नहीं रहे मशहूर अभिनेता ओम पुरी

देश के बेहतरीन एक्टर्स में शुमार ओम पुरी का निधन हो गया है. 66 साल के ओम पुरी की मौत की वजह दिल का दौरा पड़ना बताया जा रहा है. ओम पुरी उन चंद कलाकारों में से एक थे जिन्होंने समानान्तर सिनेमा से लेकर कमर्शल सिनेमा तक में कामयाबी हासिल की. उनकी मौत की खबर सुनकर उनके फैंस सकते में हैं.

ओम पुरी का जन्म अंबाला के एक पंजाबी परिवार में हुआ था. 1993 में ओम पुरी ने नंदिता पुरी के साथ शादी की थी. 2013 में उनका तलाक हो गया था. उनका इशान नाम का एक बेटा भी है.

पुरी ने पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) से ग्रेजुएशन किया. उन्होंने दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) से भी पढ़ाई की. यहां नसीरुद्दीन शाह उनके क्लासमेट थे.

ओम पुरी का फिल्मी सफर

पद्मश्री ओमपुरी ने ‘अर्ध्य सत्य’, ‘धारावी’ ‘मंडी’ जैसी सैकड़ों फिल्मों में सशक्त अभिनय किया है. ओम पुरी ने अपने फिल्मी सफर की शुरुआत मराठी नाटक पर आधारित फिल्म ‘घासीराम कोतवाल’ से की थी. वर्ष 1980 में रिलीज ‘आक्रोश’ ओम पुरी के सिने करियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई.

सनी देओल के साथ घायल और 1996 में गुलजार की माचिस में उन्होंने सिख आतंकवादी का किरदार निभाया. ‘माचिस’ में बोला गया उनका डायलॉग ‘आधों को 47 ने लील लिया और आधों को 84 ने’ काफी मशहूर हुआ.

ओम पुरी ने अपनी हिंदी सिनेमा करियर में कई सफल फिल्मों में अपने बेहतरीन अभिनय का परिचय दिया है. एक बिना फिल्मी परिवार से होने के कारण उन्हें हिंदी सिनेमा में अपनी जगह बनाने के लिए काफी कड़ा संघर्ष करना पड़ा.

उन्हें हिंदी सिनेमा में अपनी बेहतरीन अभिनय के चलते कई पुरुस्कारों से भी नवाजा गया है. ओम पुरी ने बॉलीवुड के अलावा ब्रिटेन और अमेरिका की भी फिल्मों में काम किया.

किसने क्या कहा

अशोक पंडित

अशोक पंडित ने ट्वीट कर बताया कि इस खबर से वो शॉक में हैं. उन्होंने ट्वीट किया कि “ओम पुरी का अचानक यूं चले जाना हिंदी सिनेमा का बड़ा नुक्सान है. बहुत कम एक्टर ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपने शक्ल सूरत के बजाय अपने अभिनय क्षमता से अपनी पहचान बनायी, ओम पुरी उन सबके लिए एक मिसाल हैं!”

शबाना आजमी

उनके निधन पर शबाना आजमी ने कहा कि उनसे करीब की दोस्ती रही थी, उनके साथ कई फिल्मों में काम किया, उनका निधन होना बहुत अफसोस की बात है.

मधुर भंडारकर

मधुर भंडारकर ने कहा कि यकीन नहीं होता कि इतना एक्टिव इंसान इस तरह अचानक चला गया, बहुत दुखद बात है, फिल्म इंडस्ट्री में उनका बहुत कमाल का योगदान रहा है.

डेविड धवन

डेविड धवन ने कहा कि बड़ा धक्का लगा उनकी डेथ की न्यूज सुनकर. 1974 में हम रूम मेट रह चुके थे. वो ब्रिलियंट एक्टर थे.

रजा मुराद

ओम पुरी की मौत पर एक्टर्स रजा मुराद ने दुख जताया है. उन्होंने कहा कि ओम पुरी ने बीच में बहुत ज्यादा शराब पीनी शुरू कर दी, जिसकी वजह से उनकी सेहत खराब हो गई. मुराद के मुताबिक, बेहद आम शक्ल सूरत होने के बावजूद ओम पुरी ने अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाया.

नागिन के बाद आ रही है लेडी बिच्छू

कलर्स का टीवी शो नागिन काफी मशहूर है. इस शो ने अपनी लीड एक्ट्रेस मौनी रॉय का सफलता की नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है. हर कोई इस शो और इसकी लीड एक्ट्रेस का फैन है.

लेकिन अब खबर है कि टीवी पर नागिन के साथ-साथ एक बिच्छू की भी एंट्री होने वाली है. मतलब यह कि अब तक टीवी पर इच्छाधारी, इच्छाप्यारी नागिन और नेवला देखने वाले दर्शकों के लिए एंटरटेनमेंट का नया डोज आने वाला है.

जल्द आपको टीवी पर एक ऐसा विलेन दिखने वाला है जो आधा इंसान होगा और आधा बिच्छू. दरअसल लाइफ ओके चैनल अपना शो सुपर कॉप वर्सेज सुपर विलेन शुरू होने वाला है. इस शो में नीता शेट्टी और हर्षद अरोड़ा लीड रोल में नजर आने वाले हैं.

शो में हर्षद लोमड़ी के रोल में होंगे और नीता आधी इंसान और आधी बिच्छू होंगी. इस शो में लोमड़ी के रोल में नजर आने वाले हर्षद अरोड़ा को आप इससे पहले दहलीज और बेइंतेहां में देख चुके हैं. वहीं नीता शेट्टी घर की लक्ष्मी बेटियां, प्यार की एक कहानी, ससुराल सिमर का जैसे शो में काम कर चुकी हैं.

महिलाओं में सैल्फ अवेयरनैस जरूरी: मिलिंद सोमन

उम्र के 5 दशक पार कर चुके मिलिंद सोमन एक सुपर मौडल, अभिनेता, फिल्म निर्माता, स्पोर्ट्स पर्सन हैं और फिटनैस को प्रमोट करते हैं. महाराष्ट्र के मिलिंद सोमन ने 10 साल की उम्र से ही महाराष्ट्र को राष्ट्रीय स्तर पर रिप्रेजैंट करना शुरू कर दिया था.

उन्होंने 4 साल तक लगातार नैशनल सीनियर स्विमिंग चैंपियनशिप जीती. 30 दिनों में 1,500 किलोमीटर दौड़ कर अपना नाम लिम्का बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड्स में दर्ज करवाया. इस के अलावा उन्होंने ‘आयरन मैन’ चैलेंज को पहली ही कोशिश में 15 घंटों और 19 मिनट में पूरा किया. इस में साइक्लिंग, स्विमिंग और रनिंग शामिल हैं.

समय मिलने पर सोमन आज भी 10-12 किलोमीटर दौड़ते हैं और फिटनैस के लिए सब को प्रोत्साहित करते हैं. इस समय वे महिलाओं की मैराथन दौड़ ‘पिंकाथन’ के ब्रैंड ऐंबैसेडर हैं. हर बार मैराथन में भाग लेने वाली महिलाओं की बढ़ती संख्या को देख कर वे काफी खुश हैं. उन से हुई बातचीत के कुछ अंश प्रस्तुत हैं:

अच्छी हैल्थ के लिए फिटनैस कितनी जरूरी

फिट रहने से केवल शरीर ही नहीं, बल्कि मानसिक अवस्था भी अच्छी रहती है. आमतौर पर महिलाएं कुछ न कुछ बहाना बना कर फिटनैस से भागती हैं. ऐसे में इस तरह की दौड़ उन के लिए काफी आकर्षक होती है. हमारे समाज में कुछ पुरुषों का ही कहना है कि महिलाएं दौड़ नहीं सकतीं.

यही वजह है कि मैं ‘पिंकाथन’ से जुड़ा हूं. अधिकतर महिलाएं घरेलू होती हैं और उन्हें इस की जानकारी नहीं है, इसलिए आज मैं महिलाओं को अपने लिए, अपनी हैल्थ के लिए दौड़ने के लिए कह रहा हूं. मेरे खयाल से एक महिला जो सोचती है वह कर सकती है.

कुछ महिलाएं तो ऐसी भी हैं कि शादी से पहले अपने लिए सबकुछ करती हैं और शादी के बाद सब छोड़ कर घरपरिवार में व्यस्त हो जाती हैं. ऐसे में वे एक अच्छी सेहत को नहीं जी पातीं. उन का स्ट्रैस लैवल भी बढ़ता रहता है.

महिलाओं का झुकाव इस ओर कितना बढ़ा

महिलाओं में अवेयरनैस बढ़ रही है. पहले हम केवल 8 शहरों में इस दौड़ का आयोजन करते थे. अब छोटेबड़े अनेक शहरों जैसे विशाखापट्टनम, विजयवाड़ा, नागपुर आदि से भी लोग हमें बुला रहे हैं. मैं ने इन छोटेबड़े शहरों के लिए एक दूसरा इवैंट ‘इंडिया गोइंग पिंक’ भी और्गनाइज किया है.

 इस इवैंट से जुड़े लोग सब को गाइड करते हैं और दौड़ का आयोजन करते हैं. इस बार 14 शहरों में यह दौड़ होगी. मुंबई की पहली मैराथन में केवल 2 हजार महिलाओं ने भाग लिया था. पिछले साल 11 हजार महिलाओं ने भाग लिया था और इस बार यह संख्या लाखों में होने की संभावना है.

फिटनैस से महिला के जीवन में बदलाव

मैं तो सब को ले कर दौड़ता हूं. अंदर जो बदलाव आते हैं यह उन्हें ही पता चलता है. उन के अंदर आत्मविश्वास बढ़ता है कि वे जो चाहें कर सकती हैं. वे अच्छा फील करती हैं. हमारे देश में पिछले कुछ सालों से ही महिलाएं दौड़ रही हैं, जबकि अमेरिका में 40-45 साल पहले ही यह ट्रैंड शुरू हो गया था. लेकिन तब केवल प्रतियोगिता के लिए ही लोग दौड़ते थे, जिन में अधिकतर पुरुष ही होते थे.

हैल्थ के लिए कोई भी नहीं दौड़ता था. अभी अमेरिका में हर सप्ताह 30 मिलियन लोग दौड़ते हैं, क्योंकि उन्हें इस के फायदे पता चल चुके हैं. वहां स्पोर्ट्स कल्चर है पर अपने देश में ऐसा नहीं है. महिलाएं तो स्पोर्ट्स के मामले में और भी पीछे हैं. लेकिन अब हर स्कूल, गांव, शहर, क्लब आदि जगह रनिंग के इवैंट कराए जा रहे हैं. लोग भाग भी ले रहे हैं.

इस तरह सभी एकदूसरे से प्रेरित हो रहे हैं, यह एक अच्छी बात है. अब महिलाओं की झिझक दूर हो रही है. अब उन्हें फिटनैस के फायदे समझ में आ रहे हैं. इस से उन का स्ट्रैस दूर होता ही है, साथ ही और कई बीमारियां भी कम हो रही हैं.

स्टै्रस को भगाना मुश्किल नहीं, अगर हम अपने दैनिक रूटीन में दौड़ना, व्यायाम आदि को शामिल करें. बड़े शहरों में महिलाएं सुबह से शाम तक दौड़ती रहती हैं, फिर भी बीमार रहती हैं. उन्हें अपने लिए थोड़ा समय निकाल कर जो भी व्यायाम अच्छा लगे, करना चाहिए. उन्हें अपने व्यायाम की समय सीमा खुद ही तय करनी चाहिए. महिलाओं का सैल्फ अवेयर होना बहुत ही जरूरी है.

विंटर वेडिंग के लिए ब्राइडल ड्रेस

शादी-ब्याह की तैयारी में दुलहन की ड्रेस भी अहम स्थान रखती है. लेटैस्ट फैशन, बढि़या डिजाइन, बजट, कलर सभी चीजों को ध्यान रख कर अपने लिए ब्राइडल वियर चुनती हैं. हर साल की तरह इस साल भी दुलहनों के लिए ब्राइडल वियर में नया क्या है, इस बारे में बता रही हैं फैशन डिजाइनर अनुभूति जैन.

लहंगा चोली

यह स्टाइल विंटर्स के लिए बिलकुल नया और इन है. दुलहन के लिए यह बहुत कंफर्टेबल भी है. यह आउटफिट स्पैशली उन दुलहनों के लिए है, जो ठंड के मौसम में गरम रहना चाहती हैं. इस में ब्लाउज के साथ यह लौंग या शौर्ट जैकेट होती है. इस जैकेट के किनारों पर लहंगे जैसी ही बहुत सुंदर ऐंब्रौयडरी हकी होती है, जो इसे और भी रौयल बनाती है.

लहंगा विद टेल

इस लहंगे में लहंगे का घेर पीछे से बहुत ज्यादा होता है. वह पीछे से जमीन को टच करता होता है. इसे पीछे से किसी को पकड़ कर चलना पड़ता है और यही चीज दुलहन की चाल में नजाकत और एक अदा लाती है.

जैकेट लहंगा

यह बहुत कुछ शरारे जैसा होता है और इस में लहंगे के ऊपर एक हैवी जैकेट होती है जोकि पूरे लहंगे को हैवी लुक देती है. यह जैकेट लहंगे के कलर की या फिर कंट्रास्ट भी हो सकती है.

नैट का लहंगा

यदि आप के पसंदीदा रंगों में से पिंक एक है, तो आप के लिए नैट का लहंगा जिस पर महीन हस्त कारीगरी से डिजाइन बनाए गए हों बेहद खूबसूरत लगेगा. इस के साथ फुल बाजू की कोटी अच्छी लगेगी. इस पर गोल्डन तार से काम किया जाता है, जो लहंगे को सोने जैसी चमक देता है.

लहंगा विद मिरर ऐंड क्रिस्टल

इस पूरे लहंगे पर मिरर और क्रिस्टल का काम होता है, जिस से इस की चमक कई गुना बढ़ जाती है. इस दिन दुलहन सब से अलग दिखना चाहती है. अत: इस काम का लहंगा भी लिया जा सकता है.

लौंग स्लीव्स लहंगा

विंटर की दुलहन के लिए यह अच्छा औप्शन है. इस में नैट या फिर सिल्क की स्लीव्स हो सकती हैं. डैस्टिनेशन वैडिंग के लिए भी यह परफैक्ट है. इस लहंगे में ऐंब्रौयडरी नीचे की तरफ होती है वही काम स्लीव्स पर भी होता है.

वैल्वेट का लहंगा

वैल्वेट का लहंगा एक बार फिर इन है. इस पर पैच वर्क होता है, जो कि अधिकतर गोल्डन कलर में किया जाता है. मैरून रंग के लहंगे पर गोल्डन कलर का पैच वर्क खूब फबता है.

रिसैप्शन के लिए

अगर आप को अपनी शादी के बाद रिसैप्शन में ग्लैमर और लीक से हट कर कुछ चाहिए तो आप गोलडन कलर की साड़ी पहनें. इस कलर की साड़ी के साथ सुविधा यह होती है कि इस में आप ज्वैलरी के साथ ऐक्सपैरीमैंट कर सकती हैं.

इस के अलावा रौयल और कंटैंपररी लुक के लिए रा सिल्क, जरदोजी में नीले रंग की साड़ी इस मौके पर अच्छी रहेगी. अपने लुक को और भी बोल्ड और ब्राइट बनाने के लिए इस में पीला या लाल रंग भी जोड़ें या फिर अलग से चुन्नी. इन कलर की साड़ी के साथ मिक्स ऐंड मैच कर सकती हैं.

गोटापट्टी वर्क की प्योर शिफौन साड़ी वैसे तो हलकी होती है, लेकिन अपने हैवी गोटापट्टी के काम की वजह से इस फंक्शन के लिए खूब हैवी लगेगी. इस के अलावा बनारसी सिल्क साड़ी भी दुलहन पर खूब फबती है, क्योंकि इस का लुक सब से हट कर होता है.

दुलहन नए रंग भी ट्राई करें. जब बात शादी की आती है तो दुलहन अकसर एक ही रंग पहनती है और वह है रैड. लेकिन बदलते समय के साथ दुलहन के लहंगे का कलर भी बदलने लगा है. अब दुलहनें ऐक्सपैरीमैंट करने से घबराती नहीं हैं वे अलगअलग रंगों के साथ प्रयोग कर रही हैं. वे पेस्टल से ले कर न्योन तक हर रंग के लहंगे ट्राई कर रही हैं.

लेकिन आप फिर पारंपरिक रैड मैरून रंग से किसी भी तरह का समझौता नहीं करना चाहतीं और वही पहनना चाहती हैं, तो उस में दुपट्टा या चोली अलग रंग की ले कर एक नया कलर कौंबिनेशन फ्यूजन के जरीए बना सकती है. बबलगम पिंक, स्काई ब्लू, लाइट ग्रीन, लीफ ग्रीन, औरेंज, रैड, पंपकिन औरेंज, गोल्डन आदि कलर ट्राई कर सकती हैं.

छत्तीसगढ़ का शिमला: मैनपाट

छत्तीसगढ़ में भी बर्फ का लुत्फ उठाया जा सकता है. आप को यकीन नहीं हो रहा तो छत्तीसगढ़ के खूबसूरत पर्यटन स्थल मैनपाट जाएं. बर्फ की सफेद चादर से ढकी वादियों का नजारा देख रोमांच से भर उठेंगे.

पर्यटन की अपार संभावनाओं से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ के हरेभरे जंगल, झरने और पहाड़ सहज ही पर्यटकों का मन मोह लेते हैं. बहुत कम सैलानियों को शायद ही यह पता होगा की छत्तीसगढ़ में मैनपाट एक ऐसी खूबसूरत जगह है जहां बर्फ गिरती है और सर्दियों में यह इलाका बर्फ की सफेद चादर से ढक जाता है. मैनपाट में काफी ठंडक रहती है, यही कारण है कि इसे ‘छत्तीसगढ़ का शिमला’ कहा जाता है.

मैनपाट छतीसगढ़ का एक पर्यटन स्थल है. यह स्थल अंबिकापुर नगर, जो पूर्व सरगुजा, विश्रामपुर के नाम से भी जाना जाता है, 75 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. मैनपाट विंध्य पर्वतमाला पर स्थित है. समुद्र की सतह से इस की ऊंचाई 3,780 फुट है. मैनपाट की लंबाई 28 किलोमीटर और चौड़ाई 12 किलोमीटर है. यह बहुत ही आकर्षक स्थल है.

छत्तीसगढ़ के मैनपाट की वादियां शिमला का एहसास दिलाती हैं खासकर सावन और सर्दी के मौसम में. प्रकृति की अनुपम छटाओं से परिपूर्ण मैनपाट को सावन में बादल घेरे रहते हैं, तब इस की खूबसूरती और भी बढ़ जाती है. लगता है, जैसे आकाश से बादल धरा पर उतर रहे हों. अंबिकापुर से दरिमा होते हुए कमलेश्वरपुर तक पक्की घुमावदार सड़क और दोनों ओर घने जंगल मैनपाट पहुंचने से पहले ही हर किसी को प्रफुल्लित कर देते हैं.

मैनपाट की वादियां यों तो पहले से ही खूबसूरत हैं, लेकिन बादलों की वजह से इस की खूबसूरती में चारचांद लग जाते हैं. शिमला, कुल्लूमनाली जैसे पर्यटन स्थलों में प्रकृति की अनुपम छटा देख चुके लोग जब मैनपाट की वादियों को देखते हैं तो इस की तुलना शिमला से करते हैं.

यहां पर्यटकों को सावधानी से वाहन चलाना पड़ता है. रिमझिम फुहारों के कारण कई स्थानों पर तो दिन में भी वाहनों की लाइट जलाने की जरूरत पड़ जाती है.

अंबिकापुर से दरिमा होते हुए मैनपाट जाने के मार्ग में जैसेजैसे चढ़ाई ऊपर होती जाती है, सड़क के दोनों ओर के घने जगल अनायास ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं. मैनपाट में सुबह काफी देर से होती है देर तक तक घना कोहरा छाया रहता है और दोपहर में भी धूप के बावजूद गरमाहट का एहसास नहीं होता. जुलाई महीने में मैनपाट ही ऐसा नजारा देख पर्यटक आश्चर्यचकित रह जाते हैं.

प्राकृतिक संपदा से भरपूर बादलों से घिरे मैनपाट में सरभंजा जलप्रपात, टाइगर पौइंट और फिश पौइंट मुख्य दर्शनीय स्थल हैं. शहरी कोलाहल, प्रदूषण, भागमभाग और रोजमर्रा के तनाव से हट कर हरियाली के बीच मैनपाट पर्यटकों को खासा लुभाता है. यहां पहुंच कर पर्यटकों को बादलों को नजदीक से देखने का अनुभव प्राप्त होता है.

पर्यटकों के लिए यहां होटल के अलावा कुछ निजी रिजौर्ट और गैस्ट हाउस भी ठहरने के लिए उपलब्ध हैं. छत्तीसगढ़ के शिमला के नाम से विख्यात मैनपाट की प्राकृतिक सुंदरता से हर कोई वाकिफ है और यही कारण है कि हर मौसम में यहां दूर-दूर से पर्यटक पहुंचते हैं.

कैसे चुनें हेयर कलर

एक समय था जब काले, लंबे, घने बालों वाली महिला को ही सुंदर कहा जाता था. मगर बदलते फैशन और ट्रैंड ने बालों की लंबाई को घटा दिया है और अब बालों के आधार पर महिलाओं की खूबसूरती को आंकने के पैमाने भी बदल चुके हैं.

इन पैमानों में सब से खास है बालों का रंग. जी हां, महिलाएं जितनी चूजी अपनी ड्रैस के कलर को ले कर होती हैं अब उतनी ही अपने बालों के रंग को ले कर भी हैं. विशेषतौर पर वे लड़कियां या महिलाएं जो अपने बालों के प्राकृतिक रंग से ज्यादा खुश नहीं हैं, उन्हें संतुष्ट करने के लिए बाजार में कई बड़े ब्रैंड्स के हेयर कलर मौजूद हैं. मगर इन का चुनाव सावधानी से न किया जाए तो लुक संवरने की जगह बिगड़ भी सकता है.

इस बारे में लौरियल मैट्रिक्स हेयर कलर की टीम का कहना है, ‘‘माना कि महिलाएं बौलीवुड ऐक्ट्रैसेज को आदर्श मान कर उन के जैसे लुक को पाने की कोशिश करती हैं, मगर हेयर कलर का चुनाव किसी को आदर्श मान कर नहीं, बल्कि अपनी पर्सनैलिटी, स्किन टोन, प्रोफैशन और आईबौल्स के रंग के आधार पर होना चाहिए.’’

जानें कलर लैवल्स

लौरियल मैट्रिक्स हेयर कलर टीम के अनुसार ज्यादातर महिलाओं को अपने बालों के रंग के बारे में भी नहीं पता होता. यहीं बालों के लिए सही रंग चुनने की प्रक्रिया में बड़ी चूक हो जाती है. इसलिए सब से पहले यह जानना जरूरी है कि बालों का प्राकृतिक रंग क्या है.

मैट्रिक्स टीम  के अनुसार बालों के रंगों को 12 शेड्स में विभाजित किया जाता है. इन 12 शेड्स लैवल में से भारत में केवल 1 से 5 तक के लैवल के शेड्स बालों में पाए जाते हैं. इन शेड्स में ब्लैक, जैड ब्लैक, ब्राउन, डार्क ब्राउन, लाइट ब्राउन रंग शामिल हैं.

दरअसल, बालों का रंग जानना इसलिए जरूरी है, क्योंकि इस से तय हो पाता है कि कौन सा रंग बालों पर चढ़ेगा और कौन सा नहीं. उदाहरण के तौर पर बालों का रंग हलका है तो उन पर गहरे शेड्स के हेयर कलर चढ़ जाते हैं. मगर बालों का रंग गहरा है तो हलके रंग बहुत ही मुश्किल से चढ़ पाते हैं.

इस बाबत मैट्रिक्स हेयर कलर टीम का कहना है, ‘‘काले बालों पर यदि कोई शेड लगाया जाए तो वह 100% रिजल्ट कभी नहीं देता है. कई बार महिलाएं ब्लीच का इस्तेमाल करती हैं. इस से बालों में कलर इफैक्ट तो आ जाता है, मगर यह तरीका बालों की सेहत के लिए बहुत ही नुकसानदायक साबित हो सकता है. फिर इस तरह के कैमिकल ट्रीटेड बालों पर कलर चढ़ने में भी दिक्कत आती है. इसलिए बालों के कलर के हिसाब से ही रंग चुना जाए यह तो जरूरी है ही, साथ ही बालों के रंग के साथ ज्यादा छेड़खानी भी नहीं करनी चाहिए.

डैवलपर संख्या की भी हो जानकारी

हेयर कलरिंग में सारा खेल डैवलपर का होता है. इसी से बालों के रंग को लिफ्ट कराया जाता है. लौरियल मैट्रिक्स हेयर कलर टीम के अनुसार, ‘‘डैवलपर में 3 नंबर होते हैं. चाहे कोई भी ब्रैंड हो 20,30,40 नंबर के डैवलपर का ही इस्तेमाल किया जाता है.

जहां 20 नंबर वाला डैवलपर बालों के रंग को 1-2 लैवल तक ही लिफ्ट करता है, वहीं 30 नंबर वाला डैवलपर 3 से 5 लैवल तक बालों के रंग को लिफ्ट कर देता है, 40 नंबर वाला डैवलपर कलर शेड पर निर्भर करता है, मगर बालों के रंग को 5 से 7 लैवल तक लिफ्ट कर देता है.’’

स्किन कलर टोन के हिसाब से चुनें रंग सही हेयर कलर के चुनाव के लिए जितना जरूरी बालों का प्राकृतिक रंग जानना है उतना ही जरूरी स्किन कलर टोन जानना भी है. हेयर एक्सपर्टस के अनुसार, ‘‘हर किसी का स्किन कलर टोन अलग होता है और बालों का रंग यदि उस हिसाब से तय न किया जाए तो इस का असर उस की पर्सनैलिटी पर पड़ता है. उदाहरण के लिए पेल व्हाइट स्किन टोन वाली महिला के बाल यदि जैड ब्लैक हों तो यह थोड़ा भद्दा लगता है, क्योंकि चेहरा ओवरव्हाइट लगने लगता है और फीचर्स उभर कर नहीं दिखते. इसलिए ऐसी स्किन टोन वाली महिलाओं को ब्राउन या लाइट ब्राउन शेड का हेयर कलर ही बालों के लिए चुनना चाहिए.’’

अन्य स्किन कलर टोन के लिए कौन सा हेयर कलर चुनना चाहिए, आइए जानते हैं.

डार्क स्किन टोन

इस कलर टोन वाली महिलाओं के लिए ब्लैक और जैड ब्लैक हेयर कलर सब से अच्छे विकल्प हैं. इन से त्वचा का रंग भी थोड़ा निखरा लगता है. इस कलर टोन की महिलाओं को कभी हलके शेड्स नहीं चुनने चाहिए.

व्हीटिश स्किन टोन

भारत में सब से अधिक अनुपात इस स्किन टोन वाली महिलाओं का है. इस स्किन टोन पर ब्लैक और डार्क ब्राउन शेड्स काफी सूट करते हैं. चाहें तो बर्गंडी रंग का भी इस्तेमाल कर सकती हैं. यह शेड भी इस कलर टोन वाली महिलाओं को रिच लुक देता है.

फेयर स्किन टोन

इस कलर टोन पर लाइट ब्राउन और लाइट ब्लोंड शेड बहुत ही खूबसूरत लगते हैं.

इन बातों का रखें ध्यान

यदि बाल सफेद हैं तो कभी ब्लैक या डार्क ब्राउन शेड का इस्तेमाल न करें, क्योंकि इस से बाल नकली लगने लगते हैं या फिर यह पता चलता है कि इन्हें रंगा गया है. सफेद बालों के लिए हमेशा डार्क ब्राउन शेड का चुनाव करें. बारबार हेयर कलर ब्रैंड न बदलें, क्योंकि इस से बालों को नुकसान पहुंचता है और उन का रंग भी बदलता रहता है.

अगर आप भी अपने बालों को कलर कराना चाहती हैं तो लौरियल मैट्रिक्स हेयर कलर आपके लिए एक बेहतर विकल्प है. 

न्यूट्रिशियस मेवा स्लाइस

सर्दियां यानी कि घूमने और अलग अलग तरह के व्यंजन बनाने और खाने का मौसम. सर्दियों में मेवा स्वास्थय के लिए भी फायदेमंद है, क्योंकि यह शरीर को चुस्ती और फुर्ती देता है.

तो घर पर जरूर बनायें मेवा स्लाइस. हमें बतायें, ये डिश आपको कैसी लगी.

सामग्री

– 30 हाइड ऐंड सीक बिस्कुट

– कटे बादाम, काजू, नारियल, पिस्ता 1 कप

– 1/2 कप चोकर

– 1 बड़ा चम्मच कोको पाउडर

– 200 ग्राम कंडैंस्ड मिल्क.

विधि

मेवा को हलका सा रोस्ट कर लें. चोकर को भी हलका सा रोस्ट करें. बिस्कुटों का चूरा कर उन में सारी सामग्री मिला कर लंबे लंबे रोल बनाएं. ऐल्युमिनियम फौयल में लपेट कर फ्रिज में 2-3 घंटे सैट होने के लिए रखें. फिर फौयल हटा कर 1/2-1/2 इंच मोटे टुकड़े काट लें.

व्यंजन सहयोग: नीरा कुमार

बर्थडे स्पेशल: दीपिका से जुड़ी रोचक बातें

दीपिका पादुकोण आज सिर्फ बॉलीवुड ही नहीं, बल्कि हॉलीवुड में भी अपनी एक अलग पहचान बना चुकी हैं. दीपिका की पहली हॉलीवुड फिल्म ‘ट्रिपल एक्स द रिटर्न ऑफ जेंडर केज’ इसी 14 को रिलीज होने वाली है.

खेल जगत से एक्टिंग की दुनिया में कदम रखने वाली दीपिका ना सिर्फ अपने अभिनय से बल्कि अपनी खूबसूरती और अपने परफेक्ट लुक से भी धमाल मचा रही हैं. अभी हाल ही में दीपिका, देसी गर्ल प्रियंका चोपड़ा को पछाड़ते हुए एशिया की सबसे सेक्सी महिला बन गई हैं.

दीपिका को सबसे पहले फरहा खान ने अपनी फिल्म ‘ओम शांति ओम’ में कास्ट किया था. कहा जाता है कि फरहा ने दीपिका को हिमेश रेशमिया के एलबम ‘नाम है तेरा…’ में देखा और उन्हें दीपिका पसंद आ गईं. इस तरह से हिमेश रेशमिया के एलबम में काम करना दीपिका के लिए लकी साबित हुआ.

आज इस खूबसूरत एक्ट्रेस दीपिका पादुकोन का 31वां जन्मदिन है.

दीपिका के इस जन्मदिन पर उनके अब तक के सफर पर डालते हैं एक नजर और जानते हैं उनसे जुड़ी कुछ रोचक बातें.

खेल जगत में भी दिखा रहीं थी अपना जलवा

दीपिका ने अपने करियर की शुरुआत एक स्पोर्ट्स पर्सन के रूप में की थी. जाने-माने बैडमिंटन प्लेयर प्रकाश पादुकोण की बेटी दीपिका स्टेट लेवल पर बैडमिंटन खेल चुकी थीं और जल्द ही नेशनल प्लेयर की लिस्ट में भी उनका नाम शामिल होने वाला था. इसके साथ ही दीपिका बासकेट बॉल की भी स्टेट प्लेयर रह चुकी हैं.

जन्म,बचपन और शुरूआती जीवन

जानी-मानी अभिनेत्री दीपिका का जन्म डेनमार्क की राजधानी कोपनहेगन में 5 जनवरी 1986 को हुआ. वह बैडमिंटन खिलाड़ी प्रकाश पादुकोण की बेटी हैं. दीपिका की मां, उज्जला एक ट्रेवल एजेंट हैं. छोटी बहन अनिषा एक गोल्फर हैं. दीपिका के दादा रमेश पादुकोण भी मैसूर बैडमिंटन के सेक्रेटरी रह चुकें हैं.

जब दीपिका 1 साल की थीं तब उनका परिवार कोपनहेगन से बेंगलुरु में शिफ्ट हो गया. दीपिका ने अपनी शुरूआती पढाई बेंगलुरु से किया. इंदिरा गाँधी नेशनल यूनिवर्सिटी से दीपिका ने सोशियोलॉजी में बेचलर ऑफ आर्ट्स की डिग्री हासिल की.

मॉडलिंग में कदम रखा

राष्ट्रिय स्तर पर बैडमिंटन खेलने के बावजूद दीपिका ने  बैडमिंटन को छोड़ कर मॉडलिंग को अपने करियर के तौर पर चुना. अच्छी कद काठी होने की वजह से देखते ही देखते मॉडलिंग में दीपिका का नाम रौशन हो गया. मॉडलिंग में नाम होने के बाद दीपिका के पास फिल्मों के लिए भी ऑफर्स आने शुरू हो गए.

फिल्मों की दुनिया में रखा कदम

अभिनेत्री दीपिका पादुकोण को एक्टिंग के साथ-साथ डांस में भी दिलचस्पी है, जिसके चलते फिल्मों में उनके डांस को भी सराहा गया. उन्होंने मॉडलिंग में सफलता के बाद एक्टिंग के क्षेत्र में कदम रखा.

सबसे पहले उन्होंने हिमेश रेशमिया के पॉप अल्बम ‘आप का सुरूर’ में गीत ‘नाम है तेरा’ से अभिनय की शुरुआत की. दीपिका पादुकोण मॉडलिंग करते हुए फिल्मों की दुनिया की ओर आकर्षित हो गईं. उन्होंने सबसे पहले साल 2006 में कन्नड फिल्म ऐश्वर्या के जरिए फिल्मी सफर की शुरुआत की. जिसे निर्देशक इन्द्रजीत लंकेश ने निर्देशित किया था.

बॉलीवुड में एंट्री

साल 2007 में दीपिका ने बॉलीवुड में कदम रखा वो भी किंग खान के साथ जिसका सपना हर किसी एक्ट्रेस का होता है. फिल्म ओम शांति ओम में दीपिका को ऐसी भूमिका मिली की वो अपनी पहली फिल्म से ही बॉलीवुड की टॉप की एक्ट्रेस बन गईं. फराह खान की इस फिल्म के जरिये दीपिका पादुकोण ने कई खिताब अपने नाम किए.

बॉलीवुड की प्रिंसेस

इसके बाद बचना ए हसीनो (2008), लव आज कल ( 2009), हाउसफुल (2010), परिंदे 2010) में भी दीपिका नजर आईं. हालांकि कुछ फिल्मों में उन्हें निगेटिव कमेंट्स भी मिले.

साल 2012 में आई फिल्म कॉकटेल ने दीपिका के करियर को गति दी. इसके बाद उन्हें कई अवॉर्ड्स कैटेगरी में नॉमिनेशन मिला. फिर आई ये जवानी है दीवानी (2013), चेन्नई एक्सप्रेस (2013), हैप्पी न्यू ईयर (2014). इन फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई की.

साल 2013 में आई फिल्म गोलियों की रासलीला राम लीला के लिए दीपिका को फिल्म फेयर का बेस्ट एक्ट्रेस अवॉर्ड भी मिला. इसके बाद साल 2015 में आई फिल्म ‘पीकू’ के लिए भी दीपिका के काम को सराहा गया. फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ ने बतौर अभिनेत्री बॉलीवुड में उनकी पहचान को मजूबत बना दिया.

कई पुरस्कार जीते

दीपिका ने अपने फिल्मी करियर के दौरान कई पुरस्कार जीते. इनमें बेस्ट एक्ट्रेस,बेस्ट न्यू कमर, पॉपुलर हिरोइन, जैसे पुरस्कार शामिल हैं.

जिनमे खास कर फिल्मफेअर की बात करे तो 2007 में उन्हें फिल्म ओम शांति ओम के लिए बेस्ट डेब्यू और साल 2013 में फिल्म गोलिओं के रासलीला के लिए बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड मिला.

अफेयर की चर्चाएँ आम हुईं

बॉलीवुड में चमकते सितारे के बारे में तरह तरह की बातें होना आम बात है. दीपिका के अफेयर्स ने भी जमकर सुर्खियाँ बटोरी. पहले दीपिका का नाम रणबीर कपूर के साथ जुड़ा. दीपिका ने कभी भी अपने रिलेशनशिप पर बात करने में झिझक महसूस नहीं की. रणबीर कपूर के साथ रिलेशनशिप को लेकर दीपिका ने करण जौहर से कहा था ‘एक समय आया था जब मुझे लगा कि मैं प्यार में पड़ गई हूं. वो एक ऐसा रिश्ता था जो मुझे लगा था कि सीमाओं से परे जाएगा. दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ.’

रणबीर के साथ रिश्ता टूटने के बाद दीपिका सहम गईं थी, लेकिन अब उनका नाम रणवीर सिंह के साथ जोड़ा जा रहा है. दीपिका और रणवीर ने इस रिश्ते के बारे में कई बार खुलकर बोला भी है.

कालीन साफ करने के आसान टिप्स

घर की सजावट और जरूरत के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले गलीचे और कालीन को साफ रखना एक बड़ी चुनौती है. विशेषज्ञों की मानें तो इसे लंबे समय तक ठीक ढंग से रखने के लिए साफ रखे जाना जरूरी है.

वेक्यूम क्लीनर से सफाई करना : रोजाना वेक्यूम से कार्पेट साफ रखने में मदद मिलती है. कार्पेट अधिक नाजुक होती है, जिसके चलते इसे ब्रश के बिना वेक्यूम से साफ करना चाहिए. अगर कार्पेट का धागा निकलता है तो इसे खिचना नहीं, बल्कि कैंची से काटना चाहिए.

धब्बे साफ करें : ड्रॉप गिरने या बहाव होने पर इसे प्लॉटिंग पेपर के साथ तुरंत सुखाना चाहिए. अगर यह सोल्वेंट या स्प्रिट से साफ न हो तो इसे सफेद सिरके और बराबर मात्रा में पानी के साथ साफ करें.

धुलाई : इसे घर पर धोने का प्रयास न करें. इसके लिए किसी पेशेवर से संपर्क करें. धूल, मिट्टी और नमी से बचाएं : गीले कालीन पर फफूंदी लग जाती है. इससे गीला ऊन सड़ना शुरू हो जाता है, जिससे गंध आने लगती है. इसमें नमी बनाए रखने के लिए इसे सूरत या उचित वातावरण प्रदान किया जाना चाहिए.

उचित ढंग से रखना : सूखी और उचित जगह पर रखना. गलीचे मोड़ कर नहीं रखना चाहिए.

प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत मेल पश्चिम बंगाल

आधुनिकता और सांस्कृतिक धरोहर को अपने में समेटे पश्चिम बंगाल में जहां एक ओर प्राकृतिक सौंदर्य का खजाना दार्जिलिंग है वहीं दूसरी ओर पूर्वोत्तर भारत का प्रवेशद्वार कोलकाता है, जो पर्यटकों को अपनी ओर बरबस आकर्षित करते हैं.

पश्चिम बंगाल अपनी अलग संस्कृति एवं सभ्यता के कारण भारत के अन्य राज्यों से अलग अहमियत रखता है. इस के उत्तर में विशाल हिमालय व दक्षिण में बंगाल की खाड़ी है. पश्चिम बंगाल अनेक शासकीय परिवर्तनों का  गवाह रहा है. ईस्ट इंडिया कंपनी की आड़ में अंगरेजों ने धीरेधीरे इसे अपनी कर्मस्थली बना कर पूरे हिंदुस्तान पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया था.

पश्चिम बंगाल जूट उद्योग के कारण व्यापारियों के आकर्षण का केंद्र रहा है. यहां जन्मे अनेक महान साहित्यकारों द्वारा रचा साहित्य न सिर्फ साहित्य प्रेमियों को आकर्षित करता है बल्कि पर्यटकों के लिए इस राज्य में घूमनेफिरने के लिए कई ऐसी जगह हैं जहां वे अनायास ही खिंचे चले आते हैं.

दार्जिलिंग

शिवालिक पर्वत श्रृंखला में समुद्रतल से लगभग 7 हजार फुट की ऊंचाई पर बसे दार्जिलिंग को पहाड़ों की रानी कहा जाता है. दार्जिलिंग चाय और हिमालयन रेलवे के कारण दुनियाभर में प्रसिद्ध है.

दार्जिलिंग पर्वत क्षेत्र के इन तीनों महकमों (दार्जिलिंग, कर्सियांग और कालिंपोंग) में विभाजित है. दार्जिलिंग जिले के नजदीक का महकमा खारसांग, आम लोगों के लिए कर्सियांग के नाम से जाना जाता है. इस का अपना ऐतिहासिक महत्त्व है. यहां का सफेद और्किड विश्वविख्यात है, जो स्थानीय भाषा में सुनखरी के नाम से जाना जाता है. यहां के गिद्ध पहाड़ के करीब सुभाषचंद्र बोस का पैतृक मकान है जहां उन्होंने लंबे समय तक एकांतवास किया था.

दार्जिलिंग का तीसरा महकमा कलिंपोंग है, जिस का भूटानी भाषा में अर्थ है मंत्रियों का गढ़. दार्जिलिंग और कर्सियांग को तिस्ता नदी कलिंपोंग से अलग करती है. नदी के किनारे हरेभरे जंगल हैं. जंगलों के बीच पहाड़ी,  झरने यहां की प्राकृतिक शोभा में चार चांद लगाते हैं. दार्जिलिंग विशेष रूप से टौय ट्रेन के लिए जाना जाता है. शुरुआती तौर पर यह टौय ट्रेन हिमालयन रेलवे का हिस्सा थी, जिस की स्थापना 1921 में हुई थी. यह रेलमार्ग 70 किलोमीटर लंबा है. यह बतासिया लूप तक जा कर खत्म होता है. इस ट्रेन से मोनैस्ट्री तक के सफर के दौरान पर्यटक दार्जिलिंग के प्राकृतिक सौंदर्य के नजारों का लुत्फ उठा सकते हैं.

दार्जिलिंग का दूसरा मुख्य आकर्षण टाइगर हिल है. इसे रोमांटिक माउंटेन के रूप में भी जाना जाता है. इस टाइगर हिल से एवरेस्ट समेत विश्व की तीसरी सब से ऊंची चोटी कंचनजंघा का दृश्य देखना पर्यटकों के लिए रोमांचकारी होता है.

दार्जिलिंग अपने बौद्ध मोनैस्ट्री या मठों के लिए भी जाना जाता है. दार्जिलिंग का विख्यात मठ घूम मोनैस्ट्री है. इस के अलावा यहां के दर्शनीय स्थलों में एक जापानी ‘पीस पैगोडा’ भी है, जिस की स्थापना विश्व शांति के मकसद से महात्मा गांधी के मित्र फूजी गुरु ने की थी. गौरतलब है कि यह भारत में कुल 6 शांति स्तूपों में से एक है. पीस पैगोडा से पूरे दार्जिलिंग और कंचनजंघा की शृंखला का नजारा दिखाई देता है.

दार्जिलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद और गोरखा टेरिटोरियल औटोनौमस बौडी द्वारा नवनिर्मित गंगामाया पार्क, रौक गार्डन, राजभवन, वर्धमान महाराजा की कोठी आदि यहां के दर्शनीय स्थलों में से है. इस के अलावा मिरिक झील, सिंजल झील, जोर पोखरी, सिंगला बाजार, संदाकफू, फालुट भी पर्यटन के दृष्टिकोण से काफी लोकप्रिय हैं. माउंटेनियरिंग संस्थान के करीब पद्मजा नायडू जैविक उद्यान है, जो न सिर्फ बच्चों के लिए बल्कि बड़ों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है. इस उद्यान में हिमालयन तेंदुआ और लाल पांडा को भी देखा जा सकता है. यह उद्यान तेंदुआ और पांडा के प्रजनन केंद्र के लिए भी जाना जाता है.

इस के अलावा यहां साइबेरियन बाघ और तिब्बती भेडि़ए भी हैं. भारत में इन वन्य जीवों को एकसाथ एक ही जगह देखने का मौका पर्यटकों को कहीं और नहीं मिल सकता. लियोर्डस वनस्पति उद्यान भी यहां है. इस उद्यान में और्किड की 50 किस्म की प्रजातियां देखने को मिल जाती हैं. इस के अलावा यहां कई तरह के दुर्लभ पेड़पौधे और जड़ीबूटियां भी पाई जाती हैं.

दार्जिलिंग चायबागानों के लिए विश्वविख्यात है. यह एक रोचक तथ्य है कि चाय के पौधे का पहला बीज कुमाऊं से लाया गया था और यही चाय आगे चल कर दार्जिलिंग चाय के नाम से दुनियाभर में जानी जाने लगी. चायबागान में पत्तियों को तोड़ते हुए देख पर्यटकों के लिए अच्छा शगल है. पर्यटक यहां पत्तियों को प्रोसैस होते

हुए भी देख सकते हैं. हालांकि इस के लिए चायबागान के अधिकारियों से विशेष अनुमति लेनी होगी.

कैसे पहुंचें

दार्जिलिंग का नजदीकी एअरपोर्ट बागडोगरा है, जो सिलीगुड़ी में है. कोलकाता, गुवाहाटी, दिल्ली और पटना से प्रतिदिन उड़ानें हैं. बहरहाल, बागडोगरा से दार्जिलिंग पहुंचने के लिए यहां से 90 किलोमीटर की यात्रा किराए की कार या जीप से की जा सकती है. रेलवे से यात्रा करनी हो तो सब से करीबी स्टेशन जलपाईगुड़ी है. कोलकाता से दार्जिलिंग मेल व कामरूप ऐक्सप्रैस ट्रेन जलपाईगुड़ी तक पहुंचती हैं. जलपाईगुड़ी से टौय ट्रेन द्वारा लगभग 8 घंटे की यात्रा कर दार्जिलिंग पहुंचा जा सकता है. दिल्ली से गुवाहाटी तक राजधानी ऐक्सप्रैस से पहुंचा जा सकता है. यहां से हवाई या सड़क के रास्ते दार्जिलिंग पहुंचा जा सकता है. सड़क मार्ग से कोलकाता से सरकारी और निजी बसें भी जाती हैं.

क्या खरीदें

जहां तक दार्जिलिंग में खरीदारी का सवाल है तो चाय पत्तियों के अलावा सेमी प्रेसियस स्टोन से ले कर हस्तशिल्प के सामान और ऊनी कपड़े खरीदे जा सकते हैं. साथ ही यहां अच्छे किस्म की पेंटिंग्स भी मिल जाती हैं. यहां की पेंटिंग्स को पर्यटक दार्जिलिंग सफर की यादगार के रूप में जरूर ले कर जाते हैं.

कोलकाता

कोलकाता ऐसा शहर है जहां प्राचीन मान्यता और आधुनिक विचार, अंधविश्वास व प्रगतिशीलता साथसाथ चलती है. कोलकाता शहर का एक बड़ा महत्त्व इसलिए भी है क्योंकि यह देश की सांस्कृतिक राजधानी होने के साथ ही साथ यह पूर्वोत्तर भारत का प्रवेशद्वार भी है. अब यह शहर काफी बदल चुका है. एक समय था जब कोलकाता पहुंचने के लिए पहले इस के उपनगर हावड़ा से हो कर जाना पड़ता था. कारण, ज्यादातर लंबी दूरी की ट्रेनें हावड़ा ही आती थीं. लेकिन अब कोलकाता का अपना टर्मिनस भी बन गया है. ‘कोलकाता टर्मिनस’. अब यहां पहुंचना वाया हावड़ा जरूरी नहीं है. फिर भी हावड़ा ब्रिज का महत्त्व किसी भी तरह से कम नहीं हुआ है.

लगभग पौने दो सौ साल पुराना बिन खंभे का यह झूलता हुआ पुल आज भी आकर्षण का केंद्र है, फिर वह चाहे पर्यटन के लिहाज से हो या कोलकाता को हावड़ा समेत अन्य उपनगरों से जोड़ने का मामला हो. हावड़ा ब्रिज के अलावा पूर्वी भारत के इस सब से बड़े महानगर कोलकाता के दर्शनीय स्थलों में विक्टोरिया मैमोरियल, अजायबघर  और बिड़ला प्लेनेटोरियम समेत बहुत सारे स्थल हैं.

विक्टोरिया मैमोरियल

विक्टोरिया मैमोरियल  भारत में ब्रिटिश राज का एक स्मारक स्थल है. 228×338 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैले इस स्मारक में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के साथ अन्य ब्रिटिश प्रशासकों का अभिलेखागार भी है. महारानी विक्टोरिया की मृत्यु के बाद 1901 में इसे तत्कालीन वायसराय ने बनवाया था. 1921 में पहली बार इसे आम लोगों के दर्शन के लिए खोल दिया गया. संग्रहालय के ऊंचेऊंचे खंभे, रंगीन कांच और राजकीय सजावट बरतानिया राज और महारानी विक्टोरिया की उपस्थिति की कहानी सुनाते हैं.

बोटैनिकल गार्डन

यह भी गंगा के किनारे कोलकाता के उस पार स्थित है. यह भारत का सब से बड़ा बोटैनिकल पार्क है. 213 एकड़ में फैले इस पार्क में 1,400 प्रजातियों के लगभग 12 हजार दुर्लभ किस्म के पेड़ पाए जाते हैं, इसी कारण यह विश्वविख्यात है. 25 हिस्सों में बंटे इस उद्यान के अलगअलग भाग में विभिन्न किस्म के पेड़पौधे हैं.

अलीपुर चिडि़याघर

यह एक ऐतिहासिक चिड़ियाघर है. जिस के मछलीघर में विभिन्न प्रजातियों की रंगबिरंगी मछलियां हैं. चिड़ियाघर में एक तरफ रेपटाइल्स हाउस है जहां किस्म किस्म के सांपों के अलावा मगरमच्छ और घडि़याल भी हैं. यहां बंगाल के मशहूर रौयल बंगाल टाइगर के अलावा सफेद बाघ, जलहस्ती, गैंडा, अफ्रीकी जिराफ, जेब्रा, नीलगाय, बारहसिंगा आदि भी हैं.

इंडियन म्यूजियम

यह एशिया के वृहत्तम संग्रहालयों में से एक है. यहां हजारों वर्ष पुराने, शिवालिक काल के जीवाश्म रखे गए हैं. शिवालिक की पहाड़ियों पर पाए जाने वाले 20 फुट दांतों वाले विशाल हाथी से ले कर न्यूजीलैंड के एक प्राचीन पक्षी और 1891 में अमेरिका के अरिजोना में हुए उल्कापात के अवशेष और बहुत सारे अजीब और अनोखे संग्रह यहां देखने को मिलते हैं.

राष्ट्रीय पुस्तकालय

अलीपुर में चिड़ियाघर के सामने ही राष्ट्रीय पुस्तकालय है. यह देश का सब से बड़ा पुस्तकालय है.

मिलेनियम पार्क

गंगा किनारे बसा मिलेनियम पार्क महानगर के सौंदर्यीकरण का हिस्सा है. यहां से हावड़ा ब्रिज और हुगली सेतु का नजारा बहुत ही लुभावना नजर आता है. गंगा के किनारे से लगे पूरे इलाके को पार्क में तबदील कर दिया गया है. यहां तैरता हुआ चारसितारा होटल भी है. गंगा नदी में तैरते हुए होने के कारण यह फ्लोटेल कहलाता है.

शहीद मीनार

यह मीनार तुर्की, मिस्र और सीरियाई स्थापत्य कला का मिलाजुला स्वरूप है. भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर इस का नाम शहीद मीनार रखा गया. 48 मीटर ऊंची इस मीनार से पूरे कोलकाता का नजारा देखा जा सकता है. लेकिन यहां से हुई आत्महत्याओं की घटना के बाद इस में प्रवेश के लिए कोलकाता पुलिस मुख्यालय से विशेष अनुमति लेनी पड़ती है. इन प्रमुख पर्यटक स्थलों के अलावा कालीघाट, दक्षिणेश्वर, बेलूर मठ और फोर्ट विलियम भी दर्शनीय स्थल हैं. इन पर्यटन स्थलों को देखने का सब से अच्छा समय सितंबर से मार्च तक होता है.

कैसे पहुंचें

कोलकाता अपने दमदम एअरपोर्ट से राष्ट्रीय स्तर पर भारत के लगभग सभी हिस्सों से और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दक्षिणपूर्व एशियाई देशों से जुड़ा हुआ है. हावड़ा, सियालदह और कोलकाता रेलवे टर्मिनस में देश के विभिन्न हिस्सों से ट्रेनें आती हैं. कोलकाता के विभिन्न स्थलों को बस, मिनी बस, ट्राम, लांच, मैट्रो ट्रेन, लोकल ट्रेन, लक्जरी एसी बस द्वारा देखा जा सकता है.

दीघा

यह कोलकाता से 187 किलोमीटर दूर स्थित है. भारतीय समुद्रतटों में दीघा ऐसा पर्यटन स्थल है जहां बीच पर अठखेलियां करती लहरों का लुत्फ उठाने देशविदेश से पर्यटक बड़ी तादाद में आते हैं. दीघा में पर्यटन का सब से अनुकूल समय नवंबर से मार्च तक है. वैसे पर्यटकों का पूरे साल यहां आना लगा रहता है. इस का पुराना नाम बारीकूल है. पर अब यह दीघा के ही नाम से जाना जाता है. यहां सूर्योदय और सूर्यास्त के नजारे मनमोहक होते हैं.

दीघा का साफसुथरा समुद्र तट ऐसा है कि इस तट पर दूरदूर तक पैदल चला जा सकता है. गौरतलब है कि दीघा का समुद्र तट ओडिशा के समुद्रतट से जा कर मिलता है. इसीलिए कहा जाता है कि अगर कोई दीघा के समुद्रतट के किनारेकिनारे चलता जाए तो वह ओडिशा पहुंच जाएगा. अगर ओडिशा की ओर न जाना हो तो दीघा के करीब और भी बहुत सारे पर्यटन स्थल हैं. इन्हीं में से एक है न्यू दीघा. हाल के दिनों में न्यू दीघा को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया है. यहां समुद्रतट के अलावा  झील और पार्क भी हैं.

दीघा से 14 किलोमीटर की दूरी पर है शंकरपुर. इस की ख्याति फिशिंग प्रोजैक्ट के रूप में अधिक है. हाल के दिनों में इसे बीच रिजोर्ट के रूप में विकसित किया गया है. इस के अलावा लोगों के लिए पिकनिक स्थल है चंदनेश्वर. दीघा में नहाने, तैरने की सुविधा है. लेकिन यहां पर तट के कुछ ऐसे भी स्थल हैं जहां तैरने की सख्त मनाही है, विशेष रूप से ज्वार के दौरान जब समुद्रतट का पानी उफान पर होता है. दीघा में समुद्रतट के अलावा तटीय वृक्षों का एक जंगल भी है जो स्थानीय रूप से  झाऊवन के नाम से जाना जाता है. समुद्र की लहरों में तैरनेखेलने के बाद अकसर लोग ‘ झाऊवन’ में आराम करते हैं.

दीघा पहुंचने का रास्ता

कोलकाता से दीघा रेल और सड़क दोनों रास्तों से पहुंचा जा सकता है. कोलकाता से दीघा की दूरी मात्र 4 घंटे में तय हो जाती है. कोलकाता के एस्प्लानेड, उल्टाडांगा से दीघा के लिए सीधी बसें जाती हैं. हावड़ा से दीघा के लिए ट्रेनसेवा भी है. ट्रेन से दीघा पहुंचने में महज 2 घंटे का समय लगता है.

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