Hum Kisise Kum Nahin- हम किसी से कम नहीं: समीर ने मानसी के साथ क्या किया?

मानसी की समीर से लैंडलाइन फोन पर रविवार की सुबह 11 बजे बात हुई. दिल्ली से मेरठ आए समीर को अपने घर का रास्ता समझने में मानसी को ज्यादा कठिनाई नहीं हुई. मानसी के मम्मीपापा उस के बीमार मामाजी का हाल पूछने गए हुए थे. उस ने अपने पापा से उन के मोबाइल पर बात कर के उन्हें समीर के आने की सूचना दे दी.

‘‘हमें लौटने में अभी करीब घंटा भर लग जाएगा. तब तक तुम समझदारी से उस के साथ बात करो और उसे नाश्ता भी जरूर करा देना,’’ हिदायत दे कर उस के पापा ने फोन काट दिया.

मानसी की मम्मी की बचपन की सहेली शीला का बेटा है समीर, जो उसी से मिलने आ रहा था. अगर वे इस पहली बार होने वाली मुलाकात में एकदूसरे को पसंद कर लेते हैं, तो यह रिश्ता पक्का होने में कोई और रुकावट नहीं आने वाली थी.

समीर 10 मिनट बाद उस के घर पहुंच गया. अपने सामने 2 सुंदर, स्मार्ट लड़कियों को देख समीर सकुचाया सा नजर आने लगा.

‘‘मैं मानसी हूं और यह है मेरी सब से अच्छी सहेली शिखा,’’ दरवाजे पर अपना व अपनी सहेली का परिचय दे कर मानसी उसे ड्राइंगरूम में ले आई. उन के बीच कुछ देर मामाजी की बीमारी, मौसम व ट्रैफिक की बातें हुईं और फिर मानसी उठ कर चाय बनाने चली गई.

शिखा ने मुसकराते हुए उसे ऊपर से नीचे तक ध्यान से देखा और फिर हलकेफुलके लहजे में कहा, ‘‘जोड़ी तो तुम दोनों की खूब जंचेगी.

तुम्हें कैसी लगी पहली नजर में मेरी सहेली?’’

‘‘मैं तो कहूंगा कि तुम दोनों सहेलियां एकदूसरे से बढ़चढ़ कर सुंदर और स्मार्ट हैं,’’ समीर ने लगे हाथ दोनों सहेलियों की तारीफ कर डाली.

शिखा खुश हो कर बोली, ‘‘तुम तो काफी समझदार इंसान लग रहे हो. अच्छा यह बताओ कि तुम अपने कैरियर से खुश हो या आगे और कोई कोर्स वगैरह करोगे?’’

‘‘इंजीनियरिंग के बाद मैं ने एमबीए कर लिया है. अब और ज्यादा पढ़ने की हिम्मत नहीं है मुझ में.’’

‘‘लेकिन मेरी सहेली अभी और पढ़ कर सीए बनना चाहती है. क्या तुम उसे आगे पढ़ने की सुविधा दोगे?’’

‘‘उसे मेरा पूरा सहयोग मिलेगा.’’

‘‘यानी आप उस की हर इच्छा पूरी करने को हमेशा तैयार रहेंगे?’’ शिखा ने बड़ी अदा के साथ सवाल किया.

‘‘बिलकुल.’’

‘‘और ऐसा करने पर

अगर लोग तुम्हें जोरू का गुलाम कहने लगे तो?’’ शिखा की खिलखिलाती हंसी ड्राइंगरूम में गूंज उठी. समीर को झेंपते देख शिखा के ऊपर हंसी का दौरा ही पड़ गया. जब उस की हंसी थमी तब समीर ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘अगर तुम बुरा न मानो तो एक बात कहूं?’’

‘‘हां, कहो.’’

‘‘तुम्हारी हंसी बहुत सैक्सी है.’’

समीर की इस टिप्पणी को सुन कर उस के गाल गुलाबी हो उठे. फिर वह फौरन संभली और नाराज होते हुए बोली, ‘‘अरे, तुम तो पहली मुलाकात में ही जरूरत से ज्यादा खुल रहे हो.’’

‘‘सौरी. प्रौब्लम यह है कि सुंदर लड़कियों को देख कर मैं जरा ज्यादा ही अच्छे मूड में आ जाता हूं,’’ समीर शर्मिंदा दिखने के बजाय शरारती अंदाज में मुसकरा रहा था.

‘‘यानी तुम सुंदर लड़कियों से फ्लर्ट करने के शौकीन हो?’’ शिखा ने भौंहें चढ़ा कर पूछा.

‘‘थोड़ाथोड़ा, पर यह बात अपनी सहेली को मत बताना.’’

‘‘मैं तो जरूर बताऊंगी.’’

‘‘तुम नहीं बताओगी.’’

‘‘यह बात इतने विश्वास से कैसे कह रहे हो?’’ शिखा ने तुनक कर पूछा.

‘‘देखो, मानसी से मेरी शादी होगी तो तुम मेरी प्रिय साली बनोगी. क्या तुम अपने भावी जीजा की चुगली कर उस के साथ अभी से संबंध खराब करना चाहोगी?’’

‘‘बातें बनाने में तो तुम पूरे उस्ताद लग रहे हो. अच्छा यह बताओ कि नौकरी कहां कर रहे हो?’’

‘‘एक मल्टीनैशनल कंपनी में.’’

‘‘कितनी पगार मिलती है?’’

‘‘कटकटा कर 60 हजार रुपये मिल जाते हैं.’’

‘‘और कितने साल से नौकरी कर रहे हो?’’

‘‘लगभग 3 साल से.’’

‘‘तब तो तुम ने बहुत माल जमा कर रखा होगा?’’

‘‘तुम्हें कभी लोन चाहिए तो मांग लेना,’’ समीर ने फौरन दरियादिली दिखाई.

‘‘लेने के बाद अगर मैं ने लोन वापस नहीं किया तो?’’

‘‘कोई बात नहीं. अपनी प्यारी सी साली के लिए लोन को गिफ्ट में बदल कर मुझे बहुत खुशी होगी.’’

शिखा ने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा, ‘‘मानसी बहुत सीधी और भोली लड़की है. मुझे नहीं लगता कि वह तुम्हारे जैसे तेजतर्रार और चालू इंसान के साथ शादी कर के खुश रहेगी.’’

‘‘अब यह शादी तो तुम्हें करानी ही पड़ेगी,’’ समीर ने फौरन नाटकीय अंदाज में उस के सामने हाथ जोड़ दिए.

‘‘वह क्यों?’’ शिखा ने चौंक कर पूछा.

‘‘मैं तुम जैसी अच्छी साली को नहीं खोना चाहता हूं.’’

‘‘सिर्फ अच्छी साली पाने के लिए तुम किसी के भी साथ शादी कर लोगे?’’

‘‘तुम जैसी शानदार साली को पाने के लिए ऐसा खतरा उठाया जा सकता है.’’

‘‘ऐ मिस्टर, मुझ पर ज्यादा लाइन मत मारो, नहीं तो मानसी नाराज हो जाएगी.’’

‘‘तब तुम अपनी अदाओं से मुझे लुभाना बंद कर दो.’’

शिखा उसे कोई तीखा जवाब दे पाती, उस से पहले ही मानसी चायनाश्ते की ट्रे उठाए वहां आ पहुंची. उस ने चाय का कप समीर को पकड़ाते हुए संजीदे स्वर में कहा, ‘‘मैं तुम दोनों की बातें रसोई में खड़ी सुन रही थी. मेरे मन में एक सवाल उठ रहा है. क्या तुम शादी के बाद अपनी भावी पत्नी के प्रति वफादार रह सकोगे?’’

समीर ने फौरन लापरवाह अंदाज में जवाब दिया, ‘‘इस मामले में मैं कुछ नहीं कह सकता. मेरा मानना है कि जबरदस्ती कोई किसी से प्यार नहीं कर सकता.’’

‘‘वाह, क्या बात कही है,’’ शिखा ने फौरन उस के डायलौग की तारीफ की.

‘‘लेकिन मेरा मानना है कि एक बार शादी हो गई तो उस पवित्र रिश्ते को हमें जीवन भर निभाना चाहिए,’’ मानसी ने उसे अपना मत बता दिया.

‘‘जीवनसाथी अगर गले का फंदा बन जाए तो रिश्ता तोड़ देने में भी कोई बुराई नहीं है,’’ समीर ने उस की बात सुनने के बाद भी अपना नजरिया नहीं बदला था.

‘‘वाह, क्या बात कही है,’’ शिखा फिर बीच में बोल पड़ी.

‘‘तुम मेरी तारीफ कर रही हो या मजाक उड़ा रही हो?’’ समीर ने उसे नाटकीय अंदाज में घूरा.

‘‘तुम्हें क्या लगता है?’’ शिखा सवाल पूछ कर व्यंग्य भरे अंदाज में मुसकरा उठी.

समीर के जवाब देने से पहले ही मानसी बोल पड़ी, ‘‘मुझे तो तुम दोनों की आपस में ट्यूनिंग ज्यादा अच्छी लग रही

है. इसलिए अच्छा यही होगा कि मेरी जगह…’’

‘‘बस, आगे कुछ मत कहो मानसी,’’ समीर ने उसे टोक दिया, ‘‘मैं शादी तुम से ही करूंगा, क्योंकि यह तो साली बन कर मेरी जिंदगी में आ ही जाएगी.’’

फिर समीर ने अचानक शरारती अंदाज में शिखा को आंख मारी तो वह भड़क कर झटके से खड़ी हो गई और बोली, ‘‘तुम जरूरत से ज्यादा चालू इंसान हो, मिस्टर समीर. मैं ने तुम्हें अच्छी तरह परख लिया है.’’

‘‘अगर परख लिया है तो बता दो कि मुझे 100 में से कितने नंबर दोगी?’’ समीर ने शान से कौलर खड़ा करते हुए पूछा.

‘‘मैं यह शादी होने ही नहीं दूंगी,’’ शिखा का मुंह गुस्से से लाल हो उठा.

‘‘तुम गुस्सा करते हुए और भी ज्यादा खूबसूरत लगती हो,’’ समीर उस की तारीफ करने का यह मौका भी नहीं चूका.

‘‘मैं इन जनाब को और ज्यादा सहन नहीं कर सकती. अब तू ही इन्हें झेल,’’ कह कर शिखा तमतमाती हुई वहां से उठी और मकान के भीतरी भाग में चली गई.

‘‘अपने प्यार को हर लड़की पर लुटाते रहोगे तो कोई भी हाथ नहीं आएगी,’’ ऐसा तीखा जवाब दे कर मानसी शिखा के पीछे जाने को तैयार हुई कि तभी कालबैल की आवाज गूंज उठी.

मानसी दरवाजा खोलने चली गई और जब लौटी तो उस के मातापिता साथ अंदर आए.

‘‘कैसे हो तुम, समीर? कुछ खिलायापिलाया इन दोनों ने तुम्हें?’’ मानसी के पिता ने समीर से बड़ी गर्मजोशी के साथ हाथ मिलाया.

तभी शिखा ने कमरे में प्रवेश किया और गुस्से से भरी आवाज में बोली, ‘‘हमारी शादी नहीं हो सकती, पापा.’’

‘‘ऐसा क्यों कह रही हो, बेटी?’’ उस के पापा की आंखों में चिंता के भाव थे.

अपने पापा को जवाब देने के बजाय शिखा समीर की तरफ घूमी और चुभते लहजे में बोली, ‘‘मैं इन्हें पापा इसलिए कह रही हूं, क्योंकि मैं मानसी हूं, शिखा नहीं. मैं तुम से खुल कर बातें करना चाहती थी, इसलिए शिखा बन कर मिली. जो कुछ हुआ बहुत अच्छा हुआ, क्योंकि अब मैं कम से कम तुम्हारी असलियत तो पहचानती हूं. मैं तुम्हारे जैसे छिछोरे इंसान के साथ शादी कर के जिंदगी भर का रिश्ता बिलकुल नहीं जोड़ना चाहूंगी.’’

समीर परेशान दिखने के बजाय उत्साहित अंदाज में बोला, ‘‘लेकिन तुम जरा शांति से सोचोगी तो एक बात साफ हो जाएगी, मानसी. मैं फिदा तो तुम पर ही हुआ हूं और यह बात तो हमारी शादी होने के हक में जानी चाहिए.’’

‘‘सौरी, मिस्टर समीर, यही बात तो तुम्हारी नीयत व चरित्र में खोट होने का सुबूत है.’’

समीर अचानक गुस्से से भड़क उठा, ‘‘कुसूरवार तुम भी कम नहीं हो. तुम मुझे इतनी ज्यादा लिफ्ट क्यों दे रही थीं?’’

‘‘मुझे तुम्हारे साथ किसी बहस में नहीं पड़ना है. तुम अपने लिए कोई और लड़की

ढूंढ़ लो.’’

‘‘नहीं, मुझे तुम से ही शादी करनी है,’’ समीर उस के सामने तन कर खड़ा हो गया, ‘‘तुम मजाक करो तो मजाक और दूसरा मजाक करे तो चरित्रहीन. यह कहां का इंसाफ हुआ?’’

‘‘क्या मतलब हुआ तुम्हारी इस बात का?’’ मानसी एकदम से चौंक कर उलझन की शिकार बन गई.

‘‘तुम शिखा बन कर मुझ से मिलीं जरूर, पर सच यह है कि तुम मुझ से अपनी असलियत छिपा नहीं पाई थीं,’’ समीर अब खुल कर मुसकरा रहा था.

‘‘ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि हम जिंदगी में आज पहली बार मिले हैं,’’ मानसी को उस के कहे पर विश्वास नहीं हुआ था.

समीर ने अपने कोट की जेब से एक तसवीर निकाली और मानसी को दिखाते हुए बोला, ‘‘तुम्हारी कालेज की सहेली वंदना की शादी दिल्ली में हुई है. तुम्हारी यह तसवीर  मुझे 2 दिन पहले उसी से मिल गई थी. तभी मुझे आज तुम्हें पहचानने में दिक्कत नहीं हुई थी.’’

‘‘तुम्हें यह बात हमें शुरू में ही बतानी चाहिए थी,’’ मारे घबराहट के मानसी अब हकलाने लगी थी.

‘‘अगर मैं शुरू में ही यह सस्पैंस खोल देता तो फिर मुझे यह कैसे पता चलता कि मेरी होने वाली पत्नी कितनी नौटंकी करना जानती है,’’  समीर के इस मजाक पर मानसी को छोड़ बाकी तीनों ठहाका मार कर हंस पड़े.

‘‘यह आप ने बिलकुल ठीक नहीं किया,’’  मानसी के गोरे गाल गुलाबी हो उठे और वह पहली बार उसी अंदाज में शरमाई जैसे कोई भी लड़की अपने भावी पति को सामने देख कर शरमाती है.

‘‘मैं ऐसा न करता तो तुम्हें यह कैसे पता लगता कि नौटंकी करने में हम भी किसी कम नहीं हैं,’’ समीर द्वारा नाटकीय अंदाज में छाती फुला कर किए गए इस मजाक पर पूरा कमरा एक बार फिर ठहाकों से गूंजा तो मानसी लजातीशरमाती अपने कमरे में भाग गई.

सर्वस्व : क्या मां के जीवन में खुशियां ला पाई शिखा

बैठक में बैठी शिखा राहुल के खयालों में खोई थी. वह नहा कर तैयार हो कर सीधे यहीं आ कर बैठ गई थी. उस का रूप उगते सूर्य की तरह था. सुनहरे गोटे की किनारी वाली लाल साड़ी, हाथों में ढेर सारी लाल चूडि़यां, माथे पर बड़ी बिंदी, मांग में चमकता सिंदूर मानो सीधेसीधे सूर्य की लाली को चुनौती दे रहे थे. घर के सब लोग सो रहे थे, मगर शिखा को रात भर नींद नहीं आई. शादी के बाद वह पहली बार मायके आई थी पैर फेरने और आज राहुल यानी उस का पति उसे वापस ले जाने आने वाला था. वह बहुत खुश थी.

उस ने एक भरपूर नजर बैठक में घुमाई. उसे याद आने लगा वह दिन जब वह बहुत छोटी थी और अपनी मां के पल्लू को पकड़े सहमी सी दीवार के कोने में घुसी जा रही थी. नानाजी यहीं दीवान पर बैठे अपने बेटों और बहुओं की तरफ देखते हुए अपनी रोबदार आवाज में फैसला सुना रहे थे, ‘‘माला, अब अपनी बच्ची के साथ यहीं रहेगी, हम सब के साथ.

यह घर उस का भी उतना ही है, जितना तुम सब का. यह सही है कि मैं ने माला का विवाह उस की मरजी के खिलाफ किया था, क्योंकि जिस लड़के को वह पसंद करती थी, वह हमारे जैसे उच्च कुल का नहीं था, परंतु जयराज (शिखा के पिता) के असमय गुजर जाने के बाद इस की ससुराल वालों ने इस के साथ बहुत अन्याय किया.

उन्होंने जयराज के इंश्योरैंस का सारा पैसा हड़प लिया. और तो और मेरी बेटी को नौकरानी बना कर दिनरात काम करवा कर इस बेचारी का जीना हराम कर दिया. मुझे पता नहीं था कि दुनिया में कोई इतना स्वार्थी भी हो सकता है कि अपने बेटे की आखिरी निशानी से भी इस कदर मुंह फेर ले. मैं अब और नहीं देख सकता. इस विषय में मैं ने गुरुजी से भी बात कर ली है और उन की भी यही राय है कि माला बिटिया को उन लालचियों के चंगुल से छुड़ा कर यहीं ले आया जाए.’’

फिर कुछ देर रुक कर वे आगे बोले, ‘‘अभी मैं जिंदा हूं और मुझ में इतना सामर्थ्य है कि मैं अपनी बेटी और उस की इस फूल सी बच्ची की देखभाल कर सकूं… मैं तुम सब से भी यही उम्मीद करता हूं कि तुम दोनों भी अपने भाई होने का फर्ज बखूबी अदा करोगे,’’ और फिर नानाजी ने बड़े प्यार से उसे अपनी गोद में बैठा लिया था. उस वक्त वह अपनेआप को किसी राजकुमारी से कम नहीं समझ रही थी.

घर के सभी सदस्यों ने इस फैसले को मान लिया था और उस की मां भी घर में पहले की तरह घुलनेमिलने का प्रयत्न करने लगी थी. मां ने एक स्कूल में अध्यापिका की नौकरी कर ली थी. इस तरह से उन्होंने किसी को यह महसूस नहीं होने दिया कि वे किसी पर बोझ हैं.

नानाजी एवं नानी के परिवार की अपने कुलगुरु में असीम आस्था थी. सब के गले में एक लौकेट में उन की ही तसवीर रहती थी. कोई भी बड़ा निर्णय लेने के पहले गुरुजी की आज्ञा लेनी जरूरी होती थी. शिखा ने बचपन से ही ऐसा माहौल देखा था.

अत: वह भी बिना कुछ सोचेसमझे उन्हें मानने लगी थी. अत्यधिक व्यस्तता के बावजूद समय निकाल कर उस की मां कुछ वक्त गुरुजी की तसवीर के सामने बैठ कर पूजाध्यान करती थीं. कभीकभी वह भी मां के साथ बैठती और गुरुजी से सिर्फ और सिर्फ एक ही दुआ मांगती कि गुरुजी, मुझे इतना बड़ा अफसर बना दो कि मैं अपनी मां को वे सारे सुख और आराम दे सकूं जिन से वे वंचित रह गई हैं.

तभी खट की आवाज से शिखा की तंद्रा भंग हो गई. उस ने मुड़ कर देखा. तेज हवा के कारण खिड़की चौखट से टकरा रही थी. उठ कर शिखा ने खिड़की का कुंडा लगा दिया. आंगन में झांका तो शांति ही थी. घड़ी की तरफ देखा तो सुबह के 6 बज रहे थे. सब अभी सो ही रहे हैं, यह सोचते हुए वह भी वहीं सोफे पर अधलेटी हो गई. उस का मन फिर अतीत में चला गया…

जब तक नानाजी जिंदा रहे उस घर में वह राजकुमारी और मां रानी की तरह रहीं. मगर यह सुख उन दोनों के हिस्से बहुत दिनों के लिए नहीं लिखा था. 1 वर्ष बीततेबीतते अचानक एक दिन हृदयगति रुक जाने के कारण नानाजी का देहांत हो गया. सब कुछ इतनी जल्दी घटा कि नानी को बहुत गहरा सदमा लगा.

अपनी बेटी व नातिन के बारे में सोचना तो दूर, उन्हें अपनी ही सुधबुध न रही. वे पूरी तरह से अपने बेटों पर आश्रित हो गईं और हालात के इस नए समीकरण ने शिखा और उस की मां माला की जिंदगी को फिर से कभी न खत्म होने वाले दुखों के द्वार पर ला खड़ा कर दिया.

नानाजी के असमय देहांत और नानीजी के डगमगाते मानसिक संतुलन ने जमीनजायदाद, रुपएपैसे, यहां तक कि घर के बड़े की पदवी भी मामा के हाथों में थमा दी.

अब घर में जो भी निर्णय होता वह मामामामी की मरजी के अनुसार होता. कुछ वक्त तक तो उन निर्णयों पर नानी से हां की मुहर लगवाई जाती रही, पर उस के बाद वह रस्म भी बंद हो गई. छोटे मामामामी बेहतर नौकरी का बहाना बना कर अपना हिस्सा ले कर विदेश में जा कर बस गए. अब बस बड़े मामामामी ही घर के सर्वेसर्वा थे.

मां का अपनी नौकरी से बचाखुचा वक्त रसोई में बीतने लगा था. मां ही सुबह उठ कर चायनाश्ता बनातीं. उस का और अपना टिफिन बनाते वक्त कोई न कोई नाश्ते की भी फरमाइश कर देता, जिसे मां मना नहीं कर पाती थीं. सब काम निबटातेनिबटाते, भागतेदौड़ते वे स्कूल पहुंचतीं.

कई बार तो शिखा को देर से स्कूल पहुंचने पर डांट भी पड़ती. इसी प्रकार शाम को घर लौटने पर जब मां अपनी चाय बनातीं, तो बारीबारी पूरे घर के लोग चाय के लिए आ धमकते और फिर वे रसोई से बाहर ही न आ पातीं. रात में शिखा अपनी पढ़ाई करतेकरते मां का इंतजार करती कि कब वे आएं तो वह उन से किसी सवाल अथवा समस्या का हल पूछे.

मगर मां को काम से ही फुरसत नहीं होती और वह कापीकिताब लिएलिए ही सो जाती. जब मां आतीं तो बड़े प्यार से उसे उठा कर खाना खिलातीं और सुला देतीं. फिर अगले दिन सुबह जल्दी उठ कर उसे पढ़ातीं.

यदि वह कभी मामा या मामी के पास किसी प्रश्न का हल पूछने जाती तो वे हंस कर उस की खिल्ली उड़ाते हुए कहते, ‘‘अरे बिटिया, क्या करना है इतना पढ़लिख कर? अफसरी तो करनी नहीं तुझे. चल, मां के साथ थोड़ा हाथ बंटा ले. काम तो यही आएगा.’’

वह खीज कर वापस आ जाती. परंतु उन की ऐसी उपहास भरी बातों से उस ने हिम्मत न हारी, न ही निराशा को अपने मन में घर करने दिया, बल्कि वह और भी दृढ़ इरादों के साथ पढ़ाई में जुट जाती.

मामामामी अपने बच्चों के साथ अकसर बाहर घूमने जाते और बाहर से ही खापी कर आते. मगर भूल कर भी कभी न उस से न ही मां से पूछते कि उन का भी कहीं आनेजाने का या बाहर का कुछ खाने का मन तो नहीं? और तो और जब भी घर में कोई बहुत स्वादिष्ठ चीज बनती तो मामी अपने बच्चों को पहले परोसतीं और उन को ज्यादा देतीं. वह एक किनारे चुपचाप अपनी प्लेट लिए, अपना नंबर आने की प्रतीक्षा में खड़ी रहती.

सब से बाद में मामी अपनी आवाज में बनावटी मिठास भर के उस से बोलतीं, ‘‘अरे बिटिया तू भी आ गई. आओआओ,’’ कह कर बचाखुचा कंजूसी से उस की प्लेट में डाल देतीं. तब उस का मन बहुत कचोटता और कह उठता कि काश, आज उस के भी पापा होते, तो वे उसे कितना प्यार करते, कितने प्यार से उसे खिलाते. तब किसी की भी हिम्मत न होती, जो उस का इस तरह मजाक उड़ाता या खानेपीने को तरसता. तब वह तकिए में मुंह छिपा कर बहुत रोती.

मगर फिर मां के आने से पहले ही मुंह धो कर मुसकराने का नाटक करने लगती कि कहीं मां ने उस के आंसू देख लिए तो वे बहुत दुखी हो जाएंगी और वे भी उस के साथ रोने लगेंगी, जो वह हरगिज नहीं चाहती थी.

एकाध बार उस ने गुरुजी से परिवार से मिलने वाले इन कष्टों का जिक्र करना चाहा, परंतु गुरुजी ने हर बार किसी न किसी बहाने से उसे चुप करा दिया. वह समझ गई कि सारी दुनिया की तरह गुरुजी भी बलवान के साथी हैं.

जब वह छोटी थी, तब इन सब बातों से अनजान थी, मगर जैसेजैसे बड़ी होती गई, उसे सारी बातें समझ में आने लगीं और इस सब का कुछ ऐसा असर हुआ कि वह अपनी उम्र के हिसाब से जल्दी एवं ज्यादा ही समझदार हो गई.

उस की मेहनत व लगन रंग लाई और एक दिन वह बहुत बड़ी अफसर बन गई. गाड़ीबंगला, नौकरचाकर, ऐशोआराम अब सब कुछ उस के पास था.

उस दिन मांबेटी एकदूसरे के गले लग कर इतना रोईं, इतना रोईं कि पत्थरदिल हो चुके मामामामी की भी आंखें भर आईं. नानी भी बहुत खुश थीं और अपने पूरे कुनबे को फोन कर के उन्होंने बड़े गर्व से यह खबर सुनाई. वे सभी लोग, जो वर्षों से उसे और उस की मां को इस परिवार पर एक बोझ समझते थे, ‘ससुराल से निकाली गई’, ‘मायके में आ कर पड़ी रहने वाली’ समझ कर शक भरी निगाहों से देखते थे और उन्हें देखते ही मुंह फेर लेते थे, आज वही सब लोग उन दोनों की प्रशंसा करते नहीं थक रहे थे. मामामामी ने तो उस के अफसर बनने का पूरा क्रैडिट ही स्वयं को दे दिया था और गर्व से इतराते फिर रहे थे.

समय का चक्र मानो फिर से घूम गया था. अब मां व शिखा के प्रति मामामामी का रवैया बदलने लगा था. हर बात में मामी कहतीं, ‘‘अरे जीजी, बैठो न. आप बस हुकुम करो. बहुत काम कर लिया आप ने.’’

मामी के इस रूप का शिखा खूब आनंद लेती. इस दिन के लिए तो वह कितना तरसी थी.

जब सरकारी बंगले में जाने की बात आई, तो सब से पहले मामामामी ने अपना सामान बांधना शुरू कर दिया. मगर नानी ने जाने से मना कर दिया, यह कह कर कि इस घर में नानाजी की यादें बसी हैं. वे इसे छोड़ कर कहीं नहीं जाएंगी. जो जाना चाहे, वह जा सकता है. मां नानी के दिल की हालत समझती थीं. अत: उन्होंने भी जाने से मना कर दिया. तब शिखा ने भी शिफ्ट होने का प्रोग्राम फिलहाल टाल दिया.

इसी बीच एक बहुत ही सुशील और हैंडसम अफसर, जिस का नाम राहुल था की तरफ से शिखा को शादी का प्रस्ताव आया. राहुल ने खुद आगे बढ़ कर शिखा को बताया कि वह उसे बहुत पसंद करता है और उस से शादी करना चाहता है. शिखा को भी राहुल पसंद था.

राहुल शिखा को अपने घर, अपनी मां से भी मिलाने ले गया था. राहुल ने उसे बताया कि किस प्रकार पिताजी के देहांत के बाद मां ने अपने संपूर्ण जीवन की आहुति सिर्फ और सिर्फ उस के पालनपोषण के लिए दे दी. घरघर काम कर के, रातरात भर सिलाईकढ़ाईबुनाई कर के उसे इस लायक बनाया कि आज वह इतना बड़ा अफसर बन पाया है. उस की मां के लिए वह और उस के लिए उस की मां दोनों की बस यही दुनिया थी. राहुल का कहना था कि अब उन की इस 2 छोरों वाली दुनिया का तीसरा छोर शिखा है, जिसे बाकी दोनों छोरों का सहारा भी बनना है एवं उन्हें मजबूती से बांधे भी रखना है.

यह सब सुन कर शिखा को महसूस हुआ था कि यह दुनिया कितनी छोटी है. वह समझती थी कि केवल एक वही दुखों की मारी है, मगर यहां तो राहुल भी कांटों पर चलतेचलते ही उस तक पहुंचा है. अब जब वे दोनों हमसफर बन गए हैं, तो उन की राहें भी एक हैं और मंजिल भी.

राहुल की मां शिखा से मिल कर बहुत खुश हुईं. उन की होने वाली बहू इतनी सुंदर, पढ़ीलिखी तथा सुशील है, यह देख कर वे खुशी से फूली नहीं समा रही थीं. झट से उन्होंने अपने गले की सोने की चेन उतार कर शिखा के गले में पहना दी और फिर बड़े स्नेह से शिखा से बोलीं, ‘‘बस बेटी, अब तुम जल्दी से यहां मेरे पास आ जाओ और इस घर को घर बना दो.’’

मगर एक बार फिर शिखा के परिवार वाले उस की खुशियों के आड़े आ गए. राहुल दूसरी जाति का था और उस के यहां मीटमछली बड़े शौक से खाया जाता था जबकि शिखा का परिवार पूरी तरह से पंडित बिरादरी का था, जिन्हें मीटमछली तो दूर प्याजलहसुन से भी परहेज था.

घर पर सब राहुल के साथ उस की शादी के खिलाफ थे. जब शिखा की मां माला ने शिखा को इस शादी के लिए रोकना चाहा तो शिखा तड़प कर बोली, ‘‘मां, तुम भी चाहती हो कि इतिहास फिर से अपनेआप को दोहराए? फिर एक जिंदगी तिलतिल कर के इन धार्मिक आडंबरों और दुनियादारी के ढकोसलों की अग्नि में अपना जीवन स्वाहा कर दे? तुम भी मां…’’ कहतेकहते शिखा रो पड़ी.

शिखा के इस तर्क के आगे माला निरुत्तर हो गईं. वे धीरे से शिखा के पास आईं और उस का सिर सहलाते हुए रुंधी आवाज में बोलीं, ‘‘मुझे माफ कर देना मेरी प्यारी बेटी. बढ़ती उम्र ने नजर ही नहीं, मेरी सोचनेसमझने की शक्ति को भी धुंधला दिया था. मेरे लिए तुम्हारी खुशी से बढ़ कर और कुछ भी नहीं… हम आज ही यह घर छोड़ देंगी.’’

जब मामामामी को पता लगा कि शिखा का इरादा पक्का है और माला भी उस के साथ है, तो सब का आक्रोश ठंडा पड़ गया. अचानक उन्हें गुरुजी का ध्यान आया कि शायद उन के कहने से शिखा अपना निर्णय बदल दे.

बात गुरुजी तक पहुंची तो वे बिफर उठे. जैसे ही उन्होंने शिखा को कुछ समझाना चाहा, शिखा ने अपने मुंह पर उंगली रख कर उन्हें चुप रहने का इशारा किया और फिर अपने गले में पड़ा उन की तसवीर वाला लौकेट उतार कर उन के सामने फेंक दिया.

सब लोग गुस्से में कह उठे, ‘‘यह क्या पागलपन है शिखा?’’

गुरुजी भी आश्चर्यमिश्रित रोष से उसे देखने लगे.

इस पर शिखा दृढ़ स्वर में बोली, ‘‘बहुत कर ली आप की पूजा और देख ली आप की शक्ति भी, जो सिर्फ और सिर्फ अपना स्वार्थ देखती है. मेरा सर्वस्व अब मेरा होने वाला पति राहुल है, उस का घर ही मेरा मंदिर है, उस की सेवा आप के ढोंगी धर्म और भगवान से बढ़ कर है,’’ कहते हुए शिखा तेजी से उठ कर वहां से निकल गई.

शिखा के इस आत्मविश्वास के आगे सब ने समर्पण कर दिया और फिर खूब धूमधाम से राहुल के साथ उस का विवाह हो गया.

अचानक बादलों की गड़गड़ाहट से शिखा की आंख खुल गई. आंगन में लोगों की चहलकदमी शुरू हो गई थी. आंखें मलती हुई वह उठी और सोचने लगी, यहां दीवान पर लेटेलेटे उस की आंख क्या लगी वह तो अपना अतीत एक बार फिर से जी आई.

‘राहुल अब किसी भी वक्त उसे लेने पहुंचने ही वाला होगा,’ इस खयाल से शिखा के चेहरे पर एक लजीली मुसकान फैल गई.

जोर का झटका: जब मजे के लिए अस्पताल पहुंचे वामनमूर्ति

भारत अस्पताल के पार्किंग एरिया में अपनी कार रोक कर वामनमूर्ति नीचे उतरे. ब्रीफकेस खोल कर नैशनल इंश्योरैंस द्वारा दी गई हैल्थ पौलिसी के कार्ड को अपनी जेब में रखा और शान से अस्पताल में प्रवेश किया.

भारत अस्पताल का शहर में कौरपोरेट अस्पताल के रूप में अच्छा नाम है. 20 एकड़ क्षेत्र में ऊंचे पहाड़ों पर फूलों के बगीचे के बीच बना भारत अस्पताल आधुनिकता दर्शाता एक फाइव स्टार होटल सा दिखाई पड़ता है.

वामनमूर्ति अस्पताल में प्रवेश करते ही कुछ देर तो आश्चर्यचकित हो कर अस्पताल को देखते रह गए. फिर अपने इंश्योरैंस कार्ड को देखते हुए, खुशी से रिसैप्शन रूम में दाखिल हुए और दीवार पर टंगे बोर्ड पर स्पैशलिस्ट डाक्टरों के नाम और उन की शैक्षणिक योग्यताओं को देख कर खुशी से झमते हुए वे मन ही मन बुदबुदाए, ‘वाऊ, क्या अस्पताल है.’

रिसैप्शन पर एक खूबसूरत युवती कंप्यूटर पर काम कर रही थी. उन्हें देख कर वह बोली, ‘‘आप का नाम क्या है?’’

‘‘वामनमूर्ति,’’ हौले से मुसकराते हुए उन्होंने कहा.

‘‘अच्छा नाम है.’’

‘क्या है इस में अच्छा होने के लिए,’ वे मन ही मन बुदबुदाए.

युवती बोली, ‘‘उम्र?’’

वामनमूर्ति बोले, ‘‘45 वर्ष.’’

‘‘प्रोफैशन.’’

‘‘कालेज लैक्चरर.’’

‘‘इंश्योरैंस है क्या?’’

‘‘हांहां है,’’ वामनमूर्ति खुशी से बोले.

‘‘क्या हैल्थ प्रौब्लम है?’’

‘‘हां सिर चकरा रहा है.’’

‘सिर चकराने से ही यहां आते हैं?’ वे फिर से बुदबुदाते हुए मन ही मन गुस्सा जाहिर करने लगे.

युवती बोली, ‘‘आप जनरल फिजीशियन, डायबिटीज स्पैशलिस्ट, हृदय रोग विशेषज्ञ किस से मिलेंगे?’’

‘‘जनरल फिजीशियन से,’’ वामनमूर्ति बोले.

‘‘ठीक है.’’

‘‘दाहिनी तरफ के कौरिडोर में दूसरा कमरा है डाक्टर नित्यानंद का, आप वहां जाइए.’’

वामनमूर्ति 500 रुपए फाइल के दे कर डाक्टर नित्यानंद से मिलने पहुंचे. वहां आधा घंटा इंतजार करने के बाद उन की डाक्टर नित्यानंद से मुलाकात हुई. डा. नित्यानंद की उम्र लगभग 50 वर्ष थी और सिर गंजा था. उन के पास स्पैशलाइजेशन की 4-5 मैडिकल डिग्रियां भी थीं.

डाक्टर नित्यानंद ने वामनमूर्ति को देखते हुए पूछा, ‘‘प्रौब्लम क्या है?’’

वामनमूर्ति बोले, ‘‘डाक्टर, 2-3 बार सिर चकराया है. ब्लडप्रैशर की समस्या भी है. इस के साथसाथ जनरल चैकअप भी करवाना चाहता हूं. यह देखिए, इंश्योरैंस कार्ड भी है.’’

‘‘इस के लिए आप को ऐडमिट होना पड़ेगा.’’

‘‘ठीक है, मैं ऐडमिट हो जाऊंगा. मैं ने 2 दिन की छुट्टी ले ली है. आप टैस्ट लिखें,’’ वामनमूर्ति बोले.

फिर कुछ सोचते हुए डाक्टर ने कहा, ‘‘अस्पताल में रहने के लिए सीरियस प्रौब्लम बतानी पड़ती है. आप कितनी बार टौयलेट जाते हैं?’’

‘‘हर रोज 2-3 बार.’’

‘‘ठीक है, मैं ‘क्रौनिक लूज बोल सिंड्रोम’ लिखूंगा. आप के बाकी टैस्ट गैस्ट्रोलौजिस्ट और हृदय रोग विशेषज्ञ करेंगे. सभी टैस्ट को पूरा करने के लिए और औब्जर्वेशन में रखने के लिए कितने दिन ऐडमिट रहने के लिए लिखूं, 2 या 3 दिन अस्पताल में रहोगे?’’ डाक्टर ने पूछा.

‘‘2 दिन रुक सकता हूं, उस से ज्यादा छुट्टी नहीं है.’’

‘‘ठीक है. आप ऐडमिट हो जाइए.’’

एडमिशन काउंटर पर अपना इंश्योरैंस कार्ड दे कर वामनमूर्ति फाइव स्टार होटल जैसे अस्पताल के कमरे में पेशैंट के रूप में भरती हुए. नर्स के बाहर जाते ही वामनमूर्ति ने कमरे में चारों तरफ नजर दौड़ाते हुए मन ही मन कहा, कितना अच्छा कमरा है. गैस्ट बैड, सीलिंग लाइट्स, टौयलेट आदि. कुछ सोचते हुए वह बुदबुदाए, कौन्फ्रैंस के समय में मैं शेयरिंग बेसिस पर ऐसे ही कमरे में रहता हूं. इंश्योरैंस करवाना कितना अच्छा साबित हुआ.

फिर उन्होंने पत्नी को फोन किया ओर कहा, ‘‘मैं अस्पताल में भरती हो गया हूं, तुम बच्ची को ले कर अस्पताल आ जाओ. हम 2 दिन यहां रुकेंगे.’’

इतने में चैकअप करने के लिए गैस्ट्रोलौजिस्ट आए और केस शीट देखते हुए उन्होंने पूछा, ‘‘आज कितनी बार टौयलेट हो कर आए हो?’’

‘‘2 बार,’’ वामनमूर्ति झूठ का सहारा लेते हुए बोले, जबकि उस दिन वे टौयलेट गए ही नहीं थे.

‘‘ऐसा कब से हो रहा है?’’

‘‘6 महीने से. मुझे एक परेशानी और है डाक्टर, मेरा सिर चकराता है.’’

‘‘कब? शौच जाने की इच्छा होने पर या उस के बाद में?’’ डाक्टर ने पूछा.

‘‘शौच के आरंभ से ले कर बाद में भी. काम करते हुए भी सिर चकराता है.’’

‘‘मुझे ऐसा लगता है आप को कोई न्यूरोलौजिकल समस्या है. मैं आप को न्यूरोलौजिस्ट के पास रेफर करता हूं.’’ डाक्टर ने कहा.

‘‘ठीक है डाक्टर, लेकिन कल शाम तक पूरी चिकित्सा हो जानी चाहिए, क्योंकि मेरे पास और छुट्टी नहीं है.’’

‘‘ठीक है, आप के रैक्टम में गांठ हो सकती है, इस के लिए टैस्ट लिखता हूं. 1-2 घंटे कुछ मत खाइएगा. 4 घंटे बाद यह

टैस्ट होगा,’’ यह कहते हुए डाक्टर चले गए.

तभी एक नर्स ने अंदर आ कर वामनमूर्ति से कहा, ‘‘रक्त चाहिए, 6 घंटे में एक बार टैस्ट करना होगा.’’

‘‘अरे बाप रे, यह कौन सा टैस्ट है?’’ वामनमूर्ति ने सहमते हुए पूछा.

नर्स बोली, ‘‘यह टैस्ट आप के रक्त में बेसिक साल्ट की बदलती स्थिति को देखने के लिए है. इस से यह पता चलेगा कि लूजमोशन हो रहा है या नहीं. हमें इसे 24 घंटे तक देखना है.’’

नर्स ने बाहर जाते हुए वामनमूर्ति से कहा, ‘‘रात को

8 बजे ही भोजन करें, कल सुबह फास्टिंग, ब्लड सैंपल लेना है.

12 घंटे पहले कुछ भी नहीं खाना.’’

वामनमूर्ति बोले, ‘‘मुझे ऐसिडिटी है. रात के 3 बजे ही जाग जाता हूं. 2 बिस्कुट खा कर 1 कप दूध पीने पर भी नींद नहीं आती.’’

‘‘ऐसा होने पर कुछ भी नहीं खाना चाहिए,’’ नर्स ने कहा.

तभी हृदय रोग विशेषज्ञ आ गए. उन्होंने वामनमूर्ति का टैस्ट कर के कहा, ‘‘आप का बीपी व पल्स रेट नौर्मल ही है. आप का सिर चकराना बीपी के कारण से नहीं, फिर भी ईसीजी, इको टैस्ट करने के लिए लिख रह हूं. चैकअप करने से लाभ ही होगा.’’

‘‘हां ठीक है, मुझे वही चाहिए,’’ वामनमूर्ति बोले.

‘‘कल सुबह सभी टैस्ट करने होंगे, आप तैयार रहें.’’ यह कहते हुए डाक्टर चले गए.

डाक्टर के जाते ही वामनमूर्ति टीवी औन कर के पैर हिलाते हुए टीवी देखने लगे. ब्लड निकलने के कारण उन के बाएं हाथ में दर्द हो रहा था. हर आधे घंटे में एक बार हंस की चाल चलती हुई युवतियां कौफी, टी, टिफिन सभी पेशैंट को दे रही थीं.

तभी सिल्क साड़ी पहने एक सुंदर युवती ने वामनमूर्ति से पूछा, ‘‘आप की देखभाल ठीक से हो रही है या नहीं?’’

वामनमूर्ति ने ‘हां’ में जवाब दिया.

तभी न्यूरोलौजिस्ट ने कहा, ‘‘आप को न्यूरोलौजिकल डिसऔर्डर है या नहीं, यह जानने के लिए न्यूरोग्राफ निकालना पड़ेगा. ओ.के.?’’

‘‘उस टैस्ट में दर्द होता है क्या?’’ वामनमूर्ति डरते हुए बोले.

‘‘नोनो, एकदम नहीं,’’ न्यूरोलौजिस्ट बोला.

‘‘अगर दर्द नहीं होता तो ठीक है,’’ वामनमूर्ति ने राहत की सांस ली.

शाम के समय वामनमूर्ति की पत्नी बेटी के साथ अस्पताल पहुंची. अस्पताल आने से पहले पड़ोस में रहने वाली मीनाक्षी ने उन से पूछा, ‘‘कहां जा रही हो?’’

‘‘मेरे पति भारत अस्पताल में भरती हैं. उन्हीं के पास जा रही हूं. पता नहीं किस हाल में होंगे बेचारे.’’

पत्नी के अस्पताल पहुंचते ही वामनमूर्ति अपना बड़प्पन जाहिर करते हुए बोले, ‘‘देखा, हम कितने बड़े अस्पताल में मुफ्त में रह रहे हैं.’’ उस दिन सभी टैस्ट पूरे हुए. वामनमूर्ति ने अपना समय टीवी देखते हुए, कुछ खाते हुए और बातें करते हुए गुजारा. दूसरे दिन सुबह सभी टैस्ट होने के बाद दोपहर तक रिपोर्ट आ गई.

पूरी रिपोर्ट सही थी. डाक्टर नित्यानंद ने आ कर डिस्चार्ज शीट लिखी.

उन्होंने वामनमूर्ति से कहा, ‘‘आप को कोई भी डिसऔर्डर नहीं है. जब कभी आप मानसिक रूप से अपसेट होते हैं, तभी लूजमोशंस और सिर चकराने की समस्या होती है.’’

‘‘इस के लिए मैं क्या करूं?’’ वामनमूर्ति ने पूछा.

‘‘आप काम में तल्लीन हो जाइए. ऐसा करने से सभी उतारचढ़ाव अपनेआप कम हो जाएंगे,’’ डाक्टर ने कहा.

फिर डाक्टर वामनमूर्ति की पत्नी से बोले, ‘‘आप बिल सैक्शन में जा कर रसीद ले लीजिए.’’

कुछ देर बाद वामनमूर्ति की पत्नी बिलिंग सैक्शन से वापस आईं. अस्पताल वालों ने इंश्योरैंस वालों से बात की तो उन्होंने कहा कि पहले पेशैंट बिल भर दे, हम बाद में चैक भेजेंगे. आप चाहें तो इस फोन नंबर पर बात कर सकते हैं.

वामनमूर्ति ने बिल देखा… 50 हजार रुपए. ‘‘इतना ज्यादा बिल,’’ कहते हुए वामनमूर्ति ने फिर से बिल को देखा. स्पैशलिस्ट डाक्टर्स ने 5-5 हजार रुपए लिए, स्पैशल रूम व भोजन का खर्च 20 हजार रुपए. टैस्ट के लिए खर्च का विवरण भी उस में है. अब पैसों का भुगतान कैसे करें, कल तक यहीं ठहर कर पत्नी को बैंक भेजना सही नहीं होगा.

हड़बड़ाते हुए वामनमूर्ति ने ब्रीफकेस से एटीएम कार्ड निकाले और पत्नी से कुल 60 हजार रुपए एटीएम से लाने के लिए कहा.

‘‘हमें पैसे अदा करने की क्या जरूरत है, इंश्योरैंस है न?’’ फिर भी पति की जल्दबाजी को देख कर वे 1 घंटे में 60 हजार रुपए ले कर आ गईं. तब तक वामनमूर्ति पसीने से तरबतर हो रहे थे.

काउंटर पर बिल अदा कर के ‘जान है तो जहान है’ कहते हुए वह पत्नी के साथ अस्पताल से बाहर आए और कार में बैठते हुए अस्पताल की ओर देखा. भारत अस्पताल बोर्ड के नीचे यह वाक्य लिखा हुआ था- मानव सेवा ही हमारा कर्तव्य है.

दूसरे दिन वामनमूर्ति ने अस्पताल का बिल इंश्योरैंस कंपनी को भेजा. एक हफ्ते बाद इंश्योरैंस कंपनी द्वारा एक लिफाफा प्राप्त हुआ. लिफाफा खोलते समय वामनमूर्ति की खुशी का ठिकाना नहीं था. लेकिन यह क्या, लिफाफे में चैक न हो कर एक जवाबी चिट्ठी थी. उस में लिखा था, ‘आप को टैस्ट के लिए हो या चिकित्सा के लिए अस्पताल में कम से कम 3 दिन रहना चाहिए था, लेकिन आप अस्पताल में सिर्फ 2 दिन ही रहे. इसलिए हम आप के क्लेम को वापस भेज रहे थे.’

वामनमूर्ति ने हड़बड़ाते हुए इंश्योरैंस डाक्यूमैंट देखा. उस के अंत में एक जगह छोटे अक्षरों में लिखा था- ‘अस्पताल में कम से कम 3 दिन रहना जरूरी है.’ यह पढ़ते ही उन के पैरों तले जमीन खिसक गई. उनका सिर अब सही में चक्कर खाने लगा.

‘टैस्ट, चिकित्सा के नाम पर उन के 50 हजार रुपए व्यर्थ चले गए.’ वे हताश हो कर बैठ गए. भविष्य में अस्पताल में मौज मनाने के नाम से वामन मूर्ति ने तोबा कर ली.

चिंता: आखिर क्या था लता की चिंताओं कारण?

बुधवार को दिन भर लता अपने पति के लौटने की प्रतीक्षा करती रही. घर के मुख्यद्वार पर जरा सी आहट होने पर उस की निगाहें खुद ब खुद बाहर की ओर उठ जाती थीं. एक बार तो उसे लगा जैसे कोई दरवाजे पर दस्तक दे रहा हो. आशा भरे मन से उस ने दरवाजा खोला. देखा तो एक पिल्ला दरवाजे से अंदर घुसने का व्यर्थ प्रयास कर रहा था, जिस के कारण खटखट की आवाज हो रही थी. देख कर लता के होंठों पर मुसकराहट तैर गईर्. अगले ही पल निराश हो कर वह फिर लौट आई.

पिछले शनिवार को उस के पति इलाहाबाद गए थे. उस दिन अचानक उन्हें अपने मुख्य अधिकारी की ओर से इलाहाबाद जाने का आदेश प्राप्त हुआ था. कुछ गोपनीय कागजात सुबह तक वहां जरूरी पहुंचाए जाने थे, इसलिए वह रात की गाड़ी से ही रवाना हो गए थे. लता को यह बता कर गए थे कि एकदो दिन का ही काम है, मंगलवार को वह हर हालत में वापस लौट आएंगे.

मंगलवार की शाम तक तो लता को अधिक फिक्र नहीं थी परंतु जब बुधवार की शाम तक भी उस के पति नहीं लौटे तो उसे चिंता सताने लगी. उसे लगा, जैसे उन्हें घर से गए महीनों बीत गए हों. जब देर रात गए तक भी पति महोदय नहीं आए तो उस के मन में बुरेबुरे विचार आने लगे. वह सोने का असफल प्रयास करने लगी. कभी एक ओर करवट लेती तो कभी दूसरी ओर, पर नींद जैसे उस से कोसों दूर थी.

‘कहां रुक सकते हैं वह,’ लता सोचने लगी, ‘कहीं गाड़ी न छूट गई हो. लेकिन अगर गाड़ी छूट गई होती तो अगली गाड़ी भी पकड़ सकते थे. कल न सही, आज तो आ ही सकते थे.

‘हो सकता है उन की जेब कट गई हो और सभी पैसे निकल गए हों. ऐसे में उन्हें बड़ी मुश्किल हो गई होगी. वापसी पर टिकट लेने के लिए उन के सामने विकट समस्या खड़ी हो गई होगी.’

पर दूसरे ही क्षण लता उस का समाधान भी खोजने लगी, ‘इस के बावजूद तो कई उपाय थे. वहां स्थित अपने कार्यालय के शाखा अधिकारी को अपनी समस्या बता कर पैसे उधार मांग सकते थे. वहां के शाखा अधिकारी यहीं से तो स्थानांतरित हो कर गए हैं और उन के अच्छे दोस्त भी हैं. हां, उन की कलाई पर घड़ी भी तो बंधी है, उसे बेच सकते हैं. नहीं, उन की जेब नहीं कटी होगी. अब तक न आ सकने का कोई और ही कारण रहा होगा.

‘हो सकता है स्टेशन पर उन का सामान चुरा लिया गया हो. तब तो वह बड़ी मुसीबत में फंस गए होंगे. उन के ब्रीफकेस में तो दफ्तर के बहुत सारे महत्त्वपूर्ण कागज थे. यदि ऐसा हो गया तो अनर्थ हो जाएगा. फिर तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाएगा. अपनी नौकरी के बचाव के लिए अधिकारियों के सामने गिड़गिड़ाना पड़ेगा. कैसी भयावह स्थिति होगी वह?’

यह सोच कर लता की आंखों के सामने कई प्रकार के भयानक दृश्य घूमने लगे.

‘नौकरी छूट गई तो दरदर भटकना पड़ेगा. आजकल दूसरी नौकरी कहां मिलती है? हर महीने मिलने वाला वेतन एकदम बंद हो जाएगा. तनख्वाह के बिना गुजारा कैसे चलेगा? मकान का किराया कहां से देंगे? बच्चों की फीस, किताबें, घर का अन्य खर्च, इतना सबकुछ. कटकटा कर उन्हें हर माह 2,200 रुपए तनख्वाह मिलती है. सब का सब घर के अंदर व्यय हो जाता है. लेकिन अगर यह पैसा भी मिलना बंद हो गया तो कहां से करेंगे ये सब खर्च?

‘यदि ऐसी नौबत आ गई तो कोई अन्य उपाय करना होगा…हां, अपने मायके से कुछ मदद लेनी होगी. पर वह भी आखिर कब तक हमारी सहायता करेंगे? बाबूजी, मां, भैया, भाभी और उन के छोटेछोटे बच्चे…उन का भी भरापूरा परिवार है. उन के अपने भी तो बहुत सारे खर्चे हैं. अंत में तो उन्हें खुद ही कुछ न कुछ अपनी आमदनी का उपाय करना होगा.

‘हां, एक बात हो सकती है,’ लता को उपाय सूझा, ‘मैं अपने पिताजी से कहसुन कर उन्हें कोई छोटीमोटी दुकान खुलवा दूंगी. कितने कष्टदायक दिन होंगे वे भी. क्या हमारे लिए दूसरों का मोहताज बनने की नौबत आ जाएगी.’

लता सोचतेसोचते एक बार फिर वर्तमान में लौट आईर्. दोनों बच्चे चारपाई पर हर बात से बेखबर गहरी नींद सो रहे थे. वह सोचने लगी, ‘काश, वह खुद भी एक बच्ची होती.’

बाहर घुप अंधेरा छाया हुआ था. दूर कहीं से कुत्ते भूंकने की आवाज रात के सन्नाटे को तोड़ रही थी. उस ने अनुमान लगाया कि रात के 12 बज चुके होंगे. उस ने सिर को झटका दिया, ‘मैं तो यों ही जाने क्याक्या सोचने लगी हूं. बाहर जाने वाले को किसी कारण ज्यादा दिन भी तो लग सकते हैं.’

लता ने अपने मन को समझाने की पूरीपूरी कोशिश की. दुशचिंताए उस का पीछा नहीं छोड़ रही थीं. न चाहते हुए भी उसे तरहतरह के खयाल सताने लगते थे.

‘नहीं, उन का सामान चोरी नहीं हुआ होगा. तो फिर वह अभी तक लौटे क्यों नहीं थे? कल तो उन्हें जरूर आ जाना चाहिए,’ और तब लता को पति पर रहरह कर गुस्सा आने लगा, अगर ज्यादा ही दिन लगाने थे तो कम से कम तार द्वारा तो सूचना दे ही सकते थे. फोन पर भी बता सकते थे कि वह अभी नहीं आ सकेंगे…आ जाएं एक बार, खूब खबर लूंगी उन की.

आएंगे तो दरवाजा ही नहीं खोलूंगी. पर दरवाजा तो खोलना ही होगा. मैं उन से बात ही नहीं करूंगी. बेशक, जितना जी चाहे मनाते रहें. खूब तंग करूंगी. चाय तक के लिए नहीं पूछूंगी. वह समझते क्या हैं अपनेआप को. पता नहीं, जनाब वहां क्या गुलछर्रे उड़ा रहे होंगे. उन्हें क्या पता यहां उन की चिंता  में कोई दिनरात घुले जा रहा है.’

अगले क्षण उसे किसी अज्ञात भय ने घेर लिया, ‘कहीं वह किसी औरत वगैरह के चक्कर में न पड़ गए हों. आजकल बड़ेबडे़ शहरों में कई पेशेवर औरतें केवल अजनबी व्यक्तियों को फंसाने के चक्कर में रहती हैं. जरूर ऐसा ही हुआ होगा. उन्हें फंसा कर उन का सब कुछ लूट लिया होगा. पर ऐसा नहीं हो सकता. वह आसानी से किसी के चंगुल में फंसने वाले नहीं हैं. जरूर कोई अन्य कारण रहा होगा.’ लता के दिलोदिमाग में अजीब तर्कवितर्क चल रहे थे.

ऐसी कौन सी वजह हो सकती है जो वह अभी तक नहीं लौटे. कहीं कोई दुर्घटना वगैरह तो नहीं हो गई? नहीं, नहीं…लता एक बार तो भीतर तक कांप उठी.

‘रिकशा से स्टेशन आते समय कोई दुर्घटना…नहीं, नहीं…बस दुर्घटना या रेलगाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई हो. अगर चोट लगी होगी तो किसी अस्पताल में पड़े कराह रहे होंगे…नहीं, नहीं, उन्हें कुछ नहीं हो सकता.’ लता मन ही मन पति की सलामती के लिए कामना करने लगी.

‘अगर ऐसी कोई दुर्घटना हुई होती तो अब तक अखबार, रेडियो या टेलीविजन पर खबर आ जाती.’

लता चारपाई से उठी और अलमारी में से पिछले 3-4 दिन के समाचारपत्र ढूंढ़ कर ले आई. उस ने अखबारों के सभी पन्ने उलटपलट कर एकएक खबर देख डाली. इलाहाबाद की किसी भी दुर्घटना की खबर नहीं थी.

‘यह मैं क्या उलटासीधा सोचने लगी. कितनी मूर्ख हूं मैं,’ लता ने अपनेआप को चिंता के भंवर से मुक्त करना चाहा. पर उस का व्याकुल मन उसे घेरघार कर फिर वहीं ले आता. उसे लगता, जैसे उस के पति अस्पताल में पड़े मौत से जूझ रहे हों.

‘वहां तो उन की देखभाल करने वाला कोई भी नहीं होगा. बेहोशी की हालत में वह अपना अतापता भी नहीं बता पाए होंगे. कहीं वह वहीं पर दम न तोड़ गए हों. नहीं, नहीं, उन का लावारिस शव…यह सोच कर वह अंदर तक सिहर उठी. उस ने पाया कि उस की आंखें गीली हो गई हैं और आंसुओं की बूंदें उस के गालों पर लुढ़क आईं. अपनी नादान सोच पर उसे हंसी भी आई और गुस्सा भी.

‘यह मुझे क्या होता जा रहा है. जागते हुए भी मुझे कैसेकैसे बुरे सपने आने लगे हैं.’ लता कल्पना की आंखों से देख रही थी कि कुछ लोग उस के पति के शव को गाड़ी पर लाद कर ले आए हैं. घर पर भीड़ जमा हो गई है. चारों ओर हंगामा मचा हुआ है. लोग उस से सहानुभूति जता रहे हैं.’

उस ने एक बार फिर उन विचारों को अपने दुखी मन से झटक देना चाहा, पर विचारों की उड़ान पर किस का वश चलता है.

‘उन के मरने के बाद मेरा क्या होगा? उन के अभाव में यह पहाड़ सी जिंदगी कैसे कटेगी,’ लता के विचारों की शृंखला लंबी होती जा रही थी.

‘नहीं, नहीं, ऐसा नहीं हो सकता. ऐसे में दूसरी शादी…नहीं, नहीं, किस से शादी करूंगी मैं? इस उम्र में कौन थामेगा मेरा हाथ. क्या कोई व्यक्ति उस के दोनों बच्चों को अपनाने के लिए राजी हो जाएगा. कौन करेगा इतना त्याग, पर मैं अभी इतनी बूढ़ी तो नहीं हो गई हूं कि कोई मुझे पसंद न करे. 24 वर्ष की उम्र ही क्या होती है. 2 बच्चों को जन्म देने के बाद भी मैं सुंदर व अल्हड़ युवती सी दिखाई देती हूं. उस दिन पड़ोस वाली कमला चाची कह रही थीं, ‘लता, लगता ही नहीं तुम 2 बच्चों की मां हो. अगर साथ में बच्चे न हों और मांग में सिंदूर न हो तो कोई पहचान ही नहीं सकता कि तुम विवाहिता हो.’

फिर एकाएक लता को सुशील का ध्यान हो आया, ‘सुशील अविवाहित है. कई बार मैं ने सुशील को प्यार भरी नजरों से अपनी ओर निहारते पाया है. वह अकसर मेरे बनाए खाने की तारीफ किया करता है. मुझे खुद भी तो सुशील बहुत अच्छा लगता है. सुशील सुदर्शन है, सभ्य है, मनमोहक व्यक्तित्व वाला है. वह उन का दोस्त भी है. यहां घर पर आताजाता रहता है.

मैं किसी के माध्यम से उस के दिल को टोहने का प्रयास करूंगी. यदि वह मान गया तो उस के साथ मेरा जीवन खूब सुखमय रहेगा. वह उन से ऊंचे पद पर भी है. आय भी अच्छी है. उस के पास कार, बंगला सबकुछ है. वह जरूर मुझ से विवाह कर लेगा,’ लता अनायास मन ही मन खुद को सुशील के साथ जोड़ने लगी.

‘मैं सुशील के साथ हनीमून भी मनाने जाऊंगी. वह मुझे कश्मीर ले जाने के लिए कहेगा. मैं ने कभी कश्मीर नहीं देखा है. उन्होंने कभी मुझे कश्मीर नहीं दिखाया. कितनी बार उन से अनुरोध किया कि कभी कश्मीर घुमा लाओ, पर वह हमेशा टालते रहे हैं. पर मुन्ना और मुन्नी? उन को मैं यहीं उन के नानानानी के पास छोड़ जाऊंगी.’

सुशील के साथ प्रेम क्रीड़ा, छेड़छाड़ इत्यादि क्षण भर में ही लता कई बातें अनर्गल सोच गई.

कश्मीर का काल्पनिक दृश्य, तसवीरों में देखी डल झील, शिकारे, हाउस बोट, निशात बाग, शालीमार बाग, गुलमर्ग इत्यादि के बारे में सोच कर उस का मन रोमांचित हो उठा.

एकाएक उस की तंद्रा भंग हो गई. बाहर दरवाजे पर दस्तक हो रही थी. लता कल्पनाओं के संसार से मुक्त हो कर एकाएक वास्तविकता के धरातल पर लौट आईर्. अपने ऊटपटांग विचारों को स्मरण कर के वह ग्लानि से भर गई, ‘कितने नीच विचार हैं मेरे. क्या मैं इतना गिर गई हूं? क्या इतनी ही पतिव्रता हूं मैं?’ लता को लगा जैसे अभीअभी उस ने कोई भयंकर सपना देखा हो.

बाहर कोई अब भी दरवाजा खटखटा रहा था. ‘इतनी रात गए कौन हो सकता है?’ लता सोचती हुई उठी और आंगन में आ गईर्. दरवाजा खोला, देखा तो उस के पति ब्रीफकेस हाथ में लिए सामने खड़े मुसकरा रहे थे. वह दौड़ कर उन से लिपट गई.

प्रसन्नता के मारे उस की आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी.

ऐक्शन हीरो Sunny Deol का Jaat के टीजर में दिखा वनमैन आर्मी लुक, उड़े फैंस के होश

ब्लौकबस्टर ‘गदर 2’ की जबरदस्त सफलता के बाद सनी देओल (Sunny Deol) एक बार फिर वह ऐक्शन पैक्ड परफौर्मेंस देने के लिए तैयार है. उनकी फिल्म ‘जाट’ (Jaat) का बहुप्रतीक्षित टीजर रिलीज हो गया है, जिसे देख कर फैंस के होश उड़ गए हैं. कल सिनेमाघरों में ब्लौकबस्टर पुष्पा 2 से जुड़े एक एक्सक्लूसिव प्रीमियर के बाद, टीज़र का प्रीमियर दुनिया भर में रिकौर्ड तोड़ 12,500 स्क्रीन पर हुआ, जो भारतीय सिनेमा के इतिहास में सबसे बड़ा टीजर लौन्च है.

जाट का टीजर वीडियो रिलीज

ऐक्शन हीरो सनी देओल जाट के टीजर में भरपूर  एक्शन का डोज देते हुए नजर आ रहे हैं. 1 मिनट 27 सेकंड के टीजर वीडियो में हाथ में गन पकडे खड़े सनी डायलौग मारते है, ‘मैं जाट हूं, सर कटने के बाद भी हाथ हथियार नहीं छोड़ता’ काफी कैची है और लोगों को खूब पसंद आ रहा है. सनी का वायलेंट मोड वाला किरदार होश उड़ाने वाला है. इस फिल्म में रणदीप हुड्डा भी रफटफ लुक में नजर आ रहे हैं. टीजर देखकर पता चलता है कि रणदीप सनी देओल के अपोजिट होंगे यानि रणदीप फिल्म में विलेन का किरदार निभा रहे हैं. इसका ऑफिशियल टीजर मेकर्स ने जारी कर दिया है.

भारतीय सिनेमा के ओरिजिनल ऐक्शन हीरो

सिनेमाघरों में दर्शकों की एनर्जी बिजली की तरह थी क्योंकि दर्शकों ने सनी देओल की एंटरटेनिंग परफौरमेंस और रोमांचकारी ऐक्शन से भरपूर सीन्स देखकर खूब सीटियां और तालियां बजाई. इस बार फिल्म में सनी हैंडपंप नहीं बल्कि पंखा ही उखाड़ लाए. टीजर ने फैंस को अपनी सीट से बांधे रखा, क्योंकि यह टीजर इस बात की याद दिलाता है कि सनी देओल भारतीय सिनेमा के ओरिजिनल एक्शन हीरो क्यों हैं.

एक्शन जितनी ही दमदार कहानी का वादा

दूरदर्शी गोपीचंद मालिनेनी द्वारा निर्देशित और माइथ्री मूवी मेकर्स और पीपल मीडिया फैक्ट्री की पावरहाउस जोड़ी द्वारा निर्मित, जाट एक्शन जानर को फिर से परिभाषित करने के लिए तैयार है. रणदीप हुड्डा, विनीत कुमार सिंह, सैयामी खेर और रेजिना कैसंड्रा जैसे शानदार कलाकारों के साथ, यह फिल्म अपने एक्शन जितनी ही दमदार कहानी का वादा करती है.

शानदार स्टंट और एक्शन सीक्वेंस

“जाट” का म्यूजिक सनसनीखेज थमन एस द्वारा रचित है, जिसमें ऋषि पंजाबी ने सिनेमैटोग्राफी संभाली है, नवीन नूली ने एडिटिंग की देखरेख की है और अविनाश कोला ने प्रोडक्शन डिजाइन का जिम्मा संभाला है. एक्शन कोरियोग्राफर अनल अरासु, राम लक्ष्मण और वेंकट की टेक्निकल क्रू ने शानदार स्टंट और एक्शन सीक्वेंस देने का वादा किया है, जो दर्शकों को अपनी सीट से बांधे रखेंगे.

रिलीज का काउंटडाउन शुरू

टीजर, फिल्म जाट के सिनेमेटिक स्पेक्टेकल की एक झलक मात्र है. जैसेजैसे फिल्म रिलीज का काउंटडाउन शुरू होता है, फैंस अप्रैल 2025 में सिनेमाघरों में फिल्म के आने पर रोमांच से भरी यात्रा के लिए तैयार हो रहे हैं.

Sherlyn Chopra नेचुरल तरीके से नहीं बन सकती मां, जानें कौनसी बीमारी से जूझ रही हैं ऐक्ट्रैस

वालपेपर क्वीन के नाम से फेमस और अपने अतरंगी स्टाइल से इंटरनेट पर सुर्खियां बटोरने वाली कौन्ट्रोवर्शियल ऐक्ट्रैस शर्लिन चोपड़ा (Sherlyn Chopra) एक ऐसी बीमारी से ग्रस्त है. जिसकी वजह से वह नेचुरल तरीके से मां नही बन सकती है. आपको बता दें इसी बीमारी की वजह से साल 2021 में उनकी किडनी भी फेल हो गई थी. ये कोई नौर्मल किडनी फेलियर नहीं है, ये SLE किडनी फेलियर है. आइए जानते हैं इस बीमारी के बारे जिससे शर्लिन जूझ रही हैं.

इस बीमारी से ग्रस्त है शर्लिन

हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान शर्लिन चोपड़ा ने अपनी हेल्थ से जुड़ी उस बीमारी के बारे में बताया, जिससे वो ग्रस्त हैं. उन्होंने बताया कि उन्हें जो बीमारी हुई है, उसका नाम सिस्टमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस (SLE) है. डौक्टर ने उन्हें बताया है कि इस बीमारी पर कंट्रोल रखने के लिए उन्हें पूरी जिंदगी मेडिसिन खानी पड़ेगी.

शर्लिन का कहना है की मैं दिन में तीन बार दवाइयां लेती हूं. इसी बीमारी की वजह से मैं नेचुरल तरीके से मां नहीं बन सकती. क्योंकि मेरी प्रेग्नेंसी से मुझे और बच्चे दोनों के लिए जान का खतरा हो सकता है. इसलिए डौक्टर्स ने क्लियर बोला है कि मुझे कभी प्रेग्नेंसी के बारे में सोचना भी नही चाहिए.

क्या होती है एसएलई बीमारी

सिस्टमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस (एसएलई) एक आटोइम्यून डिसऔर्डर है. ये बीमारी गलती से बौडी के इम्यून सिस्टम के हैल्दी टिश्यूस पर अटैक करती है. जिससे स्किन, जाइंट्स, किडनी, ब्रेन और दूसरे और्गन प्रभावित होते है. इसकी वजह से नेचुरल तरीके से मां बनने में प्रौब्लम होती है.

औप्शन की तलाश

शर्लिन चोपड़ा का कहना है, ‘मैं बच्चे के लिए औप्शन की तलाश में हूं. जिससे मां बन सकू. मुझे कम से कम तीन या चार बच्चे होने की उम्मीद है. और मेरी इच्छा है कि हर बच्चे का नाम A से शुरू हो. मुझे A से शुरू होने वाले नाम से बहुत अटैचमेंट है.

बच्चे के लिए अलग ही खुशी

शर्लिन का कहना है, “जब भी मैं बच्चों के बारे में सोचती हूं तो मुझे एक अलग ही खुशी महसूस होती है. बच्चों के आने से पहले ही मैं बहुत खुश हूं. सोचिए कि उनके आने के बाद मैं कितनी खुश होंगी. मैं बच्चे के आने के बाद भी अपना काम करती रहूंगी. उन्हें अपने साथ लेकर चलूंगी. शुरू में एक नैनी रखूंगी, जो उनकी देखभाल करेगी.”

शर्लिन का करियर

मिस हैदराबाद रह चुकी शर्लिन हिंदी , तेलुगु और तमिल फिल्मों में काम किया. 2002 में तेलुगु फिल्म ‘वेंडी मैब्बू’ के साथ अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की थी. बौलीवुड फिल्म ‘टाइम पास’ में उन्होंने जम कर अंग प्रदर्शन किया था. फिर ‘रेड स्वस्तिक’, ‘दिल बोले हड़िप्पा’, ‘दोस्ती’, ‘रकीब’, ‘इट्स माय लाइफ’ ‘गेम’, ‘कामसूत्र 3 डी’ ‘दोस्ती, ‘नाटी बाट, में भी नजर आ चुकी हैं. शर्लिन ने 15 साल की उम्र में अपना मेकओवर करवाया. इसके अलावा वह छोटे पर्दे के चर्चित रियलिटी शो बिग बॉस-3 में भी नजर आई थी. शर्लिन एमटीवी के शो Splitsvilla का भी हिस्सा रह चुकी है. उन्होंने अपना म्युजिक एलबम भी लांच किया था.

कौन्ट्रोवर्शियल क्वीन

शर्लिन चोपड़ा अक्सर कॉन्ट्रोवर्सी में रहती हैं. आपको याद होगा इंटरनेशनल मैगजीन ‘प्लेबाय’ के लिए उन्होंने न्यूड फोटो शूट करवाया था, फिर चर्चित शो बिग बौस में उन्होंने बाथरूम में भी कैमरे लगाने की जिद की और कहा कि वे कैमरे के सामने नहाना पसंद करेंगी, इसके अलावा शर्लिन, शिल्पा शेट्टी के हसबैंड राज कुंद्रा के पोर्न रैकेट मामले में भी खूब चर्चा में रहीं थीं.

मां बनने के बाद पहली बार स्पौट हुईं Deepika Padukone, दिलजीत दोसांझ के कौन्सर्ट में जमकर झूमती दिखीं

बौलीवुड ऐक्ट्रैस दीपिका पादुकोण (Deepika Padukone) कुछ महीनों पहले ही मां बनी हैं. वह अपनी प्रेग्नेंसी को लेकर काफी टाइम से सुर्खियों में थी. रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण एक बेटी के पेरेंट्स बनें. बता दें कि कुछ दिनों पहले ही अपनी बेटी का नाम ‘दुआ’ रखा. हालांकि इस नाम के लिए कपल को ट्रोलिंग का भी सामना करना पड़ा.

बेटी के नाम के लिए रणवीर-दीपिका हुए ट्रोल

कुछ लोगों का कहना था कि हिंदू होते ही बेटी का नाम मुसलिम से जुड़ा रखा. तो वहीं कुछ लोगों ने रणवीर-दीपिका को ये भी सुझाव दिया कि उन्हें अपनी बेटी का नाम प्रार्थना रखना चाहिए. बेटी के जन्म के तीन महीने बाद ऐक्ट्रैस दीपिका पादुकोण एक कौन्सर्ट में फुल एंजौय करते नजर आईं.

दिलजीत दोसांझ के कौन्सर्ट पहुंचीं दीपिका पादुकोण

फेमस पंजाबी सिंगर दिलजीत दोसांझ के ‘दिल ल्युमिनाटी’ कौन्सर्ट में दीपिका पादुकोण पहुंचीं. हाल ही में दिलजीत दोसांझ बेंगलुरू में कौन्सर्ट के लिए पहुंचे, इस दौरान दीपिका पादुकोण ने फैंस को बड़ा सरप्राइज दिया. इसका वीडियो इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसे फैंस बेहद पसंद कर रहे हैं.
इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि दिलजीत दिल जबरदस्त गाना गा रहे हैं. दूसरी तरफ ऐक्ट्रैस दीपिका पादुकोण व्हाइट कलर की टीशर्ट और जींस में बहुत खूबसूरत लग रही हैं. इस वीडियो में दीपिका पादुकोण दिलजीत दोसांझ के पंजाबी गानों पर जमकर डांस कर रही हैं.

दीपिका के चेहरे पर मां बनने का ग्लो साफ दिख रहा

दीपिका पादुकोण के इस अंदाज को फैंस काफी पसंद कर रहे हैं और कमेंट कर रहे हैं. इस वीडियो पर एक यूजर ने कमेंट किया है, ‘ओह गाड दीपिका बहुत ही प्यारी लग रही हैं, मां बनने का ग्लो उनके चेहरे पर दिख रहा है.’ तो वहीं दूसरे यूजर ने लिखा, ‘दीपिका बेहद ही जबरदस्त लग रही हैं.’ एक अन्य यूजर ने लिखा कि ‘यह मेरा प्यार है और यह मेरी फेवरेट है.’

फिल्मी करियर की बात करे, तो दीपिका पादुकोण आखिरी बार फिल्म ‘कल्कि 2898 एडी’ में नजर आई थीं. इस मूवी में ऐक्टर प्रभास और अमिताभ बच्चन भी मुख्य भूमिका में नजर आए थे. इस फिल्म को लोगों ने काफी पसंद किया.

बच्चे की चाह में : क्या अपनी इज्जत बचा पाई राजो?

लेखक- प्रदीप कुमार शर्मा

भौंरा की शादी हुए 5 साल हो गए थे. उस की पत्नी राजो सेहतमंद और खूबसूरत देह की मालकिन थी, लेकिन अब तक उन्हें कोई औलाद नहीं हुई थी. भौंरा अपने बड़े भाई के साथ खेतीबारी करता था. दिनभर काम कर के शाम को जब घर लौटता, सूनासूना सा घर काटने को दौड़ता. भौंरा के बगल में ही उस का बड़ा भाई रहता था. उस की पत्नी रूपा के 3-3 बच्चे दिनभर घर में गदर मचाए रखते थे. अपना अकेलापन दूर करने के लिए राजो रूपा के बच्चों को बुला लेती और उन के साथ खुद भी बच्चा बन कर खेलने लगती. वह उन्हीं से अपना मन बहला लेती थी.

एक दिन राजो बच्चों को बुला कर उन के साथ खेल रही थी कि रूपा ने न जाने क्यों बच्चों को तुरंत वापस बुला लिया और उन्हें मारनेपीटने लगी. उस की आवाज जोरजोर से आ रही थी, ‘‘तुम बारबार वहां मत जाया करो. वहां भूतप्रेत रहते हैं. उन्होंने उस की कोख उजाड़ दी है. वह बांझ है. तुम अपने घर में ही खेला करो.’’

राजो यह बात सुन कर उदास हो गई. कौन सी मनौती नहीं मानी थी… तमाम मंदिरों और पीरफकीरों के यहां माथा रगड़ आई, बीकमपुर वाली काली माई मंदिर की पुजारिन ने उस से कई टिन सरसों के तेल के दीए में मंदिर में जलवा दिए, लेकिन कुछ नहीं हुआ. बीकमपुर वाला फकीर जबजब मंत्र फुंके हुए पानी में राख और पता नहीं कागज पर कुछ लिखा हुआ टुकड़ा घोल कर पीने को देता. बदले में उस से 100-100 के कई नोट ले लेता था. इतना सब करने के बाद भी उस की गोद सूनी ही रही… अब वह क्या करे?

राजो का जी चाहा कि वह खूब जोरजोर से रोए. उस में क्या कमी है जो उस की गोद खाली है? उस ने किसी का क्या बिगाड़ा है? रूपा जो कह रही थी, क्या सचमुच उस के घर में भूतप्रेत रहते हैं? लेकिन उस के साथ तो कभी ऐसी कोई अनहोनी घटना नहीं घटी, तो फिर कैसे वह यकीन करे? राजो फिर से सोच में डूब गई, ‘लेकिन रूपा तो कह रही थी कि भूतप्रेत ही मेरी गोद नहीं भरने दे रहे हैं. हो सकता है कि रूपा सच कह रही हो. इस घर में कोई ऊपरी साया है, जो मुझे फलनेफूलने नहीं दे रहा है. नहीं तो रूपा की शादी मेरे साथ हुई थी. अब तक उस के 3-3 बच्चे हो गए हैं और मेरा एक भी नहीं. कुछ तो वजह है.’

भौंरा जब खेत से लौटा तो राजो ने उसे अपने मन की बात बताई. सुन कर भौंरा ने उसे गोद में उठा लिया और मुसकराते हुए कहा, ‘‘राजो, ये सब वाहियात बातें हैं. भूतप्रेत कुछ नहीं होता. रूपा भाभी अनपढ़गंवार हैं. वे आंख मूंद कर ऐसी बातों पर यकीन कर लेती हैं. तुम चिंता मत करो. हम कल ही अस्पताल चल कर तुम्हारा और अपना भी चैकअप करा लेते हैं.’’

भौंरा भी बच्चा नहीं होने से परेशान था. दूसरे दिन अस्पताल जाने के लिए भाई के घर गाड़ी मांगने गया. भौंरा के बड़े भाई ने जब सुना कि भौंरा राजो को अस्पताल ले जा रहा है तो उस ने भौंरा को खूब डांटा. वह कहने लगा, ‘‘अब यही बचा है. तुम्हारी औरत के शरीर से डाक्टर हाथ लगाएगा. उसे शर्म नहीं आएगी पराए मर्द से शरीर छुआने में. तुम भी बेशर्म हो गए हो.’’ ‘‘अरे भैया, वहां लेडी डाक्टर भी होती हैं, जो केवल बच्चा जनने वाली औरतों को ही देखती हैं,’’ भौंरा ने समझाया.

‘‘चुप रहो. जैसा मैं कहता हूं वैसा करो. गांव के ओझा से झाड़फूंक कराओ. सब ठीक हो जाएगा.’’ भौंरा चुपचाप खड़ा रहा.

‘‘आज ही मैं ओझा से बात करता हूं. वह दोपहर तक आ जाएगा. गांव की ढेरों औरतों को उस ने झाड़ा है. वे ठीक हो गईं और उन के बच्चे भी हुए.’’ ‘‘भैया, ओझा भूतप्रेत के नाम पर लोगों को ठगता है. झाड़फूंक से बच्चा नहीं होता. जिस्मानी कमजोरी के चलते भी बच्चा नहीं होता है. इसे केवल डाक्टर ही ठीक कर सकता है,’’ भौंरा ने फिर समझाया.

बड़ा भाई नहीं माना. दोपहर के समय ओझा आया. भौंरा का बड़ा भाई भी साथ था. भौंरा उस समय खेत पर गया था. राजो अकेली थी. वह राजो को ऊपर से नीचे तक घूरघूर कर देखने लगा. राजो को ओझा मदारी की तरह लग रहा था. उस की आंखों में शैतानी चमक देख कर वह थोड़ी देर के लिए घबरा सी गई. साथ में बड़े भैया थे, इसलिए उस का डर कुछ कम हुआ.

ओझा ने ‘हुं..अ..अ’ की एक आवाज अपने मुंह से निकाली और बड़े भैया की ओर मुंह कर के बोला, ‘‘इस के ऊपर चुड़ैल का साया है. यह कभी बंसवारी में गई थी? पूछो इस से.‘‘ ‘‘हां बहू, तुम वहां गई थीं क्या?’’ बड़े भैया ने पूछा.

‘‘शाम के समय गई थी मैं,’’ राजो ने कहा.

‘‘वहीं इस ने एक लाल कपडे़ को लांघ दिया था. वह चुड़ैल का रूमाल था. वह चुड़ैल किसी जवान औरत को अपनी चेली बना कर चुड़ैल विद्या सिखाना चाहती है. इस ने लांघा है. अब वह इसे डायन विद्या सिखाना चाहती है. तभी से वह इस के पीछे पड़ी है. वह इस का बच्चा नहीं होने देगी.’’ राजो यह सुन कर थरथर कांपने लगी.

‘‘क्या करना होगा?’’ बड़े भैया ने हाथ जोड़ कर पूछा. ‘‘पैसा खर्च करना होगा. मंत्रजाप से चुड़ैल को भगाना होगा,’’ ओझा ने कहा.

मंत्रजाप के लिए ओझा ने दारू, मुरगा व हवन का सामान मंगवा लिया. दूसरे दिन से ही ओझा वहां आने लगा. जब वह राजो को झाड़ने के लिए आता, रूपा भी राजो के पास आ जाती.

एक दिन रूपा को कोई काम याद आ गया. वह आ न सकी. घर में राजो को अकेला देख ओझा ने पूछा, ‘‘रूपा नहीं आई?’’ राजो ने ‘न’ में गरदन हिला दी.

ओझा ने अपना काम शुरू कर दिया. राजो ओझा के सामने बैठी थी. ओझा मुंह में कुछ बुदबुदाता हुआ राजो के पूरे शरीर को ऊपर से नीचे तक हाथ से छू रहा था. ऐसा उस ने कई बार दोहराया, फिर वह उस के कोमल अंगों को बारबार दबाने की कोशिश करने लगा.

राजो को समझते देर नहीं लगी कि ओझा उस के बदन से खेल रहा है. उस ने आव देखा न ताव एक झटके से खड़ी हो गई. यह देख कर ओझा सकपका गया. वह कुछ बोलता, इस से पहले राजो ने दबी आवाज में उसे धमकाया, ‘‘तुम्हारे मन में क्या चल रहा है, मैं समझ रही हूं. तुम्हारी भलाई अब इसी में है कि चुपचाप यहां से दफा हो जाओ, नहीं ंतो सचमुच मेरे ऊपर चुड़ैल सवार हो रही है.’’

ओझा ने चुपचाप अपना सामान उठाया और उलटे पैर भागा. उसी समय रूपा आ गई. उस ने सुन लिया कि राजो ने अभीअभी अपने ऊपर चुड़ैल सवार होने की बात कही है. वह नहीं चाहती थी कि राजो को बच्चा हो. रूपा के दिमाग में चल रहा था कि राजो और भौंरा के बच्चे नहीं होंगे तो सारी जमीनजायदाद के मालिक उस के बच्चे हो जाएंगे.

भौंरा के बड़े भाई के मन में खोट नहीं था. वह चाहता था कि भौंरा और राजो के बच्चे हों. राजो को चुड़ैल अपनी चेली बनाना चाहती है, यह बात गांव वालों से छिपा कर रखी थी लेकिन रूपा जानती थी. उस की जबान बहुत चलती थी. उस ने राज की यह बात गांव की औरतों के बीच खोल दी. धीरेधीरे यह बात पूरे गांव में फैलने लगी कि राजो बच्चा होने के लिए रात के अंधेरे में चुड़ैल के पास जाती है. अब तो गांव की औरतें राजो से कतराने लगीं. उस के सामने आने से बचने लगीं. राजो उन से कुछ पूछती भी तो वे उस से

सीधे मुंह बात न कर के कन्नी काट कर निकल जातीं. पूरा गांव उसे शक की नजर से देखने लगा. राजो के बुलाने पर भी रूपा अपने बच्चों को उस के पास नहीं भेजती थी.

2-3 दिन से भौंरा का पड़ोसी रामदा का बेटा बीमार था. रामदा की पत्नी जानती थी कि राजो डायन विद्या सीख रही है. वह बेटे को गोद में उठा लाई और तेज आवाज में चिल्लाते हुए भौंरा के घर में घुसने लगी, ‘‘कहां है रे राजो डायन, तू डायन विद्या सीख रही है न… ले, मेरा बेटा बीमार हो गया है. इसे तू ने ही निशाना बनाया है. अगर अभी तू ने इसे ठीक नहीं किया तो मैं पूरे गांव में नंगा कर के नचाऊंगी.’’ शोर सुन कर लोगों की भीड़ जमा

हो गई. एक पड़ोसन फूलकली कह रही थी, ‘‘राजो ने ही बच्चे पर कुछ किया है, नहीं तो कल तक वह भलाचंगा खापी रहा था. यह सब इसी का कियाधरा है.’’

दूसरी पड़ोसन सुखिया कह रही थी, ‘‘राजो को सबक नहीं सिखाया गया तो वह गांव के सारे बच्चों को इसी तरह मार कर खा जाएगी.’’ राजो घर में अकेली थी. औरतों की बात सुन कर वह डर से रोने लगी. वह अपनेआप को कोसने लगी, ‘क्यों नहीं उन की बात मान कर अस्पताल चली गई. जेठजी के कहने में आ कर ओझा से इलाज कराना चाहा, मगर वह तो एक नंबर का घटिया इनसान था. अगर मैं उस की चाल में फंस गई होती तो भौंरा को मुंह दिखाने के लायक भी न रहती.’’

बाहर औरतें उसे घर से निकालने के लिए दरवाजा पीट रही थीं. तब तक भौंरा खेत से आ गया. अपने घर के बाहर जमा भीड़ देख कर वह डर गया, फिर हिम्मत कर के भौंरा ने पूछा, ‘‘क्या बात है भाभी, राजो को क्या हुआ है?’’ ‘‘तुम्हारी औरत डायन विद्या सीख रही है. ये देखो, किशुना को क्या हाल कर दिया है. 4 दिनों से कुछ खायापीया भी नहीं है इस ने,’’ रामधनी काकी

ने कहा. गुस्से से पागल भौंरा ने गांव वालों को ललकारा, ‘‘खबरदार, किसी ने राजो पर इलजाम लगाया तो… वह मेरी जीवनसंगिनी है. उसे बदनाम मत करो. मैं एकएक को सचमुच में मार डालूंगा. किसी में हिम्मत है तो राजो पर हाथ उठा करदेख ले,’’ इतना कह कर वह रूपा भाभी का हाथ पकड़ कर खींच लाया.

‘‘यह सब इसी का कियाधरा है. बोलो भाभी, तुम ने ही गांव की औरतों को यह सब बताया है… झूठ मत बोलना. सरोजन चाची ने मुझे सबकुछ बता दिया है.’’

सरोजन चाची भी वहां सामने ही खड़ी थीं. रूपा उन्हें देख कर अंदर तक कांप गई. उस ने अपनी गलती मान ली. भौंरा ओझा को भी पकड़ लाया, ‘‘मक्कार कहीं का, तुम्हारी सजा जेल में होगी.’’

दूर खड़े बड़े भैया की नजरें झुकी हुई थीं. वे अपनी भूल पर पछतावा कर रहे थे.

Husband Wife Story- स्नेह के सहारे: पति के जाने के बाद सरला का कौन बना सहारा

लेखिका- प्रमिला नानिवडेकर

रोज की तरह नहा कर माताजी बगीचे में पहुंचीं. वहां से उन की नजर पडो़सी के बगीचे में पडी़. वहां कोई वृद्ध व्यक्ति बड़े ध्यान से काम कर रहा था.

‘शायद इन को माली मिल गया है,’ माताजी बुदबुदाईं. फिर उन्होंने सोचा, ‘पर माली इतनी जल्दी उठ कर काम कर रहा है. फिर उस केघ्कपडे़ भी तो एकदम साफ हैं. ऊंह, होगा कोई उन का रिश्तेदार.’

उन्होंने अपने मन को उधर से हटाने का प्रयास किया. लेकिन उन का ध्यान बारबार पडो़स केघ्बगीचे की ओर ही चला जाता था. वह सोचने लगीं, ‘कौन होगा वह वृú सज्जन?’

कई दिनों के बाद उन के मन को कुछ सोचने लायक मसाला मिला था. कुछ वर्षों से वह अपनी बेटी सरला के साथ रह रही थीं. पहले जब सरला के पिता थे तब चेन्नई के नजदीक के एक छोटे से गांव में वह उन के साथ अपने घर में रहती थीं. पति के रिटायर होने के बाद भी उन्होंने अपने पति के साथ इस तरह का रोज का कार्यक्रम बना लिया था कि उन्हें समय बीतने का पता ही नहीं चलता था. साल में एक बार सरला अपने बच्चों के साथ आती थी. तब कुछ दिनों के लिए उस वृú दंपती का जीवन बच्चों केघ्शोरगुल से भर जाता था. उन्हें यह शोरगुल अच्छा लगता था, लेकिन सरला की वापसी केघ्बाद घर में छाने वाली शांति भी उन्हें बेहद अच्छी लगती थी.

पति के देहांत केघ्बाद उन्हें सरला केघ्पास ही रहना पडा़. सरला के पति सांबशिवन वायुसेना में अफसर थे. वह ही माताजी को समझा कर ले आए थे.

फ्अकेली गांव में क्या करोगी मांजी? फिर हम लोगों को भी आप की चिता लगी रहेगी. इस से अच्छा है कि घर बेचबाच कर पैसे बैंक में जमा करा दो और बुढा़पा हमारे साथ आराम से गुजारो, सांबशिवन ने कहा था.

माताजी ने घर बेचा तो नहीं था, पर किराए पर चढा़ दिया था. पति केघ्बीमे के पैसे भी बैंक में जमा करवा दिए थे. उस के ब्याज का भी कुछ आ ही जाता था. वैसे खानेपीने की सरला केघ्घर में भी कमी नहीं थी, पर सिर्फ शरीर की जरूरतें पूरी होने से ही क्या इनसान खुश रहता है?

वायुसेना के कैंप में बूढों़ की कमी थी. शहर से दूर, अंगरेजी बोलचाल, रहनसहन का अलग तरीका, आधुनिक विचारों वाले बच्चे. माताजी का दम पहलेपहल तो उस वातावरण में घुटता रहता था. पर अब उन्हें इस जीवन की आदत हो गई थी. अब वह आराम से बैठी रहती थीं और मन को इधरउधर बगीचे में लगाने की कोशिश करती थीं.

फ्सरला, बच्चों ने ब्रश भी नहीं किया और नाश्ता खा रहे हैं. तुम ने सिर चढा़ रखा है इन को, शुरू में वह कहती थीं तो सरला हंस देती थी. बच्चे नानी को ‘ओल्ड फैशन’ यानी पुराने रिवाजों वाली कह कर चिढा़ते थे. कभी वह नौकरानी के गंदे काम पर बरस पड़ती थीं तो सरला नौकरानी केघ्जाने के बाद समझाती थी, फ्अम्मां, आजकल नौकर मिलते ही नहीं हैं. अब तुम्हारे वाला पुराना जमाना गया. यह नौकरानी चली गई तो स्वयं काम करना पडे़गा.

फ्तो कर लेंगे, वह गुस्से में बोलतीं.

फ्अम्मां, तुम्हें तो बस, किचन, घर और धर्म के सिवा दूसरा कुछ सूझता ही नहीं है. मेरे पास दूसरे हजारों काम हैं. बच्चों को पढा़ना, सिलाई, बुनाई, लेडीज क्लब, सामाजिक जीवन आदि. इसलिए मेरा काम नौकर के बिना नहीं चल सकता.

माताजी को पता चल गया था कि यहां लोग दिखावे के बल पर ही ऊंचे स्तर के माने जाते हैं. यहां बैठक की सजावट, कालीन, परदे और पेंटिग को देखा और सराहा जाता है. चौके में गंदे हाथों वाली आया, बिना नहाए, बिना सब्जी या चावल धोए खाना बनाती है, यह कोई नहीं देखता. बच्चे मन चाहे, तब नहाते हैं, मन चाहे जो पढ़ते हैं. खूब फिल्म देखते हैं और अनुशासन के नाम से नाकभौं चढा़ते हैं. पर इस की यहां कोई परवा नहीं करता. यह सब देखदेख कर अम्मां कुढ़ती रहतीं, लेकिन कर कुछ नहीं पातीं. अपना घर छोड़ने के साथ उन केघ्अधिकार भी भूतकाल में गल गए थे. कभीकभार धीरज छोड़ कर वह कुछ कहतीं तो सरला समझाती, फ्अम्मां, तुम क्यों चिता करती हो? आराम से रहो. दुनिया कितनी आगे बढ़ गई है, तुम्हें क्या मालूम? सच, मुझे अगर तुम्हारे जितना आराम मिले तो मैं तो इधर की दुनिया उधर कर दूं. इस उम्र में घर के झंझट में दोबारा क्यों पड़ती हो?

लेकिन माताजी जानती थीं कि आराम भी एक हद तक ही किया जा सकता है. ज्यादा आराम व्यक्ति केघ्उत्साह को खत्म कर देता है.

माताजी पडो़स में आए वृú सज्जन के बारे में जानने केघ्लिए बहुत ही उत्सुक थीं. आखिर उन्होंने आया से पूछ ही लिया, फ्कौन हैं रे, वह बूढे़ बाबा?

फ्वह तो महंती साहब के चाचा हैं. अकेले हैं तो यहां रहने आ गए हैं, आया के पास पूरी जानकारी थी.

फ्पहले कहां थे?

फ्इन्हीं चाचाजी ने साहब को बडा़ किया, पढा़यालिखाया. पहले यह साहब के दूसरे भाईबहनों के साथ रहते थे. शादी नहीं की. भाई की मृत्यु के बाद भाई के परिवार के लिए ही इन्होंने अपनी जिदगी काट दी, आया ने पूरी बात बता दी. और माताजी उस से पूछती रहीं. हालांकि वह जानती थीं कि उन का आया से बतियाना भी सरला को पसंद नहीं.

अब माताजी  अकसर पडो़स के बगीचे की तरफ देखती रहतीं. कुछ ही समय में बगीचे में निखार आ गया था. रंगबिरंगे फूल क्यारियों में खिलने लगे थे. उन की देखादेखी माताजी भी थोेडा़बहुत अपना बगीचा संवारने लगीं.

एक दिन अचानक ही उन के कानों में आवाज आई, फ्लगता है, आप को भी बागबानी का शौक है.

माताजी ने चौंक कर देखा तो सामने वही वृú खडे़ थे. उन्होंने हाथ जोड़ कर नमस्ते कर दी. माताजी ने भी उत्तर में मुसकरा कर हाथ जोड़ दिए.

फिर इस के बाद उन की दोस्ती बढ़ती गई. दोनों बातें कर के समय गुजारने लगे और भाषा, जातपांत के कूडे़कचरे को नजरअंदाज करती हुई उन की मित्रता बढ़ती गई. अब वे घंटों बगीचे में खडे़ हो कर बातें करते. शाम को दोनों सब्जी लाने उत्साह से चल पड़ते. माताजी का चिड़चिडा़पन धीरेधीरे गुनगुनाहट में डूबता गया. चाचाजी भी अपने पास की दुनिया को मुसकान भरी आंखों से देखने लगे.

आया के जरिए माताजी को पता चल गया था कि बहू और भतीजे में चाचाजी के खर्चे को ले कर खटपट हो जाया करती है. एक आदमी के आने से उन का महीने का बजट चौपट हो गया था. बच्चों की फीस, शराब का खर्च, पत्नी की रमी और पति केघ्ब्रिज के अड्डों में अब कुछ अड़चनें सी आने लगी थीं.

फ्उन्हें भेज क्यों नहीं देते जेठजी के घर? श्रीमती महंती अपने पति से पूछतीं.

फ्वहां भी तो यही हाल है. उन्हें हम लोगों को छोड़ कर दूसरे किसी का सहारा नहीं है मालू. अगर हम चारों भाईबहन में से कोईघ्भी उन्हें नहीं रखेगा तो—

फ्तब उन्हें वृúाश्रम में भेज दो.

फ्क्या? तुम्हारी जबान इतनी चल कैसे गई? जिस ने हमारे लिए अपना घर नहीं बसाया, उसे मैं वृúाश्रम में छोड़ दूं? महंती चीखने लगे.

फ्मुझ से तो यह झंझट नहीं होगा. कभी चावल ज्यादा खिलाया तो गैस की तकलीफ, कभी रोटी ज्यादा खा गए तो पेट में गड़बड़.

फ्मालू, जरा तो खयाल करो. बुढा़पे पर उन का क्या बस चल सकता है.

फ्जब वह उस मद्रासी बुड्ढी के साथ हंसहंस कर बतियाते हैं तो बुढा़पा कहां गुम हो जाता है, श्रीमती महंती पूछतीं.

इधर सरला ने भी एक दिन झिझकते हुए माताजी से कह दिया, फ्अम्मां, चाचाजी से इतनी दोस्ती इस उम्र में अच्छी नहीं लगती. लोग मजाक उडा़ते हैं.

माताजी बिफर गईं. बोलीं, फ्अच्छे हैं तुम्हारे लोगबाग. पेड़ को सूखते हुए देख कर लोटा भर पानी तो देेंगे नहीं, अगर दूसरा कोई दे भी रहा हो तो जलेंगे भी. क्या हम लोगों को किसी बात करने वाले साथी की जरूरत नहीं है?

फ्मैं ने मना कब किया है? लेकिन— उसे आगे के शब्द नहीं सूझ रहे थे.

फ्हां, तुम्हारी सोसाइटी में स्त्रियां

औरों केघ्साथ खुलेआम नाच  तो सकती हैं, अविवाहित लड़केलड़कियां डेटिग तो कर सकते हैं लेकिन 2 बूढे़, जिन से कोई बात करने वाला नहीं, आपस में भी बातें नहीं कर सकते. यही सोसाइटी है तुम्हारी. वाहवाह.

एक दिन चाचाजी ने भतीजे से कहा,  फ्बेटे, मैं सोचता हूं कि मैं किसी आश्रम में जा कर अपना समय बिता दूं. तुम सभी भाई थोडे़थोडे़ पैसे भेजते रहोगे तो मेरा खर्च तो… मुझे पता है बेटे कि तुम्हारी तनख्वाह तुम्हारे लिए ही पर्याप्त नहीं, पर मैं—मेरा तोे कुछ है ही नहीं. बोझ बनना पड़ रहा है तुम सब पर—

महंती ने उन के पांव पकड़ लिए, फ्चाचाजी, हमें शमिरंा््दा न करें. मालू तो मूर्ख है. मैं उसे समझा दूंगा.

फ्नहीं बेटे, वह मूर्ख नहीं है. मूर्ख मैं हूं जो स्वावलंबी नहीं हूं. नौकरी सरकारी नहीं थी तो पेंशन कहां से मिलती. फिर भी, काश, मैं कुछ बचा कर रखता.

चाचाजी के इस सुझाव के बारे में जब माताजी को पता चला तो उन की आंखें भर आईं. मौका मिलते ही उन्होंने चाचाजी से कहा, फ्तुम मेरे साथ चलो, मेरा एक छोटा सा घर है गांव में. हां, भाषा तुम्हारी नहीं, पर मैं हूं वहां. मेरे साथ रहो. मैं भी तो नितांत अकेली हूं.

चाचाजी अवाक देखते रहे. फिर बोले, फ्लोग क्या कहेंगे, इस उम्र में हमारी दोस्ती लोगों की नजर में पवित्र नहीं हो सकती.

फ्तो हम शादी कर लेंगे. सच, मैं इस भरी दुनिया की तनहाई से तंग आ गई हूं. उस छोटे गांव में, अपने घर में शांति से रहना चाहती हूं. तुम भी चलो. दोनों के बाकी दिन कट जाएंगे, स्नेह केघ्सहारे.

फ्लेकिन लोग—लोग क्या कहेंगे? इतने बुढा़पे में शादी? फिर मैं तो—

फ्मुझे पता है कि तुम निर्धन हो, लेकिन तुम्हारे पास छलकते स्नेह और त्याग की जो दौलत है, उस की कोई कीमत नहीं है. और हां, उन लोगों की क्या परवा करनी जो तुम्हारी इस दौलत की कीमत नहीं जानते. फिर अब हमें कहां अपने बच्चे ब्याहने जाना है? वह हंस पडीं़.

फिर एक दिन उस फूलों से लदे बगीचे के पास एक टैक्सी आ कर रुकी. उस में से फूलों के हार पहने चाचाजी व माताजी उतरे. दोनों ने शादी कर ली थी. उसी टैक्सी में अपनाअपना सामान लदवा कर माताजी और चाचाजी गांव जाने के लिए स्टेशन चले गए.

इस के बाद सारे कैंप में ‘बूढी़ घोडी़, लाल लगाम’ के नारे, लतीफे और कहकहे कई दिनों तक गूंजते रहे. महंती और सांबशिवन का परिवार शरम के मारे कई दिनों तक मुंह छिपाए घर में बैठा रहा. घर से बाहर आने पर दोनों परिवारों ने गैरों से भी बढ़ कर अपने उन बूढों को गालियां दीं.

लेकिन उन बूढों के कानों तक यह सबकुछ कभी नहीं पहुंचा. वे दोनों आदमी स्नेह केघ्सहारे लंबी लगने वाली जिदगी को मजे से जीते रहे. अब वे अकेले जो नहीं रह गए थे.

इच्छा मृत्यु: क्यों भाई के लिए लाचार था डेनियल

‘‘मि. सिंह, क्या आप कुछ घंटे के लिए अपनी कार मुझे दे सकते हैं?’’ डेनियल डिपो ने संकोच भरे स्वर में कहा.

लहना सिंह ने हिसाबकिताब के रजिस्टर से अपना सिर उठाया और पढ़ने का चश्मा उतार कर सामने देखा. उस का स्थायी ग्राहक डेनियल डिपो, जो एक नीग्रो था, सामने खड़ा था.

उस के चेहरे पर याचना और संकोच के मिलजुले भाव थे. उस ने एक सस्ता ओवर कोट और हैट पहना हुआ था.

‘‘ओह, मि. डिपो, हाउ आर यू? क्या परेशानी है?’’ लहना सिंह ने आत्मीयता से पूछा.

‘‘आज ट्यूब बंद है. रेललाइन की मरम्मत चल रही है. मुझे परिवार सहित न्यूयार्क के बड़े अस्पताल अपने छोटे भाई को देखने जाना है. यहां का बस अड्डा दूर है. कैब (टैक्सी) का भाड़ा काफी महंगा पड़ता है. अगर आप की कार खाली हो तो…’’ डेनियल के स्वर में संकोच स्पष्ट झलक रहा था.

‘‘हांहां, क्यों नहीं, हमें आज कहीं नहीं जाना है. आप शौक से ले जाइए,’’ कहते हुए लहना सिंह ने कार की चाबी डेनियल को थमा दी.

‘‘थैंक्यू, थैंक्यू, मि. सिंह,’’ आभार व्यक्त करता डेनियल चाबी ले कर ग्रोसरी स्टोर के एक तरफ खड़ी कार की ओर बढ़ चला.

लहना सिंह को न्यूयार्क के एक उपनगर में किराने की बड़ी दुकान, जिसे ग्रोसरी स्टोर कहा जाता था, चलाते हुए 20 वर्ष से भी ज्यादा समय हो चुका था. उस ने शुरुआत छोटी सी दुकान के तौर पर की थी पर धीरेधीरे वह दुकान बड़े ग्रोसरी स्टोर में बदल गई थी.

भारत की तरह अमेरिका के महानगरों, शहरों और कसबों के आसपास निम्नवर्गीय और मध्यमवर्गीय बस्तियां भी बसी हुई थीं. इन बस्तियों में रहने वाले परिवारों की जरूरतें भी आम भारतीय परिवारों जैसी ही थीं.

इन बस्तियों और परिवारों में रहने वालों की मानसिकता को समझने के बाद लहना सिंह को अपना व्यापार चलाने में थोड़ा समय ही लगा था.

आरंभ में उस की यह धारणा थी कि अमेरिका जैसे विकसित देश में महंगा और बढि़या खानेपीने का सामान ही बिक सकता था. मगर इस उपनगर में बसने के बाद उस की यह सोच बदल गई थी.

सस्ते और मोटे अनाज, सस्ते खाद्य तेल, साबुन, शैंपू, झाड़ू और अन्य सस्ते सामान की मांग यहां भी भारत के समान ही थी.

जिस तरह भारत का आम आदमी बड़े और महंगे डिपार्टमेंटल स्टोरों में कदम रखने से कतराता था लगभग वही स्थिति यहां के आम निम्नवर्गीय लोगों की भी थी.

भारत के बड़े डिपार्टमेंटल स्टोरों में जैसे आम आदमी को उधार सामान मिलना संभव नहीं था, वैसे ही हालात आम अमेरिकी के लिए अमेरिका में भी थे. अमेरिका का निम्न बस्ती में बसने वाला परिवार चाहे श्वेत हो या अश्वेत, उधार सामान देने वाले दुकानदार को ही प्राथमिकता देता है.

लहना सिंह ने इस मानसिकता को समझ लिया और उस ने धीरेधीरे निम्न व मध्यम वर्ग के लोगों में संपर्क बनाने शुरू किए. शुरुआत में थोड़े समय की थोड़ी रकम की उधार, फिर थोड़ी बड़ी उधार दे अपनी दुकान अच्छी जमा ली थी.

उस के ग्राहकों में अब श्वेत अमेरिकियों की तुलना में अश्वेत अमेरिकी, जिन्हें आम भाषा में ‘निगर’ कहा जाता है, थोड़े ज्यादा थे. दरअसल, इस उपनगर के करीब नीग्रो की बस्तियां ज्यादा थीं.

शुरुआत में लहना सिंह को इस उपनगर में दुकान खोलने में डर लगा था. कारण, उस के दिमाग में यह धारणा बनी कि नीग्रो उत्पाती और लुटेरे होते हैं. उन का काम ही बस लूटपाट करना है मगर बाद में यह धारणा अपनेआप बदल गई.

उस के साथी दुकानदारों, जिन में ज्यादातर उसी के समान सिख थे, ने उस को बताया था कि बदअमनी, लूटपाट, जबरन धन वसूली की घटनाएं अमेरिकी इन निम्नवर्ग वाले लोगों की बस्तियों की तुलना में अमेरिकी शहरों या महानगरों में ज्यादा थीं और भारत के अनेक प्रदेशों, जैसे बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश के कसबों में और भी ज्यादा थीं.

इन निगर कहे जाने वाले काले अमेरिकियों से मैत्रीसंबंध बनाने में लहना सिंह और अन्य एशियाई दुकानदारों व व्यापारियों को कोई ज्यादा समय नहीं लगा और दूसरी कोई दिक्कत भी पेश न आई.

जिस तरह किसी खूंखार पशु या जानवर को उस के अनुकूल व्यवहार और आहार दे कर वश में किया जा सकता है उसी तरह इन उत्पाती समझे जाने वाले काले हब्शियों को समयसमय पर सामान और डालर उधार दे कर और कभीकभार उन के साथ खानापीना खा कर लहना सिंह ने दोस्ताना संबंध बना लिए थे.

वह बेखौफ उन की बस्तियों में जा कर घूमफिर आता था, सामान दे आता था और उगाही कर आता था.

शाम को डेनियल उस की कार वापस करने आया. वह चाबी थमाते बारबार आभार व्यक्त करता थैंक्यू

मि. सिंह, थैंक्यू मि. सिंह बोल रहा था.

‘‘कोई बात नहीं मि. डेनियल, बहुत मामूली बात है.’’

‘‘मि. सिंह, मैं ने कार की टंकी में गैस भरवा दी है.’’

‘‘उस की क्या जरूरत थी. मामूली खर्च की बात है.’’

‘‘ओ.के. मि. सिंह, अब मैं चलूंगा.’’

‘‘एक कप कौफी तो पीजिए, भाई कैसा है आप का?’’

डेनियल की आंखें नम हो गईं. वह आर्द्र स्वर में बोला, ‘‘मि. सिंह, हम से उस की तकलीफ नहीं सही जाती है. वह बारबार जहर का इंजेक्शन लगाने को कहता है. डाक्टर बिना सरकारी आदेश के ऐसा करने में असमर्थता जताता है.’’

लहना सिंह ने आत्मीयता के साथ डेनियल का हाथ पकड़ कर उसे सोफे पर बैठाते हुए कौफी का कप पकड़ा दिया. डेनियल इस स्नेह स्पर्श से और भी नम हो उठा. वह चुपचाप कौफी पीने लगा.

डेनियल का छोटा भाई किसी जानलेवा लाइलाज बीमारी से ग्रस्त सरकारी अस्पताल में भरती था. इलाज के सभी प्रयास निष्फल रहे थे. अब उस की इच्छा मृत्यु यानी दया मृत्यु की याचिका अमेरिका के राष्ट्रपति के पास विचाराधीन थी.

कौफी समाप्त कर डेनियल उठा और धन्यवाद कह कर जाने लगा. लहना सिंह ने उस को ढाढ़स बंधाते हुए कहा, ‘‘मि. डेनियल, मैं कल आप के यहां आऊंगा.’’

अगले दिन लहना सिंह अपने लड़के को स्टोर संभालने को कह कर निगर बस्ती की तरफ चल पड़ा. आम भारतीय कसबों की तरह छोटी, संकरी, कच्चीपक्की गलियों से बनी यह बस्ती एक तरह की स्लम ही थी.

निगर बस्ती में मकानों की छतें ऊंचीनीची थीं. गलियों में कपड़े सूखने के लिए तारों पर लटके थे. कई जगह गलियों में पानी जमा था. ढाबेनुमा दुकान के बाहर खड़ेखड़े लोग खापी रहे थे. मांस खाने के बाद हड्डियां यहांवहां बिखरी पड़ी थीं.

एक पबनुमा दुकान के बाहर बीयर का मग थामे नौजवान लड़के- लड़कियां बीयर पी रहे थे. उन में हंसीमजाक हो रहा था. कोई वायलिन बजा रहा था, कोई माउथआरगन से धुनें निकाल रहा था.

अमेरिका की इन निम्न बस्तियों में छेड़छाड़ की घटनाएं कम सुनने में आतीं. कारण, लड़केलड़कियों का खुला मेलजोल होना, डेटिंग पर जाना आम बात थी.

भारत और अमेरिका के निम्न- मध्यवर्गीय लोगों में एक बात एक जैसी थी कि आदमी आदमी के करीब था. भारत में भी जैसेजैसे व्यक्ति पैसे वाला होता है वैसेवैसे वह आम आदमी से दूर होता जाता है.

स्वयं में सिमटने की प्रवृत्ति पाश्चात्य और अमेरिकी देशों में अमीरी बढ़ने के कई दशक पहले बढ़ चुकी थी. वही प्रवृत्ति अब भारत के नवधनाढ्य वर्ग में बढ़ रही है.

लहना सिंह का परिवार भारत में आम और निम्नवर्गीय लोगों के लिए दुकानदारी करता था अब अमेरिका में भी वह इन्हीं तबकों का दुकानदार था.

अमेरिका आने पर लहना सिंह कई महीने न्यूयार्क में कैब यानी टैक्सी चलाता रहा. सप्ताहांत में छुट्टी बिताने पबों, बारों, डिस्कोथैकों में जाता था, जहां उच्च वर्ग के लोग आते थे. उन के चेहरों पर बनावटी मुसकराहट, बनावटी हंसी, झलकती थी. बदन से बदन सटा कर नाचने वाले कितने एकदूसरे के समीप थे यह सभी जानते थे.

उन की तुलना में ये गरीब तबके के लोग खुल कर हंसते और एकदूसरे के समीप थे. दुखसुख में साथ देते थे.

डेनियल उस का इंतजार कर रहा था. उस के यहां लहना सिंह आमतौर पर आताजाता था. किराने का सामान साइकिल की टोकरी या कैरियर पर रख कर थमा जाता था. नियत तारीख पर भुगतान ले जाता था. ऐसा उस बस्ती के अनेक घरों के साथ था.

डेनियल की पत्नी ने लहना सिंह का अभिवादन किया. फिर सभी कौफी पीने लगे. घर का माहौल थोड़ी उदासी भरा था. संवेदना के स्वर हर जगह समान रूप से अपने सुरों का प्रभाव छोड़ते ही हैं.

इधरउधर की सामान्य बातों के बाद लहना सिंह ने डेनियल से उस के छोटे भाई के बाबत पूछा.

‘‘राष्ट्रपति के पास विचाराधीन पड़ी मर्सी किलिंग पेटिशन का फैसला दोचार दिन में होने की संभावना है,’’ डेनियल ने गम भरे स्वर में कहा.

‘‘क्या इस के बिना कोई और रास्ता नहीं है?’’

‘‘निरंतर तकलीफ झेलते, तिलतिल कर मरने के बजाय अगर उसे एकबारगी मुक्ति दिला दी जाए तो क्या अच्छा नहीं है?’’

डेनियल के चेहरे से पीड़ा साफ झलक रही थी.

लहना सिंह भी अवसाद से भर उठा. कहां तो हर कोई मृत्यु से बचने की कोशिश करता था. कहां अब मृत्यु की इच्छा करते मार दिए जाने की दरख्वास्त लगा कर मौत का इंतजार कर रहा था.

‘‘आप अस्पताल कब जाओगे?’’

‘‘रोज ही जाता हूं. आज बड़े लड़के को भेजा है.’’

‘‘भाई का खानापीना?’’

‘‘क्या खा सकता है वह? ट्यूब नली द्वारा उसे तरल भोजन दिया जाता है. सब सरकारी खाना होता है. हम चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते, न कोई दवा दे सकते हैं, न कोई खुराक.’’

‘‘कल मैं भी चलूंगा.’’

अगले दिन लहना सिंह और डेनियल भूमिगत रेल, जिसे भारत में मेट्रो और अमेरिका व इंगलैंड में ट्यूब कहा जाता है, के द्वारा सरकारी अस्पताल पहुंचे.

एक बड़े बेड पर आक्सीजन मास्क नाक और आधे चेहरे पर चढ़ाए डेनियल का छोटा भाई लेटा था. उस की आंखें अधखुली थीं. उस के चेहरे पर गहन पीड़ा के भाव साफ दिखाई पड़ रहे थे.

भाई ने भाई को देखा. दोनों ही लाचार थे. बड़ा छोटे को बचाना चाहते हुए भी बचा नहीं पा रहा था. छोटा उसे ज्यादा समय परेशानी नहीं देना चाहता था. संवेदना अपनेआप को खामोश रास्ते से व्यक्त कर रही थी.

अवसाद से भरा लहना सिंह डेनियल का कंधा थपथपा लौट आया था.

2 दिन बाद, राष्ट्रपति द्वारा दयामृत्यु की याचिका स्वीकार कर ली गई थी. आज जहर के इंजेक्शन द्वारा मृत्युदान दिया जाना था.

सगेसंबंधी, मित्र, पड़ोसी, लहना सिंह और अनेक समाचारपत्रों के संवाददाता डैथ चेंबर के शीशे से अंदर झांक रहे थे.

जहर का इंजेक्शन देने को नियुक्त डाक्टर का चेहरा भी अवसाद भरा था. उसे जल्लाद की भूमिका निभानी थी. डाक्टर का काम किसी की जान बचाना होता है, जान लेना नहीं. मगर कर्तव्य कर्तव्य था.

डाक्टर ने एकबारगी बाहर की तरफ देखा फिर सिरिंज बांह में पिरो कर उस में भरा द्रव्य शरीर में दाखिल कर दिया. मरने की इच्छा करने वाली आंखें धीरेधीरे बंद होती गईं. सर्वत्र खामोशी छा गई थी.

ताबूत को कब्र में उतार उस पर मिट्टी समतल कर एक पत्थर लगा दिया गया था. फूलों के गुलदस्ते कब्र पर चढ़ा सभी भारी मन से कब्रिस्तान से बाहर आ रहे थे.

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