साउथ और बौलीवुड स्टार Nagarjuna के घर आई दोहरी खुशी, दो बेटों की शादी का जश्न शुरू

साउथ और बौलीवुड में काम कर चुके नामी गिरामी एक्टर नागार्जुन (Nagarjuna) के घर में दोहरी खुशी आ गई है . उनकी यह खुशी उनके दोनों बेटों से रिलेटेड है. जल्द ही नागार्जुन के घर में दोदो बार शहनाइयां बजने वाली है. जहां एक और नागार्जुन के छोटे बेटे ने हाल ही में सगाई की है. वहीं उनके बड़े बेटे की 7 दिन बाद शादी होने वाली है. नागार्जुन के बड़े बेटे नागा चैतन्य शोभिता धुलिपाला के संग सात फेरे लेने वाले हैं.

जिसका जश्न बहुत ही जोरशोर से मनाया जाने वाला है. अब दूसरे छोटे बेटे का भी शादी के लिए घोड़ी पर चढ़ने का समय आ गया है. नागार्जुन के छोटे बेटे अखिल अक्कीनेनी ने 30 साल की उम्र में अपनी प्रेमिका 27 वर्षीय जैनब रावदजी से सगाई कर ली है. नागार्जुन ने अपने छोटे बेटे की सगाई होने की खुशी को सोशल मीडिया पर शेयर किया है.  नागार्जुन ने अपनी बहू जैनब का अपने परिवार में गर्म जोशी के साथ स्वागत किया है यह कहते हुए कि मुझे खुशी है की जैनब अब हमारे घर की बहू बन रही है.

नागार्जुन के बेटे अखिल भी अपनी सगाई को लेकर बहुत खुश है .आखिल ने अपनी और जैनब की रोमांटिक फोटोज शेयर की है अखिल की पत्नी जैनब एक आर्टिस्ट है, जो हैदराबाद से हैं और वह अपनी एब्स्ट्रेक्ट पेंटिंग के लिए जानी जाती हैं. गौरतलब है अखिल की यह दूसरी सगाई है इससे पहले उनकी सगाई श्रेया भूपाल जो की बिजनेसमैन जीवीके रेड्डी की बेटी है उनसे हुई थी लेकिन किन्हीं कारणों से सगाई नहीं टिक पाई. फिलहाल अखिल जैनब के साथ सगाई करके बेहद खुश है. शादी की डेट अभी फाइनल नहीं हुई है . बहरहाल 4 दिसंबर को नागार्जुन के बड़े बेटे नागा चैतन्य और शोभित धुलीपाला की शादी है जिसकी तैयारियां जोरोंशोरों से चल रही है.

क्या Aishwarya Rai की अपनी भाभी श्रीमा राय से बिगड़े रिश्ते, सोशल मीडिया पर वायरल हुआ ये पोस्ट

Shrima Rai Post For Aishwarya Rai: ऐश्वर्या राय अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर सुर्खियों में छाई हुई हैं. खबरों की माने तो अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय के बीच कुछ ठीक नहीं चल रहा है. हालांकि हाल ही में अमिताभ बच्चन ने अपने बेटेबहू की तलाक की खबरों पर बिना किसी का नाम लिए वीराम लगाई थी. तो वहीं अभिषेक बच्चन अपना फिल्म प्रोमट करते समय ऐश्वर्या राय को याद कर उनकी तारीफ भी की थी.

क्या ऐश्वर्या की अपनी भाभी से नहीं बनती है ?

खबरों के मुताबिक ऐश्वर्या राय की अपनी भाभी से भी नहीं बनती है. इसी बीच एक सोशल मीडिया पर पोस्ट भी वायरल हो रहा है, जिसमें साफ नजर आ रहा है कि ऐश्वर्या और उनके भाभी के बीच कुछ तो गड़बड़ चल रही है. दरअसल, ऐश्वर्या राय की भाभी श्रीमा राय के एक कमेंट से अंदाजा लगाया जा रहा है कि दोनों भाभीननद के रिश्ते ठीक नहीं चल रहे.

एक यूजर के सवाल पर भड़कीं श्रीमा राय

बीते दिनों श्रीमा राय ने एक पोस्ट किया था, जिसमें उन्होंने ऐश्वर्या राय के लिए कुछ ऐसा लिख दिया, जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. दरअसल, कुछ महीनों पहले श्रीमा राय (Shrima Rai) ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर फोटो शेयर की थी, जिसमें वह अपने ससुराल वालों के साथ नजर आ रही थीं. तस्वीर में श्रीमा के पति आदित्य राय, उनके दोनों बच्चे और सासु मां नजर आईं. इस तस्वीर पर लोगों ने खूब प्यार लुटाया, लेकिन एक यूजर ने श्रीमा राय से कुछ ऐसा सवाल कर दिया कि वह भड़क गईं.

श्रीमा ने ऐश्वर्या के बारे में दिया ये जवाब

यूजर ने पूछा कि वह कभी ऐश्वर्या राय और आराध्या के साथ तस्वीर शेयर क्यों नहीं करती हैं. उनके सोशल मीडिया अकाउंट पर दोनों के साथ एक भी तस्वीर नहीं है. इस सवाल का श्रीमा ने जवाब में लिखा है, आप उनकी सभी तस्वीरें देखने के लिए उनके पेज पर जा सकते हैं और वहां आपको केवल उनकी तस्वीरें मिलेंगी और हमारी एक भी तस्वीर नहीं मिलेगी. इससे आपको संतुष्टि मिलनी चाहिए.’

साल 2019 में ऐश्वर्या राय ने भाभी संग फोटो किया था शेयर

श्रीमा का ये जवाब ऐश्वर्या के फैंस को पसंद नहीं आया और लोगों ने उन्हें ट्रोल करना शुरू कर दिया. हालांकि, श्रीमा राय को यूजर्स की तरफ से भी जवाब मिला है. दरअसल, ऐश्वर्या राय ने साल 2019 में अपने भाई और भाभी संग कुछ फोटोज सोशल मीडिया पर शेयर की थी. जिसे ऐक्ट्रैस ने फैमिली टाइम बताया था.

शुक्रिया दोस्त: शालू ने क्या किया था

एसएससीकंपीटिशन ऐग्जाम के औनलाइन फार्म में परीक्षा केंद्र चुनने वाला औप्शन कौलम भरते समय शालू ने एक पल को कुछ सोचा और फिर जयपुर पर क्लिक कर दिया. हालांकि उस के  अपने शहर जोधपुर में भी परीक्षा केंद्र प्रस्तावित था, मगर शालू को तो एक बहाना चाहिए था साहिल से मिलने का और वह इस से बेहतर क्या हो सकता था. इस बहाने को तो मांपापा भी नकार नहीं सकते. मन ही मन अपने प्यार से मिलने की सुखद कल्पनाओं में खोई शालू ने फार्म भरने की बाकी प्रक्रिया पूरी की और एक बार फिर परीक्षा केंद्र जयपुर पर नजर डाल कर खुद को आश्वस्त किया और फार्म सबमिट कर दिया.

शालू ने यह बात किसी को नहीं बताई थी, साहिल को भी नहीं. लगभग 1 महीने बाद एसएससी की बैवसाइट पर ऐग्जाम से संबंधित सूचना अपलोड हुई तो वह खुशी से झम उठी. 4 सप्ताह के बाद यह कंपीटीशन होने वाला है और उस का परीक्षा केंद्र जैसाकि उस ने चाहा था, जयपुर ही आया है.

शाम को उस ने पापा को यह खबर दी तो उन्होंने तो कुछ नहीं कहा, मगर मां बोली, ‘‘जोधुपर में इस का सैंटर नहीं था क्या, जयपुर क्यों आया है?’’

शालू को कोई जवाब नहीं सूझ, मगर पापा ने अपने अनुभव के आधार पर कहा, ‘‘हो सकता है, यहां कैडिडेट ज्यादा हो गए हों, इसलिए सैंटर बदल दिया गया हो. कोई बात नहीं. जयपुर भी ज्यादा दूर नहीं है. तुम बस मन लगा कर तैयारी करो. सिर्फ फार्म भरने और परीक्षा देने से ही ऐग्जाम पास नहीं हुआ करते. कुछ बनने के लिए जीजान लगा देनी पड़ती है. दिनरात मेहनत करनी पड़ती है.’’

सुन कर शालू की जान में जान आई. पापा की बातों को उस ने एक कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया. उसे तो इस ऐग्जाम से नहीं बल्कि जयपुर जाने से मतलब था.

यहां तक तो सबकुछ उस की प्लानिंग के हिसाब से हो गया था. एकांत पाते ही

उस ने साहिल को मैसेज कर दिया कि वह 4 सप्ताह बाद जयपुर आ रही है. सुन कर साहिल भी उस से मिलने के सपने संजोने लगा. अब यह देखना था कि कुछ ऐसा प्लान बनाया जाए कि मांपापा उसे अकेली जयपुर भेजने को तैयार हो जाएं वरना उस की सारी प्लानिंग पर पानी फिर जाएगा. शालू मन ही मन कामना करने लगी

कि अपने प्यार को पाने का यह अवसर उसे अवश्य मिले.

शालू और साहिल दोनों ने एक ही कालेज से एमबीए की डिगरी ली थी. जहां साहिल पढ़ने में बहुत तेज था वहीं शालू बला की खूबसूरत थी. दोनों को ही अपनीअपनी खूबियों का एहसास था और उन पर गुरूर भी. दोनों का ऐटीट्यूड देखते ही बनता था. शुरुआती नोकझेंक के बाद दोनों की दोस्ती हो गई जो साल बीततेबीतते आखिर प्यार में बदल ही गई. कालेज में उन की जोड़ी हिट थी.

शालू की इच्छा थी कि कालेज खत्म होने के बाद वे दोनों शादी के बंधन में बंध जाएं, इसलिए वह बारबार साहिल पर कैंपस इंटरव्यू में जाने और जौब चुनने के लिए दबाव बना रही थी. वहीं साहिल अपने लिए किसी बेहतर मुकाम की तलाश में जुटा था. वह कालेज के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठ कर अपनी मेहनत को आजमाना चाहता था, इसलिए शालू की नाराजगी के बावजूद उस ने जयपुर के एक जानेमाने कोचिंग इंस्टिट्यूट में एडमिशन ले लिया.

‘‘कुछ बनूंगा तभी तो तुम्हें बेहतर कल दे पाऊंगा न,’’ साहिलका अपना तर्क था, जिस ने शालू को चुप करवा दिया और फिर साहिल उसे अपनी यादों के सहारे छोड़ कर जयपुर चला गया.

हालांकि फोन और सोशल मीडिया पर वे लगातार जुड़े हुए थे, मगर शालू को इतने भर से सब्र नहीं होता था. शालू के लिए जब साहिल से दूरी सहन करना मुश्किल होने लगा तो उस ने भी जयपुर जा कर कोचिंग करने की, जिद अपने पापा से की मगर लाख सिर पटकने के बाद भी उस के घर वाले इस बात के लिए राजी नहीं हुए. हां उसे वहीं जोधपुर में ही एक इंस्टिट्यूट में एडमिशन जरूर दिला दिया गया.

अब शालू के पास साहिल से मिलने का कोई और तरीका नहीं था, इसलिए उस ने यह तरकीब लगाई. अगले ही संडे शालू का ऐग्जाम था. शायद कुदरत ने उस की प्रार्थना सुन ली थी. 2 दिन बाद अचानक पापा का बीपी हाई हो

गया और डाक्टर ने उन्हें कंप्लीट बैडरैस्ट की सलाह दी तो मां का भी उन के  पास रुकना जरूरी हो गया.

‘‘रहने दे ऐग्जाम. वैसे भी कोई तैयारी तो तुम ने की नहीं. क्यों बिना मतलब समय और पैसा बरबाद कर रही हो,’’ मां ने कहा तो शालू रोंआसी हो गई.

‘‘अकेली मैनेज कर लोगी सब?’’ पापा थोड़े पिघले.

‘‘हांहां पापा, क्यों नहीं. फिर मेरी सहेली रिया भी तो वहीं जयपुर में ही है. मैं वहां उस

के पास चली जाऊंगी… एक ही दिन की तो बात है. शनिवार की रात को जाऊंगी और सोमवार

को सुबह वापस पहुंच जाऊंगी,’’ शालू अपनी योजना की कामयाबी पर मन ही मन खुश होती हुई बोली.

तय कार्यक्रम के अनुसार शालू रविवार सुबह लगभग 5 बजे जयपुर पहुंच गई. साहिल उसे लेने स्टेशन आया था. उसे देखते ही शालू के सब्र का बांध टूट गया और वह बिना किसी की परवाह किए उस से लिपट गई.

साहिल ने घबरा के इधरउधर देखा और उसे अपने से अलग किया. औटो से दोनों रिया के कमरे पर पहुंचे. रास्ते भर शालू साहिल से चिपक कर बैठी थी. कभी उस के कंधे पर सिर रखती

तो कभी उस का हाथ अपने हाथ में ले कर सहलाने लगती. साहिल बहुत असहज हो रहा

था. वह शालू को रिया के कमरे पर छोड़ कर

9 बजे वापस आने का वादा कर के अपने हास्टल चला गया.

दोपहर 2 बजे ऐग्जाम खत्म होने पर साहिल और शालू वापस रिया के कमरे पर आ गए. रिया उन की तड़प समझ रही थी इसलिए वह अपने फ्रैंड्स के साथ मूवी देखने का बहाना बना कर बाहर चली गई. अब शालू और साहिल दोनों कमरे में अकेले थे. एकांत पाते ही शालू फिर से साहिल से लिपट गई. अब साहिल का भी अपनेआप से निमंत्रण खत्म हो चुका था और फिर 2 जवान दिलों का 1 होने में वक्त ही कितना लगता है. आज दोनों के बीच की वह दीवार भी ढह गई थी जिसे दोनों ने शादी तक के लिए बचा कर रखा था. दोनों को होश तब आया जब दिन ढलने पर रिया वापस आई.

साहिल ने रात स्टेशन पर आने का वादा कर के शालू से विदा ली.

‘‘सखी, ये आंखें इतनी लाल क्यों हैं?’’ रिया ने उस के जाते ही चुटकी ली.

‘‘थैंक्स रिया. आज तुहारी वजह से मुझे जो खुशी मिली है उसे मैं बयां नहीं कर सकती. तुम ने मुझे जिंदगीभर का कर्जदार बना लिया,’’ शालू ने रिया के हाथ को कस कर थाम लिया.

‘‘दोस्त, किसी पर एहसान नहीं किया करते. वक्त आने पर वसूल लिया करते हैं,’’ रिया हंस दी तो शालू भी मुसकरा दी.

‘‘और सुना क्याक्या गुजरी जब मिल बैठे थे दीवाने?’’ रिया ने फिर शालू को छेड़ा.

‘‘चल यार. तू भी क्या याद रखेगी. यह देख,’’ कहते हुए शालू ने अपने मोबाइल को औन किया और एक वीडियो रिया को दिखाया. देखते ही रिया की आंखें फटी की फटी रह गईं. यह शालू और साहिल के अंतरंग पलों का वीडियो था. रिया ने देखा शालू का चेहरा अब भी शर्म से लाल हो उठा था.

‘‘यह कैसे?’’ रिया के मुंह से शब्द ही नहीं निकल रहे थे.

‘‘मैं ने सामने टेबल पर मोबाइल सैट कर रख दिया था. इसे मैं अपने प्यार की निशानी के रूप में साथ ले जा रही हूं. जब भी साहिल की याद आएगी, मैं इसे देख कर अपनी प्यास बुझ लिया करूंगी,’’ साहिल के प्यार में आंकठ डूबी शालू ने खोईखोई आवाज में कहा.

‘‘सोच लो शालू. कहीं तुम्हारी यह नादानी तुम्हें किसी मुसीबत में न डाल दे,’’ रिया ने उसे चेताया, मगर शालू ने उस पर कान नहीं दिए.

सबकुछ वैसा ही हुआ जैसा शालू ने सोचा था. साहिल से निर्विघ्न

मिल कर वह आसमान में उड़ी जा रही थी. जोधपुर आ कर वह भी अपनी पढ़ाई में जुट गई. एक दिन व्हाट्सऐप पर रिया का भेजा वीडिया देख कर शालू के होश उड़ गए. यह उस का और साहिल का वही वीडियो था जो उस ने रिया को दिखाया था.

‘‘रिया, तुम तो छिपी रूस्तम निकली.

आंखों से यह काजल कब चुराया,’’ शालू ने अपनी आवाज को नौर्मल करते हुए रिया को

फोन लगाया.

‘‘बस तभी जब तुम चेंज करने बाथरूम में गई थी. खैर, ये सब छोड़… सुन मुझे अर्जैंट कुछ रुपयों की जरूरत है. यही कोई 5 हजार. तू प्लीज जल्दी व्यवस्था कर के भिजवा दे,’’ रिया बिना वक्त गंवाए असली मुद्दे पर आ गई थी.

शालू सब समझ गई कि वह ब्लैकमेलिंग का शिकार हो चुकी है. वह उस वक्त को

कोसने लगी जब उस ने यह आत्मघाती कदम उठाया था.

हालांकि जयपुर से लौटने के बाद खुद शालू ने भी कई बार अपनेआप को इस कृत्य के लिए कठघरे में खड़ा किया था. कोसा था उस घड़ी को जब वह अपनेआप पर काबू नहीं रख पाई थी. काश उस ने अपना कौमार्य पहली रात को समर्पित करने के लिए संभाल कर रखा होता. बेशक उस ने साहिल को भावी पति के रूप में देख कर ही यह कदम उठाया था, मगर क्या ही अच्छा होता यदि यह खास तोहफा अपने साहिल को उसी रात दिया होता.

यह तो शुक्र है कि गर्भ ठहरने जैसी किसी आपात स्थिति में नहीं पहुंची वरना क्या करती वह. कैसे अपने घर वालों का सामना करती. हो सकता है वह आत्महत्या जैसा कायरतापूर्ण कदम ही उठा लेती. साहिल के पास भी किस मुंह से जाती, वह खुद भी कहां अपने पैरों पर खड़ा था जो समाज से लड़ लेता.

शालू को यों तो साहिल पर पूरा भरोसा था, मगर खुदा न खास्ता कहीं दगा दे दिया

तो? कहीं समाज और परिवार के दबाव में आ कर उसे कहीं और शादी करनी पड़ी तो? कहीं उस के भावी पति को भनक लग गई कि वह वर्जिन

नहीं है तो? शालू जितना सोचती उतना ही उलझती जा रही थी.

जो किया वह तो क्षणिक ज्वार था, मगर यह वीडियो बनाने की नासमझ वह कैसे कर बैठी. और तो और खुद ही रिया

के सामने वायरल भी कर दिया. उस से बड़ा बेवकूफ शायद ही कोई और हो. यह वीडियो

अब शालू के लिए गले की हड्डी बनने लगा था जिसे न डिलीट करते बन रहा था और न ही मोबाइल में रखते. कहीं किसी और के हाथ लग गया तो… इज्जत का फलूदा बन जाएगा. वह कोई निर्णय ले पाती इस से पहले ही रिया ने उसे एहसास करा दिया कि वह कितनी बड़ी मुसीबत में फंस चुकी है.

शालू को अपनेआप पर बहुत गुस्सा आ रहा था. एक तो उस ने ऐसी बचकानी हरकत की थी तिस पर भी ‘आ बैल मुझे मार’ वाली कहावत सच कर डाली. अरे, क्या जरूरत थी वह वीडियो रिया को दिखाने की? मगर अब क्या हो सकता है. अब तो तीर कमान से निकल चुका है. कुछ समझदारी से ही काम लेना पड़ेगा वरना यह मुसीबत और भी बढ़ सकती है. शालू के दिमाग में योजनाएं बनतीबिगड़ती जा रही थीं.

शालू ने जैसेतैसे कर के रिया को 5 हजार रुपए दिए, मगर वह जानती थी कि बात यहीं खत्म नहीं हुई है. अब रिया उसे सोने का अंडा देने वाली मुरगी समझने लगेगी. अपने पैरों पर कुल्हाड़ी वह खुद ही मार चुकी है. अब इस

कटे हुए पैर पर इलाज भी खुद ही करना पड़ेगा और वह भी इन्फैक्शन फैलने से पहले. उसे कोई ऐसा ठोस कदम उठाना पड़ेगा जिस से सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. कैसे भी कर के यह वीडियो रिया के मोबाइल से डिलीट करना

ही पड़ेगा.

शालू ने रिया की मां को फोन कर के पता लगाया कि वह इस संडे घर आने वाली हैं. शालू उस से मिलने पहुंच गई.

‘‘अरे शालू तुम? मैं तुम्हें ही याद कर रही थी,’’ उसे देख कर रिया चौंकी. हालांकि उस ने विडियो का कोई जिक्र नहीं किया. शालू भी अनजान बनते हुए उस से गरमजोशी से मिली. शालू ने पानी मांगा तो रिया उठ कर अंदर गई. शालू ने फौरन उस का मोबाइल उठाकर देखा मगर यह क्या? मोबाइल तो पासवर्ड से लौक

था. शालू निराश हो गई. मगर तभी कुछ सोच

कर उस ने मोबाइल से मैमोरी कार्ड निकाल

कर अपने पर्स में रख लिया. अब तक रिया पानी ले कर आ गई थी. शालू ने थोड़ी देर इधरउधर की बातें कीं और चलने को हुई.

‘‘शालू, यार मुझे 3 हजार रुपए और चाहिए. मैं परसों वापस जा रही हूं, तू प्लीज. कल तक इंतजाम कर देना,’’ रिया ने कहा.

‘‘कोशिश करती हूं. कल शाम तू घर आ जाना, रुपए वहीं दे दूंगी,’’ शालू बुझे मन से हामी भर कर बोली.

शालू ने घर जा कर रिया का मैमोरी कार्ड चैक किया, मगर उस में वह वीडियो नहीं था जिस की उसे तलाश थी. इस का मतलब है कि वीडियो उस के मोबाइल की हार्ड डिस्क में है. अगर किसी तरह वह मोबाइल फौर्मेट कर दिया जाए तो बात बन सकती है. शालू ने मन ही मन कुछ सोच लिया.

अगले दिन शाम को रिया तय समय पर शालू के घर पहुंची. शालू उसे अपने कमरे में बैठा कर चाय बनाने रसोई में चली गई. रिया टाइम पास करने के लिए अपने मोबाइल में कोई गेम खेलने लगी.

‘‘रिया, वहां अकेली बोर हो रही हो, यहीं रसोई में आ जाओ,’’ शालू ने आवाज लगाई.

रिया उठ कर शालू के पास चली गई. वह मोबाइल के गेम में इतनी खोई हुई थी कि शालू के पास खड़ीखड़ी भी कीबोर्ड पर उंगलियां ही चला रही थी. शालू ने कनखियों से देखा और अचानक ही रिया को कुहनी मार दी. रिया के हाथ से छिटक कर मोबाइल नीचे गिर गया. शालू अफसोस करते हुए ‘सौरीसौरी’ कहने लगी और लपक कर मोबाइल को चाय के पतीले में खौलते हुए पानी में डाल दिया.

रिया ने तुरंत आंच बंद कर के मोबाइल को पानी से बाहर निकाला, मगर बहुत कोशिश करने पर भी वह औन नहीं हुआ.

‘‘अब इसे ठीक करवाने के चार्जेज भी तुम्हें ही देने होंगे,’’ रिया ने खा जाने वाली नजरों से शालू को घूरा.

‘‘सौरी यार. चल पास ही मोबाइल रिपेयर की शौप है, इसे अभी ठीक करवा लेते हैं,’’ शालू ने सहानुभूति जताते हुए कहा.

वह रिया को ले कर शौप पर गई. मोबाइल को चैक करने के बाद मोबाइल मैकेनिक

ने उन्हें बताया कि उबलते पानी में गिरने के कारण मोबाइल की आईसी खराब हो गई है

और इसे बदलना पड़ेगा. इस के साथ ही इस

के अंदर स्टोर किया हुआ सारा डाटा भी करप्ट

हो गया.

शालू के कान यही तो सुनने के लिए

तरस रहे थे. वहीं रिया के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं.

‘‘सौरी यार. मेरी वजह से तुम्हारा मोबाइल खराब हो गया. मुझे बहुत बुरा लग रहा है, तुम्हारी सोने का अंडा देने वाली मुरगी मर गई,’’ शालू मुसकराई.

‘‘ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है, वह वीडियो मेरे मैमोरी कार्ड में था, इस में नहीं,’’ रिया ने अपना आखिरी तीर छोड़ा, तो शालू ने पर्स में से मैमोरीकार्ड निकाल कर उस के 2 टुकड़े किए और हवा में उछाल दिए और कहा, ‘‘बेचारा, मैमोरी कार्ड. यह भी गया.’’

रिया देखती रह गई.

‘‘रिया, तुम चाहे जैसी भी हो, मेरी गुरु हो. तुम ने मुझे कई बातें सिखाई हैं जैसेकि ऐसी बेवकूफियां नहीं करनी चाहिए जो यह कि कभी भी किसी पर आंख बंद कर भरोसा नहीं करना चाहिए, यह कि अपने राज अपनेआप से भी छिपा कर रखने चाहिए आदिआदि. शुक्रिया दोस्त,’’ कह कर शालू मुसकरा दी.

फिर शालू ने कुछ पल सोचा और फिर अपने मोबाइल में सेव वह वीडियो भी डिलीट कर के समस्या की जड़ को ही खत्म कर दिया. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी और रिया को वहीं असमंजस में छोड़ कर शालू चली गई.

रिया अब भी वहीं खड़ी उसे आत्मविश्वास के साथ जाते हुए देख रही थी.

इंग्लिश रोज: क्या सच्चा था विधि के लिए जौन का प्यार

वह आज भी वहीं खड़ी है. जैसे वक्त थम गया है. 10 वर्ष कैसे बीत जाते हैं…? वही गांव, वही शहर, वही लोग…यहां तक कि फूल और पत्तियां तक नहीं बदले. ट्यूलिप्स, सफेद डेजी, जरेनियम, लाल और पीले गुलाब सभी उस की तरफ ठीक वैसे ही देखते हैं जैसे उस की निगाह को पहचानते हों. चौश्चर काउंटी के एक छोटे से गांव नैनटविच तक सिमट कर रह गई उस की जिंदगी. अपनी आरामकुरसी पर बैठ वह उन फूलों का पूरा जीवन अपनी आंखों से जी लेती है. वसंत से पतझड़ तक पूरी यात्रा. हर ऋतु के साथ उस के चेहरे के भाव भी बदल जाते हैं, कभी उदासी, कभी मुसकराहट. उदासी अपने प्यार को खोने की, मुसकराहट उस के साथ समय व्यतीत करने की. उसे पूरी तरह से यकीन हो गया था कि सभी के जीवन का लेखाजोखा प्रकृति के हाथ में ही है. समय के साथसाथ वह सब के जीवन की गुत्थियां सुलझाती जाती है. वह संतुष्ट थी. बेशक, प्रकृति ने उसे, क्वान्टिटी औफ लाइफ न दी हो किंतु क्वालिटी औफ लाइफ तो दी ही थी, जिस के हर लमहे का आनंद वह जीवनभर उठा सकेगी.

यह भी तो संयोग की ही बात थी, तलाक के बाद जब वह बुरे वक्त से निकल रही थी, उस की बड़ी बहन ने उसे छुट्टियों में लंदन बुला लिया था. उस की दुखदाई यादों से दूर नए वातावरण में, जहां उस का मन दूसरी ओर चला जाए. 2 महीने बाद लंदन से वापसी के वक्त हवाईजहाज में उस के साथ वाली कुरसी पर बैठे जौन से उस की मुलाकात हुई. बातोंबातों में जौन ने बताया कि रिटायरमैंट के बाद वे भारत घूमने जा रहे हैं. वहां उन का बचपन गुजरा था. उन के पिता ब्रिटिश आर्मी में थे. 10 वर्ष पहले उन की पत्नी का देहांत हो गया. तीनों बच्चे शादीशुदा हैं. अब उन के पास समय ही समय है. भारत से उन का आत्मीय संबंध है. मरने से पहले वे अपना जन्मस्थान देखना चाहते हैं, यह उन की हार्दिक इच्छा है. उन्होंने फिर उस से पूछा, ‘‘और तुम?’’

‘‘मैं भारत में ही रहती हूं. छुट्टियों में लंदन आई थी.’’

‘‘मैं भारत घूमना चाहता हूं. अगर किसी गाइड का प्रबंध हो जाए तो मैं आप का आभारी रहूंगा,’’ जौन ने निवेदन करते कहा.

‘‘भाइयों से पूछ कर फोन कर दूंगी,’’ विधि ने आश्वासन दिया. बातोंबातों में 8 घंटे का सफर न जाने कैसे बीत गया. एकदूसरे से विदा लेते समय दोनों ने टैलीफोन नंबर का आदानप्रदान किया. दूसरे दिन अचानक जौन सीधे विधि के घर पहुंच गए. 6 फुट लंबी देह, कायदे से पहनी गई विदेशी वेशभूषा, काला ब्लेजर और दर्पण से चमकते जूते पहने अंगरेज को देख कर सभी चकित रह गए. विधि ने भाइयों से उस का परिचय करवाते कहा, ‘‘भैया, ये जौन हैं, जिन्हें भारत में घूमने के लिए गाइड चाहिए.’’

‘‘गाइड? गाइड तो कोई है नहीं ध्यान में.’’

‘‘विधि, तुम क्यों नहीं चल पड़ती?’’ जौन ने सुझाव दिया. प्रश्न बहुत कठिन था. विधि सोच में पड़ गई. इतने में विधि का छोटा भाई सन्नी बोला, ‘‘हांहां, दीदी, हर्ज की क्या बात है.’’

‘‘थैंक्यू सन्नी, वंडरफुल आइडिया. विधि से अधिक बुद्धिमान गाइड कहां मिल सकता है,’’ जौन ने कहा. 2 सप्ताह तक दक्षिण भारत के सभी पर्यटन स्थलों को देखने के बाद दोनों दिल्ली पहुंचे. उस के एक सप्ताह बाद जौन की वापसी थी. जाने से पहले तकरीबन रोज मुलाकात हो जाती. किसी कारणवश जौन की विधि से बात न हो पाती तो वह अधीर हो उठता. उस की बहुमुखी प्रतिभा पर जौन मरमिटा था. वह गुणवान, स्वाभिमानी, साहसी और खरा सोना थी. विधि भी जौन के रंगीले, सजीले, जिंदादिल व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुई. उस की उम्र के बारे में सोच कर रह जाती. जौन 60 वर्ष पार कर चुका था. विधि ने अभी 35 वर्ष ही पूरे किए थे. लंदन लौटने से 2 दिन पहले, शाम को टहलतेटहलते भरे बाजार में घुटनों के बल बैठ कर जौन ने अपने मन की बात विधि से कह डाली, ‘‘विधि, जब से तुम से मिला हूं, मेरा चैन खो गया है. न जाने तुम में ऐसा कौन सा आकर्षण है कि मैं इस उम्र में भी बरबस तुम्हारी ओर खिंचा आया हूं.’’ इस के बाद जौन ने विधि की ओर अंगूठी बढ़ाते हुए प्रस्ताव रखा, ‘‘विधि, क्या तुम मुझ से शादी करोगी?’’

विधि निशब्द और स्तब्ध सी रह गई. यह तो उस ने कभी नहीं सोचा था. कहते हैं न, जो कभी खयालों में हमें छू कर भी नहीं गुजरता, वो, पल में सामने आ खड़ा होता है. कुछ पल ठहर कर विधि ने एक ही सांस में कह डाला, ‘‘नहींनहीं, यह नहीं हो सकता. हम एकदूसरे के बारे में जानते ही कितना हैं, और तुम जानते भी हो कि तुम क्या कह रहे हो?’’ ‘‘हांहां, भली प्रकार से जानता हूं, क्या कह रहा हूं. तुम बताओ, बात क्या है? मैं तुम्हारे संग जीवन बिताना चाहता हूं.’’ विधि चुप रही.

जौन ने परिस्थिति को भांपते कहा, ‘‘यू टेक योर टाइम, कोई जल्दी नहीं है.’’ 2 दिनों बाद जौन तो चला गया किंतु उस के इस दुर्लभ प्रश्न से विधि दुविधा में थी. मन में उठते तरहतरह के सवालों से जूझती रही, ‘कब तक रहेगी भाईभाभियों की छत्रछाया में? तलाकशुदा की तख्ती के साथ क्या समाज तुझे चैन से जीने देगा? कौन होगा तेरे दुखसुख का साथी? क्या होगा तेरा अस्तित्व? क्या उत्तर देगी जब लोग पूछेंगे इतने बूढ़े से शादी की है? कोई और नहीं मिला क्या?’ इन्हीं उलझनों में समय निकलता गया. समय थोड़े ही ठहर पाया है किसी के लिए. दोनों की कभीकभी फोन पर बात हो जाती थी एक दोस्त की तरह. कालेज में भी खोईखोई रहती. एक दिन उस की सहेली रेणु ने उस से पूछ ही लिया, ‘‘विधि, जौन के जाने के बाद तू तो गुमसुम ही हो गई. बात क्या है?’’

‘‘जाने से पहले जौन ने मेरे सामने विवाह का प्रस्ताव रखा था.’’

‘‘पगली…बात तो गंभीर है पर गौर करने वाली है. भारतीय पुरुषों की मनोवृत्ति तो तू जान ही चुकी है. अगर यहां कोई मिला तो उम्रभर उस के एहसानों के नीचे दबी रहेगी. उस के बच्चे भी तुझे स्वीकार नहीं करेंगे.

जौन की आंखों में मैं ने तेरे लिए प्यार देखा है. तुझे चाहता है. उस ने खुद अपना हाथ आगे बढ़ाया है. अपना ले उसे. हटा दे जीवन से यह तलाक की तख्ती. तू कर सकती है. हम सब जानते हैं कि बड़ी हिम्मत से तू ने समाज की छींटाकशी की परवा न करते हुए अपने पंथ से जरा भी विचलित नहीं हुई. समाज में अपना एक स्थान बनाया है. अब नए रिश्ते को जोड़ने से क्यों हिचकिचा रही है. आगे बढ़. खुशियों ने तुझे आमंत्रण दिया है. ठुकरा मत, औरत को भी हक है अपनी जिंदगी बदलने का. बदल दे अपनी जिंदगी की दिशा और दशा,’’ रेणु ने समझाते हुए कहा. ‘‘क्या करूं, अपनी दुविधाओं के क्रौसरोड पर खड़ी हूं. वैसे भी, मैं ने तो ‘न’ कर दी है,’’ विधि ने कहा. ‘‘न कर दी है, तो हां भी की जा सकती है. तेरा भी कुछ समझ में नहीं आता. एक तरफ कहती है, जौन बड़ा अलग सा है. मेरी बेमानी जरूरतों का भी खयाल रखता है. बड़ी ललक से बात करता है. छोटीछोटी शरारतों से दिल को उमंगों से भर देता है. मुझे चहकती देख कर खुशी से बेहाल हो जाता है. मेरे रंगों को पहचानने लगा है. तो फिर झिझक क्यों रही है?’’

‘‘उम्र देखी है? 60 वर्ष पार कर चुका है. सोच कर डर लगता है, क्या वह वैवाहिक सुख दे पाएगा मुझे?’’ ‘‘आजमा कर देख लेती? मजाक कर रही हूं. यह समय पर छोड़ दे. यह सोच कि तेरी आर्थिक, सामाजिक, शारीरिक सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा. तेरा अपना घर होगा जहां तू राज करेगी. ठंडे दिमाग से सोचना…’’ ‘‘डर लगता है कहीं विदेशी चेहरों की भीड़ में खो तो नहीं जाऊंगी. धर्म, सोच, संस्कृति, सभ्यता, कुछ भी तो नहीं है एकजैसा हमारा. फिर इतनी दूर…’’ ‘‘प्रेम उम्र, धर्म, भाषा, रंग और जाति सभी दीवारों को गिराने की शक्ति रखता है. मेरी प्यारी सखी, प्यार में दूरियां भी नजदीकियां हो जाती हैं. अभी ईमेल कर उसे, वरना मैं कर देती हूं.’’

‘‘नहींनहीं, मैं खुद ही कर लूंगी,’’ विधि ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘डियर जौन,

मैं ने आप के प्रस्ताव पर विचार किया. कोई भी नया रिश्ता जोड़ने से पहले एकदूसरे के बीते जीवन के बारे में जानना बहुत जरूरी है. ऐसी मेरी सोच है. 10 वर्ष पहले मेरा विवाह एक बहुत रईस घर में संपन्न हुआ. मेरी ससुराल का मेरे रहनसहन, सोचविचार और संस्कारों से कोई मेल नहीं था. वहां के तौरतरीकों के बारे में मैं सोच भी नहीं सकती थी. वहां मुझे लगा कि मैं चूहेदानी में फंस गई हूं. मेरे पति शराब और ऐयाशी में डूबे रहते थे. शराब पी कर वे बेलगाम घुड़साल के घोड़े की तरह हो जाते थे, जिस का मकसद सवार को चोट पहुंचाना था. ऐसा हर रोज का सिलसिला था. हर रात अलगअलग औरतों से रंगरेलियां मनाते थे.

धीरेधीरे बात यहां तक पहुंच गई कि वे ग्रुपसैक्स की क्रियाओं में भाग लेने लगे. जबरदस्ती मुझ से भी औरों के साथ हमबिस्तर होने की अपेक्षा करने लगे. उन के अनुकूल उन की बात मानते जाओ तो ठीक था वरना कहते, ‘हम मर्द अच्छी तरह जानते हैं कि कैसे औरतों को अपने हिसाब से रखा जाए.’ ‘‘एक साधारण सी लड़की के लिए कितना कठिन था यह. एक दिन जब मैं ने किसी और के साथ हमबिस्तर होने से इनकार किया तो मुझे घसीट कर सामने बिठा कर सबकुछ देखने को मजबूर कर दिया. उस दिन मैं ने बरदाश्त की सभी सीमाएं लांघ कर उन के मुंह पर एक तमाचा जड़ दिया और सामान उठा कर भाई के घर चली आई. पैसे और मनगढ़ंत कहानियों के बल पर मेरा बेटा उन्होंने अपने पास रख लिया. उस दिन के बाद आज तक मैं अपने बेटे को देख नहीं पाई. अब सबकुछ जानते हुए भी आप तैयार हैं तो आप मेरे बड़े भाईसाहब अजय से बात करें.’’

‘‘आप की विधि’’

विधि का ईमेल पढ़ कर जौन नाचने लगा. तुरंत ही उस ने उत्तर दिया,

‘‘मेरी प्यारी विधि,

बस, इतनी सी बात से परेशान हो. जीवन में हादसे सभी के साथ होते हैं. मैं ने तो तुम से पूछा तक नहीं. तुम ने बता दिया तो मेरे मन में तुम्हारे लिए इज्जत और बढ़ गई. मेरी जान, मैं ने तुम्हें चाहा है. मैं स्त्री और पुरुष की समानता में विश्वास रखता हूं. तुम मेरी जीवनसाथी ही नहीं, पगसाथी भी होगी. जिन खुशियों से तुम वंचित रही हो, मैं उन की भरपाई की पूरी कोशिश करूंगा. मैं अगली फ्लाइट से दिल्ली पहुंच रहा हूं.

‘‘प्यार सहित

‘‘तुम्हारा जौन.’’

वह दिल्ली आ पहुंचा. होटल में विधि के बड़े भाईसाहब को बुला कर ईमेल दिखाते हुए उन से विधि का हाथ मांगा. भाईसाहब ने कहा, ‘‘शाम को तुम घर आ जाना.’’ पूरा परिवार बैठक में उस की प्रतीक्षा कर रहा था. जौन का प्रस्ताव सामने रखा गया. सभी हैरान थे. सन्नी तैश में आ कर बोला, ‘‘इतने बूढ़े से…? दिमाग खराब हो गया है क्या. जाहिर है विधि की उम्र के उस के बच्चे होंगे. अंगरेजों का कोई भरोसा नहीं.’’ बाकी बहनभाई भी सन्नी की बात से सहमत थे.

‘‘तुम ने क्या सोचा?’’ बड़े भाई अजय ने विधि से पूछा.

‘‘मुझे कोई एतराज नहीं,’’ उस ने कहा.

‘‘दीदी, होश में तो हो, क्या सचमुच सठियाए से शादी…?’’ विधि के हां करते ही अजय ने जौन को बुला कर कहा, ‘‘शादी तय करने से पहले हमारी कुछ शर्तें हैं. शादी हिंदू रीतिरिवाजों से होगी. उस के लिए तुम्हें हिंदू बनना होगा. हिंदू नाम रखना होगा. विवाह के बाद विधि को लंदन ले जाना होगा.’’ जौन को सब शर्तें मंजूर थीं. वह उत्तेजना से ‘आई विल, आई विल’ कहता नाचने लगा. पुरुष चहेती स्त्री को पाने का हर संभव प्रयास करता है. उस में साम, दाम, दंड, भेद सभी भाव जायज हैं. अच्छा सा मुहूर्त देख कर उन का विवाह संपन्न हआ. जौन लंदन से इमीग्रेशन के लिए जरूरी कागजात ले कर आया था. विधि का पासपोर्ट तैयार ही हो रहा था कि अचानक जौन के बेटे मार्क का ऐक्सिडैंट होने के कारण, जौन को विधि के बिना ही लंदन जाना पड़ा. जौन तो चला गया. विधि का मन बेईमान होने लगा. उसे घबराहट होने लगी. मन में अनेक प्रश्न उठने लगे. किसी से शिकायत भी तो नहीं कर सकती थी. 6 महीने से ऊपर हो गए. उधर जौन बहुत बेचैन था, चिंतित था. वह बारबार रेणु को ईमेल कर के पूछता. एक दिन हार कर रेणु विधि के घर आ ही पहुंची और उसे बहुत डांटा, ‘‘विधि, क्या मजाक बना रखा है, क्यों उस बेचारे को परेशान कर रही हो? तुम्हें पता भी है कितनी मेल डाल चुका है. कहतेकहते थक गया है कि आप विधि को समझाएं और कहें ‘डर की कोई बात नहीं है. मैं उसे पलकों पर बिठा कर रखूंगा.’ ‘‘अब गुमसुम क्यों बैठी हो. कुछ तो बोलो. यह तुम्हारा ही फैसला था. अब तुम्हीं बताओ, क्या जवाब दूं उसे?’’

‘‘मैं बहुत उलझन में हूं. परेशान हूं. खानापीना, उठनाबैठना बिलकुल अलग होगा. फिर उस के बच्चे…? क्या वे स्वीकार करेंगे मुझे…?’’

‘‘विधि, तुम बेकार में भावनाओं के द्वंद्व में डूबतीउतरती रहती हो. यह तो तुम्हें वहीं जा कर पता लगेगा. हम सब जानते हैं, तुम हर स्थिति को आसानी से हैंडल कर सकती हो. ऐसा भी होता है  कभीकभी सबकुछ सही होते हुए भी, लगता है कुछ गलत है. तू बिना कोशिश किए पीछे नहीं मुड़ सकती. चिंता मत कर. अभी जौन को मेल करती हूं कि तुझे आ कर ले जाए.’’ जौन को मेल करते ही एक हफ्ते में वह दिल्ली आ पहुंचा. 2 हफ्ते में विधि को लंदन भी ले गया. लंदन में घर पहुंचते ही जौन ने अंगरेजी रिवाजों के अनुसार विधि को गोद में उठा कर घर की दहलीज पार की. अंदर पहुंचते ही वह हतप्रभ रह गई. अकेले होते हुए भी जौन ने घर बहुत तरतीब और सलीके से रखा था. सुरुचिपूर्ण सजाया था. घर में सभी सुविधाएं थीं, जैसे कपड़े धोने की मशीन, ड्रायर, स्टोव, डिशवाशर और औवन…काटेज के पीछे एक छोटा सा गार्डन था जो जौन का प्राइड ऐंड जौय था. पहली ही रात को जौन ने विधि को एक अनमोल उपहार देते हुए कहा, ‘‘विधि, मैं तुम्हें क्रूर संसार की कोलाहल से दूर, दुनिया के कटाक्षों से हटा कर अपने हृदय में रखने के लिए लाया हूं. तुम से मिलने के बाद तुम्हारी मुसकान और चिरपरिचित अदा ही तो मुझे चुंबक की तरह बारबार खींचती रही है और मरते दम तक खींचती रहेगी. मैं तुम्हें इतना प्यार दूंगा कि तुम अपने अतीत को भूल जाओगी. मैं तुम्हारा तुम्हारे घर में स्वागत करता हूं.’’ इतना कह कर जौन ने उसे सीने से लगा लिया और यह सब सुन कर विधि की आंखों में खुशी के आंसू छलकने लगे.

ऐसे प्रेम का एहसास उसे पहली बार हुआ था. धीरेधीरे वह जान पाई कि जौन केवल गोराचिट्टा, ऊंचे कद का ही नहीं, वह रोमांटिक, सलोना, जिंदादिल, शरारती और मस्त इंसान है जो बातबात में किसी को भी अपना बनाने का हुनर जानता है. उस का हृदय जीवन की आकांक्षाओं से धड़क उठा. जौन ने उसे इतना प्यार दिया कि जल्दी ही उस की सब शंकाएं दूर हो गईं. विधि उसे मन से चाहने लगी थी. दोनों बेहद खुश थे. वीकेंड में जौन के तीनों बच्चों ने खुली बांहों से विधि का स्वागत किया और अपने पिता के विवाह पर एक भव्य पार्टी दी. विधि अपने फैसले पर प्रसन्न थी. अब उस का अपना घर था. अलग परिवार था. असीम प्यार देने वाला पति. जौन ने घर की बागडोर उसी के हाथ में थमा दी थी. उसे प्यार करना सिखाया, उस का आत्मविश्वास जगाया यहां तक कि उसे पोस्टग्रेजुएशन भी करवा दिया. क्योंकि भीतर से वह जानता था कि उस के जाने के बाद विधि अपने समय का सदुपयोग कर सकेगी.

गरमी का मौसम था. चारों ओर सतरंगी फूल लहलहा रहे थे. दोपहर के खाने के बाद दोनों कुरसियां डाल कर गार्डन में धूप सेंकने लगे. बाहर बच्चे खेल रहे थे. बच्चों को देखते विधि की ममता उमड़ने लगी. जौन की पैनी नजरों से यह बात छिपी नहीं. जौन ने पूछ ही लिया, ‘‘विधि, हमारा बच्चा चाहिए…? हो सकता है. मैं ने पता कर लिया है. पूरे 9 महीने डाक्टर की निगरानी में रह कर. मैं तैयार हूं.’’

‘‘नहींनहीं, हमारे हैं तो सही, वो 3, और उन के बच्चे. मैं ने तो जीवन के सभी अनुभवों को भोगा है. मां बन कर भी, अब नानीदादी का सुख भोग रही हूं,’’ विधि ने हंसतेहंसते कहा. ‘‘मैं तो समझा था कि तुम्हें मेरी निशानी चाहिए?’’ जौन ने विधि को छेड़ते हुए कहा, ‘‘ठीक है, अगर बच्चा नहीं तो एक सुझाव देता हूं. बच्चों से कहेंगे मेरे नाम का एक (लाल गुलाब) इंग्लिश रोज और तुम्हारे नाम का (पीला गुलाब) इंडियन समर हमारे गार्डन में साथसाथ लगा दें. फिर हम दोनों सदा एकदूसरे को प्यार से देखते रहेंगे.’’ इतना कह कर जौन ने प्यार से उस के गाल पर चुंबन दे दिया.

विधि भी होंठों पर मुसकान, आंखों में मोती जैसे खुशी के आंसू, और प्यार की पूरी कशिश लिए जौन के आगोश में आ गई. जौन विधि की छोटी से छोटी जरूरतों का ध्यान रखता. धीरेधीरे विधि के पूरे जीवन को उस ने अपने प्यार के आंचल से ढक लिया. सामाजिक बैठकों में उसे अदब और शिष्टाचार से संबोधित करता. उसे जीजी करते उस की जबान न थकती. कुछ ही वर्षों में जौन ने उसे आधी दुनिया की सैर करा दी थी. अब विधि के जीवन में सुख ही सुख थे. हंसीखुशी 10 साल बीत गए. इधर, कई महीनों से जौन सुस्त था. विधि को भीतर ही भीतर चिंता होने लगी, सोचने लगी, ‘कहां गई इस की चंचलता, चपलता, यह कभी टिक कर न बैठने वाला, यहांवहां चुपचाप क्यों बैठा रहता है? डाक्टर के पास जाने को कहो तो टालते हुए कहता है, ‘‘मेरा शरीर है, मैं जानता हूं क्या करना है.’’ भीतर से वह खुद भी चिंतित था. एक दिन बिना बताए ही वह डाक्टर के पास गया. कई टैस्ट हुए. डाक्टर ने जो बताया, उसे उस का मन मानने को तैयार नहीं था. वह जीना चाहता था. उस ने डाक्टर से कहा, ‘‘वह नहीं चाहता कि उस की यह बीमारी उस के और उस की पत्नी की खुशी में आड़े आए. समय कम है, मैं अब अपनी पत्नी के लिए वह सबकुछ करना चाहता हूं, जो अभी तक नहीं कर पाया. मैं नहीं चाहता मेरे परिवार को मेरी बीमारी का पता चले. समय आने पर मैं खुद ही उन्हें बता दूंगा.’’

अचानक एक दिन जौन वर्ल्ड क्रूज के टिकट विधि के हाथ में थमाते बोला, ‘‘यह लो तुम्हारा शादी की 10वीं वर्षगांठ का तोहफा.’’ उस की जीहुजूरी ही खत्म नहीं होती थी. विधि का जीवन उस ने उत्सव सा बना दिया था. वर्ल्ड क्रूज से लौटने के बाद दोनों ने शादी की 10वीं वर्षगांठ बड़ी धूमधाम से मनाई. घर की रजिस्ट्री के कागज और एफडीज उस ने विधि के नाम करवा कर उसे तोहफे में दे दिए. उस रात वह बहुत बेचैन था. उसे बारबार उलटी हो रही थी और चक्कर आते रहे. जल्दी से उसे अस्पताल ले जाया गया. वहां उसे भरती कर लिया गया. जौन की दशा दिनबदिन बिगड़ती गई. डाक्टर ने बताया, ‘‘उस का कैंसर फैल चुका है. कुछ ही समय की बात है.’’

‘‘कैंसर…?’’ कैंसर शब्द सुन कर सभी निशब्द थे. ‘‘तुम्हारे डैड, जाने से पहले, तुम्हारी मां को उम्रभर की खुशियां देना चाहते थे. तुम्हें बताने के लिए मना किया था,’’ डाक्टर ने बताया. बच्चे तो घर चले गए. विधि नाराज सी बैठी रही. जौन ने उस का हाथ पकड़ कर बड़े प्यार से समझाया, ‘‘जो समय मेरे पास रह गया था, मैं उसे बरबाद नहीं करना चाहता था, भोगना चाहता था तुम्हारे साथ. तुम्हारे आने से पहले मैं जीवन बिता रहा था. तुम ने जीना सिखा दिया है. अब मैं जिंदगी से रिश्ता चैन से तोड़ सकता हूं. जाना तो एक दिन सभी को है.’’ एक वर्ष तक इलाज चलता रहा. कैंसर इतना फैल चुका था कि अब कोई कुछ नहीं कर सकता था. अपनी शादी की 11वीं वर्षगांठ से पहले ही जौन चल बसा. अंतिम संस्कार के बाद उस के बेटे ने जौन की इच्छानुसार उस की राख को गार्डन में बिखरा दिया. एक इंग्लिश रोज और एक इंडियन समर (पीला गुलाब) साथसाथ लगा दिए. उन्हें देखते ही विधि को जौन की बात याद आई, ‘कम से कम तुम्हें हर वक्त देखता तो रहूंगा?’ इस सदमे को सहना कठिन था. विधि को लगा मानो किसी ने उस के शरीर के 2 टुकड़े कर दिए हों. एक बार वह फिर अकेली हो गई. एक दिन उस के अंतकरण से आवाज आई, ‘उठ विधि, संभाल खुद को, तेरे पास जौन का प्यार है, स्मृतियां हैं. वह तुझे थोड़े समय में जहानभर की खुशियां दे गया है.’ धीरेधीरे वह संभलने लगी. जौन के बच्चों के सहयोग और प्यार ने उसे फिर खड़ा कर दिया. कालेज में उसे नौकरी भी मिल गई. बाकी समय में वह गार्डन की देखभाल करती. इंग्लिश रोज और इंडियन समर की कटाईछंटाई करने की उस की हिम्मत न पड़ती. उस के लिए माली को बुला लेती. गार्डन जौन की निशानी था. एक दिन भी ऐसा न जाता, विधि अपने गार्डन को न निहारती, पौधों को न सहलाती. अकसर उन से बातें करती. बर्फ पड़े, कोहरा पड़े या फिर कड़कती सर्दी, वह अपने फ्रंट डोर से जौन के लगाए पौधों को निहारती रहती. उदासी में इंग्लिश रोज से शिकवेशिकायतें भी करती, ‘खुद तो अपने लगाए परिवार में लहलहा रहे हो और मैं? नहीं, नहीं, मैं शिकायत नहीं कर रही. मुझे याद है आप ने ही कहा था, ‘यह मेरा परिवार है डार्लिंग. मुझे इन से अलग मत करना.’

उस दिन सोचतेसोचते अंधेरा सा होने लगा. उस ने घड़ी देखी, अभी शाम के 4 ही बजे थे. मरियल सी धूप भी चोरीचोरी दीवारों से खिसकती जा रही थी. वह जानती थी यह गरमी के जाने और पतझड़ के आने का संदेशा था. वह आंखें मूंद कर घास पर बिछे रंगबिरंगों पत्तों की कुरमुराहट का आनंद ले रही थी. अचानक तेज हवा के झरोखे से एक सूखा पत्ता उलटतापलटता उस के आंचल में आ अटका. पलभर को उसे लगा, कोई उसे छू कर कह रहा हो… ‘डार्लिंग, उदास क्यों होती हो, मैं यही हूं तुम्हारे चारों ओर, देखो वहीं हूं, जहां फूल खिलते हैं…क्यों खिलते हैं? यह मैं नहीं जानता. बस, इतना जरूर जानता हूं, फूल खिलता है, झड़ जाता है. क्यों? यह कोई नहीं जानता. बस, इतना जानता हूं इंग्लिश रोज जिस के लिए खिलता है उसी के लिए मर जाता है. खिले फूल की सार्थकता और मरे फूल की व्यथा एक को ही अर्पित है.’

उस दिन वह झड़ते फूलों को तब तक निहारती रही जब तक अंधेरे के कारण उसे दिखाई देना न बंद हो गया. हवा के झोंके से उसे लगा, मानो जौन पल्लू पकड़ कर कह रहा हो, ‘आई लव यू माई इंडियन समर.’ ‘‘मी टू, माई इंग्लिश रोज. तुम और तुम्हारा शरारतीपन अभी तक गया नहीं.’’ उस ने मुसकरा कर कहा.

लड़कियों की छेड़खानी बेचारे लड़के भरें पानी

भारत में ऐसा माना जाता है कि लड़के अकसर लड़कियों के साथ छेड़खानी करते हैं, उन पर फब्तियां कसते हैं, अश्लील इशारे या फिर शारीरिक टीजिंग करते हैं. बेचारी लड़कियों को हर जगह ऐसी छेड़छाड़ का शिकार अकसर होना पड़ता है.

पर यह तसवीर का एकतरफा पहलू है. तसवीर का दूसरा पहलू यह बताता है कि न केवल लड़कियों को लड़कों द्वारा छेड़ा जाना अच्छा लगता है बल्कि मौका मिलते ही वे खुद लड़कों से छेड़खानी करने से बाज नहीं आतीं.

सुरेश अपनी बहन का एडमिशन फौर्म भर कर उसे कालेज में जमा करवाने गया. वह गर्ल्स कालेज था. हर तरफ लड़कियां ही लड़कियां नजर आ रही थीं.

सुरेश ने झिझकते हुए एक शरीफ सी नजर आने वाली लड़की से फौर्म जमा कराने की खिड़की के बारे में पूछ लिया तो उस लड़की ने उसे इशारे से जगह बता दी.

सुरेश लड़की की बताई जगह पर पहुंचा तो वहां उसे कोई नजर नहीं आया. वह जाने के लिए मुड़ा तो 3-4 लड़कियों ने उसे घेर लिया.

‘‘हाय, हैंडसम, इतनी भी क्या जल्दी है जाने की. जरा हमारे पास तो बैठो,’’ कहते हुए उन लड़कियों ने उसे जकड़ लिया. एक लड़की उस का इस तरह वीडियो बनाने लगी कि सुरेश का चेहरा दिखे पर लड़कियों का नहीं.

सुरेश की समझ में नहीं आ रहा था कि यह हो क्या रहा है, इतने में वह लड़की आ गई जिस ने फौर्म जमा करवाने की जगह बताने के बहाने उसे यहां भेजा था.

सुरेश सब समझ गया. उस लड़की और उस की सहेलियों ने मिल कर उस की वह हालत की कि बेचारा किसी तरह खुद को और अपने कपड़ों को संभाल कर भागा. उस के बाद वे लड़कियां उस से खूब कौफीपकौड़े खाती रहीं.

बहुत समय बाद मेरे एक और दोस्त कंकर ने यह बात मुझे एकांत में बताई कि किस तरह बलात्कार पर उतारू उस के साथ की कालेज गर्ल्स से उस ने खुद को बचाया था. यहांवहां काटने, छीना?ापटी के निशान खुद अपनी कहानी कह रहे थे. उसे क्लासरूम में उन लड़कियों ने घेर लिया था और पैंट तक उतार दी थी.

एक अन्य घटना में होस्टल में रहने वाली लड़कियों ने शहर के पेस्ट्री वाले से फोन कर के एक केक मंगवाया. पेस्ट्री वाले के यहां से जो सेल्समैन केक ले कर होस्टल पहुंचा. वह

18-19 साल का स्मार्ट लड़का था. और्डर देने वाली लड़की ने उस से कहा कि वह केक मेज पर रख दे और वहीं बैठ कर थोड़ा इंतजार करे, तब तक वह पैसे ले कर आती है.

5-7 मिनट बाद ही 3-4 लड़कियां वहां आईं. उन्होंने केवल अंडरगारमैंट्स ही पहन रखे थे. उन्होंने रूम को अंदर से लौक कर दिया और सेल्समैन लड़के के यहांवहां हाथ लगाने लगीं.

उस ने विरोध किया तो लड़कियों ने कहा कि अगर उस ने उन के साथ सैक्स से इनकार किया तो वे शोर मचा देंगी कि तुम गलत हरकत कर रहे थे.

कहना न होगा कि उन लड़कियों ने मिल कर उस का वह हाल किया कि बेचारे को कुछ दिन अस्पताल में रहना पड़ा. अकेले में एक लड़के के साथ वासना के वार में अंधी उन लड़कियों का अत्याचार का किस्सा दिल दहलाने वाला था.

अकेले ही नहीं, सार्वजनिक स्थानों पर भी लड़कियां अपने हावभाव, चेष्टा और वेशभूषा से लड़कों को उकसाती हैं कि वे उन्हें छेड़ें. इस तरह की दलित इच्छाओं का प्रदर्शन पहले जहां लड़कों द्वारा किया जाता था वहीं आजकल लड़कियां भी इस मामले में पीछे नहीं हैं.

लड़कियों के पास आज दोहरा हथियार होता है, खुद के साथ छेड़छाड़ हो तो वे लड़की बन कर सहानुभूति बटोर सकती हैं. लेकिन अगर वे ही खुद छेड़खानी पर उतर आएं तो भी कोई यकीन नहीं करता. सभी मामलों में दोषी लड़कों को ही ठहराया जाता है. जालंधर की नवंबर 2022 की घटना है जिस में 4 लड़कियों ने  पता पूछने के बहाने एक लड़के को गाड़ी में घसीट लिया और फिर उस का जबरन रेप किया. जालंधर की लैदर कौंप्लैक्स रोड की इस घटना पर पुलिस ने कुछ किया या नहीं, यह पता नहीं चला क्योंकि लड़के इस तरह की शिकायतों को ज्यादा चलाते नहीं हैं.

उलटे, अगर लड़का ऐसी शिकायत ले कर कहीं जाए तो बेचारा खुद ही हंसी का पात्र बन जाता है. इस डर से वह चाह कर भी अपने साथ हुईर् ज्यादती का जिक्र किसी के सामने नहीं कर पाता और लड़कियां पाकसाफ बच जाती हैं.

जरूरत इस बात की है कि हर मामले के दोनों पहलुओं पर विचार करने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाए. अगर पीडि़त लड़की हो सकती है तो लड़का भी ऐसी ज्यादती का शिकार हो सकता है.

रिश्ते में आ गई है तलाक की नौबत,अपनाएं ये बातें बच सकता है रिश्ता

शादी एक ऐसा पवित्र बंधन हैं जिसके जरिए दो अजनबी एक दूसरे के साथ ऐसे अटूट रिश्ते में बंध जाते हैं जिसमे एक दूसरे की खुशी,अपनी खुशी बन जाती है और दुख दर्द अपने गम बन जाते हैं .यह दोनों पार्टनर्स के लिए एक नए जीवन की शुरुआत होती है. कामयाब शादी का एक मूल मंत्र हैं कि यदि पति की आदतों में पत्नी अपनी खुशी और पत्नी की आदतों में पति अपनी खुशी खोज ले तो जीवन खुशनुमा हो जाता है. शादी ब्याह का बंधन एक विश्वास के धागे पर टिका होता है और जिस रिश्ते  में एक दूसरे के प्रति केयर  और रिस्पांसिबिलिटी का भाव होता है उस रिश्ते में हमेशा प्यार बना रहता है ऐसा रिश्ता एक सम्पूर्ण व कामयाब रिश्ते कि पहचान बन जाता है और जिस रिश्ते में बात बात पर ईगो आने लगता है रेस्पेक्ट व बराबरी का भाव खत्म होने लगता है तो वह रिश्ता टिक नहीं पाता. इसीलिए रहीम जी ने अपने दोहे में लिखा हैं ‘रहीमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय टूटे तो फिर ना जुड़े जुड़े गांठ पड़ जाए ‘ तो जरूरी है कि छोटीमोटी बातों को राई का पहाड़ ना बनाएं व एक दूसरे के  प्रति प्रेम व विश्वास बनाए रखें.

एक दूसरे की रिस्पेक्ट है जरूरी 

किसी भी रिश्ते को निभाने के लिए एक दूसरे के प्रति बराबरी, शेयर एंड केयर का  भाव होना अति आवश्यक है यह पति पत्नी के रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए रामबाण का कार्य करता है यदि आपका पार्टनर आपसे किसी भी क्षेत्र में कम है तो उसे कभी भी निचा ना दिखाएं बल्कि उसकी अच्छाईयों को तब्बजो दें , और उसको एहसास दिलाएं कि वह आपके जीवन में कितना जरूरी है और वो जैसा भी हैं वैसा ही आपके लिए खास है.

 मुसीबत में ना छोड़े साथ

मुश्किल समय में भी आप अपने पार्टनर को दोष न देकर उसके साथ खड़े होते हैं तो आप एक आदर्श पार्टनर कहलाते हैं जब भी कभी आपके पार्टनर पर कोई विपदा आए तो उसका साथ ना छोड़े बल्कि उसकी ढाल बनकर उसका हौसला बढ़ाएं क्योंकि मुसीबत कितनी भी बड़ी क्यों ना हो लेकिन यदि आपका पार्टनर साथ है तो आप हर मुसीबत का सामना आसानी से कर सकते हैं. और इससे आपकी लव बौन्डिंग मजबूत होती है.

 उसकी खूबियों को आंके

आप अपने पार्टनर के बाहरी रंगरूप को ध्यान न देते हुए उसकी आंतरिक सुंदरता से प्रेम करें. हमेशा ध्यान रखें कि यदि आप अपने पार्टनर कि खामियों पर ही फोकस करते रहते हैं तो यह एक बड़े टकराव कि वजह बन सकती हैं लेकिन यदि आप उसकी कमियों पर कम बल्कि खूबियों पर फोकस ज्यादा करते हैं तो वह खुद ही अपने अंदर कि कमियों को खूबियों में बदलने कि कोशिश करता है इसीलिए खूबियों का आकलन आपके रिश्ते को मजबूती देता है जब भी आपको लगे कि आपका रिश्ता कमजोर पड़ने लगा है तो अपने पार्टनर कि खूबियों पर अधिक से अधिक ध्यान दें आपके गिले शिकवे अपने आप कम होने लगेंगे.

पार्टनर की इच्छाओं को दें महत्व

अपनी इच्छा अपने पार्टनर पर बिलकुल भी थोपने की कोशिश ना करें पति-पत्नी को चाहिए कि वो एक दूसरे की इच्छाओं की हमेशा कद्र करें. अगर आप कोई भी काम करने जा रहें है तो अपने पार्टनर की सलाह जरूर लें. और हमेशा अपने पार्टनर कि इच्छाओं को भी समझने कि कोशिश करें.

तुलना ना करें

यह हर रिश्ते में जरूरी हैं कि अपने रिश्ते में किसी और की तुलना को बीच में ना आने दे. कई लोग ऐसे होते हैं कि अपने करीबियों के रिश्तो कि तुलना करते रहते हैं जो कि सबसे गलत है. इस बात को समझें कि आप दोनों का जो रिश्ता हैं वह सबसे बेहतर है और हमेशा रहेगा.

बंटी हुई औरत: लाजो को क्यों कर दिया शेखर व विजय ने दरकिनार

लाजवंती को अपनी पत्नी बना कर शेखर ने सभी रिश्तेदारों के साथसाथ अपने पिता की आशाओं पर भी पानी फेर दिया था, क्योंकि वह तो कब से इस बात की उम्मीद लगाए बैठे थे कि बेटा ज्यों ही प्रशासनिक सेवा में लगेगा उस का विवाह किसी कमिश्नर या सेक्रेटरी की बेटी से कर देंगे. इस से शेखर के साथसाथ सारे परिवार का उद्धार होगा.

दूरदर्शी शेखर के पिता यह भी जानते थे कि बड़े ओहदेदारों से पारिवारिक संबंध बनाना बेटे के भविष्य के लिए भी जरूरी है साथ ही स्थानीय प्रशासन पर भी अच्छा रौबदाब बना रहता है.

उधर भाईबहनों में यह धुन सवार थी कि कब भैया की शादी हो और कब घर को संभालने वाला कोई आए. उन्हें तो यह भी विश्वास था कि भाभी अवश्य ही अलादीन का चिराग ले कर आएंगी.

एक मध्यवर्गीय परिवार के टूटेफूटे स्वप्न…

शेखर जब भी अपनी मौसी या बूआ के घर जाता तो उस का स्वागत एक ही वाक्य से होता, ‘‘बेटे, मैं ने तुम्हारे लिए सर्वगुण संपन्न चांद सी दुलहन ढूंढ़ रखी है. बस, नौकरी ज्वाइन करने का इंतजार है.’’

जीवनसाथी के मामले में शेखर की सोच कुछ और थी. उस ने एक गरीब असहाय लड़की को अपना जीवन- साथी बनाने का निर्णय किया था. चूंकि

लाजवंती उस के सोच के पैमाने पर खरी उतरी थी इसीलिए उस ने उसे अपना जीवनसाथी बनाया. बचपन में ही लाजवंती के पिता का देहांत हो चुका था. घर में एक भाई था और 4 बहनें. अब तक 2 बहनों का विवाह हो चुका था. मां थीं जो ढाल बन कर बच्चों को ऊंचनीच से बचाने के प्रयास में लगी रहतीं. शेखर का विचार था कि दरिद्रता में पली हुई लाजवंती जिंदगी के उतारचढ़ाव से परिचित होगी. भलेबुरे की उसे पहचान होगी.

लाजवंती में ऐसा कुछ भी न था. वह उस गंजी कबूतरी की तरह थी जो महलों में डेरा डाल चुकी हो. शेखर की धारणा गलत साबित हुई. इतना ही नहीं लाजवंती अपने साथ अपना अतीत भी समेट कर लाई थी.

मां के कंधों का बोझ कम करने के लिए 14 वर्ष की आयु में ही लाजवंती को उस की सब से बड़ी बहन ने अपने पास बुला कर स्कूल में दाखिल करा दिया. हर सुबह लाजो सफेद चोली और नीला स्कर्ट पहने अपना बस्ता कंधे पर लटकाए स्कूल जाने लगी. घड़ी की टिकटिक चढ़ती जवानी का अलार्म बन गई.

उधर लाजो के रूप में निखार आने लगा. चाल में लचक पैदा होने लगी. आंखें भी चमकने लगीं और यौवन का प्रभाव उन्नत डरोजों पर स्पष्ट दिखाई पड़ने लगा.

पिता के प्यार की चाहत लिए लाजो अकसर अपने जीजा के सामने बैठ कर अपना पाठ दोहराती या फिर उस की गोद में सिर रख कर एलिस के वंडरलैंड में खो जाती. जीजा लाजो के केशों में अपनी उंगलियां फेरता या फिर उस के मुलायम गालों को सहलाता तो नारी स्पर्श से उस की आंखों में नशा छा जाता.

लाजो भी नासमझी के कारण इस कोमल अनुभूति का आनंद लेने की टोह में लगी रहती. एक दिन पत्नी की गैर- मौजूदगी ने भावनाओं को विवेक पर हावी कर दिया. नदी अपने किनारे तोड़ कर अनियंत्रित हो गई. लाजो को जब होश आया तो बहुत देर हो चुकी थी.

उस घटना के बाद लाजो अपने आप से घृणा करने लगी. वह हर समय खोईखोई रहती. परिणाम की कल्पना से ही भयभीत हो जाती. बहन से कहने में भी उसे डर लगता था इसलिए अंदर ही अंदर घुटती रहती, हालांकि  उस में उस का कोई दोष नहीं था. जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो असहाय मासूम बच्ची क्या कर सकती थी.

मन पर बोझ लिए लाजो को रात भर भयानक सपने आते. अंधेरे जंगलों में वह जान बचाने के लिए भागती, चीखतीचिल्लाती, मगर उस की सहायता के लिए कोई नहीं आता. सपने में देखा चेहरा जाना- पहचाना लगता पर आंख खुलती तो सपने में देखे चेहरे को पहचानने में असफल रहती. इस तरह एक मासूम बच्ची बड़ी अजीब मानसिक स्थिति में जी रही थी.

बहन इतनी पढ़ीलिखी समझदार नहीं थी कि उस के मानसिक द्वंद्व को समझ सकती.

इस के बावजूद लाजो को बारबार उसी दलदल में कूदने की तीव्र इच्छा होती. डर और चाह चोरसिपाही का खेल खेलते. कई महीने के बाद जब उस की बहन को अचानक ही इस संबंध की भनक पड़ी तो उस ने लाजो को वापस मायके भेज दिया.

उस मासूम बच्ची की आत्मा घायल हो चुकी थी. अब हर पुरुष उस को भूखा और खूंखार नजर आने लगा था. फिर भी मुंह से खून लगी शेरनी की तरह उस को मर्दों की बारबार चाह सताती रहती थी. कालिज के यारदोस्तों ने जब घर के दरवाजे खटखटाने शुरू किए तो वह अपनी मां के साथ गांव चली आई. कुनबे के प्रयास से लाजवंती को देखने के लिए शेखर आया और उस ने लाजो को पसंद कर लिया.

लाजवंती ने कभी सपने में भी न सोचा था कि उस को ऐसा जीवनसाथी मिल जाएगा और वह भी किसी मोल- तोल के बिना. वह फूली न समा रही थी.

पहली रात में एक औरत के अंदर सेक्स के प्रति जो झिझक, घबराहट होती है ऐसा कुछ लाजवंती में न पा कर शेखर को उस पर शक होने लगा. उस  पर लाजवंती के व्यवहार ने उस के शक को यकीन में बदल दिया. यद्यपि शेखर ने इस बात को टालने की बहुत कोशिश की मगर उस के दिमाग में अंगारे सुलगते रहे. वह किस को दोषी ठहराता. विवाह के लिए उस ने खुद ही सब की इच्छा के खिलाफ हां की थी. अत: परिस्थितियों से समझौता करना ही उस ने उचित समझा.

लाजवंती अपने अतीत को भूल जाना चाहती थी, मगर अपने द्वारा लूटे जाने की जो पीड़ा उस के मन में घर कर चुकी थी वह अकसर उसे झिंझोड़ती रहती. शेखर ने उस के अतीत को कुरेद कर जानने का कभी प्रयास नहीं किया, शायद यही वजह थी कि लाजवंती खुद ही अपने गुनाहों के बोझ तले दब रही थी. कई बार उस के दिमाग में आया कि जा कर शेखर के सामने अपनी भूल को स्वीकार कर ले. फिर जो भी दंड वह दे उसे हंसीखुशी सह लेगी पर हर बार मां की नसीहत आड़े आ जाती.

अपनी असुरक्षा की भावना को दूर करने के लिए लाजवंती ने अपनी आकर्षक देह का यह सोच कर सहारा लिया कि शेखर की सब से बड़ी कमजोरी औरत है.

अब वह हर रोज नएनए पहनावे व मेकअप में शेखर के सामने अपने आप को पेश करने लगी. वह शेखर को किसी भी हालत में खोना नहीं चाहती थी. वह अपनी बांहों की जकड़ शेखर के चारों तरफ इतनी मजबूत कर देना चाहती थी कि वह उस में से जीवन भर निकल न सके. इस के लिए लाजवंती ने शेखर के हर कदम पर पहरा लगा दिया. उस के सामाजिक जीवन की डोर भी अपने हाथों में ले ली. वह चाहती थी कि शेखर जहां भी जाए उसी के शरीर की गंध ढूंढ़ता फिरे.

यह पुरुष जाति से लाजवंती के प्रतिशोध का एक अनोखा ढंग था. अकसर ऐसा होता है कि करता कोई है और भरता कोई. लाजवंती शेखर के चारों तरफ अपना शिकंजा कसती रही और वह छटपटाता रहा.

आखिर तनी हुई रस्सी टूट गई. शेखर ने अपने एक नजदीकी दोस्त से परामर्श किया.

‘‘तुम तलाक क्यों नहीं ले लेते?’’ दोस्त ने कहा.

तलाक…शब्द सुनते ही शेखर के चेहरे का रंग उड़ गया. वह बोला, ‘‘शादी के इतने सालों बाद ढलती उम्र में तलाक?’’

‘‘अरे भई, जब तुम दोनों एक छत के नीचे रहते हुए भी एकदूसरे के नहीं हो और तुम्हारी निगाहें हमेशा औरत की तलाश में भटकती रहती हैं. बच्चों को भी तुम लोगों ने भुला दिया है. कभी तुम ने सोचा है कि इस हर रोज के लड़ाईझगड़े से बच्चों पर क्या असर पड़ता होगा.’’

‘‘तो मैं क्या करूं?’’ शेखर बोला, ‘‘वह पढ़ीलिखी औरत है. मैं ने सोचा था कि स्थिति की गंभीरता को समझ कर या तो वह संभल जाएगी या फिर तलाक के लिए सहमत हो जाएगी पर वह है कि जोंक की तरह चिपटी हुई है.’’

‘‘तुम खुद ही तलाक के लिए आवेदन क्यों नहीं कर देते? वैसे भी हमारे देश में औरतें तलाक देने में पहल नहीं करतीं. एक पति को छोड़ कर दूसरे की गोद का आसरा लेने का चलन अभी मध्यवर्गीय परिवारों में आम नहीं है.’’

‘‘मैं ने इस बारे में बहुत सोचविचार किया है. मुसीबत यह है कि इस देश का कानून कुछ ऐसा है कि कोर्ट से तलाक मिलतेमिलते वर्षों बीत जाते हैं. फिर तलाक की शर्तें भी तो कठिन हैं. केवल मानसिक स्तर बेमेल होने भर से तलाक नहीं मिलता. तलाक लेने के लिए मुझे यह साबित करना पड़ेगा कि लाजवंती बदचलन औरत है.

‘‘इस के लिए झूठी गवाही और झूठे सुबूत के सहारे कोर्ट में उस की मिट्टी पलीद करनी पड़ेगी और तुम तो जानते हो कि यह सब मुझ से नहीं हो सकता’’.

‘‘शेखर, जब तुम तलाक नहीं दे सकते तो भाभी के साथ बैठ कर बात कर लो कि वह ही तुम्हें तलाक दे दें.’’

‘‘यही तो रोना है मेरी जिंदगी का. लाजवंती तलाक क्यों देगी? इतने बड़े अधिकारी की बीवी, यह सरकारी ठाटबाट, नौकरचाकर, मकान, गाड़ी, सुविधाओं के नाम पर क्या कुछ नहीं है उस के पास. जिन संबंधियों के सामने आज वह अभिमान से अपना सिर ऊंचा कर के अपनी योग्यता की डींगें मारती है उन्हीं के पास कल वह कौन सा मुंह ले कर जाएगी. ऐसे में वह भला तलाक क्यों देगी?’’

‘‘देखो शेखर, तुम्हारा मामला बहुत उलझा हुआ है, फिर भी मैं तुम्हें यही सलाह दूंगा कि कोर्ट में आवेदन देने में कोई हर्ज नहीं है.’’

‘‘बात तो सही है. अगर तलाक होने में 10 साल भी लग गए तो इस आजीवन कारावास से तो छुटकारा मिल ही सकता है,’’ शेखर अपने दिल की गहराइयों में डूब गया.

उन्हीं दिनों शेखर का तबादला पटना हो गया. वह लाजवंती को अकेला छोड़ कर बच्चों के साथ पटना चला गया. लाजवंती उसी शहर में इसलिए रुक गई क्योंकि एक कालिज में वह लेक्चरर थी.

घर में अब वह पहली सी रौनक न थी. शेखर के जाते ही तमाम सरकारी साधन, नौकरचाकर भी चले गए. सारा घर सूनासूना हो गया. रात के समय तो मकान की दीवारें काटने को दौड़तीं. इस अकेलेपन से वह धीरेधीरे उकता गई और फिर हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष विजयकुमार की शरण में चली गई.

विजयकुमार और लाजवंती के सोचने- समझने का ढंग एक जैसा ही था, रुचियां एक जैसी थीं. यहां तक कि दोनों के मुंह का स्वाद भी एक जैसा ही था. दोपहर में खाने के दौरान लाजवंती अपना डब्बा खोलती तो विजयकुमार भी स्वाद लेने आ जाता.

‘‘तुम बहुत अच्छा खाना बना लेती हो. कहां से सीखी है यह कला,’’ विजय ने पूछा तो लाजवंती उस की आंखों में कुछ टटोलते हुए बोली, ‘‘अपनी मां से सीखी है मैं ने पाक कला.’’

‘‘कभी डिनर पर बुलाओ तब बात बने,’’ विजयकुमार ने लाजवंती को छेड़ते हुए कहा.

‘‘क्यों नहीं, आने वाले रविवार को मेरे साथ ही डिनर कीजिए,’’ लाजवंती को मालूम था कि पुरुष का दिल पेट के रास्ते से ही जीता जा सकता है.

अगले रविवार को विजयकुमार लाजवंती के घर पहुंच गया.

इस तरह एक बार विजयकुमार को घर आने का मौका मिला तो फिर आने- जाने का सिलसिला ही चल पड़ा. अब विजयकुमार न केवल खाने में बल्कि लाजवंती के हर काम में रुचि लेने लगा. उसे तो अब लाजो में एक आदर्श पत्नी का रूप भी दिखाई देने लगा. उस की निकटता में विजय अपनी गर्लफ्रेंड अर्चना को भी भूल गया जिस के प्रेम में वह कई सालों से बंधा था. अब उस के जीवन का एकमात्र लक्ष्य लाजवंती को पाना था और कुछ भी नहीं.

उधर लाजवंती जैसा चल रहा था वैसा ही चलने देना चाहती थी. इस बंटवारे से उस के जीवन के विविध पहलू निखर रहे थे. भौतिक सुख, ऐशोआराम और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए शेखर का सहारा काफी था और मानसिक संतुष्टि के लिए था विजयकुमार. लाजवंती चाहती थी कि बचीखुची जिंदगी इसी तरह व्यतीत हो, मगर विजय इस बंधन को कानूनी रंग देने पर तुला हुआ था.

विजयकुमार की अपेक्षाओं से घबरा कर लाजवंती ने अपनी छोटी बहन अमृता को आगे कर दिया. उस ने अमृता को अपने पास बुलाया, विजयकुमार से परिचय करवाया और फिर स्वयं पीछे हो गई.

लाजो का यह तीर भी निशाने पर लगा. शारीरिक भूख और आपसी निकटता ने दो शरीरों को एक कर दिया. लाजवंती तो इसी मौके की तलाश में थी. उस ने फौरन दोनों की शादी का नगाड़ा बजवा दिया. विवाह के शोर में लाजवंती के चेहरे पर विजय की मुसकान झलक रही थी.

विजयकुमार ने सोचा कि अमृता के साथ रिश्ता जोड़ने पर लाजवंती भी उस के समीप रहेगी मगर वह औरत की फितरत से अपरिचित था. लाजवंती बहन का हाथ पीला करते ही उस के साए से भी दूर हो गई.

विजयकुमार की आंखों से जब लाजवंती के सौंदर्य का परदा हटा तो उसे पता चला कि वह तो लाजो के हाथों ठगा गया है. अत:  उस ने सोचा एक गंवार को जीवन भर ढोने से तो अच्छा है कि उस से तलाक ले कर छुटकारा पाया जाए.

मन में यह फैसला लेने के बाद विजयकुमार अपनी पूर्व प्रेमिका अर्चना के पास पहुंचा. प्रेम का हवाला दिया. अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी. यही नहीं सारा दोष लाजवंती के कंधों पर लाद कर उस ने अर्चना के मन में यह बात बिठा दी कि वह निर्दोष है. अर्चना अपने प्रेमी की आंखों में आंसू देख कर पसीज गई और उस ने विजयकुमार को माफ कर दिया.

एक दिन अदालत परिसर में शेखर की विजयकुमार से भेंट हुई.

‘‘हैलो विजय, आप यहां… अदालत में?’’ शेखर ने विजयकुमार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हुए कहा.

‘‘आज तारीख पड़ी है,’’ विजय कुमार ने उत्तर दिया.

‘‘कैसी तारीख?’’ शेखर ने फिर पूछा.

‘‘मैं ने अमृता को तलाक देने के लिए कोर्ट में आवेदन किया है,’’ विजयकुमार ने अपनी बात बता कर पूछा बैठा, ‘‘पर शेखर बाबू, आप यहां अदालत में क्या करने आए हैं?’’

‘‘विजय बाबू, आज मेरे भी मुकदमे की तारीख है, मैं भी तो लाजवंती से अलग रह रहा हूं. मैं ने तलाक लेने का मुकदमा दायर कर रखा है,’’ शेखर ने गंभीरता से उत्तर दिया.

फिर 10 साल यों ही बीत गए तारीखें लगती रहीं. काला कोट पहने वकील आते रहे और जाते रहे. फाइलों पर धूल जमती रही और फिर झड़ती रही.

बारबार एक ही नाम दुहराया जाता शेखर सूरी सुपुत्र रामलाल सूरी हाजिर हो… लाजवंती पत्नी शेखर सूरी हाजिर हो…

मां, पराई हुई देहरी तेरी: भैया की शादी होते ही कितना पराया हो गया मीनू का मायका

लेखिका- नीलम कुलश्रेष्ठ 

कमरे में पैर रखते ही पता नहीं क्यों दिल धक से रह जाता?है. मां के घर के मेरे कमरे में इतनी जल्दी सब- कुछ बदल सकता है मैं सोच भी नहीं सकती थी. कमरे में मेरी पसंद के क्रीम कलर की जगह आसमानी रंग हो गया है. परदे भी हरे रंग की जगह नीले रंग के लगा दिए गए हैं, जिन पर बड़ेबड़े गुलाबी फूल बने हुए हैं.

मैं अपना पलंग दरवाजे के सामने वाली दीवार की तरफ रखना पसंद करती थी. अब भैयाभाभी का दोहरा पलंग कुछ इस तरह रखा गया है कि वह दरवाजे से दिखाई न दे. पलंग पर भाभी लेटी हुई हैं. जिधर मेरी पत्रिकाओं का रैक रखा रहता था, अब उसे हटा कर वहां झूला रख दिया गया?है, जिस में वह सफेद मखमली सा शिशु किलकारियां ले रहा है, जिस के लिए मैं भैया की शादी के 10 महीने बाद बनारस से भागी चली आ रही हूं.

‘‘आइए दीदी, आप की आवाज से तो घर चहक रहा था, किंतु आप को तो पता ही है कि हमारी तो इस बिस्तर पर कैद ही हो गई है,’’ भाभी के चेहरे पर नवजात मातृत्व की कमनीय आभा है. वह तकिए का सहारा ले कर बैठ जाती हैं, ‘‘आप पलंग पर मेरे पास ही बैठ जाइए.’’

मुझे कुछ अटपटा सा लगता है. मेरी मां के घर में मेरे कमरे में कोई बैठा मुझे ही एक पराए मेहमान की तरह आग्रह से बैठा रहा है.

‘‘पहले यह बताइए कि अब आप कैसी हैं?’’ मैं सहज बनने की कोशिश करती हूं.

‘‘यह तो हमें देख कर बताइए. आप चाहे उम्र में छोटी सही, लेकिन अब तो हमें आप के भतीजे को पालने के लिए आप के निर्देश चाहिए. हम ने तो आप को ननद के साथ गुरु  भी बना लिया है. सुना है, तनुजी ‘बेबी शो’ में प्रथम आए?थे.’’

मैं थोड़ा सकुचा जाती हूं. भैया मुझ से 3 वर्ष ही तो बड़े थे, लेकिन उन्हीं की जिद थी कि पहले मीनू की शादी होगी, तभी वह शादी करेंगे. मेरी शादी भी पहले हो गई और बच्चा भी.

भाभी अपनी ही रौ में बताए जा रही हैं कि किस तरह अंतिम क्षणों में उन की हालत खराब हो गई थी. आपरेशन द्वारा प्रसव हुआ.

‘‘आप तो लिखती थीं कि सबकुछ सामान्य चल रहा है फिर आपरेशन क्यों हुआ?’’ कहते हुए मेरी नजर अलमारी पर फिसल जाती है, जहां मेरी अर्थशास्त्र की मोटीमोटी किताबें रखी रहती थीं. वहां एक खाने में मुन्ने के कपड़े, दूसरे में झुनझुने व छोटेमोटे खिलौने. ऊपर वाला खाना गुलदस्तों से सजा हुआ है.

‘‘सबकुछ सामान्य ही था लेकिन आजकल ये प्राइवेट नर्सिंग होम वाले कुछ इस तरह ‘गंभीर अवस्था’ का खाका खींचते हैं कि बच्चे की धड़कन कम हो रही है और अगर आधे घंटे में बच्चा नहीं हुआ तो मांबच्चे दोनों की जान को खतरा है. घर वालों को तो घबरा कर आपरेशन के लिए ‘हां’ कहनी ही पड़ती है.’’

‘‘अब तो जिस से सुनो, उस के ही आपरेशन से बच्चा हो रहा है. हमारे जमाने में तो इक्कादुक्का बच्चे ही आपरेशन से होते थे,’’ मां शायद रसोई में हमारी बात सुन रही हैं, वहीं से हमारी बातों में दखल देती हैं.

मेरी टटोलती निगाह उन क्षणों को छूना चाह रही है जो मैं ने अपनी मां के घर के इस कमरे में गुजारे हैं. परीक्षा की तैयारी करनी है तो यही कमरा. बाहर जाने के लिए तैयार होना है तो शृंगार मेज के सामने घूमघूम कर अपनेआप को निखारने के लिए यही कमरा. मां या पिताजी से कोई अपनी जिद मनवानी हो तो पलंग पर उलटे लेट कर रूठने के लिए यही कमरा या किसी बात पर रोना हो तो सुबकने के लिए इसी कमरे का कोना. मेरा क्या कुछ नहीं जुड़ा था इस कमरे से. अब यही इतना बेगाना लग रहा है कि यह अपनी उछलतीकूदती मीनू को पहचान नहीं पा रहा.

‘‘तू यहीं छिपी बैठी है. मैं तुझे कब से ढूंढ़ रहा हूं,’’ भैया आते ही एक चपत मेरे सिर पर लगाते हैं. भाभी के हाथ में कुछ पैकेट थमा कर कहते हैं, ‘‘लीजिए, बंदा आप के लिए शक्तिवर्धक दवाएं व फल ले आया है.’’ फिर मुन्ने को गोद में उठा कर अपना गाल उस के गाल से सटाते हुए कहते हैं, ‘‘देखा तू ने इसे. मां कह रही थीं बचपन में तू बिलकुल ऐसी ही लगती थी. अगर यह तुझ पर ही गया तो इस के नखरे उठातेउठाते हमारी मुसीबत ही आ जाएगी.’’

‘‘मारूंगी, ऐसे कहा तो,’’ मैं तुनक कर जवाब देती हूं. मुझे यह दृश्य भला सा लग रहा है. अपने संपूर्ण पुरुषत्व की पराकाष्ठा पर पहुंचा पितृत्व के गर्व से दीप्त मुन्ने के गाल से सटा भैया का चेहरा. सबकुछ बेहद अच्छा लगने पर भी, इतनी खुश होते हुए भी एक कतरा उदासी चुपके से आ कर मेरे पास बैठ जाती है. मैं भैया की शादी में भी कितनी मस्त थी. भैया की शादी की तैयारी करवाने 15 दिन पहले ही चली आई थी. मैं ने और मां ने बहुत चाव से ढूंढ़ढूंढ़ कर शादी का सामान चुना था. अपने लिए शादी के दिन के लिए लहंगा व स्वागत समारोह के लिए तनछोई की साड़ी चुनी थी. बरात में भी देर तक नाचती रही थी.

मां व मैं घर पर सारी खुशियां समेट कर भाभी का स्वागत करने के लिए खड़ी थीं. भैया भाभी के आंचल से अपने फेंटे की गांठ बांधे धीरेधीरे दरवाजे पर आ रहे थे.

‘‘अंदर आने का कर लगेगा, भैया.’’ मैं ने अपना हाथ फैला दिया था.

‘‘पराए घर की छोकरी मुझ से कर मांग रही है, चल हट रास्ते से,’’ भैया मुझे खिजाने के लिए आगे बढ़ते आए थे.

‘‘मैं तो नहीं हटूंगी,’’ मैं भी अड़ गई थी.

‘‘कमल, झिकझिक न कर, नेग तो देना ही होगा,’’ मां और एक बुजुर्ग महिला ने बीचबचाव किया था.

‘‘तुम्हीं बताओ, इसे कितनी बख्शीश दें?’’ भैया ने स्नेहिल दृष्टि से भाभी को देखते हुए पूछा था.

भाभी तो संकोच से आधे घूंघट में और भी सिमट गई थीं. किंतु मुझे कुछ बुरा लगा था. मुझे कुछ देने के लिए भैया को अब किसी से पूछने की जरूरत महसूस होने लगी है.

अपनी शादी के बाद पहले विनय का फिर तनु का आगमन, सच ही मैं भी अपनी दुनिया में मस्त हो गई थी. मुझे खुश देखती मां, पिताजी व भैया की खुशी से उछलती तृप्त दृष्टि में भी एक कातर रेखा होती थी कि मीनू अब पराई हो गई. मां तो मुझ से कितनी जुड़ी हुई थीं. घर का कोई महत्त्वपूर्ण काम होता है तो मीनू से पूछ लो, कुछ विशेष सामान लाना हो तो मीनू से पूछ लो. शायद मेरे पराए हो जाने का एहसास ही उन के लिए मेरे बिछोह को सहने की शक्ति भी बना होगा.

‘‘संभालो अपने शहजादे को,’’ भैया, मुन्ने को भाभी के पास लिटाते हुए बोले, ‘‘अब पड़ेगी डांट. मैं यह कहने आया था कि मेज पर मां व विनयजी तेरा इंतजार कर रहे हैं.’’

खाने की मेज पर तनु नानी की गोद में बैठा दूध का गिलास होंठों से लगाए हुए है.

मेरे बैठते ही मां विनय से कहती हैं, ‘‘विनयजी, मैं सोच रही हूं कि 3 महीने बाद हम लोग मुन्ने का मुंडन करवा देंगे. आप लोग जरूर आइए, क्योंकि बच्चे के उतरे हुए बाल बूआ लेती है.’’

मैं या विनय कुछ कहें इस से पहले ही भैया के मुंह से निकल पड़ता है, ‘‘अब ये लोग इतनी जल्दी थोड़े ही आ पाएंगे.’’

मैं जानती हूं कि भैया की इस बात में कोई दुराव नहीं है पर पता नहीं क्यों मेरा चेहरा बेरौनक हो उठता है.

विनय निर्विकार उत्तर देते हैं, ‘‘3 महीने बाद तो आना नहीं हो सकता. इतनी जल्दी मुझे छुट्टी भी नहीं मिलेगी.’’

मां जैसे बचपन में मेरे चेहरे की एकएक रेखा पढ़ लेती थीं, वैसे ही उन्होंने अब भी मेरे चेहरे की भाषा पढ़ ली है. वह भैया को हलकी सी झिड़की देती हैं, ‘‘तू कैसा भाई है, अपनी तरफ से ही बहन के न आ सकने की मजबूरी बता रहा है. तभी तो हमारे लोकगीतों में कहा गया है, ‘माय कहे बेटी नितनित आइयो, बाप कहे छह मास, भाई कहे बहन साल पीछे आइयो…’’’ वह आगे की पंक्ति ‘भाभी कहे कहा काम’ जानबूझ कर नहीं कहतीं.

‘‘मां, मेरा यह मतलब नहीं था.’’ अब भैया का चेहरा देखने लायक हो रहा है, लेकिन मैं व विनय जोर से हंस कर वातावरण हलकाफुलका कर देते हैं.

मैं चाय पीते हुए देख रही हूं कि मां का चेहरा इन 10 महीनों में खुशी से कितना खिलाखिला हो गया है. वरना मेरी शादी के बाद उन की सूरत कितनी बुझीबुझी रहती थी. जब भी मैं बनारस से यहां आती तो वह एक मिनट भी चुप नहीं बैठती थीं. हर समय उत्साह से भरी कोई न कोई किस्साकहानी सुनाने में लगी रहती थीं.

‘‘मां, आप बोलतेबोलते थकती नहीं हैं.’’ मैं चुटकी लेती.

‘‘तू चली जाएगी तो सारे घर में मेरी बात सुनने वाला कौन बचेगा? हर समय मुंह सीए बैठी रहती हूं. मुझे बोलने से मत मना कर. अकेले में तो सारा घर भांयभांय करता रहता है.’’

‘‘तो भैया की शादी कर दीजिए, दिल लग जाएगा.’’

‘‘बस, उसी के लिए लड़की देखनी है. तुम भी कोई लड़की नजर में रखना.’’

कभी मां को मेरी शादी की चिंता थी. उन दिनों तो उन के जीवन का जैसे एकमात्र लक्ष्य था कि किसी तरह मेरी शादी हो. लेकिन वह लक्ष्य प्राप्त करने के बाद उन का जीवन फिर ठिठक कर खड़ा हो गया था. कैसा होता है जीवन भी.  एक पड़ाव पर पहुंच कर दूसरे पड़ाव पर पहुंचने की हड़बड़ी स्वत: ही अंकुरित हो जाती है.

‘‘मां, लगता है अब आप बहुत खुश हैं?’’

‘‘अभी तो तसल्ली से खुश होने का समय भी नहीं है. नौकर के होते हुए भी मैं तो मुन्ने की आया बन गई हूं. सारे दिन उस के आगेपीछे घूमना पड़ता है,’’ वह मुन्ने को रात के 10 बजे अपने बिस्तर पर लिटा कर उस से बातें कर रही हैं. वह भी अपनी काली चमकीली आंखों से उन के मुंह को देख रहा है. अपने दोनों होंठ सिकोड़ कर कुछ आवाज निकालने की कोशिश कर रहा है. तनु भी नानी के पास आलथीपालथी मार कर बैठा हुआ है. वह इसी चक्कर में है कि कब अपनी उंगली मुन्ने की आंख में गड़ा दे या उस के गाल पर पप्पी ले ले.

‘‘मां, 10 बज गए,’’ मैं जानबूझ कर कहती हूं क्योंकि मां की आदत है, जहां घड़ी पर नजर गई कि 10 बजे हैं तो अधूरे काम छोड़ कर बिस्तर में जा घुसेंगी क्योंकि उन्हें सुबह जल्दी उठने की आदत है.

‘‘10 बज गए तो क्या हुआ? अबी अमाला मुन्ना लाजा छोया नहीं है तो अम कैसे छो जाएं?’’ मां जानबूझ कर तुतला कर बोलते हुए स्वयं बच्चा बन गई हैं.

थोड़ी देर में मुन्ने को सुला कर मां ढोलक ले कर बैठ जाती हैं, ‘‘चल, आ बैठ. 5 जच्चा शगुन की गा लें, आज दिन भर वक्त नहीं मिला.’’

मैं उबासी लेते हुए उन के पास नीचे फर्श पर बैठ जाती हूं. उन्हें रात के 11 बजे उत्साह से गाते देख कर सोच रही हूं कि कहां गया उन का जोड़ों या कमर का दर्द. मां को देख कर मैं किसी हद तक संतुष्ट हो उठी हूं, अब कभी बनारस में अपने सुखद क्षणों में यह टीस तो नहीं उठेगी कि वह कितनी अकेली हो गई हैं. मेरा यह अनुभव तो बिलकुल नया है कि मां मेरे बिना भी सुखी हो सकती हैं.

नामकरण संस्कार वाले दिन सुबह तो घरपरिवार के लोग ही जुटे थे. भीड़ तो शाम से बढ़नी शुरू होती है. कुछ औरतों को शामियाने में जगह नहीं मिलती, इसलिए वे घर के अंदर चली आ रही हैं. खानापीना, शोरशराबा, गानाबजाना, उपहारों व लिफाफों को संभालते पता ही नहीं लगता कब साढ़े 11 बज गए हैं.

मेहमान लगभग जा चुके हैं. कुछ भूलेभटके 7-8 लोग ही खाने की मेज के इर्दगिर्द प्लेटें हाथ में लिए गपशप कर रहे हैं. बैरों ने तंग आ कर अपनी टोपियां उतार दी हैं. वे मेज पर रखे डोंगों, नीचे रखी व शामियाने में बिखरी झूठी प्लेटों व गिलासों को समेटने में लगे हुए हैं.

तभी एक बैरा गुलाब जामुन व हरी बरफी से प्लेट में ‘शुभकामनाएं’ लिख कर घर के अंदर आ जाता?है. लखनऊ वाली मामी बरामदे में बैठी हैं. वह उन्हीं से पूछता है, ‘‘बहूजी कहां हैं, जिन के बच्चे की दावत है?’’

तभी सारे घर में बहू की पुकार मच उठती है. भाभी अपने कमरे में नहीं हैं. मुन्ना तो झूले में सो रहा है. मैं भी उन्हें मां, पिताजी के कमरे में तलाश आती हूं.

तभी मां मुझे बताती हैं, ‘‘मैं ने ही उसे ऊपर के कमरे में कपड़े बदलने भेजा है. बेचारी साड़ी व जेवरों में परेशान हो रही थी.’’

मैं ऊपर के कमरे के बंद दरवाजे पर ठकठक करती हूं, ‘‘भाभी, जल्दी नीचे उतरिए, बैरा आप का इंतजार कर रहा है.’’

भाभी आहिस्ताआहिस्ता सीढि़यों से नीचे उतरती हैं. अभी उन्होंने जेवर नहीं उतारे हैं. उन के चलने से पायलों की प्यारी सी रुनझुन बज रही है.

‘‘बहूजी, हमारी शुभकामनाएं लीजिए,’’ बैरा सजी हुई प्लेट लिए आंगन में आ कर भाभी के आगे बढ़ाता?है. भाभी कुछ समझ नहीं पातीं. मामी बरामदे में निक्की की चोटी गूंथते हुए चिल्लाती हैं, ‘‘बहू, इन को बख्शीश चाहिए.’’

‘‘अच्छा जी,’’ भाभी धीमे से कह कर अपने कमरे में से पर्स ले आती हैं.

अब तक मां के घर के हर महत्त्वपूर्ण काम में मुझे ही ढूंढ़ा जाता रहा है कि मीनू कहां है? मीनू को बुलाओ, उसे ही पता होगा. मैं…मैं क्यों अनमनी हो उठी हूं. क्या सच में मैं यह नहीं चाह रही कि बैरा प्लेट सजा कर ढूंढ़ता फिरे कि इस घर की बेटी कहां है?

‘‘21 रुपए? इतने से काम नहीं चलेगा, बहूजी.’’

भाभी 51 रुपए भी डालती हैं लेकिन वह बैरा नहीं मानता. आखिर भाभी को झुकना पड़ता है. वह पर्स में से 100 रुपए निकालती हैं. बैरे को बख्शीश देता हुआ उन का उठा हुआ हाथ मुझे लगता है, जिस घर के कणकण में मैं रचीबसी थी, जिस से अलग मेरी कोई पहचान नहीं थी, अचानक उस घर की सत्ता अपनी समग्रता लिए फिसल कर उन के हाथ में सिमट आई है. न जाने क्यों मेरे अंदर अकस्मात कुछ चटखता है.

शादी से जुड़े कुछ डर के बारे में जानकारी दें?

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल

मैं ने सुना है कि यदि शादी से पहले लड़की किसी लड़के से शारीरिक संबंध स्थापित कर ले तो विवाह के बाद उस के पति को पता चल जाता है कि लड़की कुंआरी नहीं है, अर्थात उस का किसी से शारीरिक संबंध रहा है. मैं जानना चाहती हूं कि पति को यह कैसे पता चल जाता है? कृपया मुझे जवाब मेरे मोबाइल पर मैसेज कर दें.

जवाब-

लड़कियों की योनि में एक झिल्ली होती है, जो प्रथम समागम के दौरान फट जाती है. इस से थोड़ा रक्तस्राव होता है और हलकी सी पीड़ा भी होती है. पहले प्रथम सहवास के समय रक्तस्राव न होने को इस बात का प्रमाण माना जाता था कि युवती का कौमार्य भंग हो चुका है. लेकिन आजकल लड़कियों के साइकिल चलाने, गिरने या और किसी वजह से भी कौमार्य झिल्ली फट सकती है.

इस के अलावा कुंआरी युवतियों के यौनांगों में कसावट होती है पर यदि युवती विवाहपूर्व किसी से अवैध संबंध बना चुकी हो तो यौनांग की कसावट खत्म हो जाती है, जिस से पता चल जाता है कि युवती शारीरिक संबंधों की अभ्यस्त है.अगर पति को ऐसा अंदेशा हो जाए तो उन का वैवाहिक जीवन प्रभावित हो सकता है.

अत: विवाहपूर्व ऐसे अनैतिक संबंध बनाने से यथासंभव बचने की सलाह दी जाती है.जहां तक मोबाइल फोन पर आप के प्रश्न का उत्तर देने की बात है तो हम पहले भी कई बार अपने पाठकों को बता चुके हैं कि उन के प्रश्नों के उत्तर सिर्फ गृहशोभा में ही प्रकाशित किए जाते हैं. मैसेज द्वारा संभव नहीं.

ये भी पढ़ें- 

अनिल और सुधा की शादी की पहली रात थी. शादी में आए लोगों के जातेजाते रात का 1 बज गया. तब अनिल की बहन को ध्यान आया कि इस नवविवाहित जोड़े को तो अपने कक्ष में भेजो. चूंकि रात काफी बीत चुकी थी, इसलिए अपने कक्ष में पहुंचते ही अनिल आननफानन सहवास करने लगा तो एक हलकी सी चीख के साथ सुधा उस के बाहुपाश से अलग हो गई. बोली कि नहीं, मैं यह बरदाश्त नहीं कर सकूंगी. मुझे दर्द होता है. बेचारा अनिल मन मसोस कर रह गया. सुधा की दिन पर दिन बीतते चले गए और फिर दर्द की तीव्रता भी बढ़ती चली गई. पहली रात की मिठास कड़वाहट में बदल गई थी. फिर एक दिन जब अनिल ने यह बात अपने दोस्त को बताई तो उस की सलाह पर वह पत्नी के साथ चिकित्सक के पास पहुंचा. तब जा कर दोनों सहवास का आनंद उठाने में कामयाब हो पाए.

वास्तव में सहवास परम आनंद देता है. मगर इस में इस तरह की कोई परेशानी हो जाए तो नौबत तलाक तक की भी आ जाती है.

आइए, जानें कि ऐसी स्थिति आने पर क्या करें:

पतिपत्नी को चाहिए कि भले प्रथम 1-2 मिलन में दर्द हो, तो भी वे संपर्क बनाना न छोड़ें. कामक्रीड़ा करते रहें ताकि एकदूसरे के प्रति आकर्षण बना रहे और दर्द की बात मन में न बैठे.

चूंकि यह शारीरिक से ज्यादा मनोवैज्ञानिक समस्या है, अत: मानसिक स्तर पर भी मजबूत बने रहें.

ऐसे पतिपत्नी को चाहिए कि वे यह सोच कर कि सहवास नहीं करेंगे, प्रतिदिन यौनक्रीड़ा यानी आलिंगन, चुंबन, बाहुपाश में बांधना, सहलाना आदि करते रहें. यौनक्रीड़ा में बहतेबहते उन्हें पता भी नहीं चलेगा कि वे कब सहवास में सफल हो गए. तब सारा डर जाता रहेगा.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर 8588843415 पर  भेजें. 

या हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- sampadak@delhipress.biz सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

जेल में है रत्ना: प्रखर की शादी के बाद क्या हुआ मां का

समाचार को जब विस्तार से पढ़ा तो मेरे पांव के नीचे से जमीन खिसक गई. डा. रत्ना गुप्ता ने अपनी बहू डा. निकिता को जहर दे कर मारने की कोशिश की क्योंकि वह कम दहेज लाई थी और समाचार लिखे जाने तक निकिता नर्सिंग होम में भरती थी. मेरी रत्ना जेल में, ऐसी तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी. उच्च शिक्षित और डिगरी कालिज की प्रवक्ता बहू, खुद रत्ना मेडिकल कालिज में गायनियोलोजिस्ट है और बेटा अभी 3 साल पहले चेकोस्लोवाकिया विश्वविद्यालय में हेड आफ डिपार्टमेंट हो कर गया है. एक साधनसंपन्न घर में जितना कुछ होना चाहिए वह सबकुछ तो है. फिर दोनों तरफ का परिवार पढ़ालिखा सभ्य व प्रतिष्ठित है. ऐसे में दहेज के लिए हत्या करने का प्रयास करने की रत्ना को क्या जरूरत थी.

हां, इतना तो मुझे भी पता था कि बेटे के विवाह के बाद वह काफी बीमार रही थी और उसे कई महीने छुट्टी पर रहना पड़ा था. लेकिन अब तो सबकुछ ठीक था.

मेरे मुंह से अनायास निकल गया, ‘बड़ी बदनसीब है तू रत्ना,’ ‘‘10 साल पहले एक कार दुर्घटना में पति का देहांत हो गया था. तब भी वह बड़ी मुश्किल से संभल पाई थी. मैं बच्चों के भविष्य की दुहाई देदे कर किसी प्रकार इस हादसे से उसे उबार सकी थी.

बेटी गरिमा को कंप्यूटर इंजीनियर बनाया और एक इंजीनियर लड़के से विवाह किया. अकेले ही सारी जिम्मेदारियां निभाती रही वह. ससुराल में था ही कौन? पति के 2 भाई थे. एक की मौत हो गई और दूसरा कब का विदेश में बस चुका था. बेटी गरिमा के विवाह में बतौर मेहमान आया था.

चाचा की शह पर ही प्रखर को भी विदेश जाने की धुन सवार हो गई. अपने सुख में वह यह भी भूल गया कि अकेली मां यहां किस के सहारे रहेगी. प्रखर के विवाह के बाद तो रत्ना के जीवन में जैसे ठहराव सा आ गया. अब किस के लिए क्या करना है?

समय काटने के लिए कोई न कोई बहाना तो चाहिए ही. घर में कब तक बंद रहा जा सकता है? रत्ना ने क्लब ज्वाइन कर लिया. शामें वहीं बीतने लगीं. बेटी की तरफ से बेफिक्र, लेकिन अब तो बेटी गरिमा और बेटे प्रखर के नाम भी वारंट थे जो घटना के समय दूसरे मुल्कों में बैठे थे.

किस से बात करूं कुछ समझ में नहीं आ रहा था. अपनी असहायता और सखी की मुसीबत पर रोने के अलावा और कुछ भी नहीं बचा था. उस के बारे में तरहतरह की कल्पना कर मेरी बुद्धि भी मारे घबराहट के कुंठित हो चली थी. भूल गई कि बचपन की सहेली है तो मायके से ही पता कर लूं.

स्मृतिपटल पर बचपन की ढेरों बातें घूम गईं. साथसाथ पढ़ना, खेलना, खाना, झगड़ना, रूठना, मनाना और बड़ी क्लास में आने पर एकदूसरे से अधिक अंक लाने की होड़ में लाइब्रेरी में बैठ कर किताबों को चाटना.

ज्योंज्यों हम आगे बढ़ते गए हमारे रास्ते अलग होते गए. इंटर के बाद हम ने सी.पी.एम.टी. की परीक्षा दी. रत्ना उत्तीर्ण हुई और मैं अनुत्तीर्ण. मैं ने बी.एससी. में दाखिला ले लिया और वह पढ़ने बाहर चली गई. मैं ने बी.एससी. के बाद बी.एड. किया और फिर शादी हुई तो घरेलू औरत बन गई. रत्ना डा. रत्ना बनने के बाद अपने एक सहयोगी डाक्टर के साथ ही विवाह बंधन में बंध गई.

इस सब से दोनों सखियों की अंतरंगता में कोई अंतर नहीं आया. जब भी हम मिलते बीते समय की जुगाली करते रहते. वह अपने मरीजों को भूल जाती और मैं अपने घरपरिवार के दायित्वों को. यह बात हमारे पति भी जानते थे. इसीलिए हमारी बातचीत में कोई व्यवधान न डाल वे हमारे उत्तरदायित्वों को खुद संभाल लेते थे.

ऐसे ही हंसीखुशी समय गुजरता रहा और हम उम्र की सीढि़यां चढ़ते दादीनानी सभी बन बैठे. जब भी मिलते एकदूसरे से पूछते कि दादीनानी बन कर कैसा लग रहा है? इस सवाल पर रत्ना कहती, ‘यार, मुझे तो लगता ही नहीं कि मैं इतनी बड़ी हो गई हूं. मेरे मन में तो आज भी कालिज की मौजमस्ती घूमती रहती है.’

‘हाल तो मेरा भी यही है, रत्ना. जब बच्चे अम्मांजी और नानीमां कहते हैं तो लगता है जबरदस्ती किसी सुरंग में घसीटा जा रहा है.’

अपनी अंतरंग सहेली के परिवार में गुपचुप ऐसा क्या घुन लग गया कि उसे जेल तक ले पहुंचा. अब पूछूं भी तो किस से? ध्यान आया कि रत्ना के भाई से पूछूं और डायरी में उन का फोन नंबर ढूंढ़ कर उन्हीं से जेल का पता ले मिलने जेल जा पहुंची.

पहले तो हम गले मिल कर खूब रोईं फिर मैं ने शिकायत की, ‘‘तू ने मुझे इस लायक समझना बंद कर दिया है कि अपना सुखदुख भी बांट सके और अकेले यहां तक पहुंच गई. क्या हुआ कुछ तो बता?’’

‘‘कुछ हुआ हो तो बताऊं? बहूबेटे के ईगो की लड़ाई है. प्रखर अपना विदेश जाने का अवसर छोड़ना नहीं चाहता था और बहू अपनी स्थायी नौकरी छोड़ कर साथ जाना नहीं चाहती थी. उस का कहना था कि मैं तुम्हारे लिए अपनी नौकरी क्यों छोड़ूं, तुम्हीं मेरे लिए विदेश का आफर ठुकरा दो.’’

पिछले 1 साल से मायके में रह रही है. पढ़ीलिखी समझदार है. अपना भलाबुरा समझती है. इतना तो मांबाप भी समझा सकते थे. प्रखर ने तो निकिता का वीजा भी बनवा लिया था. अब नहीं जाना चाहती तो मैं क्या कर सकती हूं. इसी खीज में उन्होंने प्रखर पर दूसरी शादी का आरोप लगाया है. दोनों की ईगो में मैं मारी गई क्योंकि प्रखर मेरा बेटा है और मैं ही उन्हें आसानी से उपलब्ध भी हूं.

‘‘पता नहीं निकिता के मन में क्या है? कई बार समझाना चाहा. जब भी बात करती उस का उत्तर होता. ‘मम्मीजी, आप हमारे बीच में न ही बोलें तो अच्छा होगा.’

‘‘‘क्या तुम दोनों मेरे कुछ लगते नहीं? क्या इस ईगो की लड़ाई के लिए ही शादी की थी? यह तो तुम्हें शादी से पहले ही सोचना चाहिए था? तुम दोनों अलगअलग रहते हो तो क्या मुझे दुख नहीं होता?’

‘‘‘दुख होता तो आप प्रखर को समझातीं. सोचने और समझौता करने का काम क्या सिर्फ इसलिए मेरा है कि मैं पत्नी हूं.’

‘‘वह फिर मुझे भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करने की कोेशिश करती.

‘‘‘प्रखर के विदेश जाने पर यहां आप का है ही कौन? आप अकेले किस के सहारे रहेंगी?’

‘‘‘तुम मेरी चिंता छोड़ो. मैं तो अपना वक्त काट लूंगी…इतने समय से नौकरी की है रिटायर हो कर ही निकलूंगी.’

‘‘‘जब आप को अपनी नौकरी से इतना मोह है तो मुझे भी तो है,’ और वह पैर पटकती उठ कर चली जाती.

‘‘उस के पापा भी बेटी को समझाने के बजाय उस का पक्ष लेते हैं और कहते हैं, ‘प्रखर को यदि निकिता को अपने साथ नहीं रखना था तो विवाह ही क्यों किया.’

‘‘‘आप ऐसा कैसे समझते हैं?’

‘‘‘और क्या समझूं? लोग तो अपनी पत्नियों के लिए जाने क्याक्या करते हैं? वह विदेश से लौट कर यहां नहीं आ सकता? उस के आने से आप को भी सहारा होगा.’

‘‘‘बात मेरे सहारे की नहीं उस के कैरियर की है.’

‘‘‘तो बनाता रहे वह अपना कैरियर. मैं भी बताऊंगा उसे कि मैं क्या हूं. मेरी बेटी  का जीवन बरबाद कर के आप का बेटा सुखी नहीं रह सकता.’

‘‘मैं ने उन की धमकी पर ध्यान नहीं दिया. महज गीदड़ भभकी समझा. बस, यहीं गलती की मैं ने. यदि यह सारी बातें गंभीरता से ली होतीं और एक पत्र एस.एस.पी. के यहां लगा दिया होता तो आज यह दिन न देखना पड़ता.’’

सुन कर दुख हुआ मुझे कि किस प्रकार लोग कानून का दुरुपयोग कर रहे हैं. वकील, डाक्टर सब नोटों के सामने कैसेकैसे हाथकंडे अपनाकर बेकुसूरों को फंसाते हैं.

‘‘क्या करूं मैं तेरे लिए जो तू बाहर आ सके,’’ उस के कंधे पर हाथ रख कर शब्दों में अपनापन समेट कर मैं ने कहा.

‘‘निकिता के पापा ऊंची पहुंच वाले आदमी हैं. सोचते हैं कि एक अकेली विधवा औरत उन का क्या बिगाड़ सकती है. उन्हीं की वजह से जमानत नहीं हो पा रही है, अब तो शायद हाईकोर्ट से ही होगी.’’

‘‘और प्रखर?’’

‘‘इस कांड का पता प्रखर को चल गया है. वह आना भी चाहता है पर आने से क्या फायदा? आते ही गिरफ्तार हो जाएगा. मैं ने ही उसे मना कर दिया है कि वह बाहर रह कर ही अपनी और मेरी जमानत का प्रयास करे.’’

‘‘अच्छा, मुझे बता, मेरी कहां जरूरत है?’’

‘‘अभी तेरी जरूरत कहीं नहीं है. वकील सब देख रहा है.’’

आश्वस्त हुई सुन कर और मिल कर. हर रोज मैं जेल जाती रही. कभी फल, कभी बिस्कुट और कभी खाना ले कर. मुझे देख कर रत्ना की आंखें भर आतीं, ‘‘कितना कष्ट दे रही हूं तुझे.’’

‘‘सचमुच तेरी दशा देख कर मुझे कष्ट होता है. क्या अब ऐसा ही समय आ गया है कि बहूबेटे के झगड़े में बेचारी सास को जेल जाना पड़ेगा.’’

‘‘हां, मैं ने सोचसमझ कर यही निष्कर्ष निकाला है कि विवाह के बाद बेटाबहू को अलग रहने दो. कम से कम उन के मनमुटाव में मां को जेल तो नहीं जाना पड़ेगा.’’

‘‘अभी क्या है? जब तू जेल से बाहर आएगी, लोग तुझे ऐसे देखेंगे जैसे तू ने कत्ल किया है? सास की छवि इतनी खराब कर दी गई है कि एक मां बेटे का विवाह करते ही चुड़ैल बन जाती है.’’

‘‘मैं भी क्या करूंगी यह समझ में नहीं आ रहा. अब क्या नौकरी कर पाऊंगी? स्टाफ के बीच तरहतरह की चर्चाएं होंगी. लोग जाने क्याक्या कह रहे होेंगे,’’ रो पड़ी थी रत्ना.

इस तरह की जाने कितनी बातें जेल में होती रहीं. 20 दिन लग गए रिहाई में. आज रत्ना को साथ ले कर लौटी हूं. जम कर सोऊंगी और रत्ना आगे की योजना बनाती सारी रात जाग कर काट देगी क्योंकि उस की यातनाओं का अभी अंत नहीं हुआ है.

आंखों से नींद कोसों दूर हो गई है. दोनों सोने का बहाना किए छत्तीस का आंकड़ा बनी लेटी हैं. वह अपना भविष्य देख रही है और मैं उस का. कई साल लग गए फैसला होने में. रत्ना ने समय से पहले ही रिटायरमेंट ले ली. तारीखें पड़ती रहीं और वह अब मरीज देख कर दवाई की पर्ची लिखने की जगह वकील से कानूनी दांवपेंच पर विचारविमर्श करती रहती. ज्यादा तनाव होे जाता तो रात को नींद की गोली खा लेती. बननासंवरना सब छूट गया. जब भी मिलती मैं हमेशा टोकती, ‘‘स्वयं को संभाल रत्ना. तू खुद को दोषी क्यों समझती है? तू तो बिना किए अपराध की सजा पा रही है.’’

‘‘यही तो दुख है और दुख का भार अब सहा नहीं जाता. प्रखर की तरफ देखती हूं तो दुख और बढ़ जाता है.’’

मैं ने कस कर रत्ना का हाथ थाम लिया. देखा प्रखर को भी है, सारे बाल पक गए हैं. चेहरे पर एक अजीब सी उदासी छा गई है.  विदेश की नौकरी छोड़ दी है. रत्ना के साथ केस डिसकस करता रहता है. फैसला होने तक वह दूसरे विवाह के बारे में सोच भी नहीं सकता. उस दिन केस का फैसला होना था. तलाक के 3 अक्षरों पर हस्ताक्षर होने और रत्ना को बाइज्जत बरी होने में 10 साल लग गए. फैसले के बाद पुत्र प्रखर के साथ रत्ना एक तरफ बढ़ गई और निकिता अपने पापा के साथ दूसरी ओर.

कचहरी के मुख्य दरवाजे से दोनों साथसाथ बाहर निकले. पल भर को ठिठकी निकिता, फिर धीरेधीरे रत्ना और प्रखर के पास आ कर खड़ी हो गई. रत्ना की आंखें आग उगलना ही चाहती थीं कि निकिता बोली, ‘‘आई एम सौरी मम्मी, सौरी प्रखर.’’

इन 10 सालों में जीवन की दिशा ही बदल गई. सबकुछ बिखर गया और आज यह लड़की कह रही है आई एम सौरी.

‘‘सौरी, निकिता,’’ कह कर प्रखर आगे बढ़ गया. ठगी सी खड़ी देखती रह गई रत्ना. क्या नियति अभी कुछ और दिखाना चाहती है. कुछ कदम चल कर निकिता गिर कर बेहोश हो गई. प्रखर के आगे बढ़ते कदम रुक गए. उस ने निकिता को गोद में उठाया, गाड़ी में लिटाया और गाड़ी हवा से बातें करने लगी. भूल गया कि मां और मौसी साथ आई हैं.

अचानक रत्ना को फिर जेल की चारदीवारी स्मरण हो आई. लगा वह बाइज्जत बरी नहीं हुई है बल्कि आजीवन  कारावास की सजा उसे मिली है. जेल में सलाखों के पीछे सीमेंट के फर्श पर बैठी है, लोग उस पर हंस रहे हैं और उस का मजाक उड़ा रहे हैं.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें