Short Story : ठोकर – सरला ने क्यों तोड़ा गौरिका का विश्वास

Short Story : गौरिका ने आंखें खोलीं तो सिर दर्द से फटा जा रहा था. एक क्षण के लिए तो सबकुछ धुंधला सा लगा, मानो कोई डरावना सपना देख रही हो. उस ने कराहते हुए इधरउधर देखने की कोशिश की थी.

‘सरला, ओ सरला,’ उस ने बेहद कमजोर स्वर में अपनी सेविका को पुकारा. लेकिन उस की पुकार छत और दरवाजों से टकरा कर लौट आई.

‘कहां मर गई?’ कहते हुए गौरिका ने सारी शक्ति जुटा कर उठने का यत्न किया. तभी खून में लथपथ अपने हाथ को देख कर उसे झटका सा लगा और वह सिरदर्द भूल कर ‘खूनखून…’ चिल्लाती हुई दरवाजे की ओर भागी थी.

गौरिका की चीख सुन कर पड़ोस के दरवाजे खुलने लगे और पड़ोसिनें निशा और शिखा दौड़ी आई थीं.

‘क्या हुआ, गौरिका?’ दोनों ने समवेत स्वर में पूछा. खून में लथपथ गौरिका को देखते ही उन के रोंगटे खड़े हो गए थे. गौरिका अधिक देर खड़ी न रह सकी. वह दरवाजे के पास ही बेसुध हो कर गिर पड़ी.

तब तक वहां अच्छीखासी भीड़ जमा हो गई थी. निशा और शिखा बड़ी कठिनाई से गौरिका को उठा कर अंदर ले गईं. वहां का दृश्य देख कर वे भय से कांप उठीं. दीवान पूरी तरह खून से लथपथ था.

गौरिका के सिर पर गहरा घाव था. किसी भारी वस्तु से उस के सिर पर प्रहार किया गया था. शिखा ने भी सरला को पुकारा था पर कोई जवाब न पा कर वह स्वयं ही रसोईघर से थोड़ा जल ले आई थी और उसे होश में लाने का यत्न करने लगी थी.

निशा ने तुरंत गौरिका के पति कौशल को फोन कर सूचित किया था. अन्य पड़ोसियों ने पुलिस को सूचना दे दी थी. सभी इस घटना पर आश्चर्य जाहिर कर रहे थे. बड़े से पांचमंजिला भवन में 30 से अधिक फ्लैट थे. मुख्यद्वार पर 2 चौकीदार दिनरात उस अपार्टमेंट की रखवाली करते थे. नीचे ही उन के रहने का प्रबंध भी था.

इस साईं रेजिडेंसी के ज्यादातर निवासी वहां लंबे समय से रह रहे थे और भवन को पूरी तरह सुरक्षित समझते थे. अत: इस प्रकार की घटना से सभी का भयभीत होना स्वाभाविक ही था.

आननफानन में कौशल आ गया. उस का आफिस अधिक दूर नहीं था. पर आज आफिस से फ्लैट तक पहुंचने का 15 मिनट का समय उसे एक युग से भी लंबा प्रतीत हुआ था. अपने घर का दृश्य देखते ही कौशल के हाथों के तोते उड़ गए. घर का सामान बुरी तरह बिखरा हुआ था. लोहे की अलमारी का सेफ खुला पड़ा था और सामान गायब था.

‘सरला…सरला,’ कौशल ने भी घर में घुसते ही उसे पुकारा था पर उसे न पा कर एक झटका सा लगा उस भरोसे को जो उन्होंने सरला को ले कर बना रखा था.

सरला को गौरिका और कौशल ने सेविका समझा ही नहीं था. वह घर का काम करने के साथ ही गौरिका की सहेली भी बन बैठी थी. कौशल का पूरा दिन तो दफ्तर में बीतता था. घर लौटने में रात के 9-10 भी बज जाते थे.

कौशल एक साफ्टवेयर कंपनी में ऊंचे पद पर था. वैसे भी काम में जुटे होने पर उसे समय का होश कहां रहता था.

गौरिका से कौशल का विवाह हुए मात्र 10 माह हुए थे. गौरिका एक संपन्न परिवार की 2 बेटियों में सब से छोटी थी. पिता बड़े व्यापारी थे, अत: जीवन सुख- सुविधाओं में बीता था. मातापिता ने भी गौरिका और उस की बहन चारुल पर जी भर कर प्यार लुटाया था. ‘अभाव’ किस चिडि़या का नाम है यह तो उन्होंने जाना ही नहीं था.

कौशल का परिवार अधिक संपन्न नहीं था पर उस के पिता ने बच्चों की शिक्षा में कोई कोरकसर नहीं उठा रखी थी. विवाह में गौरिका के परिवार द्वारा किए गए खर्च को देख कर कौशल हैरान रह गया था. 4-5 दिनों तक विवाह का उत्सव चला था. 3 अलगअलग स्थानों पर रस्में निभाई गई थीं. उस शानो- शौकत को देख कर मित्र व संबंधी दंग रह गए थे. पर सब से अधिक प्रभावित हुआ था कौशल. उस ने अपने परिवार में धन का अपव्यय कभी नहीं देखा था. जहां जितना आवश्यक हो उतना ही व्यय किया जाता था, वह भी मोलतोल के बाद.

सुंदर, चुस्तदुरुस्त गौरिका गजब की मिलनसार थी. 10 माह में ही उस ने इतने मित्र बना लिए थे जितने कौशल पिछले 5 सालों में नहीं बना सका था.

अब दिनरात मित्रों का आनाजाना लगा रहता. मातापिता ने उपहार में गौरिका को घरेलू साजोसामान के साथ एक बड़ी सी कार भी दी थी. कौशल कार्यालय आनेजाने के लिए अपनी पुरानी कार का ही इस्तेमाल करता था. गौरिका अपनी मित्रमंडली के साथ घूमनेफिरने के लिए अपनी नई कार का प्रयोग करती थी.

मायके में कभी तिनका उठा कर इधरउधर न करने वाली गौरिका ने मित्रों के स्वागतसत्कार के लिए इस फ्लैट में आते ही 3 सेविकाओं का प्रबंध किया था. घर की सफाई और बरतन मांजने वाली अधेड़ उम्र की दमयंती साईं रेजिडेंसी से कुछ दूरी पर झोंपड़ी में रहती थी. कपड़े धोने और प्रेस करने वाली सईदा सड़क पार बने नए उपनगर में रहती थी.

सरला को गौरिका ने रहने के लिए निचली मंजिल पर कमरा दे रखा था. वह भोजन बनाने, मित्रों का स्वागतसत्कार करने के साथ ही उस के साथ खरीदारी करने, सिनेमा देखने जाती थी. 4-5 माह में ही सरला कुछ इस तरह गौरिका की विश्वासपात्र बन बैठी थी कि उस के गहने संभालने, दूध, समाचारपत्र आदि का हिसाबकिताब करने जैसे काम भी वह करने लगी थी.

कुछ दिनों के लिए कौशल के मातापिता बेटे की गृहस्थी को करीब से देखने की आकांक्षा लिए आए थे और नौकरों का एकछत्र साम्राज्य देख कर दंग रह गए थे. उस की मां ने दबी जबान में कौशल को समझाया भी था, ‘बेटा, 2 लोगों के लिए 3 सेवक? तुम्हारी पत्नी तो तुम्हारा सारा वेतन इसी तरह उड़ा देगी. अभी से बचत करने की सोचो, नहीं तो बाद में कुछ भी हाथ नहीं लगेगा.’

‘मां, गौरिका हम जैसे मध्यम परिवार से नहीं है. उस के यहां तो नौकरों की फौज रखना साधारण सी बात है. हम उस से यह आशा तो नहीं कर सकते कि वह बरतन मांजने और घर की सफाई करने जैसे कार्य भी अपने हाथों से करेगी,’ कौशल ने उत्तर दिया था.

‘कपड़े धोने के लिए मशीन है, बेटे,’ मां बोलीं, ‘साफसफाई के लिए आने वाली दमयंती भी ठीक है, पर दिन भर घर में रहने वाली सरला मुझे फूटी आंखों नहीं भाती. कपडे़, गहने, रुपएपैसे आदि की जानकारी उसे भी है. किसी तीसरे को इस तरह अपने घर के भेद देना ठीक नहीं है. उस की आंखें मैं ने देखी हैं… घूर कर देखती है सबकुछ. काम रसोईघर में करती है, पर उस की नजरें पूरे घर पर रहती हैं. मुझे तो तुम्हारी और गौरिका की सुरक्षा को ले कर चिंता होने लगी है.’

‘मां, यह चिंता करनी छोड़ो. चलो, कहीं घूमने चलते हैं. सरला 6 माह से यहां काम कर रही है पर कभी एक पैसे का नुकसान नहीं हुआ. गौरिका को तो उस पर अपनों से भी अधिक विश्वास है,’ कौशल ने बोझिल हो आए वातावरण को हलका करने का प्रयत्न किया था.

‘रहने भी दो, अब बच्चे बड़े हो गए हैं. अपना भलाबुरा समझते हैं. हम 2-4 दिनों के लिए घूमने आए हैं. तुम क्यों व्यर्थ ही अपना मन खराब करती हो,’ कौशल के पिताजी ने बात का रुख मोड़ने का प्रयत्न किया था.

‘क्या हुआ? सब ऐसे गुमसुम क्यों बैठे हैं,’ तभी गौरिका वहां आ गई थी.

‘कुछ नहीं, मां को कुछ पुरानी बातें याद आ गई थीं,’ कौशल हंसा था.

‘बातें बाद में होती रहेंगी, हम लोग तो पिकनिक पर जाने वाले थे, चलिए न, देर हो जाएगी,’ गौरिका ने कुछ ऐसे स्वर में अनुनय की थी कि सब हंस पड़े थे.

सरला ने चटपट भोजन तैयार कर दिया था. थर्मस में चाय भर दी थी. पर जब गौरिका ने सरला से भी साथ चलने को कहा तो कौशल ने मना कर दिया था.

‘मांपापा को अच्छा नहीं लगेगा, उन्हें परिवार के सदस्यों के बीच गैरों की उपस्थिति रास नहीं आती,’ कौशल ने समझाया था.

‘मैं ने सोचा था कि वहां कुछ काम करना होगा तो सरला कर देगी.’

‘ऐसा क्या काम पड़ेगा. फिर मैं हूं ना, सब संभाल लूंगा,’ सच तो यह था कि खुद कौशल को भी परिवार में सरला की उपस्थिति हर समय खटकती थी पर कुछ कह कर गौरिका को आहत नहीं करना चाहता था.

कौशल के मातापिता कुछ दिन रह कर चले गए थे पर कौशल की रेनू बूआ, जो उसी शहर के एक कालिज में व्याख्याता थीं, दशहरे की छुट्टियों में अचानक आ धमकी थीं. चूंकि  कौशल घर में सब से छोटा था इसकारण वह बूआ का विशेष लाड़ला था.

गौरिका से बूआ की खूब पटती थी. पर सरला को कर्ताधर्ता बनी देख वह एक दिन चाय पीते ही बोल पड़ी थीं, ‘गौरिका, नौकरों से इतना घुलनामिलना ठीक नहीं है. तुम्हें शायद यह पता नहीं है कि तुम अपनी सुरक्षा को किस तरह खतरे में डाल रही हो. आजकल का समय बड़ा ही कठिन है. हम किसी पर विश्वास कर ही नहीं सकते.’

‘मैं जानती हूं बूआजी, इसीलिए तो मैं ने किसी पुरुष को काम पर नहीं रखा. मैं अपनी कार के लिए एक चालक रखना चाहती थी. अधिक भीड़भाड़ में कार चलाने से बड़ी थकान हो जाती है. पर देखिए, हम दोनों स्वयं ही अपनी कार चलाते हैं.’

रेनू बूआ चुप रह गई थीं. वह शायद बताना चाहती थीं कि पुरुष हो या स्त्री कोई भी विश्वास के योग्य नहीं है. फिर भी उन्होंने गौरिका से यह आश्वासन जरूर ले लिया कि भविष्य में वह रुपएपैसे, गहनों से सरला को दूर ही रखेगी.

गौरिका ने रेनू बूआ का मन रखने के लिए उन्हें आश्वस्त कर दिया पर उसे सरला पर अविश्वास करने का कारण समझ में नहीं आता था. उस के अधिकतर पड़ोसी एक झाड़ ूबरतन वाली से काम चलाते थे लेकिन वह सोचती थी कि उस का स्तर उन सब से ऊंचा है.

कौशल ने सब से पहले गौरिका को पास के नर्सिंग होम में भरती कराया था. सिर पर घाव होने के कारण वहां टांके लगाए गए थे. निशा और शिखा ने गौरिका के पास रहने का आश्वासन दिया तो कौशल घर आ गया और आते ही उस ने अपने और गौरिका के मातापिता को सूचित कर दिया. कौशल ने रेनू बूआ को भी सूचित कर दिया. बूआ नजदीक थीं और वह अच्छी तरह से जानता था कि उस पर आई इस आफत को सुनते ही बूआ दौड़ी चली आएंगी.

प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखा कर कौशल दोबारा नर्सिंग होम चला गया था. सिर में टांके लगाने के लिए गौरिका के एक ओर के बाल साफ कर दिए गए थे. हाथ में पट्टी बंधी थी, पर वह पहले से ठीक लग रही थी.

‘कौशल, मेरे कपड़े बदलवा दो. सरला से कहना अलमारी से धुले कपडे़ निकाल देगी,’ गौरिका थके स्वर में बोली थी.

‘नाम मत लेना उस नमकहराम का. कहीं पता नहीं उस का. तुम्हें अब भी यह समझ में नहीं आया कि तुम्हारी यह दशा सरला ने ही की है,’ कौशल क्रोधित हो उठा था.

‘क्या कह रहे हो? सरला ऐसा नहीं कर सकती.’

‘याद करने की कोशिश करो, हुआ क्या था तुम्हारे साथ? पुलिस तुम्हारा बयान लेने आने वाली है.’

गौरिका ने आंखें मूंद ली थीं. देर तक आंसू बहते रहे थे. फिर वह अचानक उठ बैठी थी.

‘मुझे कुछ याद आ रहा है. मैं आज सरला के साथ बैंक गई थी. 50 हजार रुपए निकलवाए थे. घर आ कर सरला खाना बनाने लगी थी. मैं ने उस से एक प्याली चाय बनाने के लिए कहा था. चाय पीने के बाद क्या हुआ मुझे कुछ पता नहीं,’ गौरिका सुबकने लगी थी, ‘2 दिन बाद तुम्हारे जन्मदिन पर मैं तुम्हें उपहार देना चाहती थी.’

तभी रेनू बूआ आ पहुंची थीं. उन के गले लग कर गौरिका फूटफूट कर रोई थी.

‘देखो बूआजी, क्या हो गया? मैं ने सरला पर अपनों से भी अधिक विश्वास किया. सभी सुखसुविधाएं दीं. उस ने मुझे उस का यह प्रतिदान दिया है,’ गौरिका बिलख रही थी.

रेनू बूआ चुप रह गई थीं. वह जानती थीं कि कभीकभी मौन शब्दों से भी अधिक मुखर हो उठता है. वह यह भी जानती थीं कि बहुत कम लोग दूसरों को ठोकर खाते देख कर संभलते हैं, अधिकतर को तो खुद ठोकर खा कर ही अक्ल आती है.

सरला 50 हजार रुपए के साथ ही घर में रखे गौरिका के गहनेकपड़े भी ले गई थी. लगभग 5 माह बाद वह अपने 2 साथियों के साथ पकड़ी गई थी और तभी गौरिका को पता चला कि वह पहले भी ऐसे अपराधों के लिए सजा काट चुकी थी. सुन कर गौरिका की रूह कांप गई थी. कौशल, मांबाप तथा घर के अन्य सभी सदस्यों ने उसे समझाया था कि भाग्यशाली हो जो तुम्हारी जान बच गई. नहीं तो ऐसे अपराधियों का क्या भरोसा.

इस घटना को 5 वर्ष बीत चुके हैं. फैशन डिजाइनर गौरिका का अपना बुटीक है. पर पति, 3 वर्षीय बंटी और बुटीक सबकुछ गौरिका स्वयं संभालती है. दमयंती अब भी उस का हाथ बंटाती है पर सब पर अविश्वास करना और अपना कार्य स्वयं करना सीख लिया है गौरिका ने.

Best Story : बंजर जमीन – क्या हुआ था जगदीश के साथ

Best Story :  शाम को जब मैं कोर्ट से लौटा तो जैसे घर में सब मेरा ही इंतजार कर रहे थे. स्कूटर की आवाज सुन कर बिट्टू और नीरू दौड़ कर बाहर आ गए. मैं स्कूटर खड़ा भी नहीं कर पाया था कि बिट्टू लपक कर मेरे पास आ गया और उत्साहित हो कर बताने लगा, ‘‘पापा, आप को मालूम है?’’ मैं ने स्कूटर की डिग्गी से केस फाइल निकालते हुए पूछा, ‘‘क्या, बेटा?’’ ‘‘वह पिंकी के पापा हैं न…’’ ‘‘हां, उन्हें क्या हुआ?’’ ‘‘उन्होंने नई कार खरीदी है. देखिए न उधर, वह खड़ी है. कितना अच्छा कलर है.’’

मैं ने दाहिनी ओर मुड़ कर देखा. बगल वाले फ्लैट के सामने नई चमचमाती कार खड़ी थी. तब तक नीरू भी पास आ गई थी. वह आगे की जानकारी देते हुए बोली, ‘‘पापा, नए मौडल की कार है. पिंकी बता रही थी. बहुत महंगी है.’’ ‘‘अच्छा,’’ मैं ने भी बच्चों की खुशी में शामिल होते हुए आश्चर्य प्रकट किया. बिट्टू और करीब आ गया और मुझ से लिपटते हुए बोला, ‘‘मैं तो पिंकी के साथ कार में बैठा भी था. अंकल हम दोनों को घुमाने ले गए थे. खूब मजा आया. उन्होंने हमें मिठाई भी खिलाई,’’ फिर मचलते हुए बोला, ‘‘पापा, हम लोग भी कार खरीदेंगे न?’’ मैं ने बिट्टू को गोद में उठा लिया और प्यार करते हुए कहा, ‘‘जरूर खरीदेंगे.’’ फिर मैं भीतर चला गया और थोड़ी देर तक बच्चों को प्यार से तसल्ली देता रहा. मेरे आश्वासन पर दोनों खुश हो गए और उछलतेकूदते बाहर खेलने चले गए.

कोट उतार कर हैंगर पर लटका दिया, फिर सोफे पर पसरते हुए सविता को आवाज लगाई, ‘‘सविता, एक कप चाय लाना.’’ सविता को भी शायद मेरा ही इंतजार था. बच्चों के साथ बात करते हुए उस ने सुन लिया था, इसीलिए चाय का पानी शायद पहले ही चूल्हे पर चढ़ा चुकी थी. चाय की ट्रे सामने टेबल पर रख कर वह मेरे करीब बैठते हुए बोली, ‘‘आप ने तो बच्चों के मुंह से सुन लिया होगा और बगल वाले फ्लैट के बाहर देखा भी होगा. गौतम भाईसाहब ने नई कार खरीदी है. उन की पत्नी दोपहर में कार खरीदने की खुशी में मिठाई दे गई हैं.’’ फिर मिठाई मेरी ओर सरकाते हुए एक लंबी सांस लेती हुई बोली, ‘‘लीजिए, मुंह मीठा कीजिए, आप के दोस्त ने नई गाड़ी खरीदी है,’’ वाक्य का अंतिम छोर जानबूझ कर लंबा खींचा गया था, ताकि मैं समझ जाऊं कि सूचना के साथसाथ मेरे लिए एक उलाहना भी है.

मैंने मिठाई का एक टुकड़ा उठाया और अनमने से मुंह में डाल लिया. सविता चाय का कप मेरी ओर बढ़ाते हुए बोली, ‘‘आप को पता है, कालोनी में हमारे अलावा बाकी सब के पास कार है,’’ ‘‘यानी कि हमीं लोग बेकार हैं?’’ मैं ने हंसने की कोशिश की. ‘‘छोडि़ए भी, यह मजाक की बात नहीं है. आप ने कभी भी मेरी बात को गंभीरता से लिया है?’’ ‘‘क्यों नहीं लिया, मैं भी तो कोशिश कर रहा हूं कि कार जल्दी ही खरीद ली जाए, मगर…’’ ‘‘बसबस, रहने दीजिए, आप तो बस, कोशिश ही करते रहेंगे, कालोनी में सब के यहां कार आ चुकी है.’’ ‘‘जरूर आ चुकी है, मगर तुम जानती हो, वे सब व्यापारी या सरकारी अफसर हैं, लेकिन मैं तो एक साधारण सा वकील हूं. फिर भी…’’ ‘‘छोटे देवरजी कौन से व्यापारी हैं?

साधारण से डाक्टर ही तो हैं, फिर भी देवरानी को कार में घूमते हुए 2 साल हो गए और आप हैं कि…’’ ‘‘अरे, क्या बात करती हो…जीतू, मेरा छोटा भाई, एक काबिल सर्जन है. 10 सालों में उस ने कितना नाम कमा लिया है.’’ ‘‘छोड़ो भी, आप को भी तो वकालत करते 15 साल हो गए हैं, मगर अभी तक लेदे कर एक फ्लैट ही तो खरीद पाए हैं.’’ ‘‘ऐसा न कहो. सबकुछ तो है अपने पास. टीवी, फ्रिज, एसी, कूलर, स्कूटर, वाश्ंिग मशीन, गहने, कपड़े…’’ ‘‘ठीक है, ठीक है. ये चीजें तो सब के यहां होती हैं. जरा सोचिए, आप कार में कोर्ट जाएंगे तो लोगों पर रोब पड़ेगा और बच्चे भी काफी खुश होंगे.’’ ‘‘हूं, तुम ठीक कहती हो,’’ मैं ने सहमति में सिर हिलाया. फिर अलमारी के लौकर से बैंक की पासबुक निकाल लाया, ‘‘सविता, बैंक खाते में 1 लाख रुपए हैं, चाहें तो पुरानी गाड़ी खरीद सकते हैं.’’ ‘‘नहीं प्रेम, पुरानी गाड़ी नहीं लेंगे. गाड़ी तो नई ही होनी चाहिए.’’ ‘‘ठीक है. फिर तो और रुपयों की व्यवस्था करनी होगी.’’

मैं सोच में डूब गया. पत्नी भी कुछ देर तक सोचती रही. फिर जैसे अचानक कुछ याद आ गया हो, मेरे करीब आते हुए बोली, ‘‘आप के नाम से तो गांव में कुछ जमीन भी है न?’’ ‘‘हां, 5-6 एकड़ के करीब है तो सही, मगर बाबूजी के नाम से है. अगर कहूं तो वे उसे कल ही मेरे नाम कर देंगे.’’ ‘‘जमीन कितने की होगी?’’ ‘‘पता नहीं, वहां जा कर ही मालूम होगा.’’ सविता खुश हो गई, ‘‘फिर क्या सोचना, बेच दीजिए इस जमीन को.’’ ‘‘सो तो ठीक है, मगर इतने सालों बाद गांव जा कर यह सब करना क्या उचित होगा? जगदीश भैया क्या सोचेंगे?’’ ‘‘सोचेंगे क्या, हम उन की जमीन थोड़े ही ले रहे हैं. अपने हिस्से की जमीन बेचेंगे. वैसे भी बेकार ही तो पड़ी है.’’ समस्या का हल निकल चुका था. बस, थोड़े दिनों के लिए गांव जा कर यह सब निबटा देना था.

अब तो मुझे भी एक अदद कार के लालच ने उत्साहित कर दिया था. रात को खाना खाने के बाद जब मैं अगली पेशी में लगने वाले केसों की फाइल देख रहा था, तब भी मन बारबार गांव और वहां की जमीन में उलझा रहा. पता नहीं दिमाग में कार की बात इस कदर क्यों समा गई थी कि दूसरे विषयों में जी नहीं लग रहा था. मैं ने जब से वकालत शुरू की थी, कभी गांव के बारे में सोचने की जरूरत ही महसूस नहीं की. कभीकभी बाबूजी खुद ही शहर चले आते थे और दोचार दिन यहां रह कर फिर गांव वापस चले जाते थे. उन्होंने अपनी जरूरतों या गांवघर की खोजखबर लेते रहने के बारे में अपने मुंह से कभी कुछ नहीं कहा था. जगदीश भैया गांव में रहते थे, वहीं प्राइमरी स्कूल में मास्टर थे. वे बीए ही कर पाए थे, इसलिए कोई विशेष नौकरी मिलने की संभावना नहीं थी. जैसेतैसे मास्टरी मिल गई थी.

गांव में पुराना मकान था. जगदीश भैया उस घर में परिवार सहित रहते थे. जमीन 15 एकड़ बची थी और हम 3 भाई थे, इसलिए बाबूजी ने मौखिक रूप से 5-5 एकड़ जमीन हम तीनों भाइयों के बीच बांट दी थी. चूंकि मैं और जीतू यानी डा. जितेंद्र प्रसाद शहर में ही रह रहे थे, इसलिए खेतीबारी जगदीश भैया ही देखते थे. सुबह उठते ही मैं ने पत्नी से कहा, ‘‘परसों रविवार है, गांव चला जाता हूं और जमीन का सौदा कर आता हूं.’’ वह यह बात सुन कर खिल उठी. रविवार की सुबह मैं जल्दी तैयार हो गया. बैग में दोचार कपड़े डाले और नाश्ता करने के बाद स्कूटर ले कर गांव के लिए निकल पड़ा. रास्ते में बसंतपुर पड़ता था, जहां के सेठ हर्षद भाई मनसुख भाई का बिक्रीकर संबंधी मामला मेरे ही पास था. सो सोचा, चलतेचलते अपनी फीस भी वसूल करता चलूं, यही सोच कर हर्षद भाई की राइस मिल के सामने स्कूटर रोक दिया. हर्षद भाई अपने कर्मचारियों के बीच मशगूल थे. मुझे स्कूटर से उतरते देख नजदीक आते हुए बोले, ‘‘आइएआइए, तशरीफ लाइए,’’ कहते हुए मुझे साथ ले कर अपने औफिस की ओर बढ़ गए. वे चाय मंगवाने के बाद बोले, ‘‘वकील साहब, आज इधर कैसे आना हुआ?’’ ‘‘बस हर्षद भाई, नीमखेड़ा तक जा रहा हूं. 2 दिनों तक कोर्ट बंद है, सोचा, थोड़ा गांव तक हो आऊं.’’ ‘‘अच्छा है.

अब आप यहां तक आए हैं तो अपनी पुरानी फीस भी लेते जाइए,’’ फिर पैसा निकाल कर मेरी ओर बढ़ाते हुए बोले, ‘‘पूरे 7 हजार रुपए हैं, गिन लीजिए.’’ रुपए कोट की जेब के हवाले करते हुए मैं ने कहा, ‘‘अरे, इस में देखना क्या है, ठीक ही होंगे,’’ हंसते हुए मैं आगे बढ़ गया. लगभग 76 किलोमीटर की पक्की सड़क थी, इसलिए कोई दिक्कत नहीं हुई. शेष 5 किलोमीटर का रास्ता कच्चा था. गांव की गलियों को पार करते हुए जब घर के सामने स्कूटर रोका तो आवाज सुन कर 3-4 बच्चे बाहर निकल आए और उत्सुकताभरी नजरों से मेरी ओर देखने लगे. बच्चों को गली की ओर दौड़ते देख उन की मां भी दरवाजे तक निकल आईं. मुझे देखते ही आश्चर्य से बोल उठीं, ‘‘देवरजी, आप. सविता भी आई है क्या? अच्छाअच्छा, आओ, अंदर आओ,’’ फिर बच्चों से बोलीं, ‘‘बबलू, राजू तुम्हारे प्रेम चाचा आए हैं, रायपुर वाले. देखते क्या हो, इन का सामान अंदर ले आओ.’’

बच्चों का मेरा परिचय मिल गया था. वे लपक कर स्कूटर से मेरा बैग उठा लाए और ‘चाचाजी आ गए, चाचीजी आ गए,’ कहते हुए आंगन की ओर दौड़ने लगे. वर्षों बाद गांव आया था, शायद 10 वर्षों के बाद. इतने वर्षों में बहुत कुछ बदल गया था. पुराना मकान, जहां हम भाईबहनों का बचपन बीता था, अब गिर चुका था. उस के स्थान पर 3 कमरों का एकमंजिला, जिस की दीवारें मिट्टी की और छत खपरैलों की बनी थी. सामने बरामदे से लगा हुआ एक बड़ा सा कमरा था, जहां से किसी के खांसने की आवाज आ रही थी. मैं उसी कमरे की ओर बढ़ गया. बाबूजी तख्त पर लेटे हुए थे. मुझे देख वे उठने की कोशिश करने लगे. सिरहाने रखी बनियान को गले में डाल कर बिस्तर पर रखे अपने चश्मे को ढूंढ़ने लगे. चश्मा चढ़ा लेने पर मुझे पहचानने की कोशिश करते हुए बोले, ‘‘कौन…प्रेम?’’ ‘‘जी, बाबूजी, मैं प्रेम ही हूं.’’ ‘‘आओ बेटे, आओ, इधर पास बैठो.’’ मैं उन के करीब बैठ गया.

बाबूजी मुझे कमजोर लगे रहे थे. खांसते समय सारा शरीर हिल उठता था. उन की कमजोर काया और चेहरे पर उभरी झुर्रियों को देख कर एकबारगी मैं घबरा उठा. अपनेआप को संयत करने की कोशिश में इधरउधर देखने लगा. कमरा खालीखाली सा था. तख्त से लगी हुई लकड़ी की पुरानी 3 कुरसियां रखी हुई थीं, जिन के हत्थे उखड़ चुके थे. कमरे के एक कोने में ईंटों के ऊपर 2 संदूक रखे हुए थे. पास की दीवार में एक खुली अलमारी बनी हुई थी, जिस में एक पुराना ट्रांजिस्टर, दवाइयों की कुछ भरी और कुछ खाली शीशियां, कागजों में लिपटी कुछ पुडि़यां, आईना और एक कंघी रखी हुई थी. दीवार पर लगी खूंटियों पर 2 थैले तथा बाबूजी की कमीज टंगी हुई थी.

अलगनी पर बाबूजी की धोती सूख रही थी, जिसे देख पुरानी बात याद आ गई. एक दिन बाबूजी जब हमारे यहां पौधों को पानी दे रहे थे तो नीरू की नजर उन की कमीज पर पड़ गई थी. कमीज जेब के पास से कुछ फटी हुई थी. नीरू ने पूछ लिया, ‘दादाजी आप की कमीज तो फटी हुई है.’ बच्ची की बात सुन बाबूजी ने अपनी फटी कमीज की ओर देखा और खूबसूरती से बात घुमाते हुए हंस कर बोले, ‘बेटे, यह कमीज फटी नहीं है. गांव में सभी ऐसी ही कमीज पहनते हैं. यह तो गांवों का फैशन है.’ बच्ची तो संतुष्ट हो गई थी, मगर बाबूजी अपनेआप को तसल्ली न दे सके थे और शायद तभी से ही उन्होंने अपने कमजोर हाथों से कपड़ों पर पैबंद लगाने शुरू कर दिए थे. बाबूजी को फिर खांसी आ गई थी. मैं ने पूछा, ‘‘आप की तबीयत ठीक नहीं लगती?’’ ‘‘नहीं रे, तबीयत तो ठीक है, बस, खांसी कभीकभी परेशान करती है.’’ ‘‘कोई दवाई ली?’’ ‘‘हां, ले रहा हूं. जगदीश बराबर खयाल रखता है.

2 दिन पहले ही तो दवाई ला कर दी है.’’ फिर जैसे उन्हें याद हो आया हो, कहने लगे, ‘‘तुम अकेले ही आए हो या बहू भी आई है?’’ ‘‘मैं अकेला ही आया हूं. एक केस के सिलसिले में बसंतपुर आया था. कल और परसों कोर्ट बंद है, तो सोचा, गांव होता जाऊं.’’ ‘‘बहुत अच्छा किया, बिट्टू और नीरू कैसे हैं?’’ ‘‘ठीक हैं, बाबूजी.’’ हम बातें कर ही रहे थे कि रानू आ गया और कहने लगा, ‘‘चाचाजी, आप नहा लीजिए.’’ तभी बाबूजी बोले, ‘‘जाओ, नहा लो.’’ आंगन के उस पार कुआं था और उस के पास ही ईंटों की दीवारें उठा कर उस पर टीन का शेड और टीन का ही दरवाजा लगा कर स्नानघर बनाया गया था. नहाते समय मुझे अपने फ्लैट के चमचमाते बाथरूम की याद आ गई.

मैं नहाधो कर तैयार हो गया. तब तक रसोईघर में खाना तैयार हो चुका था. रसोईघर भी क्या, बस बरामदे के ही एक छोर को मिट्टी की दीवार से घेर कर कमरे की शक्ल दे दी गई थी. भाभी दरी बिछाती हुई बोलीं, ‘‘प्रेम भैया, आओ बैठो, मैं खाना लगाती हूं.’’ मैं दरी पर बैठ गया. थाली परोसते हुए भाभी बोलीं, ‘‘फर्श पर बैठते हुए अजीब सा लग रहा होगा न? क्या करें, मेज वगैरह तो है नहीं.’’ ‘‘नहीं भाभी, कोईर् परेशानी नहीं है, सब ठीक है.’’ खाना तो साधारण था, मगर जिस स्नेह से परोसा जा रहा था, उस से आनंद आ गया. अब तक मैं घर के सभी कमरे, साजोसामान और जानवर वगैरह देख चुका था. कहीं पर भी मुझे संपन्नता की कोई निशानी नजर नहीं आई थी. अलबत्ता अपनेपन की महक हर ओर मौजूद थी. शाम को 4 बजे जगदीश भैया स्कूल से आ गए.

मुझे देखते ही उन के चेहरे पर खुशी छा गई. साइकिल बरामदे की दीवार से टिकाते हुए बोले, ‘‘कितने वर्षों बाद आया है, घर में सब कैसे हैं?’’ ‘‘ठीक हैं,’’ मेरा छोटा सा उत्तर था. आंगन में खाट बिछा कर उन्होंने मुझे बैठने का इशारा किया, फिर बबलू को आवाज लगाते हुए बोले, ‘‘बेटे, अपनी मां से कहो कि यहां 2 कप चाय लेती आए.’’ चाय पीने के बाद भैया बोले, ‘‘प्रेम, चलो, आज मैं तुम्हें खेतों पर ले चलता हूं. जमीनजायदाद की लड़ाई तो तुम ने अदालत में बहुत देखी होगी और लड़ी भी होगी, परंतु खेत क्या चाहते हैं, इसे अब स्वयं देखना.’’ खेतों के पास पहुंच कर फसलों के बीच खेत में जगदीश भैया बताने लगे, ‘‘प्रेम, ये हैं हम लोगों के खेत. यह सामने वाला खेत तुम्हारे हिस्से का है. इस की मिट्टी जीतू और मेरे हिस्से के खेत से अच्छी है. वह नाले के पास भी है, इसलिए इस में सिंचाई भी अच्छी होती है. मेरे पास बैलों की एक जोड़ी ही है न, इसलिए पूरी जमीन को जोत नहीं पाता.

15 एकड़ में से 10-12 एकड़ में ही खेती कर पाता हूं, शेष जमीन पड़ी रह जाती है. फसल का अच्छा होना भी पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर करता है. समय पर पानी बरस गया और कीड़ेमकोड़ों का प्रकोप न हुआ तो अनाज खलिहान तक पहुंचता है, नहीं तो हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी खाद और बीज तक की रकम वसूल नहीं होती.’’ थोड़ी देर रुक कर वे आगे बताने लगे, ‘‘बाबूजी बताते हैं कि दादाजी के जमाने में बस्ती से ले कर नाले तक की जमीन हमारी थी और यहां से वहां तक फसल लहलहाती थी. अब तो मात्र 15 एकड़ जमीन है, उस में भी पूरी जमीन पर फसल नहीं उगा पाता. बाबूजी की बड़ी इच्छा है कि पूरे 15 एकड़ जमीन में हरीभरी फसल लहलहाए, अगर एक जोड़ी बैल और खरीद सकता तो…’’ मेरे मुंह से अचानक निकल पड़ा, ‘‘बैलों की जोड़ी कितने में आती होगी?’’ ‘‘अच्छी जोड़ी तो 20-25 हजार रुपए से कम में नहीं आएगी.’’ मैं ने खेतों पर दूर तक नजर डाली.

किनारे की 2-3 एकड़ जमीन बंजर पड़ी थी, शेष हिस्से में गेहूं की फसल पकने को थी. थोड़ी देर बाद हम वहां से लौट आए. रात को खाना खाने के बाद मैं आंगन में खाट पर लेटा हुआ था. आसमान साफ था, दूरदूर तक चांदनी छिटकी हुई थी. रहरह कर मन में यही विचार उठता था कि अपने हिस्से की जमीन के बारे में बाबूजी और जगदीश भैया से कैसे कह सकूंगा? क्या मैं इतना स्वार्थी हो गया हूं? नहींनहीं, यह मुझ से नहीं हो सकेगा. दूसरे दिन सुबह घर का नौकर फिरतू कुछ सौदा लेने जामगांव के बाजार जा रहा था. मुझे भी बाजार जाना था, इसलिए उस से कहा, ‘‘फिरतू, चल बैठ स्कूटर के पीछे, जामगांव मैं भी जा रहा हूं.’’ ‘‘नहीं मालिक, मैं पैदल चला जाऊंगा.’’ ‘‘अरे, डरता क्यों है, बैठ पीछे.’’ वह झिझकते हुए पिछली सीट पर बैठ गया. 15-20 मिनट में हम बाजार पहुंच गए.

मैं ने स्कूटर पेड़ के नीचे खड़ा कर दिया और फिरतू को ले कर मवेशी बाजार की ओर बढ़ गया. थोड़ी देर की छानबीन और जांचपड़ताल के बाद बैलों की एक जोड़ी पसंद आ गई. साढ़े 23 हजार रुपए में सौदा पक्का हो गया. मैं ने कोट की जेब से रुपए निकाल कर बैलों के मालिक को कीमत का भुगतान कर दिया. फिरतू बैलों की जोड़ी देख कर खुशी से झूमने लगा. मैं ने फिरतू को बाकी सौदा खरीद लाने को कहा. जब वह सामान ले कर वापस आया तो मैं बैलों की रस्सी उसे थमाते हुए बोला, ‘‘फिरतू, तुम बैलों को ले कर गांव चले जाओ, मैं थोड़ी देर बाद आता हूं.’’ बाजार से वापस आ कर मैं जगदीश भैया के साथ बैठा चाय पी रहा था. इतने में बैलों की रस्सी थामे फिरतू भी आ गया, बैल देख कर जगदीश भैया चकित हो गए, कुतूहलवश पूछने लगे, ‘‘क्यों रे फिरतू, बैलों की जोड़ी किस की है?’’

‘‘अपनी ही है, वकील साहब ने खरीदी है.’’ जगदीश भैया को विश्वास नहीं हो रहा था, वे मेरी ओर मुड़ कर बोले, ‘‘क्यों प्रेम?’’ ‘‘भैया, बैलों की जोड़ी पसंद आ गई थी और संयोग से जेब में पैसे भी थे, इसलिए खरीद लाया. कहिए, जोड़ी कैसी है?’’ जगदीश भैया की आंखें खुशी से चमकने लगीं. झटपट उठ कर बैलों के एकदम पास चले गए. फिर दोनों बैलों की पीठ पर हाथ फेरते हुए बोले, ‘‘वाह, क्या शानदार जोड़ी है. महंगी भी होगी? लेकिन तुम ने यह सब…’’ ‘‘कुछ नहीं भैया, कल खेतों को देखा तो लगा कि जमीन का कोईर् भी टुकड़ा बंजर नहीं रहना चाहिए.’’

Hair Care Tips : कैसे चुनें बालों के लिए सही Conditioner

Hair Care Tips :  बालों की सुरक्षा के लिए आप समय समय पर इन्हें जरूरी ट्रीटमैंट देती रहती हैं. इन्हीं ट्रीटमैंट्स में एक है, हेयर कंडीशनिंग. घरेलू नुसखों के साथ साथ बाजार में कई कंडीशनर भी उपलब्ध हैं, जो हर प्रकार के बालों के लिए बनाए गए हैं. मगर इन का चुनाव सावधानी के साथ करना चाहिए वरना इन का विपरीत प्रभाव बालों की सेहत को बिगाड़ भी सकता है.

अकसर महिलाएं इस बात को नजरअंदाज कर शैंपू और कंडीशनर की आकर्षक पैकिंग और उन के विज्ञापनों पर ही गौर करती हैं. कंडीशनर में मौजूद इनग्रीडिएंट्स उन के लिए महत्त्व नहीं रखते. जबकि सब से पहले किसी भी प्रोडक्ट पर दिए गए निर्देशों को ध्यानपूर्वक पढ़ लेना बहुत जरूरी होता है.

एक अध्ययन के मुताबिक 70% महिलाओं को पता ही नहीं होता कि कंडीशनर का इस्तेमाल क्यों किया जाता है. वे तो बस इसे एक प्रक्रिया के तौर पर बालों में लगा लेती हैं, तो कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं, जो हर बार शैंपू और कंडीशनर बदल लेती हैं. ऐसे में बालों का खराब होना तय होता है.

इन में से कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं, जिन्हें कंडीशनर के इस्तेमाल करने का ढंग और उस के फायदों के बारे में तो पता होता है, लेकिन यह पता नहीं होता है कि उन के बालों के टैक्स्चर पर कौन सा हेयर कंडीशनर फायदेमंद साबित होगा.

आइए, जानें कि किस तरह बालों के टैक्स्चर को समझ कर उन पर कौन सा कंडीशनर लगाना चाहिए.

पतले और महीन बाल

बालों के पतले होने के 2 कारण हो सकते हैं, या तो बालों को सही ट्रीटमैंट नहीं दिया जा रहा है या फिर आनुवंशिकता की वजह से भी बालों का टैक्स्चर महीन हो सकता है. लेकिन इन्हें सही ट्रीटमैंट के जरीए कुछ हद तक दुरुस्त किया जा सकता है. खासतौर पर हलके और वौल्यूमाइजिंग फौर्मूला बेस्ड कंडीशनर ऐसे बालों के लिए सब से अच्छा विकल्प साबित होते हैं.

दरअसल, ऐसे बालों को भारीपन के साथ ही चमक की भी जरूरत होती है और इस के लिए जरूरी है कि बालों में नमी रहे. लेकिन ऐसे बालों के लिए कंडीशनर चुनते वक्त यह जरूर देख लें कि उस में बायोटिन, कैफीन, पैंथेनोल और अमोनिया ऐसिड जैसे तत्त्वों का इस्तेमाल न किया गया हो. साथ ही, ऐसे बालों पर कंडीशनर को क्राउन एरिया पर लगने से बचाना चाहिए और जड़ों से लगभग 2 इंच बाल छोड़कर कंडीशनर लगाना चाहिए.

नौर्मल एवं मीडियम बाल

ऐसे बालों को मैंटेन रखने के लिए हाईड्रेशन लैवल में संतुलन बनाए रखना जरूरी है. अच्छी बात है कि आप के बाल शाइनी और हैल्दी हैं, लेकिन उन की इस खूबी को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि उन्हें जरूरी ट्रीटमैंट मिलता रहे. ऐसे बालों के लिए विटामिन ए, सी और ई युक्त कंडीशनर का इस्तेमाल किया जा सकता है. साथ ही यूकलिप्टस और व्हीट प्रोटीन वाले कंडीशनर भी ऐसे बालों में नमी बनाए रखते हैं.

घुंघराले बाल

घुंघराले बालों में मौइश्चराइजिंग कंडीशनर ही लगाना चाहिए. ऐसे कंडीशनर बालों को शाइनिंग देते हैं और पोषण भी. ऐसे बालों के लिए कंडीशनर का चुनाव करते वक्त यह जरूर देख लें कि उस में शामिल सामग्री में प्रोटीन जरूर हो. इस के अतिरिक्त ऐसे बालों में शीया बटर, औलिव औयल और ग्लिसरीन युक्त कंडीशनर भी फायदेमंद साबित होते हैं. ये बालों में हाईड्रेशन और इलास्टिसिटी को भी बनाए रखते हैं.

मोटे बाल

यदि बाल मोटे और कड़े टैक्स्चर वाले हैं तो सब से पहले उन्हें मुलायम बनाया जाए, जिस के लिए कंडीशनर में ऐवोकाडो का तेल और सोया मिल्क जैसे इनग्रीडिएंट्स का शामिल होना बेहद जरूरी है. यह ऐसे बालों को भारी और सिल्की बनाएगा और साथ ही वौल्यूम को भी स्मूद करेगा.

औयली बाल

वैज्ञानिक तौर पर जिन की स्कैल्प ड्राई होती है उन के बाल औयली होते हैं. दरअसल, ड्राईनैस की वजह से स्कैल्प पर मौजूद औयल ग्लैंड तेल निकालना शुरू कर देती है, जिस से बाल ग्रीसी दिखने लगते हैं. कई महिलाएं बाल औयली होने की वजह से कंडीशनर को नजरअंदाज करने लगती हैं. लेकिन ऐसा नहीं करना चाहिए. ऐसे बालों में कंडीशनर को बालों के निचले हिस्से में लगाना चाहिए और वह भी स्प्रिंग की तरह बालों को घुमाघुमा कर कंडीशनर लगाने से फायदा होता है.

Breakfast Benefits : सुबह का नाश्ता क्यों है जरूरी

Breakfast Benefits : अमिता को एक शादी के लिए अपना वजन कम करने की धुन चढ़ी तो उस ने सुबह के नाश्ते में केवल फल और उस से बने सलाद, स्मूदी आदि लेना शुरू कर दिया. 1 महीने के बाद अचानक वह बेहोश हो कर गिर पड़ी. डाक्टरों के अनुसार उस ने जरूरी पौष्टिक तत्त्वों की अनदेखी की.

होममेकर सुष्मिता की आदत है कि सुबह की पहली चाय के बाद जब तक वह घर का पूरा काम समाप्त नहीं कर लेती तब तक कुछ नहीं खाती. चूंकि दोपहर तक नाश्ते का टाइम ही निकल जाता है इसलिए वह सीधे दोपहर का खाना ही खाती है. वहीं सौम्या अंधविश्वासी है और पूजापाठ में समय बरबाद करने के बाद ही कुछ खाती है.

अकसर इस तरह की आदतें स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होती हैं. शरीर में पौष्टिक तत्त्वों की कमी हो जाती है.

जरूरी है सुबह का नाश्ता

सुबह का नाश्ता जरूरी है क्योंकि रात्रि के डिनर के लंबे अंतराल के बाद यह पहला मील होता है और पूरे दिन की ऐनर्जी के लिए इसे काफी पौष्टिक होना चाहिए. डाक्टरों के अनुसार स्वस्थ रहने के लिए इसे नियमित रूप से लेना ही चाहिए पर अधिकांश लोग कुछ भ्रांतियों या व्यस्तता के चलते नाश्ते के ऊपर उतना ध्यान नहीं देते.

आज हम आप को नाश्ते के बारे में आम इंसान के द्वारा किए जाने वाले कुछ हैक्स बता रहे हैं जो आप के लिए काफी मददगार साबित हो सकते हैं :

ब्रेकफास्ट स्किप करना

अकसर कुछ लोग वजन कम करने के उद्देश्य से ब्रेकफास्ट करना छोड़ देते हैं पर आहार विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा करने से शरीर का मेटाबौलिज्म स्लो हो जाता है और ऐनर्जी डाउन हो जाती है जिस से आप पूरे दिन सुस्ती महसूस करते हैं.

रात्रि के खाने के बाद सुबह हमारे शरीर को कार्य करने के लिए अच्छीखासी ऐनर्जी की आवश्यकता होती है इसलिए भले ही आप सुबह ओट्स, कौर्नफ्लैक्स, दलिया, इडली सांभर जैसा हलका नाश्ता लें पर स्किप बिलकुल भी न करें.

केवल मीठा ही खाना

केवल सीरियल्स, पेस्ट्री, डोनट्स, दूध, ब्रैड आदि खाने से ब्लड शुगर जल्दी बढ़ती और कम होती है जिस से बारबार भूख लगती है. इन नाश्तों की अपेक्षा अंडे, अवाकाडो, टोस्ट, नट्स या ग्रीक योगर्ट जैसे प्रोटीन, हैल्दी फैट और फाइबर से भरपूर नाश्ता लें.

चाय कौफी से दिन की शुरुआत

अधिकांश लोग अपने दिन की शुरुआत चाय या कौफी से करते हैं जिस से एसिडिटी और डिहाइड्रेशन बढ़ जाता है और ऐनर्जी लेवल बहुत कम हो जाता है। आहार विशेषज्ञों के अनुसार चाय या कौफी से पहले गरम पानी, शहद या नीबू पानी पीना सेहतमंद रहता है। साथ में भुने मखाने और पीनट्स भी ले सकते हैं.

अधिक प्रोसेस्ड फूड का सेवन

इंस्टेंट सीरियल्स ऐनर्जी बार, चौकलेट जैसे उत्पादों में शुगर की मात्रा बहुत अधिक होती है इसलिए इन की अपेक्षा घर का बना दलिया, स्मूदी, होममेड प्लेन या स्टफ्ड परांठे को अपने नाश्ते में शामिल करें.

पर्याप्त प्रोटीन न लेना

केवल ब्रेड या कार्बोहाइड्रेट खाने से भी भूख जल्दीजल्दी लगती है। इस की अपेक्षा प्रोटीन रिच फूड आइटम्स बौईल अंडे, ब्रैड आमलेट, दही, पनीर या मूंग दाल चीला आदि का सेवन करना उचित रहता है.

बहुत ज्यादा या बहुत कम खाना

कम खाने से पूरे दिन आप कमजोरी महसूस करेंगे। साथ ही बहुत ज्यादा खाने से शरीर में आलस्य और सुस्ती रह सकती है. इसलिए हमेशा अपने ब्रेकफास्ट में 50% फाइबर (फल सब्जियां), 25% प्रोटीन और 25% हैल्दी फैट लें.

एक जैसा नाश्ता करना

कुछ लोगों को ब्रैड आमलेट, परांठा, ब्रैड बटर या फिर दूध कौर्नफ्लैक्स जैसे नाश्तों को हर दिन करने की आदत होती है. इस की अपेक्षा हर दिन बदलबदल कर नाश्ता करने की आदत डालें। इस से आप एक जैसा खाने से बोर भी नहीं होंगे, दूसरा आप को प्रत्येक खाद्यपदार्थ के पोषक तत्त्व भी मिल पाएंगे.

बड़ी उम्र की लड़कियां बन सकती हैं सहेलियां

सासबहू के रिश्ते को ले कर अकसर कई तरह की धारणाएं बनाई जाती हैं. इन में से एक धारणा यह है कि बड़ी उम्र की लड़कियां (Aged Girls) ससुराल में ऐडजस्ट नहीं कर पाती हैं और इसलिए सास हमेशा छोटी उम्र की लड़कियों को बहू बनाना ज्यादा पसंद करती हैं, क्योंकि उसे वह अपने तरीके से ढाल सकती है. लेकिन क्या आप ने कभी सोचा है कि बड़ी उम्र की बहू सास के लिए बेहतर और सही विकल्प क्यों हो सकती है? और उम्र कोई भी हो, बहू बनने का मतलब केवल जिम्मेदारी उठाना नहीं, बल्कि परिवार को समझना, प्यार देना और एकजुट रह कर जीवन जीना होता है?

इसलिए अब समय आ गया है कि हम महिलाओं की भूमिका को उम्र के पैमाने से बाहर निकाल कर देखें और स्वीकार करें.

सोशल मैच्योरिटी और समझदारी

बड़ी उम्र की लड़कियां अधिक मैच्योर होती हैं और जीवन के कई अनुभवों से गुजर चुकी होती हैं. ऐसे में वे सास की मैनेजमेंट ट्रिक्स को जल्दी सीख सकती हैं और उन के साथ मिल कर घर के मामलों को बेहतर तरीके से समझ सकती हैं.

उम्र में बड़ी होने से बहू परिवार के सभी सदस्यों के साथ अच्छे रिश्ते बना सकती है, साथ ही सास के विचारों और आदतों को भी बेहतर समझ सकती है. उस की मैच्योरटी सास के साथ रिश्तों को ज्यादा अच्छे से बना सकती है.

निर्णय लेने की क्षमता

बड़ी उम्र की लड़की अकसर अपने जीवन में कई महत्त्वपूर्ण निर्णय पहले ही ले चुकी होती है. यह अनुभव उसे घर के मामलों में भी मजबूत बनाता है. सास को अकसर यह भरोसा हो सकता है कि बहू किसी भी मुश्किल स्थिति में ठंडे दिमाग से सही निर्णय लेगी. इस कारण सास को यह विश्वास होता है कि बहू किसी भी संकट का सामना समझदारी से करेगी.

मानसिक स्वतंत्रता और विश्वास

बड़ी उम्र की बहू पहले से ही मानसिक रूप से स्वतंत्र होती है और उसे अपने फैसलों में किसी का हस्तक्षेप पसंद नहीं आता. ऐसे में सास के लिए यह अवसर होता है कि वह अपनी बहू पर ज्यादा दबाव न डाले और उसे अपने तरीके से जीवन जीने का मौका दे. इस मानसिक स्वतंत्रता से दोनों के बीच का रिश्ता और भी मजबूत हो सकता है.

घर की जिम्मेदारी और देखभाल

बड़ी उम्र की बहू को घर की जिम्मेदारियों का अनुभव होता है. उसे घर के कामों को अच्छे से संभालने का तरीका पता होता है. साथ ही, अगर सास को कोई स्वास्थ्य संबंधी समस्या होती है, तो बड़ी उम्र की बहू उन से अधिक स्नेह और समझदारी से निबट सकती है. सास को यह लगता है कि बहू घर की सभी जिम्मेदारियों को समझते हुए उस का अच्छे से खयाल रखेगी.

सास और बहू के बीच सम्मान का रिश्ता

बड़ी उम्र की बहू सास को अपनी मां के समान समझ सकती है और इस रिश्ते में आमतौर पर सम्मान और समझदारी बनी रहती है. छोटी उम्र की बहू के मुकाबले एक बड़ी उम्र की बहू अकसर सास के प्रति ज्यादा सम्मान दिखाती है और परिवार की परंपराओं को आदर देती है. यह सामंजस्यपूर्ण रिश्ते को बढ़ावा देता है.

भावनात्मक स्थिरता

बड़ी उम्र की बहू मानसिक रूप से अधिक स्थिर होती है, क्योंकि उस ने पहले ही जीवन के उतारचढ़ाव को झेला होता है. इस कारण वह सास के साथ रिश्ते में उतारचढ़ाव से बचने में सक्षम होती है. ऐसे में, रिश्ते में कोई भी तनाव उत्पन्न होने पर वह उसे सुलझाने के बजाय संघर्ष को बढ़ाने की बजाय समझदारी से सुलझाती है.

समझदारी से नजरिया

बड़ी उम्र की बहू न केवल अपनी सास से, बल्कि घर के बाकी सदस्यों से भी अच्छे रिश्ते बनाए रख सकती है. वह किसी भी स्थिति में समझदारी से काम ले सकती है और हर किसी की भावनाओं का सम्मान करती है. इस के कारण सास को लगता है कि बहू परिवार के सभी मुद्दों को समझ कर हल करती है, जिस से परिवार का माहौल संतुलित रहता है.

उम्र का रिश्तों पर असर

सामाजिक मान्यताओं के अनुसार, उम्र का रिश्तों पर प्रभाव होता है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि यह हमेशा नकारात्मक हो. बड़ी उम्र की लड़कियां जब बहू बनती है, तो उस की अलग सोच और परिपक्वता रिश्तों को और मजबूत बना सकती है. साथ ही, वह अपनी सास या पति के परिवार से भी अच्छे संबंध स्थापित कर सकती है, क्योंकि उस की मानसिकता परिपक्व और व्यावहारिक होती है.

Sheena Chohan को सोशल वर्क है पसंद, जानें ऐक्ट्रैस का फिल्मी सफर

Sheena Chohan : मलयालम फिल्म से कैरियर की शुरुआत करने वाली खूबसूरत, सुंदर कदकाठी वाली ऐक्ट्रैस शीना चौहान ने हिंदी, तमिल, तेलुगू, हौलीवुड फिल्मों और वैब सीरीज में अभिनय किया है. उन्होंने मलयालम फिल्म ‘द ट्रेन’ में ममूटी के साथ अपनी शुरुआत की, जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक जयराज ने निर्देशित किया था, लेकिन उन्हें बड़ी सफलता ओटीटी पर आई फिल्म ‘ऐंट स्टोरी’ से मिली, जिस से उन्हें कई पुरस्कार भी मिले. इस के अलावा उन्होंने बुद्धदेव दासगुप्ता द्वारा निर्देशित फिल्म ‘मुक्ति’ और ‘पत्रलेखा’ में मुख्य भूमिका निभाई है. इतना ही नहीं कोलकाता की शीना ‘मिस कोलकाता’ भी रहीं और यही उन्होंने मौडलिंग और थिएटर में काम करना शुरू कर दिया था.

अभिनय के अलावा शीना ह्यूमन राइट्स की ब्रैंड ऐंबेसडर हैं और पूरी दुनिया में इस दिशा पर काम कर रही हैं.

अभी शीना एक हिंदी मूवी ‘संत तुकाराम’ में काम कर रही हैं, जो रिलीज होने पर है. इस में उन्होंने अवली जीजाबाई की भूमिका निभाई है, जबकि तेलुगू फिल्म में पुलिस औफिसर, हौलीवुड और वैब सीरीज में भी काम कर रही हैं. ये सभी फिल्में इस साल रिलीज होने वाली हैं. उन्होंने खास गृहशोभा के साथ बात की. पेश हैं, कुछ खास अंश :

खुश हूं जर्नी से

फिल्मों और वैब सीरीज में एकसाथ काम कर शीना अपनी जर्नी से बहुत खुश हैं और कहती हैं कि हर भूमिका की डिमांड अलगअलग है और मेहनत भी, लेकिन मैं इस से बहुत खुश हूं, क्योंकि अभी मेरी जर्नी रियल में शुरू हुई है और मुझे बेहतर काम मिल रहा है. मैं ने हर क्षेत्रीय भाषाओं में काम किया है और हिंदी में छोटेछोटे रोल किए हैं, लेकिन एक बड़ी भूमिका हिंदी फिल्म में करना मेरे लिए बहुत संतुष्टि देता है.

इतना ही नहीं, अलगअलग क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों में काम करने पर ऐक्टिंग का अनुभव बहुत होता है और उसे मैं फिल्मों में प्रयोग कर पाऊंगी.

रिजनल फिल्मों और हिंदी फिल्मों में काम करने में अंतर को ले कर शीना कहती हैं कि अभिनय के इमोशंस एक जैसे होते हैं, लेकिन भाषा, कल्चर, कहानी कहने का अंदाज वगैरह में अंतर होता है. बंगाल और मलयालम में साहित्य को अच्छी तरह दिखाया जाता है. आने वाली हिंदी फिल्म में मैं ने महाराष्ट्रीयन कल्चर को देवनागरी में किया.

मिली प्रेरणा

अभिनय के क्षेत्र में आने की प्रेरणा के बारे में शीना का कहना है कि मेरी मां मेरी प्रेरणास्त्रोत हैं, क्योंकि उन्हें अभिनय का बहुत शौक था, लेकिन ट्रैडिशनल परिवार की होने की वजह से उन्हें यह मौका नहीं मिला. उन का सपना था कि वे हर चीज का अनुभव करें, इसलिए उन्होंने मार्शल आर्ट्स में ब्लैक बेल्ट, ड्राइंग, कौन्टैंपररी और क्लासिकल डांस को सिखाया, जिस का फायदा अब मुझे मिल रहा है.

परिवार का सहयोग

शीना कहती हैं कि मां ने मुझे शुरू से थिएटर में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया. उन्हें लगता था कि मैं अधिक से अधिक अभिनय करूं और आगे फिल्म इंडस्ट्री में भी अभिनय करूं, इसलिए मना करने की कोई गुंजाइश नहीं रही.

पंजाब से मुंबई का सफर

शीना कहती हैं कि मैं पंजाब में पैदा हुई थी और स्कूल की पढ़ाई की. बाद में कोलकाता में मैं अपने परिवार के साथ शिफ्ट हुई और बाकी शिक्षा पूरी की. वहां पर मैं ने थिएटर और डांस सीखी, क्योंकि कोलकाता में आर्ट और कल्चर अधिक मात्रा में होता है, वहां हर परिवार में लोग डांस या संगीत को महत्त्व देते हैं. इस के बाद मैं दिल्ली में भारतीय रंगमंच निर्देशक, अरविंद गौड़ के पास गई और वहां पर थिएटर की बारीकियां सीखीं.

दिल्ली में मैं ने मौडलिंग शुरू की और साउथ के निर्देशक ने मुझे मामूटी के साथ फिल्म में काम करने
का मौका दिया. इस से मैं धीरेधीरे पौपुलर हुई और एक के बाद एक काम मिलता गया.

संघर्ष

शीना कहती हैं कि अच्छा काम मिलना एक चुनौती है और मैं ने भी बहुत संघर्ष किए हैं. कोई भी काम मेरे पास चल कर नहीं आया. इस में मैं जिन के साथ काम करना चाहती थी, उन के साथ काम मिलने में समय लगा. मैं ने यह सीखा है कि जीवन में 3 चीजें बहुत जरूरी हैं- दृढ़ विश्वास, पैशन और अटल रहना, ताकि आप मेहनत से आगे बढ़ सकें. कई लोग बहुत जल्दी निराश हो कर दूसरा रास्ता अपना लेते हैं, पर मुझे यह सही नहीं लगता, क्योंकि इस क्षेत्र में रिजैक्शन होता है और उस परिस्थिति में खुद को संभालना पड़ता है, जो पैशन के बिना संभव नहीं हो सकता. अब मैं हर पल को अच्छी तरह जीना पसंद करती हूं.

सोशल वर्क है पसंद

ह्यूमन राइट्स के क्षेत्र में शीना अच्छा काम कर रही हैं और वे इस की ब्रैंड ऐंबेसडर भी हैं. इस क्षेत्र में काम करने की वजह के बारे में उन का कहना है कि मुझे बचपन से इस क्षेत्र में काम करने की इच्छा रही है, क्योंकि मेरी मां जो करना चाहती थीं, उन्हें कभी करने को नहीं मिला. गांवदेहातों में तो आमतौर पर स्त्रियों को कोई सम्मान नहीं मिलता. मेरे अंदर ऐसे बहुत प्रश्न थे, जिन का हल मुझे चाहिए था, ऐसे में ह्यूमन राइट्स और्गेनाइजेशन में ब्रैंड ऐंबेसडर बनने का औफर मिला. मैं ने स्कूल में पढ़ते हुए ही यह काम शुरू कर दिया था, ताकि महिलाओं में जागरूकता बढ़े और उन के हक के बारे में उन्हें परिचित करा सकूं.
अगर किसी को खुद के हक के बारे में पता न हो, तो इसे रोकना संभव नहीं. ‘न’ बोलना तभी संभव होता है, जब आप अपनी सीमा से परिचित हो. मेरा यह पैशन है और इसे मैं फिल्मों, स्कूलों और कालेजों के जरीए करती रहती हूं. इस से ही एक नया समाज बनने का सपना पूरा हो सकेगा.

नारी शक्ति में कमी

स्त्रियों पर आज भी अधिक शोषण होने की वजह के बारे में शीना का कहना है कि अपने अंदर की कौन्फिडेंस को वे जुटा नहीं पातीं, क्योंकि समाज और परिवार के प्रेशर बहुत होते हैं और सहयोग बहुत कम मिलता है. एक औरत की सैल्फ रिस्पेक्ट और कौन्फिडेंस को पहले जगाने की जरूरत है, इस के बाद वे बाहर अपनी बाउंड्री तय कर सकती हैं, ताकि अगर कुछ गलत होता है, तो आप खड़े हो कर सही और गलत को बोल सकती हैं. यही समस्या हर जगह है. जहां की सोसाइटी पुरुषप्रधान है, महिलाओं को झेलना पड़ रहा है. अभी थोड़ा बदलाव दिख रहा है, लेकिन अभी भी फिल्मों में वूमन को ही आब्जेक्टिफाई किया जाता है. मैं इस दिशा में स्त्रियों की आवाज बन कर अधिक काम करना चाहती हूं, क्योंकि इस से मुझे खुशी मिलती है.

शीना आज की लड़कियों से गुजारिश करती हुई कहती हैं कि वे अपने अधिकारों के बारे में जानें. जहां कुछ गलत लग रहा हो, वहां न बोलना सीखें, खुद को हमेशा रिस्पैक्ट दें, अपने ऊपर विश्वास रखें. सफलता का मूलमंत्र यही है.

Family Bond : मेरी पत्नी और मां के बीच रोज झगड़ा होता है, इसका कैसे समाधान करूं?

Family Bond : अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल

 मैं विवाहित पुरुष हूं. मेरे साथ मेरी मां भी रहती हैं. आए दिन किसी न किसी बात पर मेरी पत्नी व मेरी मां के बीच बहस होती रहती है जिस से मेरी पत्नी मुझ से नाराज हो जाती है. वह बहस या झगड़े के लिए मुझे जिम्मेदार मानती है. नतीजतन, मेरे और पत्नी के संबंधों में कड़वाहट बढ़ रही है. सब से बड़ी बात, मैं अपनी पत्नी के साथ शारीरिक संबंध नहीं बना पाता. मैं ऐसा क्या करूं कि मेरी पत्नी और मां के बीच के झगड़े कम हो जाएं और हम पति पत्नी के बीच दूरियां भी खत्म हो जाएं, सलाह दें.

जवाब

विवाह के बाद जब एक लड़की ससुराल में आती है तो वह उम्मीद रखती है कि घर के सदस्य उसे इस नए माहौल में ऐडजस्ट करने में मदद करेंगे. वहीं, सास के मन में बहू के आने से असुरक्षा की भावना पनपने लगती है. उसे अपना राजपाट छिनता नजर आता है. इसलिए वह बातबेबात पर बहू पर अपना रोब झाड़ती है जिस के चलते सासबहू में झगड़े व विवाद शुरू हो जाते हैं. ऐसे में बेटे की जिम्मेदारी होती है कि वह पत्नी और मां के रिश्ते के बीच संतुलन बना कर रखे. मां को मां की जगह दे और पत्नी को पत्नी के अधिकार. आप के मामले में हो सकता है कि आप दोनों रिश्तों के बीच संतुलन न बना पा रहे हों जिस के कारण आप की पत्नी आप से नाराज रहती हो.

आप दोनों रिश्तों के बीच सामंजस्य बना कर रखें तभी आप पतिपत्नी की सैक्सुअल लाइफ खुशनुमा रह पाएगी. वरना आप की पत्नी, आप की मां का गुस्सा आप पर निकालेगी और संबंधों में मधुरता की जगह कड़वाहट बनी रहेगी जैसा कि अभी हो रहा है.

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जबरन यौन संबंध बनाना पति का विशेषाधिकार नहीं

विवाह बाद पत्नी से जबरन सैक्स करने को बलात्कार कहा जाने वाला कानून बनाए जाने के खिलाफ जो बातें कही जा रही हैं वे सब धार्मिक नजरिए से कही जा रही हैं. इन का मकसद यह कहना है कि चूंकि हिंदू धर्म में विवाह एक पवित्र बंधन है, इसलिए वैवाहिक बलात्कार जैसी किसी बात के लिए यहां कोई जगह नहीं. जब से विवाहितों के बीच बलात्कार को ले कर चर्चा शुरू हुई तब से यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि रोजमर्रा की इस बहुत ही सहज, सरल व सामान्य बात को ले कर इतना शोर मचाने का कोई औचित्य नहीं है.

कभी न कभी हर महिला अपने सुख के लिए नहीं, मात्र पति की यौन संतुष्टि के लिए बिस्तर पर बिछती है. शादी को ले कर उस ने जो सपना बुना होता है वह चूरचूर हो जाता है. कई नवविवाहित युवतियों का पहली रात का अनुभव बड़ा दर्दनाक होता है. इतना कि सैक्स उन के लिए आनंद का नहीं, बल्कि डर का विषय बन कर रह जाता है. कुछ इस डर को रोज झेलती हैं और फिर यह उन की आदत में शुमार हो जाता है.

दरअसल, इस तरह का मामला तब तकलीफदेह हो जाता है जब किसी महिला के पति का संभोग हिंसक यौन हमले का रूप ले लेता है और वह महिला महज यौन सामग्री के रूप में तबदील हो जाती है. वह असहाय हो जाती है. तब जाहिर है, आपसी परिचय और भरोसे की नींव हिल जाती है. कुछ मामलों में वजूद का आपसी टकराव ही ऐसे संबंध की सचाई बन कर रह जाता है. कुछ ज्यादा ही सोचता है. एक लड़की का बदन किस हद तक खुला रहना शोभनीय या अशोभनीय है या फिर किसी बच्ची के लड़की से युवती बनने के रास्ते में कौन से शारीरिक संबंध सामाजिक रूप से स्वीकृत हैं, इस सब के बारे में सामाजिक व धार्मिक फतवे जारी किए जाते हैं. जबकि इसी समाज में चाचा, मामा और यहां तक कि पिता और भाइयों द्वारा भी लड़कियां बलात्कार की शिकार हो रही हैं. तो क्या यह भी धर्म और संस्कृति का हिस्सा है? बहरहाल, अब एक और सांस्कृतिकसामाजिक फतवे को सरकारी स्वीकृति दिलाने की कोशिश की जा रही है और यह स्वीकृति है वैवाहिक संबंध में बलात्कार को ले कर. कहा जा रहा है कि धर्म के अनुसार हुए विवाह में बलात्कार की गुंजाइश नहीं है.

गौरतलब है कि निर्भया कांड के बाद वर्मा कमीशन द्वारा वैवाहिक बलात्कार को बलात्काररोधी कानून में शामिल करने की सिफारिश से हड़कंप मच गया. मोदी सरकार में मंत्री रहे हरिभाई पारथीभाई चौधरी ने साफसाफ शब्दों में कहा है कि वैवाहिक रिश्ते में बलात्कार जैसी कोई चीज हो ही नहीं सकती. इस के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने साफ किया कि विधि आयोग ने बलात्कार संबंधी कानून में वैवाहिक बलात्कार को अपराध की सूची में शामिल नहीं किया है और न ही सरकार ऐसा करने की सोच रही है.

अंदेशा यह है कि इस से परिवारों के टूटने का खतरा बढ़ जाएगा. इस खतरे को टालने के लिए हमारा समाज पत्नियों की बलि लेने को तैयार है. तर्क यह भी कि भारतीय समाज में केवल विवाहित यौन संबंध को ही सामाजिक स्वीकृति मिली हुई है और इस पर पत्नी और पति दोनों का ही समान अधिकार है. अर्द्धनारीश्वर की अवधारणा भी तो भारत की धार्मिक संस्कृति का हिस्सा है. लेकिन ऐसा होता कहां है? ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यौन संबंध बनाने में पत्नी की इच्छा न होने की स्थिति में क्या ऐसा करने का अधिकार अकेले पति को मिल जाता है? जबरन संबंध बनाने का अधिकार अकेले पति  का कैसे हो सकता है? पति द्वारा जबरन यौन संबंध बनाने को आखिर क्यों बलात्कार नहीं माना जाना चाहिए?

आइए, जानें कि भारतीय कानून इस बारे में क्या कहता है. कोलकाता हाई कोर्ट के वकील भास्कर वैश्य का कहना है कि भारतीय कानून के तहत पति को केवल 2 तरह के मामलों में बलात्कारी कहा जा सकता है- पहला अगर पत्नी की उम्र 15 साल से कम हो और पति उस के साथ जबरन यौन संबंध बनाए तो कानून की नजर में यह बलात्कार है और दूसरा, पतिपत्नी के बीच तलाक का मामला चल रहा हो, कानूनी तौर पर पतिपत्नी के बीच विच्छेद यानी सैपरेशन चल रहा हो और पति पत्नी की रजामंदी के बगैर जबरन यौन संबंध बनाता है तो इसे भारतीय कानून में बलात्कार कहा गया है. इस के लिए सजा का प्रावधान भी है. हालांकि इन दोनों ही मामलों में पति को जो सजा सुनाई जा सकती है वह बलात्कार के लिए तय की गई सजा की तुलना में कम ही होती है.

विवाह की पवित्रता पर सवाल

सुनने में यह भी बड़ा अजीब लगता है कि विवाहित महिला कानून यौन संबंध के लिए पति को अपनी सहमति देने को बाध्य है यानी पत्नी यौन संबंध के लिए पति को मना नहीं कर सकती. कुल मिला कर यहां यही मानसिकता काम करती है कि चूंकि हमारे यहां विवाह को पवित्र रिश्ते की मान्यता प्राप्त है और इस का निहितार्थ संतान पैदा करना है, इसलिए पतिपत्नी के बीच यौन संबंध बलात्कार की सीमा से बाहर की चीज है. तब तो इस का अर्थ यही निकलता है कि यौन संबंध बनाने की पति की इच्छा के आगे पत्नी की अनिच्छा या उस की असहमति कानून की नजर में गौण है.

ऐसे में यह कहावत याद आती है कि मैरिज इज ए लीगल प्रौस्टिट्यूशन यानी पत्नी का शरीर रिस्पौंस करे या न करे पति के स्पर्श में प्रेम की छुअन का उसे एहसास मिले या न मिले पति की जैविक भूख ही सब से बड़ी चीज है. यह बात दीगर है कि जब प्रेमपूर्ण स्पर्श पर पति की जैविक भूख हावी हो जाती है तब यह स्थिति किसी भी पत्नी के लिए किसी अपमान से कम नहीं होती. जाहिर है, सभी विवाह पवित्र नहीं होते. हमारे समाज में बहुत सारी ऐसी महिलाएं हैं, जिन के मन में कभी न कभी यह सवाल उठाता है कि क्या वाकई सैक्स पत्नियों के लिए भी सुख का सबब हो सकता है? जिन के भी मन में यह सवाल आया, उन के लिए शादी कतई पवित्र रिश्ता नहीं हो सकता. रवींद्रनाथ ठाकुर ने भी अपने एक अधूरे उपन्यास ‘योगायोग’ में वैवाहिक बलात्कार का मुद्दा उठाया है. उन्होंने उपन्यास की नायिका कुमुदिनी के जरीए यही बताने की कोशिश की है कि सभी विवाह पवित्र नहीं होते. शादी के बाद पति मधुसूदन के साथ बिताई गई रात के बाद कुमुदिनी ने आखिर अपनी करीबी बुजुर्ग महिला से पूछ ही लिया कि क्या सभी पत्नियां अपने पति को प्यार करती हैं?

गौरतलब है कि यह उपन्यास 1927 में लिखा गया था. जाहिर है, वैवाहिक बलात्कार इस से पहले एक सामाजिक समस्या रही होगी और नारीवादी रवींद्रनाथ ठाकुर ने इस समस्या को अपने इस उपन्यास में बड़ी शिद्दत से उठाया है.

वैवाहिक बलात्कार और राजनेता

वैवाहिक बलात्कार पर यूनाइटेड नेशंस पौप्यूलेशन फंड का एक आंकड़ा कहता है कि भारत में विवाहित महिलाओं की कुल आबादी की तीनचौथाई यानी 75% महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन में अकसर बलात्कार का शिकार होती हैं. मजेदार तथ्य यह है कि आज भी वैवाहिक बलात्कार के आंकड़े पूरी तरह से उपलब्ध नहीं हैं. अगर इस से संबंधित आंकड़े उपलब्ध होते तो समस्या की गंभीरता का अंदाजा लगाना और भी सहज होता, कभीकभार ही कोई मामला दर्ज होता है. विश्व के ज्यादातर देशों में वैवाहिक बलात्कार की गिनती दंडनीय अपराधों में होती है. यूनाइटेड नेशंस पौप्यूलेशन फंड के इस आंकड़े के आधार पर ही डीएमके सांसद कनीमोझी ने भी बलात्कार विरोधी कानून में बदलाव की मांग की थी. इसी मांग के जवाब में मोदी सरकार में तत्कालीन गृह राज्यमंत्री हरिभाई पारथी ने बयान दिया कि वैवाहिक बलात्कार की अवधारणा भारतीय संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था, मूल्यबोध और धार्मिक आस्था के अनुरूप नहीं है.

जाहिर है, 16 दिसंबर, 2013 को दिल्ली में निर्भया कांड की जांच के लिए गठित किए गए वर्मा कमीशन की रिपोर्ट की हरिभाई पारथी ने अनदेखी कर के बयान दिया था. गौरतलब है कि वर्मा कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में वैवाहिक बलात्कार को भी बलात्कार विरोधी कानून में शामिल करने की सिफारिश की थी. हालांकि हमारा बलात्कार संबंधी कानून तो यही कहता है कि यौन संबंध बनाने में महिला की सहमति न हो तो उस की गिनती बलात्कार में होगी. लेकिन पति द्वारा बलात्कार को इस से जोड़ कर देखने में सरकार को भी गुरेज है.

शादी एकतरफा यौन संबंध की छूट नहीं

इस विषय पर आम चर्चा के दौरान मध्य कोलकाता में एक डाकघर में कार्यरत संचिता चक्रवर्ती बड़ी ही बेबाकी के साथ कहती हैं कि कानून की बात दरकिनार कर दें. जहां तक यौन संबंध में महिला की सहमति का सवाल है तो उस का निश्चित तौर पर अपना महत्त्व है, इस से इनकार नहीं किया जा सकता. विवाह का प्रमाणपत्र इस महत्त्व को कतई कम नहीं कर सकता. यौन संबंध में पतिपत्नी दोनों अगर बराबर के साझेदार हों तो वह सुख दोनों के लिए अवर्णनीय होगा. विवाह बंधन जबरन यौन संबंध का लाइसैंस किसी भी कीमत पर नहीं हो सकता.

संचिता कहती हैं कि मोदी सरकार में मंत्री के बयान की बात करें तो उस से तो यही लगता है कि उन के हिसाब से भारतीय संस्कृति में पत्नी की सहमति के बगैर यौन संबंध बनाने की पति को छूट है. भारत में विभिन्न संस्कृतियों के लोगों का वास है. तथाकथित भारतीय संस्कृति में विवाहित महिला पुरुष की बांदी है, भोग की वस्तु है. इसीलिए वैवाहिक बलात्कार उन की तथाकथित भारतीय संस्कृति में लागू नहीं होता. अमेरिका के शिकागो में एक अस्पताल में कार्यरत भारतीय मूल की सुष्मिता साहा का कहना है कि इस विषय को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और वैवाहिक बलात्कार पर सख्त कानून होना ही चाहिए. आज भारत में जिस संस्कृति की दुहाई दी जा रही है, वही स्थिति कभी ब्रिटेन या न्यूयौर्क में थी. पर अब वहां वैवाहिक बलात्कार के बढ़ते मामलों को देखते हुए कड़े कानून बनाए गए हैं. फिर भारत में यह क्यों नहीं संभव हो सकता?

सुष्मिता कहती हैं, ‘‘जबरन यौन संबंध पति का विशेषाधिकार उसी तरह नहीं हो सकता, जिस तरह विवाह का प्रमाणपत्र यौन हिंसा की छूट नहीं देता. इसलिए वैवाहिक बलात्कार भी दरअसल दूसरे बलात्कार की ही तरह यौन हिंसा का ही एक मामला है, ऐसा न्यूयौर्क के अपील कोर्ट ने अपने बयान में कहा था. लेकिन अगर एक पत्नी के नजरिए से देखें तो वैवाहिक बलात्कार अन्य बलात्कार से इस माने में अलग है कि यहां यौन हिंसा को महिला का सब से करीबी व्यक्ति अंजाम देता है. यही बात किसी पत्नी को जीवन भर के लिए झकझोर देती है.

विवाह और यौन स्वायत्तता

भारतीय संस्कृति में पारंपरिक विवाह के तहत लड़कालड़की की पारिवारिकसामाजिक हैसियत को देखपरख कर वैवाहिक रिश्ते तय होते हैं. ऐसे रिश्ते में जाहिर है परस्पर प्रेम व मित्रता शुरुआत में नहीं होती है. हालांकि कुछ समय के बाद पतिपत्नी के बीच प्रेम का रिश्ता बन जाता है. पर ऐसे ज्यादातर विवाह एकतरफा यौन स्वायत्तता का मामला ही होते हैं. मोदी सरकार के मंत्री ने जिस भारतीय संस्कृति की बात की है उस में नारीजीवन की इसी सार्थकता का प्रचार सदियों से किया जाता रहा है और इस संस्कृति में औरत पुरुष के खानदान के लिए बच्चे पैदा करने का जरीया और पुरुष के लिए यौन उत्तेजना पैदा करने की खुराक मान ली गई है.हमारी परंपरा में लड़कियां अपने मातापिता को खुल कर सब कुछ कहां बता पाती हैं? खासतौर पर नई शादी का ‘लव बाइट’ आगे चल कर पति का ‘वायलैंट बाइट’ बन जाए तो शादी के नाम पर लड़की अकसर अपने भीतर ही भीतर घुट कर रह जाती है. माना ऐसा हर किसी के साथ नहीं होता है.

2013 में दिल्ली में पारंपरिक विवाह के बाद नवविवाहित जोड़ा हनीमून के लिए बैंकौक पहुंचा. हनीमून के दौरान लड़की के साथ उस के पति पुनीत ने क्रूरता की तमाम हदें पार कर के बलात्कार किया. लौट कर लड़की ने पुलिस में शिकायत दर्ज की. पुलिस ने दीनदयाल अस्पताल में लड़की की जांच करवाई तो बलात्कार की पुष्टि हुई. इस के बाद भारतीय दंड विधान की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दायर किया. साफ है कि वैवाहिक बलात्कार पर हमारा कानून एकदम से खामोश भी नहीं है. इस के लिए भी हमारे यहां प्रावधान है. भारतीय दंड विधान की घरेलू हिंसा की धारा 498ए के तहत शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न और क्रूरता के लिए सजा का प्रावधान है. इसी धारा के तहत वैवाहिक बलात्कार का निदान महिलाएं ढूंढ़ सकती हैं.

अन्य देशों की स्थिति

चूंकि विकास और सभ्यता एक निरंतर प्रक्रिया है, इसीलिए दुनिया के बहुत सारे देशों में वैवाहिक बलात्कार के लिए कोई कानून नहीं था. लेकिन विमन लिबरेशन ने महिलाओं को अपने अधिकार के लिए आवाज बुलंद करना सिखाया. लंबी लड़ाई के बाद सफलता भी मिली. दोयमदर्जे की स्थिति में बदलाव आया. कहा जाता है कि आज दुनिया के 80 देशों में वैवाहिक बलात्कार के लिए कानूनी प्रावधान हैं. बहरहाल, दुनिया में वैवाहिक बलात्कार को ले कर चर्चा ने तब पूरा जोर पकड़ा जब 1990 में डायना रसेल की एक किताब ‘रेप इन मैरिज’ प्रकाशित हुई. इस किताब में डायना रसेल ने समाज को अगाह करने की कोशिश की है कि वैवाहिक जीवन में बलात्कार को पति के विशेषाधिकार के रूप में देखा जाना पत्नी के लिए न केवल अपमानजनक है, बल्कि महिलाओं के लिए एक बड़ा खतरा भी है.

2012 में अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की आयुक्त भारतीय मूल की नवी पिल्लई ने कहा कि जब तक महिलाओं को उन के शरीर और मन पर पूरा अधिकार नहीं मिल जाता, जब तक पुरुष और महिला के बीच गैरबराबरी की खाई को पाटा नहीं जा सकता. महिला अधिकारों का उल्लंघन ज्यादातर उस के यौन संबंध और गर्भधारण से जुड़ा हुआ होता है. ये दोनों ही महिलाओं का निजी मामला है. कब, कैसे और किस के साथ वह यौन संबंध बनाए या कब, कैसे और किस से वह बच्चा पैदा करे, यह पूरी तरह से महिलाओं का अधिकार होना चाहिए. यह अधिकार हासिल कर के ही कोई महिला सम्मानित जीवन जी सकती है. 1991 में ब्रिटेन की संसद में वैवाहिक संबंध में बलात्कार का मामला उठाया गया था, जो आर बनाम आर के नाम से दुनिया भर में जाना जाता है. ब्रिटेन संसद के हाउस औफ लौर्ड्स में कहा गया कि चूंकि शादी के बाद पति और पत्नी दोनों समानरूप से जिम्मेदारियों का वहन करते हैं, इसलिए पति अगर पत्नी की सहमति के बिना यौन संबंध बनाता है तो अपराधी करार दिया जा सकता है. इस से पहले 1736 में ब्रिटेन की अदालत के न्यायाधीश हेल ने एक मामले की सुनवाई के बाद फैसला सुनाया था कि शादी के बाद सभी परिस्थितियों में पत्नी पति से यौन संबंध बनाने को बाध्य है. उस की शारीरिक स्थिति कैसी है या यौन संबंध बनाने के दौरान वह क्या और कैसा महसूस कर रही है, इन बातों के इसलिए कोई माने नहीं हैं, क्योंकि शादी का अर्थ ही यौन संबंध के लिए मौन सहमति है. हेल के इस फैसले को ब्रिटेन में 1949 से पहले कभी किसी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ा. लेकिन 1949 में एक पति को पहली बार पत्नी के साथ बलात्कार का दोषी ठहराया गया.

ब्रिटेन के अलावा यूरोप के कई देशों में वैवाहिक बलात्कार दंडनीय अपराध है. अमेरिका, आस्ट्रेलिया और अफ्रीकी देशों में भी इस के लिए कानून बना कर इसे दंडनीय अपराध घोषित किया गया है. नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने भी पत्नी की रजामंदी के बगैर संभोग को बलात्कार करार दिया है. कोर्ट ने अपनी इस घोषणा का आधार हिंदू धर्म को ही बताते हुए कहा है कि हिंदू धर्म में पति और पत्नी की आपसी समझ को ही महत्त्व दिया गया है. इसलिए यौन संबंध बनाने में पति पत्नी की मरजी की अनदेखी नहीं कर सकता. अब जब गरीब राष्ट्र नेपाल घोषित रूप से भी हिंदू राष्ट्र है, वैवाहिक बलात्कार के लिए महिलाओं के पक्ष में कानून बना सकता है तो भारत में क्या दिक्कत है?

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
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क्या शादी के 37 साल बाद Govinda ले रहे हैं तलाक ? जानें पत्नी सुनीता से अलग होने की वजह

Govinda and Sunita Ahuja Divorce : बौलीवुड के फेमस ऐक्टर गोविंदा के डांस और ऐक्टिंग का हर कोई दीवाना है. जब भी वह किसी शो में जाते हैं, तो वहां का माहौल ही कुछ अलग सा हो जाता है. उनकी पत्नी सुनीता आहूजा सोशल मीडिया पर काफी ऐक्टिव रहती हैं. वह अपने बेबाक अंदाज के लिए जानी जाती हैं.

 गोविंदा और सुनीता आहूजा की शादी टूट जाएगी?

गोविंदा और सुनीता आहूजा
गोविंदा और सुनीता आहूजा

सुनीता आहूजा किसी न किसी कारण से चर्चा में बनी रहती हैं. अब गोविंदा और सुनीता से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आ रही है. बताया जा रहा है कि दोनों की शादीशुदा जिंदगी में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है.जी हां रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि गोविंदा और उनकी पत्नी का 37 साल पुराना रिश्ता टूट रहा है और इसकी वजह गोविंदा का एक्सट्रा मैरिटल अफेयर है. रिपोर्ट के अनुसार उनके तलाक का फाइनल स्टेज चल रहा है.

क्या गोविंदा का चल रहा है एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर

 गोविंदा और सुनीता आहूजा
गोविंदा और सुनीता आहूजा

खबरों के अनुसार, 30 साल की एक मराठी ऐक्ट्रैस के साथ गोविंदा रिलेशनशिप में हैं. सुनिता आहूजा ने कई इंटरव्यू में बताया है कि दोनों पति-पत्नी अलगअलग घरों में रहते हैं. क्योंकि उनकी शेड्यूल मैच नहीं करते. गोविंदा और सुनीता आहूजा की तलाक में कितनी सच्चाई है, ये कपल ही बता सकते हैं. हालांकि तलाक की खबरों पर गोविंदा और सुनीता की तरफ से कोई औफिशियल रिएक्शन नहीं आया है.

एकसाथ नहीं रहते हैं गोविंदा और सुनीता

सुनीता आहूजा ने इंटरव्यू में ये भी बताया था कि वह अपने बच्चों के साथ फ्लैट में रहती हैं. वहीं गोविंदा फ्लैट के सामने एक बंगले में रहते हैं. इसके अलावा इंटरव्यू से जुड़ा एक वीडियो समाने आया था, जिसमें सुनीता ये कहते हुए नजर आ रही थी कि ‘कभी भी किसी भी आदमी पर भरोसा मत करो. लोग गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं. हमारी शादी को 37 साल हो गए हैं. वो कहां जाएगा? पहले कभी कहीं नहीं जाता था और अब मुझे पता नहीं…’

आबता दें कि  1987 में गोविंदा और सुनीता ने शादी की थी. दोनों ने एकदूसरे को पसंद कर शादी की थी.  शादी के वक्त सुनीता की उम्र बहुत कम थी, वह सिर्फ 18 साल की थीं. कपल के दो बच्चे हैं, टीना और यशवर्धन.

Online Hindi Story : 8 नवंबर की शाम – आखिर उस शाम कैसे बदल गए मुग्धा की जिंदगी के माने

Online Hindi Story : आज 8 नवंबर, 2017 है. मुग्धा औफिस नहीं गई. मन नहीं हुआ. बस, यों ही. अपने फ्लैट की बालकनी से बाहर देखते हुए एक जनसैलाब सा दिखता है मुग्धा को. पर उस के मन में तो एक स्थायी सा अकेलापन बस गया है जिसे मुंबई की दिनभर की चहलपहल, रोशनीभरी रातें भी खत्म नहीं कर पातीं. कहने के लिए तो मुंबई रोमांच, ग्लैमर, फैशन, हमेशा शान वाली जगह समझी जाती है पर मुग्धा को यहां बहुत अकेलापन महसूस होता है.

जनवरी में मुग्धा लखनऊ से यहां मुंबई नई नौकरी पर आई थी. यह वन बैडरूम फ्लैट उसे औफिस की तरफ से ही मिला है. आने के समय वह इस नई दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए, जीवन फिर से जीने के लिए जितनी उत्साहित थी, अब उतनी ही स्वयं को अकेला महसूस करने लगी है. बिल्ंिडग में किसी को किसी से लेनादेना है नहीं. अपने फ्लोर पर बाकी 3 फ्लैट्स के निवासी उसे लिफ्ट में ही आतेजाते दिखते हैं. किसी ने कभी पूछा ही नहीं कि नई हो? अकेली हो? कोई जरूरत तो नहीं? मुग्धा ने फिर स्वयं को अलमारी पर बने शीशे में देखा.

वह 40 साल की है, पर लगती नहीं है, वह यह जानती है. वह सुंदर, स्मार्ट, उच्च पद पर आसीन है. पिछली 8 नवंबर का सच सामने आने पर, सबकुछ भूलने के लिए उस ने यह जौब जौइन किया है. मुग्धा को लगा, उसे आज औफिस चले ही जाना चाहिए था. क्या करेगी पूरा दिन घर पर रह कर, औफिस में काम में सब भूली रहती, अच्छा होता.

वह फिर बालकनी में रखी चेयर पर आ कर बैठ गई. राधा बाई सुबह आती थी, खाना भी बना कर रख जाती थी. आज उस का मन नहीं हुआ है कुछ खाने का, सब ज्यों का त्यों रखा है. थकीथकी सी आंखों को बंद कर के उसे राहत तो मिली पर बंद आंखों में बीते 15 साल किसी फिल्म की तरह घूम गए.

सरकारी अधिकारी संजय से विवाह कर, बेटे शाश्वत की मां बन वह अपने सुखी, वैवाहिक जीवन का पूर्णरूप से आनंद उठा रही थी. वह खुद भी लखनऊ में अच्छे जौब पर थी. सबकुछ अच्छा चल रहा था. पर पिछले साल की नोटबंदी की घोषणा ने उस के घरौंदे को तहसनहस कर दिया था.

नोटबंदी की घोषणा होते ही उस के सामने कितने कड़वे सच के परदे उठते चले गए थे. उसे याद है, 8 नवंबर, 2016 की शाम वह संजय और शाश्वत के साथ डिनर कर रही थी. टीवी चल रहा था. नोटबंदी की खबर से संजय के चेहरे का रंग उड़ गया था. शाश्वत देहरादून में बोर्डिंग में रहता था. 2 दिनों पहले ही वह घर आया था. खबर चौंकाने वाली थी.

आर्थिकरूप से घर की स्थिति खासी मजबूत थी, पर संजय की बेचैनी मुग्धा को बहुत खटकी थी. संजय ने जल्दी से कार की चाबी उठाई थी, कहा था, ‘कुछ काम है, अभी आ रहा हूं.’

‘तुम्हें क्या हुआ, इतने परेशान क्यों हो?’

‘बस, कुछ काम है.’

मुग्धा को सारी सचाई बाद में पता  चली थी. संजय के सलोनी नाम की युवती से अवैध संबंध थे. सलोनी के रहने, बाकी खर्चों का प्रबंध संजय ही करता था. संजय के पास काफी कालाधन था जो उस ने सलोनी के फ्लैट में ही छिपाया हुआ था. उस ने ईमानदार, सिद्धांतप्रिय मुग्धा को कभी अपने इस कालेधन की जानकारी नहीं दी थी. वह जानता था कि मुग्धा यह बरदाश्त नहीं करेगी.

उस दिन संजय सीधे सलोनी के पास पहुंचा था. सलोनी को उस पैसे को खर्च करने के लिए मना किया था. सलोनी सिर्फ दौलत, ऐशोआराम के लिए संजय से चिपकी हुई थी. संजय का पैसा वह अपने घर भी भेजती रहती थी. संजय कालेधन को ठिकाने लगाने में व्यस्त हो गया.

सलोनी को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी थी. उस ने संजय से छिपा कर 2-3 एजेंट्स से बात भी कर ली थी जो कमीशन ले कर रुपए जमा करवाने और बदलवाने के लिए तैयार हो गए थे. उन में से एक सीबीआई का एजेंट था. सलोनी की मूर्खता से संजय और सलोनी को गिरफ्तार कर लिया गया था.

दोनों का प्रेमसंबंध मुगधा के सामने आ चुका था. इस पूरी घटना से मुग्धा शारीरिक और मानसिक रूप से इतनी आहत हुई थी कि वह सब से रिश्ता तोड़ कर यहां मुंबई में नई नौकरी ढूंढ़ कर शिफ्ट हो गई थी. उस के मातापिता थे नहीं, भाईभाभी और सासससुर ने जब पतिपत्नी संबंधों और पत्नीधर्म पर उपदेश दिए तो उसे बड़ी कोफ्त हुई थी.

एक तो भ्रष्ट पति, उस पर धोखेबाज, बेवफा भी, नहीं सहन कर पा रही थी वह. शाश्वत समझदार था, सब समझ गया था. मुग्धा बेटे के संपर्क में रहती थी. संजय से तलाक लेने के लिए उस ने अपने वकील से पेपर्स तैयार करवाने के लिए कह दिया था.

वह आज की औरत थी, पति के प्रति पूरी तरह समर्पित रहने पर भी उस का दिल टूटा था. वह बेईमान, धोखेबाज पति के साथ जीवन नहीं बिता सकती थी. आज नोटबंदी की शाम को एक साल हो गया है. नोटबंदी की शाम उस के जीवन में बड़ा तूफान ले कर आई थी. पर अब वह दुखी नहीं होगी. बहुत रो चुकी, बहुत तड़प चुकी. अब वह परिवार बिखरने का दुख ही नहीं मनाती रहेगी.

नई जगह है, नया जीवन, नए दोस्त बनाएगी. दोस्त? औफिस में तो या बहुत यंग सहयोगी हैं या बहुत सीनियर. मेरी उम्र के जो लोग हैं वे अपने काम के बाद घर भागने के लिए उत्साहित रहते हैं. मुंबई में अधिकांश लोगों को औफिस से घर आनेजाने में 2-3 घंटे तो लगते ही हैं. उस के साथ कौन और क्यों, कब समय बिताए. पुराने दोस्तों से फोन पर बात करती है तो जब जिक्र संजय और सलोनी पर पहुंच जाए तब वह फोन रख देती है. नए दोस्त बनाने हैं, जीवन फिर से जीना है. वह पुरानी यादों से चिपके रह कर अपना जीवन खराब करने वालों में से नहीं है.

आज फिर 8 नवंबर की शाम है लेकिन वर्ष है 2017. संजय से मिले धोखे को एक साल हुआ है. आज से ही कोई दोस्त क्यों न ढूंढ़ा जाए. वह अपने फोन पर कभी कुछ, कभी कुछ करती रही. अचानक उंगलियां ठिठक गईं. मन में एक शरारती सा खयाल आया तो होंठों पर एक मुसकान उभर आई. वह टिंडर ऐप डाउनलोड करने लगी, एक डेटिंग ऐप. यह सही रहेगा, उस ने स्वयं में नवयौवना सा उत्साह महसूस किया. यह ऐप 2012 में लौंच हुई थी. उसे याद आया उस ने संजय के मुंह से भी सुना था, संजय ने मजाक किया था, ‘बढि़या ऐप शुरू हुई है. अकेले लोगों के लिए अच्छी है. आजकल कोई किसी भी बात के लिए परेशान नहीं हो सकता. टैक्नोलौजी के पास हर बात का इलाज है.’

मुग्धा ने तब इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था. वह अपने परिवार, काम में खुश थी. डेटिंग ऐप के बारे में जानने की उसे कहां जरूरत थी. अब तो अकेलापन दूर करना है, यही सही. अब वह देख रही थी, पहला स्वाइपिंग ऐप जहां उसे दूसरे यूजर्स के फोटो में चुनाव के लिए स्वाइपिंग मोशन यूज करना है. अच्छे लग रहे मैच के लिए राइट स्वाइप, आगे बढ़ने के लिए लैफ्ट.

मुग्धा के चेहरे पर एक अरसे बार मुसकराहट थी. वह एक के बाद एक फोटो देखती गई. एक फोटो पर उंगली ठहर गई, चेहरे पर कुछ था जो उस की नजरें ठहर गईं. उसी की उम्र का अभय, यह मेरा दोस्त बनेगा? बात कर के देखती हूं, नुकसान तो कुछ है नहीं. मुग्धा ने ही संपर्क किया. बात आगे बढ़ी. दोनों ने एकदूसरे में रुचि दिखाई. फोन नंबर का आदानप्रदान भी हो गया.

अभय का फोन भी आ गया. उस ने अपना पूरा परिचय बहुत ही शालीनता से मुग्धा को दोबारा दिया, बताया कि वह भी तलाकशुदा है, परेल में उस का औफिस है, अकेला रहता है. अभय के सुझाव पर दोनों ने मिलने की जगह तय कर ली.

बौंबे कैंटीन जाने का यह मुग्धा का पहला मौका था. शनिवार की शाम वह अच्छी तरह से तैयार हुई. ढीला सा व्हाइट टौप पर छोटा प्रिंट, ब्लैक जींस में वह काफी स्मार्ट लग रही थी. बौंबे कैंटीन के बाहर ही हाथ में फूल लिए अभय खड़ा था. दोनों ने बहुत ही शालीनता से, मुसकराते हुए एकदूसरे को ‘हाय’ कहा.

मुग्धा की आकर्षक मुसकराहट अभय के दिल में अपनी खास जगह बनाती चली गई. अब तक वे दोनों फोन पर काफी बातें कर चुके थे, बौंबे कैंटीन के इंटीरियर पर नजर डालते हुए मुग्धा ने कहा, ‘‘काफी अलग सी जगह है न.’’

‘‘मैं यहां अकसर आता हूं, मेरे औफिस से पास ही है,’’ अभय ने कहा. उसी समय एक वेटर मैन्यू कार्ड दे गया तो मुग्धा बोली, ‘‘फिर तो आज आप ही और्डर कीजिए क्योंकि यहां के खाने में आप को अंदाजा भी होगा.’’

‘‘ठीक है, फिर आज मेरी पसंद का खाना खाना.’’

मुग्धा को अंदाजा हो गया था, वहां के वेटर्स अभय को अच्छी तरह पहचानते थे. अभय का सहज, सरल व्यक्तित्व मुग्धा को प्रभावित कर गया था. अभय उसे बहुत अच्छा लगा था. खाना सचमुच जायकेदार था. मुग्धा ने दिल से अभय की पसंद के खाने की तारीफ की. दोनों फिर इस टिंडर ऐप की बात पर हंसने लगे थे.

अभय ने कहा, ‘‘जानती हो, मुग्धा, पहले मैं ऐसी ऐप्स को मूर्खतापूर्ण चीजें समझता था. उस दिन मैं पहली बार ही यह ऐप देख रहा था और पहली बार ही तुम से बात हो गई,’’ फिर उस के स्वर में अचानक उदासी का पुट आ गया, ‘‘जीवन में अकेलापन तो बहुत अखरता है. देखने में तो मुंबई में खूब चहलपहल है, कोई कोना खाली नहीं, भीड़ ही भीड़, पर मन इस भीड़ में भी कितना तनहा रहता है.’’

‘‘हां, सही कह रहे हो,’’ मुग्धा ने भी गंभीरतापूर्वक कहा.

उस के बाद दोनों अपने जीवन के अनुभव एकदूसरे से बांटते चले गए. अभय की पत्नी नीला विदेश में पलीबढ़ी थी. विदेश में ही एक फंक्शन में दोनों मिले थे. पर नीला भारतीय माहौल में स्वयं को जरा भी ढाल नहीं पाई. अभय अपने मातापिता की इकलौती संतान था. वह उन्हें छोड़ कर विदेश में नहीं बसना चाहता था. अभय और नीला की बेटी थी, रिनी. नीला उसे भी अपने साथ ले गई थी. अभय के मातापिता का अब देहांत हो चुका था. वह अब अकेला था.

मुग्धा की कहानी सुन कर अभय ने

माहौल को हलका करते हुए

कहा, ‘‘मतलब, पिछले साल नोटबंदी ने सिर्फ आर्थिकरूप से ही नहीं, भावनात्मक, पारिवारिक रूप से भी लोगों के जीवन को प्रभावित किया था. वैसे अच्छा ही हुआ न, नोटबंदी का तमाशा न होता तो तुम्हें संजय की बेवफाई का पता भी न चलता.’’

‘‘हां, यह तो है,’’ मुग्धा मुसकरा दी.

‘‘पहले मुझे भी नोटबंदी के नाटक पर बहुत गुस्सा आया था पर अब तुम से मिलने के बाद सारा गुस्सा खत्म हो गया है. एक बड़ा फायदा तो यह हुआ कि हम आज यों मिले. वरना तुम लखनऊ में ही रह रही होतीं, मैं यहां अकेला घूम रहा होता.’’

मुग्धा हंस पड़ी, ‘‘एक नोटबंदी कारण हो गया और दूसरी यह डेटिंग ऐप. कभी सोचा भी नहीं था कि किसी से कभी ऐसे मिलूंगी और दिल खुशी से भर उठेगा. कई महीनों की उदासी जैसे आज दूर हुई है.’’ बिल मुग्धा ने देने की जिद की, जिसे अभय ने बिलकुल नहीं माना. मुग्धा ने कहा, ‘‘ठीक है, अगली बार नहीं मानूंगी.’’

‘‘देखते हैं,’’ अभय मुसकरा दिया, फिर पूछा, ‘‘कोई मूवी देखें?’’

‘‘हां, ठीक है.’’ मुग्धा का तनमन आज बहुत दिनों बाद खिलाखिला सा था. दोनों का दिल इस ताजीताजी खुशबू से भरी दोस्ती को सहर्ष स्वीकार कर चुका था. अभय ने अपनी कार स्टार्ट कर गाना लगा दिया था, ‘‘अजनबी तुम जानेपहचाने से लगते हो, यह बड़ी अजीब सी बात है, फिर भी जाने क्यों, अजनबी…’’ मुग्धा ने सीट बैल्ट बांध, सिर सीट पर टिका लिया था.

मुग्धा गाने के बोल में खोई सोच रही थी, इतने दिनों की मानसिक यंत्रणा, अकेलेपन के बाद वह जो आज आगे बढ़ रही थी, उसे लेशमात्र भी संकोच नहीं है. अभय के साथ जीवन का सफर कहां तक होगा, यह तो अभी नहीं पता, वक्त ही बताएगा. पर आशा है कि अच्छा ही होगा. और अगर नहीं भी होगा, तो कोई बात नहीं. वह किसी बात का शोक नहीं मनाएगी. उसे खुश रहना है. वह आज के बारे में सोचना चाहती है, बस. और आज नए बने सौम्य, सहज दोस्त का साथ मन को सुकून पहुंचा रहा था. वह खुश थी. अभय को अपनी तरफ देखते पाया तो दोनों ने एकसाथ कहा, ‘‘यह गाना अच्छा है न.’’ दोनों हंस पड़े थे.

Hindi Story : नासमझी की आंधी – दीपा से ऐसी क्या गलती हो गई थी

Hindi Story : सुबहसुबह रमेश की साली मीता का फोन आया. रमेश ने फोन पर जैसे ही  ‘हैलो’ कहा तो उस की आवाज सुनते ही मीता झट से बोली, ‘‘जीजाजी, आप फौरन घर आ जाइए. बहुत जरूरी बात करनी है.’’

रमेश ने कारण जानना चाहा पर तब तक फोन कट चुका था. मीता का घर उन के घर से 15-20 कदम की दूरी पर ही था. रमेश को आज अपनी साली की आवाज कुछ घबराई हुई सी लगी. अनहोनी की आशंका से वे किसी से बिना कुछ बोले फौरन उस के घर पहुंच गए. जब वे उस के घर पहुंचे, तो देखा उन दोनों पतिपत्नी के अलावा मीता का देवर भी बैठा हुआ था. रमेश के घर में दाखिल होते ही मीता ने घर का दरवाजा बंद कर दिया. यह स्थिति उन के लिए बड़ी अजीब सी थी. रमेश ने सवालिया नजरों से सब की तरफ देखा और बोले, ‘‘क्या बात है? ऐसी क्या बात हो गई जो इतनी सुबहसुबह बुलाया?’’

मीता कुछ कहती, उस से पहले ही उस के पति ने अपना मोबाइल रमेश के आगे रख दिया और बोला, ‘‘जरा यह तो देखिए.’’

इस पर चिढ़ते हुए रमेश ने कहा, ‘‘यह क्या बेहूदा मजाक है?  क्या वीडियो देखने के लिए बुलाया है?’’

मीता बोली, ‘‘नाराज न होएं. आप एक बार देखिए तो सही, आप को सब समझ आ जाएगा.’’

जैसे ही रमेश ने वह वीडियो देखा उस का पूरा जिस्म गुस्से से कांपने लगा और वह ज्यादा देर वहां रुक नहीं सका. बाहर आते ही रमेश ने दामिनी (सलेहज) को फोन लगाया.

दामिनी की आवाज सुनते ही रमेश की आवाज भर्रा गई, ‘‘तुम सही थी. मैं एक अच्छा पिता नहीं बन पाया. ननद तो तुम्हारी इस लायक थी ही नहीं. जिन बातों पर एक मां को गौर करना चाहिए था, पर तुम ने एक पल में ही गौर कर लिया. तुम ने तो मुझे होशियार भी किया और हम सबकुछ नहीं समझे. यहीं नहीं, दीपा पर अंधा विश्वास किया. मुझे अफसोस है कि मैं ने उस दिन तुम्हें इतने कड़वे शब्द कहे.’’

‘‘अरे जीजाजी, आप यह क्या बोले जा रहे हैं? मैं ने आप की किसी बात का बुरा नहीं माना था. अब आप बात बताएंगे या यों ही बेतुकी बातें करते रहेंगे. आखिर हुआ क्या है?’’

रमेश ने पूरी बात बताई और कहा, ‘‘अब आप ही बताओ मैं क्या करूं? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा.’’ और रमेश की आवाज भर्रा गई.

‘‘आप परेशान मत होइए. जो होना था हो गया. अब यह सोचने की जरूरत है कि आगे क्या करना है? ऐसा करिए आप सब से पहले घर पहुंचिए और दीपा को स्कूल जाने से रोकिए.’’

‘‘पर इस से क्या होगा?’’

‘‘क्यों नहीं होगा? आप ही बताओ, इस एकडेढ़ साल में आप ने क्या किसी भी दिन दीपा को कहते हुए सुना कि वह स्कूल नहीं जाना चाहती? चाहे घर में कितना ही जरूरी काम था या तबीयत खराब हुई, लेकिन वह स्कूल गई. मतलब कोई न कोई रहस्य तो है. स्कूल जाने का कुछ तो संबंध हैं इस बात से. वैसे भी यदि आप सीधासीदा सवाल करेंगे तो वह आप को कुछ नहीं बताएगी. देखना आप, स्कूल न जाने की बात से वह बिफर जाएगी और फिर आप से जाने की जिद करेगी. तब मौका होगा उस से सही सवाल करने का.’’

‘‘क्या आप मेरा साथ दोगी? आप आ सकती हो उस से बात करने के लिए?’’ रमेश ने पूछा.

‘‘नहीं, मेरे आने से कोई फायदा नहीं. दीदी को भी आप जानते हैं. उन्हें बिलकुल अच्छा नहीं लगेगा. इस बात के लिए मेरा बीच में पड़ना सही नहीं होगा. आप मीता को ही बुला लीजिए.’’

घर जा कर रमेश ने मीता को फोन कर के घर बुला लिया और दीपा को स्कूल जाने से रोका,’’ आज तुम स्कूल नहीं जाओगी.’’

लेकिन उम्मीद के मुताबिक दीपा स्कूल जाने की जिद करने लगी,’’ आज मेरा प्रैक्टिकल है. आज तो जाना जरूरी है.’’

इस पर रमेश ने कहा,’’ वह मैं तुम्हारे स्कूल में जा कर बात कर लूंगा.’’

‘‘नहीं पापा, मैं रुक नहीं सकती आज, इट्स अर्जेंट.’’

‘‘एक बार में सुनाई नहीं देता क्या? कह दिया ना नहीं जाना.’’ पर दीपा बारबार जिद करती रही. इस बात पर रमेश को गुस्सा आ गया और उन्होंने दीपा के गाल पर थप्पड़ रसीद कर दिया. हालांकि? दीपा पर हाथ उठा कर वे मन ही मन दुखी हुए, क्योंकि उन्होंने आज तक दीपा पर हाथ नहीं उठाया था. वह उन की लाड़ली बेटी थी.

तब तक मीता अपने पति के साथ वहां पहुंच गई और स्थिति को संभालने के लिए दीपा को उस के कमरे में ले कर चली गई. वह दीपा से बोली, ‘‘यह सब क्या चल रहा है, दीपा? सचसच बता, क्या है यह सब फोटोज, यह एमएमएस?’’

दीपा उन फोटोज और एमएमएस को देख कर चौंक गई, ‘‘ये…य…यह सब क…क…ब  …कै…से?’’ शब्द उस के गले में ही अटकने लगे. उसे खुद नहीं पता था इस एमएमएस के बारे में, वह घबरा कर रोने लगी.

इस पर मीता उस की पीठ सहलाती हुई बोली, ‘‘देख, सब बात खुल कर बता. जो हो गया सो हो गया. अगर अब भी नहीं समझी तो बहुत देर हो जाएगी. हां, यह तू ने सही नहीं किया. एक बार भी नहीं खयाल आया तुझे अपने बूढ़े अम्माबाबा का? यह कदम उठाने से पहले एक बार तो सोचा होता कि तेरे पापा को तुझ से कितना प्यार है. उन के विश्वास का खून कर दिया तू ने. तेरी इस करतूत की सजा पता है तेरे भाईबहनों को भुगतनी पड़ेगी. तेरा क्या गया?’’

अब दीपा पूरी तरह से टूट चुकी थी. ‘‘मुझे माफ कर दो. मैं ने जो भी किया, अपने प्यार के लिए,  उस को पाने के लिए किया. मुझे नहीं मालूम यह एमएमएस कैसे बना? किस ने बनाया?’’

‘‘सारी बात शुरू से बता. कुछ छिपाने की जरूरत नहीं वरना हम कुछ नहीं कर पाएंगे. जिसे तू प्यार बोल रही है वह सिर्फ धोखा था तेरे साथ, तेरे शरीर के साथ, बेवकूफ लड़की.’’

दीपा सुबकते हुए बोली, ’’राहुल घर के सामने ही रहता है. मैं उस से प्यार करती हूं. हम लोग कई महीनों से मिल रहे थे पर राहुल मुझे भाव ही नहीं देता था. उस पर कई और लड़कियां मरती हैं और वे सब चटखारे लेले कर बताती थीं कि राहुल उन के लिए कैसे मरता है. बहुत जलन होती थी मुझे. मैं उस से अकेले में मिलने की जिद करती थी कि सिर्फ एक बार मिल लो.’’

‘‘लेकिन छोटा शहर होने की वजह से मैं उस से खुलेआम मिलने से बचती थी. वही, वह कहता था, ‘मिल तो लूं पर अकेले में. कैंटीन में मिलना कोई मिलना थोड़े ही होता है.’

‘‘एकदिन मम्मीपापा किसी काम से शहर से बाहर जा रहे थे तो मौके का फायदा उठा कर मैं ने राहुल को घर आ कर मिलने को कह दिया, क्योंकि मुझे मालूम था कि वे लोग रात तक ही वापस आ पाएंगे. घर में सिर्फ दादी थी और बाबा तो शाम तक अपने औफिस में रहेंगे. दादी घुटनों की वजह से सीढि़यां भी नहीं चढ़ सकतीं तो इस से अच्छा मौका नहीं मिलेगा.

‘‘आप को भी मालूम होगा कि हमारे घर के 2 दरवाजे हैं, बस, क्या था, मैं ने पीछे वाला दरवाजा खोल दिया. उस दरवाजे के खुलते ही छत पर बने कमरे में सीधा पहुंचा जा सकता है और ऐसा ही हुआ. मौके का फायदा उठा कर राहुल कमरे में था. और मैं ने दादी से कहा, ‘अम्मा मैं ऊपर कमरे में काम कर रही हूं. अगर मुझ से कोई काम हो तो आवाज लगा देना.’

‘‘इस पर उन्होंने कहा, ‘कैसा काम कर रही है, आज?’ तो मैं ने कहा, ‘अलमारी काफी उलटपुलट हो रही है. आज उसी को ठीक करूंगी.’

‘‘सबकुछ मेरी सोच के अनुसार चल रहा था. मुझे अच्छी तरह मालूम था कि अभी 3 घंटे तक कोई नौकर भी नहीं आने वाला. जब मैं कमरे में गई तो अंदर से कमरा बंद कर लिया और राहुल की तरफ देख कर मुसकराई.

‘‘मुझे यकीन था कि राहुल खुश होगा. फिर भी पूछ बैठी, ‘अब तो खुश हो न? चलो, आज तुम्हारी सारी शिकायत दूर हो गई होगी. हमेशा मेरे प्यार पर उंगली उठाते थे.’ अब खुद ही सोचो, क्या ऐसी कोई जगह है. यहां हम दोनों आराम से बैठ कर एकदो घंटे बात कर सकते हैं. खैर, आज इतनी मुश्किल से मौका मिला है तो आराम से जीभर कर बातें करते हैं.’’

‘‘नहीं, मैं खुश नहीं हूं. मैं क्या सिर्फ बात करने के लिए इतना जोखिम उठा कर आया हूं. बातें तो हम फोन पर भी कर लेते हैं. तुम तो अब भी मुझ से दूर हो.’’ मुझे बहुत कुठा…औरतों के साथ तो वह जम कर…था.

‘‘मैं ने कहा, ‘फिर क्या चाहते हो?’

‘‘राहुल बोला, ‘देखो, मैं तुम्हारे लिए एक उपहार लाया हूं, इसे अभी पहन कर दिखाओ.’

‘‘मैं ने चौंक कर वह पैकेट लिया और खोल कर देखा. उस में एक गाउन था. उस ने कहा, ‘इसे पहनो.’

‘पर…र…?’ मैं ने अचकचाते हुए कहा.

‘‘‘परवर कुछ नहीं. मना मत करना,’ उस ने मुझ पर जोर डाला. ‘अगर कोई आ गया तो…’ मैं ने डरते हुए कहा तो उस ने कहा, ‘तुम को मालूम है, ऐसा कुछ नहीं होने वाला. अगर मेरा मन नहीं रख सकती हो, तो मैं चला जाता हूं. लेकिन फिर कभी मुझ से कोई बात या मिलने की कोशिश मत करना,’ वह गुस्से में बोला.

‘‘मैं किसी भी हालत में उसे नाराज नहीं करना चाहती थी, इसलिए मैं ने उस की बात मान ली. और जैसे ही मैं ने नाइटी पहनी.’’ बोलतेबोलते दीपा चुप हो गई और पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदने लगी.

‘‘आगे बता क्या हुआ?  चुप क्यों हो गई?  बताते हुए शर्म आ रही है पर तब यह सब करते हुए शर्म नहीं आई?’’ मीता ने कहा.

पर दीपा नीची निगाह किए बैठी रही.

‘‘आगे बता रही है या तेरे पापा को बुलाऊं? अगर वे आए तो आज कुछ अनहोनी घट सकती है,’’ मीता ने डांटते हुए कहा.

पापा का नाम सुनते ही दीपा जोरजोर से रोने लगी. वह जानती थी कि आज उस के पापा के सिर पर खून सवार है. ‘‘बता रही हूं.’’ सुबकते हुए बोली, ‘‘जैसे ही मैं ने नाइटी पहनी, तो राहुल ने मुझे अपनी तरफ खींच लिया.

‘‘मैं ने घबरा कर  उस को धकेला और कहा, ‘यह क्या कर रहे हो? यह सही नहीं है.’ इस पर उस ने कहा, ‘सही नहीं है, तुम कह रही हो? क्या इस तरह से बुलाना सही है? देखो, आज मुझे मत रोको. अगर तुम ने मेरी बात नहीं मानी तो.’

‘‘‘तो क्या?’

‘‘‘देखो, मैं यह जहर खा लूंगा’, और यह कहते हुए उस ने जेब से एक पुडि़या निकाल कर इशारा किया. मैं डर गई कि कहीं यहीं इसे कुछ हो गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे. और फिर उस ने वह सब किया, जो कहा था. उस की बातों में आ कर मैं अपनी सारी सीमाएं लांघ चुकी थी. पर कहीं न कहीं मन में तसल्ली थी कि अब राहुल को मुझ से कोई शिकायत नहीं रही. पहले की तरह फिर पूछा, ‘राहुल अब तो खुश हो न?’

‘‘‘नहीं, अभी मन नहीं भरा. यह एक सपना सा लग रहा है. कुछ यादें भी तो होनी चाहिए’, उस ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘यादें, कैसी यादें’, मैं ने सवालिया नजर डाली. ‘अरे, वही कि जब चाहूं तुम्हें देख सकूं,’ उस से राहुल ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘पता नही क्यों अपना सबकुछ लुट जाने के बाद भी, मैं मूर्ख उस की चालाकी को प्यार समझ रही थी. मैं ने उस की यह ख्वाहिश भी पूरी कर देनी चाही और पूछा, ‘वह कैसे?’

‘‘‘ऐसे,’ कहते हुए उस ने अपनी अपनी जेब से मोबाइल निकाल कर झट से मेरी एक फोटो ले ली. फिर, ‘मजा नहीं आ रहा,’ कहते कहते, एकदम से मेरा गाउन उतार फेंका और कुछ तसवीरें जल्दजल्दी खींच लीं.

‘‘यह सब इतना अचानक से हुआ कि मैं उस की चाल नहीं समझ पाई. समय भी हो गया था और मम्मीपापा के आने से पहले सबकुछ पहले जैसा ठीक भी करना था. कुछ देर बाद राहुल वापस चला गया और मैं नीचे आ गई. किसी को कुछ नहीं पता लगा.

‘‘पर कुछ दिनों बाद एक दिन दामिनी मामी घर पर आई. उन की नजरें मेरे गाल पर पड़े निशान पर अटक गईं. वे पूछ बैठीं, ‘क्या हो गया तेरे गाल पर?’ मैं ने उन से कहा, ‘कुछ नहीं मामी, गिर गई थी.’

‘‘पर पता नहीं क्यों मामी की नजरें सच भांप चुकी थीं. उन्होंने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा, ‘गिरने पर इस तरह का निशान कैसे हो गया? यह तो ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने जोर से चुंबन लिया हो. सब ठीक तो है न दीपा?’

‘‘मैं ने नजरें चुराते हुए थोड़े गुस्से के लहजे में कहा, ‘पागल हो गई हो क्या? कुछ सोच कर तो बोलो.’ और मैं गुस्से से वहां से उठ कर चली गई. ‘‘लंच के बाद सब लोग बैठे हुए हंसीमजाक कर रहे थे. मामी मुझे समझाने के मकसद से आईं तो उन्होंने मुझे खिड़की के पास खड़े हो कर, राहुल को इशारा करते हुए देख लिया. हालांकि मैं उन के कदमों की आहट से संभल चुकी थी पर अनुभवी नजरें सब भांप गई थीं. मामी ने मम्मी से कहा, ‘दीदी, अब आप की लड़की बड़ी हो गई है. कुछ तो ध्यान रखो. कैसी मां हो? आप को तो अपने घूमनेफिरने और किटीपार्टी से ही फुरसत नहीं है.’

‘‘पर मम्मी ने उलटा उन को ही डांट दिया. फिर मामी ने चुटकी लेते हुए मुझ से कहा, ‘क्या बात है दीपू? हम तो तुम से इतनी दूर मिलने आए हैं और तुम हो कि बात ही नहीं कर रहीं. अरे भई, कहीं इश्कविश्क का तो मामला नहीं है? बता दो, कुछ हैल्प कर दूंगी.’

‘‘‘आप भी न कुछ भी कहती रहती हो. ऐसा कुछ नहीं है,’ मैं ने अकड़ते हुए कहा. लेकिन मामी को दाल में कुछ काला महसूस हो रहा था. उन का दिल कह रहा था कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है और वे यह भी जानती थीं की ननद से कहने का कोई फायदा नहीं, वे बात की गहराई तो समझेंगी नहीं. इसलिए उन को पापा से ही कहना ठीक लगा, ‘बुरा मत मानिएगा जीजाजी, अब दीपा बच्ची नहीं रही. हो सकता है मैं गलत सोच रही हूं. पर मैं ने उसे इशारों से किसी से बात करते हुए देखा है.’

‘‘पापा ने इस बात को कोई खास तवज्जुह नहीं दी, सिर्फ ‘अच्छा’ कह कर  बात टाल दी. जब मामीजी ने दोबारा कहा तो पापा ने कहा, ‘मुझे विश्वास है उस पर. ऐसा कुछ नहीं. मैं अपनेआप देख लूंगा.’

‘‘मैं मन ही मन बहुत खुश थी, लेकिन यह खुशी ज्यादा दिन नहीं टिकी. अब राहुल उन फोटोज को दिखा कर मुझे धमकाने लगा. रोज मिलने की जिद करता और मना करने पर मुझ से कहता, ‘अगर आज नहीं मिलीं तो ये फोटोज तेरे घर वालों को दिखा दूंगा.’

‘‘पहले तो समझ नहीं आया क्या करूं? कैसे मिलूं? पर बाद में रोज स्कूल से वापस आते हुए मैं राहुल से मिलने जाने लगी.’’

‘‘पर कहां पर? कहां मिलती थी तू उस से,’’ मीता ने जानना चाहा.

‘‘बसस्टैंड के पास उस का एक छोटा सा स्टूडियो है. वहीं मिलता था और मना करने के बाद भी मुझ से जबरदस्ती संबंध बनाता. एक बार तो गर्भ ठहर गया था.’’

‘‘क्या? तब भी घर में किसी को पता नहीं चला?’’ मीता चौंकी.

‘‘नहीं, राहुल ने एक दवा दे दी थी. जिस को खाते ही काफी तबीयत खराब हो गई थी और मैं बेहोश भी हो गई थी.’’

‘‘अच्छा, हां, याद आया. ऐसा कुछ हुआ तो था. और उस के बाद भी तू किसी को ले कर डाक्टर के पास नहीं गई. अकेले जा कर ही दिखा आई थी. दाद देनी पड़ेगी तेरी हिम्मत की. कहां से आ गई इतनी अक्ल सब को उल्लू बनाने की. वाकई तू ने सब को बहुत धोखा दिया. यह सही नहीं हुआ. वहां राहुल के अलावा और कौनकौन होता था?’’

‘‘मुझे नहीं मालूम.’’ लेकिन मुझे इतनी बात समझ में आ गई थी कि राहुल मुझे ब्लैकमेल कर मेरी मजबूरी का फायदा उठा रहा है. और मैं तब से जो भी कर रही थी, अपने घर वालों से इस बात को छिपाने के लिए मजबूरी में कर रही थी. मुझे माफ कर दो. मुझे नहीं पता था कि उस ने मेरा एमएमएस बना लिया है. मैं नहीं जानती कि उस ने यह वीडियो कब बनाया. उस ने मुझे कभी एहसास नहीं होने दिया कि हम दोनों के अलावा वहां पर कोई तीसरा भी है, जो यह वीडियो बना रहा है…’’ और वह बोलतेबोलते  रोने लगी.

मीता को सारा माजरा समझ आ चुका था. वह बस, इतना ही कह पाई,’’ बेवकूफ लड़की अब कौन करेगा यकीन तुझ पर? कच्ची उम्र का प्यार तुझे बरबाद कर के चला गया. इस नासमझी की आंधी ने सब तहसनहस कर दिया.’’

उस ने रमेश को सब बताया. तो, एक बार को तो रमेश को लगा कि सबकुछ खत्म हो गया है. पर सब के समझाने पर उस ने सब से पहले थानेदार से मिल कर वायरल हुए वीडियो को डिलीट करवाया. अपने शहर के एक रसूखदार आदमी होने की वजह से, उन के एक इशारे पर पुलिस वालों ने राहुल को जेल में बंद कर दिया. उस के बाद पूरे परिवार को बदनामी से बचाने के लिए सभी लोकल अखबारों के रिपोर्टर्स को न छापने की शर्त पर रुपए खिलाए. दीपा को फौरन शहर से बहुत दूर पढ़ने भेज दिया, क्योंकि कहीं न कहीं रमेश के मन में उस लड़के से खतरा बना हुआ था. हालांकि, बाद में वह लड़का कहां गया, उस के साथ क्या हुआ?  यह किसी को पता नहीं चला.

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