कीर्तन की महिमा

कीर्तन यानी भरपूर मनोरंजन, एक पब्लिक फंडा. जहां कहीं भी कीर्तन होता है, औरतों की मंडली सजधज कर ढोलमंजीरे ले कर तुरंत पहुंच जाती है.

‘‘मिसेज सोढी ने यही साड़ी कल भी पहनी थी. लगता है, यह इन की ‘लकी’ साड़ी है. चलोजी, अब कीर्तन की शुरुआत होने जा रही है. सब लोग शांत हो जाएं. जोर से बोलें, ‘जय मातादी’, ‘जय मातादी’.’’

ढोलमंजीरे बजा कर कीर्तन का शुभारंभ हुआ. इसी के साथ नाचगाना भी शुरू हुआ. साथ ही शुरू हुआ खुसुरफुसुर का दौर.

‘‘अरे, जरा शर्माइन को तो देखो. क्या बोल्ड लग रही है… कैसे पल्लू गिरा कर नाच रही है.’’

‘‘अरी, गुप्ताइन को तो देखो, नजर वाला मोटे लैंसों वाला चश्मा लगाए कैसे उछलउछल कर नाच रही हैं. कहीं चश्मा ही न गिर जाए. और उस मटको को तो देखो, ‘मारा ठुमका बदल गई चाल मितवा, देखोदेखो रे हमरा कमाल मितवा…’ वह तो ऐसे नाच रही है मानो डीजे चल रहा हो. कुछ मोटियां बैठेबैठे ही मटक रही हैं.’’

तभी मंडली के लीडर की आवाज आती है, ‘‘कृपया बातें न करें. वरना बाहर चले जाएं.’’

फिर जयमाता के नारों की आवाज तेज हो जाती है, ‘जय मातादी, जय मातादी’, ‘मां मेरी लाज रखना, मां मेरी लाज रखना’.’’

‘‘अरे, ‘लाज’? भला लाज आजकल रही ही कहां है. आजकल तो बेशर्मों का जमाना है, बेशर्मों का,’’ रमा बोली.

‘‘क्या हुआ? जरा हमें भी तो बता,’’ विमला ने पूछा.

‘‘अरी, वह मिसेज चोपड़ा नहीं हैं जो दूसरों की लड़कियों पर अकसर उंगली उठाती रहती थी. उस की लड़की भाग गई और वह भी पड़ोस के लड़के के साथ. कहते हैं, छज्जेछज्जे का प्यार था… बेचारी किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रही,’’ रमा बोली.

‘‘अरे, तू ने मिसेज गुप्ताइन को देखा, कैसे सेठानी बन कर घूमती रहती है. घर में बहू नौकरानी बनी घर का काम करती रहती है. और वह शर्माइन, उसे तो कतई लोकलाज नहीं है, विधवा है, मगर कोई नहीं कह सकता कि वह विधवा है. लाल चूडि़यां, गुलाबी साड़ी, पैरों में पायलें पहने सज कर आदमियों पर डोरे डालती रहती है. और यह कल्लो कमला, जरा तेवर तो देखो महारानी के… किसी से सीधे मुंह बात नहीं करती,’’ विमला ने बताया.

 

तभी उधर से आवाज आई, ‘‘मुंह पर ताला लग जाए ‘अलीगढ़’ वाला, जो जोर से न बोले ‘माता तेरी जय.’ बोलो ‘माता की जय’.’’

माता की जयजयकार के बाद फिर कीर्तन शुरू हो गया. उधर साथ ही औरतों की खुसुरफुसुर भी चल पड़ी. तालियां तो माता के भजन के लिए बज रही थीं, लेकिन मुई जबान बातों के चटखारे लेने से बाज नहीं आ रही थी.

‘‘अरी, उस मालती को देख, यह तो मुझे फूटी आंख नहीं भाती. खुद तो खूब सजधज कर इधरउधर मटकती फिरती है और खसम बेचारा फटी बनियान में घूमता रहता है. उस की हालत नौकरों की तरह बना रखी है.’’

यहां तो बातों की पूरी थाली परोसी हुई थी. बीचबीच में होश आता है तो ‘जय मातादी’ बोल देते हैं.

बीचबीच में लोगों का आनाजाना भी लगा हुआ था, ‘‘अरेअरे, निझावनी को तो देखो, आती सब के बाद में है, लेकिन बैठती है सब से आगे जैसे कि कीर्तन वही करा रही हो,’’ एक अन्य महिला बोली.

फिर माइक से आवाज आती है, ‘‘जिन्हें बातें करनी हों वे बाहर जा कर करें. यहां का माहौल खराब न करें. बोलो, ‘जय माता दी’. जो न बोले, उस का मुंह सिल जाए.’’

तभी फिर एक महिला की खुसुरफुसुर सुनाई दी, ‘‘अरी, कमबख्तों ने पानी तक को नहीं पूछा. गला सूख गया… पता नहीं बाद में चायवाय का भी इंतजाम किया है या नहीं.’’

तभी मंडली के नेता का स्वर तेज हो गया, ‘‘बोलो, ‘जय माता दी.’ आप सब माता की भेंट देना शुरू कर दें. 100 रुपए देंगी लाख मिलेंगे.’’

थोड़ी देर बाद जब कीर्तन का समय समाप्त होने को हुआ तो फिर एलान हुआ कि अब अरदास करनी है. चढ़ावा चढ़ाने के लिए आगे आएं. मां के दर से कोई खाली हाथ नहीं जाता है. आगे आएं मां के चरणों में शीश नवाएं और चढ़ावा चढ़ाएं.

फिर क्या था, दिखावे के लिए अपने नाम का सिक्का उछालने के लिए लोग बढ़चढ़ कर आगे आए. नोटों की वर्षा होने लगी.

नाचनागाना, ठुमके लगाना… फुल ऐंजौय के साथ कीर्तन में भोग पड़ा.

असल में खुशी तो मंडली के मालिक को थी. जेब ठीकठाक भर गई थी. फिर भी उतनी नहीं जितनी उसे इस इलाके से उम्मीद थी. शायद उसे अगली बार किसी नाचने वाली को खुद भी लाना पड़ेगा ताकि काम बन जाए. 

– सुनीता 

युवकों से वर्जिनिटी क्यों नहीं पूछते

हर युवक या बौयफ्रैंड अपने लिए वर्जिन युवती या गर्लफ्रैंड ही चाहता है. भले ही वह खुद कितनी ही युवतियों की वर्जिनिटी भंग कर चुका हो. साथ ही यह माना जाता है कि यदि युवती वर्जिन है तो ही वह चरित्रवान है, लेकिन युवक के लिए ऐसी कोई शर्त ही नहीं है. उसे तो हमेशा ही वर्जिन माना गया है. आखिर वर्जिनिटी क्या है? युवक क्यों देते हैं इसे इतनी अहमियत? इस का युवती के चरित्र से क्या संबंध? ऐसे बहुत सारे सवालों के जवाब और गलतफहमियों को समझने की जरूरत है.

पिछले साल की बहुचर्चित फिल्म ‘पिंक’ में जब वकील कोर्ट में खुलेआम तापसी पन्नू के किरदार से सवाल करता है कि उस की वर्जिनिटी कब खोई थी, तो वहां सन्नाटा पसर जाता है. भारत में युवकयुवती का फर्क सिर्फ लिंगभेद तक ही सीमित नहीं रहता  बल्कि वर्जिनिटी के सवाल को ले कर भी है.

सैक्स और वर्जिनिटी

गर्लफ्रैंड जब अपने बौयफ्रैंड से मिलती है तो जाहिर है कि आज की जनरेशन सैक्स से परहेज नहीं करती. इसलिए दोनों में उन्मुक्त सैक्स होता है और पारंपरिक रोमांस भी, जब तक दोनों का अफेयर चलता है, कायदे से दोनों ही अपनी वर्जिनिटी खो चुके होते हैं.

बौयफ्रैंड चाहे कितनी ही बार सैक्स कर ले, कितनी ही युवतियों का दिल तोड़े, उस से कभी उस की वर्जिनिटी को ले कर सवाल नहीं पूछा जाता. युवती की शादी में भी कई सवाल पूछे जाते हैं, लेकिन युवक वर्जिन है या नहीं, इस सवाल को कोई नहीं उठाता. वहीं युवती का हर दूसरा बौयफ्रैंड यही उम्मीद रखता है कि उस की गर्लफ्रैंड वर्जिन हो यानी उस ने किसी के साथ सैक्स न किया हो. भले ही युवक ने अपनी ऐक्स गर्लफ्रैंड के साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए हों पर युवती उसे वर्जिन चाहिए.

युवक भी वर्जिन होते हैं

कालेज और क्लास में अकसर स्टूडैंट्स के बीच आम बहस का टौपिक होता है कि उन की गर्लफ्रैंड या क्लासमेट ने अपनी वर्जिनिटी कब खोई थी. बड़े दिलचस्प अंदाज में युवक अंदाजा लगाते हैं कि फलां युवती वर्जिन है या नहीं. अपनी गर्लफ्रैंड बनाने की पहली प्राथमिकता भी वह एक वर्जिन युवती को ही देते हैं, लेकिन वे खुद के गिरेबान में कभी झांक कर नहीं देखते कि वे वर्जिन कहां हैं?

अमिताभ बच्चन इस विषय पर अपनी राय रखते हुए कहते हैं कि अगर युवतियों से उन की वर्जिनिटी, कौमार्य या कुंआरेपन को ले कर सवाल पूछे जाते हैं तो युवकों से भी ये सवाल पूछे जाने चाहिए. इस में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए. वे आगे कहते हैं कि अगर किसी युवती से कुछ पूछा जाता है तो उस पर सवालिया निशान लगता है जैसे उस ने कोई गलत काम कर दिया है, लेकिन जब युवकों का मामला हो तो सवाल विस्मयादिबोधक चिह्न के साथ आता है जैसे उन्होंने कोई महान काम कर दिया हो.

वर्जिनिटी टैस्ट में फेल तो…

आएदिन अखबारों में इस तरह की खबरें पढ़ने को मिल जाती हैं, जहां वर्जिनिटी टैस्ट करने के नाम पर युवती की शादी टूट जाती है या फिर उसे प्रताडि़त किया जाता है. गर्लफ्रैंड और बौयफ्रैंड के रिश्ते भी इसी बात के आधार पर टूट जाते हैं. पिछले दिनों यह खबर आई थी कि महाराष्ट्र के नासिक में एक पति ने शादी के 2 दिन बाद ही अपनी पत्नी को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि वह वर्जिनिटी टैस्ट में फेल हो गई.

इतना ही नहीं युवती वर्जिन है या नहीं इस का फैसला करने के लिए पंचायत के सदस्यों द्वारा शादीशुदा जोड़े को बिस्तर पर सफेद चादर बिछा कर सैक्स करने के लिए कहा जाता है. सैक्स के बाद अगर चादर पर खून के धब्बे नहीं मिलते, तो युवती को वर्जिन नहीं माना जाता. इस मामले में युवक ने अपनी पत्नी के वर्जिनिटी टैस्ट का प्रमाण पंचायत को सौंपा. युवक ने सुबूत के तौर पर वह चादर पंचायत के सामने पेश की. इस चादर पर खून के धब्बे न होने पर पंचायत के सदस्यों ने पति को शादी खत्म करने की अनुमति दे दी.

वर्जिन टैस्ट और भ्रम

आम धारणा है कि जिस युवती ने पहली बार सैक्स कर लिया उस की फीमेल रिप्रोडक्टिव और्गन में पाई जाने वाली हाइमन झिल्ली फट जाती है और ब्लड निकल जाता है. अगर वह झिल्ली न फटे तो उसे वर्जिन होने की निशानी माना जाता है. बस, इसी बात को ले कर गलतफहमी है कि पहली बार सैक्स करते समय गर्लफ्रैंड को ब्लीडिंग हुई तो वह वर्जिन वरना नहीं, जबकि गाइनोकोलौजिस्ट और सैक्स ऐक्सपर्ट मानते हैं कि हाइमन झिल्ली का सैक्स संबंध और वर्जिनिटी से कोई वास्ता नहीं है. 90त्न युवतियों की यह झिल्ली साइकिलिंग, घुड़सवारी, डांस या अन्य शारीरिक क्रियाओं के दौरान फट जाती है. ऐसे में यह कहना कि युवती ने सैक्स किया है, गलत है.

बौयफ्रैंड की भी वर्जिनिटी जांचें

अगर बौयफ्रैंड बातबात पर वर्जिन होने का सुबूत मांगे तो उस का भी वर्जिनिटी का परीक्षण करना चाहिए. इस से न सिर्फ उसे सबक मिलेगा बल्कि वह वर्जिन जैसी बेमतलब की बातों को दोबारा नहीं पूछेगा. लेकिन यह कैसे पता करें? यदि आप को भी बौयफ्रैंड की वर्जिनिटी चैक करनी है तो उस से सवाल करें और उस के व्यवहार को समझें. मसलन, अगर बौयफ्रैंड वर्जिन है तो आप के साथ सैक्स करने में जल्दबाजी नहीं करेगा. सैक्स के दौरान भी काफी असहज दिखेगा. पहली बार संबंध बनाते समय घबराता है या फिर वह पोजीशन नहीं जमा पाता. वह आप के साथ संबध बनाने से कतराएगा, जबकि पहले से सैक्स संबंध बना चुका बौयफ्रैंड आसानी से सैक्स करेगा. वर्जिन बौयफ्रैंड गर्लफ्रैंड से एक दूरी बना कर बात करेगा और कई बार घबराएगा भी, जबकि वर्जिनिटी खो चुका बौयफ्रैंड खुल कर गर्लफ्रैंड को टच करेगा और जबतब सैक्स करने के मौके खोजेगा.

कुल मिला कर युवकयुवती का संबंध प्रेम पर टिका हो न कि सैक्स और वर्जिनिटी के सवाल पर. वर्जिन कोई नहीं होता. किसी ने सैक्स किया होता है और कोई पोर्न फिल्में देख कर खयाली सैक्स करता है इसलिए गर्लफ्रैंडबौयफ्रैंड का रिश्ता भरोसे पर टिका हो और जो युवक युवती से उस की वर्जिनिटी को ले कर सवाल करे उसे पहले युवती को अपनी वर्जिनिटी का सुबूत देना चाहिए.                           

साइकिल, पोशाक और भोजन में फंसी तालीम

बिहार में तालीम को मुफ्तखोरी में फंसा कर रख दिया गया है. हर सरकार स्कूलों और पढ़ाईलिखाई के बरगद को जड़ से दुरुस्त करने के बजाय उस की शाखाओं व पत्तों का रंगरोगन कर के ही अपनी जवाबदेही का पूरा होना मान लेती है. स्कूलों में बच्चों की हाजिरी अच्छी हो, इस के लिए सरकार कभी बच्चों को दोपहर का खाना खिलाती है तो कभी स्कूल ड्रैस बांटती है. लड़कियों को स्कूल जाने के लिए मुफ्त में साइकिल बांटने की योजना भी चलाई जा रही है. कभी सरकार ने यह जानने की जहमत नहीं उठाई कि सरकारी स्कूलों में मास्टर हैं या नहीं? मास्टर स्कूल आते हैं या नहीं? ब्लैकबोर्ड और चौक हैं या नहीं? स्कूलों में बैंच और टेबल दुरुस्त हैं या नहीं?

इस साल मैट्रिक की परीक्षा में आधे से ज्यादा स्टूडैंट फेल हो गए तो उस के बाद से लगातार राज्य की तालीम सिस्टम पर सवाल उठ रहे हैं. पिछले साल कुल 15 लाख 47 हजार 83 छात्रों ने मैट्रिक की परीक्षा में हिस्सा लिया. इस में 8 लाख 32 हजार 332 लड़के और 7 लाख 14 हजार 751 लड़कियां थीं. इस में से कुल 46.66 फीसदी छात्र ही पास हो सके. लड़कों में कुल 54.44 फीसदी और लड़कियों में 37.61 फीसदी ही कामयाब हो सके. 10.86 फीसदी फर्स्ट डिवीजन, 25.46 फीसदी सैकंड डिवीजन और 10.32 फीसदी थर्ड डिवीजन से पास हुए. इस के अलावा 0.009 फीसदी छात्र जैसेतैसे केवल पास होने लायक अंक ला सके.

इतने खराब नतीजों के बाद भी अफसोस करने और अपनी खामियों को दूर करने के बजाय शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी यह कहते हुए अपनी पीठ थपथपाने में मशगूल हैं कि नकल रोकने की वजह से ही नतीजे खराब हुए हैं.

सरकारी स्कूलों और पढ़ाई की गुणवत्ता ही दुरुस्त न हो तो विद्यार्थी क्या और कैसे पढ़ें? बिहार के सरकारी स्कूलों में 2 लाख 15 हजार मास्टरों की कमी है. एक लाख 70 हजार प्राइमरी स्कूलों और 45 हजार मिडिल व हायर मिडिल स्कूलों में मास्टर के पद खाली हैं. उन खाली पदों पर बहाली के लिए केवल तारीख दर तारीख का ही ऐलान होता रहा है. शिक्षा का अधिकार कानून के तहत 35 विद्यार्थियों पर एक मास्टर होना है पर अभी 48 विद्यार्थियों पर एक मास्टर है. उस के बाद भी ज्यादातर मास्टरों को ‘मिड-डे मील’ योजना में लगा दिया गया है. ऐसे में ज्यादातर मास्टर रसोइया बन कर रह गए हैं.

पटना के ही एक सरकारी स्कूल के मास्टर दबी जबान में कहते हैं कि सरकारी स्कूल में शिक्षा के स्तर को गाली देना एक फैशन सा बन गया है. राज्य में ज्यादातर स्कूलों का न अपना भवन है, न ही सुविधाएं हैं. जितने मास्टरों की जरूरत है, उस के आधे भी नहीं हैं. उस के ऊपर से, मास्टरों को कभी जनगणना, कभी वोटर आईडी, कभी पल्स पोलियो मुहिम तो कभी बच्चों को दोपहर का खाना खिलाने के काम में लगा दिया जाता है. ऐसे में मास्टर क्या और कब पढ़ाएं? विद्यार्थी ऐसे में क्या खाक पढ़ेंगे? जब स्कूलों में पूरे सिलेबस की पढ़ाई ही नहीं हुई है तो बच्चे क्या करेंगे? उन्हें और उन के अभिभावक किसी भी तरह से अपने बच्चों को पास कराने व बढि़या अंक दिलाने की जुगाड़ में लग जाते हैं, क्योंकि अंकों के आधार पर ही कालेजों में दाखिला मिलता है.

राहत की एक बात यह है कि पिछले कुछेक सालों में ड्रौपआउट छात्रों में थोड़ी ही सही, पर कमी आई है. लेकिन सरकार तालीम की गुणवत्ता को दुरुस्त करने में नाकाम रही है. साल 2011 से हाई स्कूलों में गणित और विज्ञान के मास्टरों की बहाली का काम लटका हुआ है. पटना जिले के ही फतुहा इंटर स्कूल की बानगी देखिए. साल 1937 में चालू हुए इस स्कूल में 2,500 लड़के और 1,168 लड़कियां हैं. इतने छात्रों को पढ़ाने के लिए केवल 18 मास्टर हैं. मास्टरों के कुल 22 पद 1980 से ही स्वीकृत हैं. इस के बाद भी मास्टरों की बहाली नहीं की जा रही है. ऐसे में बच्चे कैसे और क्या पढ़ते होंगे, इस का अंदाजा लगाया जा सकता है.

सरकार मिडिल स्कूल के एक छात्र पर औसतन साढ़े 4 हजार रुपए सालाना खर्च करती है. हर साल मैट्रिक के छात्रों पर 731 करोड़ रुपया फूंक दिया जाता है. लड़कियों को साइकिल के साथ कई योजनाओं का लाभ दिया जाता है. इस के बाद भी रिजल्ट 44 फीसदी ही है.

बिहार में 72 हजार प्राइमरी और मिडिल स्कूलों में 2 करोड़ बच्चों को मिड-डे मील योजना के तहत दोपहर का खाना दिया जाता है. इस के लिए केंद्र सरकार से हर साल 1,400 करोड़ रुपया मुहैया कराया जाता है. स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ाने के मकसद से शुरू की गई इस योजना के तहत हर दिन खाने का अलगअलग मैन्यू होता है, पर ज्यादातर स्कूलों में खाने के नाम पर बच्चों को खिचड़ी ही खिलाई जाती है. काफी पैसा स्कूल प्रशासन हजम कर जाता है.

मिड-डे मील योजना के राज्य प्रभारी ने 26 मार्च, 2012 को सभी स्कूलों के लिए यह हिदायत जारी की थी कि खाना बनने के बाद उसे प्रिंसिपल, मास्टर और रसोइया चखेंगे. उस के बाद ही उसे बच्चों को परोसा जाएगा. इस का कहीं भी पालन नहीं होता है. अगर इस का पालन होता तो छपरा में इतने बच्चों की मौत नहीं होती.

इस फर्जीवाड़े से सरकार के उस दावे की भी हवा निकल गई है जिस में कहा जाता रहा है कि पिछले 5-6 सालों में स्कूलों में बच्चों के दाखिला लेने का आंकड़ा तेजी से बढ़ा है. सर्वशिक्षा अभियान के बिहार में तेजी से कामयाबी मिलने का ढिंढोरा पीटने वाले सरकारी आंकड़ेबाजी की असलियत सामने आ गई है.

भाजपा नेता और सूबे के उपमुख्यमंत्री रह चुके सुशील कुमार मोदी कहते हैं कि तरक्की का ढोल पीटने वाली सरकार की पोल उस की ही कारगुजारियों से खुल गई है. स्कूलों में बच्चों के दाखिले और उपस्थिति के अंतर के घपले की जांच सीबीआई से कराने पर ही दूध का दूध और पानी का पानी हो सकेगा. पढ़ाईलिखाई की व्यवस्था को पूरी तरह से दुरुस्त किए बगैर तालीम की हालत सुधरनी मुमकिन नहीं है.

बिहार में सरकारी स्कूलों और कालेजों में पढ़ाईलिखाई की बदहाली की वजह से ही कोचिंग संस्थानों का धंधा फलफूल रहा है. राज्य में 6,000 बड़ेछोटे कोचिंग इंस्टिट्यूट हैं और उन का सालाना टर्नओवर 1,500 हजार करोड़ रुपए का है. राज्य सरकार शिक्षा प्रणाली की सुध कब लेगी, इस का इंतजार ही किया जा सकता है.

मोक्षप्राप्ति का भ्रमजाल

आशा अपनी दोनों बेटियों गुड्डो और लाडो के साथ खेल में व्यस्त थी. उन की बालसुलभ क्रीड़ाओं को देखदेख कर निहाल हो रही थी. तभी पड़ोस वाली शर्मा आंटी आ गईं. मुसकान तिरछी करते हुए बोलीं, ‘‘खूब मस्ती हो रही है मांबेटियों के बीच.’’

‘‘आइए आंटीजी, कहते हुए आशा बेटियों को खेलता छोड़ उन के लिए कुरसी ले आई.’’

‘‘अब फटाफट एक बेटा और कर ले, ताकि परिवार पूरा हो जाए,’’ आंटी ने अपनापन जताते हुए कहा.

‘‘हम दो, हमारे दो, हमें ये 2 बेटियां ही काफी हैं. हमारा परिवार पूरा हो गया, आंटी. हमें तीसरे बच्चे की चाह नहीं है. आप बताइए क्या लेंगी, चाय या कौफी?’’ आशा ने बात का रुख बदलते हुए कहा.

‘‘अरे, कैसी नासमझी वाली बातें करती हो? धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि बेटे के हाथों पिंडदान न हो तो मोक्ष नहीं मिलता. जब तक चिता को बेटा मुखाग्नि नहीं देता, आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती.’’

‘‘आंटी, क्या आप ने चिता के बाद की दुनिया देखी है? क्या आप दावे से कह सकती हो कि मरने के बाद क्या होता है?’’ आशा ने प्रश्न किया.

‘‘नहीं तो.’’

‘‘फिर आप कैसे कह सकती हैं कि बेटा मुखाग्नि नहीं देगा तो आत्मा को मुक्ति नहीं मिलेगी? बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं जिन के कोई संतान ही नहीं होती. या फिर संतान इतनी दूर होती है कि समय पर पहुंच ही नहीं पाती. उन की आत्माएं क्या भटकती रहती हैं?’’ आशा के तर्कों ने आंटी को निरुत्तर कर दिया.

उसे अपने बचपन की एक घटना मालूम थी. उस के चाचा के अपना कोई बेटा नहीं था. जब उन की मृत्यु हुई तो मुखाग्नि देने के लिए पंडितजी ने बेटे की अनिवार्यता बताई. बेटी ने मुखाग्नि देने की बात कही. मगर पंडितजी ने मना कर दिया. वही पुरानी बातें कि ऐसा करने से मृतक को मोक्ष नहीं मिलेगा, उस की आत्मा जन्मजन्मांतर तक भटकती रहेगी आदिआदि. आननफानन उन की बहन के बेटे को उन का दत्तक पुत्र बना कर अंतिम संस्कार करवाया गया. उस के बाद के क्रियाकर्म भी उसी के हाथों संपन्न करवाए गए. चाची पर गाज तो तब गिरी जब कुछ महीने बाद वह दत्तक पुत्र चाचाजी के पुश्तैनी मकान में अपना हिस्सा मांगने लगा. तब पता चला कि पंडित ने बहन से खूब दक्षिणा बटोरी थी.

आज भी हमारे देश की जनसंख्या का एक बहुत बड़ा प्रतिशत मोक्ष के जाल में उलझा हुआ है. मोक्ष यानी आत्मा का जन्मजन्मांतर के बंधन से मुक्त हो कर परमात्मा में विलीन हो जाना.

हर जगह हैं धर्म के धंधेबाज

हिंदू धर्मशास्त्रों में पितरों का उद्घार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई है. गरुड़ पुराण के अनुसार, ऐसी मान्यता है कि पुत्र के हाथों पिंडदान होने से ही प्राणी मोक्ष को प्राप्त करता है. इस पुराण के अनुसार, मोक्ष से आशय है पितृलोक से स्वर्गगमन और वह पुत्र के हाथों ही संभव है. इस तथ्य में कोई सचाई नहीं है. फिर भी पढ़ेलिखे लोग भी बिना विरोध किए सदियों से चली आ रही इन परंपराओं को आंखें भींच निभाते चले आ रहे हैं. दरअसल, इन बातों को रातदिन दोहरा कर पूरे समाज को हिप्नोटाइज कर डराया जा रहा है. यह सारी दुनिया में हो रहा है क्योंकि धर्म के धंधेबाज हर जगह हैं.

पंडों, पादरियों और मौलवियों, जो अपनेआप को पृथ्वी पर ईश्वर का दूत मानते हैं, ने मृत्यु के बाद का एक काल्पनिक संसार रच दिया है लोगों के दिलोदिमाग में. अपनेआप को शास्त्रों का ज्ञाता बताने वाले इन दूतों ने हरेक कर्मकांड को धर्म से जोड़ कर यजमानों के आसपास ईश्वर के प्रकोप और अनहोनी का जाल बुन दिया है. इस जाल के तानेबाने इतने सशक्त हैं कि धर्मभीरू जनता के लिए इन्हें तोड़ना आसान नहीं. अगर कोई कोशिश भी करना चाहे तो उसे परलोक का भय दिखा कर डराया जाता है.

हरेक धर्म के अपने धर्मगुरु होते हैं. समाज का एक बड़ा तबका इन का अनुयायी होता है. इन गुरुओं की रोजीरोटी अपने यजमानों के कारण ही चलती है. जब भी यजमान को कोई परेशानी होती है, वह इन गुरुओं की शरण में आता है और गुरुजी तत्काल उस समस्या का कोई समाधान सुझा देते हैं. बदले में वे मोटी दक्षिणा वसूलते हैं. समस्या जितनी बड़ी होगी, समाधान भी उतना ही महंगा होगा.

पिछले दिनों मेरे पड़ोस में रहने वाले एक मित्र का देहांत हो गया. उन का बड़ा बेटा जो कि विदेश में रहता है, अंतिम संस्कार के समय नहीं पहुंच सका. मुखाग्नि छोटे बेटे के हाथों दिलवाई गई. मगर पगड़ी रस्म के समय पंडितजी ने कहा कि बड़े बेटे के रहते छोटे को पगड़ी नहीं पहनाई जाएगी. कुछ अतिरिक्त दक्षिणा ले कर उन्होंने उस का भी तोड़ निकाल दिया. बड़े बेटे की तसवीर को पाटे पर रख कर रस्मपगड़ी संपन्न करवाई गई.

मरने वाले को मोक्ष मिलता है या नहीं, इस का तो कोई प्रत्यक्ष प्रमाण है ही नहीं, मगर क्रियाकर्म करवाने वाले यानी पंडित के जरूर वारेन्यारे हो जाते हैं. अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए कोई भी पुत्र कुछ भी करने को तैयार हो जाता है क्योंकि उसे यह समझाया जाता है कि उस पर अपने उन पितरों का ऋण है जो उसे इस दुनिया में लाए थे. यह भी कि यह ऋण उतारना उस की नैतिक जिम्मेदारी है वरना उस के पूर्वजों की अतृप्त आत्माएं भटकती रहेंगी. मगर पुत्र ही क्यों? पुत्री भी तो इन्हीं पूर्वजों द्वारा संसार में लाई गई हैं तो पितृऋण तो उस पर भी होना चाहिए. अपने पूर्वजों के इस ऋण को उतारने के लिए पुत्र पर मानसिक दबाव बनाया जाता है, कई तरह के किस्से गढ़ कर सुनाए जाते हैं और प्राचीन शास्त्रों का हवाला दिया जाता है. कई बार तो इस ऋण को उतारने की कवायद में व्यक्ति सिर से पांव तक कर्जे में डूब जाता है. यानी पूर्वजों का ऋण उतार कर वंशजों को ऋण में डुबो देता है.

पिछले दिनों एक परिचित से मिलना हुआ. पता चला वे अपने पिताजी का श्राद्धकर्म करने के लिए गया जा रहे हैं क्योंकि पंडितजी ने पितृदोष बताया है. मेरे पूछने पर कि उन्हें कैसे पता चला कि ये पितृदोष है, तो वे बोले कि कई दिनों से परिवार में कोई न कोई बीमार हो जाता है. कभी व्यापार में घाटा हो जाता है तो कभी आपस में मनमुटाव. रोजरोज की परेशानियों से निबटने के लिए जब पंडितजी से उपाय पूछा तो उन्होंने बताया कि मेरे चाचाजी, जिन की मृत्यु ऐक्सिडैंट में हुई थी, का क्रियाकर्म उचित ढंग से नहीं हुआ, इसलिए उन की आत्मा को शांति नहीं मिल रही है और हमारे परिवार पर पितृदोष लगा है. अब इस का एकमात्र उपाय गया में उन का श्राद्ध कर्म करना ही है.

मैं ने बहुत समझाया कि अगर कोई बीमार है तो डाक्टर की सलाह लो, न कि पंडितजी की. मगर उन की आंखों पर तो पंडितजी ने धर्म की ऐसी पट्टी बांधी जो 2-3 लाख रुपए खर्च होने पर ही खुली क्योंकि गया में भव्य श्राद्धकर्म करने के बाद भी परिवार और व्यापार की स्थिति में आशातीत सुधार नहीं आया था. तब बात उन की समझ में आई मगर तब तक उन का काफी नुकसान हो चुका था.

हमारी नई वैज्ञानिक पीढ़ी जरूर इन आडंबरों से दूर है मगर यह प्रतिशत भी सिर्फ बड़े शहरों में ही अधिक देखने को मिलता है. छोटे कसबों और गांवों में अभी भी हालात अधिक बदले हुए नजर नहीं आते.

धर्म का डर

राधा की सास की मृत्यु के बाद 12 दिनों तक उन की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए पंडितजी ने कई क्रियाएं करवाईं. प्रतिदिन पंडितजी को वे सब पकवान बना कर खिलाए जाते जो उस की सास को बेहद प्रिय थे. क्योंकि शास्त्रों के अनुसार, यह सारा भोजन पंडितजी के माध्यम से उस की सास तक पहुंच रहा था और ये सारा ज्ञान पंडितजी का ही दिया हुआ था. सास तक क्या पहुंचा, क्या नहीं, मगर 12 दिन पंडितजी ने खूब तर माल उड़ाया और अपनी सेहत बनाई. साथ ही, मोटी दक्षिणा भी वसूली. राधा के परिवार को कितना कर्जा लेना पड़ा, इस से उन्हें कोई सरोकार नहीं.

दरअसल, पूजापाठ से मिलने वाली दानदक्षिणा ही प्राचीनकाल से पंडेपुजारियों के जीवनयापन का साधन रही है. जैसेजैसे लोग पढ़नेलिखने लगे, उन की सोच भी तार्किक होने लगी. ऐसे में पंडितोंमुल्लाओं का धंधा चौपट होने लगा. इसलिए यजमानों को धर्म का डर दिखाना उन के लिए जरूरी हो गया वरना उन की रोजीरोटी पर संकट खड़ा हो जाता. अब इस तरह के कर्मकांड रोज तो होते नहीं, इसलिए जब भी ऐसा मौका आता है ये ईश्वर के दूत सक्रिय हो जाते हैं और अधिक वसूलने की कोशिश करते हैं. अपने यजमानों को मोक्ष का ज्ञान देने वाले ये पंडित खुद गहरे मायाजाल में फंसे हुए हैं और अपने स्वार्थ के लिए ही इन के द्वारा ये भ्रांति और अंधविश्वास फैलाया गया है कि पुत्र ही मातापिता को मृत्यु के बाद मुक्ति प्रदान करता है. और इसी धारणा का नतीजा है आम आदमी की पुत्रचाह की मानसिकता. मोक्षप्राप्ति की लालसा में पुत्र की कामना प्राचीनकाल में जनसंख्या वृद्धि का एक अहम कारण बनी और आधुनिक काल में कन्याभू्रण हत्या का.

अलबत्ता तो मृत्यु के बाद मोक्ष की अवधारणा  ही कल्पना मात्र है और इस के लिए भी पुत्र की अनिवार्यता महज पंडोपादरियों द्वारा फैलाया गया भ्रमजाल है. ऐसा कोई काम नहीं जो पुत्र कर सके और पुत्री नहीं. आखिर हैं तो दोनों एक ही मातापिता की संतान.

हमें इन कर्मकांडों और पाखंडों के बजाय तार्किक और वैज्ञानिक सोच की आवश्यकता है. अंधविश्वास के अंधेरों से बाहर निकल कर तथ्यों की रोशनी में हकीकत देखने और समझने की जरूरत है. हालांकि मस्तिष्क में गहरे तक जड़ जमा चुके इन धार्मिक आडंबरों के जाल से बाहर निकलने के लिए बहुत हिम्मत की जरूरत है क्योंकि हो सकता है समाज का एक धड़ा आप के विरोध में उठा खड़ा हो. मगर सचाई यह भी है कि जब तक हम डरते रहेंगे, ईश्वर के तथाकथित दूत यानी पंडित लोग हमें लूटते रहेंगे. अगर हम तर्क की तलवार ले कर इन का सामना करें तो इन के फैलाए पाखंड के जाल को काट सकेंगे.

– आशा शर्मा

बिग बॉस 10 के सुल्तान बनें मनवीर गुर्जर

नोएडा के रहने वाले मनवीर गुर्जर ने वी जे बानी जज एवं ब्यूटी क्वीन लोपामुद्रा राउत को पीछे छोड़ते हुए ‘बिग बॉस’ का 10 वां सीजन जीत लिया है. बानी इस रियलिटी शो में पहली रनर अप रहीं जबकि लोपामुद्रा दूसरी रनरअप रहीं.

मनवीर के सबसे अच्छे दोस्त और बिग बॉस के घर में मजबूत दावेदार माने जा रहे मनु पंजाबी चौथे स्थान पर रहे. उन्होंने 10 लाख रूपये लेकर बिग बॉस का घर छोड़ने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और बाहर आ गए.

मनवीर शुरुआत के कुछ हफ्ते बाद से ही दर्शकों के पसंदीदा कंटेस्‍टेंट बन गये थे. शो जीतने के बाद मनवीर ने कहा, ‘अब मैं काफी खुश महसूस कर रहा हूं. मैंने इस सफर का आनंद लिया, अपने तरीके से लड़ाई लड़ी और अब एक विजेता के रूप में यहां बैठा हुआ हूं. मुझे लगता है कि मैंने सब कुछ अपने दिल से किया. यह ईमानदार होने का नतीजा है.’

खिताब के साथ, मनवीर को 40 लाख रूपये का ईनाम भी मिला. इस राशि में से मनवीर के पिता ने 50 प्रतिशत राशि कार्यक्रम के प्रस्तोता सलमान खान की संस्था ‘बीइंग ह्यूमन’ को दान में देने का संकल्प जाहिर किया.

जानें मनवीर के बारे में कुछ दिलचस्‍प बातें…

1. मनवीर दिल्‍ली के नोएडा के अगाहपुर के रहनेवाले हैं. उनका असली नाम मनोज कुमार बैसोया है. उनका जन्‍म 13 जून 1987 को हुआ था.

2. मनवीर ने ग्रेजुएशन की पढ़ाई दिल्‍ली यूनिवर्सिटी से की है. मनवीर 49 लोगों की ज्‍वाइंट फैमिली में रहते हैं.

3. मनवीर एक किसान हैं और डेयरी चलाते हैं, इसके साथ-साथ वे एक सामाजिक कार्यकर्ता भी है. उन्‍होंने नोएडा में गुर्जर सोसाइटी के सुधार के लिए आम आदमी पार्टी से भी हाथ मिलाया है.

4. मनवीर रेसलिंग और कबड्डी के शौकीन हैं. वे अपनी फिटनेस पर खासा ध्‍यान देते हैं साथ ही उन्‍हें हर तरह के खेल पसंद है.

5. सलमान के फेवरेट अभिनेता सलमान खान हैं. बिग बॉस के होस्‍ट और बॉलीवुड के सुपरस्‍टार सलमान खुद भी कई बार शो में मनवीर की तारीफ कर चुके हैं.

6. मनवीर का परिवार बहुत बड़ा है और वे अपने परिवार से बेहद प्‍यार करते हैं. मनवीर एक बेहद भावुक इंसान हैं जिसकी झलक बिग बॉस हाउस में भी देखने को मिली थी. कई बार परिवार का नाम आने पर उनकी आंखें नम हो जाती थी.

हौसला ही काफी है, ऊंची उड़ान के लिए

दुनिया को कुछ हिस्सों में बांटा गया है. किन हिस्सों में? कभी सोचा है? देश, राज्य, धर्म, जातियों में नहीं, पर दुनिया को बड़े करीने से सिर्फ दो हिस्सों में बांटा गया है. चौंकिए मत, चाहे कोई भी देश हो, राज्य हो या कोई भी धर्म हिस्से तो सिर्फ दो ही हैं. एक पुरुष और एक स्त्री. दुनिया को बांटने के साथ ही पुरुषों और स्त्रियों के काम काज को भी बांट दिया गया था.

पुरुषों का काम है घर से बाहर जाकर काम काज करना और स्त्रियों का काम है घर संभालना, घर की देखभाल करना. नि:स्वार्थ भाव से काम करने के बावजूद कोई पगार तो दूर कितने लोग तो स्त्रियों के काम की कद्र ही नहीं करते. पुरुष का काम है घर के लिए पैसे कमाना. मतलब पुरुष का काम है घर के लिए आटे का जुगाड़ करना, और पुरुषों का ही काम है आटे की कंपनी चलाना, पर स्त्रियों का काम है उस आटे से कुछ खाने लायक बनाना. इसके अतिरिक्त कुछ करना.

पर इतिहास गवाह है कि समय समय पर इस मानसिकता को कई स्त्रियों ने चुनौति दी है. आज जानते हैं ऐसी ही कुछ स्त्रियों के बारे में जिन्होंने पितृसत्तामक समाज के खिलाफ जाकर अपनी पहचान बनाई.

1. कोको चैनल (Gabrielle ‘Coco’ Channel)

फैशन की दुनिया में ‘चैनल’ ब्रांड का अलग ही रुतबा है. गैब्रिएल ‘कोको’ चैनल एक मामूली हैट डिजाइनर थी. पर अपनी प्रतिभा से उन्होंने फ्रांस के संपन्न परिवारों के बीच अपनी जगह बनाई. उनके खूबसूरत डिजाइन के हैट लोगों को खूब पसंद आए. उन्होंने फोर्बस की ‘20वीं सदी की 100 सबसे मश्हूर हस्तियों’ में अपनी जगह बनाई. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद औरतों को कोरसेट(corset) के चंगुल से छुड़ाने का श्रेय भी कोको को ही जाता है.

2. शर वैंग (Cher Wang)

शर वैंग ‘HTC’ की सह संस्थापक और चेयरपर्सन हैं. शर को तकनीक की दुनिया में सबसे सफल और शक्तिशाली महिला कहा जाता है. इतनी शौहरत के बावजूद शर लाइमलाइट और चकाचौंध की दुनिया से दूर रहती हैं. एक सफल बिजनेसवुमन होने के साथ साथ शर चैरिटी के कामों से भी जुड़ी हैं.

3. रुथ हैंडलर (Ruth Handler)

बार्बी डौल तो देखी होगी आपने? हर छोटी बच्ची के पास ये डौल होती है. हर बच्ची की जिन्दगी में बार्बी को लाने का श्रेय रुथ को जाता है. अपनी बेटी बार्बरा को देखकर उन्हें बार्बी डौल बनाने का आइडिया आया. बार्बी डौल आज भी कई लिविंग रूम क्लोसेट की शान है.

4. एरियाना हफिंगटन (Arianna Huffington)

एरियाना ‘The Huffington Post’ अखबार की सह संस्थापक हैं. 2016 में उन्होंने हफिंगटन पोस्ट से इस्तीफा दे दिया पर मीडिया के फिल्ड में उनके नाम का सिक्का चलता है. उन्होंने 70 के दशक में कई चर्चित किताबें लिखी. उन्होंने पिकास्सो की बायोग्राफी भी लिखी.

5. किरण मजुमदार शॉ (Kiran Mazumdar Shaw)

किरण ने ‘बायोकॉन लिमिटेड’ की स्थापना की थी. कहा जाता है कि उन्हें कंपनी खोलने की जगह नहीं मिली थी तो उन्होंने एक गराज से ही कंपनी की शुरुआत की. आज बायोकॉन बायोमेडिसीन रिसर्च की एक जानीमानी कंपनी है.

6. वंदना लुथरा (Vandana Luthra)

वंदना लुथरा ने ‘VLCC Health Care Ltd’ की स्थापना की. आज VLCC के प्रोडक्ट्स ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड समेत 11 देशों में खरीदे जाते हैं. देश में VLCC के कई स्टोर्स हैं.

7. एकता कपूर (Ekta Kapoor)

आप एकता को पसंद या नापसंद कर सकती हैं. पर उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकती. भारतीय टेलीविजन का चेहरा बदलने का श्रेय इन्हीं को जाता है. एकता ने ‘बालाजी टेलीफिल्म्स’ की स्थापना की. उनके प्रोडक्शन हाउस से कई ऐसे डेली सोप बनें जो भारत में कई घरों का हिस्सा बन गए. दोपहर में घर पर अकेले रहने वाली स्त्रियों को एकता ने क्योंकि सास भी कभी बहू थी, कहानी घर घर की जैसे सीरियल का तोहफा दिया.

इन एक्टर्स ने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट बॉलीवुड में की शुरुआत

बॉलीवुड में ऐसे कई एक्टर्स हैं जिन्होंने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट अपने करियर की शुरुआत की. इनमें से कुछ हिट हुए तो कुछ फ्लॉप. कुछ ने सफलता का मिला-जुला स्वाद चखा. इन एक्टर्स ने करियर की शुरुआत बॉलीवुड से की और बड़े होकर भी एक्टिंग की फिल्ड में ही नाम कमाया.

आइए जानते हैं किन एक्टर्स ने बचपन में ही एक्टिंग में आजमाया हाथ.

आफताब सिवदेसानी

अपने डिंपल और गुड लुक्स के लिए जाने वाले आफताब ने बॉलीवुड में चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में करियर की शुरुआत की थी. आफताब जब 14 महीने के थे तभी उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक टीवी कमर्शियल बेबी फूड से की थी. बतौर चाइल्ड एक्टर आफताब ने 1987 में आई फिल्म ‘मिस्टर इंडिया’ से बॉलीवुड में कदम रखा था. 1999 में राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘मस्त’ में पहली बार लीड रोल निभाया. इतना ही नहीं 2009 में आफताब ने मुंबई में खुद का प्रोडक्शन हाउस ‘राइजिंग सन एंटरटेनमेंट’ भी शुरू किया.

आएशा टाकिया

ग्लैमरस एक्ट्रेस आएशा टाकिया ने कॉम्पलैन के विज्ञापन से अपने अभिनय की दुनिया में कदम रखा. शायद ही कोई होगा जो इस कॉम्प्लैन गर्ल को नहीं जानता होगा. बतौर लीड एक्ट्रेस आएशा ने फाल्गुनी पाठक के म्यूजिक वीडियो ‘मेरी चुनर उड़ उड़ जाए’ में काम किया था. वो साल 2004 में ‘टार्जन द वंडर कार’ में लीड रोल में नजर आईं. अब तक वह सलमान, शाहिद कपूर, अजय देवगन जैसे सुपरस्टार्स के साथ काम कर चुकी हैं.

शाहिद कपूर

आएशा टाकिया की तरह शाहिद ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत कॉमप्लैन ब्वॉय की तरह किया. म्यूजिक वीडियो ‘आंखों में’ आप चाह कर भी शाहिद को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं. फिल्म ‘इश्क-विश्क’ से उनहोंने बॉलीवुड में डेब्यू किया.

उर्मिला मातोंडकर

उर्मिला ने 6 साल की उम्र में फिल्म ‘कलयुग’ से अपने एक्टिंग करियर की शुरूआत की थी. लेकिन इस रंगीला गर्ल को फिल्म ‘मासूम’ से बाल कलाकार के रुप में पहचान मिली. मासूम उन्होंने 9 साल की उम्र में की थी. 1991 में आई फिल्म ‘नरसिम्हा’ से उर्मिला ने युवा कलाकार की तरह अपने करियर की शुरुआत की. 1995 में रिलीज हुई फिल्म ‘रंगीला’ से उन्हें बॉलीवुड में पहचान मिली.

इमरान खान

‘जाने तू या जाने ना’ फेम एक्टर इमरान खान ने फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ से बतौर बाल कलाकार अपने बॉलीवुड करियर की शुरुआत की थी. फिल्म ‘जो जीता वही सिकंदर’ और ‘कयामत से कयामत तक’ में आमिर खान के बचपन का किरदार निभाया था. युवा कलाकार के रूप में इमरान ने साल 2008 में फिल्म ‘जाने तू या जाने ना’ से बॉलीवुड में डेब्यू किया था.

हंसिका मोटवानी

टीवी सीरियल ‘शका लका बूम बूम’ और ‘देश में निकला होगा चांद’ में चाइल्ड आर्टिस्ट का किरदार निभाने के बाद हंसिका ने बॉलीवुड में कदम रखा. 2003 में आई फिल्म ‘हवा’ से उन्होंने अपने बॉलीवुड करियर की शुरुआत की. फिल्म ‘कोई मिल गया’ में उन्हें खुब पसंद किया गया. हिमेश रेशमिया की फिल्म ‘आपका सुरूर’ में लीड रोल निभाया और बतौर बॉलीवुड एक्ट्रेस अपनी पहचान बनाई.

आमिर खान

बॉलीवुड की एवरग्रीन फिल्मों में से एक है ‘यादों की बारात’. और इसी फिल्म से बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट ने महज 7 साल की उम्र में एक्टिंग की शुरुआत की. फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ में उन्होंने पहली बार लीड रोल निभाया था.

सना सईद

‘कुछ कुछ होता है’ कि अंजली तो आपको याद ही होगी. आज की हॉट एक्ट्रेस सना सईद ने ‘कुछ कुछ होता है’ में रानी मुखर्जी और शाहरुख कान की बेटी अंजली का किरदार निभया था. सना चाइल्ड एक्टर के रूप में फिल्म ‘हर दिल जो प्यार करेगा’ में भी नजर आईं. युवा कलाकार के तैर पर सना ने ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ से अपने करियर की शुरुआत की.

श्रीदेवी

बॉलीवुड की पहली फीमेल सुपरस्टार श्रीदेवी ने भी अपने करियर की शुरुआत चाइल्ड एक्ट्रेस के रूप में ही किया था. सिर्फ 4 साल की उम्र में ही श्रीदेवी ने अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत कर दी थी. सिर्फ हिंदी नहीं श्रीदेवी ने तमिल, कन्नड़, तेलगु, मलयालम फिल्मों में भी अपने एक्टिंग का परचम लहराया. उन्होंने 1975 में आई फिल्म ‘जूली’ से बॉलीवुड में बतौर चाइल्ड एक्ट्रेस एंट्री ली. ‘सोलवा सावन’ में उन्होंने पहली बार एडल्ट रोल निभाया. फिल्म ‘हिम्मतवाला’ ने उन्हें रातोरात स्टार बना दिया.

कुनाल खेमु

कुनाल को लोग आज भी फिल्म ‘राजा हिंदुस्तानी’ और ‘हम हैं राही प्यार के’ के बाल कलाकार के रुप में याद करते हैं. 1980 के दशक के वे फेमस बाल कलाकार थें. कुनाल ने अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत दुरदर्शन के सीरियल ‘गुल गुलशन गुलफाम’ से की थी. बतौर युवा कलाकार उन्होंने महेश भट्ट की फिल्म ‘सर’ से बॉलीवुड में डेब्यू किया.

नीतू सिंह

नीतू ने महज 8 साल की उम्र में फिल्मों में अपना कदम जमा लिया था. उन्होंने पहली बार फिल्म ‘दो कलियां’ में चाइल्ड एक्ट्रेस के रूप में काम किया. 1972 में आई फिल्म ‘रिक्शेवाला’ में उनहोंने लीड रोल निभाया था. फिल्म ‘यादों की बारात’ से उन्होंने बॉलीवुड में नाम कमाया.

ऋषि कपूर

राज कपूर की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ से ऋषि ने अभिनय की दुनिया में कदम रखा था. इस फिल्म में उन्होंने राज कपूर के बचुन का किरदार निभाया था. लीड रोल में ऋषि ने सबसे पहले फिल्म ‘बॉबी’ में अभिनय किया और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

रितिक रोशन

रितिक ने फिल्म ‘आशा’ से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की. इस फिल्म में उन्होंने एक डांस सीक्वेंस किया था. युवा कलाकार की तरह उन्होंने फिल्म ‘कहो ना प्यार है’ से अभिनय की दुनिया में कदम रखा.

अभिनेत्रियां जिन्होंने कम उम्र में जिन्दगी को कहा अलविदा

कुछ अभिनेत्रियों का करियर छोटा जरूर था पर ये विश्वास अब भी सभी को है कि उन सभी में अपने जीवन में, और बहुत कुछ करने की काबिलियत थी. बहुत ही कम उम्र में जिन्दगी को अलविदा कह देने वाली इन अदाकाराओं ने सभी दर्शकों  के दिलों में एक छाप छोड़ी, जो निस्संदेह आज भी बरकरार है.  

सूत्रों की माने तो ऐसी सभी अभिनेत्रियों की दुखद मौत का कारण शराब, उनका डिप्रेशन या उनके जीवन का कोई बड़ा दुख हो सकता है. कुछ खूबसूरत अभिनेत्रियां जिन्होंने कम उम्र में अपनी जिन्दगी को खो दिया, उन पर एक नजर..

दिव्या भारती

90 के दशक की एक उभरती अदाकारा दिव्या भारती, मात्र 19 साल की उम्र में उनके जीवन का दुखद अंत आज भी एक राज बना हुआ है. उनकी मौत वाकई एक दुर्घटना थी या आत्महत्या ये बात, आज भी एक राज बनी हुई है. अभिनेत्री दिव्या भारती की मौत 5 अप्रैल 1993 की रात मुंबई में हुई, जब एक पांच मंजिला अपार्टमेंट से उनका संतुलन बिगड़ा और वे नीचे गिर गईं. कई लोगों का मानना था कि उन्होंने आत्महत्या की थी, वहीं यह संभावनाऐं भी लगाई जा रहीं थी कि ये हत्या को आत्महत्या दिखाने के लिए उनके खिलाफ कोई साजिश भी हो सकती है. उस वक्त मुंबई पुलिस उनकी मौत के पीछे होने वाले मुख्य कारणों का पता लगाने और पर्याप्त सबूत इकट्ठा करने में विफल रही और अंत में साल 1998 में आगे की जांच बंद कर दी गई.

जिया खान

अमिताभ बच्चन के साथ 2007 में फिल्म नि:शब्द से एक बड़ा डेब्यू करने वाली अभिनेत्री जिया खान के बारे में कहा जाता है कि जिया अपने असफल फिल्म करियर और अपनी लव लाईफ से काफी परेशान थीं. इन सभी चीजों ने मिलकर जिया को अंदर तक तोड़ दिया था और शायद इन्हीं परेशानियों से बचने के लिए, साल 2013 की शुरुआत में 25 साल की जिया खान ने मुंबई स्थित अपने अपार्टमेंट में आत्महत्या कर ली थी.

मधुबाला

पुराने समय की सबसे खूबसूरत अभिनेत्रियों में से एक हैं अभिनेत्री मधुबाला. 36 साल की उम्र में दिल की गति रुकने के कारण उनकी मृत्यु हो गई थी. मधुबाला एक प्रतिष्ठित अभिनेत्री थीं, तकरीबन दो दशकों तक उनका एक सफल करियर हिन्दी सिनेमा पर छाया रहा. जन्म से ही मधुबाला के हृदय में छेद था जो अंत में उनकी मौत का कारण भी बना.

सौंदर्या

100 से भी अधिक फिल्मों में काम करने वाली सौंदर्या एक दक्षिण भारतीय अभिनेत्री थीं. साल 2004 में बंगलुरु के पास एक विमान दुर्घटना में सौंदर्या की मृत्यु हो गई थी. अपनी मौत से कुछ वक्त पहले ही सौंदर्या ने दक्षिण में फिल्म निर्माण का कार्य शुरु किया था. खूबसूरत अभिनेत्री सौंदर्या का निधन मात्र 32 साल की उम्र में हो गया था.

स्मिता पाटिल

भारतीय सिनेमा में अभिनेत्री स्मिता पाटिल अब तक की सबसे टैलेन्टेड अभिनेत्रियों की लिस्ट में शुमार हैं. मंथन, भूमिका और मिर्च मसाला जैसी बेहतरीन फिल्में देने वाली स्मिता केवल 31 साल की उम्र में अपनी जिन्दगी को अलविदा कह गईं. साल 1986 में स्मिता के जीवन का अंत एक दुखद घटना थी. अपने बेटे को जन्म देने के 2 हफ्ते बाद उनका निधन हो गया था. स्मिता पाटिल के बेटे प्रतीक बब्बर हैं जो आज के समय के एक अच्छे अभिनेता हैं.

राजिम: सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 45 किलोमीटर दूर स्थित राजिम शहर को देवालयों की नगरी भी कहा जाता है क्योंकि यहां जहां भी आप की नजर जाएगी कोई न कोई मंदिर जरूर नजर आएगा. राजिम की तुलना छत्तीसगढ़ के लोग प्रयाग से करते हैं क्योंकि यहां राज्य की 3 प्रमुख नदियों पैरी-महानदी-सोढूर का संगम होता है.

दक्षिण कोसल के नाम से भी प्रसिद्ध राजिम प्राचीन सभ्यता के लिए तो जाना ही जाता है, संस्कृति और कलाओं के महत्त्व के लिहाज से यह शहर इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और कलाप्रेमियों के आकर्षण व जिज्ञासा का विषय हमेशा से रहा है.

छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल के अथक प्रयासों के चलते अब बड़ी तादाद में सैलानी भी यहां आने लगे हैं. खासतौर से हर साल आयोजित होने वाले मेले राजिम कुंभ में तो देशभर से लोग यहां आते हैं. यहां विदेशी पर्यटकों का दिखना एक सुखद अनुभूति है. यह आयोजन प्रतिवर्ष माघ महीने की पूर्णिमा से प्रारंभ हो कर महाशिवरात्रि पर संपन्न होता है.

छत्तीसगढ़ की गंगा कही जाने वाली नदी महानदी के किनारे बसे प्रमुख शहरों में से एक राजिम को ले कर किवदंतियों की भरमार है. शिलालेखों का यहां अपना अलग ऐतिहासिक महत्त्व है. रतनपुर के कलचुरी राजा नरेश जाजल्य प्रथम एवं रत्नदेव द्वितीय की युद्घविजयी गाथाएं इन शिलालेखों में उल्लिखित हैं.

भारतीय स्थापत्यकला और मूर्तिकला के इतिहास में छत्तीसगढ़ अंचल का योगदान क्या और कितना है, यह राजिम स्वयं सिद्घ करता है. सामान्य सर्वेक्षणों में राजिम में बड़ी तादाद में मृण्मय अवशेष मिलते हैं जिन के आधार पर यहां के सांस्कृतिक अनुक्रम का अनुमानित कालक्रम निर्धारित होना संभव हो पाया.

राजिम के देवालयों के निर्माण का समय 7वीं से ले कर 14वीं शताब्दी के बीच हुआ, ऐसा माना जाता है. प्रसिद्घ राजीव लोचन मंदिर का भूविन्यास महामंडप, अंतराल गर्भगृह और प्रदक्षिणापथ 4 भागों में बंटा हुआ है. राजिम के कुछ स्थानों पर शाल भंजिका की भी मूर्ति है. कहींकहीं खजुराहो जैसे आलिंगनबद्घ मूर्तियां भी दिखती हैं.

राजिम कुंभ, पर्यटकों को यहां के इतिहास के बारे में जानने का बड़ा मौका भी होता है. रायपुर से बस या टैक्सी द्वारा राजिम आसानी से पहुंचा जा सकता है.      

टौप 5 कलरफुल मसकारा

आईलाइनर और आईशैडो ही नहीं, मार्केट में यलो से ले कर ब्लू, पिंक से ले कर ग्रीन शेड के मसकारों के कलैक्शन में कोई कमी नहीं है. ऐसे में अगर आप भी नियमित ब्लैक और ट्रांसपैरेंट शेड का मसकारा लगा कर ऊब चुकी हैं, तो एक बार कलरफुल मसकारा जरूर ट्राई करें. मसकारा के कलरफुल शेड्स आंखों को बिग और ब्राइट लुक देते हैं. ब्लैक मसकारे के मुकाबले ये काफी आकर्षक भी नजर आते हैं, बशर्ते इन का चुनाव करते वक्त अपनी स्किनटोन के साथसाथ आंखों के रंग का भी खास खयाल रखा जाए.

ब्लू मसकारा

अगर आप की आंखों का रंग ग्रे, ब्राउन या लाइट ग्रीन है, तो आप अपने वैनिटी बौक्स में ब्लू शेड का मसकारा रख सकती हैं. मार्केट में ब्लू के कई शेड्स का मसकारा उपलब्ध है जैसे रौयल ब्लू, नेवी ब्लू, सी ब्लू आदि. ब्लू के ये सारे शेड्स फेयर कौंप्लैक्शन वाली महिलाओं पर ही नहीं, बल्कि डार्क और मीडियम कौंप्लैक्शन वाली महिलाओं पर भी सूट करते हैं, लेकिन ब्लू शेड का मसकारा नाइट के बजाय डे पार्टी में ज्यादा उभरा नजर आता है.

ग्रीन मसकारा

डार्क ब्राउन शेड्स की आंखों में ग्रीन शेड का मसकारा बेहद खूबसूरत नजर आता है. लेकिन बात यदि स्किनटोन की करें तो ब्लू की तरह ग्रीन कलर का मसकारा भी डार्क, फेयर, मीडियम हर तरह की स्किनटोन वाली महिलाओं पर फबता है. अगर आप चाहती हैं कि आप का ग्रीन मसकारा उभरा नजर आए, तो जब भी ग्रीन कलर का मसकारा लगाएं, उस के साथ डार्क शेड का आईशैडो या आईलाइनर लगाने की भूल न करें वरना डार्क शेड के आगे आप के मसकारे का रंग फीका पड़ सकता है.

ब्राउन मसकारा

ब्लैक के तुरंत बाद कलरफुल मसकारा लगाने से झिझक महसूस कर रही हैं तो शुरुआत ब्राउन मसकारे से करें. यह ब्लैक शेड्स से थोड़ा लाइट होता है, लेकिन इस का इफैक्ट काफी नैचुरल नजर आता है. मीडियम और फेयर कौंप्लैक्शन वाली महिलाओं के साथ ही ब्राउन आंखों वाली महिलाओं पर भी ब्राउन शेड का मसकारा काफी खूबसूरत दिखता है. इसे पार्टी, फंक्शन जैसे खास मौकों के साथसाथ रोजाना भी लगाया जा सकता है. यह दिन रात दोनों समय आकर्षक नजर आता है.

गोल्डन मसकारा

अगर आप किसी नाइट पार्टी की जान बनना चाहती हैं तो ग्रीन, ब्लू, पर्पल जैसे शेड्स के मसकारे को छोड़ कर गोल्डन शेड का मसकारा चुन सकती हैं. यह हर शेड की आंखों पर बेहद खूबसूरत नजर आता है. डार्क से ले कर मीडियम और फेयर स्किनटोन वाली महिलाओं पर भी गोल्डन शेड का मसकारा जंचता है यानी बाकी शेड्स का मसकारा रखें या न रखें, लेकिन पार्टी की जान बनने के लिए गोल्डन शेड के मसकारे को अपने वैनिटी बौक्स में जरूर खास जगह दें.

पर्पल मसकारा

अगर आप की आंखें छोटी हैं और आप उन्हें बिगर लुक देना चाहती हैं, तो आंख मूंद कर पर्पल शेड के मसकारे को अपने मेकअप बौक्स में रख लें. ये ग्रीन, ब्राउन और ब्लू कलर की आंखों पर ज्यादा सूट करता है. इस के खासकर 3 शेड ज्यादा इस्तेमाल किए जाते हैं- रौयल पर्पल, प्लम और वायलेट. अगर आप की स्किनटोन डार्क है तो पर्पल शेड का मसकारा खरीदें. अगर फेयर है तो वायलेट शेड और मीडियम है तो प्लम शेड चुन सकती हैं. नाइट के मुकाबले पर्पल शेड का मसकारा डे पार्टी में काफी खूबसूरत लुक देता है.   

सुपर स्टाइलिश आइडियाज

– आर्टिफिशियल आईलैशेज लगा कर मसकारा लगाएं. लंबीघनी पलकों पर लगा मसकारा बेहद खूबसूरत नजर आता है.

– सुपर स्टाइलिश लुक के लिए जिस शेड का मसकारा लगा रही हैं, उसी शेड का आईशैडो लगाएं.

– एक ही शेड का मसकारा और आईलाइनर लगा कर भी आप अपनी आंखों को आकर्षक लुक दे सकती हैं.

– ड्रामैटिक आई मेकअप के लिए 2 डिफरैंट शेड्स का मसकारा लगाएं, जैसे ऊपर की आईलैशेज पर ब्लू और नीचे की आईलैशेज पर ग्रीन.

– ट्रैंड सैटर कहलाने के लिए आईलैशेज को 3 भागों में बांट दें और फिर तीनों पर अलग अलग 3 शेड्स का मसकारा लगाएं.

– अगर नाइट पार्टी में जा रही हैं तो ग्लिटर वाला कलरफुल अप्लाई करें. इसे लगाने से आप का आई मेकअप कलरफुल भी नजर आएगा और चमक भी उठेगा.

– चूंकि आप कलरफुल मसकारे से आईर् मेकअप को हैवी लुक दे रही हैं, इसलिए लिपस्टिक और ब्लशऔन के लिए नैचुरल शेड्स का चुनाव करें वरना आप का लुक गौदी नजर आ सकता है.

जब लगाएं मसकारा

– अगर आप चाहती हैं कि आप का मसकारा लौंग लास्टिंग रहे तो वाटरप्रूफ मसकारा खरीदें.

– मसकारा पहले ऊपर की आईलैशेज पर फिर निचली आईलैशेज पर लगाएं.

– मसकारा लगाते वक्त आईलैशेज को घुमा कर ऊपर की तरफ ले जाएं. इस से पलकें घनी नजर आती हैं.

– मसकारे को हवा के संपर्क में न आने दें वरना वह सूख कर जल्दी खराब हो सकता है.

– अच्छे परिणाम के लिए मसकारे का सिंगल नहीं, डबल कोट लगाएं.

– सोने से पहले मसकारा रिमूव करना न भूलें वरना आप की आईलैशेज कमजोर हो सकती हैं.

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