी. फिर ‘माल’ भी तो नया रहता है.” फिर इसी बात को और भी लम्पटई शब्दों में दूसरा लड़का विस्तार देने लगा. उन दोनों की बातों में वह सब चीजें थी जो उस उम्र के युवा किसी लड़की के योवन को लेकर अनंत कल्पनाओं में बह जाते हैं. खैर, उनकी सेक्स को लेकर चल रही अधकचरी समझ मुझे इतनी समस्या में नहीं डाल रही थी, जितनी इस जेनरेशन के लड़कों में आज भी खुद के लिए तमाम आजाद यौनिक इच्छाओं और महिलाओं की योनिकता पर नियंत्रण रखने वाली पुरानी सोच से समस्या लग रही थी. यह सब उसी प्रकार से था, कि लड़का आजादी से अपनी सेक्सुअल प्लेजर का शुरू से मजा ले लेना चाहता है जिसके बारे में बताते हुए वह प्राउड महसूस भी करता है और उसके साथ उठने बैठने वाले उसके साथी उसे स्टड, प्ले बॉय का टेग लगा कर प्रोत्साहन करते हैं, वहीँ लड़की अगर किसी लड़के के साथ उठती बैठती है तो उसे रंडी, या स्लट कह देते हैं.

“पढ़ालिखा” समाज

हमारे देश में आज भी लड़का या उसका परिवार शादी करने से पहले इस बात को लेकर संतुष्ट होना चाहता है कि लड़की वर्जिन अथवा कथित तौर पर ‘पवित्र’ हो. ऐसा नहीं है कि यह कोई गाये बगाहे आया मामला है, इस प्रकार के अनेकों उदाहरण मिल जाते हैं, जहां पढ़े-लिखे होने के बावजूद भी ज्यादातर लड़के वर्जिन दुल्हन ही तलाशते हैं. तमाम मेट्रोमोनिअल साइटों पर सीधे सीधे वर्जिन या कुंवारी कन्या का ख़ासा विवरण वाला कालम होता है जिसे खासकर अखबार या सोशल मीडिया पर पढने वाला तबका बड़े चाव से देखता भी है.

पिछले साल की बात है कलकत्ता में कनक सरकार नाम के 20 साल से कार्यरत एक सीनियर प्रोफेसर ने फेसबुक में एक पोस्ट डाली जिसमें उन्होंने शादी के लिए वर्जिन दुल्हन को शादी के लिए जस्टिफाई किया था जिसकी तुलना उन्होंने कोल्ड्रिंक की बोतल और बिस्किट की पैकेट से किया था. उन्होंने लिखा “वर्जिन ब्राइड- क्यों नहीं? वर्जिन लड़की सील लगी बोतल या पैकेट की तरह होती है. क्या तुम सील टूटी बोतल या पैकेट खरीदना चाहोगे? नहीं न.” पोस्ट में आगे उन्होंने लिखा “वर्जिन लड़की अपने भीतर वैल्यू, कल्चर, सेक्सुअल हाय्जीन समेटे रखती है. वर्जिन लड़की का मतलब घर में परि होने का एहसास है.” यानी उन्होंने किसी लड़की की तुलना बड़े शर्मनाक तरीके से बेजान बोतल और बिस्किट के पैकेट से कर दी.

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इसी तरह नासिक से भी ऐसी घटना सामने आई थी जब एक दुल्हे को संदेह हुआ कि उसकी पत्नी वर्जिन नहीं है उसने टेस्ट कराया और इस कारण उसने अपनी पत्नी को ही छोड़ दिया. आज भी अगर आम सर्वे करवा दिया जाए तो यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि अधिकतर लड़के अपनी पत्नी के रूप में ऐसी दुल्हन चाहेंगे जिसका हाय्मन यानी झिल्ली टूटी नहीं हो. आज भी ग्रामीण इलाकों के बड़े हिस्से में वर्जिनिटी टेस्ट कराने पर विश्वास किया जाता है. जिसके तमाम उदाहरण हमारे आसपास दिखाई दे जाते हैं, या खुद में भी.

रस्में रिवाज की जड़ें

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वर्जिनिटी को महिला योग्यता में सबसे सम्पूर्ण देखा जाता है. इसका सीधा जुड़ाव शुद्धता से समझा जाता है. ऐसी विकृति घर से ही शुरू हो जाती है जब घर में बड़े लोग घर की बेटी को सलीके से रहने की ट्रेनिंग दे रहे होते हैं. जहां माँबाप बातबात पर बेटी को ‘नाक न कटाने’ के लिए अपील करते रहते है जिसका मतलब घर की इज्जत से होता है और घर की इज्जत तो लड़की की वेजाइना में ही समाई होती है. इसके लिए कई तरह की रोकाटाकी कि कपडे ठीक से पहनो, छाती पर चुन्नी ओढो, ज्यादा हंसो मत, बाहर मत घूमों इत्यादि सिर्फ इसलिए ही होता है कि उसकी तथाकथित वर्जिनिटी को बचाया जा सके. महिलाओं से एस्पेक्ट किया जाता है कि अगर वह अच्छी लड़की बनना चाहती है तो उन्हें शादी तक वर्जिन रहना ही पड़ेगा. जाहिर सी बात है हम पुरुष प्रधान समाज में रहते हैं. जहां महिला को संपत्ति के तौर पर देखा जाता है. जहां दूल्हा शादी के दिन दुल्हन के गले में सिन्दूर या मंगलशूत्र ही इसलिए बांधता है ताकि आधिकारिक तौर पर क्लेम कर सके कि उसके शरीर पर सिर्फ उसी का हक है.

शादी वाली रात लड़कियों से उम्मीद लगाईं जाती है कि उसी रात उसकी झिल्ली टूटेगी और वेजाइना से खून गिरेगा. इसे लड़की की इमानदारी, आचरण, चालचलन, और घर की परवरिश के तौर पर समझा जाता है. जिसका पता लगाने के लिए आज भी कई तरह की अवैज्ञानिक और अतार्किक रस्में प्रैक्टिस में लायी जाती हैं. जैंसे- ‘पानी की धीज’, जिसमें लड़की को सांस रोक कर पानी में तब तक डुबाए रखा जाता है जब तक पति द्वारा 100 कदम न पुरे हो जाएं. उसी प्रकार, कुछ इलाकों में ‘अग्निपरीक्षा’ की रस्म होती है जिसमें गरम जलते रोड को हाथ में रखना पड़ता है. अगर कोई इसे करने में असफल हो जाए तो उससे जबरन उसके कथित पार्टनर के नाम की उगलवाते हैं और उस लड़के या लड़की के परिवार वालों से पैसों की भरपाई की जाती है.

ऐसे ही एक रस्म होती है ‘कुकरी की रस्म’, जिसमें सुहागरात वाले दिन बेड पर सफ़ेद चादर बिछाई जाती है. अगले दिन घर के बड़े सदस्य आकर चादर में लगे खून के दाग देख कर लड़की के वर्जिन होने का विश्वास हांसिल कर पाते हैं. ऐसे ही एक और आम रस्म जिसे टूफिंगर के नाम से भी जाना जाता है. जिसमें गांव की दाई या घर की कोई बड़ी महिला लड़की की वेजाइना में ऊँगली फेर कर अंग के कसावट अथवा झिल्ली की जांच करती है. आमतौर पर टूफिंगर का तरीका रेप विक्टिम की जांच के लिए यूज़ किया जाता था जिसकी आलोचना ह्यूमन राईट एक्टिविस्ट ने की थी और सुप्रीम कोर्ट ने भी 2013 में इस पर आपत्ति जताते हुए अवैज्ञानिक कहा था. इसी प्रकार गुजरात हाई कोर्ट ने भी इसे लेकर विशेष टिप्पणी की थी जिसमें इस टेस्ट को रेप विक्टिम की अधिकारों का हनन मन गया.

धर्मपाखंड का बुना जाल

किन्तु ऐसा नहीं कि महिला के खिलाफ इस प्रकार की रस्में यूँही बनती चली गई, बल्कि इसके पीछे धर्मकर्म के पाखण्ड ने जितना योगदान दिया उतना शायद ही किसी और चीज ने दिया होगा. साल 2014 में दिल्ली सेशन कोर्ट के न्यायधीश ने अपने जजमेंट में कहा था कि “विवाह्पूर्ण यौन संबंध अनैतिक है और हर ‘धर्म के सिद्धांत’ के खिलाफ है.” इससे दो बात जाहिर हुई, एक यह कि कोर्ट के जज इतने जिम्मेदार पद पर बैठ कर पाखंड और पिछड़ेपन की गवाही दे रहे थे. दूसरा यह कि विवाह से पहले स्वेच्छा से किये जाने वाले यौन संबंधो पर धर्म ने हमेशा कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की है.

वहीँ, महिला पवित्रता या इमानदारी को अगर नंगी आंखो से समझना हो तो देश में कथित तौर पर पुरुषों में उत्तम की संज्ञा दिए जाने वाले भगवान राम के कृत्य से समझा जा सकता है जब रावण के कब्जे से छूटने के बाद भगवान् राम के कहने पर माता सीता तक को अपनी पतिव्रता की पवित्रता साबित करने के लिए अग्नि परीक्षा देनी पड़ी थी. जिसका गुणगान मौजूदा समय में भी बड़े उत्साह से किया जाता है. वहीँ अनुसूया को इसी पतिव्रता को साबित करने के लिए तीनों लोकों के महादेवों के सामने सशर्त नग्न अवस्था में आना पड़ा. भारत में तमाम ग्रन्थ महिला को पुरुष के अधीन कब्जे में रखे जाने की बात खुल्लम खुल्ला करते हैं. जिसे यदा कदा पढ़ समझ या पंडितों से सुन कर आम लोग अपने जीवन में में उतारते हैं.

भारत में सत्यार्थ प्रकाश लिखने वाले दयानंद सरस्वती जिन्हें आर्य समाज का जन्मदाता कहा जाता है उन्होंने अपनी किताबी के चतुर्थ समुल्यास में विधवा विवाह पर रोक लगाए रखने के लिए महिला शुद्धता के तमाम कुतर्क प्रस्तुत करने की कोशिश की. जिसमें मनु, वेदों के रेफरेन्सेस को ख़ास तौर पर शामिल किया गया. यही सब कारण भी थे कि पुराने समय में ऐसी प्रथाए प्रैक्टिस में लाइ गई जिसमें विधवा महिला को सती कर दिया, बालिका विवाह कर दिया, पढने से रोका गया, बाहर काम करने वाली को कुलटा कहा गया इत्यादि.

इसी प्रकार तमाम धर्म चाहे वह इसाई हो या इस्लाम सबमें महिला की पवित्रता से जुडी बातें देखने को मिल जाएंगी. बाइबल कहता है “दुल्हे को यदि संदेह होता है कि उसकी दुल्हन वर्जिन नहीं है तो वह उसे उसके पिता की चौखट पर जबरन खींच कर लेकर जा सकता है. और उसे पत्थरों की चोट से मार भी सकता है. जिसका तांडव देखने के लिए ख़ास तौर पर दर्शकों की भीड़ जुटाई जा सकती है.” (ओल्ड टेस्टामेंट- खंड 5, 22:13-21), वहीँ इस्लाम में भी महिला को एक वस्तु के तौर पर कब्जे में लेने व व्यापार करने की वस्तु माना जाता रहा.

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यह बात तय है कि योनिकता पर खासकर महिला की योनिकता पर हमेशा से धर्म नियंत्रण करता रहा है. जिसमें बिना शादी किये या शादी से बाहर जाकर सेक्स करना प्रतिबंधित व शर्मनाक माना जाता रहा. संभव है कि धर्म ग्रंथो में पुरुषवादी सोच का इस तरह के प्रतिबन्ध बुनने का कारण उस समय गर्भनिरोधक की अपर्याप्तता भी कहा जा सकता है, ताकि वंश में पैदा होने वाला बच्चा शुद्ध तौर से पिता के ख़ून का ही हो.

सेक्सुअलिटी को लेकर संकुचित सोच

पश्चिमी देशों में कुछ अमूल परिवर्तनों के कारण आज वर्जिनिटी को लेकर कुतर्की और महिला विरोधी सोच में एक हद तक बदलाव देखने को मिले है, जिसका बड़ा कारण वहां महिलाओं में बढती आत्मनिर्भरता है. लेकिन भारत जैंसे बड़े जनसँख्या वाले देश में आज भी इस तरह की सोच का होना दुखद है. यहां के रुढ़िवादी कल्चर में सेक्स या इंटरकोर्स को देखने का एक नजरिया सेट है. जिसमें महिला पवित्रता का पता लगाने का तरीका हाय्मन के टूटने से ही लगाया जाता है. सेक्स को पीआईवी के मेथड से ही समझा जाता है. किन्तु ऐसे में पुरुष और महिला के बीच ओरल सेक्स या एनल सेक्स भी सेक्स के तरीके है फिर उनका क्या?

क्या यह एक बड़ी वजह नहीं कि इस कारण आज भी देश दुनिया में एलजीबीटीक्यू की योनिकता को लोग एक्सेप्ट नहीं कर पा रहे हैं. क्योंकि जिस कथित वर्जिनिटी को समाज का बड़ा हिस्सा महिला की पवित्रता मान कर चलता है और उसके भीतर पेनिस के घुसने को ही सेक्स समझता है तो उसमें तो एलजीबीटीक्यू कम्युनिटी स्टैंड ही नहीं करती. इनमें पीआईवी सेक्स होता ही नहीं. तो क्या फिर इस कारण ही समाज द्वारा इनके सेक्स/रिश्तों को अवैध करार दे दिया जाता है और उनके सेक्स के अनुभवों को एक्सेप्ट ही नहीं किया जाता? जबकि इनमें से कई लोग जब पहली बार अपने पार्टनर के साथ संपर्क में आते है या आए होंगे तो खुद के ‘वर्जिनिटी’ लूस होने का उसी प्रकार एहसास पाते होंगे जैंसे हेट्रोसेक्सुअल लोग महसूस करते हों. इसलिए पहले तो यह समझें कि सेक्सुअलिटी काफी काम्प्लेक्स चीज है जिसे पीआईवी तक समेटना लेंगिक भेदभाव करने को दर्शाता है. और फिर यह कि वर्जिनिटी का पवित्रता से कोई लेना देना नहीं है.

नए स्तर से सोचने की जरुरत

आज तमाम वैज्ञानिक समझ से यह बात जगजाहिर है कि वर्जिनिटी नाम की चीज कुछ नहीं होती है. वैश्विक समाज जिस कथित वर्जिनिटी(झिल्ली) को लड़की का ख़ास गहना मान कर चलता है वह बिना किसी पुरुष के संपर्क में आए, समय के साथ खुद ब खुद टूट सकती है. जिसके लिए लड़की का उछल कूद, दौड़ना भागना, बाइक या साइकिल चलाना या मास्टरबेट करना ही काफी वजह है. एक रिपोर्ट में कहा गया कि जिसे हम आमतौर पर वर्जिनिटी मानते हैं वह दुनिया की 90 फीसदी आबादी बिना शारीरिक हुए पहले खो चुकी होती है. जबकि उन्हें इस बारे में पता भी नहीं होता है. जाहिर है इस सब चीजों के बावजूद आज भी हमारे दिमाग से महिलाओं को किसी विशेष खांचे में डालने की आदत पूरी तरह से नहीं गई है.

हाल ही हैदराबाद में फॅमिली इंस्टिट्यूट नाम के एक इंस्टिट्यूट में महिलाओं के लिए ख़ास तरह के प्रोग्राम शुरू करने का विज्ञापन ख़बरों में चढ़ा. जिसमें प्री-मैरिज ट्रेनिंग, आफ्टर मैरिज ट्रेनिंग, कुकिंग, ब्यूटी टिप्स, सिलाई से रिलेटेड कोर्सेज थे. जिसमें एक आदर्श गृहणी बनने के लिए किस तरह से गुणों को निखारना है यह सब था. जाहिर है किसी महिला को विशेष खांचे में ढालने की तरह ही था.

यह चीजें दिखाती हैं कि आज भी वर्जिनिटी को लेकर समाज में कितना संकुचित सोच लोगों के भीतर व्याप्त है. जिसकी सबसे गहरी चोट समाज में आम महिला के साथ साथ विधवा महिलाओं को झेलना पड़ता है, जहां समाज में उन्हें घोषित तौर पर सेकंड हैंड माल या डिसट्रोएड माल समझा जाता है. जिन्हें दया या सांत्वना तो मिल जाती है लेकिन पहले जैसी डिग्निटी के साथ उन्हें समाज में जगह नहीं मिल पाती. वहीँ एलजीबीटीक्यू कम्युनिटी को सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ता है. जिस कारण उन्हें हिराकत की नजरों से देखा जाता है.

हमें यह बात समझने की जरुरत है कि वर्जिनिटी किसी स्त्री या पुरुष के भीतर नहीं होती, यह इंसानों के अंतर मन में समाहित होती है. लेकिन इन कृत्यों के कारण किसी लड़की को एक ख़ास उम्र तक हर समय डर डर कर जीना सिखाया जाता है. लड़की किशोरावस्था में पहुंची नहीं कि घर में शादी को लेकर चिंता पसरने लगती है. जिसके चलते वह हमेशा तनाव में रहती है. इसी सोच के चलते आज स्थिति यह भी है कि शादी के लिए देश दुनियां में लड़कियां वेजाइना में झिल्ली पाने के लिए हाय्मनोप्लास्टी सर्जरी करवा रही हैं. यह सामजिक दबाव ही है कि इस तरह सर्जरी या तो स्वेच्छा से या मजबूरन महिला को करवाना पड़ रहा है.

वर्जिन रहने के फितूर के कारण कामकाजी औरतें बहुत से जोखिम नहीं लेती और कहीं आने जाने से डरतीं हैं. विधवा या तलाकशुदा से शादी करने से पहले पुरुष दस बार यही सोचते रहते हैं कि होने वाली पत्नी वर्जिन नहीं होगी.

यह दिखाता है कि महिलाओं का वस्तुकरण आज भी समाज में व्याप्त हैं किन्तु इसके साथ यह भी कि कुछ बदलाव आएं जरूर हैं. जिसमें महिलाओं ने अपने अधिकारों को लेकर खुद संघर्ष किया है. एक आदर्श गृहणी के तौर पर हो सकता है घर परिवार दुल्हन से तथाकथित शुद्धता की मांग कर रहे हों, लेकिन आत्मनिर्भर महिला जो कहीं बाहर काम कर अपना खर्चा खुद उठा रही है और अपनी शर्तों पर जी रही हो, वह इन दकियानूसी बेड़ियों को तोडती हुई भी देखि जा सकती है जिसकी स्वीकार्यता बदले समय के साथ स्थापित भी हो रही है. इसलिए जरुरी यह है कि किसी रिश्ते में बंधते समय इस तरह की मांग/इच्छा रखने से बेहतर भविष्य के लिए बेहतर रिश्ते के लिए विश्वास की नीव रखी जाए.

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लाइफस्टाइल में बदलाव कर वजन बढ़ाएं और दुबलेपन को कहें बाय-बाय

सामान्य से कम वजन वाले यानी दुबले लोग अपने स्वास्थ्य को बेहतर करने की कोशिश तो करते हैं लेकिन तंदुरुस्त नहीं हो पाते क्योंकि वे कुछ गलत आदतों के आदी होते हैं.

मौजूदा भागदौड़भरी लाइफस्टाइल में खुद को फिट बनाए रखना हर लिहाज से जरूरी है.

दुबलेपन को दूर करने और कमजोर शरीर को तंदुरुस्त बनाने के लिए लोग दवाओं से ले कर तरहतरह के हैल्थ सप्लीमैंट्स लेते हैं. लेकिन फिर भी अधिकतर लोगों का शरीर कमजोर और दुबलापतला ही रहता है.

दुबलेपतले शरीर के कारण किशोरों, युवाओं और अधेड़ पुरुषों को क्रमश: स्कूल, कालेज और औफिस या बिजनैस प्रतिष्ठानों तक में शर्मिंदगी  झेलनी पड़ती है. वजन बढ़ाने के लिए लड़की न जाने क्याक्या करती है, खाती है, लेकिन वजन नहीं बढ़ता और शरीर जस का तस ही बना रहता है.

क्यों नहीं बनती सेहत

वजन न बढ़ने और तंदुरुस्त न होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं. इन कारणों में कुछ ऐसी गलत आदतें भी शामिल होती हैं, लोग जिन के शिकार हो जाते हैं. ऐसी आदतें न केवल शरीर को बाहरी तौर पर नुकसान पहुंचाती हैं बल्कि शरीर को भीतर से भी नुकसान पहुंचाती हैं.

आप उन में से हैं जो खाते तो बहुत हैं लेकिन उन के शरीर में लगता नहीं है,

तो वे गलतियां न करें जिन का जिक्र यहां किया जा रहा है. आप अगर चाहते हैं

कि आप तंदुरुस्त रहें और आप की पर्सनैलिटी दूसरों की तरह

चमके तो इन गलत आदतों को बायबाय कह दें.

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भूख लगने पर खाना न खाने की आदत

व्यस्त जीवनशैली में अधिकतर लोग अपने शैड्यूल के चक्कर में सही समय पर खाना नहीं खाते हैं. कोई ऐसा अगर नियमित रूप से करता है तो उस की सेहत पर बुरा असर पड़ना शुरू हो जाता है. दरअसल, ऐसा करने से भूख मर सी जाती है,

भूख लगना बंद हो जाती है. सही समय पर खाना नहीं खाने से शरीर पर विपरीत असर पड़ता है.

किसी भी इंसान की यह गलत आदत उस के शरीर को तंदुरुस्त नहीं होने देती.

रोज एक सी ऐक्सरसाइज करने की आदत

फिट रहने और शरीर के वजन को बढ़ाने के लिए रोजाना ऐक्सरसाइज करना अनिवार्य है. सुबह की सैर पर जाना, किसी मैदान या पार्क में थोड़ीबहुत कसरत या उछलकूद करने से सेहत बेहतर होती है. इस के लिए अधिकतर पुरुषों ने जिम को एक आसान विकल्प सम झा हुआ है.

लोग बौडी बनाने के चक्कर में दवाएं और हैल्थ सप्लीमैंट्स ले लेते हैं, जो उन्हें भले ही मसल्स बनाने में मदद करते हैं लेकिन इस के साइड इफैक्ट बाद में सामने आते हैं. दूसरों को बौडी बनाता देख नए लड़के भी वही करने लग जाते हैं और रोजाना एक ही ऐक्सरसाइज करने लगते हैं. तंदुरुस्त न होने के पीछे एक वजह यह भी है. बहुत से लोग जिम जा कर रोजाना एक ही तरह की ऐक्सरसाइज करते हैं. रोजाना एक ही तरह की ऐक्सरसाइज करने से शरीर के अंग कमजोर होने लग जाते हैं और फिर बौडी नहीं बन पाती.

दरअसल, अगर ऐक्सरसाइज कर रहे हैं तो उसे ट्रेनर के निरीक्षण में करें क्योंकि उस का एक साइंस होता है. जिम ट्रेनर इंसान के शरीर के मुताबिक ऐक्सरसाइज करने का चार्ट बना देते हैं, जिस में हफ्ते के 6 दिनों का ब्योरा होता है कि किस दिन कौनकौन सी ऐक्सरसाइज करनी हैं. जिम ट्रेनर के निरीक्षण में ऐक्सरसाइज करने से शरीर फिट रहने के साथ वजन बढ़ कर आदर्श लैवल पर बना रहता है.

पानी कम पीने की आदत

24 घंटे के रातदिन के दौरान इंसान को भरपूर पानी पीना चाहिए. पर्याप्त मात्रा में पानी

पीने से शरीर को भीतर व बाहर दोनों तरफ से फायदा मिलता है.

यह शरीर के वजन को बढ़ाने व शरीर की स्किन और बालों को पोषण प्रदान करने में अहम भूमिका निभाता है.

देशविदेश के वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसान को अपनेआप को हाइड्रेट रखने और शरीर से टौक्सिन्स को बाहर निकालने के लिए दिनभर में 8 से 10 गिलास पानी या कोई तरल पदार्थ पीना चाहिए. इंसान चाहे तो नारियल पानी और ताजे फलों का जूस भी पी सकता है. सो, अगर कोई कम पानी पीता है

तो उसे यह आदत छोड़नी होगी.

सोने में कंजूसी की आदत

ऊर्जावान और स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है कि इंसान नियमित रूप से पूरी नींद ले. नींद न पूरी होने से सिर भारी रहने के साथ शरीर का ब्लडप्रैशर यानी बीपी बढ़ सकता है. नींद न पूरी होने की वजह से थकान के साथसाथ चिड़चिड़ाहट भी महसूस होती है और बातबात पर गुस्सा आता है. मैडिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, कम से कम 7 घंटे की नींद लेनी जरूरी है.

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पूरी नींद लेने से इंसान स्वस्थ महसूस करने के साथ ऊर्जावान बना रहता है. यह इंसान की फिटनैस और आदर्श वजन के लिए भी बेहद जरूरी है. ऐसे में जो लोग रात में सोने में कंजूसी करते हैं वे अपनी इस आदत को छोड़ दें.

यानी, सेहतमंद जीवन के लिए जरूरी होती हैं अच्छी आदतें. ये इंसान को खुश रखने के साथ ऊर्जा से भरपूर भी रखती हैं.

यही नहीं, ये इंसान को बीमारियों से काफी हद तक दूर भी रखती हैं. तो, गलत आदतों को त्याग कर कोई भी

तंदुरुस्त होने के साथ आइडियल वजन हासिल कर सकता है.

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