बिग बॉस का विनर नहीं बनाया तो..

अपनी हरकतों और बड़बोलेपन की वजह से हमेशा ही सुर्खियों में रहने वाले ओम स्वामी ने अब ऐसा कारनामा किया है जिसकी कल्पना कोई नहीं कर सकता. ओम स्वामी ने बिग बॉस शो के मेकर्स को धमकी दी है कि अगर उन्हें शो का विजेता नहीं बनाया गया तो वो उत्पात मचाएंगे और सख्त कदम उठाएंगे.

एक वेबसाइट की खबर के मुताबिक ओम स्वामी घर में वापस आ चुके हैं और घरवालों के घर काम में फिर से अड़ंगा डाल रहे हैं. लेकिन हद तो तब हो गई जब उन्होंने शो की टीम को धमकी दे डाली कि वो उन्हें ही बिग बॉस 10 का विजेता बनाएं वरना वो और उनकी यूनियन शो के फाइनल में आकर सख्त कदम उठाएंगे.

ओम स्वामी की इस धमकी के बाद देखते हैं कि शो की टीम और खुद सलमान खान उनके खिलाफ क्या एक्शन लेते हैं. वैसे अभी तक ओम स्वामी की हरकतों को रोकने के लिए जो भी किया गया उसमे असफलता ही हाथ लगी लेकिन स्वामी बाज नहीं आए.

घरवाले उनसे बेहद परेशान हैं लेकिन स्वामी हैं कि सुधरने का नाम ही नहीं ले रहे और तो और दिए गए मालगाड़ी टास्क में वो सभी के लिए बाधा बनते रहे. उन्होंने मन बना लिया कि वो घर के किसी भी सदस्य को इसमें कामयाब नहीं होने देंगे.

देखते हैं कि घर के अंदर ओम स्वामी की हरकतें रुकती हैं या फिर उनके खिलाफ कोई ठोस कदम उठाया जाएगा.

17 संदेश जीवन को बेहतर बनाने के

जिंदगी में हम कई दफा उतने खुश नहीं रह पाते जितना रह सकते हैं. दरअसल, हम जीवन को उस के बेहतरीन रूप में नहीं स्वीकारते. कहीं न कहीं हम स्वयं ही इस के लिए जिम्मेदार होते हैं. यदि हम कुछ बातों का ध्यान रखें तो यकीनन हमारी जिंदगी पहले से कहीं ज्यादा खूबसूरत और मकसदपूर्ण  बन सकती है. जानिए, कुछ ऐसी ही बातें:

बच्चों से 17 साला की सी बातें करें

तुलसी हैल्थकेयर के डायरैक्टर, डा. गौरव गुप्ता कहते हैं कि जब आप के बच्चे 17-18 साल के हो जाएं तब उन के साथ मां की तरह नहीं, बल्कि एक बड़ी बहन की तरह व्यवहार करें. ऐसा करने से उम्र का अंतर खत्म हो जाएगा. उन के मन में आप के लिए सम्मान तो हो लेकिन वे बिना किसी झिझक के अपने दिल की बात आप से साझा कर सकें.

यह उम्र बड़ी नाजुक होती है. बच्चे युवावस्था की दहलीज पर कदम रख रहे होते हैं. उन में जोश तो भरपूर होता है, लेकिन जीवन की समझ उतनी नहीं होती. कई बार इस उम्र के बच्चे कुछ ऐसा कदम उठा लेते हैं, जिस के परिणाम गंभीर होते हैं. ऐसे में बहुत सावधानी की जरूरत है.

बच्चों पर अपनी बातें थोपें नहीं, बल्कि उन का नजरिया समझने की कोशिश करें. उन्हें आप के साथ व सुरक्षा की जरूरत है पर विकसित होने के लिए उन्हें पूरा स्पेस भी दें. 17-18 साल की उम्र के बच्चों की अपनी एक समझ विकसित

हो जाती हैं. उन्हें उन के तरीके से सोचने और काम करने दें, लेकिन उन्हें अच्छेबुरे का अंतर जरूर समझाएं.

17 साला मानसिकता जरूरी

डा. अतुल कहते हैं कि बड़े होने पर सामान्यतया हम जिंदगी के बनेबनाए नियम फौलो करने लगते हैं. इस से हमारी रचनात्मकता कहीं गुम हो जाती है. हमें सदैव यह याद रखना चाहिए कि हम सभी के अंदर एक बच्चा है, जो अपनी मनमानी करना चाहता है, नएनए तरीकों से हर तरह के काम करना चाहता है. आप किसी भी उम्र में हों, यही मानसिकता बनाए रखें. तभी आप के अंदर पहले जैसी ऊर्जा व उत्साह कायम रहेगा और आप एक बेहतर जिंदगी जी सकेंगे.

दिमाग व मन को रखें चुस्त

आप 25 के हों या 55 के, दिमाग और मन स्वस्थ रखना जरूरी है. दिमाग को चुस्त रखने के लिए नियमित रूप से मैंटल ऐक्सरसाइज करते रहें. समयसमय पर दिमाग को चैलेंज करें. नए शब्द, नई बातें सीखें. नया सीखने की ललक कायम रखें. कभीकभी काम से ब्रेक ले कर परिवार व दोस्तों के साथ कहीं घूमने निकल जाएं. खानपान पर ध्यान दें. सकारात्मक सोच रखें. मुसकराने की आदत डालें व सोशल बनें. फिजिकल ऐक्टीविटीज भी भरपूर करें.

17 घंटों का बेहतर प्रयोग करें

हम सामान्यतया दिन के 24 घंटों में से 7 घंटे सोने में गुजारते हैं. बचे हुए 17 घंटों को बेहतर उपयोग करने के लिए जरूरी है छोटीछोटी बातों का ध्यान रखना. मसलन:

– व्हाट्सऐप, फेसबुक, ईमेल वगैरह चैक करने का काम दोपहर में लंच टाइम में करें ताकि सुबह के वक्त जब आप की ऐनर्जी सब से अधिक होती है, जरूरी काम निबटा लें.

– कम समय में बेहतर काम करना चाहते हैं, तो घर या औफिस अपने काम की जगह को साफसुथरा व व्यस्थित रखें. इस से न सिर्फ जरूरी चीजें, फाइल्स, कागजात वगैरह ढूंढ़ने में समय की बरबादी नहीं होती वरन काम करने में मन भी लगता है.

– काम के साथसाथ शरीर को आराम भी दें.

90 मिनट काम के बाद 10 मिनट का ब्रेक आप को रिफ्रैश करने के लिए जरूरी है.

– हमेशा सभी के लिए उपलब्ध न रहें. न कहना भी सीखें. दुनिया की भीड़ से अलग किसी एकांत जगह पर कभीकभी सिर्फ अपने साथ रहें. मोबाइल, कंप्यूटर वगैरह बंद कर आत्मचिंतन करें, रचनात्मक काम करें.

– तनाव न लें. जितना समय हम दूसरों के साथ वादविवाद या काम बिगड़ने के तनाव में गुजारते हैं, उस से कम समय में हम बिगड़े काम और बिगड़े रिश्तों को सुधार सकते हैं.

औफिस में 17 साला जोश से करें काम

कहा जाता है कि 17 की उम्र का जोश कुछ अलग ही होता है, गलत नहीं है. यही वह उम्र है जिस में व्यक्ति अपनी प्राथमिकताओं को समझने लगता है और उन्हें पूरा करने की भरपूर कोशिश करता है. इस उम्र में वह अपने साधनों व लक्ष्यों को ले कर काफी उत्साहित रहता है. पर उम्र बढ़ने के साथसाथ व्यक्ति थोड़ा आलसी हो जाता है. वह बेमन से काम करने लगता है. यह उचित नहीं, इनसान को अपने अंदर 17 साला जोश और कुछ कर दिखाने का जज्बा सदैव कायम रखना चाहिए. तभी वह किसी भी उम्र में उपलब्धियों का आसमान छू सकेगा.

बजाय पुरानी पत्नी के 17 साला प्रेमिका बनें

उम्र बढ़ने के साथसाथ महिलाएं भौतिक सुखसुविधाएं  जुटाने व घरगृहस्थी के कामों में उलझ जाती हैं. घर व बच्चों की जिम्मेदारियों के बीच अपनी चाहत और जीवनसाथी के प्रति अपने प्रेम को प्रकट नहीं कर पातीं, पर यह रवैया सही नहीं. पतिपत्नी के रिश्ते में ताजगी बनाए रखना भी जरूरी होता है. अपनी फिटनैस पर ध्यान दें. शारीरिक व मानसिक रूप से फिट रहें. जिम जौइन करें. अपने लुक के साथ पहले की तरह ही नएनए ऐक्सपैरिमैंट करें. ट्रैंडी कपड़े और फुटवियर खरीदें. ऐसी किताबें पढ़ें, जो आप को प्रेरित करें. पति के साथ बीचबीच में चुहलबाजियां और रिश्तों की गरमाहट बनाए रखें.

खुश रहने की वजह ढूंढें़

खुश रहना एक भावनात्मक और मानसिक प्रक्रिया है, जो आप की जिंदगी को खुशहाल बनाने में बहुत अहम भूमिका निभाती है.

खुश रहने का मतलब यह नहीं कि आप की जिंदगी में सब कुछ ठीक चल रहा है. इस का मतलब यह है कि आप अपनी परेशानियों को भूल कर भी खुशीखुशी जी सकते हैं. इस से आप को परेशानियों से लड़ने की शक्ति मिलती है. खुश रहने से इनसान को अपने आसपास की हर चीज अच्छी लगने लगती है, जिस से उस के मन के नकारात्मक खयाल दूर भागने लगते हैं और वह एक बेहतर जिंदगी जी सकता है.

खुश रहने के कारण ढूंढ़ें.

बड़ी खुशियां ही नहीं, छोटीछोटी खुशियां भी महसूस करें.

खुश रहें, सोचें कि आप के पास किसी चीज की कमी नहीं. हाथपैर सहीसलामत हैं, दोस्त नातेरिश्तेदार हैं, घर है, पैसा है, बच्चे हैं, कामधंधा है, तो फिर क्यों न अपने पास जो चीजें हैं, उन्हीं में खुश रहें.

दोस्तों के साथ करें 17 साला मस्ती

क्लीनिकल साइकोलौजिस्ट डा. अतुल कहते हैं, ‘‘जैसेजैसे हमारी उम्र बढ़ती है, हमारी जिम्मेदारियां भी बढ़ने लगती हैं. कम उम्र में जिस तरह से हम खुल कर दोस्तों से अपने मन की बात कहते थे, घूमतेफिरते, हंसीमजाक करते थे, उस से हमें नई ऊर्जा मिलती थी. मगर समय के साथ सब छूटता चला जाता है.’’

पुराने दास्तों के साथ उसी बेफिक्री के साथ मिल कर देखिए. यह एक थेरैपी की तरह आप को नई ऊर्जा और फ्रैश फीलिंग से भर देगा और आप का जिंदगी को देखने का नजरिया बदल जाएगा.

पति को 17 साला ढांचे में रखें

पति की सेहत, रूटीन, पहनावे व खानपान का ध्यान आप को ही रखना है. प्रयास करें कि उन्हें पौष्टिक भोजन दें. शुगर/कोलैस्ट्रौल बढ़ाने वाली चीजों से परहेज कराएं. सही समय पर सारे काम करने को प्रेरित करें. उन के लिए ऐसे सलीकेदार पहनावे चुनें, जिस से वे स्मार्ट व सौम्य दिखें. ऐक्सरसाइज व अधिक से अधिक पैदल चलने के लिए प्रेरित करें.

17 की तर्कशीलता जरूरी

इस संदर्भ में क्लीनिकल साइकोलौजिस्ट डा. अतुल कहते हैं, ‘‘कम उम्र में हम किसी भी बात को सहजता से नहीं स्वीकारते. हम इस पर गहराई से विचार करते हैं कि क्या सही है और क्या गलत. सामाजिक बंधनों व रीतिरिवाजों को तोड़ कर वही करते हैं, जो हमें सही लगता है. किसी भी बात को तर्क की कसौटी पर जांचते हैं.

‘‘मगर उम्र बढ़ने के साथसाथ हम बातों को जैसा है, वैसा ही मानने लगते हैं. कम उम्र में हमें अधिक अनुभव नहीं होता पर उम्र बढ़ने के साथसाथ अनुभव और ज्ञान बढ़ते जाते हैं. ऐसे में हमें बैलेंस रखना होगा. अनुभव के साथ हम तर्क का प्रयोग भी करें, तो पुरातनपंथी सोच से किनारा करते हुए अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं.’’

17 तरीकों से परिवार में आएं खुशियां

– औफिस से घर लौटते वक्त कभीकभी खानेपीने की चीजें या बच्चों के लिए खिलौने वगैरह ले लें.

– जीवनसाथी को बीचबीच में सरप्राइज गिफ्ट देते रहें.

– परिवार के साथ कभी अचानक घूमने जाने का प्रोग्राम बनाएं.

– परिवारिक झगड़े का समाधान प्रेमपूर्वक करें.

– हर सदस्य को परिवार में उस के स्थान और उपयोगिता का एहसास कराएं.

– छुट्टियों का वक्त मोबाइल/इंटरनैट/दोस्तों के साथ बिताने के बजाय परिवार के साथ बिताएं.

– परिवार में सभी को एकदूसरे की इज्जत करने का पाठ पढ़ाएं.

– कभीकभी घर में खाना बनाने के बजाय खाना और्डर करें और घर में ही पार्टी का माहौल बनाएं.

– घर के हर सदस्य के जन्मदिन या अन्य खास मौकों को यादगार बनाएं.

– घर पहली पाठशाला है. बच्चों को ईमानदारी और संस्कार की अहमियत सिखाएं.

– घर के बुजुर्गों का सम्मान करें.

– टीवी देखने का समय निर्धारित कर दें.

– घर में अुनशासन रखें.

– रिश्तेदारों के यहां सीमित आनाजाना रखें.

– लड़केलड़की में भेद न करें.

– कोई समस्या आने पर घर के सभी सदस्यों से शेयर करें और उन की राय लें.

– घर में सभी को बचत करने की आदत डालें.

रिश्तों में करें निवेश

जिंदगी में हम नहीं जानते, कब कौन हमारे काम आ जाए. इसलिए बिना लाभहानि की परवाह किए, जितना हो सके, दूसरों के साथ रिश्ते को प्रगाढ़ करें. महीने में एक बार ही सही, पर अपने रिश्तेदारों को याद जरूर करें. दास्तों के काम आएं और अनजानों की भी मदद करें.

सीखें हर पल कुछ नया

सीखने की कोई उम्र नहीं होती, जिंदगी में जब मौका मिले, कुछ नया सीखने से गुरेज नहीं करना चाहिए. आज के समय के युवाओं की तरह समय के साथ नईनई तकनीकों से दोस्ती कीजिए और देखिए, कैसे आप को छोटेबड़े कामों के लिए अपने बच्चों/पति का मुंह नहीं देखना पड़ेगा.

डा. अतुल कहते हैं कि हालफिलहाल नोटबंदी की स्थिति में सभी के लिए जरूरी हो गया है कि वह कैशलैस ट्रांजैक्शन के तरीके सीखे. यह आज के समय की मांग है. पर आज यदि इस से जुड़ी जानकारियां और बारीकियां समझने का प्रयास यह सोच कर नहीं करेंगी कि इस उम्र में इन लफड़ों व झंझटों में कौन पडे़, तो यह आप की गलत सोच है. आप इसे अपनाएंगी, तो आप की ही जिंदगी आसान हो जाएगी.

जब बच्चे 17 के होने लगे

प्राइमस सुपर स्पैशियालिटी हौस्पिटल के डा. संजू गंभीर कहते हैं कि यह बहुत जरूरी है कि जब आज के बच्चे 17 के होने लगें, तब आप उन से अच्छे से जुडे़ रहें क्योंकि यही उम्र होती है, जब बच्चे सही और गलत के बीच फर्क नहीं कर पाते. ऐसे में यदि किसी बड़े का साथ हो तो बहुत अच्छा होता है.

खुद के साथ समय बिताएं

कभीकभी किसी ऐसी जगह जा कर बैठें, जहां कोई आप को डिस्टर्ब न कर सके. अपने मोबाइल/कंप्यूटर वगैरह बंद कर दें और फिर शांत मन से आगे का प्लान सोचें.   

17 बातें जो जीवनसाथी से कभी न कहें

– आप की ड्रैसिंग सैंस अच्छी नहीं.

– तुम से नहीं होगा, छोड़ो मैं कर लूंगी.

– तुम मेरी थोड़ी भी केयर नहीं करते.

– देखो न मैं मोटी हो गई हूं.

– मुझे तुम से शादी करनी ही नहीं चाहिए थी.

– मुझे तुम्हारे दोस्त अच्छेनहीं लगते.

– नौकरी कब बदलोगे.

– व्हाट इज रौंग विद यू.

– रुको, मैं बताती हूं, यह काम कैसे करना है.

– डोंट टच मी, दूर रहो.

– काश, तुम थोड़ा ज्यादा कमा रहे होते.

– मेरा ऐक्स मेरे लिए हमेशा मेरी पसंद की साड़ी लाता था. मेरी चौइस की बहुत परवाह थी उसे.

– तुम बिलकुल अपने पिता जैसे जिद्दी हो.

– यदि तुम सचमुच मुझ से प्यार करते, तो ऐसा नहीं करते.

– मेरी मां ने पहले ही वार्निंग दी थी कि तुम से निभ नहीं सकती.

– तुम्हारी मां कितना बोलती हैं.

– तुम्हारी बहनों ने मेरी जान खा ली है.

17 चीजें जिन से दूर रहें

इन 17 चीजों को घर और मन से दूर रखना जरूरी है:

1. ईर्ष्या

2. क्रोध

3. पछतावा

4. नकारात्मक सोच

5. टालने की प्रवृत्ति

6. चिंता

7. चुगलखोर दोस्त

8. बुराइयां निकालने वाले लोग

9. हतोत्साहित करने वाले लोग/रिश्तेदार

10. अंधविश्वासी सोच

11. झूठा दंभ

12. कृतघ्नपूर्ण व्यवहार

13. हारने का खौफ

14. अनिश्चय की स्थिति

15. गलत सोच वाले व्यक्ति का साथ

16. फुजूलखर्ची

17. प्रतिकार की भावना

निकम्मापन और नोटबंदी

नरेंद्र मोदी की सरकार ने साबित कर दिया है कि न उन्हें राज करना आता है और न ही उसे सीखने की उन की इच्छा है. उन की सरकार के लोग प्रवचनों से निकल कर आए हैं और वे आम साधुसंतों, स्वामियों व बाबाओं की तरह के प्रवचन दे सकते हैं, कल्याण भव: का आशीर्वाद दे सकते हैं, पर सरकार नहीं चला सकते.

नोटबंदी तो उन के निकम्मेपन का एक बड़ा नमूना है, वरना उन के अब तक के ढाई साल के फैसलों में कोई एक अच्छा फैसला नहीं हुआ, जिस से आम गृहिणी को राहत मिली हो. सरकार उन बाबाओं की तरह काम कर रही है, जो शायद खुद इस झूठ को मानते हैं कि व्यक्ति के दुखों का कारण उस के पिछले जन्मों या इस जन्म के पाप हैं और धर्मगुरु व सरकार उन्हें पापमुक्ति दिलाने के लिए कष्ट दे तो ही उन का जीवन सुधरेगा. जैसे पापों के प्रायश्चित्त के लिए नंगे पैर चलना, कईकई दिन भूखे रहना, ठंडे पानी में स्नान करना, अपना सर्वस्व दान करना शामिल है, वैसे ही सरकार बिना कुछ किए जनता से त्याग, बलिदान और कष्ट उठाने की बात आते ही करने लगी कि इस के कुछ दिन बाद उन की घोर तपस्या फल जाएगी और सुनहरे महलों का वरदान उन्हें स्वयं भगवान देंगे.

हमारी मूढ़ जनता, जिन में महिलाएं ज्यादा शामिल हैं, इस गलतफहमी में रह रही है और हर कष्टमय काम को ताली बजा कर स्वागत करती रही है, चाहे वह गैस सब्सिडी समाप्त करने का मामला हो, गौरक्षा के नाम पर दलितों और मुसलिमों पर अत्याचार की घटनाएं हों, टैलीविजन मीडिया पर अंकुश लगाने वाले नियम हों, किसानों से जबरन जमीन लेने का प्रयास हो या अब नोटबंदी हो, धर्मभीरु जनता उन्हें स्वामियों, धर्मगुरुओं का आदेश मान कर सह रही है.

सरकार चलाना और मठआश्रम चलाना अलग है. केवल बातों से सरकार नहीं चलती. जहां भी केवल बकबकिए नेता बने और सरकार में घुस गए, वहां की जनता ने बहुत अनाचारअत्याचार देखे, चाहे वह लेनिन हो, स्टालिन हो, ईदी अमीन हो, माओ हो.

नोटबंदी एक ऐसी चमत्कारी तपस्या की तरह पेश की गई थी, मानो इस कष्ट को सहने के बाद भगवान प्रकट हो कर खुद ही इस भारतभूमि पर स्वर्ग फैला देंगे. नरेंद्र मोदी की गलती कम है, इस देश की मूर्खता की गलती ज्यादा है. काले धन के मर्म को पहचाने बिना और यह जाने बिना कि पाप होते क्यों हैं, जपतप से पुण्य कमाने की सहमति जो जनता दे रही है, नोटबंदी जैसे फैसले का कारण है.

अब हालत यह हो गई है कि धर्मगुरुओं के कहने पर जनता को अब गणेश को दूध पिलाने के लिए कतारों में खड़ा होना पड़ेगा और वह भी नंगे पैर और भूखे पेट. जय नोट महाराज की. कल्याण करो, वर दो, वर दो.       

सोशल मीडिया की लत के खिलाफ: विद्या बालन

फिल्म ‘कहानी-2: दुर्गा रानी सिंह’ की सफलता से उत्साहित विद्या बालन महिलाप्रधान किरदारों को निभाने में माहिर होती जा रही हैं. महिला सशक्तीकरण के मुद्दे व अभिनय में नृत्य, संगीत के प्रशिक्षण के असर पर जानिए उन की बेबाक राय.

मूलतया दक्षिण भारतीय विद्या बालन को कोलकाता के लोग बंगाली समझते हैं क्योंकि वह बहुत अच्छी हिंदी बोलती हैं. उनसे बात करते समय इस बात का एहसास ही नहीं होता कि वे हिंदी भाषी नहीं हैं. सुजोय घोष निर्देशित फिल्म ‘कहानी 2 : दुर्गारानी सिंह’ में उन्हें सराहा गया है. उन्हें एक सफल फिल्म की आवश्यकता थी जो ‘कहानी 2 : दुर्गारानी सिंह’ ने पूरी कर दी.

विद्या बालन की एक खासीयत यह भी है कि उन्होंने संगीत का प्रशिक्षण ले रखा है, हालांकि अभी तक उन्होंने दूसरी बौलीवुड अभिनेत्रियों की तरह किसी भी फिल्म में गीत नहीं गाया है. हाल ही में जब विद्या बालन से मुलाकात हुई, तो उन से बंगाल, संगीत व महिलाओं के हालात पर विशेष बातचीत की.

आप को पश्चिम बंगाल खासकर कोलकाता के लोग बंगाली समझते हैं?

मैं मूलतया दक्षिण भारतीय हूं, लेकिन कोलकाता के लोग मुझे बंगाली समझते हैं. यह महज संयोग है कि मैं ने 4 फिल्मों की शूटिंग कोलकाता में की और उन में से 3 फिल्मों में मैं ने बंगाली किरदार निभाया. मैं ने 2003 में एक बंगला फिल्म ‘भालो ठेको’ में भी अभिनय किया था. अब तक मैं ने बंगला भाषा काफी सीख ली है. मैं बंगला गीत व संगीत की भी दीवानी हूं. कोलकाता में शूटिंग करना मेरे लिए हमेशा सुखद अनुभव रहता है. वहां हमेशा मुझे गरमजोशी का एहसास मिलता है. वहां के लोग कला और कलाकार की कद्र करना जानते हैं. शायद इसलिए मेरी पहचान से बंगाल जुड़ गया है.

आप ने कर्नाटक संगीत का प्रशिक्षण लिया है, फिर भी अभी तक किसी फिल्म में गाना नहीं गाया?

मैं पेशेवर गायक नहीं हूं. मैं बहुत बेसुरा गाती हूं. संगीत सीखने का अर्थ यह नहीं होता कि सभी लता मंगेशकर बन जाएं. कुछ चीजें अपने लिए सीखी जाती हैं. दक्षिण भारत में हम लड़के व लड़कियों को नृत्य व संगीत बचपन से सिखाया जाता है. इस से हमारे अंदर अनुशासन आता है. इसलिए मैं ने कर्नाटक संगीत के अलावा नृत्य का भी प्रशिक्षण लिया था. पर मैं ने कभी नहीं चाहा कि मैं किसी फिल्म में गीत गाऊं.

संगीत व नृत्य का प्रशिक्षण बतौर कलाकार अभिनय में कितना मदद करता है?

सिर्फ संगीत ही क्यों, नृत्य, मार्शल आर्ट या पेंटिंग का प्रशिक्षण हो, हर प्रशिक्षण इंसान को कभी न कभी मदद जरूर करता है. सभी प्रशिक्षण, जिन से आप जिंदगी में एक नए नजरिए से जुड़ सकें, जिंदगी को नए नजरिए से समझ सकें, कलाकार की मदद करते हैं. हम गीत, नृत्य व दृश्यों में भावनाओं को व्यक्त करते हैं. यदि कलाकार को इस का अनुभव है, यदि कलाकार ने विविध प्रकार का प्रशिक्षण ले कर अपनी भावनाओं को व्यक्त करना सीखा है, तो वह उस के लिए मददगार ही होता है. देखिए, यह जरूरी नहीं है कि एक कलाकार के तौर पर आप जो कहानी कह रहे हैं, उस के अनुभव से आप निजी जिंदगी में गुजरे हों, मगर यदि आप किताबें पढ़ते हैं, नाटक देखते हैं, संगीत सुनते हैं, तो आप को एक अनुभव का एहसास होता है, इस से आप के प्रदर्शन पर असर पड़ता है.

क्या आप को महिलाओं के मुद्दों पर समाज में कोई बदलाव नजर आ रहा है?

हम कुछ लड़कियों या औरतों से मिलते हैं या कुछ पढ़ते हैं, तो हमें लगता है कि कुछ बदलाव आ गया है. पर जब कुछ अजीब सी घटनाओं के बारे में सुनते हैं, तो लगता है कि कोई बदलाव नहीं आया.

मैं अखबार पढ़ रही थी. मैं ने खबर पढ़ी कि एक मां अपनी जुड़वां बेटियों को पैसे के लिए पड़ोसी के 17 साल के बेटे के हाथों बेचते हुए पकड़ी गई. इस खबर को पढ़ने के बाद मेरे दिमाग में सवाल उठा कि क्या आज भी औरतों की स्थिति व औरतों से जुड़े मुद्दों में फर्क नहीं आया. पर हम पूरी तरह से यह नहीं कह सकते कि कोई फर्क नहीं आया. कई जगह फर्क आ रहा है, कई जगह फर्क नहीं आया. पर हर जगह से लोग बदलाव लाने की कोशिश कर रहे हैं, यह एक अच्छी बात है. यह 10-12 वर्ष का मामला नहीं है. सदियों से जो हमारी सोच चली आ रही है, उसे बदलने का मसला है, जिस में समय लगेगा. सदियों से कहा जाता रहा है कि यह मर्दों की दुनिया है. औरतों को इस तरह से रहना चाहिए, उन को फलां काम नहीं करना चाहिए आदि. हर औरत की जिंदगी पहले पिता, फिर भाई, फिर पति और फिर बेटे के साए में ही चलनी चाहिए, यह सोच इतनी जल्दी नहीं बदलेगी.

आप के विवाह के बाद से आप की फिल्में लगातार असफल होती रहीं?

फिल्मों की सफलता या असफलता का मेरी शादी से कोई संबंध नहीं है. हर फिल्म अपने कथानक के मापदंड पर सफल या असफल होती है. एक फिल्म की वजह से दूसरी फिल्म पर असर नहीं पड़ता. दर्शक को फिल्म पसंद आ गई, तो उसे सफल होने से कोई नहीं रोक पाता.

आप ने कहा था कि सोशल मीडिया से लोगों को नहीं जुड़ना चाहिए. पर अब तो आप खुद ही सोशल मीडिया से जुड़ गई हैं?

आप ने एकदम सही पकड़ा. मैं ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम से जुड़ गई हूं. पर मैं इस तरह के मीडियम की लत के खिलाफ आज भी हूं. लोगों में सोशल मीडिया की जो लत लग जाती है, जो एक नशा हो जाता है, मैं उस के खिलाफ हूं. कुछ लोग अपना काम छोड़ कर व्हाट्सऐप या फेसबुक पर लगे रहते हैं. यह गलत है. एक तरह से यह भी शराब की तरह एक नशा बन गया है.

मुझे लगता है कि यह क्या पागलपन है कि लोग सोशल मीडिया पर ही एकदूसरे से बात करते हैं. बगल में जो बैठा है, उस से बात करने के लिए उन के पास समय नहीं होता है. मैं सोशल मीडिया से जुड़ी हूं, पर अभी भी पूरी तरह से सोशल मीडिया से नहीं जुड़ी हूं. हर मुद्दे पर अपनी राय दूं, ट्वीट करूं, ऐसा नशा नहीं है. फेसबुक पर भी मैं थोड़ा ही सक्रिय हूं. मैं यह मानती हूं कि दर्शकों, अपने प्रशंसकों के साथ जुड़ने का यह अच्छा माध्यम है.

पर आप में सोशल मीडिया को ले कर जो बदलाव आया, उस की वजह क्या है?

देखिए, आज सभी सोशल मीडिया व ट्विटर पर सक्रिय हैं. हमारे देश के प्रधानमंत्री भी हर मुद्दे पर ट्वीट करते हैं. अमिताभ बच्चन भी ट्विटर, फेसबुक पर हैं, ब्लौग लिख रहे हैं. यदि ये सब दिग्गज सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं, तो फिर मुझे लगा कि मुझे ज्यादा दूरी नहीं रखनी चाहिए. मैं ने सोचा कि मैं कोशिश कर के देखती हूं. शायद यह मेरे बस का नहीं है या शायद मेरे बस का है. मुझे कहने में कोई संकोच नहीं कि यह इतना बुरा नहीं है. लेकिन इस की लत गलत है.

आप ‘निर्मल भारत अभियान’ से जुड़ कर देश में शौचालय बनवाने की मुहिम का हिस्सा हैं. मगर अब वहां भी कई तरह की गड़बडि़यां सामने आ रही हैं?

इस मसले पर मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है. पर मैं निर्मल भारत अभियान के तहत शौचालय बनवाने के लिए सिर्फ बड़े शहर ही नहीं, देहातों के कई कार्यक्रमों में जा चुकी हूं. मैं ने देखा है कि लोग जोश से इस मकसद के लिए पैसा इकट्ठा कर रहे हैं. अब कई प्रकाशक और कौर्पोरेट कंपनियां भी शौचालय बनाने के लिए आर्थिक मदद दे रही हैं. पर भ्रष्टाचार हर जगह होता है. हम सभी भ्रष्टाचार के आगे बेबस हैं. कोशिशें जारी हैं. बीचबीच में अड़चनें भी आती हैं.

बहरहाल, कुछ जगह जोरशोर से काम हो रहा है, कुछ जगह पर कार्य बहुत धीमी गति से हो रहा है. कुछ जगह पर लोग शौचालय बनाने के नाम पर पैसे खा रहे हैं, मैं दावे के साथ ऐसा कुछ कह नहीं सकती. पर मैं इस तरह की चीजें पढ़ती रहती हूं. जब हम कार्यक्रम में जाते हैं तो पता चलता है कि कहीं शौचालय बन गए हैं, पर उन में पानी नहीं है, तो सफाई नहीं है या जो बनाए गए थे, वे फिर से टूट रहे हैं, उन की मरम्मत नहीं हो रही. इस तरह की समस्याएं बहुत हैं. पर इन का हल जरूर निकलेगा.

आप एक फिल्म कर रही हैं, ‘बेगम जान’ जिस की कहानी भारत-पाक बंटवारे के समय सीमा के वेश्यालय की है, जहां बेगम जान 15-20 लड़कियों से वेश्या का धंधा करवाती है. देश की आजादी को 67 साल हो गए हैं, क्या हालात में बदलाव आया है या वही हालात हैं?

अभी भी बहुत कम औरतों को इस बात का एहसास है कि उन के शरीर पर पहला हक उस का अपना है. ज्यादातर औरतें अभी भी यही समझती हैं कि वे किसी की जायदाद हैं. उन्हें लगता है कि उन की जिंदगी की डोर किसी और के हाथ में है. पर मैं यह मानती हूं कि अब धीरेधीरे यह सोच भी बदल रही है. पर 67 वर्ष में जितना बदलना चाहिए था, उतना नहीं बदला.

एक औरत होने के नाते आप ‘बेगम जान’ के काम को कितना सही या गलत मानती हैं?

मुझे नहीं लगता कि कोई भी औरत या लड़की जानते हुए धंधा करती है. हर किसी की कुछ मजबूरी होती है. इसलिए सही या गलत के माने वहां नहीं रह जाते. उन्हें लगता है कि हम चोरी या डाका डालने या किसी को मौत के घाट उतारने के बजाय जो कर सकते हैं, वह कर रही हैं. ऐसे में सहीगलत कुछ होता नहीं है. हम यही उम्मीद करते हैं कि ऐसा वक्त आए जब किसी भी औरत को अपने गुजारे के लिए यह सब न करना पड़े. पर हो सकता है कि इस में भी बहुत वक्त लग जाए.

बजट कहीं बिगड़ न जाए

कहते हैं कि जितनी लंबी चादर हो उतने ही पैर फैलाने चाहिए लेकिन आज लोग दिखावे के चलते अपनी जरूरतें इतनी बढ़ा लेते हैं कि उन को पूरा करने के लिए कर्ज में डूबे रहते हैं. इस के चलते उन की जिंदगी हमेशा तनावग्रस्त रहती है. इस का जायजा ले रहे हैं सतीश मिश्रा.

अचानक अखबार में छपे एक समाचार पर नजर पड़ी. खबर कुछ यूं थी :

‘छंटनी के बाद नौकरी से निकाले गए कुछ सौफ्टवेयर इंजीनियर्स रात के समय लूट करते हुए पकड़े गए. जब पुलिस ने तहकीकात की तो पता चला कि नौकरी के दौरान जरूरत से ज्यादा ऋण लेने के कारण ईएमआई यानी मासिक किस्त चुकाने के लिए इन लोगों ने वारदात को अंजाम दिया.’

दरअसल, लोगों में अनावश्यक खरीदारी को ले कर रुझान बढ़ा है. जिस के चलते अन्य लोगों की देखादेखी घर में सामान का जमावड़ा लगा देते हैं. ऐसा क्यों होता है कि जब लोग बाजार में जाते हैं तो दिखाई दे रही हर वस्तु उन के लिए जरूरी लगने लगती है? इस के पीछे कौन सी मानसिकता काम करती है?

मशहूर लेखक डेल कारनेगी कहते हैं कि आदमी के अंदर बड़ा बनने की लालसा जन्मजात होती है. उन्होंने यह भी कहा है कि लालसा बहुत गहराई से आती है. और इसी का फायदा बाजार भी उठा रहा है.

एक मध्यवर्गीय परिवार में घर की अलमारी में कपड़ों का अंबार लगा रहता है. ऐसे भी कपड़े मिल जाएंगे जिन्हें साल में एक बार भी पहनने का मौका नहीं आया हो.

महिलाओं की बात तो पूछिए मत. वे अपने को महत्त्वपूर्ण दिखाने के लिए क्या कुछ नहीं करतीं. इस आलेख का उद्देश्य किसी के व्यक्तिगत शौक पर कटाक्ष करना नहीं है बल्कि यह बताना है कि खरीदारी करने से पहले अच्छे से विचार कर लें कि क्या वाकई आप को उस चीज की जरूरत है या किसी मित्र व रिश्तेदार को देख कर खरीद रहे हैं या फिर उन्हें नीचा दिखाने के लिए तो ऐसा नहीं कर रहे हैं. इस बात का भी ध्यान रखें कि इस खरीदारी से घर का बजट तो नहीं गड़बड़ाएगा जिस की कीमत परिवार को कष्ट उठा कर चुकानी पड़े. यदि जवाब ईमानदारी से आप के परिवार के पक्ष में जाता है तो आगे बढ़ें वरना रुक जाएं.

ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो महीने दो महीने में टेलीविजन, मोबाइल और गाड़ी बदलते हैं पर एक निश्चित आमदनी वाले को तो यह समझना ही पड़ेगा कि वह अपने बजट को न बिगाड़े. त्यौहारों के समय तो कंपनियों द्वारा बड़ेबड़े इश्तिहार दे कर ग्राहकों को लुभाने की कोशिश की जाती है. इस चक्कर में पड़ कर कई लोग लंबी किस्तों के झमेले में भी पड़ जाते हैं. यह आप को तय करना है कि इस झमेले में पड़ना है या नहीं. किसी भी किस्त के लंबे समय तक भुगतान का अंतिम कष्ट सिर्फ आप को ही सहन करना है.

घर के मुखिया को सारी बातें सोच कर निर्णय लेना चाहिए. हर दिन नएनए इलैक्ट्रौनिक उपकरण खरीदने से पहले अपनी जरूरत का विवेकपूर्ण विश्लेषण करें. बजट के साथ लयताल बैठ रही है या नहीं, सुनिश्चित करें फिर खरीदें. खरीदार की कमजोरी व्यवसायी अच्छी तरह से जानता है. धंधे में वह अपना मुनाफा नहीं छोड़ता. कुछ लोगों को घर में जब तक कोई नई वस्तु या इलैक्ट्रौनिक आइटम न आ जाए, संतुष्टि नहीं होती और बाद में वे किस्त भरने और कर्ज चुकाने में परेशान रहते हैं.

एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मध्यवर्ग के लोगों में भीड़ को देख कर चलने की आदत होती है. भीड़ की चाल भेड़चाल की तरह होती है, कोई बौद्धिक लक्ष्य उन के सामने नहीं होता. कुछ लोग इस खुशफहमी में रहते हैं कि उन के पास दूसरों से बेहतर कोई सामान होगा तो वे समाज में विशिष्ट कहलाएंगे. नतीजतन, हर समय वे इसी उधेड़बुन में लगे रहते हैं कि क्या करने से वे खास दिखने लगेंगे. आज तक उन्हें यह समझ नहीं आया कि दुनिया की नजर बहुत पैनी है. विशेष आदमी और सामान्य आदमी में भेद आसानी से कर लेती है. मेरे एक सहकर्मी थे, हमेशा कहते थे कि खाते में 10 हजार रुपए बने रहने का सुख बड़ा होता है न कि 10 हजार रुपए का मोबाइल लो और 100-50 का बैलेंस रखो. अनावश्यक खरीदारी के बजाय बुरे वक्त के लिए पैसा बचाना ही समझदारी है ताकि भविष्य में किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े.

ऐसे पाएं दो मुंहे बालों से छुटकारा

बालों का खूब ख्याल रखने के बाद भी अगर आपके बाल दो मुंहे हो जाते हैं तो चिंता करने की कोई बात नहीं है क्योंकि आपके घर पर मौजूद कुछ चीजों से ही इस समस्या को आसानी से हल किया जा सकता है. इसी के साथ हेल्दी डाइट लें और लीक्विड फूड का इनटेक ज्यादा लेने से भी लाभ मिलेगा.

कैसे पाएं दो मुंहे बालों से छुटकारा

दही-पपीते का पैक

150 ग्राम पपीता और आधा कप दही का पेस्ट बना कर इसे बालों पर लगाएं. सूखने के बाद ठंडे पानी से धो लें. आपको फर्क जल्द ही नजर आने लगेगा.

एग हेयरमास्क

एक बॉउल में एक अंडे का पीला भाग, तीन चम्मच ऑलिव ऑयल और एक चम्मच शहद अच्छी तरह मिला लें. अब इस पैक को बालों में लगाकर 30 मिनट के लिए छोड़ दें. इसके बाद बालों को शैंपू से अच्छी तरह धो लें.

शहद-दही का पैक

एक कप दही में एक चम्मच शहद मिलाकर इस पेस्ट को बालों की जड़ों से लगाते हुए सिरों तक लगाएं और 15-20 मिनट के लिए लगाकर छोड़ दें. उसके बाद इस पैक को धो लें.

रियाज-रेशमा की कंपनी ‘लिबास’ स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध

मशहूर कास्टयूम जोड़ी रियाज व रेशमा गांगजी भारत के पहले कास्टयूम डिजाइनर हैं, जिनकी कंपनी ‘लिबास’ नैशनल स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हो गयी है. यानी कि ‘लिबास’ स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध होने वाला पहला लेबल बन गया है.

इस संबंध में जब रियाज गांगजी से बात हुई, तो उन्होंने कहा, ‘‘इसका एकमात्र मूल मंत्र यही है कि जब आप लोगों का विश्वास हासिल करते हैं, तो आपकी कंपनी या आपका लेबल प्रगति करता है. इसके लिए हमें अपने उत्पाद या सेवा में कमी न आने पाए, इसके लिए सतत प्रयासरत रहना पड़ता है. यही काम हम कई दशक से करते आ रहे हैं. अब हम सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध हो गए हैं, तो हमारी जिम्मेदारी बढ़ गयी है. देखिए,फैशन शो खत्म होने के बाद लोग आंकड़ों पर ध्यान देते हैं. मेरी नजर में विशेश योग्यता के साथ व्यापार करने के लिए सक्षम होना बहुत महत्वपूर्ण होता है.’’

‘नैशनल स्टॉक एक्सचेंज’ में अपने लेबल ‘लिबास’ को सूचीबद्ध करने की प्रेरणा कहां से मिली? इस पर रियाज गांगजी ने कहा, “मैं एक रचनात्मक इंसान हूं. पर मैं संतुष्ट नहीं हो पा रहा था. हमें लगता था कि ‘लिबास’ हमारे अपने देश के हर शहर में पहुंचे. हम एफएमसीजी ब्रांड की तरह लोगों की जिंदगी को छूना चाहते हैं. यह सार्वजनिक निर्गम से ही संभव था. इसलिए इस दिशा में हमने प्रयास किया. दो वर्षों की लंबी प्रक्रिया के बाद अब हमारे ‘लिबास’ का पहला पब्लिक इश्यू बाजार में आ गया है.”

जबकि रियाज गांगजी की पत्नी और ‘लिबास’ में उनकी सहयोगी रेशमा गांगजी ने कहा, ‘‘हम पहले से ही पुणे, मुंबई, लुधियाना और दिल्ली में मौजूद हैं. बहुत जल्द हम दुबई में भी ‘लिबास’ खोल रहे हैं. हम भारत के हर शहर में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए प्रयासरत हैं.’’

2017 में बॉलीवुड के नए चेहरे

इस साल बॉलीवुड में कई नए चहरों की एंट्री होने वाली है. जानिए कौन हैं वो नए चहरे.

पद्मप्रिया

12 वर्ष के अंतराल में तीस से अधिक तमिल, तेलगू व मलयालम फिल्में कर चुकी पद्मप्रिया इस वर्ष फिल्म ‘शेफ’ से बॉलीवुड में कदम रख रही हैं. वह इस फिल्म में शेफ  का किरदार निभा रहे अभिनेता सैफ अली की पत्नी और भरतनाट्यम नृत्यांगना के किरदार में नजर आएंगी.

निधि अग्रवाल

बंगलुरू में पली बढ़ी 23 वर्षीय निधि अग्रवाल एमबीए करने के बाद फिल्मों में कदम रख रही हैं. वह फिल्म ‘मुन्ना माइकल’ में टाइगर श्राफ की प्रेमिका के रूप में नजर आने वाली हैं.

कानन गिल

स्टैंडअप कॉमेडियन के रूप में मशहूर कानन गिल अब बॉलीवुड में कदम रख चुकी हैं. वह सोनाक्षी सिन्हा के साथ फिल्म ‘नूर’ में नजर आने वाली हैं.

रेगिना कासंडा

दक्षिण भारत में महज 16 साल की उम्र में वी प्रिया के साथ फिल्म ‘कंडा नाल मुधाल’ कर चर्चा बटोरने के बाद वह दक्षिण भारत की फिल्मों में व्यस्त हो गयी थीं. मगर अब वह ‘आखें’ की सिक्वल फिल्म ‘आंखे 2’ में अमिताभ बच्चन, अर्जुन रामपाल, अरशद वारसी व विद्युत जमावल के साथ कदम रख रही हैं.

महीरा खान

पाकिस्तानी अदाकारा महीरा खान फिल्म ‘रईस’ में शाहरुख खान के साथ नजर आने वाली हैं.

झु झु

बिजिंग में रहने वाली झु झु भी अब बॉलीवुड से जुड़ गयी हैं. इस वर्ष उनकी पहली बॉलीवुड फिल्म ‘ट्यूबलाइट’ प्रदर्शित होगी, जिसमें उनके नायक सलमान खान हैं.

सबा कमर

पाकिस्तानी अदाकारा सबा कमर भी इरफान खान के साथ फिल्म ‘हिंदी मीडियम’ में अभिनय कर बॉलीवुड में कदम रख रही हैं.

संजय दत्त के साथ कभी नहीं करूंगा काम

बॉलीवुड के मंझे हुए कलाकार नाना पाटेकर ने अपने 67वां जन्मदिन पर ऐसे कई राज खोले जिसे सुन संजय दत्त को करारा झटका लग सकता है. दरअसल, नाना पाटेकर ने कहा कि वो कभी संजय दत्त के साथ काम नहीं करना चाहते हैं.

नाना अपने उसूलों के बहुत पक्के हैं. ऐसे में उनकी संजू बाबा के साथ काम ना करने की कसम ने सभी को चौंका दिया है. नाना ने आज तक संजू बाबा के साथ काम नहीं किया और आगे भी नहीं करना चाहते हैं. उनके साथ काम ना करने को लेकर नाना का अपना अलग नजरिया है.

उनका कहना है कि 1993 बम ब्लास्ट में संजय दत्त ने भले ही सजा काट ली हो लेकिन वो उनके साथ काम नहीं करेंगे. क्योंकि साल 1993 में जो हुआ मुझे उस बात का बहुत दुख है. इस हादसे में उन्होंने वर्ली बेस्ट बस ब्लास्ट में अपना भाई खोया था.

उन्होंने कहा, ‘मेरी पत्नी की भी उसी हादसे में मौत हो जाती अगर वो दूसरी बस नहीं लेती. मैं ये नहीं कह रहा कि इसके लिए संजय दत्त जिम्मेदार हैं. लेकिन अगर इस हादसे में उनका थोड़ा भी हाथ है तो मैं उनके साथ काम नहीं करूंगा. ये निर्णय उन लोगों के लिए लिया है जो उस हादसे में मारे गए.’

बता दें कि नाना अपनी हर बात बड़ी बेबाकी से लोगों के सामने रखते हैं. उन्होंने पाकिस्तानी एक्टर बैन का भी समर्थन किया था. साथ ही सूखे के मुद्दे को लेकर 2016 में महाराष्ट्र सरकार का भी विरोध कर चुके हैं.

सेक्स को हौआ न समझें: सना खान

मुंबई में पलीबढ़ी सना खान दकियानूसी मुसलिम परिवार की होने के बावजूद एक सफल अभिनेत्री हैं. वे अपनी मां सईदा के साथ मुंबई में रहती हैं. 12वीं कक्षा तक पढ़ाई के बाद वे मौडलिंग करते करते अभिनेत्री बन गईं. अब तक वे देश की 4 भाषाओं में लगभग 15 फिल्में कर चुकी हैं. हिंदी में बतौर हीरोइन ‘वजह तुम हो’ उन की पहली फिल्म है, जोकि कुछ समय पहले ही प्रदर्शित हुई है. वैसे वे ‘बिग बौस 6’ का हिस्सा रहने के बाद सलमान खान की फिल्म ‘जय हो’ में भी मंत्री की बेटी का किरदार निभा चुकी हैं. प्रस्तुत हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश.

आपका काफी लंबा करियर है इसे आप किस तरह से देखती हैं?

इस से मैं ने बहुतकुछ सीखा है और मुझे लगता है कि आज मैं जो कुछ हूं अपनी पिछली गलतियों से सीख लेने के कारण ही हूं.

आपके करियर में किस तरह के उतारचढ़ाव रहे हैं?

देखिए, जब करियर में चढ़ाव आता है, तो हमें खुशी होती है. जब उतार आता है, तो हम उदास हो जाते हैं, दुख भी होता है. हम जिस ढंग से अपने करियर को आगे बढ़ाना चाहते हैं, जब उस ढंग से आगे नहीं बढ़ता तो हमें तकलीफ होती है. मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ पर मैं ने हार नहीं मानी. मैं ने एक लड़ाई लड़ी और अपने करियर को आगे बढ़ाया. सच कह रही हूं, मैं अपने अनुभव से काफी कुछ सीख रही हूं.

गैर फिल्मी परिवार की होने की वजह से आप को ज्यादा संघर्ष करना पड़ा?

बहुत ज्यादा. यहां सफलता पाने के लिए गौडफादर का होना जरूरी है. मेरे हाथ से कई बेहतरीन फिल्में महज इसलिए छूट गईं कि यहां मेरा कोई गौडफादर नहीं था. कई बार मैं ने चाहा भी कि कोई तो मेरी सिफारिश कर दे, मगर किसी ने नहीं की. यहां तक कि सलमान खान के साथ फिल्म ‘जय हो’ करने के बाद भी किसी ने मेरी तरफ ध्यान नहीं दिया. ऐसे में जब विशाल पंड्या  मेरे पास ‘वजह तुम हो’ ले कर आए तो मैं ने लपक लिया. यह वह फिल्म है, जिसे एक स्थापित निर्देशक ने निर्देशित किया है.

मैं कई ऐसी अभिनेत्रियों को जानती हूं जिन्हें उन के प्रभावशाली मित्रों की वजह से फिल्में मिलती रहती हैं. मुझ से हमेशा पूछा जाता है कि मैं किस कैंप से हूं और हर बार मुझे यही कहना पड़ता है कि मेरा अपना कैंप है, क्योंकि मुझे प्रमोट करने वाला यहां कोई नहीं है. मैं अपने बलबूते इस मुकाम तक पहुंची हूं.

आप सलमान खान के साथ जब ‘बिग बौस’ कर रही थीं तब सलमान खान के साथ आप के अच्छे संबंध बन गए थे, तो उन्होंने आपकी सिफारिश नहीं की?

सलमान खान ने ही मुझे फिल्म ‘जय हो’ दी थी. इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद भी मुझे कोई फायदा नहीं हुआ. मैं फिल्में पाने तथा शोहरत के लिए सलमान खान का नाम नहीं लेती. मैं तो बातचीत में भी उन का जिक्र तब तक नहीं करती, जब तक कोई उन का नाम ले कर सवाल नहीं करता.

इरोटिक फिल्म में हीरोइन बन कर आना कैसा लगा?

देखिए, हमारे देश में बेवजह सैक्स को हौआ बना कर रखा गया है. मगर यह बहुत जल्द खत्म होने वाला है. आप मान कर चलें कि अब दर्शक समझदार हो गए हैं. यही वजह है कि हमारी फिल्म ‘वजह तुम हो’ के ट्रेलर को महज एक सप्ताह के अंदर यूट्यूब पर साढ़े 12 करोड़ लोगों ने देखा.

देखिए, अश्लीलता और कामुकता के बीच काफी बारीक लकीर होती है. यदि आप इसे समझते हैं तो आप ने पाया होगा कि मैं ने इस लकीर को लांघा नहीं है. फिर बड़े से बड़ा स्टार भी किसिंग और इंटीमेसी सीन करता है, क्योंकि इमोशंस को दिखाने के लिए यह करना ही पड़ता है. दर्शक भी फिल्म में रिएलिटी देखना चाहते हैं, तो हम ने अपनी फिल्म में उस हद तक इरोटिज्म दिखाया है जिस हद तक हमारे संस्कार और सैंसर बोर्ड इजाजत देता है.

फिल्म ‘वजह तुम हो’ में गुरमीत चौधरी के संग आप के इंटीमेट सीन भी फिल्माए गए हैं?

तो इस में क्या बुराई है. इस तरह के दृश्य हर फिल्म में होते हैं. हम सिनेमा में कहानी ही सुनाते हैं. ये कहानियां हम इंसानों की जिंदगी से ही ली गई होती हैं. क्या निजी जीवन में लोगों की प्रेमी या प्रेमिका, पति व पत्नी, अवैध प्रेम संबंध नहीं होते? क्या निजी जीवन में पतिपत्नी हमबिस्तर नहीं होते? यही सब जब हम फिल्म में कहानी के साथ दिखाते हैं तो लोग नाकभौं क्यों सिकोड़ते हैं? वैसे आप भी जानते हैं कि हमारे देश का सैंसर बोर्ड बहुत सख्त है. वह अश्लील दृश्यों पर कैंची चलाने में माहिर है. यह बात मेरी समझ से परे है कि लोग इस तरह की बातें क्यों करते हैं. अब तो हर फिल्म में किसिंग सीन होना लाजिमी सा हो गया है. क्या निजी जीवन में हम अपने प्यार का इजहार करने के लिए किस नहीं करते?

मेरी समझ में नहीं आता कि पत्रकार मेरे हर काम को अलग दृष्टिकोण से ही क्यों देखते हैं. जब मैं ‘बिग बौस’ में गई थी, तब भी लोगों ने ऊटपटांग बातें की थीं. जब मैं ने फिल्म ‘वजह तुम हो’ अनुबंधित की तो लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि सना खान इरोटिक फिल्म करने जा रही है.

तो क्या आप ‘वजह तुम हो’ को इरोटिक फिल्म नहीं मानती हैं?

मेरी फिल्म ‘वजह तुम हो’ सैक्स की कहानी नहीं है. आप ने फिल्म देखी होगी तो पाया होगा कि इस में एक चैनल को हैक कर उस पर लाइव मर्डर दिखाया जाता है और फिर ऐसा किस ने व क्यों किया, इस की जांचपड़ताल होती है, तो यह एक रोमाचंक फिल्म है. साथ में एक प्रेम कहानी भी है.

क्या आप निजी जिंदगी में फिल्म ‘वजह तुम हो’ की सिया जैसी हैं?

मैं निजी जिंदगी में जिस तरह की हूं उस से एकदम विपरीत है यह किरदार. मैं निजी जिंदगी में बहुत क्यूट और बबली गर्ल हूं. लोगों ने मुझे ‘बिग बौस’ में देखा है. अब मैं लोगों को बताना चाहती हूं कि अभिनय के मैदान में मैं कितनी अलग हूं. इस के अलावा जो निजी जिंदगी में नहीं हूं, उसे परदे पर साकार करना मेरे लिए चुनौती थी.

क्या समाज के लिए कुछ करने की इच्छा है?

मैं लोगों के लिए बहुत काम करना चाहती हूं. अभी मैं इस मुकाम पर नहीं हूं कि लोगों की आर्थिक मदद कर सकूं. भविष्य में यदि मैं आर्थिक रूप से मजबूत हुई, तो मैं हर कमजोर इंसान की आर्थिक मदद करना चाहूंगी.

आपके रोमांस की काफी चर्चाएं रहती हैं. कभी आपका नाम इस्माइल खान से जोड़ा गया था. इन दिनों आपका नाम निर्देशक विशाल पंड्या के साथ जोड़ा जा रहा है?

इन खबरों में कोई सचाई नहीं है. मैं किसी के साथ डेट नहीं कर रही हूं. फिल्म ‘वजह तुम हो’ के प्रमोशन के सिलसिले में हम कई शहरों में गए. इसी दौरान मुझे फिल्म निर्देशक विशाल पंड्या के संग एक ही कार में यात्रा करनी पड़ी. अब इसी को लोगों ने डेटिंग का नाम दे दिया.

इस बारे में मैं कुछ नहीं कहना चाहती. बस, सोच का फर्क है.

मगर हम ने सुना है कि आप के लिए गुरमीत चौधरी के साथ इस तरह के इंटीमेसी सीन फिल्माना आसान नहीं था?

मैं ने यह कब कहा कि मुझे परदे पर इंटीमेसी के दृश्य करने में आनंद आता है. गुरमीत हो या कोई भी कलाकार, मुझे इंटीमेसी के दृश्य करने से परहेज है. देखिए, मैं शौक से इंटीमेसी सीन्स को अंजाम नहीं देना चाहती. इसलिए मैं ने यह बात कही पर इस का यह मतलब नहीं कि मैं कहानी या किरदार की मांग को पूरा नहीं करना चाहती. मेरा मानना है कि मैं फिल्मों में जो भी कर रही हूं, वह फिल्म में किरदार की मांग के अनुसार हो. ‘वजह तुम हो’ में मैं ने वकील का किरदार निभाया है. इस का अर्थ यह नहीं है कि मैं हाईकोर्ट जा कर किसी का केस लडूंगी. फिल्म में मैं ने इरोटिक दृश्य किए पर निजी जिंदगी में मैं उस तरह के इरोटिक काम नहीं करती. इंटीमेसी या इरोटिक चीजें बहुत निजी होती हैं, उन्हें करते हुए मुझे भी शर्म आती है. इस फर्क  को मैं आम लोगों को बताना चाहती हूं, इसलिए मैं ने ऐसा कहा.

आइटम नंबर को ले कर क्या सोच है?

मुझे आइटम नंबर करने से भी परहेज नहीं है.

इस के बाद क्या कर रही हैं?

एक कौमेडी फिल्म ‘टाम डिक हैरी’ कर रही हूं. इस की आधे से ज्यादा शूटिंग हो चुकी है.

आपको कौमेडी से कुछ ज्यादा ही लगाव हो गया है?

लोगों को लगता है कि मैं कौमेडी अच्छी कर लेती हूं. मैं ने कपिल शर्मा के 2 शो भी किए. अब कौमेडी फिल्म कर रही हूं. कौमेडी करना आसान नहीं है. लोगों को हंसाना बहुत कठिन होता है. उस इमोशन में जाना और सही टाइमिंग में अभिनय करना बहुत कठिन होता है.

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