मृदुभाषिणी: क्यों बौना लगने लगा शुभा को मामी का चरित्र

कई बार ऐसा भी होता है कि हम किसी को आदर्श मान कर, जानेअनजाने उसी को मानो घोल कर पी जाते हैं.

सुहागरात को दुलहन बनी शुभा से पति ने प्रथम शब्द यही कहे थे, ‘मेरी एक मामी हैं. वे बहुत अच्छी हैं. हमारे घर में सभी उन की प्रशंसा करते हैं. मैं चाहता हूं, भविष्य में तुम उन का स्थान लो. सब कहें कि बहू हो तो शुभा जैसी. मैं चाहता हूं जैसे वे सब को पसंद हैं, वैसे ही तुम भी सब की पसंद बन जाओ.’

पति ने अपनी धुन में बोलतेबोलते एक आदर्श उस के सामने प्रस्तुत कर दिया था. वास्तव में शुभा को भी पति की मामी बहुत पसंद आई थीं, मृदुभाषिणी व धीरगंभीर. वे बहुत स्नेह से शुभा को खाना खिलाती रही थीं. उस का खयाल रखती रही थीं. नई वधू को क्याक्या चाहिए, सब उन के ध्यान में था. सत्य है, अच्छे लोग सदा अच्छे ही लगते हैं, उन्होंने सब का मन मोह रखा था.

वक्त बीतता गया और शुभा 2 बच्चों की मां बन गई. मामी से मुलाकात होती रहती थी, कभी शादीब्याह पर तो कभी मातम पर. शुभा की सास अकसर कहतीं, ‘‘देखा मेरी भाभी को, कभी ऊंची आवाज में बात नहीं करतीं.’’

शुभा अकसर सोचती, ‘2-3 वर्ष के अंतराल के उपरांत जब कोई मनुष्य किसी सगेसंबंधी से मिलता है, तब भला उसे ऊंचे स्वर में बात करने की जरूरत भी क्या होगी?’ कभीकभी वह इस प्रशंसा पर जरा सा चिढ़ भी जाती थी.

एक शाम बच्चों को पढ़ातेपढ़ाते उस ने जरा डांट दिया तो सास ने कहा, ‘‘कभी अपनी मामी को ऊंचे स्वर में बात करते सुना है?’’

‘‘अरे, बच्चों को पढ़ाऊंगी तो क्या चुप रह कर पढ़ाऊंगी? क्या सदा आप मामीमामी की रट लगाए रखती हैं. अपने घर में भी क्या वे ऊंची आवाज में बात नहीं करती होंगी?’’ बरसों की कड़वाहट सहसा निकली तो बस निकल ही गई, ‘‘अपने घर में भी मुझे कोई आजादी नहीं है. आप लोग क्या जानें कि अपने घर में वे क्याक्या करती होंगी. दूसरी जगह जा कर तो हर इंसान अनुशासित ही रहता है.’’

‘‘शुभा,’’ पति ने बुरी तरह डांट दिया.

वह प्रथम अवसर था जब उस की मामी के विषय में शुभा ने कुछ अनचाहा कह दिया था. कुछ दिन सास का मुंह भी चढ़ा रहा था. उन के मायके की सदस्य का अपमान उन से सहा न गया. लेदे कर वही तो थीं, जिन से सासुमां की पटती थी.

धीरेधीरे समय बीता और मामाजी के दोनों बच्चों की शादियां हो गईं. शुभा उन के शहर न जा पाई क्योंकि उसे घर पर ही रहना था. सासुमां ने महंगे उपहार दे कर अपना दायित्व निभाया था.

ससुरजी की मृत्यु के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी शुभा के कंधों पर आ गई थी. सीमित आय में हर किसी से निभाना अति विकट था, फिर भी जोड़जोड़ कर शुभा सब निभाने में जुटी रहती.

पति श्रीनगर गए तो उस के लिए महंगी शौल ले आए. इस पर शुभा बोली, ‘‘इतनी महंगी शौल की क्या जरूरत थी. अम्मा के लिए क्यों नहीं लाए?’’

‘‘अरे भई, इस पर किसी का नाम लिखा है क्या. दोनों मिलजुल कर इस्तेमाल कर लिया करना.’’ शुभा ने शौल सास को थमा दी. कुछ दिनों बाद कहीं जाना पड़ा तो शुभा ने शौल मांगी तो पता चला कि अम्मा ने मामी को पार्सल करवा दी.

यह सुन शुभा अवाक रह गई, ‘‘इतनी महंगी शौल आप ने…’’

‘‘अरे, मेरे बेटे की कमाई की थी, तुझे क्यों पेट में दर्द हो रहा है?’’

‘‘अम्मा, ऐसी बात नहीं है. इतनी महंगी शौल आप ने बेवजह ही भेज दी. हजार रुपए कम तो नहीं होते. ये इतने चाव से लाए थे.’’

‘‘बसबस, मुझे हिसाबकिताब मत सुना. अरे, मैं ने अपने बेटे पर हजारों खर्च किए हैं. क्या मुझे इतना भी अधिकार नहीं, जो अपने किसी रिश्तेदार को कोई भेंट दे सकूं?’’

अम्मा ने बहू की नाराजगी जब बेटे के सामने प्रकट की, तब वह भी हैरान रह गया और बोला, ‘‘अम्मा, मैं पेट काटकाट कर इतनी महंगी शौल लाया था. पर तुम ने बिना वजह उठा कर मामी को भेज दी. कम से कम हम से पूछ तो लेतीं.’’

इस पर अम्मा ने इतना होहल्ला मचाया कि घर की दीवारें तक दहल गईं. शुभा और उस के पति मन मसोस कर रह गए.

‘‘पता नहीं अम्मा को क्या हो गया है, सदा ऐसी जलीकटी सुनाती रहती हैं. इतनी महंगाई में अपना खर्च चलाना मुश्किल है, उस पर घर लुटाने की तुक मेरे तो पल्ले नहीं पड़ती,’’ शौल का कांटा शुभा के पति के मन में गहरा उतर गया था.

कुछ समय बीता और एक शाम मामा की मृत्यु का समाचार मिला. रोतीपीटती अम्मा को साथ ले कर शुभा और उस के पति ने गाड़ी पकड़ी. बच्चों को ननिहाल छोड़ना पड़ा था.

क्रियाकर्म के बाद रिश्तेदार विदा होने लगे. मामी चुप थीं, शांत और गंभीर. सदा की भांति रो भी रही थीं तो चुपचाप. शुभा को पति के शब्द याद आने लगे, ‘हमारी मामी जैसी बन कर दिखाना, वे बहुत अच्छी हैं.’

शुभा के पति और मामा का बेटा अजय अस्थियां विसर्जित कर के लौटे तो अम्मा फिर बिलखबिलख कर रोने लगीं, ‘‘कहां छोड़ आए रे, मेरे भाई को…’’

शुभा खामोशी से सबकुछ देखसुन रही थी. मामी का आदर्श परिवार पिछले 20 वर्षों से कांटे की शक्ल में उस के हलक में अटका था. उन के विषय में जानने की मन में गहरी जिज्ञासा थी. मामी की बहू मेहमाननवाजी में व्यस्त थी और बेटी उस का हाथ बंटाती नजर आ रही थी. एक नौकर भी उन की मदद कर रहा था.

बहू का सालभर का बच्चा बारबार रसोई में चला जाता, जिस के कारण उसे असुविधा हो रही थी. शुभा बच्चा लेना चाहती, मगर अपरिचित चेहरों में घिरा बच्चा चीखचीख कर रोने लगता.

‘‘बहू, तुम कुछ देर के लिए बच्चे को ले लो, नाश्ता मैं बना लेती हूं,’’ शुभा के अनुरोध पर बीना बच्चे को गोद में ले कर बैठ गई.

जब शुभा रसोई में जाने लगी तो बीना ने रोक लिया, ‘‘आप बैठिए, छोटू है न रसोई में.’’

मामी की बहू अत्यंत प्यारी सी, गुडि़या जैसी थी. वह धीरेधीरे बच्चे को सहला रही थी कि तभी कहीं से मामी का बेटा अजय चला आया और गुस्से में बोला, ‘‘तुम्हारे मांबाप कहां हैं? वे मुझ से मिले बिना वापस चल गए? उन्हें इतनी भी तहजीब नहीं है क्या?’’

‘‘आप हरिद्वार से 2 दिनों बाद लौटे हैं. वे भला आप से मिलने का इंतजार कैसेकर सकते थे.’’

‘‘उन्हें मुझ से मिल कर जाना चाहिए था.’’

‘‘वे 2 दिन और यहां कैसे रुक जाते? आप तो जानते हैं न, वे बेटी के घर का नहीं खाते. बात को खींचने की क्या जरूरत है. कोई शादी वाला घर तो था नहीं जो वे आप का इंतजार करते रहते.’’

‘‘बकवास बंद करो, अपने बाप की ज्यादा वकालत मत करो,’’ अजय तिलमिला गया.

‘‘तो आप क्यों उन्हें ले कर इतना हंगामा मचा रहे हैं? क्या आप को बात करने की तमीज नहीं है? क्या मेरा बाप आप का कुछ नहीं लगता?’’

‘‘चुप…’’

‘‘आप भी चुप रहिए और जाइए यहां से.’’

शुभा अवाक रह गई. उस के सामने  ही पतिपत्नी भिड़ गए थे. ज्यादा  दोषी उसे अजय ही नजर आ रहा था. खैर, अपमानित हो कर वह बाहर चला गया और बहू रोने लगी.

‘‘जब देखो, मेरे मांबाप को अपमानित करते रहते हैं. मेरे भाई की शादी में भी यही सब करते रहे, वहां से रूठ कर ही चले आए. एक ही भाई है मेरा, मुझे वहां भी खुशी की सांस नहीं लेने दी. सब के सामने ही बोलना शुरू कर देंगे. कोई इन्हें मना भी नहीं करता. कोई समझाता ही नहीं.’’

शुभा क्या कहती. फिर जरा सा मौका मिलते ही शुभा ने मामी की समझदार बेटी से कहा, ‘‘जया, जरा अपने भाई को समझाओ, क्यों बिना वजह सब के सामने पत्नी का और उस के मांबाप का अपमान कर रहा है. तुम उस की बड़ी बहन हो न, डांट कर भी समझा सकती हो. कोई भी लड़की अपने मांबाप का अपमान नहीं सह सकती.’’

‘‘उस के मांबाप को भी तो अपने दामाद से मिल कर जाना चाहिए था. बीना को भी समझ से काम लेना चाहिए. क्या उसे पति का खयाल नहीं रखना चाहिए. वह भी तो हमेशा अजय को जलीकटी सुनाती रहती है?’’

शुभा चुप रह गईर् और देखती रही कि बीना रोतेरोते हर काम कर रही है. किसी ने उस के पक्ष में दो शब्द भी नहीं कहे.

खाने के समय सारा परिवार इकट्ठा हुआ तो फिर अजय भड़क उठा, ‘‘अपने बाप को फोन कर के बता देना कि मैं उन लोगों से नाराज हूं. आइंदा कभी उन की सूरत नहीं देखूंगा.’’

तभी शुभा के पति ने उसे बुरी तरह डपट दिया, ‘‘तेरा दिमाग ठीक है कि नहीं? पत्नी से कैसा सुलूक करना चाहिए, यह क्या तुझे किसी ने नहीं सिखाया? मामी, क्या आप ने भी नहीं?’’ लेकिन मामी सदा की तरह चुप थीं.

शुभा के पति बोलते रहे, ‘‘हर इंसान की इज्जत उस के अपने हाथ में होती है. पत्नी का हर पल अपमान कर के, वह भी 10 लोगों के बीच में, भला तुम अपनी मर्दानगी का कौन सा प्रमाण देना चाहते हो? आज तुम उस का अपमान कर रहे हो, कल को वह भी करेगी, फिर कहां चेहरा छिपाओगे? अरे, इतनी संस्कारी मां का बेटा ऐसा बदतमीज.’’

वहां से लौटने के बाद भी शुभा मामी के अजीबोगरीब व्यवहार के बारे में ही सोचती रही कि अजय की गलती पर वे क्यों खामोश बैठी रहीं? गलत को गलत न कहना कहां तक उचित है?

एक दिन शुभा ने गंभीर स्वर में पति से कहा, ‘‘मैं आप की मामी जैसी नहीं बनना चाहती. जो औरत पुत्रमोह में फंसी, उसे सही रास्ता न दिखा सके, वह भला कैसी मृदुभाषिणी? क्या बहू के पक्ष में वे कुछ नहीं कह सकती थीं, ऐसी भी क्या खामोशी, जो गूंगेपन की सीमा तक पहुंच जाए.’’

यह सुन कर भी शुभा के पति और सास दोनों ही खामोश रहे. उन्हें इस समय शायद कोई जवाब सूझ ही नहीं रहा था.

प्रतिध्वनि: सुलभा डिप्रैशन में क्यों रहने लगी थी

अशोक आज किचन में ब्रैड पर ऐक्सपैरिमैंट कर रहा था. सुलभा कंप्यूटर पर अपने औफिस का काम कर रही थी. नरेंद्र आइलैंड किचन के दूसरी तरफ बैठा बतिया भी रहा था और खा भी रहा था.

नरेंद्र ने एक नजर मेरी ओर डाली, फिर आंखें अपनी प्लेट पर टिका लीं. तभी सुलभा ने दहीवड़े को डोंगा उठा कर कहा, ‘‘नरेंद्र एक और ले लीजिए. देखिए तो आप की पसंद के बने हैं. कल मैं ने खुद बनाए थे… खास रैसिपी है.

‘‘बस अब और नहीं चाहिए सुलभा,’’ उस के यह कहते हुए भी सुलभा ने एक वड़ा प्लेट में डाल ही दिया. साथ ही कहा, ‘‘तुम्हें पसंद हैं न प्लीज, एक मेरे कहने से ले लीजिए.’’

अशोक ने हाथ के इशारे से मना भी किया, पर सुलभा ने वड़ा डाल कर तभी चाउमिन का डोंगा उठा लिया.

सुलभा का पति अशोक नरेंद्र से बोला, ‘‘सुलभा को पता है कि तुम्हें क्या पसंद है. इसे दूसरों को उन की पसंद का खाना खिला कर बड़ा संतोष मिलता है. तुम से क्या बताऊं. इसे जाने कैसे पता लग जाता है. सभी को इस का बनाया खाना पसंद आता है. मेरी ब्रैड का क्या इस ने आदर नहीं किया.’’

कोविड के बाद से अशोक ने खाना बनाना शुरू कर दिया था पर वह ब्रैड, पिज्जा और बेक्ड पर ही ज्यादा जोर देता था. जब से किचन में घुसने लगा है तब से सुलभा को लगने लगा है कि उस का एकछत्र राज चला गया है. हालांकि ज्यादा खाना किचन हैल्प शंकर बनाता है पर अभी 15 दिन से वह गांव गया हुआ है इसलिए हम दोनों बना रहे हैं और किचन में भी हमारा कंपीटिशन चलता है.

इस कंपीटिशन के शिकार कभी दोस्त होते हैं, कभी शंकर तो कभी हमें आपस में भिड़ने का मौका मिल जाता है.

नरेंद्र ने वड़ा खाया और ब्रैड के बेक होने का इंतजार करने लगा. अशोक चालू हो गया, ‘‘वड़ा तो अच्छा बनेगा ही. इस में ड्राईफ्रूट्स भर रखे हैं. एक तरफ जिम जाओ और फिर इतना फैट वाला वड़ा खाओ.’’

‘‘अच्छा,’’ सुलभा ने भी नकली मुसकान होंठों पर लाते हुए कह डाला, ‘‘नरेंद्र, अगर ऐसे वड़े पसंद हैं तो मैं बनाना सिखा दूंगी… इस में कौन सी बड़ी बात है,’’ पर अशोक की बात अखर रही थी.

सुलभा का जी चाहा कह दें कि अशोक, यह दही की गुझिया है, वड़े नहीं. लेकिन उस का बोलना अच्छा नहीं रहेगा. वह बोल भी नहीं पाएगी. बस इतना ही प्रकट में कहा, ‘‘जानती हूं, कई बार तो बनाए हैं. अशोक तो बस ऐसे ही कहते रहते हैं. जब मेरी मां के यहां जाते हैं तो 2 की जगह 4 खा जाते हैं. मां हमेशा एक टिफिन में बांध कर देती है. पर ये ऐप्रीशिएट करना जानें तो न.’’

फिर आगे जोड़ डाला, ‘‘एक यहीं की तो बात है नहीं, अशोक की यह आदत बन गई है. इन्हें मेरा कोई भी काम पसंद नहीं आता. छोटी से छोटी बात में भी दोष निकालेंगे. मुझे कोई ऐतराज भी नहीं, लेकिन उसे भरी महफिल में कहना और मैं कुछ कहूं तो चिढ़ जाना. आज भी सिर्फ  इतना ही तो कहा था कि कई बार ऐसे वड़े बना कर खिला चुकी हूं, बस, उसी पर इतना कमैंट आ गया. वड़े से भी ज्यादा बड़ा,’’ दोनों को यह नोकझोंक कई बार दिल पर उतर जाती है. दोनों कमाते हैं पर पुरुष होने का अहम अशोक में वैसा ही है.

कल ही की तो बात है. दूध आंच पर रख कर स्वाति को फीस के रुपए देने सुलभा कमरे में चली गई थी, सोचा था पर्स में से निकाल कर देने ही तो हैं. अगर वहां कुछ देर लग गई थी, स्वाति औटो वाले की बात बताने लगी थी कि रास्ते में देर लगा देता है. आजकल रोज देर से स्कूल पहुंच रही हूं आदिआदि.

तभी अशोक को कहने का मौका मिल गया, ‘‘रोजरोज दूध निकल जाता है, लापरवाही की हद है. कहा था कि टैट्रापैक ले आया करो, उबालने का झंझट नहीं रहेगा पर मैडम तो थैली ही लाएंगी क्योंकि यह ज्यादा ताजा होता है.’’

उस दिन इन की मां भी रहने आई हुई थी. वह भी बोल उठी, ‘‘सुलभा हम लोगों के वक्त में तो बूंद भर भी दूध गिर जाता तो लोग आफत कर डालते थे. दूध गिरना अच्छा जो नहीं होता. अब मैं क्या कहूं कि तब दूध मिलता भी तो लंबी लाइनों में लग कर.’’

अशोक भी धीरे से बोले, ‘‘पैसा लगता है भई. जरा ध्यान रखना चाहिए इस में. दूध रख कर शंकर से ही कह दिया करो, देख ले.’’

देवरदेवरानी 10 दिन बिताने आए हैं. दिनभर सुलभा उन लोगों का स्वागतसत्कार करती रहती है. फिर भी कोई न कोई बात उठ ही जाती है. अशोक लगते हैं तो सिर्फ परोसने के समय.’’

देवर शलभ एक बड़ी कंपनी में है और नंदा आजकल नई नौकरी ढूंढ़ रही

है. नंदा घर के काम में तो हाथ ही नहीं लगाती. लगता है, पूरी तरह मेहमान बन कर आई है. आज के युग में कोई कहीं मेहमान बन कर भी जाता है, तब भी शिष्टाचारवश कुछ न कुछ काम कराने लग ही जाता है. स्वयं खाली बैठी भाभी को किचन में शंकर के साथ लगे देखना अच्छा भी तो नहीं लगता. सुलभा कुछ नहीं कह सकती क्योंकि सब जानती है, यहीं कहेंगे, थोड़े दिनों को आई थी, इसलिए काम में क्या लगे, उसे घर का कुछ पता भी तो नहीं है.

अब भी अपने 7 साल के नंदन को स्पैलिंग याद करा रही है. वहीं नाश्ता रखा है, अभी मु?ो आवाज दी है, ‘‘भाभी, मेरी चाय भी यहीं भिजवा दें, नंदन को पढ़ा रही हूं. आप के स्वाति, अंशु के आते ही खेल में लग जाएगा.’’

नंदन तो अभी दूसरी में ही है. उस की पढ़ाई क्या इतनी जरूरी है कि रानीजी चाय का प्याला लेने नहीं आ सकतीं. अशोक भी जल्दी आ गए हैं, आजकल जब से भाईभावज आए हैं 5 बजे ही घर आ जाते हैं, नहीं तो 7 बजे से पहले दर्शन नहीं होते.

‘‘नंदा सचमुच बच्चे के साथ कितनी मेहनत करती है, तब जा कर बच्चे होशियार होते हैं,’’ सुन कर कहने लगे, ‘‘नंदन अपनी कक्षा में प्रथम आया है.’’

सब सुन कर मेर हाथ कांपने लगे हैं. मैं नंदा से ज्यादा कमाती हूं. मु?ा में क्या कमी है, नहीं जानती. मेरी जनरल नौलेज नंदा से ज्यादा ही है. मेरे बच्चे बिना एक शब्द बताए, बिना किसी ट्यूशन के सदा प्रथम आते हैं. समय ही कहां मिल पाता है कि अपने बच्चों को कुछ करा पाऊं. मेरे बच्चे. गर्व से मेरा सीना फूल आया. मेरे गिरते हुए आंस़ओं में खुशी की एक चमक आ गई. मेरे बच्चों को इस की भी जरूरत नहीं है, वे बहुत आगे हैं नंदन से.

अशोक का नाम है, पोजीशन है. उन की सलाह की कद्र की जाती है, उन से मिलने को लोग इच्छुक रहते हैं. नहीं, इसलिए नहीं कि उन से मिल कर कुछ आर्थिक लाभ होता है. इन का तो शुद्ध टैक्नीकल काम है. लोग मुझे सुखी समझते हैं. हां, जब उन की चर्चा होती है तो मुझे भी मान हो आता है. लेकिन कहीं कुछ ऐसा रह जाता है कि हम दोनों एकदूसरे के लिए बन नहीं पाए. सुलभा हर समय यही महसूस करती है कि वह उन का, घर का इतना खयाल रखती है, तो वे सब भी उस की रुचिअरुचि समझें. अशोक भले ही उस के काम को अपने से ज्यादा न समझें, पर उस के काम को व्यर्थ कह नकार तो न दें. खासतौर पर जब सुलभा भी काम पर जाती है.

सुलभा को घर और औफिस में चक्की में पिस कर भी जो सहानुभूति हासिल नहीं, वह नंदाको सहज ही मिल जाती है. उसे पति का प्यार भी मिलता है और सासससुर का स्नेह भी, प्रशंसा भी.

सप्ताहभर सब के साथ रहने का एहसान कर नंदा और देवर अगले दिन जाने वाले हैं. भोजन करते देवर अचानक कह उठे, ‘‘भाभी, नंदा की बड़ा इच्छा कुछ शौपिंग करने की है, इसे शौपिंग ले जाता हूं,’’ कह कर दोनों अशोक के साथ चले गए.

सुलभा का काम में मन नहीं लग रहा था, लगता भी कैसे. मन में एक के बाद एक खयाल आता जा रहा था. अंदर ही अंदर रो रही थी. किसी के सामने रो कर वह अपने को छोटा नहीं करना चाहती. हां, इतना सही है कि उस के इतना साफ कह देने का भी देवरदेवरानी का अकेले शौपिंग करने चला जाना उसे बहुत अखरा था. यह नहीं हुआ कि उसे, स्वाति व अंशु को भी ले जाते और एक खाना तो खिलाते. लगता है सब के मन में बेचारी है सुलभा वाला भाव बैठा हुआ है.

तभी बाई की आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘मैडम, मैं ग्रौसरी ले आई हूं, चैक कर लें.’’

बाई ने जब सामान निकाल कर दिया तो उस में चौकलेट के पैकेट थे जो मैं ने नंदा के बच्चों के लिए मंगवाए थे. उस की ललचाई नजरें उन पैकेटों को देख रही थीं, ‘‘ये चौकलेट तो मैडम बहुत महंगी हैं,’’ उस की बोली में एक करुणा का भाव था, ‘‘मेरा बेटा बारबार चौकलेट लाने को कहता है पर मेरे पास इतने पैसे कहां हैं,’’ कहतेकहते उस के आंसू बह गए.

सुलभा को आश्चर्य हुआ उस की यह दीन मुद्रा देख कर वरना तो हमेशा उसे अकड़ते ही देखती थी.

आज साथ ही उस का 8-10 साल का बेटा था. उस ने समान मुझे दे कर एक सांस ली, ‘‘इस का बाप तो न मेरी चिंता करता है, न इस की. मैं कमा कर देती हूं फिर भी आए दिन मारपीट करता है. चौकलेट मांगने पर इसे भी 2-4 थप्पड़ लगा देता है. जो आप की परेशानी है मैडम, वैसी ही मेरी भी.’’

‘‘तुम ने कैसे जाना कि मुझे कोई परेशानी है?’’ सुलभा बोली.

वह बोलने लगी. सुलभा सुनने लगी. यकायक एहसास हुआ कि दोनों के दुख कहीं एकजैसे हैं. इस सुसंस्कृत समाज में (तथाकथित ऊंची जाति में) मारपीट नहीं होती इस के यहां बातबात पर उसे पीट दिया जाता है. घर में सासससुर हैं, देवरननद हैं. ससुर है कि सास की उंगली का पोर भी दुख जाए तो आफत कर देगा. दोनों देवर अपनी घरवालियों को सिर पर चढ़ा कर रखते हैं. मगर उस का पति दाल में नमक ज्यादा हो या रोटी जल गई हो हर बात पर बिगड़ेगा. सभी लानत देने लगते हैं. दिनभर काम करती है, सब से अच्छा काम, फिर भी उसी को दिनरात सुनना पड़ता है. आज घर का काम छोड़ दे, बीमार पड़ जाए पैसे नहीं मिलें तो उस की आफत आ जाएगी.

‘‘मैम आप तो जानती हैं, जब मर्द अपनी औरत की इज्जत नहीं करता तो उस का घर में कोई भी मान नहीं करता. अगर मर्द जोरू को अपना समझे, उस का अच्छाबुरा उस से अकेले में कहे, ऐसे सोचे कि इस की बड़ाई हो, इस पर दुनिया न हंसे, तो औरत निकम्मी भी हो, तब भी घर के लोग उसे कुछ न कहेंगे.’’

सुलभा जल्दी से अपने कमरे में आ गई. उस में जैसे और सुनने की शक्ति नहीं रह गई थी. उस की भी तो यही स्थिति थी. सुलभा ने सारी चौकलेटें बाई के बेटे के हाथों में दे दीं. देवरानी का बेटा खाली हाथ ही जाएगा.

‘‘मैम, आप का स्वभाव बहुत अच्छा है. आप के दिल में एकदूसरे के लिए दर्द है.’’

‘दूसरे के लिए दर्द’ सुलभा कैसे कहे यह दर्द तो उस का अपना है. उस ने बात पलट कर पूछा, ‘‘कितने बच्चे हैं. यह तुम्हारा बेटा है न.’’

‘‘हां, मैम, 2 जवान लड़के और हैं, इस से बड़े सब. लेकिन दिल की बात सम?ाने वाला मर्द हो तो सबकुछ है, नहीं तो कुछ भी नहीं… कुछ भी नहीं.’’

‘‘हां, कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं,’’ जैसे प्रतिध्वनि गूंज रही है. सुलभा के मन में भी यही आवाज उठ रही है.

सुलभा हौले से कह उठी, ‘‘हां, अपना पति अपना हो तो सब अपने हैं नहीं तो कोई भी कुछ नहीं. पत्नी लायक हो तो भी, घर बैठने वाली तो भी.’’

तुम्हारा गुनहगार: समीर की अनचाही मंजिल

मैंने कभी कुछ नहीं लिखा, इसलिए नहीं कि मुझे लिखना नहीं आता, बल्कि मैं ने कभी जरूरत ही नहीं समझ. मैं ने कभी किसी बात को दिल से नहीं लगाया. लिखना मुझे व्यर्थ की बात लगती. मैं सोचता क्यों लिखूं? क्यों अपनी सोच से दूसरों को अवगत कराऊं? मेरे बाद लोग मेरे लिखे का न जाने क्याक्या अर्थ लगाएं. मैं लोगों के कहने की चिंता ज्यादा करता अपनी कम.

अकसर लोग डायरी लिखते हैं. कुछ प्रतिदिन और कुछ घटनाओं के हिसाब से. मैं अपने विषय में किसी को कुछ नहीं बताना चाहता, लेकिन पिछले 1 सप्ताह से यानी जब से डा. नीरज से मिल कर लौटा हूं अजीब सी बेचैनी से घिरा हूं. पत्नी विनीता से कुछ कहना चाहता हूं, लेकिन कह नहीं पाता. वह तो पहले ही बहुत दुखी है. बातबात पर आंखें भर लेती है. उसे और अधिक दुखी नहीं कर सकता. बेटे वसु व नकुल हर समय मेरी सेवा में लगे रहते हैं. उन्हें पढ़ने की भी फुरसत नहीं. मैं उन का दिमाग और खराब नहीं करना चाहता. यों भी मैं जिस चीज की मांग करता हूं वह मुझे तत्काल ला कर दे दी जाती है, भले ही उस के लिए फौरन बाजार ही क्यों न जाना पड़े. मैं कितना खुदगर्ज हो गया हूं. औरों के दुखदर्द को समझना ही नहीं चाहता. अपनी इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना चाहता हूं, लेकिन लगा नहीं पा रहा.

‘‘पापा, आप चिंता न करो. जल्दी ठीक हो जाओगे,’’ कहता हुआ वसु जब अपना हाथ मेरे सिर पर रखता है, तो मैं समझ नहीं पाता कि यह कह कर वह किसे तसल्ली दे रहा है मुझे या अपनेआप को? उस से क्या कहूं? अभी मोबाइल पर किसी और डाक्टर से कंसल्ट करेगा या नैट में सर्च करेगा. बच्चे जैसे 1-1 सांस का हिसाब रख रहे हैं. कहीं 1 भी कम न हो जाए और मैं बिस्तर पर पड़ा इन सब की हड़बड़ी, हताशानिराशा उन से आंखें चुराते देखता रहता हूं. उन की आंखों में भय है. भय तो अब मुझे भी है. मैं भी कहां किसी से कुछ कह पा रहा हूं.

डा. राजेश, डा. सुनील, डा. अनंत सभी की एक ही राय है कि वायरस पूरे शरीर में फैल चुका है. लिवर डैमेज हो चुका है. जीवन के दिन गिनती के बचे हैं. डा. फाइल पलटते हैं, नुसखे पढ़ते हैं और कहते हैं कि इस दवा के अलावा और कोई दवा नहीं है.

सुन कर मेरे अंदर छन्न से कुछ टूटने लगता है यानी मेरी सांसों की डोर टूटने में कुछ ही समय बचा है. मेरे अंदर जीने की अदम्य लालसा पैदा होने लगती है. मुझे अफसोस होता है कि मेरे बाद पत्नी और बच्चों का क्या होगा? अकेली विनीता बच्चों को कैसे संभालेगी? कैसे बच्चों की पढ़ाई पूरी होगी? कैसे घर खर्च चलेगा? 2-4 लाख रुपए घर में हैं तो वे कब तक चलेंगे? वे तो डाक्टरों की फीस और मेरे अंतिम संस्कार पर ही खर्च हो जाएंगे, घर में पैसे आने का कोई तो साधन हो.

विनीता ने कितना चाहा था कि वह नौकरी करे पर मैं ने अपने पुरुषोचित अभिमान के आगे उस की एक न चलने दी. मैं कहता कि तुम्हें क्या कमी है? मैं सभी की आवश्यकताएं आराम से पूरी कर रहा हूं. पर अब जब मैं नहीं रहूंगा तब अकेली विनीता सब कैसे संभालेगी? घर और बाहर संभालना उस के लिए कितना मुश्किल होगा. मैं अब क्या करूं? उसे कैसे समझाऊं? क्या कहूं? कहीं मेरे जाने के बाद हताशानिराशा में वह आत्महत्या ही न कर ले. नहीं, वह ऐसा नहीं कर सकती. वह इतनी कमजोर नहीं है. मैं भी न जाने क्या उलटीसीधी बातें सोचने लगता हूं. पर विनीता से कुछ भी कहने के लिए मेरे पास शब्द ही नहीं बचे हैं.

रिश्तेदार 1-1 कर आ जा रहे हैं. कुछ मुझे तसल्ली दे रहे हैं तो कुछ स्वयं को. पत्नी विनीता और बेटा वसु गाड़ी ले कर मुझे डाक्टरों को दिखाने के लिए शहर दर शहर भटक रहे हैं. आय के सभी स्रोत लगभग बंद हैं. वे सब मुझे किसी भी कीमत पर बचाने की कोशिश में लगे हैं.

मैं डाक्टर की बातें सुन और समझ रहा हूं, लेकिन इस प्रकार दिखावा कर रहा हूं कि डाक्टरों की बातें मेरी समझ में नहीं आ रहीं.

विनीता और वसु के सामने उन का मन रखने के लिए कहता हूं, ‘‘डाक्टर बेकार बक रहे हैं. मैं ठीक हूं. यदि लिवर खराब है या डैमेज हो चुका है तो खाना कैसे पचा रहा है? तुम सब चिंता मत करो. मैं कुछ दिनों में ठीक हो कर चलने लगूंगा. तुम डाक्टरों की बातों पर विश्वास मत करो. मैं भी नहीं करता.’’

पता नहीं मैं स्वयं को समझ रहा हूं या उन्हें. पिछले 5 सालों से यही सब हो रहा है. मैं एक भ्रम पाले हुए हूं या सब को भ्रमित कर रहा हूं. 5 साल पहले बताए गए सभी कारणों को डाक्टरों की लफ्फाजी बता कर नकारने की कोशिश करता रहा हूं. यह छल पत्नी और बच्चों से भी किया है पर स्वयं को नहीं छल पाया हूं.

एचआईवी पौजिटिव बहुत ही कम लोग होते हैं. पता नहीं मेरी भी एचआईवी पौजिटिव रिपोर्ट क्यों कर आई.

विनीता के पूछने पर डाक्टर संक्रमित खून चढ़ना या संक्रमित सूई का प्रयोग होना बताता है, लेकिन मैं जानता हूं विनीता मन से डाक्टर की बातों पर विश्वास नहीं कर पा रही. वह तरहतरह की पत्रिकाओं और किताबों में इस बीमारी के कारण और निदान ढूंढ़ती रहती है.

मैं जानता हूं कि 7 साल पहले यह बीमारी मुझे कब और कैसे हुई? जीवन में पहली बार मित्र के कहने पर लखनऊ में एक रात रुकने पर उसी के साथ एक होटल में विदेशी महिला से संबंध बनाए. गया था रात हसीन करने, जीवन का आनंद लेने पर लौटा जानलेवा बीमारी ले कर. दोस्त ने धीरे से कंधा दबा कर सलाह भी दी थी कि सावधानी जरूर बरतना. पर मैं जोश में होश खो बैठा. मैं ने सावधानी नहीं बरती और 2 साल बाद जब तबीयत बिगड़ीबिगड़ी रहने लगी तब डाक्टर को दिखाया और ब्लड टैस्ट कराया. तभी इस बीमारी का पता चला. मेरे पांवों तले की जमीन खिसक गई. अब क्या हो सकता था, सिवा इलाज के? इलाज भी कहां है इस बीमारी का? बस धीरेधीरे मौत के मुंह में जाना है. न तो मैं दिल खोल कर हंस सकता और न ही रो. अपनी गलती किसी को बता भी नहीं सकता. बताऊं भी कैसे? मैं ने विनीता का भरोसा तोड़ा था, यह कैसे स्वीकार करता?

विनीता से कई लोगों ने कहने की कोशिश भी की, लेकिन उस का उत्तर हमेशा यही रहा कि मैं अपने से भी ज्यादा समीर पर विश्वास करती हूं. वे ऐसा कुछ कभी कर ही नहीं सकते. समीर अपनी विनीता को धोखा नहीं दे सकते. मुझे लग रहा था कि विनीता अंदर ही अंदर टूट रही है. स्वयं से लड़ रही है, पर मुखर नहीं हो रही, क्योंकि उस के पास कोई ठोस कारण नहीं है. मैं भी उस के भ्रम को तोड़ना नहीं चाहता.

पिछले 5 सालों से हमारे बीच पतिपत्नी जैसे संबंध नहीं हैं. हम अलगअलग कमरे में सोते हैं. मुझे कई बार अफसोस होता कि मेरी गलती की सजा विनीता को मिल रही है. डाक्टर ने सख्त हिदायत दी थी कि शारीरिक संबंध न बनाए जाएं. मेरी इच्छा होती तो उस का मैं कठोरता से दमन करता. विनीता भी मेरी तरह तड़पती होगी. कभी विनीता का हाथ पकड़ कर अपने पास बैठा लेता, लेकिन उस का सूनी आंखों में झंकने की हिम्मत न कर पाता. वह मुझे एकटक देखती तो लगता कि पूछ रही है कि तुम यह बीमारी कहां से लाए? मेरी नजरें झुक जातीं. मैं मन ही मन दोहराता कि विनीता मैं तुम्हारा अपराधी हूं. तुम से माफी मांग कर अपना अपराध भी कम नहीं कर सकता.

मैं रोज तुम्हारे कमरे में आ कर तुम्हें छाती पर तकिया रखे सोते देखता हूं. आंखें भर आती हैं. मैं इतना कठोर नहीं हूं जितना दिखता हूं. तुम्हें आगोश में भरने का मेरा भी मन है. मेरी इच्छाएं भी अतृप्त हैं. एक घर में रह कर भी हम एक नदी के 2 किनारे हैं. तुम पलपल मेरा ध्यान रखती हो. वक्त से खाना और दवा देती हो. मुझे डाक्टर के पास ले जाती हो. फिर भी मैं असंतुष्ट रहता हूं. मैं तुम्हें पाना चाहता हूं. तुम मुझ से दूर भागती हो और मैं तुम्हें पाना चाहता हूं. मैं अपनी भावनाओं को दबा नहीं पाता तो वे क्रोध में मुखर होने लगती हैं. सोच और विवेक पीछे छूट जाते हैं. मैं तो मर ही रहा हूं तुम्हें भी मृत्यु देना चाहता हूं. मैं कितना खुदगर्ज इंसान हूं विनीता.

वक्त के साथ दूरी बढ़ती ही जा रही है. मेरा जीना सब के लिए व्यर्थ है. मैं जी कर घर भी क्या रहा हूं सिवा सब को कष्ट देने के? मेरे रहते हुए भी मेरे बिना सब काम हो रहे हैं, मेरे बाद भी होंगे.

आज की 10 तारीख है. मुझे देख कर डाक्टर अभीअभी गया है. मैं बुझने से पहले तेज जलने वाले दीए की तरह अपनी जीने की पूरी इच्छा से बिस्तर से उठ जाता हूं. विनीता और बच्चों की आंखें चमक उठती हैं. मैं टौयलेट तक स्वयं चल कर जाता हूं. फिर लौट कर कहता हूं कि मैं चाहता हूं विनीता कि मेरे जाने के बाद भी तुम इसी तरह रहना जैसे अब रह रही हो.

मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा. तुम नहीं जानतीं कि मैं पिछले सप्ताह से बसु से अपने एटीएम कार्ड से रुपए निकलवा कर तुम्हारे खाते में जमा करा रहा हूं. ताकि मेरे बाद तुम्हें परेशानी न हो. मैं ने सब हिसाबकिताब लिख कर दिया है, समझदार हो. स्वयं और बच्चों को संभाल लेना. मुझे तुम्हें अकेला छोड़ कर जाना जरा भी अच्छा नहीं लग रहा, पर जाना तो पड़ेगा. मन में बहुत कुछ घुमड़ रहा है कि तुम से कहूं, फिर कहनेसुनने से दूर हो जाऊंगा. तुम भी मुझ से बहुत कुछ कहना चाहती होगी पर मेरी परेशानी देख कर चुप हो. न मैं तुम से कुछ कह पाऊंगा और न तुम सुन पाओगी. तुम्हें देखतेदेखते ही किसी भी पल अलविदा कह जाऊंगा. मैं जानता हूं तुम्हें हमेशा यही डर रहता है कि पता नहीं कब चल दूं. इसीलिए तुम मुझे जबतब बेबात पुकार लेती हो. हम दोनों के मन में एक ही बात चलती रहती है. मुझे अफसोस है विनीता कि मुझे अपना वादा, अपनी जिम्मेदारियां पूरी किए बगैर ही जाना पड़ेगा.

तुम सो गई हो. सोती हुई तुम कितनी सुंदर लग रही हो. चेहरे पर थकान और विषाद की रेखाएं हैं. क्या करूं विनीता आंखें तुम्हें देख रही हैं. दम घुट रहा है. कहना चाहता हूं कि मैं तुम्हारा गुनहगार हूं.

विनीता यह जीवन का अंत नहीं है, बल्कि एक नए जीवन की शुरुआत है. अंधेरा दूर होगा, सूरज निकलेगा. इतने दिन से जो धुंधलापन छाया था सब धुलपुंछ जाएगा. तुम्हारा कुछ भी नहीं गया है. यह मैं क्या सम?ा रहा हूं? क्या तुम्हें नहीं समझता? समझता हूं तभी समझ रहा हूं. अब मेरा जाना ही ठीक है. वसु को कोर्स पूरा करना है. उसे प्लेसमेंट जौब मिल गई है. एक रास्ता बंद होता है. दूसरा खुल जाता है. नकुल भी शीघ्र ही अपनी मंजिल पा लेगा.

विनीता, तुम्हारे पास मेरे सिवा सभी कुछ होगा. मैं जानता हूं मेरे बाद तुम्हें अधूरापन, खालीपन महसूस होगा. तुम अपने अंदर के एकाकीपन को किसी से बांट नहीं पाओगी. मैं

भी तुम्हारा साथ देने नहीं आऊंगा. पर मेरे सपनों को तुम जरूर पूरा करोगी. मन से मुझे माफ कर देना. अब बस सांस उखड़ रही है… अलविदा विनीता अलविदा… तुम्हारा समीर

Memories : स्मृतियों का जाल

बीता वक्त भूलता कहां है. कितना अच्छा होता व्यक्ति आगे बढ़ता जाता और पिछला भूलता जाता लेकिन बीता वक्त जमा होता रहता है और गीली लकड़ी सा सुलगता तपिश देता रहता है.

वह अच्छी तरह जानती है कि गाड़ी चलाते समय पूरी सावधानी रखनी चाहिए. तमाम प्रयासों के बावजूद उस का मन एकाग्र नहीं रह पाता, भटकता ही रहता है. उस के मन को तो जैसे पंख ही लगे हैं. कहीं भी हो, बस दौड़ता ही रहता है.

वह अपनेआप से बतियाती है. वह चाहती है कि वह जानती है उसे सब जानें. लेकिन वह खुद ही सब से छिपाती है. बस, सबकुछ अपनेआप से दोहराती रहती है. वह सिर को झटकती है. विचारों को गाड़ी के शीशे से बाहर फेंकना चाहती है. पर वह और उस की कहानी दोनों साथसाथ चलते हैं. अब तो उसे अपने विचारों के साथसाथ चलने की आदत हो गई है. उस के अंतर्मन और बाहरी दुनिया दोनों के बीच अच्छा तारतम्य बैठ गया है.

उस की स्मृतियों में भटकते रहते हैं उस के जीवन के वे दिन जो खून के साथ उस की नसों में दौड़ते रहते हैं. वह खेल रही है रेत में मिट्टी, धूल से सनी हुई. उस की गुडि़या भी उस के साथ रहती है. वह घूम रही है खेतों में, गांव के धूलभरे रास्तों में. दादादादी और कई लोग हैं जो उस के साथ हैं. वह भीग रही है. दौड़ रही है.

घर में मिट्टी के बरतनों में खाने के सामान रखे हैं. बरामदे की अलमारियों में उस की पसंद की मिठाइयां रखी रहती हैं. बाबा रोज स्कूल से आने पर उस से पाठ सुनते हैं. दादी जहां जाती वह उन के साथ जाती, उन के संगसंग घूमती है. ईंधन, चूल्हा, खेतखलिहान, गायभैंस, कुआं, गूलर का पेड़ कुछ भी तो ऐसा नहीं है जो उस की यादों से कणभर भी धूमिल हुआ हो. पर इन सब स्मृतियों में उस के जन्मदाता कहां हैं? उन की यादों को वह अपने अंतर्मन पर पलटना भी नहीं चाहती. उस की स्मृतियों में उन का स्थान इतना धूमिल सा क्यों है?

दृश्य बदल रहा है. गांव छूट गया है. ममता का घना वृक्ष, जिस की छाया में उस का बचपन सुरक्षित था, वहीं रह गया. अब वह शहर आ गई है. यहां कोई छांव नहीं है. बस, कड़ी धूप है. धूप इतनी तेज थी कि उस का बचपन भी झुलस कर रह गया और उस झुलसन के निशान उस के मन पर छोड़ता गया. अब तो, बस, लड़ाई ही लड़ाई थी – अस्तित्व की लड़ाई, अस्मिता की लड़ाई, अपनेआप को जीवित रखने, मरने न देने की लड़ाई.

उस ने भी इस लड़ाई को जारी रखा. लड़ती रही. उस ने किताबों से दोस्ती कर ली. किताबों के पाठों, कविताओं, कहानियों में खुद को ढूंढ़ती रहती. अपने अंदर बसे हुए डर का सामना करती. वह चलती रही. सब से अलग, अकेली अपनी दुनिया के साथ जीती रही.

स्मृतियां हमारा पीछा नहीं छोड़तीं. अतीत अगर साथसाथ न चलता तो व्यक्ति का जीवन कैसा होता? क्या तब वह ज्यादा सुखी होता? क्या पता? यह तो तब होता जब व्यक्ति आगे बढ़ता जाता और पिछला भूलता जाता. परंतु ऐसा होता कहां है? बीता हुआ बीतता कब है. वह तो जमा होता रहता है और गीली लकड़ी सा सुलगता रहता है.

बचपन से ले कर अब तक कितने ही साल तक वह सपनों में भी डरती रही. लोगों की उलाहनाएं, दुत्कार उस के मन को दुख और घृणा से भर देते. आत्मविश्वास से हीन, डरपोक वह. हीनभावना उस के दिल पर इस कदर हावी हो गई थी कि उस का अस्तित्व भी लोगों को नजर नहीं आता था. तपती धूप उसे जलाती. जितना वह आगे बढ़ने की कोशिश करती, दिखावटी आवरणों से ढके लोग उसे पीछे ढकेलने में लग जाते अपने पूरे सामर्थ्य के साथ. किंतु अपने सारे डरों के साथ भी वह चलती रही. जितनी ज्यादा ठोकरें लगतीं, उस का हौसला उतना ही मजबूत होता जाता. हालांकि बाहर से वह डरी हुई, घबराई हुई दिखती किंतु उस का आत्मबल, दृढ़ता इतनी पर्याप्त थी कि वह कभी अपने रास्ते से डिगी नहीं.

जीवन चल रहा है, आज वह दुनिया के सामने सफल है. उस के पास अच्छी जौब है, घर है, गाड़ी है, पैसा है. वह मां है, पत्नी है. कुछ भी ऐसा नहीं दिखता जो नहीं है. पर क्या है जो नहीं है? जो नहीं है वह कभी मिलेगा भी नहीं. क्योंकि वह तो कभी था ही नहीं. व्यक्ति जो महसूस करता है, जिस संसार में जीता है, कई बार उस का बाहरी संसार से कोई सरोकार नहीं होता. यहां तो दौड़ है. दूसरे को ढकेल कर खुद आगे निकलने की दौड़. ऐसे में कौन होगा जो उसे समझना चाहेगा, उस की भावनाओं को अहमियत देगा. नहीं, उसे किसी से कुछ नहीं कहना. सबकुछ अपने भीतर ही समेट कर रखना है.

सबकुछ अपने अंदर ही जब्त करतेकरते उस की उम्र ही गुजर गई. अब वह उम्रदराज हो गई है. पर उस के मन की उम्र नहीं बढ़ी. अभी भी वह अपने आधेअधूरे सपनों की दुनिया में ही जीती है.

पर अब उसे घुटन होने लगी है. अपनेआप को सीमाओं में बांधे रहने की अपनी प्रकृति से उसे खीझ होती. कब तक वह इसी तरह जिएगी. अब वह सब छोड़ देना चाहती है. भाग जाना चाहती है. उसे अपना अस्तित्व एक पिंजरे में कैद पंछी जैसा लगता. हर आकर्षण, हर इच्छा को वह सब अपने अंदर ही अंदर जीती है और धीरेधीरे उसे खत्म कर देती है. उसे अपना जिस्म, अपना मन सब बंधे हुए महसूस होते. दायरे, सीमाएं, विवेक सब बंधन हैं जो मनुष्य के जीवन को गुलाम बना लेते हैं. इस गुलामी की बेडि़यां इतनी मजबूत होती हैं कि मनुष्य चाह कर भी उन्हें तोड़ नहीं पाता.

उसे अब किसी से भी द्वेष नहीं होता. अपने जन्मदाताओं से भी नहीं जिन्होंने उसे जीवन की दौड़ में अकेला छोड़ दिया. उन्होंने अपनाअपना जीवन जी लिया. अगर वे भी बंधे रहते तो क्या पता उन का जीवन भी उसी के जैसा हो जाता, घुटन भरा.

वह अब स्वप्न देख रही है. वह उड़ रही है. मुक्त आकाश में विचरण कर रही है. हंस रही है. वर्षों से जमा मैल साफ हो गया है. असंभव अब संभव हो गया है. बेडि़यों को झटक कर अब वह आजाद हो गई है.

दुनिया की नजरों में तू गलत है

रात का वक्त था और 11 बज चुके थे लेकिन मानवी घर नहीं आई थी. घर वाले परेशान हो रहे थे कि आखिर अभी तक मानवी रह कहां गई अभी तक आयी क्यों नहीं क्यों कि मानवी का फोन भी नहीं लग रहा था. धीरे-धीरे रात के 1 बज गए….

घड़ी की सुईयों को देखकर मां-बाप के हांथ-पैर कांप रहे थे. कि तभी दरवाजे पर कुछ हरकत हुई और पिता ने जाकर दरवाजा खोला तो सामने मानवी खड़ी थी और उसकी जो हालत थी वो देखकर आप की भी आत्मा कांप उठती.मानवी के कपड़े फटे हुए थे और उसे खूब सारी चोटें भी लगी थीं.

अब तक आप भी समझ चुके होंगे कि उसके साथ क्या हुआ होगा जी हां वही जो आप सोच रहें हैं जिस शब्द को कोई भी मां-बाप सुनना नहीं चाहेगा अपनी बेटी के लिए…. वो शब्द है बलात्कार.

मां ने बेटी को संभाला उसे लेकर अंदर गयी और बाप की तो कुछ भी बोलने और सोचने की हिम्मत ही नहीं थी और ना ही कुछ पूछने की हिम्मत थी. बेटी फूट-फूट कर रो रही थी मां-बाप भी फूट-फूटकर रो रहे थे. लेकिन अब सवाल ये था कि करे क्या?

अगले दिन परिवार के किसी भी सदस्य को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें आखिरकार लकड़ी ने पुलिस में शिकायत करने की ठानी और कहा कि उन दोषियों को सजा तो होनी ही चाहिए कि पीछे से मां की तेज आवाज आती है ..नहीं…तू कहीं नहीं जाएगी और ना ही कोई शिकायत दर्ज होगी.

आप क्या कर रहें हैं जी आखिर कैसे जिएंगें हम समाज में अगर बात फैल गई तो हमारा इस समाज में रहना मुश्किल हो जाएगा.भला कौन शादी करेगा इससे….हम किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे..ऐसा लड़की की मां ने लड़की के पिता से कहते हुए मानवी का हांथ पकड़ा और उसे अंदर ले गयी.

फिर मानवी की मां उसे ये समझाने लगी कि तू चाहे कितनी भी सफाई दे ले लेकिन दुनिया की नजरों में तू ही गलत होगी लोग कहेंगे लड़की को इतनी रात में बाहर जाने की क्या जरुरत थी? और ये समाज तूझे जीने नहीं देगा मेरी बच्ची इसलिए भूल जा सब कुछ जो भी तेरे साथ हुआ और किसी से कुछ भी मत कहना….

भले ही मां ने जो कहा वो गलत है लेकिन जरा सोचिए एक मां ये बात अपनी बेटी से कह रही है यहां पर शायद वो मां गलत नहीं है क्योंकि उसने समाज देखा है और वो जानती है कि अगर उसकी बेटी ने किसी से कुछ भी कहा तो ये समाज उसकी बेटी को जीने नहीं देगा और उसकी बेटी अंदर ही अंदर घुटघुट कर मर जाएगी.

अगर उसकी मां ने ये बात कही तो उसकी वजह तुम समाज वाले हो कम-स-कम इतना तो रहम करो और इज्जत करो कि एक लड़की खुलकर जी सके और अपने साथ हुए उस बलात्कार जैसी घटना का बदला ले सके ये सोचकर की समाज ये दुनिया उसके साथ है.

जो लोग साथ है उनकी बात अलग है लेकिन जो लोग साथ नहीं हैं वो सभी अपनी सोच को बदले और समाज में कुछ ऐसे मिसाल पेश करें जो जन्मों तक सबको याद रहें.मानवी जैसी लड़कियां अपनी बात दुनिया के सामने रख सकें और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठा सकें.

Chutney Recipe : वीकेंड पर बनाएं ये बेहद स्वादिष्ट चटनी, बढ़ जाएगा खाने का स्वाद

Chutney Recipe : गुड़ की चटनी बहुत ही स्वादिष्ट और सेहतमंद चटनी है, जो आपके खाने का स्वाद बढ़ा देगी. इसमें अदरक और तिल जैसी कई चीजें मिलाकर बनाई जाती है. गुड़ सेहत के लिए भी फायदेमंद माना जाता है. इसमें पर्याप्त कैलोरी होती है. गुड़ की खट्टी-मीठी चटनी खाने का मजा कुछ और है. आप इसे झटपट घर पर बना सकते हैं.

गुड़ की चटनी बनाने की सामग्री:

1 कप गुड़ कद्दूकस किया हुआ

1 छोटी चम्मच अदरक पाउडर

1 बड़ा चम्मच तिल

1/2 छोटी चम्मच लाल मिर्च पाउडर

स्वादानुसार नमक

आवश्यकतानुसार पानी

बनाने की विधि

एक पैन में गुड़ और पानी डालकर धीमी आंच पर गर्म करें. गुड़ को पूरी तरह से पिघलने दें.

गुड़ पिघल जाने के बाद, उसमें कद्दूकस किया हुआ अदरक और तिल डालें, इस मिश्रण को अच्छे से मिला लें.

अब इसमें नमक, लाल मिर्च पाउडर डालें. इसे अच्छे से मिला कर 2-3 मिनट तक पका लें.
अब आंच बंद कर दें और चटनी को ठंडा होने दें.

तैयार है गुड़ की चटनी, आप इसे पराठे, चपाती, समोसा, या किसी भी स्नैक के साथ परोस सकते हैं.

टिप्स:

अगर चटनी बहुत गाढ़ी हो, तो थोड़ा सा पानी और मिला सकते हैं.
आप चटनी में ताजे नींबू का रस भी डाल सकते हैं, इससे इसका स्वाद और बढ़ जाएगा.

लहसुन की चटनी

सामग्री

10-12 छिली हुई लहसुन की कलियां

4-5 लाल मिर्च सूखी

नमक स्वादानुसार

1 चम्मच नींबू का रस

पानी आवश्यकतानुसार

बनाने की विधि:

एक बाउल में लहसुन की कलियां और सूखी लाल मिर्च रख लें.

एक छोटे पैन में तिल और जीरा डालकर उन्हें धीमी आंच पर हल्का सेंक लें, इससे मसाले का स्वाद और बढ़ जाएगा.

मिक्सी में लहसुन की कलियां, सेंके हुए तिल, जीरा, और लाल मिर्च डालकर अच्छे से पीस लें.

चटनी में स्वादानुसार नमक डालें और फिर नींबू का रस भी डालें.

अब आपकी लहसुन की चटनी तैयार है.

टिप्स:

लहसुन की चटनी को फ्रिज में कुछ दिन तक स्टोर किया जा सकता है.

आप तेल का प्रयोग नहीं करना चाहते हैं तो चटनी को बिना तेल के भी बना सकते हैं.

अर्जुन कपूर से ब्रेकअप के बाद Malaika Arora बनीं बिजनेस वुमन, बेटे अरहान के साथ मिलकर खोला रेस्टोरेंट

Malaika Arora New Business: कहते हैं दिल टूटने से तकलीफ तो बहुत हुई मगर जिंदगीभर का आराम हो गया. ऐसा ही कुछ हाल मौडल और कई शोज की जज मलाइका अरोड़ा (Malaika Arora) का है. जिनका हाल ही में  प्रेमी अर्जुन कपूर के साथ ब्रेकअप हो गया है. लेकिन वह दुख मनाने के बजाय बिजनेस वुमन बनने की राह पर निकल पड़ी है. क्योंकि वह अच्छी तरह जानती हैं कि एक बार प्यार के बिना रह सकते हैं लेकिन भूखे पेट भजन भी नहीं होता.

इसी बात को ध्यान में रखकर अर्जुन कपूर (Arjun Kapoor) से ब्रेकअप के बाद रोनेधोने और दुख मनाने के बजाय मलाइका ने पेट पूजा के बंदोबस्त पर ध्यान देना शुरू किया. उन्होंने सबको उस वक्त आश्चर्य में डाल दिया जब बिजनेस वुमन बनकर अपना नया सफर अर्थात रेस्टोरेंट खोलने की घोषणा की. रेस्टोरेंट खोलने के बिजनेस में उनके प्यारे बेटे अरहान खान ने मां का साथ दिया है.

अरहान और मलाइका के बीच बहुत अच्छी अंडरस्टैंडिंग और दोनों का एकदूसरे के प्रति पूरा सहयोग है. जिसके चलते खाना बनाने और खाना खाने की शौकीन मलाइका अरोड़ा ने अपने बेटे अरहान के साथ मिलकर मुंबई स्थित बांद्रा में एक रेस्टोरेंट की शुरुआत की है जिसका नाम Scarlett House है. मलाइका ने अपने नए रेस्टोरेंट खोलने की खुशखबरी जब से सोशल मीडिया पर दी है तब से हर तरफ से उनको बधाई के मैसेज आ रहे हैं.

मुंबई में Pushpa 2 का ट्रेलर लौन्च, बेइंतेहा भीड़ को कंट्रोल करना हुआ मुश्किल…

Pushpa 2 : कुछ समय पहले बिहार पटना के गांधी मैदान में पुष्पा 2 का प्रमोशन इवेंट हुआ इस इवेंट को देखने के लिए और अल्लू अर्जुन की एक झलक देखने के लिए पूरा मैदान भीड़ से खचाखच भरा था. अल्लू अर्जुन की एक झलक देखने के लिए हजारों में आई भीड़ को काबू करना मुश्किल हो गया था. पुष्पा वन में अल्लू अर्जुन का एक डायलौग पुष्पा झुकेगा नहीं साला, इतना प्रसिद्ध हुआ कि आज 3 साल बाद भी यह डायलौग लोगों की जुबान पर है, यही डायलौग बोलने वाले अल्लू अर्जुन जब मुंबई के जे डब्लू मैरियट होटल में ट्रेलर लांच और खास इवेंट के लिए पहुंचे तो लोगों का प्यार और भीड़ को देखकर अल्लू अर्जुन ने उसी अंदाज में एक बार फिर कहा पुष्पा अब रुकेगा नहीं साला.

 

पुष्पा 2 के लिए अल्लू अर्जुन के आगमन ने लगभग तहलका मचा दिया होटल के बाहर उनके प्रशंसकों की लगातार बढ़ती भीड़ पुष्पा 2 की सफलता की कहानी खुद ब खुद कह रही है. लगातार 3 सालों से इस फिल्म के लिए काम कर रहे अल्लू अर्जुन डायरेक्टर सुकुमार और भूषण कुमार सहित पूरी टीम ने फिल्म के 2:45 मिनट के टेलर द्वारा ही पुष्पा 2 की सफलता की कहानी कह दी है.

मेकर्स का दावा है पुष्पा 2 बौक्स औफिस पर 1500 करोड़ का आंकड़ा पार करेगी. फिल्म 5 दिसंबर को रिलीज हो रही है लेकिन अल्लू अर्जुन और पुष्पा 2 का क्रेज़ फिल्म रिलीज से पहले ही बहुत कुछ कह रहा है. पुष्पा 2 के ट्रेलर में अल्लू अर्जुन कई अवतार के साथ वन मैन शो करते नजर आए हैं और उनका हर अवतार काबिले तारीफ नजर आ रहा है.

पुष्पा 2 का निर्माण पुष्पा वन से कहीं ज्यादा बेहतरीन है. फिल्म की रिलीज से पहले अपार लोकप्रियता को देखकर अब लगता है पुष्पा रुकेगा नहीं साला … यह हम नहीं कह रहे बल्कि अल्लू अर्जुन ने वहां मौजूद अपने फैंस का प्यार देखकर पुष्पा स्टाइल में यह बात कही है. ऐसे में यह कहना गलत ना होगा की पुष्पा 2 का आगाज तो बहुत जबरदस्त है अंजाम 5 दिसंबर को फिल्म रिलीज होने पर पता चलेगा.

Samantha Ruth Prabhu ने कहीं ये इमोशनल बात, ऐक्स हसबैंड की शादी के बीच छूटा पिता का साथ

Samantha Ruth Prabhu’s Father Dies : साउथ सिनेमा की फेमस ऐक्ट्रैस सामंथा रूथ प्रभु(Samantha Ruth Prabhu)  के पिता जोसेफ प्रभु का निधन हो गया है. इसकी जानकारी सामंथा ने खुद सोशल मीडिया पर पोस्ट शेयर करके अपने फैंस को दी हैं. सामंथा का ये इमोशनल पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. इस पोस्ट में ऐक्ट्रैस ने लिखा है, अब जब तक हम दोबारा नहीं मिलते, पापा. उन्होंने इसके साथ हार्ट ब्रेक वाली इमोजी भी लगाई है. इस पोस्ट पर हर कोई उन्हें सांत्वना दे रहा है.

पिता के बेहद करीब थीं सामंथा

एक इंटरव्यू के दौरान समांथा ने अपने पिता को लेकर बातचीत की थी. इसमें उन्होंने कहा था कि, ‘मेरे पिता वैसे ही थे जैसे बाकी सबके होते हैं. उन्हें लगता है कि वह मुझे प्रोटेक्ट कर रहे हैं. क्योंकि उन्हें लगता है कि मैं ज्यादा स्मार्ट नहीं हूं.’ उन्होंने बताया कि उनके पापा ने कहा कि पढ़ाई करो, तुम भी पहली रैंक पा सकती हो. सामंथा ने आगे बताया कि जब आप किसी बच्चे से ऐसा कहते हैं, तो उसे लगता है कि वे वाकई पढ़ने में अच्छा नहीं है. इसलिए मुझे भी बहुत लंबे समय तक लगता था कि मैं होशियार और अच्छी नहीं हूं.

सामंथा के पिता तेलुगु एंग्लो-इंडियन थे

सामंथा रुथ प्रभु के पिता जोसेफ प्रभु और मां निनेट प्रभु हैं. उनके पिता ने तेलुगु एंग्लो-इंडियन थे. उन्होंने सामंथा की परवरिश में एक अभिन्न भूमिका निभाई. हालांकि, करियर में उन्हें पिता का सहारा नहीं मिला. लेकिन सामंथा अकसर पिता और अपने परिवार की बातें करती रहती हैं.

सामंथा के तलाक पर पिता जोसेफ ने किया था रिऐक्ट

पिता जोसेफ ने सामंथा के तलाक पर रिऐक्ट किया था. उन्होंने सामंथा और नागा चैतन्य की शादी की एक तस्वीर शेयर कर सोशल मीडिया पर लिखा ‘कई, कई साल पहले एक कहानी थी. और अब यह कहानी खत्म हो चुकी है. इसलिए एक नई कहानी और एक नया अध्याय शुरू करते हैं.’

नागा चौतन्य से सामंथा हो गईं अलग

2010 में सामंथा रूथ प्रभु ने नागा चैतन्य के साथ डेब्यू फिल्म किया था. इसके बाद दोनों एकदूसरे के डेट करने लगे और 2017 में शादी कर ली थी. शादी के चार साल बाद 2021 में कपल का तलाक हो गया. ऐक्स-हस्बैंड नागा चैतन्य अब 4 दिसंबर को शोभिता धुलिपाला से शादी कर रहे हैं, लेकिन सामंथा अभी सिंगल हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक सामंथा ने अपनी शादी के लिए कहा कि उन्हें अपने अलगाव को स्वीकार करने में काफी समय लगा और उन्होंने अपने जीवन में एक नया अध्याय शुरू करने की उम्मीद जताई.

Relationship : क्या है अल्फा मेल और बीटा मेल, कौन है आप के लिए सही

Relationship : अल्फा मेल जहां हमेशा जोश और गुस्से से भरा हुआ नजर आता है, वहीं बीटा मेल काफी कूल और जिंदगी को खुल कर जीने वाले माने जाते हैं. एक परफैक्ट मेल के इन दोनों ही रूपों में काफी बड़ा अंतर है. अगर आप भी नहीं जानते कि अल्फा और बीटा मेल की क्या अवधारणा है, तो अपना लाइफ पार्टनर चुनने से पहले इन बातों पर जरूर गौर करें :

आत्मविश्वास से भरा होता है अल्फा मेल

सब से पहले जानते हैं कि आखिर अल्फा मेल होते कैसे हैं. ऐसी प्रवृति के पुरुषों में स्वाभाविक रूप से नेतृत्व की क्षमता होती है. यह अकसर समूह में सब से आगे होते हैं. उस की राय और फैसले महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं. ऐसे पुरुषों का आत्मविश्वास बहुत मजबूत होता है. वह किसी भी चुनौती का सामना करने में नहीं डरते. उन के व्यक्तित्व में भी आप को ये सारी बातें नजर आती हैं. वे शारीरिक रूप से फिट और मानसिक रूप से मजबूत होते हैं. हालांकि ऐसे पुरुष अकसर डोमिनेटिंग नेचर के होते हैं और दूसरों पर हावी होने की कोशिश करते हैं. ये दूसरों से बहुत ज्यादा प्रतिस्पर्धा रखते हैं. अपने ज्यादातर फैसने खुद को केंद्र में रख कर करते हैं.

संतुष्टि से जीवन बिताते हैं बीटा मेल

बीटा मेल काफी हद तक अल्फा मेल से अलग होते हैं. ऐसे पुरुष शांत स्वभाव के होते हैं. वे हमेशा सब की मदद करने के लिए आगे रहते हैं. बीटा मेल काफी इमोशनल होते हैं और दूसरे की भावनाओं को गहराई से समझते हैं. ये लीडर बनने की जगह टीम को साथ ले कर चलने में विश्वास रखते हैं और मिलजुल कर काम करते हैं. इतना ही नहीं बीटा मेल अपने पार्टनर की जरूरत को बेहतर तरीके से समझ पाते हैं और उन्हें पूरा सम्मान भी देते हैं.

यह स्वभाव से लचीले होते हैं और हर परिस्थिति में खुद को ढालने की कोशिश करते हैं. वे अकसर दूसरों को भी बोलने का मौका देते हैं, हालांकि कई बार उन के इस स्वभाव को उन की कमजोरी समझ लिया जाता है.

आप के लिए कौन है बेहतर

अब सवाल यह है कि आप के लिए कैसा मेल बैस्ट है. दरअसल, यह पूरी तरीके से आप की निजी पसंद पर निर्भर करता है. हालांकि अल्फा मेल के मुकाबले बीटा मेल के साथ जिंदगी ​जीना काफी आसान है. लेकिन जिंदगी में आगे बढ़ने की संभावनाओं की बात करें तो इस मामले में अल्फा मेल आगे निकल सकते हैं क्योंकि ऐसे पुरुष हमेशा लीडर बन कर उभरते हैं.

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