Fatty Liver होने के क्या हैं कारण, जानें कैसे करें बचाव

Fatty Liver : बदलता लाइफस्टाइल आज हर किसी के लिए बीमारियों की जड़ बनता जा रहा है. रहनसहन व खानपान की खराब आदतें हमें उम्र से पहले बीमार कर रही हैं. कई बार ये बीमारियां इतनी घातक रूप ले लेती है कि व्यक्ति की मृत्यु तक हो जाती है ऐसी ही आम दिखने वाली बीमारी है फैटी लिवर.

क्या है फैटी लिवर

लिवर के आसपास वैसे तो पहले से ही थोड़ा फैट होता है लेकिन जब फैट जरूरत से ज्यादा हो जाए तो फैटी लिवर की समस्या हो जाती है.

लिवर हमारे शरीर का दूसरा महत्त्वपूर्ण अंग है. यह हमारे शरीर के लिए प्रोटीन का निर्माण, पाचन के लिए पित्त का उत्पादन, विषाक्त पदार्थों को खून से निकाल कर संक्रमण से बचाता है व पोषक तत्त्वों को ऊर्जा में बदलने का कार्य करता है और रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है.

यदि लिवर की समस्या में दवाइयां या परहेज में लापरवाही बरती जाए तो व्यक्ति की जान भी जा सकती है और यदि समय रहते सही इलाज मिल जाए तो व्यक्ति जल्दी ही ठीक हो जाता है.

तो जरूरी है कि इस के कारण, इलाज व बचाव की जानकारी सभी को होना.

कारण

शराब का अधिक सेवन, मसालेदार, तला हुआ भोजन खाना,आलस्य में रहना, शरारिक काम न करना,
मोटापा या अधिक वजन होना, टाइप 2 डायबिटीज होना,
मेटाबौलिज्म सिंड्रोम का होना, चीनी का अधिक सेवन, अधिक मात्रा में एसिटामिनोफेन दवाइयों का सेवन, विटामिन A सप्लिमैंट्स की अधिक मात्रा लेना इस के मुख्य कारण हैं.

लक्षण

पेट में दर्द की समस्या होना व पेट के दाहिने भाग में भारीपन बना रहना, भूख न लगना, उलटी लगना यानी जी मिचलाना, शरीर का रंग पीला होना व आंखें सफेद होना, पैरों में दर्द व सूजन होना, तेजी से वजन कम होना फैटी लिवर के लक्षण हैं.

किसे है अधिक खतरा

शराब का अधिक सेवन, बढ़ता मोटापा, महिलाओं को होता पोस्ट मेनोपौज, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज या हाई कोलेस्ट्रौल, औब्सट्रक्टिव स्लीप ऐपनिया से ग्रसित लोगों में फैटी लिवर की समस्या का खतरा अधिक होता है

कैसे करें बचाव

यदि आप इस समस्या से जूझ रहे हैं, तो समय रहते डाक्टर से संपर्क करें. शराब व तलेभुने खाने से परहेज करें. स्ट्रीट फ़ूड बिलकुल न खाएं. सौफ्ट ड्रिंक व चीनी का सेवन कम करें. धीरेधीरे अपना वजन कम करें. तेजी से वजन कम करना नुकसानदेह साबित हो सकता है.

यदि डायबिटीज है तो नियंत्रण के लिए दवा अवश्य लें. रोजाना व्यायाम अवश्य करें.

चालाक भी: होशियार निकली लड़की

मेरे होंठों पर तो केवल एक हलकी सी मुसकान आई, पर पत्नी के चेहरे पर तब आश्चर्य था जब हमारे मित्र ने उसे बताया कि इस समय अर्थात रात के लगभग 1 बजे आने वाला आगंतुक एक महिला होगी. पर जब वह आई तो उस में ऐसा कुछ असाधारण नहीं दिखा. एक साधारण नारी की तरह उस के पास भी 2 ही भुजाएं थीं. उन 2 भुजाओं में भी उस ने कोई अस्त्रशस्त्र नहीं थाम रखा था. उस के हाथ तो टिके हुए थे अपनी नीली छत वाली उस वातानुकूलित टैक्सी के स्टेयरिंग पर.

उन हाथों की पकड़ को मैं ने ध्यान से देख कर उन में घबराहट या आत्मविश्वास की कमी का कोई लक्षण तलाशने की कोशिश तो की पर नाकामयाब रहा. उस की बातों से ही नहीं, उस के हाथों से भी आत्मविश्वास झोलक रहा था. पर वह बड़बोली नहीं थी. आत्मविश्वास ने नम्रता को स्थानापन्न नहीं किया था. वह अपनी सवारी से बातें करते हुए एक साधारण घरेलू महिला जैसी ही लग रही थी. पर शायद यहां मैं गलती कर रहा हूं. कोई घरेलू महिला रात के 2 बजे मुंबई महानगर की किसी सड़क पर एक नितांत अपरिचित के साथ बातें करती हुई इतनी सहज नहीं लग सकती थी जितनी मुंबई की वह महिला टैक्सीचालक लग रही थी.

टैक्सीचालिका कहना उस के नारीत्व का असम्मान होगा, इसलिए टैक्सीचालक कह कर ही उस की बात कर रहा हूं. उस की बातचीत में नारीसुलभ मिठास थी. किसी भी प्रकार का दंभ उस की बातों में नहीं था कि वह कोई असाधारण काम करती है. टैक्सी ड्राइव करने में उस का कौशल किसी पुरुष से कम नहीं था. अत: चालक और चालिका शब्दों का भेदभाव इस प्रसंग में बेमानी होगा और आत्मसम्मान के साथ जीविकोपार्जन करने के उस के चुने काम के प्रति बेईमानी भी. तो मैं उसे टैक्सी चालक ही कहूंगा.

कुछ समय अपने बेटेबहू के साथ बिताने के लिए मैं सपत्नीक दिल्ली से मुंबई आया हुआ था. एक पुराने मित्र का बहुत दिनों से आग्रह था कि मुंबई आने पर एक शाम उन के नाम करें. हम ने उस निमंत्रण को भुनाते हुए एक बहुत मजेदार शाम उन के साथ बिताई. 2-3 दशक पहले हम ने वायुसेना में साथसाथ काम किया था और हमारी पत्नियों की भी प्रगाढ़ दोस्ती थी. अत: उन बीते दिनों की याद करते हुए. गप्पें लगाते और खातेपीते कब 1 बज गया, पता ही नहीं चला. वैसे भी कोलाबा से जहां हम बेटे के पास ठहरे थे पोवाई के हीरानंदानी कौंप्लैक्स जहां मेरा मित्र रहता था, पहुंचने में बहुत देर हो गई थी. हम रात के 10 बजे के लगभग पोवाई पहुंचे थे तो फिर वापस आतेआते रात का 1 बज जाना मामूली बात थी. मित्र ने आग्रह कर के इतनी देर तक बैठाए रखा था. साथ ही आश्वस्त भी कर दिया था कि इस महानगर में रात के किसी भी प्रहर में टैक्सी आसानी से मिल जाएगी.

पर जब उस ने हमारी टैक्सी बुलाने के लिए फोन किया तो उस ने मेरी पत्नी से हंसते हुए कहा कि आप मेरे दोस्त के साथ हैं, इसलिए आज महिला ड्राइवर वाली टैक्सी बुलाता हूं. मेरे चेहरे पर तो केवल विस्मय के ही भाव थे पर मेरी पत्नी के चेहरे पर आश्चर्य के साथसाथ घबराहट भी थी. लेडी टैक्सी ड्राइवर? इतनी रात में? उसे डर नहीं लगेगा? क्या उस के साथ कोई सुरक्षागार्ड भी चलता है? उस ने एकसाथ इतने सारे प्रश्न पूछ डाले थे कि विस्मय से अधिक घबराहट और परेशानी उस के प्रश्नों में साफ झोलक रही थी.

मेरे दोस्त ने हंस कर ही जवाब दिया कि वह पहुंचने ही वाली है, सारे सवाल उसी से पूछ लेना.

महिला टैक्सी ड्राइवर का जिक्र आने से पहले हम चारों ने इतनी देर तक गप्पें मारते हुए न मालूम कितने अतीत के पृष्ठ पलट डाले थे. पर चूंकि हम दिल्ली से आए थे इसलिए अतीत से वर्तमान में पहुंचते ही बातें निर्भया के साथ हुए उस जघन्य बलात्कार और अमानवीय यंत्रणाओं तक पहुंच गईं जिन का प्रसंग आने पर रोंगटे खड़े हो जाते थे और देश की राजधानी के माथे पर लगे कलंक से हर दिल्लीवासी का चेहरा शर्म से झोक जाता था.

तब तक शक्ति मिल्स वाला मुंबई का घिनौना कांड नहीं हुआ था, इसलिए मेरे मित्र का कहना था कि मुंबई महिलाओं के लिए दिल्ली की अपेक्षा अधिक सुरक्षित है.

बहरहाल, इतनी देर तक महिलाओं की सुरक्षा को ले कर उठी बातचीत के कारण उस महिला टैक्सीचालक के आने पर जब हम उस की गाड़ी में बैठ कर विदा हुए तब तक हमारे मन में प्रश्नों का अंबार खड़ा हो गया था.

अभी टैक्सी उस कौंप्लैक्स से बाहर ही आई थी कि मेरी पत्नी ने पहला सवाल दाग दिया, ‘‘कोलाबा बहुत दूर है. तुम्हें इतनी दूर जाने में कोई दिक्कत तो नहीं होगी?’’

तब उस ने सहज मुसकान के साथ जवाब दिया, ‘‘नहीं बाबा, जितना दूर का पैसेंजर मिले उतना ही अच्छा. अब इस टाइम कोई 2 किलोमीटर जाने के लिए बुलाए तब दिक्कत होगी मैडम.’’

उस की हिंदी भाषा और उच्चारण आम मुंबैया हिंदी से अधिक साफ था. स्पष्ट था कि अधिकांश मुंबैया टैक्सीचालकों की तरह वह ‘भैया’ नहीं थी. मु?ो पहले कुतूहल हुआ, फिर हंसी आ गई कि यदि वह भी बिहार या यूपी की होती तो उसे ‘भाभी’ कहते या ‘बहना’.

पत्नी ने बात जारी रखी, ‘‘हिंदी तो तुम्हारी मातृभाषा नहीं होगी?’’

‘‘नहीं मैडम, मैं आंध्रा की हूं. पर बचपन में ही इधर आ गई थी, इसलिए मराठी, हिंदी दोनों भाषाएं ठीक बोल लेती हूं. तेलुगु तो आती ही है, गुजराती भी मैनेज कर लेती हूं.’’

‘‘इस मैनेज शब्द से तो लगता है तुम अंगरेजी भी अच्छी तरह मैनेज कर लेती हो,’’ मैं ने भी बातचीत में घुसते हुए कहा.

वह खुश हो गई. गर्व से बोली, ‘‘हां सर, एअरपोर्ट से अकसर फौरनर मिल जाते हैं. उन से बात करने के लिए अंगरेजी जानना भी जरूरी हो जाता है.’’

‘‘अच्छा, एअरपोर्ट पर तो प्राय: रात कीही उड़ानें होती हैं. क्या तुम हमेशा रात में ही चलाती हो?’’

‘‘नहीं, शुरू में तो रात में नहीं चलाती थी. पर तब मुंबई के रास्ते ठीक से नहीं जानती थी. पर अब सब रास्ते अच्छी तरह पहचान गई हूं… फिर रात की शिफ्ट में ज्यादा पैसे…’’

मेरी पत्नी ने बीच में ही बात काटते हुए पूछा, ‘‘पर रात को टैक्सी चलाने में तुम्हें डर नहीं लगता? टैक्सी में हर तरह के लोग बैठते होंगे?’’

उस ने एक नि:श्वास लेते हुए उत्तर दिया, ‘‘अब मैडम, अगर कोई गुंडा, मवाली यात्री मिल जाए तो क्या दिन और क्या रात… सभी गड़बड़ है… दिन में भी अगर कोई शहर से बाहर कहीं दूर जाने को कहे तो उसे मना तो नहीं कर सकते हैं. पर अब तो काफी दिन हो गए हैं मु?ो गाड़ी चलाते. एकाध बार ही ऐसी सवारी थी जिस से मुझो थोड़ा डर लगा था.’’

‘‘क्या कोई हथियार भी साथ रखती हो तुम?’’ पत्नी ने पूछा तो वह हंस पड़ी, ‘‘अरे, मेरे को कौन पिस्तौल, रिवौल्वर खरीद कर देगा मैडम और फिर कोई दे भी दे तो उस का लाइसैंस मिलने में कम लफड़ा है क्या?’’ पर पत्नी संतुष्ट नहीं थीं. बात जारी रखने के लिए पूछा, ‘‘फिर?’’

हम शायद बातचीत में ही उल?ो रहते पर तभी अचानक मु?ो लगा कि हम एक ऐसी सड़क पर आ गए हैं जिस से कुछ मिनट पहले ही गुजरे थे. अत: मैं ने उसे बताया तो वह थोड़ी असामान्य दिखी. फिर बोली, ‘‘हां सर, मु?ो भी ऐसा ही लग रहा है. मैं इधर से कोलाबा एक ही बार गई थी. थोड़ा रास्ते का कन्फ्यूजन हो रहा है.’’

फिर उस ने मोबाइल निकाल कर मिलाया. शायद उस के टैक्सी स्टैंड का था. रास्ते के बारे में अपनी दिक्कत बताई और आवश्यक निर्देश लिए. फिर हम से मुखातिब होते हुए बोली, ‘‘सौरी सर, सौरी मैडम, लगता है, मैं ने एक गलत टर्न ले लिया था, पर फिक्र न करें. अभी ठीक हो जाएगी गलती,’’ और फिर गाड़ी यू टर्न लेते हुए मोड़ ली.

एक चौराहे पर मंत्रालय की ओर इंगित करता हुआ बोर्ड दिखा कर क्षमायाचना करती हुई बोली, ‘‘आप लोगों को मैं ने गलत रास्ते पर ले जा कर करीब 10 किलोमीटर ऐक्स्ट्रा घुमा दिया है. आप चार्ट देख कर 10 किलोमीटर का पैसा काट कर बाकी पेमैंट करना.’’

हमारे लिए यह उतना ही अभूतपूर्व अनुभव था जितना रात में ढाई बजे एक 27-28 वर्षीय नवयुवती द्वारा चलाई टैक्सी में बैठ कर पोवाई से कोलाबा तक की लंबी दूरी मुंबई की रात की गहराइयों में डूबते हुए तय करने का. मैं ने उसे धन्यवाद दिया और उस की ईमानदारी की प्रशंसा की. जिसे सुन कर उस के गालों पर आई सलज्ज मुसकान ने एक बार फिर उस की नारीसुलभ कोमलता की पुष्टि की. वह कोमलता जिसे उस ने पुरुषों द्वारा कब्जा किए हुए काम में आ कर भी गंवाया नहीं था. कोलाबा अब नजदीक आ गया था. फिर भी आधा घंटा तो कम से कम और लगता ही. तभी उस का मोबाइल बजा. कान से लगा कर उस ने 2-3 बार यस मैडम, यस मैडम कहा. फिर बोली, ‘‘बस मैडम, मैं अभी 10 मिनट में आती हूं.’’

मुझो आश्चर्य हुआ. अभी तो कोलाबा पहुंचने में ही कम से कम 20 मिनट और लगने हैं. वह 10 मिनट में कहां पहुंच सकती है? अत: मैं चुप नहीं रह पाया और उस से अपनी शंका का समाधान करने को कहा.

‘‘अरे सर, आप को भी तो 10 मिनट में ही आने का बोला था, पर 20 मिनट लगाए थे न. अब आधी रात में वह मैडम लेडी ड्राइवर खोज रही है. कहां से कोई दूसरी लेडी ड्राइवर आसानी से पाएगी. फिर धंधे में थोड़ा झोठ तो बोलना ही पड़ता है न?’’

 

मैं और मेरी पत्नी दोनों हंस पड़े. समझो गए कि वह चालक भी है और चालाक भी. जो भी हो, मेरा मन उस के दोनों रूपों के सामने नतमस्तक हो गया.

मेरी भाभी मुझ पर गंभीर आरोप लगाती हैं, मैं क्या करूं?

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल

मैं अविवाहित युवती हूं. माता पिता नहीं हैं. मैं भाई भाभी के साथ रहती हूं. समस्या यह है कि मेरी भाभी मुझ पर आरोप लगाती हैं कि मेरे और भैया के बीच गलत संबंध हैं. मुझे उन का यह आरोप बहुत परेशान करता है. समझ नहीं आता कि भैया से इस बारे में बात करूं या नहीं, सलाह दें.

जवाब

लगता है आप की भाभी को आप का उन के साथ रहना अखरता है. वे आप के प्रति अपनी व आप के भैया के जिम्मेदारी से बचने के लिए ऐसा आरोप लगा रही है. भाई से अपनी शादी कराने के लिए कहें. जैसा भी पति मिले, उस के साथ शादी करने को हां कह दें. यह क्लेश सब को भारी पड़ सकता है.

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न बहकें कदम

पिछले दिनों एक समाचारपत्र में खबर आई थी कि एक विवाहित महिला का एक युवक से प्रेमसंबंध चल रहा था. दुनिया की आंखों में धूल झोंक कर दोनों अपने इस संबंध का पूरी तरह से आनंद उठा रहे थे. महिला के घर में सासससुर, पति और उस के 2 बच्चे थे. पति जब टूअर पर जाता था, तो सब के सो जाने पर युवक रात में महिला के पास आता था. दोनों खूब रंगरलियां मना रहे थे.

एक रात महिला अपने प्रेमी के साथ हमबिस्तर थी, तभी उस का पति उसे सरप्राइज देने के लिए रात में लौट आया. आहट सुन कर महिला और युवक के होश उड़ गए. महिला ने फौरन युवक को वहां पड़े एक खाली ट्रंक में लिटा कर उसे बंद कर दिया. पति आ गया. वह उस से सामान्य बातें करती रही. काफी देर हो गई. पति को नींद नहीं आ रही थी. महिला को युवक को ट्रंक से बाहर निकालने का मौका ही नहीं मिला. बहुत घंटों बाद उस ने ट्रंक खोला. ट्रंक में दम घुटने से युवक की मृत्यु हो चुकी थी.

उस के बाद जो हुआ, उस का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. चरित्रहीनता का प्रत्यक्ष प्रमाण, तानेउलाहने, पुलिस, कोर्टकचहरी, परिवार, समाज की नजरों में जीवन भर के लिए गिरना. क्या कुछ नहीं सहा उस महिला ने. बहके कदमों का दुष्परिणाम उस ने तो सहा ही, युवक का परिवार भी बरबाद हो गया. बहके कदमों ने 2 परिवार पूरी तरह बरबाद कर दिए.

कभी न भरने वाले घाव

ऐसा ही कुछ मेरठ में हुआ. 2 पक्की सहेलियां कविता और रेखा आमनेसामने ही रहती थीं. दोनों की दोस्ती इतनी पक्की थी कि कालोनी में मिसाल दी जाती थी. दोनों के 2-2 युवा बच्चे भी थे. पता नहीं कब कविता और रेखा के पति विनोद एकदूसरे की आंखों में खोते हुए सब सीमाएं पार कर गए. कविता के पति अनिल और रेखा को जरा भी शक नहीं हुआ. पहले तो विनोद रेखा के साथ ही कविता के घर जाता था. फिर अकेले भी आने लगा.

कालोनी में सुगबुगाहट शुरू हुई तो दोनों ने बाहर मिलना शुरू कर दिया. बाहर भी लोगों के देखे जाने का डर रहता ही था. दोनों हर तरह से सीमा पार कर एक तरह से बेशर्मी पर उतर आए थे. अपने अच्छेभले जीवनसाथी को धोखा देते हुए दोनों जरा भी नहीं हिचकिचाए और एक दिन कविता और विनोद अपनाअपना परिवार छोड़ घर से ही भाग गए.

रेखा तो जैसे पत्थर की हो गई. अनिल ने भी अपनेआप को जैसे घर में बंद कर लिया. दोनों परिवार शर्म से एकदूसरे से नजरें बचा रहे थे. हैरत तो तब हुई जब 10 दिन बाद दोनों बेशर्मी से अपनेअपने घर लौट कर माफी मांगने का अभिनय करने लगे.

रेखा सब के समझाने पर बिना कोई प्रतिक्रिया दिए भावशून्य बनी चुप रह गई. बच्चों का मुंह देख कर होंठ सी लिए. विनोद को उस के अपने मातापिता और रेखा के परिवार ने बहुत जलील किया पर अंत में दिखावे के लिए ही माफ किया. सब के दिलों पर चोट इतनी गहरी थी कि जीवन भर ठीक नहीं हो सकती थी.

कविता को अनिल ने घर में नहीं घुसने दिया. उसे तलाक दे दिया. बाद में अनिल अपना घर बेच कर बच्चों को ले कर दूसरे शहर चला गया. लोगों की बातों से बचने के लिए, बच्चों के भविष्य का ध्यान रखते हुए रेखा का परिवार भी किसी दूसरे शहर में शिफ्ट हो गया. रेखा को विनोद पर फिर कभी विश्वास नहीं हुआ. दोस्ती से उस का मन हमेशा के लिए खट्टा हो गया. उस ने फिर किसी से कभी दोस्ती नहीं की. बस बच्चों को देखती और घर में रहती. विनोद हमेशा एक अपराधबोध से भरा रहता.

क्षणिक सुख

दोनों घटनाओं में अगर अपने भटकते मन पर नियंत्रण रख लिया जाता, तो कई घर बिखरने से बच जाते. कदम न बहकें, किसी का विश्वास न टूटे, इस तरह के विवाहेत्तर संबंधों में तनमन को जो खुशी मिलती है वह हर स्थिति में क्षणिक ही होती है. इन रिश्तों का कोई वजूद नहीं होता. ये जितनी जल्दी बनते हैं उतनी ही जल्दी टूट भी जाते हैं.

अपनी बेमानी खुशियों के लिए किसी के पति, किसी की पत्नी की तरफ अगर मन आकर्षित हो तो अपने मन को आगे बढ़ने से पहले ही रोक लें. इस रास्ते पर सिर्फ तबाही है, जीवन भर का दुख है, अपमान है. परपुरुष या परस्त्री से संबंध रख कर थोड़े दिन की ही खुशी मिल सकती है. ऐसे संबंध कभी छिपते नहीं.

यदि आप के वैवाहिक रिश्ते में कोई कमी, कुछ अधूरापन है तो अपने जीवनसाथी से ही इस बारे में बात करें, उसे ही अपने दिल का हाल बताएं. पति और पत्नी दोनों का ही कर्तव्य है कि अपना प्यार, शिकायतें, गुस्सा, तानेउलाहने एकदूसरे तक ही रखें.

स्थाई साथ पतिपत्नी का ही होता है. पतिपत्नी के साथ एकदूसरे के दोस्त भी बन कर रहें तो जीने का मजा ही और होता है. अपने चंचल होते मन पर पूरी तरह काबू रखें वरना किसी भी समय पोल खुलने पर अपनी और अपने परिवार की तबाही देखने के लिए तैयार रहें.

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या हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- sampadak@delhipress.biz सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

कांटा : क्या शिखा की चाल हुई कामयाब?

रूपापत्रिका ले कर बैठी ही थी कि तभी कालबैल की घंटी बजी. दरवाजा खोला तो सामने उस की बचपन की सहेली शिखा खड़ी थी. शिखा उस की स्कूल से ले कर कालेज तक की सहेली थी. अब सुजीत के सब से घनिष्ठ मित्र नवीन की पत्नी थी और एक टीवी चैनल में काम करती थी.

रूपा के मन में कुछ देर पहले तक शांति थी. अब उस की जगह खीज ने ले ली थी. फिर भी उसे दरवाजा खोल हंस कर स्वागत करना पड़ा, ‘‘अरे तू? कैसे याद आई? आ जल्दी से अंदर आ.’’

शिखा ने अंदर आ कर पैनी नजरों से पूरे ड्राइंगरूम को देखा. रूपा ने ड्राइंगरूम को ही नहीं, पूरे घर को सुंदर ढंग से सजा रखा था. खुद भी खूब सजीधजी थी. फिर शिखा सोफे पर बैठते हुए बोली, ‘‘इधर एक काम से आई थी… सोचा तुम से मिलती चलूं… कैसी है तू?’’

‘‘मैं ठीक हूं, तू अपनी सुना?’’

सामने स्टैंड पर रूपा के बेटे का फ्र्रेम में लगा फोटो रखा था. उसे देखते ही शिखा ने कहा, ‘‘तेरा बेटा तो बड़ा हो गया.’’

‘‘हां, मगर बहुत शैतान है. सारा दिन परेशान किए रहता है.’’

शिखा ने देखा कि यह कहते हुए रूपा के उजले मुख पर गर्व छलक आया है.

‘‘घर तो बहुत अच्छी तरह सजा रखा है… लगता है बहुत सुघड़ गृहिणी बन गई है.’’

‘‘क्या करूं, काम कुछ है नहीं तो घर सजाना ही सही.’’

‘‘अब तो बेटा बड़ा हो गया है. नौकरी कर सकती हो.’’

‘‘मामूली ग्रैजुएशन डिग्री है मेरी. मु झे कौन नौकरी देगा? फिर सब से बड़ी यह कि इन को मेरा नौकरी करना पसंद नहीं.’’

‘‘तू सुजीत से डरती है?’’

‘‘इस में डरने की क्या बात है? पतिपत्नी को एकदूसरे की पसंदनापसंद का खयाल तो रखना ही पड़ता है.’’

शिखा हंसी, ‘‘अगर दोनों के विचारों में जमीनआसमान का अंतर हो तो?

यह सुन कर रूपा  झुं झला गई तो वह शिखा से बोली, ‘‘अच्छा तू यह बता कि छोटा नवीन कब ला रही है?’’

शिखा ने कंधे  झटकते हुए कहा, ‘‘मैं तेरी तरह घर में आराम का

जीवन नहीं काट रही. टीवी चैनल का काम आसान नहीं. भरपूर पैसा देते हैं तो दम भी निकाल लेते हैं.’’

शिखा की यह बात रूपा को अच्छी नहीं लगी. फिर भी चुप रही, क्योंकि शिखा की बातों में ऐसी ही नीरसता होती थी. रूपा की शादी मात्र 20 वर्ष की आयु में हो गई थी. लड़का उस के पापा का सब से प्रिय स्टूडैंट था और उन के अधीन ही पी.एचडी. करते ही एक मल्टीनैशनल कंपनी में ऐग्जीक्यूटिव लग गया था. मोटी तनख्वाह के साथसाथ दूसरी पूरी सुविधाएं भी और देशविदेश के दौरे भी.

लड़के के स्वभाव और परिवार की अच्छी तरह जांच कर के ही पापा ने उसे अपनी इकलौती बेटी के लिए चुना था. हां, मां को थोड़ी आपत्ति थी लेकिन सम झने पर वे मान गई थीं. पापा मशहूर अर्थशास्त्री थे. देशविदेश में नाम था.

रूपा अपने वैवाहिक जीवन से बेहद खुश थी. होती भी क्यों नहीं, इतना हैंडसम और संपन्न पति मिला था. और विवाह के कुछ अरसा बाद ही उस की गोद में एक प्यारा सा बेटा भी आ गया था. शादी को 8 वर्ष हो गए थे. कभी कोई शिकायत नहीं रही. वह भी तो बेहद सुंदर थी. उस पर कई सहपाठी मरते थे, पर उस का पहला प्यार पति सुजीत ही थे.

बेटी को सुखी देख कर उस के मातापिता भी बहुत खुश थे.

बात बदलते हुए रूपा ने कहा, ‘‘छोड़ इन बातों को… इतने दिनों बाद मिली है… चल सहेलियों की बातें करती हैं.’’

शिखा थोड़ी सहज हुई. बोली, ‘‘तू भी तो कभी मेरी खबर लेने नहीं आती.’’

‘‘देख  झगड़े की बात नहीं… सचाई बता रही हूं… कितनी बार हम लोगों ने तु झे और नवीन भैया को बुलाया. भैया तो एकाध बार आए भी पर तू नहीं… फिर तू ने तो कभी हमें बुलाया ही नहीं.. अच्छा यह सब छोड़. बोल क्या लेगी चाय या ठंडा? गरम सूप भी है.’’

‘‘सूप ही ला… घर का बना सूप बहुत दिनों से नहीं पीया.’’

थोड़ी ही देर में रूपा 2 कप गरम सूप ले आई. फिर 1 शिखा को पकड़ा और दूसरा स्वयं पकड़ कर शिखा के सामने बैठ गई. बोली, ‘‘बता कैसी चल रही है तेरी गृहस्थी?’’

जब रूपा सूप लेने गई थी तब शिखा ने घर के चारों ओर नजर डाली थी. वह सम झ गई थी कि रूपा बहुत सुखी और संतुष्ट जीवन जी रही है. उस का स्वभाव ईर्ष्यालु था ही. अत: सहेली का सुख उसे अच्छा नहीं लगा. वह रूपा का दमकता नहीं मलिन व दुखी चेहरा देखना चाहती थी.

शिखा यह भी सम झ गई थी कि उस के सुख की जड़ बहुत मजबूत है. सहज उखाड़ना संभव नहीं. आज तक वह उसे हर बात में पछाड़ती आई है. पढ़ाई, लेखन प्रतियोगिता, खेल, अभिनय, नृत्य व संगीत सब में वह आगे रहती आई है. रूपा है तो साधारण स्तर की लड़की पर कालेज का श्रेष्ठ हीरा लड़का उस के आंचल में आ गया था. फिर समय पर वह मां भी बन गई. पति प्रेम, संतान स्नेह से भरी है वह. ऊपर से मातापिता का भरपूर प्यार, संरक्षण भी है उस के पास. संपन्नता अलग से.

यह सब सोच शिखा बेचैन हो उठी कि जीवन की हर बाजी उस से जीत कर यह अंतिम बाजी उस से हार जाएगी… पर करे भी तो क्या? कैसे उस की जीत को हार में बदले? कुछ तो करना ही पड़ेगा… पर क्या करे? सोचना होगा, हां कोई न कोई रास्ता तो निकालना ही होगा. रूपा में बुद्धि कम है. उसे बहकाना आसान है, तो कोई रास्ता निकालना ही पड़ेगा… जरूर कुछ सोचेगी वह.

मां से फोन पर बातें करते हुए रूपा ने शिखा के अचानक आने की बात कही तो वे शंकित

हो उठीं, ‘‘बहुत दिनों से उसे देखा नहीं… अचानक तेरे घर कैसे आ गई?’’

रूपा बेटे को दूध पिलाते हुए सहज भाव से बोली, ‘‘नवीन भैया तो आते रहते हैं… वही नहीं आती थी… उन से दूर की रिश्तेदारी भी है. सुजीत के भाई लगते हैं और दोस्त तो हैं ही. पर आज बता रही थी कि पास ही चैनल के किसी काम से आई थी तो…’’

‘‘मु झे उस पर जरा भी विश्वास नहीं. मु झे तो लगता है तेरा घर देखने आई थी,’’ मां रूपा की बात बीच ही में काटते हुए बोली.

यह सुन रूपा अवाक रह गई. बोली, ‘‘मेरे घर में ऐसा क्या है, जो देखने आएगी?’’

‘‘जो उस के घर में नहीं है. देख रूपा,

वह बहुत धूर्त, ईर्ष्यालु है… बिना स्वार्थ के वह एक कदम भी नहीं उठाती… तू उसे ज्यादा गले मत लगाना.’’

‘‘मां वह आती ही कहां है? वर्षों बाद तो मिली है.’’

‘‘यही तो चिंता है. वर्षों बाद अचानक तेरे घर क्यों आई?’’

रूपा हंसी, ‘‘ओह मां, तुम भी कुछ कम शंकालु नहीं हो… अरे, बचपन की सहेली से मिलने को मन किया होगा… क्या बिगाड़ेगी मेरा?’’

‘‘मैं यह नहीं जानती कि वह क्या करेगी पर वह कुछ भी कर सकती है. मु झे लग रहा है वह फिर आएगी… ज्यादा घुलना नहीं, जल्दी विदा कर देना… बातें भी सावधानी से करना.’’

अब रूपा भी घबराई, ‘‘ठीक है मां.’’ मां की आशंका सच हुई. एक दिन फिर आ धमकी शिखा. रूपा थोड़ी शंकित तो हुई पर उस का आना बुरा नहीं लगा. अच्छा लगने का कारण यह था कि सुजीत औफिस के काम से भुवनेश्वर गए थे और बेटा स्कूल… बहुत अकेलापन लग रहा था. उस ने शिखा का स्वागत किया. आज वह कुछ शांत सी लगी.

इधरउधर की बातों के बाद अचानक बोली, ‘‘तेरे पास तो बहुत सारा खाली समय होता है… क्या करती है तब?’’

रूपा हंसी, ‘‘तु झे लगता है खाली समय होता है पर होता है नहीं… बापबेटे दोनों की फरमाइशों के मारे मेरी नाक में दम रहता है.’’

‘‘जब सुजीत बाहर रहता है तब?’’

‘‘हां तब थोड़ा समय मिलता है. जैसे आज वे भुवनेश्वर गए हैं तो काम नहीं है. उस समय मैं किताबें पढ़ती हूं. तु झे तो पता है मु झे पढ़ने का कितना शौक है.’’

‘‘पढ़ तो रात में भी सकती है?’’

रूपा सतर्क हुई, ‘‘क्यों पूछ रही है?’’

‘‘देख रूपा, तू इतनी सुंदर है कि 20-22 से ज्यादा की नहीं लगती… अभिनय, डांस भी आता है. हमारे चैनल में अपने सीरियल बनते हैं. एक नया सीरियल बनना है जिस के लिए नायिका की खोज चल रही है. सुंदर, भोली सी कालेज स्टूडैंट का रोल है. तु झे तो दौड़ कर ले लेंगे. कहे तो बात करूं?’’

रूपा हंसने लगी, ‘‘तू पागल तो नहीं हो

गई है?’’

‘‘क्यों इस में पागल होने की क्या बात है?’’

‘‘कालेज, स्कूल की बात और है सीरियल की बात और. न बाबा न, मु झे घर से ही फुरसत नहीं. फिर मैं टीवी पर काम करूं यह कोई पसंद नहीं करेगा.’’

‘‘अरे पैसों की बरसात होगी. तू क्या सुजीत से डरती है?’’

‘‘उन की छोड़. उन से पहले मांपापा ही डांटेंगे. फिर अब तो बेटा भी बोलने लग गया है. मु झे पैसों का लालच नहीं है. पैसों की कोई कमी नहीं है. सुजीत हैं, पापा हैं.’’

शिखा सम झ गई कि रास्ता बदलना पड़ेगा. अत: फिर सामान्य बातें करतेकरते अचानक बोली, ‘‘तू सुजीत पर बहुत भरोसा करती है न?’’

यह सुन रूपा अवाक रह गई, बोली, ‘‘तेरा दिमाग तो ठीक है? वे मेरे पति हैं. मेरा उन पर भरोसा नहीं होगा तो किस पर करूंगी?’’

‘‘तु झे पूरा भरोसा है कि भुवनेश्वर ही गए हैं काम से?’’

‘‘अरे, मैं ने खुद उन का टूअर प्रोग्राम देखा है. मैं उस होटल को भी जानती हं जिस में वे ठहरते हैं. मैं भी तो कितनी बार साथ में गई हूं. इस बार भी जा रही थी पर बेटे की परीक्षा में हफ्ता भर है, इसलिए नहीं जा पाई. फिर वे अकेले नहीं गए हैं. साथ में पी.ए. और क्लर्क रामबाबू भी हैं. दिन में 2-3 बार फोन भी करते हैं.’’

‘‘तू सच में जरूरत से ज्यादा मूर्ख है. तू मर्दों की जात को नहीं पहचानती. बाहरी जीवन में वे क्या करते हैं, कोई नहीं जानता.’’

रूपा अंदर ही अंदर कांप गई. शिखा की उपस्थिति उसे अखरने लगी थी. मम्मी

की बातें बारबार याद आने लगीं. पर घर से धक्के मार उसे निकाल तो नहीं सकती थी. उस ने सोचा कि इस समय खुद पर नियंत्रण रखना बहुत जरूरी है… शिखा की नीयत पर उसे भरोसा नहीं था.

‘‘मैं घर और बच्चे को छोड़ कर सुजीत के पीछे ही पड़ी रहूं तो हो गया काम… फिर उन पर मु झे पूरा विश्वास है. दिन में कई बार फोन करते हैं… उन के साथ जो गए हैं उन्हें भी मैं अच्छी तरह जानती हूं.’’

‘‘बाप रे, तू तो सीता को भी मात देती लगती है.’’

इस बार शिखा हंसहंसते लोटपोट हो गई.

‘‘फोन वे करते हैं. तु झे क्या पता कि भुवनेश्वर से कर रहे हैं या मनाली की खूबसूरत वादियों में किसी और लड़की के साथ घूमने…’’

हिल गई रूपा, ‘‘यह क्या बक रही है? मेरे पति ऐसे नहीं हैं.’’

‘‘सभी मर्द एकजैसे होते हैं.’’

‘‘नवीन भैया भी ऐसे नहीं हैं.’’

‘‘ठीक है, मैं बताती हूं कैसे परखेगी… जब वे टूअर से लौटें तो उन के कपड़े चैक करना… किसी महिला के केश, मेकअप के कोई दाग, फीमेल इत्र की गंध है या नहीं… 2-4 बार अचानक औफिस पहुंच जा.’’

‘‘छि:… छि:… कितनी गंदगी है तेरी सोच. मु झे अब नवीन भैया पर तरस आ रहा है. अपना घर, नवीन भैया का जीवन बिगाड़ चैन नहीं… अब मेरा घर बरबाद करने आई है. तू जा… मेरे सिर में दर्द हो रहा है. मैं सोऊंगी.’’

शिखा का काम हो गया था. अत: वह हंस कर खड़ी हो गई. बोली, ‘‘जी भर कर सो ले. मैं जा रही हूं.’’

शिखा तो हंसती हुई चली गई, पर रूपा खूब रोई. जब बेटा स्कूल से आया तो उसे ले कर सीधे मां के पास चली गई.

मां ने उसे आते देख सम झ गईं कि जरूर कोई बात है. पर उस समय कोई बात नहीं की. बेटे और उसे खाना खाने बैठाया फिर बेटे को सुलाने के बाद वे बेटी के पास बैठीं, ‘‘अब बोल, क्या बात है.’’

रूपा चुप रही.

‘‘क्या आज भी शिखा आई थी?’’

उस ने हां में सिर हिलाया.

‘‘मैं ने तु झे पहले ही सावधान किया था. वह अच्छी लड़की नहीं है. वह जिस थाली में खाती है उसी में छेद करती है. हां, उस की मां सौतेली हैं यह ठीक है पर वे उस की सगी मां से भी अच्छी हैं. जब तक वहां रही एक दिन उसे चैन से नहीं रहने दिया. बाप से  झूठी शिकायतें कर घर को तोड़ने की कोशिश करती रही. पर उस के पापा सम झदार थे. बेटी की आदत को जानते थे और अपनी पत्नी पर पूरा विश्वास था, इसलिए शिखा अपने मकसद में कामयाब न हुई. अब जब से शादी हुई है तो बेचारे नवीन के जीवन को नरक बना रखा है… उस से भी मन नहीं भरा तो अब तेरे घर को बरबाद करने चली है… तू क्यों बैठाती है उसे?’’

‘‘अब घर आए को कैसे भगाऊं?’’

‘‘एक कप चाय पिला कर विदा कर दिया कर… बैठा कर बात मत किया कर. आज क्या ऐसा कहा जो तू इतनी परेशान है?’’

रूपा ने पूरी बात बताई तो वे शंकित हुईं और गुस्सा भी आया. वे अपनी बेटी को जानती थी कि उसे चालाकी नहीं आती है… उस के घर को तोड़ना बहुत आसान है. फिर बोली, ‘‘क्या तू यही मानती है कि सुजीत भुवनेश्वर नहीं गया है?’’

‘‘नहीं, मु झे उन पर पूरा विश्वास है. रामबाबू भी तो साथ हैं. यह तो शिखा कह रही थी.’’

‘‘फिर भी तू विचलित है, क्योंकि संदेह का कांटा वह तेरे मन में गहरे उतार गई है. देख संदेह एक बीमारी है. अंतर इतना है कि इस का कोई इलाज नहीं है. दूसरी बीमारियों की दवा है, उन का इलाज किया जा सकता है पर संदेह का नहीं. शिखा ने यह बीमारी तु झे लगाई है. अब अगर तु झ से सुजीत को लगे और वह तु झ पर शक करने लगे तब क्या करेगी?’’

कांप गई रूपा, ‘‘मु झ पर?’’

‘‘क्यों नहीं? उस के पीछे तू क्या करती है, उसे क्या पता. हफ्ताहफ्ता बाहर रहता है… तब तू एकदम आजाद होती है. जब तू उस पर शक करेगी तो वह भला क्यों नहीं कर सकता?’’

रूपा को काटो तो खून नहीं.

‘‘देख पागल मत बन… दूसरे की नहीं अपने मन की आवाज सुन कर चल. तू उस जैसी नहीं है. तेरे साथ तेरा बच्चा है, तू साधारण स्तर की पढ़ीलिखी है, बाहरी समाज का तु झे कोई अंदाजा नहीं है. अगर वह खाईखेली लड़की नवीन से तलाक भी ले ले तो भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा. पर तू क्या करेगी? हम हैं ठीक है पर पापा को जानती है न कितने न्यायप्रिय हैं… तू गलत हुई तो यहां से तु झे तिनके का सहारा भी नहीं मिलने वाला. मैं कुछ भी नहीं कर सकती.’’

मां की बात सुन कर स्तब्ध रह गई रूपा कि मां ने जो कहा स्पष्ट कहा, उचित बात कही. उस के मन में शिखा कांटा बोना चाहे और वह बोने दे तो अपना ही सर्वनाश करेगी.

मां ने नवीन से भी इस विषय पर बात की, यह सोच कर कि भले ही बेटी को सम झाया हो उन्होंने पर उस के मन का कांटा जड़ से अभी नहीं उखड़ा होगा.

नवीन ने उस दिन अचानक फोन कर के रूपा से कहा, ‘‘रूपा, बहुत दिन से तुम ने कुछ खिलाया नहीं. आज रात डिनर करने आऊंगा.’’

रूपा खुश हुई, ‘‘ठीक है भैया… मैं आप की पसंद का खाना बनाऊंगी.’’

शाम को नवीन सुजीत के साथ ही आया.

रूपा ने चाय के साथ पकौड़े बनाए.

नवीन ने चाय पीते हुए पूछा, ‘‘रात को क्या खिला रही हो?’’

‘‘आप की पसंद के हिसाब से पालकपनीर, सूखी गोभी, बूंदी का रायता और लच्छा परांठे… और कुछ चाहें तो…’’

‘‘नहींनहीं, बहुत बढि़या मेनू है. तुम बैठो. हां, सुजीत तू एक काम कर. रबड़ी ले आ.’’

सुजीत रबड़ी लेने चला गया तो नवीन ने कहा, ‘‘रूपा, आराम से बैठ कर बताओ पूरी बात क्या है?’’

रूपा चौंकी, ‘‘क्या भैया?’’

‘‘सुजीत को लग रहा है तुम पहले जैसी सहज नहीं हो… उसे तुम्हारे व्यवहार से कोई शिकायत नहीं है पर उसे लगता है तुम पहले जैसी खुश नहीं हो… लगता है कुछ है तुम्हारे मन में.’’

रूपा चुप रही.

‘‘रूपा तुम चुप रहोगी रही तो तुम्हारी समस्या बढ़ती ही जाएगी. बात क्या है? क्या सुजीत के किसी व्यवहार ने तुम्हें आहत किया है?’’

‘‘नहीं, वे तो कभी तीखी बात करते ही नहीं.’’

‘‘पतिपत्नी का रिश्ता बहुत सहज होते हुए भी बहुत नाजुक होता है. इस में कभीकभी बुद्धि को नजरअंदाज कर के मन की बात काम करने लगती है. तुम्हारे मन में कौन सा कांटा चुभा है मु झे बताओ?’’

रूपा ने कहा, ‘‘ऐसा कुछ नहीं है.’’

‘‘रूपा, पतिपत्नी का रिश्ता एकदूसरे के प्रति विश्वास पर टिका होता है. मु झे लगता है सुजीत के प्रति तुम्हारे विश्वास की नींव को धक्का लगा है. पर क्यों? सुजीत ने कुछ कहा है क्या?’’

शिखा ने जो संदेह का कांटा उस के मन में डाला था उस की चुभन की अवहेलना नहीं कर पा रही थी वह. इसी उल झन में उस की मानसिक शांति भंग हो गई थी. अब वह पहले जैसी खिलीखिली नहीं रहती थी और सुजीत से भी अंतरंग नहीं हो पा रही थी. उस की मानसिक उधेड़बुन उस के चेहरे पर मलिनता लाई ही, व्यवहार में भी फर्क आ गया था.

उस ने सिर  झुका कर जवाब दिया, ‘‘ऐसा कुछ नहीं है भैया.’’

‘‘नहीं रूपा, तुम्हारे मन की उथलपुथल तुम्हारे मुख पर अपनी छाप डाल रही है. ज्यादा परेशान हो तो तलाक ले लो. सुजीत तुम्हारी खुशी के लिए कुछ भी करने को तैयार है.’’

रूपा चौंकी उस की आंखें फैल गईं, ‘‘तलाक?’’

‘‘क्यों नहीं? तुम सुजीत के साथ खुश

नहीं हो.’’

‘‘भैया, मैं बहुत खुश हूं. सुजीत के बिना अपना जीवन सोच भी नहीं सकती. दोबारा तलाक की बात न करना,’’ और वह रो पड़ी.

‘‘तो फिर पहले जैसा भरोसा, विश्वास क्यों नहीं कर पा रही हो उस पर? उसे कभीकभी तुम्हारी आंखों में संदेह क्यों दिखाई देता है?’’

‘‘मैं सम झ रही हूं पर…’’

‘‘अपने मन से कांटा नहीं निकाल पा रही हो न? यह कांटा शिखा ने बोया है?’’

वह फिर चौंकी. नवीन को उस ने असहाय नजरों से देखा.

‘‘रूपा, कोईकोई मुरगी अंडा देने योग्य नहीं होती और वह दूसरी मुरगी का अंडा देना भी सहन नहीं कर पाती. कुछ औरतें भी ऐसी ही होती हैं, जो न तो अपने घर को बसा पाती हैं और न ही दूसरे के बसे घरों को सहन कर पाती हैं. उन्हें उन घरों को तोड़ने में ही सुख मिलता है. शिखा उन में से एक है और तुम उस की शिकार हो. उस ने चंद्रा का घर भी तोड़ने के कगार पर ला खड़ा किया था. मुश्किल से संभाला था उसे. अब उस के लिए वहां के दरवाजे बंद हैं तो तुम्हारे घर में घुस गई. तुम ही बताओ पहले कभी आती थी? अब बारबार क्यों आ रही है?’’

सिहर उठी रूपा. यह क्या भयानक भूल हो

गई है उस से… अपने सुखी जीवन में अपने हाथों ही आग लगाने चली थी. सुजीत जैसे पति पर संदेह. वह भी कब तक सहेंगे. उसे पापा, मां तो उसे एकदम सहारा नहीं देंगे…

फिर बोली, ‘‘भैया, शिखा तो बीमार है.’’

‘‘हां मानसिक रोगी तो है ही. पर तुम अपने को और अपने घर को बचाना चाहती हो तो अभी भी समय है संभल जाओ. सुजीत को अपने से उकताने पर मजबूर मत करो. जितना नुकसान हुआ है जल्दी उस की भरपाई कर लो.’’

‘‘वह मैं कर लूंगी पर आप…’’

‘‘मेरा तो दांपत्य जीवन कुछ है ही नहीं. घर भी नौकर के भरोसे चलता है और चलता रहेगा.’’

‘‘भैया, मैं कुछ करूं?’’

नवीन हंसा, ‘‘क्या करोगी? पहले अपना घर ठीक करो.’’

‘‘कर लूंगी पर आप के लिए भी सोचती हूं.’’

‘‘लो, सुजीत रबड़ी ले आया,’’ नवीन बोला.

शांति, प्यार, लगाव जो रूपा के हाथ से निकल रहे थे अब उस ने फिर उन्हें कस कर पकड़ लिया. मन ही मन शपथ ली कि अब सुजीत पर कोई संदेह नहीं करेगी. फिर सब से पहला काम उस ने जो किया वह था सुजीत को सब खुल कर बताना, वह सम झ गई थी कि लुकाछिपी करने से लाभ नहीं… जिस बात को छिपाया जाता है वह मन में कांटा बन कर चुभती है. और कोई भी बात हो एक न एक दिन खुलेगी ही. तब संबंधों में फिर से दरार पड़ेगी. इसलिए अपने मन में जन्मे विकार तक को साफसाफ बता दिया.

सारी बात ध्यान से सुन कर सुजीत हंसा,

‘‘मुझे पता था कि बेमौसम के बादल आकाश में ज्यादा देर नहीं टिकते. हवा का  झोंका आते ही उड़ जाते हैं. इसलिए तुम्हारे बदले व्यवहार से मैं आहत तो हुआ पर विचलित नहीं, क्योंकि मु झे पता था कि एक दिन तुम्हें अपनी भूल पर जरूर पछतावा होगा और तब सब ठीक हो जाएगा.’’

‘‘हमारा तो सब ठीक हो गया, पर नवीन भैया उन का क्या होगा?’’

‘‘शिखा के स्वभाव में परिवर्तन लाना नामुमकिन है.’’

‘‘नहीं, हमें कोशिश करनी चाहिए. नवीन भैया कितने अच्छे हैं.’’

‘‘बिगड़े संबंध को ठीक करने के लिए दोनों के स्वभाव में नमनीयता होनी चाहिए, जो शिखा में एकदम नहीं है.’’

‘‘फिर भी हमें प्रयास तो करना ही चाहिए,’’ रूपा ने कहा तो सुजीत चुप रहे.

फिर 3-4 दिन बाद रूपा ने दोनों को डिनर पर बुलाया. दोनों ही आए पर अलगअलग. रूपा फूंकफूंक कर कदम रख रही थी. शिखा को बोलने का मौका न दे कर स्वयं ही हंसे, बोले जा रही थी. जरा सी भी बात बिगड़ती देखती तो अपने बेटे को आगे कर देती. उस की मासूम बातें सब को मोह लेतीं. पूरा वातावरण खुशनुमा रहा. वैसे भी रूपा की आंखों से सुख, प्यार  झलक रहा था.

शिखा के मन में क्या चल रहा है, पता नहीं पर वह सामान्य थी. 2-4 बार मामूली मजाक भी किया. खाने के बाद सब गरम कौफी के कप ले कर ड्राइंगरूम में जा बैठे. बेटा सो चुका था.

बात सुजीत ने ही शुरू की, ‘‘यार काम, दफ्तर और घर इस से तो जीवन ही नीरस बन गया है. कुछ करना चाहिए.’’

नवीन ने पूछा, ‘‘क्या करेगा?’’

‘‘चल, कहीं घूम आएं. हनीमून में बस शिमला गए थे. फिर कहीं निकले ही नहीं.’’

‘‘हम भी शिमला ही गए थे. पर अब

कहां चलें?’’

रूपा ने कहा, ‘‘यह हम शिखा पर छोड़ते हैं. बोल कहां चलेगी?’’

शिखा ने कौफी का प्याला रखते हुए कहा, ‘‘शिमला तो हो ही आए हैं. गोवा चलते हैं?’’

रूपा उछल पड़ी, ‘‘अरे वाह, देखा मेरी सहेली की पसंद. हम तो सोचते ही रह जाते.’’

‘‘वहां जाने के लिए समय चाहिए, क्योंकि टिकट, ठहरने की जगह बुक करानी पड़ेगी. इस समय सीजन है… आसानी से कुछ भी नहीं मिलेगा और वह भी 2 परिवारों का एकसाथ,’’ नवीन बोला.

सुजीत ने समर्थन किया, ‘‘यह बात एकदम ठीक है. तो फिर?’’

‘‘एक काम करते हैं. मेरे दोस्त का एक फार्महाउस है. ज्यादा दूर नहीं. यहां से

20 किलोमीटर है. वहां आम का बाग, सब्जी की खेती, मुरगी और मछली पालन का काम होता है. बहुत सुंदर घर भी बना है और एकदम यमुना नदी के किनारे है. ऐसा करते हैं वहां पूरा दिन पिकनिक मनाते हैं. सुबह जल्दी निकल कर शाम देर रात लौट आएंगे.’’

रूपा उत्साहित हो उठी, ‘‘ठीक है, मैं ढेर सारा खानेपीने का सामान तैयार कर लेती हूं.’’

‘‘कुछ नहीं करना… वहां का केयरटेकर बढि़या कुक है.’’

शनिवार सुबह ही वे निकल पड़े. आगेपीछे 2 कारें फार्महाउस के

गेट पर रुकीं. चारों ओर हरियाली के बीच एक सुंदर कौटेज थी. पीछे यमुना नदी बह रही थी. बेटा तो गाड़ी से उतरते ही पके लाल टमाटर तोड़ने दौड़ा.

थोड़ी ही देर में गरम चाय आ गई. सुबह की कुनकुनी धूप सेंकते सब चाय पीने लगे. बेटे के लिए गरम दूध आ गया था.

रूपा ने कहा, ‘‘भैया, इतने दिनों तक हमें इतनी सुंदर जगह से वंचित रखा. यह तो अन्याय है.’’

नवीन हंसा, ‘‘मैं ने सोचा था ये सब फूलपौधे, नदी, हरियाली, कुनकुनी धूप हम मोटे दिमाग वालों के लिए हैं बुद्धिमानों के लिए नहीं.’’

‘‘ऐसे खुले वातावरण में सब के साथ आ कर शिखा भी खुश हो गई थी. उस के मन की खुंदक समाप्त हो गई थी. अत: वह हंस कर बोली, ‘‘तू सम झी कुछ? यह व्यंग्य मेरे लिए है.’’

सुजीत बोला, ‘‘तेरा दिमाग भी तो मोटा है… तू कितना आता है यहां?’’

‘‘जब भी मौका मिलता है यहां चला आता हूं. ध्यान से देखेगा तो मेरे लैंडस्केपों में तु झे यहां की  झलक जरूर दिखेगी… देख न यहां काम करने वाले सब मु झे जानते हैं.’’

शिखा चौंकी, ‘‘तो क्या कभीकभी जो देर रात लौटते हो तो क्या यहां आते हो?’’

‘‘हां. यहां आ कर फिर दिल्ली के हंगामे में लौटने को मन नहीं करता. बड़ी शांति है यहां.’’

‘‘तो तेरी कविताएं भी क्या यहीं की

उपज हैं?’’

‘‘सब नहीं, अधिकतर.’’

शिखा की आंखें फैल गईं, ‘‘क्या तुम कविताएं भी लिखते हो? मु झे तो पता ही नहीं था.’’

‘‘3 काव्य संग्रह निकल चुके हैं… एक पर पुरस्कार भी मिला है. तु झे पता इसलिए नहीं है, क्योंकि तू ने कभी जानने की कोशिश ही नहीं की कि हीरा तेरे आंचल से बंधा है. तेरी सौत कोई हाड़मांस की महिला नहीं यह कविता और चित्रकला है. इन के बाल नोच सके तो नोच. भैया ही कवि परिजात हैं, जिस की तू दीवानी है.’’

‘‘कवि परिजात?’’ प्याला छूट गया, उस

के हाथों से और फिर दोनों हाथों से मुंह छिपा कर रो पड़ी.

रूपा कुछ सम झाने जा रही थी मगर सुजीत ने रोक दिया. कान में कहा, ‘‘रोने दो… बहुत दिनों का बो झ है मन पर… अब हलका होने दो. तभी नौर्मल होगी.’’

थोड़ी देर में स्वयं ही शांत हो कर शिखा ने रूपा की तरफ देखा, ‘‘देख ले कितने धोखेबाज हैं.’’

रूपा यह सुन कर हंस पड़ी.

‘‘कितनी भी अकड़ दिखाओ शिखा पर प्यार तुम नवीन को करती ही हो… ये सारी हरकतें तुम्हारी नवीन को खोने के डर से ही थीं… पर उन्हें आप ने आंचल से बांधे रखने का रास्ता तुम ने गलत चुना था,’’ सुजीत बोला.

नवीन बोला, ‘‘छोड़ यार, अब हम

दूसरा हनीमून गोवा चल कर ही मनाते हैं…

जब भी टिकट और होटल में जगह मिलेगी तभी चल देंगे.’’

रूपासुजीत दोनों एकसाथ बोले,‘‘जय हो.’’

महक वापस लौटी: क्यों मनोज का गला दबाना चाहती थी सुमि

सुमि को रोज 1-2 किलोमीटर पैदल चलना बेहद पसंद था. वह आज भी बस न ले कर दफ्तर के बाद अपने ही अंदाज में मजेमजे से चहलकदमी करते हुए, तो कभी जरा सा तेज चलती हुई दफ्तर से लौट रही थी कि सामने से मनोज को देख कर एकदम चौंक पड़ी.

सुमि सकपका कर पूछना चाहती थी, ‘अरे, तुम यहां इस कसबे में कब वापस आए?’

पर यह सब सुमि के मन में ही कहीं  रह गया. उस से पहले मनोज ने जोश में आ कर उस का हाथ पकड़ा और फिर तुरंत खुद ही छोड़ भी दिया.

मनोज की छुअन पा कर सुमि के बदन में जैसे कोई जादू सा छा गया हो. सुमि को लगा कि उस के दिल में जरा सी झनझनाहट हुई है, कोई गुदगुदी मची है.

ऐसा लगा जैसे सुमि बिना कुछ  बोले ही मनोज से कह उठी, ‘और मनु, कैसे हो? बोलो मनु, कितने सालों के बाद मिले हो…’

मनोज भी जैसे सुमि के मन की बात को साफसाफ पढ़ रहा था. वह आंखों से बोला था, ‘हां सुमि, मेरी जान. बस अब  जहां था, जैसा था, वहां से लौट आया, अब तुम्हारे पास ही रहूंगा.’

अब सुमि भी मन ही मन मंदमंद मुसकराने लगी. दिल ने दिल से हालचाल पूछ लिए थे. आज तो यह गुफ्तगू भी बस कमाल की हो रही थी.

पर एक सच और भी था कि मनोज को देखने की खुशी सुमि के अंगअंग में छलक रही थी. उस के गाल तक लाल हो गए थे.

मनोज में कोई कमाल का आकर्षण था. उस के पास जो भी होता उस के चुंबकीय असर में मंत्रमुग्ध हो जाता था.

सुमि को मनोज की यह आदत कालेज के जमाने से पता थी. हर कोई उस का दीवाना हुआ करता था. वह कुछ भी कहां भूली थी.

अब सुमि भी मनोज के साथ कदम से कदम मिला कर चलने लगी. दोनों चुपचाप चल रहे थे.

बस सौ कदम चले होंगे कि एक ढाबे जैसी जगह पर मनोज रुका, तो सुमि भी ठहर गई. दोनों बैंच पर आराम से बैठ गए और मनोज ने ‘2 कौफी लाना’ ऐसा  कह कर सुमि से बातचीत शुरू कर दी.

‘‘सुमि, अब मैं तुम से अलग नहीं रहना चाहता. तुम तो जानती ही हो, मेरे बौस की बरखा बेटी कैसे मुझे फंसा कर ले गई थी. मैं गरीब था और उस के जाल में ऐसा फंसा कि अब 3 साल बाद यह मान लो कि वह जाल काट कर आ गया हूं.’

यह सुन कर तो सुमि मन ही मन हंस पड़ी थी कि मनोज और किसी जाल में फंसने वाला. वह उस की नसनस से वाकिफ थी.

इसी मनोज ने कैसे अपने एक अजीज दोस्त को उस की झगड़ालू पत्नी से छुटकारा दिलाया था, वह पूरी दास्तान जानती थी. तब कितना प्रपंच किया था इस भोले से मनोज ने.

दोस्त की पत्नी बरखा बहुत खूबसूरत थी. उसे अपने मायके की दौलत और पिता के रुतबे पर ऐश करना पसंद था. वह हर समय पति को मायके के ठाठबाट और महान पिता की बातें बढ़ाचढ़ा कर सुनाया करती थी.

मनोज का दोस्त 5 साल तक यह सहन करता रहा था, पर बरखा के इस जहर से उस के कान पक गए थे. फिर एक दिन उस ने रोरो कर मनोज को आपबीती सुनाई कि वह अपने ही घर में हर रोज ताने सुनता है. बरखा को बातबात पर पिता का ओहदा, उन की दौलत, उन के कारनामों में ही सारा बह्मांड नजर आता है.

तब मनोज ने उस को एक तरकीब बताई थी और कहा था, ‘यार, तू इस जिंदगी को ऐश कर के जीना सीख. पत्नी अगर रोज तुझे रोने पर मजबूर कर रही है, तो यह ले मेरा आइडिया…’

फिर मनोज के दोस्त ने वही किया. बरखा को मनोज के बताए हुए एक शिक्षा संस्थान में नौकरी करने का सुझाव दिया और पत्नी को उकसाया कि वह अपनी कमाई उड़ा कर जी सकती है. उस को यह प्रस्ताव भी दिया कि वह घर पर नौकर रख ले और बस आराम करे.

दोस्त की मनमौजी पत्नी बरखा यही चाहती थी. वह मगन हो कर घर की चारदीवारी से बाहर क्या निकली कि उस मस्ती में डूब ही गई.

वह दुष्ट अपने पति को ताने देना ही भूल गई. अब मनोज की साजिश एक महीने में ही काम कर गई. उस संस्थान का डायरैक्टर एक नंबर का चालू था. बरखा जैसी को उस ने आसानी से फुसला लिया. बस 4 महीने लगे और  मनोज की करामात काम कर गई.

दोस्त ने अपनी पत्नी को उस के बौस के साथ पकड़ लिया और उस के पिता को वीडियो बना कर भेज दिया.

कहां तो दोस्त को पत्नी से 3 साल अपने अमीर पिता के किस्सों के ताने सुनने पड़े और कहां अब वह बदनामी नहीं करने के नाम पर उन से लाखों रुपए महीना ले रहा था.

ऐसा था यह धमाली मनोज. सुमि मन ही मन यह अतीत याद कर के अपने होंठ काटने लगी. उस समय वह मनोज के साथ ही नौकरी कर रही थी. हर घटना उस को पता थी.

ऐसा महातिकड़मी मनोज किसी की चतुराई का शिकार बनेगा, सुमि मान नहीं पा रही थी.

मगर मनोज कहता रहा, ‘‘सुमि, पता है मुंबई मे ऐश की जिंदगी के नाम पर बौस ने नई कंपनी में मुझे रखा जरूर, मगर वे बापबेटी तो मुझे नौकर समझने लगे.’’

सुमि ने तो खुद ही उस बौस की  यहां कसबे की नौकरी को तिलांजलि दे दी थी. वह यों भी कुछ सुनना नहीं चाहती थी, मगर मजबूर हो कर सुनती रही. मनोज बोलता रहा, ‘‘सुमि, जानती हो मुझ से शादी तो कर ली, पद भी दिया, मगर मेरा हाथ हमेशा खाली ही रहता था. पर्स बेचारा शरमाता रहता था. खाना पकाने, बरतन मांजने वाले नौकरों के पास भी मुझ से ज्यादा रुपया होता था.

‘‘मुझे न तो कोई हक मिला, न कोई इज्जत. मेरे नाम पर करोड़ों रुपया जमा कर दिया, एक कंपनी खोल दी, पर मैं ठनठन गोपाल.

‘‘फिर तो एक दिन इन की दुश्मन कंपनी को इन के राज बता कर एक करोड़ रुपया इनाम में लिया और यहां आ गया.’’

‘‘पर, वे तुम को खोज ही लेंगे,’’ सुमि ने चिंता जाहिर की.

यह सुन कर मनोज हंसने लगा, ‘‘सुमि, दोनों बापबेटी लंदन भाग गए हैं. उन का धंधा खत्म हो गया है. अरबों रुपए का कर्ज है उन पर. अब तो वे मुझ को नहीं पुलिस उन को खोज रही है. शायद तुम ने अखबार नहीं पढ़ा.’’

मनोज ने ऐसा कहा, तो सुमि हक्कीबक्की रह गई. उस के बाद तो मनोज ने उस को उन बापबेटी के जोरजुल्म की ऐसीऐसी कहानियां सुनाईं कि सुमि को मनोज पर दया आ गई.

घर लौटने के बाद सुमि को उस रात नींद ही नहीं आई. बारबार मनोज ही खयालों में आ जाता. वह बेचैन हो जाती.

आजकल अपने भैयाभाभी के साथ रहने वाली सुमि यों भी मस्तमौला जिंदगी ही जी रही थी. कालेज के जमाने से मनोज उस का सब से प्यारा दोस्त था, जो सौम्य और संकोची सुमि के शांत मन में शरारत के कंकड़ गिरा कर उस को खुश कर देता था.

कालेज पूरा कर के दोनों ने साथसाथ नौकरी भी शुरू कर दी. अब तो सुमि के मातापिता और भाईभाभी सब यही मानने लगे थे कि दोनों जीवनसाथी बनने का फैसला ले चुके हैं.

मगर, एक दिन मनोज अपने उसी बौस के साथ मुंबई चला गया. सुमि को अंदेशा तो हो गया था, पर कहीं उस का मन कहता जरूर कि मनोज लौट आएगा. शायद उसी के लिए आया होगा.

अब सुमि खुश थी, वरना तो उस को यही लगने लगा था कि उस की जिंदगी जंगल में खिल रहे चमेली के फूल जैसी हो गई है, जो कब खिला, कैसा खिला, उस की खुशबू कहां गई, कोई नहीं जान पाएगा.

अगले दिन सुमि को अचानक बरखा दिख गई. वह उस की तरफ गई.

‘‘अरे बरखा… तुम यहां? पहचाना कि नहीं?’’

‘‘कैसी हो? पूरे 7 साल हो गए.’’ कहां बिजी रहती हो.

‘‘तुम बताओ सुमि, तुम भी तो नहीं मिलतीं,’’ बरखा ने सवाल का जवाब सवाल से दिया.

दोनों में बहुत सारी बातें हुईं. बरखा ने बताया कि मनोज आजकल मुंबई से यहां वापस लौट आया है और उस की सहेली की बहन से शादी करने वाला है.

‘‘क्या…? किस से…?’’ यह सुन कर सुमि की आवाज कांप गई. उस को लगा कि पैरों तले जमीन खिसक गई.

‘‘अरे, वह थी न रीमा… उस की बहन… याद आया?’’

‘‘मगर, मनोज तो…’’ कहतेकहते सुमि रुक गई.

‘‘हां सुमि, वह मनोज से तकरीबन 12 साल छोटी है. पर तुम जानती हो न मनोज का जादुई अंदाज. जो भी उस से मिला, उसी का हो गया.

‘‘मेरे स्कूल के मालिक, जो आज पूरा स्कूल मुझ पर ही छोड़ कर विदेश जा बसे हैं, वे तक मनोज के खास दोस्त हैं.’’

‘‘अच्छा?’’

‘‘हांहां… सुमि पता है, मैं अपने मालिक को पसंद करने लगी थी, मगर मनोज ने ही मुझे बचाया. हां, एक बार मेरी वीडियो क्लिप भी बना दी.

‘‘मनोज ने चुप रहने के लाखों रुपए लिए, लेकिन आज मैं बहुत ही खुश हूं. पति ने दूसरी शादी रचा ली है. मैं अब आजाद हूं.’’

‘‘अच्छा…’’ सुमि न जाने कैसे यह सब सुन पा रही थी. वह तो मनोज की शादी की बात पर हैरान थी. यह मनोज फिर उस के साथ कौन सा खेल खेल रहा था.

सुमि रीमा का घर जानती थी. पास में ही था. उस के पैर रुके नहीं. चलती गई. रीमा का घर आ गया.

वहां जा कर देखा, तो रीमा की मां मिलीं. बताया कि मनोज और खुशी तो कहीं घूमने चले गए हैं.

यह सुन कर सुमि को सदमा लगा. खैर, उस को पता तो लगाना ही था कि मनोज आखिर कर क्या रहा है.

सुमि ने बरखा से दोबारा मिल कर पूरी कहानी सुना दी. बरखा यह सुन कर खुद भौंचक सी रह गई.

सुमि की यह मजबूरी उस को करुणा से भर गई थी. वह अभी इस समय तो बिलकुल समझ नहीं पा रही थी कि कैसे होगा.

खैर, उस ने फिर भी सुमि से यह वादा किया कि वह 1-2 दिन में जरूर कोई ठोस सुबूत ला कर देगी.

बरखा ने 2 दिन बाद ही एक मोबाइल संदेश भेजा, जिस में दोनों की  बातचीत चल रही थी. यह आडियो था. आवाज साफसाफ समझ में आ रही थी.

मनोज अपनी प्रेमिका से कह रहा था कि उस को पागल करार देंगे. उस के घर पर रहेंगे.

सुमि यह सुन कर कांपने लगी. फिर भी सुमि दम साध कर सुन रही थी. वह छबीली लड़की कह रही थी कि ‘मगर, उस को पागल कैसे साबित करोगे?’

‘अरे, बहुत आसान है. डाक्टर का  सर्टिफिकेट ले कर?’

‘और डाक्टर आप को यह सर्टिफिकेट क्यों देंगे?’

‘अरे, बिलकुल देंगे.’ फिक्र मत करो.

‘महिला और वह भी 33 साल की, सोचो है, न आसान उस को उल्लू बनाना, बातबात पर चिड़चिड़ापन पैदा करना कोई मुहिम तो है नहीं, बस जरा माहौल बनाना पड़ेगा.

‘बारबार डाक्टर को दिखाना पड़ेगा. कुछ ऐसा करूंगा कि 2-4 पड़ोसियों के सामने शोर मचा देगी या बरतन तोड़ेगी पागलपन के लक्षण यही तो होते हैं. मेरे लिए बहुत आसान है. वह बेचारी पागलखाने मत भेजो कह कर रोज गिड़गिड़ा कर दासी बनी रहेगी और यहां तुम आराम से रहना.’

‘मगर ऐसा धोखा आखिर क्यों? उस को कोई नुकसान पहुंचाए बगैर, इस प्रपंच के बगैर भी हम एक हो सकते  हैं न.’

‘हांहां बिलकुल, मगर कमाई के  साधन तो चाहिए न मेरी जान. उस के नाम पर मकान और दुकान है. यह मान लो कि 2-3 करोड़ का इंतजाम है.

‘सुमि ने खुद ही बताया है कि शादी करते ही यह सब और कुछ गहने उस के नाम पर हो जाएंगे. अब सोचो, यह इतनी आसानी से आज के जमाने में कहां मिल पाता है.

‘यह देखो, उस की 4 दिन पहले की तसवीर, कितनी भद्दी. अब सुमि तो बूढ़ी हो रही है. उस को सहारा चाहिए. मातापिता चल बसे हैं. भाईभाभी की  अपनी गृहस्थी है.

‘मैं ही तो हूं उस की दौलत का सच्चा रखवाला और उस का भरोसेमंद हमदर्द. मैं नहीं करूंगा तो वह कहीं और जाएगी, किसी न किसी को खोजेगी.

‘मैं तो उस को तब से जानता हूं, जब वह 17 साल की थी. सोचो, किसी और को पति बना लेगी तो मैं ही कौन सा खराब हूं.’

रिकौर्डिंग पूरी हो गई थी. सुमि को बहुत दुख हुआ, पर वह इतनी भी कमजोर नहीं थी कि फूटफूट कर रोने लगती.

सुमि का मन हुआ कि वह मनोज का  गला दबा दे, उस को पत्थर मार कर घायल कर दे. लेकिन कुछ पल बाद ही सुमि ने सोचा कि वह तो पहले से ही ऐसा था. अच्छा हुआ पहले ही पता लग गया.

कुछ देर में ही सुमि सामान्य हो गई. वह जानती थी कि उस को आगे क्या करना है. मनोज का नाम मिटा कर अपना हौसला समेट कर के एक स्वाभिमानी जिद का भरपूर मजा  उठाना है.

विश्वास: अमित के सुखी वैवाहिक जीवन में क्यों जहर घोलना चाहती थी अंजलि?

करीब 3 साल बाद अंजलि और अमित की मुलाकात शौपिंग सैंटर में हुई तो दोनों एकदूसरे का हालचाल जानने के लिए एक रेस्तरां में जा कर बैठ गए.

यह जान कर कि अमित ने पिछले साल शादी कर ली है, अंजलि उसे छेड़ने से नहीं चूकी, ‘‘मैं बिना पूछे बता सकती हूं कि वह नौकरी नहीं करती है. मेरा अंदाजा ठीक है?’’

‘‘हां, वह घर में रह कर बहुत खुश है, अंजलि,’’ अमित ने मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘और वह तुम से लड़तीझगड़ती भी नहीं है न, अमित?’’

‘‘ऐसा अजीब सा सवाल क्यों पूछ रही हो?’’ अमित के होंठों पर फैली मुसकराहट अचानक गायब हो गई.

‘‘तुम्हारी विचारधारा औरत को सदा दबा कर रखने वाली है, यह मैं अच्छी तरह से जानती हूं, माई डियर अमित.

‘‘अतीत के हिसाब से तो तुम शायद ठीक कह रही हो, पर अब मैं बदल गया हूं,’’ अमित ने जवाब दिया.

‘‘तुम्हारी बात पर मुझे विश्वास नहीं हो रहा है.’’

‘‘तब सही बात शिखा से पूछ लेना.’’

‘‘कब मिलवा रहे हो शिखा से?’’

‘‘जब चाहो हमारे घर आ जाओ. मेरा यह कार्ड रखो. इस में घर का पता भी लिखा हुआ है,’’ अमित ने अपने पर्स में से एक विजिटिंग कार्ड निकाल कर उसे पकड़ा दिया.

‘‘मैं जल्दी आती हूं उस बेचारी से मिलने.’’

‘‘उस बेचारी की चिंता छोड़ो और अब अपनी सुनाओ. तुम्हारे पति तो पायलट हैं न?’’ अंजलि ने उस की टांग खींचना बंद नहीं किया तो अमित ने बातचीत का विषय बदल दिया.

‘‘हां, ऐसे पायलट हैं जिन्हें हवाईजहाज तो अच्छी तरह से उड़ाना आता है पर घरगृहस्थी चलाने के मामले में बिलकुल जीरो हैं,’’ अंजलि का स्वर कड़वा हो गया.

‘‘क्या तुम दोनों की ढंग से पटती नहीं है?’’ अमित की आवाज में सहानुभूति के भाव उभरे.

‘‘वे अजीब किस्म के इंसान हैं, अमित. मैं पास होती हूं तो मेरी कद्र नहीं करते. जब मैं नाराज हो कर मायके चली आती हूं तो मुझे वापस बुलाने के लिए खूब गिड़गिड़ाते हैं. तुम्हें अपने दिल की एक बात सचसच बताऊं?’’

‘‘हां, बताओ?’’

‘‘मुझे मनपसंद जीवनसाथी नहीं मिला है,’’ अंजलि ने गहरी सांस छोड़ी.

‘‘मैं तो हमेशा ही कहता था कि तुम्हें मुझ से अच्छा पति कभी नहीं मिलेगा पर तुम ने तब मेरी सुनी नहीं,’’ माहौल को हलका करने के इरादे से अमित ने मजाक किया.

‘‘मैं भी मानती हूं कि वह गलती तो मुझ से हो गई,’’ जवाब में अंजलि भी मुसकरा उठी.

‘‘पर तुम्हारी गलती के कारण मेरा तो बड़ा फायदा हो गया.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘मुझे शिखा मिल गई. वह ऐसा हीरा है जिस ने मेरी जिंदगी को खुशहाल बना दिया है. तुम से शादी हो जाती तो आपस में लड़तेझगड़ते ही जिंदगी गुजरती,’’ अमित जोर से हंस पड़ा.

अमित की हंसी में अंजलि को अपना अपमान नजर आया. उसे लगा कि शिखा की यों तारीफ कर के वह उस की खिल्ली उड़ा रहा है.

उस ने मुंह बनाते हुए जवाब दिया, ‘‘मैं जब शिखा से मिलूंगी तभी इस बात का पता लगेगा कि वह कितनी खुश है तुम्हारे साथ. अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना तो आसान होता है.’’

‘‘मैं इतना अच्छा पति हूं कि मेरी तारीफ करतेकरते उस का गला सूख जाएगा,’’ अमित ने ठहाका लगाया तो वह अंजलि को जहर लगने लगा.

जलन और अपमान की वजह से अंजलि ज्यादा देर उस के साथ नहीं बैठी. जरूरी काम का बहाना बना उस ने कौफी पीते ही विदा ले ली.

‘अमित जैसे गुस्सैल और शक्की इंसान के साथ कोई लड़की खुश रह ही नहीं सकती. उस से शादी न करने का मेरा फैसला गलत नहीं था,’ ऐसे विचारों में उलझी अंजलि से ज्यादा इंतजार नहीं हुआ और 2 दिन बाद ही उस ने शिखा से उस के घर फोन कर बात की.

उस ने शिखा से कहा, ‘‘तुम मुझे जानतीं नहीं हो शिखा, मैं अमित के कालेज की फ्रैंड अंजलि बोल रही हूं…’’

‘‘मुझे परसों ही बताया है अमित ने आप के बारे में. क्या आप आज हमारे यहां आ रही हो?’’ शिखा का उत्साहित स्वर अंजलि को अजीब सा लगा.

‘‘तुम्हारे घर तो मैं अपने पति के साथ किसी दिन आऊंगी. लेकिन आज अगर संभव हो तो तुम मेरे साथ कौफी पीने किसी पास के रेस्तरां में आ जाओ.’’

‘‘इस वक्त तो मेरा निकलना जरा…’’

अंजलि ने उसे टोकते हुए कहा, ‘‘मैं तुम से कुछ ऐसी बातें करना चाहती हूं, जो तुम्हारे फायदे की साबित होंगी.’’

‘‘तब हम मिल लेते हैं पर अभी नहीं बल्कि शाम को.’’

‘‘कितने बजे और कहां?’’

‘‘जिस मौल में तुम अमित से मिली थीं, उस की बगल में जो आकाश रैस्टोरैंट है, उसी में हम सवा 5 बजे मिलते हैं.’’

‘‘शिखा, अमित को तुम हमारी होने वाली मुलाकात के बारे में अभी कुछ नहीं बताना. बाद में बताना या न बताना तुम्हारा फैसला होगा.’’

‘‘ओके.’’

‘‘तो सवा 5 बजे मिलते हैं,’’ यह कह कर अंजलि ने फोन काट दिया.

शाम को रेस्तरां में मुलाकात होने पर पहले कुछ देर दोनों ने एकदूसरे के बारे में हलकीफुलकी जानकारी ली फिर अंजलि ने अपने मुद्दे पर बात शुरू कर दी.

‘‘क्या तुम्हें अमित ने बताया कि वह मुझ से प्यार करता था और हम शादी कर के साथ जिंदगी बिताने के सपने देखते थे?’’

‘‘नहीं, यह तो कभी नहीं बताया,’’ शिखा बड़े ध्यान से उस के चेहरे के हावभाव को पढ़ रही थी.

‘‘तब तो यह भी मुझे ही बताना पड़ेगा कि हमारे अलगाव का क्या कारण था.’’

‘‘बताइए.’’

‘‘शिखा, कालेज में हम दोनों सदा साथसाथ रहते थे, इसलिए हमारे बीच प्यार का रिश्ता बहुत मजबूत बना रहा. फिर मैं ने औफिस जाना शुरू किया तो परिस्थितियां बदलीं और उन के साथ बदल गया अमित का व्यवहार.’’

‘‘किस तरह का बदलाव आया उन के व्यवहार में?’’

‘‘वह बहुत ज्यादा शक्की आदमी है, क्या तुम मेरे इस कथन से सहमत हो?’’

‘‘यह तो तुम ने बिलकुल ठीक कहा,’’ शिखा हौले से मुसकरा उठी.

‘‘तब तुम समझ सकती हो कि किसी भी युवक से जरा सा खुल कर हंसनेबोलने पर अमित मुझ से कितना झगड़ता होगा. तुम्हें भी उस की इस आदत के कारण मानसिक यातनाएं झेलनी पड़ी होंगी?’’

‘‘थोड़ी सी… शुरूशुरू में,’’ शिखा की मुसकराहट और गहरी हो गई.

‘‘और अब?’’

‘‘अब सब ठीक है.’’

‘‘यानी अपने स्वाभिमान को मार कर व रातदिन के झगड़ों से तंग आ कर तुम ने घुटघुट कर जीना सीख लिया है?’’

‘‘ऐसा कुछ नहीं है. हमारे बीच झगड़े नहीं होते हैं.’’

‘‘तुम मुझ से कुछ भी छिपाओ मत, क्योंकि मैं तुम्हें अमित के हाथों प्रताडि़त होने से बचने की तरकीब बता सकती हूं,’’ अपने 1-1 शब्द पर अंजलि ने बहुत जोर दिया.

‘‘तो जल्दी बताइए न,’’ शिखा किसी छोटी बच्ची की तरह खुश हो उठी.

शिखा की दिलचस्पी देख कर अंजलि ने जोशीले अंदाज में बोलना शुरू किया, ‘‘मुझे उस ने अपने शक्की स्वभाव के कारण जब बहुत ज्यादा तंग करना शुरू किया तो मैं चुप रहने के बजाय उस के साथ झगड़ा करने के साथसाथ बोलचाल भी बंद कर देती थी. तब वह एकदम से सही राह पर आ जाता था.

‘‘तुम भी उस के गुस्से से डर कर दबना बंद कर दो. वह ख्वाहमख्वाह शक करे तो अपने को अकारण अपराधबोध का शिकार मत बनाया करो. अमित को सही राह पर रखने का तरीका यही है कि जब वह तुम्हें नाजायज तरीके से दबाने की कोशिश करे तो तुम पूरी ताकत से उस के साथ भिड़ जाओ. देखना, वह एकदम से सही राह पर आ जाएगा.’’

कुछ देर खामोश रह कर शिखा सोचविचार में खोई रही और फिर पूछा, ‘‘तुम ने यही रास्ता अपनाया था और वे इस से सही राह पर आ भी जाते थे, तो फिर तुम ने उन के साथ शादी क्यों नहीं की?’’

‘‘मैं बारबार होने वाले झगड़ों से तंग आ गई थी. मुझे जब यह लगने लगा कि यह आदमी कभी नहीं सुधरेगा, तो मैं ने हमेशा के लिए अलग होने का फैसला कर लिया था.’’

‘‘अच्छा, यह बताओ कि क्या तुम अपनी विवाहित जिंदगी में खुश और सुखी हो?’’

‘‘शादी के झंझटों में फंस कर कौन बहुत खुश और सुखी रह सकता है?’’

‘‘आप के पति पायलट हैं न?’’

‘‘हां.’’

‘‘उन की पगार 2-3 लाख रुपए तो होगी?’’

‘‘यह सवाल क्यों पूछ रही हो?’’

‘‘अमित अभी हर महीने 40 हजार रुपए कमाने तक पहुंचे हैं. मेरे मन में यह विचार उठ रहा है कि कहीं आर्थिक कारणों ने तब तुम्हारा मन बदलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका तो नहीं निभाई थी?’’

‘‘मैं तुम्हारी सहायता करने आई हूं न कि अमित से शादी न करने के कारणों का खुलासा करने,’’ अंजलि एकदम से चिढ़ उठी.

‘‘लेकिन मुझे तुम्हारी किसी भी सहायता की जरूरत नहीं है. व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर अपने जीवनसाथी से झगड़ने का तुम्हारा सुझाव मुझे बिलकुल बचकाना लगा. अमित जैसे हैं, अच्छे हैं और मैं उन के साथ बहुत खुश हूं,’’ शिखा ने अपने ऊपर से नियंत्रण नहीं खोया और शांत बनी रही.

‘‘तुम इस झूठ के साथ जीना चाहती हो तो तुम्हारी मरजी,’’ अंजलि नाराज हो कर बोली. शिखा ने अपने मोबाइल में समय देखा और बोली, ‘‘करीब 10 मिनट बाद अमित मुझे लेने यहां आ जाएंगे. तब तक हम किसी और विषय पर बात करते हैं.’’

‘‘मेरे मना करने पर भी तुम ने हमारी इस मुलाकात के बारे में उसे क्यों बताया?’’

अंजलि की आंखों में अब गुस्से के भाव नजर आ रहे थे.

‘‘मैं उन से कुछ नहीं छिपाती हूं. आज शक्की स्वभाव वाले अमित को मुझ पर पूरा विश्वास है तो उस के पीछे मेरी उन्हें सब कुछ बता देने की इस आदत से ही.’’

‘‘क्या तुम उसे हमारे बीच हुई बातों की भी सारी जानकारी दोगी?’’

‘‘हां, पर इस ढंग से नहीं कि तुम्हारी छवि खराब हो और तुम उन की नजरों में गिर जाओ.’’

‘‘थैंक यू. मुझे लग रहा है कि मैं ने तुम्हारी सहायता करने की पहल कर के शायद समझदारी नहीं दिखाई है. मैं चलती हूं,’’ अंजलि जाने को उठ खड़ी हुई.

‘‘अमित से नहीं मिलोगी?’’

‘‘नहीं. गुडबाय.’’

‘‘पत्नी को पति का दिल व विश्वास जीतने के लिए अगर पति के सामने झुक कर भी जीना पड़े, तो इस में कोई बुराई नहीं है, अंजलि.’’

‘‘मुझे ये लैक्चर क्यों दे रही हो?’’

‘‘मैं लैक्चर नहीं दे रही हूं पर इंसान को अपनी समझ में आई कोई भी अच्छी बात दूसरों से बांट लेनी चाहिए. अपने पति के साथ तुम हमारे घर जरूर आना.’’

‘‘कोशिश करूंगी,’’ रुखाई से जवाब दे कर अंजलि तेज कदमों से चल पड़ी.

अपनी बातों का जो असर वह शिखा

पर देखना चाह रही थी, वह उसे नजर नहीं आया था. शक्की अमित को उस ने कभी

यही सोच कर रिजैक्ट कर दिया था कि वह अच्छा पति साबित नहीं होगा. शिखा उस के साथ शादी कर के सुखी और संतुष्ट है, यह बात उसे हजम नहीं हो रही थी. उस के साथ अपनी तुलना कर रही अंजलि के मन में खीज व गुस्से के भाव पलपल बढ़ते ही जा रहे थे.

फेसबुक पर मिले लड़के से मैं प्यार करती हूं लेकिन वह मुझे साइको लगता है, मै अब क्या करूं?

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल

मैं एक लड़के से प्यार करती हूं. हमारी दोस्ती फेसबुक के जरिए हुई थी. धीरेधीरे बात बढ़ी और हम मिलने लगे. मैं तो उस से प्यार करने लगी हूं लेकिन मुझे ऐसा लगने लगा कि वह मुझ से कम मेरे शरीर से ज्यादा प्यार करता है. ऐसा वह कई बार बातोंबातों में कह भी चुका है कि मुझे तुम से ज्यादा प्यारी तुम्हारी बौडी लगती है, बहुत सैक्सी है, जी करता है निहारता रहूं, उसे प्यार करूं. जब वह ऐसी बातें करता है, मुझे बहुत अजीब फील होता है. कभीकभी तो वह मुझे साइको लगता है. यही नहीं, उस के मोबाइल पर जब भी कोई मैसेज आता है तो वह मुझ से छिपा लेता है, जिस से मुझे शक होता है कि कहीं वह मुझ से कुछ छिपा तो नहीं रहा. क्या मुझे ऐसी रिलेशनशिप में रहना चाहिए?    

जवाब

जिस रिलेशनशिप में प्यार से ज्यादा शक हो, घबराहट हो, शकाएं हों, वह रिलेशनशिप ज्यादा लंबी नहीं चल सकती. दूसरी बात, आप खुद कह रही हैं कि वह लड़का आप से ज्यादा आप की बौडी को महत्त्व देता है तो जो इंसान आप से ज्यादा आप के शरीर को अहमियत दे, उसे पाने की इच्छा रखे तो समझ जाएं कि वह आप से प्यार ही नहीं करता, बस, अपना उल्लू सीधा करने के लिए आप की जीहुजूरी कर रहा है, जो आप भी समझ रही हैं. सावधान हो जाएं, होशियार रहें वरना आप को पछताना पड़ेगा. अगर उस की नीयत साफ होती तो उस का आप से मैसेज छिपाने का सवाल ही नहीं उठता. समझदारी इसी में है कि ऐसे इंसान से शादी करना तो दूर की बात है, उस से दोस्ती भी न रखें. वरना, वह किसी दिन आप को कहीं का न छोड़ेगा.

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या हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- sampadak@delhipress.biz सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

Wedding Special : फैशन के साथ अपडेट करें मेकअप प्रोडक्ट्स, ताकि हैल्दी रहे स्किन

फैशन हमेशा एकजैसा नहीं रहता. थोड़े थोड़े समय में कुछ न कुछ बदलाव आता रहता है. अगर आप खुद को फैशन के साथ अपडेट रखना चाहती हैं तो सिर्फ ड्रैस पर ही ध्यान देना काफी नहीं है, बल्कि ब्यूटी प्रोडक्ट्स को भी अपडेट करना होगा. तभी आप की पर्सनैलिटी अट्रैक्टिव लगेगी.

आजकल ऐसे कई ब्यूटी प्रोडक्ट्स मार्केट में उपलब्ध हैं, जो अलग अलग स्किन और जरूरत के होते हैं. इन की खासीयत यह है कि ये लंबे समय तक तो चलते ही हैं, इस्तेमाल करने में भी आसान होते हैं.

इस बारे में एल्प्स ब्यूटी क्लीनिक की मेकअप ऐक्सपर्ट इशिका तनेजा कहती हैं कि अधिकांश महिलाएं ब्यूटी प्रोडक्ट्स फैशन के अनुसार नहीं खरीदतीं, बल्कि एकदूसरे की देखादेखी खरीदती हैं. फिर भले ही वह कलर उन की स्किनटोन से मैच करे या नहीं.

जिस तरह कपड़ों का फैशन आउटडेटेड होता है उसी तरह मेकअप में भी नए कलर, नए स्टाइल आते हैं, जिन से आप अट्रैक्टिव लुक पा सकती हैं.

लिपस्टिक में दिखे फैशन का रंग

आप को यह बात पता नहीं होगी, लेकिन लिपस्टिक भी चेहरे पर ग्लो लाती है. आप कितना भी अच्छा मेकअप कर लें, अगर आप ने लिपस्टिक नहीं लगाई है, तो आप का मेकअप अधूरा लगता है. इन दिनों फैशन ग्लौसी लिपस्टिक का नहीं वरन मैटी लिपस्टिक का है, इसलिए ग्लौसी लिपस्टिक लगाना बंद कर मैटी लिपस्टिक लगाना शुरू करें. मैटी लिपस्टिक काफी सोबर लगती है. यह डार्क कलर की होती है और होंठों पर चमक नहीं लाती, जिस कारण होंठ प्राकृतिक रूप से गहरे लगते हैं.

मैटी लिपस्टिक में डीप रैड, चैरी रैड, वाइन, ब्लम, बरगंडी, औक्स ब्लड, कोरल रैड, डार्क ब्राउन, मैरून, ब्लैकिश मैरून, ब्लैक कलर फैशन में हैं. इन दिनों आप औरेंज कलर की लिपस्टिक भी लगा सकती हैं. यह गोरी और सांवली सभी तरह की रंगत पर जंचती है. इस शेड की सब से बड़ी खासीयत यह है कि आप इसे कहीं भी और कभी भी लगा सकती हैं.

आजकल न्यूड शेड का भी फैशन है, जिसे स्मोकी आईज के साथ लगाया जा रहा है, क्योंकि स्मोकी आईज में हम आंखों को उभारते हैं. इसलिए लिप पर न्यूड शेड से मेकअप बैलेंस लगता है.

बबलगम, ब्राउन चौकलेट, नैचुरल पिंक, पीच कलर फैशन में हैं. पीच कलर हर तरह की स्किनटोन के साथ मैच करता है. इसलिए आप बिना टैंशन के इस का चुनाव कर सकती हैं.

पिंक लिपस्टिक भी फैशन में है. डे मेकअप के लिए पेस्टल पिंक लिपकलर का चुनाव करें और नाइट लुक के लिए ब्राइट पिंक अप्लाई कर सकती हैं. फेयर स्किन है, तो कोरल के पीच शेड का चुनाव करें, जबकि डार्क स्किन वालों को पिंक बेस्ड कोरल लिपस्टिक अप्लाई करनी चाहिए.

आजकल ग्लिटर और मैटेलिक का ट्रैंड इन है. इसे लिपस्टिक के ऊपर लगाने से लिप्स का लुक काफी अच्छा आता है. आप इसे लगा कर पार्टी में डिफरैंट लुक पा सकती हैं.

लिपस्टिक अप्लाई करने से पहले होंठों को मौइश्चराइज जरूर करें. इस से लिप्स सौफ्ट रहते हैं. इस के बाद आप जिस कलर की लिपस्टिक लगा रही हैं उसी कलर के लाइनर से आउटलाइनिंग करें. अब अलग कलर से आउटलाइनिंग का फैशन आउटडेटेड हो चुका है. इसलिए ऐसा न करें. अगर आप के पास मैचिंग लाइनर नहीं है, तो आप ब्रश में लिपस्टिक लगा कर लिप्स की आउटलाइनिंग करें. इस से लिप्स को अच्छी शेप मिलती है.

आंखों को करें हाईलाइट

आंखों को उभारने के लिए काजल व आईलाइनर जरूरी होता है और वह भी ऐसा जो फैले नहीं और गहरा काला रंग दे. आज कई तरह के काजल उपलब्ध हैं जैसे स्मज पू्रफ, कोलोसल, कोल, आइकोनिक इत्यादि. कलरफुल काजल का फैशन भी इन है, जिस में पर्पल, ब्राउन, कौपर कोबाल्ट ब्लू ट्रैंड में हैं.

लाइनर भी अलगअलग स्टाइल में लगाया जा रहा है जैसे कैट लुक, नैचुरल स्टाइल, फंकी स्टाइल, रैट्रो व मौडर्न लुक, विंग्ड स्टाइल, स्मोकी स्टाइल इत्यादि. इस साल ग्राफिक आई पैटर्न सब से हौट ट्रैंड में रहेगा. यह स्टाइल न सिर्फ आंखों को उभारता है, बल्कि आप को स्टाइलिश लुक भी देता है. लेकिन किसी भी स्टाइल का चुनाव करने से पहले आई कलर, स्किन कौंप्लैक्शन, मेकअप थीम और अपनी उम्र का ध्यान जरूर रखें.

अकसर हम एक ही लाइनर से सभी स्टाइल बनाने की कोशिश करते हैं, जिस की वजह से स्टाइल सही से नहीं बन पाता है. इसलिए इन स्टाइल को बनाने के लिए अलगअलग प्रकार के लाइनर का इस्तेमाल करें जैसे अगर आप कैट आई लुक चाहती हैं, तो जैल लाइनर आप के लिए बैस्ट है. इसे लगाना जितना आसान है साफ करना भी उतना ही आसान है. इस की खासीयत यह है कि यह कम फैलता है. जब भी आप जैल लाइनर का इस्तेमाल करें तब ब्रश जरूर साफ करें ताकि आप को किसी तरह का आई इन्फैक्शन न हो.

अगर आप स्मोकी आईज बनाना चाहती हैं, तो पैंसिल आईलाइनर का इस्तेमाल करें. इस से स्मोकी इफैक्ट काफी अच्छा आता है. पैंसिल आईलाइनर क्रीम टाइप लाइनर होते हैं और हर दिन के इस्तेमाल के लिए बैस्ट होते हैं, क्योंकि ये ज्यादा हार्स नहीं होते. यह उन महिलाओं के लिए  परफैक्ट होता है जो लाइनर लगाने की शुरुआत करती हैं. उन्हें पैंसिल से लाइनर लगाने में आसानी होती है. आजकल पैन लाइनर भी आ गए हैं. उन से आसानी से लाइनर लगाया जा सकता है.

मसकारा भी अलगअलग तरह के आने लगे हैं जैसे पाउडर मसकारा, क्रीम मसकारा, लिक्विड मसकारा इत्यादि. पाउडर मसकारा ड्राई और गीले मसकारा से काफी अलग होता है. इस में पानी डाल कर मिक्स किया जाता है. इसी तरह से क्रीम मसकारा वौल्यूम प्रदान करता है और आंखों में डैप्थ दिखाता है. लेकिन यह काफी जल्दी स्मज हो जाता है.

अगर आप की आईलैशेज छोटी हैं, तो लैंथनिंग मसकारा लगाएं. अगर आप घना दिखाना चाहती हैं, तो थिकनिंग मसकारा लगाएं. पर ध्यान रहे जब भी थिकनिंग मसकारा लगाएं, तो कम से कम 2 कोट जरूर अप्लाई करें. अगर आप की आईलैशेज सीधी हैं, तो कर्लिंग मसकारा लगाएं. इस से आईलैशेज कर्ली दिखाई देती हैं.

प्राइमर

चेहरा खूबसूरत दिखे इस के लिए प्राइमर लगाना जरूरी है. प्राइमर स्मूद लुक देता है और फाउंडेशन व मौइश्चराइजर को पूरा दिन रहने के लिए बेस प्रदान करता है, साथ ही त्वचा को औयली होने से बचाता है. जब भी प्राइमर का इस्तेमाल करें तब सिलिकौन बेस्ड प्राइमर ही चुनें. यह लंबे समय तक टिका रहता है और चेहरे पर ग्लोइंग इफैक्ट देता है.

अगर आप की त्वचा औयली है, तो क्रीमी और स्टिक कंसीलर कभी न लगाएं, क्योंकि ये पोर्स को बंद कर देते हैं. आप शाइनी और ग्रीसी फिनिश से बचने के लिए मैटी प्राइमर लगाएं.

आप की स्किन नौर्मल है, तो लाइन रिफ्लैक्ंिटग प्राइमर लगाएं. यह इस्तेमाल में आसान और इतना लाइट होता है कि चेहरा एकदम नैचुरल दिखता है.

अगर आप की स्किन ड्राई है और आप प्राइमर का इस्तेमाल करना चाहती हैं, जो शाइनी लुक दे, तो उस प्राइमर का चुनाव करें, जो स्किन को हाइड्रेट करे और लाइट टैक्स्चर दे. यह चेहरे पर नैचुरल ग्लो देता है. अगर आप को कुछ भी समझ नहीं आ रहा है, तो कई ब्रैंड्स के औयल फ्री कंसीलर भी आते हैं, जो दागधब्बों को छिपाने में मदद करते हैं. आप इन में से किसी का चुनाव कर सकती हैं.

आईशैडो

आप की रंगत डार्क हो या फेयर आप मेटैलिक आईशैडो लगाएं. यह इंडियन स्किनटोन पर बहुत अच्छा लगता है. आजकल स्मोकी आईज का ट्रैंड इन है. लेकिन इस में ब्लैक की जगह कौपर सिमर का ट्रैंड हिट है. इस साल गोल्ड, रस्ट और प्लम आईशैडो का फैशन इन है. अगर आप हड़बड़ी में हैं, तो आप के लिए सिंगल शेड फेस परफैक्ट है. इस में आप को कुछ भी नहीं करना, बस पीच या फिर पिंक शेड अपनी आईलिड, लिप और चिक्स पर लगा कर ब्लैंड करें.

हाईलाइटर

हाईलाइटर आप के फीचर्स को उभार शार्प व खूबसूरत दिखाता है. यह ब्लश की तरह ही होता है, जिस का इस्तेमाल उभारने के लिए किया जाता है. हाईलाइटर में मिनरल, मैट, पाउडर, स्टिक व क्रीम हाईलाइटर की बहुत वैराइटी उपलब्ध है. आप अपनी पसंदानुसार चुन सकती हैं.

Winter Special: ताकि लंबे समय तक नए रहे ऊनी कपड़े

सर्दियां शुरू हो गई है. वैसे कुछ लोगों ने तो सुबह-शाम हाफ स्वेटर पहनना भी शुरू कर दिया है. ऊनी कपड़े सिर्फ ठंड से बचाते नहीं हैं बल्कि हमारा विंटर स्टाइल भी तय करते हैं. ऐसे में जरूरी है कि हमें ऊनी कपड़ों का सही रख-रखाव पता हो. ऊनी कपड़ों को हिफाजत से रखा जाए तो वे लंबे समय तक अच्छे रहते हैं और पुराने नहीं दिखते.

ऊनी कपड़ों की देखरेख के लिए अपनाएं ये उपाय:

1. वाशिंग मशीन में धोने से बचें

स्वेटर को वॉशिंग मशीन में धोने से बचें. वाशिंग मशीन में धोने से स्वेटर जल्दी पुराने हो जाते हैं. ऊनी कपड़ों को नए जैसा रखने के लिए उन्हें एक मुलायम ब्रश से झाड़ते रहें. उन्हें हवा लगना भी जरूरी है.

2. दाग धब्बे छुड़ाने के लिए रगड़ें नहीं

दाग-धब्बे लग जाएं तो उसे तुरंत ड्राई क्लीन कराएं. अगर धब्बा ज्यादा गहरा नहीं है तो उसे ऊनी कपड़ों के लिए बने डिटर्जेंट से साफ करें.

3. सुखाने का सही तरीका

ऊनी कपड़ों को कभी भी तार पर लटकाकर नहीं सुखाएं. इससे उनका आकार बिगड़ सकता है. इसके अलावा ऊनी कपड़ों की शिकन दूर करने के लिए स्टीम प्रेस का ही इस्तेमाल करें.

4. धूप है जरूरी   

ऊनी कपड़ों को बिना धूप दिखाए, बक्से में न रखें. रखते समय नेफ्थलीन की गोलियां डालना न भूलें.

सर्दियों में आपके वार्डरोब में अतिरिक्त कपड़े आ जाते हैं. पहले से ही भरे वार्डरोब में और अतिरिक्त कपड़ों से वार्डरोब अस्त-व्यस्त हो जाता है. सर्दियों के लिए अपनी वार्डरोब तैयार करते समय थोड़ा ध्यान रखने से आप बेमतलब के टेंशन बची रहेंगी.

– सर्दी के कपड़ों को उनके टाइप या कलर के हिसाब से रख सकती हैं. फार्मल या पार्टी वेयर एक तरफ तो कैजुअल अलग.

– लांग स्लीव्स और फुल स्लीव्स वाले कपड़ों की भी अलग कैटेगरी बनाई जा सकती है.

– जगह ज्यादा होने पर कोट अलग क्लोजेट में टांगें.

– एक तरह के हैंगर्स का ही इस्तेमाल करें.

– स्वेटर्स, स्वेट शट्र्स और जींस को फोल्ड करके रखने से जगह बचाई जा सकती है.

– फोल्ड किया जाने वाला सामान दराजों में रखें.

– सूट, ड्रेसेज, साडिय़ां व कोट्स हैंगर्स पर और बाकी जरूरतों का सामान बाक्स में

रखें.

– अपनी आई लेवल पर हमेशा वही सामान रखें जो आपके रोज के मतलब का हो. कम प्रयोग किया जाने वाला सामान नीचे या ऊपर रखा जा सकता है.

Winter Special: जानिए सर्दियों में होती है कितने तरह की एलर्जी, बचने के लिए करें ये उपाय

हर मौसम का अपना मजा है, लेकिन हर मौसम अपने साथ कई बीमारियां भी लेकर आता है. वसंत ऋतु की शुरूआत के साथ एलर्जी की समस्या भी शुरू हो जाती है. वैसे तो ठंड के मौसम में सर्दी, जुकाम , फ्लू जैसी समस्या होना आम है, लेकिन इन दिनों में लोग एलर्जी की शिकायत भी करते हैं. हालांकि लोग फ्लू और एलर्जी के बीच अंतर नहीं कर पाते, ऐसे में तकलीफ बढ़ जाती  है. इसलिए एलर्जी के संकेतों और इसकी रोकथाम के तरीकों से जागरूक रहना बेहद जरूरी हैं. वैसे सर्दी और एलर्जी के बीच सबसे बड़ा अंतर अवधि का है. जुकाम आमतौर पर 10 दिनों तक रहता है, जबकि एलर्जी हफ्तों या महीनों तक जारी रह सकती है. सर्दियों में एलर्जी एक नहीं बल्कि कई तरह की होती है. तो आइए आपकी मदद के लिए हम यहां आपको बताते हैं विंटर एलर्जी क्या और कितने तरह की होती है.

सर्दियों में होने वाली सामान्य एलर्जी-

धूल और प्रदूषक-

सर्दियों के मौसम में ताप की जरूरतों के कारण ऊर्जा की खपत बहुत ज्यादा होती  है, जो हवा में विषाक्त पदार्थ छोड़ती है. सर्दियों के मौसम में हवा शुष्क होती है और गर्मी के मौसम में हवा की तुलना में इसमें ज्यादा प्रदूषण होता है. हवा में मौजूद धूल और अन्य प्रदूषक लोगों में एलर्जी का कारण बन सकते हैं.

मोल्ड-

अंधेरा, ठंडा और नम वातावरण मोल्ड के लिए एक अच्छा प्रजनन स्थल  है. यह लोगों में एलर्जी पैदा करने वाले सबसे आम  कारकों में से एक  है, जो सर्दी के मौसम में बढ़ जाता है.

पालतू जानवरों की फर-

घर में पले पालतू जानवरों की रूसी और फर के कारण एलर्जी का सामना करना पड़ सकता है. यह फर जब कपड़ों और घर में कई जगह गिर जाती है, तो इससे एलर्जी का खतरा भी बढ़ जाता है.

धूल के कण-

सर्दी गर्म कपड़ों का मौसम है. हालांकि, धूल के कण कपड़ों में फंसने और घर के अंदर की हवा में जमा होने से लोग एलर्जी का शिकार हो जाते हैं.

सर्दियों में होने वाली एलर्जी से कैसे बचा जा सकता है-

– जितना हो सके, घर को धूल, मिट्टी से मुक्त रखें.

– सप्ताह में एक या दो बार कालीन को वैक्यूम क्लीन करें.

– घर के पर्दे और शेड धूल मुक्त होने चाहिए.

– घर में ज्यादा नमी से बचें. क्योंकि ज्यादा नमी से मोल्ड का विकास बहुत तेजी से होता है.

– धूम्रपान से बचना चाहिए.

– अगर आपके घर में पेट्स हैं, तो हो सके तो इन्हें घर से बाहर रखें और हफ्ते में इन्हें एक बार नहलाएं.

सर्दियों में होने वाली एलर्जी के लक्षण लगभग मौसमी एलर्जी की तरह ही दिखते हैं. ऐसे में एलर्जी की दवा लेना, नाक और साइनस की सफाई करना या फिर घरेलू उपाय लक्षणों को कम करने में आपकी मदद कर सकते हैं.

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