कुछ ऐसे बचा सकती हैं आप अपना टैक्स

जब बात टैक्स बचाने की आती है, तो आप आईटी एक्ट की धारा 80सी के तहत मिलने वाले विकल्प खंगालने लगती हैं. टैक्स बचाने के कुछ ऐसे रास्ते हैं, जिस पर ज्यादा लोग ध्यान नहीं देते. आइए जानते हैं क्या हैं वो तरीके.

चैरिटेबल संस्‍थान को दान

आप पैसे को दान दे सकती हैं बशर्ते जिस भी धर्मार्थ संस्‍थान को आप राशि दान दे रहे हैं, वह डोनेशन के लिए मंजूर की गई संस्‍थानों की सूची में होना चाहिए.

आश्रित सदस्य के इलाज या रखरखाव पर खर्च

आप अपने आश्रितों पर खर्च करके भी टैक्स बचा सकती हैं. लेकिन ध्यान रहे ये व्यक्ति पूरी तरह और सिर्फ आप पर आश्रित होना चाहिए. साथ ही यह तब भी लागू होता है जब आपने इलाज के खर्च से निपटने के लिए विकलांग कर्मचारी के तौर पर टैक्स कटौती का आवेदन ना किया हो.

आश्रित सदस्य की खास बीमारी का इलाज

इसके लिए शर्त यह है कि जो भी इलाज में खर्च आया है, उसके बदले आपको अपनी कंपनी या फिर बीमा कंपनी से कोई रकम ना मिली हो. इसके अलावा ये छूट सिर्फ कैंसर और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के मामले में मिलती है.

होम लोन पर ब्याज

अगर आप मकान में रहते हैं, केवल तभी इस विकल्प का फायदा उठा सकते हैं. अगर यह मकान किराए पर दिया हुआ है, साल का पूरा ब्याज टैक्स बचत के रूप में क्लेम किया जा सकता है.

किराया भरकर

अगर आपकी सैलरी में हाउस रेंट अलाउंस (HRA) नहीं मिलता है, तो इसका भी लाभ लिया जा सकता है.

लारा दत्ताः मिस यूनिवर्स से मां

2000 में मिस यूनिवर्स बनीं अभिनेत्री लारा दत्ता ने फिल्म ‘अंदाज’ से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी. काम के प्रति कमिटमेंट की वजह से उन्हें कई अच्छी फिल्मों में काम करने का मौका मिला. इनमें ‘मस्ती’, ‘नो ऐंट्री’, ‘काल’, ‘पार्टनर’, ‘हाउसफुल’ आदि खास हैं.

जब वह मिस यूनिवर्स बनी थीं तो उसी दौरान अपना पहला ग्रैंड स्लेम जितने वाले टैनिस प्लेयर महेश भूपति को वे भा गईं. इसके बाद दोनों की मुलाकात महेश की इंटरटेनमेंट और स्पोर्ट्स मैनेजमेंट कंपनी की बिजनैस मीटिंग के दौरान हुई. बाद में दोनों ने शादी कर ली. अब उन की 4 साल की बेटी सायरा भी है.

लारा को जीवन से कोई मलाल नहीं. जब जो चाहा मिला. वे कहती हैं कि उन्होंने सही समय में सही काम किया. यही वजह है कि आज वे मौडल, अभिनेत्री, प्रोड्यूसर और एक सफल मां हैं. जौनसंस के ‘बेबी केयर’, ‘बैस्ट फौर बेबी’ यू ट्यूब चैनल पर लौंच के समय उन्होंने गृहशोभा के लिए खास बातचीत की.

पेश हैं, कुछ अंश:

इस लौंच से यंग मां को क्या लाभ मिलेगा?

आजकल महिलाएं संयुक्त परिवार में नहीं रहतीं, साथ ही वे वर्किंग भी होती हैं. उन के पास समय की कमी होती है. ऐसे में जब भी कोई महिला मां बनती है तो वह गूगल सर्च करने लगती है कि क्या करे क्या न करे. सर्च में कई चीजें सही, तो कई गलत भी होती हैं. वे इतनी उत्साहित होती हैं कि कोई भी राय मान लेती हैं.

जौनसंस द्वारा लौंच किया गया यह चैनल सब के लिए विश्वस्त और लाभकारी होगा. यह छोटे शहरों, बड़े शहरों की सभी नई मौम्स के लिए इन्फौरमैटरी होगा. यह भारत की मांओं के लिए उन के जीवन से जुड़ी समस्याओं और उन की मानसिकता को सही तरह से बता सकेगा. इसके अलावा छोटी छोटी बातें जैसे बच्चे के जन्म के बाद ब्रेस्ट फीडिंग कैसे करवानी है, बच्चा बीमार हो तो क्या करना चाहिए, उस के दांत निकल रहे हों तो क्या करना चाहिए, कपड़े कैसे पहनाने चाहिए आदि सभी की जानकारी इस में मिलेगी. सारी जानकारी ऐक्सपर्ट के द्वारा दी जाएगी. इस में एक सपोर्ट सिस्टम हर मां को मिल सकेगा.

जब आप मां बनी थीं तो कितनी उत्साहित थीं और आप ने किस से सब से पहले यह बात शेयर की?

ऐक्साइटमैंट तभी शुरू हो जाता है जब आप को पता चलता है कि आप मां बनने वाली हैं. बच्चा पैदा बाद में होता है, लेकिन खुशी 9 महीने तक रहती है. बच्चे के पैदा होने के बाद ही ऐक्साइटमैंट थोड़ा कम होता है, क्योंकि अब बच्चे के देखभाल की जिम्मेदारी आ जाती है. लेकिन बच्चे के साथ हर दिन आप को नया सीखने को मिलता है. आज मेरी बेटी 4 साल की है पर हर दिन कुछ नया सीख रही हूं.

मां बनने के बाद सब से पहले मैं ने अपने पति महेश से इस खुशी को शेयर किया, क्योंकि पिता को सब से पहले अधिकार है कि वे यह जानें कि वे पिता बनने वाले हैं. बाद में मैं ने अपने मातापिता को यह बात बताई.

मां बनने के बाद क्या क्या तैयारी की थी?

मेरी 2 बहनें मुझ से बड़ी हैं. दोनों के बच्चे हैं. थोड़ा अनुभव था. मेरी भानजी जो आज मेरा काम देखती है हमारे बीच में केवल 14 साल का अंतर है. मैंने उस की देखभाल की है. इस के अलावा जब आप को बच्चा होता है आप के अंदर मां की भूमिका अनायास आ जाती है. आप बच्चे को संभाल लेती हैं. आज एक वर्किंग मां के लिए बहुत जरूरी है कि काम के साथसाथ वह अपने बच्चे की भी देखभाल भी करें. यह एक तरह की बौंडिंग होती है, जो जन्म से पहले हफ्ते में होती है. यही आगे चल कर बच्चे के साथ आप के रिश्ते को निर्धारित करती है.

क्या क्या अनुभव गृहशोभा के जरीए महिलाओं तक पहुंचाना चाहती हैं?

मुझे मां बनने के बाद यह सुनने को मिला कि सब कुछ हो जाता है, ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं होती. यह नैचुरल प्रोसैस है, लेकिन आप नर्वस हमेशा रहेंगी और यह अच्छी बात है, क्योंकि तब आप सब से बेहतर करने की कोशिश करेंगी. हमारे देश में एक पुरानी प्रथा है कि गर्भवती होने के बाद अधिकतर महिलाएं कोई काम नहीं करतीं और खूब खाने लगती हैं ताकि बच्चा तंदुरुस्त पैदा हो.

घर का काम, व्यायाम सब छोड़ देती हैं. ऐसा अधिकतर मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग की महिलाएं करती हैं. निम्न आय वाली तो अंत तक काम करती हैं और उन की डिलिवरी सामान्य हो जाती है. थोड़ाबहुत व्यायाम अपने बच्चे के और अपने स्वास्थ्य के लिए हमेशा करें, जिस में जौगिंग, वाकिंग आदि शामिल हों.

मुझे गर्भवती होने के दौरान हील पहनने को मना किया गया था, पर मैंने अपने प्रोफैशन के हिसाब से पहनीं और सब ठीक ही रहा. डिलिवरी के बाद भी व्यायाम अवश्य करें. ब्रैस्ट फीडिंग साल भर तक करवाएं. अपने लिए 1 घंटा समय अवश्य निकालें.

मां बनने के बाद आप की जिंदगी में क्या बदलाव आया है?

हमारी इंडस्ट्री ग्लैमर पर चलती है. मां बनने के बाद वैनिटी गायब हो जाती है. मैं थोड़ी ईजी रहती हूं. लेकिन कोशिश रहती हूं कि अपने आप को मैंटेन रखूं.

मिस यूनिवर्स, मौडल, अभिनेत्री और अब मां, आप इस सब को कैसे ऐंजौय कर रही हैं?

मैं यंग मदर नहीं बनी. मैं सब कुछ करने के बाद मां बनी और यह मेरा सब से अच्छा फेज है. हर फेज को आप जितनी अच्छी तरह से ऐंजौय करें, उतना ही आप के लिए अच्छा होता है. मेरी प्राथमिकता मेरे बच्चे हैं. मुझे अब कुछ प्रूव करने की जरूरत नहीं है. रोल भी मैं ने सारे किए हैं. इसलिए कोई मलाल नहीं है. अगर आप के दिमाग में अपनी प्राथमिकता साफ है तो आप की लाइफ सही चलती है.

क्या आप स्ट्रिक्ट मदर हैं?

हां, मैं स्ट्रिक्ट मदर हूं, सायरा को पूरे दिन में केवल आधा घंटा समय मिलता है, जब वह टीवी आई पैड या मोबाइल कुछ भी देख सकती है. खाने के समय न तो फोन होगा और न ही टीवी ताकि वह खाने पर पूरी तरह फोकस कर सके. वह 4 साल की है. उसे थोड़ा अनुशासन में रखने की आवश्यकता है. मां ही बच्चे को अनुशासित करती है, क्योंकि पिता थोड़ा लाड़ प्यार अधिक देते हैं. सायरा को मेरे लुक से ही पता चल जाता है कि मेरा मूड कैसा है.

समय मिले तो क्या करती हैं?

किसी फ्रैंड के साथ कौफी पी लेती हूं. थोड़ा ट्रैवल करती हूं.

जीवन में खुश रहने का मंत्र क्या है?

यह किसी को पता नहीं होता. लेकिन इतना जरूर है कि महिलाएं शारीरिक, मानसिक रूप से अपना खयाल रखें. इस से बाकी सब आप आराम से हैंडल कर लेंगी.

फिल्मों को लेकर हमेशा नर्वस रहता हूं: आमिर

आगामी फिल्म ‘दंगल’ की रिलीज का इंतजार कर रहे सुपरस्टार आमिर खान ने बताया कि वह अपनी फिल्मों की रिलीज से पहले हमेशा नर्वस रहते हैं.

आमिर ने कहा, ‘फिल्मों को लेकर मैं हमेशा बेचैन रहता हूं. जब भी हम प्यार से फिल्म बनाते हैं तो दर्शकों की प्रतिक्रिया को लेकर चिंतित होते हैं. अब तक दोस्त, परिवार, करीबी लोग और अब महावीर जी फिल्म देख चुके हैं. हम उनकी प्रतिक्रिया से खुश हैं कि उन्हें यह फिल्म पसंद आई.’

आमिर ने फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग का आयोजन किया. पूर्व पहलवान महावीर सिंह फोगाट, गीता फोगाट, बबीता फोगाट, पूर्व क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर और एमएनएस नेता राज ठाकरे जैसे दिग्गजों ने इसकी शोभा बढ़ाई. आमिर ने कहा, ‘हम 23 दिसम्बर का इंतजार कर रहे हैं, जब दर्शक फिल्म देखेंगे. मैं इसका बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं.’

‘दंगल’ में आमिर पहलवान महावीर सिंह फोगाट की भूमिका में दिखेंगे. वहीं फातिमा सना शेख और सान्या मल्होत्रा गीता व बबीता की भूमिका में हैं. नितेश तिवारी द्वारा निर्देशित ‘दंगल’ शुक्रवार, 23 दिसम्बर को रिलीज होगी.

..इसलिए कभी नहीं मिला राष्ट्रीय पुरस्कार

बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि उन्होंने अब तक ऐसी कोई भूमिका निभायी है जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना चाहिए था.

उन्होंने कहा कि “यह दर्शकों, निणार्यक मंडल के सदस्यों और फिल्मकारों की उदारता है कि मैंने इतने पुरस्कार जीते. मेरे लिए किसी फिल्म के लिए पुरस्कार जीतने के बारे में सोचना, पुरस्कारों के महत्व को कमतर करना होगा. अगर मुझे कोई पुरस्कार नहीं मिला तो इसका मतलब है कि मैं उसके योग्य नहीं था.”

51 साल के एक्टर ने कहा कि मुझे नहीं लगता है कि अब तक मैंने किसी फिल्म में ऐसा कोई अभिनय किया है जिसके लिए मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार मिल सकता था या मिलना चाहिए था. मैं पुरस्कार जीतने के हिसाब से अभिनय नहीं करता. अगर मुझे कोई पुरस्कार नहीं मिलता तो इसका मतलब है कि मैं उसके योग्य नहीं हूं.

बांझपन : क्या है हकीकत

देर से शादी करना, अधिक उम्र में गर्भधारण व अन्य कई कारणों की वजह से आज बांझपन के निदान व उपचार के क्षेत्र में इतनी उन्नति के बावजूद कुछ गलत धारणाएं अब भी बनी हुई हैं, जो जोड़ों को दुविधा में डाल देती हैं. इन मिथकों के पीछे पुरानी कहानियां या विकृत सूचनाएं हैं. यहां कुछ मिथकों व उन के वास्तविक कारणों पर एक नजर डाल रहे हैं:

मिथक: गर्भधारण करने में अक्षम रहने पर महिला के समस्याग्रस्त होने की संभावना.

हकीकत: इनफर्टिलिटी पुरुष व महिला दोनों को समान ढंग से प्रभावित करती है. अमूमन एकतिहाई मामलों में महिला कारक, एकतिहाई मामले में पुरुष कारक व शेष एकतिहाई मामलों में दोनों समान रूप से जिम्मेदार होते हैं या ये अस्पष्टीकृत बांझपन हो सकता है. इसलिए कारण जानने के लिए दोनों ही पार्टनर को समुचित जांच करानी चाहिए.

मिथक: उम्र का प्रजनन क्षमता (फर्टिलिटी) पर असर नहीं होता. अगर आप स्वस्थ हैं और बच्चे की योजना बना रहे हैं तो आईवीएफ जैसी असिस्टेड रीप्रोडक्टिव तकनीक के रहते समस्या की कोई बात नहीं है.

हकीकत: बहुत सी महिलाएं 20 की उम्र में उर्वरता के चरम पर होती हैं. 27 की उम्र से उर्वरता घटने लग जाती है. 35 की उम्र के बाद बहुत तेजी से उर्वरता का हृस होता है. इसलिए आईवीएफ व अन्य बांझपन उपचार (फर्टिलिटी ट्रीटमैंट) उम्र में संबंधित बांझपन के असर को पलट नहीं सकते. यद्यपि एग डोनेशन (अंडाणु दान) मददगार सिद्ध हो सकता है.

मिथक: फर्टिलिटी ट्रीटमैंट से गुजरने वाली महिलाएं जुड़वां या 3 बच्चों को जन्म दे सकती हैं.

हकीकत: हालांकि बांझपन उपचार के मामले में जुड़वां बच्चों की संभावना सामान्य

से अधिक होती है. लेकिन अधिकतर महिलाओं ने 1 बच्चे को ही जन्म दिया है. आईवीएफ व आईसीएसआई की मदद से औसतन 22.6% गर्भधारण के मामलों में जुड़वां और 1.5% मामलों में इस से ज्यादा (3 या 4 बच्चों) के मामले सामने आए हैं. इस का उम्र से भी संबध माना जा सकता है. आईवीएफ की मदद लेने वाली 35 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं के लगभग एकतिहाई मामलों में जुड़वां बच्चों का मामला सामने आया है, जबकि 42 वर्ष से अधिक की महिलाओं में यह 10% से भी कम है.

मिथक: भू्रण हस्तांतरण के बाद पूर्ण आराम जरूरी है.

हकीकत: ऐसी कोई सलाह नहीं दी जाती. बल्कि यह सलाह दी जाती है कि महिलाएं अपनी सामान्य दिनचर्या में वापस लौट सकती हैं.

मिथक: तनाव आईवीएफ की सफलता दर को कम करता है.

हकीकत: सामान्य तनाव आईवीएफ के परिणाम को प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित नहीं करता. अगर कोई महिला अत्यधिक तनावग्रस्त है तो इस का असर दैनिक कार्यों व पारिवारिक जीवन पर पड़ता है, जिस का दुष्प्रभाव प्रजनन क्षमता पर पड़ सकता है. तनाव अपनेआप में एक समस्या है न कि बांझपन का कारक.

मिथक: मेरा मासिकचक्र सामान्य है, इसलिए मेरी प्रजनन क्षमता सही है.

हकीकत: अधिकतर मामलों में नियमित चक्र का मतलब है कि आप के अंडाणु नियमित तरीके से बाहर आ रहे हैं, परंतु इस का अर्थ यह बिलकुल नहीं है कि उन की गुणवत्ता भी ठीक है. इस के लिए एफएचएस, एलएच, एस्ट्रेडियल, एएमएच जैसे हारमोन एनालाइसिस की मदद लेनी चाहिए, जिस से ओवेरियन की कार्यप्रणाली के बारे में बेहतर जानकारी प्राप्त की जा सकती है.

मिथक: महिला की खानपान की आदत और वजन का उन की प्रजनन क्षमता और उस के उपचार परिणामों पर कोई असर नहीं होता.

हकीकत: खराब पोषण का प्रजनन क्षमता पर प्रभाव पड़ सकता है. 30 से अधिक बौडी मास इंडैक्स या गंभीर रूप से कम वजन वाली महिलाओं में हारमोन के असंतुलन व उस के परिणामस्वरूप सामान्य डिंबोत्सर्जन प्रक्रिया के प्रभावित होने की वजह से गर्भधारण में समस्याएं आ सकती हैं.

मिथक: आईवीएफ महिला के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है.

हकीकत: यह नुकसानदायक नहीं है और अच्छी निगरानी में यह बिलकुल सुरक्षित है. सिर्फ 1-2% मरीजों में डिंबग्रंथी में अत्यधिक उत्तेजना की वजह से समस्या हो सकती है. कुछ खास रोकथाम उपायों की मदद से इस की संभावना कम की जा सकती है.

मिथक: पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या बढ़ाने के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया जा सकता.

हकीकत: कुछ पुरुषों में, जिन में किसी अवरोध की वजह से शुक्राणुओं की संख्या कम या नगण्य होती है, तो ऐसी स्थिति का उपचार संभव होता है. इस स्थिति में पुरुष के प्रजनन अंग से सीधे शुक्राणु एकत्र कर आईवीएफ में इस्तेमाल किए जा सकते हैं. उपचार संभव न होने की स्थिति में दानकर्ता के शुक्राणुओं का इस्तेमाल अन्य विकल्प है.

मिथक: आईवीएफ की मदद से डिजाइनर बेबी हासिल किया जा सकता है.

हकीकत: कदकाठी, आंखों का रंग, बालों का रंग आदि सौंदर्य लक्षणों का चयन संभव नहीं है. यद्यपि प्रीइंप्लांटेशन जेनैटिक डायग्नोसिस (पीजीडी) एक प्रक्रिया है, जिस से भ्रूण में वंशानुगत गड़बडि़यों की पहचान में मदद मिलती है और इस की वजह से बच्चे को खास वंशानुगत बीमारियों से बचाया जा सकता है.

मिथक: मैं ने फर्टिलिटी ट्रीटमैंट के कई प्रयास किए और अब हमें उम्मीद छोड़ देनी चाहिए.

हकीकत: कई जोड़ों को गर्भधारण के पहले विभिन्न तकनीकों की मदद लेते हुए कई प्रयास करने पड़ते हैं. अब नई तकनीक जैसे पीजीएस उपलब्ध है, जो कई असफल प्रयासों के मामले में मददगार सिद्ध होती है. गर्भाशय की समस्या जैसे गर्भाशय के स्तर का बहुत पतला होना आदि में सैरोगेसी एक अच्छा विकल्प हो सकता है.

मिथक: आईवीएफ के मामले में पुरुष की उम्र माने नहीं रखती?

हकीकत: हालांकि पुरुष अधिक उम्र तक व्यवहार्य शुक्राणु उत्पन्न कर सकते हैं, पर ढलती उम्र में टेस्टोस्टेरौन स्तर में कमी, गुणवत्ता में कमी व शुक्राणुओं की संख्या के साथसाथ उन की गतिशीलता में कमी की वजह से प्रजनन समस्याएं दिखना आम बात है.

मिथक: फर्टिलिटी ट्रीटमैंट प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है.

हकीकत: भ्रूण हस्तांतरण के पश्चात प्रकृति के अनुरूप सुचारु ढंग से प्रक्रियाओं के जारी रहने की उम्मीद की दिशा में फर्टिलिटी ट्रीटमैंट गर्भाधान कठिनाइयों की बाधाओं को दूर करने में मददगार है.

मिथक: बांझपन के सभी कारकों का इलाज संभव है.

हकीकत: हालांकि ज्यादातर कारकों का इलाज संभव है, लेकिन बदतर डिंबग्रंथि व अंडाणुओं की खराब गुणवत्ता जैसे कुछ मामलों में अंडाणु दान एक बेहतर विकल्प है.

मिथक: बांझपन उपचार में प्रयुक्त दवाओं का महिला के बाद के जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ता है.

हकीकत: फर्टिलिटी दवाओं का लंबे समय तक दुष्प्रभाव के बारे में जानकारी लेने के लिए कई अध्ययन किए गए परंतु किसी दीर्घकालीन जोखिम की कोई खबर नहीं है. अगर किसी महिला ने बच्चे को जन्म नहीं दिया है (बांझपन समस्या के कारण), उस में डिंबग्रंथि के कैंसर का जोखिम बच्चे वाली महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा होता है. इसी प्रकार जिन महिलाओं ने स्तनपान नहीं कराया होता है उन में स्तन कैंसर का खतरा उन महिलाओं की तुलना में ज्यादा होता है, जिन्होंने स्तनपान कराया होता है. फर्टिलिटी दवा से इस का कोई संबंध नहीं है.

मिथक: आईवीएफ उपचार एकमात्र उपलब्ध विकल्प है.

हकीकत: प्रत्येक जोड़े के लिए उपचार उन की उम्र, नैदानिक जांच के परिणाम व जोड़े के प्रयास के अंतराल आदि को नजर में रखते हुए अलगअलग हो सकता है. उदाहरण के लिए डिंबक्षरण जैसे मामले में डिंबोत्सर्जन प्रवर्तन के लिए दवा दी जा सकती है, उस के बाद इंट्रा यूटराइन इंसेमिनेशन (आईयूआई) की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है. अवरुद्ध नलिका जैसे कुछ अन्य कारण भी हो सकते हैं, जिन्हें सर्जरी के जरीए ठीक किया जा सकता है.

मिथक: आईवीएफ के जरीए पैदा हुए बच्चों में जन्मदोष होते हैं तथा उन के शारीरिक व मानसिक विकास में देरी आती है.

हकीकत: आईवीएफ के जरीए पैदा हुए बच्चों पर अब तक किए गए ज्यादातर अध्ययनों में जन्मदोष का कोई सुबूत नहीं मिला है. यद्यपि शुक्राणुओं की गुणवत्ता या उन की संख्या में कमी की स्थिति में अपनाई जाने वाली इंट्रासाइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजैक्शन (आईसीएसआई) जैसी प्रक्रिया की वजह से इक्कादुक्का जन्म दोष के मामले सामने आए हैं.

मिथक: अगर आप का एक बच्चा पैदा हो चुका है तो अगली बार गर्भधारण करने में आप को कोई समस्या नहीं आ सकती.

हकीकत: यह सत्य नहीं है. अवरुद्ध वाहिका, अपरिपक्व डिंबग्रंथि यूटराइन फाइब्रौयड आदि वजहों से सैकंडरी इनफर्टिलिटी संभव है.

बांझपन से जूझ रहे जोड़ों को उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए तथा उन्हें उचित मार्गदर्शन के लिए आईवीएफ विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए.क्योंकि प्रत्येक जोड़े को पितृत्व व मातृत्व हासिल होने का अधिकार है.          

– डा. शिवानी सचदेव गौर, डायरैक्टर औफ एससीआई हैल्थकेयर

 

बेबी बंप : छिपाने की क्या बात है

2011 में मलयेशियन डेयरी फ्रीसो ने जब मलयेशियाई गर्भवती महिलाओं को अपने लुक्स और बढ़ते पेट के आकार को ले कर सैल्फ कौंशियसनैस से उबरने में मदद के उद्देश्य से फेसबुक पर कैंपेन चलाया था, तब इस कैंपेन में देश की महिलाओं ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था. कैंपेन के तहत गर्भवती महिलाओं को अपने बेबी बंप के साथ एक पिक्चर क्लिक कर के फ्रीसो के पेज पर अपलोड करनी थी.

मलयेशियन सैलिब्रिटी डीजे मम द्वारा इस कैंपेन में सब से पहले बेबी बंप वाली तसवीर अपलोड की गई. इस के बाद तो मलयेशियन महिलाओं ने सारी हिचकिचाहट को दरकिनार कर अपने बेबी बंप के साथ तसवीरें अपलोड करनी शुरू कर दीं. इस कैंपेन द्वारा 2 हजार से भी अधिक मलयेशियन गर्भवती महिलाओं की गर्भावस्था के दौरान लुक्स को ले कर होने वाली झिझक को दूर करने का प्रयास किया गया था.

यदि बात भारत जैसे विकसित देश की करें, जहां डिजिटल क्रांति वर्षों पहले ही दस्तक दे चुकी है, वहां इस तरह का डिजिटल कैंपेन अब तक नहीं किया गया, जिस में आम गर्भवती महिलाओं ने हिस्सा लिया हो. मगर भारत की कुछ सैलिब्रिटीज द्वारा अपने बेबी बंप की तसवीरें ट्वीट करने या इंस्टाग्राम पर अपलोड करने के कई मामले देखे गए हैं.

दोहरी मानसिकता में फंसा बेबी बंप

हाल ही में अभिनेत्री करीना कपूर खान द्वारा कराए गए प्रीमैटरनिटी फोटोशूट के चर्चा में आने के बाद जरूर 1-2 गर्भवती महिलाओं ने इसे खुद पर आजमाया है, मगर उन के फोटोशूट को सोशल मीडिया पर ज्यादा सराहा नहीं गया. इंदौर की वीर वाधवानी उन्हीं महिलाओं में से एक हैं. उन्होंने करीना कपूर के फोटोशूट की देखादेखी यह शूट कराया और उन्हीं के पोज की नकल भी की. मगर जहां करीना कपूर खान को उन के फोटोशूट के लिए दर्शकों की प्रशंसा मिली, वहीं वीर को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा. लोगों ने वीर के इस स्टैप को ऐक्शन सीकिंग स्टंट तक कह दिया. फिर क्या वीर की तसवीरें अलबम में बंद हो कर रह गईं.

मगर यहां लोगों की डिप्लोमैटिक सोच पर बड़ा सवाल खड़ा होता है कि एक सैलिब्रिटी और एक आम महिला, दोनों ही एक ही अवस्था में हैं, फिर व्यवहार दोनों के साथ अलगअलग क्यों? इस प्रश्न का जवाब देते हुए कानपुर स्थित सखी केंद्र की संचालिका एवं सोशल ऐक्टिविस्ट नीलम चतुर्वेदी कहती हैं, ‘‘समाज महिलाओं के चरित्र को हमेशा खुद से ही वर्गीकृत कर देता है. यदि इस संबंध में बात की जाए तो समाज की सोच यहां दोहरी हो जाती है. करीना कपूर खान ऐक्ट्रैस हैं, तो फोटो खिंचवाना उन के पेशे का हिस्सा है. मगर वीर जैसी आम महिलाएं ऐसा नहीं कर सकतीं, क्योंकि समाज उन्हें बंदिशों में जकड़ कर रखना चाहता है.’’

मोटा दिखने की हिचकिचाहट

दिल्ली मैट्रो में करोल बाग से वैशाली तक रोजाना सफर करने वाली मयंका की प्रैगनैंसी का 8वां महीना चल रहा है. उन का पहला बेबी है, इसलिए वे बेहद ऐक्साइटेड हैं. लेकिन बेबी बंप के साथ पब्लिक प्लेस पर उन्हें थोड़ा अटपटा लगता है. इसलिए वे हमेशा दुपट्टे से पेट ढक कर रखती हैं.

यह अकेली मयंका की ही नहीं, बल्कि हर भारतीय गर्भवती महिला की यही कहानी है कि बढ़ा पेट ले कर कैसे किसी के सामने जाएं? ऐसे में प्रीमैटरनिटी फोटोशूट कराने का हौसला कम ही महिलाएं दिखा पाती हैं.

ऐसी ही बुलंद हौसले वाली महिला हैं दिल्ली निवासी हीना. हीना ने 2013 में अपनी पहली संतान को जन्म देने से 2 दिन पूर्व ही प्रीमैटरनिटी फोटोशूट कराया था. अपना अनुभव बताते हुए वे कहती हैं, ‘‘पहले थोड़ी हिचकिचाहट हुई थी. लग रहा था कि मोटी दिखूंगी. मगर पति और सास के सहयोग से यह मेरे लिए आसान हो गया.’’

घर वालों के साथ से बन सकती है बात

भारतीयों की मानसिकता गर्भवती महिला के शरीर में होने वाले प्रतिदिन के बदलाव को अलगअलग रूप में परिभाषित करती है. इन में सब से पहले उस के खुद के घर वाले आते हैं. बस यहीं पर गर्भवती का आत्मविश्वास डगमगा जाता है और वो खुद को दूसरों की नजर से देखने लगती है.

इस अवस्था में महिलाओं की साइकोलौजी के बारे में बात करते हुए मनोचिकित्सक, प्रतिष्ठा त्रिवेदी कहती हैं, ‘‘गर्भावस्था में महिलाओं के शरीर में कई परिवर्तन होते हैं. उन का वजन बढ़ जाता है, शरीर का आकार बदल जाता है, चेहरे पर परिपक्वता आ जाती है. इन्हें आसानी से स्वीकार करना हर महिला के बस में नहीं होता. अलगअलग लोग जब उन के लुक पर अलगअलग बातें करते हैं, उन्हें सलाह देने लगते हैं, तो उन का थोड़ाबहुत असहज होना स्वाभाविक है. मगर गर्भवती का बेबी बंप दिखना तो प्राकृतिक है. इस बात को समझना मुश्किल नहीं है.’’

कई बार पति द्वारा मजाक में फिगर खराब होने की बात सुन कर भी गर्भवती महिला भावुक हो जाती हैं. यहां पति को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि मजाक का विषय सावधानी से चुने. पुष्पावति सिंघानिया रिसर्च इंस्टिट्यूट में हैड गाइनोकोलौजिस्ट, राहुल मनचंदा कहते हैं, ‘‘बेबी बंप केवल 7वें, 8वें और 9वें महीने में ही मैच्योर स्टेज पर होता है. प्रसव के बाद साल भर के अंदर महिलाएं वापस अपनी पुरानी बौडी शेप को पा सकती हैं. इसलिए वजन कभी कम नहीं होगा यह सोचना गलत है. वजन को ले कर महिलाओं का भावुक होना समझा जा सकता है, क्योंकि हारमोनल बदलाव से उन का मूड स्विंग होता रहता है. असल में तो वे भी यह जानती हैं कि ऐसा हमेशा के लिए नहीं है. मगर महिलाओं को इस बात का बारबार एहसास करना पड़ता है ताकि वे अवसाद जैसी गंभीर स्थिति का शिकार न हों. यह काम केवल गर्भवती महिला का पति और घर वाले ही कर सकते हैं.

प्रीमैटरनिटी फोटोशूट भी महिलाओं के लुक को ले कर चिंता पर काबू पाने का अच्छा विकल्प है. इस बाबत चाइल्ड फोटोग्राफर, साक्षी कहती हैं, ‘‘जब मानव प्रकृति की सब से खूबसूरत संरचना है, तो फिर एक नई जिंदगी को जन्म देने वाली महिला की यह अवस्था बदसूरत कैसे हो सकती है? इस अवस्था में तो हर दिन होने वाले परिवर्तनों को तसवीरों में कैद कर के रख लेना चाहिए ताकि बाद में यही तसवीरें अपने बच्चे को दिखाई जा सकें. बच्चे भी इन तसवीरों की मदद से खुद को भावनात्मक रूप से मां से जोड़ पाते हैं.’’

अंधविश्वास से रहें दूर

गर्भवती महिलाओं को कैमरे से जुड़े मिथों पर भी ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए. एक मिथ के अनुसार गर्भावस्था के दौरान इलैक्ट्रोनिक किरणें गर्भवती के पेट पर नहीं पड़नी चाहिए जबकि इस मसले पर गाइनोकोक्लौजिस्ट, डा. राहुल की राय अलग है. वे कहते हैं, ‘‘पहली तिमाही में जब बच्चे के और्गंस बन रहे होते हैं तब ऐक्सरे कराना मना होता है, मगर उस के बाद कोई परेशानी नहीं है. जहां तक बात कैमरे से तसवीर लेने की है तो विज्ञान में ऐसे प्रमाण कहीं नहीं मिलते कि बच्चे या मां पर इस का कोई बुरा असर पड़ता हो.’’

कई लोग यह भी कहते हैं कि गर्भवती महिला के तसवीर खिंचवाने से बच्चे की ग्रोथ पर असर पड़ता है और पेट का आकार कम हो जाता है. मगर डा. राहुल कहते हैं, ‘‘पेट का आकार कम है तो इंट्रायूटरिन ग्रोथ रिटारडेशन की संभावना होती है, जिस में बच्चे की ग्रोथ ठीक नहीं होती. मगर इस की वजह गर्भवती द्वारा अच्छी डाइट न लेना होती है. मगर पेट का साइज ज्यादा है तो यह भी अच्छी बात नहीं. ऐसे में बच्चा मधुमेह का शिकार हो सकता है. इन दोनों ही स्थितियों का कैमरे से कोई लेनादेना नहीं होता है.’’

अत: प्रीमैटरनिटी फोटोशूट को हौआ समझने या गर्भवती द्वारा अपने बेबी बंप के साथ सोशल मीडिया में फोटो अपलोड करने को आलोचना का विषय बनाना केवल संकुचित सोच की निशानी है, जिस का इलाज किसी भी चिकित्सक के पास नहीं है.

जैसी त्वचा वैसा मौइश्चराइजर

‘यह मौइश्चराइजर आप की त्वचा को निखारने के साथसाथ कोमल भी बनाता है’ एक ब्रैंडेड मौइश्चराइजर के विज्ञापन में लिखी ये पंक्तियां रितिका को इतनी प्रभावशाली लगीं कि वह उसी शाम बाजार से

वह मौइश्चराइजर खरीद लाई.

रितिका ने मौइश्चराइजर खरीदने से पहले यह भी नहीं देखा कि उस में किस तरह के इनग्रीडिएंट्स का इस्तेमाल किया गया है. इतना ही नहीं रितिका ने अपने स्किन टाइप को भी नए ब्रैंडेड मौइश्चराइजर के मुताबिक आंकने की जरूरत नहीं समझी. उसने यही सोचा कि सर्दियों में त्वचा के रूखेपन को ही तो खत्म करना है. कोई भी मौइश्चराइजर ले लो. बस खुशबूदार होना चाहिए और त्वचा में निखार आ जाना चाहिए.

रितिका अकेली ऐसी महिला नहीं, जो मौइश्चराइजर को मात्र त्वचा की ड्राईनैस खत्म करने वाली क्रीम समझती हो. ऐसी कई महिलाएं हैं, जो मौइश्चराइजर के चुनाव में लापरवाही बरतती हैं. मगर खुशबू, रंग और पैकिंग को सही आधार मान कर मौइश्चराइजर को खरीदने वाली महिलाओं को चेतावनी देते हुए कौस्मैटोलौजिस्ट अवलीन खोकर कहती हैं, ‘‘जहां सही मौइश्चराइजर का चुनाव त्वचा के लिए संजीवनीबूटी की तरह काम करता है, वहीं गलत मौइश्चराइजर त्वचा पर जहर जैसा असर दिखाता है, जिस के दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं. इसलिए मौइश्चराइजर हमेशा स्किन टाइप को ध्यान में रख कर ही खरीदें.’’

किस त्वचा के लिए कौन सा मौइश्चराइजर

अमूमन महिलाओं को यही नहीं पता होता है कि उन की त्वचा किस टाइप की है. त्वचा के ड्राई, औयली और कौंबिनेशन 3 प्रकार होते हैं. जिन महिलाओं को अपनी त्वचा के प्रकार का अंदाजा नहीं होता वे हमेशा गलत कौस्मैटिक उत्पाद खरीद लेती हैं.

इस बारे में अवलीन कहती हैं, ‘‘त्वचा 50% पानी और 50% तेल के मिश्रण से बनी होती है. केवल बच्चों की त्वचा में ही यह अनुपात सही होता है. उम्र के साथसाथ यह अनुपात बदलता रहता है. जैसे ड्राई त्वचा वालों में तेल की मात्रा कम और पानी की अधिक होती है.

औयली स्किन वालों में तेल की अधिक मात्रा और पानी की कम होती है, तो कौंबिनेशन वाली त्वचा में कहीं कहीं पानी की तो कहीं तेल की मात्रा कम होती है. कभी कभी यह मात्रा अधिक भी हो सकती है. इसलिए तीनों प्रकार की त्वचा के लिए अलग अलग इनग्रीडिएंट्स वाले मौइश्चराइजर होते हैं. बस अपनी स्किनटोन के हिसाब से चुनाव करना चाहिए.

ड्राई स्किन

इस त्वचा में औयल ग्लैंड कम ऐक्टिव होती है. इसलिए त्वचा में तेल न के बराबर बनता है और पानी अधिक होता है. ऐसी त्वचा के लिए क्रीम और औयल बेस्ड मौइश्चराइजर का इस्तेमाल करना चाहिए. इस मौइश्चराइजर में तेल ज्यादा पानी कम होता है. इसलिए मौइश्चराइजर खरीदने से पूर्व देख लें कि उस में इमोलियंट्स एवं ह्यूमेकटैंट लोशन को इनग्रीडिएंट्स लिस्ट में जरूर शामिल किया गया हो. यदि त्वचा बहुत अधिक ड्राई है, तो कोको बटर और शिया बटर युक्त मौइश्चराइजर काफी फायदेमंद साबित हो सकता है.

औयली त्वचा

इस त्वचा पर हलका वाटर बेस्ड मौइश्चराइजर इस्तेमाल किया जाना चाहिए. कोशिश करें कि इस तरह की त्वचा पर जैल बेस्ड मौइश्चराइजर का इस्तेमाल किया जाए. अवलीन के अनुसार बाजार में ट्रांसपैरेंट और थिक जैल बेस्ड मौइश्चराइजर उपलब्ध हैं. मगर औयली त्वचा के लिए ट्रांसपैरेंट जैल मौइश्चराइजर ही बैस्ट रहते हैं.

कौंबिनेशन त्वचा

इस त्वचा में लोशन मौइश्चराइजर का इस्तेमाल करना चाहिए, जिस में पानी की अधिक और तेल की मात्रा कम हो.

मौइश्चराइजर की नई वैराइटीज

बैरीज मौइश्चराइजर

कौस्मैटिक के लगभग हर प्रोडक्ट में इस समय अलगअलग बैरीज का इस्तेमाल किया जा रहा है और कई अच्छे ब्रैंड्स के बैरीज युक्त मौइश्चराइजर भी बाजार में उपलब्ध हैं.

औयली और कौंबिनेशन वाली त्वचा के लिए बैरीज युक्त मौइश्चराइजर सब से अच्छा विकल्प है, क्योंकि  इस में ऐंटीऔक्सीडैंट और हाइड्रेटिंग प्रौपर्टीज के साथ ही कई तरह के विटामिन भी होते हैं. इन में हीलिंग एजेंट भी पाए जाते हैं, जो त्वचा को हर प्रकार के संक्रमण से बचाते हैं.

कूलिंग एजेंट मौइश्चराइजर

इस तरह के मौइश्चराइजर में ऐलोवेरा, खीरा, संतरा, नीबू और पिपरमिंट औयल जैसे इनग्रीडिऐंट्स शामिल होते हैं, जो ऐंटीइनफ्लेमेटरी, ऐंटीसैप्टिक और हीलिंग एजेंट्स से भरपूर होते हैं. ये त्वचा को संक्रमित होने से बचाते हैं और उसे तरोताजा बनाए रखते हैं.

गोट मिल्क ऐक्सट्रैक्ट मौइश्चराइजर

ड्राई स्किन वाली महिलाओं के लिए यह मौइश्चराइजर बहुत लाभदायक साबित होता है. गोट मिल्क ऐक्सट्रैक्ट ऐसा इनग्रीडिएंट है, जिस में विटामिन ए और बी प्रचुर मात्रा में होते हैं, साथ ही इस में सिलेनियम जैसे स्किन मिनरल्स भी पाए जाते हैं, जो ड्राई स्किन को कालेपन से बचाते हैं और

उसे रिंकलफ्री बनाते हैं. इस मौइश्चराइजर में हाइड्रोऔक्सी ऐसिड भी होता है, जो डैड स्किन को निकाल कर उस की जगह नई स्किन बनाता है और उसे हाईड्रेट कर हमेशा जवां बनाए रखता है.

खरीदने से पहले यह जरूर जांचें

अधिकतर महिलाएं मौइश्चराइजर लेने से पहले प्रोडक्ट के पीछे लिखी इन बातों पर ध्यान नहीं देती हैं. अधिक खुशबूदार मौइश्चराइजर न लें. सिंथैटिक फ्रैगरैंस से स्किन ऐलर्जी होने की संभावना रहती है.

हमेशा हाईपोऐलर्जेनिक मौइश्चराइजर ही लें. इस से त्वचा पर ऐलर्जिक रिऐक्शन होने की संभावना बहुत कम हो जाती है.

मौइश्चराइजर हमेशा नौनकोमेडोजैनिक होना चाहिए.

डर्मैटोलौजिस्ट अप्रूव्ड मौइश्चराइजर ही खरीदें.

मौइश्चराइजर पैराबिन फ्री और सल्फेट फ्री होना चाहिए वरना इस की मौजूदगी से स्किन कैंसर होने की संभावना रहती है.

फिल्म रिव्यू: दंगल

रियल लाइफ की गीता फोगट और बबीता कुमारी से प्रेरित होकर बनाई गई फिल्म ‘दंगल’ रेसलर के जीवन में कामयाबी पाने के लिए कितनी जद्दोजहद होती है, उसे बड़ी खुबसूरती से परदे पर उतारने में सफल रही है. ये सही भी है कि मेडल पाने के लिए एक खिलाड़ी को अपने आत्मविश्वास को चरम सीमा पर ले जाने की जरुरत होती है. कुछ सेकंड की दांव-पेंच ही पूरे खेल के इमेज को बदल देती है. इसके अलावा खेल को सही दिशा में ले जाने के लिए एक अच्छे कोच की भी आवश्यकता होती है. ये आसान नहीं होता, क्योंकि भ्रष्ट राजनीति और सिस्टम इस पर हमेशा हावी होता आया है. फिल्म में गीता और बबीता की भूमिका निभाने वाली फातिमा शेख और सान्या मल्होत्रा ने जबरदस्त भूमिका निभाकर रियल लाइफ की गीता और बबीता के साथ पूरा न्यायकिया है.

परफेक्शनिस्ट आमिर खान ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि वे अपने काम की हर बारीकियों को देखते हैं. कहानी से लेकर पटकथा, संवाद और अभिनय सब कुछ बहुत ही उम्दा है. साक्षी तंवर ने आमिर खान की पत्नी की भूमिका सटीक निभाई है. निर्देशक नितीश तिवारी की यहां तारीफ़ करनी होगी कि उन्होंने एक पल के लिए भी दर्शकों को बोर नहीं होने दिया. इतना ही नहीं ये फिल्म उन राज्य, परिवार और धर्म के ठेकेदारों के लिए एक जोरदार तमाचा है जो लड़कियों को सिर्फ चूल्हा चौका और शादी कर बच्चे पालना ही उनका काम समझते हैं. पुरुष मानसिकता के लिए ये एक अच्छी फिल्म है, जो लड़के को अपना सबकुछ मानते हैं और उसे पाने के लिए कुछ भी कर डालते है.  

फिल्म की कहानी इस प्रकार है-

हरियाणा के एक छोटे से गांव में भूतपूर्व नेशनल चैम्पियन कुश्ती प्लेयर महावीर सिंह फोगट (आमिर खान) अपनी पत्नी दया कौर (साक्षी तंवर) के साथ रहते हैं. उनकी इच्छा है कि उनका एक बेटा हो, जो उनके लिएअन्तर्राष्ट्रीय कुश्ती चैम्पियन में गोल्ड मेडल जीते और देश का नाम रोशन करे. ये उनका सपना था, जो वे किसी कारणवश खुद पूरा कर नहीं पाए थे. लेकिन हर बार उन्हें लड़की ही होती थी.

निराश होकर महावीर ने एक दिन अपने सारे अचिवेमेंट और सपने को एक बॉक्स में बंद कर दिया. लेकिन एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि उन्हें लगने लगा कि उनकी छोरियां, गीता फोगट (फातिमा शेख) और बबीता कुमारी (सान्या मल्होत्रा) किसी छोरे से कम ना हैं और उसी दिन से वे उन्हें सख्ती से ट्रेनिंग देने लगे. इसमें उन्हें बहुत कठिनाइयां आई, पर वे टस से मस नहीं हुए. अनुशाषित जीवन, लगन, मेहनत, सही खान-पान और सही तकनीक ही उन्हें अपनी मंजिल तक पहुंचाती है. रस्ते में जहां भी मुश्किलें आई, महावीर एक मजबूत चट्टान की तरह सामने खड़े रहे.

फिल्म के संगीत निर्देशन को प्रीतम ने बहुत खूबसूरती से गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य के शब्दों को कहानी के अनुरूप पिरोया है. ये एक बेहतरीन फिल्म इस साल की है, जिसे पूरा परिवार साथ मिलकर देख सकता है. इसे फोर एंड हाफ स्टार दिया जा सकता है.

सरकार मस्त गरीब पस्त

कालेधन की समस्या के निबटान का जो चमत्कार कुछ लोग सोच रहे हैं, वह एकदम बेबुनियाद है. देश में करों से बचाया गया कालाधन कर दे कर बचाए गए धन की तरह है और फर्क यह है कि उस पर कर कम दिया गया. अधिकतम आयकर 30% है पर आमतौर व्यापारियों को अगर लाभ हो तो भी 15-20% के बराबर का कर देना होता है. कंपनियां ही पूरा 30% देती ही हैं. भारत में कृषि उत्पादन और कृषि आय वैसे ही आयकर व दूसरे करों से मुक्त हैं.

काले धन को भी पूरी तरह कमाना पड़ता है और उस में उतनी ही मेहनत लगती है जितनी सफेद टैक्स दिए गए कर में लगती है. इसलिए यह कहना कि काले धन से लोग ऐयाशी करते हैं गलत है.

जिन की आय किसी भी कारण से ज्यादा है वे बड़ी गाडि़यों, भव्य शादियों, विदेश यात्राओं, महलनुमा मकानों पर खर्च करते हैं और ज्यादातर हिस्सा उस में टैक्स दिए गए पैसे का ही होता है.

काले धन की जरूरत आम लोगों को इसलिए होती है कि वे अपना हिसाबकिताब रखना नहीं जानते या उन्हें आता ही नहीं. वे तो अपनी कापी में या अपने मन में पूरा हिसाब रख लेते हैं. किस से कितना लेना है कितना देना है, उस के लिए उन्हें लैजर कैश बुक, कंप्यूटर की जरूरत नहीं है. सरकार उन्हें ये जबरन थोप रही है. उन का काम बढ़ा रही है. खर्च बढ़ा रही है.

काले धन को बुरा मानने वाले कम नहीं हैं पर वे बुरा मानने वाले खुद जेब में काला धन लिए घूमते हैं और काला धन इस्तेमाल करने वालों के यहां काम करते हैं, उन का सामान खरीदते हैं.

यह मामला उन पापियों का है जो लूट का कुछ पैसा मंदिरों में दे कर अपने को पाप मुक्त समझ लेते हैं. काले धन के घोड़ों पर सवार हो कर आई सरकार काले धन को समाप्त करना नहीं चाहती, वह चमत्कार के चक्कर में है जिस से गरीब जनता की वाहवाही लूट सके और धन्ना सेठों, आतंकवादियों और देशद्रोहियों की आड़ में विरोधियों को पटकनी दे सके.

इस देश का एक हिस्सा अमीरों या अपने से ज्यादा खुशहालों से इतना चिढ़ा रहता है कि वह अपनी झोपड़ी भी जलाने को तैयार है यदि उस की आग से बराबर के महल का कुछ हिस्सा भी जल जाए. नोटबंदी देश की अर्थव्यवस्था की दिल की नाडि़यों में कितनी ही रुकावटें पैदा कर देगी. देश का दिल वैसे ही कमजोर है. लेकिन यह मरेगा तो नहीं पर घिसटता, सिसकता रहेगा. 

 

आस्था की आड़ में अतिक्रमण

‘‘ क्याभारत के संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप का इस्तेमाल धर्म आधारित राजनीति को प्रोत्साहन देने के लिए किया जा रहा है?’’ पिछले दिनों केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा यह कड़ी टिप्पणी दिल्ली की सड़कों पर फैलते धार्मिक ढांचों और अतिक्रमणों को हटाने में टालमटोल पर की गई थी. इतना ही नहीं, आयोग ने दिल्ली पुलिस को यह आदेश भी दिया था कि वह इस सिलसिले में अपील दायर करने वाले को और लोक निर्माण विभाग को यह सूचित करे कि उपरोक्त अवैध ढांचा हटाने के मामले में कब तक काररवाई करेगा?

मालूम हो कि रोहतक रोड पर अवैध ढंग से बने धार्मिक ढांचे को वहां से हटाने की जानकारी अपीलकर्ता ने मांगी थी. आयोग ने इस बात पर भी चिंता जताई थी कि किस तरह हर धार्मिक अतिक्रमण उस जटिल संकट को जन्म देता है, जिसे फिर सियासतदानों की तरफ से हवा दी जाती है.

गौरतलब है कि प्रार्थना स्थलों के अवैध निर्माणों या धार्मिक उत्सवों के अवसरों पर गैरकानूनी ढंग से पंडाल खड़ा करने आदि का मसला अब समूचे देश में चिंता का सबब बन रहा है, जिस के बारे में उच्चतम न्यायालय ही नहीं, बाकी अदालतें भी अपने निर्देश दे चुकी हैं. उदाहरण के तौर पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सभी राज्यों ने गिनती कर उसे यह भी सूचित किया है कि उन के यहां कितने अवैध धार्मिक स्थल हैं. ध्यान रहे कि ऐसे प्रार्थना स्थल सड़कों, चौराहों के अलावा गलीमहल्लों या अपार्टमैंट्स के अंदर भी तेजी से बन रहे हैं.

दुश्वार होती जिंदगी

पिछले दिनों राजस्थान के उच्च न्यायालय ने जयपुर की एक आवासीय सोसायटी में अवैध ढंग से पानी की टंकी पर बने मंदिर को गिराने का आदेश दिया. अपार्टमैंट के निवासी की निजता के अधिकार की याचिका को मंजूर करते हुए न्यायालय ने 2 माह के भीतर मंदिर को उपरोक्त स्थान से हटाने का निर्देश दिया तथा अवैध ढंग से मंदिर बनाने के लिए सोसायटी के 2 सदस्यों पर 50-50 हजार रुपए का जुर्माना भी ठोंका.

याचिकाकर्ता का कहना था कि मंदिर में लाउडस्पीकर तथा अन्य संगीत उपकरणों के इस्तेमाल तथा वहां नियमित चलने वाले धार्मिक आयोजनों से उन का शांति से जीना दुश्वार हो गया है. वे रात को भी नहीं सो पाते.

उधर मुल्क की आर्थिक राजधानी कही जाने वाली मुंबई की उच्च अदालत का आदेश धार्मिक अतिक्रमणों के अस्थाई रूप को रेखांकित करता है. दरअसल, आए दिन होने वाले त्योहारों के नाम पर सड़कों पर पंडाल लगाने, लाउडस्पीकर बजाने और आम नागरिकों के सड़कों व फुटपाथों पर सुरक्षित ढंग से चलने के मूल अधिकार के बाधित होने की बढ़ती प्रवृत्ति को देखते हुए मुंबई स्थित ठाणे के डाक्टर बेडेकर ने याचिका डाली थी. उन का कहना था कि मुंबई के बगल में स्थित ठाणे जिले में इस सिलसिले में बनाए गए तमाम नियमों का बारबार उल्लंघन होता है और शिकायत किए जाने पर भी सुनवाई नहीं होती है.

अदालत पहुंचते मामले

महानगर पालिका के आला अफसरों को  मामले में डांट लगाते हुए उच्च न्यायालय ने साफ कहा था कि सार्वजनिक स्थल पर पूजा का आयोजन मूल अधिकार में शामिल नहीं होता है. इतना ही नहीं न्यायालय ने आम रास्तों

व फुटपाथों पर नवरात्रों, गणेशोत्सव आदि उत्सवों के अवसरों पर अस्थाई पंडाल लगाने को ले कर अधिक सख्त निमयों का ऐलान भी किया था और राज्य सरकार से कहा था कि वहां इस आदेश के बारे में ‘ऐक्शन टेकन रिपोर्ट’ ले कर कुछ समय बाद अदालत के सामने हाजिर हो.

आस्था का सवाल इस दौर में जितना संवेदनशील हुआ है, उसे मद्देनजर रखते हुए अकसर इस मसले को आसानी से निबटाना भी संभव नहीं होता. पिछले दशक के अनुभव बताते हैं कि यदि सही तरीके से समझाया जाए, तो आम लोग आस्था के सवाल को जनहित के मातहत करने को तैयार भी हो जाते हैं. 21वीं सदी की पहली दहाई में हमारे सामने 3 अलगअलग सूबों के ऐसे उदाहरण दिखते हैं, जिन्हें एक तरह से नजीर माना जा सकता है.

यातायात पर संकट

उदाहरण के लिए 2005-06 के दौरान मध्य प्रदेश के चर्चित शहर जबलपुर में, जहां मुल्क के किसी भी अन्य शहर की तरह कई धर्मोंसंप्रदायों के अनुयायी रहते हैं, वहां पर डेढ़ साल के अंतराल में 168 धार्मिकस्थल हटा कर दूसरे स्थान पर बनाए गए. क्या यह बात आज के माहौल में किसी को आसानी से पच सकती है कि शहर के यातायात व सामाजिक जीवन को तनावमुक्त बनाए रखने के लिए सभी आस्थाओं से संबंधित लोगों ने इस के लिए मिलजुल कर काम किया और एक तरह से बाकी मुल्क के सामने सांप्रदायिक सद्भाव की नई मिसाल पेश की?

यातायात के बढ़ते दबाव को ज्यादा गंभीर बनाने वाले व सड़कों के बीचोंबीच स्थित इन धार्मिकस्थलों को स्थानांतरित करने वाले इस अभियान की शुरुआत शहर के पौश इलाके सिविल लाइन में स्थित एक मजार को स्थानांतरित कर के हुई. इस के बाद शुरू हुए सिलसिले में बड़ी तादाद में धर्मस्थलों को अपने स्थान से हटा कर दूसरे स्थान पर स्थापित किया गया.

न्यायालय का हस्तक्षेप

इस मामले में न्यायपालिका का भी बेहद सकारात्मक रूख रहा और जिला प्रशासन ने भी इस काम को अंजाम देने के पहले समाज के कई तबकों को भरोसे में ले कर उन से सुझाव व सहयोग ले कर ही काम को आगे बढ़ाया.

गौरतलब है कि जबलपुर शहर की इस नायाब पहल के पहले ‘मंदिरों के शहर’ कहे जाने वाले दक्षिण भारत के मदुराई में भी इसी किस्म की कार्यवाही की गई थी. उच्च न्यायालय के आदेश के तहत नगर पालिका की अगुआई में अवैध रूप से बनाए गए 250 से अधिक मंदिर, 2 चर्च व 1 दरगाह को हटाया गया.

मुंबई में भी, जहां 1992-93 में बड़ी संख्या में लोग सांप्रदायिक दंगों के शिकार हुए थे, वहां ऐसे धार्मिकस्थलों की मौजूदगी तनाव बढ़ाने का सबब बनी थी. वहां आम नागरिकों के संगठित हस्तक्षेप के चलते 1 हजार से अधिक अवैध धर्मस्थलों को प्रशासन ने हटा दिया था.

राजस्थान की राजधानी जयपुर में भी अदालत के निर्देश पर धर्मस्थल हटाने की कार्यवाही हुई है. राजनीति के चलते इस मामले में गतिरोध जरूर आया है और प्रशासन पर गलत कार्यवाही के आरोप भी लगे हैं. लेकिन मैट्रो कारैपोरेशन ने 200 से ज्यादा धार्मिक स्थलों को हटा दिया है.

ऐसे चलता है अतिक्रमण का खेल

कई बड़े शहरों में तो जहां जगह की काफी कीमत है, मंदिरमसजिद बना कर जमीन हथियाने वालों के पूरे गिरोह रहते हैं और यह एक बाकायदा धंधा बन चुका था. शहर में जहां कहीं भी सार्वजनिक जमीन खाली पड़ी होगी या व्यावसायिक स्थलों पर सड़कों के किनारे फालतू जगह होगी, इन लोगों की गिद्धदृष्टि में आ जाएगी.

यह बात केवल हिंदुओं के मंदिरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कमोबेश सभी धर्म वाले लोगों को धार्मिक भावनाओं का नाजायज फायदा उठाते रहे हैं. रास्तों और गोलचक्करों पर कई मसजिदें और अनजान पीरफकीरों की मजारें भी बनी हुई मिल जाएंगी.

खुले स्थानों पर बनवाए धर्मस्थल भी अकसर संचालकों की मिलबांट और पुजारी परिवार के विस्तार के ही साधन बनते हैं. ये लोग जनता से बटोरे धन से कमरे आदि बनवा कर न सिर्फ अपने पूरे कुनबे को इन में बसा लेते हैं व मुफ्त का चढ़ावा खाते हैं, बल्कि दुकानें बनवा कर उन का किराया भी वसूल करते हैं.

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