Serial Story: प्रत्युत्तर (भाग-4)

लेखक- बिकाश गोस्वामी

मुन्नी ने आईटी में बीटेक किया है और पढ़ाई खत्म कर आज ही लौटी है. अब उस की इच्छा अमेरिका के एमआईटी से एमटेक करने की है. उस ने अप्लाई भी कर दिया है. उस को जो नंबर मिले हैं और उस का जो कैरियर है उस से उसे आसानी से दाखिला मिल जाएगा. शायद स्कालरशिप भी मिल जाए.

जानकी ने अभी हां या न कुछ भी नहीं कहा है. वे अजय के साथ बात करने के बाद ही कोई फैसला लेंगी. जानकी देवी के लिए आज की रात बहुत मुश्किल हो गई है. इतने वर्षों के अंतराल के बाद विजय का इस तरह आना उन्हें पुरानी यादों के बीहड़ में खींच ले गया है. अब रात काफी हो चुकी है. जानकी सोने की कोशिश करने लगीं.

3 दिन बीत चुके हैं. जानकी देवी का इन 3 दिनों में औफिस आना बहुत कम हुआ है. ज्यादातर वक्त अमृता के साथ ही कट रहा है. इधर, अजय ने हमीरपुर में एक इंगलिश मीडियम स्कूल खोला है. इन दिनों वे स्कूल चलाते हैं और साथ ही जानकी देवी के विधानसभा क्षेत्र की देखभाल करते हैं. वे भी गांव से यहीं चले आए हैं. अब यह घर, घर लगने लगा है.  वे अजय और अमृता के साथ शुक्रवार को देहरादून जा रही हैं ताकि शनिवार और इतवार, पूरे 2 दिन, सुजय अपने परिवार के साथ, खासकर अपनी दीदी के साथ, बिता सके.

बुधवार को सवेरे अचानक जानकी देवी के पास मुख्य सचिव का फोन आया, मुख्यमंत्री नोएडा विकास प्राधिकरण की फाइल के बारे में पूछ रहे हैं. उन्होंने तुरंत अपने सचिव को बुला कर वह फाइल मांगी. फाइल पढ़ने के बाद उन की आंखें खुली की खुली रह गईं. यह विजय ने किया क्या है? सारे अच्छे आवासीय और कमर्शियल प्लौट कई लोगों और संस्थाओं को, सारे नियम और कानून की धज्जियां उड़ाते हुए, 99 साल की लीज पर दे दिए हैं.

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सरकारी नुकसान लगभग कई सौ करोड़ का आंका गया है. सारे साक्ष्य और प्रमाण विजय के विरुद्ध जा रहे हैं. वे फाइल खोले कुछ देर चुपचाप बैठी रहीं. उन को समझ में नहीं आ रहा था, क्या करें. उसी वक्त अमृता का फोन आया. उस ने घर में अपने दोस्तों के लिए एक छोटी सी पार्टी रखी है. जानकी देवी का वहां कोई काम नहीं है, फिर भी उन का वहां रहना जरूरी है. सचिव से कहा कि फाइल को गाड़ी में रखवा दें, रात को एक बार फिर देखेंगी.

पार्टी खत्म होतेहोते रात के 10 बज गए, उस के बाद जानकी देवी ने अजय से कहा कि वे सो जाएं, उन का इंतजार न करें. इस के बाद वे स्टडी रूम में फाइल ले कर बैठीं. पूरी फाइल दोबारा पढ़ ली, विजय को बचाना मुश्किल जान पड़ा. सुबह उन्होंने अपने सचिव को फोन कर पूछा, ‘‘क्या आप विजय, नीलम तथा उन के बच्चों के नाम पर जो भी चल व अचल संपत्ति है, सब का ब्योरा मुझे हासिल करवा सकते हैं? अगर हासिल करवा पाएं तो बहुत अच्छा होगा और यह ब्योरा मुझे हर हाल में आज दोपहर तक चाहिए.

सचिव ने उन्हें वह रिपोर्ट दोपहर के 2 बजे दे दी. रिपोर्ट देख कर उन की आंखें फटी की फटी रह गईं. विजय ने यह किया क्या है? उस ने अपने नाम और कुछ बेनामी भी, इस के अलावा ससुराल वालों के नाम से भी करोड़ों की संपत्ति जमा की है. अब उन के मन में कोई भी दुविधा नहीं थी. उन्होंने फाइल में सीबीआई से जांच कराए जाने की संस्तुति कर फाइल आगे बढ़ा दी.

देहरादून और मसूरी में 3 दिन देखते ही देखते कट गए. काफी दिनों बाद उन्होंने सही माने में छुट्टी मनाई थी. सुजय भी बहुत खुश हुआ. उसे अपनी दीदी काफी दिनों के बाद जो मिली थी. लेकिन जैसे दिन के बाद आती है रात, पूर्णिमा के बाद अमावस, ठीक वैसे ही खुशी के बाद दुख भी तो होता है. सुजय को होस्टल में छोड़ने के बाद जानकी देवी का मन भर आया. अजय को भी अगले दिन हमीरपुर जाना पड़ा. लखनऊ के इस बंगले में इस वक्त सिर्फ जानकी और अमृता हैं. लखनऊ वापस आए हुए आज 3 दिन हुए हैं.

शाम को सचिवालय से आ कर अभी चाय पी ही रही थीं कि रामलखन ने आ कर खबर दी कि विजय कुमार आप से मिलना चाहते हैं. जानकी को कुछ क्षण लगा यह समझने में कि असल में विजय उन से मिलने आया है. पहले सोचा कि नहीं मिलेंगे. क्या होगा मिल कर? उन के जीवन का यह अध्याय तो कब का समाप्त हो गया है. फिर मन बदला और कहा, ‘‘उन्हें बैठाओ, मैं आ रही हूं.’’

आराम से हाथमुंह धो कर कपड़े बदले और करीब 40 मिनट के बाद जानकी विजय से मिलने कमरे में आईं. वह इंतजार करतेकरते थक चुका था. जानकी देवी को देखते ही वह उठ कर खड़ा हो गया, गुस्से से उस का मुंह लाल था. उस ने जानकी से गुस्से में कहा, ‘‘तुम मेरा एक छोटा सा अनुरोध नहीं रख पाईं?’’

विजय का गुस्से से खड़ा होना और फिर उन के बात करने के लहजे से जानकी देवी को गुस्सा आया, पर वे अपने गुस्से को काबू कर बोलीं, ‘‘अनुरोध रखने लायक होता तो जरूर रखती.’’

‘‘क्या कहा? तुम्हें पता है, मुझे फंसाया गया है?’’

‘‘अच्छा, तुम ने क्या मुझे इतना बुद्धू समझ रखा है? मैं ने क्या फाइल नहीं पढ़ी है? और क्या मुझे यह पता नहीं है कि विजय कुमार को फंसाना इतना आसान नहीं है.’’

‘‘तो तुम भी यकीन करती हो कि मैं दोषी हूं?’’

‘‘प्रश्न मेरे यकीन का नहीं है. प्रश्न है साक्ष्य का, प्रमाण का. समस्त साक्ष्य और प्रमाण तुम्हारे विरुद्ध हैं. मैं अगर चाहती तो तुम्हारी सजा मुकर्रर कर सकती थी लेकिन मैं ने ऐसा नहीं किया. अपनेआप को निर्दोष साबित करने का मैं ने तुम्हें एक और मौका दिया है.’’

‘‘सुनो, मैं तुम से रिक्वेस्ट कर रहा हूं. प्लीज, अपने डिसीजन पर एक बार फिर विचार करो. मुझे पता है कि यह तुम्हारे अख्तियार में है. वरना मैं बरबाद हो जाऊंगा. मेरा कैरियर…’’

विजय की बात काट कर जानकी ने कहा, ‘‘अब यह मुमकिन नहीं है,’’ वे अपना धीरज खो रही थीं, ‘‘एक बात और, जालसाजी करते वक्त तुम्हें कैरियर की बात याद क्यों नहीं आई? तुम्हारे जैसे बड़े बेईमान और जालसाज लोगों को सजा मिलनी ही चाहिए.’’

‘‘क्यों, मैं बेईमान हूं? मैं जालसाज हूं? मैं ने जालसाजी की है?’’ विजय चिल्लाने लगा.

‘‘चिल्लाओ मत. नीची आवाज में बात करो. यहां शरीफ लोग रहते हैं. अच्छा, एक बात बताओ, दिल्ली के ग्रेटर कैलाश वाली तुम्हारी कोठी का दाम क्या है? नोएडा के प्राइम लोकेशन में तुम्हारे 4 प्लौट हैं. इस के अलावा गुड़गांव के सैक्टर 4 में तुम्हारी आलीशान कोठी है, देहरादून में फार्महाउस भी है, और बताऊं? तुम्हें कितनी तनख्वाह मिलती है, क्या यह मुझे नहीं पता? ये सारी संपत्ति क्या तुम दोनों की तनख्वाह की आमदनी से खरीदना संभव है? तुम क्या समझते हो, मैं तुम्हारी कोई खबर नहीं रखती हूं?’’

विजय को जानकी से इस तरह के उत्तर की उम्मीद नहीं थी. कुछेक पल के लिए तो वह भौंचक रह गया. उस के पास जानकी के प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था. ऐसी सूरत में एक आम

आदमी जो करता है, विजय ने भी वही किया, वह गुस्से में उलटीसीधी बकवास करने लगा, ‘‘हां, तो अब समझ में आया कि इन सारी फसादों की वजह तुम ही हो.’’

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जानकी ने उसे फिर समझाने की कोशिश की, ‘‘तुम फिर गलती कर रहे हो. तुम्हारी इस हालत की जिम्मेदार मैं नहीं, तुम खुद हो. मैं तो इस घटनाक्रम में बाद में जुड़ी हूं. एक बात और, शायद तुम यह भूल गए हो कि जिंदगी की दौड़ में मैं तुम से बहुत आगे निकल आई हूं. तुम्हारे सीनियर मेरे अंडर में काम करते हैं. मैं जब तक बैठने को न कहूं, वे मेरे सामने खड़े रहते हैं. मैं भला तुम्हारी तरह के तुच्छ व्यक्ति के पीछे क्यों पड़ूंगी. इस से मुझे क्या हासिल होने वाला है?’’

विजय को यह सुन कर और भी ज्यादा गुस्सा आ गया. वह अपना संयम खो कर चिल्लाने लगा, ‘‘बस, अब और सफाई की जरूरत नहीं है. तेरा असली चेहरा अब दिखाई दे गया.’’

अचानक दरवाजे के पास से एक आवाज आई, ‘‘हाऊ डेयर यू? आप की हिम्मत कैसे हुई मेरी मां के साथ इस तरह से बात करने की?’’

आवाज सुन कर दोनों दरवाजे की तरफ पलटे और देखा कि अमृता दरवाजे के सामने खड़ी है.

‘‘मैं तब से सुन रही हूं, आप एक भद्र महिला के साथ लगातार असभ्य की तरह बात कर रहे हैं. और मां, पता नहीं तुम भी क्यों ऐसे बदतमीज लोगों को घर में घुसने देती हो, यह मेरी समझ से परे है. इन जैसे बदतमीजों को तो घर के अंदर ही नहीं घुसने देना चाहिए.’’

‘‘अमृता, तुम इन्हें पहचान नहीं पाईं. ये तुम्हारे पिता हैं.’’

अमृता कुछेक पल के लिए सन्न रह गई. फिर संयत स्वर में हर शब्द को आहिस्ताआहिस्ता, साफसाफ लहजे में कहा, ‘‘नहीं, इन के जैसा नीच, लोभी, स्वार्थी व्यक्ति के साथ मेरा कोई रिश्ता नहीं है. सिर्फ जन्म देने से ही कोई पिता नहीं बन जाता है. मेरे पिता का नाम अजय कुमार गौतम है. और आप? आप को शर्म नहीं आती? इसी महिला को अपनी पत्नी के रूप में पहचान देने में आप को शर्म महसूस हुई थी. इसीलिए एक असहाय महिला और 5 साल की बच्ची को त्याग देने में आप को जरा भी संकोच नहीं हुआ था, और आज उसी के पास आए हैं सहायता की भीख मांगने?

‘‘इन सब के बावजूद, वह आप को मिल भी जाती अगर आप उस के योग्य होते. योग्य होना तो दूर की बात, आप तो इंसान कहलाने के लायक भी नहीं हैं, आप तो इंसान के नाम पर कलंक हैं. निकल जाइए यहां से और आइंदा हम लोगों के नजदीक भी आने की कोशिश मत कीजिएगा, नहीं तो हम से बुरा कोई न होगा. नाऊ, गैट आउट, आई से, गैट आउट.’’

विजय धीरेधीरे सिर नीचा कर कमरे से निकल गया. जानकी देवी अवाक् थीं, वे तो बस अपनी बेटी का चेहरा देखती रहीं. उन्होंने अपनी लड़की का यह रूप कभी नहीं देखा था. उन की आंखों में गर्व और आनंद से आंसू भर आए. उन्हें एहसास हुआ कि इतने दिनों के बाद विजय को अपने किएधरे का प्रत्युत्तर आखिर मिल ही गया.

अमृता ने मां के पास जा कर पूछा, ‘‘क्या मैं ने कोई गलत काम किया, मां? मैं ने ठीक तो किया न?’’

जानकी ने अमृता को बांहों में भर कर कहा, ‘‘हां, तुम ने बिलकुल सही किया, बेटी. उन की जिन बातों का मैं कोई जवाब नहीं दे सकी थी, तुम ने उन का सही प्रत्युत्तर दे दिया था.’’

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Serial Story: प्रत्युत्तर (भाग-3)

लेखक- बिकाश गोस्वामी

जानकी के कमरे में आते ही विजय ने कहा, ‘बैठो, तुम से बहुत जरूरी बात करनी है.’

‘एक काम करते हैं, मैं तुम्हारा खाना लगा देती हूं. तुम पहले खाना खा लो, फिर मैं इत्मीनान से बैठ कर तुम्हारी बातें सुनूंगी,’ जानकी ने कहा.

‘नहीं, बैठो. मेरी बातें जरूरी हैं,’ यह कह कर विजय ने जानकी की ओर देखा. जानकी पलंग के एक किनारे पर बैठ गई. विजय ने एक लिफाफा ब्रीफकेस से निकाला, फिर उस में से कुछ कागज निकाल कर जानकी को दे कर कहा, ‘इन कागजों के हर पन्ने पर तुम्हें अपने दस्तखत करने हैं.’

‘दस्तखत? क्यों? ये कैसे कागज हैं?’ जानकी ने पूछा.

विजय कुछ पल खामोश रहने के बाद बोला, ‘जानकी, असल में…देखो, मैं जो तुम से कहना चाह रहा हूं, मुझे पता नहीं है कि तुम उसे कैसे लोगी. देखो, मैं ने बहुत सोचसमझ कर तय किया है कि इस तरह से अब और नहीं चल सकता. इस से तुम्हें भी तकलीफ होगी और मैं भी सुखी नहीं हो सकता. मुझे उम्मीद है कि तुम मुझे गलत नहीं समझोगी, मुझे तलाक चाहिए.’

‘तलाक!’ जानकी के सिर पर मानो आसमान टूट कर गिर पड़ा हो.

‘हां, देखो, मुझे नहीं लगता कि तुम्हारे और मेरे बीच जो मानसिक दूरियां हैं वे अब खत्म हो सकती हैं. और यह भी तो देखो कि मैं कितना बड़ा अफसर बन गया हूं. वैसे यह तुम्हारी समझ से परे है. इतना समझ लो कि अब तुम मेरे बगल में जंचती नहीं. यही सब सोच कर मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि इस के अलावा अब कोई उपाय नहीं है,’ विजय ने कहा.

‘इस में मेरा क्या कुसूर है? मैं ने इंटर पास किया है. तुम मुझे शहर ले चलो, मैं आगे और पढ़ूंगी, मैं तुम्हारे काबिल बन कर दिखाऊंगी,’ कहतेकहते जानकी का गला भर आया था.

‘मैं मानता हूं कि इस में तुम्हारा कोई दोष नहीं, पर अब यह मुमकिन नहीं.’

‘फिर मुझे सजा क्यों मिलेगी? मैं मुन्नी को छोड़ कर नहीं रह सकती.’

‘मुन्नी तुम्हारे पास ही रहेगी. मैं तुम्हें हर महीने रुपए भेजता रहूंगा. अगर तुम चाहो तो दोबारा शादी भी कर सकती हो. शादी का सारा खर्चा भी मैं ही उठाऊंगा.’

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जानकी समझ गई कि विजय के साथ उस का रिश्ता अब खत्म हो चुका है, भला कोई पति अपनी पत्नी को दूसरी शादी के लिए कभी कहता है? जो रिश्ते दिल से नहीं बनते, उन्हें जोरजबरदस्ती बना के नहीं रखा जा सकता है. यदि वह इस वक्त दस्तखत नहीं भी करती है तो भी विजय किसी न किसी बहाने से तलाक तो हासिल कर ही लेगा और उस से मन को और ज्यादा चोट पहुंचेगी.

अचानक उसे एहसास हुआ कि विजय ने उस से कभी भी प्यार नहीं किया. उस ने खुद से सवाल किया कि क्या वह विजय से प्यार करती है? दिल से जवाब ‘नहीं’ में मिला. फिर उस ने विजय से पूछा, ‘कहां दस्तखत करने हैं?’

विजय की बताई जगह पर उस ने हर पन्ने पर दस्तखत कर दिए. उस का हाथ एक बार भी नहीं कांपा.

विजय ने नहीं सोचा था कि काम इतनी आसानी से संपन्न हो जाएगा. उस ने सारे कागज समेट कर ब्रीफकेस में डालते हुए कहा, ‘मुझे अभी निकलना पड़ेगा. पहले ही काफी देर हो चुकी है.’

जानकी ने अचानक सवाल किया, ‘वह लड़की कौन है जिस के लिए तुम ने मुझे छोड़ा है? क्या वह मुझ से ज्यादा सुंदर है?’

विजय ठिठक गया. उस ने इस सवाल की उम्मीद नहीं की थी, कम से कम जानकी से तो नहीं ही. अब उसे एहसास हुआ कि जानकी काफी अक्लमंद है. उस ने कहा, ‘उस का नाम नीलम है. हां, वह काफी सुंदर है और सब से बड़ी बात यह है कि वह शिक्षित तथा बुद्धिमान है. वह भी मेरी तरह आईएएस अफसर है. हम दोनों एक ही बैच से हैं. तलाक होते ही हम शादी कर लेंगे.’

जानकी ने बात को आगे बढ़ाना उचित नहीं समझा. विजय के कमरे से निकलते ही अम्मा ने पूछा, ‘तुम क्या अभी चले जाओगे?’

विजय ने जवाब दिया, ‘हां.’

तब अम्मा ने कहा, ‘छि:, तू इतना स्वार्थी है? तू ने अपने सिवा और किसी के बारे में नहीं सोचा?’

विजय समझ गया कि अम्मा ने उन दोनों की सारी बातें सुन ली हैं. अम्मा के चेहरे पर क्रोध की ज्वाला थी. वे लगातार बोले जा रही थीं, ‘अच्छा, हम लोगों की छोड़, तू ने अपनी लड़की के बारे में एक बार भी नहीं सोचा कि पिता के अभाव में परिवार में यह लड़की कैसे पलेगी? और जानकी का क्या होगा? तू इतना नीच है, इतना कमीना है?’

विजय कुछ कहने जा रहा था. उसे रोक उन्होंने कहा, ‘मुझे तुम्हारी सफाई नहीं चाहिए. याद रहे, आज अगर तुम चले गए तो सारी जिंदगी मैं तुम्हारा मुंह नहीं देखूंगी. यह जो जायदाद तुम देख रहे हो वह तुम्हारे बाप की नहीं है. यह सारी जायदाद मुझे मेरी मां से मिली है, इस की एक कौड़ी भी तुम्हें नहीं मिलेगी.’

विजय ने एक निगाह अम्मा पर डाली और फिर सिर नीचा कर के चुपचाप घर से चला गया. अम्मा रो पड़ी थीं, लेकिन जानकी नहीं रोई. उस के हावभाव ऐसे थे जैसे कि कुछ हुआ ही न हो.

अम्मा अपनी जबान की पक्की थीं. महीना बीतने से पहले ही वकील बुलवा कर उन्होंने सारी जायदाद अपने छोटे बेटे और बहू जानकी के नाम बराबरबराबर हिस्सों में बांट दी. जानकी के पिता आए थे एक दिन जानकी को अपने साथ अपने घर ले जाने के लिए, लेकिन जानकी की सास ने जाने नहीं दिया. बंद कमरे में दोनों के बीच बातचीत हुई थी. किसी को नहीं पता. लगभग सालभर के बाद जानकी को तलाक की चिट्ठी मिली. उस के कुछ ही दिनों बाद जानकी की सास ने खुद खड़े हो कर अजय के साथ जानकी का विवाह कराया. अजय की बीवी उस के गौना के ठीक एक दिन पहले अपने प्रेमी के साथ भाग गई थी. उस के बाद अजय ने शादी नहीं की थी. वह बीए पास कर के गांव के ही स्कूल में अध्यापक की नौकरी कर रहा था और साथ ही साथ एक खाद की दुकान भी चला रहा था. उन के समाज में पुनर्विवाह के प्रचलन के कारण उन्हें कोई सामाजिक परेशानी नहीं उठानी पड़ी. सालभर के भीतर ही उन के बेटे सुजय का जन्म हुआ.

विजय फिर कभी गांव नहीं आया. वादे के अनुसार उस ने जानकी को मासिक भत्ता भेजा था, किंतु जानकी ने मनीऔर्डर वापस कर दिया था.

जानकी गांव की एकमात्र इंटर पास बहू थीं. वे गांव के विकास के कार्यों से जुड़ने लगीं. ताऊजी की मृत्यु के बाद वे गांव की प्रधान चुनी गईं. उसी समय उन की ईमानदारी और दूरदर्शिता की वजह से गांव का खूब विकास हुआ. नतीजा यह हुआ कि वे अपनी पार्टी के नेताओं की निगाह में आईं और उन्हें विधानसभा चुनाव की उम्मीदवारी का टिकट मिल गया. चुनाव में 50 हजार से भी ज्यादा वोटों से जीत कर वे विधानसभा सदस्य के रूप में चुनी गईं और मंत्री भी बनाई गईं.

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इन सब कामों में पति अजय का भरपूर सहयोग तो मिला ही, सास का भी समर्थन उन्हें मिलता रहा. मुन्नी की पढ़ाई पहले नैनीताल, फिर दिल्ली और अंत में बेंगलुरु में हुई. सुजय भी अपनी दीदी की तरह देहरादून के शेरवुड एकेडेमी के होस्टल में रह कर पढ़ रहा है.

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Serial Story: प्रत्युत्तर (भाग-2)

लेखक- बिकाश गोस्वामी

पढ़ाई का माध्यम हिंदी होने के कारण उस की अंगरेजी कमजोर थी. उस ने खूब मेहनत कर अपनी अंगरेजी भी सुधारी. बीए का इम्तिहान देने के बाद वह गांव न जा कर सीधा दिल्ली चला गया. विजय का परिवार अमीर नहीं था, लेकिन संपन्न था. घर में खानेपीने की कोई कमी नहीं थी. उसे हर जरूरत का पैसा घर से मिलता था, लेकिन वह पैसे की अहमियत को जानता था. वह फुजूलखर्ची नहीं था. वह दिल्ली में अपने इलाके के सांसद के सरकारी बंगले के सर्वेंट क्वार्टर में रहता और उन्हीं के यहां खाता था. इस के एवज में उन के 3 बच्चों को पढ़ाता था. खाली समय में वह अपनी पढ़ाई करता था. इस तरह, 1 साल के कठोर परिश्रम के बाद वह आईएएस की परीक्षा में सफल हुआ.

मसूरी में ट्रेनिंग पर जाने से पहले वह हफ्तेभर के लिए गांव आया. उसी समय उस ने अपनी लड़की को पहली बार देखा. जानकी ने हाईस्कूल में फेल होने के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी. इसी वजह से उस ने पहले तो उसे बहुत डांटा फिर उस के साथ उस ने ठीक से बात भी नहीं की. यहां तक कि अपनी लड़की मुन्नी को उस ने एक बार भी गोदी में नहीं लिया.

जानकी ने हर तरह से विजय को खुश करने की कोशिश की लेकिन विजय टस से मस नहीं हुआ. किसी तरह वह 7 दिन काट कर मसूरी चला गया. जानकी कई दिनों तक गमगीन रही. फिर उसे सास और देवर ने समझाया कि वह बहुत बड़ा अफसर बन गया है और इसीलिए उस की पत्नी का पढ़ालिखा होना जरूरी है. मजबूर हो कर जानकी ने फिर पढ़ना शुरू किया. पहले हाईस्कूल फिर इंटरमीडिएट सेकंड डिवीजन में पास किया.

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विजय खत वगैरह ज्यादा नहीं लिखता था, लेकिन इस बार जाने के बाद तो एक भी खत नहीं लिखा. अचानक 3 साल बाद एक चिट्ठी आई, ‘अगले शनिवार को आ रहा हूं, 2 दिन रहूंगा.’ उस वक्त वह बदायूं का डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट था. घर के सब लोग बहुत खुश हुए. देखते ही देखते सारे गांव में यह खबर फैल गई. गांव वाले यह कहने लगे कि अब जानकी अपने पति के साथ शहर में जा कर रहेगी. पति बहुत बड़ा अफसर है, शहर में बहुत बड़ा बंगला है. अब जानकी की तकलीफें खत्म हुईं. लेकिन जानकी बिलकुल चुप थी, न वह ‘हां’ कह रही थी, न ‘ना’, असल में विजय से वह नाराज थी. उस ने विजय के जाने के बाद उस से माफी मांगते हुए कम से कम 6-7 चिट्ठियां लिखीं, हाईस्कूल और इंटरमीडिएट पास होने की खबर भी दी लेकिन उसे कोई जवाब नहीं मिला. इंसान से क्या गलती नहीं होती है? गलती की क्या माफी नहीं मिलती है?

शनिवार के दिन घर के सभी लोग तड़के ही जाग गए. सारे घर को धो कर साफ किया गया. बगल के मकान में रहने वाले ताऊजी, जो गांव के मुखिया भी हैं, सुबह से ही नहाधो कर तैयार हो कर विजय की बैठक में बैठ गए. मुन्नी को नई फ्रौक पहनाई गई. होश में आने के बाद वह पहली बार अपने पापा को देखेगी. वह कभी घर के अंदर और कभी घर के बाहर आजा रही थी. उस की खुशी का ठिकाना नहीं था. पापा उस के लिए ढेर सारे खिलौने लाएंगे, नए कपड़े लाएंगे. उस ने एबीसीडी सीखी है, पापा को सुनाएगी, रात को पापा के साथ लेटेगी. सारे दोस्त घर के आसपास चक्कर लगा रहे थे.

धीरेधीरे दिन ढल गया. सुबह और दोपहर की बस आई और चली भी गई लेकिन विजय नहीं आया. ताऊजी इंतजार करकर के आखिर लगभग 2 बजे अपने घर चले गए. यारदोस्त भी सब अपने घर चले गए. सास ने जबरदस्ती मुन्नी को खिला दिया. लगभग 3 बजे देवर अजय और सास ने भी खाना खा लिया, लेकिन बारबार कहने के बाद भी जानकी ने नहीं खाया. उस ने सिर्फ इतना कहा, ‘मुझे भूख नहीं है, जब भूख लगेगी तब मैं खुद खा लूंगी.’

सास ने भी ज्यादा जोर नहीं डाला. उन्हें जानकी की जिद के बारे में पता है. जबरदस्ती उस से कुछ नहीं कराया जा सकता है.

शाम ढलने को थी कि अचानक दूर से बच्चों के शोर मचाने की आवाज आई. कोई कुछ समझ सकता इस से पहले ही एक सफेद ऐंबेसेडर कार दरवाजे पर आ कर रुकी. उस में से विजय उतरा. उसे देखते ही देखते घर का गमगीन माहौल उत्सव में तबदील हो गया. सारा का सारा गांव विजय के दरवाजे पर इकट्ठा हो गया. इतना बड़ा अफसर उन्होंने कभी नहीं देखा था. जानकी रसोई में व्यस्त थी, चायनाश्ते का प्रबंध कर रही थी. बैठक में यारदोस्तों ने विजय को घेर रखा था. धीरेधीरे उसे थकान लगने लगी. करीब

7 बजे ताऊजी उठे और सभी से जाने को कहा. उन्होंने कहा, ‘अब विजय को थोड़ा आराम करने दो. वह पूरे रास्ते खुद ही गाड़ी चला कर आया है, जाहिर है कि थक गया होगा. फिर वह इतने दिनों के बाद घर आया है, उसे अपने घर वालों से भी बातें करने दो. अरे भाई, मुन्नी को भी तो मौका दो अपने पापा से मिलने का.’

अब सब न चाहते हुए भी जाने को मजबूर थे. विजय की जान में जान आई. विजय अपने साथ कोई सूटकेस वगैरह नहीं लाया बल्कि केवल एक ब्रीफकेस लाया था. अम्मा ने पूछा, ‘तू तो कोई कपड़े वगैरह साथ नहीं लाया. मुझे तो तेरा इरादा अच्छा नहीं लग रहा. मुझे सही बता, तेरा इरादा क्या है?’

विजय ने कहा, ‘मैं यहां रहने नहीं आया हूं. मैं तो यहां जरूरी काम से आया हूं. मुझे आज रात को ही वापस लौटना है. अगर रास्ते में गाड़ी खराब नहीं हुई होती तो इस वक्त मैं वापस जा रहा होता.’

अम्मा ने पूछा, ‘यह बता, ऐसा भी क्या जरूरी काम जिस के लिए तू सिर्फ कुछ घंटे के लिए आया? तुझे क्या हम लोगों की, अपनी बीवी की, मुन्नी की जरा भी याद नहीं आती?’

विजय ने इस प्रश्न का उत्तर न दे कर पूछा, ‘जानकी दिखाई नहीं पड़ रही, वह कहां है?’

अम्मा ने कहा, ‘चल, इतनी देर बाद उस बेचारी की याद तो आई. उसे मरने की भी फुरसत नहीं है. सारे मेहमानों के चायनाश्ते का इंतजाम वही तो कर रही है. इस वक्त वह रसोई में है.’

विजय ने कहा, ‘मैं हाथमुंह धो कर अपने कमरे में जा रहा हूं. तुम उसे वहीं भेज दो. उस से मुझे जरूरी काम है.’

‘‘मैडम, आज औफिस नहीं जाएंगी क्या? साढ़े 9 बजने वाले हैं,’’ रामलखन की आवाज सुन कर जानकी देवी की तंद्रा भंग हुई और वे वर्तमान में लौट आईं. बोलीं, ‘‘टेबल पर नाश्ता लगाओ, मैं आ रही हूं.’’

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साढ़े 10 बजे एक विभागीय मीटिंग थी, खत्म होतेहोते डेढ़ बज गया. बाद में भी कुछ अपौइंटमैंट थे. साढ़े 3 बजे अमृता उर्फ मुन्नी का फोन आया. काम में उलझे होने के कारण समय का खयाल ही नहीं रहा. निजी सचिव को कह कर सारे अपाइंटमैंट खारिज कर सीधे घर चली आईं जानकी देवी. अब आज और कोई काम नहीं. अमृता के साथ खाना खा कर उस के बेंगलुरु के किस्से सुनने बैठ गईं. एक बार खयाल आया कि विजय की बात अमृता से कहें, पर दूसरे ही क्षण मन से यह खयाल निकाल दिया, सोचा कि कोई जरूरत नहीं है. लेकिन रात को बिस्तर पर लेटते ही फिर पुरानी यादें ताजा हो गईं.

आगे पढ़ें- जानकी के कमरे में आते ही विजय…

Serial Story: प्रत्युत्तर (भाग-1)

लेखक- बिकाश गोस्वामी

घड़ी में 6 बजे का अलार्म बजते ही जानकी देवी की आंखें खुल गईं. उन्होंने हाथ बढ़ा कर अलार्म बंद कर दिया. फिर कुछ देर बाद वे बिस्तर से उठीं  और बाथरूम में घुस गईं. नहाधो कर जब वे बाहर निकलीं तो उन्हें हलकी सर्दी महसूस होने लगी. उन्होंने शाल को थोड़ा कस कर ओढ़ लिया.

आज वे काफी खुश थीं. उन की लड़की अमृता पढ़ाई पूरी कर वापस आ रही थी. वे बरामदे में कुरसी पर बैठ गईं. सामने मेज पर रखी गरम चाय और शहर से प्रकाशित सारे हिंदी व अंगरेजी के अखबार रखे थे. सुबह की चाय वे अखबार पढ़तेपढ़ते ही पीती थीं. यह उन की रोज की दिनचर्या थी.

जानकी देवी उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री थीं. हालांकि वे कैबिनेट मंत्री नहीं थीं लेकिन राज्यमंत्री होते हुए भी उन का स्वतंत्र विभाग था, पंचायती राज और ग्रामीण उन्नयन विभाग. बुंदेलखंड क्षेत्र के हमीरपुर जिले के एक अविकसित और संरक्षित विधानसभा सीट से वे निर्वाचित हुईं, वह भी दूसरी बार. उन का जनाधार बहुत अच्छा था. दोनों बार वे 50 हजार से भी ज्यादा वोटों से जीतीं. उन की छवि एक ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और मेहनती मंत्री की थी.

आज जानकी देवी का मन अखबार में नहीं लग रहा था. बारबार निगाहें अपनेआप घड़ी की ओर चली जा रही थीं. 4 महीने हो गए थे उन्हें अमृता को देखे हुए. ऐसा लग रहा था मानो घड़ी की सूई अटक गई हो. ऐसे में घर के नौकर रामलखन ने आ कर खबर दी कि कोई मिस्टर विजय कुमार आए हैं और आप से मिलना चाहते हैं.

‘‘मिस्टर विजय कुमार? मैं किसी विजय कुमार को नहीं जानती. फिर उन का इतनी सुबह घर में क्या काम?’’

रामलखन ने जवाब दिया, ‘‘जी, उन्होंने कहा कि वे आप के पुराने परिचित हैं.’’

‘‘ठीक है, बैठाओ उन को.’’

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उन्होंने बैठाने को तो कह दिया पर वे समझ नहीं पाईं कि कौन आया है. उन्होंने स्लिप के ऊपर एक बार और निगाह दौड़ाई. हैंडराइटिंग कुछ जानीपहचानी सी लगी. कोशिश करने के बाद भी वे याद नहीं कर पाईं कि आगंतुक कौन है.

करीब 5 मिनट बाद जानकी देवी ड्राइंगरूम में आईं. विजय की पीठ उन की तरफ थी. फिर भी तुरंत उन्होंने उन्हें पहचान लिया. उन्हें देख कर जानकी देवी को थोड़ा आश्चर्य हुआ. अभी तक विजय उन्हें देख नहीं पाए थे. पहले खयाल आया कि नहीं मिलते हैं, फिर सोचा कि मिलने में हर्ज ही क्या है. जानकी देवी ने हलके से गला खंखारा. विजय घूमे, फिर हंस कर पूछा, ‘‘पहचाना?’’

‘‘हां, क्यों नहीं. अभी तुम इतना भी नहीं बदले हो कि मैं तुम्हें पहचान न पाऊं. थोड़े मोटे जरूर हो गए हो और कुछ बाल पके हैं, बस.’’

‘‘लेकिन तुम काफी बदल गई हो.’’

‘‘हां, जिंदगी में आंधीतूफान काफी झेलना पड़ा, शायद इसी वजह से. लेकिन तुम? अचानक कैसे आना हुआ? आजकल कहां हो? नीलम कैसी है?’’

उसी वक्त रामलखन चाय की ट्रे ले कर अंदर आया. जानकी देवी ने एक कप विजय की ओर बढ़ा कर कहा, ‘‘लो, चाय पियो.’’

रामलखन के जाने के बाद विजय ने कहा, ‘‘मैं गाजियाबाद में हूं. नीलम अच्छी है. फिलहाल उस की पोस्टिंग गौतम बुद्ध नगर में है. 1 बेटा है और 1 बेटी है, दोनों दिल्ली में पढ़ते हैं. काफी दिनों से सोच रहा था कि तुम से मिलूं, पर वक्त नहीं निकाल पा रहा था. आज एक काम से लखनऊ आया था, सोचा कि मिल लूं. आज तो मुन्नी लौट रही है?’’

‘‘हां, पर अब उसे मुन्नी कह कर कोई नहीं बुलाता है. यह नाम उसे पसंद नहीं है. उस का नाम अमृता है. सब उसे इसी नाम से बुलाते हैं. तो तुम्हें इतने दिनों के बाद मुन्नी की याद आई?’’

‘‘नहीं, यह बात नहीं है. याद नहीं आती हो, ऐसा भी नहीं. असल में व्यस्तता के कारण मैं वक्त नहीं निकाल पाता,’’ उन के लहजे में हकलाहट और संकोच साफ झलक रहा था.

अब जानकी देवी से रहा नहीं गया. उन्होंने पूछा, ‘‘सच बताओ, तुम्हारा असली मकसद क्या है? तुम ऐसे ही तो आने से रहे, क्या मैं तुम्हें पहचानती नहीं?’’

विजय समझ गए कि वे पकड़े गए हैं. कुछ सेकंड चुप रहने के बाद वे बोले, ‘‘मैं तुम्हारे पास एक काम से आया हूं.’’

‘‘मेरे पास? काम से? मुझ से तुम्हारा क्या काम?’’ जानकी देवी ने चकित हो कर पूछा.

‘‘असल में, कल शाम को तुम्हारे दफ्तर में एक फाइल आई है. आज तुम्हारी मेज पर रखी जाएगी.’’

‘‘तुम किस फाइल की बात कर रहे हो?’’ जानकी देवी ने फिर पूछा.

‘‘नोएडा विकास प्राधिकरण के प्लौट ऐलौटमैंट के ऊपर जो जांच आयोग बैठा है, उस की फाइल. इस केस में सभी लोगों ने मिल कर मुझे फंसाया है. जानकी, मेरा यकीन करो. अब तुम अगर थोड़ी सी भी कोशिश करो तो मैं छूट सकता हूं.’’

‘‘अच्छा तो यह बात है. अभी तक वह फाइल मैं ने देखी नहीं है और जब तक मैं फाइल देख नहीं लेती तब तक मैं कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हूं. हां, इतना जरूर कह सकती हूं कि यदि तुम निर्दोष हो तो कोई तुम्हें दोषी करार नहीं दे सकता.’’

यह कह कर उन्होंने घड़ी की ओर देखा. विजय समझ गए कि अब उठना पड़ेगा. वे उठ कर खड़े हो गए और बोले, ‘‘अब चलूंगा, लेकिन मैं बहुत उम्मीद ले कर जा रहा हूं. मैं तुम से फिर आ कर मिलूंगा.’’

विजय के जाते ही जानकी देवी के चेहरे पर नफरत की लहर दौड़ गई. उन की आंखों के सामने पुरानी स्मृतियां जाग उठीं.

जानकी समाज के एकदम निचले हिस्से से आती हैं. पहले उन लोगों को हरिजन कहा जाता था, पर अब दलित कहा जाता है. जानकी की शादी हुई थी 9 साल की उम्र में. पति विजय की उम्र उस वक्त 14 साल थी और वह कक्षा 8 में पढ़ता था. जानकी का गौना 13 साल की उम्र में हुआ और वह ससुराल आ गई. उस वक्त वह कक्षा 7 में पढ़ती थी.

जानकी का पढ़नेलिखने में मन नहीं लगता था. ससुराल में आ कर वह खुश थी. सोचा, चलो पढ़नेलिखने से अब छुटकारा मिला. लेकिन मनुष्य सोचता कुछ है और होता कुछ और है. उस वक्त उस का पति विजय 12वीं कक्षा में था और वह पढ़ने में तेज था. उस की इच्छा थी कि उस की पत्नी जानकी भी पढ़े. सास को भी कोई आपत्ति नहीं थी, कहा, ‘तुम पढ़ो. मुझे कोई ऐतराज नहीं है.’

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इस तरह से शुरू हुई जानकी की बेमन की पढ़ाई. स्कूल घर के पास ही था. पढ़ाईलिखाई की देखरेख का दायित्व दिया गया देवर अजय को जो कक्षा 8 का छात्र था. पति विजय ने इंटरमीडिएट की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की और डिगरी की पढ़ाई करने के लिए कानपुर चला गया. वहां के क्राइस्ट चर्च डिगरी कालेज में उसे दाखिला मिल गया. जिस साल विजय ने बीए पास किया उसी साल मुन्नी पैदा हुई और जानकी हाईस्कूल में फेल हो गई. उस वक्त जानकी की उम्र 17 साल थी. उसी वक्त से विजय में बदलाव आना शुरू हो गया. इस बदलाव को जानकी शुरू में भांप नहीं पाई और जब समझ में आया तब काफी देर हो चुकी थी.

छोटे से एक गांव का दलित लड़का विजय, जब कानपुर में पढ़ने गया तब हालांकि वह अन्य शहरी छात्रों से पढ़ने में तेज था लेकिन उस में शहरी तौरतरीकों का अभाव था. 6 महीने में ही उस ने अपना हावभाव, चालचलन, पोशाक सबकुछ बदल लिया. अब उसे देख कर कोई भी नहीं कह सकता था कि वह दलित जाति का ग्रामीण लड़का है. लेकिन इन सब के बावजूद उस ने अपनी पढ़ाई के साथ कोई समझौता नहीं किया. बीए की पढ़ाई करने के दौरान ही उस ने तय कर लिया था कि उसे आईएएस बनना है. इस की तैयारी उस ने तभी से शुरू कर दी. इन 3 सालों में उस ने गिनेचुने दिन ही गांव में बिताए.

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Lockdown पर मानवी गागरू का गिल्ट फ्री ब्रेक, बोलीं- कोई दूसरा औप्शन नहीं है

डिजनी चैनल की टीवी शो धूम मचाओं धूम से अपने कैरियर की शुरूआत करने वाली अभिनेत्री मानवी गागरू ने कई हिट फिल्में दी, जिसमें लाइफ रिबूट नहीं होती, नो वन किल्ड जसिका, उजड़ा चमन, शुभ मंगल ज्यादा सावधान आदि कई फिल्में है. जिसमें उसके अभिनय की काफी तारीफ की गयी. फिल्मों के अलावा उसने कई वेब सीरीज भी की है. उसे हर नया चरित्र आकर्षित करता है. दिल्ली की मानवी पिछले कई सालों से मुंबई में रह रही है और इस लॉक डाउन को एन्जॉय कर रही है और सोचती है कि इस लॉक डाउन के बाद काम बड़े जोर शोर से शुरू होगा, क्योंकि भाग दौड़ की जिंदगी से लोगों को थोड़ी फुर्सत मिली है, जिसे वे अपने परिवार के साथ बिता रहे है. नयी स्फूर्ति और नए सिरे से सब लोग पहले से और बेहतर काम कर इंडस्ट्री को एक बार फिर से पटरी पर ला देंगे. मानवी की वेब सीरीज फोर मोर शॉट्स सीजन 2 रिलीज पर है. गृहशोभा के लिए उसने ख़ास बात की पेश है, कुछ अंश.

सवाल- इस वेब सीरीज में आपको क्या ख़ास लगा ?

इसकी स्क्रिप्ट मुझे बहुत पसंद आई थी. इसमें 4 लड़कियों की कहानी है, उनके लाइफ को सेलिब्रेट किया जा रहा है. ये किसी लड़की की दुखभरी या संघर्ष की कहानी नहीं है. नार्मल आज की बड़े शहर में रहने वाली आत्मनिर्भर लडकियां है. ये साथ रहती है और किसी गलती को समझती है. इसके अलावा इस वेब सीरीज की क्रू में सारी लड़कियां ही थी. निर्देशक, लेखक और हम 4 लड़कियां, ये मेरे लिए एक नया अनुभव था और मुझे बहुत अच्छा लगा था.

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सवाल- अभिनय में आने की इच्छा कहाँ से हुई, किसने प्रेरित किया?

मैं किसी फ़िल्मी परिवार से नहीं हूं और मैंने जीवन में कभी अभिनय की बात नहीं सोची थी. आप्शन भी नहीं था. स्कूल में रहते हुए डिजनी वाले किसी शो के लिए कलाकार ढूँढ़ रहे थे,उस समय एक टीचर के कहने पर वहां गयी और चुन ली गयी. मैंने उस टीचर को पहले मना भी किया था, क्योंकि मुझे डांस आती है, अभिनय नहीं. असल में मैंने 12 साल की उम्र से कथक सीखा है, लेकिन टीचर ने मुझे वहां एक परफ़ॉर्मर के तौर पर जाने के लिए कहा, मैं गयी और उन्हें मेरा परफोर्मेंस पसंद आया. उसके बाद भी मैं पढाई कर रही थी. कॉलेज के दौरान मैंने फिल्म ‘आमरस’ की, रिलीज होने तक मेरी पढाई ख़त्म हो चुकी थी. फिल्म बहुत अच्छी नहीं चली,पर मेरे काम को बहुत सराहा गया. तब मुझे लगा कि मुझे इसको सीरियसली लेना चाहिए. 2 साल तक कोशिश करने की जरुरत है. सफल न होने पर मैं हायर एजुकेशन में वापस चली आउंगी, ऐसा सोचकर मैं मुंबई साल 2010 में आ गयी. फिर मेरा संघर्ष शुरू हुआ. शुरू के दिनों में जब भी सोचती थी कि वापस चली जाउंगी, तभी कुछ काम मिल जाता था.इससे थोडा और रुकने की प्रेरणा जागती रही.

सवाल- अभिनय में आने के बारें में परिवार से कहने पर उनकी प्रतिक्रियां क्या रही?

उन्हें शुरू में समझ में नहीं आया कि मैं क्या करने वाली हूं, क्योंकि अधिकतर पढाई के बाद कुछ और करने की बात होती रही. एक्टिंग को लेकर कोई बात नहीं होती थी. जब मैं मुंबई आ गयी तो वे सोचने लगे कि मैं यहाँ कैसे एडजस्ट करुँगी, क्योंकि उस समय मैं कई लड़कियों के साथ रहती थी. वे कुछ दूसरा जॉब साथ-साथ करने की सलाह भी देते रहे, पर मैंने उन्हें हमेशा मना किया और अभिनय पर फोकस्ड रही. जब धीरे-धीरे काम आने लगा, तो उन्हें थोड़ी राहत मिली. वे खुश हुए. मुझे याद है, जब मैं मुंबई आ रही थी, तो पिता ने मुझे पास बिठाकर कहा कि ये अच्छा क्षेत्र नहीं है, आपको सावधान रहने की जरुरत है. मुझे लगा कि वे कास्टिंग काउच के बारें में कह रहे है. मैंने उनको भरोषा दिलाया था कि मुझे ऐसी चीजो को हैंडल करना आता है, लेकिन ऐसा नहीं था. वे मेरे काम के बारें में कह रहे थे,क्योंकि फ़िल्मी दुनिया में लोग एक दिन कामयाबी को सराहेंगे, तो दूसरे दिन नीचे भी उतार देते है. ये अनिश्चित इंडस्ट्री है. मुझे उनकी बातें तब समझ में नहीं आई थी, अब उनके कहने का मतलब पता चलता है.

सवाल- उजड़ा चमन आपकी सफल फिल्म रही, उसमें आपने एक मोटी लड़की की भूमिका निभाई, कैसे किया और फायदा कितना मिला?

मैंने उसमें बॉडी सूट पहनी थी, जो मेरे लिए अच्छी तरह से आरामदायक बनायी गयी थी. इस फिल्म के लिए मुझे वजन बढाने के लिए भी कहा गया था, पर उजड़ा चमन के कुछ दिनों बाद ही शुभ मंगल ज्यादा सावधान फिल्म की शूटिंग थी, इसलिए मैंने उन्हें मना किया था. फिर बहुत मुश्किल से ये बॉडी सूट बनी थी. फिल्म सफल होने पर कलाकार को लोग अधिक सराहने लगते है.

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सवाल- आप अब तक की जर्नी से कितनी संतुष्ट है?

मैं अपने आप को लकी समझती हूं, क्योंकि मुझे अच्छे प्रोजेक्ट के साथ अच्छे लोग भी मिले है, पिछले साल मैंने काफी काम किया है. वे सारे लोग प्रतिभावान और क्रिएटिवली अच्छे रहे, जिससे काम करना आसान हुआ. इस क्षेत्र में सबको एक जुट होकर काम करना पड़ता है. टीम वर्क सही हो तो ही काम सही होता है.

सवाल- लॉक डाउन की वजह से फिल्म इंडस्ट्री को काफी नुकसान हो रहा है, क्योंकि यहाँ टीम वर्क होता है, एक अकेला कुछ नहीं कर सकता, आपको क्या लगता है कि इंडस्ट्री को एक बार फिर से पटरी पर आने में कितना समय लगेगा? क्या-क्या तैयारियां उन्हें करनी पड़ेगी?

मेरे हिसाब से जो कलाकार वित्तीय रूप से अधिक सक्षम नहीं है, खासकर कोई नया कलाकार जिसने पहली प्रोजेक्ट को केवल साईन किया है. उनके रेंट को माफ़ करना चाहिए. इसके अलावा वार्ड बॉयज जिन्हें रोज के हिसाब से पैसे मिलते है, उनके लिए रिलीफ फंड रिलीज किये गए है. उसकी मुझे चिंता है. मैंने अपने स्टाफ को तीन महीने का वेतन दे दिया है, ताकि उनका घर चलता रहे. इसके अलावा इन दिनों क्रिएटिव लोग नए-नए कंटेंट बना रहे है. कोई मीम तो कोई विडियो बना रहा है. कोई थिएटर लाइव कर रहा है. ये अच्छी बात है, लोग क्रिएटिवली अच्छी चीजे सोच रहे है. ये सही है कि इस फील्ड में अभी कोई प्लानिंग नहीं हो पायेगा, क्योंकि लॉक डाउन है, पर मैं इस समय को एन्जॉय कर रही हूं,क्योंकि मैं पिछले कुछ दिनों से बहुत व्यस्त रही. ये गिल्ट फ्री ब्रेक है, क्योंकि कोई आप्शन नहीं है. इस लॉक डाउन के ख़त्म होने पर इंडस्ट्री बूम करेगी. लोग काम करने के लिए उत्सुक हो जायेंगे.

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सवाल-आप इन दिनों क्या कर रही है?

पहले दो दिन तो मुझे बहुत ख़ुशी मिली थी. मैं घर पर रहकर टीवी देखना, सोना और खाना खा रही थी, लेकिन जब मैंने हजारों की संख्या में फंसे लोगों को अपने घर जाने की चाहत को टीवी पर देखी, तो तनाव में आ गयी थी, रोने लगी थी, खुद को बहुत असहाय महसूस कर रही थी,क्योंकि मैं कुछ करने में असमर्थ हूं. फिर धीरे-धीरे अच्छी न्यूज़ देखकर अपने आप को सम्हाली. अभी घर का काम बहुत है, उसे करने में पूरा दिन निकल जाता है. अभी कोई डेड लाइन नहीं है, इसलिए आराम से उठकर घर का काम कर लेती हूं. मुझे लगता है कि लॉक डाउन पीरियड में मैं अधिक डिसिप्लिन हो गयी हूं, अभी वर्कआउट न करने की कोई बहाना नहीं है. नियमित करती हूं और मेंटल हेल्थ के लिए आज ये बहुत आवश्यक भी है.

फिर से नहीं: भाग-1

मुझे पार्किंग से औफिस की तरफ जाते हुए ‘हाय’ की आवाज सुनाई दी, तो मैं ने उस दिशा में देखा जहां से वह आवाज आई थी. लेकिन उधर कोई नहीं दिखा तो मैं मुड़ कर वापस चलने लगी. फिर मुझे ‘हाय प्लाक्षा’ सुनाई दिया तो मैं रुक गई. पीछे मुड़ कर देखा तो विवान था. वह हाथ हिलाते हुए मेरी तरफ आ रहा था. ‘ये यहां क्या कर रहा है?’ मैं ने सोचा. फिर फीकी सी मुसकान के बाद उस से पूछा, ‘‘हाय, कैसे हो?’’

‘‘मैं ठीक हूं. तुम यहां दिल्ली में क्या कर रही हो?’’ उस ने जिज्ञासा से पूछा.

‘‘मैं यहां काम करती हूं,’’ मैं ने जवाब दिया.

‘‘क्या सच में? कब से?’’ उस की आवाज में उत्साह था.

‘‘2 हफ्ते हो गए. क्या तुम्हारा औफिस भी इसी बिल्डिंग में है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं, मैं तो यहां औफिस के काम से किसी से मिलने आया था,’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘अच्छा चलो हम बाद में बात करते हैं. मुझे देर हो रही है,’’ यह कह कर मैं आगे बढ़ने लगी. जबकि आज मैं थोड़ा जल्दी आ गई थी, क्योंकि घर पर कुछ करने को ही नहीं था. औफिस में रोज सुबह 10 बजे मीटिंग होती थी. अभी उस में आधा घंटा बाकी था. मैं तो बस जल्दी से जल्दी उस से दूर जाना चाहती थी.

‘‘चलो चलतेचलते बात करते हैं,’’ उस ने आगे बढ़ते हुए कहा.

‘‘तो तुम किस कंपनी में काम करती हो?’’ लिफ्ट में उस ने फिर से बात शुरू की.

‘‘द न्यूज ग्रुप में.’’

‘‘तो तुम टीवी पर आती हो?’’ उस ने आंखें बड़ी कर के पूछा. मुझे मन ही मन हंसी आ गई. पता नहीं क्यों सब को ऐसा लगता है कि न्यूज चैनल में काम करने वाले सभी लोग टीवी पर आते हैं.

‘‘नहीं, मैं अभी डैस्क पर काम करती हूं.’’ मैं ने उस की तरफ देखे बिना कहा.

मैं बेसब्री से अपना फ्लोर आने का इंतजार कर रही थी. लिफ्ट खुलते ही जल्दी से उसे ‘बाय’ कह कर मैं बाहर निकल गई. ऐसा नहीं था कि मैं उस से चिढ़ती थी, बल्कि एक वक्त तो ऐसा था जब मैं उस से मिलने, बात करने के लिए घंटों इंतजार करती थी. मेरी जिंदगी में उस के अलावा और कुछ नहीं था. दूसरे शब्दों में कहूं तो वही मेरी जिंदगी था.

विवान मेरा ऐक्स बौयफ्रैंड है. हम इंजीनियरिंग में एक ही क्लास में थे और उन 4 साल के बाद भी हम साथ थे. लेकिन धीरेधीरे सब फीका पड़ गया. मुझे लगने लगा कि मैं अकेली ही इस रिश्ते को संवारने में लगी हूं. उस वक्त विवान ने मुझे काफी हद तक बदल दिया था और एक बार मैं डिप्रैशन में चली गई थी. तब मैं ने निश्चय किया कि अब मुझे इस रिश्ते से बाहर आने की जरूरत है और हम अलग हो गए.

आज हम 2 साल बाद मिले थे. मेरे लिए आगे बढ़ना आसान नहीं था. लेकिन मैं ने कोशिश की और आज मुझे खुद पर गर्व था कि मैं ऐसा कर पाई. लेकिन आज जब मैं ने उसे इतने वक्त बाद देखा तो ऐसा लगा जैसे कुछ देर के लिए मेरा दिल धड़कना भूल गया हो.

औफिस में आई तो देखा कि वह लगभग खाली था. वैसे तो किसी न्यूज चैनल का औफिस कभी भी बिलकुल खाली नहीं होता पर सुबह की शिफ्ट के लोग 10 बजने पर ही आते थे. अपने लिए कौफी ले कर मैं कुरसी पर बैठ गई. दिमाग में फिर वही पुरानी बातें घूमने लगीं…

‘‘क्या हम हमेशा ऐसे दोस्त ही रहेंगे?’’ उस ने पूछा था.

‘‘हां, क्यों? क्या तुम नहीं चाहते?’’ मैं जानती थी कि उस के मन में क्या चल रहा था पर मैं उस के मुंह से सुनना चाहती थी.

‘‘नहीं, मेरा मतलब है कि कभी उस से ज्यादा नहीं?’’ उस ने झिझकते हुए कहा.

‘‘तुम क्या चाहते हो?’’ मैं ने पूछा.

‘‘तुम जानती हो कि मैं क्या चाहता हूं पर मैं  कभी तुम्हें प्रपोज नहीं कर पाऊंगा,’’ वह कुछ ज्यादा ही अंतर्मुखी था. लेकिन मैं भी वही चाहती थी, इसलिए मैं ने ही प्रपोज करने की रस्म पूरी कर डाली. बचपन से ही मुंहफट जो थी.

खैर, वक्त के साथ हम एकदूसरे के आदी हो गए. कालेज में तो 8 घंटे साथ रहते ही थे, आतेजाते भी साथ थे. इस के अलावा मोबाइल पर सारा दिन मैसेज होते रहते थे. कहते हैं, कभीकभी रिश्तों में ज्यादा नजदीकियां भी घातक हो जाती हैं. हम शायद जरूरत से ज्यादा ही साथ रहते थे. धीरेधीरे झगड़े बढ़ने लगे. वह मेरे लिए कुछ ज्यादा ही पजैसिव था.

‘‘वह लड़का तुम्हारी तरफ देख कर मुसकरा क्यों रहा है?’’ वह पूछता.

‘‘मुझे क्या पता,’’ मैं हैरान हो कर कहती.

‘‘मुझे बताओ तुम जानती हो उसे?’’ वह गुस्से से पूछता.

‘‘अरे हद है. मैं थोड़े ही देख रही हूं उसे. वह देख रहा है. पृछ लो जा कर उस से,’’ मैं तुनक कर कहती तो वह मुंह फुला कर चुप बैठ जाता.

मेरी जिंदगी मेरी रही ही नहीं थी और मुझे एहसास भी नहीं हुआ था कि कब और कैसे मैं उसे खुश करने के लिए अपनी जिंदगी से इनसानों और चीजों को बाहर निकालने लगी थी. मेरे जितने भी दोस्त लड़के थे, उन से तो बात करना छुड़वा ही दिया था, उस पर मजेदार बात यह थी कि जब मैं लड़कियों से बात करती तब भी न जाने क्यों उसे चिढ़ होती. इस तरह मैं एक कवच में चली गई. किसी से कोई मेलजोल नहीं, कोई बात नहीं. उस ने मेरे लिए कुछ नहीं छोड़ा था. न दोस्त, न जिम, न बाइक राइड्स.

जब वह इन सब में व्यस्त होता तब मैं अकेली बैठी यही सोचती रहती कि मैं क्या कर रही हूं खुद के साथ? मेरा आत्मविश्वास बिलकुल गिर चुका था. बहुत से लोगों के सामने बोलने में मुझे हिचक होती थी. शुरुआत में जब मैं क्लास में भी सब के सामने बोलती तो वह टोक देता. उसे लगता कि मैं ऐसा लोगों का ध्यान खींचने के लिए करती हूं.

उस की ऐसी बातें मुझ में खीज पैदा करने लगीं और मैं उस का विरोध करने लगी. बस वही वक्त था, जब हमारे बीच दूरियां बढ़ने लगीं. मैं ने उस के जासूसी भरे सवालों का जवाब देना बंद कर दिया. उसे अपना फोन चैक करने के लिए भी रोकने लगी. मुझे कभी समझ नहीं आया कि लोग रिश्तों में हमेशा शंकित क्यों रहते हैं. अगर कोई आप से प्यार करता है, तो वह आप के साथ धोखा करेगा ही नहीं और यदि वह धोखा करता है तो इस का मतलब वह आप के प्यार के काबिल ही नहीं था. यह बात विवान को कभी समझ नहीं आई और इसी चीज ने हमें अलग कर दिया.

अगले 2-3 दिन तक मैं औफिस आतेजाते इधरउधर देखती रहती कि कहीं वह है तो नहीं. पता नहीं उस से बचने के लिए या फिर उसे एक बार फिर से देखने के लिए. ठीक 1 हफ्ते के बाद फिर से सुबह के वक्त वह पार्किंग में मुझ से मिला.

‘‘गुड मौर्निंग,’’ उस ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘गुड मौर्निंग,’’ मैं ने नजरें चुराते हुए कहा.

‘‘मुझे देर हो रही है,’’ कह कर मैं चलने लगी.

‘‘सुनो प्लाक्षा…पाशी सुनो,’’ उस ने पीछे से पुकारा तो मेरे कदम रुक गए. आज मुझे सच में देर हो रही थी, लेकिन उस के मुंह से पाशी सुन कर मेरे कदम आगे बढ़ ही नहीं पाए.

‘‘मुझे तुम से कुछ बात करनी है,’’ वह पास आ कर बोला.

‘‘बाद में विवान, अभी मुझे सच में बहुत देर हो रही है,’’ मैं ने जल्दी से कहा.

‘‘ओके, ओके. शाम को कब फ्री होगी?’’ उस ने पूछा.

‘‘6 बजे,’’ मैं ने धीमी आवाज में कहा.

‘‘ठीक है, फिर डिनर साथ में करते हैं.’’

‘‘पर.’’

‘‘कोई परवर नहीं. मुझे शाम को यहीं मिलना. मैं इंतजार करूंगा,’’ उस ने दृढ़ स्वर में कहा.

मैं ने चुपचाप सिर हिला दिया और खड़ी रही.

‘‘अरे अब खड़ी क्यों हो? देर नहीं हो रही?’’ उस ने हलकी सी मुसकान के साथ कहा. मैं चल दी यह सोचते हुए कि अब भी क्यों मैं उस के सामने इतनी कमजोर हूं? क्या मैं अब भी उस से..? नहींनहीं, फिर से नहीं… मैं ने अपना सिर झटक दिया.

सिर झटकने से विचार नहीं रुके. पूरा दिन मैं उसी के बारे में सोचती रही. क्यों मिलना चाहता है मुझ से? क्या बात करनी होगी? क्या वह भी मुझ से? नहींनहीं… इसी पसोपेश में सारा दिन निकल गया. शाम को मैं जानबूझ कर 6 बजने के बाद भी औफिसमें बैठी रही. सवा 6 बजे शिखा ने चलने के लिए कहा तो उस को जाने को कह कर खुद बैठी रही. जब साढ़े 6 बजे तो सोचने लगी कि जाऊं? घर जाने के लिए तो निकलना ही पड़ेगा और यह भी तो हो सकता है वह अभी तक इंतजार ही न कर रहा हो. अगर कर भी रहा हो तो कोई जबरदस्ती थोड़े ही है, मना कर दूंगी. खुद को यही समझातेसमझाते मैं नीचे तक चली आई. वह वहीं था. इंतजार कर रहा था.

‘‘क्या हुआ, क्यों देर हो गई?’’ उस ने पूछा.

‘‘काम ज्यादा था इसलिए…’’ मैं इतना ही कह पाई.

‘‘ओके. कोई बात नहीं, चलें?’’ यह कह कर वह अपनी गाड़ी की तरफ चलने लगा.

मेरे मुंह से चूं तक नहीं निकली. शायद मैं भी उस के साथ जाना चाहती थी. रास्ते में मैं पूरे वक्त खिड़की से बाहर ही देखती रही. उस की नजरें मुझे अपने चेहरे पर महसूस हो रही थीं, लेकिन मैं ने उस की ओर नहीं देखा.

‘‘क्या लोगी?’’ रैस्टोरैंट में मेन्यू बढ़ाते हुए उस ने पूछा.

‘‘कुछ भी…तुम देख लो,’’ मैं ने बिना मेन्यू देखे कहा. बैरे को और्डर देने के बाद हम चुपचाप खाने का इंतजार करने लगे. जब काफी देर तक वह कुछ नहीं बोला तो मैं ने ही चुप्पी तोड़ी.

‘‘क्या बात करनी है विवान? क्यों ले कर आए हो मुझे यहां?’’

‘‘मुझे तुम्हारी एक मदद चाहिए,’’ वह झिझकते हुए बोला.

‘‘कैसी मदद?’’

‘‘तुम मेरे मम्मीपापा से मिल सकती हो?’’ वह बोला.

‘‘क्या? पर क्यों? मुझे नहीं लगता कि वे मुझे जानते हैं,’’ मैं ने असमंजस में कहा.

‘‘यार देखो मुझे समझ में नहीं आ रहा कि मैं तुम्हें कैसे समझाऊं,’’ वह अचानक परेशान नजर आने लगा.

‘‘बोलो क्या बात है?’’

‘‘वे मेरी शादी के पीछे पड़े हैं. मैं अभी शादी नहीं कर सकता.’’

‘‘तो तुम मुझ से क्या चाहते हो?’’ मैं ने हैरानी से पूछा.

‘‘मैं चाहता हूं कि तुम उन से मेरी गर्लफ्रैंड की तरह मिलो. मैं उन से कहने वाला हूं कि तुम अभी 6 महीने शादी नहीं कर सकतीं और मैं सिर्फ और सिर्फ तुम से शादी करूंगा,’’ वह समझाते हुए बोला.

‘‘तुम पागल हो गए हो? मैं ऐसा क्यों करूंगी? और तुम ऐसा क्यों कर रहे हो? कभी न कभी किसी न किसी से तो शादी करनी है न. प्रौब्लम क्या है?’’ मैं ने तीखे स्वर में पूछा.

‘‘प्लाक्षा, तुम करोगी या नहीं?’’

‘‘नहीं, और जब तक तुम कारण नहीं बताते तब तक तो बिलकुल भी नहीं.’’ वह कुछ देर तक चुपचाप मेरी तरफ देखता रहा. खाना आ चुका था. हम बिना कुछ बोले खाना खाने लगे.

‘‘प्लाक्षा, तुम सच में मेरी मदद नहीं करोगी?’’ खामोशी तोड़ कर उस ने कहा.

‘‘तुम मुझे कारण भी नहीं बता रहे हो, विवान. क्या उम्मीद करते हो मुझ से? और मैं तुम्हारे लिए कुछ भी क्यों करूंगी? इतना सब होने के बाद भी?’’ मेरी आवाज में चिढ़ थी. पता नहीं क्यों हर कोई मुझ से इतनी उम्मीदें रखता है. कभीकभी लगता है कि इनसान को इतना भी कमजोर नहीं होना चाहिए कि सब उस का फायदा ही उठाते रहें.

मेरा घर आ चुका था. ‘‘डिनर के लिए थैंक्स,’’ कह कर मैं कार का दरवाजा खोलने लगी.

‘‘प्लाक्षा सुनो, रुको.’’ मैं रुक गई.

‘‘प्लीज मेरी हैल्प कर दो. मैं तुम्हें सब कुछ बताता हूं.’’ उस के बाद उस ने जो कहानी बताई वह कुछ इस तरह थी-

उस की एक गर्लफ्रैंड थी, साक्षी. उसे कंपनी की तरफ से अमेरिका जाने का मौका मिला था और वह 6 महीने से पहले वापस नहीं आ सकती थी. विवान उसी से शादी करना चाहता था और मुझे उस के घर वालों से साक्षी बन कर मिलना था. उस के घर वाले उस पर शादी का बहुत ज्यादा दबाव बना रहे थे और उसे इस के अलावा कोई और विकल्प नहीं दिख रहा था.

‘‘पर मैं ही क्यों विवान? तुम तो किसी भी लड़की को ले जा सकते हो,’’ मैं ने उस से कहा.

‘‘एक तो और कोई है ही नहीं. फिर कोई लड़की सच में गले पड़ गई तो?’’

‘‘अच्छा. और मैं ने ऐसा कुछ किया तो?’’

‘‘नहीं करोगी. मुझे विश्वास है तुम पर.’’

मैं व्यंग्य से हंस पड़ी. ‘‘तुम्हें मुझ पर विश्वास है? अच्छा लगा सुन कर.’’

वह असहज हो गया. कुछ देर की शांति के बाद बोला, ‘‘तो तुम करोगी?’’

‘‘सोच कर बताऊंगी,’’ कह कर मैं कार से उतर गई. मुझे पता था उस की नजरें मेरा पीछा कर रही थीं पर मैं ने मुड़ कर नहीं देखा.

सारी रात उस की बातें मेरे दिमाग में घूमती रहीं. कितनी कोशिश की थी मैं ने उन सब बातों और यादों से खुद को दूर रखने की, लेकिन आज जब फिर से वह मेरे सामने खड़ा था तो खुद को कमजोर ही पा रही थी मैं. मुझे ब्रेकअप के कुछ महीने बाद उस से हुई आखिरी मुलाकात याद आ गई.

‘‘तुम्हें मेरी याद आती है?’’ मैं ने उस से पूछा था.

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं,’’ वह मेरी ओर देखे बिना बोला था. फिर पूरे वक्त वह अपनी जौब, कुलीग्स, घूमनेफिरने की ही बातें करता रहा. हालांकि मैं ने ही उसे मिलने के लिए बुलाया था, लेकिन मैं बिलकुल खामोश थी. बस, अलविदा कहते वक्त उस से पूछा था, ‘‘तुम क्या चाहते हो विवान मुझ से?’’

‘‘मतलब?’’ उस ने अचकचा कर पूछा.

‘‘हमारा ब्रेकअप हो चुका है न. फिर भी तुम जबतब मुझ से बात करने लगते हो और जब मैं बात करना चाहूं तो मुझे झिड़क देते हो. क्या चाहते हो? फिर से रिलेशनशिप में आना या फिर सच में बे्रकअप?’’ मैं ने उस से पूछा, क्योंकि पिछले कुछ महीनों से बहुत टैंशन में थी मैं. वह न तो मुझे खुद से जुड़े रहने देता और न ही पूरी तरह अलग करना चाहता था.

‘‘देखो, अब हम साथ तो नहीं रह सकते,’’ इतना ही बोला उस ने.

‘‘तो फिर मुझ से बात करना बिलकुल बंद कर दो. मुझे अकेला छोड़ दो. यह औनऔफ मुझ से बरदाश्त नहीं होता,’’ रो पड़ी थी मैं.

उस के बाद से अकेली ही थी मैं. कमजोर थी इसलिए कई लोगों ने भावनात्मक रूप से फायदा उठाने की कोशिश भी की. पर इन सब चीजों ने मुझे और मजबूत बना दिया. लोगों की थोड़ीबहुत पहचान भी मैं करने लगी थी अब. किसी पर आसानी से विश्वास नहीं करती थी. कुल मिला कर अपनी छोटी सी दुनिया में खुद को बचाए किसी तरह चैन से जी रही थी मैं. पर अब फिर से… नहीं. मैं अब किसी को अपनी अच्छाई का फायदा नहीं उठाने दूंगी. मैं मदद करूंगी लेकिन एक शर्त पर.

हम अगली बार एक कौफी शौप में बैठे थे. मेरे ‘हां’ कहने पर विवान बहुत खुश था. लेकिन मेरी शर्त की बात सुन कर वह थोड़ा परेशान हो गया.

‘‘क्या?’’ उस ने पूछा तो मैं ने कौफी पीते हुए कहा, ‘‘वह तुम्हें 6 महीने बाद बताऊंगी.’’

‘‘अरे, प्लीज बताओ न, तुम्हें पता है मुझे सस्पैंस बिलकुल पसंद नहीं है,’’ वह मेरा हाथ पकड़ कर जिद करने लगा. मैं ने झटके से अपना हाथ छुड़ा लिया. उस की छुअन से अब भी…नहींनहीं, फिर से नहीं.

‘‘सौरी,’’ वह डरते हुए बोला, ‘‘बताओ न प्लीज.’’

‘‘विवान, तुम चाहते हो न कि मैं तुम्हारी हैल्प करूं?’’ मैं ने तल्ख स्वर में पूछा. ‘‘हां, लेकिन…’’ उस की बात पूरी होने से पहले ही मैं बोली, ‘‘बस तो फिर अब कुछ काम मेरी पसंद के भी करो और मुझे बताओ कि कब कैसे क्या करना है.’’

‘‘अगले दिन हम दोनों उस के घर के ड्राइंगरूम में बैठे थे. मैं उस के कहे अनुसार सलवारकमीज में थी और हमेशा की तरह उस ने असहज महसूस कर रही थी. उस में मम्मीपापा सामने बैठे मुझे ऊपर से नीचे तक देख रहे थे.  -क्रमश:

#lockdown: घर पर इन 4 Steps से करें हेयर स्पा, पाएं स्मूथ एण्ड शाइनी बाल

भई सुंदरता की बात हो और बालों का ज़िक्र न हो ये तो पॉसिबल ही नहीं है. फ्रेंड्स आपको पता ही होगा कि बालों की खूबसूरती बनाए रखने के लिए हेयर स्पा कितना जरूरी है. लेकिन, लॉकडाउन की वजह से अब आप पार्लर तो जा नहीं सकती, इसलिए इस आर्टिकल में हम  बताएंगे कि कैसे आप घर पर ही बड़ी आसानी से हेयर स्पा कर सकती हैं. दूसरी बात ये भी है कि पार्लर में हेयर स्पा करवाने पर आपको एक अच्छा –खासा अमाउंट भी पे करना पड़ता है, जो अब बच जाएगा.

पहला स्टेप

सबसे पहले बालों की लेंथ के अनुसार एक कटोरी में कोकोनॉट ऑयल लें अब इसमें चार से पांच बूंद टी ट्री ऑयल मिला दें. इसके बाद इस तेल को हल्का गर्म करें और इससे अपने स्कैल्प की अच्छे से 10 मिनट तक मसाज करें साथ ही बाकी बचे हुए तेल को अपने बालों की लेंथ पर लगाएं. तेल अप्लाई करने से पहले याद रखें कि आपके बाल साफ हों अगर नहीं, तो पहले शैंपू कर लें. दोस्तों, नारियल का तेल हमारे बालों को नरिस करता है, स्ट्रांग बनाता है और हेयर ग्रोथ बढ़ाने में भी हेल्प करता है. वहीं टी ट्री ऑयल हमारी बालों की सारी प्रौबल्म को दूर करता है, हमारे स्कैल्प को हेल्दी रखता है.

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दूसरा स्टेप

आयलिंग के बाद अब बारी है स्टीम लेने की, इसके लिए पहले पानी गर्म कर लें और इसमें साफ तौलिया डालें अब तौलिए को बाहर निकालकर एक्स्ट्रा पानी निचोड़ लें. इसे अपने सिर में 5 से 10 मिनट तक लपेट कर रखें.

तीसरा स्टेप

स्टीम लेने के बाद बारी आती है मास्क की. मास्क बनाने के लिए एक कटोरी में दही लें और उसमें तीन से चार चम्मच शहद डालकर अच्छे से मिलाएं. इस पेस्ट को लगाने के लिए बालों के कई सेक्शन बनाएं. दही हमारे बालों को सिल्की बनाता है. साथ ही इसमें विटमिन डी होता है और डैंडर्फ के लिए तो यह रामबाढ़ है. शहद की बात करें तो इसमें एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है जो हमारे बालों को ब्रेकेज के प्रॉब्लम से बचाता है. मास्क लगाने के बाद हल्के हाथों से मसाज करें जूड़ा बना लें, इसके बाद सिर को पॉलिथीन से कवर कर लें और बाद 30 मिनट के लिए छोड़ दें.

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चौथा स्टेप

अब बालों में शैंपू कर लें और कंडीशनर लगा लें, ध्यान रखें कंडीशनर 3 मिनट से ज्यादा देर तक अपने बालों में नहीं छोड़ना चाहिए. अब बालों को नॉर्मल सूखने दें, जब बाल सूख जाएं तो एलोवेरा जेल को हेयर सीरम की तरह लगाएं. बस हो गया आपका हेयरस्पा.

फिर से नहीं: भाग-3

अब तक आप ने पढ़ा:

वादे के अनुसार प्लाक्षा ने विवान के घर जा कर उस के मातापिता को 6 महीने बाद शादी के लिए राजी कर लिया. विवान बहुत खुश था. उधर प्लाक्षा के मातापिता भी उस पर शादी के लिए दबाव बनाने लगे थे. शादी से कुछ समय बचने के लिए प्लाक्षा ने अब विवान से वही सब नाटक करने को कहा, जो विवान ने कुछ दिनों पहले प्लाक्षा से कराया था.

– अब आगे पढ़ें:

 

विवान बुरी तरह घबरा रहा था. मैं ने माहौल को हलका करने की कोशिश की, ‘‘पापा, बैड मैनर्स. लड़कियों से उन की उम्र और लड़कों से उन की सैलरी नहीं पूछते,’’ सभी हंसने लगे. विवान के चेहरे पर भी हलकी सी मुसकान आ गई.

मम्मी ने बात आगे बढ़ाई, ‘‘बेटा, पैसेवैसे की तो कोई बात नहीं है. प्लाक्षा भी ठीकठाक कमा लेती है और तुम भी अच्छीखासी जौब कर रहे हो. यह बताओ कि प्लाक्षा के साथ ऐडजस्ट तो कर पाओगे न?’’

‘‘जी आंटी…’’ विवान ने हकलाते हुए कहा.

‘‘देखो बेटा, तुम तो इसे इतने सालों से जानते हो. यह भी जानते होगे कि यह कितनी स्पष्टवादी है, जो इसे अच्छा लगता है वह भी और जो नहीं लगता वह भी, बताने में देर नहीं करती. इस के इसी स्वभाव के कारण कम ही लोग इस के साथ ऐडजस्ट कर पाते हैं,’’ मम्मा ने कहा.

‘‘आंटी, मैं प्लाक्षा को कई सालों से जानता हूं. सब से बड़ी बात जो मैं इस के बारे में कह सकता हूं वह यह है कि मुझे इस के जैसा कोई आज तक नहीं मिला. चाहे जितनी मुंहफट हो पर दिल की साफ है. मैं यह तो नहीं कह सकता कि हम कभी झगड़ेंगे नहीं, क्योंकि इनसान सिर्फ मीठा खा कर तो जिंदा रह नहीं सकता. मैं इतना वादा जरूर कर सकता हूं कि इसे पूरी तरह समझने की कोशिश करूंगा.’’

यह विवान कह रहा था? वह इतनी परिपक्व बातें भी कर सकता है? वह मेरे बारे में सकारात्मक बातें बोल रहा था. क्या वह अब भी मुझ से…? नहींनहीं, वह सिर्फ ऐक्टिंग कर रहा होगा.

‘‘तो कैसा रहा?’’ घर से बाहर आते हुए विवान ने पूछा. मम्मीपापा उस से बहुत खुश नजर आ रहे थे.

‘‘तुम तो बहुत बड़े ऐक्टर निकले. क्या बड़ेबड़े डायलौग मार रहे थे. मम्मीपापा तो बहुत इंप्रैस हो गए तुम से. कहीं सच में हमारी शादी न  करा दें,’’ मैं ने हंसते हुए कहा.

‘‘और अगर मैं कहूं कि वह ऐक्टिंग नहीं थी. वे डायलौग नहीं बल्कि मेरे दिल के जज्बात थे, तो?’’ वह मेरी आंखों में झांकते हुए बोला. पहले कभी वह मेरी आंखों में आंखें डाल कर बात नहीं करता था. उसे शर्म आती थी. आजकल न जाने उसे क्या हो गया था. उस की ये नजरें मेरे अंदर तूफान पैदा कर देती थीं. लगता था जैसे कहीं दबी भावनाएं फिर से सिर उठाने लगी हों. मैं बिलकुल ठहर सी जाती थी.

‘‘मजाक कर रहा हूं. ऐक्टर तो मैं बचपन से ही हूं. बस कोई आज तक मेरा टेलैंट समझ ही नहीं पाया. एक तुम ही हो मेरी सच्ची पारखी,’’ वह शरारती अंदाज में बोला.

उस की धूल उड़ाती कार को देखते हुए मेरे मन में फिर से वही उथलपुथल शुरू हो गई. क्या हम दोनों सिर्फ अपनेअपने स्वार्थ के लिए एकदूसरे का इस्तेमाल कर रहे हैं या फिर अब भी हमारे बीच कुछ है? उस का तो मुझे नहीं पता, लेकिन मेरे मन में अब भी उसे देख कर कुछकुछ होने लगता था. जब भी वह पास आता था तो खुद को संभालना बहुत मुश्किल हो जाता था. मैं अब भी उस से…? नहींनहीं, फिर से नहीं.

आंखों से ढलके आंसू पोंछते हुए मैं वापस अंदर आ गई. विवान वापस दिल्ली चला गया था. मैं अभी 2 दिन और जयपुर में ही थी. सोचा इसी बहाने कुछ पुराने दोस्तों से भी मिलना हो जाएगा. आदित्य मेरा कालेज के दिनों से दोस्त था. विवान के साथ रिश्ते की शुरुआत करने पर जिन दोस्तों का साथ छूटा था, आदित्य भी उन में से एक था. एक डेढ़ साल पहले हम ने फिर से बात करना शुरू किया था. दोस्ती में कुछ वक्त का अंतराल जरूर आया था, लेकिन दूरी नहीं. हम अब भी अच्छे दोस्त थे.

शाम के वक्त हम दोनों एक मौल में बैठे थे. वह बता रहा था कि उस की शादी पक्की हो गई.

‘‘अच्छा कब चढ़ रहा है सूली पर?’’ मैं ने उसे छेड़ते हुए पूछा था.

वह शरमा गया था, ‘‘अरे, अभी तो सगाई भी नहीं हुई. सिर्फ रिश्ता पक्का हुआ है.’’

‘‘अच्छा जी. तो कब है सगाई?’’

‘‘अगले महीने और तुझे आना है,’’ वह हक से बोला.

‘‘तू नहीं बुलाएगा तब भी आऊंगी. आ कर यह हंगामा भी तो करना है कि मेरे आदित्य को छीन लिया मुझ से…’’ मैं ने उस की टांग खींचते हुए कहा. वह हंसने लगा.

‘‘अच्छा नाम तो बता दे हमारी होने वाली भाभी का,’’ मैं आज उसे इतनी आसानी से नहीं छोड़ने वाली थी. वैसे भी उस की टांग खींचने में बड़ा मजा आता था. वह भी हंस कर साथ देता रहता.

‘‘अरे नाम क्या, तू फोटो देख उस का. तू कहे तो बात भी करा दूं,’’ उस ने फोन निकालते हुए कहा.

‘‘अब तू बस नाम बता और फोटो दिखा. अभीअभी शादी पक्की हुई है तेरी, क्यों तुड़वाने पर तुला है?’’

उस ने हंस कर मोबाइल स्क्रीन मेरे सामने कर दी, ‘‘ये देख, नाम साक्षी है. अपनी ही तरह इंजीनियर है. दिल्ली में जौब करती है.’’

फोटो देखते ही मेरा मुंह लटक गया. यह वही साक्षी थी जिस का फोटो मुझे विवान ने दिखाया था. यह तो विवान की गर्लफ्रैंड थी फिर आदित्य से कैसे…?

‘‘तुम…तुम इस से मिले हो?’’ मैं ने पूछा.

‘‘कल ही मिला. वैसे बात तो काफी पहले से चल रही थी, लेकिन कल ही यह जयपुर आई थी,’’ उस ने जवाब दिया.

क्या मुझे इसे कुछ बताना चाहिए? नहीं, पहले मुझे विवान से बात करनी होगी. क्या ऐसा कुछ था जो वह मुझ से छिपा रहा था? मैं सोच रही थी.

‘‘क्या हुआ प्लाक्षा, कुछ परेशानी है?’’ आदित्य ने मेरा हाथ थपथपाते हुए पूछा.

‘‘नहीं, कुछ नहीं बहुत देर हो गई. घर चलना चाहिए,’’ मैं ने उठते हुए कहा.

कार में बैठते ही सब से पहले मैं ने विवान को फोन लगाया. फोन उठाते ही वह बोला, ‘‘हां प्लाक्षा, क्या हुआ बोलो?’’

‘‘विवान मुझे तुम से कुछ जरूरी बात करनी है,’’ मैं ने अपनी आवाज संयमित रखते हुए कहा.

‘‘हां बोलो न.’’

‘‘अभी फोन पर नहीं. कल सुबह मैं दिल्ली आ रही हूं. तब तुम मुझ से मिलो.’’

‘‘सुबहसुबह तो कहीं आना मुश्किल है, क्योंकि औफिस जाना है. तुम एक काम करना, लंच टाइम में औफिस ही आ जाना. तब बात कर लेंगे,’’ उस ने कहा.

‘‘ठीक है,’’ कह कर मैं ने फोन रख दिया.

फिर पता ही नहीं चला कि वहां से घर तक का रास्ता कैसे तय किया. कब मैं मम्मापापा और भाई के साथ बैठ कर टीवी देख रही थी और कब हम ने डिनर किया. वे थोड़े नाराज थे कि मैं एक दिन पहले ही वापस जा रही थी, लेकिन मैं ने औफिस का जरूरी काम है कह कर उन्हें मना लिया. सुबह जल्दी उठाना था इसलिए बिस्तर पर भी जल्दी आ गई, लेकिन आंखों से नींद गायब थी. रात भर बस करवटें बदलती रही.

लंच होने में अभी 10 मिनट बाकी थे. मैं वेटिंग रूम में बैठ कर औफिस की सजावट देख कर टाइम पास कर रही थी. रिसैप्शन के पीछे एक बहुत ही खूबसूरत पेंटिंग लगी हुई थी. हमारा औफिस तो इस की तुलना में कुछ भी नहीं था. कुछ ही देर में हलचल शुरू हो गई. कुछ लोग कैंटीन की तरफ जा रहे थे, तो कुछ बाहर निकल रहे थे. मेरी नजर उन में विवान को ढूंढ़ रही थी. तभी मेरी नजर एक लड़की पर पड़ी. मुझे लगा मैं ने उसे कहीं देखा है. कहीं यह साक्षी तो नहीं? यह भी मेरे दिमाग में आया. मैं उठ कर उस की तरफ गई.

‘‘ऐक्सक्यूज मी,’’ मैं ने उस का कंधा थपथपाते हुए कहा.

‘‘यस,’’ वह साक्षी ही थी.

‘‘आर यू साक्षी?’’

‘‘यस. आप?’’ वह हैरानी से मुझे देखने लगी.

‘‘आप विवान को जानती हो?’’ उसे सीधे अपना परिचय देना मैं ने ठीक नहीं समझा.

‘‘विवान… यस. ही इज माई फ्रैंड. आप मुझे कैसे जानती हो?’’

‘‘मैं प्लाक्षा…विवान की फ्रैंड. उसी ने मुझे आप के बारे में बताया था.’’ हम दोनों ने हाथ मिलाया.

अब उस के चेहरे पर मुसकान थी, ‘‘ओह प्लाक्षा. विवान बहुत बात करता है तुम्हारे बारे में.’’

विवान मेरे बारे में बात करता है सच में?

‘‘प्लाक्षा….साक्षी…ओह…हाय प्लाक्षा, ये साक्षी है. तुम्हें बताया था न,’’ विवान आ गया था.

‘‘हां, हम मिल चुके हैं,’’ साक्षी ने कहा.

उन दोनों के बीच पल भर को आंखोंआंखों में कुछ बात हुई. फिर विवान ने मुझ से मुखातिब हो कर कहा, ‘‘कैंटीन में चलें? वहीं बैठ कर बात करते हैं,’’ साक्षी से बाय कह कर हम दोनों कैंटीन की तरफ चल पड़े.

‘‘क्या लोगी?’’ विवान ने बैठते हुए पूछा. मैं ने कुछ भी लेने से इनकार कर दिया.

‘‘अरे कुछ तो खा लो. मुझे पता है तुम ने सुबह से कुछ नहीं खाया. स्टेशन से सीधी यहीं आई हो,’’ उस ने डांटते हुए कहा.

‘‘प्लीज विवान…तुम ने मुझे बताया क्यों नहीं कि साक्षी वापस आ गई है? तुम तो ऐसे शो कर रहे हो जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो,’’ मेरी आवाज सुन कर कुछ लोग हमारी तरफ देखने लगे.

‘‘प्लाक्षा प्लीज धीरे बोलो. सब हमारी तरफ देख रहे हैं,’’ उस ने इधरउधर देखते हुए कहा,  ‘‘पहले तुम कुछ खा लो फिर तुम जो जानना चाहती हो मैं तुम्हें बताऊंगा, ठीक है?’’ मैं ने कोई जवाब नहीं दिया.

मैं सच में बहुत भूखी और थकी हुई थी, इसी कारण चिड़चिड़ी भी हो रही थी और फिर अचानक साक्षी को देख लिया तो दिमाग बिलकुल खराब हो गया. उसी के बारे में तो बात करने मैं यहां आई थी. मैं ने खाना खाते वक्त विवान से यह कह भी दिया.

‘‘क्या बात करने आई थीं?’’ उस ने हैरानी से पूछा.

‘‘पहले तुम मुझे बताओ कि वह यहां क्या कर रही है? वह तो 4 महीने बाद आने वाली थी न. इतनी जल्दी कैसे आ गई?’’ मैं ने पूछा.

‘‘तुम ने मुझे बताया क्यों नहीं?’’ मैं इस बात पर अभी चिढ़ी हुई थी. कभीकभी मैं भूल जाती थी कि अब मेरा विवान पर वह हक नहीं था.

वह सहम गया, ‘‘तुम जयपुर में थीं प्लाक्षा. मैं ने सोचा कि जब वापस आओगी तब बता दूंगा.’’

‘‘उसे पता था तुम जयपुर में मेरे साथ थे?’’ मैं ने पूछा, ‘‘1 मिनट रुको, वह भी जयपुर तुम्हारे साथ ही आई थी न?’’

‘‘हां, पर तुम्हें कैसे पता?’’ विवान मेरी बात सुन कर असमंजस में पड़ गया.

‘‘तुम ने फिर भी मुझे नहीं बताया. विवान तुम ऐसा कैसे…?’’ मेरा दिमाग अब गुस्से से फट रहा था.

‘‘प्लाक्षा, उस वक्त तुम्हारी प्रौब्लम ज्यादा जरूरी थी. तुम वैसे ही इतनी परेशान थीं. तुम्हें कुछ भी बताना ठीक नहीं लगा.’’

उस की बात सुन कर भी मेरा पारा नहीं उतरा, ‘‘ओह हां, तुम्हारी गर्लफ्रैंड का किसी और के साथ रिश्ता हो रहा है और तुम किसी और की बड़ी प्रौब्लम को सौल्व करने में लगे थे. एक बात बताओ विवान, क्या मैं तुम्हें बेवकूफ लगती हूं या फिर तुम कुछ ज्यादा ही सीधे हो?’’ हर एक बात के साथ मेरा स्वर ऊंचा होता जा रहा था.

विवान मेरी बात से भौचक्का रह गया. अब उस का दिमाग भी गरम होने लगा था, ‘‘इतनी बड़ी क्या बात हो गई यार? तुम मेरी बीवी नहीं हो जो मैं तुम्हें हर बात बताऊं और अब तो मेरी गर्लफ्रैंड भी नहीं हो. मेरी पर्सनल लाइफ में कुछ भी हो, उस से तुम्हें क्या मतलब?’’

‘‘राइट, मैं तो बस तुम्हारी भाड़े की गर्लफ्रैंड हूं. एक नौकर, जिसे तुम शायद पैसे या समयसमय पर बोनस दे कर खुश करना चाहते थे,’’ मेरा गुस्सा अब हद से बाहर हो चुका था.

‘‘प्लाक्षा, आई एम सौरी. मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था. आई एम सो सौरी,’’ उस का स्वर फिर से मीठा हो गया था. वैसे भी जब मेरा गुस्सा चरम पर होता था तो वह कुछ बोल नहीं पाता था, निरुत्तर सा हो जाता था.

‘‘नहीं विवान, तुम्हें यही कहना चाहिए था. अगर तुम ये नहीं कहते तो मुझे समझ में नहीं आता कि क्यों मुझे तुम से कभी प्यार नहीं करना चाहिए था. मुझे तुम्हारी फिक्र ही नहीं करनी चाहिए. मैं ही पागल थी जो आदित्य और साक्षी की शादी की खबर सुन कर यहां भागीभागी चली आई. मुझे लगा कि तुम्हें पता नहीं होगा. मुझे लगा कि तुम इतने सीधे हो, शायद तुम्हें पता न हो कि तुम्हारे साथ क्या हो रहा है,’’ मेरा गुस्सा अब आंसुओं में बदल गया था.

‘‘मैं ही पागल थी, जो तुम्हारी मदद करने को तैयार हो गई. यह भूल गई थी कि मेरी कितनी इज्जत है तुम्हारे मन में. सोचा शायद बदल गए हो, लेकिन तुम अब भी वैसे ही हो. हमेशा खुद को सब से ऊपर रखने वाले, अपनी गलती न मानने वाले, हमेशा दूसरों को हर बात के लिए दोषी ठहराने वाले.’’

‘‘प्लाक्षा प्लीज, सुनो तो,’’ उस ने मेरा हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन मैं ने उसे झटक दिया.

‘‘नहीं, अब और नहीं. वैसे भी अब तुम्हारी गर्लफ्रैंड वापस आ चुकी है तो तुम्हें मेरी जरूरत तो होगी नहीं. इतने दिनों में तुम ने मेरे लिए इतना कुछ किया, उस के लिए शुक्रिया और तुम्हारे भविष्य के लिए ‘औल द बैस्ट’. बस एक आखिरी एहसान कर देना मुझ पर कि अब मेरी जिंदगी में कभी वापस मत आना. वैसे तो मैं यह तुम्हारी मदद करने के बदले में मांगना चाहती थी, लेकिन वह हिसाब तो बराबर हो गया, इसलिए एहसान मांग रही हूं, गुडबाय,’’ इतना कह कर मैं कैंटीन से बाहर आ गई. विवान मुझे पीछे से पुकार रहा था.

अब रोने से क्या फायदा? जब पहले से ही पता था कि वह हमेशा दुख देता आया है, तो इस बार कुछ अलग कैसे करता? मैं सोचती रही. लेकिन उस दिन के बाद काफी दिनों तक मेरे मूड में कोई सुधार नहीं हुआ. औफिस में तो सामान्य रहती, लेकिन घर आते ही अकेलापन जैसे काटने को दौड़ता. यही एक ऐसी चीज थी जिस से मैं सब से ज्यादा डरती थी और यही वह चीज है जिस का मैं ने आज तक सब से ज्यादा सामना किया था. रोना मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं थी, लेकिन पिछले 2 सालों में ऐसा लगता था जैसे आंसू सूख गए हों. किसी भी चीज से खास फर्क नहीं पड़ता था. हालांकि इन 2 सालों में मैं ने सब से ज्यादा धोखे खाए थे, लेकिन हमेशा यह सोच कर आगे बढ़ती रही कि इन सब से मैं और ज्यादा मजबूत हो रही हूं.

आज फिर से विवान ने पुराने जख्मों को कुरेद दिया था. मैं भी बहुत बहादुर बन कर उस की बातें मानती चली गई. यह भूल गई कि मैं कभी भी भावनात्मक रूप से मजबूत हो ही नहीं सकती थी और विवान के मामले में तो यह लगभग असंभव था. खुद को भुला कर प्यार किया था उस से. इतना आसान नहीं होता एक दर्द को बारबार जीना.

उस दिन विवान के औफिस से इस तरह आने के बाद उस ने कई बार मुझ से बात करने की कोशिश की, लेकिन मैं ने कोई जवाब नहीं दिया. 1-2 बार वह मेरे औफिस भी आया, लेकिन मैं ने व्यस्त होने का बहाना बना कर मिलने से मना कर दिया. अब वह मुझ से क्यों मिलना चाहता था, उस का काम तो हो गया था? उस की गर्लफ्रैंड वापस आ चुकी थी. अब उसे मेरी कोई जरूरत नहीं थी.

मुझे नहीं पता मैं किस बात से ज्यादा नाराज थी. उस के मुझे साक्षी के आने के बारे में न बताने की वजह से या फिर साक्षी के सचमुच आ जाने से. पिछले कुछ दिनों में मुझे लगने लगा था कि हम अपने पुराने दिनों में वापस लौट गए हैं, जहां अब मेरी जगह विवान ने ले ली है. अब वह स्पैशल चीजें करता था, अब वह मुझे निहारता था, और अब वह रोमांटिक बातें करता था. पर शायद वह सब मेरा वहम था. वह जो कुछ भी कर रहा था अपने स्वार्थ के लिए कर रहा था. वह जानता था कि मैं एक ‘इमोशनल फूल’ हूं और मुझ से प्यार भरी बातें कर के कोई भी अपना काम निकलवा सकता है. इसी बात का उस ने फायदा उठाया. दुनिया के सामने चाहे मैं कितनी भी मजबूत बन लूं, थी असल में एक ‘इमोशनल फूल’ ही.

अभी मेरे सामने एक और परेशानी थी. मम्मीपापा का भी सामना करना था. उस ने झूठ तो बोल दिया था पर उस झूठ को चलाने के लिए विवान नहीं था. मैं जानती थी कि यह झूठ ज्यादा वक्त तक नहीं चलने वाला था. कभी न कभी तो इसे खत्म होना ही था. मां का जब भी फोन आता, वे विवान के बारे में जरूर पूछतीं.

‘‘हमारा ब्रेकअप हो गया है मां,’’ एक दिन हिम्मत कर के मैं ने कह ही दिया.

‘‘क्या? मजाक मत कर बेटा. यहां हम तेरी शादी की प्लानिंग कर रहे हैं और तू ऐसी बातें कर रही है. क्या हुआ बेटा? किसी बात पर झगड़ा हुआ क्या?’’ मां ने प्यार से पूछा.

‘‘नहीं मां कुछ नहीं हुआ. बस हमारा ब्रेकअप हो गया. आप अब शादी की प्लानिंग करना छोड़ दो. मुझे कोई शादीवादी नहीं करनी,’’ मैं ने सख्ती से कहा.

‘‘ऐसे कैसे नहीं करनी. मैं तेरे पापा से क्या कहूंगी? मजाक बना रखा है तू ने तो. कभी नहीं करनी, कभी करनी है, अब फिर से नहीं करनी. हम लोगों को क्यों बिना मतलब उलझा रखा है?’’ मां गुस्से में थीं जो एक गंभीर बात थी. वे अकसर शांत रहती थीं. उन्हें गुस्सा छू भी नहीं पाता था. मुझे अब खुद पर गुस्सा आ रहा था और रोना भी.

‘‘मां, मैं क्या जबरदस्ती किसी से शादी करूं?’’ अब ब्रेकअप हो गया तो कैसे करूं उस से शादी? ’’ मैं ने बेबस हो कर कहा.

मेरी आवाज सुन कर मां के स्वर में भी थोड़ी नरमी आ गई, ‘‘अच्छा तू परेशान मत हो. तेरे पापा को मैं समझा लूंगी, लेकिन तुझे मेरी एक बात माननी होगी.’’

मैं कुछ भी मानने को तैयार थी, ‘‘आप जो कहोगी मैं उसे मानने को तैयार हूं. बस शादी करने को मत कहना.’’

‘‘नहीं तुझे बस उस लड़के से मिलना होगा जो हम ने तेरे लिए पसंद किया था.’’

‘‘मां, लेकिन…’’

‘‘मैं शादी कराने को नहीं कह रही सिर्फ मिलने को कह रही हूं. हम अगले हफ्ते दिल्ली आ रहे हैं. तभी उस से मिलना होगा,’’ इतना कह कर मां ने फोन काट दिया.

मेरे मन में यह बात चल रही थी कि सब मेरी दिमागी शांति के पीछे क्यों पड़े हैं? मुझे नहीं मिलना किसी से. मुझे पता है वह पसंद नहीं आएगा. कभी भी कोई पसंद नहीं आएगा.

– क्रमश:

#coronavirus: Lockdown के दौरान महिला सुरक्षा

लेखक-डॉ दीपक कोहली

हाल ही में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री ने COVID-19 के प्रसार को रोकने के लिये देशभर में लागू लॉकडाउन के दौरान महिलाओं की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिये केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से जुड़े विभिन्न संस्थानों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस की और महिलाओं की सुरक्षा के संबंध में आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किये.

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री (Union Women and Child Development Ministe) ने  8 अप्रैल, 2020 को विभिन्न संस्थानों के साथ एक वीडियो कॉन्फ्रेंस बैठक के माध्यम से महिला सुरक्षा के लिये आवश्यक कदम उठाए जाने तथा इसके लिये विभिन्न विभागों के बीच समन्वय को बढ़ाने का निर्देश दिया.

ध्यातव्य है कि हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने COVID-19 की महामारी के दौरान महिला हिंसा की घटनाओं में वृद्धि को देखते हुए विश्व के सभी देशों से महिला सुरक्षा को प्राथमिकता देने और COVID-19 पर नियंत्रण की नीति में महिला सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आवश्यक परिवर्तन करने को कहा था.

राष्ट्रीय महिला आयोग (National Commission of Women) के अनुसार, 24 मार्च के बाद पहले हफ्ते में ही घरेलू हिंसा और सेक्सुअल असॉल्ट (Sexual Assault) के मामलों में दोगुनी वृद्धि हुई है और इस दौरान पुलिस शिथिलता के ममलों में तीन गुना वृद्धि दर्ज़ की गई है.

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, हाल के दिनों में चीन में घरेलू हिंसा की हेल्पलाइन पर शिकायतों की संख्या में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है, मलेशिया और लेबनान में पिछले वर्ष के तुलना में ऐसे मामलों में दोगुनी वृद्धि हुई है तथा इस दौरान ऑस्ट्रेलिया में घरेलू हिंसा के लिये सहायता की ऑनलाइन सर्च की संख्या पिछले पाँच वर्षों की तुलना में सर्वाधिक रही है.

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महिला उत्पीडन के मामलों पर COVID-19 का प्रभाव:

राष्ट्रीय महिला आयोग के अनुसार, हाल में फोन के माध्यम से हेल्पलाइन पर मिलने वाली शिकायतों में कमी आई है, आयोग को प्राप्त ज़्यादातर शिकायतें ईमेल द्वारा भेजी गई हैं.

विशेषज्ञों के अनुसार, लॉकडाउन के कारण घरेलू हिंसा के मामलों में अपराधी (Abuser) के हमेशा घर पर रहने के कारण महिलाएँ फोन करने या बाहर जाकर सहायता माँगने में असमर्थ रही हैं.घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत घरेलू हिंसा के मामलों में पुलिस फर्स्ट रिस्पाॅडंर (First Responder) नहीं होती बल्कि ऐसे मामलों के लिये स्थापित परामर्श केंद्र शिकायतकर्त्ता की सहायता करते हैं.परंतु लॉकडाउन के कारण इन केंद्रों का संचालन प्रभावित हुआ है, जिससे हिंसा के ऐसे मामलों में पीड़ितों की समस्या और भी गंभीर हो गई है.

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री ने अपने मंत्रालय के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे सुनिश्चित करें कि पीड़ितों को विधिक और मनोसमजिक सहायता उपलब्ध कराने वाले ‘वन स्टॉप सेंटर्स’ स्थानीय स्वास्थ्य टीम और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण से जुड़े हुए हों. जिससे लॉकडाउन  के बावज़ूद भी पीड़ितों को आसानी से ये सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सके.

उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे यह भी सुनिश्चित करें कि सभी ‘वन स्टॉप सेंटर’(One Stop Center) ‘राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान’ (National Institute of Mental Health and Neuro-Sciences or NIMHANS) से जुड़े हुये हों जिससे पूरे देश में महिलाओं की विशेष समस्याओं के लिये परामर्शदाताओं की सुविधा उपलब्ध कराई जा सके.

राज्य स्तर पर महिला सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिये राज्य-स्तर पर गैर-सरकारी संगठनों के सहयोग से डिजिटल-गवर्नेंस (Digital Governence) को बढ़ावा दिया जाना चाहिये, जिससे ऐसे मामलों में सूचना और सहायता की कोई कमी न होने पाए.

केंद्रीय मंत्री ने गैर-सरकारी संगठनों को महिलाओं में सुरक्षा की भावना को बढ़ाने के लिये एक दिन में कम-से-कम 10 महिलाओं से फोन पर बात करने का सुझाव दिया.

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका-विज्ञान संस्थान (National Institute of Mental Health and Neuro-Sciences or NIMHANS): 

NIMHANS मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान के क्षेत्र में रोगी देखभाल और अकादमिक खोज का एक बहु-विषयक संस्थान है.

वर्ष 1974 में मैसूर (कर्नाटक) सरकार द्वारा स्थापित मानसिक अस्पताल और केंद्र सरकार द्वारा स्थापित ‘अखिल भारतीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान’ को मिलाकर  NIMHANS की स्थापना की गई थी.

यह संस्थान बंगलूरु (कर्नाटक) में स्थित है.

वर्ष 1994 में केंद्र सरकार ने इस संस्थान के योगदान को देखते हुए इसे शैक्षिक स्वायत्तता के साथ मानद विश्वविद्यालय (Deemed University) का दर्जा प्रदान किया

वर्ष 2012 में ‘राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका-विज्ञान संस्थान बंगलौर अधिनियम, 2012’ के माध्यम से इसे ‘राष्ट्रीय महत्त्व का संस्थान’ (Institute of National Importance) घोषित किया गया.

यह संस्थान मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में नए स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना, मौजूदा सुविधाओं में सुधार और मानसिक स्वास्थ्य के राष्ट्रीय कार्यक्रम की रणनीति तैयार करने में केंद्र तथा राज्य सरकारों को परामर्श देने का कार्य भी करता है.  सरकार को महिला सुरक्षा से जुड़ी विभिन्न सेवाओं (हेल्पलाइन, परामर्श केंद्र आदि) को अतिआवश्यक सेवाओं (Essential Services) के श्रेणी में रखना चाहिये, जिससे किसी आपदा की स्थिति में भी इनका निर्बाध संचालन सुनिश्चित किया जा सके.

महिला सुरक्षा और घरेलू हिंसा पर काम करने वाले स्वयंसेवी संस्थानों और ज़मीनी कार्यकर्त्ताओं के लिये बेहतर संसाधन और सुविधाएँ उपलब्ध कराई जानी चाहिये.  हिंसा के अतिरिक्त सामान्य मामलों में भी देश में महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाओं को मज़बूत करना अति आवश्यक है. महिला अधिकारों को बढ़ावा देने के साथ ही घरेलू कामों में पुरुषों की बराबर भागीदारी के माध्यम से एक सकारात्मक माहौल बनाया जाना चाहिये.

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