जरा सी आजादी: भाग-1

‘‘आखिर क्या कमी है जो तुम्हें कुछ भी अच्छा नहीं लगता. दिमाग तो ठीक है न तुम्हारा. तुम तो मुझे भी पागल कर के छोड़ोगी, नेहा. इतना समय नहीं है मेरे पास जो हर समय तुम्हारा ही चेहरा देखता रहूं.’’

एक कड़वी सी मुसकान चली आई नेहा के होंठों पर. बोली, ‘‘समय तो कभी नहीं रहा तुम्हारे पास. जब जवानी थी तब समय नहीं था, अब तो बुढ़ापा सिर पर खड़ा है जब अपने पेशे के शिखर पर हो तुम. इस पल तुम से समय की उम्मीद तो मैं कर भी नहीं सकती.’’

‘‘क्या चाहती हो? क्या छुट्टी ले कर घर बैठ जाऊं? माना आज बैठ भी गया तो कल क्या होगा. कल फिर तुम्हारा मन नहीं लगेगा, फिर क्या करोगी? कोई ठोस हल है?’’

तौलिया उठा कर ब्रजेश नहाने चले गए. आज एक मीटिंग भी थी. नेहा ने उन्हें जरूरी तैयारी भी करने नहीं दी. वे समझ नहीं पा रहे थे आखिर वह चाहती क्या है. सब तो है. साडि़यां, गहने, महंगे साधन जो भी उन की सामर्थ्य में है सब है उन के घर में. अभी इकलौते बेटे की शादी कर के हटे हैं. पढ़ीलिखी कमाऊ बहू भी मिल चुकी है. जीवन के सभी कोण पूरे हैं, फिर कमी क्या है जो दिल नहीं लगता. बस, एक ही रट है, दिल नहीं लगता, दिल नहीं लगता. हद होती है हर चीज की.

जीवन के इस पड़ाव पर परेशान हो चुके हैं ब्रजेश. रिटायरमैंट को 3 साल रह गए हैं. कितना सब सोच रखा है, बुढ़ापा इस तरह बिताएंगे, उस तरह बिताएंगे. जीवनभर की थकान धीरेधीरे अपनी मरजी से जी कर उतारेंगे. आज तक अपनी इच्छा से जिए कब हैं? पढ़ाई समाप्त होते ही नौकरी मिल गई थी. उस के बाद तो वह दिन और आज का दिन.

पिताजी पर बहनों की जिम्मेदारी थी इसलिए जल्दी ही उन का सहारा बन जाना चाहते थे ब्रजेश. अपना चाहा कभी नहीं किया. पिता की बहनें और फिर अपनी बहनें… सब को निभातेनिभाते यह दिन आ गया. अपना परिवार सीमित रखा, सब योजनाबद्ध तरीके से निबटा लिया. अब जरा सुख की सांस लेने का समय आया है तो नेहा कैसी बेसिरपैर की परेशानी देने लगी है. नींद नहीं आती उसे, परेशान रहती है, अकेलेपन से घबराने लगी है. बारबार एक ही बात कहती है, उस का दिल नहीं लगता. उस का मन उदास होने लगा है.

कुछ दिन के लिए मायके भी भेज दिया था उसे. वहां से भी जल्दी ही वापस आ गई. पराए घर में वह थोड़े न रहेगी सारी उम्र. उस का घर तो यह है न, जहां वह रहती है. कुछ दिन बहू के पास भी रहने गई. वह घर भी अपना नहीं लगा. वह तो बहू का घर है न, वह वहां कैसे रह सकती है.

रिटायरमैंट के बाद एक जगह टिक कर बैठेंगे तब शायद साथसाथ रहने के लिए बड़ा घर ले लें. अभी जब तक नौकरी है हर 3-4 साल के बाद उन्हें तो शहर बदलना ही है. उस शहर में आए मात्र  4 महीने हुए हैं. यह नई जगह नेहा को पसंद नहीं आ रही. नया घर ही मनहूस लग रहा है.

‘‘अड़ोसपड़ोस में आओजाओ, किसी से मिलोजुलो. टीवी देखो, किताबें पढ़ो. अपना दिल तो खुद ही लगाना है न तुम्हें, अब इस उम्र में मैं तुम्हें दिल लगाना कैसे सिखाऊं,’’ जातेजाते ब्रजेश ने समझाया नेहा को.

हर रोज यही क्रम चलता रहता है. जीवन एकदम रुक जाता है जब ब्रजेश चले जाते हैं, ऐसा लगता है हवा थम गई है, इतनी भारी हो कर ठहर गई है कि सांस भी नहीं आती. छाती पर भी हवा ही बोझ बन कर बैठ गई है.

बेमन से नहाई नेहा, तौलिया सुखाने बालकनी में आई. सहसा आवाज आई किसी की.

‘‘नमस्कार, भाभीजी. इधर देखिए, ऊपर,’’ ताली बजा कर आवाज दी किसी ने.

नेहा ने आगेपीछे देखा, कोई नजर नहीं आया तो भीतर जाने लगी.

‘‘अरेअरे, जाइए मत. इधर देखिए न बाबा,’’ कह कर किसी ने जोर से सीटी बजाई.

सहसा ऊपर देखा नेहा ने. चौथे माले पर एक महिला खड़ी थी.

‘‘क्या हैं आप भी. इस उम्र में मुझ से सीटी बजवा दी. कोई अड़ोसीपड़ोसी देखता होगा तो क्या कहेगा, बुढि़या का दिमाग घूम गया है क्या. नमस्कार, कैसी हैं आप?’’

हंस रही थी वह महिला. नेहा से जानपहचान बढ़ाना चाह रही थी. कहां से आए हैं? नाम क्या है? पतिदेव क्या काम करते हैं?

‘‘आप से पहले जो इस फ्लैट में थे उन से मेरी बड़ी दोस्ती थी. उन का तबादला हो गया. आप से रोज मिलना चाहती हूं मैं, आप मिलती ही नहीं. वाशिंग मशीन पिछली बालकनी में रख लीजिए न. इसी बहाने सूरत तो नजर आएगी.

‘‘अरे, कपड़े धोते समय ही किसी का हालचाल पूछा जाता है. सारा दिन बोर नहीं हो जातीं आप? क्या करती रहती हैं? आज क्या कर रही हैं?’’

‘‘कुछ भी तो नहीं. आप आइए न मेरे घर.’’

‘‘जरूर आऊंगी. आज आप आ जाइए. एक बार बाहर तो निकल कर देखिए, आज मेरे घर किट्टी पार्टी है. सब से मुलाकात हो जाएगी.’’

कुछ सोचा नेहा ने. किट्टी डालना ब्रजेश को पसंद नहीं है. बिना किट्टी डाले वह कैसे चली जाए. चलती किट्टी में जाना अच्छा नहीं लगता.

‘‘आप मेरी मेहमान बन कर आइए न. इधर से घूम कर आएंगी तो फ्लैट नं. 22 सी नजर आएगा. चौथी मंजिल. जरूर आइएगा, नेहाजी.’’

हाथ हिला दिया नेहा ने. मन ही नहीं कर रहा था. साड़ी निकाल कर रखी थी कि चली जाएगी मगर मन माना ही नहीं, सो, वह नहीं गई. वह दिन बीत गया और भी कई दिन. एक शाम वही पड़ोसन दरवाजे पर खड़ी नजर आई.

‘‘आइए,’’ भारी मन से पुकारा नेहा ने.

‘‘अरे भई, हम तो आ ही जाएंगे जब आ गए हैं तो. आप क्यों नहीं आईं उस दिन? मन नहीं घबराता क्या? एक तरफ पड़ेपड़े तो रोटी भी जल जाती है. उसे भी पलटना पड़ता है. आप कहीं बाहर नहीं निकलतीं, क्या बात है? सामने निशा से पूछा था मैं ने, उस ने बताया कि आप उस से भी कभी नहीं मिलीं.’’

आने वाली महिला का व्यवहार नेहा को इतना अपनत्व भरा लगा कि सहसा आंखें भर आईं. रोटी भी एक ही तरफ पड़ेपड़े जल जाती है तो वह भी जल ही तो गई है न. क्या फर्क है उस में और एक जली रोटी में. जली रोटी भी कड़वी हो जाती है और वह भी कड़वी हो चुकी है. हर कोई उस से परेशान है.

‘‘नेहाजी, क्या बात है? कोई परेशानी है?’’

गरदन हिला दी नेहा ने, न ‘न’ में न ‘हां’ में. कंधे पर हाथ रखा उस ने. सहसा रोना निकल गया. उस के साथ ही चली आई वह भीतर.

‘‘घर इतना बंदबंद क्यों रखा है? खिड़कियांदरवाजे खोलो न. ताजी हवा अंदर आने दो. उस दिन आईं क्यों नहीं?’’ सहसा थोड़ा रुक कर पूछा.

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आंखें मिलीं नेहा से. भीगी आंखों में न जाने क्या था, न कुछ कहा न कुछ सुना. नेहा ने नहीं, शायद आने वाली महिला ने ही एक नाता सा बांध लिया.

‘‘मेरा नाम शुभा है. तुम मुझे जैसे चाहो पुकार सकती हो. दीदी कहो, भाभी कहो, नाम भी ले सकती हो. मेरी उम्र 53 साल है, हिसाब लगा लो, कैसे बुलाना चाहती हो. तुम छोटी लग रही हो मुझ से.’’

‘‘जी, मेरी उम्र 50 साल है.’’

‘‘वैसे किसी खूबसूरत महिला से उस की उम्र पूछनी तो नहीं चाहिए थी मगर महिला तुम जैसी हो तो कहना ही क्या, जो खुद अपने को 50 की बता रही हो. तुम इतनी बड़ी तो नहीं लगती हो. मैं नाम ले कर पुकारूं? नेहा पुकारूं तुम्हें?’’

‘‘जी, जैसा आप को अच्छा लगे.’’

‘‘मुझे अच्छा लगे क्यों. तुम्हें क्या अच्छा लगता है, यह तो बताओ.’’

चुप रही नेहा. शुभा ने कंधे पर हाथ रखा. झिलमिलझिलमिल करती आंखों में ढेर सारा नमकीन पानी शुभा को न जाने क्याक्या बता गया.

‘‘जो तुम्हें अच्छा लगे मैं वही पुकारूंगी तुम्हें. तुम से पहले जो इस घर में रहती थी उस से मेरा बहुत प्यार था. यह घर मेरे लिए पराया नहीं है, उसी अधिकार से चली आई हूं. मीरा नाम

था उस का जो यहां रहती थी. बहुत प्यारी सखी थी वह मेरी. तुम भी

उतनी ही प्यारी हो. जरा दरवाजे- खिड़कियां तो खोलो.’’

‘‘उन को दरवाजेखिड़कियां खोलना अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘उन को किसी के साथ हंसनाबोलना भी पसंद है कि नहीं? उस दिन तुम किट्टी पार्टी में भी नहीं आईं.’’

‘‘उन्हें किट्टी डालना पसंद नहीं.’’

‘‘तुम्हारे बच्चे कहां हैं. बाहर होस्टल में पढ़ते हैं क्या?’’

‘‘एक ही बेटा है. अभी 4 महीने पहले ही उस की शादी हुई है.’’

‘‘अरे वाह, सास हो तुम. सास हो कर भी उदास हो. भई, बहू को 2-4 जलीकटी सुनाओ, अपनी भड़ास निकालो और खुश रहो. टीवी सीरियल में यही तो सिखाते हैं. शादी होती है, उस के बाद एक तो रोती ही रहती है, या बहू रुलाती है या सास. तुम्हारे यहां क्या सीन है?’’

‘‘मैं तो यहां अकेली हूं. बहू आगरा में है. दूरदूर रहना है जब, तब लड़ाई कैसी?’’

‘‘बहू तुम ने पसंद की थी या भाईसाहब ने?’’

‘‘किसी ने भी नहीं. उन दोनों ने ही एकदूसरे को पसंद कर लिया था.’’

‘‘चलो, मेहनत कम हुई. मुझे तो अपने बच्चों के लिए साथी ही ढूंढ़ने में बहुत मेहनत करनी पड़ी. कहीं परिवार अच्छा नहीं था, कहीं लड़की पसंद नहीं आती थी.’’

शुभा ने धीरेधीरे घर की खिड़कियां खोलनी शुरू कर दीं. ताजी हवा घर में आने लगी.

‘‘आज खाने में क्या बनाया था तुम ने?’’

‘‘कुछ नहीं.’’

‘‘कुछ नहीं, मतलब. भूखी हो सुबह से? अभी शाम के 6 बज रहे हैं. तुम ने कुछ भी खाया नहीं है.’’

शुभा ने हाथ पकड़ा नेहा का. रोक कर रखा बांध बह निकला. एक अनजान पड़ोसन के गले लग नेहा फूटफूट कर रो पड़ी. शुभा भी उस का माथा सहलाती रही.

‘‘चलो, तुम्हारी रसोई में चलें. बेसन है न घर में. पकौड़े बनाते हैं. आटा तो गूंध रखा होगा, चपाती के साथ पकौड़े और गरमगरम चाय पीते हैं.’’

आननफानन ही सब हो गया. आधे घंटे के बाद ही दोनों मेज पर बैठी चाय पी रही थीं.

‘‘क्यों इतना उदास हो, नेहा? खुश होना चाहिए तुम्हें. नए शहर में आई हो, उदासी स्वाभाविक है, मैं मानती हूं मगर इतनी नहीं कि भूखे ही मरने लगो. एक ही बच्चा है जिसे पालपोस दिया, उस का घर बसा दिया. तुम्हारा कर्तव्य पूरा हो गया, और क्या चाहिए?’’

‘‘बहुत खालीपन लगता है, दीदी. जी चाहता है कि अपने साथ कुछ कर लूं. जीवन और क्यों जीना, अब क्या करना है मुझे, किसे मेरी जरूरत है?’’

‘‘अपने साथ कुछ कर लूं, क्या मतलब?’’ शुभा का स्वर तनिक ऊंचा हो गया.

‘‘कुछ खा कर मर जाऊं.’’

‘‘क्या?’’ अवाक् रह गई शुभा. अनायास उस के सिर पर चपत लगा दी.

‘‘पागल हो क्या. अपने परिवार और अपनी बहू को सजा देना चाहती हो क्या? मर कर उन का क्या बिगाड़ लोगी. तुम्हें क्या लगता है वे उम्रभर रोते रहेंगे? जो जाएगा तुम्हारा जाएगा, किसी का क्या जाएगा.

खालीपन लगता है तो क्या मर कर भरोगी उसे? पति, बेटा और बहू के सिवा भी तुम्हारे पास कुछ है, नेहा. तुम्हारे पास तुम हो, अपनी इज्जत करना सीखो. पति को खिड़की खोलना पसंद नहीं तो तुम खिड़कीदरवाजे बंद कर के बैठी हो. पति को किट्टी डालना पसंद नहीं तो उस दिन तुम मेरे घर ही नहीं आईं. इतना कहना क्यों मान रही हो कि घुट कर मर जाओ?’’

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‘‘शुरू से… शुरू से ऐसा ही है. मैं चाहती थी दूसरा बच्चा हो, ये माने ही नहीं. जीवन में मैं ने तो कभी सांस भी खुल कर नहीं ली. सोचा था मनपसंद लड़की को बहू बना कर लाऊंगी, सोचा था बेटी की इच्छा पूरी हो जाएगी. बेटे ने अपनी पसंद की ढूंढ़ ली. मेरी पसंद मन में ही रह गई.’’

‘‘अच्छा किया बेटे ने. अपनी पसंद से तो जी रहा है न. क्या चाहती हो कि आज से 20-30 साल बाद वह भी वही भाषा बोले जो आज तुम बोल रही हो. तुम आज कह रही हो न अपने तरीके से जी नहीं पाई, क्या चाहती हो कि तुम्हारा बच्चा भी तुम्हारी तरह अपना जीवन खालीपन से भरा पाए. अपनी पसंद से जी नहीं पाई और मर जाना चाहती हो. क्या तुम्हारा बच्चा भी…’’

‘‘नहीं… नहीं तो दीदी,’’ सहसा जैसे कुछ कचोटा नेहा को, ‘‘मेरे बच्चे को मेरी उम्र भी लग जाए.’’

‘‘अपने बच्चे को अपनी उम्र देना चाहती हो लेकिन चैन से जीने देना नहीं चाहती. कैसी मां हो? मर कर उम्रभर का अपराधबोध देना चाहती हो. तुम तो मर कर चली जाओगी लेकिन तुम्हारा परिवार चेहरे पर प्रश्नचिह्न लिए उम्रभर किसकिस के प्रश्न का उत्तर देता रहेगा. अरे, मन में जो है आज ही कह कर भड़ास निकाल लो. सुन लो, सुना दो, किस्सा खत्म करो और जिंदा रहो.’’

सहसा शुभा का हाथ नेहा के हाथ पर पड़ा. कलाई में रूमाल बांध रखा था नेहा ने.

‘‘यह क्या हुआ, जरा दिखाना तो,’’ झट से रूमाल खींच लिया. हाथ सीधा किया, ‘‘अरे, यह क्या किया? यहां काटा था क्या? कब काटा था? ताजे खून के निशान हैं. क्या आज ही काटा? क्या अभी यही काम कर रही थीं जब मैं आई थी?’’

काटो तो खून नहीं रहा शुभा में. यह क्या देख लिया उस ने. यह अनजानी औरत जिस से वह पड़ोसी धर्म निभाने चली आई, क्या भरोसे लायक है? अभी अगर इस के जाने के बाद इस ने यह असफल प्रयास सफल बना लिया तो क्या से क्या हो जाएगा? आत्महत्या या हत्या, इस का निर्णय कौन करेगा? वही तो होगी आखिरी इंसान जो नेहा से मिली. कहीं उसी पर कोई मुसीबत न आ जाए.

‘‘नहीं तो दीदी. चूड़ी टूट कर लग गई थी.’’

‘‘भाईसाहब वापस कब आते हैं औफिस से?’’

‘‘वे तो 9-10 बजे से पहले नहीं आते. आजकल ज्यादा काम रहता है, मार्च का महीना है न.’’

‘‘तुम चलो मेरे साथ, मेरे घर. जब वे आएंगे, तुम्हें उधर से ही लेते आएंगे. तुम अकेली मत रहो.’’

‘‘मैं तो पिछले कई सालों से अकेली हूं. अब थक गई हूं. एक ही बेटे में सब देखती रही. आज वह भी मुझे एक किनारे कर पराई लड़की का हो गया. मैं खाली हाथ रह गई हूं, दीदी. पति तो पहले ही अपने परिवार के थे. मेरी इच्छा उन के लिए न कल कोई मतलब रखती थी न आज रखती है. बेटा अपनी पत्नी की इच्छा पर चलता है, पति अपने तरीके से चलते हैं. दम घुटता है मेरा. सांस ही नहीं आती. इन से कुछ कहती हूं तो कहते हैं, मेरा घर है, जैसा मैं कहता हूं वैसा ही होगा. बहू का घर उस का घर होना ही चाहिए. तो फिर मेरा घर कहां है, दीदी?

‘‘मायके जाती हूं तो वहां लगता है यह भाभी का घर है. वहां मन नहीं लगता. पति कहते हैं कि क्या कमी है, साडि़यां हैं, गहने हैं. भला साडि़यां, गहनों से क्या कोई सुखी हो जाता है? मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता. मैं तो अपने घर में एक पत्ता भी हिला नहीं सकती. यह सोफासैट इधर से उधर कर लूंगी तो भी तूफान आ जाएगा. बेजान गुडि़या हूं मैं, जिसे चूं तक करने का अधिकार नहीं है.’’

अवाक् रह गई शुभा. नेहा की परेशानी समझ रही थी वह. इस की जगह अगर वह भी होती तो शायद उस की भी यही हालत होती.

‘‘कल सोफासैट से ही शुरुआत करते हैं.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि अभी खिड़कियां खोली हैं न. इन्हें आज बंद मत करना. कहना मेरा दम घुटता है इसलिए इन्हें बंद मत करो. थोड़ा सा विरोध भी करो. कल बाई के साथ मिल कर जरा सा सामान अपनी मरजी से सजाना. कुछ कहेंगे तो कहना, तुम्हें इसी तरह अच्छा लगता है. अपनी भी कहना सीखो, नेहा. कई बार ऐसा भी होता है, हम ही अपनी बात नहीं कहते या हम ही अपनी इच्छा का सम्मान किए बिना दूसरे की हर इच्छा मानते चले जाते हैं, जिसे सामने वाला हमारी हां ही मानता है. इस में उन का भी क्या दोष.

‘‘इतने सालों में तुम ने अपने पति को कभी ‘न’ नहीं कहा और उन का अधिकार क्षेत्र तुम्हारी सांस तक पहुंच गया. 12 घंटे तुम इस बंद घर में इतनी भी हिम्मत नहीं कर सकती कि खिड़कियां ही खोल पाओ. जिंदा इंसान हो, तुम कोई मृत काया नहीं जिसे ताजी हवा नहीं चाहिए. सारा दोष तुम्हारा अपना है, तुम्हारे पति का नहीं. जिस की सांस घुटती है, विरोध भी उसी को करना पड़ता है. 4 दिन घर में अशांति होगी, होने दो मगर अपना जीवन समाप्त मत करो. शांति पाने के लिए कभीकभी अशांति का सहारा भी लेना पड़ता है. तुम्हारे पति को परेशानी तो होगी क्योंकि उन्होंने कभी तुम्हारी ‘न’ नहीं सुनी. इतने बरसों में न की गई कितनी सारी ‘न’ हैं जिन का उन्हें एकसाथ सामना करना होगा. अब जो है सो है. तब नहीं तो अब सही, जब जागे तभी सवेरा. अपना घर अपने तरीके से सजाओ.’’

नेहा आंखें फाड़े उस का चेहरा देखती रही.

‘‘घर में वह सामान जो बेकार पड़ा है, सब निकाल दो. कबाड़ी वाला मैं ले आऊंगी. गति दो हर चीज को. तुम भी रुकी पड़ी हो, सामान भी रुका पड़ा है. तुम मालकिन हो घर की, जैसा चाहो, सजाओ.’’

‘‘वही तो मैं भी सोचती हूं.’’

‘‘कुछ भी गलत नहीं सोचती हो तुम. इस घर में पतिदेव सिर्फ रात गुजारते हैं. तुम्हें तो 24 घंटे गुजारने हैं. किस की मरजी चलनी चाहिए?’’

शुभा को नेहा के चेहरे का रंग बदलाबदला नजर आया. आंखों में बुझीबुझी सी चमक, जराजरा हिलती सी नजर आई.

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‘‘अच्छा, भाईसाहब का बिजनैस कार्ड देना जरा. मेरे पतिदेव को इनकम टैक्स की कोई सलाह लेनी थी. तुम चलो, अभी मेरे साथ. आज 31 मार्च है न. क्या पता रात के 12 ही बज जाएं. जब आएंगे, तुम्हें बुला लेंगे. अरे, फोन पर बात कर लेंगे न हम,’’ कहते हुए शुभा उस का हाथ थाम चलने के लिए खड़ी हो गई.

– क्रमश:  

क्या नेहा अपनी मरजी के मुताबिक खुली हवा में सांस ले पाएगी? क्या वह अपने मन में दबी इच्छाओं को पूरा कर पाएगी? कौन उस का हाथ थामेगा? पढि़ए अगले अंक में.

पुरुषों की समस्या दिखाएगा सिद्धू का डेली सोप

द कपिल शर्मा शो में जज की भूमिका निभाने वाले पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू जल्द ही अब छोटे पर्दे पर नजर आने वाले हैं. सूत्रों के मुताबिक, अब सिद्धू डेली सोप में लीड रोल करते दिखाई देंगे.

अपने मुहावरों और शायरी से लोगों का दिल जीतने वाले सिद्धू अपने नए टीवी शो में पुरुषों की समस्याओं को उजागर करेंगे. इस शो की पूरी कहानी एक पंजाबी प‌रिवार के इर्द-गिर्द घूमती नजर आएगी. इस शो के परिवार के मर्द औरतों की सोच को लेकर भ्रमित रहते हैं. इसके चलते कई ऐसे हालात पैदा होते हैं, जो दर्शकों को खूब हंसाएंगे.
खबर है कि इस टीवी धारावाहिक में नवजोत सिंह सिद्धू की मुख्य भूमिका होगी. इससे पहले सिद्धू बिग बॉस में भी नजर आए थे. साल 2006 में आए टीवी सोप ‘क्या होगा निम्मो का’ में भगवान का रोल भी कर चुके हैं. यह सिद्धू का दूसरा डेली सोप होगा. सिद्धू बहुत से कॉमेडी शो को भी जज कर चुके हैं. दर्शकों द्वारा उन्हें बहुत पसंद भी किया गया है.

यौन उत्पीड़न की शिकार हुई थीं अभिनेत्री फोंडा

साल 1972 और 1979 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का खिताब अपने नाम करने वाली हॉलीवुड अभिनेत्री जेने फोंडा ने हाल ही में एक बड़ा खुलासा किया.

जेने फोंडा जब बच्ची थीं, तब उनके साथ बलात्कार किया गया था और उन्हें यौन उत्पीड़न से गुजरना पड़ा. हॉलीवुड की खबरों के अनुसार, 79 वर्षीय हॉलीवुड अभिनेत्री ने एक अमेरिकी पत्रिका को साक्षात्कार देते वक्त बताया कि वे हमेशा खुद को उनकी जिंदगी में आने वाले पुरुषों के सामने छोटा ही महसूस करती थीं.

आस्कर पुरस्कार जीतने वाली विदेशी अदाकारा कहती हैं कि मुझे ‘नहीं’ कहना सीखने में तकरीबन 60 साल लगे और मैंने ‘नहीं’ की ताकत को बहुत समय बाद पहचाना.

एक समय पर मुझे काम से भी निकाल दिया गया था, क्योंकि मैं अपने बॉस के साथ सोई नहीं थी. इन घटनाओं के विषय में मुझे हमेशा यही लगता था, कि यह मेरी गलती है, कि मैं सही समय पर सही चीजें और बातें नहीं कहती हूं. हर जगह पर मेरा फायदा ही उठाया गया.

यह बात उल्लेखनीय है कि साल 2014 की शुरुआत में एक कार्यक्रम के दौरान अभिनेत्री फोंडा ने खुलासा किया था कि उनकी मां फ्रांसिस फोर्ड सेमूर का यौन उत्पीड़न हुआ था, इसीलिए उन्होंने आत्महत्या कर ली थी और उस वक्त अभिनेत्री केवल 12 साल की थी.

यहां हम आपको ये जानकारी देना चाहते हैं कि जेने फोंडा एक अभिनेत्री होने के साथ-साथ लेखक, अमेरिका की एक एक राजनीतिक कार्यकर्ता, पूर्व फैशन मॉडल और फिटनेस गुरु भी हैं.

टीवी ने दिलाई इन सितारों को बड़े पर्दे पर पहचान

बॉलीवुड में ऐसे कई दिग्गज सितारे मौजूद हैं, जिन्होंने छोटे पर्दे से अपना अभिनय शुरू किया और आज बड़े पर्दे पर अपना करिश्मा दिखा रहे हैं. शाहरुख खान, विद्या बालन, प्राची देसाई, यामी गौतम, राजपाल यादव टीवी जगत के कुछ ऐसे सितारे हैं जिन्होंने टीवी के जरिये ही अपना अभिनय करियर शुरू किया और आज वो बॉलीवुड के लिए माइल स्टोन बन गए हैं.

आइए, जानते हैं ऐसे ही सेलेब्स के बारे में जिन्होंनें छोटे पर्दे से ही अपने करियर शुरूआत की और आज वो बड़े पर्दे पर अपनी चमक बिखेर रहे हैं.

शाहरुख खान

इस लिस्ट में अगर सबसे पहला नाम किसी का आता है तो वो है बॉलीवुड के किंग खान शाहरुख खान का. नॉन फिल्मी बैकग्राउंड से होने के कारण शाहरुख को फिल्मों में ब्रेक मिलना इतना आसान नहीं था. इसलिए बॉलीवुड में कदम रखने से पहले शाहरुख ने टीवी सीरियल ‘सर्कस’ और ‘फौजी’ में अपना हाथ आजमाया. उन्होंने 1988 में आई सीरियल ‘फौजी’ में कमांडो अभिमन्यु राय का किरदार निभा अपने ऐक्टिंग करियर की शुरूआत की.

विद्या बालन

आज बॉलीवुड में अपने ऐक्टिंग का लोहा मनवाने वाली विद्या बालन ने अपने करियर की शुरूआत प्रसिद्ध कॉमेडी सीरियल ‘हम पांच’ से की थी. इस शो में उन्होंने राधिका का किरदार निभाया था. इसके बाद वह कई म्यूजिक वीडियो और कमर्शियल ऐड में भी नजर आईं.

इरफान खान

जबरदस्त ऐक्टिंग और बेहतरीन डायलॉग डिलवरी से अपनी अलग पहचान बनाने वाले अभिनेता इरफान खान ने भी अपने ऐक्टिंग करियर की शुरूआत छोटे पर्दे से ही की थी. उन्होंने ‘चाणक्या’, ‘चंद्रकांता’, ‘भारत एक खोज’, ‘बनेगी अपनी बात’, ‘सारा जहां हमारा’ और ‘स्पर्श’ जैसे कई टीवी धारावाहिक में काम किया है.

प्राची देसाई

‘रॉक ऑन’, ‘वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई’ और ‘अजहर’ जैसी फिल्मों में अभिनय कर चुकी प्राची देसाई, बॉलीवुड में डेब्यू करने से पहले जी टीवी पर प्रसारित होने वाले सिरियल ‘कसम से’ की लोकप्रिय चेहरा थीं. इस सीरियल में बानी के किरदार के लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है.

सुशांत सिंह राजपूत

‘किस देश में है मेरा दिल’ से अपने ऐक्टिंग की शुरूआत करने वाले सुशांत सिंह राजपूत सीरियल ‘पवित्र रिश्ता’ में मानव का किरदार निभा लाखों लोगों के दिलों की धड़कन बन गए. फिल्म ‘काई पो चे’ से सुशांत ने बॉलीवुड में डेब्यू किया. टीम इंडिया के पूर्व कप्तान एम एस धोनी की जिंदगी पर बनी फिल्म ‘एम एस धोनी: एन अनटोल्ड स्टोरी’ से सुशांत ने खूब सुर्खियां बटोरी.

यामी गौतम

फिल्मी पर्दे पर ‘विक्की डोनर’ से अपना बॉलीवुड डेब्यू करने वाली खूबसूरत अभिनेत्री यामी गौतम ने भी अपने करियर के शुरुआत में ‘ये प्यार ना होगा कम’ और ‘चांद के पार चलो’ जैसे टीवी सीरियल किये हैं.

पंकज कपूर

बड़े पर्दे पर फिल्म ‘आरोहन’ में डेब्यू करने से पहले पंकज कपूर ने ‘बी ए एल एल बी’, ‘वाह भाई वाह’, ‘साहबजी बीवीजी गुलामजी’ जैसे कई टीवी सीरियलों में काम किया है. कॉमेडी शो ‘ऑफिस ऑफिस’ से पंकज खासे लोकप्रिय हुए. ‘ऑफिस ऑफिस’ में वह अपने किरदार मुसद्दीलाल के लिए जाने जाते हैं.

हंसिका मोटवानी

‘कोई मिल गया’ में बाल कलाकार के रूप में अभिनय करने वाली हंसिका ने भी अपने ऐक्टिंग करियर की शुरूआत ‘शक लक बूम बूम’, ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ जैसे सीरियलों से की थी.

राजपाल यादव

आज एक बेहतरीन हास्य कलाकार के रूप में जाने वाले राजपाल यादव बॉलीवुड में कदम रखने से पहले टीवी सीरियल में काम करते थें. उन्होंने टीवी सीरियल ‘मुंगेरी के भाई नौरंगीलाल’ में काम किया है.

ग्रेसी सिंह

फिल्म ‘लगान’ से बॉलीवुड में एंट्री करने वाली ग्रेसी सिंह ने भी छोटे पर्दे पर ऐक्टिंग में हाथ आजमाया था. उन्होंने सीरियल ‘अमानत’ से ऐक्टिंग की शुरूआत की.

टेलीविजन का दायरा पहले की तुलना में अब काफी बड़ा हो चुका है इसलिए फिल्मी सितारे भी कभी प्रमोशन के बहाने तो कभी रिएलिटी शो के होस्ट या जज के रूप में छोटे पर्दे पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने से नहीं चूकते.

क्रेडिट कार्ड पर बैंक नहीं बताते फायदे की ये 5 बातें

भारत में क्रेडिट कार्ड का प्रचलन तेजी से बढ़ता जा रहा है. ऑनलाइन शॉपिंग हो या रिटेल स्‍टोर से खरीदारी, रेस्‍टोरेंट से लेकर मूवी के टिकट के लिए हम धड़ल्‍ले से क्रेडिट कार्ड का इस्‍तेमाल करते हैं. यदि आपके पास क्रेडिट कार्ड नहीं है, तो आपके पास कार्ड के लिए दिन भर में दो से तीन फोन आ जाते हैं. वहीं यदि आपके पास कार्ड है तो दूसरी कंपनी के कार्ड, अपनी ही कंपनी का एडिशनल कार्ड जैसे लुभावने ऑफर भी मिलते हैं. लेकिन बैंक कई बार क्रेडिट कार्ड से जुड़ी कुछ महत्‍वपूर्ण शर्तें आपसे छिपा जाते हैं.

फ्री ईएमआई स्‍कीम लेने से पहले जान लें शर्तें

अक्‍सर बैंक अपने प्रिविलेज कस्‍टमर्स को फ्री ईएमआई या फिर क्रेडिट कार्ड पर जीरो परसेंट पर ईएमआई का वादा करते हैं. लेकिन बैंक शायद ही आपको जीरो ईएमआई से जुड़ी शर्तों को पढ़ने या समझने का समय देते हैं. आपको मालूम होना चाहिए कि जीरो प्रतिशत ब्याज पर ईएमआई पर नियम एवं शर्तें लागू होती हैं. अगर एक भी शर्त का उल्लंघन करते हैं तो 5 या 10 नहीं बल्कि 20 प्रतिशत से भी ज्यादा ब्याज चुकाना पड़ सकता है.

समय पर करा लें अपने प्‍वाइंट रिडीम्‍ड

बैंक आपको कभी भी खुद से नहीं बताता है कि आप अपने प्वाइंट्स को कैसे रिडीम कर सकते हैं. ऐसे में जानकारी न होने से लाखों प्वाइंट्स पड़े रह जाते हैं और क्रेडिट कार्ड एक्सपायर हो जाता है. इसके अलावा जब आपके प्वाइंट्स 1000 से 10,000 जैसे लैंडमार्क को क्रॉस करते हैं तब बैंक आपको ये नहीं बताता कि आपके इतने प्वाइंट हो गए हैं और आप उन्हें रिडीम कर कैशबैक लाभ ले सकते हैं.

ड्यू डेट का रखें ध्‍यान

आपने अक्सर देखा होगा कि आपको मोबाइल बिल भरना हो तो टेलीकॉम कंपनियां लगातार एसएमएस भेजती हैं. वहीं बैंक भी आपको मिनिमम बैलेंस के लिए रिमाइंडर भेजती हैं. लेकिन क्रेडिट कार्ड के बिल को जमा करने के लिए आपके पास कोई मैसेज नहीं आता. वास्‍तव में देखा जाए तो बैंक खुद नहीं चाहते कि आप समय पर बिल जमा कर दें. ऐसे में आप खुद ही अपनी ड्यू डेट का ख्‍याल रखें. बैंक तो यही चाहते हैं कि आप लेट करें और बाद में लेट फीस भरें.

फ्री में कार्ड अपग्रेड का लगता है वार्षिक चार्ज

बैंक आपको अक्‍सर कार्ड अपग्रेड करने का ऑफर देते हैं. अक्‍सर बैं‍क की एक्‍जीक्‍यूटिव आपको फ्री ऑफ कॉस्ट अपने सिल्वर कार्ड को गोल्ड में और गोल्ड को प्लेटिनम में अपग्रेड करवाने का लालच देते हैं. लेकिन ये नहीं बताते कि नए क्रेडिट कार्ड के लिए आपको 500 रुपए से लेकर 700 रुपए तक का शुल्क भी देना पड़ेगा.

लिमिट बढ़ने से भी बढ़ता है एनुअल चार्ज

क्रेडिट कार्ड धारकों को अक्सर एक कॉल आती है कि आपके क्रेडिट कार्ड की क्रेडिट लिमिट मुफ्त में बढ़ाई जा रही है. बैंक आपको प्रिविलेज कस्‍टमर मानते हुए आपकी लिमिट को दो गुना या इससे अधिक कर देता है. यहां आपसे आपकी सहमति भी नहीं मांगी जाती. लेकिन बैंक आपको कभी ये नहीं बताता कि इसके बाद आपका वार्षिक शुल्‍क बढ़ जाएगा.

“पाक युवा को बिगाड़ रहे हैं सलमान”

बॉलीवुड के ‘सुल्तान’ सलमान खान आजकल पाकिस्तानी हिरोइनें के निशाने पर हैं, पहले पाकिस्तान की मशहूर एक्ट्रेस सबा कमर ने सलमान को भला-बुरा कहा था और अब एक और अभिनेत्री ने सलमान के बारे में कुछ ऐसा ही बयान दिया है.

पाकिस्तान की एक्ट्रेस और पॉप सिंगर रबी परिजादा ने कहा है कि ‘बॉलीवुड में हर दूसरी फिल्म क्राइम और इसी तरह की सीन्स से भरी हुई है, खासकर सलमान खान की फिल्में. मेरा सवाल ये है कि आखिर वहां के लोग युवाओं को क्या सिखा रहे हैं? ऐसा लगता है जैसे वो क्राइम को ही बढ़ावा दे रहे हैं.’

एक पाकिस्तानी दैनिक की खबर के मुताबिक रबी पीरजादा को लगता है कि पाक के दर्शक स्थानीय सिनेमा से ज्यादा भारतीय फिल्में देखना पसंद करते हैं. बॉलीवुड की फिल्मों को ज्यादा तरजीह देते हैं जिसकी वजह से पाकिस्तानी सिनेमा पर बुरा असर पड़ा है.

ऐसा लगता है कि पाकिस्तानी कलाकारों ने बॉलीवुड सुपरस्टार सलमान खान को पूरी तरह अपना टारगेट बना लिया है तभी तो एक बाद एक सभी सलमान पर बयानबाजी कर रहे हैं.

आपको बता दें कि इससे पहले पाकिस्तानी हीरोइन सबा कमर ने सलमान खान और बाकी बॉलीवुड कलाकारों पर निशाना साधा था. सलमान को लेकर तो सबा ने ये तक कह दिया था कि वो छिछोरे हैं और उन्हें डांस भी नहीं आता.

ये घरेलू उपाय देंगे आपको खांसी से आराम

खांसी एक सामान्‍य सी बीमारी है पर असल मायने में यह तकलीफ बहुत देती है. खांसी दूर करने के लिए बाजार में मिलने वाली दवाईयां या कफ-सीरप्स आपको बेवक्त उनींदा बना देती हैं. इससे बचने के लिए आप कुछ कारगर घरेलू उपाय भी आपना सकते हैं.

खांसी होने का कोई समय नहीं होता, न ही ये किसी खास बीमारी के साथ आने का इंतजार करती है. ज्यादातर सर्दी, खांसी, सिरदर्द, जुकाम जैसी कुछ बीमारियां होने पर आप इलाज के लिए हम चिकित्सक के पास जाने से बचने की कोशिश करते हैं. खांसी होने की असल वजह भी आपको मालूम नहीं हो पाती है.

बदलता मौसम, ठंडा-गर्म खा या पी लेना या फिर धूल या किसी अन्यी चीज की एलर्जी होने से खांसी हो सकती है. इनमें सूखी खांसी होने पर आपको  ज्यादा तकलीफ होती है. खांसी की समस्या होने पर आप सुकून से कोई काम भी नहीं कर पाते.

आइए आज हम आपको खांसी से बचने के कुछ घरेलू उपायों के बारे में बताते हैं..

1. घर पर बने गाय के दूध का 15-20 ग्राम घी और काली मिर्च को एक कटोरी में लेकर हल्की आंच में गरम करके, कुछ समय रखकर उसे ठंडा करके लगभग 20 ग्राम पिसी हुई मिश्री मिला दें. अब इससे काली मिर्च निकालकर खा लीजिए. घर पर बनाई गई इस इस खुराक को दिन में दो बार, लगातार दो-तीन दिन तक लेने से पकी खांसी बंद हो जाएगी.

2. तुलसी के कुछ पत्ते, 5 काली मिर्च, 5 नग काला मनुक्का, 5 ग्राम गेहूं के आटे का छान, 6 ग्राम मुलहठी और 3 ग्राम बनफशा के फूल, ये सभी लेकर 200 ग्राम पानी में उबाल लीजिए. जब पानी उबलकर आधा हो जाए तो इसे ठंडा कर छान लें. रात को सोते समय इसे फिर गर्म करके, इसमें बताशे डालकर गरम-गरम पी लें. इस खुराक को 3-4 दिन तक लेने से खांसी से आराम मिलता है.

3. सेंधा नमक की एक डली को आग पर अच्छे से गरम करें, जब नमक की डली गर्म होकर लाल हो जाए तो तुरंत आधा कप पानी में डालकर निकाल लें. खांसी होने पर सोने से पहले इस पानी को पीने से खांसी काफी हद तक ठीक हो जाती है.

4. एक ग्राम सेंधा नमक और 125 ग्राम पानी को मिलाकर, इसके आधा होने तक उबालें. खांसी होने पर सुबह-शाम इस पानी को पीने से खांसी में बहुत आराम मिलता है.

5. इसके अलावा इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखकर भी आप अपनी खांसी से निजात पा सकते हैं.

  • शहद, किशमिश और मुनक्के को मिलाकर खाने से खांसी ठीक हो जाती है.
  • त्रिफला में बराबर मात्रा में शहद मिलाकर पीने से खांसी होने में फायदा मिलता है.
  • दो-तीन दिन तुलसी, कालीमिर्च और अदरक की चाय पीने से खांसी समाप्त होती है.
  • हींग, त्रिफला, मुलेठी और मिश्री को नींबू के रस में मिलाकर खाना भी खांसी पर असरदार है.

मिनटों में बनाएं राइस कौर्न अशर्फी

सामग्री

2 कप चावल पके हुए

1 आलू कटा हुआ

1 कप स्वीट कौर्न

1/2 छोटा चम्मच अदरक बारीक कटी हुई

1 छोटा चम्मच जीरा

1 बड़ा चम्मच धनियापत्ती कटी हुई

2 बड़े चम्मच कौर्नफ्लैक्स

तलने के लिए तेल

नमक व मिर्च स्वादानुसार

विधि

एक बाउल में चावलों के साथ आलू, स्वीट कौर्न, अदरक, जीरा, धनियापत्ती और थोड़ा सा पानी मिला कर मिश्रण तैयार करें. तैयार मिश्रण की पैटीज बना कर कौर्नफ्लैक्स से कोट करें और गरम तेल में सुनहरा होने तक तलें. पसंदीदा सौस के साथ सर्व करें.

-व्यंजन सहयोग: शैफ एम. रहमान

नाइट क्रीम चुनने में ना करें ये गलतियां

रात, त्वचा को आराम और सुकून देने वाला समय होता है. इसलिए चेहरे को अच्छे से साफ करने के बाद रात में बढ़िया परिणाम देने वाली मॉइश्चराइजर लगाएं. आप हालांकि इस उलझन में पड़ सकती हैं कि कौन सा मॉइश्चराइजर आपकी त्वचा के लिए बढ़िया साबित होगा.

लेकिन आप इस से परेशान ना हों. आप किसी भी सनस्क्रीन इंडीग्रिएंट्स से रहित क्रीम का इस्तेमाल कर सकती हैं. आपको खास तौर से नाइट क्रीम खरीदने की जरूरत नहीं है, क्योंकि फर्क बस इतना है कि नाइट क्रीम हानिकारक यूवी किरणों से सुरक्षा प्रदान करने वाला एसपीएफ से युक्त नहीं होता है, इसलिए आप बेहिचक बढ़िया इंडीग्रेडिएंट्स से समृद्ध अपनी त्वचा के लिए उपयुक्त क्रीम चुनें.

– बोसवेलिया सेराटा (शल्लकी), कॉफी बीन के सत्व से युक्त, ब्राह्मी, कालमेघ, यष्टिमधु, पत्थरचूर, हार्स चेस्टनट जैसे औषधीय पौधों के सत्व और तेलों व विटामिन ई, सी और अन्य एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर नाइट क्रीम लगाएं. अगर आपकी उम्र ज्यादा है तो उच्च मात्रा वाले औषधीय गुणों से युक्त क्रीम लगाएं.

– क्रीम ऐसी होनी चाहिए जो त्वचा में गहराई से समा जाए. ऐसी क्रीम न लगाएं जो त्वचा पर तैलीय रूप में साफ नजर आए और सही से अवशोषित न हो सके.

– त्वचा के प्रकार जैसे तैलीय, रूखी या सामान्य के अनुसार ही क्रीम चुनें. त्वचा को सूट करने वाली बढ़िया मॉइश्चराइजर लगाएं.

 – सिंथेटकि खूशबू या रंगों वाली क्रीम न लगाएं क्योंकि इससे आपकी त्वचा में खुजली और जलन हो सकती है. अच्छी नाइट क्रीम में पैराबेस आदि केमिकल नहीं होना चाहिए. अगर आपकी त्वचा संवेदनशील है तो अल्कोहल युक्त क्रीम न लगाएं, क्योंकि इससे एक्जीमा, रूखापन जैसी समस्या हो सकती है.

– नाइट क्रीम त्वचा को पोषण देने और त्वचा की कोशिकाओं को रिपेयर करने के लिए इस्तेमाल में लाए जाते हैं, इसलिए इसे सनस्क्रीन और एसपीएफ रहित होना चाहिए.

दलितों की आसान नहीं जिंदगी

वर्ष 2016 में सामाजिक व राजनीतिक उथलपुथल के चलते देश में जाति विभाजन की पीड़ा सहते लोगों का दर्द देखने को मिला. जनवरी में पीएचडी स्टूडैंट रोहित वेमुला द्वारा की गई आत्महत्या ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया कि हमारी शिक्षा प्रणाली दलित विद्यार्थियों के साथ कैसा व्यवहार कर रही है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को गिनें तो देश की जनसंख्या का 25 प्रतिशत दलित समाज है.

दलित समाज के लोगों से बात करने पर उन्होंने अपने मन की बातें कहीं-काशी, मुंबई के कचरा उठाने वाले सफाईकर्मी अजय का परिवार मराठवाड़ा क्षेत्र के सूखाग्रस्त जालना जिले में रहता है. उस के संयुक्त परिवार के पास

6 एकड़ जमीन है. सिंचाई की असुविधा के कारण उस के पिता सफाईकर्मी का काम करने के लिए मुंबई आ गए थे. जैसा कि इस काम को करने वाले अन्य लोगों का अंत होता है, वैसे ही अजय के पिता की भी क्षय रोग यानी टीबी से ही मृत्यु हुई. अजय की मां भी यही काम करने मुंबई आ गई थी. 10वीं कक्षा पास न कर पाने पर अजय ने भी बृहत मुंबई म्यूनिसिपल कौर्पोरेशन यानी बीएमसी की क्लीनर फोर्स को जौइन कर लिया.

अजय का कहना है, ‘‘अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस ने भाजपा प्रशासन के जरिए रिजर्वेशन के खिलाफ अपना मौलिक एजेंडा लागू करवाना शुरू किया है. मैं सभी तथाकथित मराठों और ब्राह्मणों से पूछना चाहता हूं कि आप लोग यह कचरे वाली नौकरी क्यों नहीं करते, आप अपने शहर को वैसे साफ क्यों नहीं करते जैसे हम करते हैं, बहुजनों के लिए ही इस रोजगार में शतप्रतिशत आरक्षण क्यों है? मैं यह काम नहीं करना चाहता. मेरी 3 बेटियां स्कूल जा रही हैं. मैं चाहता हूं कि समाज हमारे काम का महत्त्व समझे, दूसरे लोग भी अपने हाथ गंदे करें. मराठों और ब्राह्मणों द्वारा यह काम किया जाना तो दूर की बात है, हम सब हाउसिंग सोसाइटी में भी जाते हैं तो वहां का गार्ड भी डस्टबिन उठाने में हमारी मदद नहीं करता. हमारे काम का हर तरफ अपमान किया जाता है.’’

वहीं, एक कंपनी में असिस्टैंट मैनेजर के पद पर सेवारत 25 वर्षीया रीता पवार अपने समुदाय के अच्छे भविष्य के लिए कुछ करना चाहती हैं. वे कहती हैं, ‘‘मैं कभी नहीं छिपाती कि मैं बुद्घ को मानती हूं और डा. बाबासाहेब अंबेडकर की अनुयायी हूं. मैं हमेशा धाराप्रवाह अंगरेजी बोलती हूं. फिर भी कौर्पोरेट वर्ल्ड में लेग मुझ से कहते हैं, ‘अरे, तुम तो बिलकुल भी उन में से नहीं लगती, तुम तो ब्राह्मण लगती हो.’ मैं ने उन से पूछा, ‘‘क्या आप को नहीं पता कि बाबासाहेब, जिन्होंने भारत का संविधान लिखा, हम में से ही एक थे. यह कहने का मतलब क्या है कि मैं दलित नहीं लगती, क्या सभी दलित गंदे और सांवले ही होने चाहिए?’’

आरक्षण पर रीता अपने विचार स्पष्ट रूप से बताती हैं, ‘‘शहरी लोगों को लगता है कि आरक्षण का गलत प्रयोग होता है पर यदि आप ध्यान दें तो कुछ ही दलितों को आर्थिक रूप से इस का फायदा होता है. पर ग्रामीण क्षेत्रों में, उपेक्षित बस्तियों में हमें लोगों को शिक्षित करने के लिए आरक्षण की आवश्यकता है. दलितों से क्रूरता की भावना के चलते पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट दर्ज नहीं की जाती, यह सचाई है. मेरे समुदाय के बारे में मुझे देख कर ही फैसला न लें.’’

57 वर्षीय राधा 2012 में गुजरात में ग्राम पंचायत की सदस्या चुनी गईं. सरपंच को दलित स्त्री के साथ काम करना रास नहीं आ रहा था. उन्हें अकेले को ही नहीं, अन्य लोगों को भी पंचायत औफिस में राधा मंजूर नहीं थी. राधा ने इस से निबटने की ठानी. वे बताती हैं, ‘‘वे नहीं चाहते थे कि मैं औफिस आऊं पर मैं ने जाना नहीं छोड़ा. यह मेरा अधिकार था. वे मुझे रोकने वाले कौन थे. मुझे ऐसे कोई नहीं डरा सकता. मुझे लोगों ने चुना है. यही प्रेरणा मुझे रोज काम पर भेजने के लिए काफी थी. पर परेशानियां कम नहीं थीं. सरपंच लगातार मेरा अपमान करता रहा. मैं ने फोन पर उन की बातें रिकौर्ड कर लीं और शिकायत दर्ज करवा दी. मैं समृद्घ किसान परिवार से हूं. मैं रोज काम पर जाती हूं. अपनी कुरसी पर गर्व से बैठती हूं और सब फैसले अपनी मरजी से लेती हूं.’’

दलित लड़कियों को गांव में दूसरी कक्षा के बाद स्कूल नहीं भेजा जाता  क्योंकि यह डर रहता है कि ऊंची जाति के लड़के उन्हें परेशान करेंगे, उन का शोषण होगा. राधा कहती हैं, ‘‘सरकार ने हमारे लिए कुछ नहीं किया. हाल ही में मेरे गांव के लड़कों को बहुत पीटा गया क्योंकि वे एक दुकान के बाहर शौर्ट्स पहन कर खड़े थे.’’ दलितों को तो ऊंची जाति वाले लोगों के हिसाब से ही व्यवहार करना चाहिए. खाना, पीना, विवाह, कपड़े पहनना सब ऊंची जाति वालों के बनाए नियमों से करने चाहिए. ऊंची जाति वाले शौर्ट्स पहनते हैं, इसलिए दलित नहीं पहन सकते.

पहचान की तलाश

महेश सर्वेय्या को अपने 13 सदस्यीय परिवार के साथ अपेक्षाकृत ज्यादा पावरफुल अहीर समुदाय द्वारा मजबूर करने पर उना जिले के अंकोलाजी गांव को छोड़ना पड़ा. 500 लोगों की भीड़ ने उस के भाई लालजी को जला दिया क्योंकि उन्हें शक था कि लालजी का 19 वर्षीया अहीर लड़की से अफेयर चल रहा है. गांव से उना 10 मिलोमीटर दूर है जो 2012 में घटी इस घटना के बाद सुर्खियों में तब फिर आया जब मृत गाय की खाल निकालने के लिए दलितों को पीटा गया और नग्न अवस्था में घुमाया गया. उस के भाई के कातिल को गिरफ्तार तो किया गया पर जल्दी ही जमानत पर छोड़ दिया गया. गांव में महेश के परिवार का जीवन दूभर हो गया. सो, उन्हें गांव छोड़ना ही पड़ा. परिवार ने अपनी जमीन वापस लेने के लिए सरकार से बहुत फरियाद की. 2014 में 139 दिनों की भूखहड़ताल भी की.

महेश अब किराए के मकान में रहता है. उस का कहना है, ‘‘राज्य सरकार ने हमें जमीन नहीं दी, सिर्फ झूठे वादे किए. हम ने अब उम्मीद ही छोड़ दी है.’’  परिवार के स्त्रीपुरुष जीवनयापन के लिए अब हर छोटा कहा जाने वाला काम भी करते हैं. 8वीं तक पढ़े महेश को लगता है कि गुजरात में दलित होने का मतलब जीतेजी मर जाना है, चाहे चपरासी हो या पुलिस अफसर, एमएलए हो या एमपी. गुजरात के दलितों के पास न तो पावर है न पहचान. हम पैरों तले कुचले हुए तब भी थे, आज भी हैं. हम अमीरों और प्रभावशाली जातियों के नौकर ही हैं. दलित के जीवन में सरकारी पद का भी कोई असर नहीं पड़ता क्योंकि पूरे कैरियर में उसे लोअर रैंक पर ही रखा जाता है. राज्य में दलितों के विकास की उम्मीद नहीं है, यहां सिर्फ चपरासी ही बन सकते हैं.

बनारस के एक कालेज में 30 वर्षों से क्लर्क के पद पर कार्य कर रहे 57 वर्षीय राजेश का अपना घर है. उन के 3 बच्चे हैं. वे अपने छात्रजीवन के बारे में बताते हुए कहते हैं, ‘‘ब्राह्मण लड़कों को आगे बिठाया जाता था, मुझे पीछे. मेरे पास एक ही शर्ट थी जो वहां से मिली थी जहां मां काम करती थी. पहले तो सिर्फ स्पोर्ट्स टीचर ही मुझे बिना बात के मारा करते थे, फिर उच्च जाति के लड़कों का मुझे मारना ही उन का खेल हो गया था. मैं स्कूल जाने से इतना डरता था कि मेरी मां ने मुझे स्कूल भेजना ही बंद कर दिया था. कुछ नहीं बदला है, न हिंदू धर्म, न ब्राह्मण, न कुछ और. रोज दलितों को मारा जाता है. मैं ने दलितों की अधिकार संस्था — दलित संघर्ष समिति जौइन कर ली. मैं अब भले ही बूढ़ा हो जाऊं पर अब दलितों के अधिकार के लिए लड़ता ही रहूंगा.’’

विक्रोली, मुंबई की 40 वर्षीया रमा 15 वर्षों से सरकारी कर्मचारी हैं. वे कहती हैं, ‘‘झाड़ू लगाना, डिलीवरी का काम, माली, सफाई, सब आज भी दलित ही करते हैं. हमारे यहां किसी भी त्योहार पर न पड़ोसी आएंगे, न खाएंगे.’’

कुल मिला कर देखा जाए तो स्थिति बहुत चिंताजनक है. हम इंसान ही इंसानों के बीच धर्म, जाति की दीवारें खड़ी करने में लगे रहेंगे तो उन्नति कब करेंगे, आगे कब बढ़ेंगे. कोई भी धर्म, जाति, राजनीतिक पार्टी देश के उज्जवल भविष्य से बढ़ कर तो नहीं है.

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