सांझ की दुलहन: भाग-2

लेखिका- मीना गुप्ता

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अपनी भाभी राधिका जिन की राजन बहुत इज्जत करता था, एक दिन अपने मन की बात कहते हुए स्वप्न सुंदरी से शादी करने की बात कह दी. भाभी राधिका परेशान थीं कि कहां और कैसे देवर राजन की शादी इतनी खूबसूरत लड़की से कराई जाए.

तब दूर की एक रिश्तेदारी में जिस स्वप्न सुंदरी की तलाश थी वह मिल गई. मगर जब शादी हो कर वह घर आई तो घर का अच्छाभला माहौल बिगड़ने लगा, जबकि राजन इस ओर से अनजान था. सुंदरी काफी खुले विचारों वाली थी.

अब आगे पढें:

घर की नववधू ने रात 9 बजे घर में कदम रखा. साथ में कौन है, बाबूजी ने खिड़की से झांक कर देखना चाहा. सुंदरी उस लड़के के हाथ में हाथ डाले थी. वहीं 2 हाथ खिलखिलाहट के साथ हवा में लहरा गए और खिलखिलाहट की आवाज माहौल में गूंज उठी.

बाबूजी का तनमन कांप उठा. उन्हें अपनी सालों की कमाई दौलत, मानमर्यादा सरेआम बिकती दिखी. झांक कर देखा कितने घरों की खिड़कियां उस दृश्य की साक्षी बनीं. खिड़कियां ही नहीं उन में रहने वाले लोग भी आवाक थे.

दूसरे दिन भी वही घटना दोहराई गई. सुंदरी को छोड़ जब वह जाने लगा तब बाबूजी ने बुला कर कहा, ‘‘बेटा क्या नाम है तुम्हारा?’’

‘‘अनुभव?’’

‘‘लगते तो भले घर के हो, अनुभव तुम सुंदरी को कब से जानते हो?’’

‘‘मैं इस के साथ पढ़ा हूं,’’ कह कर वह जाने लगा तो बाबूजी ने उसे रोकते हुए कहा, ‘‘शायद तुम्हें हमारे घर की मर्यादा नहीं मालूम. तुम्हारा रिश्ता अब सिर्फ सुंदरी से ही नहीं वरन उस के परिवार से भी है. वह तुम्हारी क्लासमेट ही नहीं है, वह किसी की पत्नी भी है और किसी घर की बहू बन चुकी है. इस तरह उस के साथ तुम्हारा आनाजाना ठीक नहीं है.’’

वह बिना कुछ बोले चला गया. सुंदरी अंदर कमरे में आ कर बिफर पड़ी, ‘‘बाबूजी को क्या हो गया है? क्यों बेवजह शोर मचा दिया… कुल की मर्यादा… कुल की मर्यादा… क्या करूं मैं कुल की मर्यादा का… सारा दिन घर में रह कर उसे पालूं? मुझ से नहीं होगा… क्या हुआ जो मेरा दोस्त मुझे घर छोड़ने आ गया?’’

राजन ने समझाया, ‘‘बात दोस्त की नहीं संस्कारों की है… मर्यादा की है. उस ने आ कर किसी से कोई परिचय नहीं करना चाहा… तुम्हें बाय कह कर जाने लगा.’’

‘‘तो क्या हुआ? राजन तुम भी…’’

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धीरेधीरे उस का इस तरह आनाजाना साधारण सी बात हो गई, जिस की चर्चा भी नहीं की जाती.

हद तो तब हुई जब उस सांझ की दुलहन ने सच में रात ढले ही घर में कदम रखने शुरू किए. राजन ने सोचा कब तक बाबूजी की मर्यादा को यों सरेआम कुचलता देखूं. उस ने अलग घर ले लिया.

राजन सारा दिन औफिस में रहता और सुंदरी अपने दोस्तों के साथ. शाम को कभीकभी दोनों एकसाथ ही घर में प्रवेश करते. राजन जान चुका था कि कुछ कहना बेकार है. ऐसा नहीं कि उस ने उस की गलतियों को नजरअंदाज किया. वह जान कर भी अनजान बन जाता था, शायद खुद समझ जाए… उस की हर गलती पर खुद परदा डाल उसे सुधरने का मौका देता.

एक बार तो उस की आंखों के सामने ही सारा खेल हुआ. वह देखता रहा. बस इतना कह सका, ‘‘तुम्हें इस से क्या मिलता है?’’

‘‘वही जो तुम से नहीं मिलता… वह मेरा प्यार है… पहला प्यार…’’

‘‘मुझ से क्या नहीं मिला? तुम जिसे मिलना समझती हो वह मेरे परिवार की मर्यादाओं के खिलाफ है… अगर वह तुम्हारा प्यार है तो तुम ने मुझ से शादी क्यों की?’’

‘‘पापा ने कहा, शादी कर लो… हमारे घर से चली जाओ… फिर जैसी मरजी हो करना.’’

‘‘और तुम अपनी मरजी के कोड़े मुझ पर बरसा रही हो,’’ पहली बार चीखा राजन.

‘‘हां, क्योंकि तुम से मुझे बांधा गया है.’’

‘‘और तुम बंध नहीं सकीं… यही न?’’

‘‘तो अब तक तुम ने हमें धोखे में रखा था… क्या कमी रखी मैं ने तुम्हें खुश रखने में? सपनों की मलिका बना कर लाया था तुम्हें… सब से अलग भी कर लाया… किनारा कर लिया अपने घर से, अपने परिवार से. फिर भी तुम्हें नहीं जीत सका, शायद कमी मेरी ही थी कि मैं ने तुम्हें बहुत चाहा और यह नहीं जानना चाहा कि तुम्हें मेरी कितनी जरूरत है.’’

‘‘हां, मुझे तुम्हारी जरूरत नहीं… मैं तुम्हारे साथ तुम्हारी नहीं अपनी मरजी और शर्तों पर रह सकती हूं… तुम से पहले मेरे लिए अनुभव… मैं उस के बिना अपने एक पल की भी कल्पना नहीं कर सकती,’’ वह जोरजोर से चिल्ला रही थी.

राजन फिर भी नहीं हारा था. कई बार घर नहीं जाता. राधिका के पास चला जाता.

मगर सुंदरी यह भी जानने की कोशिश नहीं करती कि वह कहां है? उस दिन भी वह औफिस से सीधा राधिका के पास गया और फफक पड़ा.

‘‘क्या हुआ देवरजी?’’

‘‘उस ने सारी बात बता दी फिर बोला, भाभी अब आप ही कोई रास्ता निकालो.’’

‘‘क्या रास्ता निकालें देवरजी? मरजी आप की थी… हम लोग तो सिर्फ माध्यम बने थे आप की इच्छाओं के चलते… और मेरी आशंकाओं पर सभी ने आपत्ति जताई थी कि राजन सब संभाल लेगा.’’

‘‘हां भाभी, गलती मेरी थी. मेरी कल्पना सुंदर थी तो कोमल भी थी… इसलिए जल्दी टूट गई… वह तो बहुत कठोर है… जिस कल्पना सुंदरी को मैं हकीकत बना कर ला रहा हूं वह ऐसी होगी कि मेरी कल्पनाओं को ही निगल जाएगी, ऐसा तो मैं ने सोचा ही नहीं था. अगर कल्पना करना गुनाह था तो मेरा जुर्म सच में बहुत बड़ा है और मुझे उस की सजा मिल रही है. मेरी आंखों के सामने ही सब कुछ हो रहा है और मैं तमाशबीन बना हुआ हूं. उस के हर गुनाह का मैं एक ऐसा चश्मदीद गवाह हूं जिसे किसी भी अदालत में जा कर यह कहने की हिम्मत नहीं है कि मेरे घर में गुनाह पल रहा है. अब तो स्थिति यह है कि वे दोनों मेरे कमरे से लगी दीवार के पीछे होते हैं… मैं दीवारों के पार के दृश्य की कल्पना से कांप जाता हूं.’’

‘‘तो क्या आप यों ही देखते रहेंगे?’’

‘‘नहीं भाभी. मगर मैं करूं भी तो क्या?’’

‘‘बाहर करो देवरजी… जब घर की इज्जत खुद ही बाजार में बैठ जाए तो फिर उसे घर में रखना ठीक नहीं… उसे बिकना मंजूर है… आप क्या कर सकते हैं? मर्यादा की खातिर ही आप घर छोड़ कर गए थे कि लोगों की नजरों से दूर रहने पर बिगड़ी बात बन जाएगी, लेकिन…. मेरा कहा मानो तलाक ले लो.’’

‘‘लेकिन भाभी…’’

‘‘कोई लेकिनवेकिन नहीं… जब जिंदगी तुम से इतनी कुरबानियों के बाद भी खुश नहीं तो बेहतर है ऐसी जिंदगी से किनारा कर लो… आज तुम्हारे पास एक अच्छी नौकरी है, बंगला है, गाड़ी है सब कुछ है, तो फिर क्यों उस अप्सरा के पीछे भाग रहे हो? वह तुम्हारी नहीं… फिर उस ने खुद ही कह दिया है… खुद को कमजोर मत साबित करो देवरजी. रास्ते अनेक हैं, जिस मोड़ पर तुम खड़े हो उस से अनेक रास्ते जा रहे हैं और वह रास्ता भी जिस से तुम चले थे. अब एक ऐसी राह लो जहां से बीती गलियां नजर ही न आएं… छोड़ दो देवरजी उसे… छोड़ दो… अप्सरा किसी की नहीं होती… सब की हो कर भी किसी की नहीं हो पाती.’’

राजन फूटफूट कर रो पड़ा था. राधिका रो तो न सकी, मगर उस के लिए रास्ते की तलाश में जरूर निकल पड़ी.

आज वह निर्णय कर के रहेगा. इस हिम्मत के साथ वह घर में घुसा और जोर से दरवाजा पीटने लगा. दरवाजा सुंदरी ने खोला, ‘‘क्या हुआ? इतनी जोर से दरवाजा क्यों पीट रहे हो?’’

‘‘अब यह यहां नहीं होगा… मेरे घर में यह खेल अब नहीं होगा…’’

‘‘कौन सा नया पाठ पढ़ कर आए हो? यह कौन सी नई बात है?’’

सुंदरी को किनारे धकेलते हुए वह अंदर घुसा और अनुभव की कौलर पकड़ कर उसे घर से बाहर कर दिया.

सुंदरी पागलों की तरह चीखती रही. आज वह जान चुकी थी कि उसे अब किसी एक को थामना होगा. शाम को जब राजन घर आया तो वह जा चुकी थी. अपने प्रेमी अनुभव के साथ. घर में अब सिर्फ वह था और उस की रोतीसिसकती कामनाएं. कल्पनाएं, जिन्हें वह शाम तक बटोरता रहा.

तलाक के वक्त कोर्ट में इतना ही कह सका था, ‘‘मैं इस के लायक नहीं. यह जिसे चाहती है उस के साथ इसे रहने और जीने का पूरा हक है… यह हक इस के मांबाप नहीं दे सके, मगर मैं देता हूं… यह आजाद है.’’

तलाक हुए काफी अरसा हो गया था. राधिका ने कई बार देवर का मन टटोला, जानना चाहा कि वहां अब क्या चल रहा है. राजन कभीकभी कह भी देता, ‘‘भाभी अब नहीं…’’

कल्पना का कटुसत्य जिंदगी में जो कड़वाहट पैदा कर गया था उसे वह भूल नहीं पा रहा था. उस दर्द को भुलाने का एक ही रास्ता था, जो राधिका ने बताया.

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‘‘देवरजी दूसरी शादी करिए और अपनी गृहस्थी बसाइए… वह तो अपनी जिंदगी मजे से जी रही है. फिर आप ने ऐसी जिंदगी क्यों अपना ली?’’

‘‘जिंदगी को मैं ने नहीं जिंदगी ने मुझे कुबूल किया है… उसे मैं इसी रूप में अच्छा लगता हूं.’’

‘‘ऐसा नहीं… आप जिसे जिंदगी कह रहे हैं वह ओढ़ी हुई जिंदगी है और यह आप ने सुंदरी के जाने के बाद ओढ़ी है. इसे उतार फेंकने की कोशिश ही नहीं की आप ने… जिस लाश को आप ढो रहे हैं उस से बदबू पैदा हो रही है… उतार फेंको उसे वरना उस की गंध आसपास फैल कर आप को सब से दूर कर देगी… अभी मौका है नई जिंदगी की शुरुआत करने का.’’

राधिका भाभी के लफ्ज उस के जेहन में रात भर गूंजते रहे. राजन सुंदरी को मन से निकाल नहीं पाया था. दूसरी का खयाल कैसे करे? वह सोच में पड़ गया कि क्या भाभी की बात मान कर दूसरी शादी कर ले… नहीं, नहीं, कहीं वह भी. वह भी ऐसी ही निकली तो? लेकिन भाभी ने जो कहा क्या वह सच है? वह सब से दूर जा रहा है? कितनी कातर दृष्टि से भाभी ने मुझे निहारा था और कहा था कि आप की खुशियों की खातिर हम ने सारे समझौते किए थे, लेकिन अब इस बार हमारी मरजी से फैसला लें… ऐसी लाएं जो समझदार हो, शालीन हो. क्या भाभी की तरह कोई मिल सकती है?

राजन ने अलसाई आंखों में ही सवेरा देखा और फिर अपने उजड़े घर पर ताला डाल कर घर पहुंच गया.

राधिका भाभी उस समय बाबूजी को सुबह की चाय दे रही थी. राजन को इतनी सुबह आता देख शंका से भर उठीं, ‘‘क्या हुआ देवरजी… आज इतनी सुबह?’’

‘‘हां भाभी, बहुत दिनों से सुबह की चाय आप के साथ नहीं पी न, इसलिए चला आया. छुट्टी है आज… सोचा थोड़ी देर बाबूजी से भी बातें हो जाएंगी.’’

राधिका ने राजन को बहुत दिनों बाद बदला पाया. पहले जब भी आता परेशान सा रहता. चाय का एक कप उसे पकड़ाया और खुद भी पास रखी कुरसी को और पास ला कर बैठ गईं. बोलीं, ‘‘चलिए अच्छा है… मैं आप को कई दिनों से याद कर रही थी.’’

बाबूजी ने भी कहा, ‘‘चलो अच्छा है… वैसे भी अब तुम उस घर में अकेले रह कर क्या करोगे. आ जाओ यहीं शिब्बू भी अकसर बाहर ही रहता है… राधिका अकेली बोर होती है.’

‘‘नहीं बाबूजी, मैं उस सुंदरी के कारण आप को बहुत चोट पहुंचा चुका हूं… मुझे सजा मिलनी ही चाहिए.’’

‘‘नहीं देवरजी, आप अपनी मरजी से नहीं गए थे… आप को उस की मरजी की खातिर जाना पड़ा था, जिसे आप बेहद प्यार करते थे और बेहतर भी यही था… लेकिन इस घर के दरवाजे आप के लिए खुले हैं… बाबूजी हमेशा रोते और कहते हैं कि मेरा राजन अपनी खातिर नहीं, अपनी मरजी से नहीं उस चुड़ैल की खातिर गया है… वह मेरे बेटे को खा जाएगी बहू. उसे बचा लो,’’ कहते हुए राधिका की आंखें भर आईं.

राजन प्रायश्चित की मुद्रा में जड़ हो चुका था. लड़खड़ाती जबान से यही कह सका, ‘‘भाभी, आप और बाबूजी जैसा चाहें मुझे मंजूर है.’’

राजन के इस निर्णय से राधिका और बाबूजी दोनों खुश हुए. बाबूजी ने सारे

रिश्तेदारों में खबर पहुंचा दी कि राजन ने दूसरी शादी के लिए हां कर दी है.

कई रिश्ते आए. राधिका और बाबूजी ने इस बार किसी भी धोखे की गुंजाइश नहीं रखनी चाही. लड़़की की समझदारी पर अनेक प्रश्न किए जाते और घर आ कर बाबूजी और राधिका घंटों चर्चा करते कि नहीं यह भी समझ में नहीं आ रही. होस्टल वाली तो बिलकुल नहीं चलेगी. घरेलू हो, कुलीन हो… कम पढ़ीलिखी भी चलेगी, लेकिन सलीके वाली हो.

काफी कोशिश के बाद जिस लड़की से रिश्ता तय हुआ वह बेहद पिछड़े इलाके से और गरीब घर की थी और 10वीं कक्षा पास. देखने में साधारण. बात तय कर के आ गए. राजन की हां भर चाहिए थी जो उस ने दे दी.

शादी की तारीख तय हुई. राधिका ने राजन से मजाक किया, ‘‘चलिए, अपनी दुलहन का जोड़ा पसंद कर लीजिए.’’

राजन उदास स्वर में बोला, ‘‘भाभी, आप  ही पसंद कर लीजिए… जोड़ी भी आप ही बना रही हैं… पहनावा भी आप ही तय कर लीजिए.’’

इस बार 24 घंटे वाली शहनाई नहीं बजी. बहू ने घर की चौखट पर कदम रखे. चावल का कलश फिर तैयार था. राजन की आंखें भर आईं, सुंदरी की याद में. नई बहू का पैर कलश पर था. उस ने बहुत समझदारी से चावल गिराए. राजन ने समेटे फिर फैलाए फिर समेटे. भाभी मुसकरा रही थीं.

नई बहू ने बहुत दिनों तक सब का दिल जीतना चाहा. समय पर उठ कर घर के काम में राधिका का हाथ भी बंटाती. बाबूजी का भी खयाल रखती.

राजन तो अपने सारे काम खुद कर लेता. इस बार वह बेहद सतर्क था, ‘‘जो भी पूछना हो भाभी से पूछो अनु. वे ही बता सकती हैं.’’

नई बहू की समझदारी थी या पुरानी वाली की कटु यादें बाबूजी और घर के बाकी लोग सभी अनु से खुश थे. उस ने घर में अपनी जगह बना ली थी. राजन पर भी उस ने धीरेधीरे अधिकार कर लिया.

घर की कुछ जिम्मेदारियों को राधिका ने अनु को सौंपने की सोची. फिर एक दिन तिजोरी खोलते हुए कहा, ‘‘राधिका, यह सब तुम्हारा है… इसे संभालो.’’

‘‘अभी बहू नई है. इतनी समझदार नहीं है… कुछ समय दो,’’ बाबूजी ने झिझकते हुए कहा ताकि कहीं राजन को बुरा न लगे.

‘‘जिम्मेदारी ही तो समझदार बनाएगी. फिर मैं भी तो जब इस घर में आई थी तो नई ही थी और अकेली भी… सब संभाला था,’’ यह सुन कर बाबूजी खुश हो उठे.

– क्रमश:

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इस फैसले का स्वागत है

दिल्ली के कनाट प्लेस इलाके में 3 महीनों के लिए सभी तरह के वाहन बंद करने का प्रयोग करा जा रहा है ताकि विदेशों के कई शहरों की तरह यह पूरा इलाका भी केवल पैदल चलने वालों के लिए हो जाए. यह एक अच्छा प्रयोग है और देश के हर शहर में ऐसे क्षेत्र हैं जहां लोग कुछ खरीदारी के लिए तो कुछ केवल घूमने के लिए जाते हैं, मगर आड़ीतिरछी खड़ी गाड़ियां उन्हें तंग करती हैं.

दिल्ली में करोल बाग, साउथ ऐक्सटैंशन, चांदनी चौक, राजोरी गार्डन आदि बहुत से ऐसे इलाके हैं जहां दुकाने हैं पर चलने की जगह नहीं. जब से गाड़ियां आई हैं लोगों को जरूरत होती है कि ऐन दुकान के सामने गाड़ी खड़ी हो और राजारानी की तरह वे उतर कर शौपिंग करें. यह दूसरों के साथ अन्याय भी है और खुद के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ भी.

गाड़ियां की घेरी जगह अब बेशकीमती होने लगी है और उन्हें कम करना जरूरी होता जा रहा है. सरकारी ढीलमढाल का नतीजा है कि सुविधाजनक, भरोसेमंद पब्लिक वाहन पूरे देश में कहीं नहीं हैं जहां सामान से लदेफंदे लोग उन का इस्तेमाल हक से कर सकें. पब्लिक वाहन चलाने वालों को मोटी रिश्वत देनी पड़ती है. खरीद पर मोटा ब्याज देना पड़ता है, रखरखाव पर भी मोटा खर्चा होता है और इसीलिए टैक्सियां हों, बैटरी रिकशा हों या आम रिकशा, सब मैलेकुचैले ही होते हैं.

बसों, टैंपुओं, लोकल ट्रेनों, मैट्रो का तो बुरा हाल है ही. ऐसे में कौन जोखिम लेगा कि 10 हजार की साड़ी पहन कर मैले वाहन में जा कर शान वाली दुकान या एअरकंडीशंड रेस्तरां में जाएं.

अगर लोगों से अपनी निजी गाडि़यों की लत छुड़वानी है तो ढंग के पब्लिक वाहन होने जरूरी हैं और यह भी जरूरी है कि वे आम जगह मिल सकें और उन के लिए ओला जैसे एप्स पर निर्भर न रहना पड़े. यदि सरकारें पर्याय न देंगी तो चाहे कुछ भी कर लें लोग गाडि़यां नहीं छोड़ेंगे. गाड़ी अब शान की चीज नहीं उपयोगी है, पैन और कोट की तरह. इन पर बहानों से प्रतिबंध लगाया जाएगा तो उस प्रतिबंध को बेमतलब का कर दिया जाएगा.

शौपिंग एरिया खुशनुमा हों यह सब चाहते हैं पर कोई भी इस के लिए सही सोच नहीं रख रहा. यह फैसला बाबुओं और नेताओं के बस की नहीं, ठसके वाली औरतों को भी पूछना होगा वरना बेकार है.

लापरवाही न पड़ जाए कहीं भारी

स्कूली लड़कियां ही नहीं स्कूली लड़कों के साथ भी रेप करने के बढ़ते मामले भय और आतंक का माहौल खड़ा कर रहे हैं. स्कूली बच्चों से यौन क्रिया सदियों से चली आ रही है पर उम्मीद थी कि जैसेजैसे लोगों में शिक्षा बढ़ेगी, समाज में कानून का जोर चलेगा, बच्चों के मातापिता अधिकारों के प्रति जागरूक होंगे और पुरुष अपनी सीमाएं जानेंगे, तो ये कुकर्म नहीं होंगे. पर लगता नहीं कि ऐसा हो रहा है या फिर अब थोड़े से मामले ही सुर्खियां बन जाते हैं और डरावना माहौल पैदा कर देते हैं.

यह बात पक्की है कि न तो दुनिया भर में सैक्स व्यापार कम हो रहा है और न ही छेड़खानी. जिन देशों में कानून की कड़ी चौकसी है वहां भी बुरी तरह रौंदे जाने के मामले हो रहे हैं और भारत जैसे देश में जहां न के बराबर कानून की चौकसी है, हाल बुरा है. पर फिर भी यह कहना होगा कि मातापिता को अपनी बेटियों की शादी 14 साल की आयु में कर के मुसीबत को टालना अनिवार्य नहीं हो रहा है.

सैक्स अपराधों की एक मुख्य वजह तो प्राकृतिक है पर प्रकृति ने तो एकदूसरे को मारने, एकदूसरे को झपटने और एकदूसरे पर आक्रमण करना भी सिखाया था. मानव ने अपने हजारों साल के इतिहास में इस प्रवृत्ति पर विजय पाई है. आज सड़क पर महीनों कीमती सामान पड़ा रहे, कोई नहीं उठाता. सड़कों पर नगर निकायों के लोहे के बैंच, पानी के हैंडपंप, सिगनल, बैरियर आदि आसानी से चोरी नहीं होते क्योंकि समाज ने शिक्षा दे दी है.

घर से बाहर जाती अब हर औरत सुरक्षित महसूस करती है. उस का हल्ला उसे बचाने के लिए काफी है. अगर कोई हादसा हो जाए तो बहुत से मामलों में तो अपराधियों को पकड़ा जाना संभव हो ही जाता है. स्थिति बुरी है पर इतनी नहीं.

स्कूली बच्चों के बारे में मातापिता व सामान्य लोग अकसर निश्चिंत से हो जाते हैं और वे सुरक्षा के सामान्य उपाय नहीं अपनाते. यही उन की कमी है. स्कूली बच्चों को, लड़केलड़कियों दोनों को, आगाह करना जरूरी है कि वे जानेअनजाने लोगों के चंगुल में न फंसें. प्यार और सैक्स भावना में अंतर समझें. बच्चों को भयभीत करे बिना अपना खयाल रखना सिखाना जरूरी है. इस के लिए अगर बच्चों को प्रशिक्षित करना जरूरी है तो मातापिता को भी. क्लासें तो दोनों की लगनी चाहिए.

कामकाजी मातापिताओं को दोहरा सावधान होना चाहिए. उन्हें अपना घर अकेले अबोध बच्चों पर न छोड़ कर ग्रुप बनाने चाहिए ताकि 3-4 बच्चे बारी बारी एक एक के घर रह कर तब तक अपना काम कर सकें जब तक कि माता-पिता काम से लौट कर न आ जाएं. बच्चों को पालने के लिए सही गुर समझाने चाहिएं, वे खुदबखुद सीख जाएंगे, यह भूल जाना चाहिए. सरकारों, कानूनों, पुलिस व संस्थाओं पर ज्यादा निर्भर रहना भी गलत है. बच्चों के मामलों में हर संभव चौकन्ना रहना जरूरी है.

हम तो डूबेंगे सनम, तुम्हें भी ले डूबेंगे

कई तरह की उठापटक, कई तरह की बयानबाजी, आरोप प्रत्यारोप, अपने-अपने समर्थक पत्रकारों का जमावड़ा करने, प्रचार के सारे हथकंडे अपनाने के बाद शाहरुख खान की फिल्म ‘‘रईस’’ और रितिक रोशन की फिल्म ‘‘काबिल’’ 25 जनवरी को प्रदर्शित हुई थी. एक सप्ताह बाद जो तस्वीर उभरी है, उससे यही निष्कर्ष निकलता है कि दोनों ने गलतियां की और दोनों के उपरहम तो डूबेंगे, सनम तुम्हें भी ले डूबेंगे’ की कहावत चरितार्थ होती है. शाहरुख खान और राकेश रोशन के अहम इतने बलवान हो गए थे, कि दोनों अपनी फिल्म के प्रदर्शन की तारीख बदलने पर राजी नही हुए. जिसका परिणाम यह हुआ कि दोनों को काफी नुकसान उठाना पड़ा. दोनों फिल्मों की पीआर टीम अपनी-अपनी फिल्म को सफलता के झंडे गाड़ने वाली फिल्म साबित करने पर तुली हुई है. जबकि हकीकत में ऐसा कुछ नहीं हुआ. यदि यह दोनों फिल्में अलग-अलग सप्ताह में प्रदर्शित होती, तो दोनों को फायदा होता. पर दोनों के बीच अहम की लड़ाई के चलते जो कुछ हुआ, उससे अब दूसरे फिल्मकारों को सबक लेना चाहिए. बहरहाल, यदि इन फिल्मों की पीआरटीम के आकड़ो को सच माना जाए तो एक सप्ताह बाद राहुल ढोलकिया निर्देशित शाहरुख खान की फिल्म ‘‘रईस’’ बाक्स ऑफिस पर सौ करोड़ तक पहुंच पा रही है, जबकि संजय गुप्ता निर्देशित, राकेश रोशन निर्मित और रितिक रोशन अभिनीत फिल्म ‘‘काबिल’’ महज 75 करोड़ तक ही पहुंच पा रही है.

मगर शाहरुख खान या रितिक रोशन निराश नहीं हैं. बल्कि दोनों ही सफलता का जश्न मना रहे हैं. शाहरुख खान ने तो 30 जनवरी को मुम्बई के एक पांच सितारा होटल में ‘रईस’ की सफलता का जश्न मनाया. तो वहीं रितिक रोशन और यामी गौतम भी कई शहर घूमते हुए अपनी फिल्म ‘काबिल’ की सफलता के दावे ठोक रहे हैं. इस पर बौलीवुड के बिचैलिए फब्ती कसने से बाज नहीं आ रहे हैं. सब कह रहे हैं कि ‘‘अपने गाल पर खुद ही तमाचा मार अपने गाल को लाल (यानी कि खुश होने का आभास कराना) दिखाना तो बॉलीवुड की पुरानी फितरत है.

शाहरुख खान के करीबी ‘रईस’ को जबरदस्त सफल फिल्म बताते हुए तर्क दे रहे हैं कि ‘रईस’ ने शाहरुख खान की पिछली फिल्म ‘फैन’ के मुकाबले काफी अच्छा व्यापार किया है. तो वहीं रितिक रोशन के करीबी दावा कर रहे हैं कि ‘‘मोहनजो दाड़ों’’ के मुकाबले ‘काबिल’ ने जबरदस्त व्यापार किया है. अफसोस यह है कि दोनों अपनी पिछली सफलतम फिल्मों से अपनी इस फिल्म की तुलना करने से क्यों कतरा रहे हैं? हर इंसान अपनी सफलता की मिसाल देता है न कि असफलता की.

बर्थडे स्पेशल: जग्गू दादा की खास बातें

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के ‘जग्गू दादा’ के नाम से फेमस एक्टर ‘जैकी श्रॉफ’ का आज 58वां जन्मदिन है. आपको बात दें कि बॉलीवुड में जैकी श्रॉफ का नाम उन गिने चुने अभिनेताओं में शुमार किया जाता है जिन्होंने लगभग तीन दशक से अपने दमदार अभिनय से दर्शकों के दिल में आज भी एक खास मुकाम बना रखा है.

बॉलीवुड के इस शानदार एक्टर के जन्मदिन पर आइए जानें उनके बारे में कुछ खास बातें.

जैकी श्रॉफ का जन्म लातूर (महाराष्ट्र) में हुआ था. प्यार से लोग उन्हें ‘जग्गू दादा’, ‘जग्गा’ और ‘भीडू’ भी कहते हैं.

जैकी श्रॉफ के पिता ‘काकाबाई हरिभाई श्रॉफ’ गुजराती थे और इनकी मां हुरुनिसा तुर्की की रहने वाली थीं. जैकी श्रॉफ का पूरा नाम ‘जयकिशन काकुभाई श्रॉफ’ है. डायरेक्टर सुभाष घई ने फिल्म ‘हीरो’ में जैकी श्रॉफ का नाम ‘जैकी ‘रखा था.

लातूर के बाद जैकी श्रॉफ का परिवार मुंबई के मालाबार हिल इलाके के ‘तीन बत्ती’ एरिया में रहता था.

फिल्मों में आने से पहले जैकी श्रॉफ ने मॉडलिंग भी की थी जिसे देखकर एक्टर देव आनंद ने उन्हें अपनी फिल्म ‘स्वामी दादा’ में रोल दिया था. यह जैकी श्रॉफ की पहली फिल्म बनी.

जैकी श्रॉफ को लीड एक्टर के रूप में सुभाष घई ने फिल्म ‘हीरो’ में लांन्च किया था, उनके अपोजिट मिनाक्षी शेषाद्रि ने भी फिल्मों में करियर इसी फिल्म से शुरू किया था.

‘हीरो’ की सफलता के बाद जैकी श्रॉफ ने ‘अंदर बाहर’ ‘जूनून’ और ‘युद्ध’ जैसी सफल फिल्में की. साल 1986 में जैकी श्रॉफ ने ‘कर्मा’ फिल्म भी की जो उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन गई.

जैकी श्रॉफ की फिल्म ‘किंग अंकल’ और ‘अल्लाह रखा’ के लिए ओरिजिनल चॉइस अमिताभ बच्चन थे, लेकिन बाद में जैकी श्रॉफ के खाते में ये फिल्में आई.

साल 1989 में आई फिल्म ‘परिंदा’ ने जैकी के करियर में एक नई ऊंचाई दी और उन्हें इस फिल्म के लिए बेस्ट एक्टर का ‘फिल्मफेयर अवॉर्ड’ दिया गया.

फिल्म ‘1942: अ लव स्टोरी’ और रामगोपाल वर्मा की फिल्म ‘रंगीला’ के लिए जैकी श्रॉफ को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का ‘फिल्मफेयर अवॉर्ड’ भी मिल चुका है. पिछले सालों में जैकी ने ‘हैप्पी न्यू ईयर’ ‘धूम 3’ और ‘ब्रदर्स’ जैसी फिल्में भी की हैं.

जैकी श्रॉफ ने अपनी लम्बे समय से गर्ल फ्रेंड रही आएशा श्रॉफ से विवाह किया था. उनकी एक बेटी कृष्णा और एक बेटा टाइगर श्रॉफ है. टाइगर फिल्म हीरोपंती से बॉलीवुड में एंट्री कर चुके हैं.

जैकी श्रॉफ के करियर की उल्लेखनीय फिल्में

युद्ध

तेरी मेहरबानियां

शिवा का इंसाफ

दूध का कर्ज

इज्जत

100 डेज

अंगार

खलनायक

गर्दिश

आइना

शपथ

बॉर्डर

मिशन कश्मीर देवदास

धूम 3

औरंगजेब

हैप्पी न्यू ईयर

मल्लिका : लौट के बुद्धू घर को आए

जिस्म की नुमाईश और चुंबन सीन की बदौलत बौलीवुड की सर्वाधिक चर्चित अदाकारा बन जाने वाली मल्लिका शहरावत ने 2009 में हौलीवुड की तरफ रूख कर लिया था. हौलीवुड में ‘‘हिस्स’’ और ‘‘पोलीटिक्स आफ लव’’ जैसी फिल्में करने के बाद अपना ज्यादातर समय अमेरिका में बिताने लगी थी. वह गाहे बगाहे यह संकेत देती रही हैं कि हौलीवुड में उनके अभिनय के कद्रदान ज्यादा हैं, इसलिए बौलीवुड फिल्मों में उनकी दिलचस्पी नहीं है.

गत वर्ष मल्लिका शहरावत ने डेनियल ली के निर्देशन में एक चाइनीज फिल्म ‘‘टाइम राइडर्स’’ की थी, जो कि 5 अगस्त 2016 को चीन में प्रदर्शित हुई थी, पर इसे सफलता नहीं मिली थी. इसके अलावा मल्लिका शहरावत के पास कोई काम नही हैं. मजेदार बात यह है कि 2011 में प्रदर्शित हौलीवुड फिल्म ‘‘पोलीटिक्स आफ लव’’ के बाद उन्हे कोई दूसरी हौलीवुड की फिल्म नहीं मिली.

इसी के चलते अब वह पुनः भारत और बौलीवुड में वापस लौट आयी हैं. सूत्रों के अनुसार बौलीवुड में वापसी करते ही मल्लिका शहरावत ने नवोदित फिल्मकार संदेश बी नायक की फिल्म ‘‘जीनत’’ अनुबंधित की है. सूत्र दावा कर रहे हैं कि फिल्म ‘जीनत’ एक मल्टीटारर फिल्म होगी, जिसके अन्य कलाकारों के चयन का काम जारी है. इसे 2017 के अंत तक प्रदर्शित करने की योजना है.

फिल्म ‘‘जीनत’’ से जुड़ने की चर्चा करते हुए मल्लिका शहरावत कहती हैं-‘‘फिल्म ‘जीनत’ की पटकथा व इसकी विषयवस्तु मुझे पसंद आयी. मैं जिस तरह की फिल्में कर रही हूं और करना चाहती हूं, वह सब कुछ फिल्म ‘जीनत’ मे है. कलाकार के तौर पर मुझे इसी तरह की रिश्ते पर आधारित विषयवस्तु की तलाश थी. पर दुर्भाग्य की बात यह है कि यह पूरी तरह से कमर्शियल हिंदी फिल्म है. जिसमें एक ऐसा संदेश है, जो कि समाज के बड़े तबके तक पहुंचेगा. मैं बहुत रोमांचित हूं. इस तरह का किरदार भी मैंने इससे पहले नही निभाया.’’

चेहरे के तिल से हैं परेशान तो..

चेहरे पर ज्यादा तिल होने की वजह से आप काफी परेशान हो जाती हैं. इससे निजात पाने के लिए आप लेजर ट्रीटमेंट करवाती हैं जो काफी महंगा और टाइमटेकिंग वाला होता है. आप में से कई महिलाएं इसे छिपाने के लिए मंहगे कॉस्मेटिक का भी इस्तेमाल करती होंगी.

क्या आपको पता है कि कुछ घरेलू नुस्खे भी आपको तिल से छुटकारा दिला सकते हैं? नहीं, तो आइए जानते हैं कि घर पर कैसे आप आसानी से इस समस्या से निजात पा सकती हैं.

लहसुन

रात को सोने से पहले तिल पर लहसुन का पेस्ट लगाएं और उसे बांध लें. सुबह उठने पर गुनगुने पानी से चेहरा धो लें. इसे लगातार पांच दिन तक करने से तिल निकल जाता है. जब लहसुन साफ करें तो उसके आस-पास की त्वचा पर पेट्रोलियम जेली जरूर लगा लें.

सेब का सिरका

सेब के सिरके (एप्पल सिडर विनेगर) के प्रयोग से तिल आसानी से निकल जाता है. रोज सोने से पहले रुई की सहायता से प्रभावित हिस्सों पर इसे लगाएं और बैंडेज से ढक दें. दस दिन तक इस प्रक्रिया को करने से तिल से निजात पा सकते हैं.

अनानास

अनानास के रस को तिल पर लगाकर सो जाएं और सुबह उठकर हल्के गर्म पानी से साफ कर लें. आप इसे दिन में भी लगा सकते हैं और सूखने पर इसे धो लें.

प्याज का रस

प्याज के रस को तिल पर लगाएं और आधे घंटे बाद इसे धो लें. करीब तीन हफ्ते इसे लगाने से तिल निकल जाता है. इसके लिए दिन में दो से तीन बार प्याज के रस का इस्तेमाल करना चाहिए.

केले का छिलका

केले के छिलके को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें और तिल पर बांध लें. ऐसा करने पर कुछ ही दिनों में तिल सूख जाएगा और आसानी से निकल आएगा.

बेकिंग सोडा

बेकिंग सोडा तिल हटाने के आसान उपायों में से एक है. बेकिंग सोडा में कुछ बूंदें अरंडी के तेल की मिला लें और रात को सोने से पहले इस पेस्ट को तिल पर लगा ले. सुबह उठने पर इसे धो लें. हफ्ते भर में तिल खुद साफ हो जाएगा.

लव और लस्ट दोनों जरुरी: अंजना सुखानी

विज्ञापन से अभिनय के क्षेत्र में आने वाली अंजना सुखानी का जन्म जयपुर में हुआ था, जबकि पालन पोषण मुंबई में हुआ. उनकी बचपन से फिल्मों में आने की इच्छा नहीं थी, उन्होंने इंटरनैशनल बिजनैस स्कूल से मैनेजमैंट की पढ़ाई की और एक अच्छी जौब कर सैटल हो जाना चाहती थीं. पढ़ाई के दौरान ही उन्हें विज्ञापनों में काम मिलता गया. उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ एक विज्ञापन में काम किया है. उनकी बहन मीना सुखानी ने फिल्म ‘बचना ऐ हसीना’ में उन्हें मिनीषा लांबा की एक दोस्त के रूप में अभिनय करने का मौका दिया, जिस में काम करना उन्हें अच्छा लगा और धीरे धीरे वे फिल्मों में अभिनय की तरफ बढ़ गईं.

फिल्म ’सलामे इश्क’ उनके जीवन का टर्निंग पौइंट थी. कुछ दिनों पहले उनकी फिल्म ‘कौफी विद डी’ आई जिसे लेकर वह काफी उत्सुक थीं, क्योंकि यह एक अलग तरह की कौमेडी फिल्म है.

फिल्म कौफी विद डी से आपने काफी लंबे समय बाद बौलीवुड में वापसी किया है, क्या है इसकी वजह?

यह एक कौमेडी फिल्म है, जिसमें मेरे साथ सुनील ग्रोवर हैं और मैं फिल्म में उन की पत्नी बनी हूं. यह अलग तरह की फिल्म है. मैं कुछ पारिवारिक कारणों से फिल्मों में नहीं आ पाई. इस के अलावा इस दौरान साउथ की कुछ फिल्में कर रही थी, साथ ही मुझे कोई रुचिपूर्ण स्क्रिप्ट भी नहीं मिली, इसलिए थोड़ा इंतजार करना पड़ा.

आप को किस तरह की फिल्में अधिक पसंद हैं? किस में आप को अधिक मेहनत करनी पड़ती है?

मुझे हर तरह की फिल्में पसंद हैं और मेहनत सब में लगती है. जब आप अपने इमोशन से हट कर अलग भूमिका निभाते हैं तो उस में घुसना मुश्किल होता है. कई बार आप किसी कारणवश दुखी हैं, लेकिन सीन्स आप को खुशी के करने पड़ते हैं. इमोशन लैवल पर एक कलाकार को अभिनय करना मुश्किल होता है.

शारीरिक तौर पर जो अभिनय किया जाता है उस में भी आप के शरीर का उस चरित्र के हिसाब से फिट होना बहुत जरूरी है, जिस में रोज वर्कआउट, सही डाइट, अपनी देखभाल सब शामिल होता है. कई बार फिल्म की जरूरत के अनुसार अपनेआप को तैयार करना पड़ता है.

आजकल द्विअर्थी कौमेडी की जाती है, आप किसे अधिक सही मानती हैं?

कौमेडी का अपना अलग महत्त्व है और अच्छी कौमेडी क्रिएट करना आसान नहीं होता, इसलिए कुछ लोग द्विअर्थी कौमेडी का सहारा लेते हैं, जो आसान होती है. इस फिल्म में सिचुएशनल कौमेडी है जो बहुत मेहनत से लिखी गई है. इस में दिखाया गया है कि अगर किसी डौन का इंटरव्यू करना हो तो कैसे किया जा सकता है. बहुत ही अच्छा और मजेदार कौंसैप्ट है. मुझे हर तरह की कौमेडी पसंद है.

फिल्म के कौन से भाग में अभिनय करना आप को कठिन लगा?

फिल्म का पूरा काम निर्देशक और लेखक ने कर रखा था, ऐसे में अभिनय करना आसान था. फिर अगर आप के सामने सुनील ग्रोवर जैसा ऐक्टर हो तो अभिनय और भी आसान हो जाता है.

फिल्मों में आना इत्तफाक था या बचपन से इच्छा थी?

शुरू में इत्तफाक ही था पर बाद में पैशन बन गया, क्योंकि जब हमें कोई काम समझ आ जाता है तो वह काम हमें अच्छा लगने लगता है और हम बाद में उसी काम में जम जाते हैं. अब तो लगता है कि यही मंजिल है.

मेरे परिवार में कोई भी इस क्षेत्र से नहीं था. मेरी जर्नी इंटरैस्टिंग थी. मैंने एड कमर्शियल से अपनी जर्नी शुरू की थी. फिर ‘सलामे इश्क’, ‘जय वीरू’, ‘गोलमाल रिटर्न’, ‘डिपार्टमैंट’, ‘कमाल धमाल’, ‘साहेब बीबी’ और ‘गैंगस्टर्स रिटर्न’ आदि फिल्में कीं. मैं उस के लिए अपनेआप को थैंकफुल समझती हूं कि गौडफादर न रहने के बावजूद मुझे काम मिला.

आजकल स्टार्स के बच्चे ही बौलीवुड पर कब्जा जमाए बैठे हैं, ऐसे में आप को यहां तक पहुंचने में कितना संघर्ष करना पड़ा?

मेरे हिसाब से शाहरुख खान का कोई गौडफादर नहीं था और वे आज सुपर स्टार हैं. मेरे लिए यहां तक पहुंचना मुश्किल नहीं था, चुनौती थी. ऐसा कौन सा किरदार है, जिसे मैं नहीं निभा सकती और यह मुझे प्रूव करना था. लाइन में मैं अगर खड़ी हूं तो क्यू छोड़ कर न जाना ही मेरी जिद थी, ताकि दूसरे लोग उस में लग न जाएं. मौका आप को मिलेगा पर धैर्य न छोड़ना ही उचित समझा, इसलिए यहां तक पहुंच पाई हूं.

कोई खास निर्देशक जिस के साथ आप काम करना चाहती हैं?

मेरी लिस्ट में कई निर्देशक हैं. एक का नाम लेना संभव नहीं. इम्तियाज अली, राजू हिरानी, कबीर खान, संजय लीला भंसाली आदि सभी के साथ काम करना चाहती हूं.

आप के जीवन का टर्निंग पौइंट क्या था?

मेरी पहली फिल्म ‘सलामे इश्क’ थी, जिस से मुझे फिल्मों में आने का मौका मिला.

आप जीवन में किसे अधिक प्राथमिकता देती हैं लव को या लस्ट को?

‘लव’ और ‘लस्ट’ दोनों ही जीवन में जरूरी हैं. ’लव’ अगर मानसिक आकर्षण है तो ‘लस्ट’ शारीरिक जरूरत. दोनों ही आप के जीवन में जरूरी हैं, लेकिन दोनों का सामंजस्य जरूरी है. ’लव’ से एकदूसरे के प्रति सम्मान, निष्ठा और सुरक्षा मिलती है और यह जीवन में मिठास और रिश्ते को बनाए रखने के लिए जरूरी होता है.

अंतरंग दृश्य करने में कितनी सहज हैं?

पहले और आज के सिनेमा में काफी बदलाव आया है, पहले फिल्म में प्यार की अभिव्यक्ति अलग तरीके से होती थी, अब सोच अलग हो चुकी है. इसलिए फिल्मों में उस का असर देखने को मिल रहा है, पर भारत में अब भी लोग इसे गलत कहते हैं जबकि विदेशों में ‘किस’ को प्यार जताने का एक साधारण सा तरीका माना जाता है. यह सही है कि हमारी जनसंख्या अधिक है, साक्षरता की कमी है, ऐसे में सोच बदलने में काफी समय लगेगा. आज भी कहीं रेप या मोलेस्टेशन होने पर महिलाओं को ही दोषी करार दिया जाता है. फिल्मों में मैं एक चरित्र निभाती हूं, ऐसे में अगर स्क्रिप्ट की मांग है तो मुझे करना पड़ेगा. जिन्होंने लिखा है या जो फिल्म का निर्देशन करेंगे, उन का एक विजन होता है. कलाकार एक ‘पपेट’ की तरह होता है, उसे जो कहा जाता है, वह करता जाता है. इसलिए अगर स्क्रिप्ट की मांग है तो मैं ऐसे दृश्यों को गलत नहीं समझती.

सोशल मीडिया पर आप कितनी ऐक्टिव हैं? सोशल मीडिया आप की नजर में कितना सही या कितना गलत है?

मैं ऐक्टिव हूं. हर मीडिया का अपना सकारात्मक और नकारात्मक असर होता है. देखना यह है कि आप इसे कैसे लेते हैं. पहले ऐसे बहुत से मुद्दे होते थे, जिन्हें उठाने के लिए व्यक्ति को सोचना पड़ता था कि कैसे आवाज उठाई जाए. सोशल मीडिया इस दिशा में एक अच्छा प्लेटफौर्म है. जहां कोई भी अपनी बात रख सकता है. यहां अगर आप के फौलोअर अधिक हैं, तो वे आप की बात सुन कर अपनी प्रतिक्रिया देंगे, जिस से आप को किसी बात को निर्णय तक पहुंचाना आसान होता है. गलत इस वजह से है, अगर आप ने बिना सोचेसमझे कुछ लिख दिया, तो उस का असर नकारात्मक हो जाता है.

आप के कैरियर में परिवार का कितना सहयोग रहा है?

परिवार के बिना तो कुछ भी संभव नहीं हो सकता. उन्होंने हर समय मेरा साथ दिया और आज मैं यहां तक पहुंच पाई.

जो यूथ फिल्मों में आना चाहते हैं, उन को क्या मैसेज देना चाहती हैं?

अगर ऐक्टिंग में आना चाहें, तो सब से पहले संघर्ष के लिए तैयार रहें, क्योंकि यहां कुछ भी हो सकता है. इस के अलावा आप ने ऐक्टिंग में ट्रेनिंग ली हो, डांस आता हो, वित्तीय रूप से स्ट्रौंग हों आदि सबकुछ होना चाहिए ताकि आप मन लगा कर कोशिश करें, अगर आप में प्रतिभा है, तो आप को काम अवश्य मिलेगा. धैर्य की बहुत आवश्यकता है. काम में सौ प्रतिशत अपना योगदान ईमानदारी से दें.

खाली समय में आप क्या करना पसंद करती हैं?

साल 2016 बहुत व्यस्त गुजरा है. अगर समय मिलता है तो डांस करती हूं. मुझे डांस के सभी फौर्म आते हैं. संगीत, रीडिंग, खाना बनाना सबकुछ करती हूं.

महिला और मोबाइल

पाकीजा होटल के सभागार में महिला क्रांति दल द्वारा महिलाओं की एक सभा का आयोजन किया जा रहा था. सभा में चर्चा का विषय था- ‘महिला और मोबाइल.’ इस सभा में लगभग हर वर्ग, जाति और नस्ल की महिलाएं आमंत्रित थीं.

सत्ताधारी दल के विधायक भोलेराम की पत्नी सरोजनी को सभा की अध्यक्ष बनाया गया था. इस कारण होटल मालिक ने सभागार का कोई किराया नहीं लिया था. उद्योगपति सुरेंद्र की पत्नी आभा आज की सभा की विशिष्ट अतिथि थीं. जलपान की व्यवस्था उन की ओर से थी. महिला महाविद्यालय में समाजशास्त्र की हैड औफ डिपार्टमैंट मिसेज नलिनी आज के कार्यक्रम की मुख्य अतिथि थीं.

कार्यक्रम का संचालन माध्यमिक विद्यालय की मैडम विनोद बाला कर रही थीं. जबकि उन का सहयोग कर रही थीं जींस और टौप पहने मिस सलमा नसरीन.

अतिथि परिचय, स्वागत आदि औपचारिकताओं के बाद विनोद बाला ने मोना ब्यूटीपार्लर की मालकिन मोना को सर्वप्रथम आमंत्रित किया. ऐसा लग रहा था जैसे मोना सीधे ब्यूटीपार्लर से उठ कर चली आई हों. हाथ में मोबाइल लिए, कंधे पर हैंड बैग लटकाए और खुले केशों को लहराते हुए वे ऐसे चल रही थीं, जैसे रैंप पर चलने की तैयारी कर के आई हों. अभी वे माइक तक पहुंची भी नहीं थीं कि उन का मोबाइल घनघना उठा. उन्होंने मोबाइल को कान पर लगाते हुए कहा, ‘‘ओह, जस्ट ए मिनट. मैं अभी सभा में हूं. कुछ  देर बाद बात करूंगी.’’

मोना के इस व्यवहार से कुछ महिलाओं की हंसी छूट गई तो कुछ झुंझला उठीं. मंचासीन महिलाओं को तो यह बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा. सभागार में बैठी नीता ने तड़का लगा ही दिया, ‘‘यह तो ऐसे बन रही है, जैसे इस के पास ही मोबाइल हो. सभा में क्यों स्विच औफ नहीं कर सकती.’’

अभी नीता का तगड़ा तड़का पूरा भी नहीं हुआ था कि उन का खुद का मोबाइल बज उठा. अब मोना कहां चूकने वाली थीं. उन्होंने नहले पर दहला जड़ते हुए कहा, ‘‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे. लोग खुद को देखते नहीं, दूसरों को उपदेश देने लगते हैं.’’

 

अब बगलें झांकने की बारी नीता की थी. मोना मंच पर पहुंच कर विनोद बाला

से माइक लेने ही वाली थीं कि तभी मंच पर बैठी विशिष्ट अतिथि मिसेज आभा की रिंगटोन बज उठी, ‘कभीकभी मेरे दिल में खयाल आता है…’ आभा ने जल्दी से अपने मोबाइल का स्विच औफ किया. लेकिन इस से सभागार में बैठी महिलाएं दबी हंसी हंसने को मजबूर हो गईं.

फिर तो सभा का संचालन कर रहीं विनोद बाला को कहना ही पड़ा, ‘‘प्लीज बहनो, हमारी सभा निर्विघ्न चले इस के लिए आप सब से निवेदन है कि कृपया अपनेअपने मोबाइल को या तो साइलैंट कर दें या फिर स्विच औफ कर दें.’’

इस के बाद मोना ने अपने विचार रखे, ‘‘बहनो, आज का विषय है- महिला और मोबाइल. दोनों एक ही राशि के हैं और मैं भी इसी राशि की हूं. यह सुन कर सभा में मुसकराहट तैर गई.

‘‘बहनो, मैं तो यह समझती हूं कि जिस प्रकार औरत की जिंदगी आदमी के बिना अधूरी है, उसी प्रकार मोबाइल के बिना भी. यह तो हमारे जीवन की, हमारे कारोबार की डोर है. हम इस के माध्यम से अपने ग्राहकों से ऐसे ही संपर्क में बनी रहती हैं, जैसे अपने हसबैंड से. मतलब, कारोबार चलाने के लिए कितना सुविधाजनक है, यह मोबाइल. ‘आई लव माई मोबाइल, लाइक माई हसबैंड’ कितना प्यारा है यह.’’

मोना की गुदगुदाती वाणी के उपरांत विनोद बाला ने एक कालेज गोइंग गर्ल रूपकुमारी को पुकारा. रूपकुमारी इठलाती, बलखाती मंच पर पहुंची और माइक हाथ में लेते ही कहा, ‘‘मेरी प्यारी बहनो एवं आंटियों…’’

अभी रूपकुमारी का संबोधन पूरा भी नहीं हुआ था कि आंटी संबोधन पर एक आंटीजी नाराज हो गईं, ‘‘आंटी क्या, हमें अपनी दादी कह, तू तो जैसे कल ही पैदा हुई है.’’

इस से सभा में कुछ देर के लिए हलचल सी मच गई.

संचालिका विनोद बाला ने बात को संभाला और क्षमा मांगते हुए कहा कि कोई भी वक्ता आंटी का संबोधन नहीं करेगी.

अब रूपकुमारी ने अपनी बात आगे बढ़ाई, ‘‘बहनो, यू नो, आज महिलाओं की क्या किसी की भी जिंदगी मोबाइल के बिना नहीं चल सकती. मोबाइल ने इतने बड़े संसार को आपस में ऐसे जोड़ दिया है, जैसे संसार के सभी लोग एक ही परिवार के सदस्य हों. आप कहीं भी बैठेबैठे कितनी भी दूर बैठे आदमी से बात कर सकते हैं. हम लड़कियों के लिए तो मोबाइल सुरक्षा गार्ड की तरह काम करता है. जरा सी भी मुसीबत में हम अपनों को अपने पास बुला सकती हैं.’’

बोलतेबोलते अचानक रूपकुमारी ने बोलना बंद कर दिया. उस ने अपना हैंड बैग खोला, जो वाइब्रेशन के कारण कंपकंपा रहा था. हैंड बैग से मोबाइल निकाल कर उसे देखा, फिर बोली, ‘‘बहनो, मुझे क्षमा करना. यह काल ऐसी है जिसे मैं मिस नहीं कर सकती. सौरी, मुझे जाना होगा.’’

तभी सभा से आवाज आई, ‘‘रूपकुमारीजी, तुम्हारे सुरक्षा गार्ड का फोन आ गया है क्या?’’

यह सुनते ही रूपकुमारी के होंठों पर मुसकराहट तैर गई और उस के गाल सुर्ख हो गए. वह ‘हैलो’ कहती हुई सभागार से बाहर चली गई.

अगली वक्ता के रूप में मिसेज शबनम प्रकट हुईं. उन्होंने विषय को ताक पर रख कर अपनी भड़ास निकालते हुए कहा, ‘‘बहनो, इन मर्दों ने हमें सदियों से अपनी गुलाम बना रखा है. बुरकानशीं कर के हमारे सुंदर चेहरों को भी ढक दिया है. भला हो इस मोबाइल का, जिस ने हमें आजादी दे दी.

‘‘बहनो, ये मर्द हमारे मोबाइलों को ऐसे घूरते हैं, जैसे ये मोबाइल न हो कर हमारे आशिक हों. हम सड़क पर चलते मोबाइल पर अपनी मां से भी बातें करें तो मर्द यही शंका करते हैं कि न जाने किस से बातें कर रही है? मैं नहीं समझती कि अगर हम किसी मर्द से भी बातें करें तो इन्हें क्या परेशानी?’’

 

मिसेज शबनम के भाषण पर सब ने जोरदार तालियां बजाईं. जिन महिलाओं ने अपने मोबाइल स्विच औफ न कर के साइलैंट मोड पर लगा रखे थे, वे बारबार अपने मोबाइल की स्क्रीन को देखती थीं और फोन आने पर टौयलेट या फिर गैलरी में जा कर बातें करती थीं.

तभी मिसेज साधना को बुलाया गया. वे नैट की साड़ी पहने चली आ रही थीं. साधनाने शबनम की ही बातों को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘बहनो, हमें इन मर्दों से बिलकुल नहीं डरना चाहिए. मोबाइल ने हमें स्वतंत्रता दी है और हमें इस स्वतंत्रता को बरकरार रखना चाहिए. मोबाइल के कारण तलाक की घटनाएं बढ़ी हैं, लेकिन हमें इस बात से घबराना नहीं चाहिए. ध्यान रखो, पति हमें छोड़ सकता है लेकिन मोबाइल जीवन भर साथ निभाता है. इसलिए मोबाइल हमारा सच्चा जीवनसाथी है बहनो…’’

तभी मिसेज साधना बुरी तरह से कांप गईं. सभागार में बैठी महिलाएं भौचक्की रह गईं कि साधना को अचानक यह क्या हो गया? तभी उन्होंने अपने ब्लाउज में से वाइब्रेशन पर रखा मोबाइल बाहर निकाला. उस के कांपने से वे कांप गई थीं. फिर ‘सौरी’ बोलते हुए वे अपनी सीट पर जा बैठीं.

उसी समय पत्रकार, फोटोग्राफर और टीवी चैनल वाले आ गए. सभागार में बैठी महिलाएं अपना मेकअप ठीक करने लगीं. कुछ देर के लिए कार्यक्रम थम सा गया. फोटो खिंचवाने की होड़ सी लग गई. फोटोग्राफरों ने भी इन हसीन चेहरों के जम कर फोटो खींचे.

फोटोग्राफरों के जाते ही सभागार बेरौनक हो गया. अधिकांश महिलाएं फोटो खिंचवा कर चलती बनीं. सभा समापन की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद मिसेज सरोजनी ने सभा समाप्त करने की घोषणा कर दी.

रोज शैम्पू करना है हानिकारक

बालों के रखरखाव के लिए आप क्या करती हैं, अपने बालों पर शैम्पू करती हैं, अपने बालों की नियमित रूप से तेल से मालिश करती हैं, महंगे से महंगा शैम्पू यूज करती हैं, लेकिन अगर आप अपने बालों को साफ रखने के लिए रोज शैम्पू करती हैं तो ज्यादा बाल धोने से बाल ख़राब भी हो सकते हैं. इसलिए जरूरी है आप शैम्पू करने के सही तरीके को जाने और सही तरीके से शैम्पू को इस्तेमाल करें..

1. अगर आपकी स्कैल्प ड्राई है तो आपको रोज़ शैम्पू नहीं करना चाहिए. रोज शैम्पू करने से स्कैल्प और ज्यादा ड्राई हो जाती है और इससे डैंड्रफ की समस्या भी हो सकती है. अगर आपकी स्कैल्प ड्राई है तो आपको हफ्ते में 2 या 3 बार ही बाल धोने चाहिए.

2. आपकी स्कैल्प ऑयली है और आपके बाल अपने आप ऑयली हो जाते हैं तो आप रोज अपने हेयर वॉश करते हैं, पर बाल ऑयली होने पर भी आपको रोज बाल नहीं धोने चाहिए. ऑयली स्किन होने के बावजूद अपने बालों को हमेशा ऑयल फ्री रखना हो तो आप हफ्ते में 4 बार हेयर वॉश कर सकती हैं.

3. कई हेयर स्‍टाइलिस्‍ट की राय यही होती है कि आप बालों को जितना धोएंगी बाल उतने ही बुरे नजर आएगें क्योंकि हेयर स्‍टाइलिस्‍ट मानते हैं कि बाल फाइबर के होते हैं और ये एक प्रकार का वूल फाइबर है. आपको अपने बालों को रोजाना धोने की जरूरत नहीं है.

4. शैम्पू करते समय सिर की हल्के हाथों से मसाज करना चाहिए. मसाज करने से सिर में रक्त का संचार और बेहतर होता है और आपके बालों की खूबसूरती और ज्यादा बढ़ती है.

5. इसके अलावा कभी भी गरम पानी से अपने बालों को न धोऐं. ऐसी गलती करने से आपके बालों को काफी नुकसान हो सकता है, गर्म पानी से बाल धोने से बाल रूखे भी हो जाते हैं.

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