सलाह लेना जरूरी: क्या पत्नी का मान रख पाया रोहित?

घंटी बजी तो मैं खीज उठी. आज सुबह से कई बार घंटी बज चुकी थी, कभी दरवाजे की तो कभी टेलीफोन की. इस चक्कर में काम निबटातेनिबटाते 12 बज गए. सोचा था टीवी के आगे बैठ कर इतमीनान से नाश्ता करूंगी. बाद में मूड हुआ तो जी भर कर सोऊंगी या फिर रोहिणी को बुला कर उस के साथ गप्पें मारूंगी, मगर लगता है आज आराम नहीं कर पाऊंगी.

दरवाजा खोला तो रोहिणी को देख मेरी बांछें खिल गईं. रोहिणी मेरी ओर ध्यान दिए बगैर अंदर सोफे पर जा पसरी.

‘‘कुछ परेशान लग रही हो, भाई साहब से झगड़ा हो गया है क्या?’’ उस का उतरा चेहरा देख मैं ने उसे छेड़ा.

‘‘देखा, मैं भी तो यही कहती हूं, मगर इन्हें मेरी परवाह ही कब रही है. मुफ्त की नौकरानी है घर चलाने को और क्या चाहिए? मैं जीऊं या मरूं, उन्हें क्या?’’ रोहिणी की बात का सिरपैर मुझे समझ नहीं आया. कुरेदने पर उसी ने खुलासा किया, ‘‘2 साल की पहचान है, मगर तुम ने देखते ही समझ लिया कि मैं परेशान हूं. एक हमारे पति महोदय हैं, 10 साल से रातदिन का साथ है, फिर भी मेरे मन की बात उन की समझ में नहीं आती.’’

‘‘तो तुम ही बता दो न,’’ मेरे इतना कहते ही रोहिणी ने तुनक कर कहा, ‘‘हर बार मैं ही क्यों बोलूं, उन्हें भी तो कुछ समझना चाहिए. आखिर मैं भी तो उन के मन की बात बिना कहे जान जाती हूं.’’

रोहिणी की फुफकार ने मुझे पैतरा बदलने पर मजबूर कर दिया, ‘‘बात तो सही है, लेकिन इन सब का इलाज क्या है? तुम कहोेगी नहीं, बिना कहे वे समझेंगे नहीं तो फिर समस्या कैसे सुलझेगी?’’

‘‘जब मैं ही नहीं रहूंगी तो समस्या अपनेआप सुलझ जाएगी,’’ वह अब रोने का मूड बनाती नजर आ रही थी.

‘‘तुम कहां जा रही हो?’’ मैं ने उसे टटोलने वाले अंदाज में पूछा.

‘‘डूब मरूंगी कहीं किसी नदीनाले में. मर जाऊंगी, तभी मेरी अहमियत समझेंगे,’’ उस की आंखों से मोटेमोटे आंसुओं की बरसात होने लगी.

‘‘यह तो कोई समाधान नहीं है और फिर लाश न मिली तो भाई साहब यह भी सोच सकते हैं कि तू किसी के साथ भाग गई. मैं बदनाम महिला की सहेली नहीं कहलाना चाहती.’’

‘‘सोचने दो, जो चाहें सोचें,’’ कहने को तो वह कह गई, मगर फिर संभल कर बोली, ‘‘बात तो सही है. ऐसे तो बड़ी बदनामी हो जाएगी. फांसी लगा लेती हूं. कितने ही लोग फांसी लगा कर मरते हैं.’’

‘‘पर एक मुश्किल है,’’ मैं ने उस का ध्यान खींचा, ‘‘फांसी लगाने पर जीभ और आंखें बाहर निकल आती हैं और चेहरा बड़ा भयानक हो जाता है, सोच लो.’’

बिना मेकअप किए तो रोहिणी काम वाली के सामने भी नहीं आती. ऐसे में चेहरा भयानक हो जाने की कल्पना ने उस के हाथपांव ढीले कर दिए. बोली, ‘‘फांसी के लिए गांठ बनानी तो मुझे आती ही नहीं, कुछ और सोचना पड़ेगा,’’ फिर अचानक चहक कर बोली, ‘‘तेरे पास चूहे मारने वाली दवा है न. सुना है आत्महत्या के लिए बड़ी कारगर दवा है. वही ठीक रहेगी.’’

‘‘वैसे तो तेरी मदद करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं, पर सोच ले. उसे खा कर चूहे कैसे पानी के लिए तड़पते हैं. तू पानी के बिना तो रह लेगी न?’’ उस की सेहत इस बात की गवाह थी कि भूखप्यास को झेल पाना उस के बूते की बात नहीं.

रोहिणी ने कातर दृष्टि से मुझे देखा, मानो पूछ रही हो, ‘‘तो अब क्या करूं?’’

‘‘छत से कूदना या फिर नींद की ढेर सारी गोलियां खा कर सोए रहना भी विकल्प हो सकते हैं,’’ मुश्किल वक्त में मैं रोहिणी की मदद करने से पीछे नहीं हट सकती थी.

‘‘ऊफ, छत से कूद कर हड्डियां तो तुड़वाई जा सकती हैं, पर मरने की कोई गारंटी नहीं और गोली खाते ही मुझे उलटी हो जाती है,’’ रोहिणी हताश हो गई.

हर तरकीब किसी न किसी मुद्दे पर आ कर फेल होती जा रही थी. आत्महत्या करना इतना मुश्किल होता है, यह तो कभी सोचा ही न था. दोपहर के भोजन पर हम ने नए सिरे से आत्महत्या की संभावनाओं पर विचार करना शुरू किया तो हताशा में रोहिणी की आंखें फिर बरस पड़ीं. मैं ने उसे सांत्वना देते हुए कहा, ‘‘कोई न कोई रास्ता निकल ही आएगा, परेशान मत हो.’’

रोहिणी ने छक कर खाना खाया. बाद में 2 गुलाबजामुन और आइसक्रीम भी ली वरना उस बेचारी को तो भूख भी नहीं थी. मेरी जिद ने ही उसे खाने पर मेरा साथ देने को मजबूर किया था.

चाय के दूसरे दौर तक पहुंचतेपहुंचते मुझे विश्वास हो गया कि आत्महत्या के प्रचलित तरीकों से रोहिणी का भला नहीं होने वाला. समस्या से निबटने के लिए नवीन दृष्टिकोण की जरूरत थी. बातोंबातों में मैं ने रोहिणी के मन की बात जानने की कोशिश की, जिस को कहेसुने बिना ही उस के पति को समझना चाहिए था.

बहुत टालमटोल के बाद झिझकते हुए उस ने जो बताया उस का सार यह था कि 2 दिन बाद उसे भाई के साले की बेटी की शादी में जाना था और उस के पास लेटैस्ट डिजाइन की कोई साड़ी नहीं थी. इसलिए 4 माह बाद आने वाले अपने जन्मदिन का गिफ्ट उसे ऐडवांस में चाहिए था ताकि शादी में पति की हैसियत के अनुरूप बनसंवर कर जा सके और मायके में बड़े यत्न से बनाई गई पति की इज्जत की साख बचा सके.

मुझे उस के पति पर क्रोध आने लगा. वैसे तो बड़े पत्नीभक्त बने फिरते हैं, पर पत्नी के मन की बात भी नहीं समझ सकते. अरे, शादीब्याह पर तो सभी नए कपड़े पहनते हैं. रोहिणी तो फिर भी अनावश्यक खर्च बचाने के लिए अपने गिफ्ट से ही काम चलाने को तैयार है. लोग तनख्वाह का ऐडवांस मांगते झिझकते हैं, यहां तो गिफ्ट के ऐडवांस का सवाल है. भला एक सभ्य, सुसंस्कृत महिला मुंह खोल कर कैसे कहेगी? पति को ही समझना चाहिए न.

‘‘अगर मैं बातोंबातों में भाई साहब को तेरे मन की बात समझा दूं तो कैसा रहे?’’ अचानक आए इस खयाल से मैं उत्साहित हो उठी. असल में अपनी प्यारी सहेली को उस के पति की लापरवाही के कारण खो देने का डर मुझे भी सता रहा था.

एक पल के लिए खिल कर उस का चेहरा फिर मुरझा गया और बोली, ‘‘उन्हें फिर भी न समझ आई तो?’’

मैं अभी ‘तो’ का जवाब ढूंढ़ ही रही थी कि टेलीफोन घनघना उठा. फोन पर रोहिणी के पति की घबराई हुई आवाज ने मुझे चौंका दिया.

‘‘रोहिणी मेरे पास बैठी है. हां, हां, वह एकदम ठीक है,’’ मैं ने उन की घबराहट दूर करने की कोशिश की.

‘‘मैं तुरंत आ रहा हूं,’’ कह कर उन्होंने फोन काट दिया. कुछ पल भी न बीते थे कि दरवाजे की घंटी बज उठी.

दरवाजा खोला तो रोहिणी के पति सामने खड़े थे. रोहित भी आते दिखाई दे गए. इसलिए मैं चाय का पानी चढ़ाने रसोई में चली गई और रोहित हाथमुंह धो कर रोहिणी के पति से बतियाने लगे.

रोहिणी की समस्या के निदान हेतु मैं बातों का रुख सही दिशा में कैसे मोड़ूं, इसी पसोपेश में थी कि रोहिणी ने पति के ब्रीफकेस में से एक पैकेट निकाल कर खोला. कुंदन और जरी के खूबसूरत काम वाली शिफोन की साड़ी को उस ने बड़े प्यार से उठा कर अपने ऊपर लगाया और पूछा, ‘‘कैसी लग रही है? ठीक तो है न?’’

‘‘इस पर तो किसी का भी मन मचल जाए. बहुत ही खूबसूरत है,’’ मेरी निगाहें साड़ी पर ही चिपक गई थीं.

‘‘पूरे ढाई हजार की है. कल शोकेस में लगी देखी थी. इन्होंने मेरे मन की बात पढ़ ली, तभी मुझे बिना बताए खरीद लाए,’’ रोहिणी की चहचहाट में गर्व की झलक साफ थी.

एक यह है, पति को रातदिन उंगलियों पर नचाती है, फिर भी मुंह खोलने से पहले ही पति मनचाही वस्तु दिलवा देते हैं. एक मैं हूं, रातदिन खटती हूं, फिर भी कोई पूछने वाला नहीं. एक तनख्वाह क्या ला कर दे देते हैं, सोचते हैं सारी जिम्मेदारी पूरी हो गई. साड़ी तो क्या कभी एक रूमाल तक ला कर नहीं दिया. तंग आ गई हूं मैं इन की लापरवाहियों से. किसी दिन नदीनाले में कूद कर जान दे दूंगी, तभी अक्ल आएगी, मेरे मन का घड़ा फूट कर आंखों के रास्ते बाहर आने को बेताब हो उठा. लगता है अब अपनी आत्महत्या के लिए रोहिणी से दोबारा सलाहमशवरा करना होगा.

ऐक्टर दारासिंग ने सिंगापुर के प्रधानमंत्री को इम्पोर्टेन्ट हेल्थ इश्यूज के बारे में दिए इंट्रेस्टिंग सजेशन

मिस्टर इंडिया इंटरनेशनल 2017 का खिताब जीतने और मिस्टर इंटरनेशनल 2018 में भारत का प्रतिनिधित्व करने के बाद चर्चा में आए, मौडल और ऐक्टर दारासिंग खुराना अपने सोशल सर्विस
एक्टिविटीज के लिए भी जाने जाते हैं, वे पौज.ब्रीद.टौक फाउंडेशन चलाते हैं. जिसके जरिये वे सिर्फ 250 रूपये में लोगों को थेरेपी प्रोवाइड करते हैं. जिसकी एक्चुअल प्राइज ढाई से तीन हजार रूपये पर सेशन होती है.

सिंगापुर के पीएम से की मुलाकात इम्पोर्टेन्ट इश्यूज पर की बात

दारासिंग ने हाल ही में कामनवेल्थ हेड्स औफ़ गवर्नमेंट मीटिंग के सिलसिले में समोआ का दौरा किया, जहां उनकी मुलाकात सिंगापुर के प्राइम मिनिस्टर लॉरेंस वोंग से डिनर पर हुई जिसकी मेजबानी समोआ की प्रधानमंत्री माननीय फियामे नाओमी माताफा ने की थी. इस दौरान दारासिंग ने सिंगापुर के प्रधानमंत्री को कुछ जरूरी मुद्दों से अवगत कराया, उन्होंने उन्हें बताया कि पिछले महीने की एक इंटरनेशनल रिपोर्ट के मुताबित सिंगापूर में हर तीन में से एक व्यक्ति एन्जाइटी या डिप्रेशन का शिकार हैं, क्योंकि वहां टेक्नोलौजी का उपयोग बहुत ज़्यादा किया जाता है और साथ ही लोग लगभग तीन घंटे सोशल मीडिया पर बिताते है जिसका परिणाम एन्जाइटी या डिप्रेशन के रूप में उभरकर सामने आया है.

लाइफस्टाइल चेंज की बहुत जरूरत-

ऐसे में दारासिंग ने उन्हें सजेस्ट किया कि मौडर्न मेडिकल टेकनीक के साथसाथ सिंगापूरवासिंयों को लाइफस्टाइल चेंज की बहुत जरूरत है. इस लाइफस्टाइल चेंज में आयुर्वेदा और स्प्रिट्युऐलिटी बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे क्यूंकि भारत आयुर्वेदा और स्प्रिट्युऐलिटी के लिए जाना जाता है. हम इस पोजिटिव चेंज को लाने में सिंगापूर की मूल स्तर पर सहायता कर सकते हैं. गौर करनेवाली बात यह है कि दारा के यह सजेशन उन्हें काफी इंट्रेस्टिंग लगे और उन्होंने इसपर उन्हें पौजिटिव रिस्पौन्स भी दिया.

कामनवेल्थ ईयर औफ यूथ चैंपियन

आपको बता दें कि दारासिंग को इस साल कामनवेल्थ ईयर औफ यूथ चैंपियन के रूप में चुना गया , जो इस पद को पाने वाले पहले एशियाई और कुल मिलाकर दूसरे व्यक्ति बन गए हैं. दारासिंग मेन्टल हेल्थ के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए सबसे आगे हैं. जो मिस्टर इंडिया इंटरनेशनल 2017 का खिताब जीतने और मिस्टर इंटरनेशनल 2018 में भारत का प्रतिनिधित्व करने के बाद प्रसिद्धि में आए

फिल्मी करियर

दारा सिंह खुराना ने पंजाबी फिल्म ‘बाई जी कुट्टंगे’ से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की थी. इसमें मिस यूनिवर्स (2021) हरनाज कौर संधू ने भी काम किया था. दारा सिंह खुराना, फिल्म हियर मी के लिए भी जाने जाते हैं इसके अलावा दारासिंग ने हिन्दी फिल्म कागज 2 में भी काम किया. ये फिल्म इसी साल मार्च 2024 में रिलीज हुई थी. कागज 2 बॉलीवुड ड्रामा फिल्म है, जिसका निर्देशन वीके प्रकाश ने किया. इस फिल्म में अनुपम खेर, सतीश कौशिक, दर्शन कुमार, नीना गुप्ता और स्मृति कालरा जैसे बेहतरीन स्टार्स ने काम किया था. इस फिल्म के निर्माता शशि सतीश कौशिक, निशांत कौशिक, गणेश जैन और रतन जैन थे.

तलाक की खबरों के बीच Aishwarya Rai ने शेयर किया वीडियो, कहा- ‘अपने लिए हमेशा खड़े रहे’

अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय (Aishwarya Rai) ने इन दिनों अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर सुर्खियों में है. लंबे समय से कपल की तलाक की खबरें छाई हुई है. लेकिन ऐश्वर्या और अभिषेक बच्चन की तरफ से अब तक कोई रिऐक्शन नहीं आया है. तलाक की रिपोर्ट्स के बीच ऐश्वर्या राय ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर किया है. जिसमें वह अपने लिए स्टैंड लेने की बात करती नजर आ रही हैं. ऐश्वर्या हिंसा और उत्पीड़न के बारे में बात करती नजर आ रही हैं. वह स्ट्रीट हैरसमेंट के खिलाफ आवाज उठाने के लिए महिलाओं को मोटिवेट कर रही हैं.

मेरा शरीर, मेरी कीमत

वीडियो में ऐश्वर्या राय ये कहती हुई नजर आ रही हैं कि ‘सड़क पर होने वाले उत्पीड़न से कैसे निपटें? आंख से आंख मिलाने से बचें? नहीं. समस्या को सीधे आंखों में देखें. अपना सिर ऊंचा रखें. फेमिनिन और फेमिनिस्ट. ऐश्वर्या ने आगे ये भी कहा कि मेरा शरीर, मेरी कीमत. कभी भी अपनी इज्जत से समझौता न करें. खुद पर शक न करें. अपने लिए खड़े हों. अपनी ड्रेस या अपनी लिपस्टिक को दोष न दें. सड़क पर होने वाला उत्पीड़न कभी भी आपकी गलती नहीं होती.

ऐश्वर्या का ये वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है. ऐश और अभिषेक के बीच तलाक की खबरें लगभग एक साल से चल रही है. लेकिन इस पर बच्चन परिवार की तरफ से कोई रिऐक्शन नहीं आया था. लेकिन हाल ही में अभिताभ बच्चन ने अपने एक ब्लौग के जरिए तलाक की खबर पर विराम लगाई. बिग बी ने लिखा, ‘अलग होने और जीवन में इसकी मौजूदगी पर विश्वास करने के लिए बहुत साहस, दृढ़ विश्वास और ईमानदारी की आवश्यकता होती है. मैं परिवार के बारे में बहुत कम ही कहता हूं, क्योंकि यह मेरा क्षेत्र है और इसकी गोपनीयता मेरे द्वारा बनाए रखी जाती है. अटकलें तो अटकलें ही हैं. वे बिना सत्यापन के अटकलें लगाए गए झूठ हैं.”

अभिषेक बच्चन ने की  ऐश्वर्या राय की तारीफ 

ऐश्वर्या ने हाल ही में बेटी आराध्या के बर्थडे बैश की फोटोज शेयर की थीं. जिसमें अभिषेक उनके साथ नहीं थे. किसी भी फोटो में बच्चन परिवार का कोई भी सदस्य शामिल नहीं था. अभिषेक बच्चन ने अपनी हाल ही रिलीज हुई फिल्म I Want To Talk को प्रमोट करने में बिजी हैं. इसी बीच एक रिपोर्ट एक्टर ने एक इंटरव्यू के दौरान अपनी पर्सनल लाइफ के बारे में भी बात की.

अभिषेक बच्चन ने अपनी पत्नी ऐश्वर्या राय की तारीफ की. जूनियर बच्चन ने कहा, ‘अपने घर में भी मैं बहुत लकी हूं कि मुझे बाहर जाकर फिल्में बनाने का मौका मिलता है. मैं जानता हूं कि ऐश्वर्या आराध्या के साथ घर पर हैं और इसके लिए मैं उन्हें बहुत धन्यवाद देता हूं. लेकिन मुझे नहीं लगता कि बच्चे इसके बारे में इस तरह सोचते हैं.’

अभिषेक बच्चन को किसी तरह का स्ट्रेस पसंद नहीं

अभिषेक बच्चन ने कहा, ‘मुझे अपने डायरेक्टर, को-स्टार्स और सेट पर सभी तकनीशियनों के साथ कंफर्टेबल रहने की जरूरत है. इससे भी ज्यादा जरूरी है वातावरण के साथ सहज रहना. मैं यह ऐसे ही पसंद है. मुझे किसी तरह का स्ट्रेस पसंद नहीं.’

हैदराबाद डिलाइट: प्रज्ञा और मनीष के साथ कौनसी घटना घटी

‘‘मनीष ने आज औफिस में ठीक से लंच भी नहीं किया था. बस 2 कौफी और 1 सैंडविच पर पूरा दिन गुजर गया था. रास्ते में भयंकर ट्रैफिक जाम था. घर पहुंचतेपहुंचते 8 बज गए थे.

मनीष ने घर पहुंचते ही कपड़े बदले और अपनी पत्नी भावना से बोला, ‘‘जल्दी खाना लगायो यार, कस कर भूख लगी है.’’

भावना मुंह बनाते हुए बोली, ‘‘इतना क्यों चिल्ला रहे हो, गुगु अभी सोई है. रसोई में खाना लगा हुआ है, ले लो.’’

खाने को देखते ही मनीष की भूख गायब हो गई. पानीदार तरी में कुछ तोरी के टुकड़े तैर रहे थे और सूखे आलुओं में कहींकहीं काला जीरा दिख रहा था. मनीष का मन हुआ थाली फेंक दे. बिना स्वाद किसी तरह से मनीष ने निवाले गटके और बाहर जाने के लिए जैसे ही चप्पलें पहन रहा था कि भावना दनदनाते हुएआ गई और बोली, ‘‘अब फिर से कहां जा रहे हो?’’

मनीष खीजते हुए बोला, ‘‘इतने स्वादिष्ठ खाने के बाद पान खाने जा रहा हूं.’’

भावना ने भी मानो आज लड़ाई करने की ठान रखी थी. बोली, ‘‘हां मालूम है साहब कुछ और करने जा रहे हैं. बच्चे क्या अकेले मेरे हैं? सारा दिन बच्चे देखो, रसोई में पकवान बनाओ और फिर इन के नखरे.’’

मनीष की कार न चाहते हुए भी हैदराबाद डिलाइट के सामने खड़ी थी. वहां की चिकन बिरयानी उसे बेहद पसंद थी. अंदर बेहद भीड़ थी. बस एक टेबल खाली थी जहां पर पहले से एक लड़की बैठे हुए बिरयानी ही खा रही थी.

मनीष लड़की के सामने बैठते हुए बोला, ‘‘क्या मैं यहां बैठ सकता हूं?’’

लड़की बोली, ‘‘जरूर, आज यहां बेहद भीड़ है.’’

मनीष ने बिरयानी और कोल्ड ड्रिंक और्डर करी और मोबाइल में गेम खेलने लगा. तभी मनीष के फोन की घंटी बजी.

मनीष जल्दबाजी में यह बात भूल गया था कि फोन स्पीकर पर है. जैसे ही उस ने फोन लिया, उधर से भावना के चिल्लाने की आवाज आने लगी, ‘‘मैं क्या तुम्हारी नौकरानी हूं… कहां हो? अगर फौरन वापस न आए तो पूरी रात बाहर रहना.’’

मनीष एकाएक शर्म से पानीपानी हो गया. तभी सामने बैठी हुई लड़की खिलखिलाते हंसते हुए बोली, ‘‘अगर तुम्हारी मैडम ने वाकई दरवाजा नहीं खोला तो क्या करोगे?’’

मनीष झेंप गया और बोला, ‘‘लगता है तुम भी अपने पति के साथ ऐसा कुछ करती हो.’’

लड़की बोली, ‘‘हम तो भई इस पतिपत्नी के खेल से आजाद हैं.’’

इसी बीच मनीष की बिरयानी भी आ गई थी और उस लड़की की फिरनी. लड़की ने खुद ही पहल करते हुए अपना नाम बताया. लड़की का नाम प्रज्ञा था और वह एक स्थानीय कंपनी में इंजीनियर थी. दोनों कुछ देर तक हैदराबाद डिलाइट की बिरयानी की तारीफ करते रहे.

प्रज्ञा ने फिर मनीष को फिरनी भी ट्राई करने के लिए कहा. मनीष बिल चुकाते हुए बोला, ‘‘अब अगर कुछ देर और रुका तो वाकई बाहर ही रुकना पड़ेगा.’’

घर आ कर मनीष के ऊपर भावना की बातों का कोई असर नहीं हो रहा था.चिकन बिरयानी खा कर उस का मन तृप्त हो चुका था, मगर भावना के सामने उसे ?ाठ ही बोलना पड़ा कि वह बाहर टहलने निकला था. मनीष का कितना मन करता था कि वह भावना के साथ अपने मन का खाना खा सके. मगर भावना तो अंडे पर भी नाकभौं सिकोड़ती थी. हर समय कभी एकादशी, कभी पूर्णमासी तो कभी अमावस्या का व्रत चलता रहता था.

मनीष को शादी के बाद ऐसे लगने लगा था कि वह घर में नहीं किसी होस्टल में रह रहा है. भावना को मनीष की लहसुन खाने से ले कर  चिकन खाने तक से प्रौब्लम थी. उसे लगता था कि ब्राह्मण हो कर भी मनीष का ये सब खानापीना उसे शोभा नहीं देता. मगर मनीष को लगता, भावना जो मांसमछली से परहेज करती है पर क्या यह काफी है उस के करीब जाने के लिए.

भावना का हर छोटीबड़ी बात पर काम वाली पर जाहिलों की तरह चिल्लाना, हर महीने छोटीछोटी बातों पर उस की तनख्वाह काट लेना, मंदिर में कीर्तन के समय बुराई करना क्या ये सब करने से ब्राह्मण ब्राह्मण कहलाता है?

रविवार की सुबह मनीष उठने के बाद भी बिस्तर पर यों ही अलसाया से लेटे रहना चाहता था. तभी भावना जलती नजरों से उस के सामने आई और हैदराबाद डिलाइट का बिल फेंकते हुए बोली, ‘‘शर्म नहीं आती तुम्हें ?ाठ बोलते हुए? कैसे ब्राह्मण हो कर झूठ बोलते

हो? चिकन खाते हो? तुम ने कल मेरा व्रत भंग कर दिया.’’ मनीष को समझ नहीं आया उस के चिकन बिरयानी खाने से भावना का व्रत कैसे भंग हो गया.

पूरे 2 घंटे तक चाय की प्रतीक्षा करने के बाद मनीष ने खुद ही अपनी और भावना की चाय बनाई और भावना को चाय पकड़ाते हुए बोला, ‘‘भावना, मैं क्या करूं यार मुझ से यह घासफूस नहीं खाया जाता है.’’

भावना आंखों से अंगारे बरसाते हुए बोली, ‘‘हां ये सब तो मैं अपने लिए कर रही हूं. शादी से पहले मेरे घर वालों ने साफसाफ बता दिया था कि मैं विशुद्ध शाकाहारी हूं. मगर तुम्हारे घर वालों ने कहा था कि लड़का कभीकभी औफिस पार्टी में नौनवेज खा लेता है. रोज खाएगा यह भी नहीं बताया था.’’

घर के तनाव से मुक्त होने के लिए मनीष दोनों बच्चों को कार में बैठा कर पार्क ले गया. तभी पीछे से किसी महिला की आवाज सुनाई दी. पलट कर देखा तो प्रज्ञा खड़ी थी.

‘‘आप भी इस पार्क में आते हैं अपने बालगोपाल को ले कर?’’ मनीष मुसकराते हुए बोला, ‘‘ताकि इन की मम्मी नाश्ता बना सके.’’

रात के अंधेरे में जो प्रज्ञा मनीष को लड़की लग रही थी, मगर दिन के उजाले में प्रज्ञा मनीष को अपनी हमउम्र ही लग रही थी. प्रज्ञा कुछ देर तक गुगू और आर्य के साथ बात करती रही और फिर मनीष से बोली, ‘‘चलो आप

लोगों को आज रुस्तम के बड़े सांभर का स्वाद चखाया जाए.’’

जब तक मनीष और बच्चों ने बड़ा सांभर खाया तब तक भावना का फोन आ गया. भावना ने नाश्ते में दलिया परोस दिया. मनीष ने मन ही मन प्रज्ञा को धन्यवाद किया वरना यह बेस्वाद दलिया मनीष को चिढ़ाने के लिए काफी था.

आज संडे था. मनीष को लगा शायद भावना लंच में कुछ अच्छा सा बना दे, मगर भावना का आज घर की सुखशांति के लिए एकादशी का व्रत था.

मनीष की शादी की यह एक ऐसी समस्या थी जिसे शायद कोई समस्या भी नहीं मानता था. मनीष की मम्मी के अनुसार मनीष की जीभ बहुत चटोरी है. अगर भावना मनीष की सेहत को ध्यान में रख कर उसे हैल्दी खाना देती है तो इस में क्या गलत है?’’

मनीष कैसे बताए कि उस के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है. अपने ही घर में वह अपनी पसंद का खाना नहीं खा सकता है.

मनीष को आज भी याद है, जब शादी के बाद पहली बार भावना और मनीष ने हैदराबाद में नई गृहस्थी शुरू करी थी. अगले दिन प्यार में मनीष ने नाश्ता बनाया था.उसे मालूम था कि भावना वैजिटेरियन है इसलिए उस ने भावना के लिए वेज सैंडविच और अपने लिए आमलेट बनाया था. मगर भावना ने इतना शोर मचाया कि ऐसा लगा कि मनीष ने कोई अपराध कर दिया हो.

‘‘तुम ने रसोई में अंडा कैसे पका लिया. पूरे घर का शुद्धिकरण करना होगा.’’ मनीष को समझ ही नहीं आता था कि पढ़लिख कर भी भावना की सोच ऐसी कैसे है.

मनीष ने कभी भावना को किसी भी बात के लिए फोर्स नहीं किया था. मगर भावना ने मनीष के खानपान पर पहरे लगा रखे थे. नतीजा यह हुआ कि मनीष अधिकतर खाना चिढ़ कर बाहर ही खाता. इस कारण उस का कोलैस्ट्रौल और तनाव दोनों ही बढ़ रहे थे.

भावना को जब भी पता चलता मनीष बाहर से नौनवेज खा कर आया, वह न तो उसे करीब आने देती और न ही उस से बोलती. नतीजा यह हुआ अब मनीष और भावना के रिश्ते में झूठ भी पांव पसारने लगा था.

कभीकभी मनीष को लगता कि उन के रिश्ते के कारण बच्चों के साथ अन्याय हो रहा है, मगर भावना जरा भी बदलना नहीं चाहती थी. उसे मनीष के बाहर भी नौनवेज खाने से समस्या थी.

करीब 10 दिन बाद ऐसे ही एक झगड़े के बाद मनीष ने हैदराबाद डिलाइट का रुख किया. वहां पर आज भी प्रज्ञा बैठी थी.

मनीष प्रज्ञा के सामने बैठते हुए बोला, ‘‘तुम क्या यहां पर ही डिनर करती हो?’’

प्रज्ञा बोली, ‘‘और अगर मैं तुम से पूछूं तो?’’

मनीष ने कहा, ‘‘चलो आज मैं तुम्हें ट्रीट देता हूं.’’

प्रज्ञा बोली, ‘‘आज यहां चिकन की कोई आइटम नहीं है. मैं तो बिरयानी का पार्सल लेने आई हूं, तुम घर चलो मैं ने मसाला अंडा बना रखा है.’’

मनीष बोला, ‘‘इस समय?’’

‘‘चिंता न करो, घर पर मैं ही अपना परिवार हूं.’’

न जाने क्यों मनीष बिना किसी जानपहचान के भी प्रज्ञा के साथ चला गया. प्रज्ञा का घर मनीष के घर से न ज्यादा दूर था और न ही एकदम करीब. प्रज्ञा का घर छोटा मगर खूबसूरत था. बड़े ही नफासत से प्रज्ञा ने बिरयानी, मसाला अंडा, पापड़, रायता सजा दिया था. खाना बेहद ही लजीज था और उस से भी अधिक लजीज थी प्रज्ञा की बातें और सब से बड़ी बात वो आजादी जो उसे आज पहली बार खाते हुए महसूस हुई थी.

न कभी मनीष ने प्रज्ञा की निजी जिंदगी के बारे में कुछ पूछा और न ही कभी प्रज्ञा ने मनीष की निजी जिंदगी में दखल दिया. एक मौन अनुबंध था दोनों के बीच और इस मौन अनुबंध के भावों का गवाह हैदराबाद डिलाइट था. कभी हर हफ्ते तो कभी महीने में 2 बार जिसे जैसे सुविधा होती दोनों हैदराबाद डिलाइट में मिल लेते थे. बहुत बार मनीष को लगता क्या अपनी पसंद का आजादी से खाना खाना इतना महत्त्वपूर्ण है कि इसी कारण वह प्रज्ञा के करीब जा रहा है. उधर प्रज्ञा के लिए भी मनीष के साथ अपनी दोस्ती एक पहेली सी लगती जो खानपान पर आधारित है.

धीरेधीरे हैदराबाद डिलाइट प्रज्ञा और मनीष की जिंदगी का वह जायका बन गया जिस ने दोनों की फीकी जिंदगी में स्वाद भर दिया.

सांझ का भूला: आखिर हुआ क्या था सीता के साथ

सीता ने अपने नए फ्लैट का दरवाजा खोला. कुली ट्रक से सामान उतार कर सीता के निर्देश पर उन्हें यथास्थान रख गया. कुली के जाने के बाद सीता ने अपना रसोईघर काफी मेहनत से सजाया. सारा दिन घर में सामान को संवारने में ही निकल गया. शाम को सीता जब आराम से सोफे पर बैठी तो उसे अजीब सी खुशी महसूस हुई. बरसों की घुटन कम होती हुई सी लगी.

सीता को खुद के फैसले पर विश्वास नहीं हो रहा था. 50 वर्ष की उम्र में वह घर की देहरी पार कर अकेली निकल आई है. यह कैसे संभव हुआ? वैसे आचारशील परिवार की नवविवाहिता संयुक्त परिवार से अलग हो कर अपनी गृहस्थी अलग बसा ले तो कोई बात नहीं, क्योंकि ऐसा चलन तो आजकल आम है. लेकिन घर की बुजुर्ग महिला गृह त्याग दे और अलग जीने लगे तो यह सामान्य बात नहीं है. सीता के दिमाग में सारी अप्रिय घटनाएं एक बार फिर घूमने लगीं.

सीता कर्नाटक संगीत के शिक्षक शिवरामकृष्णन की तीसरी बेटी थी. पिताजी अच्छे गायक थे, पर दुनियादारी नहीं जानते थे. अपने छोटे से गांव अरिमलम को छोड़ कर वे कहीं जाना नहीं चाहते थे. उन का गांव तिरुच्ची के पास ही था. गांव के परंपरावादी आचारशील परिवार, जहां कर्नाटक संगीत को महत्त्व दिया जाता था, शहर की ओर चले गए. गांव में कुल 3 मंदिर थे.

आमंत्रण के उत्सवों और शादीब्याह में गाने का आमंत्रण शिवरामकृष्णन को मिलता था. उन के कुछ शिष्य घर आ कर संगीत सीखते थे. सीता की मां बीमार रहती थीं और सीता ही उन की देखभाल करती थी. पिताजी ने किसी तरह दोनों बहनों की शादी कर दी थी. एक छोटा भाई भी था, जो स्कूल में पढ़ रहा था. सीता अपनी मां का गौर वर्ण और सुंदर नयननक्श ले कर आई थी.

घने काले बाल, छरहरा बदन और शांत चेहरा बड़ा आकर्षक था. एक उत्सव में तिरुच्ची से आए रामकृष्णन के परिवार के लोगों ने सीता को देखा और उसी दिन शाम को रामकृष्णन ने अपने बेटे रविचंद्रन के साथ सीता की सगाई पक्की कर ली. सीता के पिता ने भी झटपट बेटी का ब्याह रचा दिया.

सीता का ससुराल जनधन से वैभवपूर्ण था. उस का पति कुशल बांसुरीवादक था. वह जब बांसुरीवादन का अभ्यास करता तो राह चलते लोग खड़े हो कर सुनने लगते थे, लेकिन सीता को कुछ ही समय में पता लगा कि उस का पति बुरी संगति के कारण शराबी बन गया है और अपनी इसी लत के कारण वह कहीं टिक कर काम नहीं कर पाता.

कुल 4 वर्षों की गृहस्थी ही सीता की तकदीर में लिखी थी. रविचंद्रन फेफड़े के रोग का शिकार बन कर खांसते हुए सीता को छोड़ कर चल बसा. सासससुर पुत्र शोक से बुझ कर गांव चले गए. जेठ ने सीता को मायके जाने को कह दिया.

सीता अपने दोनों नन्हे पुत्रों को ले कर अपनी दीदी के यहां चेन्नई में रहने लगी. उस ने अपनी छूटी हुई पढ़ाई फिर से शुरू कर दी. दीदी के घर का पूरा काम अपने कंधे पर उठाए सीता गुस्सैल जीजा के क्रोध का सामना करती. उस ने किसी तरह संगीत में एम.ए. तक की शिक्षा पूरी की और शहर के प्रसिद्ध महिला कालिज में प्रवक्ता के पद पर काम करने लगी.

सीता के दोनों बेटे 2 अलग दिशाओं में प्रगति करने लगे. बड़ा बेटा जगन्नाथ पिता की तरह संगीतकार बना. वह फिल्मों में सहायक संगीत निर्देशक के रूप में काम करने लगा. अपनी संगीत टीम की एक विजातीय गायिका मोनिका को जगन्नाथ घर ले कर आया तो सीता ने पूरी बिरादरी का विरोध सहन करते हुए जगन्नाथ और मोनिका का विवाह रचाया था. दूसरा बेटा बालकृष्णन ग्रेनेट व्यापार में लग गया. अपनी कंपनी के मालिक ईश्वरन की पुत्री के साथ उस का विवाह हो गया.

सीता ने दोनों बेटों का पालनपोषण काफी मेहनत से किया था. वह उन पर कड़ा अनुशासन रखती थी. मां का संघर्ष, परिवार में मिले कटु अनुभवों ने दोनों बेटों की हंसी छीन ली थी. विवाह के बाद ही दोनों बेटे हंसनेबोलने लगे थे. सैरसपाटे पर जाना, दोस्तों को घर बुलाना, होटल में खाना दोनों को ही अच्छा लगने लगा. कुछ समय तक सीता का घर खुशहाल रहा, लेकिन सीता के जीवन में फिर आंधी आई.

भाग्यलक्ष्मी के पिता काफी संपन्न थे. इसलिए उस के पास ढेर सारे गहने और कांचीपुरम की कीमती रेशमी साडि़यां थीं. उस पर हर 2-3 दिन के बाद वह मायके जाती और वापसी पर फलमिठाइयां भरभर कर लाती थी. मोनिका यह सब देख कर जलभुन जाती थी. सीता दोनों बहुओं को किसी तरह संभालती थी. दोनों के मनमुटाव के बीच फंस कर घर का सारा काम सीता को ही करना पड़ता था.

पोंगल के त्योहार के समय बहुओं को उन के मायके से एक सप्ताह पहले ही नेग आ जाता. भाग्यलक्ष्मी के मातापिता अपनी बेटी, दामाद और सास के कपड़े आदि ले कर आ गए. भाग्यलक्ष्मी काफी खुश थी. पोंगल के पर्व के दिन सीता ने बहुओं को मेहंदी रचाने के लिए बुलाया. भाग्यलक्ष्मी ने मेहंदी रचा ली तो मोनिका का क्रोध फूट पड़ा, ‘बड़ी बहू को पहले न बुला कर छोटी बहू को पहले मेहंदी लगा दी, मुझे नीचा दिखाना चाहती हैं न आप?’

मोनिका के कठोर व्यवहार के कारण घर में कलह शुरू हो गई. बालकृष्णन का व्यापार भाग्यलक्ष्मी के परिवार से जुड़ा था. वह पत्नी का रोनाधोना देख नहीं पा रहा था. वही हुआ जिस का सीता को डर था. बालकृष्णन अपने ससुर के यहां रहने चला गया. कुछ समय तक वह सीता से मिलने आताजाता रहा पर धीरेधीरे उस का आना कम हो गया. मोनिका अपने पति के साथ संगीत के कार्यक्रमों में जुड़ी रहती थी. घर के कामों में उस की कभी रुचि रही ही नहीं. यहां तक कि सवेरे स्नान कर रसोईघर में आने के रिवाज का भी वह पालन नहीं करती थी.

मोनिका को जाने क्यों कभी सीता के साथ लगाव रहा ही नहीं. सीता बहू को प्रसन्न रखने के लिए काफी प्रयास करती थी. इस के बाद भी मोनिका का कटु व्यवहार बढ़ता ही जाता था. यहां तक कि वह अपने बेटे मोहन को उस की दादी सीता से हमेशा दूर रखने का यत्न करती थी. सीता अंदर से टूटती रही, अकेले में रोती रही और अंत में अलग फ्लैट ले कर रहने का कष्टपूर्ण निर्णय उस ने लिया था.

आदतवश सीता सुबह 4 बजे ही जग गई. आंख खुलते ही घर की नीरवता का भान हुआ तो झट से अपना मन घर के कामकाज में लगा लिया. रसोईघर में खड़ी सीता फिर एक बार चौंकी. भरेपूरे मायके और ससुराल में हमेशा वह 5-7 लोगों के लिए रसोई बनाती थी. आज पहली बार उसे सिर्फ अपने लिए भोजन तैयार करना है. लंबी सांस लेती हुई वह काम में जुटी रही.

मन में खयाल आया कि बहू मोनिका नन्हे चंचल मोहन को संभालते हुए नाश्ता और भोजन अकेले कैसे तैयार कर पाएगी? जगन्नाथ को प्रतिदिन नाश्ता में इडलीडोसा ही चाहिए. इडली बिलकुल नरम हो, सांभर के साथ नारियल की चटनी भी हो, यह जरूरी है. दोपहर के भोजन में भी उसे सांभर, पोरियल (भुनी सब्जी), कूट्टू (तरी वाली सब्जी), दही, आचार के साथ चावल चाहिए. इतना कुछ मोनिका अकेले कैसे तैयार कर पाएगी? सीता ने अपना लंच बौक्स बैग में रख लिया. उसे अकेले बैठ कर नाश्ता करने की इच्छा नहीं हुई. केवल कौफी पी कर वह कालिज चल पड़ी. कालिज में उसे अपने इस नए घर का पता कार्यालय में नोट कराना था. मैनेजर रामलक्ष्मी ने तनिक आश्चर्य से पूछा, ‘‘आप का अपना मकान टी. नगर में है न? फिर आप उतने अच्छे इलाके को छोड़ कर यहां विरुगंबाकम में क्यों आ गईं?’’

सीता फीकी हंसी हंस कर बात टाल गई. कालिज में कुछ ही समय में बात फैल गई कि सीता बेटेबहू से लड़ कर अलग रहने लगी है. ‘जाने इस उम्र में भी लोग कैसे परिपक्व नहीं होते, छोटों से लड़तेझगड़ते हैं. जब बड़ेबूढ़े ही घर छोड़ कर भागने लगेंगे तो समाज का क्या हाल होगा?’ इस तरह के कई ताने सुन सीता खून का घूंट पी कर रह जाती थी. सीता को अकेला, स्वतंत्र जीवन अच्छा भी लग रहा था.

रोजरोज की खींचातानी, तूतू, मैंमैं से तो छुटकारा मिल गया. घर को सुचारु रूप से चलाने के लिए वह कितना काम करती थी फिर भी मोनिका ताने देती रहती थी. सीता ने अपने वैधव्य का सारा दुख अपने दोनों बेटों के चेहरों को निहारते हुए ही झेला था पर आज स्थिति बदल गई है. आज बेटे भी मां को भार समझने लगे हैं.

बहुओं की हर बात मानने वाले दोनों बेटे अपनी मां के दिल में झांक कर क्यों नहीं देखना चाहते हैं? बहुओं का अभद्र व्यवहार सहन करते हुए क्या सीता को ही घुटघुट कर जीना होगा. सीता ने जब परिवार से अलग रहने का निर्णय लिया तब दोनों बेटे चुप ही रहे थे. सीता की आंखों में आंसू भर आए. सीता के पति रविचंद्रन का श्राद्ध था.

सीता अपने बेटेबहुओं व पोतों के साथ गांव में ही जा कर श्राद्ध कार्य संपन्न कराती थी. गांव में ही सीता के सासससुर, बूआ और अन्य परिजन रहते हैं. जगन्नाथ ही सब के लिए टिकट लिया करता था. गांव में पत्र भेज कर पंडितजी और ब्राह्मणों से सारी तैयारी करवा कर रखता था. श्राद्ध में कुल 8 दिन बाकी हैं और अब तक सीता को किसी ने कोई खबर नहीं दी. क्या दोनों बेटे उसे बिना बुलाए ही गांव चले जाएंगे? सीता अकेले गांव पहुंचेगी तो बिरादरी में होहल्ला हो जाएगा.

अभी तक तो उस के अलग रहने की बात शहर तक ही है. सीता का मन घबराने लगा. अपने अलग फ्लैट में रहने की बात वह अपने सासससुर से क्या मुंह ले कर कह पाएगी. उस के वयोवृद्ध सासससुर आज भी संयुक्त परिवार में ही जी रहे हैं. ससुर की विधवा बहन, विधुर भाई, भाई के 2 लड़के, दूर रिश्ते की एक अनाथ पोती सब परिवार में साथ रहते हैं. उन्होंने सीता को भी गांव में आ कर रहने को कहा था, पर वह ही नहीं आई थी. क्या इतने लोगों के बीच मनमुटाव नहीं रहता होगा? क्या आर्थिक परेशानियां नहीं होंगी? पता नहीं ससुरजी कैसे इस उम्र में सबकुछ संभालते हैं?

सीता ने मन मार कर जगन्नाथ को फोन किया. मोनिका ने ही फोन उठाया. जगन्नाथ किसी फिल्म की रिकार्डिंग के सिलसिले में सिंगापुर गया हुआ था. सीता गांव जाने के बारे में मोनिका से कुछ भी पूछ नहीं पाई. बालकृष्णन भी बंगलुरु गया हुआ था. भाग्यलक्ष्मी ने भी गांव जाने के बारे में कुछ नहीं कहा.

सीता को पहली बार घर त्यागने का दर्द महसूस हुआ. क्या करे वह? टे्रन से अपने अकेले का आरक्षण करा ले? पर यह भी तो पता नहीं कि लड़कों ने गांव में श्राद्ध करने की व्यवस्था की है या नहीं? उसे अपने दोनों बेटों पर क्रोध आ रहा था. क्या मां से बातचीत नहीं कर सकते हैं? लेकिन सीता अपने बेटों से न्यायपूर्ण व्यवहार की अपेक्षा कैसे कर सकती है? उस ने स्वयं परिवार त्याग कर बेटों से दूरी बना ली है. अब कौन किसे दोष दे? सीता ने अंत में गांव जाने के लिए अपना टिकट बनवा लिया और कालिज में भी छुट्टी की अर्जी दे दी.

सीता विचारों के झंझावात से घिरी गांव पहुंची थी. उस के पहुंचने के बाद ही जगन्नाथ, मोनिका, बालकृष्णन, भाग्यलक्ष्मी, मोहन और कुमार पहुंचे. सीता ने जैसेतैसे बात संभाल ली. श्राद्ध अच्छी तरह संपन्न हुआ. सीता की वृद्ध सास और बूआ उस के परिवार के बीच में अलगाव को देख रही थीं. मोहन अपनी दादी सीता के गले लग कर बारबार पूछ रहा था, ‘‘ ‘पाटी’ (दादी), आप घर कब आएंगी? आप हम से झगड़ कर चली गई हैं न? मैं भी अम्मां से झगड़ने पर घर छोड़ कर चला जाऊंगा.’’

‘‘अरे, नहीं, ऐसा नहीं बोलते, जाओ, कुमार के साथ खेलो,’’ सीता ने मुश्किल से उसे चुप कराया. शहर वापसी के लिए जब सब लोग तैयार हो गए तब सीता के ससुर ने अपने दोनों पोतों को बुला कर पूछा, ‘‘तुम दोनों अपनी मां का ध्यान रखते हो कि नहीं? तुम्हारी मां काफी दुबली और कमजोर लगती है. जीवन में बहुत दुख पाया है उस ने. अब कम से कम उसे सुखी रखो.’’

जगन्नाथ और बालकृष्णन चुपचाप दादा की बात सुनते रहे. उन्हें साष्टांग प्रणाम कर सब लोग चेन्नई लौट गए थे. गांव से वापस आने के बाद सीता और भी अधिक बुझ गई थी. कितने महीनों बाद उस ने अपने दोनों बेटों का मुंह देखा था. दोनों प्यारे पोतों का आलिंगन उसे गद्गद कर गया था. बहू मोनिका भी काम के बोझ से कुछ थकीथकी लग रही थी पर उस की तीखी जबान तो पहले जैसे ही चलती रही थी. जगन्नाथ काफी खांस रहा था. वह कुछ बीमार रहा होगा.

बालकृष्णन अपने चंचल बेटे कुमार के पीछे दौड़तेदौड़ते ऊब रहा था. भाग्यलक्ष्मी बालकृष्णन का ज्यादा ध्यान नहीं रख रही थी. खैर, मुझे क्या? चलाएं अपनीअपनी गृहस्थी. मेरी जरूरत तो किसी को भी नहीं है. सब अपना घर संभाल रहे हैं. मैं भी अपना जीवन किसी तरह जी लूंगी. सीता के कालिज में सांस्कृतिक कार्यक्रम था. अध्यापकगण अपने परिवार के साथ आए थे. अपने साथियों को परिवार के साथ हंसताबोलता देख कर सीता के मन में कसैलापन भर गया. उसे अपने परिवार की याद सताने लगी. हर वर्ष उस के दोनों बेटे इस कार्यक्रम में आते थे. सीता इस कार्यक्रम में गीत गाती थी. मां के सुरीले कंठ से गीत की स्वरलहरी सुन दोनों बेटे काफी खुश होते थे. आज सांस्कृतिक कार्यक्रम में अकेली बैठी सीता का मन व्यथित था.

सीता को इधर कुछ दिनों से अपनी एकांत जिंदगी नीरस लगने लगी थी. न कोई तीजत्योहार ढंग से मना पाती और न ही किसी सांस्कृतिक आयोजन में जा पाती. कहीं चली भी गई तो लोग उस से उस के परिवार के बारे में प्रश्न अवश्य पूछते थे. पड़ोसी भी उस से दूरी बनाए रखते थे.

एक दिन सीता ने अपने 2 पड़ोसियों की बातें सुन ली थीं : ‘‘मीना, तुम अपने यहां मत बुलाना. हमारे सुखी परिवार को उस की नजर लग जाएगी. पता नहीं, इतने बड़े फ्लैट में वह अकेली कैसे रहती है. जरूर इस में कोई खोट होगा, तभी तो इसे पूछने कोई नहीं आता है.’’

सीता यह संवाद सुन कर पसीना- पसीना हो गई थी. दरवाजे की घंटी लगातार बज रही थी. सीता हड़बड़ा कर उठी. रात भर नींद नहीं आने के कारण शायद भोर में आंख लग गई. सीता की नौकरानी सुब्बम्मा आ गई थी. सुब्बम्मा जल्दीजल्दी सफाई का काम करने लगी. सीता ने दोनों के लिए कौफी बनाई.

‘‘अम्मां, मुझे बेटे के लिए एक पुरानी साइकिल लेनी है. बेचारा हर दिन बस से आताजाता है. बस में बड़ी भीड़ रहती है. तुम मुझे 600 रुपए उधार दे दो. मैं हर महीने 100-100 रुपए कर के चुका दूंगी,’’ सुब्बम्मा बरतन मलतेमलते कह रही थी. ‘‘लेकिन सुब्बम्मा, तुम्हारा बेटा तो तुम्हारी बात नहीं सुनता है. तुम्हें रोज 10 गालियां देता है. कमाई का एक पैसा भी तुम्हें नहीं देता…रोज तुम उस की सैकड़ों शिकायतें करती हो और अब उस के लिए कर्ज लेना चाहती हो,’’ सीता कौफी पीते हुए आश्चर्य से पूछ रही थी.

‘‘अरे, अम्मां, अपनों से ही तो हम कहासुनी कर सकते हैं. बेचारा बदनसीब मेरी कोख में जन्मा इसीलिए तो गरीबी का सारा दुख झेल रहा है. अच्छा खानाकपड़ा कुछ भी तो मैं उसे नहीं दे पाती हूं. बेटे के आराम के लिए थोड़ा कर्ज ले कर उसे साइकिल दे सकूं तो मुझे संतोष होगा. फिर मांबेटे में क्या दुश्मनी टिकती है भला…अब आप खुद का ही हाल देखो न. इन 7-8 महीनों में ही आप कितनी कमजोर हो गई हैं. अकेले में आराम तो खूब मिलता है पर मन को शांति कहां मिलती है?’’ सुब्बम्मा कपड़ा निचोड़ती हुई बोले जा रही थी. ‘‘सुब्बम्मा, तुम आजकल बहुत बकबक करने लगी हो. चुपचाप अपना काम करो,’’ सीता को कड़वा सच शायद चुभ रहा था.

‘‘अम्मां, कुछ गलत बोल गई हूं तो माफ करना. मैं आप का दुख देख रही हूं. इसी कारण कुछ मुंह से निकल गया. अम्मां, मुझे रुपए कलपरसों देंगी तो अच्छा रहेगा. एक पुरानी साइकिल मैं ने देख रखी है. दुकानदार रुपए के लिए जल्दी कर रहा है,’’ सुब्बम्मा ने अनुनय भरे स्वर में कहा. ‘‘सुब्बम्मा, रुपए आज ही ले जाना. चलो, जल्दी काम पूरा करो. देर हो रही है,’’ सीता रसोईघर में चली गई.

सीता का मन विचलित होने लगा. ‘ठीक ही तो कहती है सुब्बम्मा. जगन्नाथ और बालकृष्णन को देखे बिना उसे कितना दुख होता है. पासपड़ोस में बेटेबहू की निंदा भी तो होती होगी. सास को घर से निकालने का दोष बहुओं पर ही तो लगाया जाता है. अपने पोतों से दूर रहना कितना दर्दनाक है. कुमार और मोहन दादी से बहुत प्यार करते हैं. आखिर परिवार से दूर रह कर अकेले जीवन बिताने में उसे क्या सुख मिल रहा है? ‘सुब्बम्मा जैसी साधारण महिला भी परिवार के बंधनों का मूल्य जानती है. परिवार से अलग होना क्या कर्तव्यच्युत होना नहीं है? परिवार में यदि हर सदस्य अपने अहं को ही महत्त्व देता रहे तो सहयोगपूर्ण वातावरण कैसे बनेगा?

‘बहू उस के वंश को आगे ले जाने वाली वाहिका है. बहू का व्यवहार चाहे जैसा हो, परिवार को विघटन से बचाने के लिए उसे सहन करना ही होगा. उस की भी मां, दादी, सास, सब ने परिवार के लिए जाने कितने समझौते किए हैं. मां को घर से निकलते देख कर जगन्नाथ को कितना दुख हुआ होगा?’ सीता रात भर करवट बदलती रही.

सुबह होते ही उस ने दृढ़ निश्चय के साथ जगन्नाथ को फोन लगाया और अपने वापस घर आने की सूचना दी. सीता को मालूम था कि उसे बहू मोनिका के सौ ताने सुनने होंगे. अपने पुत्र जगन्नाथ का मौन क्रोध सहन करना पड़ेगा. बालकृष्णन और भाग्यलक्ष्मी भी उसे ऊंचनीच कहेंगे. सीता ने मन ही मन कहा, ‘सांझ का भूला सुबह को घर लौट आए तो वह भूला नहीं कहलाता.’

दूसरी बार लिटिल एंजेल की मां बनी टीवी ऐक्ट्रैस Aditi Shrama, सोशल मीडिया पर शेयर किया इमोशनल पोस्ट

‘सिलसिला बदलते रिश्तों का’, और ‘कथा अनकही,’ टीवी शो की एक्ट्रेस अदिती शर्मा (Aditi Shrama) ने एक बार फिर मां बनने का सुख उठाया है. इस बार वह लिटिल एंजेल की मां बनी है. अदिति और उनके ऐक्टर पति सरवर आहूजा एक बेटे के बाद अब एक बेटी के पेरेंट्स भी बन गए हैं. अब उनकी फैमिली कंप्लीट हो गई है. अदिति शर्मा ने यह गुड न्यूज सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए फैंस के साथ शेयर की है.

आपको बता दे अदिति और सरवर ने 2014 में शादी की थी.  इस गुड न्यूज की अनाउंसमेंट के साथ , कपल ने एक इमोशनल पोस्ट को सोशल मीडिया पर शेयर किया, जिसे सब लोग खूब लाइक कर रहे है. कपल ने पोस्ट के साथ कई फोटोज शेयर की है, जिसमें कुछ मैटरनिटी फोटोशूट भी हैं. इन फोटोज में अदिति बेबी बंशादी के पांच साल बाद, 2019 में उन्होंने अपने पहले बच्चे, बेटे सरताज आहूजा को जन्म दिया था. अब कपल ने अपने दूसरे बेबी की अनाउंसमेंट की है.प के साथ नजर आ रहीं हैं.

अनदेखी फोटोज-

अदिति देव शर्मा ने सोशल मीडिया पर अपने मैटरनिटी फोटोशूट की कुछ अनदेखी फोटोज शेयर कीं. जिसमें उनके बेटे सरताज ने एक स्लेट पकड़ी हुई है, उस पर लिखा है, “बड़ा भाई बन गया हूं” और दूसरी फोटो में, सरताज ने स्लेट पकड़ी हुई है, जिस पर लिखा है, “एक बेबी गर्ल है.” हैप्पी फैमिली वाली इस फोटो में सभी ने ब्लैक कलर की ड्रेस पहनी हुई है और उनके फेस पर खुशियों की झलक साफ दिख रही है.

इमोशनल पोस्ट

एक्ट्रेस अदिति देव शर्मा नेपोस्ट में लिखा, “प्यारी बच्ची, इस दुनिया में आने से पहले ही, प्लीज जान लो कि आपका इंतजार किया जा रहा था, आपके लिए प्रार्थना की जा रही थी, प्यार किया जा रहा था, आपका ख्याल रखा जा रहा था और आपको चाहा जा रहा था.”

अदिति शर्मा ने आगे लिखा, “वह आ चुकी है और वह फेबुलस है… तुम्हारी मनमोहक खुशबू, वो छोटे पैर, छोटी नाजुक उंगलियां, चमकती आंखें, गु गु और बू बू और तुम्हारे अस्तित्व की आभा ने हमारे जीवन को आने वाले मजेदार समय की उम्मीदों से भर दिया है. यूनिवर्स का आभार कि उसने हम दोनों को दुनियां का सबसे अच्छा आशीर्वाद दिया है. प्यार… आभारी.”

बधाइयों का सिलसिला

अदिति शर्मा की इस पोस्ट को देख कर उनके फैंस की खुशी का ठिकाना नही है. उनके दोस्त और फैंस कपल को बधाइयां दे रहे हैं और न्यूबोर्न बेबी को आशीर्वाद दे रहे हैं. एक फैंस ने लिखा, ‘बधाई हो, अदिति और सरवर! आपकी छोटी राजकुमारी सच में आप जैसे पैरेंट्स पाकर धन्य है.’ एक फैन ने कमेंट किया, “बेबी को देखने के लिए इंतजार नहीं कर सकता! आपके परिवार को दुनिया की सारी खुशियां मिलें.’
अब, अदिति और सरवर की फैमिली कंप्लीट हो गई एक बार फिर उनका घर खुशियों से भर गया है.

वैडिंग प्लानर रखने के हैं बेहद फायदे, कुछ अफवाहों पर न करें भरोसा

सुनीता अपनी सहेली मिली की शादी में गई. वहां उस ने देखा कि सहेली की मां सुबहशाम बेटी की शादी में नईनई साड़ी पहन कर हर फंक्शन का आनंद ले रही है. सुनीता मन ही मन सोचने लगी कि मेरी शादी में मेरी मां इतनी व्यस्त थी कि उन्हें एक अच्छी साड़ी पहनने तक का समय नहीं था, जबकि मिली की मां इतनी खुश और रिलैक्स कैसे रह रही हैं? उन्होंने आंटी से इस का राज पूछ लिया और पता चला कि उन्होंने पूरी शादी के लिए वैडिंग प्लानर को अरैंज्ड किया है, जिस की वजह से उन के पास समय की कमी नहीं है और वे बेटी की शादी पूरी तरह से ऐंजौय कर रही हैं.

जरूरत वैडिंग प्लानर की

यह सही है कि आज की तारीख में शादी के दिन का आयोजन सुचारु रूप से चलाने के लिए वैडिंग प्लानर को नियुक्त करना फायदेमंद होता है. वैडिंग प्लानर की मदद से आप अपने खास दिन का आनंद परिवार के साथ ले सकते हैं और तनाव से बच सकते हैं.

इस बारे में मुंबई की प्राइम पेलेट इवैंट्स इंटेरटैनमैंट के वैडिंग प्लानर, सुमित मोहरे कहते हैं कि आजकल शादी में वैडिंग प्लानर का होना बहुत जरूरी होता है, क्योंकि पहले ट्रैडिशनल शादी का दौर था. परिवार के सभी लोग मिल कर शादी की पूरी तैयारियां करते थे, जिस में हलदी, मेहंदी, संगीत के अलावा वैन्यू, फूड से ले कर डैकोरेशन, निमंत्रण आदि सब परिवार के सभी सदस्य साथ मिलजुल कर करते थे. पूरी शादी के दौरान सारे परिवार वाले व्यस्त रहते थे. किसी को शादी ऐंजौय करने की फुरसत नहीं रहती थी. जैसेतैसे शादी का काम पूरा हो जाता था, क्योंकि तब प्लानर की सुविधा भी नहीं होती थी.

मगर आज तो ऐसी शादियां करना बिलकुल असंभव सा है, क्योंकि अधिकतर परिवार अकेले रहते हैं. जिन के 1 या 2 बच्चे होते हैं, ऐसे में शादी की हर रस्म को खुद अरैंज्ड करना उन से संभव नहीं होता, जिस वजह से वैडिंग प्लानर को काम मिलने लगा और लोगों ने पाया कि एक वैडिंग प्लानर शुरू से ले कर अंत तक सारे काम एक प्लांड तरीके से करता है, जिस से शादी सुचारु रूप से होती है और परिवार के सभी लोग वैडिंग का आनंद उठा सकते हैं.

बदला है ट्रैंड

सुमित आगे कहते हैं कि कोविड के बाद से शादी का ट्रैंड काफी बदल चुका है, क्योंकि उस दौरान जितनी भी शादियां हुई थीं, सभी में सिर्फ 50 लोगों को शादी में शामिल होने की इजाजत सरकार ने दी थी। इस से सभी ने देखा कि कम लोगों के बीच में शादियां काफी अच्छी और इंटिमेसी के साथ होती हैं और
खर्चा भी कम होता है. यही वजह है कि आज की शादियां कम लोगों के बीच अधिकतर होने लगी हैं.

डैकोरेशन में बदलाव

इतना ही नहीं शादी की हर डैकोरेशन में भी काफी बदलाव देखने को मिल रहा है, जिस में शादी की मंडप की सजावट में खास परिवर्तन आया है। वर्ष 2000 से 2010 तक ट्रैडिशनल ट्रैंड काफी पौपुलर था, जिस में राजारजवाड़े की थीम पर अधिक सजावट होती थी, लेकिन अब लोग यूनिक थीम रखते हैं, जिस में पिंक और पर्पल थीम, पीकाक थीम या किसी सैलिब्रिटीज की शादी की थीम से प्रेरित हो कर उस तरीके का मंडप चाहते हैं, जिस में दीपिका रणवीर कपूर की शादी की थीम या आलिया की शादी की थीम काफी पौपुलर हुई है.

कैटरिंग में बदलाव

फूड में भी काफी बदलाव है, जिस में ट्रैडिशनल फूड का क्रेज अब खत्म हो चुका है। आजकल मौडर्न और वैस्टर्न डिसेज इक्स्प्लोर कर रहे हैं, जिस में मैक्सिकन डिशेज, इटालियन डिशेज के साथ पिज्जा, पास्ता भी शादियों में लोगों को पसंद आने लगे हैं, जो पहले नहीं था.

शादी को सुचारु ढंग से करवाने के लिए शादी की तारीख से कम से कम 6 महीने पहले प्लानर से संपर्क करना चाहिए, ताकि वैन्यू और शादी की सारे अरेंजमैंट अच्छी तरह से हो सके, क्योंकि सही वैन्यू का मिलना शादी की सीजन में बहुत मुश्किल होता है. बाकी की सारी चीजें धीरेधीरे होती रहती हैं.

प्लानर के बारे में मिथ

सुमित कहते हैं कि प्लानर को ले कर लोगों में कई सारे मिथ हैं. उन के अनुसार प्लानर शादी की प्लानिंग करते वक्त अधिक पैसे ग्राहकों से ऐंठ लेता है, जबकि ऐसा नहीं होता, क्योंकि एक प्लानर को हायर करने पर वैन्यू, कैटरिंग, डैकोरेशन, मनोरंजन आदि पर काफी पैसा आप बचा सकते हैं, क्योंकि वैडिंग
होने तक कस्टमर की सारी तैयारी वैडिंग प्लानर आप के साथ रह कर करता है, जिस से आप को अधिक भागनेदौड़ने की जरूरत नहीं पड़ती. सारा समय व्यक्ति अपनी वैडिंग को अच्छी तरह से मना सकता है.

वे आगे बताते हैं कि प्लानर वैन्यू से ले कर डैकोरेशन, फूड आदि पर बहुत सारा छूट दिला सकता है, क्योंकि उन का संपर्क उन सभी के साथ होता है और बारबार उन्हें बिजनैस वैडिंग प्लानर से ही करना होता है, जिस से वे आम इंसान से अधिक डिस्काउंट रेट पर वैडिंग प्लानर को सारी चीजें उपलब्ध करवाते हैं, जिस का फायदा कस्टमर को होता है. साथ ही विवाह में जरूरत के अनुसार पैसे खर्च करने की सलाह भी देता हूं, जिस से उन की फुजूलखर्ची नहीं होती.

सुमित का आगे कहना है कि इस काम में सब से बड़ी चुनौती क्लाइंट के साथ कोओर्डिनेशन का होता है. साथ ही क्लाइंट के किसी भी काम की डिसिजन में देर करना मेरे लिए कई बार चुनौती होती है, जिसे मुझे अंत में ठीक करना पड़ता है. एक बार एक शादी में दुलहन के पिता की अचानक मृत्यु हो जाने की
वजह से शादी की सारी तैयारी को 1 साल के लिए टालना पड़ा था, जो मुश्किल था, पर हो गया था. मैं बजट के अनुसार ही क्लाइंट को मैरिज प्लान देता हूं.

वैडिंग प्लानर को शादी में नियुक्त करने के फायदे निम्न हैं:

समय की बचत

वैडिंग प्लानर शादी की योजना बनाने में लगने वाले समय को कम करते हैं. वे शादी से जुड़े सभी काम संभालते हैं, ताकि आप को अपने खास दिन का आनंद लेने के लिए ज्यादा समय मिल सकें.

बजट का सही मैनेजमैंट

वैडिंग प्लानर आप के बजट के हिसाब से काम करते हैं और लागत प्रभावी विकल्पों की पहचान करते हैं. वे सर्वोत्तम कीमतों के लिए विक्रेताओं से बातचीत करते हैं.

विशेषज्ञता

वैडिंग प्लानर शादी के क्षेत्र के विशेषज्ञ होते हैं. उन के पास शादी से जुड़े कई अनुभव और संपर्क होते हैं. वे आप की शादी को सुंदर और यादगार बनाने में मदद करते हैं.

तनावमुक्त वातावरण

वैडिंग प्लानर समय सीमाओं का प्रबंधन करते हैं, विक्रेताओं के साथ समन्वय करते हैं और अप्रत्याशित अड़चनों को संभालते हैं. इस से आप का दिन तनावमुक्त रहता है और आप आनंद से शादी का जश्न मना सकते हैं.

इतना सही है कि शादी को हरकोई यादगार बनाना चाहता है। इस के लिए एक सही वैडिंग प्लानर की आवश्यकता होती है, जिस की सूचना व्यक्ति औनलाइन जा कर रिव्यू पढ़ कर ले सकता है, जो शुरू से शादी के अंत तक उन का साथ देते हैं और शादी की सभी रस्मों को सुचारु रूप से सम्पन्न कराते हैं.

अगर आप के चेहरे और हाथों के कलर में है अंतर, तो जानें इस के कारण और ठीक करने के तरीके

Skin Care Tips : अकसर लोगों का चेहरा तो चांद सा चमकता है, लेकिन जब बात हाथपैरों की आती है तो उन की गहरी रंगत सारा इंप्रेशन खराब कर देती है. चेहरे और हाथपैरों के रंग में बड़ा अंतर होना एक आम समस्या है. इस परेशानी से अधिकांश लोग जूझते हैं. अगर आप के चेहरे का रंग भी साफ है, लेकिन हाथपैर डार्क हैं तो इस के कारण और निवारण दोनों जानना आप के लिए जरूरी है. चलिए, आज इस सीक्रेट को जानते हैं :

इसलिए होता है रंग में अंतर

चेहरे का रंग शरीर के बाकी अंगों से साफ होने का प्रमुख कारण यह है कि अधिकांश लोग सिर्फ फेस के स्किन केयर पर ही ध्यान देते हैं. लोग चेहरे को दिनभर में कई बार धोते हैं और उस पर क्रीम लगाते हैं, जिस से स्किन में नमी बनी रहती है और वह नुकसान से बचती है. वहीं सूरज की किरणों से बचने के लिए भी सनस्क्रीन का उपयोग चेहरे पर ही किया जाता है.

हाथपैरों को लोग भूल जाते हैं. यही कारण है कि धूप, गंदगी और प्रदूषण के कारण हाथपैरों की स्किन में मेलेनिन का उत्पादन बढ़ जाता है और त्वचा काली होने लगती है.

दूसरा बड़ा कारण यह है कि आप के हाथ और पैर गंदगी और धूल के संपर्क में ज्यादा आते हैं. कई बार पोषक तत्त्वों की कमी और साफसफाई के अभाव में भी हाथपैर काले पड़ने लगते हैं.

3 स्टैप्स से गोरे करें हाथपैर

हाथपैरों का रंग साफ करना कोई मुश्किल काम नहीं है. इस के लिए आप 3 आसान से स्टैप्स फौलो करें, आप को कुछ ही दिनों में असर नजर आएगा.

स्टेप 1 : सब से पहले आप चेहरे के साथ ही हाथपैरों को भी अपने नाइट स्किन केयर रूटीन में शामिल करें. रोज रात को कोजिक एसिड और ग्लाइकोलिक एसिड से युक्त क्रीम लगाएं. इस से आप की स्किन में कोलेजन बढ़ेगा और रंगत निखरेगी.

स्टेप 2 : दूसरा स्टेप है अपने चेहरे के साथ ही हाथपैरों पर भी सनस्क्रीन का यूज करना. घर से निकलते समय आप एसपीएफ 50 वाले अच्छे सनस्क्रीन को चेहरे, गरदन और हाथपैरों पर लगाएं. इस से सूरज की हानिकारक किरणों से आप का बचाव होगा व हाथपैरों का रंग और गहरा नहीं होगा.

स्टेप 3 : अपने खाने में ऐंटीऔक्सिडेंट रिच फूड शामिल करें. विटामिन सी से भरपूर फलों का सेवन करें. संतरे और आंवले जैसे फलों को अपनी डेली डाइट में शामिल करें. पालक और बादाम भी नियमित रूप से खाएं. इस से स्किन अंदर से हैल्दी होगी.

प्यार है नाम तुम्हारा: क्या हुआ था स्नेहा मां के साथ

“हैलो, कौन?” “पहचानो…””कौन है?””अरे यार, भुला दिया हमें?” और एक खिलखिलाती हुई हंसी फोन पर सुनाई पड़ी. “अरे स्नेहा, तुम, इतने दिनों बाद, कैसी हो?” नेहा  पहचान कर खुशी ज़ाहिर करते हुए बोली.

“नेहा, यार, तुम तो मेरी पक्की सहेली हो, तुम से कैसे दूर रह सकती थी. ऐसे भी दोस्ती निभाने में हम तो नंबर वन हैं. बहुत सारी बातें करनी है मुझे तुम से. अच्छा, मेरा फोन नंबर लिख लो. अभी मुझे हौस्पिटल जाना है, कल बात करते है,” और स्नेहा ने फ़ोन रख दिया.

“हौस्पिटल…” बात अधूरी रह गई.  नेहा कुछ चिंतित हो उठी, ‘आख़िर, उसे हौस्पिटल क्यों जाना था…’ नेहा बुदबुदा रही थी.

नेहा के मन में स्नेहा की स्मृतियां चलचित्र की तरह तैर गईं… कालेज में फौर्म भरने की लाइन में नेहा खड़ी थी लाल रंग के पोल्का डौट का सूट पहने और उसी लाइन मे स्नेहा काले रंग के पोल्का डौट का सूट पहने खड़ी थी. उन दिनों पोल्का डौट का फैशन चल रहा था.

“गम है किसी के पास,” स्नेहा ज़ोर से बोली. स्नेहा को फौर्म पर फोटो चिपकानी थी.”हां है, देती हूं,” नेहा ने मुसकराते हुए गम की छोटी सी शीशी स्नेहा को थमा दी. बदले में स्नेहा ने मुसकान बिखेर दी.

फौर्म जमा कर बाहर निकलते हुए स्नेहा चपल मुसकान के साथ नेहा की ओर मुखातिब हुई, “थैंक्यू सो मच, फौर्म से मेरी फोटो निकल गई थी, मैं तो घबरा गई थी कि क्या होगा अब…”

“थैंक्यू कैसा, चलो आओ, उधर सीढ़ियों पर थोड़ी देर बैठते हैं,” नेहा बीच में ही बोल पड़ी.नेहा, स्नेहा दोनों वहां अकेली थीं. दोनों को, शायद, इसीलिए एकदूसरे का साथ मिल गया था.”अच्छा, तुम्हारा नाम क्या है?”

“स्नेहा ढोले.”“और तुम्हारा?””नेहा खरे. अरे वाह, हम दोनों के नाम कितने मिलते हैं… और हमारी ड्रैसेस भी,” नेहा आश्चर्यमिश्रित खुशी के साथ बोली, वैसे, ढोले…क्या?”

“हम गढ़वाल के हैं,” स्नेहा ने उत्तर दिया.नेहा गौर से स्नेहा को निहार रही थी. बड़ीबड़ी आंखें, तीखी नाक, गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होंठ, दमकता हुआ रंग मतलब सुंदरता के पैमाने पर तराशा हुआ चेहरा थी स्नेहा और पहाड़ी निश्च्छलता से सराबोर उस का व्यक्तित्व.

“क्या हुआ?”, स्नेहा ने टोका.”न…न…नहीं, बस, ऐसे ही,” नेहा मुसकरा कर रह गई.”तुम कितने भाईबहन हो? स्नेहा ने पूछा.”एक भाईबहन.”“हम भी एक भाईबहन हैं. कितना कुछ मिलता है हम में  न,” स्नेहा ज़ोर से खिलखिलाते हुए बोल पड़ी.

“हां, सच में,” नेहा भी आश्चर्य से भर गई थी.”तो आज से हम दोनों दोस्त हुए,” दोनों ने एकसाथ हाथ पकड़ कर हंसते हुए कहा था.

लखनऊ अमीनाबाद कालेज से निकल कर दोनों ने पाकीज़ा जूस सैंटर पर ताज़ाताज़ा मौसमी का जूस पिया. दोनों को ही मौसमी का जूस बहुत पसंद था और इस तरह शुरू हुई दोनों की दोस्ती.

लोग कहते हैं, दोस्त हम चुनते हैं. पर नेहा का मानना है कि दोस्ती भी हो जाती है जैसे उस दिन स्नेहा से उस की दोस्ती हो गई थी.

नेहा स्नेहा की यादों को एक सिरे से समेट रही थी. उस ने पुराने अलबम निकाले. एक फोटो थी एनसीसी कैंप की, जिस में वह खुद और स्नेहा पैरासीलिंग कर रही थीं. नेहा को कैंप की याद आई…’यार, वह लड़का कितना हैंडसम है. बस, एक नज़र देख ले,’ स्नेहा ने चुहलबाज़ी करते नेहा से कहा था.

‘क्या स्नेहा, हर समय लड़कों को देखती रहती हो,’ नेहा गंभीरता ओढ़ कर बोली थी.‘अरे यार, एनसीसी में हमारे कैंप लड़कों से अलग हो जाते हैं, तो नैनसुख तो ले ही सकते हैं न,” स्नेहा बोलतेबोलते ज़ोर से हंस पड़ी थी.

नेहा और स्नेहा दोनों  ने ही ग्रेजुएशन में एनसीसी ली थी और पहली बार दोनों घर से दूर कैंप गई थीं. साथसाथ खाना, साथसाथ रहना, साथसाथ परेड करना…लगभग सारे काम साथ. उन की दोस्ती गहरी होती जा रही थी.

‘कितने गंदे पैर ले कर  आई हो,’  स्नेहा ने डांटते हुए कहा था.‘अरे यार, आज मेरी सफाई की ड्यूटी थी, सो पैर में कीचड़ लग गया,” नेहा ने गुस्साते हुए कहा था.‘ह्म्म्म्मम, कैंप की सफाई कर खुद को गंदा कर लिया,’ स्नेहा बड़बड़ाती जा रही थी.

स्नेहा तुरंत उठी और एक तौलिया ले कर नेहा का पैर बड़ी ही तन्मयता के साथ साफ करने लगी. नेहा स्नेहा का यह रूप देख कर हैरान थी. स्नेहा को उस का पैर साफ करने में तनिक भी संकोच नहीं हुआ. एक मातृवत भाव के साथ वह यह सब कर रही थी. कहां से आई उस के अंदर यह भावना, शायद उस की परिस्थितियां…, नेहा सोच में मे पड़ गई थी.

एक दिन पाकीज़ा जूस सैंटर पर जूस पीतेपीते नेहा ने कहा, ‘स्नेहा, आज चलो मेरे घर, मेरे मांपापा से मिलो.’ स्नेहा उस दिन नेहा के घर गई. उसे नेहा के यहां बहुत अच्छा लगा. ‘कितने अच्छे हैं तुम्हारे मांपापा और तुम्हारी प्यारी सी दादी. मां ने कितने अच्छे पकौड़े बनाए,’ स्नेहा बिना रुके बोले जा रही थी, अचानक मुसकराई, ‘और तुम्हारा भाई भी बहुत अच्छा है.’ शरारत के साथ आंखें मटकाते अपने चिरपरिचित अंदाज़ में स्नेहा बोली थी.

स्नेहा के इस अंदाज़ को नेहा बखूबी समझ चुकी थी, वह भी हंस पड़ी.‘अब मुझे भी अपने घर ले चलो,’ नेहा ने स्नेहा से कहा. ‘मेरे घर…,’ स्नेहा कुछ हिचकिचा गई‘ले चल स्नेहा, तुम्हारा घर तो सीतापुर रोड पर खेतखलिहानों के पास है, बहुत मज़ा आएगा.”‘ह्म्म्म्म, अच्छा, कल चलना,’ स्नेहा  का स्वर कुछ धीमा पड़ गया था.

‘कितनी सुंदर जगह है तुम्हारा घर, हरेभरे खेतों के बीच,’ नेहा, स्नेहा का घर देख कर खुशी से झूमी जा रही थी. स्नेहा का घर कच्चे रास्तों से गुज़रता था. घर पहुंचते ही स्नेहा ने अपनी दादीमां से मिलवाया, ये हैं मेरी सब से प्यारी दादी तुम्हारी दादी की तरह. और दादी, यह है मेरी पक्की वाली दोस्त नेहा.” स्नेहा ने फिर गरमागरम छोलेचावल खिलाए.

‘स्नेहा, छोले तो बहुत टैस्टी हैं, आंटी ने बनाए होंगे,’ नेहा खातेखाते बो ‘नहीं, मैं ने बनाए हैं,” स्नेहा कुछ गंभीर हो गई थी. ‘तुम ने! यार स्नेहा, यू आर  ग्रेट कुक. वैसे आंटी कहां हैं?’ नेहा ने पूछा. ‘मम्मी…’ स्नेहा की बात अधूरी रह गई. पीछे वाले कमरे से सांवली, साधारण सी बिखरे बालों के साथ एक महिला वहां आ गई. नेहा कुछ आश्चर्य से उन्हें देखने लगी. फिर ‘मेरी मम्मी’ कह स्नेहा ने उस महिला का परिचय कराया.

नेहा सोच में पड़ गई. स्नेहा तो कितनी सुंदर और उस की मम्मी साधारण सी, बिखरे बाल, दांत भी कुछ टूटे हुए… यह कैसे? कई सारे सवालों से नेहा घिर गई थी. स्नेहा की मम्मी कुछ अलग सी मुसकान के साथ अंदर चली गई.

‘नेहा, तुम्हें आश्चर्य हो रहा होगा न. मेरी मम्मी ऐसी… दरअसल, मम्मी पहले बहुत अच्छी दिखती थीं लेकिन जब मेरा भाई किडनैप हुआ तब से मम्मी की हालत ऐसी हो गई. भाई तो वापस मिला लेकिन मम्मी तब तक मैंटल पेशेंट हो चुकी थीं,’ स्नेहा धीरेधीरे बोल रही थी.

‘उफ्फ़…’ नेहा ने एक लंबी सांस भरी. कितना दुख है जीवन में. मां होते हुए भी मां का प्यारदुलार न मिले. स्नेहा तो अपनी मां से कोई ज़िद भी न कर पाती होगी. नेहा का मन भरा जा रहा था.

“चलो नेहा, मैं तुम्हें अपना स्कूल दिखाती हूं.  हमारा स्कूल कोएजुकेशन था, एक से एक स्मार्ट लड़के पढ़ते थे. अब तो हम गर्ल्स कालेज में आ गए,’ स्नेहा ने शायद नेहा के माथे पर पड़ी सलवटों को देख लिया था और वह माहौल को कुछ हलका करना चाहती थी.

‘स्नेहा, तुम भी न,” नेहा ने यह कह कर हंसी तो स्नेहा भी खिलखिला पड़ी थी.नेहा उस अलबम की हर फोटो को बड़े  गौर से देख रही थी. वेलकम पार्टी, टीचर्स डे, फेयरवैल, ऐनुअल फंक्शन… हर फोटो में नेहा और स्नेहा छाई हुई थीं. दिन हंसतेगाते, पाकीज़ा जूस सैंटर का जूस पीते हुए बीत  रहे थे. पर दिन हमेशा एक से नहीं रहते. ग्रेजुएशन के फाइनल ईयर के आख़िरी दिनों में स्नेहा कालेज में लगातार गैरहाजिर हो रही थी. नेहा चिंतित थी, क्या हुआ, क्यों नहीं आ रही है स्नेहा? पता चला, स्नेहा बहुत दिनों से हौस्पिटल में एडमिट है. स्नेहा को क्या हो गया, नेहा परेशान हो उठी.

नेहा हौस्पिटल पहुंची जहां स्नेहा एडमिट थी. स्नेहा का चेहरा स्याह पड़ चुका था, आंखें गड्ढे में चली गई थीं, चेहरा फीकाफीका सा लग रहा था, देह जैसे हड्डी का ढांचा. नेहा को स्नेहा का वह पहले वाला दमकता सौंदर्य याद आ गया. और अब…

‘आओ नेहा,’ एक कमज़ोर सी आवाज़ और फीकी मुसकान के साथ स्नेहा बोली. नेहा उस के पास रखे स्टूल पर बैठ गई. नेहा ने स्नेहा का हाथ पकड़ते हुए पूछा, ‘क्या  हो गया स्नेहा? किसी को कुछ बताया भी नहीं, अकेलेअकेले ही सारे दुख़ झेलती रही?’

नहीं, नहीं नेहा, कुछ पता ही नहीं चला. पहले फीवर और हलकी कमज़ोरी थी, फीवर की दवा ले लेती थी, पर घर का काम भी रहता था और वीकनैस बढ़ने लगी.  और एक दिन खून की बहुत सारी उलटियां हुईं. मेरे पापा तो बहुत घबरा गए. यहां हौस्पिटल में एडमिट करा दिया,’ स्नेहा धीरेधीरे सारी बातें नेहा को बताती जा रही थी.

‘और तुम्हारी मम्मी?’ नेहा ने तुरंत ही पूछा.‘मम्मी को तो कुछ पता ही नहीं चलता. वे तो…’ बोलतेबोलते स्नेहा रुक गई और एक गहरी सांस अंदर खींच कर रह गई.

‘पर खून की उलटियां क्यों हुईं तुम्हें?’ नेहा अगले प्रश्न के साथ तैयार थी. ‘दरअसल, मुझे सीवियर  ट्यूबरकुलोसिस है. पूरे लंग्स में इन्फैक्शन है. थोड़ा मुझ से दूर ही रहो,’ स्नेहा पहले तो कुछ गंभीर थी, फिर हंस दी.

‘पर स्नेहा, तुम्हारा इलाज तो सही हो रहा है न, यहां के डाक्टर्स अच्छे हैं न? नेहा ने चिंतित स्वर में पूछा.  स्नेहा के चेहरे पर शरारत टपक गई, बोली, ‘अरे यार नेहा, डाक्टर्स तो अच्छे हैं, एक नहीं दोदो अच्छे हैं, एक सीनियर डाक्टर और एक जूनियर डाक्टर. सीनियर वाला न, मेरे गढ़वाल का ही है. पर, सूरत जूनियर वाले की ज़्यादा अच्छी है.’  ‘स्नेहा, तुम नहीं सुधरोगी, इतनी बीमार हो, फिर भी…’ नेहा हंसते हुए उस का गाल सहलाते हुए बोली.

नेहा, तो क्या रोती रहूं हर समय. अब तुम ने ही पूछा कि डाक्टर्स कैसे हैं तो मैं ने बताया,’ स्नेहा हलके गुस्से से बोली. इतने में एक साधारण नयननक्श  का सांवला डाक्टर आया, उसे एग्जामिन किया और पूछा, ‘स्नेहा जी, अब वौमिटिंग बंद हुई, फीलिंग बेटर नाउ?’

‘हां डाक्टर,’ स्नेहा ने धीमे से जवाब दिया. पीछे एक हैंडसम सा जूनियर डाक्टर साथ था. उस ने स्नेहा को कुछ दवाएं दी और मुसकराते हुए चला गया. ‘देखा स्नेहा, दोनों डाक्टर अच्छे हैं न,’ स्नेहा चहक कर बोली. नेहा प्यार से स्नेहा को सहलाने लगी और बोली, ‘स्नेहा, जल्दी से ठीक हो जाओ, परीक्षाएं पास आ रही हैं, मैं तुम्हें नोट्स दे दूंगी, ओके.’

स्नेहा ने भी नेहा का दूसरा हाथ अपने हाथों से कस के पकड़ लिया और अंसुओं की दो बूंदें उस की आंखों से ढ़ुलक गईं. नेहा अपनी आंखों को छलकने से बचाने के लिए तेज़ आवाज़ में बोली, ‘माय डियर, गेट वैल सून.’ नेहा भीगी पलकों के साथ वहां से चली आई.

परीक्षाएं पास आ गई थीं. स्नेहा की तबीयत पूरी तरह ठीक नहीं हो पाई थी. वह फाइनल एग्ज़ाम नहीं दे सकी. स्नेहा हौस्पिटल से डिस्चार्ज हो कर अपनी दादी के साथ पहाड़ चली गई. इधर नेहा आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली चली गई. वहीं होस्टल ले कर पोस्टग्रेजुएशन करने लगी और साथ में सिविल सर्विसेज़  की भी तैयारी कर रही थी. उसे बिलकुल भी फुरसत न मिलती. मोबाइल उन दिनों था नहीं जो हर समय दोस्तों से वह बात कर सके.

लखनऊ घर बात करने के लिए हफ्ते में एक बार होस्टल के पीसीओ  जा पाती  थी. नेहा स्नेहा को याद करती, पर बात नहीं हो पाती. ‘पता नहीं स्नेहा कैसी होगी, उस की तबीयत… उस की मां का क्या हाल होगा…’ एक लंबी सांस खींच कर नेहा किताब खोल कर पढ़ने बैठ जाती.

स्नेहा से मिले हुए नेहा को 10-11 महीने हो रहे थे. नेहा दिल्ली से  छुट्टियों में अपने घर आई हुई थी. कहते हैं, किसी को शिद्दत से याद करो तो वह मिल ही जाता है. उस दिन भी ऐसा ही कुछ हुआ. स्नेहा ने नेहा को अचानक ही फ़ोन लगा दिया था.

अब नेहा दूसरे दिन स्नेहा के फ़ोन का इंतज़ार कर रही थी और साथ ही चिंतित भी थी क्योंकि स्नेहा ने हौस्पिटल जाने की बात कह कर फ़ोन काट दिया था. कुछ देर बाद फ़ोन की घंटी बजी. नेहा ने पहली घंटी बजते ही रिसीवर  उठा लिया.

“हैलो, स्नेहा?” “हां नेहा, मैं स्नेहा बोल रही हूं.”

“स्नेहा, कल तुम ने हौस्पिटल जाने की बात कह कर फ़ोन काट दिया था. क्या तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं हुई?” नेहा ने कुछ घबराते हुए पूछा. “नेहा, मुझे कल जाना था हौस्पिटल डाक्टर से मिलने.”

“वही तो मैं पूछ रही हूं स्नेहा. डाक्टर से मिलने तुम्हें क्यों जाना था”? नेहा लगभग झुंझला कर  बोली.”नेहा, जब तुम मुझ से मिलने हौस्पिटल आई थीं, तो याद है तुम्हें 2 डाक्टर्स मुझे एग्ज़ामिन करने आए थे.”

“हांहां, याद है मुझे. एक तो तुम्हारे पहाड़ के थे और दूसरे एक जूनियर डाक्टर थे.””हां, पहाड़ वाले डाक्टर स्वप्निल जोशी. उन्होंने मुझे बुलाया था,” स्नेहा बताने लगी, “नेहा, तुम्हें याद है न, मेरी तबीयत कितनी खराब थी, खून की उलटियां हो रही थीं, मेरा चेहरा कैसा स्याह पड़ चुका था. मम्मी की हालत तो तुम जानती ही हो. जब मुझे हौस्पिटल में एडमिट कराया तो मेरी हालत बहुत खराब थी. ऐसे में डा. स्वप्निल ने ही मुझे एग्ज़ामिन किया. उन की ही दवाओं से मेरी उलटियां रुकीं. थोड़ी तबीयत हलकी हुई. अब जब भी डा. स्वप्निल मेरा चैकअप करने आते, मुझे आदतन हंसी आ जाती. तुम्हें तो पता है, मुझ से ज़्यादा देर सीरियस नहीं रहा जाता. उस दिन भी डा. स्वप्निल को देख मैं यों ही हंस पड़ी. डा. ने पूछा, “हैलो स्नेहा, फीलिंग बेटर नाऊ?”

“या डाक्टर,” मैं ने मुसकराते हुए उत्तर दिया. “पूरा आराम कीजिए स्नेहा आप और मेडिसिन्स टाइम से लीजिए पूरे 6 महीने का कोर्स है.”जी डाक्टर,” मैं फिर मुसकरा उठी. डा. स्वप्निल भी मुसकरा पड़े.

एक दिन मैं ने शीशे में में अपना चेहरा गौर से देखा तो मैं खुद घबरा गई. आंखें धंसी, चेहरा पीला, सारी रंगत चली गई थी. बस. नहीं कुछ गया था तो वह थी मेरी हंसी.  मम्मी की चिंता, पापा की चिंता, दादी भी बूढ़ी हो चली हैं…कैसे क्या होगा? और मेरी भी तबीयत…भाई भी छोटा है… क्या ज़रूरत थी कुदरत को मुझे इस तरह बीमार करने की. बहुत गुस्सा आता मुझे. पर इन सब के बीच ज़िंदगी से नफ़रत नहीं कर  पाती. कुछ भी अच्छा एहसास होता, तो बरबस ही होंठों पर मुसकान आ जाती. सो, डा. स्वप्निल का एहसास भी कुछ अच्छा सा था. डा. स्वप्निल से मैं धीरेधीरे खुलने लगी. उन्हें अपने घर के बारे में, मम्मी के विषय में बताया. डा. स्वप्निल गंभीरता से मेरी बातें सुनते. मुझे भी उन से बातें करना अच्छा लगता. उस दिन 25 अगस्त को मेरा बर्थडे था. डा.

स्वप्निल मुझे चैक करने आए तो स्टेथोस्कोप के साथ उन के हाथों में लाल गुलाब के फूलों का बुके भी था. उन्होंने बुके पकड़ाते हुए कहा, “हैप्पी बर्थडे स्नेहा.” “पर आप को कैसे पता चला?” मैं ने चौंकते हुए पूछा.

“ह्म्म्म्म, स्नेहा, वह दरअसल, मैं ने तुम्हारी फ़ाइल देखी थी. उस में बर्थडे की एंट्री थी. वहीं से पता चला,” डा. स्वप्निल मुसकराते हुए बोले”अच्छा, तो डाक्टर साहब मरीज़ की सारी अनोट्मी देखते हैं,” मैं ने भवें तिरछी कर हंसते हुए कहा.

डा. स्वप्निल कुछ औकवर्ड फील करने लगे, फिर कुछ सीरियस हो कर मेरी ओर मुखातिब हुए, “स्नेहा, आज तुम्हारा बर्थडे है, उपहार तो मुझे देना चाहिए. पर एक उपहार मैं तुम से मांगना चाहता हूं.”  “क्या, क्या?” मैं ने हैरानी और आशंका से प्रश्न किया.डा. स्वप्निल बिना एक पल की देरी किए हुए कह उठे, “स्नेहा, मुझ से शादी करोगी?”

मैं आश्चर्य में पड़ गई. समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या कहूं. मेरे कानों से ऐसा लगा मानो गरम हवा निकल रही हो. दिल बैठा जा रहा था. सुन्न सी हालत हो गई थी मेरी.

मैं ने लड़खड़ाती ज़बान से कहा, “पर डाक्टर, मेरी बीमारी…मेरी मां की हालत… आप कैसे…” आवाज़ मानो घुट कर गले में ही अटक गई.

डा. स्वप्निल ने मेरा हाथ पकड़ लिया और कहने लगे, “स्नेहा, तुम्हारी बीमारी ठीक हो जाएगी, मुझ पर विश्वास करो. मैं तुम्हारे घर की स्थिति को जानता हूं. ये सब जानते हुए भी मुझे तुम्हारा ही हाथ थामना है. पता है क्यों, क्योंकि तुम से मिल कर मेरी दवाओं, इंजैक्शन, औपरेशन से भारी रूखी ज़िंदगी में मुसकराहट आ जाती है. मेरी सीरियसनैस में चंचलता आ जाती है. तुम से मिल कर ज़िंदगी से प्यार होने लगता है. मेरा ख़ालीपन भरने लगता है. बोलो स्नेहा, मेरा साथ तुम्हें पसंद है.”

डा. स्वप्निल इतना कह कर नम आंखों से मुझे देखने लगे. मेरी पलकें अनायास ही झुक गईं. डा. स्वप्निल की बातों में,  उन के हाथों के स्पर्श में भरोसे की खुशबू को मैं ने खूब महसूस किया  और…”

“और, फिर क्या हुआ?” नेहा ने उछलते हुए पूछा. “फिर क्या हुआ?? हुआ यह कि इस संडे को मेरी एंग़ेज़मैंट है डा. स्वप्निल के साथ और उस दिन मुझे उन्होंने रिंग पसंद करवाने के लिए हौस्पिटल बुलाया था. तुम्हें ज़रूर आना है, ” स्नेहा बोलते हुए अपनी स्वाभाविक हंसी के साथ हंस पड़ी.

नेहा  बड़ी गर्मजोशी  से बोली,  “ओह स्नेहा, तुम ने अपनी हंसी में डाक्टर को फंसा ही लिया. सच, मैं बहुत खुश हूं तुम्हारे लिए. वैसे, डाक्टर साहब ने ठीक ही कहा कि तुम से मिल कर वीरान ज़िंदगी में बहार आ जाती है, बोरिंग ज़िंदगी रंगीन लगने लगती है और ज़िंदगी से प्यार होने लगता है. आख़िर प्यार है नाम तुम्हारा, स्नेहा डियर.”

“और तुम्हारा भी,” स्नेहा खनकती आवाज़ में बोल  पड़ी. दोनों सहेलियां एकदूसरे को फोन पर ही मनभर कर महसूस करती हुईं ज़ोर से खिलखिला पड़ीं.

 

Haldi Function : शादी के फंक्शन में हलदी की रस्म का मजा लें न कि दिखावा करें

Haldi Function : शादी में हलदी की रस्म का जितना महत्त्व होता है, उस से कहीं ज्यादा इस रस्म के दौरान जो मजाकमस्ती व नाचगाना होता है वह शादी का मजा दोगुना कर देता है. यही वजह है शादी में हलदी की रस्म को बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन इस प्रथा के दौरान कई सारी बातें ऐसी होती है जो ध्यान देने योग्य हैं. हलदी की रस्म के दौरान अगर हम इन बातों का ध्यान रखें तो शादी के दौरान हुई हलदी की रस्म का मजा न सिर्फ दोगुना हो जाएगा बल्कि यादगार भी रहेगा. पेश हैं, इसी सिलसिले पर एक नजर :

शादी में हलदी की रस्म का महत्त्व

शादी का मौसम आ चुका है, हर तरफ शादी का शोर है. शादी में बाराती बनने वाले और दूल्हादुलहन महंगीमहंगी खरीदारी में जुटे हैं. शादी की शुरुआत हलदी की रस्म से होती है। हलदी मेहंदी, संगीत, शादी के वे फंक्शंस हैं जिन का मजा सिर्फ दूल्हादुलहन ही नहीं, बल्कि शादी में आने वाले बाराती भी लेते हैं क्योंकि हलदी को शुभ माना जाता है.

इसलिए शादी की शुरुआत हलदी की रस्म से होती है. दूल्हादुलहन को हलदी चढ़ाई जाती है. इस रस्म के पीछे एक वजह यह भी है कि ठंडे इलाकों में रहने वाले लोग कईकई दिनों तक नहाते नहीं थे जिस के वजह से उन के शरीर पर मैल की परतें जम जाती थीं. इसी वजह से दूल्हादुलहन को हलदी लगाई जाती थी। कई बार हलदी का रंग पीले से काला हो जाता था जो दूल्हा या दुलहन के न नहाने का सुबूत होता था. इसी बात को ध्यान में रख कर पूर्वजों द्वारा हलदी की रस्म की शुरुआत हुई ताकि शादी में दूल्हादुलहन सिर्फ शुभ हो कर ही नहीं बल्कि स्वच्छ हो कर भी शामिल हों.

हलदी की रस्म के लिए कपड़े और ज्वैलरी को ले कर दिखावे से बचें

हलदी के फंक्शन में पीले कपड़े पहनने का रिवाज है. इस में शामिल होने के लिए दूल्हादुलहन से ले कर बाराती तक पीले कपड़े और उसी से मैच करती हुई ज्वैलरी बनाते हैं. सोशल मीडिया पर बौलीवुड स्टार्स और अंबानी की शादियों में बारातियों द्वारा पीले रंग के महंगे वस्त्र और आभूषण पहने देख आम लोग भी इस की नकल करते हुए हलदी की रस्म के लिए महंगे कपड़े बनवाने की कोशिश करते हैं.

ऐसे में अगर आप के पास पैसा है तो आप इस रस्म में अपनी इच्छा अनुसार खर्च कर सकते हैं. लेकिन जिन के बजट इस बड़े खर्च को झेल नहीं सकते वे इन खर्चों से बचें और दिखावे में न पड़ें बल्कि अपनी सहूलियत अनुसार खर्च करें। ऐसे मौके पर हलदी के फंक्शन के लिए दूल्हा और दुलहन के घर वालों को बारातियों की जेब का खयाल रखते हुए लड़कियों के लिए पीली चुन्नी, और लड़कों के लिए पीले स्कार्फ का इंतजाम रखना सही रहेगा. जो भी इस रस्म में शामिल होने के लिए दिलचस्पी रखता है उसे चुन्नी और स्कार्फ दे दें और बाकी लोगों को यह रस्म देखने का मौका दें.

जो सिर्फ इस रस्म को देखना चाहते हैं, इस में शामिल नहीं होना चाहते वे पीला कपड़ा नहीं पहनें. सिर्फ इस रस्म को देखने का मजा लें.

हलदी की रस्म के दौरान हर किसी को हलदी लगाने की कोशिश न करें

ऐसे मौके पर जबकि हलदी से लोगों को हलदी लगा कर होली खेली जा रही हो, उस दौरान भी इस बात का ध्यान रखें की जबरन किसी को हलदी न लगाएं क्योंकि कई बार अगर कुछ लोग इस फंक्शन का पूरा मजा लेते हुए हलदी लगाना पसंद करते हैं तो कुछ लोगों को चेहरे पर गुलाल की तरह हलदी लगाना, मस्तीमजाक करना पसंद नहीं होता. क्योंकि कुछ लोग अगर मजाकिया और मस्तीखोर होते हैं, तो कुछ लोग सीरियस और गंभीर किस्म के भी होते हैं. ऐसे लोगों को हलदी लगाने की रस्म भी पसंद नहीं होती. लिहाजा, उन्हीं लोगों को हलदी लगाएं जिन्हें यह पसंद है.

कई बार ओवर मस्ती करने के चक्कर में हलदी की रस्म के दौरान कुछ लोग दूल्हादुलहन को ऐसीऐसी जगह हलदी लगा देते हैं जो दूल्हा या दुलहन को बिलकुल पसंद नहीं आता. इस के बाद हलदी लगाने की रस्म कई बार लड़ाई में तबदील हो जाती है. लिहाजा, ऐसी हरकतों से सावधान रहें.

शादी में हलदी की रस्म के दौरान अगर इन बातों का खासतौर पर ध्यान रखा गया तो शादी का मजा दोगना और शादी यादगार साबित हो सकती है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें