एक पहेली की तरह है नर्सरी में ऐडमिशन

नर्सरी स्कूलों में अपने बच्चों को प्रवेश दिलाना मातापिताओं के लिए सारे देश में एक दुखद प्रक्रिया हो गई है. बच्चे स्कूल जाएं, पढ़ेंलिखें और योग्य युवा बनें. यह अब आदर्श सपना हो गया है कि बच्चे अच्छे स्कूल में जाएं, जहां शान से सिर उठा सकें और फिर पढ़ें या न पढ़ें चमचमाते दिखें. स्कूली शिक्षा पढ़ाई व जानकारी के लिए नहीं वर्ग और वर्ण यानी स्टेटस और कास्ट से जुड़ गई है, जो पहले नर्सरी प्रवेश से शुरू होती है. गोरे ऊंचे वर्ण में पैदा हुई संतान की तरह अच्छा स्कूल जीवन में सफलता की पक्की सीढ़ी माना जाने लगा है.

दिल्ली के स्कूलों में नर्सरी में प्रवेश में ही इतने विवाद होने लगे हैं कि उच्च व सर्वोच्च न्यायालय व सरकार रोज नियम व कानून बनाती और बदलती है. दिल्ली में बहुत स्कूलों को वह जमीन दी गई है जिसे सरकार ने जबरन किसानों से सस्ते दाम पर खरीदा था और उसे बाजार भाव से थोड़े से कम दाम पर स्कूल चलाने वाली संस्थाओं को अलौट किया था. इस अलौटमैंट में बहुत सी शर्तें डाल दी गई थीं, जिन्हें उस समय संस्था के संचालक पढ़ते भी नहीं थे, क्योंकि जमीन का बड़ा टुकड़ा पाना अपनेआप में एक टेढ़ी खीर होता है. अब सरकार उस हक के नाते स्कूलों पर रोब गांठती है, तो संचालक चूंचूं करते हैं.

हाल ही में दिल्ली सरकार ने आदेश दिया है कि नर्सरी में प्रवेश केवल आसपास के पड़ोसी इलाकों में रह रहे मातापिताओं के बच्चों को दिया जाएगा और जो लोग किराए पर रह रहे हैं वे इस सुविधा का लाभ न उठा सकेंगे. किराएदारों को वंचित रखा गया है, क्योंकि मातापिता फर्जी किराया ऐग्रीमैंट बनवा लेते हैं ताकि मनचाहे स्टेटस और कास्ट के स्कूल में दाखिला मिल सके.

छोटेछोटे बच्चों को भेड़ों की तरह रिकशों और कैबों में भर कर ले जाना देश भर में देखा जा सकता है, क्योंकि नेबरहुड स्कूल भी इतने दूर होते हैं कि आज के कोमल बच्चे 20-25 मिनट की वाक भी नहीं कर सकते. व्यस्त मातापिता उन्हें रिकशा वालों और कैब ड्राइवरों के हवाले कर देते हैं.

एक तरह से मातापिताओं, स्कूल संचालकों और सरकारों ने मिल कर शिक्षा का न केवल भयंकर बाजारीकरण कर दिया है, इस पर शासकीय आदेशों, अदालती फैसलों, नेतागीरी की कालिख व पैसे की चाहत के काले ब्रश भी फेर दिए हैं. मातापिता 4 लोगों में अपने बच्चे के स्कूल के गुणगान गा सकें. इस के लिए वे हर नेता, संचालक, व्यापारी की खुशामद को तैयार रहते हैं.

नर्सरी से ले कर 8वीं कक्षा तक की शिक्षा पास के स्कूल में हो यह अच्छी बात है पर अंत के 4 साल ही बच्चे का भविष्य बनाएं, ऐसी कोई नीति बननी चाहिए और इन 4 सालों में वे धर्म, जाति, स्टेटस के आधार पर नहीं, बल्कि योग्यता के आधार पर स्कूलों में प्रवेश पाएं.

छोटे बच्चे नामी स्कूल से न जुड़ें यह भावना पैदा करने की कोशिश करना आवश्यक हो रहा है ताकि छुटपन में ही बच्चों में उच्च या हीनभावना पैदा न हो. यह पहेली हल करना आसान नहीं, क्योंकि किसी को उसे हल करने की फुरसत भी नहीं है.

सर्दियों में ऐसे करें त्वचा की देखभाल

सर्दियों में हमारी त्वचा को कुछ खास देखभाल की जरूरत होती है. इस मौसम में ज्यादातर लोगों को शुष्क त्वचा की शिकायत हो जाती है पर कुछ घरेलू उपायों को अपनाकर आप सर्दी के मौसम में भी निखरी त्वचा पा सकती हैं.

सर्दियों में अपनाएं ये घरेलू उपाय

1. सर्दियों में त्वचा को कोमल बनाए रखने के लिए बादाम के तेल का इस्तेमाल करना बहुत फायदेमंद होता है. बेहतर फायदे के लिए आप चाहें तो रात के वक्त तेल लगाकर सो जाएं. सुबह उठने पर आप पाएंगे कि आपकी त्वचा का मॉइश्चर अब भी बरकरार है.

2. बाजार में बिकने वाले स्क्रब के स्थान पर चीनी के स्क्रब का इस्तेमाल करें. इससे डेड स्‍क‍िन तो साफ हो ही जाएगी आपके चेहरे का मॉइश्चर भी बना रहेगा.

3. साबुन का इस्तेमाल करने से बेहतर है कि सरसों के उबटन का इस्तेमाल करें.

4. चेहरा धोने के लिए न तो बहुत अधिक गर्म पानी का इस्तेमाल करें और न ही बहुत ठंडे पानी का.

5. नहाने के बाद हल्के हाथों से तौलिए का इस्तेमाल करें. संभव हो तो नहाने के तुरंत बाद नारियल के तेल से या किसी ऑयली बॉडी लोशन से पूरे शरीर पर मसाज करें.

गर्म पानी से नहाना हो सकता है खतरनाक

ठंड का मौसम शुरू होने के साथ ही हम गर्म पानी से नहाना शुरू कर देते हैं. पर शायद ही आपने ध्यान दिया हो लेकिन गर्म पानी से नहाने के बाद आपको अपनी त्वचा ज्यादा ड्राई और बुझी-बुझी नजर आती होगी. जानकारों की मानें तो गर्म पानी से नहाने से कई तरह की त्वचा संबंधी बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है.

सर्दी के मौसम में ठंडे पानी से नहाना तो संभव नहीं है लेकिन बहुत अधिक गर्म पानी से नहाना भी सही नहीं है. ऐसे में हल्के गुनगुने पानी का ही इस्तेमाल करें. इससे खुजली नहीं होगी और त्वचा का नेचुरल मॉइश्चर भी बना रहेगा.

ठंड के मौसम में खुजली होना एक आम समस्या है. कई बार तो ये इतनी बढ़ जाती है कि घाव का रूप ले लेती है. पर आप चाहें तो नहाने के पानी में ऑलिव ऑयल या नारियल के तेल की कुछ बूंदें डालकर इससे नहा सकते हैं. तेल की दो से चार बूंदों का पानी में इस्तेमाल करने से त्वचा की नमी खोती नहीं है और यह रूखी व बेजान नहीं होती.

इसके अलावा गर्म पानी से नहाने के बाद पोर्स काफी संवेदनशील हो जाते हैं जिससे इंफेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है. अगर पानी बहुत अधि‍क गर्म है और वातावरण ठंडा तो शरीर पर लाल रंग के चकत्ते भी उभर सकते हैं. जिनमें काफी खुजली होती है. इसलिए कोशि‍श करें कि नहाए तो रोज लेकिन बहुत गर्म पानी से नहीं, गुनगुने पानी से.

इन फिल्मों ने समाज को दिए गलत संदेश

बौलीवुड फिल्मों से समाज पर सकारात्मक असर पड़ रहा है या नहीं, इस पर सालों से बहस चल रही है. पर अगर बात समाज में गलत संदेश भेजने की करें, तो बौलीवुड की फिल्में सालों से ये काम बखूबी कर रही हैं. जैसे- स्टॉकिंग जैसे अपराध को बौलीवुड की फिल्में हमेशा से प्रोमोट करती हैं. स्टॉकिंग ही क्यों, जातिवाद, लैंगिकवाद आदि को भी बौलीवुड की फिल्मों ने जाने-अनजाने बढ़ावा दिया है.

‘कौन सी बौलीवुड फिल्मों ने समाज में गलत संदेश भेजा?’, जब Quora पर यह सवाल पूछा गया तो यूजर्स के जवाब भी सवाल की तरह ही दिलचस्प थे. इन फिल्मों में हमशक्लस, ग्रैंड मस्ती जैसी फिल्में तो थी हीं पर दंगल जैसी फिल्म को भी कुछ लोगों ने समाज के लिए गलत बताया.

1. पार्टनर, ढिशूम, दोस्ताना…

मल्लिकार्जून पंड्या ने बहुत ही जरूरी बात कही. बौलीवुड की फिल्मों में सम्लैंगिक रिश्तों को हमेशा नकारात्मक रूप में प्रस्तूत किया है. ज्यादातर फिल्मों में ऐसा दिखाया जाता है कि गे खुलेआम स्ट्रेट पुरुषों की ताक में रहते हैं. पार्टनर फिल्म में सुरेश मेनन की किरदार इस मानसिकता का उदाहरण है.

बहुत से लोगों का मानना है कि दोस्ताना फिल्म का क्लाइमैक्स सम्लैंगिकता का मजाक उड़ाती है.

ढिशूम में भी अक्षय कुमार का किरदार गे लोगों का मजाक ही उड़ाता है.

2. कुछ कुछ होता है (1998)

यह फिल्म बहुत से लोगों के दिल को छू गई. पर इस फिल्म की शुरुआत ही एक बात पर सोचने पर मजबूर कर देती है. एक 8 साल की लड़की इतनी मैच्यूर है की अपने पापा को उनके ‘सच्चे प्यार’ से मिलाने में मदद करती है. सानंदन रतकल ने इस मूवी के बनावटीपन पर प्रशन उठाया. एक लड़के को लड़की से तभी प्यार हुआ जब लड़की साड़ी में, चुड़ियां खनकाते हुए भजन गाती है. बास्केट बॉल खेलते वक्त प्यार नहीं होता.

3. सुल्तान (2016)

सुल्तान ब्लॉकबस्टर हिट रही. पर सोशल मीडिया पर इस फिल्म के प्लॉट की आलोचना हुई. फिल्म का हीरो सिर्फ कुछ महिनों की ट्रेनिंग के बाद अंतर्राष्ट्रीय लेवल का पहलवान बन जाता है. पर हीरोईन यानी की एक महिला पहलवान 20 सालों से अपने स्कील्स को सुधार ही रही हैं, पर रिजल्ट नदारद. इससे भी हैरान करने वाली बात यह है कि प्रेगनेंट होने पर हीरोईन पहलवानी छोड़कर परिवार पर ध्यान देने लगती है. केतुल मकवाना ने हमारे पितृसत्तातमक समाज को दर्शाते हुए इस फिल्म की सटीक आलोचना की.

4. हौलीडे (2015)

फिल्म भले ही रोमांचक हो. बाइक सवार एक आर्मी ऑफिसर ऑटो में बैठी एक लड़की को देखकर जैसे इशारें करता है, यह कहीं से भी सभ्यता को नहीं दर्शाता है. अंकुर ने बौलीवुड फिल्मों में लड़कियों को इंप्रेस करने के इन गलत तरीकों के ट्रेन्ड को समाज के लिए गलत बताया है.

5. तनु वेड्स मनु रिटर्नस (2015)

इस फिल्म के लिए कंगना रनौत की जितनी भी तारीफ की जाए कम है. पर फिल्म में पारिवारीक रिश्तों पर खासी चोट की गई है. पालकेश असावा ने तनु द्वारा मनु के खिलाफ रेजिस्टर किए गए गलत केस कि ओर इशारा करते हुए बताया कि असल जिन्दगी में भी न जाने कितने ही लोग गलत केसों में फंसाए जाते हैं. ‘फिल्म में ये दिखाना कि एक शादीशुदा औरत कई मर्दों से फ्लर्ट करे तो कोई गलत बात नहीं, पर शादीशुदा पुरुष ने तलाकनामा भेज दिया तो वह बदचलन है.’

6. हैप्पी न्यू ईयर (2014)

कुछ नौसिखीए धोखेबाजी से एक इंटरनेशनल डांस चैम्पियनशिप जीत जाते हैं. कंदर्प जोशी की बात कड़वी पर सच है. उनका कहना है. ‘फिल्म में ये दिखाया गया है कि भारत के डांसर्स पूरी दुनिया को बेवकूफ बनाकर चैम्पियनशिप जीत जाते हैं. क्या भारतीय इतने बेवकूफ हैं कि ऐसे नौसिखीयों को एक विश्वस्तरीय चैम्पियनशिप में भेजेंगे. क्या चैम्पियनशिप के जज इतने बेवकूफ हैं कि उन्हें दिखाई ही न दे की कुछ गड़बड़ी है. फराह खान की सारी फिल्में समाज में गलत मैसेज ही भेजती है. उनकी फिल्में देखकर लगता है कि बौलीवूड की फिल्मों में स्क्रीप्ट ही नहीं होता.’

7. दंगल (2016)

साल के अंत की सबसे बड़ी फिल्म को कुछ लोगों ने सराहा, वहीं कुछ लोगों ने फिल्म की आलोचना की. नमन वर्मा के अनुसार एक पिता को गोल्ड मेडल के अलावा कुछ भी नजर नहीं आता. बच्चों से एक बार पूछा नहीं जाता कि वे क्या करना चाहती हैं. इतनी छोट-छोटी बच्चीयां अपने पिता के सपने को ही अपना सपना बनाकर जीती हैं. फिल्म में लड़कियों के पास दो ही ऑप्शन बचते हैं, या तो पहलवानी या फिर घर का काम.

8. स्टूडेंड ऑफ द ईयर (2012)

करण जोहर की यह फिल्म भले ही बॉक्स ऑफिस पर हिट रही हो. पर कोई भी कॉलेज ऐसा नहीं होता जहां पढ़ाई छोड़कर सब कुछ होता हो. Quora पर बहुत से लोगों ने इस फिल्म की आलोचना की. स्टूडेंट ऑफ द ईयर नामक कम्पीटिशन के कारण अच्छे-अच्छे दोस्त दुश्मन बन गए. फिल्म कॉलेज के बारे में लोगों की मानसिकता बदल देती है. बौलीवुड की ज्यादातर फिल्में ऐसा ही करती हैं. ऐसा दिखाया जाता है मानो कॉलेज में पढ़ाई छोड़कर सब कुछ होता हो.

नसबंदी का मर्म

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने नसबंदी लागू करने की वकालत की तो हल्ला मच गया कि देखो, फिर से इसलाम विरोधी बात की जा रही है. कट्टर हिंदूवादी इंदिरा गांधी के आपातकाल के बाद से ही मुसलिम आबादी को थामने की मंशा से नसबंदी का हौआ दिखाते रहते हैं.

किसी ने गिरिराज सिंह की मंशा या व्यथा पर ध्यान नहीं दिया कि यह बयान उन्होंने भुवनेश्वर स्थित कलिंग इंस्टिट्यूट औफ सोशल साइंस के दौरे के बाद बाकायदा उस का जिक्र करते दिया था जिस के मुखिया डाक्टर अच्युत सामंत हैं. सामंत ने अपनी जिंदगी बदहाल आदिवासियों के बच्चों को शिक्षा दिला कर मुख्यधारा से जोड़ने में खपा दी है. इस में वे सफल भी रहे हैं. गिरिराज सिंह उन के कार्य देख कर हैरान थे और इसी हैरानी ने उन के ज्ञानचक्षु खोले कि सुदूर इलाकों में हिंदुत्व की इस बुनियाद यानी आदिवासियों की जिंदगी बेहद भयावह है जिस का इकलौता इलाज उन्हें नसबंदी लगा, तो इस पर हल्ला क्यों.

शाही फकीर

अपना महान देश अभी भी साधु, संतों, सपेरों और फकीरों का ही देश है जिन के बारे में आम धारणा यह है कि ये लोग जो भी करते हैं जनता के भले के लिए करते हैं. इस भले के लिए वे त्याग, तपस्या करते हैं और वस्त्र तक त्याग देते हैं. महात्मा गांधी इस लोकतांत्रिक फकीरी शृंखला की आखिरी कड़ी थे.

इधर, चाय वाले की छवि धुंधली पड़ने लगी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुरादाबाद की परिवर्तन रैली में खुद को फकीर घोषित कर दिया. सूटबूट वाले इस शाही फकीर का फलसफा समझने वाले लोग अब शोध तक करने लगे हैं जो फैसले पहले लेता है, फिर बाद में उन की औचित्यता सिद्ध करने की बात करता है. उम्मीद नहीं है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मोदी की शाही फकीरी ब्रैंड बन पाएगी. वजह, बारबार भेष बदलने वाले को चमत्कारी नहीं, बल्कि बहुरूपिया कहा जाता है जिस का काम भला करना कम, मनोरंजन करना ज्यादा होता है.

आपने आजतक नहीं देखी होगी ऐसी फिल्म

निर्देशक संजय लीला भंसाली की आने वाली ‘पद्मावती’ इस साल की बहुप्रतीक्षित फिल्मों में से एक है और इस फिल्म का निर्माण कर रही वायकॉम 18 के अजीत अंधारे ने बताया कि यह ऐसी फिल्म होगी जो दर्शकों ने अब तक नहीं देखी होगी.

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित इस फिल्म में रणवीर सिंह दिल्ली में मध्यकालीन युग के शासक अलाउद्दीन खिलजी की भूमिका में होंगे जो महारानी पद्मावती से प्रेम करने लगते हैं. पद्मावती का किरदार दीपिका पादुकोण ने निभाया है.

फिल्म में शाहिद कपूर राजपूत शासक राजा रत्न सिंह और पद्मावती के पति की भूमिका में होंगे. स्टूडियो के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अंधारे बताते हैं कि ‘यह बेहतरीन फिल्म बन रही है और हम लोग आश्वस्त हैं. यह ऐसा होगा जो आपने पहले कभी नहीं देखा होगा. रणवीर, दीपिका, शाहिद इसमें अपने दिल और आत्मा से लगे हुये हैं. हम लोग 17 नवंबर को फिल्म प्रदर्शित करेंगे और इस समय मैं कह सकता हूं कि यह एक बड़ी फिल्म होगी.’

क्या आपने देखी इन सुपरस्टार्स की अनदेखी फोटो

सलमान खान ने ट्वीटर पर राकेश रोशन निर्देशित फिल्म ‘करन अर्जुन’ के 21 साल पूरे होने और ‘कहो ना प्यार है’ के 17 साल पूरे होने की खुशी में एक तस्वीर साझा की है. इस तस्वीर में वो रितिक रोशन और शाहरुख के साथ हैं.

इस तस्वीर के माध्यम से सलमान ने शाहरुख और रितिक दोनों को उनकी आने वाली फिल्मों के लिए शुभकामनाएं दी है. आपको बता दें की शाहरुख की फिल्म ‘रईस’ और रितिक की ‘काबिल’ 25 जनवरी को बॉक्स ऑफिस पर टकरा रही है.

भले ही आज रितिक और शाहरुख के रिश्ते उनकी फिल्मों के क्लैश को लेकर थोड़े बिगड़े हों, लेकिन सलमान के इस ट्वीट से यह इशारा तो साफ हो रहा है कि वो दोनों को ही 21 साल पीछे की याद दिलाना चाहते हैं जब इंडस्ट्री एक परिवार की तरह काम करती थी.

जरूरी है निवेश में नौमिनी होना

शिप्रा को 2 महीने हो गए बैंक के चक्कर काटते हुए. एक तो असमय पति का साथ छूट गया, ऊपर से बतौर नौमिनी उन का नाम दर्ज न होने की वजह से उन के बैंक अकाउंट में जमा रुपए और लौकर में रखे गहने निकालने के लिए कई तरह की औपचारिकताएं पूरी करतेकरते वे टूट सी गईं. गलती बैंक वालों की नहीं थी. शिप्रा के पति ने जरा सी समझदारी से काम लिया होता, तो इतनी जटिलताएं उत्पन्न नहीं होतीं. कुछ आसान सी औपचारिकताएं पूरी करते ही शिप्रा को उन के खाते में जमा रकम और लौकर खोल कर उस में रखा सामान निकालने की सुविधा मिल जाती.

अकसर ऐसी गलती बहुत से लोग करते हैं. शेयरों, म्यूचुअल फंड्स, फिक्स डिपौजिट्स या अन्य जमाओं के फौर्म भरते वक्त हम नौमिनेशन वाले कौलम को गैरजरूरी मानते हुए नजरअंदाज कर देते हैं. ऐसा इसलिए होता है कि फौर्म के इस कौलम को निवेश वित्तीय संस्थाओं ने आवश्यक न रख कर वैकल्पिक/ऐच्छिक श्रेणी में रखा है. नौमिनी न नियुक्त होने की सूरत में निवेशक की मृत्यु होने की स्थिति में जमा रकम को प्राप्त करना बेहद मुश्किल हो जाता है.

कई सारी कानूनी औपचारिकताएं पूर्ण करने के बाद ही उसे प्राप्त किया जा सकता है. निवेशक ने नौमिनी नियुक्त कर रखा हो, तो बैंक या वित्तीय संस्था द्वारा दिए गए फौर्म के साथ मृत्यु प्रमाणपत्र संलग्न कर के या आवेदन के साथ मृत्यु प्रमाणपत्र संलग्न कर के जमा कर देने पर आसानी से जमा रकम को प्राप्त किया जा सकता है. वहीं नौमिनी न होने की सूरत में वसीयतनामा, कानूनी उत्तराधिकारियों की प्रमाणीकृत सूची आदि देने की आवश्यकता पड़ जाती है.

क्या है नौमिनी?

नौमिनी एक ऐसी व्यवस्था है जिस के अंतर्गत निवेशक अपनी संपत्ति में अपना उत्तराधिकारी घोषित कर सकता है और निवेशक के न होने पर नौमिनी उस की संपत्ति पर अपना दावा पेश कर सकता है. कोई भी व्यक्ति अपनी चल, अचल संपत्ति के अलावा जीवन बीमा, भविष्य निधि, बैंक खातों, फिक्सड डिपौजिट और डीमैट में नौमिनी बना सकता है. डाकघर की कुछ योजनाओं जैसे पीपीएफ, कर्मचारी भविष्य निधि और जीवन बीमा की कुछ पौलिसियों में एक से ज्यादा नौमिनी बनाए जा सकते हैं. इन योजनाओं में मातापिता, पतिपत्नी को 50:50 फीसदी का उत्तराधिकारी बनाया जा सकता है.

भागमभाग की जिंदगी में जहां कभीकभी कुछ भी दुर्घटना घटित हो सकती है. ऐसे में घर के कमाने वाले सदस्य के चले जाने पर परिवार को आर्थिक संकट का सामना न करना पड़े इस के लिए जरूरी है कि पति विवाह के बाद अपनी प्रौपर्टी, बीमा पौलिसी या अन्य निवेश में अपनी पत्नी को नौमिनी बनाए. महिलाओं को नौमिनी बनाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और बीमा नियामक प्राधिकरण (इरडा) भी निवेशकों को समयसमय पर प्रेरित कर रहा है ताकि पति के न होने की स्थिति में उसे संकट का सामना न करना पड़े.

जानने योग्य बातें

– अधिकांश निवेश प्रपत्रों में नौमिनी का नाम, उम्र, पता और निवेशक से संबंध आदि जानकारियां दर्ज करने के लिए कौलम बने होते हैं. इन्हें अवश्य पूर्ण करें.

– निवेश के समय, नौमिनी का नाम आदि दर्ज करना भूल गए हों तो संबंधित बैंक/शेयर ब्रोकर/म्यूचुअल फंड या वित्त संस्था से नौमिनी फौर्म मांग कर तुरंत उसे भर कर जमा कर दें. नौमिनी पंजीकरण की संख्या दी जाती है, उसे भी जान लें.

– जरूरत पड़ने पर एक से अधिक नौमिनी भी नियुक्त किए जा सकते हैं और उन के हिस्से के प्रतिशत का उल्लेख भी किया जा सकता है. इस के लिए संबंधित संस्थान से सलाह लेना उचित होगा.

– अगर निवेशक एक से ज्यादा हैं तो सभी संयुक्त निवेशकों द्वारा नौमिनेशन फौर्म में हस्ताक्षर करना जरूरी होता है. भले ही औपरेट करने का निर्देश कुछ भी दिया गया हो.

– नौमिनी निवेश को अपने खाते में ट्रांसफर करवा सकता है, जिसे बाद में वह निकाल सकता है. इस के लिए उसे पैन कार्ड का ब्यौरा और केवाईसी की औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ सकती हैं.

– हिंदू संयुक्त परिवार के कर्ता और पावर औफ एटौर्नी होल्डर नौमिनेशन करने या बदलने के लिए अधिकृत नहीं होते. इन्हें किसी निवेश में नौमिनी भी नियुक्त नहीं किया जा सकता है.

– आप्रवासी भारतीय को नौमिनी नियुक्त किया जा सकता है, लेकिन निवेश की रकम भारतीय करैंसी में ही दी जाती है.

– अधिकांश मामलों में व्यक्तिगत हैसियत से ही किसी को नौमिनी नियुक्त किया जा सकता है, लेकिन कुछ निवेशों में ट्रस्ट या शैक्षणिक संस्थानों को भी नौमिनी बनाया जा सकता है.

पचमढ़ी: जहां मन हो जाए मदमस्त

इतिहास और खूबसूरती का अद्भुत रंग समेटे मध्य प्रदेश के हिल स्टेशन पचमढ़ी को सतपुड़ा की रानी के नाम से भी जाना जाता है. प्रदेश के होशंगाबाद जिले में सतपुड़ा की पहाडि़यों के बीच पहाड़ों और जंगलों से घिरे हिल स्टेशन पचमढ़ी में पर्यटकों को कश्मीर जैसी खूबसूरती व नेपाल की शांति मिलती है. अगर आप भी कुदरत के सौंदर्य को नजदीक से निहारना चाहते हैं तो सुकून और प्रदूषणरहित वातावरण से भरपूर पचमढ़ी एक बेहतर प्लेस है. यहां की खूबसूरती और आबोहवा सिर चढ़ कर बोलती है. खुशबूदार हवा, फाउंटेन, मनमोहक पेड़पौधे, पहाड़ और दूरदूर तक फैली हरियाली आंखों के सामने नैसर्गिक सौंदर्य का संसार प्रस्तुत करते हैं. यहां का तापमान सर्दी में 4.5 डिगरी सैल्सियस और गरमी में अधिकतम 35 डिगरी सैल्सियस होता है.

यहां आप सालभर किसी भी मौसम में जा सकते हैं. यहां की गुफाएं पुरातात्त्विक महत्त्व की हैं क्योंकि यहां की गुफाओं में शैलचित्र मिले हैं. यहां की प्राकृतिक संपदा को पचमढ़ी राष्ट्रीय उद्यान के रूप में संजोया गया है. पर्यावरण की दृष्टि से पचमढ़ी को सुरक्षित रखने के लिए यहां पौलिथीन का उपयोग नहीं करने दिया जाता.

दर्शनीय स्थल

पांडव गुफा

पचमढ़ी की एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थित 5 गुफाओं को पांडव गुफा के नाम से जाना जाता है. माना जाता है कि ये गुफाएं गुप्तकाल की हैं और इन्हें बौद्ध भिक्षुओं ने बनवाया था. ऐसी भी मान्यता है कि 5 पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान इन गुफाओं में कुछ समय बिताया था. गुफा के ऊंचाई पर स्थित होने के कारण यहां से पूरी पचमढ़ी के सौंदर्य को निहारा जा सकता है.

अप्सरा विहार

पांडव गुफा से आगे 30 फुट गहरा एक ताल है जहां नहाने और तैरने का आनंद लिया जा सकता है. बच्चों के साथ घूमने के लिए यह एक बेहतरीन पिकनिक स्पौट है.

रजत प्रपात

अप्सरा विहार से आधा किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस प्रपात से 350 फुट की ऊंचाई से गिरता इस का पानी एकदम दूध की तरह दिखाई देता है. अपने साथ एक जोड़ा कपड़ा ले जाएं ताकि इस प्रपात में स्नान कर सकें.

हांडी खोह

300 फुट गहरी यह खाई पचमढ़ी की सब से गहरी खाई है. खाई का अंतिम छोर जंगल के ऊंचेऊंचे पेड़ों के कारण दिखाई नहीं देता. घने जंगलों में ढकी इस खाई के आसपास कलकल बहते झरनों की आवाज सुनना अद्भुत आनंद देता है. ऊपर से देखने पर एक रोमांचभरी सिहरन पैदा होती है. स्थानीय लोग इसे अंधी खोह के नाम से भी पुकारते हैं. यहां बनी रेलिंग प्लेटफौर्म से पूरी घाटी का नजारा दिखाई देता है.

धूपगढ़

धूपगढ़ सतपुड़ा रेंज की सब से ऊंची चोटी है. यहां से सनसैट का व्यू काफी सुंदर दिखाई देता है. धूपगढ़ तक जाने के लिए अंतिम 3 किलोमीटर का रास्ता काफी घुमावदार है. बादलों के बीच में ही धीरेधीरे मलिन होते सूरज को देखना एक अनोखा अनुभव होता है.

सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान

524 वर्ग किलोमीटर में फैले इस उद्यान की स्थापना 1981 में हुई थी. प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर यह उद्यान जहां चीड़, देवदार, सफेद ओक, यूकेलिप्टस, गुलमोहर और अन्य छोटेबड़े वृक्षों से ढका हुआ है वहीं यहां आप को बाघ, तेंदुआ, सांभर, चीतल, गौर, चिंकारा, भालू और रंगबिरंगे पक्षियों के भी दर्शन हो जाएंगे.

डचेश फौल्स

यह पचमढ़ी का सब से दुर्गम स्पौट है. यहां पहुंचने के लिए करीब डेढ़ किलोमीटर का सफर पैदल ही तय करना पड़ता है. 700 मीटर का रास्ता जहां घने जंगलों के बीच से पार करना पड़ता है वहीं करीब 800 मीटर का रास्ता पहाड़ पर से सीधा ढलान का है, इसलिए काफी संभलसंभल कर चलना पड़ता है. लेकिन नीचे उतरने के बाद फौल में नहाने से सारी थकान पल में छूमंतर हो जाती है.

इस का नाम बी फौल्स इसलिए पड़ा क्योंकि पहाड़ी से गिरते समय यह झरना बिलकुल मधुमक्खी की तरह दिखता है. यहां आते समय अपने साथ स्पोर्ट्स शूज लाना न भूलें क्योंकि पहाड़ी रास्तों पर चलने के दौरान उन की जरूरत पड़ती है. यह 3 बजे बंद हो जाता है.

समुद्रतल से 1,100 मीटर की ऊंचाई पर बसे इस शहर की आबादी लगभग 12 हजार है और यहां की जीवनशैली आज भी बाहरी चकाचौंध से अछूती है. प्रदूषणरहित वातावरण में कुदरत के सौंदर्य को निहारने के लिए इस छोटी सी सैरगाह में स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लेना न भूलें. इन में कई जगह कैमरे या हैंडीकैम का शुल्क है, इसलिए गाइड से पूछ लें कि यह शुल्क कहां जमा कराया जाए.

कहां ठहरें

पचमढ़ी में ठहरने की बहुत अच्छी व्यवस्था है. मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग के भी हेरिटेज होटल और गेस्ट हाउस हैं जो विभिन्न आयुवर्ग की जरूरतों को ध्यान में रख कर बनाए गए हैं.

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