आप जानते हैं हॉलीवुड और बॉलीवुड के बीच का फर्क?

‘ट्रिपल एक्सः रिटर्न ऑफ द जेंडर केज’ फिल्म से हॉलीवुड में डेब्यू कर चुकीं बॉलीवुड एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण इन दिनों खूब सुर्खियां बटोर रही हैं. उनकी फिल्म हाल ही में विश्व स्तर पर रिलीज हुई है और फिल्म में उनके काम की काफी तारीफ की जा रही है.

दीपिका कुछ दिनों पहले ही हॉलीवुड स्टार विन डीजल के साथ मुंबई में अपनी फिल्म का प्रमोशन करती नजर आई थीं. दीपिका ने अमेरिकन टॉक शो एक्सेस हॉलीवुड में भी शिरकत की. शो पर उन्होंने अपने बॉलीवुड से हॉलीवुड तक के सफर को साझा किया. उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि उनका यह सफर बहुत मजेदार रहा है.

जब शो पर उनसे पूछा गया कि वह अब तक बॉलीवुड में तकरीबन 30 फिल्में कर चुकी हैं, तो उन्हें बॉलीवुड और हॉलीवुड में क्या फर्क लगा. इस पर दीपिका ने कहा कि उन्हें दोनों में कोई फर्क नहीं लगा और उन्हें क्योंकि लोग यहां कम पहचानते हैं तो उन्होंने इसका पूरा मजा लिया.

दीपिका ने अपने फास्ट एंड फ्यूरियस वाले एक्सपीरंस भी साझा किए. मालूम हो कि दीपिका ने फिल्म फास्ट एंड फ्यूरियस के लिए ऑडीशन दिया था लेकिन किसी कारण के चलते उन्हें उस फिल्म में कास्ट नहीं किया गया. दीपिका ने कहा कि प्रोड्यूसर्स को मेरी और विन की कैमिस्ट्री याद थी और न जाने क्यूं उन्हें लगा कि इसे यूज किया जाना चाहिए.

अपने एक्शन सीन्स के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया कि स्पोर्ट्स और फिटनेस उनके खून में है. उन्होंने बताया कि वह अपने स्कूल के दिनों में पढ़ाई के बाद बैडमिंटन खेलने जाया करती थीं और उन्होंने उस अनुभव का खूब मजा लिया.

मीठे में बनायें ड्राईफ्रूट गुड़ के क्यूब्स

सामग्री

– 1 कप छोटे टुकड़ों में कटे बादाम, काजू, पिस्ता

– 2 बड़े चम्मच खरबूजे की मींग भुनी हुई 

– 200 ग्राम गुड़ कद्दू कस किया

– 1 छोटा चम्मच सोंठ पाउडर

– 1/2 छोटा चम्मच इलायची पाउडर,

– 2 छोटे चम्मच सौंफ दरदरी कुटी

– 1 बड़ा चम्मच घी.

विधि

एक नौनस्टिक कड़ाही में घी गरम कर के मेवा हलका भून लें. बचे घी में ही सौंफ, सोंठ पाउडर व गुड़ डाल कर पिघलाएं. इस में मेवा, मींग और इलायची पाउडर मिला दें. मिनी इडली वाले स्टैंड के खांचों को घी से चिकना कर के उन में थोड़ाथोड़ा मिश्रण डालें. जब मिश्रण ठंडा हो कर क्यूब सा बन जाए तब निकाल लें. यह खाना सर्दियों में खाना बहुत फायदेमंद रहता है.

– व्यंजन सहयोग: नीरा कुमार

ये फुटवियर देंगे आपको पर्फेक्ट लुक

सिर्फ कपड़े और मेकअप ही नहीं जूते भी आपकी खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं. फुटवियर आपके लुक को स्मार्ट बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं. बाजार में कुछ ऐसे फुटवेयर्स हैं जिन्हें पहन आप आसानी से पर्फेक्ट स्मार्ट लुक पा सकती हैं.

आत्मविश्वास से भरपूर ऑफिस लुक के लिए आप आकर्षक डिजाइन वाले ब्लॉक हील या चौड़े हील वाले फुटवियर पहन सकती हैं.

परफेक्‍ट फुटवियर के सलेक्‍शन के लिए कुछ टिप्‍स.

न्‍यूट्रल कलर के हील या वेज

ब्राउन, बिज कलर में ढेर सारी आड़ी-तिरछी पट्टियों के डिजाइन वाले फुटवियर आपके कलेक्शन में होना चाहिए. चाहे जूतियां हों या वेजज यानी चौड़े हील वाले फुटवियर न्‍यूट्रल कलर किसी भी स्टाइल को सूट करते हैं और आपको स्मार्ट लुक देते हैं.

ब्लॉक हील वाली जूति और सैंडिल

फॉर्मल कपड़ों के ऊपर ब्लॉक हील वाली जूतियां और सैंडिल जंचते हैं. कम या मीडियम लंबाई वाली लड़कियां इन्हें पहनकर लंबी नजर आती हैं. ऐसे आप अपने आत्मविश्वास से भरपूर लुक के साथ सबको प्रभावित कर सकती है.

स्लीक स्टाइल लोफर जूति

स्लीक स्टाइल वाली ब्राउन, बिज कलर की लोफर जूतियां आपकी पर्सनेलिटी को पल भर में आकर्षक लुक देती हैं. चाहे आप स्ट्रेट कट-पैंट्स, पेंसिल स्कर्ट या ढीला ट्राउजर पहन सकती हैं. ये जूतियां सब पर सूट करती हैं.

वेज हील

वेजस हील के फुटवियर लगभग सभी फॉर्मल कपड़ों के साथ जंचते हैं. चौड़ी हील होने के कारण पहनने के लिए भी ये आरामदायक होते हैं.

ब्लैक फुटवियर

काले रंग का फुटवियर सदाबहार है. यह हमेशा फैशन में बना रहता है. सभी कामकाजी महिलाओं के पास यह जरूर होना चाहिए, क्योंकि यह लगभग सारे कपड़ों के ऊपर सूट करता है और साथ ही अच्छा लुक भी देता है.

प्रकृति का धवल आंचल हिमाचल

प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर हिमाचल प्रदेश दूरदूर तक फैली हिमाच्छादित पर्वत शृंखलाओं, हरेभरे मैदानों, कलकल करती नदियों, झरनों के कारण पर्यटकों को आकर्षित करता रहा है. आइए, इस के खुशगवार नजारों पर दृष्टि डालें.

हमारी टोली की ट्रैक गाइड आइसा कह रही थी, ‘‘इस बार कुछ नया हंगामा करेंगे. खानाबदोशी का निराला जश्न मनाएंगे. ऐसा ट्रैक पकड़ेंगे कि हिमाचल प्रदेश के अधिकांश ऊपरी रोमांचक स्थलों पर पैदल घूमा जा सके और वहां बसे लोगों के संग फुरसत से रहा जा सके. हम तिब्बत से जुड़ी भारत की अंतिम आबादियों तक जाएंगे.’’

इस सफर में 14 मित्र शामिल हुए, हालांकि हमें 10 से ज्यादा की उम्मीद नहीं थी. पहाड़ों पर छोटी टोली में  झं झट कम रहते हैं. आइसा जैसी गाइड हों तो 2 ही बहुत हैं.

अगली सुबह हम ओल्ड मनाली से क्लबहाउस के रास्ते सोलंगनाला की पगडंडी पर थे. मनालसू नदी पीछे छूट गई. अब व्यास नदी हमारे दाहिने थी. सब नदी पार बसे वसिष्ठ गांव और उस के आगे के जोगनी फौल के खुलेपन को देख रहे थे. धीरेधीरे हम सब में एक फासला आ गया और हम बातचीत भूल कर नजारों में डूब गए.

हिमालय की घाटियों से बचपन से परिचित आइसा सब से आगे थी. पीछे छूट जाने वाले मित्रों की सुविधा के लिए वह हर मोड़ या दोराहे पर चट्टान पर चाक से तीर का निशान बना कर ‘एस’ लिख रही थी, ताकि अगर मोबाइल फोन काम न कर सके तो आगे मिला जा सके.

स्कूल के लिए निकले बालक बालिकाएं और बागों व वनों में निकले स्त्रीपुरुष मुसकराते और हाथ हिलाते. दोनों ओर फैले सेब के बागों में भरे अधपके सेबों पर लाली आ रही थी. सामने धौलाधार का अंतिम शिखर और उस से जुड़ा रोहतांग पर्वत अपने विराट रूप में सुबह की किरणों का सुनहरा जादू ओढ़े प्रतीत हो रहे थे.

2 घंटे के बाद सोलंगनाला के चट्टानी नदी तट पर हमारी टोली शवासन में लेटी थी. आइसा ने हमें मन और सांस को साधने की यौगिक क्रिया से गुजारा और बताया कि किस तरह शरीर थक जाने के बाद भी वह स्वयं को दोबारा अनोखी ऊर्जा से भर देता है. होश और जोश के साथ मन से मिलजुल कर भोजन पकाया व खाया. दोपहर बाद चाय पी कर हम मनाली-लेह रोड की चढ़ाई की ओर मुड़े. पलचान और कोठी के बीच के अनोखे मखमली भूभाग से गुजर कर शाम को गुलाबा के ऊपरी वन में पहुंचे, जहां देवदारों का सिलसिला समाप्त होता है और भोजपत्र के वन दिखाई देने लगते हैं.

सुबह हम चले तो ग्लेशियरों और  झरनों से घिरी चढ़ाई पार कर के मढ़ी पहुंचे, जहां पेड़पौधे नहीं उगते. हमारे सिरों के ऊपर सैलानी हैंडग्लाइडरों पर उड़ रहे थे. यहां से मनाली तक की ढलानों और उन पर बिछी सर्पीली सड़क और चारों ओर के बर्फ ढके पहाड़ों को देखना रोमांचक है.

मढ़ी के निचले क्षेत्र में नदी की धाराओं और ग्लेशियरों पर हजारों पर्यटकों को एक नजर में खेलते और खातेपीते देखा जा सकता है. मढ़ी में भी एक ढाबे में जलते चूल्हे के इर्दगिर्द हमारे रैनबसेरे का इंतजाम हो गया, अपने पल्ले में ओढ़नेबिछाने और खानेपीने का इंतजाम हो तो मईजून में जनवरीफरवरी की ठंडक पाने का मजा ही कुछ और है. जहां जलाने की लकड़ी नहीं होती, वहां चाय बनाने के लिए नन्हा गैसस्टोव हमारी मदद कर रहा था. रोमांच की आंच हो तो इस से अच्छा और क्या हो सकता है.

हमारी टोली की जयपुरवासी नेहा गा रही थी, ‘‘इस रंग में कोई जी ले अगर…’’

सुबह सूरज निकलते ही हम रोहतांग पर्वत की चोटी पर चढ़ रहे थे, दिसंबर से 5-6 महीने के लिए यह रास्ता वाहनों और पैदल यात्रियों के लिए पूरी तरह बंद हो जाता है, लेकिन जून से अक्तूबर तक इस पर दुनियाभर के सैलानियों का मेला दिखाई देता है. हजारों लोग जोखिम उठा कर अपनी कारों पर सपरिवार यहां पहुंचते हैं.

मनाली से रोहतांग शिखर 52 किलोमीटर है. हम ने शौर्टकट वाली कुछ पगडंडियां पकड़ कर 10-12 किलोमीटर कम कर लिए थे. इस में चढ़ाई ज्यादा बढ़ जाती है, लेकिन कुदरत के अजूबे ज्यादा मिलते हैं.

दोपहर से पहले हम रोहतांग की चोटी पर थे. पर्यटकों को ले कर मनाली से मुंहअंधेरे निकली गाडि़यों की कतारें लग रही थीं. यहां की बर्फ से व्यास नदी निकली है जो आगे आने वाले  झरनों और नालों से भरती चली गई है. रोहतांग पर्वत पर नीले आसमान से उतरी मीठी धूप में बैठने, बर्फीले मैदानों पर टहलने और ढलानों पर फिसलने का मजा लेने के बाद रोहतांग के उस पार निकले.

उतराई पर बसमार्ग से हट कर निकली पगडंडी ने हमारे सफर को राहत दी. 3 घंटे के बाद हम रोहतांग की तलहटी पर बहती चंद्र नदी के किनारे अगले भोजन के लिए

3 पत्थरों वाला चूल्हा बना रहे थे. सूखे हुए तिनके और डंठल आसानी से मिल गए. सूखा हुआ गोबर भी काम आया. ग्रांफू नामक इस जगह से बाएं लाहुलस्पिति के मुख्यालय केलांग को और दाएं स्पिति घाटी को रास्ते हैं. हमें स्पिति जाना था. तभी घास से अधभरा एक ट्रक हमारे चूल्हे के पास आ कर रुका. ड्राइवर ने हमारी चाय सुड़की और बताया कि अगर हम 14 नरनारी घास के बीच समाना पसंद करें तो वह हमें बातल तक पहुंचा देगा. यह एक संयोग था कि हमें बातल में डेरा डालना था, जहां से 12 किलोमीटर का चंद्रताल लेक ट्रैक दुनिया के बेहतरीन घुमक्कड़ों को निमंत्रण देता आया है.  शाम को हम चंद्र नदी के किनारे बातल में डेरा डाल चुके थे.

रोमांच से भरा चंद्रताल

सुबह आइसा की आवाज गूंजी, ‘‘चायवाय और बाकी सब कुछ रास्ते में होगा. 7 बजने वाले हैं. दोपहर को हम चंद्रताल पर खिली धूप में खाना पका रहे होंगे. आप लोग वहां फैसला करेंगे कि आज यहां लौटना है या वहीं कहीं गुफा में रहना है. मैं रात को वहीं रुकना चाहती हूं.’’ मैं ने बताया, ‘‘मैं अकेला होता हूं तो सप्ताहभर वहीं रहता हूं. आज तो नहीं लौटूंगा.’’

चंद्रताल पहुंचे तो वहां का मंजर देख कर चिल्लाए, ‘‘आज यहीं रहेंगे.’’ जेएनयू दिल्ली के हितेश और लंदन की मिरांडा को कल से हलका बुखार था, लेकिन उन्होंने बताया कि यहां की प्यारी हवा में दोपहर तक बुखार उड़ जाएगा. सब उस पतली धारा में हाथपांव भिगोने लगे जो चंद्रताल  झील में से निकल कर चंद्रताल नदी बनाती है और केलांग के पास भागा नदी से मिल कर चंद्रभागा हो जाती है. इसी नदी को चेनाब कहा जाता है यानी चंद्रनीरा.

एक छोर पर थैले और स्टिक्स छोड़ कर सब चुपचाप अकेलेअकेले  झील की ढाई किलोमीटर की परिक्रमा पर निकल गए. हम ने पूर्णिमा की रात यहां रहने के लिए चुनी थी. आइसा यह देख कर मुसकराई कि कुछ साथी अपनी नोटबुकें निकाल कर कुछ लिखने लगे हैं. वह बोली, ‘‘यहां आ कर मैं ने अकसर कविताएं और कहानियां लिखी हैं. हिमाचल प्रदेश में यह एकमात्र जगह है, जहां मकान या मंदिर जैसी कोई चीज दिखाई नहीं देती. आकाश जैसी यह  झील है और उस के चारों ओर खड़े बर्फीले पर्वत. मन सीधा कुदरत से बात करता है,’’ सहसा वह गाने लगी, ‘‘अज्ञात सा कुछ उड़नखटोले पर आता है और हमारे कोरे कागज पर उतर जाता है…’’

रात को चांद निकला तो वही हुआ, जिसे सम झाया नहीं जा सकता. चांद के निकलते ही  झील में लहरें उठने लगीं और चांद की परछाईं उन में नाचती रही. हमारे पास चांद और लहरों के साथ थिरकने के अलावा और कुछ नहीं था. चंद्रताल और उस के सारे विराट मंजर को प्रणाम कर के हम अपना हर निशान मिटा कर लौटे. अधकचरे लोग तो हर कहीं अपना नाम खोद कर ही लौटते हैं.

तन और मन का शोध करने वालों की बस्ती

बातल से कुंजुम दर्रे तक खड़ी चढ़ाई है. दोपहर को बातल में बस मिली और शाम को हम कुंजुम और लोसर गांव की अनोखी बुलंदियों से होते हुए स्पिति के मुख्यालय काजा में पहुंचे. अगली सुबह हम पास ही ‘की’ गोंपा को निकले और दोपहर को दुनिया के ऐसे सब से ऊंचे गांव किब्बर में पहुंचे जहां बिजली भी है और बस भी पहुंचती है. स्पिति नदी के तट पर बसे काजा क्षेत्र और वहां के लोगों के बीच 2 दिन बिताने और जीभर कर सुस्ताने के बाद हम ने ताबो की बस पकड़ी.

लगभग डेढ़ सदी पहले ताबो में ऐसे  स्त्रीपुरुषों ने डेरा जमाया था जो निपट सन्नाटे में रह कर तन और मन के रहस्यों को जानना चाहते थे. ताबो संग्रहालय में उन लोगों की प्रतिमाएं और ममियां देखी जा सकती हैं. ‘की’ गोंपा, काजा और ताबो में आज भी गहरी रुचियों वाले लोग अज्ञातवास में रहने आते हैं. हर गोंपा में ध्यान, निवास और खानेपीने की सुविधाएं हैं. बौद्ध परंपरा में भी हालांकि रूढि़यां भर गई हैं लेकिन वहां हर व्यक्ति को अपने ढंग से भीतरबाहर का अध्ययन करने की स्वतंत्रता है. शांत चित्त के लिए तो यहां की दुनिया संजीवनी है.

किन्नर कैलास और वास्पा घाटी

चांगो की हिमानी और चट्टानी दुनिया और नाको  झील की खामोशी से बातें करते हम उस सतलुज नदी के तटों पर थे जो मानसरोवर से निकल कर यहां से गुजरती है. हिमाचल का जिला किन्नौर सामने था. मुख्यालय रिकांगपिओ और कल्पा से हम ने किन्नर कैलास की बुलंदियों को देखा.

रिकांगपिओ से हम सतलुज और वास्पा नदियों के संग पर कड़छम गए और वास्पा नदी के साथसाथ सांगला घाटी पहुंचे. वास्पा या सांगला घाटी किन्नर कैलास पर्वत के ठीक पीछे बसी है. यहां काला जीरा और केसर की खेती होती है. कई गांवों में से गुजरते हुए हम अंतिम भारतीय गांव चितकुल पहुंचे. हर गांव कलात्मक मंदिरों से संपन्न हैं. हर कहीं देवदारों के सिलसिले हैं.

ओगला और फाफरा नामक अनाजों से खेत सजे हुए मिले. नृत्य व संगीत के लिए कभी मौका न चूकने वाली मेहनती युवतियों ने हमें कई जगह घेरा और मेहमान बनाया. हिमालय के लोगों का दुर्लभ सरल स्वभाव इस घाटी की माटी में रचाबसा हुआ है. चितकुल में हमें शिमला जाने वाली बस मिली.

जलोड़ी दर्रे के आरपार

किन्नौर के टापरी, वांगतू, भाभानगर, तरंडा और निगुलसरी होते हुए हम शिमला जिले के ज्योरी, सराहन और फिर रामपुर बुशहर पहुंचे. अगले दिन फिर बड़ा रोमांच सामने था. सतलुज पार की चढ़ाई से पैदल कुल्लू जिले के जलोड़ी दर्रे पर पहुंचना और अगले दिन दूसरी तरफ उतरना. जलोड़ी की चढ़ाई रोहतांग से आसान है. रास्ते में कई गांव हैं. हम यहां की अनोखी सरयोलसर  झील तक गए और पास ही वनविभाग की हट में शरण ली. अगले दिन जलोड़ी दर्रे की दूसरी तरफ की उतराई पर शोजा और बनजार होते हुए दिल्ली-मनाली मार्ग पर आ गए.

शाम को हम नए ट्रैक्स पर जाने की योजना बना रहे थे, वे थे : मनाली के वसिष्ठ गांव से भुगु लेक, मनाली से नग्गर होते हुए मलाना, मलाना से मणिकर्ण होते हुए पार्वती वैली के रोमांचक स्थल क्षीरगंगा, क्षीरगंगा से बजौरा होते हुए पर्वत शिखर पर पराशर  झील, रिवालसर  झील और शिकारीदेवी शिखर. इस में एक और महीना लगने वाला था.

हिमाचल प्रदेश के अधिकांश ट्रैक्स आज ठहरने और खानेपीने की सुविधाओं से भरे हुए हैं, इसलिए जब भी जरूरी हो, पैदल चलने वाले लोग उन सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं.

ड्रामा क्वीन बनकर खुश हैं प्रियंका

प्रियंका चोपड़ा ने टीवी शो ‘क्वान्टिको’ के लिए दूसरा पीपल्स च्वाइस अवॉर्ड अपने नाम कर लिया है. अभिनेत्री एलेन पोम्पिओ और वियोला डेविज को पीछे छोड़ते हुए उन्होंने पसंदीदा ड्रामेटिक टीवी अभिनेत्री का यह पुरस्कार अपने नाम किया.

प्रियंका ने अवॉर्ड लेते समय जो भाषण दिया उससे सभी का दिल भी जीत लिया. इस दौरान हॉलीवुड फिल्म ‘बेवॉच’ में प्रियंका के को-स्टार ड्वेन जॉनसन लगातार मुस्कुराते हुए प्रियंका की हौंसला अफजाई करते दिखे.

प्रियंका ने अवॉर्ड हासिल करने के बाद अपने को-स्टार्स और नॉमिनेट हुए दूसरी एक्ट्रेस को शुक्रिया कहा है. उन्होंने अपने फैन्स को भी प्यार और समर्थन के लिए शुक्रिया कहा.

प्रियंका ने इस मौके पर एक वीडियो भी शेयर किया और वोटिंग करने वालों को थैक्स कहा. प्रियंका ने वीडियो के साथ लिखा, ‘ये आपके बिना संभव नहीं होता. आप सबको बहुत प्यार’.

प्रियंका के अलावा ‘2017 पीपल च्वाइस अवार्ड’ में भारतीय मूल की लिली सिंह को भी पसंदीदा यूट्यूब स्टार की श्रेणी में नामित किया गया था.

अभिनेत्री और कॉमेडियन एलन डेजेनेरस ने 43वें पीपल्स चॉइस अवार्ड में तीन और पुरस्कार जीतकर इतिहास रच दिया है. ‘फाइंडिंग डॉरी’ की स्टार ने माइक्रोसॉफ्ट थियेटर में अपना 20वां, 21वां और 22वां पुरस्कार जीता. वह अमेरिका में अपना एक टॉक शो होस्ट करती हैं जिसकी रेटिंग टॉप पर है.

एलन डेजेनेरस ने फेवेरेट डेटाइम टीवी शो होस्ट, फेवरेट कॉमेडिक कोलाबोरेशन और फेवरेट एनिमेटेड मूवी वॉयस का पुरस्कार जीता. गायक-अभिनेता जस्टिन टिम्बरलेक ने उन्हें ट्रॉफियां प्रदान की.

दुनिया के ये सिनेमा हॉल देख हैरान हो जाएंगे आप

दुनिया भर में कई ऐसे शानदार थिएटर हैं जो अपनी अनोखी बनावट और सुविधाओं के कारण मशहूर हैं. इनमें से किसी थिएटर के अंदर लोग बोट और कार पर बैठकर तो किसी थिएटर में बाथ टब और आरामदायक सोफे पर बैठकर फिल्में देखते हैं.

आज हम आपको कुछ ऐसे ही स्पेशल सिनेमा हॉल के बारे में बता रहे हैं.

आइनॉक्स थिएटर, वडोदरा (Inox theatre, Vadodara)

इस थिएटर के अंदर दर्शकों को आलीशान बिस्तर पर लेटकर फिल्में देखने का मौका मिलता है. इसकी प्रत्येक बिस्तरनुमा सीट पर दो लोग लेटकर फिल्में देख सकते हैं. इस थिएटर में फिल्म देखने के लिए प्रति व्यक्ति को 800 रुपए खर्च करने होंगे. इस थिएटर का संचालन मीडिया एंड एटरटेनमेंट कंपनी आइनॉक्स लेजर लिमिटेड करती है.

मूवी थिएटर इन पेरिस (Movie Theatre in Paris)

पेरिस का यह थिएटर, दुनिया के खास थिएटरों में गिना जाता है. इस थिएटर में नाव जैसा सिटिंग अरेंजमेंट है. यह थ्री डी थिएटर है.

साई-फाई डाइन-इन थिएटर, ओरलैंडो, अमेरिका (Sci-Fi Dine-In Theater Orlando, America)

इसमें बैठकर आप न सिर्फ मूवी देख सकते हैं, बल्कि सीट पर ही लंच या डिनर भी ऑर्डर कर सकते हैं.

इस थिएटर की चेयर कार के आकार की है.

ओलंपिया थिएटर, ग्रीस (Olympia theatre, Greece)

इस थिएटर के अंदर दर्शकों को आलीशान बिस्तर पर लेटकर फिल्में देखने का मौका मिलता है. बता दें कि सबसे पहले 1910 में ओलंपिया थिएटर का डिजाइन आर्किटेक्ट स्टैवरोस क्रिस्टिडिस ने किया था. वहीं, वर्तमान ओलंपिया थिएटर को 1950 में डिजाइन किया गया था.

न्यूपोर्ट अल्ट्रा सिनेमा, न्यूपोर्ट सिटी (Newport Ultra Cinema, Newport city)

यह लग्जरी थिएटर पूरी तरह 3डी टेक्नोलॉजी पर आधारित है. यहां 80 का सीट है. यहां ज्यादातर कपल्स जाते हैं, जिनकी प्राइवेसी का भी पूरा ख्याल रखा जाता है.

हॉट ट्यूब सिनेमा, लंदन (Hot tub cinema, London)

इस थिएटर में टब बने हैं. इन टब में पानी भरा रहता है. आप इनमें दोस्तों के साथ मूवी देख सकते हैं. यहां मूवी देखते वक्त ड्रिंक्स पर भी कोई पाबंदी नहीं है.

इलेक्ट्रिक सिनेमा, नॉटिंग हिल, लंदन (Electric cinema, Noting Hill London)

इस थिएटर की खूबसूरती देखते ही बनती है. यहां महरून रंग के सोफे लगे हैं, जिनके सामने छोटे-छोटे लैंप लगे हैं.

कॉलेज डिग्री के बिना कमायें लाखों

आजकल सभी को नौकरी चाहिए. हर व्यक्ति अपने पैरों पर खड़े होना चाहता है. पर किसी के परिवार वाले साथ नहीं देते, किसी का किस्मत तो किसी की डिग्री. अगर आप भी अपने जीवन में कुछ करना चाहती हैं, तो अभी देर नहीं हुई. बिना डिग्री के भी आप अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं. कुछ ऐसी नौकरीयां हैं, जिसमें सैलेरी बहुत है पर किसी खास डिग्री की जरूरत नहीं है. अगर आपके पास कम्यूनिकेशन, प्लानिंग, स्ट्रेटजी जैसे स्किल्स हैं तो बिना डिग्री के भी नौकरी मिल सकती है.

इन नौकरियों के लिए नहीं चाहिए कोई डिग्री-

1. कस्टमर सपोर्ट ऑफिसर

किसी भी कंपनी को मार्केट में अपना प्रोडक्ट चलाना के लिए कस्टमर को खुश करना बहुत जरूरी है. यह प्रोफेशन कस्टमर्स का पूरा ख्याल रखने के लिए ही बना है. अगर आपके पास अच्छे कम्यूनिकेशन स्किल्स हैं तो आप इसमें अपना करियर बना सकती हैं. आपको अपने कंपनी के कस्टमर्स के शिकायतों और प्रोबलेम का समाधान करना होगा. कई बार अप्रिय भाषा भी सुनने को मिलेगी. इसलिए आपके पास स्ट्रॉन्ग कम्यूनिकेशन स्किल्स होना बहुत जरूरी है.

2. रियल एस्‍टेट एजेंट

आसान से शब्दों में कहा जाए तो ‘ब्रोकर’. बड़े शहरों में बिना ब्रोकर के फ्लैट ढूंढना बहुत मुश्किल है. ये प्रॉपर्टी के खरीदने ये रेंट करने के लिए विक्रेता और खरीदार के बीच में बिचौलिए का किरदार निभाते हैं. अगर आप में आत्मविश्वास है तो आप भी ये काम कर सकती हैं. एजेंट बनने के लिए डिग्री की नहीं, पर लाइसेंस की जरूरत जरूर पड़ती है.

3. मेकअप आर्टिस्‍ट

अगर आप क्रिएटिव हैं और आपमें आर्टिस्‍टि‍क स्किल्‍स है तो आप सफल मेकअप आर्टिस्‍ट बन सकती हैं. मॉडलिंग, फैशन, सिनेमा आदि क्षेत्रों में मेकअप आर्टिस्‍ट की अपने टैलेंट के हिसाब से अच्‍छी कमाई होती है. इसके लिए भी किसी डिग्री का होना आवश्‍यक नहीं है. अगर आपके पास टैलेंट है तो आप अच्छी कमाई कर सकती हैं.

4. सोशल मीडिया मैनेजर

बदलते समय के साथ बहुत सारे नए प्रोफेशन भी आ गए हैं. सोशल मीडिया मैनेजर भी नए जमाने का जॉब है. आजकल हर कंपनी का सोशल मीडिया पर होना कंपनी की जरूरत बन गया है. एक सोशल मीडिया मैनेजर को ट्विटर, फेसबुक और लिंक्डइन जैसी साइट्स पर अपनी कंपनी का स्टेटस अपडेट लिखना, प्रमोशन कंटेंट बनाना, सवालों के जवाब देना और कमेंट्स का रिप्लाई करना जैसे काम करने होते हैं. इस जॉब के लिए भी कोई स्पेसिफिक डिग्री नहीं चाहिए. पर आपको सोशल मीडिया के बारे में पता होना चाहिए और आपके पास क्रिएटिविटी भी होनी चाहिए.

5. इवेंट मैनेजर     

शादी हो, घर का प्रोग्राम या कोई ऑफिस इवेंट, किसी भी छोटे-बड़े फंशन के आयोजन के लिए इवेंट मैनेजर की जरूरत पड़ती है. पार्टी करने के लिए एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है जो पार्टी को प्रोपर तरीके से प्लैन कर सके और विभिन्न प्रकार के इवेंट्स और समारोहों के आयोजन में अहम भूमिका निभाएं. अगर आपका क्रिएटिव माइंडसेट है तो आप बिना डिग्री के इस प्रोफेशन में ऊंचाइयां छू सकती हैं.

6. फ्रीलांस फोटोग्राफर  

फोटोग्राफी कुछ लोगों के लिए सिर्फ एक हॉबी है. अगर फोटोग्राफी आपकी भी हॉबी है, तो आप इसे अपना प्रोफेशन भी बना सकती हैं. हालां‍कि इस प्रोफेशन में आपको अपने क्‍लाइंट्स की जरूरत के हिसाब से काफी ट्रेवल भी करना पड़ सकता है. लेकिन इसके लिए कोई डिग्री की जरूरत नहीं हैं.

7. पर्सनल ट्रेनर

यह एक दिलचस्प जॉब है. पर इसके लिए पहले आपको खुद फिट होना पड़ेगा. हेल्थ को लेकर लोग पहले के मुकाबले ज्यादा जागरूक हो रहे हैं. इशलिए पर्सनल ट्रेनर की डिमांड बढ़ गई है. इस जॉब को करने के लिए आपको डिग्री या सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं पड़ती है. इस पेशे में आप लाखों रुपये कमा सकती हैं.

8. रेडियो जॉकी

अगर आपकी आवाज में भी जादू है तो आप रेडियो जॉकी बन सकती हैं. इस जॉब के लिए कम्यूनिकेशन स्किल्स चाहिए. अगर शब्दों पर आपकी अच्छी पकड़ है तो आप रेडियो जॉकि बन सकती हैं.

यहां देखें शाहिद-कंगना का जबरदस्त रोमांस

सैफ अली खान, शाहिद कपूर और कंगना रनौत की फिल्म रंगून का दूसरा गाना रिलीज हो गया है. रंगून का गाना ‘ये इश्क है’ एक सॉफ्ट रोमांटिक गाना है. गाने में कंगना रनौत और शाहिद कपूर बोल्ड सीन में नजर आ रहे हैं. फिल्म के इस खूबसूरत गाने को अरिजीत सिंह ने गाया है साथ ही गीत गुलजार के हैं और म्यूजिक डायरेक्टर विशाल भारद्वाज हैं.

रोमांटिक गानों के मूड को बेहतरीन तरीके से समझने वाले अरिजीत ने इस गाने को और भी खूबसूरत बना दिया है. गाने का म्यूजिक विशाल भारद्वाज ने दिया है. गाने में कंगना और शाहिद का केमिस्ट्री लाजवाब है.

सैफ अली खान फिल्म में निगेटिव रोल प्ले करते नजर आएंगे. मालूम हो कि इस फिल्म में जंग और 1944 का लुक देने के लिए विशाल भारद्वाज को अधिकांश शूटिंग अरुणाचल प्रदेश के घने जंगलों में करनी पड़ी थी.

जंगलों में शूटिंग की परमिशन के लिए विशाल को सरकारी और निजी दफ्तरों के खूब चक्कर भी काटने पड़े थे. कुछ वक्त पहले एक्ट्रेस कंगना रनौत ने अपने एक बयान में कहा था कि फिल्म की शूटिंग के दौरान टीम को जंगल में और पहाड़ियों के पीछे और झाड़ियों के पीछे जाकर टॉयलट और कपड़े बदलने जैसे काम निपटाते पड़ते थे.

शाहिद, सैफ और कंगना की यह तिकड़ी पहली बार किसी फिल्म में एक साथ नजर आएगी. जहां तक निर्देशक विशाल भारद्वाज के साथ काम करने का सवाल है तो शाहिद कपूर फिल्म ‘कमीने’ और ‘हैदर’ में उनके साथ काम कर चुके हैं, वहीं सैफ अली खान ने ‘ओमकारा’ में विशाल के साथ काम किया है. कंगना रनौत के लिए यह पहला मौका है जब वह इस दिग्गज निर्देशक के साथ काम कर रहे हैं. फिल्म की रिलीज डेट 24 फरवरी 2017 तय की गई है.

नोटबंदी से परेशान युवा

सरकारकी धौंस दुनिया भर में नागरिकों को परेशान करती है पर जो मनमानी नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी कर के दिखाई है इस से बूढे़, बिजनैसमैन, औरतें तो परेशान हैं हीं, लाखों युवा भी परेशान व हताश हैं जो अपने घरों में रह रहे हैं या घरों से सैकड़ों मील दूर पढ़ने या काम करने के लिए आए हुए हैं और अब तक या तो छोटी कमाई पर जीते थे या घर से पैसा मंगाते थे और जिन के पास अपने रहने के ठीहे में 4 दिन का खाना भी नहीं होता.

ये युवा आजकल 8 नवंबर के बाद से मारेमारे फिर रहे हैं. इन के पुराने नोट कुछ मिनटों में सरकारी डकैती के शिकार हो गए. इन्होंने कितने ही संभाल कर रखे हों, वे मिनटों में बेकार हो गए, बरबाद हो गए. बहुत से इन दिनों परीक्षाओं की तैयारियों में लगे हैं पर उन्हें किताबों को छोड़ कर बैंकबैंक एटीएमएटीएम भटकना पड़ रहा है.

आम घरों में 10-12 दिन का खाना होता है, तेलसाबुन होता है, बिजली का बिल देने में समय होता है. कुछ दिन लायक गैस होती है. पर इन युवाओं के पास आज कल या परसों तक का ही इंतजाम रहा है, क्योंकि ये जरूरत के हिसाब से रोज खरीदते हैं. 1000 व 500 के नोटों को छीन लेने के बाद मोदी सरकार ने हजारोंलाखों युवाओं को कंगाल बना दिया जिन्हें खाने तक के लिए जहां रह रहे हैं वहां के दोस्तों पर निर्भर रहना पड़ रहा है.

कहने को यह नोटबंदी कालेधन को खत्म करने के लिए की गई थी पर यह ऐसा ही है जैसे शहर में चोरियां हो रही हों तो शहर को ही उजाड़ दो. न कोई रहेगा, न चोरी होगी. सरकार इतनी छोटी सोच की व इतनी दंभी और बेरहम हो सकती है, यह उम्मीद न थी. जिस सरकार को अच्छे दिनों के लिए लाया गया था, उस ने युवाओं को 50 दिन की सजा दी है, 150 दिन की या 500 दिन की कहा नहीं जा सकता.

लगता तो यही है कि पहले से ही चरमराई अर्थव्यवस्था की कीलें निकाल फेंकी गई हैं और न जाने कब यह सब व्यापार कामधंधे बंद हो जाएं. क्योंकि हर कोई अपनी वर्षों की कमाई की सुरक्षा को खो बैठा है और नई नौकरियां तो क्या मिलेंगी, पुरानी ही चली जाएंगी.

युवाओं के लिए यह देशव्यापी आर्थिक भूकंप है जो हरेक को मलबे में दबा रहा है. जो मकान बने हैं, सब में दरारें पड़ गई हैं और कब गिरेंगे कहा नहीं जा सकता.

कार्ड पेमैंट गले की फांस

युवाओं के लिए अच्छे दिन आ गए हैं. नोटबंदी को गले से उतारने के लिए सरकार कार्ड पेमैंट पर बहुत से छोटेछोटे चार्ज समाप्त कर रही है और ज्यादा लोग अब कार्ड से भुगतान लेने लगे हैं. यह भले एक तरह से अच्छा लगे पर जो अनुशासन सदियों से चल रहे कागज के नोटों का है, वह टूट जाएगा. कार्ड की संस्कृति ऊपरी तौर पर चाहे जितनी अच्छी लगे असल में यह मानसिक तौर पर गुलामी ही है.

कागज का नकद नोट हर युवा के लिए स्वतंत्रता है कि वह पैसा अपनी गर्लफै्र्रंड के लिए सिनेमा के टिकट के लिए खर्च कर रहा है, बिना मातापिता को बताए मुंबई का चक्कर लगा कर आ रहा है, आर्थर हेली की नई किताब खरीदने पर खर्च कर रहा है या किसी कोचिंग वाले सर से क्लास ले रहा है. उसे अपना ड्रीम नहीं छोड़ना पड़ रहा है. पूर्व कांग्रेस सरकार भी कुछ कम नहीं थी पर वर्तमान सरकार अति कर रही है, चाहती है कि हर काम कार्ड पेमैंट से हो, ताकि पता चल सके कि कब क्या किया गया.

इस कार्ड संस्कृति का नतीजा होगा कि हर युवा का जीवन एक खुली किताब हो जाएगा और जो चाहेगा वह पता लगा लेगा कि उस ने कब, कहां, क्या खर्च किया. आप के जीवन की प्राइवेसी बिलकुल समाप्त हो जाएगी. प्राइवेसी एक मौलिक हक है और उसे बचा कर रखा जाना चाहिए पर देशभक्ति, आतंकवाद और कालेधन के चक्कर में इसे कार्ड पेमैंट के शगूफे के जरिए सरकार बुरी तरह निगल रही है.

नोटबंदी अपनेआप में सरकार का अपने ही नागरिकों पर आतंकी प्रहार है. करोड़ों युवाओं के किताबों में छिपा कर रखे गए 500 व 1000 के नोट निकाल लिए गए हैं और बहुतों ने तो अनापशनाप तरीके से उन्हें खर्च भी किया है. कुछ गृहिणियां तो 1000-500 के नोट महीनों बाद निकालेंगी और तब तक वे बेकार हो गए होंगे. ऊपर से सरकार ने प्राइवेसी पर काबू करने का चौकस इंतजाम कर लिया है.

कार्ड से पेमैंट करना आधुनिक तरीका हो सकता है. यह अमेरिका व यूरोप में बहुत लोकप्रिय है पर वहां लोग उधार की जिंदगी जीने के आदी हैं, वे खर्च पहले करते हैं, कमाते बाद में हैं और इसलिए कार्ड उन के लिए लाभकारी है. हमारे यहां जितनी जेब उतने खर्च की आदत है और यह अच्छी आदत है. उधार पर जीने वाले यहां बहुत सा सामान महंगा खरीदते हैं औैर अपनी कमाई को खो देते हैं. प्राइवेसी का सवाल उन के मन में भी रहता है, क्योंकि जिस से भी सामान उधार लिया जाता है, उसे अपनी फटेहाली की दास्तान सुनानी पड़ती है.

कैशलैस संस्कृति के पैरोकार ढेरों में युवा वर्ग में मिल जाएंगे पर वे नहीं जानते कि क्रैडिट कार्ड उन के गले का फंदा भी बन सकता है. जहां दूरी हो वहां तो पेमैंट कार्ड से ठीक है पर आमनेसामने का लेनदेन थोपा जाए कि कार्ड से ही हो, गलत है.

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