फिर से नहीं: भाग-5

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प्लाक्षा और विवान में गहराई तक दोस्ती थी. बात शादी तक पहुंचती, इस से पहले ही दोनों का ब्रेकअप हो गया. कुछ साल बाद दोनों की फिर से मुलाकात हुई, जो बढ़ती ही गई. अपनीअपनी शादी रुकवाने के लिए दोनों ने एकदूसरे के घर वालों के सामने नाटक किया और कुछ दिनों तक के लिए शादी रुकवा ली. उधर जिस लड़की साक्षी को विवान ने अपनी मंगेतर बताया था, उसे प्लाक्षा के बचपन के एक दोस्त आदित्य ने भी अपनी मंगेतर बता कर प्लाक्षा की उलझनें बढ़ा दी थीं. उन दोनों को एकसाथ प्लाक्षा ने मौल में भी खरीदारी करते देखा था. पर जब इस बात की जानकारी उस ने विवान को दी तो विवान ने कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई. प्लाक्षा को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है. जब वह विवान से मिली तो यह सुन कर और भी हैरान रह गई कि यह सब उस ने उसे ही पाने के लिए किया था.

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वह हार कर सोफे पर बैठ गया. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोलूं. दिमाग में पिछले कुछ दिनों की घटनाएं एक के बाद एक फिल्म की तरह चल रही थीं. विवान का अचानक मुझ से मिलना, अपनी मदद करने का आग्रह, मम्मीपापा से मिलवाना, साक्षी का फोटो, शादी… क्या वह सब कुछ झूठ था. इतनी आसानी से उस ने मुझे बेवकूफ बना दिया. इन सब चीजों के बीच उस का बदला हुआ रूप, मेरे लिए उस की परवाह, उस की आंखें क्या वह सब सच था या फिर वह भी बस झूठ, दिखावा था? मेरे लिए सच और झूठ के बीच भेद करना मुश्किल हो रहा था.

‘‘कुछ बोलो प्लाक्षा, ऐसे चुप मत रहो. मुझ पर चीखोचिल्लाओ लेकिन प्लीज कुछ तो बोलो,’’ विवान ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा.

‘‘यह सब कर के तुम्हें क्या मिला विवान? तुम सीधे मुझ से आ कर कह भी तो सकते थे कि मुझ से शादी करना चाहते हो. इतना बड़ा नाटक करने की क्या जरूरत थी?’’ मेरी आवाज अब भी धीमी थी.

वह मेरे सामने घुटनों के बल बैठ गया, ‘‘जरूरत थी प्लाक्षा. मैं तुम्हें यह एहसास कराना चाहता था कि तुम मेरे लिए कितनी स्पैशल हो. तुम्हारे साथ वक्त गुजार कर तुम्हारी छोटीछोटी बातों पर गौर करना चाहता था. तुम्हें बताना चाहता था कि मैं तुम्हारी कितनी परवाह करता हूं. इस थोड़े से वक्त में मैं 5 साल की भरपाई करना चाहता था. तुम्हें वह सब कुछ देना चाहता था, जो उन 5 साल में नहीं दे पाया. अटैंशन, केयर, प्यार सब कुछ.’’

‘‘और कभी मुझे सचाई पता चलती ही नहीं तो? तुम कब तक मुझ से झूठ पर झूठ बोलते रहते?’’ उस की बातें मुझे फिल्मी लग रही थीं. अगर आज से कुछ साल पहले वह ऐसी बातें करता तो मैं बहुत खुश हो जाती. लेकिन अब इन सब बातों को कोई मतलब नहीं था. दिल अब ऐसा नहीं था कि इस तरह की बातों से पिघल जाए. और अब जब मैं ने जान लिया था कि उस ने मुझ से इतना बड़ा झूठ बोला था तो उस की किसी भी बात पर विश्वास करना मुश्किल था.

‘‘मैं नहीं जानता प्लाक्षा, मैं बस किसी भी तरह तुम्हारे साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त गुजाराना चाहता था.’’

मैं हंस पड़ी. वक्त ही तो नहीं था कभी उस के पास मेरे लिए. बाकी सब चीजों- फिल्म, बाइक, दोस्त, जिम, घूमनाफिरना वगैरह के लिए था. मैं तो कहीं थी ही नहीं उस की जिंदगी में. हमेशा भीख मांगती रहती थी उस के वक्त की, उस के अटैंशन की लेकिन वह मेरे साथ हो कर भी नहीं होता था. मुझे देख कर भी नहीं देखता था. अब इन सब बातों का क्या फायदा? मैं चाह कर भी उस पर विश्वास नहीं कर सकती थी.

‘‘प्लाक्षा, प्लीज मेरी बात सुनो,’’ उस ने मेरे हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा. मैं चुप थी, अपने अंतर्द्वंद्व को छिपाए हुए.

‘‘प्लाक्षा, मैं ने तुम्हें कभी प्रपोज नहीं किया. कभी तुम से ‘आई लव यू’  नहीं कहा. आज मैं तुम्हारी यह शिकायत भी दूर कर देता हूं,’’ उस ने अपनी जेब से अंगूठी निकाल कर मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘प्लाक्षा, मैं तुम से बहुतबहुत प्यार करता हूं. तुम्हारे बिना मेरी लाइफ बिलकुल बकवास है. मैं चाहता हूं कि पूरी जिंदगी तुम मुझे झेलो और मेरी फालतू बातों पर हंसती रहो. मैं हर पल तुम्हें खुश रखने की कोशिश करूंगा. प्लीज मुझ से शादी कर लो. मैं कुंआरा नहीं मरना चाहता.’’

उस की बात सुन कर मैं खुश नहीं हुई. लग रहा था जैसे अंदर सब कुछ मर सा गया था. इतने दिनों उस के लिए जो प्यार उमड़ रहा था वह अचानक कहीं गायब हो गया था. वह मेरे जवाब का इंतजार कर रहा था. मेरा मन नहीं था कि मैं उस से कुछ भी कहूं. कुछ भी कह कर अपनेआप को ही और परेशान करने का मेरा कोई इरादा नहीं था. मैं अपना हाथ छुड़ा कर उठ खड़ी हुई. विवान भी सकपका कर खड़ा हो गया. उसे मुझ से ऐसी प्रतिक्रिया की शायद उम्मीद नहीं थी.

‘‘प्लाक्षा, कुछ तो बोलो,’’ वह निवेदन के स्वर में बोला.

मेरा दिमाग अब और सहन नहीं कर सकता था. वह फट पड़े उस से पहले ही मैं ने बोलना शुरू कर दिया, ‘‘क्या सुनना चाहते हो? यही न कि मैं तुम से शादी करूंगी या नहीं? तो सुनो, मैं नहीं करूंगी. अब तुम्हें एक पल भी बरदाश्त करना मेरे लिए मुश्किल है. तुम ने कैसे सोच लिया कि वे सब बातें मैं इतनी आसानी से भूल जाऊंगी? तुम्हारी कुछ दिनों की केयर उन 5 सालों के खालीपन की भरपाई नहीं कर सकती. तरसती और रोती थी मैं तुम्हारे अटैंशन के लिए. तुम्हारी जिंदगी में थोड़ी सी इंपौर्टैंस के लिए, लेकिन मुझे पूरा बदल दिया तुम ने, तुम्हारे व्यवहार ने. अब चाह कर भी किसी को अपनी जिंदगी में जगह नहीं दे सकती. तुम्हें भी तुम्हारी वह जगह वापस नहीं मिल सकती. हर चीज का एक वक्त होता है. उस के बाद उस की अहमियत खत्म हो जाती है. जब मुझे तुम्हारे प्यार की बहुत ज्यादा जरूरत थी तब तुम्हारे लिए दूसरी चीजें ज्यादा महत्त्व रखती थीं. अब मैं आगे बढ़ चुकी हूं. अब ये सब बातें मेरे लिए फुजूल हैं.’’

विवान को देख कर ऐसा लग रहा था जैसे अभी रो पड़ेगा. उस ने रूंधे गले से कहा, ‘‘पर प्लाक्षा मैं बदल चुका हूं. मुझे तुम्हारी अहमियत पता चल चुकी है. मैं बहुत खुश रखूंगा तुम्हें…’’

‘‘अच्छा और इस बात की क्या गारंटी है कि मुझे एक बार फिर से पा लेने के बाद मेरी अहमियत खत्म नहीं होगी? अभी तुम मुझे पाना चाहते हो, क्योंकि मैं तुम्हारी नहीं हूं. एक बार फिर से जब मैं तुम्हारे साथ होऊंगी तो तुम फिर से मेरे अस्तित्व के बारे में भूल जाओगे और अगर यह फिर से हुआ तो मैं खुद को संभाल नहीं पाऊंगी. एक बार ही बड़ी मुश्किल से संभाला था. अब और हिम्मत नहीं है. मैं फिर से तुम्हारे प्यार में पागल नहीं हो सकती. फिर से तुम्हें चोट पहुंचाने नहीं दे सकती. मैं फिर से खत्म नहीं होना चाहती विवान नहीं, फिर से नहीं…’’

अपने आंसुओं की बाढ़ को अब मैं नहीं रोक पाई. हां, मैं उस से प्यार करती थी. जब उस के साथ थी तब भी और जब नहीं थी तब भी. आज भी अब भी हर एक पल मैं ने उस से प्यार किया था. बस अब उसे इस बात का और फायदा उठाने नहीं दे सकती थी.

उस दिन मेरे घर से जाने के बाद विवान ने मुझ से संपर्क करने की कोई कोशिश नहीं की. यही हम दोनों के लिए ठीक भी था. बारबार सामने आने से खुद को संभाल पाना मुश्किल ही होता. हम दोनों जानते थे कि एकदूसरे से कितना प्यार करते हैं, लेकिन जीवन में पहली बार मैं रिश्तों में स्वाभिमान को महत्त्व दे रही थी. मेरे लिए हमेशा रिश्ते सर्वोपरि रहे थे. उन्हें बनाए रखने के लिए कितना भी झुकने को तैयार रहती थी पर अब खुद को अहमियत देने का वक्त आ गया था, नहीं तो मेरे अस्तित्व को खत्म होते देर नहीं लगती. विवान भी शायद यह बात समझ गया था. अब मुझे उस से कोई शिकायत नहीं थी. उस के बारे में अच्छा या बुरा कुछ भी सोचना नहीं चाहती थी.

मम्मीपापा दिल्ली आ चुके थे. आज हम लड़के वालों से मिलने उस के घर जाने वाले थे. मम्मी ने मेरा मूड भांप लिया था. उन्होंने कई बार पूछा भी कि मुझे कोई परेशानी तो नहीं है? लेकिन मैं ने कुछ नहीं कहा. फिर उन्होंने भी ज्यादा जोर नहीं दिया.

मेरा आज तैयार होने का बिलकुल मन नहीं था. वैसे भी मैं मेकअप वगैरह से दूर ही रहती थी. मम्मी भी सादा रहना ही पसंद करती थीं इसलिए उन्होंने इस बारे में कुछ नहीं कहा. बस मेरे पुराने कपड़ों को देख कर जरूर नाराज हुईं कि बोलने पर भी नए क्यों नहीं लिए? अब क्या बोलती कुछ ले ही कहां पाई थी उस दिन.

मेरे मम्मीपापा की सब से अच्छी बात यह थी कि वे कभी किसी भी काम को करने पर  जोर नहीं देते थे. हमारे घर में जिस का जैसा मन करता, वैसा ही करता. किसी को किसी से कोई परेशानी नहीं होती थी. बस इतना जरूर सिखाया गया था कि खुद की मरजी चलातेचलाते दूसरों की सहूलत के बारे में न भूलें.

कार मैं ही चला रही थी. पापा ने उन से रास्ता पहले ही पूछ लिया था. वे मम्मी से बात करतेकरते रास्ता भी बताते जा रहे थे. कभीकभी मुझ से भी कोई बात कर लेते. लेकिन मैं अलग दुनिया में ही खोई हुई थी. उन की आवाज सुन कर बस ‘हां’ कर देती और निर्देशानुसार गाड़ी चलाती जा रही थी. एक घर के सामने उन्होंने गाड़ी रोकने को कहा.

घर देख कर जैसे मुझे अचानक होश आया. यह तो विवान का घर था. हम यहां क्यों आए थे? क्या मम्मीपापा मेरे लिए विवान से झगड़ा करने आए हैं? पर उन्हें कैसे पता वह यहां रहता है?

‘‘मम्मा, हम यहां क्या करने आए हैं?’’ मैं ने उन पर प्रश्नवाचक दृष्टि डाली. वे हलकी सी मुसकराईं और बोलीं, ‘‘अंदर चल, सब पता चल जाएगा.’’

मेरे पैर अपनी जगह से हिलने को तैयार ही नहीं थे. मैं वहीं ठिठक कर खड़ी रही. मम्मी ने पीछे मुड़ कर देखा तो पाया कि मैं वहीं की वहीं खड़ी थी. वे हाथ पकड़ कर मुझे अंदर ले गईं. अंकलआंटी हौल में हमारा इंतजार कर रहे थे. मम्मीपापा बड़ी ही गर्मजोशी से इन से मिले. क्या वे एकदूसरे को पहले से जानते थे? ये सब हो क्या रहा था? मैं ने अंकलआंटी को यंत्रवत नमस्ते किया और बैठ गई. विवान वहां नहीं था.

‘‘बेटा, विवान तुम्हारा अंदर अपने कमरे में इंतजार कर रहा है. जाओ, जा कर मिल लो,’’ आंटी ने प्यार से कहा. मैं उसी तरह यंत्रवत उठ कर उस के कमरे की तरफ चल दी.

दरवाजा हलका सा खुला था. बाहर से विवान दिखाई नहीं दे रहा था. मैं ने दरवाजे को हलका सा धक्का दे कर खोला. वह सामने बिस्तर पर बैठा काफी नर्वस दिखाई दे रहा था. मुझे अंदर आते देख कर उस के चेहरे की परेशानी और बढ़ गई.

‘‘ये सब क्या हो रहा है विवान? मेरे मम्मीपापा…तुम्हारे मम्मीपापा?’’ आखिरकार मेरी जबान ने कुछ हरकत की. विवान ने मुझे पकड़ कर पलंग पर बैठा दिया और खुद सामने कुरसी पर बैठ गया.

‘‘प्लाक्षा, मुझे समझ नहीं आ रहा. मैं तुम्हें कैसे बताऊं,’’ वह नजरें नीची कर के झिझकते हुए बोल रहा था.

‘‘अब भी कुछ बचा है क्या बताने को? और क्याक्या छिपाया है तुम ने मुझ से?’’ मैं ने खीझ कर कहा. मेरे सब्र का बांध टूट रहा था. कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर मेरे साथ हो क्या रहा है. कोई मुझे कुछ बता ही नहीं रहा था.

‘‘बोलो अब. ऐसे चुप रहने से क्या होगा? मुझे बताना तो पड़ेगा. आखिर मेरे साथ कर क्या रहे हो?’’ मैं ने उस का चेहरा ऊपर उठाया तो देखा उस की आंखों में आंसू थे. ऐसा लग रहा था जैसे वह पिछले कुछ दिनों में बहुत रोया था. आंखें सूजी हुई और एकदम लाल थीं.

‘‘मुझे माफ कर दो प्लाक्षा. मैं ने आज तक  तुम्हारे साथ जो कुछ भी किया, उस के लिए मुझे माफ कर दो. मैं बस यही चाहता था कि पुरानी गलतियों को सुधार कर तुम्हें वापस पा सकूं. तुम्हारा दिल दुखाने का मेरा कोई इरादा नहीं था. प्लीज…मुझे माफ कर दो,’’ वह अपना चेहरा हाथों में लिए सुबक रहा था. मेरे लिए यह अप्रत्याशित था. वह आजतक कभी मेरे सामने नहीं रोया था. मैं ने उस के चेहरे से हाथ हटाए और आंसू पोंछने लगी.

‘‘कोई बात नहीं. तुम रोओ मत. मैं भी शायद कुछ ज्यादा ही निष्ठुर हो गई थी,’’ मेरी आवाज में नरमी आ गई थी. चाहे मैं उस से कितनी भी नाराज होऊं लेकिन उसे परेशान नहीं देख सकती थी. रोते हुए तो बिलकुल भी नहीं.

‘‘प्लाक्षा, मैं तुम से सच में बहुत प्यार करता हूं. मैं अब तुम्हारे बिना नहीं रह सकता. मैं बदल गया हूं प्लाक्षा, अब कभी तुम्हारा दिल नहीं दुखाऊंगा. तुम प्लीज मुझ से नाराज मत रहो,’’ वह फूटफूट कर रो रहा था. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं? मेरे दिमाग में पुरानी बातें चल रही थीं. पिछले कुछ दिनों में जो कुछ हुआ वह भी और अब यह प्यार तो मैं भी उस से करती थी, लेकिन फिर से उसे मौका देना…

उसे रोता देख कर लग रहा था जैसे मेरे अंदर भी भावनाओं की बाढ़ आ गई हो. दिल कह रहा था कि सब कुछ भुला कर उसे सीने से लगा लूं. लेकिन दिमाग अब भी नापतौल में लगा था. बुत बन कर बैठी मैं उसे बेबसी से रोते हुए देख रही थी. लेकिन मेरे लिए उसे इस तरह देखना अब असहनीय हो रहा था.

आखिरकार हमेशा की तरह मैं ने दिमाग को परे कर के दिल की बात सुनी. उस के हाथों को अपने हाथों में ले कर सहलाने लगी और बोली, ‘‘इस तरह रोओ मत विवान. मैं तुम से जरा भी नाराज नहीं हूं. मैं ने तुम्हें माफ भी कर दिया. बस तुम रोना बंद करो. मुझे यह बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा.’’

मेरा स्नेहिल स्पर्श पा कर उस का सुबकना कुछ कम हुआ. पानी पी कर वह थोड़ा सामान्य हो गया. मैं चुप ही थी. मेरे लिए अब भी काफी कुछ जानना बाकी था. मैं बस उस के बोलने का इंतजार कर रही थी.

उस ने हिम्मत कर के मेरी आंखों में देखा और कुरसी से उठ कर उसी दिन की तरह मेरे हाथों को अपने हाथों में लिए घुटनों के बल बैठ गया, ‘‘प्लाक्षा, सब से पहले तो मैं आज तक की अपनी सारी गलतियों के लिए तुम से फिर से माफी मांगना चाहता हूं. क्या तुम अपना समझ कर मेरी सारी गलतियों को माफ कर दोगी?’’

वह आशा भरी नजरों से मेरी तरफ देख रहा था. मैं ने बस हलके से सिर हिला दिया.

‘‘मैं वादा करता हूं कि अब तुम्हारा दिल कभी नहीं दुखाऊंगा,’’ उस की बात पर मुझे विश्वास था. यह बताने के लिए मैं ने उस के हाथों को हलके से दबाया.

‘‘पिछले कुछ दिनों में मैं ने तुम से बहुत सारे झूठ बोले हैं. लेकिन तुम जानती हो कि वह सब सिर्फ और सिर्फ तुम्हें पाने के लिए थे. क्या तुम उन सब के लिए मुझे माफ करोगी?’’ मैं ने अब भी कुछ नहीं कहा. बस पलकों को हिला कर हामी भर दी.

 

– क्रमश:

फिर से नहीं: भाग-4

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विवान के वापस दिल्ली लौट जाने के बाद प्लाक्षा की मुलाकात अपने एक पुराने दोस्त आदित्य से हुई. आदित्य ने बताया कि उस की शादी साक्षी नाम की एक लड़की से होने जा रही है. प्लाक्षा ने जब साक्षी की तसवीर देखी तो चौंक गई. यह वही साक्षी थी, जिसे विवान ने अपनी गर्लफ्रैंड बताया था. वह तुरंत ही दिल्ली जा कर विवान के औफिस पहुंचती है तो वहां उस की मुलाकात साक्षी और विवान दोनों से हो जाती है. उधर प्लाक्षा के मातापिता उस पर शादी के लिए दबाब बना रहे थे और उन्होंने एक लड़का पसंद भी कर लिया था.

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मां का आदेश था कि मुझे नए कपड़े खरीदने हैं उस दिन पहनने के लिए. अब गलती की थी तो भुगतना तो था ही. सप्ताहांत में मैं उन के आदेश का पालन करने के लिए अकेली ही नजदीकी मौल में खरीदारी करने जा पहुंची. मुझे कुछ भी पसंद नहीं आ रहा था. वैसे भी मुझ से अकेले शौपिंग नहीं होती थी. न तो मुझे करनी आती थी और न ही मुझे अकेले घूमना पसंद था. खैर, आजकल जब सब कुछ अकेले ही कर रही थी तो यह भी सही. मैं शौपिंग में और ज्यादा ध्यान लगाने की कोशिश करने लगी. 2-3 ड्रैसेज पसंद कर के मैं ट्रायल रूम में जाने लगी तो वहां खड़ा एक लड़का आदित्य जैसा दिखाई दिया. पास जाने पर पता चला कि वही था. शायद किसी का इंतजार कर रहा था.

‘‘आदित्य तुम यहां? दिल्ली कब आए? बताया भी नहीं.’’

मेरी आवाज सुन कर वह चौंक पड़ा. उस के चेहरे पर मुसकराहट आ गई, ‘‘आज सुबह ही आया हूं. तुम यहां क्या कर रही हो?’’

‘‘परांठे बेच रही हूं…अरे शौपिंग करने आई हूं और तुम ऐसा सवाल पूछ रहे हो,’’ मैं ने हंसते हुए कहा, तो वह भी हंसने लगा.

‘‘अच्छा हुआ तुम मिल गईं. साक्षी मेरे साथ ही है. उस से भी मिल लेना.’’

साक्षी इस के साथ? मैं ने आदित्य को अब तक कुछ नहीं बताया था. कहीं न कहीं आज भी मेरी वफादारी किसी और से ज्यादा विवान की तरफ ही थी. वैसे भी साक्षी को अपनी जिंदगी अपने तरीके से चलाने की पूरी आजादी थी. एक बार मसीहा बन कर भुगत चुकी थी मैं. फिर कोई बखेड़ा खड़ा करना नहीं चाहती थी. आदित्य की ओर हलका सा मुसकरा कर मैं ट्रायल रूम की ओर बढ़ गई.

सभी ट्रायल रूम व्यस्त थे. मैं एक रूम के बाहर खड़ी हो कर इंतजार करने लगी. तभी पास वाले रूम से साक्षी बाहर निकली. मुझे वहां खड़ी देख कर वह सकपका गई.

‘‘हाय प्लाक्षा, कैसी हो?’’ वह बोली.

‘‘मैं ठीक हूं. तुम कैसी हो? और विवान कैसा है आजकल?’’ मैं ने झूठी मुसकान के साथ पूछा.

‘‘विवान ठीक है. तुम्हारी बात नहीं हुई उस से?’’ उस ने झिझकते हुए पूछा.

‘‘नहीं उस दिन के बाद हमारी बात नहीं हुई. वैसे बाहर मैं आदित्य से मिली. वह भी मेरा दोस्त है. उस ने मुझे बताया कि तुम दोनों की शादी होने वाली है,’’ मैं अपनी आवाज में छिपे क्रोध को छिपाने की कोशिश कर रही थी.

मेरी बात सुन कर उस के चेहरे का रंग उड़ गया,  ‘‘ओह हां, ऐक्चुअली प्लाक्षा हम दोनों आई मीन मेरा और विवान का ब्रेकअप हो गया. मैं अपने मम्मीपापा के खिलाफ नहीं जा सकती, इसलिए हम अलग हो गए,’’ उस ने झूठी मायूसी के साथ कहा.

क्या तुम्हें पता है कि उस ने तुम्हारे कारण अपने मम्मीपापा से कितना बड़ा झूठ बोला है? और तुम कह रही हो कि तुम अपने मम्मीपापा के खिलाफ नहीं जा सकतीं. तुम उस के साथ ऐसा कैसे कर सकती हो?’’ मेरे स्वर में क्रोध था, आंखें गुस्से से जल रही थीं.

‘‘मुझे सब पता है कि उस ने क्या किया है, क्या नहीं. मैं उस की गर्लफ्रैंड हूं…आई मीन थी. और तुम क्यों इतनी परेशान हो रही हो उस के लिए? क्या अब तुम फिर से उस पर चांस मारने का सोच रही हो?’’

‘‘शटअप. बकवास बंद करो अपनी,’’ मैं ने गुस्से में कपड़े वहीं पटक दिए और वहां से जाने लगी.

‘‘बकवास तो तुम कर रही हो. दूसरों से भी और अपनेआप से भी. आंखें खोल कर देखो सचाई क्या है,’’ वह पीछे से बोलती जा रही थी.

शुक्र था कि आदित्य बाहर नहीं खड़ा था. मैं तेज कदमों से मौल के बाहर आ गई. अब मुझे विवान पर तरस आ रहा था. वह शुरू से ही बहुत सीधा था. कोई बड़ी बात नहीं थी कि साक्षी ने उस के साथ ऐसा किया. पता नहीं किस हाल में होगा वह और यहां साक्षी मजे से शौपिंग कर रही है. इतने संवेदनहीन कैसे हो सकते हैं लोग? मुझे विवान से बात करनी ही होगी अभी. फोन तो पर्स में था. पर्स कहां गया?

मैं भाग कर वापस मौल में गई. पर्स शायद ट्रायल रूम में ही भूल आई थी. साक्षी के चक्कर में दिमाग ने काम करना ही बंद कर दिया था. पर्स वहीं पड़ा था. सांस में सांस आई. पास के ट्रायल रूम से किसी की आवाज आ रही थी. कोई लड़की गुस्से में फोन पर बात कर रही थी. मैं नजरअंदाज कर के आगे बढ़ने लगी. तभी मेरे कानों ने वह नाम सुना जिस के बाद मेरे कदम वहीं ठिठक गए.

‘‘विवान तुम समझ नहीं रहे हो. मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था,’’ यह साक्षी की आवाज थी. ‘‘मुझे उस से बदतमीजी से बात करनी पड़ी वरना उसे शक हो जाता. तुम भी न कभी ढंग से झूठ नहीं बोल सकते. झूठ बोलते वक्त हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अपने भागीदारों से कुछ न छिपाओ पर तुम्हें तो सब कुछ खुद करना होता है.’’

झूठ? विवान ने किस से झूठ बोला था, मुझ से? और साक्षी भी उस में भागीदार थी? मैं सोच रही थी.

‘‘अच्छा अब भड़को मत. यह सोचो कि आगे क्या करना है. मुझे उस वक्त जो समझ आया मैं ने बोल दिया. अब तुम ही सिचुएशन को संभालो.’’

आवाज आनी बंद हो गई. मैं बाहर चल पड़ी. बाहर आदित्य मिल गया.

‘‘अरे प्लाक्षा, तू इतनी देर से अंदर थी? साक्षी भी पता नहीं इतनी देर से क्या कर रही है. मैं पूरा मौल घूम आया और वह अभी बाहर नहीं आई. तुम्हें मिली क्या?’’

मैं उस वक्त उस से बात करने के बिलकुल मूड में नहीं थी. ‘‘नहीं, मैं अभी चलती हूं जरूरी काम है,’’ इतना कह कर मैं बाहर आ गई.

 

कुछ देर पहले विवान के लिए जो तरस था वह अब गुस्से में बदल चुका था. उस ने मुझ से झूठ बोला था? लेकिन वह झूठ कैसे बोल सकता है? उसे तो झूठ से सख्त नफरत थी. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि हो क्या रहा है. मेरा दिमाग चकराने लगा था. मैं फुटपाथ पर ही एक बैंच पर बैठ गई. कुछ भी सोचनेसमझने की क्षमता अब मुझ में नहीं थी. बेहतर यही होगा कि मैं विवान के मुंह से ही सब कुछ सुनूं.

‘‘हैलो विवान, तुम मुझ से अभी मिल सकते हो?’’ इतना ही कह पाई मैं.

उस की आवाज में हैरानी के साथसाथ चिंता भी झलक रही थी, ‘‘प्लाक्षा, तुम कहां हो? इतने दिनों से तुम से मिलने की, बात करने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा.’’

‘‘अभी मिल सकते हो?’’ मैं ने फिर से पूछा.

‘‘हां बिलकुल, बताओ कहां आना है?’’

‘‘घर आ जाओ,’’ कह कर मैं ने फोन रख दिया. इतने दिनों से मेरे जीवन में चल रही उथलपुथल शायद आज शांत हो जाएगी. थके कदमों से मैं घर की ओर चल पड़ी. अभी सचाई का सामाना करना बाकी था.

मेरे पहुंचने से पहले ही विवान मेरे घर पहुंच चुका था. मैं चुपचाप ताला खोलने लगी. उसे अभी यह नहीं पता था कि मैं ने उस की और साक्षी की फोन पर की गई बात सुन ली थी. मैं देखना चाहती थी कि अब भी मुझे बेवकूफ ही बनाता है या सच बोलता है.

‘‘साक्षी ने मुझे बताया कि आज तुम मिली थीं उस से. उस की तरफ से मैं तुम से माफी मांगता हूं. वह ब्रेकअप और शादी के कारण वैसे ही काफी परेशान है, इसीलिए इतना कुछ बोल गई,’’ मेरे कुछ पूछे बिना ही वह बोलने लगा.

‘‘इट्स ओके,’’ मैं ने इतना ही कहा.

‘‘तुम नाराज हो क्या मुझ से? मैं नहीं बता पाया तुम्हें उस वक्त. तुम्हारी अपनी प्रौब्लम थी और मैं भी साक्षी के कारण परेशान चल रहा था. वह सब मैं उस दिन पता नहीं कैसे कह गया,’’ वह बोलता जा रहा था.

‘‘इट्स ओके विवान. मैं नाराज नहीं हूं,’’ मैं शांत थी.

‘‘फिर तुम ने मुझे यहां क्यों बुलाया?’’ वह थोड़ा हैरान था, ‘‘मम्मीपापा से फिर मिलना है क्या?’’

मैं ने इनकार में सिर हिला दिया. फिर बोली, ‘‘मुझे सच जानना है विवान.’’

‘‘सच? किस बात का सच?’’

बातें घुमाने का अब कोई मतलब नहीं था. मैं ने सीधेसीधे पूछने का निश्चय किया और बोली, ‘‘आज मुझ से लड़ाई के बाद जब साक्षी तुम से फोन पर बात कर रही थी तो मैं ने कुछ बातें सुन ली थीं. उन्हें सुन कर मुझे लगा कि तुम मुझ से कुछ झूठ बोल रहे हो.’’

विवान के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. उसे उम्मीद नहीं थी कि इस तरीके से उस की पोल खुल जाएगी.

‘‘नहीं वह किसी और के बारे में बात कर रही थी. तुम ने शायद गलत समझ लिया,’’ वह बोला. लेकिन पहली बार वह मुझ से नजरें चुरा रहा था.

‘‘और झूठ नहीं विवान, मुझे सिर्फ सच सुनना है,’’ मैं चिल्लाई नहीं थी. अपने शांत स्वर पर मैं खुद हैरान थी.

विवान शब्द ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा था. झूठ बोलना आसान होता है, लेकिन उसे स्वीकार करना बहुत मुश्किल. उस ने अपनी आंखों को उंगलियों से ढक कर खुद को शांत करने की कोशिश की, फिर हिम्मत कर के बोलना शुरू किया, ‘‘प्लाक्षा, पिछले कुछ महीनों में मैं ने तुम से पता नहीं कितने झूठ बोले हैं. मैं कोई सफाई नहीं देना चाहता लेकिन मेरा इरादा तुम्हारा दिल दुखाने का नहीं था. मैं बस तुम्हें पाने के लिए यह सब झूठ बोलता गया.’’

‘‘मतलब?’’ अब सब कुछ मेरे बरदाश्त से बाहर होता जा रहा था, ‘‘हमारा ब्रेकअप हो चुका है न 2 साल पहले? फिर ये पानाखोना क्या है?’’

विवान के आंसू आने लगे थे, ‘‘प्लाक्षा, मैं तुम्हें सब कुछ सचसच बताता हूं. बस तुम बीच में रिऐक्ट मत करना. पहले पूरी बात सुनना. उस के बाद ही फैसला करना कि मैं सही हूं या गलत.’’ मैं ने हामी में सिर हिला दिया. 2 मिनट तक खुद को संयमित करने के बाद उस ने फिर से बोलना शुरू किया, ‘‘तुम तो जानती हो मैं अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में कितना कमजोर हूं. और शायद सारे लड़के ऐसे ही होते हैं. ऐसा नहीं है प्लाक्षा कि मैं ने तुम से कभी प्यार नहीं किया, लेकिन मुझे कभी उसे जताना नहीं आया. जब हमारा ब्रेकअप हुआ तो मैं तुम्हें जाने से नहीं रोक पाया. कहीं न कहीं मैं जानता था कि मुझ में ही कोई कमी थी. तुम पर हक तो पूरा जताता था, लेकिन बदले में प्यार देना भूल जाता था.

‘‘ब्रेकअप के बाद कुछ वक्त तक तो मैं सामान्य रहा. तब तो कई बार हमारी बात भी हो जाती थी तो लगता ही नहीं था कि हम दूर हुए हैं. उस के बाद जब तुम ने कोई भी संपर्क रखने से मना कर दिया तब भी मैं ने बिना सोचेसमझे हामी भर दी. उस वक्त तक मुझे एहसास नहीं था कि तुम मेरे लिए कितनी इंपौर्टेंट हो.

‘‘इस दौरान मैं कई तरह के लोगों से मिला, कई तरह के अनुभव हुए. धीरेधीरे एक बात समझ आई कि तुम ने जितनी अच्छी तरह मुझे संभाल रखा था, उतना कोई कभी नहीं कर सकता. तब मुझे तुम्हारी कमी का एहसास हुआ. कई बार तो अकेलेपन में मन ही मन रो पड़ता तुम्हें याद कर के. कई बार तुम से बात करने की भी कोशिश की लेकिन तब तक शायद तुम मेरे प्रति बिलकुल निष्ठुर हो चुकी थीं. तुम ने भी ढंग से बात करना छोड़ दिया.

‘‘तुम्हारी जिंदगी में जो भी चल रहा था, उस एकएक बात की खबर थी मुझे. मुझ से अलग हो कर काफी आत्मनिर्भर हो गई थीं तुम. तुम्हें ऐसे देख कर खुशी भी होती थी और दुख भी कि मैं ने इतने सालों तक तुम्हें बांध कर रखा. मैं ने तुम से कभी कहा नहीं लेकिन मुझे हमेशा से तुम पर गर्व था. अपने पुरुष अहं के कारण ही शायद तुम्हें कभीकभार रोक बैठता था पर जब मैं चला गया तो तुम ने अपने हिसाब से जीना शुरू कर दिया. मुझे बस एक ही बात का डर रहता था कि कोई तुम्हारे भोलेपन का फायदा न उठा ले. तुम चाहे कितनी भी मुंहफट, मजबूत और समझदार हो, लेकिन तुम्हारी सब से बड़ी कमजोरी यह है कि तुम किसी को भी बहुत जल्दी अपना मान लेती हो. पहले तो मैं तुम्हें अपने सुरक्षा घेरे में रखता था कि कोई तुम्हें किसी तरह की कोई चोट न पहुंचाए लेकिन अब मैं नहीं था. तुम ने कई बार धोखे खाए और फिर से उठ खड़ी हुईं, वह भी दोगुने आत्मविश्वास के साथ.

‘‘उस वक्त मुझे लगने लगा कि मुझ में भी कई परिवर्तन आ रहे हैं. तुम्हारे जीवन में जो कुछ भी चल रहा था उसे देख कर जलन तो होती थी, लेकिन तुम जिस तरह से अपनेआप को संभाल रही थीं उसे सराहने से खुद को रोक नहीं पाता था. मेरे मन में तुम्हारे लिए इज्जत बढ़ती जा रही थी.’’

‘‘इन सब बातों का तुम्हारे झूठ से क्या संबंध? मुझे इन फालतू फिल्मी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं है,’’ मैं ने सपाट शब्दों में कहा. वह आखिर साबित क्या करना चाहता था कि वह अब भी मुझ से…? नहीं, अब मैं बेवकूफ नहीं थी. उस के पास पूरे 5 साल थे अपने प्यार को साबित करने के लिए. अब इन सब बातों का क्या मतलब?

‘‘प्लीज प्लाक्षा, मेरी पूरी बात तो सुन लो. फिर तुम्हें जो कहना हो जी भर के कह लेना,’’ उस ने विनती की तो मैं गुस्सा पी कर चुप हो गई.

‘‘मेरे घर पर मेरी शादी की बातें होने लगी थीं. मैं ने उन से कह दिया था कि मुझे शादी नहीं करनी. लेकिन घर वालों को तुम तो जानती ही हो. वे सुनते ही कहां हैं. कुछ लड़कियों से मुझे मिलवा भी दिया. मगर मेरी नजर हर लड़की में तुम्हें ही ढूंढ़ती. सब में कुछ न कुछ तुम सा मिला, लेकिन मुझे तो तुम चाहिए थीं. और कोई पसंद ही कहां आने वाली थी.

‘‘फिर एक दिन मैं ने मम्मीपापा से कह दिया कि मैं शादी करूंगा तो सिर्फ तुम से वरना जिंदगी भर कुंवारा रहूंगा. उन्हें इस में कोई परेशानी नहीं थी. परेशानी तो तुम्हें मनाने की थी. तुम तो मुझ से इतनी दूर चली गई थीं कि तुम्हें वापस पाना कोई आसान काम नहीं था. तभी मुझे पता चला कि तुम दिल्ली आ गई हो.

‘‘मैं बिना कुछ सोचेसमझे तुम से मिलने की योजना बनाने लगा. उस दिन जब मैं तुम्हारे औफिस आया था, वह इत्तफाक नहीं था. मैं जानता था कि तुम वहां काम करती हो. पहले तो मुझे लगा कि अपने चार्म से तुम्हें मना लूंगा, लेकिन उस दिन तुम्हारा रुख देख कर मुझे पता चल गया कि यह काम इतना आसान नहीं है. 2-3 दिन तक यही सोचता रहा कि क्या और कैसे करूं?

‘‘तब साक्षी ने मुझे यह रास्ता बताया. वह मेरी दोस्त है प्लाक्षा. हम दोनों ने मिल कर यह कहानी रची. मुझे उम्मीद नहीं थी कि तुम मेरी बात मान जाओगी पर तुम ने हां कह दिया. मैं हैरान तो था लेकिन खुश भी. यह सोच कर कि शायद तुम्हारे मन में अब भी कहीं न कहीं मेरे लिए थोड़ी जगह है.

‘‘मम्मीपापा को भी अपनी इस योजना में शामिल कर लिया. तुम्हें उन से मिलवाना कोई बड़ी बात नहीं थी. मुश्किल यह थी कि जब तुम्हारे साथ अकेला होता तो खुद को संभाल नहीं पाता था. उस दिन तुम्हारे जन्मदिन पर शायद मैं अपना भांडा फोड देता, लेकिन अच्छा हुआ जो तुम नाराज हुईं और मैं चुपचाप वहां से चला आया.

‘‘जब तुम ने मुझ से अपने मम्मीपापा से मिलने को कहा तो मुझे बहुत हंसी आई. जो काम मैं तुम से झूठ बोल कर करवा रहा था तुम वही मुझ से सच में करवाना चाहती थी. मेरे लिए तो ये सोने में सुहागा था. तुम्हारे साथ ज्यादा वक्त बिताने का मौका जो मिल रहा था, वह भी बिना कोई योजना बनाए.

‘‘और हां, तुम्हारे दोस्त आदित्य को कैसे भूल सकता हूं. उस के कारण तो सारा खेल बिगड़ गया मेरा. मैं कहता था न मुझे वह शुरू से पसंद नहीं था.’’

मैं व्यंग्य से मुसकरा दी. वह बोलता जा रहा था, ‘‘इत्तफाक देखो, औफिस आते ही जिस से तुम सब से पहले मिलीं, वह साक्षी थी. तुम दोनों को साथ देख कर मैं समझ गया कि अब मेरा खेल और नहीं बचा. उस दिन भी मैं तुम से झूठ ही बोला. साक्षी के सामने आने से सब कुछ बिगड़ गया था. अब मेरे पास तुम से मिलने का कोई बहाना नहीं था. प्लान तो यह था कि अपने ब्रेकअप की बात कह कर तुम्हारी सहानुभूति पाने के बहाने तुम्हारे करीब आ जाऊंगा. पर अब तो तुम मुझ से बात करने को ही राजी नहीं थीं.

‘‘आज जो कुछ भी हुआ वह योजनानुसार नहीं था. हालांकि करना मैं भी यही चाहता था जो साक्षी ने किया लेकिन मैं तुम से झूठ बोलबोल कर थक चुका था. आज तुम से मिलने में बहुत डर लग रहा था. जानता था कि आज तुम्हें सच बताना ही पड़ेगा. बस यही सच है. अब तुम मेरे साथ जो सुलूक करना चाहती हो कर सकती हो.’’

-क्रमश:

हैल्दी एंड वैल्दी: lockdown में Organic फूड स्टोर ऐसे करें शुरू

आजकल लोगों में स्वस्थ रहने की जागरूकता बढ़ने के साथ ग्रोसरी की दुकानों में और्गेनिक खाने का सामान मिलने लगा है. आने वाले वक्त में और्गेनिक फ़ूड के बिज़नेस में बहुत गुंजाइश है. हां, और्गेनिक स्टोर शुरू करने से जुड़ी इन बातों का ध्यान जरूर रखें :

लाइसेंस और परमिट

बिजनेस को कानूनीतौर से मान्यता दिलाने के लिए दूसरे स्टोर्स  की तरह इस में भी कुछ क़ानूनी कार्यवाही और खानापूर्तियां होती हैं, जिनका पूरा होना ज़रूरी होता है. कुछ राष्ट्रीय और्गेनिक  मापदंड हैं, जिनको इस बिज़नेस के लिए क्वालीफाई करने के लिए पूरा करना ज़रूरी है.

* और्गेनिक ट्रेड एसोसिएशन से अपने स्टोर को सरकारी तौर पर और्गेनिक के रूप  में सर्टिफाइड(प्रमाणित) करवाएं.

* किसी भी राज्य में लागू होने वाले लाइसेन्सेस और फ़ूड परमिट के लिए स्वास्थ्य विभाग में अप्लाई करें.

* आईआरएस की वेबसाइट से एम्प्लायर आइडेंटिफिकेशन नंबर यानी ईआईएन के लिए अप्लाई करें .

* अपने बिज़नेस के किसी भी एक मुख्य ऑपरेटिंग स्ट्रक्चर को चुनें, जैसे कि कारपोरेशन, सीमित लायबिलिटी कंपनी (कंपनी की सीमित जिम्मेदारियाँ), पार्टनरशिप (साझेदारी ) या सोल प्रोप्राइटरशिप (एकमात्र स्वामित्व).

* अपने बिज़नेस के नाम से बैंक में खाता खोलें.

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* बिज़नेस  से संबंधित सभी खरीदारी के लिए बिज़नेस एटीएम कार्ड काम में लें. यह आपके बिज़नेस पर लोगों का भरोसा मजबूत करेगा.

स्टोर लोकेशन  

स्टोर की लोकेशन बिज़नेस की सफलता में  अहम भूमिका निभाती है. हालांकि आर्गेनिक फ़ूड का बाज़ार हर तरफ है, फिर भी यह जानना ज़रूरी है कि हर कोई इसका भावी खरीदार नहीं हो सकता है. हालांकि एक बहुत अच्छी लोकेशन सफलता की गारंटी नहीं देती है, लेकिन एक बुरी लोकेशन लगभग हमेशा असफलता की गारंटी जरूर देती  है.

सो, आपको ऐसी जगह चुननी चाहिए जहाँ ग्राहकों के लिए  सुरक्षा, सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट के साधन उचित मात्रा में हों. वहां पर पर्याप्त पार्किंग  स्पेस भी होना चाहिए. उस जगह के अपने कौम्पिटिटर्स का भी ध्यान रखें. जितना कम कौम्पिटिशन, उतनी ही ज़्यादा और आसानी से बिक्री होगी.

एक सबसे अच्छी जगह वह है जो सबकी नज़र में आए, आपके बजट में आए और जिसकी शर्तें आपके लिए अनुकूल हों. विशेषतौर से एक डिपार्टमेंटल स्टोर नए विकसित क्षेत्रों में अधिक सफल होता है.

एक जगह का किराया शहर, स्थान और डिपार्टमेंटल स्टोर के आकार के आधार पर 10,000 रुपए जैसी छोटी रकम से लेकर 10 लाख रुपए तक हो सकता है. एक स्टोर का किराया सुरक्षित तौर पर  बिक्री का 4 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए.

स्टाफ का चयन

स्टोर चलाने के लिए आपको स्टाफ की  नियुक्ति करनी होगी – सेल्स एसोसिएट, कैशियर से ले कर बुककीपर तक. अगर आप बहुत सारा काम खुद कर सकते हैं, तो भी ग्राहकों को देखने के लिए स्टाफ की ज़रूरत  ज़रूर होगी.

ग्राहक अनुभव

ग्राहकों का स्टोर के अंदर अच्छा अनुभव उनको वापस आपकी दुकान पर लेकर आता है. हमें यह तभी हासिल होगा जब हम अपने स्टाफ को प्राकृतिक एवं और्गेनिक खाद्य उत्पादों के बारे में सही जानकारी देंगे.

स्टाफ को ट्रेनिंग देना, आपकी मार्केटिंग रणनीति का एक ज़रूरी हिस्सा है. आपका स्टाफ हर दिन आपके स्टोर में आपके उत्पादों के बारे में लोगों को बताएंगे अपने ग्राहकों को आपके द्वारा किए जा रहे प्रयासों  पर भरोसा दिलवाने के लिए अपने स्टाफ को और्गेनिक्स और प्राकृतिक पर  ट्रेनिंग दें .

अग्रिम निवेश

ऊंची  स्टार्टअप कीमतों  के लिए तैयार हो जाएं. और्गेनिक सामान, नौन-और्गेनिक सामान के बजाय अधिक महंगे होते हैं. पहली बार स्टोर को स्टौक से भरना जितना आपने सोचा है उससे कहीं ज़्यादा  महंगी प्रक्रिया है.

उचित बिक्री मूल्य तय करें

और्गेनिक वस्तुओं की उच्च कीमत की वजह से यह उम्मीद करना आम बात है  कि उनकी कीमत नौन-और्गेनिक दुकान में रखे हुए सामान से ज़्यादा होगी. इसके बावजूद अगर आपके सामान की कीमत बहुत ज्यादा होगी तो ग्राहक वो सामान किसी और से खरीद लेंगे .

* आसपास की और्गेनिक दुकानों द्वारा निर्धारित कीमतों को देखकर अपने सामान की कीमत निर्धारित करें.

* अगर कोई अन्य और्गेनिक स्टोर आसपास मौजूद नहीं है, तो यह जानें कि एक नौन-और्गेनिक स्टोर अपने हर एक सामान पर कितना मुनाफा कमाता है. उसके आधार पर अपनी कीमत का मोटेतौर पर अंदाजा लगाएं. और उसी अनुसार अपने सामान की कीमत निर्धारित करें .

* अपने सामान की बहुत कम कीमत निर्धारित करना आपको नुकसान पहुंचा सकता है.

* बहुत ज़्यादा  मूल्य लगाना, मूल्य-संवेदनशील ग्राहकों का आना बंद करा सकता है.

*जब तक आपको अपने सामान की एकदम सही कीमत नहीं पता चलती है तब तक आपको अपने सामान की कीमतों को कम और ज़्यादा  करना पड़ सकता है.

और्गेनिक दुकान का औफ़लाइन विज्ञापन

इस बारे में सोचें कि आप अपने आर्गेनिक और प्राकृतिक सामान का विज्ञापन कैसे करना चाहते हैं.लोगों द्वारा, स्थानीय विज्ञापन और प्रमोशन वे तरीके हैं, जिनसे आपके स्टोर में लोगों का आना बढ़ सकता है . और्गेनिक सामान खरीदने में रुचि रखने वाले लोगों का ध्यान खासतौर से अपनी और खींचें.  विज्ञापनों को छपवाएं. समाचारपत्र में अपना  विज्ञापन दें, शहर में चारों तरफ अपने फ्लायर/ पैम्फलेट बाटें. यदि संभव हो, तो भावी ग्राहकों को स्टोर तक लाने के लिए एक सीमित संख्या में कूपन बांटें .

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असल में, आप एक फ्लायर या ब्रोशर पर पूरी तरह से अपने प्राकृतिक और आर्गेनिक सामानों का प्रचार कर सकते है . अपने ग्राहकों को अपने स्टोर में रखे प्राकृतिक और और्गेनिक्स सामानों के बारे में बताएं और यह भी बताएं कि  वे कहाँ रखे हुए हैं. उन्हें  समझाएं कि आपका स्टोर प्राकृतिक और और्गेनिक सामन क्यों बेच रहा है. इसमें नौनऔर्गेनिक फ़ूड की तुलना में और्गेनिक फ़ूड से क्याक्या फायदे हैं ये भी शामिल करें.

औनलाइन विज्ञापन करें!

यह जानना बहुत ज़रूरी है कि इस पीढ़ी के उपभोक्ताओं के पास भारी खरीद क्षमता है. वे  जानकारी के लिए इंटरनेट पर ज़्यादा भरोसा कर रहे हैं.

सबसे पहले, अपनी आर्गेनिक और प्राकृतिक खाद्य सामान की मार्केटिंग के लिए अपने स्टोर की वेबसाइट और सोशल मीडिया को काम में लें. दूसरा, गूगल  मैप पर अपने स्टोर को चिह्नित करें, साथ ही, बढ़ती औनलाइन उपभोक्ता आबादी तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया,  जैसे कि  फेसबुक आदि को काम में लें.

मैनेज और ट्रैक करें

किसी भी बिज़नेस को शुरू करना आसान काम है. उसे सफलतापूर्वक चलाना बहुत मुश्किल काम है.सबसे पहले, जानें कि आप अपनी दुकान में बिकने वाले सामानों की सूची को कैसे ट्रैक करें.

बिज़नेस  को अकेले या लोगों के साथ, बिना किसी असमंजस  के संभालना, यह अगली सबसे बड़ी चुनौती है. बिज़नेस चलाने, इन्वेंट्री को मैनेज  करने और सामग्री की अकाउंटिंग को आसान करने में ‘व्यापार’ जैसे बिज़नेस सौफ्टवेयर को काम में लें.अधिकतर बिज़नेसमैन अपने जीवन को आसान बनाने के लिए व्यापार जैसे  बिज़नेस अकाउंटिंग सौफ्टवेयर का उपयोग करते हैं.

सच बात तो यह है कि आर्गेनिक फ़ूड उन  कुछ श्रेणियों में से एक है जो उच्च-स्तरीय, उच्च-मार्जिन अवसर ब्रैकेट में आती हैं. जैसेजैसे  प्राकृतिक और स्वस्थ खाद्य पदार्थों की तरफ ग्राहकों की जागरूकता बढ़ रही है, वे आर्गेनिक खाद्य पदार्थों के लिए भुगतान करने को तैयार हैं. जब से लोग स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने लग गए हैं तब से और्गेनिक खरीदते समय एमआरपी पर ध्यान देना बंद कर दिया है. इन सारी बातों का निचोड़ यह है कि ज़्यादा खर्च करने की क्षमता और बढ़ती जागरूकता की वजह से ये उत्पाद न केवल लोकप्रिय हो रहे हैं बल्कि लोग इन्हें खरीद भी रहे हैं.

जब डेटिंग किसी से और शादी किसी और से

क्या हो अगर डेटिंग वाला शादी के समय आ धमके? पता चला कि इधर दुलहन शादी की तैयारियों में मगन, सजधज कर शादी के लिए तैयार है और उधर पुराने मजनूजी दिल हथेली पर लिए लैला की शादी में खलल डालने पधार गए. ऐसी स्थिति लड़कों के साथ भी हो सकती है कि दूल्हे मियां साफा बांध कर शादी करने चले और पुरानी गर्लफ्रैंड आ धमके रंग में भंग डालने.

ऐसे माहौल में रिश्तेदारों की प्रतिक्रिया अलग होगी. कुछ को शायद मजा आए, कुछ तरस खाएं, लेकिन खुद शादी वाले लड़के/लड़की का क्या हाल होगा, कैसे निबटेंगे वे इस परिस्थिति से, आइए जानते हैं:

1. जब ऐक्स को बनाया बुद्धू

कुछ ऐसी ही मजेदार किस्सा बताती हुई शीतल कहती हैं, ‘‘मेरी शादी के समय कालेज का बौयफ्रैंड आ पहुंचा. पता नहीं उसे कहां से पता चल गया कि मेरी शादी हो रही है. हालांकि उस से मेरा ब्रैकअप हुए 3 साल हो चुके थे. पर उस को इस बात की तसल्ली थी कि मैं उस की नहीं तो और किसी की भी नहीं हुई हूं. थोड़ा चिपकू किस्म का था. मेरी पूछताछ करता रहता था. घर में किसी को भी उस के बारे में पता नहीं था. पूछो मत क्या हाल हुआ.’’

फिर तो शीतल ने अपनी प्रिय सहेली रति का सहारा लिया. शीतल कहती हैं, ‘‘रति ने मुझे बचाने के लिए मजनू के साथ झूठा स्वांग रचाया ताकि वह मुझ से ध्यान हटाए. वह बेवकूफ मुझे जलाने की सोच कर रति के आगेपीछे घूमता रहा. पर बात प्रपोज करने तक पहुंची उस से पहले ही मेरी बिदाई हो गई और रति सिर पर पैर रख वापस विदेश लौट गई.’’

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2. बीवी ने लिया समझदारी से काम

‘‘मेरी ऐक्स गर्लफ्रैंड ने जैसे ठान लिया था कि मेरी होने वाली पत्नी के मन में शक का बीज बो कर रहेगी,’’ यह कहना है सिद्धार्थ का. वे आगे बताते हैं, ‘‘मुझे हमेशा लगता था कि वह एक बचकानी लड़की है और मेरी शादी पर अचानक टपक कर उस ने मुझे सही साबित कर दिया. एक तो बिनबुलाए आ पहुंची, ऊपर से हर फंक्शन में मेरे आसपास ऐसे मटक रही थी कि सब को संदेह होना लाजमी था. वह तो अच्छा हुआ कि मेरी पत्नी समझदार थी. उस के विश्वास के कारण मैं ने निस्संकोच दोनों का परिचय करा दिया. तब जा कर मेरी ऐक्स शांत हुई और मेरी शादी आराम से हो पाई.’’

3. मां ने बचाया शर्मिंदगी से

निशा की मां को उस के ऐक्स बौयफ्रैंड के बारे में जानकारी थी. जब शादी के ऐन वक्त वह हाथ में गुलदस्ता लिए आ पहुंचा तो मां ने ही मोरचा संभाला. झट उस के हाथों से गुलदस्ता लिया और उस का हाथ थामे उसे स्टेज पर अपने संग ले गई. आननफानन में नए जोड़े के साथ उस की फोटो खिंचवाई और उस को रवाना किया.

निशा थोड़ी गंभीर हो कर कहती हैं, ‘‘उस शाम यदि मां ने चौकसी न बरती होती तो क्या पता वह मेरे पति से मिल कर क्या कह देता.’’

4. क्यों होता है ऐसा

मनोचिकित्सक, डा. श्याम भट्ट कहते हैं, ‘‘पश्चिमी देशों की तुलना में भारत में डेटिंग करना एक नूतन प्रक्रिया है. 15-20 वर्ष इस की मौजूदगी इतनी नहीं थी जितनी उग्रता व तीव्रता से यह आज हर ओर दिखाई देती है. जब इतने युवा डेटिंग करेंगे तो लाखों के दिल भी टूटेंगे.

‘‘ब्रैकअप के कई कारण हो सकते हैं जैसे जातिधर्म की दीवार, आर्थिक स्थिति, आपसी मनमुटाव, परिवार वालों की असहमति, किसी एक का चीटिंग करना, लौंग डिस्टैंस रिलेशनशिप, शादी में रुचि न होना, कोई बेहतर साथ मिल जाना, व्यक्तित्व में असमानता आदि.’’

मनोविज्ञानी के. वर्षा के अनुसार, ‘‘कई बार बचपन का प्यार परिपक्व होने पर दोस्ती या खयाल रखने तक सीमित रह जाता है. एक बार ब्रैकअप होने के बाद मूव औन करने में ही दोनों पक्षों की समझदारी और भलाई है.’’

5. ताकि शादी में कन्फ्यूजन न हो जाए

बेहतर यही होगा कि ब्रैकअप के समय भावनात्मक झगड़ों से बचें और सही तर्कों के अंतर्गत अलग हों ताकि भविष्य में कहीं टकरा जाने की स्थिति में एकदूसरे का सामना करना आसान रहे. पूर्व प्रेमी का शादी में शामिल होने से कई कोण सामने आ सकते हैं. जैसे:

पूर्व प्रेमी का पहले से भी अधिक आकर्षक लगना: अब आप आगे बढ़ चुकी हैं इसलिए पीछे मुड़ने से खुद को रोकना होगा.

पूर्व प्रेमी को सामने पा अंतरंग क्षणों की याद आ जाना: अपनी आंखों और चेहरे को सामान्य बनाए रखें ताकि देखने वाले भांप न लें कि आप के मन में क्या चल रहा है.

रिश्तेदारी में कानाफूसी: अपने अंदर आत्मविश्वास रखें. आप का आत्मविश्वास देख कर रिश्तेदार एकदूसरे के कानों में चुगली भले ही करें, पर कुछ भी जोर से बोलने या शादी का माहौल खराब करने की हिम्मत कोई नहीं कर पाएगा.

ऐक्स द्वारा कोई गलत हरकत करना: किसी अपने का सहारा लें, चाहे बहन हो या सहेली. उस की मदद से अपने ऐक्स को स्वयं तक पहुंचने से रोकें.

मैरिज काउंसलर, राबर्ट पारस्ले कहते हैं कि शादी का स्थान डेटिंग से कहीं ऊंचा है. डेटिंग वाले के चक्कर में वर्तमान शादी खराब नहीं करनी चाहिए.

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मुंबई की काउंसलिंग साइकोलौजिस्ट, जंखाना जोशी का कहना है कि ब्रैकअप के बाद दिल टूटने की पीड़ा उतनी ही गहरी होती है जितनी किसी रिश्ते की मौत की. मस्तिष्क के एमआरआई से पता चलता है कि टूटे हुए दिल में उतना ही दर्द होता है जैसा शारीरिक चोट में होता है.

शोध बताते हैं कि इस के लक्षण ड्रग्स के समान होते हैं. इसलिए समझदारी इसी में है कि ब्रैकअप के समय परिपक्वता से काम लें. जिस से डेटिंग कर रही हैं, जरूरी नहीं कि उसी से आप की शादी हो. यह बात पहले ही साफ कर दें. अपनी अपेक्षाएं बता कर आगे बढ़ें ताकि रिश्ता तोड़ते समय सामने वाले को धोखा न लगे. यदि आप ने ब्रैकअप सफाई से किया होगा तो डेटिंग वाले का आप की शादी में आ धमकने से भी आप को नुकसान का खतरा कम होगा.

फिर से नहीं: भाग-2

पूर्व कथा:

ब्रेकअप के 2 साल बाद अचानक प्लाक्षा की मुलाकात अपने ऐक्स बौयफ्रैंड विवान से हुई, तो उस के दिमाग में फिर से वही पुरानी बातें घूमने लगीं. जब एक रोज प्लाक्षा ने विवान को प्रपोज किया था. मगर विवान के शक्की व्यवहार ने उन दोनों के बीच जल्द ही दूरियां पैदा कर दी थीं. 1 हफ्ते बाद विवान फिर प्लाक्षा को उस के औफिस के बाहर मिला. वह उस से कुछ जरूरी बात करना चाहता था. मगर प्लाक्षा जल्दी में थी इसलिए शाम को मिलने का वादा कर के चली गई. शाम को जब दोनों मिले तो विवान ने कहा कि क्या तुम मेरे मम्मीपापा से मेरी गर्लफ्रैंड बन कर मिल सकती हो. सारा मामला जानने के बाद प्लाक्षा मिलने को राजी हो गई.

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‘‘उस का चेहरा मेरे चेहरे के बिलकुल नजदीक था. उस की सांसों को मैं अपनी गरदन पर महसूस कर रही थी. मन कर रहा था कि उस से लिपट जाऊं और जी भर के रोऊं. नहींनहीं…’’

‘‘तुम यह सब क्यों कर रहे हो विवान?’’ प्लाक्षा अंतत: पूछ ही बैठी.

‘‘तुमतो काफी छोटी लगती हो विवान से,’’ उस की मम्मी ने कहा.

‘‘नहीं आंटी, हम तो एक ही…’’ मेरी बात काट कर विवान बीच में ही बोला, ‘‘एक ही औफिस में काम करते हैं, एक ही बैच के हैं.’’ अच्छा हुआ उस ने संभाल लिया. मेरे मुंह से निकलने वाला था कि हम एक ही क्लास में थे.

‘‘फिर भी छोटी लगती है,’’ कह कर वे फुसफुसा कर उस के पापा के कान में कुछ कहने लगीं. मुझे पता था कि वे मेरी हाइट के बारे में बात कर रही होंगी. बचपन से सुनती आई थी ऐसी बातें लोगों के मुंह से, अब तो आदत हो चुकी थी. उन की बात भी सही थी. विवान मुझ से एक फीट से भी ज्यादा लंबा था.

‘‘तो बेटा, तुम यहां अकेली रहती हो?’’ उस के पापा ने पूछा.

‘जी. जौब यहीं है और मम्मापापा का जयपुर में अपनाअपना काम है, इसलिए अकेली ही रहती हूं,’’ मैं ने जवाब दिया.

‘‘शादी की बात करने तो वे आएंगे न?’’ उन्होंने आगे पूछा.

‘‘जी…’’ मैं ने झिझक कर विवान की ओर देखा.

‘‘पापा, अभी जयपुर में इन के घर का काम चल रहा है और फिर उन की जौब भी है, तो अभी नहीं आ सकते,’’ उस ने कहा.

‘‘तो हम जयपुर चले चलते हैं,’’ अंकलआंटी दोनों ने एक स्वर में कहा.

‘‘अरे इतनी भी क्या जल्दी है? वैसे भी अगले महीने मुझे प्रमोशन मिलने वाली है. तब तक अंकलआंटी भी फ्री हो जाएंगे,’’ विवान जल्दी से बोला.

‘‘अभी अगर सगाई ही हो जाती तो…’’ आंटी ने उम्मीद भरे स्वर में कहा.

‘‘मां मुझे पता है आप को मेरी शादी की बहुत जल्दी है. इतने दिन रुकी हो, तो अब थोड़े दिन और रुक जाओ,’’ उस ने मां को समझाते हुए कहा.

घर से बाहर आ कर कार में बैठ कर मैं ने चैन की सांस ली. विवान ने कार स्टार्ट की ही थी कि मेरे दिमाग में एक विचार कौंधा, ‘‘मुझे एक बात बताओ विवान. तुम ने अपने घर वालों को सीधासीधा यह क्यों नहीं बता दिया कि साक्षी अभी यहां नहीं है, 6 महीने बाद आएगी?’’

मेरी बात सुन कर वह कुछ परेशान हो गया. फिर बोला, ‘‘मेरी मौसी की बेटी की सगाई एक लड़के से हुई थी. उस के बाद वह विदेश चला गया. उन लोगों ने 1 साल तक उस का इंतजार किया, लेकिन वह वापस नहीं आया. यहां उस के परिवार को भी उस की कोई खबर नहीं थी. बाद में छानबीन करने पर पता चला कि वह वहां आराम से लिव इन में रह रहा था. उस के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज हुई, लेकिन सगाई में हुए खर्चे और परिवार की इज्जत को हुए नुकसान की तो कोई भरपाई नहीं हुई.’’

‘‘लेकिन साक्षी तो कंपनी की तरफ से गई है न, उसे तो वापस आना ही पड़ेगा 6 महीने बाद?’’ मैं ने पूछा.

‘‘हां, लेकिन मां यह बात नहीं समझ सकतीं न. उन्हें तो लगता है कि विदेश जाने वाला हर इनसान धोखेबाज हो जाता है,’’ उस ने मेरी तरफ देखते हुए कहा.

‘‘और जब साक्षी वापस आ जाएगी तब उन से क्या कहोगे? अपने ही बेटे से मिले धोखे को वे बरदाश्त कर पाएंगी?’’ मुझे सब कुछ बिलकुल घालमेल सा लग रहा था.

‘‘मैं इस बारे में नहीं सोचना चाहता पाशी. वह जब होगा तब मैं संभाल लूंगा. अभी बस मुझे मम्मीपापा को किसी तरह 6 महीने तक रोकना है. इस के अलावा मुझे अभी कुछ नहीं सूझ रहा.’’ उस ने कार रोक दी. मेरा घर आ चुका था.

‘‘तुम्हें लगता है कि तुम सही कर रहे हो विवान?’’ मैं ने इन दिनों में पहली बार उस की आंखों में देखते हुए पूछा.

‘‘नहीं, लेकिन मेरे पास और कोई रास्ता भी नहीं है अपने प्यार को पाने का,’’ उस ने मेरी आंखों में आंखें डालते हुए कहा. एक पल को लगा जैसे दुनिया ठहर गई हो पर फिर ध्यान आया उस का प्यार यानी साक्षी. मैं चुपचाप कार से उतर गई. वह चला गया.

अगले कुछ दिनों तक न तो उस का कोई काल आया और न ही वह कहीं नजर आया. मैं जानती थी कि वह मेरे पास सिर्फ काम से आया था पर फिर भी मुझे बुरा लगा. ऐसा नहीं था कि मैं ने उस से कोई उम्मीद की थी, लेकिन शायद फिर से उसे सामने देख कर दिल एक बार फिर ख्वाब संजोने लगा था. कई बार काफी दुखी हो जाती, उसे काल करने की भी सोचती. कई बार जी में आया कि मना कर दूं कि मुझे नहीं करनी किसी भी तरह की कोई भी मदद. लेकिन उस से जो मांगना था, उस के लालच में खुद को मना लेती. इस बार मैं कुछ भी भावनाओं में बह कर नहीं कर रही थी. इस में मेरा भी स्वार्थ था.

एक रात इन्हीं विचारों में डूबी मैं बिस्तर पर लेटी करवटें बदल रही थी, तभी दरवाजे की घंटी बजी. मैं चौंक कर उठ बैठी. इतनी रात को कौन हो सकता है? घड़ी में देखा, पौने 12 बज रहे थे. वैसे तो जिस प्रोफैशन में मैं थी मुझे डरना नहीं चाहिए था, लेकिन इतने बड़े शहर में अकेली लड़की का फ्लैट में रहना आसान नहीं था. आज तक कोई खास परेशानी तो नहीं हुई थी पर आज इस घंटी की आवाज सुन कर दिल जोरजोर से धड़कने लगा. पिछले कुछ समय में लड़कियों के साथ हुए सारे हादसे याद आने लगे.

पलंग से उतर कर धीमे कदमों से मैं दरवाजे तक पहुंची. डोर व्यूवर में देखा तो बाहर विवान खड़ा था.

‘‘तुम इतनी रात को यहां क्या कर रहे हो?’’ दरवाजा खोलते ही मैं ने पूछा.

उस ने जवाब दिए बिना ही कहा, ‘‘अंदर आ जाऊं? मैं किनारे हो गई. अंदर जा कर वह कुरसी पर बैठ गया. मैं भी दरवाजा बंद कर के अंदर आ गई.

‘‘एक गिलास पानी पिलाओगी?’’ वह बोला, तो पानी पिला कर उस के पास ही कुरसी पर बैठ कर मैं उस के बोलने का इंतजार करने लगी. मुझे अपनी तरफ घूरते देख वह बोला,  ‘‘सौरी, तुम्हें इतनी रात को परेशान किया. मैं अपने घर की चाबी न जाने कहां भूल गया. मम्मीपापा जयपुर गए हैं, तो समझ नहीं आया क्या करूं. इसलिए यहां आ गया.’’

‘‘जयपुर क्यों?’’ मैं ने परेशान हो कर पूछा.

‘‘अरे ऐसे ही कुछ काम था. तुम क्यों इतनी परेशान हो रही हो?’’

‘‘नहीं, मुझे लगा कि…’’

‘‘कि?’’

‘‘कुछ नहीं…’’ लेकिन मेरे बिना बोले ही वह समझ गया.

‘चिंता मत करो. मैं ने मम्मीपापा को मना कर दिया है कि वे तुम्हारे मम्मीपापा से न मिलें,’’ उस ने तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘अच्छा 1 कप कौफी पिलाओगी?’’ उस की बात सुन कर मेरा ध्यान टूटा.

‘‘हां क्यों नहीं. अभी लाती हूं,’’ कह कर मैं उठ कर किचन में चली गयी. 2 मिनट बाद ही बाहर से विवान जोरजोर से आवाज लगाने लगा. मैं दौड़ कर बाहर आई तो देखा हौल में बिलकुल अंधेरा था, विवान वहां नहीं था. तभी फिर से उस की आवाज आई, ‘‘हैपी बर्थडे टू यू…हैपी बर्थडे टू यू…हैपी बर्थडे टू डियर पाशी…,’’ वह हाथ में केक लिए मेरे पास आ रहा था. उसे याद था पर कैसे और क्यों? इस बार तो मुझे भी याद नहीं था.

‘‘थैंक्यू विवान. पर यह सब किसलिए?’’ मेरे स्वर में हैरानी थी.

उस ने मेरे होंठों पर उंगली रख कर कहा, ‘‘आओ पहले केक काटो. बाद में तुम्हारे परवर का जवाब दूंगा.’’

केक मेरा फेवरेट था यानी चौकलेट केक. उस पर लिखा था, ‘हैपी बर्थडे पाशी.’ आज कई सालों बाद मैं ने केक काटा था. विवान ने रिलेशनशिप के 5 सालों में मेरे बर्थडे पर कभी कुछ स्पैशल नहीं किया था. हर साल हमारा एक ही प्लान होता था मूवी और लंच. मैं हर साल उत्साहित होती कि शायद इस बार वह कुछ करेगा. लेकिन जब 2-3 साल यही सिलसिला चला, तो मैं ने उम्मीद करना ही छोड़ दिया.

कुछ जलने की बदबू आ रही थी. कौफी…मेरे मुंह से निकला. फिर मैं केक का टुकड़ा उस के हाथ में थमा कर किचन की तरफ भागी. गैस स्टोव खुला पड़ा था. पानी उबलउबल कर खत्म हो गया था और कौफी जलने की बदबू आ रही थी. मैं ने जल्दी से नौब बंद किया. विवान भी अंदर आ गया. यह सब देख कर वह बोला, ‘‘कोई बात नहीं. मैं कोल्ड ड्रिंक्स लाया हूं और खाने का सामान भी. मैं ने डिनर भी नहीं किया. चलो बाहर चलें.’’ वह बैग से एकएक कर के चीजें निकाल रहा था. पिज्जा, कोल्ड ड्रिंक और तोहफा.

‘‘ये लो तुम्हारा गिफ्ट,’’ उस ने तोहफा मुझे थमा दिया जो एक बहुत खूबसूरत कोलाज था. बचपन से ले कर आज तक की मेरी सारी तसवीरें. उन में से अधिकतर वे थीं, जो विवान ने मुझ से ली थीं. कुछ तो उन्हीं दिनों की थीं. मुझे पता ही नहीं चला उस ने कब खींची थीं.

‘‘विवान,’’ मैं ने उसे अपनी ओर घुमाते हुए कहा.

‘‘हां गोरी मेम.’’

एक सैकंड को मेरे चेहरे पर मुसकान आ गई. वह हमेशा मुझे प्यार से ऐसे ही बुलाता था. अपनी भावनाओं पर काबू करते हुए मैं ने उस से पूछा, ‘‘तुम यह सब क्यों कर रहे हो विवान?’’

‘मैं ने क्या किया?’’ उस ने मासूम बन कर पूछा.

‘‘यही सब…मेरा बर्थडे मना रहे हो रात के 12 बजे. 5 साल के रिलेशनशिप में कभी भी मेरे लिए कुछ स्पैशल नहीं किया. अब यह सब किसलिए?’’ मेरी आंखों में आंसू थे.

‘‘अरे तुम रो क्यों रही हो…तुम मेरी इतनी हैल्प कर सकती हो तो क्या मैं तुम्हारा बर्थडे भी नहीं मना सकता? क्यों इतना भी हक नहीं है मुझे?’’ वह मेरे गाल थपथपाते हुए बोला.

‘‘नहीं है. मुझे यह सब नहीं चाहिए विवान. मैं ने बहुत प्यार ले लिया सब से. अब और नहीं चाहिए. बेहतर होगा कि तुम यह सब न करो,’’ मेरे स्वर में दृढ़ता थी.

‘‘आगे से ध्यान रखूंगा पर अभी जो प्लान किया है वह तो करने दो प्लीज.’’

हम दोनों खामोशी से बैठ कर खाते रहे. अपना पसंदीदा पिज्जा खा कर मेरे मूड में कुछ सुधार हुआ. अब हम आराम से बैठ कर कोल्ड ड्रिंक पी रहे थे.

‘‘तुम्हारे पास साक्षी का कोई फोटो है?’’ मैं ने विवान से पूछा.

‘‘हां, क्यों?’’

मैं ने उस से दिखाने को कहा. साक्षी सुंदर थी. मुझ से ज्यादा सुंदर. मैं तो वैसे भी खुद को कभी सुंदर नहीं मानती थी. मैं ने विवान से कह भी दिया कि साक्षी बहुत सुंदर है, उस के लायक है. विवान खुद भी बहुत स्मार्ट था. अच्छीखासी कदकाठी, आकर्षक चेहरा. मैं तो उस के सामने कुछ भी नहीं थी.

‘‘तुम से ज्यादा क्यूट नहीं है,’’ उस ने शरारती अंदाज में कहा.

‘‘मजाक मत करो विवान,’’ मैं ने उसे हंस कर टाल दिया.

वह मुझे एकटक देख रहा था. मैं नजरें चुरा कर दूसरी ओर देखने लगी. यह देख कर उस ने भी अपनी नजरें हटा लीं और सहज हो कर कहा,  ‘‘चलो डांस करते हैं.’’

‘‘डांस? विवान तुम मजाक कर रहे हो. तुम और डांस?’’

‘‘हां, आजकल खूब डिस्को जा रहा हूं. चलो उठो.’’

‘‘अरे नहीं, मन नहीं है,’’ मैं ने आनाकानी करने की कोशिश की, लेकिन उस ने एक ही झटके में मुझे उठा लिया.

काफी वक्त बाद हम इतने करीब थे. विवान सहज था पर मैं असहज महसूस कर रही थी. उस का स्पर्श उस के पास होने का एहसास मुझे विचलित कर रहा था. कहीं अब भी मैं उस से…? नहींनहीं फिर से नहीं. उस का चेहरा मेरे चेहरे के बिलकुल नजदीक था. उस की सांसों को मैं अपनी गरदन पर महसूस कर रही थी. मन कर रहा था कि उस से लिपट जाऊं और जी भर के रोऊं. नहींनहीं…

मैं छिटक कर उस से अलग हो गई. उस की आंखों में ग्लानि और हैरानी का मिलाजुला भाव था. ‘‘तुम अब जाओ विवान,’’ मैं ने उस से नजरें मिलाए बिना कहा. वह बिना कुछ कहे चला गया. सुबहसुबह मां के फोन से आंखें खुलीं. जन्मदिन की बधाई देने के बाद वे घर आने के कार्यक्रम के बारे में पूछने लगीं. वे जानती थीं कि नईनई नौकरी में छुट्टी मिलना आसान नहीं होता इसलिए कभी ज्यादा जोर नहीं देती थीं. लेकिन मैं पहली बार घर से दूर अकेली रह रही थी इसलिए उन्हें याद भी आती थी और फिक्र भी होती थी. मैं ने उन्हें तसल्ली दी कि राखी पर पक्का आ जाऊंगी. इसी बहाने भाई से भी मिलना हो जाएगा.

मां ने संतुष्ट हो कर फोन पापा को दे दिया. पापा ने बधाई दे कर और हालचाल पूछ कर फोन वापस मां को थमा दिया. इस बार मां के स्वर में उत्साह था,  ‘‘अच्छा सुन तेरे लिए एक रिश्ता आया है. तेरे पापा को तो पसंद भी आ गया.’’

‘‘मम्मा, आप को पता है न मुझे शादी नहीं करनी, फिर भी आप…’’ मैं ने चिढ़ कर कहा.

‘‘अरे कभी न कभी तो करनी है न. वे लोग इंतजार करने को तैयार हैं.’’

‘‘जरूर कोई कमी होगी लड़के में. ऐसे कौन इंतजार करता है.’’

‘‘कोई कमी नहीं है. मैं ने देखा है. अच्छाखासा दिखता है. इंजीनियर है, कमाई भी ठीकठाक है. तुझे भी जरूर पसंद आएगा.’’

अच्छा तो बात यहां तक पहुंच चुकी है. मुझ से पूछे बिना मेरी शादी की बातें हो रही हैं. लड़के देखे जा रहे हैं और पसंद भी किए जा रहे हैं. मुझे अब बहुत चिढ़ होने लगी तो मैं गुस्से से बोली, ‘‘इंजीनियर होने से क्या होता है मम्मा, वह तो मैं भी थी. आजकल तो हर दूसरा बंदा इंजीनियर है.’’

मेरा जीवन भर शादी करने का कोई इरादा नहीं था. लगता था जैसे दुनिया भर की परेशानियां पिछले कुछ सालों में झेल ली थीं और लड़कों को तो मैं बरदाश्त भी नहीं कर सकती थी. विवान की बात अलग थी. मैं उस की एकएक आदत जानती थी और वह मेरी. मुझे पता था उसे किस स्थिति में कैसे संभालना है. बाकी तो आज तक सब लड़कों ने मुझे बेवकूफ ही बनाया था चाहे वे दोस्त हों या कुछ और.

‘‘एक बार मिलने में क्या हरज है बेटा? हम कौन सा जबरदस्ती तेरी शादी करा देंगे,’’ मां ने मनुहार करते हुए कहा.

‘‘पर मुझे शादी करनी ही नहीं है मां,’’ मैं किसी कीमत पर नहीं मानने वाली थी. ये सब घर वालों की साजिश होती है. पहले मिलने में क्या हरज है, फिर रिश्ता ही तो पक्का हुआ है, फिर सगाई भी कर ही देते हैं और आखिर में शादी करा के ही मानते हैं. मुझे इस जाल में नहीं फंसना था.

‘‘क्यों नहीं करनी? मुझे कारण तो बता. कोई है क्या? हो तो बता दे. तू तो जानती है हमें कोई प्रौब्लम नहीं होगी.’’

‘‘हां मां, कोई है.’’ मैं ने हकलाते हुए कहा. मां से झूठ बोलना बहुत बड़ी बात थी. हम दोनों मां बेटी होने से ज्यादा दोस्त थीं, लेकिन अभी मुझे कुछ और सूझ ही नहीं रहा था.

‘‘कौन है, क्या करता है? वहीं का ही है क्या? बताया क्यों नहीं?’’ मां ने एक के बाद एक सवाल दागने शुरू कर दिए.

‘‘मम्मा, आप उस को जानती हो. मेरे साथ कालेज में था. इंजीनियरिंग में. आजकल यहीं है.’’

‘‘कौन, विवान?’’

मां भी न मां ही होती है. मैं हंस पड़ी,  ‘‘हां मां, आप को कैसे पता?’’

‘‘बेटा मैं आप की मां हूं. तू जिस तरीके से उस के बारे में बात करती थी, उस से मुझे लगता तो था कि कुछ न कुछ तो है.’’ मैं कुछ नहीं बोली. मां ही आगे बोलने लगीं, ‘‘तो घर कब ला रही है उसे? पापा से भी तो मिलवाना पड़ेगा न.’’

‘‘नहीं मां, पापा को मत बताना प्लीज. वे पता नहीं क्या सोचेंगे.’’

पापा से मेरा रिश्ता थोड़ा अलग किस्म का था. वह न तो दोस्ती जितना खुला था और न ही पारंपरिक पितापुत्री जैसा दकियानूसी. हम दोनों दुनिया के किसी भी बौद्धिक मुद्दे पर बात कर सकते थे, लेकिन बायफ्रैंड, शादी वगैरह पर कभी नहीं.

‘‘क्या सोचेंगे? वे जानते हैं कि उन की बेटी समझदार है. जो भी फैसला लेगी सोचसमझ कर ही लेगी,’’ मां मेरी बात को समझ ही नहीं रही थीं और मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे रोकूं मां को?

‘‘मां, लेकिन…’’ मैं ने बोलने की कोशिश की.

‘‘अब कुछ लेकिनवेकिन नहीं. तू जब राखी पर आएगी उसे भी साथ ले आना. सब मिल लेंगे,’’ मां ने अंतिम फैसला सुनाते हुए कहा.

मैं ने फोन रख दिया. लेकिन सोच रही थी अब यह एक और नई परेशानी. विवान को मनाना पड़ेगा और कल जो हुआ उस के बाद पता नहीं विवान मानेगा या नहीं. फिर भी कोशिश तो करनी होगी. मैं ने उसे फोन लगाया. उस ने उठाया नहीं. 2-3 बार करने पर भी नहीं उठाया. क्या वह नाराज था या फिर शर्मिंदा?

औफिस भी जाना था. अब बचपन तो था नहीं कि सारा दिन जन्मदिन मनाती फिरूं. बड़े होने का यही नुकसान है. आप छोटीछोटी खुशियों को मनाना छोड़ देते हो. खैर, फटाफट तैयार हो कर औफिस के लिए निकल गई. विवान से बाद में भी बात हो सकती थी.

लंच टाइम के दौरान उस का काल आया,  ‘‘सौरी यार, मीटिंग में था इसलिए फोन नहीं उठा पाया. बोलो?’’

ओह तो यह बात थी. मैं बिना मतलब ही फालतू की बातें सोच रही थी. वह सामान्य रूप से ही बात कर रहा था. फिर भी मैं ने सावधानी से पूछा, ‘‘आज डिनर साथ करें? मुझे कुछ बात करनी है.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं. यह भी कोई पूछने की बात है. मैं शाम को तुम्हें पिक कर लूंगा,’’ उस ने सहजता से कहा.

चलो एक बाधा तो पार हुई. अब सब से बड़ी मशक्कत तो उसे मनाने की थी. सारा दिन यही सोचती रही कि उस से कैसे और क्या कहना है. कभीकभी लगता है कितने झमेले हैं जिंदगी में. आधी से ज्यादा तो लोगों को मनाने में ही निकल जाती है औरबाकी उन की बातें मान कर उन के अनुसार चलने में. शाम को मैं समय से पहले ही नीचे पहुंच गई. मेरे मन में जो उथलपुथल चल रही थी उसे मैं जल्दी से जल्दी शांत करना चाहती थी. कार में बैठ कर भी खुद को संयमित कर पाना मुश्किल हो रहा था.

‘‘विवान, मुझे तुम से एक फेवर चाहिए,’’ मैं ने झिझकते हुए कहा.

‘‘हां बोलो,’’ वह अपनी नजरें सड़क से हटाए बिना बोला.

‘‘क्या तुम मेरे लिए वही कर सकते हो जो मैं तुम्हारे लिए कर रही हूं?’’

‘‘मतलब?’’ उस ने हैरानी से मेरी तरफ देखा.

मैं ने उसे मां से सुबह हुई बात के बारे में बताया. यह भी बताया कि मैं ने मां से कहा है कि वह मेरा बौयफ्रैंड है और क्योंकि मां तुम्हें जानती हैं, इसलिए तुम्हें यह नाटक करना ही पड़ेगा.

‘‘तो यही था जो तुम बदले में मुझ से चाहती थीं?’’ उस ने पूछा.

‘‘नहीं. यह सब तो आज ही हुआ. उस बात को रहने दो. तुम बस मेरी इतनी हैल्प कर दो. मुझे और कुछ नहीं चाहिए,’’ मैं ने दयनीय स्वर में कहा.

वह हंसने लगा, ‘‘तुम पागल हो? तुम जो बोलो मैं वह करने को तैयार हूं. बस परेशानी यह है कि तुम कभी कुछ बोलतीं ही नहीं,’’ उस का हाथ मेरे हाथ पर था, आंखें मेरे चेहरे पर जमी हुई थीं. क्या उस की आंखों में मेरे लिए…? नहींनहीं…

‘‘राखी पर चलना है,’’ मैं ने गला खंखार कर कहा.

‘‘क्या?’’ इस से उस का ध्यान टूट गया,  ‘‘राखी पर तो नहीं उस के 1-2 दिन पहले या बाद में आ जाऊंगा, चलेगा?’’

‘‘थैंक्यू,’’ अब जा कर सांस में सांस आई. अब बस घर जा कर सब ठीक हो जाए.

एक बार फिर से हम मम्मीपापा के सामने बैठे थे. फर्क इतना था कि इस बार मम्मीपापा मेरे थे. घबराहट के मारे विवान के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था. मुझे बड़ा मजा आ रहा था उसे ऐसे देख कर. बड़ी मुश्किल से मैं अपनी हंसी रोक पा रही थी.

‘‘मैं ने शायद पहले तुम्हें कहीं देखा है,’’ पापा ने विवान को देखते हुए कहा. उस ने डर कर मेरी तरफ देखा.

‘‘हां पापा, कालेज में देखा होगा कभी,’’ मैं ने अपना चेहरा सामान्य रखते हुए कहा.

‘‘हो सकता है. अच्छा बेटा पैकेज कितना है तुम्हारा?’’ पापा ने इंटरव्यू शुरू किया.   -क्रमश:

बूटकट फैशन में बौलीवुड स्वैग

हमारा फैशन बौलीवुड के ट्रेंड के हिसाब से बनता और बिगड़ता रहता हैं, किसी नई फिल्म के आने और उसके हिट होते ही उस फिल्म का फैशन ट्रेंड हमारा स्टाइल स्टेटमेंट बन जाता हैं. जिस तरह पुरानी फिल्मों, पुराने गानो को नए तरीके से रीमेक किया जाता है, उसी तरह फैशन का भी रीमेक किया जाता हैं. प्लाजो, क्रौप टौप, लौन्ग स्कर्ट, हाईवैस्ट जीन्स,  बूटकट जीन्स ये सभी 90 के दशक में पहने जाते थे, अब ये सारे लुक फिर से फैशन में आ गए हैं.

1 आलिया का सिंपल बूटकट डेनिम फैशन

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‘स्टूडेंट औफ द इयर’ से अपनी कैरियर की शुरुआत करने वाली आलिया भट्ट भी फैशन के मामले में पीछे नहीं रहती. ब्लू डेनिम बूटकट जीन्स के साथ व्हाइट टी-शर्ट में आलिया अपने दोस्तों के साथ लंच पर जाती नजर आईं. आलिया का ये लुक काफी सिम्पल और डिसेन्ट था.

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2 मलाइका का बूटकट डैनिम लुक

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‘मुन्नी बदनाम’ जैसे आइटम सौंग्स पर सबको नचाने वालीं मलाइका अरोड़ा हमेशा अपने लुक्स और ड्रेसिंग सैंस को लेकर सोशल मीडिया पर छाई रहती हैं. अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर हमेशा एक्टिव रहने वाली मलाइका अपने रिसेंट पोस्ट में बेहद फैशनेबल और कूल लूक के साथ नजर आयी, मलाइका ने ब्लू डेनिम बूटकट जीन्स के साथ लौन्ग फ़ैदर जैकेट और ब्लैक शेड के साथ दिखीं. उनका ये लुक काफी चर्चा में रहा.

3 बूटकट फैशन में दीपिका भी नहीं पीछे

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एक्टिंग की दुनिया में नाम कमाने वाली दीपिका पादुकोण एक बेहतरीन अदाकारा के साथ-साथ एक फैशन दीवा भी हैं. अपनी एक्टिंग के साथ हौट एंड सेक्सी लुक्स के कारण दीपिका हमेशा खबरों में बनी रहती हैं. दीपिका ने भी इस बूटकट स्टाइल को बखूबी कैरी किया. कभी एयरपोर्ट लुक में दीपिका बूटकट जीन्स में नजर आई, तो कई शोज में भी दीपिका को बूटकट स्टाइल की ड्रेसेज में देखा गया.

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Edited by Rosy

#coronavirus: जानिए हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के बारे में रोचक जानकारी

आजकल एक दवा का नाम काफी चर्चा में है, और वो है हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन (Hydroxychloroquine). भारत इसके निर्माण-निर्यात में विश्व में अग्रणीय स्थान पर आता है. कोरोना वायरस के हालात को देखते हुए मलेरिया के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन आजकल खबरों में बनी हुई है क्योंकि यह दवा अर्थराइटिस, मलेरिया और काफी हद तक COVID-19 के इलाज में भी प्रयोग में आ रही है.

आज कई सारे देश इस दवाई की मांग कर रहे हैं. भारत सरकार अब उन जी-20 देशों को, जिन्हें इसकी ज़रूरत है और जिन्होंने प्रार्थना की है, ये दवा उपलब्ध करवा रही है. हालांकि सरकार की प्राथमिकता घरेलू जरूरतों को पूरा करना है.

भारत में मौजूद गरीबी और असंख्य लोगों की अनेकोनेक बीमारियों के कारण सरकारों की पॉलिसी ऐसी रही कि जनता का ध्यान पहले रखा गया. परंतु भारत जैसे देश में अच्छी गुणवत्ता की किन्तु सस्ती दवाइयाँ मिलना एक चैलेंज रहा है. इसका उपाय ढूँढा हमारे डॉक्टरों ने जिन्होंने रिवर्स-इंजीनीयरिंग करके जेनरिक दवाइयाँ ईजाद कीं. इसका परिणाम यह रहा कि आज भारत को विश्व की फार्मेसी कहा जाता है. भारत में इन दवाइयों का आविष्कार हुआ हो या नहीं, किन्तु यहाँ इन दवाइयों का उत्पाद भारी मात्रा में होता है. और फिर ये दवाइयाँ विश्व भर में निर्यात की जाती हैं. यही कारण है कि आज की कोरोना वायरस की स्थिति में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन पाने के लिए सारे विश्व की नज़र भारत पर आकर टिक गयी है.

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हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का उत्पाद करनेवाली कुछ फार्मासूटिकल कंपनियाँ हैं इपका लैब्स, ज़ाइडस, सिपला, एलकेम, टौरेंट, और माइक्रो लैब्स. इनमें से मुंबई स्थित इपका लैब्स और ज़ाइडस सबसे बड़ी उत्पादक हैं. इपका लैब्स भारत सरकार को करीब 10 करोड़ हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवाइयाँ, और साथ ही 3-4 करोड़ राज्यों के लिए भी बनाकर दे रही है. इपका लैब्स के जाइंट एम डी श्रीमान ए के जैन का कहना है कि इस स्थिति में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन बनाने के लिए कुछ सोल्वेंट्स और केमिकल्स में बदलाव लाने की आवश्यकता है जिससे इसको बनाने की लागत में वृद्धि होगी किन्तु भारी माँग की वजह से दवा की कीमतें शायद ही बढ़ाई जाएंगी.

आज अमेरिका व यूरोपीय देशों द्वारा भारत से दवाइयों की ताबड़तोड़ खरीदी की खबरें सामने आ रही हैं. करीब 30 देशों ने भारत से हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की विनती की है. भारत ने अपनी खपत और हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की उपलब्धता को देखते हुए 25 देशों की मांग को स्वीकार कर लिया है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, श्रीलंका, ब्राज़ील, जर्मनी, ब्रितान आदि के राष्ट्रपतियों और प्रधान मंत्रियों ने अपने-अपने ट्वीट में भारत को धन्यवाद दिया है.

क्या आपको इस दवा का इतिहास पता है?

कई वर्षों तक कुनैन को दक्षिण अमेरिकी पेड़ सिनकोना पौधे की छाल से प्राप्त किया गया जो मुख्य रूप से अमेज़न के वर्षावन में पाया जाता है. इस छाल का पेरु, इक्वाडोर और कोलम्बिया के पूर्व-कोलम्बियाई संस्कृतियों द्वारा इसके उपचार और औषधीय प्रभावों के लिए बहुत उपयोग किया गया था. कुनैन एक प्राकृतिक श्वेत क्रिस्टलाइन एलक्लाइड पदार्थ होता है, जिसमें ज्वर रोधी, मलेरिया रोधी, दर्दनाशक (एनल्जेसिक), सूजन रोधी गुण होते हैं.

हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के पीछे एक अत्यंत रोचक कथा है. इसकी कहानी सन 1638 में शुरू हुई जब पेरु के वाइसरॉय की पत्नी – काउंटेस ऑफ चिंकोना को मलेरिया ने जकड़ लिया. सर्वाधिक मान्यता प्राप्त इलाज करने के बजाय उनकी चिकित्सा में एक पेड़ की छाल का प्रयोग किया गया. (बाद में इस पेड़ का नाम उन्हीं के नाम पर चिंकोना पेड़ रखा गया.) इस पेड़ की छाल से काउंटेस ऑफ चिंकोना को नाटकीय रूप से आराम मिला. जब  पेरु के वाइसरॉय स्पेन लौटे तब वो अपने साथ ढेर मात्रा में इस पेड़ की छाल का पाउडर लेते आए जिसका नाम जेसुइट पाउडर पड़ा.

इस छाल का उपयोग प्राकृतिक उपचार के रूप में विभिन्न प्रकार की स्थितियों के लिए किया जाने लगा, खास तौर पर ज्वरनाशक. इसके सभी उपयोग के ऊपर प्रकाश डाला गया. इस कारण से यह सोने की कीमत पर बेचा जाने लगा और इसकी मांग अधिक होने लगी.

ईसाई मिशन से जुड़े कुछ लोग इसे दक्षिण अमेरिका से लेकर आए थे. पहले-पहल उन्होंने पाया कि यह मलेरिया के इलाज में कारगर होती है, किन्तु बाद में यह ज्ञात होने पर कि यह कुछ अन्य रोगों के उपचार में भी काम आ सकती है, उन्होंने इसे बड़े पैमाने पर दक्षिण अमेरिका से लाना शुरू कर दिया.

मूल शुद्ध रूप में कुनैन एक सफेद रंग का क्रिस्टल युक्त पाउडर होता है, जिसका स्वाद कड़वा होता है. ये कड़वा स्वाद ही इसकी पहचान बन चुका है. इस कारण इसे टॉनिक वाटर में भी मिलाया जाता है और अन्य पेय पदार्थों में मिलाया जाता है.

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कुनैन को पेड़ की छाल से अलग होकर अपनी पहचान बनाने में लगभग 2 शताब्दियाँ लगीं. बीसवीं शताब्दी तक कुनैन का प्रयोग अमेरिकी राज्यों में लोक-दवा के तौर पर, मलेरिया का उपचार करने के लिए और सामान्य बीमारियों के लिए किया जाने लगा.

क्लोरोक्वीन का आविष्कार सन 1934 में अमेरिकी दवा कंपनी बेयर द्वारा किया गया. किन्तु इसमें मौजूद विषाक्तताओं के कारण इसे अगले दशक तक बाज़ार में उपलब्ध नहीं करवाया गया. लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान, सन 1940 के दशक में, क्लोरोक्वीन का प्रयोग मलेरिया के उपचार के लिए पेसिफिक में लड़ रहे अमेरिकी सैनिकों के लिए अत्यंत आवश्यक हो गया. इसके बाद सन 1945 में इसके यौजिक में बदलाव करके हाइड्रोक्सिलिन द्वारा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन उत्पन्न की गयी जो कम विषाक्त थी, और आज तक इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया.

आज हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का प्रयोग जोड़ों के दर्द के इलाज में काफी किया जाता है. ये एक ऐसी औषधि है जो कई तरह के उपचारों में काम आती है जैसे चर्मरोग, ऑटोइम्यून कोऔग्लोपैथी, गठिया, संधिवात गठिया, संधिरोग आदि.

दिल्ली के ड्रग्स कंट्रोल ऑफिसर अतुल नासा ने कहा कि जब से स्वास्थ्यकर्मियों और कोविड-19 के संपर्क में आने वाले मरीजों को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन देने की खबर आई थी, तब से लोग इस दवा को खरीदने के लिए दवा की दुकानों पर पहुंचने लगे थे. जबकि इस दवा की जरूरत सभी को नहीं है. उन्होंने कहा कि इस दवा को 15 साल से कम उम्र या 60 साल से ज्यादा आयु वाले लोगों को नहीं दिया जा सकता क्योंकि इसके साइड इफेक्ट्स भी हैं.

एक कप कौफी: भाग-4

मेरा मकसद केवल तुम्हें सच से रूबरू कराना था.’’ गौतमी की कही बात ने अनुप्रिया के दिल को और भी अधिक छलनी कर के उसे आत्मग्लानि के बोझ तले दबा दिया. उसे यह सोच कर शर्म आ रही थी कि वह इस भली औरत का घर तोड़ने चली थी और यह औरत उस पर दोषारोपण करने के बजाय यहां बैठ कर उस से सहानुभूति प्रकट कर रही है. साथ ही साथ उसे अपनेआप पर भी तरस आ रहा था. उस में अब फिर से एकबार खुद को समेटने की ताकत बाकी नहीं थी.

गौतमी ने उस की हालत देख कर उसे दिलासा देने की कोशिश की, ‘‘अनुप्रिया, तुम हिम्मत मत हारो. उस वक्त तुम जैसी मानसिक स्थिति में थीं, ऐसे पराग तो क्या उस के जैसा कोई भी विकृत मानसिकता का पुरुष तुम्हारा फायदा उठा सकता था. मैं यह नहीं कह रही हूं कि जो कुछ हुआ उस में तुम्हारा कोई दोष नहीं है. गलती तुम से भी हुई है. तुम्हें एक बार धोखा खाने के बाद भी इस तरह बिना कुछ सोचेसमझे और आंख मूंद कर पराग पर विश्वास नहीं करना चाहिए था. पर अब उस गलती पर पछता कर या पराग के लिए रो कर अपने वक्त और आंसू बरबाद मत करो, बल्कि इस गलती से सबक ले कर जिंदगी में आगे बढ़ो.’’ ‘‘मुझ में इतनी हिम्मत नहीं है गौतमी…’’

‘‘ऐसा न कहो अनुप्रिया. तुम्हें अपनी जिंदगी में पराग जैसे आदमी की जरूरत नहीं है. अपना स्तर इतना नीचे मत गिरने दो. तुम सुंदर हो, पढ़ीलिखी व स्मार्ट हो. अपना सहारा खुद बनना सीखो. आजकल तलाकशुदा होना या दूसरी शादी करना कोई बुरी बात नहीं है. खुद को थोड़ा वक्त दो और यकीन करो कि तुम्हारी जिंदगी में भी कोई न कोई जरूर आएगा, जो तुम्हारे और अपने रिश्ते को नाम देगा, तुम्हें पत्नी होने का सम्मान देगा,’’ गौतमी ने अनुप्रिया को धैर्य बंधाते हुए कहा.

गौतमी की बात सुन कर अनुप्रिया न चाहते हुए भी मुसकरा उठी और फिर अपने आंसू पोंछते हुए बोली, ‘‘मैं कितना कुछ सोच कर यहां आई थी. मैं आप को अपने रास्ते से हटाना चाहती थी और आप ने मुझे ही सही रास्ता दिखा दिया. आप उम्र में मुझ से बड़ी हैं. अगर आप को एतराज न हो तो क्या मैं आप को दीदी कह सकती हूं?’’ गौतमी के मुसकरा कर सहमति देने पर उस ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘मुझे माफ कर दो दीदी. मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. मैं भी आप के साथ वही करने जा रही थी जो कभी निदा ने मेरे साथ किया था.’’

गौतमी ने आगे बढ़ कर अनुप्रिया के जुड़े हाथों को थाम कर कहा, ‘‘तुम्हें माफी मांगने की जरूरत नहीं है अनुप्रिया. बस जो मैं ने कहा है उस पर विचार करना. सिर उठा कर अपने जीवन में आगे बढ़ने का प्रयास करना.’’ ‘‘मैं वादा करती हूं कि आज के बाद मेरी जिंदगी में पराग या उस के जैसे किसी भी आदमी के लिए कोई जगह नहीं होगी. मैं आगरा वापस चली जाऊंगी. अपने मम्मीपापा के पास रह कर कोई नौकरी ढूंढ़ लूंगी.’’

आज अनुप्रिया खुद को बेहद हलका महसूस कर रही थी. ऐसा लग रहा था मानो सीने से कोई बोझ उतर गया हो. वह भले ही अपने मुंह से खुद को सही कहती आई हो पर उस के मन में बैठा चोर तो यह जानता था कि वह गलत कर रही है और अब वह दुनिया से अपराधी की तरह छिप कर नहीं, इसी तरह खुल कर जीना चाहती थी. गौतमी के शब्दों ने उस के भीतर एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर दिया था. उस ने गौतमी से आग्रह कर के फिर कौफी का और्डर किया और इधरउधर की बातें करने लगीं. कौफी पीते हुए अनुप्रिया गौतमी को देख कर यह सोच रही थी कि यदि 2 वर्ष पहले वह भी इसी तरह हिम्मत जुटा कर तरुण और निदा के सामने दीवार बन कर खड़ी हो गई होती तो आज शायद उस की स्थिति कुछ और ही होती. उस की आंखों में शर्म व ग्लानि के बजाय स्वाभिमान व जीत की चमक होती. वह अपनी शादी को बचा पाती या नहीं यह तो वक्त ही बताता पर कम से कम मन में यह संतोष तो होता कि उस ने अपने रिश्ते को बचाने का पूरा प्रयास किया और आज वह इतनी बड़ी गलती कर के गौतमी के सामने शर्मिंदा होने से बच जाती. काश, उस का दिल व सोच का दायरा गौतमी की तरह बड़ा होता. आज गौतमी के साथ पी कौफी ने जिंदगी व रिश्तों के प्रति उस की सोच ही बदल कर रख दी थी. ‘‘अच्छा, अब मैं चलती हूं. सिद्धार्थ को मांजी के पास छोड़ कर आई हूं. उस ने परेशान कर रखा होगा,’’ कहते हुए गौतमी उठ खड़ी हुई.

गौतमी जाने के लिए मुड़ी ही थी कि अनुप्रिया ने उसे रोका, ‘‘गौतमी दीदी.’’ गौतमी के पलट कर देखने पर उस ने वह प्रश्न पूछ लिया जो उसे बेचैन कर रहा था, ‘‘आप ने पराग को इतनी आसानी से कैसे माफ कर दिया? सिद्धार्थ के लिए?’’

‘‘मैं ने ऐसा कब कहा कि मैं ने पराग को माफ कर दिया है?’’ ‘‘पर आप ने मुझे तो माफ कर दिया है, फिर पराग को क्यों नहीं?’’

‘‘तुम्हारी बात अलग है अनुप्रिया. तुम दोषी के साथ पीडि़ता भी थीं. धोखा तो तुम ने भी खाया है, इसलिए मैं ने तुम्हें माफ कर दिया. तुम मेरी कुछ नहीं लगती थीं पर पराग तो मेरा अपना था न. उस ने जानबूझ कर मुझे धोखा दिया. यदि मैं ने उसे रंगे हाथों नहीं पकड़ा होता तो वह आज भी मुझ से छिप कर तुम से मिल रहा होता.’’ ‘‘पर अब तो वह अपना ट्रांसफर करा रहा है…मेरा यकीन मानिए, अब हम दोनों कभी नहीं मिलेंगे. क्या अब भी आप उसे माफ नहीं करेंगी?’’

गौतमी ने अनुप्रिया की ओर डबडबाई आंखों से देख कर कहा, ‘‘तुम्हें क्या लगता है कि तुम पराग की पहली और आखिरी गलती हो? तुम से पहले भी वह ऐसी गलती और पश्चाताप कर चुका है. उस ने मुझ से माफी केवल इसलिए मांगी है, क्योंकि वह पकड़ा गया है और रही बात ट्रांसफर की तो वह भी उस का नाटक ही है. उसे सुधरना होता तो पहली बार गलती पकड़े जाने पर ही सुधर गया होता. पराग जैसे फरेबी आदमी अपने मुखौटे बदल सकते हैं, फितरत नहीं. आज मैं उसे फिर माफ कर दूंगी तो वह एक बार फिर से यही सब करेगा और पकड़े जाने पर मुझ से माफी मांग लेगा. इस तरह तो यह सिलसिला यों ही चलता रहेगा. मेरा स्वाभिमान मुझे अब पराग को माफ करने की इजाजत नहीं देता है.’’

जिस गौतमी की आंखों में अनुप्रिया ने अब तक केवल आत्मविश्वास व हिम्मत को देखा था, उन में इतना दर्द समाया होगा उस ने यह कल्पना नहीं की थी. उस ने गौतमी की तकलीफ को अपने भीतर महसूस करते हुए पूछा, ‘‘पर दीदी, ट्रांसफर… आप यहां अकेली सिद्धार्थ को कैसे संभालेंगी?’’

‘‘पराग कोई दूध पीता बच्चा नहीं, जो अकेला किसी और शहर में नहीं रह पाएगा. उसे यहां रहते हुए भी अपनी बीवी और बच्चे की जरूरत कहां थी. जहां जाएगा वहां एक और अनुप्रिया या निदा ढूंढ़ ही लेगा. मुझे और सिद्धार्थ को पराग की जरूरत नहीं है. मैं पहले भी सिद्धार्थ को अकेली ही पाल रही थी, आगे भी पाल लूंगी. ‘‘पढ़ीलिखी हूं, बेहतर ढंग से अपनी और सिद्धार्थ की जिंदगी को संवार कर उसे एक अच्छा भविष्य दे सकती हूं. आज तक मैं ने पराग को और अपने रिश्ते को बदले में कुछ चाहे बिना अपना सबकुछ दिया है, पर अब मेरे पास उसे देने के लिए कुछ नहीं है, माफी भी नहीं,’’ कह कर गौतमी तेज कदमों से चलती हुई कैफे से बाहर निकल गई और पीछे रह गई अनुप्रिया जो अब भी कभी कैफे के दरवाजे को तो कभी मेज पर पड़े कौफी के कप को देख रही थी.

#lockdown: फैमिली के लिए बनाएं Cheese आलू कटलेट

अगर आप लौकलाउन में अपनी फैमिली के लिए स्नैक्स में कुछ टेस्टी और हेल्दी डिश बनाना चाहते हैं. तो बनाए अपनी फैमिली के लिए चीज आलू कटलेट. ये कम समय में बनने वाली डिश है, जो बच्चों को पसंद आएगी.

हमें चाहिए

–  3-4 उबले आलू

–  2-3 हरीमिर्चें

–  1/4 कप धनियापत्ती कटी

–  1/2 छोटा चम्मच अमचूर पाउडर

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–  1/2 छोटा चम्मच धनिया पाउडर

–  1/2 छोटा चम्मच लालमिर्च कुटी

–  नमक स्वादानुसार.

भरावन के लिए चाहिए

–  3 बड़े चम्मच चीज स्प्रैड

–  2 बड़े चम्मच कसा पनीर

–  तेल तलने के लिए

–  3 बड़े चम्मच मैदा

–  1 कप ब्रैडक्रंब्स.

बनाने का तरीका

उबले आलुओं को छील कर कद्दूकस कर लें. भरावन की सामग्री छोड़ बाकी सारी सामग्री एकसाथ मिला कर अच्छी तरह गूंध लें. अब इस के मध्यम आकार के गोले बना लें. अब 1-1 बौल्स लें. उस में उंगली से एक छेद बना उस में पनीर और चीज स्प्रैड को मिला कर बना मिश्रण भरें और सावधानी से छेद बंद कर दें. मैदे का घोल बना लें. बौल्स को मैदे के घोल में डुबो कर ब्रैडक्रंब्स में लपेटे गरम तेल में तल कर चटनी के साथ परोसें.

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प्रयास: भाग-3

मगर पार्थ अगली सुबह नहीं आए. अब तक मैं यह तो जान ही चुकी थी कि मैं अपना बच्चा खो चुकी हूं. लेकिन उस का कारण नहीं समझ पा रही थी. न तो मैं शारीरिक रूप से कमजोर थी और न ही कोई मानसिक परेशानी थी मुझे. कोई चोट भी नहीं पहुंची थी. फिर वह क्या चीज थी जिस ने मुझ से मेरा बच्चा छीन लिया?

2 दिन बाद पार्थ मुझ से मिलने आए. न जाने क्यों मुझ से नजरें चुरा रहे थे. पिछले कुछ महीनों का दुलारस्नेह सब गायब था. मांजी के व्यवहार में भी एक अजीब सी झिझक मुझे हर पल महसूस हो रही थी.

खैर, मुझे अस्पताल से छुट्टी मिलने के कुछ ही दिन बाद मांजी चली गईं, लेकिन मेरे और पार्थ के बीच की खामोशी गायब होने का नाम ही नहीं ले रही थी. शायद मुझ से ज्यादा पार्थ उस बच्चे को ले कर उत्साहित थे. कई बार मैं ने बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने कभी अपनी नाराजगी को ले कर मुंह नहीं खोला.

उस दिन से ले कर आज तक कुछ नहीं बदला था. एक ही घर में हम 2 अजनबियों की तरह रह रहे थे. अब न तो पार्थ का गुस्सैल रूप दिखता था और न ही स्नेहिल. अजीब से कवच में छिप गए थे पार्थ.

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अचानक आई तेज खांसी ने मेरी विचारशृंखला को तोड़ दिया. पानी पीने के लिए उठी तो छाती में दर्द महसूस हुआ. ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने जकड़ लिया हो. पानी पीपी कर जैसेतैसे रात काटी. सुबह उठी, तब भी बदन में हरारत हो रही थी. बिस्तर पर पड़े रहने से और बीमार पड़ूंगी, यह सोच कर उठ खड़ी हुई. पार्थ के लिए नाश्ता बनाते वक्त भी मैं खांस रही थी.

‘‘तुम्हें काफी दिनों से खांसी है. पूरी रात खांसती रहती हो,’’ नाश्ते की टेबल पर पार्थ ने कहा.

‘‘उन की आवाज सुन कर मैं लगभग चौंक पड़ी. पिछले कुछ दिनों से उन की आवाज ही भूल चुकी थी मैं.’’

‘‘बस मामूली सी है, ठीक हो जाएगी,’’ मैं ने हलकी मुसकान के साथ कहा.

‘‘कितनी थकी हुई लग रही हो तुम? कितनी रातों से नहीं सोई हो?’’ पार्थ ने माथा छू कर कहा, ‘‘अरे, तुम तो बुखार से तप रही हो. चलो, अभी डाक्टर के पास चलते हैं.’’

‘‘लेकिन पार्थ…’’ मैं ने कुछ बोलने की कोशिश की, लेकिन पार्थ नाश्ता बीच में ही छोड़ कर खड़े हो चुके थे.

गाड़ी चलाते वक्त पार्थ के चेहरे पर फिर से वही परेशानी. मेरे लिए चिंता दिख रही थी. मेरा बीमार शरीर भी उन की इस फिक्र को महसूस कर आनंदित हो उठा.

जांच के बाद डाक्टर ने कई टैस्ट लिख दिए. इधर पार्थ मेरे लिए इधरउधर भागदौड़ कर रहे थे, उधर मैं उन की इस भागदौड़ पर निहाल हुए जा रही थी. सूई के नाम से ही घबराने वाली मैं ब्लड टैस्ट के वक्त जरा भी नहीं कसमसाई. मैं तो पूरा वक्त बस पार्थ को निहारती रही थी.

मेरी रिपोर्ट अगले दिन आनी थी. पार्थ मुझे ले कर घर आ गए. औफिस में फोन कर के 3 दिन की छुट्टी ले ली. मेरे औफिस में भी मेरे बीमार होने की सूचना दे दी.

‘‘कितने दिन औफिस नहीं जाओगे पार्थ? मैं घर का काम तो कर ही सकती हूं,’’ पार्थ को चाय बनाते हुए देख मैं सोफे से उठने लगी.

‘‘चुपचाप लेटी रहो. मुझे पता है मैं क्या कर रहा हूं,’’ उन्होंने मुझे झिड़कते हुए कहा.

‘‘अच्छा बाबा… मुझे काम मत करने दो… मांजी को बुला लो,’’ मैं ने सुझाव दिया.

कुछ देर तक पार्थ ने अपनी नजरें नहीं उठाईं. फिर दबे स्वर में कहा, ‘‘नहीं, मां को बेवजह परेशान करने का कोई मतलब नहीं है. मैं बाई का इंतजाम करता हूं.’’

‘‘बाई? पार्थ ठीक तो है?’’ मैं ने सोचा.

एक बार जब मैं ने झाड़ूपोंछे के लिए बाई का जिक्र किया था तो पार्थ भड़क उठे थे, ‘‘बाइयां घर का काम बिगाड़ती हैं. आज तक तो तुम्हें घर का काम करने में कोई परेशानी नहीं हुई थी. अब अचानक क्या दिक्कत आ गई?’’

‘‘पार्थ, तुम्हें पता है न मुझे सर्वाइकल पेन रहता है. दर्द के कारण रात भर सो नहीं पाती,’’ मैं ने जिद की.

‘‘देखो श्रेया, अभी हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं कि घर में बाई लगा सकें,’’ उन्होंने अपना रुख नर्म करते हुए कहा.

मगर मैं ने पूरी प्लानिंग कर रखी थी. अत: बोली, ‘‘अरे, उस की तनख्वाह मैं अपने पैसों से दे दूंगी.’’

मेरी बात सुनते ही पार्थ का पारा चढ़ गया. बोले, ‘‘अच्छा, अब तुम मुझे अपने पैसों का रोब दिखाओगी?’’

‘‘नहीं पार्थ, ऐसा नहीं है,’’ मैं ने सकपकाते हुए कहा.

‘‘इस घर में कोई बाई नहीं आएगी. अगर जरूरत पड़ी तो मां को बुला लेंगे,’’ उन्होंने करवट लेते हुए कहा.

आज वही पार्थ मांजी को बुलाने के बजाय बाई रखने पर जोर दे रहे थे. पिछले कुछ दिनों से पार्थ सिर्फ मुझ से ही नहीं मांजी से भी कटने लगे थे. अब तो मांजी का फोन आने पर भी संक्षिप्त बात ही करते थे.

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कहां, क्या गड़बड़ थी मुझे समझ नहीं आ रहा था. अपना बच्चा खोने के कारण मुझे कुसूरवार मान कर रूखा व्यवहार करना समझ आता था, लेकिन मांजी से उन की नाराजगी को मैं समझ नहीं पा रही थी.

अगली सुबह अस्पताल जाने से पहले ही मांजी का फोन आ गया. पार्थ बाथरूम में थे तो मैं ने ही फोन उठाया.

‘‘हैलो, हां श्रेया कैसी हो बेटा?’’ मेरी आवाज सुनते ही मांजी ने पूछा.

‘‘ठीक हूं मांजी. आप कैसी हैं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘बस बाबा की कृपा है बेटा. पार्थ से बात कराना जरा.’’

तभी पार्थ बाथरूम से निकल आए, तो मैं ने मोबाइल उन के हाथ में थमा दिया. उन की बातचीत से तो नहीं, लेकिन इन के स्वर की उलझन से मुझे कुछ अंदेशा हुआ, ‘‘क्या हुआ? मांजी किसी परेशानी में हैं क्या?’’ पार्थ के फोन काटने के बाद मैं ने पूछा.

‘‘अरे, उन्हें कहां कोई परेशानी हो सकती है. उन की रक्षा के लिए तो दुनिया भर के बाबा हैं न,’’ उन्होंने कड़वाहट से उत्तर दिया.

‘‘वह उन की आस्था है पार्थ. इस में इतना नाराज होने की क्या बात है? उन का यह विश्वास तो सालों से है और जहां तक मैं जानती हूं अब तक तुम्हें इस बात से कोई परेशानी नहीं थी. अब अचानक क्या हुआ?’’ मैं ने शांत स्वर में पूछा.

‘‘ऐसी आस्था किस काम की है श्रेया जो किसी की जान ले ले,’’ उन्होंने नम स्वर में कहा.

मैं अचकचा गई, ‘‘जान? मांजी किसी की जान थोड़े ही लेंगी पार्थ. तुम भी न.’’

‘‘मां नहीं, लेकिन उन की आस्था एक जान ले चुकी है,’’ पार्थ का स्वर गंभीर था. वे सीधे मेरी आंखों में देख रहे थे. उन आंखों का दर्द मुझे आज नजर आ रहा था. मैं चुप थी. नहीं चाहती थी कि कई महीनों से जो मेरे दिमाग में चल रहा है वह सच बन कर मेरे सामने आए.

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