“अमिताभ के बिना ‘सरकार’ नहीं”

अमिताभ बच्चन और राम गोपाल वर्मा ने हमेशा एक दूसरे के साथ ‘सरकार 3’ में काम करने की ख्वाहिश जाहिर की है और बहुत वक्त से कयास लग रहे थे कि ‘सरकार 3’ कब शुरू होगी.

अब राम गोपाल वर्मा ने इस बात को माना है कि अगले महीने से वो अमिताभ के साथ ‘सरकार 3’ की शूटिंग शुरू करेंगे. निर्देशक राम गोपाल वर्मा की फिल्में लाइन से फ्लॉप हो रही थी अब ये उनके लिए एक बड़ा मौका है जिससे वो अमिताभ के साथ अपनी हिट सीरीज के साथ वापसी कर सकेंगे. रामू का ये भी मानना है अमिताभ के बगैर ‘सरकार’ कभी नहीं बन सकती. हॉलीवुड की सुपर हिट फिल्म ‘गॉड फादर से प्रेरित है ‘सरकार’.

पहली ‘सरकार’ और दूसरी ‘सरकार’ में अमिताभ के अलावा अभिषेक बच्चन बेहद दमदार भूमिका में दिखे थे लेकिन दूसरे पार्ट में उनके किरदार की मौत हो जाती है. तो देखना दिलचस्प होगा ‘सरकार’ का जानशीन कौन अभिनेता निभाएगा. वैसे सुशांत सिंह राजपूत और रितिक रोशन के नाम की चर्चा थी, लेकिन ये तो तय है कि अमिताभ बच्चन एंग्री ओल्ड मैन के तौर पर दिखेंगे.

गर्भ मेरा मरजी मेरी

बलात्कार की शिकार एक गरीब औरत को 20 सप्ताह की कानूनी इजाजत की हद के बाहर 24वें सप्ताह में गर्भपात कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा. गनीमत है कि उस का मामला हजारों मामलों की तरह दबा नहीं रह गया और 2 दिन में ही फैसला हो गया, जिस से उसे अनचाहे गर्भ से छुटकारा मिल गया.

पर देश की हजारों औरतें हर साल इस तरह से पीडि़त होती हैं. बलात्कार या मरजी से हुए गर्भ को गिराने का फैसला अबोध किशोरियां व युवतियां हफ्तों तक नहीं ले पातीं. कुछ को तो मालूम ही नहीं होता कि सैक्स के कारण वे गर्भवती हो गई हैं. जब तक घर वालों को पता चलता है, तब तक देर हो चुकी होती है और डाक्टर गर्भपात करने से मना कर देते हैं. ऐसे में मोटी फीस दे कर चुपचाप गर्भपात कराना होता है या फिर नौसिखियों के हवाले खुद को छोड़ देना होता है.

कुछ औरतें बारबार गर्भपात कराती हैं, क्योंकि या तो वे खुद उन्मुक्त सैक्स चाहती हैं या फिर बिंदास हो चुकी होती हैं और गर्भपात को मासिक क्रम सा समझने लगती हैं.

गनीमत है कि भारत उन देशों में से है, जहां गर्भपात का कानून काफी उदार है. अमेरिका आज भी आधुनिक होते हुए गर्भपात पर नाकभौं चढ़ाता रहता है और वहां का शक्तिशाली चर्च प्रोलाइफ यानी गर्भ के बच्चे के जीवन के हक की बात जोरशोर से सड़कों, विधान सभाओं और अदालतों में करता रहता है.

गर्भ में जो है उस की मालकिन औरत और सिर्फ औरत है. उस गर्भ पर न तो धर्म, न समाज न सरकार और न ही उस पुरुष की जिस की वजह से गर्भ हुआ, कोई हक है. यह फैसला उस औरत का अपना है चाहे जो भी जोखिम हो. गर्भ में पल रहे भू्रण का कानूनी दर्जा क्या है या लिंग क्या है, यह जानने का भी उसे ही हक है और जब तक वह खुली हवा में सांस नहीं ले लेता उस औरत की संपत्ति है, उस युवती का फैसला है.

सुप्रीम कोर्ट के पास तो अवसर था कि बजाय डाक्टरों का पैनल बनवाने के वह आदेश देती कि हर मामले में फैसला केवल औरत और उस के डाक्टरों का होगा और डाक्टर अपनी सुविधा के लिए अल्ट्रासाउंड मशीनें लगाएं या सक्शन मशीन, यह उन की अपनी मरजी है. डाक्टर को गलती के लिए दोषी ठहराया जा सकता है, गर्भपात करने या गर्भ में भू्रण के लिंग को पहचानने के लिए नहीं. औरतों ने नाहक ही धर्म या मानवता की आड़ में अपने हक कमजोर कराए हैं.

इन के जज्बे को सलाम

जयललिता और ममता बनर्जी के बाद उत्तर प्रदेश में अनुमान लगने लगा है कि अगले साल के चुनावों में बाजी मायावती के हाथों में रहेगी. मायावती जीतेंगी या नहीं, यह तो बात दूसरी है पर एक बात इन तीनों में सामान्य है कि ये तीनों ही किसी पुरुष के समर्थन की मुहताज नहीं हैं. होने को तो कई महिला मुख्यमंत्री हुई हैं और आज भी हैं वसुंधरा राजे पर वे अकेले अपने दमखम पर नहीं हैं.

ममता बनर्जी, जयललिता और मायावती तीनों ने सिद्ध किया है कि वे बिना पुरुष छत्रछाया के राजनीति जैसे दुरूह और पैतरे वाले क्षेत्र में भी सफल हो सकती हैं और वह भी बिना यह कहे कि वे आधी आबादी औरतों पर निर्भर हैं. इन तीनों की राजनीति अन्य पुरुष राजनीतिबाजों की तरह नीतियों और फैसलों पर चलती है और ये रोजमर्रा के आक्रमणों, रोज की समस्याओं, टूटतेजुड़ते लोगों के हेरफेर को सहन कर लेती हैं.

इन तीनों को गद्दियां विरासत में नहीं मिलीं, इन्होंने छीनी हैं. इन्होंने अरसे से चल रही पार्टियों को हरा कर जीत हासिल की है. ये जब सत्ता से बाहर थीं तो भी इन्होंने हिम्मत नहीं हारी और पगपग पर खतरों का सामना करा. यह कहानी अब घरघर में दोहराई जा सकती है. लाखों घर ऐसे हो गए हैं, जिन्हें औरतें अपने बल पर चला रही हैं. वे इन तीनों महिला नेताओं की तरह पुरुष शक्ति से लड़ कर सुखी जीवन जी रही हैं बेचारगी का नहीं. उन्हें अब भाई, पिता या बेटों का सहारा नहीं चाहिए.

आधुनिक शिक्षा की सब से बड़ी देन यही हुई है कि अब औरतों को वह सब पता है, जो आदमियों को पता है और वे हर उस जगह जा सकती हैं जहां आदमी जाते हैं. केवल इसलामी देशों को छोड़ कर दुनिया भर की औरतें आज मायावती की तरह सत्ता की डोर पाने को तैयार हैं. फिर चाहे सत्ता की हो, घर की हो, दुकान की हो, व्यवस्था की हो, पूरे राज्य की हो अथवा देश की.

जरमनी की ऐंजेला मार्केल अपने बलबूते यूरोप की सब से शक्तिशाली नेता हैं. हिलेरी क्लिंटन अगर राष्ट्रपति बनती हैं, तो बिल क्लिंटन की वजह से नहीं बनेंगी, उन के बावजूद बनेंगी. जरूरत हिम्मत की है, जरूरत संकल्प की है, जो हर स्त्रीपुरुष में बराबर हो सकता है. जरूरत सामाजिक गठन है, जो स्त्रीपुरुष पर बंधन नहीं लगाता या बराबर का बंधन लगाता है. जैंडर आज के युग में निरर्थक होता जा रहा है.

मायावती और हिलेरी क्लिंटन जीतें या न जीतें, उन का नाम रेस में पहले नंबर पर होना ही काफी है.

 

टीवी शो ‘साथिया’ की एक्ट्रेस के साथ छेड़छाड़

मशहूर टीवी शो साथ निभाना साथिया की एक्ट्रेस के साथ छेड़छाड़ का मामला सामने आया है. स्टार प्लस पर आने वाले इस शो में नाइया का किरदार निभाने वाली प्रतिभा तिवारी ने इस मामले में एफआईआर भी दर्ज कराई है. यह घटना मुंबई की हैं जहां शराब के नशे में धुत एक आदमी ने उनसे बुरा बर्ताव किया. घटना के वक्त प्रतिभा अपने हेयरड्रेसर के साथ कांदिवली हाईवे से गुजर रही थीं.

प्रतिभा ने बताया कि वो अपने एक साथ की इंतजार कर रहे थे. इसी समय उस शख्स ने आकर उनसे बात करने की कोशिश की. इस दौरान उसने कुछ अभद्र व्यवहार किया. इसके बाद प्रतिभा उसे सीधे पास के पुलिस स्टेशन लेकर गईं और एफआईआर दर्ज कराई. इसके बाद अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत करते हुए एक्ट्रेस ने कहा, दूसरी महिलाओं को भी इस तरह के हालात में ऐसा ही करना चाहिए. यह हैरानी की बात है कि शहर की इतनी बिजी सड़क पर इस तरह की घटना हुई.

बता दें कि प्रतिभा को पहली बार पहचान टीवी सीरियल तुझसे नाराज नहीं जिंदगी से मिली थी. वो स्टार पर आने वाले शो बदतमीज दिल में नजर आई थीं. इसके साथ ही उन्होंने कुछ कमर्शियल ऐड्स में भी काम किया है. फिलहाल प्रतिभा साथ निभाना साथिया सीरियल में नाइया का रोल कर रही हैं. यह किरदार नेगेटिव शेड का है. साथ निभाना साथिया सीरियल स्टार प्लस का सबसे लंबा चलने वाला शो है. इस सीरियल में प्रतिभा अमर उपाध्याय की बेटी के रोल में हैं.

बॉलीवुड में है राम की कमी

रोहित शेट्टी और करण जौहर की राम लखन रीमेक की चर्चा हमेशा जोरों पर रही है. लेकिन हाल ही में खबर आई थी कि फिलहाल के लिए फिल्म को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है और रोहित शेट्टी दूसरे प्रोजेक्ट्स पर ध्यान दे रहे हैं.

जब रोहित शेट्टी से एक प्रमोशनल इवेंट पर ये सवाल पूछा गया तो उन्होंने मजेदार तरीके से बताया कि राम लखन रीमेक कैंसिल हो गई क्योंकि पूरे बॉलीवुड को केवल लखन बनना था. राम का रोल कोई करना ही नहीं चाहता था. अब केवल लखन को लेकर मैं कैसे फिल्म बना लेता.

खबर थी कि रणवीर सिंह और शाहिद कपूर इस प्रोजेक्ट के लिए फाइनल कर लिए गए हैं. करण जौहर फिल्म को प्रोड्यूस कर रहे थे. फिल्म का आखिरी ऑफर वरूण धवन के पास गया था, जिसे वरूण के रिजेक्ट करते ही फिल्म डिब्बाबंद मानी जा रही थी. लेकिन फिर रणवीर सिंह और शाहिद कपूर का नाम सामने आया और फैन्स खुश हो गए.

शाहिद कपूर और रणवीर सिंह की ऑफ स्क्रीन केमिस्ट्री जबर्दस्त है जो कई फिल्मों में दिख चुकी है ऐसे में दोनों को साथ भाईयों का किरदार निभाते देखना काफी दिलचस्प था. फिल्म में शाहिद कपूर को राम का रोल दिया गया था. हालांकि इससे पहले जब फिल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा और वरूण धवन का नाम आ रहा था तो जैकी ने माना था कि सिड ही उनका रोल बेस्ट निभाएंगे.

अनिल कपूर एक दफे नहीं हज़ार बार कह चुके हैं कि उनका कोई भी रोल रणवीर से अच्छा कोई और नहीं निभा सकता. और शायद ये भी कारण हो कि रणवीर के लखन बनने की वजह से कोई राम नहीं बन रहा हो.

हालांकि सिड और वरूण से पहले इस फिल्म में बॉलीवुड के सबसे हैपेनिंग कपल अर्जुन कपूर और रणवीर सिंह के होने की बात थी. यहां तक कि फैन्स ने तो पोस्टर तक बना डाले थे. लेकिन अब रोहित ने कंफर्म किया कि चू्ंकि सबको अनिल कपूर वाला रोल चाहिए था, फिल्म बंद हो गई.

ऐसा ही कुछ हुआ है हाल की कुछ फिल्मों के साथ, जिनके बारे में बस बातें होती हैं पर ये फिल्में बनती ही नहीं.

मुन्नाभाई चले अमरीका

फिल्म का पहला टीजर 3 इडियट्स के साथ आया था और तब से ये फिल्म बन रही है या इस पर काम चल रहा है. खैर अब जब बाबा आ ही गए हैं तो उम्मीद है कि फिल्म भी बन ही जाएगी.

ठग

ऋतिक रोशन और दीपिका पादुकोण यशराज फिल्म्स की इस फिल्म में काम करने वाले थे. फिर अमिताभ बच्चन को फिल्म में जोड़ा गया. इसके बाद से स्टार्स के फिल्म छोड़ने की खबर आ रही है पर फिल्म नहीं बन पा रही है. अब सुनने में आया है कि फिल्म में आमिर खान हैं.

एके Vs एसके

अनुराग कश्यप बॉम्बे वेलवेट के साथ जो कांड हुआ उसे लेकर सच में फिल्म बनाने वाले थे. शाहिद कपूर कास्ट हो गए, मीरा राजपूत का कैमियो डिसाइड हो गया पर फिल्म पता नहीं कहां गायब हो गई.

नमस्ते इंग्लैंड

हालांकि विपुल शाह का कहना है कि नमस्ते इंग्लैंड बन रही है लेकिन जबसे फिल्म का अनाउंसमेंट हुआ है, फिल्म के बारे में दूसरी कोई खबर किसी को नहीं मिली है.

हसीना

सोनाक्षी सिन्हा, दाउद इब्राहिम की बहन हसीना शेख की इस बायोपिक में फाइनल थीं. लेकिन सोना इस फिल्म के लिए डेट ही नहीं दे पा रही हैं और फिल्म लटकी है. अब माना जा रहा है कि फिल्म को श्रद्धा कपूर कर रही हैं.

बैंक चोर

यशराज फिल्म्स की इस फिल्म में कपिल शर्मा को फाइनल किया गया पर वो तीन फिल्म के कॉन्ट्रैक्ट में नहीं बंध पा रहे थे. फिर रितेश देशमुख ने उन्हें रिप्लेस किया. अब फिल्म का क्या हाल है पता नहीं.

 सेक्शन 84

यह फिल्म पहले सलमान खान प्रोडक्शन्स फाईनेंस कर रही थी लेकिन बजट को लेकर बहस के बाद इरोज़ इंटरनेशनल इस फिल्म को प्रोड्यूस कर रही थी. लेकिन मानसिक रोगी के किरदार को हां करने के बाद करीना ने फिल्म छोड़ दी.

मिस्टर चालू

फिल्म के लिए सब कुछ फाइनल है. लेकिन रीमा कागती की इस फिल्म पर जाने क्या ग्रहण लगा है कि फिल्म शुरू ही नहीं हो पा रही है.

रुस्तम के कारण नहीं बनी आमिर की फिल्म

हाल ही में आई अक्षय कुमार की फिल्म रुस्तम चर्चा में है. ये 1959 के केएम नानावटी केस पर आधारित है. इसी केस पर फिल्म बनाने के लिए आमिर खान भी लंबे समय से रिसर्च कर रहे थे.

इस फिल्म का निर्देशन राम माधवानी करने वाले थे. फिल्म के सिलसिले में लंदन में रह रहीं नानावटी की पत्नी सिल्विया से भी बात की गई थी. लेकिन जब अक्षय की ‘रुस्तम’ और पूजा भट्ट की ‘लव अफेयर’ की घोषणा हुई तो निर्मताओं ने इस फिल्म को बनाने का ख्याल छोड़ दिया.

सूत्रों के अनुसार, ‘आमिर इस केस पर फिल्म बनाने के लिए बेहद उत्सुक थे. उन्होंने इसके बारे में बेहद गहराई से अध्ययन किया. आमिर ने इसके निर्देशन के लिए राम माधवानी को उपयुक्त पाया था. जब उनकी फिल्म नीरजा बेहद सफल रही तो उन्हें लगा कि माधवानी इस विषय के साथ न्याय कर सकते हैं. दोनों ने बाद में लंदन जाकर मिसेस नानावटी से बात की. उन्होंने भी इसमें खासी रुचि दिखाई. लेकिन जब नीरज पांडे इसी विषय पर बनने वाली फिल्म के लिए अक्षय कुमार को बोर्ड पर लाए तो आमिर का सारा उत्साह गायब हो गया.’

इतना ही नहीं कुछ ही दिनों बाद सोनी राजदान और पूजा भट्ट ने भी इसी केस पर फिल्म लव अफेयर की घोषणा कर दी. एक अन्य सूत्र कहते हैं कि आमिर की फिल्म पर रिसर्च कर रहे लोगों ने जब रुस्तम देखी तो वे बेहद निराश हुए.

उनकी स्टोरी लाइन इससे अलग थी. उनके अनुसार रुस्तम में इस केस का बहुत छोटा हिस्सा दिखाया गया है.

कमल हासन को पुरस्कृत करेगी फ्रांस सरकार

फिल्म अभिनेता और निर्माता कमल हासन को फ्रांस सरकार अपने प्रमुख पुरस्कार से नवाजेगी. उन्हें ‘द नाइट ऑफ द ऑर्डर ऑफ आर्ट्स एंड लेटर्स’ से पुरस्कृत किया जाना है.

हासन के एक बयान में कहा है, ‘यह सम्मान किसी अभिनेता के लिए एक और पुरस्कार है, और यह उसके उच्चस्तर की कलात्मक विशिष्टता एवं उसकी असाधारण उपलब्धियों की मान्यता है. एक विशेष समारोह में कमल हासन को पुरस्कृत किया जाएगा.’

यह पुरस्कार प्रसिद्ध कलाकारों एवं लेखकों के साथ-साथ वैसे लोगों के काम को मान्यता प्रदान करने के लिए दिया जाता है, जिन्होंने फ्रांस और पूरी दुनिया में कला को आगे बढ़ाने में उल्लेखनीय योगदान किया है.

इस पुरस्कार को पाने वाले अन्य अभिनेताओं में दिवंगत तमिल अभिनेता शिवाजी गणेशन, अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्य राय बच्चन, नंदिता दास और शाहरुख खान शामिल रहे हैं.

महाराष्ट्र में धोनी की फिल्म पर लगा बैन!

लंबे वक्त से टीम इंडिया के सबसे सफल कैप्टन महेन्द्र सिंह धोनी की लाइफ पर बनी फिल्म का  इंतजार हो रहा है. देश के इस रीयल स्टार की लाइफ को जानने को हर कोई बेताब है जिसमें आम से लेकर खास लोग शामिल हैं लेकिन ऐसा भी कोई है जिसे इस फिल्म पर एतराज है.

हम बात कर रहे हैं मनसे प्रमुख राज ठाकरे की, जिनका गुस्सा इस बार धोनी की बॉयोपिक फिल्म ‘एम एस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी’ पर फूटा है. उन्हें धोनी पर नहीं धोनी की फिल्म पर गुस्सा आ रहा है क्योंकि इस फिल्म को हाल ही में मराठी भाषा में डब किया गया है. जिसका विरोध करते हुए राज ठाकरे ने कहा कि मराठी डबिंग से मराठी सिनेमा को खतरा है.

इसलिए मनसे मनसे की चित्रपट शाखा ने कहा है कि मराठी में डब की गई फिल्म को सिनेमाघरों में प्रदर्शित नहीं किया जायेगा. मनसे का कहना है कि अगर इसी तरह से फिल्मों की डबिंग की जाती रही तो एक दिन मराठी सिनेमा बंद हो जायेगा इसलिए हम ‘एम एस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी’ को मराठी सिनेमाघरों में रिलीज नहीं होने देंगे.

हम पहले हम पहले फिल्म निर्माता नीरज पांडे से निवेदन करेंगे कि वे इस फिल्म का मराठी डब संस्करण प्रदर्शित ना करें अगर वो मान गये तो ठीक वरना आंदोलन होगा.

गर्भावस्था कोई बीमारी नहीं

हमारे समाज के लोग भी बड़े अजीब हैं. उन की अपने से ज्यादा दूसरों के मामले में ताकनेझांकने में रुचि होती है. एक उदाहरण देखिए. जैसे ही किसी लड़की के विवाह की उम्र होने लगती है, लोग उस से यह पूछपूछ कर उसे परेशान कर देते हैं कि शादी कब कर रही हो? कब सैटल हो रही हो? अगर किसी तरह इन सवालों से पीछा छुड़ाने के लिए वह शादी कर ले, तो वे यह नया राग अलापना शुरू कर देते हैं कि खुशखबरी कब सुना रही हो? अरे भई, उसे अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने का तो मौका दीजिए. अपनी जिंदगी में लोगों के पास अपने लिए सोचने लायक क्या कुछ भी नहीं है?

विवाह के बाद अगर लोगों को यह पता चल जाए कि वह मां बनने वाली है, तो सच मानिए वे अपनी नसीहतों का पुलिंदा देदे कर उसे पूरी तरह पका देंगे और अच्छेभले इनसान को बीमार बना देंगे.

गर्भावस्था कोई बीमारी नहीं

दरअसल, हम बात कर रहे हैं गर्भावस्था के दौरान मिलने वाली ऐक्सपर्ट ऐडवाइजेज की. अरे भई, गर्भावस्था कोई बीमारी थोड़े न है, जो लोग बिना मांगे अपनी ऐक्सपर्ट हिदायतें दे कर अच्छीभली महिला को जिस के लिए मातृत्व एक सुखद अनुभव होना चाहिए, उसे बीमार बना दें. आम लोगों के साथ तो ऐसा ही होता है. लेकिन जब ऐसा ही कुछ फिल्म अभिनेत्री करीना कपूर के साथ हुआ और बारबार उन की प्रैगनैंसी पर मीडिया के अटैंशन के कारण जब उन की बरदाश्त करने की सीमा खत्म हो गई तो उन्होंने जम कर अपनी भड़ास निकाली और गुजारिश की कि मीडिया उन की प्रैगनैंसी को नैशनल कैजुअलिटी इशू न बनाए.

मुंहतोड़ जवाब

दरअसल, करीना इन दिनों प्रैगनैंसी के बावजूद रिया कपूर की फिल्म ‘वीरे दी वैडिंग’ की शूटिंग कर रही हैं. इस बात पर जब उन से पूछा गया कि वे मैटरनिटी लीव क्यों नहीं ले रहीं, तो यह सुनते ही उन्हें गुस्सा आ गया जो वाजिब भी था.

वे गुस्से में बोलीं, ‘‘मैं प्रैगनैंट हुई हूं, मरी नहीं हूं और किस बात की मैटरनिटी लीव? बच्चा पैदा करना इस दुनिया में नौर्मल बात है. मुझे उस से अलग दिखाना बंद करें. जिसे परेशानी है वह मेरे साथ काम न करे. लेकिन मेरा काम हमेशा की तरह चलता रहेगा. हम 21वीं सदी में जी रहे हैं 18वीं में नहीं. लोगों के लिए मेरा मैसेज है कि शादी करना या फैमिली बढ़ाना मेरे कैरियर के आड़े नहीं आ सकता.’’

वाह करीनाजी, आखिर आप ने एक आम महिला की समस्या को समझा और उस का मुंहतोड़ जवाब दिया.

आप को बता दें जिस तरह करीना कपूर ने अपनी अपकमिंग फिल्म ‘वीरे दी वैडिंग’ की शूटिंग को जारी रखने का फैसला किया है, उसी तरह फिल्म इंडस्ट्री में अनेक हीरोइनें हुई हैं, जिन्होंने अपनी प्रैगनैंसी के दौरान बेबी बंप के साथ अपना काम जारी रखा था. काजोल ने ‘वी आर फैमिली’ की शूटिंग प्रैगनैंसी के दौरान की थी. जूही चावला फिल्म ‘झंकार’ की शूटिंग के दौरान 7 महीने की गर्भवती थीं. नंदिता दास जिस समय निर्माता ओनीर की फिल्म ‘आई एम’ की शूटिंग कर रही थीं, तो वे 5 महीने की गर्भवती थीं. अभिनेत्री जया बच्चन फिल्म ‘शोले’ की शूटिंग के दौरान 3 महीने की गर्भवती थीं.

गर्भावस्था में भी शूटिंग

जो लोग गर्भावस्था को कैजुअलिटी इशू बना देते हैं उन्हें यह बता दें कि गर्भावस्था कोई बीमारी नहीं है. यह एक सुखद एहसास है और इस अवधि में एक महिला की खुश और फिट रहना चाहिए न कि खुद को बीमार मान कर सारे कामकाज छोड़ कर बैठ जाना चाहिए. बेवजह की शंकाओं से खुद को डिप्रैस नहीं करना चाहिए, क्योंकि आने वाले बच्चे का स्वास्थ्य व भावनात्मक स्थिति गर्भवती महिला के स्वास्थ्य व मूड पर निर्भर करती है.

बेकार की नसीहतें

गर्भावस्था किसी भी महिला के शारीरिक और भावनात्मक दोनों तरह के परिवर्तनों का कारण बनती है और कोई भी महिला किसी भी स्थिति में इन बदलावों के लिए पूरी तरह से तैयार होती है. अपने बच्चे के बारे में एक मां से बेहतर और कोई नहीं सोच सकता. लेकिन जैसे ही कोई महिला गर्भवती होती है, लोग सलाह या नसीहतें देना शुरू कर देते हैं कि ऐसे न बैठो, यह न खाओ, वह न खाओ, ज्याद काम न करो, आराम करो आदि. ऐसे में गर्भवती महिला की समझ में नहीं आता कि वह इन बातों को माने या नहीं, क्योंकि कई बार ऐसी सलाह अटपटी या उलझन पैदा करने वाली भी होती है.

वैज्ञानिक सोच अपनाएं

गर्भवती महिला को इन दिनों तनाव से दूर रहना चाहिए. लेकिन बारबार की रोकटोक उसे चिंता में डाल देती है. सचाई यह है कि इन में से ज्यादातर नसीहतें सुनीसुनाई बातों पर या अंधविश्वास पर आधारित होती हैं, जिन का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता. कुछ लोग तो महिला की चालढाल और उस के खानेपीने की आदतों को देख कर यह भी अनुमान लगाना शुरू कर देते हैं कि होने वाला बच्चा लड़का होगा या लड़की? गर्भावस्था में अधिक से अधिक आराम करना चाहिए वाली सोच बिलकुल गलत है. अमेरिका में हुए एक शोध के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान सक्रिय रहने वाली महिलाओं में बेचैनी की शिकायत कम होती है और उन्हें प्रसव के दौरान भी कम परेशानी का सामना करना पड़ता है.               

झोली भरने का जुगाड़ है दान

एक भिखारी रोज की तरह भीख मांगने निकला. शगुन के तौर पर 1 मुट्ठी जौ अपनी खाली झोली में डाल कर निकला. रास्ते में उस ने राजा की सवारी आते देखी. उसे अच्छी भीख की उम्मीद बंधी. लेकिन यह क्या? भिखारी के सामने राजा ने खुद अपनी झोली फैला दी. भिखारी क्या करता, कुछ समझ नहीं आ रहा था. वह तो खुद दूसरों से भीख लेता था. आज राजा ने भीख के लिए अपनी झोली उस के सामने फैला दी.

आखिर उस ने अपनी झोली में हाथ डाला और मन मार कर जौ के 2 दाने निकाल कर राजा की झोली में डाल दिए. लेकिन सारा दिन उसे जौ के 2 दाने चले जाने का मलाल सालता रहा. बहरहाल, सारा दिन घूमघूम कर भीख मांगने के बाद भिखारी घर लौटा. जब उस ने अपनी झोली को पलटा तो हैरानी से उस की आंखें खुली की खुली रह गईं. दान में मिली चीजों के साथ झोली से जौ के 2 सोने के दाने भी मिले. वह पछताने लगा, काश, उस ने मुट्ठी भर कर जौ राजा की झोली में डाल दिए होते. किस्से की सीख : दान की महिमा.

दानवीर कर्ण का भी किस्सा है. दान ने ही कर्ण के प्राण ले लिए. महाभारत के युद्ध में अर्जुन की रक्षा के मद्देनजर देवराज इंद्र ने कर्ण से उस का कवच दान में मांग लिया था.

हालांकि बदले में इंद्र ने कर्ण को 5 तीर दिए. लेकिन कृष्ण ने कुंती को भेज कर वे पांचों तीर मंगवा लिए. इसी दानी स्वभाव के कारण कर्ण की मौत हुई वरना कर्ण अर्जुन से भी बड़ा योद्धा था और महाभारत के युद्ध में इस तरह मारा नहीं जाता.

दानदक्षिणा की बात की जाए और एकलव्य का जिक्र न हो, यह भला कैसे हो सकता है. निषाद पुत्र होने के कारण द्रोणाचार्य ने एकलव्य को अपना शिष्य बनाने से मना कर दिया. तब एकलव्य ने दूर से देखदेख कर धनुष चलाना सीखा और वन में द्रोणाचार्य की मूर्ति बना कर धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा. जल्द ही वह इस विद्या में निपुण हो गया. एक दिन द्रोणाचार्य के आगे एकलव्य की धनुर्विद्या उजागर हुई. अर्जुन की तुलना में एकलव्य की धनुर्विद्या के प्रति निष्ठा और पारंगतता से द्रोणाचार्य कांप गए और उन्होंने उस से गुरुदक्षिणा में अंगूठा मांग लिया ताकि अर्जुन के अलावा और कोई धनुर्विद्या में पारंगत न रहे. यह और बात है कि एकलव्य ने तर्जनी और मध्यम उंगली से तीर चलाने का अभ्यास करना शुरू कर दिया. लेकिन यह कितनी अजीब बात है कि एकलव्य को बगैर कुछ सिखाए द्रोणाचार्य ने दक्षिणा में उस का अंगूठा मांग लिया.

दान परंपरा की शुरुआत

वैसे सनातन हिंदू धर्म में हैं तो कई कर्मकांडी ढकोसले, पर दानदक्षिणा इन सब में सब से बड़ा ढकोसला है. हिंदू धर्म में दान को महापुण्य बताया गया है. वेदों में भी दान की महिमा का तरहतरह से बखान किया गया है. ऋग्वेद के 10वें अध्याय के 117 विभिन्न सूक्तों में दान की महिमा का वर्णन है. अर्थवेद के तीसरे अध्याय में भी सहस्र हाथों से दान करने की बात की गई है. ऐतरेय ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण, मनुसंहिता में ब्राह्मण की महत्ता और दान से प्राप्त होने वाले पुण्य का बखान भरा पड़ा है. पर यह सब धन कमाने और बटोरने की ब्राह्मणों की जुगत है. इन का दरअसल, धर्म से कुछ खास लेनादेना नहीं है.

दान परंपरा की शुरुआत इसीलिए हुई, क्योंकि वर्णव्यवस्था में सब से ऊपर रहने के बावजूद आर्थिक रूप से ब्राह्मणों की स्थिति अच्छी नहीं थी. उन के बुरे दिन चल रहे थे. तब ब्राह्मणों ने अपनी रोजीरोटी और आजीविका के लिए दान परंपरा की शुरुआत की. इस के लिए तरहतरह के धार्मिक पाखंड रचे गए. बताया जाता है कि कृष्ण का द्वापर युग बहुत हद तक ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ था. अनुभव, ज्ञान और कौशल के कारण कृष्ण की व्यवस्था में वृद्धों का महत्त्व कहीं अधिक था. इसलिए एक आख्यान के अनुसार द्वारिका का निर्माण कृष्ण ने विश्वकर्मा से कराया था और विश्वकर्मा को हमेशा वृद्ध के रूप में प्रदर्शित किया जाता है.

कलयुग का हौआ

इतिहासकार आर.एन. नंदी कहते हैं कि चौथी सदी के आरंभ से ले कर 5वीं सदी के अंत तक ब्राह्मणों ने पुरोहिताई, दानदक्षिणा के अलावा आजीविका के और नएनए रास्ते तलाशने शुरू किए. इस दौरान ब्राह्मणों ने नए सिरे से जजमान (यजमान) बनाना शुरू किया.

स्वरोजगार के कई तरीके ईजाद किए, जो दरअसल में गैरपरंपरावादी तरीके से हट कर थे. जीविका निर्वाह के नएनए तरीके फलित ज्योतिष, भविष्य कथन आदि तरीके ढूंढ़े गए.

शूद्रों पर अलग से धार्मिक कर्मकांड थोपे गए. इसी दौरान वेदाध्ययन, मूर्तिपूजा शुरू हुई. इसी कड़ी में तीसरी से 5वीं सदी के बीच पुराण साहित्य रचे गए. इन में विष्णु पुराण, वायु पुराण और मत्स्य पुराण विशेष उल्लेखनीय हैं. इन पुराणों में दान की महत्ता और दान संबंधी कर्मकांडों का बढ़चढ़ कर उल्लेख किया गया. इन सब के पीछे ब्राह्मणों का मकसद धर्म और कर्मकांड से विरक्त रहने वाले यजमानों को पाप का भय दिखा कर उन से पीछा छुड़ाने का उपाय सुझा कर अपने लिए जीवन निर्वाह का साधन जुटाना था. अपने इसी उद्देश्य के मद्देनजर कलियुग का हौआ फैलाया गया और कहा गया कि इस युग में पुण्य स्वत: कम हो जाएंगे और पाप की वृद्धि होगी. पातकों के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए दानपुण्य करने की बात कही गई.

इसी तरह अक्षय तृतीया या आखा तीज को दान के लिए ही जाना जाता है. ब्राह्मणों ने लोगों के दिमाग में यह बात ठूंस दी है कि अक्षय तृतीया के दिन किए गए दान का कभी क्षय नहीं होता है. इसी परंपरा के तहत बड़े पैमाने पर कन्यादान की परंपरा चल पड़ी. इस परंपरा ने बालविवाह का चलन भी शुरू किया. अक्षय तृतीया के दिन राजस्थान समेत उत्तर भारत में बड़े पैमाने पर बाल विवाह होते हैं.

दानदक्षिणा की महिमा

बहरहाल, दान की महिमा पर एक नजर डाल ली जाए. इस की लंबी सूची है. यही नहीं सूची में श्रेष्ठ दान के ढेर सारे स्तर बताए गए हैं. गोदान को श्रेष्ठ दान बताया गया है.

इस के बाद अन्नदान, वस्त्रदान, स्वर्णदान और भूमिदान भी है. धर्मशास्त्रों में अष्टदान की बात कही गई है. अष्टदान के अंतर्गत तिल, लोहा, सोना, कपास, नमक, सप्तधान, भूमि और गोदान को शामिल किया गया है.

अष्टदान की महिमा इस तरह बताई गई है. तिल के दान से असुर, दैत्य और दानव तृप्त होते हैं. लोहे के दान से यम प्रसन्न होते हैं. सोने के दान से धर्मराज की सभा के ब्रह्मादि देवता और ऋषिमुनि प्रसन्न होते हैं. स्वर्ण दान से स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है. कपास के दान से यम का दूत प्रसन्न होता है. नमकदान से यम का भय जाता रहता है. चावल, जौ, गेहूं, उरद, चना जैसे सप्तधान से यमलोक में संतोष की प्राप्ति होती है. भूमिदान से स्वर्ग का द्वार खुल जाता है. गोदान से स्वर्ग की नदी वैतरणी पार कर के मोक्ष प्राप्त होता है.

सिर्फ इतना ही नहीं, अगर ब्राह्मण की अकाल मौत हो जाए तो ब्राह्मण की बेटी का कन्यादान अपना दायित्व समझ कर कराना चाहिए. कोई सर्पदंश से मर गया हो तो ब्राह्मण को सोने का सांप बना कर देना चाहिए. हाथी से मौत होने पर स्वर्ण हाथी, राजा द्वारा मृत्यु हो जाने पर स्वर्ण पुरुष, शत्रु ने मार डाला हो तो स्वर्ण बैल, शैया पर मृत्यु हुई हो तो स्वर्ण विष्णु, सूअर ने मार डाला हो तो भैंस दान, पेड़ की वजह से मौत होने पर वस्त्र, अन्नदान के साथ स्वर्ण वृक्ष दान देने का शास्त्र प्रावधान किया गया है. पर्वत की चोटी से गिर कर मौत हुई हो तो अनाज का पहाड़ बना कर दान करने का विधान बताया गया है. आग से जल कर मृत्यु होने पर यथाशक्ति कुआं खोद कर ब्राह्मण को उत्सर्ग करने की बात कही गई है.

कहा गया है कि जो मनुष्य परलोक में अक्षय सुख की अभिलाषा रखता है, उसे अपने लिए संसार या घर में जो वस्तु सर्वाधिक प्रिय है, उसे गुणवान ब्राह्मण को दान करना चाहिए, जो सामान्य किस्म का दान है, उसे किसी को भी दान कर के पुण्य कमाया जा सकता है. मिसाल के तौर पर विद्यादान, कन्यादान, जलदान से तृप्ति, अन्नदान से कभी न खत्म होने वाले सुख की प्राप्ति होती है. तिलदान से संतान की प्राप्ति, दीपदान से आंखें नीरोग रहने की बात कही गई है.

दान देने की सीख के पीछे बहुत सारे लोचे हैं. कुल मिला कर आशय यह है कि जीतेजी ही नहीं, मरने के बाद भी ब्राह्मणों की ही सुखसुविधा का ध्यान रखने की बात तमाम धर्मग्रंथ कहते हैं और कुछ नहीं तो पिता के मरने के बाद बेटे के लिए दशक्रिया का नियम बना कर पिता के ऋण से मुक्ति का रास्ता बताया गया है. पिंडदान के साथ 5 या 7 या 9 ब्राह्मणों को दानदक्षिणा देने के नाम पर उन के लिए जीने के तमाम साधन दान में देने को कहा गया है.

बहरहाल, धर्मग्रंथों में अलगअलग तरह के दान के महत्त्व का बखान किया गया है. मसलन, भूमिदान से तमाम तरह के इच्छित फलों की प्राप्ति, स्वर्णदान से दीर्घायु होने, चांदीदान से उत्तम रूप की प्राप्ति और वस्त्रदान से चंद्रलोक, अश्वदान से अश्विनी कुमार के लोक और गोदान से सूर्यलोक की प्राप्ति, गृहदान से उत्तम घर आदि का लालच दिया गया है. इतना कुछ अगर किसी ब्राह्मण को दान में मिल जाए तो और क्या चाहिए.

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