Hindi Crime Story बाबा का सच : अंधविश्वास की एक सच्ची कहानी

Hindi Crime Story: मेरा तबादला उज्जैन से इंदौर के एक थाने में हो गया था. मैं ने बोरियाबिस्तर बांधा और रेलवे स्टेशन आया. रेल चलने के साथ ही उज्जैन के थाने में रहते हुए वहां गुजारे दिनों की यादें ताजा होने लगीं. हुआ यह था कि एक दिन एक मुखबिर थाने में आ कर बोला, ‘‘सर, एक बाबा पास के ही एक गांव खाचरोंद में एक विधवा के घर ठहरा हुआ है. मुझे उस का बरताव कुछ गलत लग रहा है.’’

उस की बात सुन कर मैं सोच में पड़ गया. फिर मेरे पास उस बाबा के खिलाफ कोई ठोस सुबूत भी नहीं था. लेकिन मुखबिर से मिली सूचना को हलके में लेना भी गलत था, सो उसी रात  मैं सादा कपड़ों में उस विधवा के घर जा पहुंचा. उस औरत ने पूछा, ‘‘आप किस से मिलना चाहते हैं?’’

मैं ने कहा, ‘‘दीदी, मैं ने सुना है कि आप के यहां कोई चमत्कारी बाबा ठहरे हैं, इसीलिए मैं उन से मिलने आया हूं.’’

वह औरत बोली, ‘‘भैया, अभी तो बाबा अपने किसी भक्त के घर गए हैं.’’

‘‘अगर आप को कोई एतराज न हो, तो क्या मैं आप से उन बाबा के बारे में कुछ बातें जान सकता हूं? दरअसल, मेरी एक बेटी है, जो बचपन से ही बीमार रहती है. मैं उस का इलाज इन बाबा से कराना चाहता हूं.’’

वह औरत बोली, ‘‘भैया, जितनी जानकारी मेरे पास है, वह मैं आप को बता सकती हूं.

‘‘एक दिन ये बाबा अपने 2 शिष्यों के साथ रात 8 बजे मेरे घर आए थे.

‘‘बाबा बोले थे, ‘तुम्हारे पति के गुजरने के बाद से तुम तंगहाल जिंदगी जी रही हो, जबकि उस के दादाजी परिवार के लिए लाखों रुपयों का सोना इस घर में दबा कर गए हैं.

‘‘‘ऐसा कर कि तेरे बीच वाले कमरे की पूर्व दिशा वाला कोना थोड़ा खोद और फिर देख चमत्कार.’

‘‘मैं अपने बीच वाले कमरे में गई, तभी उन के दोनों शिष्य भी मेरे पीछेपीछे आ गए और बोले, ‘बहन, यह है तुम्हारे कमरे की पूर्व दिशा का कोना.’

‘‘मैं ने कोने को थोड़ा उकेरा, करीब 7-8 इंच कुरेदने के बाद मेरे हाथ में एक सिक्का लगा, जो एकदम पीला था.

‘‘उस सिक्के को अपनी हथेली पर रख कर बाबा बोले, ‘ऐसे हजारों सिक्के इस कमरे में दबे हैं. अगर तू चाहे, तो हम उन्हें निकाल कर तुझे दे सकते हैं.’

‘‘मैं ने बाबा से पूछा, ‘बाबा, ये दबे हुए सिक्के बाहर निकालने के लिए क्या करना होगा?’

‘‘वे बोले, ‘तुझे कुछ नहीं करना है. जो कुछ करेंगे, हम ही करेंगे, लेकिन तुम्हारे मकान के बीच के कमरे की खुदाई करनी होगी, वह भी रात में… चुपचाप… धीरेधीरे, क्योंकि अगर सरकार को यह मालूम पड़ गया कि तुम्हारे मकान में सोने के सिक्के गड़े हुए हैं, तो वह उस पर अपना हक जमा लेगी और तुम्हें उस में से कुछ नहीं मिलेगा.’

‘‘आगे वे बोले, ‘देखो, रात में चुपचाप खुदाई के लिए मजदूर लाने होंगे, वह भी किसी दूसरे गांव से, ताकि गांव वालों को कुछ पता न चल सके. इस खुदाई के काम में पैसा तो खर्च होगा ही. तुम्हारे पति ने तुम्हारे नाम पर डाकखाने में जो रुपया जमा कर रखा है, तुम उसे निकाल लो.’

‘‘इस के बाद बाबा ने कहा, ‘हम महीने भर बाद फिर से इस गांव में आएंगे, तब तक तुम पैसों का इंतजाम कर के रखना.’

‘‘डाकखाने में रखे 4 लाख रुपयों में से अब तक मैं बाबा को 2 लाख रुपए दे चुकी हूं.’’

‘‘दीदी, क्या मैं आप के बीच वाले कमरे को देख सकता हूं?’’

वह औरत बोली, ‘‘भैया, वैसे तो बाबा ने मना किया है, लेकिन इस समय वे यहां नहीं हैं, इसलिए आप देख लीजिए.’’

मैं फौरन उठा और बीच के कमरे में जा पहुंचा. मैं ने देखा कि सारा कमरा 2-2 फुट खुदा हुआ था और उस की मिट्टी एक कोने में पड़ी हुई थी. मुझे लगा कि अगर अब कानूनी कार्यवाही करने में देर हुई, तो इस औरत के पास बचे 2 लाख रुपए भी वह बाबा ले जाएगा.

मैं ने उस औरत से कहा, ‘‘दीदी, मैं इस इलाके का थानेदार हूं और मुझे उस पाखंडी बाबा के बारे में जानकारी मिली थी, इसलिए मैं यहां आया हूं.

‘‘आप मेरे साथ थाने चलिए और उस बाबा के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाइए, ताकि मैं उसे गिरफ्तार कर सकूं.’’

उस औरत को भी अपने ठगे जाने का एहसास हो गया था, इसलिए वह मेरे साथ थाने आई और उस के खिलाफ रिपोर्ट लिखा दी. चूंकि बाबा घाघ था, इसलिए उस ने उस औरत के घर के नुक्कड़ पर ही अपने एक शिष्य को नजर रखने के लिए  बैठा दिया था. इसलिए उसे यह पता चलते ही कि मैं उस औरत को ले कर उस के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने थाने ले गया हूं. वह बाबा उस गांव को छोड़ कर भाग गया. इस के बाद मैं ने आसपास के गांवों में मुखबिरों से जानकारी भी निकलवाई, लेकिन उस का पता नहीं चल सका.

मैं यादों की बहती नदी से बाहर आया, तब तक गाड़ी इंदौर रेलवे स्टेशन पर आ कर ठहर गई थी. जब मैं ने इंदौर का थाना जौइन किया, तब एक दिन एक फाइल पर मेरी नजर रुक गई. उसे पढ़ कर मेरे रोंगटे खड़े हो गए. रिपोर्ट में लिखा था, ‘गडे़ धन के लालच में एक मां ने अपने 7 साला बेटे का खून इंजैक्शन से निकाला.’ उस मां के खिलाफ लड़के के दादाजी और महल्ले वालों ने यह रिपोर्ट लिखाई थी. यह पढ़ कर मैं सोच में पड़ गया कि कहीं यह वही खाचरोंद गांव वाला बाबा ही तो नहीं है.

मैं ने सबइंस्पैक्टर मोहन से कहा, ‘‘मैं इस मामले में उस लड़के के दादाजी से बात करना चाहता हूं. उन्हें थाने आने के लिए कहिए.’’

रात के तकरीबन 10 बजे एक बुजुर्ग  मेरे क्वार्टर पर आए. मैं ने उन से उन का परिचय पूछा. तब वे बोले, ‘‘मैं ही उस लड़के का दादाजी हूं.’’

‘‘दादाजी, मैं इस केस को जानना चाहता हूं,’’ मैं ने पूछा.

वे बताने लगे, ‘‘सर, घर में गड़े धन के लालच में बहू ने अपने 7 साल के बेटे की जान की परवाह किए बगैर इंजैक्शन से उस का खून निकाला और तांत्रिक बाबा को पूजा के लिए सौंप दिया.’’

‘‘दादाजी, आप मुझे उस बाबा के बारे में कुछ बताइए?’’ मैं ने पूछा.

‘‘सर, यह बात तब शुरू हुई, जब कुछ दिनों के लिए मैं अपने गांव गया था. फसल कटने वाली थी, इसलिए मेरा गांव जाना जरूरी था. उन्हीं दिनों यह तांत्रिक बाबा हमारे घर आया और बहू से बोला कि तुम्हारे घर में गड़ा हुआ धन है. इसे निकालने से पहले थोड़ी पूजापाठ करानी पड़ेगी.’’

‘‘मेरी बहू उस के कहने में आ गई. फिर उस तांत्रिक बाबा ने रात को अपना काम करना शुरू किया. पहले दिन उस ने नीबू, अंडा, कलेजी और सिंदूर का धुआं कर उसे पूरे घर में घुमाया, फिर उस ने बीच के कमरे में अपना त्रिशूल एक जगह जमीन पर गाड़ा और कहा कि यहां खोदने पर गड़ा धन मिलेगा.

‘‘उस के शिष्यों ने एक जगह 2 फुट का गड्ढा खोदा. चूंकि रात के 12 बज चुके थे, इसलिए उन्होंने यह कहते हुए काम रोक दिया कि अब खुदाई कल करेंगे.

‘‘इसी बीच मेरी 5 साल की पोती उस कमरे में आ गई. उसे देख कर तांत्रिक गुस्से में लालपीला हो गया और बोला कि आज की पूजा का तो सत्यानाश हो गया है. यह बच्ची यहां कैसे आ गई? अब इस का कोई उपचार खोजना पड़ेगा. Hindi Crime Story

‘‘अगले दिन रात के 12 बजे वह तांत्रिक अकेला ही घर आया और बहू से बोला, ‘तू गड़ा हुआ धन पाना चाहती है या नहीं?’

‘‘बहू लालची थी, इसलिए बोली, ‘हां बाबा.’

‘‘फिर बाबा तैश में आ कर बोला, ‘कल रात उस बच्ची को कमरे में नहीं आने देना चाहिए था. अब उस बच्ची को भी ‘पूजा’ में बैठा कर अकेले में तांत्रिक क्रिया करनी पड़ेगी. जाओ और उस बच्ची को ले आओ.

‘‘इस पर मेरी बहू ने कहा, ‘लेकिन बाबा, वह तो सो रही है.’

‘‘बाबा बोला, ‘ठीक है, मैं ही उसे अपनी विधि से यहां ले कर आता हूं.

‘‘अगले दिन सुबह उस बच्ची ने अपनी दादी को बताया, ‘रात को वह तांत्रिक बाबा मुझे उठा कर बीच के कमरे में ले गया और मेरे सारे कपड़े उतार कर उस ने मेरे साथ गंदा काम किया.’

‘‘जब मेरी पत्नी ने बहू से पूछा, तो वह बोली, ‘बच्ची तो नादान है. कुछ भी कहती रहती है. आप ध्यान मत दो.’

‘‘अगले दिन बाबा ने बीच का कमरा खोद दिया. लेकिन कुछ नहीं निकला. फिर वह बाबा बोला, ‘बाई, लगता है कि तुम्हारे ही पुरखे तुम्हारे वंश का खून चाहते हैं, तुम्हें अपने बेटे की ‘बलि’ देनी होगी या उस का खून निकाल कर चढ़ाना होगा.’

‘‘गड़े धन के लालच में मां ने बिना कोई परवाह किए अपने बेटे का खून ‘इंजैक्शन’ से खींचा और उस का इस्तेमाल तांत्रिक क्रिया करने के लिए बाबा को दे दिया.

‘‘यह सब देख कर मेरी पत्नी से रहा नहीं गया और उस ने फोन पर ये सब बातें मुझे बताईं. मैं तभी सारे काम छोड़ कर इंदौर आया और अपने पोते और महल्ले वालों को ले कर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई.’’

‘‘दादाजी, इस समय वह तांत्रिक बाबा कहां है?’’

‘‘सर, मेरी बहू अभी भी उस के मोहपाश में बंधी है. चूंकि उसे मालूम पड़ चुका है कि मैं ने उस के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई है, इसलिए वह हमारे घर नहीं आ रहा है, लेकिन मैं उस पर नजर रखे हुए हूं.’’

सुबह एक मुखबिर आया और बोला, ‘‘सर, एक सूचना मिली है कि अपने इलाके की एक मलिन बस्ती में एक तांत्रिक आज ही आ कर ठहरा है.’’

रात के 12 बजे मैं अपने कुछ पुलिस वालों को साथ ले कर सादा कपड़ों में वहां जा पहुंचा. एक पुलिस वाले ने एक मकान से  धुआं निकलते देखा. हम ने चारों तरफ से उस मकान को घेर लिया. जब मैं ने उस मकान का दरवाजा खटखटाया, तो एक अधेड़ औरत ने दरवाजा खोला और पूछा, ‘‘क्या है? यहां पूजा हो रही है. आप जाइए.’’

इतना सुनते ही मैं ने दरवाजे को जोर से धक्का दिया और बीच के कमरे में पहुंचा. मुझे देखते ही वह तांत्रिक बाबा भागने की कोशिश करने लगा, तभी मेरे साथ आए पुलिस वालों ने उसे घेर लिया और गाड़ी में डाल कर थाने ले आए.

थाने में थर्ड डिगरी देने पर उस ने अपने सारे अपराध कबूल कर लिए, जिस में खाचरोंद गांव में की गई ठगी भी शामिल थी. मैं थाने में बैठा सोच रहा था कि अखबारों में गड़े धन निकालने के बारे में ऐसे ठग बाबाओं की खबरें अकसर छपती ही रहती हैं, फिर भी न जाने क्यों लोग ऐसे बाबाओं के बहकावे में आ कर अपनी मेहनत की कमाई को उन के हाथों सौंप कर ठगे जाते हैं?

टेढ़ीमेढ़ी डगर: सुमोना ने कैसे सिखाया पति को सबक

लेखिका- नीलम राकेश

सुमोना रोरो कर अब शांत हो चुकी थी. आज फिर विक्रांत ने उस पर हाथ उठाया था और फिर धक्का दे कर व बुरीबुरी गालियां देता हुआ घर से बाहर चला गया था. 5 वर्षीय पिंकी और 4 वर्षीय पंकज हिचकियों के साथ रोते हुए उस से चिपके हुए थे. तीनों के आंसू मिल कर एक हो रहे थे. अब यह सब आएदिन की बात हो गई थी.

सुमोना सोच रही थी कि कौन कहेगा कि वे दोनों पढ़ेलिखे संपन्न परिवारों से हैं. दोनों के ही परिवार आर्थिक और सामाजिक रूप से समाज में अच्छी हैसियत रखते थे. कहने को तो उन का प्रेम विवाह था. सजातीय होने के कारण और शायद परिजनों के खुले हुए विचारों का होने के कारण भी उन्हें विवाह में कोई अड़चन नहीं आई थी. सभी की रजामंदी से, बहुत धूमधड़ाके के साथ उन दोनों का विवाह संपन्न हुआ था. दोनों के ही मातापिता ने किसी तरह की कोई कमी नहीं छोड़ी थी. बल्कि अगर यह कहें कि कुछ जरूरत से ज्यादा ही दिखावा किया गया था तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.

शादी के थोड़े दिनों बाद ही विक्रांत का यह रूप उस के सामने आ गया था. सुमोना चौंकी जरूर थी. दोनों ने एकसाथ एमबीए किया था. सुमोना अपने बैच की टौपर थी. पूरा जोर लगाने के बाद भी विक्रांत कक्षा में दूसरे स्थान पर ही रहता था. दोनों के बीच एक स्वस्थ स्पर्धा रहती थी.

विक्रांत का दोस्त अंगद अकसर कहता था, “अच्छा है तुम दोनों एकदूसरे को डेट नहीं कर रहे हो. नहीं तो एकदूसरे का सिर ही फोड़ देते.”

पल्लवी हंसते हुए उस में जोड़ती, “और कहीं यह दोनों शादी कर लेते तो एकदूसरे का गला ही दबा देते,” सब खिलखिला कर हंस पड़ते और बात हवा में उड़ जाती.

पता नहीं साथियों के कहने का असर था या क्या, धीरेधीरे दोनों एकदूसरे के प्रति आकर्षण महसूस करने लगे और जब विक्रांत पर प्रेम का भूत चढ़ा तो वह इतना अधिक रोमांटिक हो गया कि खुद सुमोना को ही विश्वास नहीं होता कि यह वही अकड़ू, गुस्सैल विक्रांत है. सहेलियां भी सुमोना से जलने लगीं. विक्रांत हर दिन सुमोना के लिए कुछ न कुछ सरप्राइज प्लान करता और सब देखते रह जाते. विक्रांत कभी भी कुछ छिपा कर नहीं करता सबकुछ सब के सामने खुलाखुला.

दोस्त कहते, “शादी के बाद विक्रांत तो जोरू का गुलाम बन जाएगा,”
विक्रांत हंस कर जवाब देता, “हां भाई बन जाऊंगा. तुम्हारे पेट में क्यों दर्द होता है? तुम भी बन जाना पर अपनी बीवी के मेरी नहीं,” और चारों ओर जलन भरी खिलखिलाहट बिखर जाती.

सुमोना को खुद भी विक्रांत का यह रूप बहुत भाता था. वह तो खुशियों के सतरंगे आकाश में विचरण कर रही थी मगर कहां जानती थी कि कुदरत उसे अंधेरे की गहरी खाई की ओर ले जा रहा है.

पहला झटका सुमोना को शादी के बाद दूसरे महीने में ही लगा था. मात्र 15 दिनों के हनीमून ट्रिप से जब दोनों लौटे थे, 1 हफ्ता तो घर से बाहर ही नहीं निकले और विक्रांत तो जैसे चकोर की तरह उसे निहारता ही रहता था.

जौइंट फैमिली थी. घर में सासससुर के साथ जेठजेठानी भी थे पर जैसे विक्रांत को कोई फर्क ही नहीं पड़ता था. जेठानी जरूर इस बात पर ताना मारती रहती थी. वह एकांत में विक्रांत को समझाती तो वह कहता, “जो जलता है, उसे जलने दो.”

उस रात नई बहू के स्वागत में विक्रांत के चाचा ने पूरे परिवार को खाने पर बुलाया था. बहुत चाव से सजधज कर जब वह तैयार हुई और विक्रांत के सामने आई तो विक्रांत के चेहरे पर बल पड़ गया, “यह क्या पहना है तुम ने?”

“क्यों क्या हुआ? अच्छा तो है,” शीशे में खुद को निहारते हुए उस ने पूछा.

“ब्लाउज का इतना गहरा गला किस को दिखाना चाहती हो?”

आहत हुई थी सुमोना, पर खुद को संभाल कर बोली, “अच्छा तो जनाब इनसिक्योर हो रहे हैं.”

“बदल कर नीचे आओ, मैं मां के पास इंतजार कर रहा हूं,” कहता हुआ विक्रांत कमरे से बाहर चला गया.

सुमोना का उखड़ा हुआ मूड, चाचा के घर में सब के स्नेहिल व्यवहार से फिर से खिल उठा था. खाना खा कर सब बैठक में बैठे हंसीमजाक कर रहे थे. बहुत ही खुशनुमा माहौल था. सब उस के रूप और व्यवहार की तारीफ कर रहे थे. थोड़ा हंसीमजाक भी चल रहा था. किसी बात पर सब के साथसाथ वह भी खिलखिला कर हंसी तो विक्रांत तेजी से चीखा, “क्या घोड़े की तरह हिनहिना रही हो… कायदे से हंस भी नहीं सकती हो क्या?”

सब चुप हो गए और उसी असहनीय शांति के बीच वापस घर चले आए. कोई कुछ नहीं बोला. कमरे में आ कर वह बहुत रोई. विक्रांत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. वह करवट बदल कर आराम से सो गया. सुबह भी घर में इस बारे में कोई बात नहीं हुई. न ही किसी ने उस से कुछ कहा, न ही विक्रांत को कुछ समझाया. जेठानी के चेहरे पर जरूर व्यंग्य भरी मुसकान पूरे दिन तैरती रही.

कुछ ही दिनों बाद विक्रांत के किसी दोस्त की ऐनिवर्सरी की पार्टी थी. विक्रांत ने उसे शाम के लिए तैयार होने के साथसाथ यह भी हिदायत दी की देखो, यह मेरे दोस्त की पार्टी है, शराफत वाले कपड़े ही पहनना. बल्कि ऐसा करो की मुझे दिखा दो कि तुम क्या पहनने वाली हो. यह तो बस शुरुआत थी. उस के पहनने, बोलने पर टिप्पणी करना, टोकाटाकी करना, व्यंग्य करना अब अंगद के लिए आम बात हो गई थी.

उस दिन पार्टी पूरे शबाब पर थी. सब संगीत की लहरों पर थिरक रहे थे. संगीत वैसे भी सुमोना की कमजोरी थी. वह भी पूरी तरह से संगीत में डूबी हुई थिरक रही थी. अचानक अंगद चिल्लाया, “क्या नचनिया की तरह ठुमके लगाए जा रही हो? अब पिछली बातें भूल जाओ, शरीफ घर की बहू बन गई हो तो शरीफों की तरह रहना सीखो.”

इस अपमान को वह सह नहीं पाई और रोते हुए बाहर की ओर भागी. विक्रांत भी उस के पीछेपीछे आया. घर पहुंचते ही उस ने अपनी सासूमां को पूरी बात बताई पर उन की प्रतिक्रिया से वह चकित रह गईं,”देख बहू, पतिपत्नी के बीच में ऐसी छोटीमोटी बातें होती रहती हैं. इन्हें तूल नहीं देना चाहिए. जाओ जा कर आराम करो,” कहते हुए उन्होंने उस की पीठ थपथपाई और अपने कमरे में चली गईं.

रात उस ने आंखों में ही काटी. सुबह होते ही वह अपने मायके चली आई. अपने मातापिता की प्रतिक्रिया से तो वह बुरी तरह आहत ही हो गई. पिता ने ठहरे हुए शब्दों में उसे समझाया, “देखो सुमोना, हर दंपति के बीच में ऐसे मौके आते ही हैं. बात को बिगाड़ने से कोई लाभ नहीं है. पुरुष कभीकभार कुछ ऊंचानीचा बोल ही देते हैं. छोटीछोटी बातों को पकड़ कर बैठोगी तो खुद भी दुखी रहोगी और हमें भी दुखी करती रहोगी. अब बड़ी हो गई हो, अपनी जिम्मेदारियों को समझो. हमारी परवरिश पर उंगली उठाने का मौका उन लोगों को मत देना. बस, इतनी सी अपेक्षा है तुम से.“

पिता तो अपनी बात कह कर अपने कमरे में चले गए, उस ने आशा भरी नजरों से मां की ओर देखा. कुछ देर शांत रहने के बाद मां बोलीं, “तुम अगर यह सारी बातें अपना मन हलका करने के लिए हमारे साथ साझा कर रही हो, तो ठीक है. पर अगर तुम को लगता है कि हम लोग दामादजी से इस बारे में कोई बात करेंगे तो ऐसा नहीं होगा.”

“मां…”

बात बीच में काट कर मां बोलीं, “सुमी, हम ने तुम्हें बेटे की तरह पाला है. इस का यह अर्थ बिलकुल नहीं है कि तुम लड़का बन जाओ. लड़की हो, लड़की की तरह रहना सीखो. लड़कियों को थोड़ा दबना पड़ता है, सहना पड़ता है. गृहस्थी की गाड़ी तभी पटरी पर चलती है.”

“मां, मुझे इस तरह अपमानित करने का अधिकार विक्रांत को नहीं है. ”

“सुमी, तुम ने तो खुद देखा है, तुम्हारे पापा कितनी बार मुझे क्या कुछ नहीं कह देते हैं. तो क्या मैं उन की शिकायत ले कर अपने मायके जाती हूं? नहीं न?”

“मां, पर मैं यह अपमान बरदाश्त नहीं कर सकती.”

“सुमी, यह शादी तुम्हारी पसंद से, तुम्हारी खुशी के लिए करी गई है. इसे निभाना तुम्हारी जिम्मेदारी है. अभी हमें तुम्हारी दोनों छोटी बहनों की शादी भी करनी है. अगर बड़ी बहन का डाइवोर्स हो गया तो दोनों बहनों की शादी में बहुत दिक्कत आएगी. 2-4 चार दिन रहो आराम से मायके में और फिर अपने घर चली जाना. रात बहुत हो गई है, जाओ सो जाओ.”

शाम को औफिस से लौटते हुए विक्रांत उस के मायके चला आया. बिना कुछ कहेसुने वह विक्रांत के साथ अपने ससुराल चली आई. अपमानित होने का एक अनवरत सिलसिला आरंभ हो गया था. अब उसे अपने जीवन की सब से बड़ी भूल का एहसास हो रहा था. भावना में बह कर उस ने हनीमून पर से ही अपनी लगीलगाई नौकरी को इस्तीफा दे दिया था क्योंकि विक्रांत ने कहा था, “जानेमन, तुम दूसरे शहर में नौकरी करोगी तो मैं तो वियोग में ही मर जाऊंगा. 1-2 साल साथ में जी लेते हैं फिर तुम भी नौकरी कर लेना. तुम तो टौपर हो, तुम्हें तो कभी भी नौकरी मिल जाएगी.”

जाने उसे कब नींद आई. अगले दिन जब सुबह सो कर उठी तो उसे चक्कर आ रहे थे. उसे लगा कि उसे तनाव की वजह से ऐसा हो रहा है. पर सासूमां की अनुभवी आंखें शायद समझ गई थीं. उन्होंने डाक्टर के पास ले जा कर जांच करवाई और खुशी से झूमती हुई घर वापस आईं. सालभर के भीतर ही पिंकी उस की गोद में खेलने लगी थी और लगभग 1 साल बाद ही उस ने बेटे को जन्म दिया था. 2 बेटियों की मां, उस की जेठानी जलभुन गई थीं. अब वे भी उसे बातबात पर कुछ न कुछ बोलती रहतीं पर बेटा पा कर सास अब उस का ही पक्ष लेतीं पर बच्चों की मां को नौकरी करने की अनुमति इस घर में नहीं थी.

धीरेधीरे विक्रांत शराब पीने लगा. सब के बीच उस का अपमान करना अब रोज की बात थी. कमरे में अगर वे कुछ समझाने की कोशिश करतीं भी तो विक्रांत उस पर हाथ उठा देता. बच्चे सहम जाते.

कालेज में विक्रांत के परम मित्र थे अंगद. एक ही शहर में होने के कारण उन की दोस्ती अभी भी कायम थी . अगर उन के सामने कुछ भी घटित होता तो वे कभी विक्रांत को समझाते और कभी उसे. पर यह बात न तो विक्रांत को अच्छी लगती न ही परिजनों को इसलिए उन्होंने विक्रांत के घर आना कम कर दिया पर मोबाइल से वे सुमोना से संपर्क में रहते. सुमोना भी जब भी परेशान होती एकांत पा कर अंगदजी को ही फोन लगा लेती. अंगद हमेशा उस का हौसला बढ़ाते. अपने पैरों पर खड़े होने की सलाह देते.

उस दिन भी अंगद घर आए थे. जब विक्रांत ने सुमोना को गाली दी तो अंगद बच्चों का वास्ता दे कर उसे समझाने लगे पर विक्रांत तो जैसे अपना आपा ही खो चुका था. उस ने उन दोनों के रिश्ते पर ही उंगली उठा दी. अपमान से तिलमिलाए हुए अंगद उठ कर चले गए और अंगद का सारा गुस्सा विक्रांत ने उस पर ही उतार दिया.

आज जिस तरह से विक्रांत ने उसे पीटा था, उसे देख कर पंकज सहम गया था और उस घटना के बाद घंटे भर तक पिंकी डर कर कांपती रही थी और उस के आंसू रुके ही नहीं थे. सुमोना को लगा ये मेरे बच्चे हैं उन्हें डर और उलझी हुई जिंदगी नहीं दे सकती हूं. अब अपने बच्चों के लिए मुझे ही कुछ करना होगा. यह निर्णय लेने के बाद सुमोना स्वयं को भविष्य में आने वाले कठिन समय के लिए मानसिक रूप से तैयार करने लगी. अब उसे पता था कि यह लड़ाई उस की अकेले की है. इस युद्ध में कोई उस के साथ नहीं खड़ा होगा. पर फिर भी सुमोना हलका महसूस कर रही थी.

अगले दिन विक्रांत के जाने के बाद सुमोना लैपटौप ले कर बैठ गई और कई जगह नौकरी के लिए आवेदन भेज कर ही अपने कमरे से बाहर आई. 2 दिनों तक कहीं से कोई जवाब नहीं आया. पर वह निराश नहीं हुई, जानती थी कोर्स करने के बाद 5 साल का लंबा अंतराल लिया था उस ने, तो थोड़ी मुश्किल से तो नौकरी मिलेगी ही. पर उसे विश्वास था कि उस की योग्यता को देखते हुए उसे नौकरी जरूर मिलेगी.

मगर हमेशा अपना सोचा कहां होता है. इस से पहले कि सुमोना की नौकरी लगती विक्रांत ने उस के हाथ में तलाक के कागज थमा दिए. दूसरा विस्फोट यह था कि विक्रांत ने कोर्ट से अपने बच्चों की कस्टडी मांगी थी, क्योंकि सुमोना बेरोजगार थी. सुमोना के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई थी. पर सुमोना ने रोनेचिल्लाने की बजाय आगे की रणनीति पर विचार करना आरंभ किया. उसे किसी से किसी सहारे की उम्मीद नहीं थी. एक ही व्यक्ति था जिस से वह कोई मदद मांग सकती थी. तो उस ने अंगद को फोन मिलाया. पूरी स्थिति बता कर उस ने किराए का मकान ढूंढ़ने का अनुरोध किया.

विक्रांत के आने से पहले ही सुमोना अपने दोनों बच्चों को ले कर एक अटैची के साथ घर से चली गई. अंगद उस के विश्वास पर खरा उतरा और उस ने अपने किसी परिचित के यहां उसे पेइंगगेस्ट बनवा दिया. अंगद ने उसे मायके जाने की भी सलाह दी पर सुमोना ने यह कह कर मना कर दिया कि यह मेरी लडाई है मैं इस में उन लोगों को परेशान नहीं करना चाहती.

रात में जब विक्रांत लौटा तो इस नए घटनाक्रम से बुरी तरह बौखला गया,
“आप लोगों ने उसे रोका क्यों नहीं? वह इस तरह से मेरे बच्चों को ले कर नहीं जा सकती.”

“हम लोगों को लगा कि आप लोगों की आपस में बात हो गई होगी,” भाभी मुंह बना कर बोलीं.

विक्रांत अपने कमरे में चला गया. उस के जीवन में इतना बड़ा भूचाल आया था और परिवार का कोई सदस्य उस के पास हमदर्दी दिखाने भी नहीं आया. समझ नहीं पा रहा था कि जिन परिजनों पर सुमोना जान छिड़कती थी, उस के जाने का किसी को कोई दुख नहीं था. आधी रात को विक्रांत को भूख लगी. उठ कर बाहर आया, डाइनिंग टेबल पर 2 रोटी और सब्जी ढकी रखी थी, वही खा कर वापस जा कर सो गया.

सुमोना होती तो गरम कर, मानमनुहार से सलाद, अचार के साथ उसे खिलाती. अगली सुबह भी सब कुछ सामान्य ढंग से होता रहा. जब वह बाहर निकलने लगा तब मां ने पूछा, “सुमोना से कुछ बात हुई क्या?”

“नहीं, खुद गई है तो खुद वापस आएगी. किसी को चिंता करने की जरूरत नहीं है,” गुस्से में विक्रांत बोला.

“और वह तलाकनामा?” भाभी ने पूछा.

“उसी से उस की अक्ल ठिकाने आएगी आप देख लीजिएगा,” कहता हुआ विक्रांत बाहर चला गया.

समय के तो जैसे पंख होते हैं, तेजी से खिसकने लगा. दिन, महीना और फिर साल बीत गया. न सुमोना आई, न उस का कोई फोन आया. विक्रांत ने भी अपनी अकड़ में कोई फोन नहीं किया था पर इस दौरान विक्रांत ने सुमोना की कमी को शिद्दत से महसूस किया. अपनी उलझनों के कारण उस का काम में मन नहीं लगता था. प्राइवेट कंपनी उस को क्यों रखती अतः उसे नौकरी से निकाल दिया गया. बेरोजगार देवर अब भाभी पर अब बोझ था. वही भाभी जो उस के साथ मिल कर सुमोना को ताने सुनाया करती थीं, अब उसे ताने देती थीं, “जो अपनी पत्नी और बच्चों का नहीं हुआ वह किसी और का कैसे होगा.“

अपने ही घर में उस की स्थिति अनचाहे मेहमान जैसी हो गई थी. अब विक्रांत को अपने जीवन में सुमोना का महत्त्व समझ में आ रहा था. वह खुद को सुमोना से मिलने के लिए मानसिक रूप से तैयार कर रहा था कि तभी उस के ताबूत में आखिरी कील के रूप में हस्ताक्षर किया हुआ तलाकनामा रजिस्टर्ड डाक से उस के पास आ गया. साथ ही सुमोना ने कोर्ट के पास अपने बच्चों की कस्टडी का दावा भी ठोका था क्योंकि अब वह बेरोजगार नहीं थी बल्कि एक बड़ी कंपनी की एचआर हैड थी.

जो बांटता है वही काटता है

‘बंटेंगे तो कटेंगे’ का नारा आजकल जम कर लगाया जा रहा है पर इस में यह नहीं बताया जा रहा कि कौन बांटता रहा है कि जिसे रोकना जरूरी है. हालांकि जाति का नाम नहीं लिया जा रहा है पर यह सब को पता है कि जाति जनगणना से घबरा कर यह बांटने और काटने की बात कही जा रही है, डराया जा रहा है कि यदि जातियों की पहचान और गिनती दोनों हो गईं तो इन जातियों से बाहर का कोई काट डालेगा.

सवाल तो यह है कि जातियों की पहचान कौन करता है, कहां से शुरू होती है? पूरे देश में अगर जाति का निशान पैदा होते ही लग जाता है तो इस के लिए जिम्मेदार ब्राह्मणों की बनाई गई वह प्लानिंग है जिस में हरेक को अपनी जाति के दायरे में रहना पड़ता है.

गांवों में यह खास है क्योंकि वहां का समाज आज भी 18वीं सदी से पहले वाला है. पढ़नेलिखने, जवाहरलाल नेहरू के समय लाए गए संविधान, उस समय के कानून, हरेक को बराबर के वोट के हकों के बावजूद हर जगह लोग अपने नाम के आगे जाति का नाम लगाए घूमते रहते हैं और सामने वाले की जब तक जाति नहीं पता चल जाए, बात करने को तैयार नहीं होते.

जाति से बंटना तो इस तरह का है कि जो इसे बांटना जानते हैं वे तो चेहरा देख कर बता देते हैं कि कौन किस जाति का है. साथ चलने वाला या बगल में रहने वाला या साथ पढ़ने वाला या साथ काम करने वाला जब तक अपनी जाति नहीं बता देता, जो जाति के नाम पर बांटते हैं, वे चैन से नहीं बैठते. लोग बाप के नाम, काम, इतिहास, महल्ले से पता करते हैं कि अगर कोई जाति छिपा रहा है तो क्यों छिपा रहा है और उस की जाति है क्या?

जब बांटने वाले पगपग पर मौजूद हों तो काटने वालों की बात क्यों की जा रही है और वही कर रहे हैं जो दिन में 10 बार जाति का खुलासा करते हैं ‘फिल्म आर्टिकल 15’ का वह हिस्सा रोचक है जिस में एक  पात्र नायक को ब्राह्मण तो बताता है पर वहीं मौजूद 4 और ब्राह्मणों की उपजातियां अलगअलग और ऊंचीनीची बता कर बांट देता है. इसी ब्राह्मणपात्र को शूद्र या अछूत स्त्री से सहवास करने पर कोई आपत्ति नहीं पर वह घर में कुछ छू भी ले तो आफत आ जाती है.

चुनावों से पहले सारी पार्टियां हर जाति के खाते बनाना शुरू कर देती हैं और टिकट उसी आधार पर दिए जाते हैं. जाति का मतलब यहां तक है कि राष्ट्रपति पद पर रहे दलित रामनाथ कोविंद और बाद में बनीं एसटी द्रौपदी मुर्मू को बहुत सी जगहों पर बुलाया तक नहीं गया. नए संसद भवन की नींव का शिलालेख राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों नहीं हुआ, उद्घाटन द्रौपदी मुर्मू के हाथों नहीं होने दिया गया.

यह बंटवारा किस ने किया? हिंदूमुसलिम बंटवारे के लिए स्वामी दयानंद, बाल गंगाधर तिलक, बाल कृष्ण गोखले, राजेंद्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, सी. राजगोपालाचार्य जैसे कांग्रेसी नेता ही थे. सब जाति ऊंची के नाम रख रहे थे और मुसलमानों को अछूत घोषित करने की कोशिश करते हुए पूरे भारतवर्ष का एकतिहाई हिस्सा खो बैठे.

आज काटने का डर दिखाया जा रहा है तो किस से? क्या मुसलमानों से जिन्होंने आवाज उठाने का खमियाजा 2002 में गुजरात में भुगता या सिखों से जिन्होंने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में झेला? दोनों हालों में कौन कटा? क्या वे जिन के बंटने पर आंसू बहाए जा रहे हैं? नहीं, वे कटे जिन का डर दिखाया जा रहा है, वे कमजोर थोड़े से लोग जो आज कोनों में पड़े हैं और हर पल डरेसहमे रहते हैं काट डालेंगे.

काट वह सकता है जिस के हाथों में आज बंदूक है, नेता है, ड्रोन है, ट्रेनिंग मिली हुई फोर्स है. काटने की ट्रेनिंग गैरहिंदुओं को नहीं हिंदुओं की पुलिस या सेना का मिल रही है या अधकचरे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ वालों को. फिर डर कैसा?

डर इस बात का है कि कहीं जातियों के सही नंबर पा कर सदियों से बंट कर अपना सबकुछ खोने वाले शूद्र यानी आज के पिछड़े, चांडाल या अछूत यानी आज के एससीएसटी या फिर औरतें, चाहे ऊंची जातियों की हों या नीची जातियों की, समझ कमतर ही जाती हैं. ये बंटे हुए लोग अपना हिस्सा मांग रहे हैं पर वह जो बांट रहा है वही शोर मचा रहा है. यह इस समाज या धर्म की नहीं लगभग दुनियाभर के धर्मों की रगरग में फैला है. दोगलापन बांटने वाले और काटने वालों का एक ही होता है. असल में जो बांटता है वही काटता है और कोई नहीं.

Married Woman : शादीशुदा महिलाओं को क्यों छोड़ना पड़ता है जौब

Married Woman : विश्व की सबसे प्रमुख टैक कंपनियों में से एक ऐप्पल कंपनी ने हाल ही में भारत के अंदर अपना आईफोन प्रोडक्शन बढ़ाया है, साथ ही अपने अन्य डिवाइस के प्रोडक्शन को भी भारत में शुरू करने की योजना पर काम कर रही है. भारत में ये काम उन के प्रमुख सप्लायर फाक्सकान करती है. फाक्सकान के बारे में यह बात सामने आई है कि भारत के प्लांट में वह विवाहित महिलाओं को जौब पर नहीं रखेगी.

मार्च, 2023 में पार्वती और जानकी नाम की 2 महिलाएं ऐप्पल कंपनी में जौब के लिए गईं तो उन्हें यह कह कर लौटा दिया गया कि यह कंपनी शादीशुदा महिलाओं को नौकरी नहीं देती है. इस कंपनी में काम करने वाले 17 कर्मचारियों ने भी नाम न बताने की शर्त पर कंपनी के इस रवैए की पुष्टि की और कहा कि फाक्सकान का मानना है कि शादीशुदा महिलाएं पारिवारिक जिम्मेदारियों और संभावित गर्भावस्था के कारण जोखिम के कारक हैं.

वजह क्या है

एजेंसी ने फाक्सकान इंडिया के पूर्व ह्यूमन रिसोर्सेज ऐग्जीक्यूटिव एस. पाल के हवाले से लिखा कि कंपनी एक सिस्टम के तहत इंडिया में अपनी आईफोन असैंबली की प्रमुख फैक्टरी में शादीशुदा महिलाओं को नौकरी से बाहर रखती है. शादीशुदा महिलाओं को जौब पर न रखने की वजह है कल्चर और उन पर पड़ने वाला सामाजिक दबाव. इसलिए शादीशुदा महिलाओं को नौकरी पाने की दौड़ से बाहर कर दिया गया है.

कंपनी की नजर में महिलाएं शादी के बाद प्रैगनैंसी, फैमिली ड्यूटीज आदि समस्याओं से घिरी होती हैं. कंपनी इसे रिस्क फैक्टर बताते हुए कहती है कि शादीशुदा महिलाएं ज्वैलरी भी पहनती हैं जो प्रोडक्शन को प्रभावित कर सकता है.

शादीशुदा महिलाओं को नौकरी न देने का मामला राज्य सरकार से होता हुआ केंद्र सरकार के पास चला गया. इस के बाद केंद्र सरकार ने कंपनी के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए रिपोर्ट मांगी. इस पर कंपनी ने सफाई देते हुए कहा कि उन की कंपनी में 75 फीसदी महिलाएं काम करती हैं और जिन में से 25 फीसदी महिलाएं शादीशुदा है.

वैसे कंपनी का कहना पूरी तरह से गलत भी नहीं है कि विवाहित महिलाओं पर सामाजिक जिम्मेदारियां ज्यादा होती हैं और उन के चलते वे अपने काम पर फोकस नहीं कर पाती हैं. वे औफिस में एक कर्मचारी की तरह नहीं बल्कि एक घरेलू महिला की तरह व्यवहार करती हैं जहां उन की बातों में पति बच्चे, घरपरिवार और सासससुर की बातें होती हैं.

आम परेशानियां

33 साल की दीपिका जो एक सरकारी बैंक में जौब करती है अकसर इस बात को ले कर परेशान रहती है कि उस के घर पर न रहने से घर का क्या हाल हो रहा होगा. बाई काम करने आई होगी या नहीं. उस का 4 साल का बेटा ठीक से होगा या नहीं? कहीं वह अपनी नानी को परेशान तो नहीं कर रहा होगा? रो तो नहीं रहा होगा? जैसी परेशानियों से जू?ाती हुई कईकई बार वह घर पर फोन लगा कर वहां का हालचाल लेती रहती है. पर उसे यह पता नहीं होता कि उस का यह व्यवहार औफिस में उस के काम को प्रभावित कर रहा होता है.

पदमा भी एक बड़े सरकारी बैंक में जौब करती है. प्रैगनैंसी के समय उसे काफी तकलीफों से गुजरना पड़ा. बारबार डाक्टर के पास चैकअप के लिए जाने के चलते अकसर उसे बैंक से छुट्टी लेनी पड़ी थी. जब उस की डिलिवरी हुई तब वह 2 साल की छुट्टी ले कर घर बैठ गई क्योंकि उसे अपने बच्चे की परवरिश के लिए वक्त चाहिए था.

धर्म भी जिम्मेदार

महिलाएं अकसर औफिस में आ कर भी घरपरिवारों के बीच उलझी होती हैं. शरीर तो उन का औफिस में होता है, पर दिल और दिमाग घरपरिवार पर लगा होता है. एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि विवाहित वर्किंग वूमंस अपने घर की जिम्मेदारियों के चलते औफिस में सही से काम नहीं कर पाती हैं. ऐसा नहीं है कि वे जौब नहीं करना चाहतीं या उन्हें प्रमोशन या ऊंचे पद नहीं चाहिए पर औफिस में ज्यादा जिम्मेदारी लेने से बचती हैं.

मालविका एक सरकारी कर्मचारी है. इस साल ही वह प्रमोट हुई है. लेकिन औफिस में उस के काम करने के रवैए में कोई बदलाव नहीं आया है. औफिस से ज्यादा उस का दिमाग घरपरिवार, पति, बच्चे और सासससुर में अटका होता है. एक आम गृहिणी की तरह तीज, करवाचौथ आदि त्योहारों में बढ़चढ़ कर हिसा लेती है. उस के साथ काम करने वाली विवाहित महिलाएं भी पूजाव्रत, जागरण पर खुल कर बातें करती हैं. किस व्रतउपवास में क्या करना है, कैसे रंग की साड़ी, चूडि़यां पहननी हैं, कहां किस दुकान से खरीदारी करनी है, इस सब पर चर्चा चलती है ज्यादा और औफिस के काम की कम.

खुद को बदलने की जरूरत

मीनाक्षी एक स्कूल टीचर है. वह गले में मंगलसूत्र और मांग में सिंदूर लगा कर ही स्कूल आती है. उसे देख कर कोई कह ही नहीं सकता कि वह एक कामकाजी महिला है. धर्मकर्म में काफी विश्वास करती है. सुबह उठ कर सब से पहले घर के देवीदेवता की पुजा करती है, फिर सब को चाय देने के बाद परिवार के लिए खाना बना कर ही स्कूल के लिए निकलती है. हफ्ते में एक दिन उपवास भी होता है जिस में वह अन्न ग्रहण नहीं करती, केवल जूस पर रहती है. लेकिन इन सब कामों से वह नहीं थकती. थकावट तो उसे स्कूल से जानेआने पर होती है. कभीकभी मन होता है कि नौकरी छोड़ दे पर नौकरी छोड़ना भी नहीं चाहती क्योंकि अब भला महीने के क्व60-65 हजार क्यों छोड़े कोई.

महिलाएं पढ़ाई और डिगरियां तो पुरुषों की तरह प्राप्त कर लेती हैं पर असल में वे खुद को बदलना नहीं चाहतीं. कार्यक्षेत्र में भी उन का पहनावाओढ़ावा, सोचविचार एक घरेलू महिला की तरह ही होता है. आज ऊंचे पदों पर महिलाएं इसलिए भी कम हैं क्योंकि वे खुद से ज्यादा दूसरों के बारे में सोचती हैं. अपने से ज्यादा उन्हें पतिपरिवार और बच्चों की फिक्र लगी होती है और जिस के चलते अपने काम से न्याय नहीं कर पाती हैं.

कुछ समय पहले एक वीडियो वायरल हुआ जिस में दिखाया गया है कि एक महिला स्कूल टीचर बच्चों को पढ़ाने के बजाय स्वैटर बुन रही थी. 27 सैकंड के इस वीडियो में कई महिला टीचर स्टाफरूम में बैठ कर घरेलू बातचीत में मशगूल थीं. उन्हीं में एक टीचर खिड़की के पास कुरसी पर बैठी धूप का लुत्फ उठाते हुए स्वैटर बुन रही थी.

वीडियो देखने के बाद लोगों का रिएक्शन आया. लोगों का कहना था कि अच्छा वेतन उठाने के बाद भी टीचर पढ़ाने की जगह अन्य कामों में व्यस्त रहती हैं. ऐसे में इन पर काररवाई होनी चाहिए.

क्या कहती है रिपोर्ट

कई ऐसी महिलाएं हैं जो जौब तो करना चाहती हैं पर पारिवारिक जिम्मेदारियों से बाहर नहीं निकल पाती हैं. कोरना काल में शुरू वर्क फ्रौम होम का कल्चर आज भी कायम है खासकर महिलाएं घर से काम करना ज्यादा पसंद कर रही हैं ताकि वे घर और औफिस दोनों संभला सकें.

मिताली कहती है कि महिलाओं के लिए वर्क फ्रौम होम बहुत सुविधाजनक है. इस से समय तो बचता ही है, घरेलू काम भी डिस्टर्ब नहीं होते और नौकरी छोड़ने की बात भी मन में नहीं आती है.

अंतर्राष्ट्रीय श्रम की एक हालिया रिपोर्ट भी यही कहती है कि भारत की महिलाएं वर्क फ्रौम होम को ज्यादा प्राथमिकता देती हैं.

भले ही आज महिलाएं पुरुषों के साथ बराबरी से चलना चाहती हैं जो सही भी है लेकिन वे घर, पति बच्चों की जिम्मेदारियों से खुद को आजाद नहीं कर पाई हैं. सच बात तो यह है कि महिलाएं खुद सामाजिक बेडि़यों में जकड़ी रहना चाहती हैं. अगर पुरुष औफिस में धोतीकुरता पहन कर आएंगे, तो अच्छा नहीं लगेगा वैसे ही कामकाजी महिलाएं अगर अपने औफिस में मंगलसूत्र, चूडि़यां पहन और बिंदी लगा कर जाएंगी तो सही तो नहीं लगेगा न? लेकिन कई ऐसी कामकाजी महिलाएं अपने औफिस में भी जींसटौप पर मंगलसूत्र और सिंदूर, चूडि़यां पहन कर आ जाती हैं जो काफी अजीब लगता है.

धार्मिक गुट द्वारा अहमियत

गोवा के एक कालेज में पौलिटिकल साइंस की एक महिला प्रोफैसर की फेसबुक पर की गई पोस्ट में मंगलसूत्र की तुलना कुत्ते के गले में बंधी बेड़ी से की गई थी. पितृसत्ता और रूढि़वाद के संदर्भ में की गई इस पोस्ट के लिए प्रोफैसर का कहना था कि वह बचपन से ही यह सम?ाने की कोशिश करती रही है कि अलगअलग परंपराओं में शादीशुदा औरतों के लिए खास सूचक क्यों है और पुरुषों के लिए क्यों नहीं? हालांकि अपने विचार प्रकट करने के लिए उस महिला प्रौफैसर को राष्ट्रीय हिंदू युवा वाहिनी की शिकायत के बाद माफी मंगनी पड़ी थी.

गोवा के मामले के बाद लेखक और ऐक्टिविस्ट राम पुनियानी ने रेखांकित किया कि औरतों पर नियंत्रण दिखाने वाले ये सूचक भारत की परंपराओं का हिस्सा हैं और सभी धार्मिक गुट इन्हें बहुत अहमियत देते हैं. एक लेख में उन्होंने कहा कि इस वक्त दुनियाभर में धार्मिक राष्ट्रवाद लोकप्रिय हो रहा है और ऐसी रीत को और प्राथमिकता और सामाजिक स्वीकृति दी जा रही है.

‘नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे 2023’ की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में केवल 32% विवाहित महिलाएं ही कार्यरत हैं. इतना ही नहीं 2004-05 और 2011-12 के बीच चौंकाने वाली बात तो यह रही कि 20 मिलियन भारतीय महिलाओं ने नौकरी छोड़ दी इसलिए कि उन पर सामाजिक जिम्मेदारियां ज्यादा थीं और उन की वे अनदेखी नहीं कर सकती थीं.

आदर्श औरत बनने की आशा

अकसर औरतों से एक आदर्श औरत बनने की आशा की जाती है. कुछ साल पहले कर्नाटका हाई कोर्ट ने एक आदर्श स्त्री की परिभाषा दी कि जो शादी के बाद गले में मंगलसूत्र और माथे पर सिंदूर लगाती हैं, वही आदर्श स्त्री की गिनती में शामिल हैं. कुछ साल पहले वाराणसी के एक स्टार्टअप ने लड़कियों को आदर्श बहू बनने की ट्रेनिंग देने की पेशकश की थी. ऐसी ट्रेनिंग गीता प्रैस वाले कई सालों से दे रहे हैं. जैसे नारी धर्म, स्त्री के लिए कर्तव्य दीक्षा, भक्ति नारी, नारी शिक्षा, दांपत्य जीवन का आदर्श, गृहस्थ में कैसे रहें आदिआदि. लेकिन अफसोस तो इस बात का है कि महिलाएं यह शिक्षा ले भी रही हैं.

भारतीय शादीशुदा महिलाओं को यह सम?ा नहीं होती कि पुरातनपंथी घर से औफिस के लिए निकलते समय पोशाक और मस्तिष्क दोनों बदलने की जरूरत है. जींसटौप या औफिशियल पैंटशर्ट पहन कर, गले में मंगलसूत्र और चूडि़यां पहन कर औफिस नहीं जाया जाता. पुरुष घर और दफ्तर दोनों जगह मर्दों सा व्यवहार करते हैं, लेकिन औरतें दोनों जगह संस्कारी बहू और पत्नी की तरह पेश आती हैं. काफी समय औरतें अपने औफिस में मां, बहन, सहेली की बातों में लगी रहती हैं. आए दिन उन का उपवास चलता है और दूसरा हर महीने पीरियड्स का रोना जिस के लिए वे दफ्तर में काम करने वाले पुरुषों से सिंपैथी चाहती हैं.

व्रत उपवास का ढकोसला

जौब करने वाली स्मार्ट युवतियों को भी यह कहते सुना जाता है कि आज उन का गुरुवार का व्रत है और आज मंगलवार का और इन सब व्रतों को एक अच्छे पति की कमाना से करती हैं. तो क्या आज की स्मार्ट पढ़ीलिखी युवतियों को अपने ऊपर भरोसा नहीं रहा जो वे अच्छे पति की कमाना के लिए व्रतउपवास कर रही हैं? कहीं न कहीं लड़कियां खुद ही खुद को गिराने का काम करती हैं और कहती हैं कि उन्हें बराबरी का हक नहीं मिल रहा है.

बदलाव तब नहीं आएगा, जब लोग हमें बदलेंगे. बदलाव तो तब आएगा जब हम खुद बदलना चाहेंगे. समान काम समान वेतन का जो ढिंढोरा पीटा जा रहा है न इस के लिए भी महिलाओं को पहले खुद को बदलना होगा. पुरातनपंथी रीतिरिवाजों से बाहर निकलना होगा. खुद को साबित करना होगा कि वे किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं हैं.बदलाव तभी संभव है.

Periods के दौरान क्या खाना सही रहता है और क्या गलत, यहां जानिए…

अकसर महिलाओं को पीरियड्स (Periods) में कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ता है. ऐसे में खाने की कुछ ऐसी चीजें हैं जिन से आप को परेशानियों से कुछ राहत मिलेगी. आमतौर पर पीरियड्स में महिलाओं को इन परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है- पेट में क्रैंप या ऐंठन, सिरदर्द, थकावट, मितली, सूजन, मूड चेंज, हलका बुखार और दस्त.

पीरियड्स में क्या खाएं

हाइड्रेटेड रखने वाले फल और सब्जियां: तरबूज, खीरा, स्ट्राबैरी, आड़ू, नारंगी, पत्तागोभी आदि हरी पत्तेदार सब्जियां, साथ में पर्याप्त पानी पीएं. इस से सिरदर्द, थकावट और बौडी पेन से बचा जा सकता है.

जिंजर टी: अदरक की चाय से मितली और मांसपेशियों के दर्द में फायदा होता है, साथ में यह ऐंटीइनफ्लैमेटरी भी होता है. ध्यान रहे ज्यादा अदरक से सीने में जलन हो सकती है.

आयरन, प्रोटीन और ओमेगा 3 वाले खाद्य: चिकन से पर्याप्त प्रौटीन और आयरन मिलेगा और मछली से साथ में ओमेगा 3 भी. पीरियड्स में आयरन कम होने की संभावना होती है जिस से बचा जा सकता है. आयरन की कमी से थकावट होती है.

हलदी और करक्यूमिन: हलदी में मौजूद करक्यूमिन से ही यह ऐंटीऔक्सीडैंट और ऐंटीइनफ्लैमेटरी होता है. करक्यूमिन के कैप्सूल भी आते हैं. देखा गया है पीरियड्स के सिंप्टम्स में यह बहुत फायदा पहुंचाता है. यह डिप्रैसन में काम करता है जिस से मूड अच्छा रहता है.

डार्क चौकलेटस: डार्क चौकलेट में प्रचुर मात्रा में आयरन और मैग्नीशियम होता है. 100 ग्राम के डार्क चौकलेट से 67% आयरन और 58% मैग्नीशियम की एक दिन की जरूरत पूरी होती है. पीरियड्स में इन मिनरल्स की संभावित कमी से बचा जा सकता है.

नट्स: बादाम, काजू, अखरोट आदि नट्स से पर्याप्त प्रोटीन और ओमेगा 3 मिलते हैं. अगर आप सीधे तौर पर नहीं खाना चाहती हैं तो इन्हें स्मूदी में मिला कर पीएं या बादाम युक्त दूध पी सकती हैं.

दूध और दही: कुछ महिलाओं को पीरियड्स में यीस्ट इन्फैक्शन होता है. ऐसे में दही एक अच्छा प्रोबायोटिक है. यह पाचनक्रिया और यीस्ट इन्फैक्शन में मदद करने के साथसाथ वैजाइना में अच्छे बैक्टीरिया का पोषक है. दूध और दही से शरीर को प्रोटीन और कैल्सियम भी मिलता है.

किनोआ, दालें और बींस: इन में आयरन, प्रोटीन और मैग्नीशियम होता है. विशेषकर शाकाहारी लोगों के लिए मांस का अच्छा विकल्प है.

पिपरमिंट टी: पीरियड्स में पिपरमिंट टी बहुत अच्छी होती है. यह मितली, दस्त और क्रैंप सभी में फायदा करती है.

पीरियड्स में क्या न खाएं 

नमक: ज्यादा नमक वैसे भी नहीं खाना चाहिए. पीरियड्स में ज्यादा नमक खाने से शरीर में पानी जमा होता है जिस के चलते ब्लोटिंग (पेट में सूजन या टाइटनैस) होती है. ऐसे में फास्ट प्रोसैस्ड फूड नहीं खाना चाहिए.

चीनी: पर्याप्त मात्रा में शुगर बुरी नहीं है पर शुगर ज्यादा होने से मूड स्विंग होता है.

अल्कोहल: पीरियड्स में अल्कोहल का सेवन न करना ही बेहतर है. अल्कोहल से पीरियड्स की परेशानियां बढ़ जाती हैं जैसे डिहाइड्रेशन, मितली, दस्त और सिरदर्द. इस के हैंगओवर से थकान भी महसूस होती है.

कौफी: अगर आप कौफी पीने की आदी हैं तो इसे कम से कम लें. हो सके तो 1 या 2 कप ही लें. कौफी से पाचनक्रिया पर असर पड़ता है. कौफी से शरीर में पानी की अनावश्यक मात्रा जमा होने की संभावना रहती है जिस के चलते ब्लोटिंग की समस्या होती है.

मसालेदार खाना: नौर्मल मसाला खाया जा सकता है पर जिन्हें ज्यादा मसाला खाने की आदत होती है वे इसे कम करें. ज्यादा स्पाइसी फूड से पाचनक्रिया पर असर पड़ता है जैसे पेट में दर्द, दस्त और मितली या उलटी की संभावना रहती है.

रैड मीट: रैड मीट में आयरन तो होता है पर इस में प्रोस्टाग्लैंडीन हारमोन बहुत ज्यादा होता है जिस से क्रैंप बढ़ने की संभावना रहती है.

जो खाने आप के लिए सुपाच्य नहीं हैं: कुछ खाने की चीजों जिन के आप अभ्यस्त नहीं हैं या जिन्हें आप पचा नहीं सकती हैं उन्हें न खाएं. इस से कब्ज, दस्त, मितली, उलटी और अनपच हो सकती है और आप की परेशानियां बढ़ सकती हैं.

कुछ दिनों से देवर के व्यवहार में बदलाव की वजह से परेशान हूं?

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल-

मैं 25 साल की शादीशुदा महिला हूं. हम एक शहर में किराए के मकान में रहते हैं. कुछ दिन पहले मेरे पति के छोटे भाई यानी मेरा देवर हमारे साथ रहने आया हुआ है. देवर अभी अविवाहित है. पति औफिस के काम में बिजी रहते हैं, इस वजह से मैं देवर के साथ शौपिंग आदि करने लगी. इधर कुछ दिनों से उस के व्यवहार में बदलाव की वजह से परेशान हूं. वह अब जानेअनजाने मेरे पास आने की कोशिश करता है. मुझे छूना चाहता है. समझ नहीं आ रहा मैं क्या करूं? मैं नहीं चाहती कि इस वजह से दोनों भाइयों में दूरियां बनें. कई बार लगा कि पति से बात करूं पर बहुत कुछ सोच कर रुक जाती हूं. बताएं मैं क्या करूं?

जवाब-

संभव है कि ज्यादा हंसीमजाक कर आप ने उसे सिर चढ़ा लिया है. देवर और भाभी का संबंध बहुत पवित्र होता है और अगर आप का देवर इस मर्यादा को भूल कर गलत मंशा रखता है, तो उस से दूरी बना कर रखें. शौपिंग या बाजार आदि भी देवर के साथ नहीं पति के साथ जाएं.

आप अपनी छोटीमोटी जरूरतों का सामान पति के साथ भी जा कर खरीद सकती हैं. पति के औफिस से आने के बाद नजदीकी बाजार में खरीदारी कर सकती हैं. इस से पति को भी अच्छा लगेगा. सप्ताह के अंत या जिस दिन पति की छुट्टी हो, साथ जा कर पूरे सप्ताह की खरीदारी कर लें.

इस दौरान आप को संयम से काम लेना होगा. देवर को रिश्ते की मर्यादा बताएं, बावजूद इस के अगर वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आता तो पति और घर वालों से बात कर सकती हैं.

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बड़े शहरों में सब से बड़ी समस्या आवास की होती है. 2 कमरों के छोटे से फ्लैट में पतिपत्नी, बच्चे और सासससुर रहते हैं. ऐसे में पतिपत्नी एकांत का नितांत अभाव महसूस करते हैं. एकांत न मिल पाने के कारण वे सैक्स संबंध नहीं बना पाते या फिर उन का भरपूर आनंद नहीं उठा पाते क्योंकि यदि संबंध बनाने का मौका मिलता है तो भी सब कुछ जल्दीजल्दी में करना पड़ता है. संबंध बनाने से पूर्व जो तैयारी यानी फोरप्ले जरूरी होता है, वे उसे नहीं कर पाते. इस स्थिति में खासकर पत्नी चरमसुख की स्थिति में नहीं पहुंच पाती है. पतिपत्नी को डर लगा रहता है कि कहीं बच्चे न जाग जाएं, सासससुर न उठ जाएं. मैरिज काउंसलर दीप्ति सिन्हा का कहना है, ‘‘संबंध बनाने के लिए एकांत न मिलने के कारण महिलाएं चिड़चिड़ी, झगड़ालू और उदासीन हो जाती हैं और फिर धीरेधीरे दांपत्य जीवन में दरार पड़नी शुरू हो जाती है, यह दरार अनेक समस्याएं खड़ी कर देती है. कभीकभी तो नौबत हत्या या आत्महत्या तक की आ जाती है.’’

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या हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- sampadak@delhipress.biz सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

Winter Special Food : घर पर बनाएं रेस्टोरैंट की तरह चटपटा इंडो चाइनीज चिल्ली पोटैटो

Winter Special Food: यदि आपको तीखा और चटपटा खाना पसंद है तो घर पर बना हुआ यह इंडो-चाइनीज चिल्ली पोटैटो बहुत ही पसंद आयेगा.

सामग्री

आलू – 250 ग्राम ( 3 आलू)

हरा धनियां – 2-3 टेबल स्पून बारीक कटा हुआ

हरी मिर्च – 1-2 बारीक कटी हुई

अदरक – 1 छोटी चम्मच पेस्ट

कॉर्न फ्लोर – 4 टेबल स्पून

टमाटो सॉस – 2 टेबल स्पून

सोया सॉस – 1 टेबल स्पून

चिल्ली सॉस – 1/2 – 1 छोटी चम्मच

विनेगर – 1 छोटी चम्मच

चिल्ली फ्लेक्स – 1/4 -1/2 आधा छोटी चम्मच

नमक – आधा छोटी चम्मच (स्वादानुसार)

चीनी – 1/2 – 1 छोटी चम्मच

विधि

आलू को अच्छी तरह धोइये, छीलिये और लम्बे पतले टुकड़ों में काट लीजिये. कटे आलू के टुकड़ों को कॉर्न फ्लोर में अच्छी तरह मिलाइये. कॉर्न फ्लोर की कोटिंग आलू के टुकड़ों पर अच्छी तरह से आनी चाहिये.

कॉर्न फ्लोर कोटेड आलू को तलने के लिये कढ़ाई में तेल डालकर गरम कीजिये. तेल गरम होने पर कॉर्न फ्लोर कोटेड आलू डालिये और गोल्डन ब्राउन होने तक तल कर किसी स्टील की छलनी में निकाल लीजिये. सारे आलू के टुकड़े तल कर तैयार कर, छलनी में रख लीजिये.

दूसरा पैन गरम कीजिये, 2 टेबल स्पून तेल डालिये, तेल गरम होने पर अदरक हरी मिर्च डालकर थोड़ा सा भूनिये, एकदम धीमी गैस पर, चिल्ली सॉस, टमाटर सॉस, सोया सॉस डालिये, मिक्स कीजिये. 1 टेबल स्पून कॉर्न फ्लोर को 1/4 कप पानी में लमप्स खतम होने तक घोल कर, भुने मसाले और सॉस में डालकर मिक्स कीजिये, और नमक, चीनी डालकर 1-2 मिनिट तक पका लीजिये, तले हुये आलू डालिये, चिल्ली फ्लेक्स और सिरका विनेगर भी डालकर, अच्छी तरह मिक्स करते हुये पकाइये, आधा हरा धनिया डालकर मिला दीजिये.

चिल्ली पोटेटो तैयार हैं, चिल्ली पोटेटो को प्लेट में निकालिये और हरा धनियां डालकर गार्निश कीजिये. गरमा गरम चिल्ली पोटेटो तैयार है, बहुत ही स्वादिष्ट चिल्ली पोटेटो को परोसिये और खाइये.

Solo Travelling के लिए हो जाएं तैयार, घूमें दुनिया के ये खूबसूरत देश

Solo Travelling : कोई अगर आपसे पूछे कि आपको रात में अकेले घूमने से डर क्यों लगता है? तो शायद आपको जवाब सुरक्षा के इंतजाम को लेकर होगा. लेकिन दुनिया में ऐसी कई जगह हैं, जो सुरक्षा के लिहाज से काफी बेहतर मानी जाती हैं. महिलाओं के लिए सोलो ट्रैवलिंग के लिए ये डेस्टिनेशन काफी खूबसूरत और सुरक्षित मानी जाती हैं.

आइसलैंड

एक खबर के अनुसार आइसलैंड खूबसूरती के साथ सुरक्षित भी है. इसी वजह से यहां सोलो ट्रैवलिंग करने वाली महिलाओं की तादाद सालभर ज्यादा रहती है. यहां जोकुलसरलौंग, पिंगवैलीर, सीक्रेट लगून जैसी जगहें आपको जरूर पसंद आएगी.

औस्ट्रेलिया

travel in hindi

आप औस्ट्रेलिया में अपना लंबा वींकेड बिता सकती हैं. औस्ट्रेलिया में दुनिया के कई देशों से महिलाएं अकेले घूमने आती हैं. आप यहां सिडनी, मेलबर्न, गोल्ड कोस्ट, ब्रिसबेन जैसी खूबसूरत जगह हैं.

मैक्सिको

यहां घूमने वाले ज्यादातर लोगों को यहां का कल्चर बहुत पसंद आता है. मैक्सिको सिटी, ककून, ओसाका, टूलूम जैसी खूबसूरत जगह देखने के लिए दुनिया भर से पर्यटक आते हैं.

न्यूयौर्क

कला प्रेमी महिलाओं के लिए आर्ट म्यूजियम, प्राकृतिक इतिहास का म्यूजियम घूमने के लिेए शानदार जगह हैं. जहां आपको काफी मजा आएगा. नाइटलाइफ की शौकीन लड़कियों के लिए न्यूयौर्क एक बेहतरीन डेस्टिनेशन है.

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टोरंटो, कनाडा

कनाडा को ‘मिनी पंजाब’ भी कहा जाता है क्योंकि यहां पंजाबी और सिख समुदाय के लोग सबसे ज्यादा मिलते हैं. यहां निगेरिया झरना, बर्नफ नेशनल पार्क, टोरंटो टावर जैसी दिलचस्प जगह हैं.

जापान

यहां महिलाओं की सुरक्षा का खास ध्यान रखा जाता है. आप यहां नाइटलाइफ का मजा ले सकती हैं. आपको यहां टोक्यो, ओसाका, क्योटो जैसी खूबसूरत जगहों को देख सकती हैं.

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कोलंबिया

सालसा राजधानी के तौर पर पहचाना जाने वाला कोलंबिया का कैली अपनी पार्टियों और जश्न के लिए भी मशहूर है. सालसा एक तरफ जहां यहां की खासियत है वहीं कैली पयर्टकों के हिसाब से ज्यादा भीड़-भाड़ से मुक्तक शहर है. सालसा के जश्न में रातभर डूबने के बाद अगर आपने कोलंबियन कौफी का मजा उठा सकती हैं. यहां कार्टागेना, बोगोटा, मेडेलिन, टायरोना नेशनल पार्क जैसी खूबसूरत जगह यहां मशहूर है.

रंग जीवन में नया आयो रे: क्यों परिवार की जिम्मेदारियों में उलझी थी टुलकी

घंटी की आवाज से मैं एकदम चौंक उठी. सोचा, बेवक्त कौन आया है नींद में खलल डालने. उठ कर देखा तो डाकिया बंद दरवाजे के नीचे से एक लिफाफा खिसका गया था.

झुंझलाई सी मैं लिफाफा ले कर वहीं सोफे पर बैठ गई. जम्हाई लेते हुए मैं ने सरसरी नजर से देखा, ‘यह तो किसी के विवाह का कार्ड है. अरे, यह तो टुलकी की शादी का निमंत्रणपत्र है.’

सारा आलस, सारी नींद पता नहीं कहां फुर्र हो गई. टुलकी के विवाह के निमंत्रणपत्र के साथ उस का हस्तलिखित पत्र भी था. बड़े आग्रह से उस ने मुझे विवाह में बुलाया था. मेरे खयालों के घेरे में 12 वर्षीया टुलकी की छवि अंकित हो आई.

लगभग 8 वर्ष पूर्व मैं उदयपुर अस्पताल में कार्यरत थी. टुलकी मेरे मकानमालिक की 4 बेटियों में सब से बड़ी थी. छोटी सी टुलकी को घर के सारे काम करने पड़ते थे. भोर में उठ कर वह किसी सुघड़ गृहिणी की भांति घर के कामकाज में जुट जाती. वह पानी भरती, मां के लिए चाय बनाती. फिर आटा गूंधती और उस के अभ्यस्त नन्हेनन्हे हाथ दो परांठे सेंक देते. इस तरह टुलकी तैयार कर देती अपनी मां का भोजन.

टुलकी की मां पंचायत समिति में अध्यापिका थीं. चूंकि स्कूल शहर के पास एक गांव में था, इसलिए उस को साढ़े 6 बजे तक आटो स्टैंड पहुंचना होता था. जल्दबाजी में वह अकसर अपना टिफिन ले जाना भूल जाती. ऐसे में टुलकी सरपट दौड़ पड़ती आटो स्टैंड की ओर और मां को टिफिन थमा आती.

लगभग यही समय होता जब मैं अपनी रात की ड्यूटी पूरी कर घर लौट रही होती. आटो स्टैंड से ही टुलकी वापस मेरे साथ घर की ओर चल पड़ती.

‘आज तुम्हारी मां फिर टिफिन भूल गईं क्या?’ मेरे पूछते ही टुलकी ‘हां’ में गरदन हिला देती. मैं देखती रह जाती उस के मासूम चेहरे को और सोचती, ‘दोनों में मां कौन है और बेटी कौन?’

घर पहुंचते ही टुलकी पूछती, ‘सिस्टर, आप के लिए चाय बना दूं?’

‘नहीं, रहने दे. अभी थोड़ी देर सोऊंगी. रातभर की थकी हूं,’ कहती हुई मैं अपने बालों को जूड़े के बंधन से मुक्त कर देती. मेरे काले घने, लंबे बालों को टुलकी अपलक देखती रह जाती. पर यह मैं ने तब महसूस किया जब एक दिन वह बर्फ लेने आई. उस के कटे बालों को देख मैं हैरानी से पूछ बैठी, ‘बाल क्यों कटवा लिए, टुलकी?’

उस की पहले से सजल मिचमिची आंखों से आंसू बहने लगे. मेरे पुचकारने पर उस के सब्र का बांध टूट गया. भावावेश में वह मेरे सीने से लिपट गई. मेरे अंदर कुछ पिघलने लगा. उस के रूखे बालों में हाथ घुमाते हुए मैं ने पुचकारा, ‘रो मत बेटी, रो मत. क्या हुआ, क्या बात हुई, मुझे बता?’

सिसकियों के बीच उभरते शब्दों से मैं ने जाना कि टुलकी के लंबे बालों में जुएं पड़ गई थीं. मां से सारसंभाल न हो पाई. इसलिए उस के बाल जबरदस्ती कटवा दिए गए.

‘सिस्टर, मुझे आप जैसे लंबे बाल…’ उस ने दुखी स्वर में मुझ से कहा, ‘देखो न सिस्टर, मैं सारे घर का काम करती हूं, मां का इतना ध्यान रखती हूं…क्या हुआ जो मेरे बालों में जुएं पड़ गईं. इस का मतलब यह तो नहीं कि मेरे बाल…’ और उस की रुलाई फिर से फूट पड़ी.

मैं उसे दिलासा देते हुए बोली, ‘चुप हो जा मेरी अच्छी गुडि़या. अरे, बालों का क्या है, ये तो फिर बढ़ जाएंगे, जब तू मेरे जितनी बड़ी हो जाएगी तब बढ़ा लेना इतने लंबे बाल.’

हमेशा चुप रहने वाली आज्ञाकारिणी टुलकी मेरी ममता की हलकी सी आंच मिलते ही पिघल गई थी. पहली बार मुझे महसूस हुआ कि इस अबोध बच्ची ने कितना लावा अपने अंदर छिपा रखा है.

टुलकी की मां उस को जोरजोर से आवाजें देती हुई कोसने लगी, ‘पता नहीं कहां मर गई यह लड़की. एक काम भी ठीक से नहीं करती. बर्फ क्या लेने गई, वहीं चिपक गई.’

मां की चिल्लाहट सुन कर बर्फ लिए वह दौड़ पड़ी. उस दिन के बाद वह हमेशा स्नेह की छाया पाने के लिए मेरे पास चली आती.

एक दिन जब टुलकी अपनी मां के सिर की मालिश कर रही थी तो मैं अपनेआप को रोक नहीं पाई, ‘क्या जिंदगी है, इस लड़की की. खानेखेलने की उम्र में पूरी गृहस्थिन बन गई है. इसे थोड़ा समय खेलने के लिए भी दिया करो, भाभी. तुम इस की सही मां हो, तुम्हें जरा खयाल नहीं आता कि…’

‘क्या करूं, सिस्टर, आज सिर में बहुत दर्द था,’ टुलकी की मां ने अपराधभाव से अपनी नजर नीची करते हुए कहा.

मैं ने टुलकी को उंगली से गुदगुदाते हुए उठने का इशारा किया तो उस ने हर्षमिश्रित आंखों से मुझे देखा और आंखों ही आंखों में कुछ कहा. फिर वह बाहर भाग गई. मुझे लगा, जैसे मैं ने किसी बंद पंछी को मुक्त कर दिया है.

‘आज आटो के इंतजार में सड़क पर 2 घंटे तक खड़ा रहना पड़ा. शायद तेज धूप के कारण सिर में दर्द होने लगा है. सोचा, थोड़ी मालिश करवा लूं, ठीक हो जाएगा,’ टुलकी की मां सफाई देती हुई बोलीं.

शायद कुछ दर्द के कारण या फिर अपनी बेबसी के कारण टुलकी की मां की आंखें नम हो आई थीं. यह देख मैं इस समय ग्लानि से भर गई.

‘क्या करूं सिस्टर, एक लड़के की चाह में मैं ने पढ़ीलिखी, समझदार हो कर भी लड़कियों की लाइन लगा दी. पता नहीं क्याक्या देखना है जिंदगी में…’ कहती हुई वह अपनी बेबसी पर सिसक उठी.

सारा दोष ‘प्रकृति’ पर मढ़ कर वह अपनेआप को तसल्ली देने लगी. मैं सोचने लगी कि इन्होंने तो सारा दोष प्रकृति को दे कर मन को समझा दिया पर टुलकी बेचारी का क्या दोष जो असमय ही उस का बचपन छिन गया.

‘क्या उस का दोष यही है कि वह घर में सब से बड़ी बेटी है?’ मन में बारबार यही प्रश्न घुमड़ रहा था. टुलकी बारबार मेरे मानसपटल पर उभर कर पूछ रही थी, ‘मेरा कुसूर क्या है, सिस्टर?’

उस दिन भी मैं सो रही थी कि एकाएक मुझे लगा कि कोई है. आंखें खोल कर देखा तो टुलकी सामने खड़ी थी. पता नहीं कब आहिस्ता से दरवाजा खोल कर भीतर आ गई थी. वह एकटक मुझे देख रही थी. मैं ने आंखों ही आंखों में सवाल किया, ‘क्या है?’

‘आप को उड़ती हुई पतंग देखना अच्छा लगता है, सिस्टर?’

मैं ने ‘हां’ में गरदन हिलाई और उस को देखती रही कि वह आगे कुछ बोले, पर जब चुप रही तो मैं ने पूछ लिया, ‘क्यों, क्या हुआ?’

वह चुप रही. मन में कुछ तौलती रही कि मुझ से कहे या न कहे. मैं उसे इस स्थिति में देख प्रोत्साहित करते हुए बोली, ‘तुझे पतंग चाहिए?’

उस ने ‘न’ में गरदन हिलाई तो मैं झुंझलाते हुए बोली, ‘तो फिर क्या है?’

वह सहम गई. धीरे से बोली, ‘कुछ नहीं, सिस्टर?’ और जाने को मुड़ी.

‘कुछ कैसे नहीं, कुछ तो है, बता?’ चादर एक तरफ फेंकते हुए मैं उस का हाथ पकड़ कर रोकते हुए बोली.

‘सिस्टर, मैं शाम को छत पर पतंग देख रही थी तो पिताजी ने गुस्से में मेरे बाल खींच लिए. कहने लगे कि नाक कटानी है क्या? लड़की जात है, चल, नीचे उतर. सिस्टर, क्या पतंग देखना बुरी बात है?’

मैं ने बात की तह में जाते हुए पूछ लिया, ‘छत पर तुम्हारे साथ कौन था?’

‘कोई नहीं,’ टुलकी की मासूम आंखें सचाई का प्रमाण दे रही थीं.

‘और पड़ोस की छत पर?’ मैं तहकीकात करते हुए आगे बोली.

‘वहां 2 लड़के थे सिस्टर, पर मैं उन्हें नहीं जानती.’

बस, बात मेरी समझ में आ गई थी कि टुलकी को डांट क्यों पड़ी. सोचने लगी, ‘छोटी सी अबोध बच्ची पर इतनी पाबंदी. पर मैं कर ही क्या सकती हूं?’

टुलकी के पिता पुलिस में सबइंस्पैक्टर थे, सो रोब तो उन के चेहरे व  आवाज में समाया ही रहता था. अपनी बेटियों से भी वह पुलिसिया अंदाज में पेश आते थे. जरा सी भी गलती हुई नहीं कि टुलकी के गालों पर पिताजी की उंगलियों के निशान उभर आते.

एक दिन अचानक टुलकी के पिता की कर्कश आवाज सुनाई दी, ‘मेरी जान खाने को चारचार बेटियां जन दीं निपूती ने, एक भी बेटा पैदा नहीं किया. सारी उम्र हड्डियां तोड़तोड़ कर दहेज जुटाता रहूंगा और बुढ़ापे में ये सब चल देंगी अपने घर. कोई भी सेवा करने वाला नहीं होगा.’

मारपीट और चीखचिल्लाहट की आवाजें आ रही थीं. मैं अस्पताल जाने के लिए तैयार खड़ी थी पर वह सब सुन कर मुझ से नहीं रहा गया. बाहर निकल कर देखा कि टुलकी भय से थरथर कांपती हुई दीवार से सट कर खड़ी है.

‘इंस्पैक्टर साहब, आप भी क्या बात करते हैं. बेटियां जनी हैं तो इस में नीरा भाभी का क्या दोष?’ एक नजर कलाई पर बंधी घड़ी की ओर फेंकते हुए मैं

ने कहा.

मुझे देख वे जरा संयमित हुए. चेहरे पर छलक आए पसीने को पोंछते हुए बोले, ‘अब आप ही बताओ सिस्टर, चारचार बेटियों का दहेज कहां से जुटा पाऊंगा?’

‘अब कह रहे हैं यह सब. आप को पहले मालूम नहीं था जो चारचार बेटियों की लाइन लगा दी?’

मेरे कहने पर वे थोड़ा झुंझलाए. फिर कुछ कहने ही वाले थे कि मैं फिर घुड़कते हुए बोली, ‘आप अकेले तो नहीं कमा रहे, नीरा भाभी भी तो कमा रही हैं.’

‘कमा रही है तो रोब मार रही है. घर का कुछ खयाल नहीं करती. उस छोटी सी लड़की पर पूरे घर का बोझ डाल दिया है.’

‘नौकरी और घरगृहस्थी ने तो भाभी को निचोड़ ही लिया है. अब उन में जान ही कितनी बची है जो आप उन से और ज्यादा काम की उम्मीद करते हैं.’

वे दुखी स्वर में बोले, ‘सिस्टर, आप भी मुझे ही दोष दे रही हैं. देखो, टुलकी का प्रगतिपत्र,’ टुलकी का प्रगतिपत्र आगे करते हुए बोले, ‘सब विषयों में फेल है.’

‘इंस्पैक्टर साहब, आप ही थोड़ा जल्दी उठ कर टुलकी को पढ़ा क्यों नहीं देते?’

‘जा री टुलकी, सिस्टर के लिए चाय बना ला,’ वे ऊंचे स्वर में बोले.

‘देखो सिस्टर, सारा दिन ये खुद ही लड़की से काम करवाते रहते हैं और दोष मुझे देते हैं,’ साड़ी के पल्लू से आंखें पोंछते हुए नीरा भाभी रसोई की ओर बढ़ते हुए बोलीं तो मुझे एकाएक ध्यान आया कि इस पूरे प्रकरण में मुझे 10 मिनट की देर हो गई है. मैं उसी क्षण अस्पताल की ओर चल पड़ी.

उस दिन के बाद से इंस्पैक्टर साहब रोज सुबह टुलकी को पढ़ाने लगे पर उस का पढ़ाई में मन ही नहीं लगता था. उस का ध्यान बराबर घर में हो रहे कामकाज व छोटी बहनों पर लगा रहता. उस के पिता उत्तेजित हो जाते और टुलकी सबकुछ भूल जाती और प्रश्नों के उत्तर गलत बता देती.

टुलकी की शिकायतें अकसर स्कूल से भी आती रहती थीं, कभी समय से स्कूल न पहुंचने पर तो कभी गृहकार्य पूरा न करने पर. ऐसे में टुलकी का अध्यापिका द्वारा दंडित होना तो स्वाभाविक था ही, साथ ही अब घर में भी उसे मार पड़ने लगी. मैं सोचती रह जाती, ‘नन्ही सी जान कैसे सह लेती है इतनी मार.’ पर देखती, टुलकी इस से जरा भी विचलित न होती, मानो दंड सहने की आदत पड़ गई हो.

टुलकी की परीक्षाएं नजदीक थीं. सो, नीरा भाभी छुट्टियां ले कर घर रहने लगीं. अब उस की पढ़ाई पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा.

मातापिता के इस एक माह के प्रयास के कारण टुलकी जैसेतैसे पास हो गई.

एक दिन टुलकी के भाई का जन्म हुआ जो उस के लिए बेहद प्रसन्नता का विषय था. इस से पहले मैं ने कभी टुलकी को इस तरह प्रफुल्लित हो कर चौकडि़यां भरते नहीं देखा था.

मुझे मिठाई का डब्बा देते हुए बोली, ‘जब हम सब चली जाएंगी तब भैया ही मातापिता की सेवा करेगा.’

मैं ने ऐसे ही बेखयाली में पूछ लिया था, ‘कहां चली जाओगी?’

‘ससुराल और कहां,’ मुझे अचरज से देखती टुलकी बोली.

उस के छोटे से मुंह से इतनी बड़ी बात सुन कर उस समय तो मुझे बहुत हंसी आई थी पर अब उसी टुलकी के विवाह का कार्ड देखा तो मन की राहों से उस का मासूम, बोझिल बचपन गुजरता चला गया.

फिर शीघ्र ही मेरा वहां से तबादला हो गया था. अस्पताल की भागदौड़ में अनेक अविस्मरणीय घटनाएं अकसर घटती ही रहती हैं. मैं तो टुलकी को

लगभग भूल ही चुकी थी. किंतु जब उस ने मुझे याद किया और इतने मनुहार से पत्र लिखा तो हृदय की सुप्त भावनाएं जाग उठीं. सोचा, ‘मैं जरूर उस की शादी में जाऊंगी.’

निश्चय करते ही मुझे अस्पताल की थका देने वाली जिंदगी एकाएक उबाऊ व बोझिल लगने लगी. सोच रही थी कि दो दिन पहले ही छुट्टी ले कर चली जाऊं. अपने इस निर्णय पर मैं खुद हैरान थी.

विवाह के 2 दिन पूर्व मैं उदयपुर जा पहुंची. टुलकी ने मुझे दूर से ही देख लिया था. चंचल हिरनी सी कुलांचें मारने वाली वह लड़की हौलेहौले मेरी ओर बढ़ी. कुछ क्षण मैं उसे देख कर ठिठकी और एकटक उसे देखने लगी, ‘यह इतनी सुंदर दिखने लग गई है,’ मैं मन ही मन सोच रही थी कि वह बोली, ‘‘सिस्टर, मुझे पहचाना नहीं?’’ और झट से झुक कर मुझे प्रणाम किया.

मैं उसे बांहों में समेटते हुए बोली, ‘‘टुलकी, तुम तो बहुत बड़ी हो गई हो. बहुत सुंदर भी.’’

मेरे ऐसा कहने पर वह शरमा कर मुसकरा उठी, ‘‘तभी तो शादी हो रही है, सिस्टर.’’

उस से इस तरह के उत्तर की मुझे उम्मीद नहीं थी. सोचने लगी कि इतनी संकोची लड़की कितनी वाचाल हो गई. सचमुच टुलकी में बहुत अंतर आ गया था.

अचानक मेरा ध्यान उस के हाथों की ओर गया, ‘‘यह क्या, टुलकी, तुम ने तो अपने हाथ बहुत खराब कर रखे हैं, जरा भी ध्यान नहीं दिया. बड़ी लापरवाह हो. अरे दुलहन के हाथ तो एकदम मुलायम होने चाहिए. दूल्हे राजा तुम्हारा हाथ अपने हाथ में ले कर क्या सोचेंगे कि क्या किसी लड़की का हाथ है या…?’’ मैं कहे बिना न रह सकी.

मेरी बात बीच में ही काटती हुई टुलकी उदास स्वर में बोल उठी, ‘‘सिस्टर, किसे परवा है मेरे हाथों की, बरतन मांजमांज कर हाथों में ये रेखाएं तो अब पक्की हो गई हैं. आप तो बचपन से ही देख रही हैं. आप से क्या कुछ छिपा है.’’

‘‘अरे, फिर भी क्या हुआ. तुम्हारी मां को अब तुम से कुछ समय तक तो काम नहीं करवाना चाहिए था,’’ मैं ने उलाहना देते हुए कहा.

‘‘मेरा जन्म इस घर में काम करने के लिए ही हुआ है,’’ रुलाई को रोकने का प्रयत्न करती टुलकी को देख मेरे अंदर फिर कुछ पिघलने लगा. मन कर रहा था कि खींच कर उस को अपने सीने में भींच लूं. उसे दुनिया की तमाम कठोरता से बचा लूं. मेरी नम आंखों को देख कर वह मुसकराने का प्रयत्न करते हुए आगे बोली, ‘‘मैं भी आप से कैसी बातें करने लग गई, वह भी यहीं सड़क पर. चलिए, अंदर चलिए, सिस्टर, आप थक गई होंगी,’’ मुझे अंदर की ओर ले जाती टुलकी कह उठी, ‘‘आप के लिए चाय बना लाती हूं.’’

बड़े आग्रह से उस ने मुझे नाश्ता करवाया. मैं देख रही थी कि यों तो टुलकी में बड़ा फर्क आ गया है पर काम तो वह अब भी पहले की तरह उन्हीं जिम्मेदारियों से कर रही है.

मेरे पूछने पर कहने लगी, ‘‘मां तो नौकरी पर रहती हैं, उन्हें थोड़े ही मालूम है कि घर में कहां, क्या पड़ा है. मैं न देखूंगी तो कौन देखेगा. और यह टिन्नू,’’ अपनी छोटी बहन की ओर इशारा करते हुए कहने लगी, ‘‘इसे तो अपने शृंगार से ही फुरसत नहीं है. अब देखो न सिस्टर, जैसे इस की शादी हो रही हो. रोज ब्यूटीपार्लर जाती है.’’

‘‘दीदी, आज आप की पटोला साड़ी मैं पहन लूं?’’ अंदर आती टिन्नू तुनक कर बोली.

‘‘पहन ले, मोपेड पर जरा संभलकर जाना.’’

‘‘पायलें भी दो न, दीदी.’’

‘‘देख, तू ने लगा ली न वही बिंदी. मैं ने तुझे मना किया था कि नहीं?’’

‘‘मैं ने मां से पूछ कर लगाई है,’’ इतराती हुई टिन्नू निडर हो बोली.

‘‘मां क्या जानें कि मैं क्यों लाई?’’

‘‘आप और ले आना, मुझे पसंद आई तो मैं ने लगा ली. इस पटोला पर मैच कर रही है न. अब मुझे जल्दी से पायलें निकाल कर दे दो. देर हो रही है. अभी बहुत से कार्ड बांटने हैं.’’

‘‘नहीं दूंगी.’’

‘‘तुम नहीं दोगी तो मैं मां से कह कर ले लूंगी,’’ ठुनकती हुई टिन्नू टुलकी को अंगूठा दिखा कर चली गई.

‘‘देखो सिस्टर, मेरा कुछ नहीं है. मैं कुछ नहीं, कोई अहमियत नहीं,’’ भरे गले से टुलकी कह रही थी.

‘‘टुलकी, ओ टुलकी,’’ तभी उस की मां की आवाज सुनाई दी, ‘‘हलवाई बेसन मांग रहा है.’’

‘‘टुलकी, जरा चाकू लेती आना?’’ किसी दूसरी महिला का स्वर सुनाई दिया.

‘‘दीदी, पाउडर का डब्बा कहां रखा है?’’ टुलकी की छोटी बहन ने पूछा.

‘‘क्या झंझट है, एक पल भी चैन नहीं,’’ झुंझलाती हुई वह उठ खड़ी हुई.

मैं बैठी महसूस कर रही थी कि विवाह के इन खुशी से भरपूर क्षणों में भी टुलकी को चैन नहीं.

दिनभर के काम से थकी टुलकी अपने दोनों हाथों से पैर दबाती, उनींदी आंखें लिए ‘गीतों भरी शाम’ में बैठी थी और ऊंघ रही थी. उल्लास से हुलसती उस की बहनें अपने हाथों में मेहंदी रचाए, बालों में वेणी सजाए, गोटा लगे चोलीघाघरे में ढोलक की थाप पर थिरक रही थीं.

सभी बेटियां एक ही घर में एक ही मातापिता की संतान, एक ही वातावरण में पलीबढ़ीं पर फिर भी कितना अंतर था. कुदरत ने टुलकी को ‘बड़ा’ बना कर एक ही सूत्र में मानो जीवन की सारी मधुरता छीन ली थी.

टुलकी के जीवन की वह सुखद घड़ी भी आई जब द्वार पर बरात आई, शहनाई बज उठी और बिजली के नन्हे बल्ब झिलमिला उठे.

मैं ने मजाक करते हुए दुलहन बनी टुलकी को छेड़ दिया, ‘‘अब मंडप में बैठी हो. किसी काम के लिए दौड़ मत पड़ना.’’

धीमी सी हंसी हंसती वह मेरे कान में फुसफुसाई, ‘फिर कभी इधर लौट कर नहीं आऊंगी.’

बचपन से चुप रहने वाली टुलकी के कथन मुझे बारबार चौंका रहे थे. इतना परिवर्तन कैसे आ गया इस लड़की में?

मायके से विदा होते वक्त लड़कियां रोरो कर कैसा बुरा हाल कर लेती हैं पर टुलकी का तो अंगप्रत्यंग थिरक रहा था. मुझे लगा, सच, टुलकी के बोझिल जीवन में मधुमास तो अब आया है. उस के वीरान जीवन में खुशियों के इस झोंके ने उसे तरंगित कर दिया है.

विदा के झ्रसमय टुलकी के मातापिता, भाई और बहनों की आंखों में आंसुओं की झड़ी लगी हुई थी लेकिन टुलकी की आंखें खामोश थीं, उन में कहीं भी नमी दिखाई नहीं दे रही थी. इसलिए वह एकाएक आलोचना व चर्चा का विषय बन गई. महिलाओं में खुसरफुसर होने लगी.

लेकिन मैं खामोश खड़ी देख रही थी बंद पिंजरे को छोड़ती एक मैना की ऊंची उड़ान को. एक नए जीवन का स्वागत वह भला आंसुओं से कैसे कर सकती थी.

एक दिन में 60 सिगरेट पीने वाले ऐक्टर Nana Patekar ने अपनी बहन की खातिर छोड़ी हमेशा के लिए सिगरेट

बौलीवुड के प्रसिद्ध ऐक्टर नाना पाटेकर (Nana Patekar) जो जल्द ही अनिल शर्मा की डायरेक्शन में बनी फिल्म वनवास में नजर आने वाले हैं . उन्होंने अपने अभिनय करियर में एक से एक बेहतरीन फिल्में देकर बौलीवुड में अपनी अलग पहचान बनाई है. नाना पाटेकर अपने सशक्त अभिनय के लिए तो पहचाने जाते हैं लेकिन साथ ही अपने गुस्सैल स्वभाव के वजह से भी हमेशा चर्चा में बने रहे हैं . उनके गुस्से का यह आलम था की शूटिंग के दौरान अगर किसी का मोबाइल बज जाए तो उस इंसान की खैर नहीं होती थी.

नाना पाटेकर के गुस्से से हर कोई डरता था. यही वजह है कि एक अच्छे ऐक्टर होने के बावजूद उनका अभिनय करियर ज्यादा लंबा नहीं रहा. लेकिन ऊपरी तौर पर सख्त और गुस्सैल दिखने वाले नाना पाटेकर दिल से बहुत इमोशनल है. जिसके चलते वह अपने परिवार के सदस्यों से दिल से जुड़े हुए हैं. अपने परिवार के लोगों से बहुत प्यार करते हैं. इसी प्यार के चलते नाना पाटेकर ने अपनी बहन की खातिर सिगरेट पीना छोड़ दिया.

नाना पाटेकर के अनुसार वह 1 दिन में 60 सिगरेट पीते थे. उनको सिगरेट की इतनी लत थी कि वह नहाते हुए भी सिगरेट पीते थे. नाना पाटेकर के अनुसार सिगरेट की बदबू की वजह से कोई उनके साथ कार में भी नहीं बैठता था ,क्योंकि जहां भी वह बैठते थे वहां सिगरेट की स्मेल आती थी. नाना के अनुसार एक दिन जब मै अपनी बहन के सामने खांस रहा था तो उसने मुझे कहा कि मुझे और क्या क्या दुख देखना बाकी है.

दरअसल मेरी बहन का बेटा छोटी उम्र में ही मर गया था और मेरी बहन अपने बेटे की मौत से बहुत दुखी थी. वह मुझे भी बहुत प्यार करती है. इसलिए उसने मुझे यह बात कही. उसकी यह बात मेरे दिल को इतनी छू गई कि मैंने उसी दिन से सिगरेट पीना छोड़ दिया. जब मैंने लगातार 5 दिन सिगरेट नहीं पी  तो बहन को फोन करके कहा मैने पांच दिन से सिगरेट नही पी, अब आगे से मैं सिगरेट नहीं पिऊंंगा. यही बात मैं अपने आप को रोज बोलता हूं ताकि मुझे हमेशा याद रहे कि मुझे सिगरेट नहीं पीना है. अपनी बहन के प्यार में अब तो कई साल बीत गए मैंने सिगरेट को हाथ नहीं लगाया.

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