पार्ट टाइम जौब: क्या मनोज का कत्ल हुआ था

दुबलापतला श्याम श्रीवास्तव उर्फ पेपर वाला सवेरेसवेरे रोज की तरह मनोज के कमरे में अखबार देने के लिए दाखिल हुआ. उस ने दरवाजा खोलते ही मनोज की लाश पंखे से लटकी देखी.

इस के बाद अफरातफरी मच गई. कुछ ही समय में एंबुलैंस और पुलिस की गाडि़यों का काफिला, जिस में सीनियर इंस्पैक्टर श्रीप्रकाश, सबइंस्पैक्टर परितेश शर्मा और हवलदार बहादुर सिंह जैसे कई काबिल अफसर शामिल थे, मौका ए वारदात पर पहुंचा.

घर के बाहर लोगों का हुजूम देख कर पुलिस को समझने में देर न लगी कि यही वह जगह है, जहां से उन्हें फोन किया गया था.

पुलिस को देख कर भीड़ एक ओर हट कर खड़ी हो गई. फोन करने वाले श्याम से जब पूछताछ की गई, तो उस ने बताया कि वह शुरू से ही हर रोज मनोज के कमरे में अखबार डालने आता है, पर आज जैसे ही उस ने अखबार देने के लिए दरवाजा खोला, वैसे ही सामने उसे मनोज पंखे से फांसी पर लटका हुआ मिला.

सीनियर इंस्पैक्टर श्रीप्रकाश को अखबार वाले श्याम का बयान थोड़ा खटका. इतने में ही आसपास रह रहे छात्रों से सूचना मिली कि मनोज का पूरा नाम मनोज दास है और अभी कुछ ही महीनों पहले वह कोलकाता से दिल्ली पढ़ने के लिए आया था और आते ही इस स्टूडैंट हब में कमरा किराए पर ले कर रहना शुरू कर दिया था. उस के साथ यहां और कोई नहीं आया था.

मनोज के पिताजी ही उसे शुरू में यहां कमरा किराए पर दिलवा कर गए थे. मनोज यहीं पर अपनी कोचिंग किया करता था.

मनोज की लाश को फौरन जांच के लिए फौरैंसिक लैब भेज दिया गया और उस के कमरे के सामान की छानबीन शुरू कर दी गई.

साइबर ऐक्सपर्ट की मदद से मनोज की कौल हिस्ट्री निकाल ली गई. उन के पिता का नंबर तलाश कर उन्हें सूचना भिजवा दी गई.

पर, एक नंबर था, जिस से मनोज दिन में कई बार बातें किया करता. उस नंबर को ट्रेस करने के बाद सिर्फ  इतना ही मालूम हुआ कि वह नंबर दिल्ली का ही है. इस से ज्यादा पता लगाना मुश्किल था, क्योंकि वह नंबर बिना किसी आइडैंटिटी के खरीदा  गया था.

कमरे की छानबीन से कुछ खास सुबूत तो हाथ न लगा, पर एक बात अभी भी इंस्पैक्टर श्रीप्रकाश के मन में किसी सवाल की तरह घूमे जा रही थी और वह थी अखबार वाले श्याम का बयान, क्योंकि अमूमन अखबार वाला अखबार बालकनी में फेंक देता है या दरवाजे के नीचे से सरका देता?है. उसे इतनी फुरसत कहां होती है, जो सब के हाथ में अखबार पकड़ाए और क्या मनोज ने दरवाजा खोल कर खुदकुशी की थी?

सीनियर इंस्पैक्टर श्रीप्रकाश ने हवलदार को इस श्याम अखबार वाले पर नजर रखने को कहा और साथ ही, खबरियों को भी इस की जानकारी निकलवाने का आदेश दिया.

उधर अगले ही दिन की फ्लाइट से मनोज के मातापिता दिल्ली पहुंचे और थाने जा कर अपना परिचय दिया. अपने बेटे की चादर से ढकी लाश देख कर मनोज के मातापिता का रोरो कर बुरा हाल हो गया.

पुलिस ने मनोज के मातापिता को दिलासा दी और पूछताछ के लिए सीनियर इंस्पैक्टर श्रीप्रकाश के पास ले आए.

मनोज के पिता पुरुषोत्तम दास और माता संगीता दास ने बताया कि मनोज बचपन से ही पढ़ाईलिखाई में काफी होशियार था, जिस के चलते उन्होंने उसे पढ़ने के लिए दिल्ली भेजा था.

इंस्पैक्टर श्रीप्रकाश ने मनोज से मिलतेजुलते और कई सवाल पूछे और फिर उन के बेटे की लाश उन्हें सौंप दी.

अभी मनोज के मातापिता को लाश के साथ विदा किया ही गया था कि एक खबरी से खबर मिली, जिस में उस ने बताया, ‘‘साहब, श्याम का असली रोजगार अखबार बेचना नहीं है. इस के अलावा वह और भी कई गैरकानूनी धंधों में शामिल है, पर पूरी तरह से नहीं.’’

हवलदार बहादुर सिंह ने भी यही बताया, ‘‘श्याम का पिछले कई सालों से छोटीमोटी चोरीचकारी और छीनाझपटी के लिए थानों में नाम आता रहा है, पर इस का नाम ऐसे किसी संगीन मामले में नहीं पाया गया है.’’

सीनियर इंस्पैक्टर श्रीप्रकाश के इशारे पर आधी रात को ही श्याम को घर से उठवा कर थाने में बुलवा लिया गया. शुरुआत में किसी भी सवाल का सही जवाब न मिलने पर श्याम को रिमांड में लेने को कहा गया, जिस से डर कर उस ने तोते की तरह सबकुछ सच उगलना शुरू कर दिया.

बात कुछ महीने पहले की है. श्याम छोटामोटा जेबकतरा था, पर इस काम में आगे जातेजाते उस की मुलाकात कई गैरकानूनी धंधे करने वाले गिरोह से हुई. उन्हीं में से एक था विकी छावरा उर्फ ‘सिकंदर’ जिस का काम बड़ेबड़े रईसजादों के लिए ड्रग्स और लड़कियों की तस्करी करना था. इस काम के लिए उसे दलाल की जरूरत थी.

श्याम भी जानता था कि बड़े कामों में पैसा भी बड़ा है, ऊपर से खुद का भी अलग ही रोब होता है महल्ले वालों में. उस ने धीरेधीरे सिकंदर के करीब  आना शुरू कर दिया और देखते ही देखते उस का खास और भरोसेमंद आदमी बन गया.

श्याम का काम ड्रग्स सप्लाई करने के लिए लड़के तलाशना था और किसी भी तरह उन्हें अपने साथ काम करने के लिए मजबूर करना था, जिस के चलते उस ने अखबार बेचने का काम शुरू कर दिया, जिस से घर से दूर यहां पढ़ने आए छात्रों से बातचीत कर उन के नजदीक आया जाए और नएनए लड़के तैयार किए जाएं.

तकरीबन 5 महीने पहले मनोज भी यहां पढ़ने के लिए आया था. यों तो सभी अपने साथियों के साथ रहा करते थे, पर मनोज अकेला था, जिस से  श्याम का काम कुछ हद तक आसान हो गया था.

कुछ दिनों की दोस्ती में बातों ही बातों में श्याम को पता लगा कि मनोज माली तंगी झेल रहा है, जिस के लिए उसे छोटेमोटे पार्टटाइम जौब की

तलाश है.

श्याम ने भी लगे हाथ अपना पत्ता फेंक दिया और कहा, ‘देख मनोज, तुझे पार्टटाइम जौब चाहिए, तो मैं दिलवा सकता हूं. बस डिलीवरी का काम है. पैसा भी किसी फुलटाइम जौब से कम नहीं मिलेगा.’

‘भैया, फिर तो मैं तैयार हूं,’ मनोज ने कहा.

‘अरे, जहां का पता दिया जाए, वहां पर एक छोटी सी थैली पहुंचानी है,’ श्याम ने झूठी हंसी हंसते हुए कहा.

मनोज काम करने के लिए तैयार हो गया. उसे लिफाफे में कुछ दिया जाता और साथ ही एक परची पर पता भी लिख कर दे दिया जाता.

मनोज वह छोटी सी थैली पैंट की जेब में डाल कर उसे दिए गए पते पर छोड़ आता, जिस के बदले में उसे अच्छीखासी रकम नकद मिल जाती.

ऐसे ही कुछ महीनों तक यह सिलसिला चलता रहा. एक दिन मनोज के जेहन में आया कि आखिर छोटी सी थैली में ऐसी क्या कीमती चीज है, जिस के लोग इतने रुपए दे देते हैं.

उस ने थैली को खोल कर देखा. उस के अंदर सफेद चूर्ण सा दिखने वाला कोई पदार्थ था.

मनोज पढ़ालिखा था. उसे शक हो गया कि कहीं यह उसी चीज की थैली तो नहीं, जिस के बारे में उस ने कई फिल्मों में देखा है. उस का शक तब और भी पक्का हुआ, जब उस ने उस सफेद चूर्ण से दिखने वाले पाउडर को सूंघ कर देखा और एहसास हुआ कि उस से इतने दिनों से एक गैरकानूनी काम करवाया जा रहा है.

उस ने तुरंत श्याम को फोन कर धमकी दी कि वह सुबह होते ही उस का भांड़ा फोड़ देगा और उस के खिलाफ केस करेगा.

इधर, श्याम ने यह सारा माजरा सिकंदर को फोन कर के बताया. सिकंदर एक शातिर मुजरिम था. उसे ऐसे हालात से भी मुनाफा कमाना खूब अच्छी तरह से आता था.

उस ने कुछ गुरगे भेज कर मनोज को अपने पास बुलवाया और खूब मीठीमीठी बातों से आदरसत्कार किया.

मनोज नहीं जानता था कि श्याम के भी ऊपर कोई है, जो इन चीजों का मास्टरमाइंड है. सिकंदर की दबंगई देख कर उस का भी दिल सहम गया. उसे महसूस हुआ कि वह ज्यादा पैसा कमाने के चक्कर में कैसे लोगों के चक्कर में फंस चुका है.

सिकंदर ने मीठी जबान में कहा, ‘अरे, क्या है भाई. पढ़ेलिखे हो, समझदार हो, यह पुलिस की धमकी देते हुए अच्छे लगते हो क्या? अच्छा, यह लो, इसे ले जाओ अपने साथ और मजे करो.’

सिकंदर ने अपने बगल में खड़ी एक खूबसूरत लड़की को पकड़ मनोज की ओर धकेल दिया. उस लड़की को देख मनोज का भी दिल बहक सा गया और वह सिकंदर के दिए हुए तोहफे को मना नहीं कर सका.

मनोज उसे अपने घर ले आया. उस लड़की ने मौका पा कर मनोज को बेहोश कर दिया और बाहर हाथ में रस्सी लिए उस लड़की के इशारे ओर देख रहे श्याम और सिकंदर को जैसे ही कमरे के अंदर से उस लड़की का फोन आया, वे दोनों चुपचाप मनोज को रस्सी के सहारे पंखे से लटका कर अपनेअपने ठिकाने पर लौट गए.

अगले दिन योजना के मुताबिक श्याम अनजान आदमी की तरह मनोज के कमरे में अखबार देने गया और खुद शक के घेरे से बाहर निकलने के लिए सामने से पुलिस को फोन कर दिया.

इतना बताने के बाद ही हवलदार बहादुर सिंह फौरैंसिक रिपोर्ट ले कर हाजिर हुआ, जिस में साफसाफ  लिखा था, ‘मौत बेहोशी की हालत में हुई है’.

Most Suspenseful Crime Fiction Stories in Hindi : पढ़ें ये 10 टौप कहानियां, जो सस्पेंस से है भरपूर

Most Suspenseful Crime Fiction Stories in Hindi : इस लेख में  आप समाज, परिवार और रिश्तों की आड़ में हुए धोखे और जुर्म की कहानी के बारे में बताएंगे. जो सस्पेंस से भरपूर है. इन Crime Stories को पढ़कर आप जीवन के कई पहलुओं से परिचित होंगे. तो अगर आप भी  Suspenseful Crime Fiction  पढ़ने के शौकिन हैं तो पढ़िए गृहशोभा की ये कहानियां….

1. बदनामी का डर: राज अनुभा को धोखा क्यों दे रहा था

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राज ने एक बार फिर से अनुभा को अपनी बांहों में भर कर उस के लबों को चूम लिया. अनुभा देर तक राज को प्यार से निहारती रही फिर शरमा कर बोली,” हटो अब जाने दो मुझे. इतनी रात गए तुम्हारे घर से निकलते किसी ने देख लिया तो हंगामा हो जाएगा. विपक्षी दल वाले तुम्हारे पीछे पड़ जाएंगे. एक मुद्दा मिल जाएगा उन्हें.”

“तो फिर आज मेरे घर में ही ठहर जाओ न. जाने की जरूरत ही क्या है? अपनी वार्डन को कह दो कि ऑफिस में किसी काम से बाहर जाना पड़ा. अनीता भी अभी 15 दिन से पहले नहीं आएगी. 15- 20 दिनों की बात कह कर मायके गई है. उस के भाई के बेटे का मुंडन है न. ऐसे में मुझे किसी की परवाह नहीं. खूब मस्ती करेंगे हम दोनों.”

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2. जरा सा मोहत्याग : ऐसा क्या हुआ था नीमा के साथ?

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बहुत दिनों से नीमा से बात नहीं हो पा रही थी. जब भी फोन मिलाने की सोचती कोई न कोई काम आ जाता. नीमा मेरी छोटी बहन है और मेरी बहुत प्रिय है.

‘‘मौसी की चिंता न करो मां. वे अच्छीभली होंगी तभी उन का फोन नहीं आया. कोई दुखतकलीफ होती तो रोनाधोना कर ही लेतीं.’’

मानव ने हंस कर बात उड़ा दी तो मुझे जरा रुक कर उस का चेहरा देखना पड़ा. आजकल के बच्चे बड़े समझदार और जागरूक हो गए हैं, यह मैं समझती हूं और यह सत्य मुझे खुशी भी देता है. हमारा बचपन इतना चुस्त कहां था, जो किसी रिश्तेदार को 1-2 मुलाकातों में ही जांचपरख जाते. हम तो आसानी से बुद्धू बन जाते थे और फिर संयुक्त परिवारों में बच्चों का संपर्क ज्यादातर बच्चों के साथ ही रहता था. बड़े सदस्य आपस में क्या मनमुटाव या क्या मेलमिलाप कर के कैसेकैसे गृहस्थी की गाड़ी खींच रहे हैं, हमें पता ही नहीं होता था. आजकल 4 सदस्यों के परिवार में किस के माथे पर कितने बल आए और किस ने किसे कितनी बार आंखें तरेर कर देखा बच्चों को सब समझ में आता है.

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3. महक वापस लौटी: क्यों मनोज का गला दबाना चाहती थी सुमि

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सुमि को रोज 1-2 किलोमीटर पैदल चलना बेहद पसंद था. वह आज भी बस न ले कर दफ्तर के बाद अपने ही अंदाज में मजेमजे से चहलकदमी करते हुए, तो कभी जरा सा तेज चलती हुई दफ्तर से लौट रही थी कि सामने से मनोज को देख कर एकदम चौंक पड़ी.

सुमि सकपका कर पूछना चाहती थी, ‘अरे, तुम यहां इस कसबे में कब वापस आए?’

पर यह सब सुमि के मन में ही कहीं  रह गया. उस से पहले मनोज ने जोश में आ कर उस का हाथ पकड़ा और फिर तुरंत खुद ही छोड़ भी दिया.

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4. विश्वास: अमित के सुखी वैवाहिक जीवन में क्यों जहर घोलना चाहती थी अंजलि?

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करीब 3 साल बाद अंजलि और अमित की मुलाकात शौपिंग सैंटर में हुई तो दोनों एकदूसरे का हालचाल जानने के लिए एक रेस्तरां में जा कर बैठ गए.

यह जान कर कि अमित ने पिछले साल शादी कर ली है, अंजलि उसे छेड़ने से नहीं चूकी, ‘‘मैं बिना पूछे बता सकती हूं कि वह नौकरी नहीं करती है. मेरा अंदाजा ठीक है?’’

‘‘हां, वह घर में रह कर बहुत खुश है, अंजलि,’’ अमित ने मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘और वह तुम से लड़तीझगड़ती भी नहीं है न, अमित?’’

‘‘ऐसा अजीब सा सवाल क्यों पूछ रही हो?’’ अमित के होंठों पर फैली मुसकराहट अचानक गायब हो गई.

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5. बहन का सुहाग: क्या रिया अपनी बहन का घर बर्बाद कर पाई

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आनंद रंजन अर्बन बैंक में क्लर्क थे. उन की आमदनी ठीकठाक ही थी. घर में सुघड़ पत्नी के अलावा 2 बेटियां और 1 बेटा बस इतना सा ही परिवार था आनंद रंजन का.

गांव में अम्मांबाबूजी बड़े भाई के साथ रहते थे, इसलिए उन की तरफ की जिम्मेदारियों से आनंद मुक्त थे, हां… पर गांव में हर महीने पैसे जरूर भेज दिया करते थे.

वैसे तो आनंद रंजन का किसी के साथ कोई मनमुटाव नहीं था. सब के साथ उन का मृदु स्वभाव उन्हें लोगों के बीच लोकप्रिय बनाए रखता था, चाहे बैंक का काम हो या सामाजिक काम, सब में आगे बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया करते थे वे. साथ ही साथ अपने परिवार को आनंद रंजन पूरा समय भी देते थे. जहां हमारे देश में एक लड़के को ही वंश चलाने के लिए जरूरी माना जाता है और लड़कियों के बजाय लोग लड़कों को वरीयता देते हैं, वहीं आनंद की दोनों बेटियां, बड़ी बेटी निहारिका और छोटी बेटी रिया उन की आंखों का तारा थीं. बड़ी बेटी सीधीसादी और छोटी बेटी रिया थोड़ी चंचल थी.

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6. झगड़ा: क्यों भागा था लाखा

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रात गहराने लगी थी और श्याम अभीअभी खेतों से लौटा ही था कि पंचायत के कारिंदे ने आ कर आवाज लगाई, ‘‘श्याम, अभी पंचायत बैठ रही?है. तुझे जितेंद्रजी ने बुलाया है.’’

अचानक क्या हो गया? पंचायत क्यों बैठ रही है? इस बारे में कारिंदे को कुछ पता नहीं था. श्याम ने जल्दीजल्दी बैलों को चारापानी दिया, हाथमुंह धोए, बदन पर चादर लपेटी और जूतियां पहन कर चल दिया.

इस बात को 2-3 घंटे बीत गए थे. अपने पापा को बारबार याद करते हुए सुशी सो गई थी. खाट पर सुशी की बगल में बैठी भारती बेताबी से श्याम के आने का इंतजार कर रही थी.

तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया, तो भारती ने सांकल खोल दी. थके कदमों से श्याम घर में दाखिल हुआ.

भारती ने दरवाजे की सांकल चढ़ाई और एक ही सांस में श्याम से कई सवाल कर डाले, ‘‘क्या हुआ? क्यों बैठी थी पंचायत? क्यों बुलाया था तुम्हें?’’

7. सिंदूर विच्छेद: क्या हुआ था मनोज के साथ

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धूपबत्ती का धुआं गोल आकार में उड़ता ऊपर की ओर जा रहा था. शायद छत तक पहुंचने की कोशिश कर रहा था. पर इतनी ऊंचाई तक पहुंचने से पहले ही धूपबत्ती के सफेद गोलाकार धुएं के कण सर्पिलाकार होते हुए तितरबितर हो जाते थे.

चंदन धूपबत्ती की खुशबू मनोज के नथुनों में जा रही थी और उस की सांस जैसे रुकी जा रही थी.

सामने अधीरा की मृत शरीर के पास दीपक के साथ एक मोटी सी धूपबत्ती भी जला कर रखी गई थी, पर मनोज चाह कर भी चिरनिंद्रा में लीन अपनी बीवी के मुख को देख नहीं पा रहा था. नजरें झुकी हुई थीं. बस, कभीकभी नजर उठा कर धुंए के गोल छल्लों को देख लेता था.

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8. हवस का नतीजा : राज ने भाभी के साथ क्या किया

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मुग्धा का बदन बुखार से तप रहा था. ऊपर से रसोई की जिम्मेदारी. किसी तरह सब्जी चलाए जा रही थी तभी उस का देवर राज वहां पानी पीने आया. उस ने मुग्धा के हावभाव देखे तो उस के माथे पर हाथ रखा और बोला, ‘‘भाभी, आप को तो तेज बुखार है.’’

‘‘हां…’’ मुग्धा ने कमजोर आवाज में कहा, ‘‘सुबह कुछ नहीं था. दोपहर से अचानक…’’

‘‘भैया को बताया?’’

‘‘नहीं, वे तो परसों आने ही वाले हैं वैसे भी… बेकार परेशान होंगे. आज तो रात हो ही गई… बस कल की बात है.’’

‘‘अरे, लेकिन…’’ राज की फिक्र कम नहीं हुई थी. मगर मुग्धा ने उसे दिलासा देते हुए कहा, ‘‘कोई बात नहीं. मामूली बुखार ही तो है. तुम जा कर पढ़ाई करो, खाना बनते ही बुला लूंगी.’’

‘‘खाना बनते ही बुला लूंगी…’’ मुग्धा की नकल उतार कर चिढ़ाते हुए राज ने उस के हाथ से बेलन छीना और बोला, ‘‘लाइए, मैं बना देता हूं. आप जा कर आराम कीजिए.’’

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9. दोषी कौन: रश्मि के पति ने क्यों तोड़ा भरोसा

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लॉकडाउन के कारण सभी की जानकारी में आई भोपाल की इस सच्ची कहानी में असली दोषी कौन है यह मैं आपको वाकिए के आखिर में बता पाऊँगा तो उसकी अपनी वजहें भी हैं . मिसेज वर्मा कोई 17 साल की अल्हड़ हाई स्कूल की स्टूडेंट नहीं हैं जिसे नादान , दीवानी या बाबली करार देते हुये बात हवा में उड़ा दी जाये . यहाँ सवाल दो गृहस्थियों और तीन ज़िंदगियों का है इसलिए फैसला करना मुझे तो क्या आपको और मामला अगर अदालत में गया तो किसी जज को लेना भी कोई आसान काम नहीं होगा.

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10.  अपनी शर्तों पर: जब खूनी खेल में बदली नव्या-परख की कहानी

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नव्यालाइब्रेरी में बैठी नोट्स लिख रही थी तभी कब परख उस के पास आ कर बैठ गया उसे पता ही नहीं चला. ‘‘मुझ से इतनी बेरुखी क्यों नव्या, मैं सह नहीं पाऊंगा. वैसे कान खोल कर सुन लो, तुम मेरी नहीं हो सकीं तो और किसी की नहीं होने दूंगा. कितने दिनों से मैं तुम से मिलने का प्रयत्न कर रहा हूं पर तुम कन्नी काट कर निकल जाती हो,’’ वह बोला.

‘‘मेरा पीछा छोड़ दो परख, हमारी राहें और लक्ष्य अलग हैं,’’ नव्या ने उत्तर दिया. दोनों को बातें करता देख कर लाइब्रेरियन ने उन्हें बाहर जाने का इशारा करते हुए द्वार पर लगी चुप रहने का इशारा करने वाली तसवीर दिखाई.

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Shilpa Shetty के पति राज कुंद्रा पर कसा ईडी का शिंकजा, छापेमारी जारी

Shilpa Shetty and Raj Kundra : मोबाइल के ऐप के जरिए अश्‍लील सामग्री बनाने और उसका प्रसार करने के मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने शुक्रवार को ऐक्‍ट्रैस शिल्‍पा शेट्टी के पति बिजनेसमैन राज कुंद्रा (Raj Kundra) के घर और औफिस में छापेमारी की. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें, तो ईडी ने ऐक्‍ट्रैस के पति के साथ ही कई और लोगों के यहां भी छापे मारे. मुंबई और उत्तर प्रदेश में भी तलाशी अभियान चलाया गया. इतना ही नहीं इस मामले में यह जांच एजेंसी राज कुंद्रा से पूछताछ भी कर रही है.

इसके पहले भी हुई थी जांच

साल 2024 की शुरुआत में ही ईडी ने क्रिप्‍टो करैंसी के मामले में राज कुंद्रा और उनकी पत्‍नी शिल्‍पा शेट्टी (Shilpa Shetty) की 90 करोड़ से अधिक की संपत्‍त‍ि को कुर्क कर लिया गया था. हालांकि इस मामले में ईडी के आदेश के खिलाफ कपल को बौम्‍बे हाईकोर्ट से राहत मिल गई थी. इसके पहले राज कुंद्रा (Raj Kundra) को साल 2021 में एक केस में गिरफ्तार किया गया. उन पर एडल्‍ट मूवी बनाने के साथ ही एक मोबाइल ऐप के जरिए इसे डिस्‍ट्रीब्‍यूट करने का भी आरोप लग चुका है. तब मुंबई की अपराध शाखा की ओर से भारतीय दंड संहिता और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत गिरफ्तारी की गई थी. बाद में उन्‍हें जमानत दे दी गई थी. ईडी की इस छापेमारी को इसी केस से जुड़ा मामला बताया जा रहा है.

बंगले में अश्‍लील शूट कराने का लगा था आरोप

राज कुंद्रा (Raj Kundra) के मड आइलैंड वाले एक बंगले पर पुलिस ने साल 2021 में छापेमारी की थी. तब कहा गया था कि इस बंगले में अश्‍लील मूवी की शूटिंग होती है. इस मामले में टीवी ऐक्‍ट्रैस गहना वशिष्‍ठ का नाम सामने आया था. दरअसल, राज कुंद्रा ने ‘हौटशौट्स’ नाम के एक ऐप के माध्‍यम से एडल्‍ट वीडियोज स्‍ट्रीम किए थे. इस ऐप को ‘गूगल’ और ‘ऐपल’ दोनों के प्‍ले स्‍टोर से हटा दिया गया है. तब राज पर आरोप लगा था कि वह इसी ऐप की मदद से ब्रिटेन की एक कंपनी को अश्‍लील सामग्री बेचते थे. इस मामले में कई लड़कियों ने ऐक्‍ट्रैस के पति पर यह आरोप लगाया था कि उन्‍हें बौलीवुड मूवीज में काम दिलाने के नाम पर अश्‍लील मूवी में काम करने को मजबूर किया गया था. पुलिस की जांच में यह पाया गया था कि वेबसीरीज में काम दिलाने के नाम पर इन कलाकारों को औडिशन देने के लिए बुलाया. इन लड़कियों को बोल्‍ड सीन देने को कहा गया. राज कुंद्रा के फोन से इस मामले में आर्थिक लेनदेन के संबंध में जानकारी मिली थी. एक वाट्सचैट से पता चला कि राज ने एक व्‍यक्ति को 1.2 मिलियन अमेरिकी डौलर में सौ से अधिक एडल्‍ट कंटेंट बेचने की चर्चा भी की थी.

पूनम पांडे और शर्लिन चोपड़ा का नाम भी

पौर्न फिल्में बनाने के मामले में गहना वशिष्‍ठ के अलावा पूनम पांडेय और शर्लिन चोपड़ा का नाम भी सामने आया. शर्लिन ने राज पर यह इल्‍जाम लगाया था कि एक्‍ट्रैस के पति ने उनके घर में आकर उनके साथ जबरदस्‍ती करने की कोशिश की थी. शर्लिन का कहना था कि राज अपनी मैरिड लाइफ से खुश नहीं था और टेंशन में रहते थे. शर्लिन ने यह भी कहा था कि राज ने ही उन्‍हें अश्‍लील कंटेंट के धंधे में धकेला. नवंबर 2023 में राज कुंद्रा के अपने जेल जाने के अनुभव पर उनकी मूवी UT69 रिलीज हुई. इसमें राज कुंद्रा ने ही अपनी भूमिका को निभाया था. राज कुंद्रा और शिल्‍पा शेट्टी की शादी साल 2019 में हुई थी . इस कपल का एक बेटा है वियान और एक बेटी है समीशा. इसी 22 नवंबर को कपल ने अपनी शादी की 15वीं सालगिरह मनाई थी.

Manoj Bajpayee ने 14 सालों से क्यों नहीं किया डिनर

फिल्म इंडस्ट्री में आज के समय में मोटापा सबसे बड़ी बीमारी है. खासतौर पर उन एक्टरों के लिए जो अभिनय के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं. वैसे तो आजकल हर कोई हेल्थ कौन्शियस है . लेकिन एक्टरों को अपने शारीरिक गठन का खासतौर पर ध्यान रखना पड़ता है. पहले वजन बढ़ने को लेकर सिर्फ हीरोइनें ज्यादा परेशान रहती थी लेकिन अब हीरो को भी मोटापे का डर सताने लगा है जिसकी वजह से कई सारे हेल्थ सेंटर फल फूल रहे हैं. फिल्म इंडस्ट्री के जानेमाने एक्टर मनोज बाजपेयी (Manoj Bajpayee) जो फिल्म और ओटीटी पर कई बेहतरीन वेब सीरीज की वजह से छाए हुए हैं. उनको एक डर बहुत सताता है और वह है वजन बढ़ने का डर.  मनोज बाजपेयी खानेपीने के शौकीन हैं इसलिए उनका वजन बढ़ने का ज्यादा डर रहता है.

लिहाजा अपने बढ़ते वजन को कंट्रोल में रखने के लिए मनोज बाजपेयी पिछले 14 सालों से डिनर अर्थात रात का खाना नहीं खाते हैं. मनोज बाजपेयी के अनुसार अगर उन्हें रात को भूख लगती है तो वह हैल्दी फूड के कुछ टुकड़े खा लेते हैं.

एक डौक्टर ने उन्हें सलाह दी थी कि रात में मनोज जल्दी खाना खा लिया करें ताकि खाना अच्छे से डाइजेस्ट हो जाए. लेकिन काम और व्यस्तता के चलते रात को जल्दी खाना उनके लिए संभव नहीं हो पा रहा था. इसलिए मनोज बाजपेयी ने रात का खाना ही छोड़ दिया क्योंकि उनको एक सर्वे से पता चला कि रात को खाना न खाने से वजन कंट्रोल रहता है.

मनोज बाजपेयी जो डाइट फौलो कर रहे हैं उससे उन्हें बहुत एनर्जी मिलती है मनोज बाजपेयी के अनुसार उनकी दादी भी रात में खाना ना के बराबर खाती थी. इसलिए वह लंबे समय तक फिट और एनर्जेटिक रही हैं. अपनी दादी से प्रेरित होकर भी मनोज बाजपेयी ने रात के खाने से दूरी बना ली है. जिसके चलते वह न सिर्फ फिट एंड फाइन हैं बल्कि उनके वजन पर भी सालों से कंट्रोल रहा है. आज भी मनोज बाजपेयी वैसे ही फिट और फाइन नजर आते हैं जैसे आज से 10 साल पहले दिखाई देते थे.

दाग का सच : क्या था ललिया के कपड़ों में दाग का सच

पूरे एक हफ्ते बाद आज शाम को सुनील घर लौटा. डरतेडरते डोरबैल बजाई. बीवी ललिया ने दरवाजा खोला और पूछा, ‘‘हो गई फुरसत तुम्हें?’’

‘‘हां… मुझे दूसरे राज्य में जाना पड़ा था न, सो…’’ ‘‘चलिए, मैं चाय बना कर लाती हूं.’’

ललिया के रसोईघर में जाते ही सुनील ने चैन की सांस ली. पहले तो जब सुनील को लौटने में कुछ दिन लग जाते थे तो ललिया का गुस्सा देखने लायक होता था मानो कोई समझ ही नहीं कि आखिर ट्रांसपोर्टर का काम ही ऐसा. वह किसी ड्राइवर को रख तो ले, पर क्या भरोसा कि वह कैसे चलाएगा? क्या करेगा?

और कौन सा सुनील बाकी ट्रक वालों की तरह बाहर जा कर धंधे वालियों के अड्डे पर मुंह मारता है. चाहे जितने दिन हो जाएं, घर से ललिया के होंठों का रस पी कर जो निकलता तो दोबारा फिर घर में ही आ कर रसपान करता, लेकिन कौन समझाए ललिया को. वह तो इधर 2-4 बार से इस की आदत कुछकुछ सुधरी हुई है. तुनकती तो है, लेकिन प्यार दिखाते हुए.

चाय पीते समय भी सुनील को घबराहट हो रही थी. क्या पता, कब माथा सनक उठे. माहौल को हलका बनाने के लिए सुनील ने पूछा, ‘‘आज खाने में क्या बना रही हो?’’

‘‘लिट्टीचोखा.’’ ‘‘अरे वाह, लिट्टीचोखा… बहुत बढि़या तब तो…’’

‘‘हां, तुम्हारा मनपसंद जो है…’’ ‘‘अरे हां, लेकिन इस से भी ज्यादा मनपसंद तो…’’ सुनील ने शरारत से ललिया को आंख मारी.

‘‘हांहां, वह तो मेरा भी,’’ ललिया ने भी इठलाते हुए कहा और रसोईघर में चली गई. खाना खाते समय भी बारबार सुनील की नजर ललिया की छाती पर चली जाती. रहरह कर ललिया के हिस्से से जूठी लिट्टी के टुकड़े उठा लेता जबकि दोनों एक ही थाली में खा रहे थे.

‘‘अरे, तुम्हारी तरफ इतना सारा रखा हुआ है तो मेरा वाला क्यों ले रहे हो?’’ ‘‘तुम ने दांतों से काट कर इस को और चटपटा जो बना दिया है.’’

‘‘हटो, खाना खाओ पहले अपना ठीक से. बहुत मेहनत करनी है आगे,’’ ललिया भी पूरे जोश में थी. दोनों ने भरपेट खाना खाया. ललिया बरतन रखने चली गई और सुनील पिछवाड़े जा कर टहलने लगा. तभी उस ने देखा कि किसी की चप्पलें पड़ी हुई थीं.

‘‘ये कुत्ते भी क्याक्या उठा कर ले आते हैं,’’ सुनील ने झल्ला कर उन्हें लात मार कर दूर किया और घर में घुस कर दरवाजा बंद कर लिया. सुनील बैडरूम में पहुंचा तो ललिया टैलीविजन देखती मिली. वह मच्छरदानी लगाने लगा.

‘‘दूध पीएंगे?’’ ललिया ने पूछा. ‘‘तो और क्या बिना पीए ही रह जाएंगे,’’ सुनील भी तपाक से बोला.

ललिया ने सुनील का भाव समझ कर उसे एक चपत लगाई और बोली, ‘‘मैं भैंस के दूध की बात कर रही हूं.’’

‘‘न… न, वह नहीं. मेरा पेट लिट्टीचोखा से ही भर गया है,’’ सुनील ने कहा. ‘‘चलो तो फिर सोया जाए.’’

ललिया टैलीविजन बंद कर मच्छरदानी में आ गई. बत्ती तक बुझाने का किसी को होश नहीं रहा. कमरे का दरवाजा भी खुला रह गया जैसे उन को देखदेख कर शरमा रहा था. वैसे भी घर में उन दोनों के अलावा कोई रहता नहीं था.

सुबह 7 बजे सुनील की आंखें खुलीं तो देखा कि ललिया बिस्तर के पास खड़ी कपड़े पहन रही थी. ‘‘एक बार गले तो लग जाओ,’’ सुनील ने नींद भरी आवाज में कहा.

‘‘बाद में लग लेना, जरा जल्दी है मुझे बाथरूम जाने की…’’ कहते हुए ललिया जैसेतैसे अपने बालों का जूड़ा बांधते हुए वहां से भाग गई. सुनील ने करवट बदली तो ललिया के अंदरूनी कपड़ों पर हाथ पड़ गया.

ललिया के अंदरूनी कपड़ों की महक सुनील को मदमस्त कर रही थी.

सुनील ललिया के लौटने का इंतजार करने लगा, तभी उस की नजर ललिया की पैंटी पर बने किसी दाग पर गई. उस का माथा अचानक से ठनक उठा. ‘‘यह दाग तो…’’

सुनील की सारी नींद झटके में गायब हो चुकी थी. वह हड़बड़ा कर उठा और ध्यान से देखने लगा. पूरी पैंटी पर कई जगह वैसे निशान थे. ब्रा का मुआयना किया तो उस का भी वही हाल था. ‘‘कल रात तो मैं ने इन का कोई इस्तेमाल नहीं किया. जो भी करना था सब तौलिए से… फिर ये…’’

सुनील का मन खट्टा होने लगा. क्या उस के पीछे ललिया के पास कोई…? क्या यही वजह है कि अब ललिया उस के कई दिनों बाद घर आने पर झगड़ा नहीं करती? नहींनहीं, ऐसे ही अपनी प्यारी बीवी पर शक करना सही नहीं है. पहले जांच करा ली जाए कि ये दाग हैं किस चीज के. सुनील ने पैंटी को अपने बैग में छिपा दिया, तभी ललिया आ गई, ‘‘आप उठ गए… मुझे देर लग गई थोड़ी.’’

‘‘कोई बात नहीं,’’ कह कर सुनील बाथरूम में चला गया. जब वह लौटा तो देखा कि ललिया कुछ ढूंढ़ रही थी.

‘‘क्या देख रही हो?’’ ‘‘मेरी पैंटी न जाने कहां गायब हो गईं. ब्रा तो पहन ली है मैं ने.’’

‘‘चूहा ले गया होगा. चलो, नाश्ता बनाओ. मुझे आज जल्दी जाना है,’’ सुनील ने उस को टालने के अंदाज में कहा. ललिया भी मुसकरा उठी. नाश्ता कर सुनील सीधा अपने दोस्त मुकेश के पास पहुंचा. उस की पैथोलौजी की लैब थी.

सुनील ने मुकेश को सारी बात बताई. उस की सांसें घबराहट के मारे तेज होती जा रही थीं. ‘‘अरे, अपना हार्टफेल करा के अब तू मर मत… मैं चैक करता हूं.’’

सुनील ने मुकेश को पैंटी दे दी. ‘‘शाम को आना. बता दूंगा कि दाग किस चीज का है,’’ मुकेश ने कहा.

सुनील ने रजामंदी में सिर हिलाया और वहां से निकल गया. दिनभर पागलों की तरह घूमतेघूमते शाम हो गई. न खाने का होश, न पीने का. वह धड़कते दिल से मुकेश के पास पहुंचा.

‘‘क्या रिपोर्ट आई?’’ मुकेश ने भरे मन से जवाब दिया, ‘‘यार, दाग तो वही है जो तू सोच रहा है, लेकिन… अब इस से किसी फैसले पर तो…’’

सुनील जस का तस खड़ा रह गया. मुकेश उसे समझाने के लिए कुछकुछ बोले जा रहा था, लेकिन उस का माथा तो जैसे सुन्न हो चुका था. सुनील घर पहुंचा तो ललिया दरवाजे पर ही खड़ी मिली.

‘‘कहां गायब थे दिनभर?’’ ललिया परेशान होते हुए बोली. ‘‘किसी से कुछ काम था,’’ कहता हुआ सुनील सिर पकड़ कर पलंग पर बैठ गया.

‘‘तबीयत तो ठीक है न आप की?’’ ललिया ने सुनील के पास बैठ कर उस के कंधे पर हाथ रखा. ‘‘सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा है.’’

‘‘बैठिए, मैं चाय बना कर लाती हूं,’’ कहते हुए ललिया रसोईघर में चली गई. सुनील ने ललिया की पैंटी को गद्दे के नीचे दबा दिया.

चाय पी कर वह बिस्तर पर लेट गया. रात को ललिया खाना ले कर आई और बोली, ‘‘अजी, अब आप मुझे भी मार देंगे. बताओ तो सही, क्या हुआ? ज्यादा दिक्कत है, तो चलो डाक्टर के पास ले चलती हूं.’’

‘‘कुछ बात नहीं, बस एक बहुत बड़े नुकसान का डर सता रहा है,’’ कह कर सुनील खाना खाने लगा. ‘‘अपना खयाल रखो,’’ कहते हुए ललिया सुनील के पास आ कर बैठ गई.

सुनील सोच रहा था कि ललिया का जो रूप अभी उस के सामने है, वह उस की सचाई या जो आज पता चली वह है. खाना खत्म कर वह छत पर चला गया. ललिया नीचे खाना खाते हुए आंगन में बैठी उस को ही देख रही थी.

सुनील का ध्यान अब कल रात पिछवाड़े में पड़ी चप्पलों पर जा रहा था. वह सोचने लगा, ‘लगता है वे चप्पलें भी इसी के यार की… नहीं, बिलकुल नहीं. ललिया ऐसी नहीं है…’ रात को सुनील ने नींद की एक गोली खा ली, पर नींद की गोली भी कम ताकत वाली निकली.

सुनील को खीज सी होने लगी. पास में देखा तो ललिया सोई हुई थी. यह देख कर सुनील को गुस्सा आने लगा, ‘मैं जान देदे कर इस के सुख के लिए पागलों की तरह मेहनत करता हूं और यह अपना जिस्म किसी और को…’ कह कर वह उस पर चढ़ गया.

ललिया की नींद तब खुली जब उस को अपने बदन के निचले हिस्से पर जोर महसूस होने लगा. ‘‘अरे, जगा देते मुझे,’’ ललिया ने उठते ही उस को सहयोग करना शुरू किया, लेकिन सुनील तो अपनी ही धुन में था. कुछ ही देर में दोनों एकदूसरे के बगल में बेसुध लेटे हुए थे.

ललिया ने अपनी समीज उठा कर ओढ़ ली. सुनील ने जैसे ही उस को ऐसा करते देखा मानो उस पर भूत सा सवार हो गया. वह झटके से उठा और समीज को खींच कर बिस्तर के नीचे फेंक दिया और फिर से उस के ऊपर आ गया.

‘‘ओहहो, सारी टैंशन मुझ पर ही उतारेंगे क्या?’’ ललिया आहें भरते हुए बोली. सुनील के मन में पल रही नाइंसाफी की भावना ने गुस्से का रूप ले लिया था.

ललिया को छुटकारा तब मिला जब सुनील थक कर चूर हो गया. गला तो ललिया का भी सूखने लगा था, लेकिन वह जानती थी कि उस का पति किसी बात से परेशान है.

ललिया ने अपनेआप को संभाला और उठ कर थोड़ा पानी पीने के बाद उसी की चिंता करतेकरते कब उस को दोबारा नींद आ गई, कुछ पता न चला. ऐसे ही कुछ दिन गुजर गए. हंसनेहंसाने वाला सुनील अब बहुत गुमसुम रहने लगा था और रात को तो ललिया की एक न सुनना मानो उस की आदत बनती जा रही थी.

ललिया का दिल किसी अनहोनी बात से कांपने लगा था. वह सोचने लगी थी कि इन के मांपिताजी को बुला लेती हूं. वे ही समझा सकते हैं कुछ. एक दिन ललिया बाजार गई हुई थी. सुनील छत पर टहल रहा था. शाम होने को थी. बादल घिर आए थे. मन में आया कि फोन लगा कर ललिया से कहे कि जल्दी घर लौट आए, लेकिन फिर मन उचट गया.

थोड़ी देर बाद ही सुनील ने सोचा, ‘कपड़े ही ले आता हूं छत से. सूख गए होंगे.’ सुनील छत पर गया ही था कि देखा पड़ोसी बीरबल बाबू के किराएदार का लड़का रंगवा जो कि 18-19 साल का होगा, दबे पैर उस की छत से ललिया के अंदरूनी कपड़े ले कर अपनी छत पर कूद गया. शायद उसे पता नहीं था कि घर में कोई है, क्योंकि ललिया उस के सामने बाहर गई थी.

यह देख कर सुनील चौंक गया. उस ने पूरी बात का पता लगाने का निश्चय किया. वह भी धीरे से उस की छत पर उतरा और सीढि़यों से नीचे आया. नीचे आते ही उस को एक कमरे से कुछ आवाजें सुनाई दीं.

सुनील ने झांक कर देखा तो रंगवा अपने हमउम्र ही किसी गुंडे से दिखने वाले लड़के से कुछ बातें कर रहा था. ‘‘अबे रंगवा, तेरी पड़ोसन तो बहुत अच्छा माल है रे…’’

‘‘हां, तभी तो उस की ब्रापैंटी के लिए भटकता हूं,’’ कह कर वह हंसने लगा. इस के बाद सुनील ने जो कुछ देखा, उसे देख कर उस की आंखें फटी रह गईं. दोनों ने ललिया के अंदरूनी कपड़ों पर अपना जोश निकाला और रंगवा बोला, ‘‘अब मैं वापस उस की छत पर रख आता हूं… वह लौटने वाली होगी.’’

‘‘अबे, कब तक ऐसे ही करते रहेंगे? कभी असली में उस को…’’ ‘‘मिलेगीमिलेगी, लेकिन उस पर तो पतिव्रता होने का फुतूर है. वह किसी से बात तक नहीं करती. पति के बाहर जाते ही घर में झाड़ू भी लगाने का होश नहीं रहता उसे, न ही बाल संवारती है वह. कभी दबोचेंगे रात में उसे,’’ रंगवा कहते हुए कमरे के बाहर आने लगा.

सुनील जल्दी से वापस भागा और अपनी छत पर कूद के छिप गया. रंगवा भी पीछे से आया और उन गंदे किए कपड़ों को वापस तार पर डाल कर भाग गया.

सुनील को अब सारा मामला समझ आ गया था. रंगवा इलाके में आएदिन अपनी घटिया हरकतों के चलते थाने में अंदरबाहर होता रहता था. उस के बुरे संग से उस के मांबाप भी परेशान थे. सुनील को ऐसा लग रहा था जैसे कोई अंदर से उस के सिर पर बर्फ रगड़ रहा है. उस का मन तेजी से पिछली चिंता से तो हटने लगा, लेकिन ललिया की हिफाजत की नई चुनौती ने फिर से उस के माथे पर बल ला दिया. उस ने तत्काल यह जगह छोड़ने का निश्चय कर लिया.

ललिया भी तब तक लौट आई. आते ही वह बोली, ‘‘सुनिए, आप की मां को फोन कर देती हूं. वे समझाएंगी अब आप को.’’ सुनील ने उस को सीने से कस कर चिपका लिया, ‘‘तुम साथ हो न, सब ठीक है और रहेगा…’’

‘‘अरे, लेकिन आप की यह उदासी मुझ से देखी नहीं जाती है अब…’’ ‘‘आज के बाद यह उदासी नहीं दिखेगी… खुश?’’

‘‘मेरी जान ले कर ही मानेंगे आप,’’ बोलतेबोलते ललिया को रोना आ गया.

यह देख कर सुनील की आंखों से भी आंसू छलकने लगे थे. वह सिसकते हुए बोला, ‘‘अब मैं ड्राइवर रख लूंगा और खुद तुम्हारे पास ज्यादा से ज्यादा समय…’’ प्यार उन के चारों ओर मानो नाच करता फिर से मुसकराने लगा था.

विश्वासघात: जूही ने कैसे छीना नीता का पति

नीला आसमान अचानक ही स्याह हो चला था. बारिश की छोटीछोटी बूंदें अंबर से टपकने लगी थीं. तूफान जोरों पर था. दरवाजों के टकराने की आवाज सुन कर जूही बाहर आई. अंधेरा देख कर अतीत की स्मृतियां ताजा हो गईं…

कुछ ऐसा ही तूफानी मंजर था आज से 1 साल पहले का. उस दिन उस ने जीन्स पर टौप पहना था. अपने रेशमी केशों की पोनीटेल बनाई थी. वह बहुत खूबसूरत लग रही थी. उस ने आंखों पर सनग्लासेज चढ़ाए और ड्राइविंग सीट पर बैठ गई.

कुछ ही देर में वह बैंक में थी. मैनेजर के कमरे की तरफ बढ़ते हुए उसे कुछ संशय सा था कि उस का लोन स्वीकृत होगा भी या नहीं, पर मैनेजर की मधुर मुसकान ने उस के संदेह को विराम दे दिया. उस का लोन स्वीकृत हो गया था और अब वह अपना बुटीक खोल सकती थी. आननफानन उस ने मिठाई मंगवा कर बैंक स्टाफ को खिलाई और प्रसन्नतापूर्वक घर लौट आई.

शुरू से ही वह काफी महत्त्वाकांक्षी रही थी. फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करते ही उस ने लोन के लिए आवेदन कर दिया था. पड़ोस के कसबे में रहने वाली जूही इस शहर में किराए पर अकेली रहती थी और अपना कैरियर गारमैंट्स के व्यापार से शुरू करना चाहती थी.

अगले दिन उस ने सोचा कि मैनेजर को धन्यवाद दे आए. आखिर उसी की सक्रियता से लोन इतनी जल्दी मिलना संभव हुआ था. मैनेजर बेहद स्मार्ट, हंसमुख और प्रतिभावान था. जूही उस से बेहद प्रभावित हुई और उस की मंगाई कौफी के लिए मना नहीं कर पाई. बातोंबातों में उसे पता चला कि वह शहर में नया आया है. उस का नाम नीरज है और शहर से दूर बने अपार्टमैंट्स में उस का निवास है.

धीरेधीरे मुलाकातें बढ़ीं तो जूही ने पाया कि दोनों की रुचियां काफी मिलती है. दोनों को एकदूसरे का साथ काफी अच्छा लगने लगा. लगातार मुलाकातों में जूही कब नीरज से प्यार कर बैठी, पता ही न चला. नीरज भी जूही की सुंदरता का कायल था.

बिजली तो उस दिन गिरी जब बुटीक की ओपनिंग सेरेमनी पर नीरज ने अपनी पत्नी नीता से जूही को मिलवाया. नीरज के विवाहित होने का जूही को इतना दुख नहीं हुआ, जितना नीता को उस की पत्नी के रूप में पा कर. नीता जूही की सहपाठी रही थी और हर बात में जूही से उन्नीस थी. उस के अनुसार नीता जैसी साधारण स्त्री नीरज जैसे पति को डिजर्व ही नहीं करती थी.

सहेली पर विजय की भावना जूही को नीरज की तरफ खींचती गई और नीता से अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करने के चक्कर में जूही का नीरज से मिलनाजुलना बढ़ता गया. नीता खुश थी. अकेले शहर में जूही का साथ उसे बहुत अच्छा लगता था. वह हमेशा उस से कुछ सीखने की कोशिश करती, पर इन लगातार मुलाकातों से जूही और नीरज को कई बार एकांत मिलने लगा.

दोनों बहक गए और अब एकदूसरे के साथ रहने के बहाने खोजने लगे. नीता को अपनी सहेली पर रंच मात्र भी शक न था और नीरज पर तो वह आंख मूंद कर विश्वास करती थी. विश्वास का प्याला तो उस दिन छलका, जब पिताजी की बीमारी के चलते नीता को महीने भर के लिए पीहर जाना पड़ा.

सरप्राइज देने की सोच में जब वह अचानक घर आई, तो उस ने नीरज और जूही को आपत्तिजनक हालत में पाया. इस सदमे से आहत नीता बिना कुछ बोले नीरज को छोड़ कर चली गई.

जूही अब नीरज के साथ आ कर रहने लगी. कहते हैं न कि प्यार अंधा होता है, पर जब ‘एवरीथिंग इज फेयर इन लव ऐंड वार’ का इरादा हो तो शायद वह विवेकरहित भी हो जाता है.

समय अपनी गति से चलता रहा. जूही और नीरज मानो एकदूसरे के लिए ही बने थे. जीवन मस्ती में कट रहा था. कुछ समय बाद जूही को सब कुछ होते हुए भी एक कमी सी खलने लगी.

आंगन में नन्ही किलकारी खेले, वह चाहती थी, पर नीरज इस के लिए तैयार नहीं था. उस का कहना था कि ‘लिव इन रिलेशन’ की कानूनी मान्यता विवादास्पद है, इसलिए वह बच्चे का भविष्य दांव पर नहीं लगाना चाहता. जूही इस तर्क के आगे निरुत्तर थी.

जूही का बुटीक अच्छा चल रहा था. नाम व  कमाई दोनों ही थे. एक दिन अचानक ही एक आमंत्रणपत्र देख कर वह सकते में आ गई. पत्र नीरज की पर्सनल फाइल में था. आमंत्रणपत्र महक रहा था. वह था तो किसी पार्लर के उद्घाटन का, पर शब्दावली शायराना व व्यक्तिगत सी थी. मुख्य अतिथि नीरज ही थे.

जूही ने नीरज को मोबाइल लगाना चाहा पर वह लगातार ‘आउट औफ रीच’ आता रहा. दिन भर जूही का मन काम में नहीं लगा. बुटीक छोड़ कर वह जा नहीं सकती थी. रात को नीरज के आते ही उस ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी.

कुछ देर तो नीरज बात संभालने की कोशिश करता रहा पर तर्कविहीन उत्तरों से जब जूही संतुष्ट नहीं हुई, तो दोनों का झगड़ा हो गया. नीरज पुन: किसी अन्य स्त्री की ओर आकृष्ट था. संभवत: पत्नी के रहते जूही के साथ संबंध बनाने ने उसे इतनी हिम्मत दे दी थी.

मौजूदा दौर में स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता ने उस के वजूद को बल दिया है. इतना कि कई बार वह समाज के विरुद्ध जा कर अपनी पसंद के कार्य करने लगती है. नीरज जैसे पुरुष इसी बात का फायदा उठाते हैं.

उन्होंने पढ़ीलिखी, बराबर कमाने वाली स्त्री को अपने समान नहीं माना, बल्कि उपभोग की वस्तु समझ कर उस का उपयोग किया. अपने स्वार्थ के लिए जब चाहा उन्हें समान दरजा दे दिया और जब चाहा तब सामाजिक रूढि़यों के बंधन तोड़ दिए. विवाह उन के लिए सुविधा का खेल हो गया.

इस आकस्मिक घटनाक्रम के लिए जूही तैयार नहीं थी. उस ने तो नीरज को संपूर्ण रूप से चाहा व अपनाया था. नीरज को अपनी नई महिला मित्र ताजा हवा के झोंके जैसी दिख रही थी. उस के तन व मन दोनों ही बदलाव के लिए आतुर थे.

जूही को अपनी भलाई व स्वाभिमान नीरज का घर छोड़ने में ही लगे. कुछ महीनों का मधुमास इतनी जल्दी व इतनी बेकद्री से खत्म हो जाएगा, उस ने सोचा न था. नीरज ने उस को रोकने का थोड़ा सा भी प्रयास नहीं किया.

शायद जूही ने इस कटु सत्य को जान लिया था कि पुरुष के लिए स्त्री कभी हमकदम नहीं बनती. वह या तो उसे देवी बना कर उसे नैसर्गिक अधिकारों से दूर कर देता है या दासी बना कर उस के अधिकारों को छीन लेता है. उसे पुरुषों से चिढ़ सी हो गई थी.

नीरज के बारे में फिर कभी जानने की उस ने कोशिश नहीं की, न ही नीरज ने उस से संपर्क साधा.

आज बादलों के इस झुरमुट में पिछली यादों के जख्मों को सहलाते हुए वह यही सोच रही थी कि विश्वासघात किस ने किस के साथ किया था?

 

घरेलू दुर्घटनाओं को भूलकर भी न करें अनदेखा, जानें कैसे करें इलाज

Domestic Accident :  कई बार हम घर में ही कई तरह की दुर्घटनाओं के शिकार हो जाते हैं. किचन में काम करते हुए, घर की साफसफाई करते हुए और भी कई तरह के काम होते हैं.. इस दौरान हमें चोट या जख्म लग जाती है.

पैर की मोच को हलके में न लें

ऐसे कई लोग होंगे, जिनका बाथरूम में पैर स्लिप के बाद मोच तो आता ही है, कुछ लोगों की हड्डियां भी फ्रैक्चर हो जाती हैं. किचन में काम करने वाली महिलाओं को सब्जी काटने वाली चाकू से अकसर हाथ पर जख्म लग ही जाती है. फैस्टिवल या घर में शादी के दौरान लोग एकएक कोने की सफाई करते हैं, लेकिन कई बार अलमारी गिरने से या बेड सेट करते समय कुछ ऐसी दुर्घटनाओं के शिकार हो जाते हैं, जिससे उनका उठनाबैठना मुश्किल हो जाता है.

घरेलू इलाज से बिगड़ सकती है सेहत

लेकिन घरेलू दुर्घटनाओं के दौरान लोग अपने रिश्तेदारों को ही डौक्टर मान लेते हैं और उनकी सलाह पर अपना इलाज करना शुरू कर देते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं, कई बार ये घरेलू इलाज आपके लिए भारी पड़ सकता है और इससे आपका सेहत पहले से भी ज्यादा बिगड़ सकता है. कई रिश्तेदार तो ऐसे होते हैं, अगर आप उनसे कहेंगे कि मेरे पैरों में गहरी चोट लगी है, बस इतना ही सुनते आपको कई तरह का देसी नुस्खा बताएंगे, दूध-हल्दी पिओ, उस पर हल्दी का लेप लगाओं.. वगैरह वगैरह.. ये कोई मामूली चोट नहीं है, इसे ठीक करने के लिए आपके देसी नुस्खे काम नहीं आएंगे.

नीम-हकीम से ले सकते हैं सलाह

घरेलू दूर्घटनाओं को भूलकर भी हलके में न लें. आप लोगों की सलाह पर अपना इलाज न करें. चाहें तो आप आसपास के नीम-हकीम से भी सलाह लेकर घरेलू दुर्घनाओं की तकलीफ को कम कर सकते हैं. ये आपको कई दर्द-निवारक तेल के बारे में बता सकते हैं या कोई मलहम लगाने की भी सलाह दे सकते हैं. कुछ नीम-हकीम तो खुद दवाइयां बनाते हैं, जो किसी घरेलू दुर्धटना में कारगर साबित हो सकता है.

औनलाइन परामर्श है सबसे बैस्ट औप्शन

आजकल तो आप औनलाइन डौक्टर से परामर्श लेकर भी अपना इलाज कर सकते हैं. दवाइयां भी आप औनलाइन मंगवा सकते हैं. डौक्टर से औडियों और वीडियो दोनों माध्यम से आप कंसल्ट कर सकते हैं. आपको घर से कहीं बाहर जाने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी और घर बैठे आपको सही इलाज मिल जाएगा. औनलाइन माध्यम से देश के बड़े हौस्पिटल से जुड़े डौक्टर से सलाह ली जा सकती है. आप डौक्टर्स से प्राइवेटली चैट करके भी अपने स्वास्थ्य से संबंधित परेशानियों को शेयर कर सकते हैं.

मृगतृष्णा: क्या यकीन में बदल पाया मोहिनी का शक

बिंदासजीवन जीने का पर्याय थी मोहिनी. जैसेकि नाम से ही जाहिर हो रहा है मन को मोह लेने वाली सुंदर, छरहरी, लंबा कद और आकर्षक मुसकराहट बरबस ही किसी को भी अपना कायल बना लेती. मगर जीवन को जीने का अलग ही फलसफा था मोहिनी का. निडर, बेवाक, बिंदास.

कभीकभी मेरा भी मिलना होता था उस से पर मैं ने कभी ज्यादा दोस्ती नहीं बढ़ाई. रोहन के दोस्त आकाश की बीवी थी मोहिनी. मु झे कभी भी सहज नहीं लगा उस से मिलना. मेरे चेहरे पर एक खिंचाव सा आ जाता उस से मिलते समय.

मगर मोहिनी को कहां परवाह थी घरपरिवार की. उस की तरफ से तो दुनिया जाए भाड़ में. आकाश को भी सब पता था. आकाश क्या सब को सब पता था.

‘‘रागिनी, आज मोहिनी और आकाश में फिर से बहुत  झगड़ा हुआ. आकाश बहुत दुखी है मोहिनी की वजह से,’’ खाना खाते हुए रोहन ने कहा.

‘‘पता नहीं इस सब का अंत कहां होगा, मैं खुद सोचसोच कर परेशान होती हूं. कल मोहिनी के बच्चे बड़े हो जाएंगे तो उन को भी तो सब पता चलेगा. कैसे उन के सवालों के जवाब दे पाएगी.’’

एक लंबी सांस छोड़ कर रह गए दोनों पतिपत्नी. दरअसल, मोहिनी के अपने ननदोई राहुल के साथ शारीरिक संबंध थे. उस की ननद को भी शक था पर बिना किसी ठोस सुबूत से कुछ कहना नहीं चाहती थी. अपने पति और भाभी को बातोंबातों में वह कटाक्ष कर देती पर दोनों ही बात को हंसी में टाल देते. सब के सामने भी दोनों आंखोंआंखों में बहुत कुछ कह जाते. यदाकदा दोनों को मिलने का मौका मिल ही जाता, उस समय मोहिनी के चेहरे पर कुछ अलग सा ही सुरूर होता. उस की बलिष्ठ बांहों का आलिंगन उसे मदहोश कर देता. उस के होंठों की गरमी से वह पिघल जाती. राहुल की आंखों में उस के लिए प्यार और उस की बातों में मोहिनी की सुंदरता का बखान उसे तन और मन दोनों से तृप्त कर देता. इस इजहार ए मुहब्बत से आकाश कोसों दूर था. यही कारण था, जिस से मोहिनी और आकाश में दूरियां बढ़ती जा रही थीं.

मोहिनी राहुल के प्यार में मदहोश रहती और राहुल उस की कामुकता में बंधा रहता. दोनों बच्चों का कोई भी काम अटक जाता तो मोहिनी राहुल को फोन करती और राहुल भी कच्चे धागे में बंधा चला आता. दोनों पर किसी की बात का न तो कोई असर था न ही मलाल. सब दबी जबान बातें करते पर कोई मुंह पर कुछ न कहता. लिहाजा मोहिनी और आकाश में दूरियां बढ़ती जा रही थीं.

दोनों बेटे गौरव और आरव बड़े हो रहे थे. मांबाप का रोजरोज का  झगड़ा दोनों  बेटों की पढ़ाई पर भी बुरा असर डाल रहा था. आकाश भी हर वक्त दोनों की परवरिश को ले कर चिंतित रहता. बच्चों का भविष्य खराब न हो, इसी सोच ने सब जानते हुए भी आकाश को चुप करवा रखा था. गौरव और आरव के बहुत से कार्य राहुल करता था, इसलिए वे दोनों भी कुछ कह नहीं पाते और मन मसोस कर रह जाते.

हद तो तब हुई जब एक पारिवारिक समारोह में मोहिनी की मुलाकात एक नेता से हुई. अच्छीखासी साख थी नेताजी की इलाके में. राहुल की अच्छी पटती थी उन से. अकसर नेताजी के साथ किसी न किसी समारोह में जाता रहता. अचानक हुई 1-2 मुलाकातों के बाद मोहिनी की नेताजी से घनिष्ठता बढ़ने लगी. अकसर मोहिनी राहुत से नेताजी के बारे में बात करती रहती. राहुल को मोहिनी का नेताजी के बारे में बात करना खटकता था. एक तो घर में मोहिनी को ले कर कलहकलेश रहता दूसरा मोहिनी का नेताजी की तरफ बढ़ता आकर्षण. राहुल मनाता रहता, पर मोहिनी को इन सब बातों से कोई लेनादेना नहीं था.

कुछ दिन पहले गौरव ने बताया कि कालेज में उस के दाखिले में कोई अड़चन आ रही है, किसी बड़ी सिफारिश से ही यह काम हो सकता है, मोहिनी भी बहुत टैंशन में थी. अब उसे एक ही रास्ता सम झ में आ रहा था नेताजी.

बात कर के नेताजी से मिलने का समय तय किया. मोहिनी को पूरा यकीन था कि उस का काम हो जाएगा. पावर और पैसा तो मोहिनी की कमजोरी थी. अपनी खूबसूरती को भुनाना भी उसे अच्छे से आता था. रात 8 बजे नेताजी ने मोहिनी को अपने फार्महाउस में मिलने के लिए बुला लिया.

बिना किसी भूमिका के नेताजी ने कहा, ‘‘मोहिनीजी, आप बहुत खूबसूरत हैं. आप का चांद सा चेहरा, आप की कातिलाना मुस्कराहट… उफ क्या कहना. मैं तो पहली ही मुलाकात में आप का कायल हो गया था. कहिए क्या खिदमत कर सकता हूं मैं आप की?’’ नेता के मुंह से तारीफ और आंखों से वासना टपक रही थी. भंवरे की तरह वह हर फूल का रस चखने वालों में से था.

‘‘क्या आप भी…’’ कहते हुए मोहिनी ने भी एक मौन निमंत्रण दे डाला, ‘‘आप के नाम और साख की तो मैं कायल हूं सर…’’

‘‘और हम आप की खूबसूरती के दीवाने हैं.’’

‘‘दरअसल, मेरे बेटे को कालेज में दाखिला नहीं मिल रहा. अगर आप चाहें तो यह काम आसानी से कर सकते हैं.’’

‘‘बस इतनी सी बात… यह तो मेरे बाए हाथ का खेल है आप बेफिक्र हो जाएं आप का काम हो जाएगा,’’ मोहिनी के बालों में उंगलियां घुमाते हुए नेताजी ने भी अपनी इच्छा जाहिर कर दी और फिर गौरव का दाखिला बिना किसी रुकावट के हो गया.

देखतेदेखते कुछ वर्ष और बीत गए. छोटे बेटे आरव को भी अब मां की हरकतें सम झ आने लगी थीं. बड़ा बेटा गौरव अब शहर के बाहर जौब करता था, इसलिए वह भी इन बातों से अनजान तो नहीं था पर दूर था. लोगों की दबी जबान में बातें छोटे को सम झ में आती थीं, पर मां को कुछ भी नहीं कह पाता बस बातबात पर मां से  झगड़ा करता. पर मोहिनी ने जानने की कभी कोशिश नहीं की कि बेटे के स्वभाव में क्यों बदलाव आ रहा है.

एक बार आकाश कुछ दिनों के लिए औफिस के काम से कोलकाता गया. 1 सप्ताह के लिए उसे वहीं रुकना था. मोहिनी की तो जैसे लौटरी लग गई. कभी राहुल के साथ तो कभी नेताजी के साथ वक्त बिताने का पूरापूरा मौका मिल गया. देर तक पार्टी में रहना, घर में आधी रात तक वापस आना, इन सब बातों का कहां अंत था, किसे पता था.

एक दिन मोहिनी ने नेता को दोपहर को घर बुला लिया. आकाश को 1 सप्ताह बाद आना था और बच्चों को भी शाम को आना था. एकदूसरे के आलिंगन में दोनों को एहसास ही नहीं हुआ कि कब शाम हो गई. मोहिनी नेताजी की बांहों में मदमस्त थी. तभी मोहिनी का बड़ा बेटा गौरव घर आ गया. मां को आपत्तिजनक स्थिति में देख कर उस के होश उड़ गए. आज तक जो कानाफूसी होती थी, यह सच होगी उस ने कभी सोचा भी न था. उस के होश फाख्ता हो गए. पापा भी यहां नहीं थे. उस का दिमाग सुन्न हो रहा था कि पापा को पता चलेगा तो क्या होगा. घर में होने वाले हंगामे की कल्पना से ही सिहर रहा था गौरव. घर पर रुक नहीं सका और अपने एक दोस्त के घर चला गया.

अगले दिन मोहिनी ने गौरव को फोन किया तो उस ने फोन नहीं उठाया. वह अभी मां से बात नहीं करना चाहता था. बाहर जाता तो उसे यों लगता की हरकोई उस की मां के बारे में फुसफुसा रहा है. दिमाग भन्ना रहा था उस का. पर वह क्या करे सम झ नहीं आ रहा था. मम्मीपापा की हर वक्त की तकरार और दोनों के बीच न टूटने वाला सन्नाटा आज सम झ पा रहा था. कल दोस्तों में, फिर रिश्तेदारों में बदनामी होगी वह कैसे सहेगा. छोटे भाई आरव ने भी कई फोन किए, लेकिन गौरव घर नहीं आना चाहता था. एक दिन आरव गौरव को खुद लेने चला गया? ‘‘भाई तुम घर क्यों नहीं आ रहे? मां बहुत परेशान हैं.’’

‘‘नहीं आरव में घर नहीं जाऊगा, मु झे पता है मां के पास कितनी फुरसत है हमारे लिए.’’

‘‘भाई आखिर बात क्या है बताओ तो…’’

आरव के बहुत कहने पर गौरव ने सबकुछ बता दिया. मां और नेता के नाजायज  रिश्ता… सुनते ही आरव एक फीकी हंसी हसते हुए बोला, ‘‘भाई तुम्हें तो अब पता चला है मु झे तो बहुत वक्त से पता है. और तो और मेरे दोस्त के पापा से भी मां का रिश्ता है. दबी जुबान में सब की बातें, लोगों की प्रश्न पूछती आंखें और पापा की बेबसी अब बरदाश्त नहीं होती गौरव भैया… मैं खुद इस माहौल में नहीं रह सकता. मैं ने तो सोच लिया है अपनी बीए कंप्लीट होते ही चला जाऊंगा. आप भी बाहर जौब कर ही रहे हो. पापा को भी कोई इतराज नहीं है हमें बाहर भेजने में. वे भी यही चाहते हैं कि हम इस माहौल से दूर हो जाएं.’’

दोनों बच्चे शहर से बाहर रहने लगे और आकाश भी ज्यादा वक्त अपने बेटों के पास बिताने लगे. आकाश और मोहिनी एक छत के नीचे तो रहते थे, लेकिन नदी के 2 किनारों की तरह जो साथसाथ तो चले पर एक नहीं हो सके. इसलिए दोनों को कोई दुख नहीं था एकदूसरे से दूर होने का.’’

राहुल ने तो नाता तोड़ ही लिया था मोहिनी से. बच्चे और पति भी दूर हो गए. सिवा पछतावे के उस को कुछ न मिला. आकाश, गौरव और आरव को फोन करती, उन से क्षमा याचना करती पर उन को कोई लगाव नहीं था मोहिनी से. एक दिन मोहिनी ने फिर हिम्मत कर के आकाश को फोन किया, ‘‘आकाश, मु झे माफ कर दो… तुम और बच्चे लौट आओ मेरी जिंदगी में.’’

‘‘नहीं, मोहिनी अब यह नहीं हो सकता. मैं ने और मेरे बच्चों ने बहुत सहा है तुम्हारे कारण, बस अब और नहीं तुम को तुम्हें जिंदगी मुबारक. हमारी जिंदगी से तुम दूर ही रहो तो बेहतर होगा.’’

मोहिनी को अब एहसास हो रहा था कि जिन बातों में वह सुख ढूंढ़ती रही वह मृगतृष्णा और छलावे से ज्यादा कुछ न था.

मगर यह रास्ता उस ने खुद चुना था जहां से लौट कर जाना नामुमकिन था. पीछे मुड़ना तो उस ने सीखा ही नहीं था. कुछ वक्त के ठहराव के बाद वह फिर चल पड़ी अपनी ही चुनी राह पर… अपनी निडर, बिंदास और बेबाक जिंदगी जीने.

झुमकी: किसने की राधा और सुरेंद्र की मदद

‘‘बाजार से खाने के लिए कुछ ले आती हूं,’’  झुमकी पलंग पर लेटे बिछुआ को देख कर बोली और बाहर निकल गई.  बटुए से पैसे निकाल कर गिनते हुए  झुमकी के चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंची हुई थीं. उत्तर प्रदेश के कमालपुर गांव से वह अपने बीमार पति बिछुआ का इलाज कराने दिल्ली आई थी. उसे यहां आए हुए 2 हफ्ते हो चुके थे. कोई जानपहचान वाला तो था नहीं, सो अस्पताल के पास ही एक कमरा किराए पर ले कर रह रही थी.

कई दिनों से चल रही जांच के बाद ही पता लग पाया कि बिछुआ के पेट की छोटी आंत में एक गांठ थी. आपरेशन जल्द कराने को कह रहे थे अस्पताल वाले, लेकिन  झुमकी यह सोच कर परेशान थी कि पैसों का जुगाड़ कैसे होगा? सरकारी अस्पताल है तो क्या हुआ… कुछ खर्चा तो होगा ही आपरेशन का. फिर इस कमरे का किराया, खानापीना और बिछुआ की दवाएं… पैसे के बिना तो कुछ मुमकिन था ही नहीं. क्या बिछुआ का इलाज कराए बिना ही वापस लौट जाना पड़ेगा?

सड़क पर चलते हुए अचानक ही  झुमकी को किसी के कराहने की आवाज सुनाई दी. पास जा कर देखा तो एक 35-40 साल की औरत जमीन पर गिरी हुई थी. उठने की भरपूर कोशिश करने के बावजूद वह उठ नहीं पा रही थी.  झुमकी ने सहारा दे कर उसे उठाया और पास ही पड़े एक बड़े से पत्थर पर बैठा दिया.

झुमकी को उस औरत ने बताया कि वह आराम से चलती हुई जा रही थी कि अचानक एक लड़का तेजी से साइकिल चलाता हुआ पीछे से आया और धक्का मार दिया. उस के धक्के से वह इतनी जोर से गिरी कि एक पैर बुरी तरह मुड़ गया और कुहनियां भी छिल गईं.

कुछ देर वहीं बैठने के बाद उस औरत ने  झुमकी से एक रिकशा रोक लेने को कहा. रिकशा रुकते ही वह औरत  झुमकी की मदद  से चढ़ तो गई, लेकिन  हाथों में दर्द के चलते रिकशे को पकड़ नहीं पा रही थी.

झुमकी भी तब रिकशे में बैठ गई और अपने हाथ का घेरा उस घायल औरत की कमर पर बना कर सहारा दे दिया. रिकशा उस औरत के घर की ओर रवाना हो गया.

रास्ते में उन दोनों की बातचीत हुई. उस औरत ने  झुमकी को बताया कि  उस का नाम राधा है. नजदीक के ही  एक महल्ले में वह अपने पति सुरेंद्र  के साथ रहती है. सुरेंद्र की पास के बाजार में किराने की दुकान है.

शादी को 10 साल बीत चुके थे, लेकिन राधा के कोई बच्चा नहीं था, इसलिए घर पर अकेली ऊब जाती थी. अपना समय बिताने और पति की मदद करने के मकसद से वह कुछ देर के लिए दुकान पर चली जाती है. आज भी वह दुकान से वापस लौट रही थी, तब यह घटना घटी.

अपने बारे में बता कर राधा ने  झुमकी से उस का परिचय पूछा, तो  झुमकी ने अपने बारे में सब बता दिया.

झुमकी की बात पूरी होतेहोते ही राधा का घर आ गया.  झुमकी ने चाबी राधा के हाथ से ले कर ताला खोल दिया और उसे सहारा देते हुए कमरे के भीतर ले

आई. जब तक राधा ने सुरेंद्र को फोन किया, तब तक  झुमकी वहां खड़ी रही.

राधा की सुरेंद्र से बात पूरी होते ही  झुमकी  बोली, ‘‘मैडमजी, मैं अब चलती हूं. बिछुआ मेरी बाट देखते होंगे.’’

राधा ने उसे रुकने को कहा. धीरेधीरे चलते हुए उस ने रसोई से ला कर कुछ नमकीन के पैकेट  झुमकी को थमा दिए.

रात को  झुमकी और बिछुआ राधा की दी हुई नमकीन खा कर सो गए. अगले दिन सुबहसुबह  झुमकी के कमरे का दरवाजा खड़का तो दरवाजा खोलने पर वह सामने सुरेंद्र को देख चौंक उठी.

सुरेंद्र ने उसे बताया कि राधा के पैर में पलस्तर चढ़ गया है. वह एक जरूरी बात करने के लिए  झुमकी को घर बुला रही है.

झुमकी बिछुआ को बता कर सुरेंद्र के साथ राधा से मिलने आ गई.

राधा  झुमकी को देख कर बहुत खुश हुई और तुरंत अपनी बात सामने रखते हुए बोली, ‘‘ झुमकी, मैं कल से तुम्हारे बारे में ही सोच रही थी. तुम्हारी परेशानी को ले कर मैं ने सुरेंद्र से भी बात की  है. मेरा एक सु झाव है, तुम्हें जंचे तो ही हां करना.’’

‘‘जी, कहिए…’’  झुमकी बोली.

‘‘मैं ने अपने घर का कुछ हिस्सा पिछले महीने ही बनवाया है. पहले आगे वाले 2 कमरे ही थे. कई दिनों बाद रंगरोगन हुआ तो पीछे की ओर एक कमरा भी बनवा लिया. उसे हम दुकान के गोदाम के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं.

‘‘अभी वह कमरा खाली है. बस, मकान बनवाने के बाद का कुछ बचाखुचा सामान जैसे रंगरोगन के खाली डब्बे रखे हैं. तुम चाहो तो बिछुआ के इलाज तक उस कमरे में रह सकती हो.

‘‘तुम मेरे घर का काम कर दिया करना, क्योंकि चोट की वजह से मु झ से काम हो नहीं पाएगा. तुम हम दोनों का खाना बनाओगी तो साथसाथ अपना खाना भी बना लिया करना. काम के बदले पैसे तो दूंगी ही मैं तुम्हें.’’

झुमकी को मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई हो. खुशीखुशी यह प्रस्ताव स्वीकार कर उसी दिन बिछुआ को ले कर वह राधा के घर चली आई.

राधा ने अपने घर पर रखे सामान में से बिस्तर और कुछ पुराने कपड़े  झुमकी के कमरे में रखवा दिए. अस्पताल के खर्च के लिए उस को कुछ रुपए भी दे दिए.

बिछुआ के पेट में खून रिसने के चलते जल्द ही आपरेशन कर दिया गया. आपरेशन कामयाब रहा और 4 दिन बाद उसे अस्पताल से छुट्टी भी मिल गई. तकरीबन एक महीने के लिए उसे आराम करने की सलाह दी गई. साथ ही, यह भी कहा कि दर्द ज्यादा हो तो तुरंत अस्पताल आना है, वरना एक महीने बाद जांच कराने ही आना होगा.

झुमकी ने पहले दिन से ही खाना बनाने के साथसाथ घर के बाकी काम पूरी जिम्मेदारी से करने शुरू कर दिए. वह सोच रही थी कि राधा के घर पर अगर आसरा न मिला होता तो जाने क्या होता? इधर राधा को भी  झुमकी के रूप में बड़ा सहारा मिल गया था.

एक दिन सफाई करते समय कमरे  में मकान बनने के बाद का बचा हुआ सामान और एक अलमारी में रखे रद्दी अखबार देख  झुमकी कुछ सोच कर मुसकरा उठी. शादी से पहले अपने  पिता से उस ने कुट्टी नाम की कला सीखी थी.

कुट्टी का मतलब होता है कागज को कूट कर उस से सुंदरसुंदर चीजें बनाना. पहले बेकार पड़े कागजों को कुछ दिन पानी में भिगो कर कूटा जाता है. इस लुगदी में मुलतानी मिट्टी और गोंद डाल कर गूंद लिया जाता है और किसी भी आकृति में ढाल कर सुखा लिया जाता है. बाद में उस आकृति पर रंग कर देते हैं.

‘इस काम के लिए मु झे जो भी सामान चाहिए, उस में से मुलतानी मिट्टी को छोड़ कर यहां सबकुछ  है, लेकिन उस की जगह एक थैली में  जो सफेद सीमेंट रखा है, उस से काम चल जाएगा.

‘मैडमजी तो यह सारा सामान फेंकने को कह रही थीं. इस का मतलब उन  को इस में से कुछ चाहिए भी नहीं, तो  मैं ही इस्तेमाल कर लेती हूं इसे,’  झुमकी ने सोचा.

डिस्टैंपर के खाली डब्बे में पानी भर कर  झुमकी ने वहां रखे रद्दी अखबार उस में भिगो दिए. 2-3 दिन बीतने पर भीगे कागजों को कूट कर लुगदी बना ली और बाकी सामान मिला कर एक सुंदर बड़ा सा फूलदान बना दिया. सूखने पर वहां रखे पेंट और ब्रश ले कर उसे सुंदर रंगों से रंग दिया.

जब  झुमकी फूलदान ले कर राधा के पास पहुंची, तो पीले, संतरी और सुनहरी रंगों से चमकते फूलदान को देख कर राधा हैरान रह गई. जब उसे पता लगा कि वह  झुमकी ने बचे सामान से बनाया है, तो हैरानी के साथसाथ उस की खुशी का ठिकाना न रहा.

‘‘ झुमकी तुम मु झे सिखाओगी यह कला?’’ राधा ने चहकते हुए पूछा.

‘‘क्यों नहीं मैडमजी, मु झे तो बहुत अच्छा लगेगा,’’  झुमकी को बहुत दिनों बाद एक अजीब सी खुशी महसूस हो रही थी.

अगले दिन से ही  झुमकी ने राधा को कुट्टी कला की बारीकियां बतानी शुरू कर दीं.  झुमकी ने बताया कि उस के पिता ज्यादा सामान बनाते थे, तो तकरीबन 15 दिन भिगोते थे कागजों को. ऐसे में 2-3 दिनों के बाद पानी बदल लेते थे. पुराना पानी वे पेड़पौधों में दे  देते थे.

पानी में कागजों को कुछ दिन भिगो कर जब कलाकृतियां बनाने का समय आया, तो  झुमकी राधा को सहारा देते हुए आंगन में ले आई और एक कुरसी पर बिठा दिया.

झुमकी को छोटेछोटे खिलौने बनाते देख राधा का मन भी खिलौने बनाने को करने लगा.  झुमकी एक टीचर की तरह राधा को सब सिखा रही थी और कुरसी पर बैठेबैठे ही राधा भी  झुमकी को देख कर खिलौने बना रही थी.

झुमकी ने उसे मूर्तियां, कटोरे और प्लेट जैसी और चीजें बनानी भी सिखाईं. सूखने पर रंग करने का आसान तरीका भी  झुमकी ने राधा को सिखा दिया. कुछ रंगों को मिला कर नए सुंदर रंग बनाना और उन का सही ढंग से इस्तेमाल करना भी राधा ने  झुमकी से सीख लिया.

इधर बिछुआ ठीक हुआ, उधर राधा के पैर का पलस्तर भी कट गया.  झुमकी और बिछुआ के गांव वापस जाने का समय आ गया था. जाने से पहले एक बार अस्पताल में जांच कराने के बाद  झुमकी और बिछुआ राधा और सुरेंद्र का अहसान मानते हुए भरे मन से विदा ले कर गांव चले गए.

कुछ दिनों तक राधा को घर सूनासूना लगता रहा, फिर धीरेधीरे सब सामान्य हो गया. वह पहले की तरह ही घर संभालने लगी और सुरेंद्र की मदद को दुकान भी पर जाने लगी थी.

अचानक उन की जिंदगी में एक मुसीबत आ गई. सुरेंद्र को दुकान के मालिक ने एक दिन आ कर बताया कि उस की और आसपास की कई दुकानों को गैरकानूनी होने के चलते जल्दी ही गिरा दिया जाएगा.

सभी दुकानदार आपस में सलाह कर इस नोटिस के खिलाफ कोई कदम उठाते, इस से पहले ही अचानक दुकानों को तोड़ने का काम शुरू हो गया.

सुरेंद्र ने बाकी सब की तरह ही अफरातफरी के बीच जल्दीजल्दी अपना सामान बाहर निकाला. उस का काफी सामान इधरउधर बिखर कर खराब हो गया. बाकी बचे सामान को किसी तरह वह घर ले कर आया.

अड़ोसपड़ोस में जा कर उन दोनों ने गुजारिश की कि पड़ोसी रोजमर्रा का कुछ सामान उन से खरीद लें, लेकिन बहुत कम लोगों ने ही सामान खरीदने के लिए उन के घर तक आने की जहमत उठाई. बचे सामान में से कुछ खराब हो गया और बाकी राधा ने घर पर इस्तेमाल कर लिया.

उन की असली चिंता तो अभी भी सामने थी, रोजीरोटी की. वे जान गए थे कि घर पर दुकान खोलने की बात सोचना बेकार है, क्योंकि ग्राहक तो आएंगे नहीं वहां चल कर. कुछ सालों से बचत कर के जो पैसे जोड़े थे, वे अब खत्म होने को आए थे.

एक दिन सुरेंद्र का दोस्त अनवर उस से मिलने घर आया हुआ था. चाय पीते हुए उस का ध्यान  झुमकी के बनाए फूलदान पर चला गया. उस ने बताया कि उस के दफ्तर के पास इस तरह का सामान बेचने वाला बैठता है, जिस की खूब बिक्री होती है. वहां विदेश से घूमने आए सैलानी भी आते हैं. वे लोग इसे ‘पेपर मैशे’ से बना सामान कहते हैं.

अनवर की बात सुन कर राधा की आंखें चमक उठीं. वह सुरेंद्र से बोली, ‘‘क्यों न हम सजावट का सामान बना कर उसे ही बेचने की कोशिश करें?  झुमकी ने कितने आसान तरीके से इतनी सुंदर चीजें बनानी सिखाई थीं हमें. शायद यही हो हमारी समस्या का हल.’’

सुरेंद्र की परेशानी अनवर सम झता था, लेकिन दूर करने का उपाय नहीं मिल पा रहा था. उसे भी यह बात जंच गई. वह बोला, ‘‘आप लोग ऐसा कर सकते हैं, तो मैं आप की बात दफ्तर के पास दुकान लगाने वाले से करवा दूंगा. महेश नाम है उस का.’’

सुरेंद्र ने तुरंत हामी भर दी.

अनवर ने जल्दी ही महेश से सुरेंद्र को मिलवा दिया. महेश  झुमकी के हाथों से बना फूलदान देख कर बहुत प्रभावित हुआ. उस ने कहा कि अगर सुरेंद्र ऐसा ही सामान बना लेगा, तो वह सारा सामान उस से खरीद लेगा. वैसे भी उसे खरीदारी के लिए बहुत दूर जाना पड़ता है. इस से किराए पर बहुत खर्च होता है और सामान टूटने पर नुकसान भी हो जाता है.

महेश की शर्त यही थी कि नया बनने वाला सामान भी फूलदान की टक्कर का हो. बेचने की जिम्मेदारी उस पर होगी. इस में दोनों का फायदा ही होगा.

अगले दिन से ही राधा ने  झुमकी द्वारा सिखाई गई एकएक बात को याद करते हुए काम करना शुरू कर दिया. सुरेंद्र भी उस की मदद कर रहा था. उन्होंने कागज भिगो कर रख दिए. राधा को याद आया कि  झुमकी ने उसे कुट्टी कला के एक और रूप के बारे में भी बताया था, जिस में गुब्बारा फुला कर उस पर कागज की कतरनें गोंद से चिपकाते हुए तकरीबन 7 परतें बना दी जाती हैं. सूखने पर गुब्बारे को फोड़ कर उस ढांचे को बराबर 2 भागों में काट कर दीवार पर सजाने वाले मुखौटे बनाए जाते हैं.

राधा ने सुरेंद्र से कई बड़ेबड़े गुब्बारे बाजार से मंगवा लिए और उन को फुला कर एकएक कर कागज की परतें  चिपका दीं.

कागज की मोटी परतें सूख गईं, तो मुलतानी मिट्टी गूंद कर ढांचे पर आंख, नाक व होंठ बना दिए और उन्हें फिर सुखाने के लिए रख दिया. सूखने पर  पेंट के डब्बों से रंग ले कर उन को रंग दिया गया.

सुरेंद्र ने अपना दिमाग लगाते हुए बोरी के रेशों से मुखौटों की भौंहें व बाल बनाए और बेकार पड़े बिजली के तारों से कानों में कुंडल पहना दिए. अपने बनाए मुखौटे देख कर उन की खुशी का ठिकाना न रहा.

कुछ दिनों बाद पानी में भीगे कागज जब गल गए तो  झुमकी के बताए तरीके से उन दोनों ने मिल कर छोटेछोटे पक्षी, जानवर, फोटो फ्रेम, फूलदान, गिफ्ट बौक्स और सजावट की अनेक चीजें बना कर तैयार कर लीं.

उन चीजों के सूख जाने पर राधा ने पुराना और बेकार सामान जैसे आईना, चूडि़यां, बिंदी व बटन वगैरह ले कर उन को सजा दिया

महेश ने जब उन सब चीजों को देखा, तो बहुत खुश हुआ. उस ने सामान ले जा कर जब अपनी दुकान में रखा तो पाया कि बाकी सामान के मुकाबले सुरेंद्र से खरीदे गए सामान की ओर लोग ज्यादा खिंच रहे हैं. जल्द ही उस ने यह बात सुरेंद्र को बता कर और चीजें बनाने का और्डर दे दिया.

राधा और सुरेंद्र मन ही मन  झुमकी का धन्यवाद करना नहीं भूले. राधा जानती थी कि  झुमकी के पिता कुट्टी कला में माहिर थे. उन के साथ बचपन से काम करती आ रही  झुमकी का हाथ इतना सधा हुआ था कि उस से सीखने के बाद ही आज राधा बेजोड़ सामान तैयार कर पाई है.

इस बार राधा ने मूर्तियां, खिलौने, कटोरे, प्लेट और सजावट की अनेक चीजें बनाईं. इस बार रंगने का काम सुरेंद्र ने किया. उस ने पेंट करने के लिए ब्रश के अलावा पेड़ के पत्तों, भिंडी के कटे भाग व फूलों की पंखुडि़यों का इस्तेमाल भी किया.

महेश के सामान को देख कर दूसरे कारोबारियों ने भी सुरेंद्र से सामान खरीदना शुरू कर दिया. धीरेधीरे धंधा खूब चमकने लगा. घर का नया कमरा, जो उन्होंने दुकान का सामान रखने के लिए बनाया था, उस में अब कुट्टी कला की मदद से सामान बनने लगा था.

झुमकी का अहसान वे न तो भूले थे और न ही भूलना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अपने इस नए कारोबार को ‘ झुमकी कला निकेतन’ नाम दिया.

Sunscreen In Winter : सर्दियों में क्यों जरूरी है सनस्क्रीन का इस्तेमाल, ऐक्सपर्ट से जानें इसका जवाब

Sunscreen In Winter : सर्दियों में सनस्क्रीन का इस्तेमाल अकसर लोग नजरअंदाज कर देते हैं. ठंडी हवाओं की वजह से हमें धूप कम महसूस होती है और लोग सोचते हैं कि सर्दियों में सनस्क्रीन की जरूरत नहीं होती, लेकिन असल में ऐसा नहीं है.

सर्दियों में भी सूरज की यूवी किरणें आप की त्वचा पर असर डाल सकती हैं और आप को स्किन संबंधी कई समस्याएं हो सकती हैं. सचाई तो यह है कि सर्दियों में भी सनस्क्रीन का इस्तेमाल उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना गर्मियों में होता है.

सर्दियों में सूरज की रोशनी कम जरूर होती है, लेकिन यूवीए और यूवीबी किरणें लगातार हमारे संपर्क में रहती हैं. यूवीए किरणें त्वचा में गहराई तक जा कर त्वचा को नुकसान पहुंचा सकती हैं और त्वचा को झुर्रियों, झाइयों और एजिंग का कारण बना सकती हैं.

यूवीबी किरणें मुख्यत: गर्मियों में अधिक होती हैं, लेकिन सर्दियों में भी इन से पूरी तरह से बचाव नहीं होता.

कब करें सनस्क्रीन का प्रयोग

इस के साथसाथ सर्दियों में त्वचा की नमी कम हो जाती है और रूखापन बढ़ता है, जिस से त्वचा अधिक सेंसिटिव हो जाती है. ऐसे में यूवी किरणों के प्रभाव से त्वचा की नमी और भी कम हो सकती है, जिस से त्वचा में खुजली, जलन और सूजन जैसी समस्याएं हो सकती हैं. सनस्क्रीन त्वचा को प्रोटेक्टिव लेयर प्रदान करता है, जो त्वचा की नमी बनाए रखने में मदद करता है.

कुछ शोधों के अनुसार यूवी किरणों के अधिक संपर्क में आने से स्किन कैंसर का खतरा बढ़ सकता है. भले ही सर्दियों में सूर्य की रोशनी कम दिखती हो, परंतु यूवी किरणें अब भी आप की त्वचा पर असर डाल सकती हैं. नियमित सनस्क्रीन का उपयोग स्किन कैंसर जैसी गंभीर समस्याओं से बचाव में सहायक हो सकता है.

अगर आप सर्दियों में बर्फीले क्षेत्रों में यात्रा कर रहे हैं या ऐसे स्थान पर रहते हैं जहां बर्फबारी होती है, तो यह ध्यान रखें कि बर्फ यूवी किरणों को रिफ्लेक्ट करती है और उन का असर दोगुना हो जाता है. यह आप की त्वचा पर दोहरी मार कर सकती हैं, जिस से सनबर्न या अन्य त्वचा संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए बर्फीले स्थानों पर सनस्क्रीन लगाना अनिवार्य है.

सर्दियों में लोग अकसर सोचते हैं कि अगर वे घर में ही रह रहे हैं या अधिकतर समय औनलाइन काम कर रहे हैं तो उन्हें सनस्क्रीन की आवश्यकता नहीं है. लेकिन सचाई यह है कि खिड़कियों से आने वाली रोशनी और इलैक्ट्रौनिक उपकरणों की स्क्रीन से भी यूवी किरणें त्वचा पर असर डालती हैं. इसलिए घर में रहते हुए भी सनस्क्रीन लगाना आवश्यक है.

सनस्क्रीन का चुनाव

सर्दियों में सनस्क्रीन का चुनाव करते समय ध्यान रखें कि वह मॉइस्चराइजिंग बेस का हो. सर्दियों में त्वचा पहले से ही रूखी होती है. इसलिए एक ऐसा सनस्क्रीन चुनें जो आप की त्वचा को सुरक्षा के साथ नमी भी प्रदान करे. इस के अलावा एसपीएफ 30 या उस से अधिक का सनस्क्रीन प्रभावी साबित होता है. सनस्क्रीन को बाहर जाने से 15-20 मिनट पहले लगाएं और हर 2-3 घंटे में इसे फिर से लगाना भी न भूलें.

अगर आप मेकअप करती हैं, तो भी सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना आवश्यक है. आजकल ऐसे मेकअप प्रॉडक्ट्स अवेलेबल हैं

जिन में एसपीएफ होता है, लेकिन फिर भी फाउंडेशन के नीचे एक अच्छे सनस्क्रीन का उपयोग करना अच्छा रहता है. इस से आप की त्वचा को यूवी किरणों से सुरक्षा मिलेगी और मेकअप भी अच्छे से टिकेगा.

इस के इलावा सनस्क्रीन के नियमित इस्तेमाल से आप की त्वचा स्वस्थ, खूबसूरत और जवान बनी रहती है. अगर आप चाहते हैं कि आप की त्वचा सर्दियों में भी सुरक्षित और खूबसूरत बनी रहे तो रूटीन में सनस्क्रीन का नियमित इस्तेमाल करना न भूलें.

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