“किसिंग सींस से फिल्में हिट नहीं होतीं”

जिम्मेदारी का एहसास बच्चों को बचपन से ही कराना पड़ता है और उसे तभी समझ में भी आता है, जो आगे चल कर उस के लाइफस्टाइल में शामिल हो जाता है. कुछ ऐसी ही जिम्मेदारी का एहसास लिए अभिनेत्री साएशा सैगल ने फिल्म इंडस्ट्री में 17 वर्ष की अवस्था में कदम रखा. उन्हें बचपन से ही फिल्मों में अभिनय करने का शौक था.

साएशा अभिनेता सुमीत सैगल और अभिनेत्री शाहीन बानू की बेटी हैं. दिलीप कुमार और सायरा बानों की भतीजी भी हैं. साएशा ने फिल्म ‘शिवाय’ में अभिनय कर यह जता दिया है कि वे एक अच्छी एक्ट्रेस हैं. काम अच्छा मिले तो वे और मेहनत कर सकती हैं. ‘शिवाय’ फिल्म के बाद वे साउथ की फिल्म में व्यस्त हैं. उन से बात करना रोचक रहा था. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के कुछ खास अंश:

अपने बारे में बताएं?

3 साल की उम्र से ही अभिनय का शौक था. स्कूल में जब पढ़ रही थी, तब अजय देवगन ने मेरा फोटो कहीं देखा था, उन्हें मैं पसंद आई. मुझ से बात की और ‘शिवाय’ के बारे में बताया. मुझे कहानी पसंद आई. उस के बाद स्क्रीन टैस्ट और औडिशन हुआ. अपने 17वें बर्थडे पर मैं ने पहली हिंदी फिल्म ‘शिवाय’ साइन की. मैं बहुत खुश थी, क्योंकि इतने बड़े बैनर के साथ मैं पहली फिल्म कर रही थी.

कितना संघर्ष था? सुना है आप डांस की भी शौकीन हैं.

संघर्ष अधिक नहीं था, क्योंकि मेरे माता-पिता और मेरे रिश्तेदार इस क्षेत्र से हैं. इस के अलावा मुझे बचपन से डांस का शौक था. मैं आईने के आगे खड़ी हो कर डांस किया करती थी, मुझे फिल्मी और नौनफिल्मी दोनों तरीके के डांस आते हैं. 9 साल की उम्र से मैंने डांस शुरू किया था. मैंने लैटिन अमेरिकन, हिपहौप के साथ-साथ ओडिशी, कथक आदि सीखा है. मैं हर दिन 6 घंटे डांस करती थी.

पहली बार कैमरे के सामने आने का अनुभव कैसा रहा?

मैं रियल लाइफ में बहुत चुप रहती हूं. कैमरे के आगे आते ही बिंदास हो जाती हूं. मेरी पर्सनैलिटी ही बदल जाती है. कोई झिझक नहीं होती, क्योंकि मेरा सपना पूरा हो रहा है.

शिवाय’ में आपके काम की बहुत सराहना हुई, कैसा लगा आपको?

‘शिवाय’ फिल्म आसान नहीं थी. निर्देशक को यंग और फ्रैश चेहरा चाहिए था, जिस में मैं फिट बैठी. मुझे बहुत अच्छा लग रहा है कि मेरा काम सभी को पसंद आया. मैं ने पहले फिल्म नहीं देखी थी, क्योंकि नर्वस थी. लेकिन मैं ने अपनी बैस्ट परफौर्मैंस दी थी.

आपके काम में परिवार का कितना सहयोग रहा?

मेरी मां और पिता का हमेशा सहयोग रहा है. ट्रेनिंग से ले कर शूटिंग तक में वे मेरे साथ रहे. उन्हें उस बात से खुशी मिलती है जिसमें उनके बच्चे खुश रहें. वे हमेशा गाइड करते हैं. स्क्रिप्ट से ले कर अभिनय के बाद तक सब चर्चा करते हैं.

आजकल फिल्मों में अंतरंग दृश्य अधिक आने लगे हैं ऐसे में आप इन्हें करने में कितनी सहज हैं?

मैं इस क्षेत्र में नई हूं, इसलिए इस बारे में अधिक सोचा नहीं है. जब ऑफर आएगा तब सोचूंगी. ऐस्थैटिक वैल्यू को हमेशा बनाए रखना चाहती हूं. लाइन क्रौस नहीं करना चाहती. कुछ निर्देशकों को लगता है कि किसिंग सींस से फिल्म हिट होगी पर ऐसा नहीं होता. पुरानी रोमांटिक फिल्मों में प्यार को बहुत ही सलीके से दिखाया जाता था. फिल्में भी बहुत हिट हुईं. वह दौर अब चला गया है. मुझे उस की तलाश है. मुझे अपनी चाची सायरा बानों की फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’, ‘पड़ोसन’ और चाचा दिलीप कुमार की ‘गंगा जमुना’, ‘कर्मा’, ‘मशाल’ आदि फिल्में बहुत पसंद हैं.

अजय देवगन के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?

मुश्किल नहीं था. वे बहुत ‘कंफर्ट फील’ करवाते थे. वे नैचुरल ऐक्टिंग करना पसंद करते हैं.

आगे क्या कर रही हैं?

अभी एक तमिल फिल्म की शूटिंग चल रही है और 2 हिंदी फिल्मों पर भी बात चल रही है.

फिटनैस के लिए क्या करती हैं?

मैं रोज डांस करती हूं, जिस से शरीर की काफी कैलोरी बर्न हो जाती है. इस के अलावा जिम भी जाती हूं.

कितनी फैशनेबल हैं?

मुझे फैशन में ज्वैलरी सब से अधिक पसंद है. किसी फैशन ट्रैंड को फोलो नहीं करती. आरामदायक कपड़े पहनती हूं. जो पोशाक व्यक्तित्व को बढ़ाए, उसे पहनना चाहिए. मैं ज्यादातर जींस और टीशर्ट पहनती हूं. भारतीय पोशाकें मुझे अधिक पसंद हैं, जिन में सलवार सूट अधिक अच्छा लगता है.

कितनी फूडी हैं?

मुझे खाना बहुत पसंद है. यह मेरी वीकनैस है. कंट्रोल करना पड़ता है. सब कुछ जो अच्छा बना हो, मैं खाती हूं. लेकिन मैं डांस अधिक करती हूं. इस से मोटापा मेरे पास नहीं फटकता. मां के हाथ की बनी फिश करी, राइस, राजमा-चावल आदि अधिक पसंद हैं.

मेकअप कितना अच्छा लगता है?

मैं अधिक मेकअप पसंद नहीं करती, बाहर जाने पर लिप बाम लगाती हूं. सैट पर मेकअप करना पड़ता है. मुझे नैचुरल रहना पसंद है.

खुद को कैसे ऐक्सप्लेन करेंगी?

मैं हमेशा खुश रहना पसंद करती हूं. शांत और धैर्यवान हूं. गुस्सैल और नकारात्मक सोच रखने वालों से हमेशा दूर रहती हूं.

कहां घूमने जाना पसंद करती हैं?

घूमना बहुत होता है. भारत में मैं कश्मीर नहीं गई. सुना है वहां की वादियां बड़ी खूबसूरत हैं. इस के अलावा मॉरिशस जाना चाहती हूं. वहां के समुद्री तट बहुत सुंदर हैं. वहां जा कर मैं तटों पर स्विमिंग करना चाहती हूं.

ये काम कर प्रियंका की जलती है जान

प्रियंका चोपड़ा ने बॉलीवुड के बाद हॉलीवुड में भी अपनी जगह बनाई और अब अपनी फिल्मों के अलावा वो अपने प्रोडक्शन हाउस ‘पर्पल पेबल पिक्चर्स’ पर भी पूरा ध्यान दे रहीं हैं. रीजनल सिनेमा को बढ़ावा देने वाला प्रियंका का यह प्रोडक्शन हाउस मराठी, भोजपुरी और पंजाबी फिल्मों को सपोर्ट कर रहा है.

लेकिन, इतना होने के बाद भी आज भी जब फिल्में हाथ से निकलतीं हैं तो प्रियंका को बुरा लगता है. एक सक्सेसफुल अभिनेत्री बनने के बाद भी फिल्मों को पाने की प्रियंका की चाह कम नहीं हुई है उनका कहना है कि जब फिल्मों के लिए उन्हें मना करना पड़ता है तो उनकी जान जलती है.

सूत्रों की मानें तो प्रियंका चोपड़ा निर्देशक संजय लीला भंसाली द्वारा महान कवि साहिर लुधियानवी पर बनाई जा रही एक फिल्म में काम कर रही हैं, लेकिन अभिनेत्री का कहना है कि उन्होंने अभी इस तरह की कोई फिल्म साइन नहीं की है. हालांकि 34 वर्षीय अभिनेत्री ने कहा कि अगर भंसाली उनसे फिल्म का हिस्सा बनने के लिए कहेंगे तब वह उन्हें ना नहीं कह सकतीं.

हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में जब प्रियंका से बॉलीवुड फिल्में साइन करने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, “लिस्ट इतनी बड़ी है और मेरी जान जलती है जब मुझे अच्छी फिल्मों के लिए मना करना पड़ता है. मुझे साल में चार से छह फिल्में साइन करने की आदत हैं मगर मुझसे कहा गया है कि इस साल, मेरे पास मेरे शेड्यूल में फिल्मों के लिए सिर्फ चार महीने हैं तो मैं इस साल सिर्फ दो फिल्में साइन कर पाऊंगी! लेकिन जनवरी तक सब तय हो जाएगा.”

जोड़ी मिलाएं धन कमाएं

शादी के अटूट बंधन के मद्देनजर लड़के के लिए उपयुक्त लड़की और लड़की के लिए उपयुक्त लड़का उपलब्ध कराना नेक काम तो है ही, इस से लाभ भी हासिल होता है. आज जोड़ी बनाने यानी मैचमेकिंग का काम रोजगार का रूप ले चुका है. इस काम को कहीं से भी किया जा सकता है. कुछ लोग इस के लिए कमर्शियल कौंप्लैक्स में औफिस खोलते हैं तो कुछ घर से ही इस काम को अंजाम दे कर खासी कमाई कर रहे हैं. मैचमेकिंग के काम में महिलाएं महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा कर अपने घर में धनवर्षा कर रही हैं.

मैचमेकिंग यानी जोड़ी मिलाने के व्यवसाय में न तो बहुत ज्यादा जगह की जरूरत होती है और न ही भारी पूंजी की. ‘हींग लगे न फिटकरी रंग भी चोखा होय’ की कहावत को चरितार्थ करता यह व्यवसाय एक बार जम गया तो फिर समझो इस में सोनाचांदी सबकुछ है.

इस में अधिकाधिक रिश्ते जुटानेके लिए आप के संपर्क जितने ज्यादा होंगे, आप की संपर्क सूची उतनी ही लंबी होगी, जो व्यवसाय में फायदेमंद साबित होगी. एक समय था जब लोग रिश्तों के लिए रिश्तेदारों व अन्य विश्वस्त सूत्रों पर निर्भर होते थे लेकिन आज मैचमेकर्स पर निर्भर होने लगे हैं क्योंकि मैचमेकर्स ने अपनी सेवाओं से लोगों में विश्वास जमाया है.

मैचमेकर्स के लिए न्यू टैक्नोलौजी यानी कंप्यूटर लाभ का सौदा सिद्ध हो रही है. लड़केलड़की की सारी जानकारी को कंप्यूटर में सेव कर लिया जाता है जिस से काफी सुविधा होती है. लोगों का इन पर विश्वास करने का कारण यह भी है कि उन्हें इन के द्वारा अधिक से अधिक कौंटैक्ट्स की सारी जानकारी मिल जाती है. व्यक्तिगत स्तर पर लड़केलड़की और उन के परिवार की पूरी व सही जानकारी हासिल करना आसान नहीं होता.

जोड़ी की खोज में पेरैंट्स मैचमेकर को अपने लड़केलड़की के बारे में विस्तार से जानकारी देते हैं. जानकारी में पेरैंट्स लड़के/लड़की का नाम, पता, पिता व माता का नाम, आयु, कद, व्यवसाय, फैमिली बैकग्राउंड, मांगलिक/नौन मांगलिक, कास्ट/नो कास्ट बार, एजुकेशन, सैलरी, मंथली इनकम, किस तरह के परिवार में शादी करना पसंद करेंगे आदि जानकारियां देते हैं. इस से मैचमेकर को परिवार की पसंद के बारे में पता चल जाता है और वह उसी के आधार पर रिश्ते ढूंढ़ता है.

दोनों परिवारों को जब मनमाफिक मैच मिल जाता है और विस्तार से जानकारी भी प्राप्त हो जाती है तो उस के अगले कदम में कई मीटिंग्स आयोजित करवाई जाती हैं, जिन में लड़कालड़की को कई बार एकदूसरे को समझने का मौका मिल जाता है, और वे एकदूसरे के व्यवहार से भी परिचित हो जाते हैं, ऐसे में उन्हें निर्णय लेने में सुविधा होती है.

अंतिम निर्णय दोनों पार्टियों पर ही टिका होता है, वे अपने रिस्क पर ही कोई निर्णय लेते हैं. हर मैचमेकर की फीस अलगअलग होती है. कुछ मैचमेकर तो लड़के/लड़की की व उस के पूरे परिवार की सारी जानकारी स्वयं जांचपड़ताल कर उपलब्ध कराते हैं. इस कार्यशैली के आधार पर उन की फीस निर्भर करती है.

मैचमेकर क्यों

अगर आप खुद लाइफपार्टनर सर्च करना प्रारंभ करते हैं तो आप का बहुत समय बरबाद होता है. औनलाइन डेटिंग या होटल वगैरह में जा कर मिलने में यह भी पता नहीं होता कि आप सही और ईमानदार व्यक्ति से मिल रहे हैं या नहीं. हो सकता है कि आप जल्दबाजी में गलत व्यक्ति को चुन लें. लेकिन मैचमेकर्स आप की हर संभव सहायता करते हैं.

अनुभव

लोगों की जोडि़यां बनाने के काम में जुटे मैचमेकर्स को लोगों को परखना ज्यादा अच्छी तरह आता है. वे पहली नजर में ही पहचान जाते हैं कि अमुक व्यक्ति कैसा है. इसलिए वे मैचिंग बहुत सोचसमझ कर ही करवाते हैं.

डेट कोचिंग : सब से पहले मैचमेकर सही मैच करवाने का प्रयास करते हैं. यदि दोनों को बताया हुआ मैच पसंद आता है तो बात आगे बढ़ाई जाती है. इस में वे बताते हैं कि कैसे आप सामने वाले व्यक्ति को परख कर अपना सही फैसला ले सकते हैं. वे एकदूसरे को तय तिथि व समय पर मिलवाते हैं.

सुरक्षा : आप की सुरक्षा मैचमेकर्स की प्राथमिकता होती है. वे खुद अपने स्तर पर सारी जांचपड़ताल कर आप को इस बात के लिए निश्चिंत करते हैं कि अमुक परिवार सही है और आप बात आगे बढ़ा सकते हैं.

मैचमेकिंग के काम के संबंध में गाजियाबाद की कुमुद, जो अपने घर से मैचमेकिंग का काम करती हैं, ने बताया कि शुरू में उन्हें इस व्यवसाय को जमाने में दिक्कत हुई लेकिन धीरेधीरे जब लोगों को विश्वास हो गया तो अब उन के पास आएदिन कोई न कोई अपनी लड़की या लड़के के रिश्ते के लिए आता रहता है. वे बताती हैं कि लड़के या लड़की वालों से रजिस्ट्रेशन फीस के तौर पर वे 400 रुपए चार्ज करती हैं. रजिस्ट्रेशन फीस लेने के समय हम लड़के या लड़की की संपूर्ण जानकारी ले कर उसे अपने कंप्यूटर में फीड कर लेते हैं और उसी के अनुसार ही उन्हें रिश्ते बताते हैं.

रिश्तों के लिए अकसर सामूहिक सम्मेलन का आयोजन करते हैं जिस में वे सभी लोग आमंत्रित होते हैं जिन्होंने रजिस्ट्रेशन कराया होता है. वहां पर आए लड़केलड़कियों को एकदूसरे से परिचित कराया जाता है, फिर पेरैंट्स को अपने लड़के या लड़की  के लिए जो उपयुक्त लगता है, उन से बात आगे बढ़ाई जाती है.

दिल्ली के पीतमपुरा महल्ले में मैचमेकिंग के व्यवसाय में व्यस्त पूनम ने बताया कि वे जो भी रिश्ता बताती हैं उस की गारंटी लेती हैं. इस के लिए वे क्लाइंट से शुरुआत में टोकनमनी के रूप में 5,100 रुपए लेती हैं. उन की कोशिश यही होती है कि वे 6 से 8 महीने के बीच बात पक्की करवा दें. लेकिन इस बीच अगर संयोगवश रिश्ता पक्का न हो सका या फिर पार्टी को लगे कि वे उन्हें धोखा दे रही हैं तो उन के द्वारा दी गई टोकनमनी वे उन्हें 6 महीने के बाद वापस कर देती हैं.

वे बताती हैं कि वे लड़का या लड़की की पूरी वैरिफिकेशन करवाती हैं, मीटिंग्स दोनों पार्टियों की सुविधा के हिसाब से आयोजित करवाती हैं, ताकि उन्हें कोई दिक्कत न हो. वे मैचमेकिंग के सम्मेलन भी करवाती हैं. इस के लिए उन का कई लोगों व संस्थाओं से टाइअप होता है. जब रिश्ता पक्का हो जाता है और शादी का कार्ड छप जाता है तब वे क्लाइंट से 40 हजार रुपए चार्ज करती हैं. जो भी रिश्ता वे बताती हैं, उस की वे खुद भी व्यक्तिगत स्तर पर जांचपड़ताल करती हैं ताकि बाद में कोई दिक्कत न हो.

दिल्ली के पंजाबी बाग स्थित अपने घर से मैचमेकिंग का काम कर रही कुसुम ने बताया कि जब भी कोई लड़के या लड़की के रिश्ते के लिए उन के पास आता है तो वे उन्हें सारी बातें शुरू में ही बता देती हैं ताकि शुरुआती चरण में ही सब स्पष्ट हो जाए. अगर हमारी सर्विस पसंद आती है तो हम उन से 6,500 रुपए लेते हैं और उन से लड़का या लड़की की सारी जानकारी ले लेते हैं क्योंकि उसी उपलब्ध जानकारी के अनुसार मैच करवाया जाता है. यह सारा रिकौर्ड हम कंप्यूटर में दर्ज कर लेते हैं.

इस तरह कोई भी पुरुष या महिला घर बैठे जोड़ी मिलाने का काम आसानी से व अच्छी तरह से कर अपने परिवार का जीविकोपार्जन कर सकता है.

सितारों सी चमक क्रिस्टल से

मैट्रो सिटीज में जगह की कमी, सभी के लिए एक बड़ी समस्या है. ऐसे में कम जगह के घर को अपनी पसंद के अनुसार सजाना बहुत मुश्किल होता है. केवल रंगबिरंगी दीवारों से ही घर खूबसूरत नहीं बनता बल्कि घर में रखे साजोसामान से घर की खूबसूरती निखरती है. यदि आप अपने घर को न्यू लुक देना चाहते हैं तो एक बार क्रिस्टल से बने आइटम्स से घर सजा कर देखें. यह घर की सजावट में नई जान डाल देते हैं. आज के समय में क्रिस्टल से घर सजाना ट्रैंड में है.

क्या है क्रिस्टल?

क्रिस्टल एक चमकदार और ट्रांसपैरैंट ग्लास होता है. इस से सजा हुआ आप का छोटा सा घर भी बंगले सा अहसास देता है. क्रिस्टल कई रंगों में मौजूद होने के कारण इस से की गई सजावट काफी अट्रैक्टिव लगती है. मार्केट में क्रिस्टल की एक बड़ी रेंज मोजूद है. आजकल लोग घर को सजाने के लिए बहुत सारी चीजों का प्रयोग करने के बजाए. कम सामान रखना पसंद करते हैं. जिस में क्रिस्टल एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. हर कोई अपनी पसंद और बजट के अनुसार क्रिस्टल से बनी चीजें ही खरीदता है.

क्रिस्टल का जलवा

क्रिस्टल को सजावट की दुनिया का ट्रैंड सैंटर कहा जा सकता है. करीने से तैयार किए गए प्रिज्म और आकर्षक डिजाइन लोगों के दिल में अपनी खास जगह बनाते जा रहे हैं. क्रिस्टल से छन कर आती हुई रोशनी जमीं पर सितारों की चमक बिखेर देती है. आप के घर को सितारों सा सजाने के लिए न सिर्फ क्रिस्टल के गुलदान मौजूद हैं बल्कि क्रिस्टल की आकृतियों और कलात्मक वस्तुओं को भी काफी पसंद किया जाता है. विभिन्न रूपों में हाथ से तराशे गए शीशे वाले क्रिस्टल लोगों के, ड्राइंगरूम, गेस्टरूम और यहां तक कि बेडरूम में भी अपनी जगह बना रहे हैं. आप के घर के दरवाजे से ले कर कमरे को विभाजित करने वाले पिलर, स्टैंड तक क्रिस्टल के होते हैं.

क्रिस्टल के डिफरैंट आइटम्स

क्रिस्टल की बढ़ती मांग को देखते हुए मार्केट में इस के कई औप्शन मौजूद हैं. छोटेबड़े कई तरह के आइटम कम कीमत से ले कर ऊंची कीमत में मौजूद हैं. जहां आप अपनी जेब और पसंद के अनुसार खरीद सकते हैं औप्शन की कमी नहीं है क्रिस्ट के कैंडल, स्टैंड, शोपीस फ्लावर, फ्लावर पौट आदि कई वैराइटी मौजूद है.

क्रिस्टल का बदलता ट्रैंड

पहले क्रिस्टल के व्हिस्की, बीयर ग्लासेज का चलन ज्यादा था. धीरेधीरे कांच के अन्य प्रोडक्ट जैसे फ्लावर वासेज, कैंडल स्टैंड, मूर्तियां, सेंडिलियर्स, बाउल्स व डेकोरेटिव पीसेज को इंटीरियर डेकोरेशन के तौर पर खरीदा जाने लगा.

क्रिस्टल से औफिस को सजाएं

जब औफिस को एक नया रूप देना होता है तो इस कार्य के लिए क्रिस्टल एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. ऐसे भी घर सजाने से कहीं अधिक महत्तवपूर्ण होता है औफिस को सजाना. औफिस को सजाने का मूलमंत्र है सजावट को मूलआर्ट एवं डिजाइन के रंग से भरते हुए ग्लोबल या ट्रैंउी लुक देना, क्रिस्टल आप के औफिस की सुंदरता में चार चांद लगा देता है. इस मार्डन जमाने में यह आर्ट का प्रतीक बन गया है. इस की चमकदार और ट्रांसपरेंट उपस्थिति औफिस को नया लुक देती है.

क्रिस्टल से सजे औफिस का सामान

क्रिस्टल से औफिस में चमकते कई सामान आप के वर्क स्टेश्शन को सजा करते है जैसे क्रिस्टल से गढ़ा पेन, क्रिस्टल से चमकती टेबल क्लौक, क्रिस्टल का पेपर वेट, पैन स्टैंड, कोस्टर के अलावा स्टेशनरी से जुड़े और भी कई सामानों को क्रिस्टल से जोड़ा जा सकता है. इस के अलावा औफिस की दीवारों पर सजी तस्वीरों के फ्रेम पर अगर क्रिस्टल लगा हो तो वो कई नजरों को खींच सकती है. आप के औफिस को कोई कोना या टेबल क्रिस्टल के किसी जानवर या इंसान की स्टेच्यू या कला के शानदार नमूने से निखर सकता है.

क्रिस्टल आइटम्स की कीमत

क्रिस्टल के आइटम्स प्राय: यूरोपीयन देशों जैसे बेल्जियम, इटली, फ्रांस और आस्ट्रेलिया से आयात किए जाते हैं. इसलिए ये काफी महंगे होते हैं. यह 1000 रुपए से 5000 रुपए तक की रेंज में मिल जाते हैं. आप अपने बजट और जरूरत के मुताबिक खरीद सकते हैं. वहीं छोटे क्रिस्टल पीस 500 से 900 रुपए की रेंज में भी उपलब्ध हैं.

सरकारों की मनमानी

नरेंद्र मोदी की नोटबंदी ने यह साफ कर दिया है कि हमारा लोकतांत्रिक अधिकार वास्तव में कितना कमजोर है. 70 साल के लोकतांत्रिक शासन और उस से पहले अंगरेज शासन में भी आधेअधूरे वोट से चुने गए प्रतिनिधियों के सीमित शासन के आदी होने के बावजूद इस नोटबंदी पर देश कुछ न कर पाया. संसद में विरोधी पक्ष अपनी बात न कह पाया, लोग सड़कों पर लाइनों में लगे रहे, पर गुस्सा न जाहिर कर पाए.

भारत की तरह विश्व के अन्य देशों में भी लोकतंत्र से बनी सरकारें अकसर मनमानी करती रहती हैं. अमेरिका ने देश को पहले वियतनाम लड़ाई में भी बिना जनता की राय के झोंक दिया था, फिर इराक व अफगानिस्तान के युद्धों में. दक्षिण कोरिया में राष्ट्रपति पार्क ग्वेन हे को हटाने की मांग की जा रही है, पर कोई सुन नहीं रहा. अमेरिका में ही अश्वेतों, लेटिनों और दूसरे इम्मीग्रैंटों का रहना खतरे में पहुंच गया है. इंगलैंड ने बहुमत से यूरोपीय यूनियन से निकलने का फैसला किया है, पर जनमत संग्रह लोकतांत्रिक है या नहीं, इस की बहस चालू है.

लोकतंत्र का अर्थ केवल 2-3 साल बाद एक मतदान केंद्र में वोट डालना भर नहीं है. लोकतंत्र का अर्थ है कि जनता को उस के सभी मौलिक व मानवीय अधिकार मिलें और वह अपने नीति निर्धारकों को चुनने में स्वतंत्र हो, पर ज्यादातर लोकतंत्रों में एक तरह की राजशाही, मोनार्की खड़ी हो गई है, जिस में नौकरशाही, बड़ी कार्पोरेशनें और राजनीतिक दल शामिल हैं, जिन का संचालन वे लोग करते हैं, जो उत्पादन में नहीं लगे, दूसरों के उत्पादन को लूटते हैं.

सफलता आज यह नहीं है कि आप ने कितना जनता को सुख दिया, सफलता यह है कि आप ने जनता से कितना लूटा, चाहे उस से ज्यादा कमवा कर लूटा या भूखा मार कर लूटा. भारत में नोटबंदी भूखा मार कर लूटने का उदाहरण है, जिस में सत्तारूढ़ राजनीतिक दल, बड़ी कंपनियों के मालिक, बैंकर, नौकरशाही, हिंदू धर्म व्यवस्था के पैरोकार और अंधभक्त शामिल हैं. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप को लाने वालों में कट्टरपंथी चर्च, बड़ी कार्पोरेशनें, समर्थ गोरे, बंदूकें रखने के हिमायती शामिल हैं.

ये सब आम जनता के लोकतांत्रिक मानवीय मौलिक अधिकारों के बदले जनता से कहते हैं कि जैसा है वैसा स्वीकार करो. भारत और अमेरिका में लाखों लोग जेलों में बिना गुनाह साबित हुए गिरफ्तार हैं, पर चुनावों की प्रक्रिया को लोकतंत्र कह कर ढोल पीटा जाता है. यह अधूरा लोकतंत्र है. यह षड्यंत्र है. यह जनता को दिया जाने वाला झुनझुना बन कर रह गया है. जनता अगर बेहाल, निरीह है, तो इसीलिए कि उसे कैदियों की तरह रखा जा रहा है और सूखी रोटी के साथ यहांवहां एक चम्मच हलवा वोट देने के हक के नाम पर दे दिया जाता है. वोट दे कर वह सरकार चलाने वाले चेहरे बदल सकती है, पर सरकार नहीं, शासन प्रक्रिया नहीं, कानून व्यवस्था नहीं, कुशासन नहीं. लोकतंत्र उस के लिए उस स्वर्ग की तरह है, जिस के सपने हर धर्म दिखाता है, पर कभी किसी को मिलता नहीं है.  

“मुझे पुराने जमाने का रोमांस पसंद है”

अभिनेत्री श्रुति हासन का कहना है कि उन्हें पुराने जमाने का रोमांस अट्रैक्ट करता है. यह कुछ ऐसा है जिसे इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाली आज की जनरेशन नहीं जानती. श्रुति हासन ने अपने पिता कमल हासन से हुई बातचीत को याद करते हुए कहा कि उनके पिता ने उन्हें बताया था कि प्यार सेल फोन के स्क्रीन से बाहर पनपता है.

उन्होंने कहा कि मैं अपने पिता से बात कर रही थी और उन्होंने मुझसे कहा कि आधी प्रेम कहानियां तो इसलिए हो पाईं क्योंकि हम वॉट्सऐप का इस्तेमाल नहीं करते थे. उस दौर में हर प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे से चैट या फोन पर नहीं बल्कि वाकई में मिलते और आमने-सामने बात करते थे. ये उस दौर का सादगी भरा रोमांस हुआ करता था.

उन्होंने कहा कि रोमांस की सादगी ही थी जिसने इस 28 साल की अभिनेत्री को आने वाली फिल्म ‘बहन होगी तेरी’ का हिस्सा बनने के लिए आकर्षित किया.

अभिनेत्री ने कहा कि मुझे पुराने दिनों को याद करना अच्छा लगता है. रोमांस के बारे में मेरे ख्याल पुराने स्कूल वाले हैं. मुझे ‘बहन होगी तेरी’ में मौजूद बातें अच्छी लगीं. इस फिल्म की ताजगी और सादगी बेहतर है. मुझे रोमांटिक कॉमेडी पसंद है. बता दें कि श्रुति हासन ने बहुत ही कम समय में बॉलीवुड में अपनी एक अलग पहचान बनाई है.

जीवन में गंभीरता भी जरूरी

देश की समस्याओं का अब एक बड़ा कारण लोगों का भावनाओं में बह जाना और समस्याओं को मजाक में उड़ा देना है. एक तरफ धार्मिक धुआंधार प्रचार और दूसरी तरफ मोबाइल की चुहलबाजी ने मानसिकता को कुंद कर दिया है और लोगों का सोचविचार इतना कम हो गया है कि नोटबंदी जैसे मामले पर भी सोशल मीडिया में मजाक ज्यादा चले, इस प्रहार की मार का दर्द कम उजागर हुआ.

जीवन एक संघर्ष है. न फसल मजाक से पैदा होती है, न मकान हंसी और चुटकुलों से बनते हैं, न ही बच्चे प्रवचनों से पैदा होते हैं और न भाषणों से बड़े होते हैं. जीवन में गंभीरता की जरूरत होती है और जिस समाज ने यह गंभीरता खो दी, मूर्खता में या दंभ में वह मरेगा ही. पंजाब एक समय देश का सब से उन्नत राज्य था पर दंभ, धर्म, शराब, नशे और मजाक ने उसे आज इस तरह गर्त में डाल दिया कि ‘उड़ता पंजाब’ जैसी फिल्म बन सके.

आप जीवन में कितनी गंभीर हैं, क्या पूछा खुद से? कितना समय मोबाइलों पर चुटकुले फौरवर्ड करने या किट्टी पार्टियों में निरर्थक तंबोलों में खर्च करती हैं या कितना समय समस्याओं को जानने और पहचानने की कला को विकसित करने में लगाती हैं? हमारे यहां पढ़ीलिखी, शिक्षित अध्यापिकाएं भी न विचारकों की बातें करती हैं न किताबें पढ़ती हैं और न कुछ लिखती हैं. उन का समय शौपिंग में, टीवी या रिपीट होती फिल्में देखने में, फोन पर गप्पें मारने या कान में इयरफोन ठूंस कर पुराने गाने बारबार सुनने में व्यर्थ हो रहा है.

जब कोई समस्या आती है तो हाथपैर फूल जाते हैं, क्योंकि जिस से सलाह मांगो वह मुंह छिपा लेता है. किसी को कुछ समझ हो तो बताए न? समझ तो तब आएगी जब दूसरों की, देश की, समाज की, विश्व की, भूगोल की, पर्यावरण की समस्या पर ध्यान दिया हो. गंभीर चर्चाएं करने वालों को अमेरिका जैसे देश में भी ‘नर्ड’ कह कर अपमानित किया जाता है.

यह समाज मूर्खों का समूह बन रहा है, जिस में क्रिकेटरों और फिल्मी सितारों के जीवन के हर पल की चिंता है पर अपनी आने वाली आफत की नहीं.

गंभीर जने को यहां एकाकीपन की कैद में डाला जा रहा है. उसे किसी भी ग्र्रुप में ऐरोगैंट एजुकेटेड कह कर अलगथलग कर दिया जाता है. बहाव के विरुद्ध सोचने वाले को अजूबा मान लिया जाता है. उसे बदलने का संकल्प करें ताकि जीवन सुधरे.

वादियों का प्रदेश उत्तराखंड

शीतल आबोहवा, हरेभरे मैदान और खूबसूरत पहाडि़यां, ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने यहां अपने अनुपम सौंदर्य की छटा दिल खोल कर बिखेरी है. यही वजह है कि देशी और विदेशी पर्यटक यहां अनायास खिंचे चले आते हैं और सुकून अनुभव करते हैं. अपनी इन्हीं खूबियों के चलते उत्तराखंड घुमक्कड़ों की चहेती जगह है.

भारत के राज्यों में उत्तराखंड पर्यटन के लिहाज से अद्वितीय है. राज्यभर में पूरे साल देशविदेश के सैलानियों का तांता लगा रहता है. यहां पर्यटन स्थलों की भरमार है, प्राकृतिक खूबसूरती है, हरियाली है, पर्वत हैं, झीलें हैं, कलकल करती नदियां हैं.

नैनीताल

नैनीताल की बड़ी खासीयत यहां के ताल हैं. इसी कारण नैनीताल को तालों का शहर भी कहा जाता है. यहां पर कम खर्च में हिल टूरिज्म का भरपूर मजा लिया जा सकता है. काठगोदाम, हल्द्वानी और लालकुआं नैनीताल के करीबी रेलवे स्टेशन हैं. इन स्टेशनों से पर्यटक बस या टैक्सी के द्वारा आसानी से नैनीताल पहुंच सकते हैं. यह हनीमून कपल के लिए पसंदीदा जगह है.

नैनीताल को अंगरेजों ने हिल स्टेशन के रूप में विकसित किया था. नैनीताल शहर के बीचोंबीच नैनी  झील है. इस  झील की बनावट आंखों की तरह की है. यहां पर वोटिंग का मजा लिया जा सकता है. इसी कारण इस को नैनी और शहर को नैनीताल कहा जाता है. काठगोदाम नैनीताल का सब से करीबी रेलवे स्टेशन है. काठगोदाम से नैनीताल के लिए जब आगे बढ़ते हैं तो ज्योलिकोट में चीड़ के घने वन दिखाई पड़ते हैं. यहां से कुछ दूरी पर कौसानी, रानीखेत और जिम कौर्बेट नैशनल पार्क भी पड़ते हैं.

ज्योलिकोट कई पहाडि़यों से घिरी हुई जगह है.  गरमियों के सीजन में नैनीताल में रुकने की जगह नहीं मिलती, ऐसे में जिन लोगों को एकांत पसंद हो वे नैनीताल घूम कर ज्योलिकोट में रुक सकते हैं. यहां पर ठहरने के लिए कई हिल रिजोर्ट हैं. यहां के जंगलों में खूबसूरत पक्षियों के कलरव को सुना जा सकता है.  सीजन में बर्फबारी को भी यहां से देख सकते हैं. नैनीताल के आसपास कई खूबसूरत जगहें हैं, जहां घूमने का मजा भी लिया जा सकता है.

दर्शनीय स्थल

भीमताल : इस की लंबाई 448 मीटर और चौड़ाई 175 मीटर है. भीमताल की गहराई 50 मीटर तक है. भीमताल के 2 कोने तल्लीताल और मल्लीताल के  दोनों कोने सड़क से जुडे़ हैं. नैनीताल से भीमताल की दूरी 22.5 किलोमीटर है.

नौकुचियाताल : यह भीमताल से 3 किलोमीटर दूर उत्तरपूर्व की ओर 9 कोनों वाला ताल है. नैनीताल से इस की दूरी 26 किलोमीटर है. नौकुचियाताल की खासीयत इस के टेढ़ेमेढे़ कोने हैं. ये 9 कोने किसी को एकसाथ दिखाई नहीं देते हैं.

सातताल : यह कुमाऊं इलाके का सब से खूबसूरत ताल है. इतना सुंदर कोई दूसरा ताल नहीं है. इस ताल तक पहुंचने के लिए भीमताल से हो कर रास्ता गुजरता है. भीमताल से इस की दूरी 4 किलोमीटर है. नैनीताल से यह 21 किलोमीटर दूर स्थित है.  साततालों में नलदमयंती ताल सब से अलग है.

खुर्पाताल : यह नैनीताल से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.  इस ताल का गहरा पानी इस की सब से बड़ी सुंदरता है.  यहां पर पानी के अंदर छोटीछोटी मछलियों को तैरते हुए देखा जा सकता है. इन को रूमाल के सहारे पकड़ा भी जा सकता है. खुर्पाताल के साफ और स्थिर पानी में पहाड़ों की सुंदरता को देखा जा सकता है.

रोपवे : यह नैनीताल का सब से प्रमुख आकर्षण है. यह स्नोव्यू पौइंट और नैनीताल को जोड़ता है. यह मल्लीताल से शुरू होता है. यहां पर 2 ट्रौलियां हैं जो सवारियों को ले कर एक तरफ से दूसरी तरफ जाती हैं. रोपवे से पूरे नैनीताल की खूबसूरती को देखा जा सकता है. नैनीताल का माल रोड यहां का सब से आधुनिक बाजार है. माल रोड पर बहुत सारे होटल, रेस्तरां, दुकानें और बैंक हैं.

कौसानी

कौसानी को भारत की सब से खूबसूरत जगह माना जाता है. कौसानी उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले से 53 किलोमीटर उत्तर में बसा है. यह बागेश्वर जिले में आता है. यहां से हिमालय की सुंदर वादियों को देखा जा सकता है. कौसानी पिंगनाथ चोटी पर बसा है. यहां पहुंचने के लिए रेल मार्ग से पहले काठगोदाम आना पड़ता है. यहां से बस या टैक्सी के द्वारा कौसानी पहुंचा जा सकता है. दिल्ली के आनंद विहार बस स्टेशन से कौसानी के लिए बस सेवा मौजूद है. अपने खूबसूरत प्राकृतिक नजारे और

आकर्षण के चलते कौसानी घूमने वालों को अपनी ओर खींचती है. बर्फ से ढकी नंदा देवी चोटी का नजारा यहां से भव्य दिखाई देता है.

दर्शनीय स्थल

कौसानी में सब से अच्छी घूमने वाली जगह यहां के चाय बागान को माना जाता है. यहां आने वाले यहां की चाय की खरीदारी करना नहीं भूलते हैं. यहां के अनासक्ति आश्रम को गांधीजी का आश्रम भी कहा जाता है. यह आश्रम अध्ययन कक्ष और पुस्तकालय देखने वालों को आकर्षित करता है.

कौसानी से बर्फ से ढके पहाड़ों को भी देखा जा सकता है. यहां से चौखंबा, नीलकंठ, नंदाघुंटी, त्रिशूल, नंदादेवी, नंदाखाट, नंदाकोट और पंचकुली शिखर देखे जा सकते हैं.    

देहरादून

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून शिवालिक पहाडि़यों में बसा एक बहुत ही खूबसूरत शहर है. घाटी में बसे होने के कारण इस को दून घाटी भी कहा जाता है. देहरादून में दिन का तापमान मैदानी इलाके सा होता है पर शाम ढलते ही यहां का तापमान कम हो जाता है. देहरादून के पूर्व और पश्चिम में गंगायमुना नदियां बहती हैं. इस के उत्तर में हिमालय और दक्षिण में शिवालिक पहाडि़यां हैं. शहर को छोड़ते ही जंगल का हिस्सा शुरू हो जाता है. यहां पर वन्यप्राणियों को भी देखा जा सकता है. देहरादून प्राकृतिक सौंदर्य के अलावा शिक्षा संस्थानों के लिए भी प्रसिद्ध है. यहां के स्कूलों में भारतीय सैन्य अकादमी, दून स्कूल और ब्राउन स्कूल प्रमुख हैं.

दर्शनीय स्थल

सहस्रधारा : देहरादून में घूमने के लिए कई जगहें हैं. जो यहां आता है वह मसूरी जरूर घूमने जाता है. घूमने के हिसाब से देखें तो सहस्रधारा सब से करीब की जगह है. सहस्रधारा गंधक के पानी का प्राकृतिक स्रोत है. देहरादून से इस की दूरी 14 किलोमीटर है. जंगल से घिरे इस इलाके में बालदी नदी में गंधक का स्रोत है.  इस का पानी भर कर लोग घरों में ले जाते हैं. कहते हैं कि गंधक का पानी स्किन की बीमारियों को दूर करने में सहायक होता है.

गुच्चू पानी : सहस्रधारा के बाद गुच्चू पानी नामक जगह भी देखने लायक है. यह शहर से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. गुच्चू पानी जलधारा है. इस का पानी गरमियों में ठंडा और जाड़ों में गरम रहता है. गुच्चू पानी आने वाले लोग अनारावाला गांव तक कार या बस से आते हैं.

खलंग स्मारक : देहरादून से सहस्रधारा जाने वाले रास्ते के बीच ही खलंग स्मारक बना हुआ है. यह अंगरेजों और गोरखा सिपाहियों के बीच हुए युद्ध का गवाह है.

चंद्रबदनी :  देहरादून- दिल्ली मार्ग पर बना चंद्रबदनी एक बहुत ही सुंदर स्थान है. देहरादून से इस की दूरी 7 किलोमीटर है. यह जगह चारों ओर पहाडि़यों से घिरी हुई है. यहां पर एक पानी का कुंड भी है. अपने सौंदर्य के लिए ही इस का नाम चंद्रबदनी पड़ गया है.

लच्छीवाला : देहरादून से 15 किलोमीटर दूर जंगलों के बीच बसी इस खूबसूरत जगह को लच्छीवाला के नाम से जाना जाता है. जंगल में बहती नदी के किनारे होने के कारण यहां पर लोग घूमने जरूर आते हैं.

कालसी : देहरादून- चकराता रोड पर 50 किलोमीटर की दूरी पर कालसी स्थित है. यहां पर सम्राट अशोक के प्राचीन शिलालेख देखने को मिल जाते हैं. यह लेख पत्थर की बड़ी शिला पर पाली भाषा में लिखा है. पत्थर की शिला पर जब पानी डाला जाता है तभी यह दिखाई देता है.

चीला वन्यजीव संरक्षण उद्यान : गंगा नदी के पूर्वी किनारे पर वन्यजीवों के संरक्षण के लिए 1977 में चीला वन्य संरक्षण उद्यान बनाया गया था. यहां पर हाथी, टाइगर और भालू जैसे तमाम वन्य जीव पाए जाते हैं. नवंबर से जून का समय यहां घूमने के लिए सब से उचित रहता है. देहरादून से यहां आने के लिए अपने साधन का प्रयोग करना पड़ता है.

मसूरी

मसूरी दुनिया की उन जगहों में गिनी जाती है जहां पर लोग बारबार जाना चाहते हैं. इसे पर्वतों की रानी भी कहा जाता है. मसूरी उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से 35 किलोमीटर दूर स्थित है. देहरादून तक आने के लिए देश के हर हिस्से से रेल, बस और हवाई जहाज की सुविधा उपलब्ध है. मसूरी हिमालय पर्वतमाला की शिवालिक श्रेणी में आती है. इस के उत्तर में बर्फ से ढके पर्वत दिखते हैं और दक्षिण में खूबसूरत दून घाटी दिखती है.

मुख्य आकर्षण

गन हिल : मसूरी के करीब दूसरी ऊंची चोटी पर जाने के लिए रोपवे का मजा घूमने वाले लेते हैं. यहां पैदल रास्ते से भी पहुंचा जा सकता है. यह रास्ता माल रोड पर कचहरी के निकट से जाता है. यहां पहुंचने में लगभग 20 मिनट का समय लगता है. रोपवे की लंबाई केवल 400 मीटर है. गन हिल से हिमालय पर्वत शृंखला देखा जा सकता है.

म्युनिसिपल गार्डन :  मसूरी का कंपनी गार्डन आजादी से पहले तक बोटैनिकल गार्डन कहलाता था.  कंपनी गार्डन क ा  निर्माण भूवैज्ञानिक डा. एच फाकनर लोगी ने किया था. 1842 के आसपास उन्होंने इस जगह को सुंदर उद्यान में बदल दिया. इसे कंपनी गार्डन या म्युनिसिपल गार्डन कहा जाने लगा.

कैमल बैक रोड : कुल 3 किलोमीटर लंबी यह रोड रिंक हौल के समीप कुलीर बाजार से शुरू होती है. यह लाइब्रेरी बाजार पर जा कर खत्म होती है. इस सड़क पर पैदल चलना या घुड़सवारी करना अच्छा लगता है. सूर्यास्त का दृश्य बहुत सुंदर दिखाई पड़ता है.

कैंपटी फौल : यमुनोत्तरी रोड पर मसूरी से 15 किलोमीटर दूर 4500 फुट की ऊंचाई पर स्थित कैंपटी फौल मसूरी की सब से सुंदर जगह है. यह मसूरी का सब से बड़ा और खूबसूरत  झरना है. यह चारों ओर ऊंचे पहाड़ों से घिरा हुआ है. कैंपटी फौल में नहाने के बाद पर्यटक अपने को तरोताजा महसूस करते हैं.

मसूरी  झील : मसूरी- देहरादून रोड पर मूसरी  झील के नाम से नया पर्यटन स्थल बनाया गया है. यह मसूरी से 6 किलोमीटर दूर है. पैडल बोट से  झील में घूमने का आनंद लिया जा सकता है.

वाम चेतना केंद्र : टिहरी बाईपास रोड पर लगभग 2 किलोमीटर दूर एक नया पिकनिक स्पौट बनाया गया है. यहां तक पैदल या टैक्सी से पहुंचा जा सकता है. इस पार्क में वन्यजीव जैसे घुरार, कंणकर, हिमालयी मोर और मोनल आदि रहते हैं.

दर्शनीय स्थल

यमुना ब्रिज : मसूरी से 27 किलोमीटर चकराता-बारकोट रोड पर यमुना ब्रिज स्थित है. यह फिशिंग के लिए सब से अच्छी जगह है. परमिट ले कर यहां फिशिंग की जा सकती है.

चंबा : मसूरी से लगभग 56 किलोेमीटर दूर चंबा स्थित है. इस को टिहरी भी कहते हैं. यहां पहुंचने के लिए लोगों को जिस सड़क से हो कर गुजरना पड़ता है वह फलों के बागानों से घिरी है. वसंत के मौसम में फलों से लदे वृक्ष देखते ही बनते हैं.

ट्रैकिंग का मजा

मसूरी-नागटिब्बा : मसूरी से नागटिब्बा मार्ग की दूरी लगभग 62 किलोमीटर है. नागटिब्बा से हिमालय की चोटी के शानदार दृश्य को देखा जा सकता है. यहां से पंथवाडी, नैनबाग और कैंपटी फौल की दूरी को कवर किया जा सकता है.

मसूरी-धनौल्टी : 26 किलोमीटर लंबे मसूरीधनौल्टी मार्ग पर हिमालय की चोटियों और घाटी के कुछ दिल दहला देने वाले दृश्य दिखाई देते हैं.

अल्मोड़ा

यह उत्तराखंड का सब से खास शहर है. हल्द्वानी, काठगोदाम और नैनीताल से बस या टैक्सी से यहां पहुंचा जा सकता है.

दर्शनीय स्थल

भवाली के रास्ते से जब अल्मोड़ा के लिए जाया जाता है तो रास्ते में कैंची जगह पड़ती है. यह भवाली से 7 किलोमीटर की दूरी पर है. प्रकृति का आनंद लेने वाले पर्यटकों के रुकने के लिए यहां पर धर्मशालाएं बनी हैं. कैंची से आगे गरमपानी नामक छोटी सी जगह है. यहां पर्यटक खानेपीने के लिए रुकते हैं. यहां का पहाड़ी खाना घूमने वालों को खूब पसंद आता है. इस से कुछ आगे बढ़ने पर खैरना आता है. खैरना मछली के शिकार के लिए बहुत प्रसिद्ध है. अल्मोड़ा के किले पर्यटकों को बहुत अच्छे लगते हैं. कालीमठ अल्मोड़ा से 5 किलोमीटर दूर है. इस के एक ओर से हिमालय दिखाई देता है तो दूसरी ओर अल्मोड़ा शहर दिखता है. यहां घंटों बैठ कर प्राकृतिक सौंदर्य को निहारा जा सकता है.

अल्मोड़ा से 3 किलोमीटर दूर सिमतोला पिकनिक स्पौट है. अल्मोड़ा के राजकीय संग्रहालय के साथ ही साथ यहां का ब्राइट ऐंड कौर्नर भी घूमने वाली खास जगह है. यहां से उगते और डूबते सूरज को देखना अद्भुत लगता है. यह जगह बस स्टेशन से 2 किलोमीटर की दूरी पर है. लालबाजार में वूलेन क्लौथ लेना पर्यटक नहीं भूलते हैं.

मेरा मकसद लोगों का मनोरंजन करना है: सुनील ग्रोवर

छह साल पहले सायलेंट कॉमेडी वाले सीरियल ‘गुटरगूं’ से पहली बार चर्चा में आए सुनील ग्रोवर को मशहूर व्यंगकार रहे जसपाल भट्टी की खोज माना जाता है. पर उन्हें रातों रात स्टार बनाया कपिल शर्मा के शो ने. इस शो में उनके महिला किरदार गुत्थी ने उन्हें स्टार बना दिया. अब वह फिल्म ‘कॉफी विथ डी’ में पत्रकार की भूमिका में नजर आने वाले हैं. वैसे वह 1998 से ही फिल्मों में छोटे छोटे किरदार निभाते आ रहे हैं.

आपको जसपाल भट्टी का खोज माना जाता हैं?

चंडीगढ़ में जसपाल भट्टी से मेरी मुलाकात हुई थी. उन्होंने मेरा पहला ऑडिशन लिया था. उनसे मैंने ह्यूमर के बारे में बहुत कुछ सीखा. उनसे मैंने सीखा कि क्राफ्टेड ह्यूमर क्या होता है. उनकी सीख का ही परिणाम है कि मैं भी लोगों के चेहरों पर मुस्कान लाने में कामयाब हो गया हूं.

जसपाल भट्टी से क्या खास बात सीखी?

मैंने उनसे एक पंक्ति को पांच पक्तियों में बयां करना सीखा. यह कला मैं अभी भी सीख रहा हूं. इसमें माहिर नहीं हुआ हूं. वह तो लीजेंड थे. उनके दिमाग को पूरी तरह से अपनाना बहुत कठिन है. मेरा अपना नेच्युरल तरीका बहुत अलग था. मैंने उनसे ह्यूमर के साथ संदेश देना सीखा. ह्यूमर के साथ विचार का होना बहुत जरुरी है.

अभिनय को करियर बनाने की वजह क्या रही?

अभिनय मेरे दिमाग, मेरे शरीर व मेरी आत्मा में था. बचपन से ही मुझे कुछ बड़ा बनना था. डॉक्टर, इंजीनियर या पायलट वगैरह अब एक जीवन में यह सब बन नहीं सकता था, पर कलाकार के तौर पर मैं सब कुछ बन सकता हूं. इसलिए मैंने अभिनय को चुना. लेकिन मैं लोगों के लिए हास्य का डॉक्टर हूं. लोगों को मेरे हंसाने से फायदा होता है. यह अच्छी बात है कि हमारे हंसाने से लोगों को तनाव से मुक्ति मिलती है. मुझे खुशी होती है कि मेरा योगदान किसी न किसी रूप में समाज के लिए हो रहा है.

पहले हमें लगता था कि हम अभिनय का यह काम अपने लिए कर रहे हैं. मकान गाड़ी खरीदनी है. वगैरह वगैरह, फिर धीरे धीरे समझ आया कि ईश्वर ने इस काम के लिए हमें भेजा है कि हम समाज में जाकर लोगों के चेहरों पर मुस्कान लेकर आएं.

फिल्म कॉफी विथ डी कैसे मिली?

मैंने अक्षय कुमार के साथ एक फिल्म ‘गब्बर इज बैक’ की थी. इसकी निर्माता शबीना खान इस फिल्म के साथ जुड़ी हुईं थी. इस फिल्म के निर्देशक विशाल मिश्रा से शबीना खान का परिचय था. शबीना खान ने फिल्म ‘कॉफी विथ डी’ की पटकथा पढ़ी थी तो शबीना खान ने ही मुझे निर्देशक विशाल मिश्रा से मिलने के लिए कहा. मैं निर्देशक विशाल मिश्रा से मिला. कहानी व किरदार पसंद आया, तो मैंने कर लिया.

फिल्म ‘कॉफी विथ डी’ में आप क्या कर रहे हैं?

मैंने इस फिल्म में एक टीवी पत्रकार का किरदार निभाया है, जिसका नाम अरनब घोष है. वह जिस चैनल में काम करता है. वह चैनल डूब रहा है. चैनल को लोकप्रिय करने, उसकी टीआरपी बढ़ाने के लिए वह अंडरवर्ल्ड डॉन के बारे में झूठी खबरें बनाता रहता है. इस वजह से अंडरवर्ल्ड डॉन का ध्यान उसकी तरफ जाता है. वह फिर अरनब हो इंटरव्यू के लिए बुलाता है. उस वक्त इंटरव्यू के बीच में हल्की फुल्की चीजें हैं.

पर फिल्म की टैग लाइन है, ‘‘बम का बदला बेइज्जती से…’’तो यह फिल्म क्या कह रही है?

यह फिल्म उस विषय पर आधारित है, जिसके बारे में सभी को पता है. उसी विषय को इस फिल्म में हास्य व्यंग के माध्यम से पेश किया गया है.इस तरह के विषय पर अब तक कोई व्यंगात्मक फिल्म नहीं बनी. तो मैंने दाउद के किरदारों का कैरीकेचर बनाकर व्यंग के लहजे में कुछ कहने की कोशिश की है. हमने एक गंभीर विषय पर हास्य व्यंग के माध्यम से कुछ कहने की कोशिश की है.

आपने प्रधानमंत्री के नाम खुला पत्र लिखा था. उसकी क्या प्रतिक्रिया हुई?

यह सब फिल्म को प्रचार दिलाने के लिए किया गया था. यह कोई गंभीर मसला नहीं था. इस पर ज्यादा कुछ कहना ठीक नहीं है. पी आर टीम ने ही यह पत्र लिखा था. वैसे भी इस पत्र में कुछ खास था नहीं. हां! इस वजह से फिल्म की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित हो गया.

फिल्म बागी में श्रृद्धा कपूर के पिता का किरदार निभाया था?

मेरे लिए यह बात मायने नहीं रखती कि पिता का किरदार है या मां का किरदार है. मैं सिर्फ यह देखता हूं कि किरदार में करने के लिए कुछ हो. उस किरदार को करते हुए एक्साइटमेंट मिले. मैं लोगों का मनोरंजन कर सकूं. इसके अलावा मैं कुछ नहीं सोचता. मैं एक अच्छी फिल्म से जुड़कर लोगों का मनोरंजन करना चाहता हूं.

एक चुटकी नमक चमकाए आपकी त्वचा

नमक हमारी सेहत के लिए फायदेमंद होता है ये तो सभी जानते हैं, लेकिन क्या आप ये जानते हैं कि हमारी त्वचा को साफ और सुंदर बनाने में भी नमक काम आता है. नमक से बने स्क्रब से आप अपनी स्किन में निखार ला सकते हैं और साथ ही आप अपनी जेब भी ढीली होने से बचा सकते हैं.

दूर होगी टैनिंग

एक चम्मच शहद में थोड़ा सा सेंधा नमक मिलाकर चेहरे पर लगाएं. 10 मिनट के बाद चेहरे को ठंडे पानी से धो लें. इसके इस्तेमाल से आपके चेहरे की टैनिंग खत्म होगी.

स्क्रबर की तरह करे काम

दो चम्‍मच ओटमील पाउडर, एक चुटकी सेंधा नमक, 6 बूंद नींबू का रस और 5 बूंद बादाम का तेल एक साथ मिलाएं. इसके बाद इस स्क्रब को अपने चेहरे पर लगाकर कम से कम 5 मिनट लगा रहने दे, इसके बाद साफ पानी से धो लें

सात चम्‍मच बादाम तेल और बारह चम्‍मच नमक मिलाएं और फिर अपने चेहरे को स्क्रब करें.

नींबू का रस एप्‍सम सॉल्‍ट में डालें और चेहरे को हल्के से स्‍क्रब करें. इससे मुंहासे, मृत त्वचा, ब्‍लैक हेड व वाइट हेड को दूर करने में मदद मिलती है.

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