सैक्सुअल हैरेसमैंट युवकों का भी

राघवन को समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक उन के 20 वर्षीय बेटे को क्या हो गया है. फर्स्ट ईयर में उस ने टौप किया था. इस सैमेस्टर में अचानक फेल कैसे हो गया? डरासहमा रहता है सो अलग?

राघवन समझदार पिता हैं. पहले उन्हें लगा कि शायद बुली का मामला है. कालेज में ऐसा थोड़ाबहुत सब के साथ होता ही है. काउंसलर से कई सैशन काउंसलिंग कराने के बाद मामला खुला तो राघवन भी सकते में आ गए. उन के बेटे रोहित के साथ 2 नाइजीरियन युवकों ने दुष्कर्म किया था.

उस के बाद रोहित मन ही मन रोता रहता था. उस ने दोस्तों को भी इस घटना के बारे में नहीं बताया. उस ने गर्लफ्रैंड के फोन उठाने भी बंद कर दिए. पुलिस के पास जाने का तो सवाल ही नहीं था.

राघवन का हैरत और गुस्से के मारे बुरा हाल था. उन्होंने रोहित के लाख मना करने पर भी थाने में एफआईआर दर्ज करा दी. वैसे पुलिस का रवैया भी लचर ही था.

‘‘इतने दिन बाद शिकायत दर्ज कराने का क्या तुक है,’’ थाना इंचार्ज ने रोहित से पूछा तो वह काफी परेशान हो गया और काफी समय बाद सामान्य हो पाया, लेकिन अब वह अच्छीभली नौकरी कर रहा है. लव लाइफ भी ठीकठाक है.

यह किसी भी युवक के साथ हो सकता है. शारीरिक शोषण कितने ही युवकों का उन के परिचितों, रिश्तेदारों सीनियर या किसी पड़ोसी द्वारा भी किया जा सकता है या यों कहें कि आप के आसपास या मित्रों में कोई भी युवक शोषण का शिकार हो सकता है.

यहां तक कि टीचर या प्रोफैसर भी शोषक हो सकते हैं. यदि आप या आप का कोई परिचित किसी न किसी प्रकार से शोषण का शिकार है तो इसे न सहें.

युग 9वीं कक्षा का छात्र है. उस के पीटीआई टीचर ने उस का शारीरिक शोषण करने की कोशिश की, लेकिन बगैर देर किए उस ने इस बारे में अपने दोस्तों को बता दिया. दोस्तों ने आगे अपने सीनियर्स को बताया तथा वहां से फैलते हुए यह बात टीचर्स में फैल गई. परिणाम यह हुआ कि पीटीआई टीचर स्कूल से खुद ही रिजाइन कर के चला गया.

ऐसा ही कुछ रियाज अहमद के साथ भी हुआ. उस के एक बेहद करीबी रिश्तेदार ने उस के साथ गलत हरकत की. इस के बारे में किसी को बताने पर उसे धमकी भी दी कि यदि तुम ने इस बारे में किसी को बताया तो तुम्हारे परिवार के साथ मैं कुछ बुरा कर दूंगा. बेचारा रियाज उस की इस धमकी से डर गया और परेशान रहने लगा. कुछ समय बाद रियाज ने इसे अपनी करनी का फल मान लिया.

आखिर क्या कारण है कि युवकों के शारीरिक शोषण के बारे में काफी कम घटनाएं सामने आ पाती हैं जबकि सचाई इस के एकदम विपरीत है.

युवक सामाजिक रूप से अधिक रफटफ बने रहना चाहते हैं. उन्हें लगता है वे दोस्तों और समाज में हंसी का पात्र बन जाएंगे. कई बार परिवार भी उन्हें सपोर्ट नहीं करता.

क्या करें

– कड़े और स्पष्ट शब्दों में प्रतिरोध करें.

– यदि इस तरह की हरकत किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाती है जो आप का करीबी है, तो उसे चेतावनी दें.

– अगर आप के प्रतिरोध को धमकी या नुकसान द्वारा दबाया जाता है तो भी न डरें. किसी जिम्मेदार व्यक्ति को पूरी बात बताएं.

– पार्टी में किसी अनजान व्यक्ति द्वारा गलत हरकत करने पर शोर मचाएं और प्रथम प्रयास में ही खुद को सुरक्षित करने पर ध्यान दें.

क्या न करें

– चुपचाप न सहें. याद रखें पहली हार में आप की चुप्पी है.

– खुद को दोषी न ठहराएं.

– हर किसी को इस प्रसंग के बारे में न बताएं.

– अगर आप ने अपने साथ हुए व्यवहार का विरोध किया है और

दोस्तों के बीच व परिवार में आप अपनी उपेक्षा महसूस करते हैं, तो खुद पर गर्व करें कि आप ने अपने लिए कदम उठाया.

– ऐसी घटनाएं या तो आप को तोड़ती हैं या फिर मजबूत बनाती हैं.

जरूर करें

– ऐसे समय में अच्छे साहित्यिक व प्रेरणादायक सामग्री का उपयोग अवश्य करें.

– एक सब से आवश्यक बात जो आप को कठिन समय से उबार लेगी, अच्छी तरह से कोई नई स्किल सीखें.

जोंबी वौक: डर का मजा

हौरर मूवीज में इंसान मरने के बाद भी डरावने रूप में बदला लेने के लिए लोगों के सामने आ जाता है. उस का पूरा शरीर घावों से भरा और खून से लथपथ होता है. चाल इतनी डरावनी होती है कि देखने वाले डर से कांप उठते हैं. वह जैसे ही उन के करीब आता है, वैसे ही बचाव में लोग भागने की कोशिश करते हैं. हालांकि फिल्मों में ये सब तकनीक पर आधारित होता है और एडिटिंग द्वारा खौफ पैदा किया जाता है, लेकिन हकीकत में कोई भूत नहीं होते बल्कि जोंबीज होते हैं जिन्हें मेकअप आर्टिस्ट की मदद से डरावना रूप दिया जाता है, जिसे देखने वाला भूत समझ कर खुद पर से काबू खो बैठता है.

क्या है जोंबी वौक

लोग लाइफ ऐंजौय करने के लिए क्या-क्या नहीं करते. कभी ऐंडवैंचर के लिए खतरनाक स्टंट ट्राई करते हैं तो कभी अजीबोगरीब फैस्टिवल्स में भाग ले कर खुद को अलग अंदाज में पेश करने की कोशिश करते हैं. इन्हीं अजीबोगरीब आयोजनों में दुनियाभर में जोंबी वौक भी एक है, जिस में जोंबीज बनने के इच्छुक लोग भाग लेते हैं. यह एक तरह से हैलोवीन थीम से मिलताजुलता है. इस में भाग लेने वाले व्यक्ति अपने फेवरिट हौरर करैक्टर के लुक व स्टाइल को कौपी कर लोगों को अपने डरावने चेहरों से डराने की कोशिश करते हैं. पता होने के बावजूद कि जोंबी वौक में शामिल होने वाला व्यक्ति भूत नहीं है फिर भी डर के मारे कोई भी उन के पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता. कुल मिला कर यह लोगों का एक नए अंदाज में ऐंटरटेनमैंट करता है.

मेकअप का खेल

इस में पूरा खेल मेकअप का होता है, जिसे मेकअप आर्टिस्ट अपने हाथ की सफाई से व्यक्ति के चेहरे, हाथपैरों व गरदन को वही रूप देने की कोशिश करता है जैसा करैक्टर बनने की ख्वाहिश वह व्यक्ति रखता है. चाहे कितना भी डरावना करैक्टर बनाना हो मेकअप आर्टिस्ट हार नहीं मानते और कर के दिखाते हैं, क्योंकि इस से जहां उन्हें अपनी कला को लोगों के सामने दिखाने का मौका मिलता है, वहीं इस के लिए उन्हें मुंहमांगी कीमत भी मिलती है.

किस मोटो से होता है आयोजन

जोंबी वौक का आयोजन जिस भी देश में किया जाता है उस के लिए लोगों तक सूचना पहुंचाने के लिए मीडिया व विभिन्न सोशल साइट्स की हैल्प ली जाती है ताकि बड़ी संख्या में लोग इस में भाग लेने के लिए पहुंच सकें. इस तरह के आयोजन का मुख्य उद्देश्य रूटीन लाइफ से एक दिन के लिए खुद को बाहर निकालना तो होता ही है, साथ ही वर्ल्ड रिकौर्ड बनाना या फिर किसी चैरिटी वर्क के लिए भी किया जाता है

फर्स्ट जोंबी वौक ने किया क्रेजी

पहली जोंबी वौक उत्तरी अमेरिका में 2000 में आयोजित हुई. भले ही इस में बहुत कम लोगों ने भाग लिया लेकिन इस के बाद इस की लोकप्रियता इतनी अधिक बढ़ गई कि इसे दुनियाभर में और भी कई जगहों पर आयोजित किया जाने लगा.

उत्तरी अमेरिका के बाद अगस्त, 2001 में ‘जोंबी परेड’ सैक्रामेंटो, कैलिफोर्निया में आयोजित हुई. वहां इस का श्रेय ब्रेना लविंग को जाता है, जिन्होंने ट्रैश फिल्म ओर्ग के सामने सुझाव रखा कि इस के माध्यम से वे अपने एनुअल मिडनाइट फिल्म फैस्टिवल  को प्रमोट कर सकते हैं.

इस के बाद दोबारा जुलाई, 2002 में यह इवैंट आयोजित हुआ और तब से यह उन का एनुअल इवैंट बन गया, जिस में भाग लेने वालों की संख्या हर बार बढ़ती ही है. इस के बाद अक्तूबर, 2003 में यह वौक टोरंटो में हौरर मूवी फैन द मंस्टर द्वारा आयोजित की गई. 

इस के बाद से यह वहां एक एनुअल इवैंट के रूप में मनाया जाने लगा. नएपन और देखादेखी के चलते बाकी देशों में भी इस का क्रेज बढ़ता चला गया.

यह कहना गलत नहीं होगा कि जोंबी फिल्म्स जैसे रैजिडैंट एविल मूवीज, 28 डेज लेटर, जैक स्नेडर्स डाउन औफ द डैड, शौन औफ द डैड , जौर्ज ए रोमैरोज, लैंड औफ द डैड आदि की सफलता से भी जोंबी इवैंटस का प्रचलन औैर ज्यादा बढ़ा है.

2016 का जोंबी वौक

मैक्सिको सिटी, लंदन, फ्रांस आदि कई जगहों पर जोंबी वौक का आयोजन हुआ, जिस में हजारों की संख्या में प्रतिभागियों ने भाग लिया. देखने वालों के होश तब उड़े जब नकली खून से सने, हाथों में मांस लटकाए और डरावना मेकअप किए एक प्रतिभागी ने उन की ओर दौड़ लगा कर उन्हें खाने का नाटक किया, जिस ने एक बार उन से आंखें मिला लीं, वे दोबारा उन से आंखें मिलाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. कुछ ऐसा था 2016 का जोंबी वौक.

भारत में जोंबी वौक की जगह थीम पार्टीज का चलन

जोंबी वौक जहां अभी विदेशों में ही ज्यादा प्रचलित है, वहीं भारत में थीम पार्टीज का ज्यादा चलन है, क्योंकि यूथ अब नौर्मल पार्टीज की जगह थीम पार्टीज को ज्यादा पसंद करने लगे हैं. इन पार्टीज में युवा थीम्स के अनुसार खुद को रैडी कर जीभर कर ऐंजौय करते हैं. ऐसी पार्टीज के लिए उन की उत्सुकता कई दिन पहले से शुरू हो जाती है. आखिर हो भी क्यों न, जब लुक न्यू, डैकोरेशन और फूड भी थीम के अनुसार होगा तो दिल तो गार्डनगार्डन होगा ही.

आजकल सब से ज्यादा डिमांड में है, हैलोवीन थीम, जो भले ही दिखने में डरावना है लेकिन खूब मजा देने वाला होता है. इस के अतिरिक्त अवैंजर थीम, कैसीनो थीम, रैट्रो थीम, पाइरेसो थीम, जंगल थीम, डिस्को थीम, एंग्री बर्ड थीम भी चलन में हैं.

जिस तरह थीम पार्टीज ने भारत में जगह बनाई है ठीक उसी तरह जोंबीज इवैंट भी भारत में जल्द ही चलन में आएंगे क्योंकि ये मनोरंजन का नया माध्यम हैं.

बाथरूम वार्त्ता

कई महीनों ने गुसलखानों में लाखोंलाख लगा डाले. अब क्या है कि वैसे गुसलखाना जो है वह बाथरूम का अनुवाद है. लेकिन जब अब तक का सब से महंगा 35 लाख का बाथरूम चर्चा में है, उस बेचारे की हैसियत गुसलखाने या स्नानागार की नहीं है.

35 लाख का बाथरूम सुन कर दिल में एक लहर सी उठी है अभी. भैया 35 पैसे का टिकट लगा दो. अपन देख आएंगे और सरकार का राजस्व अर्जन मुफ्त में. जब मुल्क में घपलों का इतना शोर न था, तब माला सिन्हा ने 12 लाख लगा कर बाथरूम बनवाया था. वह सस्ते का जमाना था, इसलिए 12 लाख भी बहुत होते थे. इतने होते थे कि हास्य कविताएं तक बन गई थीं. जैसे- माला सिन्हा की तरह 12 लाख लगा कर बाथरूम बनवाऊं. 12 लाख का बाथरूम फायदा तो न दिला सका, लेकिन कविवर मंचमंच पर चैक दर चैक वसूलते गए.

बाथरूम तो माला सिन्हा के बाद पं. सुखराम का भी चर्चा में रहा. हल्ले बहुत हुए, मगर पटाखा फिस्स. अगर कोई सुधी पाठक यह सोचता है कि अखबारबाजी से मोंटेक सिंह अहलूवालिया के 35 लाख के बाथरूमों का बालबांका हो जाएगा तो गलत सोचता है. आज तक किसी का कुछ हुआ है कि पहली बार कोई चमत्कार होगा? कृपलानी की जीपें, नागरवाला, तेंदूपत्ता, चारा, करोड़ की अटैची… आखिर इंसान किसकिस को याद रखे? हजारों गम हैं दफ्तर के, मुहब्बत के, नूनतेल के, जमाने का ही दर्द तनहा नहीं, हम क्या करें? अब इस शेर पर यह न कहिएगा कि यह क्या उलटपुलट है. शेर तो था कि हजारों गम हैं दुनिया में अपने भी, पराए भी, मुहब्बत ही का गम तनहा नहीं, हम क्या करें? गम तो पन्नेपन्ने, चैनलचैनल पर छाए हुए हैं पर किसे परवाह है कि पुलिस वाले भैया की मोटरसाइकिल में तेल ही न था, अपने स्कूटर पर पीछे बैठा कर लगानी पड़ी रेस, तब जो है सो पुलिस मौका ए वारदात पर पहुंची. खोदने वाली मशीन में डीजल ही खत्म हो गया, दुखियारा पैसे दे तो डीजल लाएं. डीजल लाएं तो मशीन चले. मशीन चले तो खुदाई हो, खुदाई हो तो बोरवैल का मलबा सामने आए. डीजल न हो तो कोई अपनी जेब से डलवाने से रहा. सरकारी काम. पैसा मिला न मिला. परमीशन कहां है? सैंक्शन कहां है? पहले कुरसियों पर आदमी बैठते थे आजकल कुरसियों पर आमतौर पर कुरसियां बैठती हैं. उन के नयन कुरसी, उन के वचन कुरसी, उन का मन कुरसी, उन का तन कुरसी, उन का रोमरोम कुरसी. पता नहीं चलता कि वे कुरसी में समाए हैं या कुरसी उन में समाई है. कुरसी लकड़ी की यानी काठ की. काठ माने ईंधन. संपूर्ण रस सूख गया है. वे जो लचकती शाखें होती थीं, फूलों से लदी हुईं वे अब झोंकने लायक ईंधन में तबदील हो गईं. झोंकने की जगह भट्टी है कि चिता यह पता चलना ही रह जाता है. रह तो जाता है इसे याद रखना भी. याद रहे तो कोई कुरसी 35 लाख के बाथरूम को जस्टिफाई क्यों करे.

गीता में यह आत्मा वगैरह के बारे में कहा कुरसी के बारे में नहीं कहा. जैसे आत्मा जीर्णवस्त्र को त्याग देती है, इसी प्रकार एक कुरसी पर बैठी कुरसी रिटायर होते ही दूसरी पसंद कर धारण कर लेती है. सहायक, परामर्शदाता वगैरह. अगर आई.ए.एस. हुए तो आयोगों के सदस्य हुए. पक्के जुगाड़ू हुए तो मनचाही पोस्टिंग. वह भी ऐसी कि बंगला भी रहे और गाड़ी भी. 35-35 लाख के बाथरूमों में आनाजाना भी लगा रहे.

इन बाथरूमों में यानी 35 लाख रुपए वाले बाथरूमों में आवाजाही के लिए तनिक देखादेखी हो जाए का जुगाड़ लगाना पड़ता है. जरा देख लें कि साहब देख रहे हैं. अगर साहब ने न देखा तो नजर में न चढ़ेगा. न चढ़ेगा तो फिर जस्टिफाई करने का दम कहां से आएगा?

मैं कल्पना करती हूं कि कहा गया होगा, ‘सर, ये अखबार वाले बदमाश हो गए हैं. सिर्फ 35 लाख के बाथरूमों के पीछे शोर? दैट टू औफिशियल. अपने घर में बनवाते तो कोई बात भी थी.’

अपने घर में बनवाते तब भी क्या बात होती? मायावती ने बनवा लिए न घर में. हुई कोई बात? बाथरूम न बनवाओ तो अपनी मूर्ति बनवा लो सरकारी पैसों से. तब क्या हुआ? सरकार चली जाने की चर्चा न करें. सरकारें तो आतीजाती रहती हैं. कभी यह, कभी वह. भूखीनंगी जनता के पास विकल्प क्या है, लेदे कर एक अदद वोट है, उसे नोट के बदले, चोट के बदले, खोट के बदले ले लो, हुजूर माईबाप सरकार जैसा आप चाहें. कोई चाहे 35 लाख का बाथरूम बनवाए या किसी के किचन में साल भर में 389 गैस सिलेंडर लग जाएं, हमें क्या? अपना तो राग है-

गुड़ हो तो गुलगुले बनाते

चून उधार ले आते

बस, तेल ई नई ए

कोई यों नहीं पूछता कि फिर क्या हुआ? गुलगुले बनाने की सूझी ही क्यों?

सूझी यों कि जागी आंखों से सपने देखने की आदत पड़ रही थी. शहीद ठाकुर रोशन सिंह के वंशजों के सिर पर छत नहीं है. खुले आसमान के नीचे गुजारा कर रही है विधवा मां और संग में नन्हे बच्चे. ये जी रहे हैं या मर रहे… मैं ने 35 लाख के बाथरूम की छत जरा सी खींच ली और खींच कर शाहजहांपुर के उस खेत तक कर दी, जहां की दीवार के साथ शहीद के वंशज बैठे थे. वह अकेली थी और उस पर कोई छप्पर, छाजन या टीन न थी. अंगरेजों ने ठाकुर रोशन सिंह को फांसी क्यों दी थी… इन को भारत देश के लिए छोड़ देते.

अगर जागी आंखों से सपने देखे जाते तो 35 लाख में कई छतें बन जातीं. साहब, मालिक, हाकिम, हुक्काम उन्हीं से काम चला लेते वरना अपने तो पहले वाले यानी एकदम पहले राष्ट्रपति तलक दिशामैदान हो आते थे. सुरक्षा वाले टापते रह जाते और वे झाडि़यों के पीछे जाते भी और लौटते भी. आज का जमाना होता तो भई लोग इस सादगी का भी प्रचार कर लेते और राजपथ पर इंपोर्टेड झाडि़यों लगवा लेते.

शायद फिर उन झाडि़यों पर बाथरूमों से भी अधिक खर्च हो जाता. कोई झाड़ी पसंद करने देशविदेश में भागाभागा फिरता, कोई मंजूर करता, कोई ले कर आता, कोई लगवाता. कौमनवैल्थ गेम्स भूल गए क्या? अपने यहां तो सब प्रकार की परंपराएं हैं. इति बाथरूम वार्त्ता 2012 संपूर्णम.

– अलका पाठक

बड़े भाई की गर्लफ्रैंड पर नजर रखें

संजना 12वीं की छात्रा थी और उस का बड़ा भाई मैनेजमैंट का छात्र था. संजना का अपने भाई से दोस्ताना रिश्ता था, वे अपनी प्रौब्लम को एकदूसरे के साथ शेयर करते थे, लेकिन संजना कुछ दिन से अपने भाई अर्पित को काफी परेशान देख रही थी. संजना ने कई बार भाई की परेशानी का कारण पूछा, लेकिन वह हर बार संजना की बातों को टालता रहा. अब तो अर्पित अपनी क्लास भी मिस करने लगा था, भाई को परेशान देख संजना से रहा नहीं गया और वह भाई से बोली कि भैया मैं कई दिन से आप को परेशान देख रही हूं, आप अपनी परेशानी मुझ से साझा क्यों नहीं करते, हो सकता है कि मैं आप की परेशानी दूर करने में कुछ मदद कर पाऊं.

संजना की बातें सुन कर उस के भाई को थोड़ा बल मिला और उसे लगा कि संजना सही ही तो कह रही है. उस के भाई ने बताया कि उस की अपने कालेज की ही अदिति नाम की एक लड़की से फ्रैंडशिप है, जो उस के साथ ही मैनेजमैंट का कोर्स कर रही है. उस ने बताया कि उन की फ्रैंडशिप अब धीरेधीरे प्यार में बदलने लगी थी, लेकिन अचानक कुछ दिन से अदिति उस से दूरी बना कर रहने लगी है.

संजना अपने भाई अर्पित से बोली कि आप मुझे अपनी गर्लफ्रैंड का पता दे दीजिए, मैं खुद जा कर उस से मिलती हूं और आप से दूरी बनाने का कारण जानने की कोशिश करती हूं. हो सके तो फिर से आप की दोस्ती को नजदीकी में बदलने का प्रयास करूंगी.

एक दिन संजना अपने स्कूल से समय निकाल कर अदिति से मिली और उसे बताया कि वह अर्पित की छोटी बहन है. अदिति संजना से मिल कर बेहद खुश हुई. बातचीत के दौरान संजना ने अदिति को यह बताया कि मेरा बड़ा भाई उसे बहुत चाहता है, लेकिन अचानक उस के दूरी बनाने से वह बहुत परेशान रहने लगा है, जिस वजह से उस का पढ़ाई में भी मन नहीं लगता.

संजना की बात सुन कर अदिति बोली कि मैं भी अर्पित को बहुत चाहती हूं और मुझे उस का साथ भी बहुत अच्छा लगता है, लेकिन कुछ दिन से अर्पित मुझपर अपनी मरजी थोपने लगा था कि मैं हर काम उस के हिसाब से करूं, जिस वजह से मेरी आजादी में खलल पड़ने लगा था.

अदिति ने बताया कि अर्पित उस की तुलना दूसरी लड़कियों से करता है जो उसे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता. अगर अर्पित को उस की कोई बात अच्छी नहीं लगती तो वह यह बात उस से सीधा कह सकता है, लेकिन दूसरी लड़कियों से उस की तुलना करना एकदम गलत है. अदिति ने यह भी बताया कि वह अर्पित के साथ रिलेशन को आगे बढ़ाना चाहती है, लेकिन अर्पित को इस के लिए अपने व्यवहार में सुधार लाना होगा. संजना ने अदिति को यह विश्वास दिलाया कि वह अपने बडे़ भाई को अपनी आदतों में सुधार लाने के लिए कहेगी. उस ने अदिति से यह रिक्वैस्ट की कि वह उस के भाई से फ्रैंडशिप जारी रखे.

घर आ कर संजना ने अपने भाई को उस की गर्लफ्रैंड से हुई सारी बातें बताईं और दूरी बनाने का कारण भी बताया. अर्पित ने संजना से वादा किया कि वह भविष्य में कोई भी ऐसी हरकत नहीं करेगा, जिस से उस की गर्लफ्रैंड को दुख पहुंचे. संजना की इस पहल से उस के बडे़ भाई के रिश्ते गर्लफ्रैंड से पहले जैसे अच्छे हो गए. संजना ने भाई और उस की गर्लफ्रैंड पर नजर रखते हुए छोटी बहन होने का फर्ज निभाया और वह दोनों की गलतफहमियां दूर करने में कामयाब रही. छोटी बहन संजना के चलते अर्पित और अदिति दोनों जल्द ही शादी करने वाले हैं.

संजना ने बड़ी बुद्धिमानी से भाई से छोटी होने के बावजूद उन की गर्लफ्रैंड से मिल कर उन के खराब संबंधों के बावजूद फिर उन दोनों को पास लाने में मदद की, लेकिन ऐसा सभी मामलों में नहीं हो पाता, क्योंकि ज्यादातर मामलों में छोटी बहन होने के नाते वह बडे़ भाई की गर्लफ्रैंड के मामलों में हाथ नहीं डालना चाहती, जबकि कई बार अपने भाई को अपनी गर्लफ्रैंड के चलते तमाम तरह की दुशवारियों का सामना करना पड़ता है. वह इस बात को अपने पैरेंट्स से भी नहीं कह पाता. ऐसी स्थिति में यदि छोटी बहन बड़े भाई की दोस्त की हैसियत से उस की गर्लफ्रैंड पर नजर रखे तो न केवल भाई को गर्लफ्रैंड से होने वाली कई तरह की परेशानियों से बचा सकती है बल्कि भाई को उस की गर्लफ्रैंड से जुड़ी गलत बातों को ले कर भी सचेत कर सकती है.

अकसर कई मामलों में लड़कियों का लड़कों के साथ दोस्ती का उद्देश्य इमोशनल अत्याचार करना भी होता है. ऐसी लड़कियां एकसाथ कई लड़कों से दोस्ती गांठ कर उन के पैसों से मौज उड़ाती हैं और अपने शौक पूरे करने के लिए उन दोस्तों से सैक्स संबंध बनाने में भी कोई गुरेज नहीं करतीं. ऐसी गर्लफ्रैंड कभी भी अपने बौयफ्रैंड के प्रति ईमानदार नहीं हो सकती, जब गर्लफ्रैंड के बारे में ऐसी बातें बौयफ्रैंड को पता चलती हैं तो उस का दिल टूट जाता है और उस के चक्कर में वह अपनी पढ़ाई व कैरियर सबकुछ बरबाद कर बैठता है.

ऐसे मामलों में छोटी बहन होने के नाते बहन अपने बडे़ भाई की गर्लफ्रैंड पर नजर रख कर उस की अच्छीबुरी आदतों के बारे में भाई को बता सकती है और कभी जरूरत पड़ने पर भाई और उस की गर्लफ्रैंड को आमनेसामने बैठा कर उन की गलतफहमियां दूर करने में भी मदद कर सकती है.

बहन की बातों को भाई गंभीरता से ले

एक महिला महाविद्यालय में शिक्षिका रंजना अग्रहरि का कहना है कि कुछ लड़कियां कई लड़कों के साथ दोस्ती बना कर रखने में विश्वास रखती हैं. यह उसी तरह से होता है जैसे कालेज में लड़केलड़कियों की आपस में दोस्ती होती है. ऐसे में अगर आप का बड़ा भाई भी किसी लड़की को अपनी गर्लफ्रैंड बनाता है तो यह कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब यह दोस्ती प्यार तक पहुंचने लगे तो रिश्तों में संजीदगी लाना बेहद जरूरी हो जाता है. वहीं कुछ लड़कियां सिर्फ अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए बौयफ्रैंड बनाती हैं और जब उन का मन भर जाता है तो उसे छोड़ कर दूसरे लड़के के साथ दोस्ती गांठ लेती हैं. ऐसे मामलों में दिल टूटना आम बात हो जाती है.

अगर आप घर में छोटी हैं और आप के बडे़ भाई की कोई गर्लफ्रैंड है तो एक जागरूक बहन का फर्ज निभाते हुए अपने भाई को गर्लफ्रैंड की ज्यादती का शिकार होने व इमोशनल अत्याचार से बचाने के लिए उस पर नजर रख सकती हैं. अगर आप को लगता है कि भाई की गर्लफ्रैंड का उद्देश्य आप के भाई के पैसों से मौजमस्ती करना है तो इस के प्रति भाई को सचेत कर सकती हैं. हो सकता है कि एक बारगी भाई को आप की बातों पर विश्वास न हो, लेकिन भाई को विश्वास दिलाएं कि आप उन की सगी बहन हैं और उन का बुरा कभी नहीं सोच सकतीं. यदि भाई को विश्वास न हो तो आप उस से जुडे़ कुछ सुबूत भी पेश कर सकती हैं. ऐसे में आप भाई को न केवल टूटने से बचा सकती हैं, बल्कि उन के कैरियर व पढ़ाई को भी बरबाद होने से बचा सकती हैं.

गर्लफ्रैंड को ले कर अकसर लड़कों में गलतफहमी पैदा हो जाती है. इस का मुख्य कारण उस का कई लड़कों के साथ दोस्ती रखना व उन से बातचीत करना हो सकता है, लेकिन ऐसी बातें गलत नहीं होतीं. अगर भाई को अपनी गर्लफ्रैंड की कई लड़कों से दोस्ती नागवार गुजर रही है तो आप भाई को यह समझा सकती हैं कि उस की भी अपनी लाइफ है. ऐसे में उस के आजादी के हक को छीनना गलत होगा.

बडे़ भाई की गर्लफ्रैंड पर नजर रखना पढ़ाई व कैरियर के लिए है अच्छा

गर्लफ्रैंड के चक्कर में पड़ कर अकसर लड़के अपने पढ़ाई व कैरियर दोनों बरबाद कर बैठते हैं और कई बार गर्लफ्रैंड पढ़ाईलिखाई में बेहद तेजतर्रार होती है. इस स्थिति में आप भाई की गर्लफ्रैंड पर नजर रखने के लिए छोटी बहन होने का फायदा उठा कर उस से नजदीकियां बढ़ा सकती हैं. अपनी पढ़ाई से जुडे़ सवालों को भी हल करने में उस की मदद ले सकती हैं. इस स्थिति में भाई की गर्लफ्रैंड के व्यवहार और उस की खूबियों की जानकारी भी हो जाएगी और आप की पढ़ाई से जुड़ी समस्याओं का निदान भी होगा.

यदि भाई की गर्लफ्रैंड पढ़नेलिखने में तेजतर्रार है तो वह न केवल आप के लिए फायदेमंद है बल्कि आप के भाई को भी भटकने से रोकने में मददगार साबित होती है, क्योंकि उसे पढ़ाई का महत्त्व पता होता है और वह अपने बौयफ्रैंड को पढ़ाई से जुडे़ जरूरी टिप्स भी समयसमय पर देती रहती है.

उपरोक्त बातों के अलावा भी भाई की गर्लफ्रैंड पर नजर रखना आप के भाई और उस की गर्लफ्रैंड दोनों के लिए मददगार साबित हो सकता है, क्योंकि आप की नजर रखने से गर्लफ्रैंड की अच्छीबुरी आदतों की सही जानकारी भी हो पाती है. इस के लिए आप भाई की गर्लफ्रैंड से दोस्ती बना सकती हैं, जिस से उसे शक भी नहीं होगा और उस की खूबियों से आप रूबरू भी हो पाएंगी. हो सकता है कि वह आप के पहनावे, हेयरस्टाइल और बातचीत से प्रभावित हो कर आप के भाई से दोस्ती को और प्रगाढ़ करने के लिए कुछ टिप्स भी ले, जिसे आप आसानी से उसे दे सकती हैं.

आजकल ज्यादातर मामलों में लड़कियों से दोस्ती प्यार में बदल जाती है, ऐसी स्थिति में हो सकता है कि आप अपने भाई की गर्लफ्रैंड पर पहले से नजर रख रही हों तो आप के घर में वह जब भाभी बन कर आए तब उस की पसंद व नापसंद के बारे में आप को पहले से ही पता हो, जिस से भाभी और ननद के रिश्तों में और प्रगाढ़ता लाई जा सकती है.

अगर आप बडे़ भाई की गर्लफ्रैंड पर निगरानी रख रही हैं तो आप के भाई या उस की गर्लफ्रैंड को यह कतई नहीं लगना चाहिए कि आप उन के निजी संबंधों में दखलंदाजी कर रही हैं बल्कि अगर इस बात की जानकारी हो भी जाए तो आप उन्हें यह विश्वास दिलाएं कि आप जो कुछ भी कर रही हैं, उन दोनों के अच्छे के लिए कर रही हैं. इस से आप की इमेज आप के भाई और उस की गर्लफ्रैंड दोनों की नजर में अच्छी होगी और इस तरह आप एक अच्छी बहन होने का फर्ज अदा कर सकती हैं.                                              

कोमल हाथों में हथियार

‘‘मैं तब फर्स्ट ईयर में पढ़ती थी. जयपुर के महेश नगर इलाके से शाम तकरीबन साढ़े 6 बजे मैं पैदल ही घर से ट्यूशन के लिए निकली. आगे जहां लोगों की कम चहलपहल थी वहां पहुंची, तो मैं ने देखा कि सामने एक आदमी मुझे इशारा कर रहा था. वह साइन लैंग्वेज में कुछ कह रहा था. मैं ने पलट कर पीछे देखा तो एक अन्य आदमी भी मुझे फौलो करता नजर आया.

‘‘जब तक मैं समझ पाती कि दोनों एकदूसरे से मेरे बारे में ही बात कर रहे हैं, तब तक उन दोनों ने आ कर मुझे जकड़ लिया और करीब 20 कदम दूर खड़ी एक कार तक घसीटते हुए ले गए. जब वे मुझे कार में धकेल रहे थे तो मैं ने उसी समय एक व्यक्ति को किक मार कर नीचे गिरा दिया और कार से बाहर निकल गई. ऐसे में कार में बैठे 3 और बदमाश मुझे पकड़ कर वहीं मारपीट करने लगे.

‘‘मारपीट व छीनाझपटी के दौरान मेरा बैग नीचे गिर गया और उस में रखा चाकू बाहर आ गया. उन लोगों की नजर चाकू पर नहीं पड़ी, लेकिन मैं ने बैग के बाहर गिरे चाकू को देख लिया था. ऐसे में उन की मार खा कर मैं ने सड़क पर गिरने का नाटक किया और चाकू उठा कर हिम्मत से उन की तरफ लहरा दिया. मेरे हाथ में चाकू देख कर वे सकपका गए और एकदम पीछे हट गए. मैं मौका देख कर वहां से भाग निकली.

‘‘इस घटनाक्रम को वहां दूर खड़े 8-10 लोग देख रहे थे. मुझे भागता देख उन्हें सारा माजरा समझ आ गया और वे तुरंत कार के पास आ कर बदमाशों से सवालजवाब करने लगे और मामला गड़बड़ देख उन्होंने बदमाशों की धुनाई करनी शुरू कर दी. उन लोगों की मदद से मैं घर पहुंची. घर पहुंच कर मैं ने पेरैंट्स को सारी बातें बताईं और परिजनों के साथ थाने गई, जिस से पुलिस ने आगे की तहकीकात शुरू की.’’

जयपुर के महेश नगर थाना क्षेत्र में रहने वाली माधवी ने अपनी आपबीती सुनाते हुए आगे बताया, ‘‘दिल्ली गैंगरेप की घटना के बाद मैं ने अपने बैग में चाकू रखना शुरू कर दिया था. मैं अपनी ओर से सभी युवतियों को यह कहना चाहती हूं कि स्प्रे, मिर्च पाउडर व चाकू जैसी चीजें हर युवती को खुद की हिफाजत के लिए अपने पास जरूर रखनी चाहिए.’’

सभ्य समाज में हथियारों का कोई काम नहीं है. यह जिम्मेदारी पुलिस और प्रशासन की है कि वह समाज के लोगों में भरोसा और माहौल में शांति बनाए रखे, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा. भरोसा इस कदर उठ चुका है कि युवतियां अपने बचाव के लिए हथियार रखने को मजबूर हैं. युवतियां बदमाशों के खिलाफ अपने कोमल हाथों में हथियार थाम रही हैं.

दिल्ली गैंगरेप की घटना के बाद लाखों लोगों के विरोध और अपराधियों को सख्त सजा देने की मांग के बाद भी समाज के उन लोगों की सोच पर इन सब का कोई असर नहीं हुआ, जो युवतियों को महज शारीरिक हवस को पूरा करने की नजर से देखते हैं. आज भी देशभर में रोज दर्जनों ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां युवतियों का अपहरण कर बलात्कार किया जा रहा है. बढ़ते अपराध पर रोक लगाने में नाकामी से भी अब युवतियां हताश हो चुकी हैं. ऐसे में वे खुद की हिफाजत के लिए खुद आगे आने व हथियार उठाने को मजबूर हैं.

समाज में तेजी से आ रहे इस बदलाव को देखते हुए क्या अब यह समझ लेना चाहिए कि युवतियों को अपनी हिफाजत के लिए खुद ही हथियार उठाने होंगे? अगर ऐसा है तो देश में पुलिस का क्या काम है? क्या युवतियों के पास हथियार उठाने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है? युवतियां हथियार न उठाएं, तो खुद की हिफाजत के लिए क्या करें?

गौरतलब है कि दिल्ली में हुए गैंगरेप हादसे के बाद युवतियों ने हथियार रखने की जरूरत पर जोर दिया है. आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो जयपुर में 2011 से कमिश्नरेट लागू होने के बाद से अब तक 2,368 महिलाएं आर्म लाइसैंस के लिए अप्लाई कर चुकी हैं, जिन में से 648 को लाइसैंस मिल भी चुका है. वहीं देश के दूसरे शहरों में भी आर्म लाइसैंस के लिए अप्लाई करने वाली महिलाओं की तादाद में पिछले 2-3 साल में तेजी से बढ़ोतरी हुई है.

सैल्फ डिफैंस ट्रेनर रिचा गौड़ बताती हैं कि पिछले 2 साल में मार्शल आर्ट व कराटे में युवतियों की भागीदारी 70 फीसदी तक बढ़ी है. मैं राजस्थान पुलिस एकेडमी समेत कई शिक्षण संस्थानों में युवतियों को सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग दे रही हूं. हम कुल 4 युवतियों ने मिल कर सैल्फ डिफैंस ट्रेनिंग की शुरुआत की थी, आज हमारे ग्रुप से 65 युवतियां जुड़ी हुई हैं, जो ट्रेनर के रूप में युवतियों को ट्रेनिंग दे रही हैं.

जयपुर की पुलिस अफसर शिल्पा चौधरी का कहना है, ‘‘खुद की रक्षा के लिए हथियार से ज्यादा आत्मविश्वास की जरूरत होती है. युवतियों को सैल्फ प्रोटैक्शन के लिए खुद को तैयार करना है, तो उन्हें सैल्फ डिफैंस ट्रेनिंग लेनी चाहिए. कराटे और मार्शल आर्ट सीखना चाहिए, ताकि मुसीबत के समय वे खुद की रक्षा कर सकें. पर मालूम रहे कि 4 इंच से बड़ा चाकू या कोई हथियार रखना गैरकानूनी है.’’

पिस्टल शूटर राजश्री चूड़ावत का कहना है, ‘‘शूटर होने के कारण मेरा सैल्फ कौन्फिडैंस हमेशा बेहतर रहता है. हालांकि जिस पिस्टल से हम शूट करते हैं, वह पिस्टल बदमाशों पर फायर करने के काम नहीं आती, लेकिन फिर भी कहीं अकेले जाते हैं तो मन में सुरक्षा की भावना रहती है. कम से कम इस पिस्टल से बदमाशों को डराने का काम तो किया ही जा सकता है. हालांकि अभी तक कोई ऐसा हादसा मेरे साथ नहीं हुआ कि पिस्टल दिखाने की जरूरत पड़ी हो, लेकिन कभी ऐसा मौका पड़ेगा तो मैं चूकूंगी नहीं. कहीं भी रेप जैसे मामले सामने आते हैं, तो मेरा खून खौल उठता है. हालिया हालात को देखते हुए युवतियों के लिए सैल्फ प्रोटैक्शन बहुत जरूरी है.’’

इस मामले में रिटायर जिला और सैशन जज अजय कुमार सिन्हा का कहना है, ‘‘सरकार और पुलिस प्रशासन युवतियों को सुरक्षा देने में नाकामयाब हैं. यही वजह है कि युवतियों को आज कोमल हाथों में हथियार थामने पर मजबूर होना पड़ रहा है. युवतियों का पुलिस प्रशासन से भरोसा उठ रहा है. मेरा मानना है कि हथियार रखने के बजाय युवतियों को सैल्फ डिफैंस की ट्रेनिंग लेनी चाहिए.’’

राजस्थान यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफैसर सोहन शर्मा का कहना है कि युवतियों को समाज में हमेशा से ही सभ्य, शालीन और शांत स्वभाव का माना जाता रहा है, लेकिन अब आने वाले समय में यह सोच बदल जाएगी. इस का जिम्मेदार भी समाज खुद ही होगा. घर के बाहर ही नहीं, घर के भीतर भी युवतियां सुरक्षित नहीं हैं. तमाम तरह के रिश्ते भी आज के दौर में तारतार हो रहे हैं. ऐसे में युवतियां खुद की हिफाजत के लिए हथियार उठाने को विवश हो रही हैं.                

बचें आंखों पर डिजिटल इफैक्ट से 

यदि आप को आंखों में लाली, खुजलाहट, आंखों से पानी आना, थकान और बारबार सिरदर्द जैसी समस्याएं सताती हैं, तो सावधान हो जाएं क्योंकि ऐसा कंप्यूटर, स्मार्टफोन, टैबलेट, ईरीडर जैसी डिजिटल डिवाइसेज पर लगातार नजर गड़ाए रखने के कारण हो सकता है. लोग आंखों की थकान जैसे लक्षण बढ़ने की शिकायत कर रहे हैं. डिवाइसेज पर कई बार हम एकटक नजर गड़ाए रहते हैं और इस के कारण हमारी आंखों पर बहुत ज्यादा जोर पड़ता है. लोग अपने लैपटौप पर काम करते हुए टैलीविजन भी साथसाथ देखते रहते हैं और साथ ही बीचबीच में सोशल मीडिया अपडेट के लिए अपने स्मार्टफोन में भी झांकते रहते हैं.

डिजिटल डिवाइसेज के बढ़ते इस्तेमाल को देखते हुए बाजार में आप की आंखों की सुरक्षा के लिए कई उत्पाद पेश किए हैं, जिन में डिजिटल ओवरलोड का असर कम करने वाले उत्पाद भी शामिल हैं, लेकिन आंखों की बढ़ती थकान से बचने के लिए कुछ बेसिक उपायों का भी पालन करना जरूरी है. प्रस्तुत हैं, कुछ खास टिप्स :

बीचबीच में उठ कर ब्रेक लेते रहें

आजकल सारा काम कंप्यूटर पर ही निर्भर हो गया है इसलिए लोग औफिस और घर में भी घंटों कंप्यूटर से चिपके रहते हैं. ऐसे में आंखों को आराम देने के लिए बीचबीच में ब्रेक लिया जा सकता है. दिन के वक्त मीटिंग और विचारविमर्श के सत्रों में हिस्सा लें, साथ ही लंच के दौरान अपनी स्क्रीन से दूर रहें. हर एक घंटे बाद कुछ देर के लिए अपने डैस्क से हटना तथा अपने कंप्यूटर से दूरी बनाए रखना भी जरूरी है.

स्क्रीन की रोशनी कम करें

मौनिटर की अधिक रोशनी आप की आंखों पर दबाव बढ़ा सकती है. खिड़कियों में परदे लगाने, अपने कमरे में तेज रोशनी वाले स्रोत से बचने तथा मौनिटर स्क्रीन पर ग्लेयर फिल्टर लगा कर आप इस की चमक कम कर सकते हैं. स्क्रीन पर जितनी कम चमक रहेगी, उतना ही आप की आंखों पर तनाव भी कम पड़ेगा.

सोशल मीडिया की लत कम करें

हमारे डिजिटल डिवाइसेज से कई जरूरी काम निबट जाते हैं, लेकिन वहीं इन में समय का एक बड़ा हिस्सा हम फेसबुक, ट्विटर तथा व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया नैटवर्क पर भी खर्च करते हैं. युवाओं को तो हर समय अपने स्मार्टफोन से चिपके  देखा जा सकता है. यदि आप इस तरह की लत को कम कर लें तो प्रतिदिन बेवजह डिजिटल डिवाइस से चिपके रहने का एक घंटा बचा सकते हैं.

सुरक्षात्मक चश्मे का इस्तेमाल करें

जरूरत के अनुकूल चश्मे का लैंस इस्तेमाल करें जो आप की आंखों को डिजिटल ओवरलोड, नुकसानदेह नीली रोशनी, तनाव और थकान से सुरक्षा प्रदान करेगा. ऐसी जरूरतों के लिए इनोवेटिव लैंस तैयार किए गए हैं. इन लैंसों के इस्तेमाल से आंखों को बचाया जा सकता है. ऐसे लैंस हमारी आंखों को नुकसानदेह नीली रोशनी तथा यूवी किरणों से बचाते हैं.

स्मार्टफोन बिस्तर पर न ले जाएं

यह भी एक ऐसी आदत है जो न सिर्फ आंखों पर डिजिटल तनाव बढ़ाती है बल्कि हमारी नींद में भी खलल डालती है. अत: बिस्तर पर जाने से आधा घंटा पहले ही अपने फोन को दूर रख दें.

– शिव कुमार

बर्थडे स्पेशल: लिरिल गर्ल से जुड़ी खास बातें

बॉलीवुड की प्रीटी गर्ल यानि की प्रीति जिंटा आज 42 साल की हो गईं हैं. प्रीति आज भले ही कामयाबी के शिखर पर हों लेकिन उनकी शुरूआती जिंदगी कांटो से भरी रही है. जिन हालात का सामना कर प्रीति ने अपनी जिंदगी में बुलंदियां हासिल की हैं, वो हर लड़की के बस की बात नहीं है. आज प्रीति के जन्मदिन के मौके पर हम आपको उनके जिन्दगी से जुड़ी बेहद खास बातें बताते हैं, जो आपने शायद ही पहले कभी सुने होंगे.

प्रीति का जन्म 31 जनवरी 1975 को शिमला में हुआ. प्रीति के पिता आर्मी में थे. लेकिन अभी प्रीति ने दुनिया को देखना, समझाना शुरू ही किया था की उनके सर से माता पिता का साया उठ गया. महज 13 साल की उम्र में प्रीति के माता पिता का कार एक्सीडेंट हुआ जिसमें उनके पिता की मृत्यु हो गई और मां घायल हुईं. करीब दो साल बाद यानि की 15 साल की उम्र में मां ने भी प्रीति का साथ छोड़ दिया. हालात बेहद बदतर थे, लेकिन इन्ही हालातों ने प्रीति को कुछ बनने की प्रेरणा दी.

प्रीति को अपने साथ साथ अपने दो भाइयों का भी ख्याल रखना था. प्रीति ने ठान लिया की उन्हें कुछ बड़ा बनना है. प्रीति ने शिमला से इंग्लिश ऑनर्स की डिग्री हासिल की और फिर मॉडलिंग शुरू कर दी.

काफी संघर्ष करने के बाद उन्हें एक चॉकलेट के विज्ञापन में मौका मिला. इसके बाद 1997 में प्रीति को लिरिल के ऐड में भी काम मिला . इस ऐड ने प्रीति को लिरिल गर्ल के तौर पर पहचान दिलाई.  निर्देशक मणिरत्नम ने प्रीति के अंदर एक एक्ट्रेस को देखा और उन्हें फिल्म ‘दिल से’ में शाहरुख खान के साथ काम करने का मौका मिला.

पहली ही फिल्म में प्रीति को बेस्ट डेब्यू का अवार्ड मिला. इसके बाद प्रीति बॉलीवुड की टॉप की एक्ट्रेस भी बनीं.

प्रीति की कुछ चुनिंदा फिल्में..

दिल से

सोल्जर

कल हो ना हो

वीर जारा

इश्क इन पैरिस

हैप्पी एंडिंग

कभी अलविदा ना कहना

सलाम नमस्ते

कोई मिल गया

मिशन काश्मिर

लक्ष्य

मुझे संवाद रटने की जरूरत नहीं पड़ती: मोहम्मद सउद

‘‘स्टार प्लस’’ पर 26 जनवरी से हर शाम साढ़े छह बजे प्रसारित हो रहे सीरियल ‘‘मेरी दुर्गा’’ में दुर्गा के साथ स्कूल में पढ़ने वाले तथा दुर्गा की बदमाश मानी जाने वाली चार सदस्यीय टीम का हिस्सा बंसी ने महज चार एपीसोड के प्रसारण में ही हर किसी को अपना दीवाना बना लिया है. जबकि बंसी का किरदार निभा रहे बाल कलाकार मोहम्मद सउद ने अभिनय की कोई ट्रेनिंग नहीं ली है. तो फिर उसके अभिनय के लोग दीवाने क्यों हो रहे हैं? इसकी मूल वजह यह है कि वह उस वक्त से अभिनय करते आ रहा है, जब वह अभिनय का नाम तक नहीं जानता था. मोहम्मद सउद का दावा है कि उसकी मां ने ही उसे बताया कि उसका जन्म गुजरात के अहमदाबाद शहर में हुआ था और वह दो माह की उम्र से ही विज्ञापन फिल्मों में अभिनय करने लगा था.

कक्षा सातवीं के छात्र तेरह वर्षीय मोहम्मद सउद ने विज्ञापन फिल्में करते करते सीरियल ‘‘जय जय बजरंग बली’’ में राम का किरदार निभाकर टीवी पर कदम रखा. उसके बाद से वह ‘कुमकुम भाग्य’, ‘एक था राजा एक थी रानी’, ‘प्रतिज्ञा’ सहित कई सीरियलों में अभिनय कर चुके हैं. इतना ही नहीं मोहम्मद सउद ने फिल्म अभिनेता इमरान हाशमी के साथ एक सीरियल में प्रमोशनल एपीसोड किया था, उसके बाद उसे फिल्म‘‘अजहर’’ में मो. अजहरुद्दीन के बचपन का किरदार निभाने का अवसर मिला. इसके अलावा मोहम्मद सउद ने जैगम इमाम की शिक्षा को बढ़ावा देने वाली और मदरसा व कंवेंट शिक्षा को लेकर बनायी गयी फिल्म ‘‘अलिफ’’में भी मुख्य भूमिका निभाई है. यह फिल्म तीन फरवरी को पूरे देश के सिनेमाघरों में प्रदर्षित हो रही है. इस फिल्म के लिए उसे सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का इंटरनेशनल अवार्ड भी मिल चुका है.

सीरियल ‘‘मेरी दुर्गा’’ तो दुर्गा नामक लड़की की कहानी है. इसमें आप क्या कर रहे हो?

आप एकदम सही कह रहे हैं. सीरियल के नाम के अनुरूप इसकी कहानी दुर्गा के इर्द गिर्द घूमती है. मगर हकीकत यह है कि यह सीरियल हरियाणा की पृष्ठभूमि की कहानी है, जो कि लड़कियों को पढ़ाने का संदेश देता है. इस सीरियल में लोग मुझे बंसी के किरदार में देख रहे हैं. बंसी और उसके दो जिगरी दोस्त हैं. जो कि दुर्गा के ही गांव में रहते हैं और दुर्गा के ही साथ एक ही कक्षा में पढ़़ते हैं. यानी कि दुर्गा की यह चार सदस्यीय टोली है. जो कि आपको पूरे गांव व स्कूल में एक साथ हमेशा नजर आते रहेंगे. अब बंसी और दुर्गा के बीच किस तरह कारिश्ता आगे बढ़ेगा, किस तरह की रोचक घटनाएं होने वाली हैं, वह सब जानने के लिए तो सीरियल ‘‘मेरी दुर्गा’’देखना ही पड़ेगा. मगर यह सच है कि इस सीरियल में मेरा बंसी का किरदार  भी अहम है.

सीरियलों में किन किन लोगों के साथ काम कर चुके हो?

शब्बीर अहलूवालिया, दृष्टि धामी, श्रृति झा, सिद्धांत, उपासना सिंह सहित कई कलाकारों के साथ काम करते हुए इंज्वाय किया है.

सेट पर बड़े कलाकारों के साथ आप काम करते हैं. उनसे आपकी किस तरह की बातचीत होती है?

मेरे लिए सेट पर कलाकार बड़े नही होते हैं. सब मेरे भाई या बहन होते हैं. मसलन मैं इमरान हाशमी को इमरान भइया, शब्बीर आहलुवालिया को शब्बीर भइया ही या दृष्टि धामी को दृष्टि दीदी ही कहता हूं. यह सभी मुझे सेट पर अपने छोटे भाई की तरह प्यार देते हैं. हमारे साथ मस्ती मजाक भी करते हैं. हम खेल भी करते हैं. सच कहूं तो जब हम सेट पर शूटिंग करते हैं, तो मुझे यह नहीं लगता है कि हम कोई बड़ा काम कर रहे हैं. हां! जब सीरियल प्रसारित होता हैं या फिल्म रिलीज होती है, तो पता चलता है कि हां मैंने कुछ काम किया था. हम सेट पर अपने कलाकारों के साथ स्क्रिप्ट को लेकर भी चर्चा करते हैं. शब्बीर भईया और दृष्टि दीदी के साथ तो हम सेट पर खूब मस्ती करते हैं. उपासना दीदी के साथ तो हम सेट पर मस्ती के साथ साथ पढ़ाई भी कर लेते हैं. गौरव शर्मा भइया तो सिर्फ मस्ती ही करते हैं. हां! इमरान हाशमी भइया के साथ थोड़ी मस्ती कम हुई थी. वह कम बोलते हैं और थोड़ा गंभीर किस्म के हैं.

सेट पर कभी ऐसा भी हुआ होगा कि आप चार पांच बच्चों का सीन है. तो कभी आप संवाद भूल जाते होंगे. या कभी आपका दूसरा साथी संवाद भूल जाता होगा?

अब तक तो मैं कभी अपने संवाद नहीं भूला. पर जब मेरा कोई दूसरा दोस्त अपना संवाद भूलता है, तो हम उसे चियरअप करने की कोशिश करते हैं. मैं तो उसे उसका संवाद याद दिलाने की कोशिश करता हूं.

तो क्या आप दूसरे बच्चों के भी संवाद याद कर लेते हो?

ऐसा नही है. सेट पर सहायक निर्देशक हम लोगों को संवाद सुनाया करते हैं. जिसके चलते हम अपने दोस्त के उन संवादों को दोहरा देते हैं. इसके अलावा सामने वाला कोई शब्द भूल रहा है, तो हम अपने होंठ चलाकर भी उसे बता सकते हैं. कई बार तो मैं भी अपने साथी को सीन के बारे में समझा देता हूं कि कैसे करना चाहिए. तो वहीं सेट पर जब शब्बीर आहलुवालिया भइया हों, तो वह मुझे सीन के बारे में समझा देते हैं.

क्या आप अपने संवाद रटते हो?

संवाद रटने की जरूरत नहीं पड़ती. सब कुछ एकाग्रता वाली बात है. हम सुबह सेट पर पहुंचते हैं. निर्देशक उस दिन की पूरी स्क्रिप्ट हमें दे देते हैं. हम स्क्रिप्ट को दो तीन बार पढ़ लेते हैं. उसके बाद जब मेरे सीन कीशूटिंग होती है, तब हम अपने सीन के संवाद को दो तीन बार पढ़ते हैं. फिर रिहर्सल में चार पांच बार संवाद दोहराते हैं. रटने की जरूरत नहीं पड़ती है. रिहर्सल के दौरान निर्देशक बताते हैं कि हमें किस तरह मूव करना है.

इसके बाद क्या करने वाले हो?

यह कहना मुश्किल है. जब तक दर्शक हमें पसंद करेंगे, तब तक हम ‘मेरी दुर्गा’ में बंसी के किरदार में नजर आते रहेंगे. वैसे एक सीरियल के पायलट एपीसोड की शूटिंग कलकत्ता में कर चुका हूं. पर इस सीरियल का प्रसारण कब शुरू  होगा, इसकी जानकारी मुझे नहीं है.

मैं किसी ‘स्टार लिस्ट’ में नहीं हूं: सोनू सूद

व्यवसायी परिवार से संबंध रखने वाले सोनू सूद लुधियाना, पंजाब के हैं. फिल्मी बैकग्राउंड से न होने के बावजूद उन्होंने फिल्मों में अपनी पहचान बनायीं. वैसे तो उन्होंने इलेक्ट्रोनिक इंजीनियरिंग में बीटेक किया है, लेकिन बचपन से ही उनकी इच्छा एक्टर बनने की थी. माता-पिता चाहते थे कि वे अपनी पढाई पूरी करें. उन्होंने वैसा ही किया और मॉडलिंग के बाद फिल्मों की ओर रुख किया. बॉलीवुड में उनकी पहली फिल्म ‘शहीद-ए-आज़म’ थी, जिसमें उन्होंने भगत सिंह की भूमिका निभाई थी. इसके बाद उन्होंने कई फिल्में की. जिसमें जोधा अकबर, सिंह इज किंग, एक विवाह ऐसा भी, शूटआउट एट वडाला, हैप्पी न्यू इयर, दबंग, गब्बर इज बैक आदि प्रमुख हैं. उन्होंने हिंदी के अलावा कन्नड़ा, तमिल, तेलगू, पंजाबी आदि भाषाओं में भी फिल्में की हैं.

साल 2016 में उन्होंने अपना प्रोडक्शन हाउस ‘शक्ति सागर प्रोडक्शन्स’ अपने स्वर्गीय पिता शक्ति सागर के नाम पर खोला है. सोनू सूद अपनी बॉडी को लेकर काफी सजग रहते हैं और फिटनेस पर काफी ध्यान देते हैं. यही वजह है कि अभिनेताओं की अच्छी बॉडी की लिस्ट में उनका नाम भी शामिल है. इन दिनों वे ‘कुंग फु योगा’ फिल्म को लेकर काफी उत्सुक हैं, जिसमें उन्होंने अभिनेता जैकी चैन के साथ अभिनय किया है, साथ ही वे उस फिल्म के निर्माता भी हैं. अपने ‘फिट एंड फाइन’ अंदाज़ में वे सामने आये, बातचीत रोचक थी, पेश है अंश.

प्र. इस प्रोजेक्ट में आप कैसे शामिल हुए, इसमें शामिल होने की खास वजह क्या थी?

मुझे एक दिन फोन आया कि हम जैकी चैन की एक फिल्म बना रहे हैं जिसमें ‘फिट एक्टर’ की लिस्ट में आपका नाम सबसे ऊपर है. उन्होंने स्क्रिप्ट भेजी, वीडियो कांफ्रेंसिंग पर बात हुई और मैं इसमें शामिल हो गया. इस फिल्म की खास आकर्षण मेरे लिए अभिनेता जैकी चैन और निर्देशक स्टैनले टोंग है, जो बहुत ही कमाल की एक्शन फिल्म बनाते हैं. मुझे बहुत इच्छा थी कि अगर मुझे एक्शन फिल्म करनी है तो जैकी चैन की फिल्म में काम करना है और वह सपना जो मैंने बचपन से देखा था, वह पूरा हो रहा है. उनकी सारी फिल्में मैंने देखी है.

प्र. किस प्रकार की तैयारी की है?

मैंने बीजिंग में करीब सात से आठ महीने जैकी चैन स्टाइल कुंग फू सीखने के लिए गया हूं. सुबह चार से पांच बजे उठकर माइनस दस डिग्री तापमान में रोज प्रैक्टिस करता था. यह केवल फिल्म के लिए ही नहीं किया बल्कि आगे भी मैं ऐसे एक्शन को भारत में ला सकता हूं. मैंने चाइनीज भाषा भी सीखी है.

प्र. आपके करियर में इतने उतार-चढ़ाव आये, फिर भी आप डटे रहे और काम करते रहे, इसे कैसे देखते हैं?

ये सही है कि मैं छोटे शहर से आया था. लेकिन माता-पिता का सहयोग हमेशा रहा, उनके सपोर्ट के बिना मैं यहां तक नहीं पहुंच सकता था. काम मिलेगा, इसी विश्वास के साथ मैं यहां आया था और धीरे-धीरे रास्ते खुलते गए. मैं तो एक इंजीनियर था, पर मेरी कद-काठी को देखकर दोस्त हमेशा एक्टर बनने की सलाह देते थे. मैंने भी पढ़ाई पूरी करने के बाद सोचा कि चलो एक साल कोशिश करते हैं, अगर सही हुआ तो यही रहेंगे, नहीं तो वापस जायेंगे. एक साल कैसे सालों में बदल गया पता ही नहीं चला.

प्र. मुंबई आने के दौरान सबसे अधिक संघर्ष कहां था?

मैंने फिल्म की प्रोसेस को बहुत एन्जॉय किया है, लेकिन जब आप परिवार से दूर रहते हैं, तो आप अपनी सारी बातें फोन पर ही शेयर कर पाते हैं, ऐसे में आप उन्हें अच्छी बातें ही शेयर करते हैं. कठिनाइयों को आप बता नहीं पाते. वहीं अधिक ‘मिस’ करता था, वहीं संघर्ष था. यह सिर्फ मेरे लिए ही नहीं, बल्कि हर बाहर से आने वाले एक्टर कर लिए मुश्किल होता है.

प्र. इस फिल्म का प्रोडक्शन आप कर रहे हैं, निर्माता बनना कितना मुश्किल होता है?

ये सही है कि कठिन है, लेकिन मुझे करना था. मैंने जैकी चैन को बीजिंग से चार्टेड प्लेन से मुंबई लाया, मुझे याद आता है जब मैं पहली बार मुंबई आया था तो मेरे पास टिकट का रिज़र्वेशन नहीं था. मैं लुधियाना से चलने वाली डिलक्स ट्रेन के चालू टिकट में आया था. इस तरह ये जर्नी बुरी नहीं है, भले ही मैं बड़े स्टार लिस्ट में शामिल नहीं हुआ हूं, लेकिन जो भी मेरी जिंदगी में हुआ है, उस दौरान मुझे सीखने को बहुत कुछ मिला है. मैंने इस फिल्म की डिस्ट्रीब्यूशन को भी संभाला हुआ है. फिल्म को बनाना एक ‘थीसिस’ लिखने जैसा है, जिसे एक पेन से लेकर हॉल तक जाकर खत्म होती है. इसका श्रेय मैं अपने पिता को देता हूं, जो एक व्यवसायी थे,‘सेल्फ मेड’ थे. उनका कुछ असर मुझपर भी पड़ा है. इसके अलावा मैंने बहुत काम सीखा हुआ है, जब मुंबई आया था तो काम कम था. उस दौरान मैंने कैमरे को पकड़ना, साउंड रिकॉर्डिंग, एडिटिंग आदि फिल्म की सारी बारीकियां सीख ली हैं. मेरे घर में इस तरह की कई किताबें भी रखी हुई हैं. मैं इंजीनियरिंग बैकग्राउंड का हूं और मुझे सीखने की बहुत इच्छा रहती है. जिसका लाभ अब मुझे मिल रहा है.

प्र. क्या जीवन में कोई मलाल रह गया है?

(भावुक होकर) जिंदगी में मलाल यही रहेगा कि जो सफलता मुझे मिली, मेरे माता-पिता उसे देखने के लिए नहीं रहे.

प्र. क्या कोई ड्रीम प्रोजेक्ट है?

मैं एक बायोपिक बनाना चाहता हूं.

प्र. परिवार के साथ समय कैसे बिता पाते हैं?

मैं बहुत व्यस्त रहता हूं, लेकिन समय मिलने पर परिवार के साथ रहता हूं.

प्र. आपकी फिटनेस का राज क्या है?

मेरी फिटनेस की वजह मेरे मुंह पर एक जिप का लगना है, जो कुछ भी खाने नहीं देती. मैं पूरे दिन में तीन घंटे जिम करता हूं, कितना भी व्यस्त रहूं, जिम अवश्य जाता हूं.

प्र. यूथ के लिए क्या मेसेज देना चाहते हैं?

मैं यूथ से यह दुआ करता हूं कि सपने आप देखे, पर मेहनत खूब करें. सपने अगर टूटते हैं, तो अपने आप को और अधिक मजबूत करना सीखे. साथ ही यह सिद्ध करने की कोशिश करें कि दुनिया की कोई भी ताकत आपको आगे बढ़ने से रोक नहीं सकती. कर्म करते रहें, फल अपने आप मिल जायेगा.

ताकि सफर में भी बनी रहे खूबसूरती

आप घूमने जा रही हैं, तो जरूरी है कि आप ब्यूटीफुल भी दिखें. यहां हम आपको कुछ टिप्स बता रहे हैं, जो ट्रिप के दौरान आपकी खूबसूरती बनाए रखेंगे.

मॉइश्चराइजर का करें इस्तेमाल

आप घूमने जा रही हैं, तो जाहिर है कि आपके फोटो भी अच्छे आने चाहिए. ऐसे में जरूरी है कि आपकी स्किन हाइड्रेट होती रहे. ट्रैवल से पहले स्किन को अच्छी तरह मॉइश्चराइज करें, क्योंकि घूमने के बाद डिहाइड्रेशन का असर साफ दिखने लगता है.

फाउंडेशन ना लगाएं

ट्रिप के दौरान फाउंडेशन को स्किप करें. इसकी बजाय सिर्फ मॉइश्चराइजर ही लगाएं. हेल्दी लुक पाने के लिए टिंटेड मॉइश्चराइजर लगाएं. अगर आप रेग्युलर फाउंडेशन यूज करती हैं और बिना इसके आपको अटपटा-सा लगता है, तो इससे प्राइमर लगाएं. इसकी सिलिकॉन बेस्ड लिक्विड या क्रीम लेयर स्किन और मेकअप के बीच प्रोटैक्शन लेयर का काम करेगी. इससे फाउंडेशन भी ज्यादा देर तक टिका रहेगा.

दुबारा मेकअप ना करें

मेकअप को रिफ्रेश करने के लिए दुबारा मेकअप न करें. न ही फाउंडेशन और फेस पाउडर दोबारा लगाएं. इसकी बजाय आप मिनरल वॉटर का बेस लगाकर स्किन को फ्रेश लुक दे सकती हैं.

ब्लॉटिंग पेपर

ऑयली स्किन को कंट्रोल करने के लिए अपने साथ ब्लॉटिंग पेपर रखें. इसे हल्के हाथ से फेस पर लगाकर एक्स्ट्रा ऑयल रिमूव कर सकती हैं.

लिप बाम

लिप्स को सॉफ्ट और शाइनी बनाए रखने के लिए लिप बाम का यूज करें. इससे आपको फ्रेश लुक मिलेगा.

खूब पानी पीएं

इसके साथ ही अपने हाईजीन का भी ख्याल रखें. हैंड सेनिटाइजर और डेटॉल जरूर कैरी करें. वहीं, ट्रैवलिंग के दौरान ग्रीन वेजिटेबल सलाद और एनर्जी ड्रिंक का सेवन करें. साथ ही आप खूब पानी पीएं.

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