परफैक्ट बैलेंस

‘‘नेहा बहुत थक गया हूं, एक गरमगरम चाय का कप और प्याज के पकौड़े हो जाएं. जरा जल्दी डार्लिंग,’’ राज ने औफिस से आते ही सोफे पर फैलते हुए कहा.

फीकी सी मुसकान बिखेरते नेहा ने पति को पानी का गिलास दिया और फिर उस के पास ही बैठ गई. फिर थकी सी आवाज में बोली, ‘‘चाय और पकौड़े थोड़ी देर में तैयार करती हूं. आज जल्दीजल्दी नहीं हो सकेगा.’’

‘‘क्यों, सब ठीक तो है?’’ राज की आवाज में खिन्नता साफ थी.

‘‘पिछले कुछ दिनों से थोड़ी कमजोरी महसूस कर रही हूं. थकीथकी सी रहती हूं,’’ पति की खिन्नता को भांप कर नेहा ने अपनी बढ़ती कमजोरी को थोड़ी बातों में समेट दिया था. यही तो वह करती आ रही है कई सालों से. कोई भी समस्या हो वह यथासंभव स्वयं ही सुलझा लेती या फिर हलके से उसे राज के सामने रखती ताकि उसे किसी प्रकार का तनाव न हो. ऐसा करने में नेहा को बहुत खुशी मिलती.

‘‘ठीक है पकौड़े न सही चाय के साथ बिस्कुट तो दे सकती हो मेरी नाजुक रानी,’’ राज ताना मारने से नहीं चूका. फिर नेहा की कमजोरी वाली बात को अनसुना कर फ्रैश होने के लिए बाथरूम की ओर बढ़ गया.

नाजुक नेहा के मन रूपी दर्पण पर जैसे किसी ने पत्थर दे मारा हो. कब थी वह नाजुक. 15 सालों की गृहस्थी में उस ने हर छोटेबड़े काम को कुशलता से निभाया था. कब टपटप करता बिगड़ा नल ठीक हो गया, कब पंखा दोबारा चलने लगा, कब बाथरूम की दीवार से रिसता पानी बंद हो गया उस ने राज को पता ही नहीं लगने दिया. बच्चों की देखरेख, पढ़ाईलिखाई, बैंक का काम, कितने ही और घरबाहर से जुड़े काम वह चुपचाप सुचारु रूप से संपन्न करती आ रही थी.

इतना ही नहीं नेहा छोटी कक्षा के 8-10 बच्चों को घर पर ही ट्यूशन भी पढ़ा देती थी. ताकि घर की आमदनी में थोड़ीबहुत वृद्धि हो सके.

पति और अपने बच्चों को प्रसन्न रखने में ही उस ने खुद को भुला दिया था. राज जबजब उसे गुलाबो या झांसी की रानी कह कर छेड़ता तो वह फूली न समाती थी. यही तो उस का प्यारा सा संसार था. यही उस की मनचाही साधना. अपने शौक, अपनी चाहतें सब कुछ उस ने सहर्ष भुला दिए थे. इस बात का नेहा को कभी कोई मलाल नहीं था, कोई गिला नहीं था. पर आज उसे मलाल हुआ कि मेरी कमजोरी, मेरी तकलीफ राज की नजर में कुछ अर्थ नहीं रखती. खुद को ताक पर रख दिया, यही मुझ से गलती हुई.

विचारों की उठतीउफनती लहरों में नेहा ने जैसेतैसे चाय बनाई.

राज फ्रैश हो कर आ गया था. खोईखोई सी नेहा ने उस के सामने चाय और बिस्कुट रख दिए. बस एक रोबोट की तरह यंत्रवत. कहते हैं कि सूखी आंखों से भी आंसू गिरते हैं, पर उन्हें समझने या देखने वाले बिरले ही होते हैं.

‘‘क्या कमाल की चाय बनाई है मेरी गुलाबो ने,’’ चाय की चुसकियां लेते हुए राज ने घाव पर मरहम लगाने की असफल चेष्टा की.

‘गुलाबो, हूं… अब लगे हैं मेरी खुशामद करने. चाय, बिस्कुट मिल गए… मेरी कमजोरी गई भाड़ में. दिल रखने के लिए ही सही कुछ तो पूछते मेरी कमजोरी के बारे में. इन्हें क्या? गलती मेरी ही है जो कभी इन के सामने अपनी तकलीफ नहीं रखी… यही तो सजा मिली है,’ मन ही मन बुदबुदा कर नेहा ने अपनी खीज निकाली.

‘‘नीरू और उमेश कहां हैं?’’ राज के प्रश्न पर नेहा का ध्यान भंग हुआ.

‘‘ट्यूशन वाले बच्चों का कैसा चल रहा है?’’

‘‘अच्छा चल रहा है. उन्हें भी आजकल अधिक समय देना पड़ रहा है. परीक्षा जो नजदीक है,’’ अनमनी सी नेहा बोली.

हर पौधे की तरह मानव हृदय के कोमल पौधे को भी समयसमय पर प्रेमजल से सींचना  पड़ता है, सहृदयता एवं सहानुभूति की खाद को जड़ों में यदाकदा डालना पड़ता है अन्यथा पौधा मुरझा जाता है. विशेषकर नारी का संवेदनशील हृदय जो प्रेम की हलकी सी थाप से छलकछलक जाता है, किंतु अवहेलना की तनिक सी चोट पर मरुस्थल सा शुष्क बन जाता है.

‘‘वह तो है. परीक्षा आ रही है तो समय देना ही पड़ेगा. इतना तो शुक्र है कि घर बैठे ही कमा लेती हो. बाहर नौकरी करती तो आए दिन थक जाती… आनाजाना पड़ता तो पता चलता,’’ घायल मन पर राज ने फिर चोट की.

यह चोट नेहा के लिए असहनीय थी. बोली, ‘‘घर पर ही अंदरबाहर के हजारों काम होते हैं. ये काम आप को दिखते ही नहीं. सब कियाकराया जो मिल जाता है… इतने सालों की गृहस्थी में मैं ने आप पर किसी भी काम का कम से कम बोझ डाला है. इसीलिए मेरी थकान, मेरी कमजोरी आप को पच नहीं रही. आखिर बढ़ती उम्र है… शरीर हमेशा एकजैसा तो नहीं रहता… पर नहीं, मैं तो सदैव गुलाब की तरह खिली रहूं, तरोताजा रहूं… है न?’’ क्रोध और क्षोभ से नेहा की आंखें छलछला आईं.

‘‘अब यह भी क्या बात हुई नाराज होने की? तुम तो मेरी झांसी की रानी हो. कुछ भी कहो आज भी तुम मुझे पहले जैसी गुलाबो ही दिखती हो,’’ राज ने बढ़ती कड़वाहट में मिठास घोलनी चाही.

‘‘रहने दो अपने चोंचले. आप का चैक बैंक में जमा करा दिया था और इंश्योरैंस वाले को फोन कर दिया था,’’ नेहा ने मात्र सूचना दी.

‘‘यह हुई न बात. पढ़ीलिखी, मौडर्न बीवी का कितना सुख होता है. मौडर्न औरत वाकई चुस्त और दुरुस्त होती है.’’

‘‘मौडर्न औरत बेमतलब पिसतीघुटती नहीं है और न ही इतनी मूर्ख कि अपने वजूद को भुला दे चाहे कोई कद्र करे या न करे,’’ नेहा के स्वर तीखे हो चले थे.

‘‘तिल का ताड़ मत बनाओ नेहा. तुम ही एकमात्र स्त्री नहीं हो जो घर और बाहर संभाल रही है. इस बढ़ती महंगाई के युग में हर सजग स्त्री कुछ न कुछ कर के पैसा कमा रही है. घर और परिवार में बैलेंस आजकल की स्त्री को बखूबी आता है. तनिक सूझबूझ से सब हो जाता है,’’ राज ने आग में घी डाल ही दिया.

‘‘आप कहना क्या चाहते हैं? क्या मुझ में सूझबूझ नहीं? इतने सालों से क्या मैं झकझोर रही हूं? क्या कमी रखी है किसी भी बात में? बैलेंस ही तो करती आ रही हूं अब तक… पर सच ही कहा है कि घर की मुरगी दाल बराबर,’’ नेहा आपे से बाहर हो चुकी थी.

सच सब से गहरे घाव भी उन्हीं से मिलते हैं जिन्हें हम बहुत चाहते हैं. उसी समय नीरू और उमेश आ गए. तूफान थम सा गया. नेहा ने उन्हें नाश्ता कराया. फिर उन्हें पढ़ाने बैठ गई.

वातावरण बोझिल हो चुका था.

‘‘मैं जरा बाहर घूमने जा रहा हूं,’’ कह कर राज बाहर निकल गया.

राज और नेहा की गृहस्थी सुखी और सामान्य थी. थोड़ी बहुत नोकझोंक होती रहती थी. यह सब तो गृहस्थ जीवन का अभिन्न अंग है. बहुत मिठास भी बनावटी लगती है.

नेहा राज को बहुत परिश्रम करता देखती. महीने में 2-3 टूअर भी हो जाते. देर रात तक राज नएनए प्रोजैक्ट पर काम करता. अपने पति पर नेहा को गर्व था. वह राज को प्रसन्न रखने की भरसक कोशिश करती.

सच तो यह था कि दोनों एकदूसरे से बहुत प्यार करते थे. लेकिन प्यार करने और दूसरे के मन की गहराई को समझने में काफी अंतर है. दिल महंगी भेंट नहीं मांगता. 2 शब्द प्रेम, प्रशंसा या सहानुभूति के ही पर्याप्त होते हैं. भावनाओं का स्थान भौतिक पदार्थ कमी नहीं ले सकते.

चूंकि नेहा हमेशा खिलीखिली रहती, इसलिए राज को उसे इसी प्रकार देखने की आदत हो चुकी थी. उस ने कभी इस बात को न जाना न समझा कि नेहा हर कार्य को कैसे कुशलतापूर्वक निबटा लेती. बहुत कम ऐसे अवसर आए जब नेहा ने अपनी परेशानी राज को बताई. प्रेमविभोर नेहा से शायद जानेअनजाने यही गलती हो गई थी. आज झगड़े का मूल कारण भी यही था. रात को डिनर के समय पतिपत्नी चुपचाप से थे. अंदर की पीड़ा जो थी सो थी.

बच्चे स्वभावानुसार चहक रहे थे, ‘‘पापा, मम्मी ने आज दमआलू कितने स्वादिष्ठ बनाए हैं,’’ नीरू ने चटकारे लेते हुए कहा.

‘‘हां बेटा, बहुत स्वादिष्ठ बने हैं,’’ राज ने स्वीकार किया.

उमेश भी नेहा को अपनी विज्ञान शिक्षिका और स्कूल की विज्ञान प्रदर्शिनी के बारे में बता रहा था. नेहा भी जैसेतैसे बेटे के उत्साह में भाग ले रही थी.

बच्चों का भोलापन वास्तव में कलकल करते निर्मल शीतल जलप्रपात सा है, जो पतिपत्नी के गिलेशिकवों के जलतेबुझते अंगारों को शांत कर देता है.

डिनर समाप्त हुआ तो बच्चे अपने बैडरूम में चले गए. नेहा ने जल्दी से बचे काम निबटाए और कपड़े बदल कर राज की तरफ पीठ कर के लेट गई. राज लेटेलेटे कुछ पढ़ रहा था. 11 बज रहे थे. नेहा के लेटते ही राज ने बत्ती बुझा दी.

‘‘नाराज हो क्या?’’ राज की आवाज में मलाई जैसी चिकनाहट थी.

नेहा चुप. कांटा बहुत गहरा चुभा था. पीड़ा हो रही थी.

‘‘डार्लिंग कल शाम मैं टूअर पर निकल जाऊंगा. 2-3 दिन के बाद ही आऊंगा. तुम बात नहीं करोगी तो कैसे चलेगा.’’

‘‘मेरा सिर दुख रहा है. आप सो जाएं,’’ नेहा ने टालना चाहा.

‘‘लाओ मैं तुम्हारा सिर दबा दूं,’’ राज नेहा को मना रहा था.

नेहा अब तक मन ही मन कोई फैसला ले चुकी थी. इसलिए प्रतिकार किए बिना उस ने करवट बदली और राज की ओर देखा. राज ने समझा बिगड़ी बात बनने लगी है. वह नेहा का सिर दबाने लगा.

‘अच्छा है… होने दो सेवा,’ नेहा मन ही मन मुसकराई. मन हलका हुआ तो आंख लग गई. राज भी हलके मन से सो गया.

अगला दिन सामान्य ही रहा. राज औफिस निकल गया. बच्चे स्कूल. नेहा

रोज के कार्यों में व्यस्त हो गई. पर कल रात उस ने जो फैसला लिया था. उसे भूली नहीं थी.

शाम हुई. बच्चे स्कूल से लौटे और राज औफिस से. कुछ खापी कर राज टूअर पर निकल गया. निकलने से पहले नेहा को आलिंगन में लिया. बच्चों को प्यार किया. सब ठीकठाक था. हमेशा की तरह.

3 दिन बाद राज सुबह 9 बजे घर लौटा. बच्चे स्कूल जा चुके थे. नेहा ने हंसते हुए स्वागत किया, ‘‘आप नहाधो लें. तब तक मैं नाश्ता तैयार करती हूं,’’

राज को लगा सब पहले जैसा नौर्मल है. दिल को सुकून मिला.

राज जैसे ही तरोताजा हुआ नेहा ने उस के सामने गरमगरम चाय और प्याज के पकौड़े रख दिए. साथ में पुदीने की चटनी.

‘‘मैं जानता था मेरी गुलाबो कभी बदल नहीं सकती,’’ राज बहुत खुश था.

‘‘कैसा रहा आप का टूअर?’’

‘‘अच्छा रहा. बहुत काम करना पड़ा पर मैं संतुष्ट हूं.’’

‘‘औफिस कितने बजे जाना है?’’

‘‘दोपहर 3 बजे निकलना है. थोड़ा आराम करूंगा. तुम अपनी कहो. क्याक्या किया इन 3 दिनों में?’’ राज ने पकौड़ों का आनंद लेते हुए उत्सुकता से नेहा की ओर देखा.

‘‘बहुत कुछ किया,’’ नेहा के चेहरे पर रहस्यमयी मुसकान थी.

‘‘बताओ तो सही.’’

‘‘एक स्कूल में इंटरव्यू दे कर आई हूं. पार्टटाइम जौब है. छठी और 7वीं कक्षा के बच्चों को अंगरेजी और समाजशास्त्र पढ़ाना है. मेरी ही पसंद के विषय हैं.’’

‘‘इंटरव्यू… यह सब क्या है,’’ राज सकपका गया.

‘‘हां डार्लिंग इंटरव्यू. नौकरी लगभग तय है. अगले महीने से जाना होगा. मेरी 1-2 सहेलियां भी वहां पढ़ा रही हैं. वेतन भी अच्छा है. मेरी सहेली ने ही मेरी सिफारिश की थी. अत: बात बन गई,’’ नेहा ने डट कर अपनी बात कह डाली. वह जानती थी कि राज को यह बात अच्छी नहीं लगेगी. लगे न लगे पर अब पता चलेगा कि परफैक्ट बैलेंस रखना क्या होता है.

‘‘अचानक यह नौकरी की क्या सूझी?’’ राज हैरान और खिन्न था.

‘‘अब इस में सूझने की क्या बात है?

जब हर आधुनिक स्त्री नौकरी कर रही है तो फिर मैं क्यों नहीं,’’ नेहा ने चटनी के चटखारे लेते हुए कहा.

‘‘तुम्हें मेरी उस दिन की बात बुरी लग गई?’’

‘‘बिलकुल नहीं. आप ठीक कहते थे. बैलेंस करने की ही तो बात है,’’ नेहा को मजा आ रहा था.

‘‘तुम्हारी कमजोरी… थकावट का क्या… सेहत भी देखनी पड़ती है.’’

‘‘भई कमाल है. आज आप को मेरी सेहत की बहुत चिंता होने लगी. पर सुन कर अच्छा लगा. चिंता न करें यह सब तो चलता ही है.’’

‘‘नेहा, बात उड़ाओ मत. मैं सीरियस हूं,’’ राज परेशान हो उठा.

‘‘धीरज रखें. मैं डाक्टर से मिल कर आई हूं. ब्लड टैस्ट की रिपोर्ट भी आ गई है.

सब ठीक है हीमोग्लोबिन कम है. डाक्टर की बताई दवा लेनी शुरू कर दी है और खानपान भी डाक्टर के निर्देशानुसार ले रही हूं.’’

‘‘और तुम्हारी ट्यूशनें?’’

‘‘पार्टटाइम नौकरी है. दोपहर 12:30 बजे तक लौट आऊंगी. ट्यूशन तो 3 बजे शुरू होती है. वह भी सप्ताह में 4 बार. महरी फुलटाइम सुबह से शाम तक आ जाया करेगी. बच्चे तो शाम 5 बजे तक ही लौटते हैं. स्कूल मुझे सप्ताह में 5 दिन ही जाना है. शनिर विवार छुट्टी. सब बैलेंस हो जाएगा,’’ नेहा मोरचे पर डटी थी.

‘‘तुम जानती हो अगले महीने बड़े भाईसाहब और भाभी आ रहे हैं,’’ राज ने हारे सिपाही के स्वर में कहा.

‘‘यह तो और भी अच्छी बात है. भाभीजी तो बहुत सुघड़ हैं. मेरी बहुत मदद हो जाएगी. वे भी थोड़ीबहुत घर की देखभाल कर लेंगी और भाईसाहब बच्चों को गणित और विज्ञान पढ़ा दिया करेंगे. इन विषयों में तो वे माहिर हैं,’’ नेहा आज घुटने टेकने वाली नहीं थी.

‘‘तो तुम ने नौकरी करने का निश्चय कर ही लिया है,’’ राज ने हथियार डाल दिए.

‘‘बिलकुल. आप देखना आप की झांसी की रानी घरबाहर को कैसा बैलेंस करती है. आप से ही तो मुझे प्रेरणा मिली है. खैर, छोडि़ए इन बातों को. आप थके हुए हैं. आओ सिर में तेल की मालिश कर देती हूं. आराम मिलेगा,’’ नेहा चाश्नी से सने तीर छोड़ रही थी.

‘‘लंच में क्या है?’’

‘‘सब आप की मनपसंद की चीजें.

लौकी के कोफ्ते, बैगन का भरता और मीठे में बासमती चावल की खीर. आया न मुंह में पानी?’’

‘‘हांहां, ठीक है,’’ राज निरुत्तर हो चुका था.

कहना न होगा कि नेहा परफैक्ट बैलेंस का अंदाज सीख चुकी थी.

सुलझे लोग

सड़क दुर्घटना में हुई मिहिर की आकस्मिक मृत्यु ने सपना के परिवार को बुरी तरह झकझोर दिया था. सब से ज्यादा फिक्र सब लोगों को सपना को ले कर थी. बी.ए. की परीक्षा के तुरंत बाद सपना की सास ने सपना को एक शादी में देख कर अपने बेटे के लिए पसंद कर लिया था और शादी के लिए जल्दी मचा दी थी. सपना के घर वालों ने कहा भी था कि सपना को कोई प्रोफैशनल कोर्स कर लेने दें लेकिन उस की सास ने बड़े दर्प से कहा था, ‘‘हमारे घर की बहू को कभी नौकरी नहीं करनी पड़ेगी. मिहिर सरकारी प्रतिष्ठान में इंजीनियर है, अच्छी तनख्वाह पाता है. घरपरिवार की उस पर कोई जिम्मेदारी नहीं है. वकील बाप ने बढि़या कोठी बनवा ही दी है, इतना कैश भी छोड़ ही जाएंगे कि दोनों बेटे अपने बच्चों को अच्छा भविष्य दे सकें.’’

उन की बात गलत भी नहीं थी. सपना मिहिर के साथ बहुत खुश थी, पैसे की तो खैर, कमी थी ही नहीं. लेकिन शादी के 7 साल ही के बाद मिहिर उसे 2 बच्चों के साथ यों छोड़ कर चला जाएगा, यह किसी ने नहीं सोचा था. वैसे सपना के सासससुर का व्यवहार उस के साथ बहुत स्नेहपूर्ण और संवेदनशील था. सपना के भाई और पिता आश्वस्त थे कि उस का देवर और सासससुर उस का और बच्चों का पूरा खयाल रखेंगे, मगर सपना की चाची का कहना था कि यह सब मुंह देखी बातें हैं. हम लोगों को अभी सब बातें साफ कर लेनी चाहिए और उठावनी होते ही उन्होंने सपना की मां से कहा कि वह उस की सास से पूछें कि सपना अब कहां रहेगी?

‘‘हमारे साथ दिल्ली में रहेगी, बच्चों की छुट्टियों में आप लोगों के पास मेरठ आ जाया करेगी. मिहिर की बरसी के बाद उस के लिए उपयुक्त घरवर देखना शुरू करेंगे,’’ सास का स्वर कोशिश करने के बावजूद भी भर्रा गया.

‘‘आजकल कुंआरी लड़कियों के लिए तो उपयुक्त घरवर मिलते नहीं, बहनजी, सपना बेचारी के तो 2 बच्चे हैं,’’ चाची बोलीं.

‘‘मनोयोग से चेष्टा करने पर सब मिल जाता है, बहनजी. कोई न कोई विकल्प तो तलाशना ही होगा, क्योंकि सपना को हम ने न तो कभी बेचारी कहलवाना है, न ही उसे एक बेवा की निरीह और बोसीदा जिंदगी जीने देना है,’’ उस की सास ने दृढ़ स्वर में कहा और सपना की मां की ओर मुड़ीं, ‘‘फिलहाल तो हमें यह सोचना है कि अभी सपना के पास कौन रहेगा, आप या मैं? खैर, कोई जल्दी नहीं है, रिश्तेदारों के जाने के बाद तय कर लेंगे.’’

सब ने यही मुनासिब समझा कि सपना की मां उस के साथ रहे. सपना का देवर शिशिर नागपुर के एक कालेज में व्याख्याता था. वह हर दूसरे सप्ताहांत में आ जाता था. उस के आने से बच्चे तो खुश होते ही थे, सपना भी उस की पसंद का खाना बनाने में रुचि लेती थी. देवरभाभी में थोड़ी नोकझोंक भी हो जाती थी. शिशिर उम्र में सपना से कुछ महीने बड़ा था. कहता तो भाभी ही था लेकिन व्यवहार दोस्ती का था.

‘‘तुम्हारे आने से सब का दिल बहल जाता है, शिशिर, लेकिन तुम्हारी छुट्टियां खराब हो जाती हैं,’’ सपना की मां ने कहा.

‘‘यहां आ कर मेरी छुट्टियां भी मजे से गुजर जाती हैं, मांजी. वहां छुट्टी के दिन सोने या पढ़ने के सिवा कुछ नहीं करता.’’

‘‘दोस्तों के साथ समय नहीं गुजारते?’’

‘‘दोस्त हैं ही नहीं. पीएच.डी. करने के दौरान खानेसोने का समय ही नहीं मिला. जो दोस्त थे उन से भी संपर्क नहीं रहा और लड़कियां तो मांजी मुझ जैसे पुस्तक प्रेमी की ओर देखतीं भी नहीं,’’ शिशिर हंसा.

‘‘अब तो पीएच.डी. कर ली है, इसलिए दोस्त बनाओ.’’

‘‘बनाऊंगा मांजी, मगर दिल्ली जा कर. मैं बंटीबन्नी के साथ रहने के लिए दिल्ली में नौकरी की कोशिश कर रहा हूं, उम्मीद है जल्दी ही मिल जाएगी,’’ शिशिर ने बताया.

बच्चों की परीक्षा होने तक सपना भी संभल चुकी थी और बड़ी शांति से अपनी गृहस्थी को समेट रही थी. शिशिर को भी दिल्ली में नौकरी मिल गई थी. जब सपना की मां मेरठ लौट कर आई तो वह सपना की ओर से पूर्णतया निश्चिंत थी. सब के पूछने पर उस ने बताया, ‘‘मिहिर को तो वे वापस नहीं ला सकते, मगर ससुराल वाले बहुत सुलझे हुए लोग हैं और इसी कोशिश में रहते हैं कि सपना को हर तरह सुखी रखें. देवर ने भी बच्चों के साथ रहने की खातिर दिल्ली में नौकरी ढूंढ़ ली है.’’

‘‘बच्चों के साथ रहने को या यह देखने को कि कहीं सारी कोठी पर सपना का कब्जा न हो जाए,’’ चाची ने मुंह बिचकाया.

‘‘चलो, इसीलिए सही, पर उस के रहने से हमारी बेटी और बच्चों का मन तो बहला रहेगा,’’ मां ने कहा.

‘‘तब तक जब तक उस की शादी नहीं होती. अपना घरसंसार बसाने के बाद कौन भाई के उजड़े चमन को सींचने आता है. मेरी मानो, तुम उन लोगों की बातों में न आ कर सपना के सासससुर से कहो कि वे उसे कोई अच्छा सा बिजनेस करा दें. उस का दिल भी लगा रहेगा और निजी आमदनी भी हो जाएगी,’’ चाची ने सलाह दी.

‘‘मगर सपना को तो बिजनेस का क ख ग भी नहीं मालूम,’’ मां ने कहा.

‘‘सपना को न सही, जतिन को तो मालूम है. एम.बी.ए. कर रहा है, बहन की मदद करने को नौकरी के बजाय उस के साथ काम कर लेगा,’’ चाची बोलीं.

एक बार मेरठ आने पर जब वह सब को बता रही थी कि उसे आशंका थी कि भोपाल में पलेबढ़े बच्चे दिल्ली के बच्चों के साथ शायद न चल सकें, मगर बंटी और बन्नी ने तो बड़ी आसानी से नए परिवेश को अपना लिया है तो चाची ने पूछा, ‘‘लेकिन इन्हें संवारने के चक्कर में तुम ने अपने लिए भी कुछ सोचा है या नहीं?’’

‘‘मेरा सर्वस्व या जीवन तो अब ये बच्चे ही हैं, चाची. इन का भविष्य संवारने के अलावा मुझे और क्या सोचना है?’’

इस से पहले कि चाची कुछ और बोलती, बच्चों ने आ कर कहा कि वे वापस दिल्ली जाना चाहते हैं. चाची की वजह पूछने पर बोले, ‘‘यहां हमारा दिल नहीं लग रहा. दिल्ली में तो चाचा के साथ छुट्टी के रोज सुबह घुड़सवारी करने जाते हैं और टैनिस तो रोज ही शाम को खेलते हैं. हम ने चाचा को भी फोन किया था. उन का भी दिल नहीं लग रहा. कहते थे, मम्मी से पूछ लो, अगर वे कहती हैं, तो मैं अभी लेने आ जाता हूं, आप क्या कहती हैं, मम्मी?’’

‘‘तुम्हें और तुम्हारे चाचा को उदास तो कर नहीं सकती. इसलिए चलो, ड्राइवर से कहो, हमें छोड़ आएगा.’’

लेकिन तब तक बन्नी ने शिशिर को आने के लिए फोन कर दिया. शिशिर के आने से बच्चे बहुत खुश हुए.

‘‘बाप की कमी महसूस नहीं होने देता बच्चों को,’’ सब के जाने के बाद सपना के पिता ने कहा.

‘‘जब तक अपनी शादी नहीं हो जाती, भाई साहब. हमें शिशिर की शादी अपने परिवार की लड़की से करवानी चाहिए ताकि अगर वह सपना को कुछ तकलीफ दे तो हम उस की लगाम तो कस सकें,’’ चाची बोलीं.

‘‘मगर अपने परिवार में लड़कियां हैं ही कहां?’’

‘‘मेरे पीहर में हैं. मैं देखती हूं,’’ चाची ने बड़े इतमीनान से कहा.

मिहिर की बरसी के कुछ दिन बाद ही चाची अपनी भांजी का रिश्ता शिशिर के लिए ले कर सपना की ससुराल पहुंच गईं.

‘‘अब घर में कुछ खुशी भी आनी चाहिए.’’

‘‘जरूर आएगी, बहनजी, लेकिन पहले सपना की जिंदगी में,’’ सपना की सास ने कहा, ‘‘उसे व्यवस्थित करने के बाद ही हम शिशिर के बारे में सोचेंगे.’’

‘‘व्यवस्थित करने वाली बात आप सही कह रही हैं. सपना को कोई बिजनेस करा दीजिए. मेरे बेटे ने अभी एम.बी.ए. किया है, वह सपना के अनुकूल अच्छा प्रोजैक्ट सुझा सकता है,’’ चाची उत्साह से बोलीं.

‘‘सपना को रोजीरोटी कमाने की कोई मुसीबत नहीं है. मिहिर ही उस के लिए बहुत कुछ छोड़ गया है और ससुर भी बहुत कमा रहे हैं. लेकिन जीने के लिए पैसा ही सब कुछ नहीं होता. मैं ने पहले भी कहा था कि हम लोग सपना को बेवा की बोसीदा जिंदगी

ज्यादा दिन तक नहीं जीने देंगे. आप लोगों को उस की फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं है,’’ न चाहते हुए भी सपना की सास का स्वर तल्ख हो गया था.

‘‘मगर सपना ने तो बच्चों को अपना सर्वस्व बना लिया है. वह उन की जिम्मेदारी किसी अनजान आदमी से बांटने या शादी करने को तैयार नहीं होगी.’’

सपना की सास कुछ सोचने लगी, ‘‘कहती तो आप सही हैं. फिर भी सपना को अब मैं ज्यादा रोज तक उदास या सादे लिबास में नहीं देख सकती. कोई न कोई विकल्प तो खोजना ही होगा,’’ उस ने दृढ़ स्वर में कहा.

चाची ने उस की ओर देखा. हमेशा ठसके से सजीसंवरी रहने वाली सपना की सास सादी सी शिफौन की साड़ी पहने थी.

‘अगर बहू बेवा की वेशभूषा में रही तो तुम्हार सिंगारपिटार कैसे होगा, महारानी,’ चाची ने विद्रूपता से सोचा.

अगले सप्ताहांत सपना के ससुर ने सपना के पिता को फोन किया कि वे उन लोगों से कुछ विचारविमर्श करना चाहते हैं, इसलिए क्या वह सपरिवार दिल्ली आ सकते हैं?

‘‘मुझे पता है क्या विचारविमर्श करेंगे,’’ चाची ने हाथ नचा कर कहा, ‘‘सपना शादी के लिए तैयार नहीं हो रही होगी, इसलिए चाहते होंगे कि हम उसे अपने पास रख लें ताकि उस की सास फिर सजसंवर सके.’’

‘‘सपना की ससुराल वाले बड़े सुलझे हुए लोग हैं, वे ऐसा सोच भी नहीं सकते. हमें उन की बात सुनने से पहले न अटकल लगानी है, न सलाह देनी है,’’ सपना के पिता ने कहा.

शिशिर और सपना के सासससुर तो सामान्य लग रहे थे, मगर सपना कुछ अनमनी सी थी.

‘‘जैसा कि मैं ने आप को पहले बताया था, हम लोग सपना का पूर्ण विवाह करना चाहते हैं,’’ सपना की सास ने कहते हुए चाची की ओर देखा.

‘‘और इन्होंने ठीक सोचा था कि सपना अपने बच्चों की जिम्मेदारी किसी और के साथ बांटने को तैयार नहीं होगी. सपना ही नहीं, शिशिर भी बन्नीबंटी की जिम्मेदारी किसी गैर को सौंपने को तैयार नहीं है.’’

‘‘शिशिर का कहना है कि वह आजीवन उन्हें संभालेगा और अविवाहित रहेगा, क्योंकि बीवी को उस का दिवंगत भाई के बच्चों पर जान छिड़कना पसंद नहीं आएगा,’’ सपना के ससुर बोले, ‘‘मैं भी उस के विचारों से सहमत हूं, क्योंकि एक अतिरिक्त परिवार की जिम्मेदारी संभालने वाले व्यक्ति का अपना विवाहित जीवन तो कदापि सुखद नहीं हो सकता, वैसे भी शिशिर को लड़कियों या शादी में कोई दिलचस्पी नहीं है.’’

‘‘मगर शादी से एतराज भी नहीं है, अगर सपना से हो तो,’’ सपना की सास ने कहा. ‘‘दोनों ही बच्चों को किसी तीसरे से बांटना नहीं चाहते और उन की परवरिश में जिंदगी गुजारने को कटिबद्ध हैं. जब तक बच्चे छोटे हैं तब तक तो ठीक है, मगर जब ये समझने लायक होंगे कि लोग उन की मां और चाचा को ले कर क्या कहते हैं, तब सोचिए, उन पर क्या बीतेगी? वैसे लोग तो कहेंगे ही, उन का मुंह बंद करने का तो एक ही तरीका है, शिशिर और सपना की शादी. मगर उस के लिए सपना नहीं मान रही.’’

‘‘मगर क्यों? शिशिर में कोई कमी तो है नहीं,’’ सपना की मां ने कहा.

‘‘इसीलिए तो मैं उस से शादी नहीं

करना चाहती, मां. उसे एक से बढि़या एक कुंआरी लड़की मिल सकती है, तो फिर वह 2 बच्चों की मां से शादी क्यों करे?’’ सपना ने पूछा.

‘‘इसलिए सपना कि वे दोनों बच्चे मेरी जिंदगी का अभिन्न अंग हैं, जिन्हें सिर्फ तुम स्वीकार कर सकती हो, कोई कुंआरी लड़की नहीं,’’ शिशिर ने किसी के बोलने से पहले कहा.

‘‘एक बात और सपना, मैं किसी मजबूरी या दयावश तुम से शादी नहीं कर रहा बल्कि इसलिए कि जब शादी करनी ही है तो किसी अनजान लड़की के बजाय जानीपहचानी तुम बेहतर रहोगी. तुम्हें ले कर मेरे मन में कोई पूर्वाग्रह नहीं है, मैं ने तुम्हें भाभी जरूर कहा है लेकिन देखा एक दोस्त की नजर से ही है.’’

‘‘और दोस्त तो अकसर शादी कर लेते हैं,’’ सपना का भाई सुनील बोला.

‘‘खुद हिम्मत न करें तो दोस्त बढ़ कर करवा देते हैं, यार,’’ शिशिर हंसा.

‘‘तो तुम्हारी शादी हम करवा देते हैं,’’ सुनील भी हंसा.

‘‘मगर सपना माने तब न. उसे बेकार का वहम यह भी है कि उसे सुहाग का सुख है ही नहीं, तभी मिहिर की असमय मृत्यु हो गई.’’

‘‘जब उस के घर वाले मान गए हैं तो सपना भी मान जाएगी,’’ सपना के ससुर बोले. ‘‘उस की यह शंका कि दूसरी शादी कर के वह मिहिर की यादों के साथ बेवफाई कर रही है, मैं दूर कर देता हूं. मिहिर तुम्हें बच्चों की जिम्मेदारी सौंप कर गया है, जो तुम अकेले तो निभा नहीं सकतीं. हम तुम्हारा पूर्ण विवाह करना तो चाहते थे लेकिन साथ ही यह सोच कर भी विह्वल हो जाते थे कि किसी अनजान आदमी को अपने मिहिर की निशानियां कैसे सौंपेंगे? लेकिन शिशिर के साथ ऐसी कोई परेशानी नहीं है. दूसरे, मिहिर की जितनी आयु थी वह उतनी जी कर मरा है. शिशिर की जितनी आयु है, वह तुम से शादी करे या न करे, उतनी ही जिएगा और कोई शंका या एतराज?’’

‘‘नहीं, पापाजी,’’ सपना ने सिर झुका कर कहा लेकिन उस के रक्तिम होते गाल बहुत कुछ कह गए.

‘‘आप ठीक कहते थे, भाई साहब, सपना के ससुराल वाले बहुत सुलझे हुए लोग हैं,’’ चाची के स्वर में अपनी हार के बावजूद भी उल्लास था.

मृगमरीचिका एक अंतहीन लालसा: भाग 2-मीनू ने कैसे चुकाई कीमत

ऋषभ के चेन्नई से आ जाने के बाद हमारी मुलाकात उतनी आसान न रही और न ही हमारे मिलने की कोई उपयुक्त जगह. 10-12 दिनों में ही हमारे बीच में जिस्मानी दूरी आने से हम बौखला उठे और फिर आपसी रजामंदी से भाग जाने का निर्णय ले लिया, किसी भी अंजाम की परवाह किए बगैर. मयंक का तो पहले ही अपने परिवार से कोई खास जुड़ाव नहीं था. इधर उस के शारीरिक आकर्षण में बंधी मैं भी घायल हिरनी सी उस के साथ चलने को तत्पर हो उठी.

एक दिन खुशी के स्कूल की छुट्टी थी. तब ऋषभ के औफिस जाने के बाद मैं ने खुशी को खिलापिला कर सुला दिया और चल पड़ी अपने नए सफर की ओर.

अब सोचती हूं तो बहुत धिक्कारती हूं खुद को परंतु उस वक्त वासना की आंधी के आगे मेरा सतीत्व और ममत्व दोनों हार गए थे. गोवा के एक रिजोर्ट में 2-3 दिन रहने के बाद जब हमारी खुमारी कुछ उतरी, तो समझ आया कि जीवन में शारीरिक जरूरतों के अलावा भी बहुत कुछ जरूरी होता है. उस का कारण यह था कि मयंक जो 10-15 हजार रुपए अपने घर से लाया था, वे खत्म होने को थे. मेरे पास जो भी कैश था, मैं ने मयंक के हाथ में रख दिया.

‘‘इस से क्या होगा?’’ उस के चेहरे पर नाराजगी के भाव थे. ‘‘तो मैं क्या करूं, जो मेरे पास था तुम्हें दे दिया. अब क्या करना है तुम जानो,’’ मैं गुस्से में बोली.

‘‘अच्छा तो क्या सारी जिम्मेदारी मेरी है. तुम भी तो कुछ ला सकती थीं?’’ उस ने झुंझला कर कहा.

‘‘तो प्यार का दम भरते ही क्यों थे जब तुम्हारी जेब खाली थी? बहुत बड़े मर्द बनते थे न? अब कहां गई तुम्हारी मर्दानगी? बातें तो चांदसितारों की करते थे. क्या तुम्हें इन खर्चों के बारे में पहले नहीं सोचना चाहिए था?’’ मैं ने गुस्से में अपने पहने हुए गहने उतार कर उस के हाथों में रख दिए. ‘‘मुझ पर चीखने की बजाय अपने गरीबान में झांको और देने ही हैं तो सारे गहने दो… यह मंगलसूत्र भी,’’ मयंक ने उतावलेपन से मेरी ओर बढ़ते हुए कहा.

‘‘नहीं इसे मैं नहीं दूंगी. यह ऋ षभ के प्यार की निशानी है,’’ मैं ने भावावेश में कहा. ‘‘वाह रे सतीसावित्री. पति और बच्ची को छोड़ते समय तुम्हारा कलेजा नहीं पसीजा और अब उस की निशानी को रखने का नाटक कर रही हो,’’ मयंक अब बेशर्मी पर उतर आया था.

‘‘तुम्हें शर्म नहीं आती… आज मैं तुम्हारे कारण ही अपनी हरीभरी गृहस्थी को छोड़ कर यहां हूं. यहां तक कि अपनी बेटी खुशी को भी छोड़ दिया मैं ने तुम्हारे लिए,’’ मैं लगभग चीखते हुए बोली. ‘‘तो कोई एहसान नहीं किया. तुम्हारा पति तुम्हें जो नहीं दे पाया, वह मैं ने दिया है. बड़े मजे किए हैं तुम ने मेरे साथ मैडम,’’ मयंक ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया था.

मयंक के इस बदले रूप को देख कर मैं हैरान रह गई. मन का क्षोभ, बेबसी और ठगे जाने की पीड़ा आंखों से बह निकली. मन के किसी कोने में घर से भागने का मलाल भी हुआ और अपनी नामसझी पर गुस्सा भी आया. मुझे रोता देख मयंक मेरे पास आया और हमेशा की तरह मुझे दुलारने की कोशिश की, लेकिन आज उस की यह हरकत मुझे बहुत नापाक लगी. आवेश में आ कर मैं ने उस के गाल पर जोरदार तमाचा जड़ दिया, ‘‘दूर हो जा मुझ से, मेरे पास आने की हिम्मत भी मत करना.’’

‘‘अरे पागल हो गई है क्या? क्यों चिल्ला रही है? भीड़ इकट्ठी हो जाएगी. मत भूल कि हम यहां भाग कर आए है… तुम्हारी जो मरजी आए करो,’’ कह कर मयंक पैर पटकता हुआ कमरे से बाहर चला गया. उस वक्त अपनी हालत के लिए अपने सिवा किसे कोसती. ऋ षभ ने 1-2 बार अप्रत्यक्ष रूप से मुझे समझाने की कोशिश भी की थी, परंतु उस समय मुझ पर मयंक के प्यार का ऐसा भूत सवार था कि बिना कोई आगापीछा सोचे मैं यह काम कर बैठी. अब मैं अपनी उसी करनी पर शर्मिंदा हो कर रोए जा रही थी.

शाम हो गईं मयंक नहीं लौटा. अब मैं और घबरा गई. अगर उस ने भी मुझे छोड़ दिया तो मैं क्या करूंगी, कहां जाऊंगी? एक तो अनजानी जगह उस पर हाथ में दो पैसे भी नहीं… शायद सच्चे रिश्तों को नकारने की मुझे सजा मिली थी. मेरी बरबादी की शुरुआत हो चुकी थी. ऋ षभ जैसे सच्चे जीवनसाथी और अपनी मासूम बच्ची को धोखा दे कर मैं ने जो वासनाजनित गलत राह चुनी थी उस की भयावहता का यह सिर्फ आगाज था. मयंक को मैं कौल पर कौल किए जा रही थी, पर उस का मोबाइल स्विच्ड औफ था. वहां इसी तरह ऋ षभ भी तो परेशान हो रहे होंगे, यह विचार आते ही उन्हें फोन लगाना चाहा, पर फिर रुक गई कि किस मुंह से और क्या सफाई दूंगी मैं? मयंक द्वारा लाई गई इस नई सिम में और कोई भी नंबर सेव नहीं था. रात होने को थी. मेरा सारा धैर्य जवाब दे चुका था.

तभी दरवाजे पर हुई आहट से दौड़ कर दरवाजा खोला तो हैरानपरेशान ऋ षभ को देखते ही चौंक पड़ी. मन चाहा कि लिपट जाऊं उन से और जी भर कर रो लूं, पर अपनी करतूत याद आते ही मुझ पर मानो घड़ों पानी पड़ गया. मयंक के पापा भी उन के साथ थे, पर मुझे कमरे में अकेली पा कर वे बाहर ही बैठ गए मयंक के इंतजार में. ऋ षभ ने पास आ कर स्नेह से मेरी पीठ पर हाथ रखा तो मैं पिघल कर उन के सीने से लग गई, ‘‘मुझे माफ कर दो ऋ षभ, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई,’’ मैं ने हिचकियां लेते हुए कहा.

काफी देर तक खड़े रह ऋ षभ अपनी मूक संवेदनाएं प्रकट करते रहे, फिर बोले, ‘‘घर चलो मीनू, खुशी तुम्हारी राह देख रही है.’’ ‘‘नहीं ऋ षभ अब मैं वहां क्या मुंह ले कर जाऊंगी. खुशी से क्या कहूंगी? मैं ने जो भी किया है, उस की कोई माफी नहीं,’’ कह मैं सिसक उठी.

ऋ षभ काफी देर तक मुझे समझाते रहे. उन्होंने बताया कि किस तरह मयंक के किसी दोस्त से हमारी जानकारी निकाल कर बड़ी मुश्किल से यहां आए हैं. मैं मन ही मन और भी लज्जित हो गई. आखिरकार मैं लौटने को तैयार हो गई. करती भी क्या. मयंक का असली रंग तो देख ही चुकी थी. ‘‘अंकलजी, आप मयंक से बात कर उसे ले आना, मैं मीनू को ले कर जा रहा हूं,’’ चिंतित बैठे मयंक के पिता से ऋ षभ ने कहा और मेरा हाथ पकड़ कर बाहर आ गए.

घर पहुंचते ही दादी के हाथों से छिटक कर खुशी मम्मामम्मा कहते हुए मेरे गले आ लगी. मैं उसे जोर से छाती से लगा कर प्यार करने लगी. वहां मौजूद सभी लोगों को शायद यह प्यार बनावटी लग रहा हो, पर मैं वास्तव में शर्मिंदा थी. ऋ षभ की वजह से सभी ने ज्यादा रिएक्ट नहीं किया, पर उन की निगाहों में खासी नाराजगी दिखी. मेरा अपना भाई भी मुझ से दूर खड़ा था. मुझे लौटे 2-3 दिन बीत चुके थे. सारा समय मैं अपने कमरे में ही रहती थी. ऋ षभ आ कर मुझे खाना खिला जाते. नन्ही खुशी तो जैसे चहक उठी थी. पर मेरे सासससुर व भाई ने अभी तक मुझ से कोई बात नहीं की थी.

गलतफहमी: शिखा ने आलोक को अपने प्रेमजाल में क्यों फंसाया?

औफिस का समय समाप्त होने में करीब 10 मिनट थे, जब आलोक के पास शिखा का फोन आया.

‘‘मुझे घर तक लिफ्ट दे देना, जीजू. मैं गेट के पास आप के बाहर आने का इंतजार कर रही हूं.’’

अपनी पत्नी रितु की सब से पक्की सहेली का ऐसा संदेश पा कर आलोक ने अपना काम जल्दी समेटना शुरू कर दिया.

अपनी दराज में ताला लगाने के बाद आलोक ने रितु को फोन कर के शिखा के साथ जाने की सूचना दे दी.

मोटरसाइकिल पर शिखा उस के पीछे कुछ ज्यादा ही चिपक कर बैठी है, इस बात का एहसास आलोक को सारे रास्ते बना रहा. आलोक ने उसे पहुंचा कर घर जाने की बात कही, तो शिखा चाय पिलाने का आग्रह कर उसे जबरदस्ती अपने घर तक ले आई. उसे ताला खोलते देख आलोक ने सवाल किया, ‘‘तुम्हारे भैयाभाभी और मम्मीपापा कहां गए हुए हैं?’’

‘‘भाभी रूठ कर मायके में जमी हुई हैं, इसलिए भैया उन्हें वापस लाने के लिए ससुराल गए हैं. वे कल लौटेंगे. मम्मी अपनी बीमार बड़ी बहन का हालचाल पूछने गई हैं, पापा के साथ,’’ शिखा ने मुसकराते हुए जानकारी दी.

‘‘तब तुम आराम करो. मैं रितु के साथ बाद में चाय पीने आता हूं,’’ आलोक ने फिर अंदर जाने से बचने का प्रयास किया.

‘‘मेरे साथ अकेले में कुछ समय बिताने से डर रहे हो, जीजू?’’ शिखा ने उसे शरारती अंदाज में छेड़ा.

‘‘अरे, मैं क्यों डरूं, तुम डरो. लड़की तो तुम ही हो न,’’ आलोक ने हंस कर जवाब दिया.

‘‘मुझे लेकर तुम्हारी नीयत खराब है क्या?’’

‘‘न बाबा न.’’

‘‘मेरी है.’’

‘‘तुम्हारी क्या है?’’ आलोक उलझन में पड़ गया.

‘‘कुछ नहीं,’’ शिखा अचानक खिलखिला के हंस पड़ी और फिर दोस्ताना अंदाज में उस ने आलोक का हाथ पकड़ा और ड्राइंगरूम की तरफ चल पड़ी.

‘‘चाय लोगे या कौफी?’’ अंदर आ कर भी शिखा ने आलोक का हाथ नहीं छोड़ा.

‘‘चाय चलेगी.’’

‘‘आओ, रसोई में गपशप भी करेंगे,’’ उस का हाथ पकड़ेपकड़े ही शिखा रसोई की तरफ चल पड़ी?

चाय का पानी गैस पर रखते हुए अचानक शिखा का मूड बदला और वह शिकायती लहजे में बोलने लगी, ‘‘देख रहे हो जीजू, यह रसोई और सारा घर कितना गंदा और बेतरतीब हुआ पड़ा है. मेरी भाभी बहुत लापरवाह और कामचोर है.’’

‘‘अभी उस की शादी को 2 महीने ही तो हुए हैं, शिखा. धीरेधीरे सब सीख लेगी… सब करने लगेगी,’’ आलोक ने उसे सांत्वना दी.

‘‘रितु और तुम्हारी शादी को भी तो 2 महीने ही हुए हैं. तुम्हारा घर तो हर समय साफसुथरा रहता है.’’

‘‘रितु एक समझदार और सलीकेदार लड़की है.’’

‘‘और मेरी भाभी एकदम फूहड़. मेरा इस घर में रहने का बिलकुल मन नहीं करता.’’

‘‘तुम्हारा ससुराल जाने का नंबर जल्दी आ जाएगा, फिक्र न करो.’

आलोक के मजाक को नजरअंदाज कर शिखा आक्रामक से लहजे में बोली, ‘‘भैया की शादी के बाद से इस घर में 24 घंटे क्लेश और लड़ाई झगड़ा रहता है. मुझे अपना भविष्य तो बिलकुल अनिश्चित और असुरक्षित नजर आता है. इस के लिए पता है मैं किसे जिम्मेदार मानती हूं.’’

‘‘किसे?’’

‘‘रितु को.’’

‘‘उसे क्यों?’’ आलोक ने चौंक कर पूछा.

‘‘क्योंकि उसे ही इस घर में मेरी भाभी बन कर आना था.’’

‘‘यह क्या कह रही हो?’’

‘‘मैं सच कह रही हूं, जीजू. मेरे भैया और मेरी सब से अच्छी सहेली आपस में प्रेम करते थे. फिर रितु ने रिश्ता तोड़ लिया, क्योंकि मेरे भाई के पास न दौलत है, न बढि़या नौकरी. उस के बदले जो लड़की मेरी भाभी बन कर आई है, वह इस घर के बिगड़ने का कारण हो गई है,’’ शिखा का स्वर बेहद कड़वा हो उठा था.

‘‘घर का माहौल खराब करने में क्या तुम्हारे भाई की शराब पीने की आदत जिम्मेदार नहीं है, शिखा?’’ आलोक ने गंभीर स्वर में सवाल किया. ‘‘अपने वैवाहिक जीवन से तंग आ कर वह ज्यादा पीने लगा है.’’

‘‘अपनी घरगृहस्थी में उसे अगर सुखशांति व खुशियां चाहिए, तो उसे शराब छोड़नी ही होगी,’’ आलोक ने अपना मत प्रकट किया.

‘‘न रितु उसे धोखा देती, न इस घर पर काले बादल मंडराते,’’ शिखा का अचानक गला भर आया.

‘‘सब ठीक हो जाएगा,’’ आलोक ने उस का कंधा छू कर हौसला ही बढ़ाया पर शिखा तो पलट कर उस की छाती से लग गई.

‘‘कभीकभी मुझे बहुत डर लगता है, आलोक,’’ शिखा का स्वर अचानक कोमल और भावुक हो गया.

‘‘शादी कर लो, तो डर चला जाएगा,’’ आलोक ने मजाक कर के माहौल सामान्य करना चाहा.

‘‘मुझे तुम जैसा जीवनसाथी चाहिए,’’ शिखा ने कहा.

‘‘तुम्हें मुझ से बेहतर जीवनसाथी मिलेगा, शिखा.’’

‘‘मैं तुम से प्यार करने लगी हूं, आलोक.’’

‘‘पगली, मैं तो तुम्हारी बैस्ट फ्रैंड का पति हूं. तुम मेरी अच्छी दोस्त बनी रहो और प्रेम को अपने भावी पति के लिए बचा कर रखो.’’

‘‘मेरा दिल अब मेरे बस में नहीं है,’’ शिखा बड़ी अदा से मुसकराई.

‘‘रितु को तुम्हारे इरादों का पता लग गया, तो हम दोनों की खैर नहीं.’’

‘‘उसे हम शक करने ही नहीं देंगे, आलोक. सब के सामने तुम मेरे जीजू ही रहोगे. मुझे और कुछ नहीं चाहिए तुम से… बस, मेरे प्रेम को स्वीकार कर लो, आलोक.’’ ‘‘और अगर मुझे और कुछ चाहिए हो तो?’’ आलोक शरारती अंदाज में मुसकराया.

‘‘तुम्हें जो चाहिए, ले लो,’’ शिखा ने आंखें मूंद कर अपना सुंदर चेहरा आलोक के चेहरे के बहुत करीब कर दिया.

‘‘यू आर वैरी ब्यूटीफुल, साली साहिबा,’’ आलोक ने उस के माथे को हलके से चूमा और फिर शिखा को गैस के सामने खड़ा कर के हंसता हुआ बोला, ‘‘चाय उबलउबल कर कड़वी हो जाएगी, मैडम. तुम चाय पलटो, इतने में मैं रितु को फोन कर लेता हूं.’’

‘‘उसे क्यों फोन कर रहे हो?’’ शिखा बेचैन नजर आने लगी.

‘‘आज का दिन हमेशा के लिए यादगार बन जाए, इस के लिए मैं तुम तीनों को शानदार पार्टी देने जा रहा हूं.’’

‘‘तीनों को? यह तीसरा कौन होगा?’’

‘‘तुम्हारी पक्की सहेली वंदना.’’

‘‘पार्टी के लिए मैं कभी मना नहीं करती हूं, लेकिन रितु को मेरे दिल की बात मत बताना.’’

‘‘मैं न बताऊं, पर इश्क छिपाने से छिपता नहीं है, शिखा.’’

‘‘यह बात भी ठीक है.’’

‘‘तब रितु से दोस्ती टूट जाने का तुम्हें दुख नहीं होगा?’’

‘‘ऐसा कुछ नहीं होगा, क्योंकि मेरा

इरादा तुम्हें उस से छीनने का कतई नहीं है. 2 लड़कियां क्या एक ही पुरुष से प्यार करते हुए अच्छी सहेलियां नहीं बनी रह सकती हैं?’’

‘‘तुम्हारे इस सवाल का जवाब रितु से पूछ कर दूंगा,’’ आलोक ने हंसते हुए जवाब दिया और फिर अपनी पत्नी को फोन करने ड्राइंगरूम की तरफ चला गया.

रितु और वंदना सिर्फ 15 मिनट में शिखा के घर पहुंच गईं. दोनों ही गंभीर नजर आ रही थीं, पर बड़े प्यार से शिखा से गले मिलीं.

‘‘किस खुशी में पार्टी दे रहे हो, जीजाजी?’’

‘‘शिखा के साथ एक नया रिश्ता कायम करने जा रहा हूं, पार्टी इसी खुशी में होगी,’’ आलोक ने शिखा का हाथ दोस्ताना अंदाज में पकड़ते हुए जवाब दिया.

शिखा ने अपना हाथ छुड़ाने का कोई प्रयास नहीं किया. वैसे उस की आंखों में तनाव के भाव झलक उठे थे. रितु और वंदना की तरफ वह निडर व विद्रोही अंदाज में देख रही थी. ‘‘किस तरह का नया रिश्ता, जीजाजी?’’ वंदना ने उत्सुकता जताई. ‘‘कुछ देर में मालूम पड़ जाएगा, सालीजी.’’

‘‘पार्टी कितनी देर में और कहां होगी?’’

‘‘जब तुम और रितु इस घर में करीब

8 महीने पहले घटी घटना का ब्योरा सुना चुकी होगी, तब हम बढि़या सी जगह डिनर करने निकलेंगे.’’

‘‘यहां कौन सी घटना घटी थी?’’ शिखा ने चौंक कर पूछा.

‘‘उस का ब्योरा मैं बताना शुरू करती हूं, सहेली,’’ रितु ने पास आ कर शिखा का दूसरा हाथ थामा और उस के पास में बैठ गई, ‘‘गरमियों की उस शाम को वंदना और मैं ने तुम से तुम्हारे घर पर मिलने का कार्यक्रम बनाया था. वंदना मु?ा से पहले यहां आ पहुंची थी.’’

घटना के ब्योरे को वंदना ने आगे बढ़ाया, ‘‘मैं  ने घंटी बजाई तो दरवाजा तुम्हारे भाई समीर ने खोला. वह घर में अकेला था. उस के साथ अंदर बैठने में मैं जरा भी नहीं हिचकिचाई क्योंकि वह तो मेरी सब से अच्छी सहेली रितु का जीवनसाथी बनने जा रहा था.’’

‘‘समीर पर विश्वास करना उस शाम वंदना को बड़ा महंगा पड़ा, शिखा,’’ रितु की आंखों में अचानक आंसू आ गए.

‘‘क्या हुआ था उस शाम?’’ शिखा ने कांपती आवाज में वंदना से पूछा.

‘‘अचानक बिजली चली गई और समीर ने मुझे रेप करने की कोशिश की. वह शराब के नशे में न होता तो शायद ऐसा न करता.

‘‘मैं ने उस का विरोध किया, तो उस ने मेरा गला दबा कर मुझे डराया… मेरा कुरता फाड़ डाला. उस का पागलपन देख कर मेरे हाथपैर और दिमाग बिलकुल सुन्न पड़ गए थे. अगर उसी समय रितु ने पहुंच कर घंटी न बजाई होती, तो बड़ी आसानी से तुम्हारा भाई अपनी हवस पूरी कर लेता, शिखा,’’ वंदना ने अपना भयानक अनुभव शिखा को बता दिया.

‘‘मुझे विश्वास नहीं हो रहा है इस बात पर,’’ शिखा बोली.

‘‘उस शाम वंदना को तुम्हारा नीला सूट पहन कर लौटना पड़ा था. जब उस ने वह सूट लौटाया था तो तुम ने मु?ा से पूछा भी था कि वंदना सूट क्यों ले गई तुम्हारे घर से. उस सवाल का सही जवाब आज मिल रहा है तुम्हें, शिखा,’’ रितु का स्पष्टीकरण सुन शिखा के चेहरे का रंग उड़ गया.

‘‘तुम दोनों ने यह बात आज तक मुझ से छिपाई क्यों?’’ शिखा रोंआसी हो उठी.

‘‘समीर की प्रार्थना पर… एक भाई को हम उस की बहन की नजरों में गिराना नहीं चाहते थे,’’ वंदना भी उठ कर शिखा के पास आ गई.

‘‘मैं समीर की जिंदगी से क्यों निकल गई, इस का सही कारण भी आज तुम्हें पता चल गया है. मैं बेवफा नहीं, बल्कि समीर कमजोर चरित्र का इंसान निकला. उसे अपना जीवनसाथी बनाने के लिए मेरे दिल ने साफ इनकार कर दिया था. वह आज दुखी है, इस बात का मुझे अफसोस है. पर उस की घिनौनी हरकत के बाद मैं उस से जुड़ी नहीं रह सकती थी,’’ रितु बोली.

‘‘मैं तुम्हें कितना गलत समझती रही,’’ शिखा अफसोस से भर उठी.

आलोक ने कहा, ‘‘मेरी सलाह पर ही आज इन दोनों ने सचाई को तुम्हारे सामने प्रकट किया है, शिखा. ऐसा करने के पीछे कारण यही था कि हम सब तुम्हारी दोस्ती को खोना नहीं चाहते हैं.’’

शिखा ने अपना सिर झुका लिया और शर्मिंदगी से बोली, ‘‘मैं अपने कुसूर को समझ रही हूं. मैं तुम सब की अच्छी दोस्त कहलाने के लायक नहीं हूं.’’

‘‘तुम हम दोनों की सब से अच्छी, सब से प्यारी सहेली हो, यार,’’ रितु बोली.

‘‘मैं तो तुम्हारे ही हक पर डाका डाल रही थी, रितु,’’ शिखा की आवाज भर्रा उठी, ‘‘अपने भाई को धोखा देने का दोषी मैं तुम्हें मान रही थी. इस घर की खुशियां और सुखशांति नष्ट करने की जिम्मेदारी तुम्हारे कंधों पर डाल रही थी.

‘‘मेरे मन में गुस्सा था… गहरी शिकायत और कड़वाहट थी. तभी तो मैं ने आज तुम्हारे आलोक को अपने प्रेमजाल में फांसने की कोशिश की. मैं तुम्हें सजा देना चाहती थी… तुम्हें जलाना और तड़पाना चाहती थी… मुझे माफ कर दो, रितु… मेरी गिरी हुई हरकत के लिए मुझे क्षमा कर दो, प्लीज.’’

रितु ने उसे समझया, ‘‘पगली, तुझे माफी मांगने की कोई जरूरत नहीं, क्योंकि हम तुम्हें किसी भी तरह का दोषी नहीं मानते हैं.’’

‘‘रितु ठीक कह रही है, साली साहिबा,’’ आलोक ने कहा, ‘‘तुम्हारे गुस्से को हम सब समझ रहे थे. मुझे अपनी तरफ आकर्षित करने के तुम्हारे प्रयास हमारी नजरों से छिपे नहीं थे. इस विषय पर हम तीनों अकसर चर्चा करते थे.’’

‘‘आज मजबूरन उस पुरानी घटना की चर्चा हमें तुम्हारे सामने करनी पड़ी है. मेरी प्रार्थना है कि तुम इस बारे में कभी अपने भाई से कहासुनी मत करना. हम ने उस से वादा किया था कि सचाई तुम्हें कभी नहीं पता चलेगी,’’ वंदना ने शिखा से विनती की.

‘‘हम सब को पक्का विश्वास है कि तुम्हारा गुस्सा अब हमेशा के लिए शांत हो जाएगा और मेरे पतिदेव पर तुम अपने रंगरूप का जादू चलाना बंद कर दोगी,’’ रितु ने मजाकिया लहजे में शिखा को छेड़ा, तो  वह मुसकरा उठी.

‘‘आई एम सौरी, रितु.’’

‘‘जो अब तक नासमझ में घटा है, उस के लिए सौरी कभी मत कहना,’’ रितु ने उस के मुंह पर हाथ रख दिया.

‘‘साली साहिबा, वैसे तो तुम्हें प्रेमिका बना कर भी मैं खुश रहता, पर…’’

‘‘शक्ल देखी है कभी शीशे में? मेरी इन सहेलियों को प्रेमिका बनाने का सपना भी देखा, तो पत्नी से ही हाथ धो बैठोगे,’’ रितु बोली.

आलोक मुसकराते हुए बोला, तो फिर दोस्ती के नाम पर देता हूं बढि़या सी पार्टी… हम चारों के बीच दोस्ती और विश्वास का रिश्ता सदा मजबूत बना रहे.

कारावास: ऐसा क्या हुआ कि सुनीता का मन खुशी से नाच उठा

‘‘नहीं दीदी, आप न नहीं कहोगी. पहले भी तो 2 बार आप ऐसे टूर टाल चुकी हैं. अब फिर आप को मौका दिया जा रहा है, तो फायदा उठाइए न. फिर आप ही तो बता रही थीं कि इस ट्रेनिंग के बाद प्रमोशन का चांस भी मिल सकता है,’’ पम्मी ने चाय की ट्रे मेज पर रखते हुए फिर से वही जिक्र छेड़ दिया.

सुनीता अपना चाय का कप उठाते हुए बोली, ‘‘अब मेरी बात ध्यान से सुन. मुझे इस ट्रेनिंग से कोई खास फायदा नहीं होगा और न ही मैं अगले प्रमोशन के लिए अधिक लालायित हूं. हां, हमारे ही बैंक के किसी और सहयोगी को अगर यह चांस मिलता है, तो उस को व उस के परिवार को अधिक लाभ पहुंचेगा. फिर रामबाबू, सुधीरजी जैसे लोग तो अपनेअपने परिवार को भी साथ ले जाना चाह रहे हैं, घूमने के लिए.’’

‘‘दीदी, जब बौस ने आप की सिफारिश की है, तो रामबाबू, सुधीर, ये सब कहां से टपक पड़े? आप सब से सीनियर हो, आप को चांस मिल रहा है बस… मैं अब और कुछ सुनने वाली नहीं हूं. मैं तो 3 दिन की छुट्टी ले कर आई ही इसलिए हूं कि आप के जाने की तैयारी करा दूं… आप तैयार हो जाओ, बाजार चलती हैं. मैं तब तक आप की वार्डरोब चैक करती हूं कि क्याक्या लेना है आप को,’’ कहते हुए पम्मी ने चाय के बरतन समेटने शुरू कर दिए.

‘‘तू भी जिद की पक्की है,’’ कह सुनीता को हंसी आ गई.

वैसे देखा जाए तो सुनीता से रिश्ता भी क्या है पम्मी का… बस जब तक यहां इस की नौकरी थी तो इसी फ्लैट में सुनीता के साथ रही थी. फिर अपनापन इतना बढ़ा कि सगी बहन से भी अधिक स्नेह हो गया. अब शादी कर के दूसरे शहर चली गई तो भी आए दिन फोन पर बात करती रहती है. फिर पता नहीं कैसे इसे टूर की भनक लगी तो बिना बताए आ धमकी.

‘‘तू तो शादी कर के अब बड़ी बहन की तरह रोब झाड़ने लगी है मुझ पर.’’

‘‘वह तो है ही… अब कोई तो आप को सही राय देगा. चलो, अब और बातें नहीं, आप जल्दी से नहा कर तैयार हो जाओ, तब तक मैं नाश्ता तैयार करती हूं,’’ कह पम्मी रसोई में चली गई.

जब तक सुनीता नहा कर निकली तब तक पम्मी ने उस की अलमारी भी टटोल ली थी. बोली, ‘‘यह क्या दीदी, सारे पुराने फैशन के कपड़े हैं और इतने फीके रंगों के… अरे, विदेश जा रही हो तो थोड़े चटक रंग भी लो न… आज मैं पसंद करूंगी आप के लिए कपड़े. आप टोकना मत… मैं पिछली बार कुछ सूट लाई थी आप के लिए, आप ने सिलवाए नहीं?’’

‘‘अरे हां, उन्हें तो मैं रश्मि और आशा को दे आई थी. उन के गोरे रंग पर वे बहुत फब रहे थे और फिर उन की उम्र भी है.’’

‘‘दीदी, फिर वही बात. अभी आप कौन सी बुढ़ा गई हो कि वे कपड़े उन पर फबते और आप पर नहीं… अरे, मैं इतने शौक से आप के लिए लाई थी और आप भी बस… विनी, रश्मि, गीता, आशा आदि के बारे में ही सोचती रहती हो.’’

‘‘पम्मी, मेरा परिवार है यह,’’ सुनीता ने धीरे से कहा.

‘‘मैं कब कह रही हूं कि आप का परिवार नहीं है यह, पर वे लोग भी तो कभी आप के बारे में सोचें. कभी आएं आप के पास… आप ने अपने फ्लैट में गृहप्रवेश किया था तो आया था कोई? आप इतनी बीमार पड़ीं कि अस्पताल में भरती रहीं. क्या कोई आया था आप को देखने? तब कहां था यह परिवार?’’

फिर सुनीता को चुप देख कर आगे बोली, ‘‘सौरी दीदी, मेरा मकसद आप का दिल दुखाना नहीं था. मैं तो बस यही कहना चाह रही थी कि कभी तो आप अपने बारे में सोचें कि आप को क्या अच्छा लगता है, किस बात से खुशी मिलती है… क्या इतना भी हक नहीं बनता आप का…? चलें अब नाश्ता कर लें, ठंडा हो रहा है.’’

सुनीता सोच रही थी कि बातों का रुख बदलने में कितनी माहिर हो गई है यह लड़की. जब अपने बारे में सोचने का समय था तब नहीं सोचा तो अब उम्र के इस पड़ाव पर क्या सोचना. फिर नाश्ता करते हुए बोली, ‘‘तो इस बार तू मुझे लंदन भेज कर ही मानेगी.’’

‘‘हां दीदी, मैं आई ही इसलिए हूं कि आप कहीं पहले की तरह इस बार भी अपना ट्रिप कैंसिल न कर दें.’’

नाश्ता करने के बाद दोनों औटोरिकशा से बाजार चल दीं. बाजार पहुंच जब पम्मी ने औटो रूपाली ब्यूटीपार्लर के सामने रुकवाया तो सुनीता चौंक उठी. बोली, ‘‘अरे, यहां क्या करना है?’’

‘‘दीदी, आप जल्दी अंदर चलिए, मैं रूपाली से आप का अपौइंटमैंट ले चुकी हूं,’’ पम्मी सुनीता की बात को अनसुना कर औटो वाले को रुपए देती हुई बोली.

पम्मी ने सुनीता के केश सैट करवाए, कलरिंग भी करवाई, फेशियल के लिए भी जिद कर के बैठा ही दिया और फिर बोली, ‘‘दीदी, आप को यहां थोड़ी देर लगेगी. तब तक मैं बाजार से कुछ सामान खरीद लाती हूं.’’

बाजार पहुंच कर पम्मी ने कुछ कौस्मैटिक्स और महंगे सूट खरीदे. जब ब्यूटीपार्लर लौटी तो सुनीता का एकदम बदला रूप पाया. बोली, ‘‘वाह दीदी, आप की तो उम्र ही 10 साल कम कर दी रूपाली ने. चलिए, अब आप को टेलर के यहां नाप देना है. कपड़े मैं ले चुकी हूं. मुझे पता था, आप के सामने लेती तो आप खरीदने नहीं देतीं.’’

‘‘पम्मी, आखिर तू चाहती क्या है?’’

‘‘देखो दीदी, अच्छी तरह से तैयार होने पर स्वयं को भी अच्छा लगता है और दूसरों को भी और फिर इस में बुराई क्या है. अब मैं जैसे डिजाइन पसंद करूं, आप मना मत करना,’’ और पम्मी ने टेलर को सूटों के डिजाइन बता दिए.

वे खाना बाहर ही खा कर घर लौटीं तो सुनीता को थकान महसूस होने लगी थी, पर पम्मी सूटकेस खोल कर उस का सामान जमाती रही. रात को उस ने कह भी दिया, ‘‘दीदी, आप की सारी तैयारी कर दी है. अब टिकट, वीजा वगैरह का इंतजाम तो आप के औफिस की तरफ से हो रहा है. आप यात्रा का पूरापूरा आनंद उठाना,’’ कहते हुए पम्मी भावुक हो उठी.

‘‘अच्छा अब तू इतमीनान रख, मैं यात्रा का पूर्ण आनंद लूंगी और कुछ नहीं सोचूंगी,’’ कहतेकहते सुनीता का भी गला भर आया था कि कोई तो है उस की जिंदगी में, जो उस के बारे में इतना सोचता है.

पम्पी के जाने के बाद 3-4 दिन सफर की तैयारी की अफरातफरी में बीत गए. जब सारी औपचारिकताएं पूरी कर के दिल्ली से हवाईजहाज में बैठी तो इतमीनान की सांस ली उस ने.

ऐसे टूर के मौके तो पहले भी कई बार आए थे उस की जिंदगी में पर वही टालती रही थी. क्या करती, मन ही नहीं करता था इतने लंबे और अकेले सफर पर जाने का… छुट्टी मिलती तो बस भाईबहनों के पास आनाजाना हो जाता… वही काफी था. इस बार पम्मी ने तो उसे मना ही किया था कि जब दीदी और भैया लोग पसंद ही नहीं करते कि आप कहीं जाओ तो आप उन्हें बताना भी नहीं.

सुनीता तब फीकी हंसी हंस कर रह गई.

पम्मी उस के परिवार के लोगों की मानसिकता से परिचित हो गई थी इसीलिए सब कुछ कह देती थी. कई बार तो यह भी कह चुकी थी कि अच्छा हुआ आप ने यह फ्लैट खरीद लिया, रिटायरमैंट के बाद कोई ठिकाना तो होगा रहने के लिए… भाईबहनों से अपेक्षा रखो तो बुढ़ापे में ठोकरें ही खानी पड़ती हैं. आप को तो पैंशन भी अच्छीखासी मिलेगी. आराम से रहना, यह नहीं कि सब लुटाती रहो…

पम्मी की बातें कभीकभी सुनीता को चुभ तो जाती थीं, पर वह ठीक ही बोलती थी, क्योंकि ऐसे कई उदाहरण सुनीता देख भी चुकी है, कब तक आंखें मूंदे रहे सब से…

प्लेन में बैठेबैठे सुनीता का मन अतीत में डूबने लगा था. पूरे 44 वर्ष की हो गई है वह. क्या खोया, क्या पाया… कभीकभी विश्लेषण करती है तो लगता है कि खोया ही खोया है उस ने.

पढ़ाई में मेधावी रही तो कम उम्र में ही बैंक में नौकरी लग गई. फिर अकस्मात पिता का देहांत हो गया तो भाईबहनों का दायित्व आ पड़ा उस के कमजोर कंधों पर. दीदी की शादी, भैया की पढ़ाई, छोटी बहनों के खर्चे… सब वहन करतेकरते अपनी शादी का खयाल तो उसे बस एक बार ही आया था जब प्रखर को देखा था. प्रखर आर्मी मेजर था. वहीं झांसी में ट्रेनिंग के लिए आया था. तब उस की सहेली ने ही परिचय करवाया था. प्रखर शानदार व्यक्तित्व और हंसमुख स्वभाव का था. उस ने तो बातों ही बातों में प्रपोज भी कर दिया था, पर घर वालों का विरोध… वह नौकरी छोड़ कर प्रखर के साथ चली गई तो भाईबहनों का दायित्व कौन वहन करेगा? प्रखर इस दोटूक इनकार से इतना नाराज हुआ कि अपनी ट्रेनिंग बीच में ही छोड़ कर चला गया था.

सुनीता भी तो कई दिनों तक भूल नहीं पाई थी उसे… कई दिनों तक ही क्यों, प्रखर का व्यक्तित्व तो आज भी ताजा है उस की आंखों में… बाद में भी कई बार रिश्ते की बात चली पर कभी किसी तो कभी किसी कारण अस्वीकार होती रही.

पूर्वा दीदी ने तो एक बार अपनी तरफ से रिश्ता तय ही कर दिया. बोलीं, ‘सुनीता, दीपक भी बैंक में ही अफसर है, पारिवारिक कारणों से अब तक विवाह नहीं किया. मैं ने तेरी बात चलाई है, शाम को खाने पर बुला लिया है उसे… ठीक तरह से तैयार हो कर आ जाना. पुरानी किसी बात का जिक्र मत करना, समझी?’

वह ठीक समय पर पहुंच गई थी. खानेपीने तक माहौल सामान्य रहा. दीपक देखने में ठीकठाक ही था.

फिर पूर्वा ने ही प्रस्ताव रखा, ‘दीपक, अब तुम सुनीता को ले कर कहीं घूम आओ.’

‘ठीक है.’

दीपक के साथ बगल में कार में बैठते समय सुनीता कुछ असहज हो गई थी. पुराने रिश्ते याद आए… कई बार अस्वीकार होने का बोध हुआ… दीपक ने धीरे से उस का हाथ सहलाया था, पर वह तो पसीने से नहा उठी थी.

‘क्या बात है… तबीयत ठीक नहीं है क्या?’

‘हां, शायद ऐसा ही कुछ…’ वह स्वयं नहीं समझ पाई थी कि हुआ क्या है?

‘और लड़कियां तो शादी के नाम से ही खुश हो जाती हैं, पर आप तो इतनी ठंडी…’

दीपक के ये शब्द भीतर तक चुभते चले गए थे सुनीता के. वह जिद कर के बीच रास्ते में ही उतर गई थी. उस ने निश्चय कर लिया था कि अब कभी विवाह के बारे में सोचेगी भी नहीं.

‘‘मैडम, आप शायद सो गई थीं, आप का नाश्ता,’’ एयरहोस्टेस पूछ रही थी.

सुनीता को तब खयाल आया कि शायद उनींदेपन में भी मन विचारतंद्रा में ही डूबा रहा. थोड़ा जूस ले कर वह कुछ सहज हुई तो साथ लाई पुस्तक के पन्ने पलटने चाहे, पर मन तो फिर पुरानी बातों में भटकने लगा था…

अब पम्मी को कैसे बताए अपने मन की स्थिति? वह तो जबतब कह देती है दीदी, अभी आप की ऐसी उम्र नहीं हुई है कि शादी के बारे में सोचें ही नहीं. कोई मनपसंद साथी मिले तो जरूर विचार करना, बड़ी उम्र में भी एक अच्छे साथी की जरूरत होती ही है.

‘पम्मी, अब मैं एक तरह से वैरागिनी हो गई हूं,’ उस दिन पता नहीं कैसे सुनीता के मुंह से निकल गया था.

‘कोई वैरागिनी नहीं हुई हैं. मैं ने आप की एक डायरी देखी है… कितनी प्रेमकविताएं लिखी हैं आप ने.’

पम्मी के कहे एकएक शब्द के बारे में गंभीरता से सोचती सुनीता को पता ही नहीं चला कि उस का प्लेन हीथ्रो एअरपोर्ट पर लैंड कर रहा है.

हीथ्रो एअरपोर्ट की चकाचौंध मन को लुभा गई थी… कस्टम औफिस से बाहर आते ही चमकती दुकानें, लोगों की भीड़भाड़… लंबाचौड़ा एअरपोर्ट… फिर बाहर औफिस की ही टैक्सी लेने आ गई थी.

विदेशी धरती पर पहला कदम, सब कुछ बदलाबदला… साफसुथरा और मन को मोह लेने वाला था. फिर होटल में रिसैप्शन से चाबी लेते समय पता चला कि उस का कमरा नंबर 302 है और 303 में भी एक भारतीय ही हैं, नारायण… जो बेंगलुरु से आए हैं.

‘‘हैलो, आई एम नारायण,’’ नारायण ने हाथ आगे बढ़ाया था.

‘‘आई एम सुनीता,’’ सुनीता ने भी हाथ बढ़ा दिया था.

एक बार तो चौंक ही गई थी सुनीता… लगा, जैसे प्रखर ही सामने आ गया हो… वही डीलडौल… वही कद… कानों के पास के बालों में जरूर हलकी सफेदी झांक रही थी… पर प्रखर भी इस उम्र में…

‘‘चलिए, हमारे कमरे पासपास ही हैं,’’ कह कर नारायण ने उस का बैग उठा लिया.

नारायण उसे पहली मुलाकात में ही काफी मिलनसार और मजाकिया स्वभाव का लगा था. बातों से लगा ही नहीं कि अब वे विदेशी भूमि पर हैं.

कमरे में सामान रख कर दोनों कौफी पीने लाउंज में आ गए थे और कौफी पीतेपीते ही नारायण ने उसे होटल की सारी व्यवस्थाओं से भी परिचित करवा दिया था.

‘‘चलिए, अब आप कमरे में जा कर काम कीजिए, मैं थोड़ी देर अपने लैपटौप पर काम करूंगा, शाम को खाने पर मिलते हैं,’’ नारायण ने बड़े अपनेपन से कहा था.

सुनीता स्वयं सोच रही थी कि प्लेन में तो ठीक से सो नहीं पाई, अब नहाधो कर गहरी नींद लेगी ताकि शाम तक कुछ ताजगी महसूस हो.

शाम को खाने के समय और भी सहयोगियों से परिचय हुआ, नारायण ने सब से मिलवा दिया था.

‘‘आप दोनों पुराने परिचित हैं?’’ एक विदेशी ने तो सुनीता से पूछ ही लिया था और तब नारायण उसे देख कर मुसकरा दिया था.

कुल मिला कर सुनीता को सारा माहौल सौहार्दपूर्ण लगा था… कहीं कुछ पूछना हो तो नारायण बड़े अपनेपन से मदद कर देता था.

1 हफ्ता कौन्फ्रैंस चली और फिर 1 हफ्ते का वहीं से यूरोप घूमने का प्रोग्राम बन गया.

नए शहर, ऐतिहासिक इमारतें, खूबसूरत वादियां, झीलें, फूलों से लहलहाते बगीचे, सभी कुछ भव्य था… और नारायण के सान्निध्य ने दोनों को काफी पास ला दिया था. इतने दिन कब बीत गए, सुनीता को पता ही नहीं चला था. एक बार भी अपने घर, पुराने परिचितों की याद नहीं आई.

लंदन से वापसी की उड़ान थी अत: फिर उसी होटल में 1 रात रुकना था. दूसरे दिन लौटना था, लग रहा था जैसे वह और नारायण दोनों ही कुछ मिस कर रहे हैं… नारायण अपने स्वभाव के विपरीत उस दिन बहुत गंभीर और चुपचुप सा था.

‘‘आप का सान्निध्य बहुत अच्छा लगा,’’ सुनीता ने अपनी तरफ से धन्यवाद देने का प्रयास किया.

नारायण फिर भी चुप ही था, आंखों में उदासी की झलक थी.

‘‘चलो, कमरे में चल कर कौफी पीते हैं,’’ कह सुनीता ने कौफी का और्डर दिया.

कौफी पीते समय भी दोनों चुप थे. बहुत कुछ कहना चाहते हुए भी कुछ कह नहीं पा रहे थे.

फिर कब क्या हुआ… कब नारायण उठ कर उस के पास सोफे पर इतने करीब आ गया… कब वह उस के कंधे पर सिर रख कर सिसक पड़ी… कब उस ने उसे बांहों में ले लिया… कब… कब…

‘‘तुम्हें भूल नहीं पाऊंगा सुनीता… हो सके तो मुझे माफ कर देना… मैं… मैं… अपनेआप को रोक नहीं पाया…’’

‘‘नहीं,’’ सुनीता ने धीरे से उस के होंठों को छुआ, ‘‘माफी क्यों और किस से? बहुत अच्छी यादें ले कर जा रहे हैं हम दोनों… थैंक्स ए लौट…’’

फिर लगा कि शायद शब्दों से वह सब कुछ बयान नहीं कर पा रही है, जो महसूस कर रही है… आखिर आज नारायण ने उसे एक स्वनिर्मित कारावास से मुक्त जो कर दिया था.

सोच का विस्तार: रिया के फोन से कैसे गायब हुई सुरेश की खुशी

मृगमरीचिका एक अंतहीन लालसा: भाग 1-मीनू ने कैसे चुकाई कीमत

‘‘मम्मा आज मैं अपनी नई वाली बोतल में पानी ले जाऊंगी,’’ नन्ही खुशी चहकते हुए मुझ से बोली. ‘‘ओके,’’ कहते हुए मैं ने उसे स्कूल के लिए तैयार किया.

‘‘मीनू पार्लर की लिस्ट मैं सतीश को दे आया था. 11-12 बजे तक सामान पहुंचा देगा. तुम चैक कर लेना,’’ ऋ षभ ने नाश्ता करते हुए कहा. ठीक है आप चिंता न करें, ‘‘मैं ने कहा, फिर खुशी और ऋ षभ के चले जाने के बाद मैं आरामकुरसी पर निढाल हो गई. यह तो अच्छा था कि ऋ षभ के औफिस के रास्ते में ही खुशी का स्कूल पड़ता था और वे उसे स्कूल ड्रौप करते हुए अपने औफिस निकल जाते थे वरना तो उसे स्कूल छोड़ने भी मुझे ही जाना पड़ता. दोपहर 1 बजे तक उस का स्कूल होता था. तब तक मैं अपने सभी काम निबटा कर उसे ले आती थी. तभी अचानक किसी ने जोर से दरवाजा खटखटाया. मैं ने दरवाजा खोला, तो सामने पड़ोसिन ममता हांफती हुई दिखाई दी.

‘‘क्या हुआ? कहां से भागतीदौड़ती चली आ रही है?’’ मैं ने पूछा, क्योंकि मैं उसे अच्छी तरह जानती थी कि उसे तिल का ताड़ बनाना बहुत अच्छी तरह आता है. ‘‘यार बुरी खबर है. मयंक की बीवी ने आत्महत्या कर ली.’’

‘‘क्या? क्या कह रही है तू?’’ ‘‘हां यार सभी सकते मैं हैं,’’ वह बोली और फिर पूरी बात बताने लगी.

उस के जाने के बाद मेरे दिमाग ने काम करना ही बंद कर दिया. उफ पूजा ने यह क्या कर लिया. अपने 2 साल के बच्चे को यों छोड़ कर… लेकिन वह तो प्रैगनैंट भी थी. मतलब उस ने नन्ही सी जान को भी अपनी कोख में ही दफन कर लिया. आखिर ऐसा उस ने क्यों किया… मैं जानती थी, फिर भी हैरान थी. दिमाग में बहुत से प्रश्न हथौड़े की तरह चलते जा रहे थे… मयंक को तो मैं अच्छी तरह जानती थी. उस की शादी में नहीं गई थी, लेकिन लोगों से सुना अवश्य था कि बहुत खूबसूरत व समझदार है उस की पत्नी. बाद में तो यह तक सुनने में आया था कि बातबात पर वह पत्नी को मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना देता है. उसे उस के मायके नहीं जाने देता. यहां तक कि उस के मातापिता के लिए अपशब्द भी कहता है.

एक बार एक आयोजन में उस की पत्नी से मुलाकात हुई थी, तो आंखों में आंसू भर कर उस ने मुझ से यही 2 शब्द कहे थे कि दीदी, काश हम भी आप की तरह खुशहाल होते. हां खुशहाल ही तो थी मैं कि मयंक के चंगुल से बच निकली थी. वाकई अगर ऋ षभ ने न संभाला होता, तो मैं कतराकतरा हो कर कब की टूट कर बिखर गई होती. सोचतेसोचते मेरा मन अतीत की गहराइयों में विचरने लगा…

‘‘भाभी यह रंग आप पर बहुत खिल रहा है,’’ कुछ गहरे गुलाबी रंग की साड़ी पहन कर घर के बाहर सब्जी खरीदते समय किसी ने मुझे पीछे से आवाज दी. हम नएनए ही शिफ्ट हुए थे. मयंक हमारे पड़ोसी का लड़का था. 23-24 की उम्र में उस का शारीरिक सौष्ठव कमाल का था.

जी थैंक्स, कह कर मैं अपनी ओर एकटक निहारते मयंक को देख थोड़ी असहज हो गई. मयंक ने कहना जारी रखा, ‘‘सच कुछ लोगों को कुदरत ने फुरसत में बनाया होता है और आप उन में से एक हो?’’

‘‘यह कुछ ज्यादा नहीं हो गया क्या?’’ मैं कहते हुए हंस दी. अंदर आ कर खुद को शीशे में निहारते हुए मैं खुद भी बुदबुदा उठी कि सच में कुदरत ने मुझे फुरसत में बनाया है. दूध सी मेरी काया और उस पर तीखे नैननक्श मेरी सुंदरता में चार चांद लगाते हैं. उस पर कपड़ों का मेरा चुनाव लोगों के बीच मुझे चर्चा का विषय बना देता था.

वैसे तो ऐसी तारीफें सुनने की मुझे आदत सी पड़ गई थी, लेकिन मयंक द्वारा की गई तारीफ से मुझ में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई. उस का मेरी आंखों में गहरे झांक कर देखना फिर अर्थपूर्ण तरीके से मुसकराना मुझे अच्छा लगा. सच कहूं तो उस के शब्दों से ज्यादा उस की मोहक मुसकान ने मुझे लुभाया. पड़ोसी होने के नाते गाहेबगाहे उस से मेरी मुलाकात होती रहती थी. उस वक्त खुशी बहुत छोटी थी और मेरे पार्लर के भी ढेर सारे काम होते थे. ऐसे में कभीकभी मैं झुंझला उठती थी. एक दिन मैं ऋषभ से अपनी परेशानी का रोना ले कर बैठी ही थी कि मयंक आ गया. बातों ही बातों में उस ने मुझे मदद की पेशकश की, जिसे मुझ से पहले ऋ षभ ने स्वीकार कर लिया.

अब मयंक तकरीबन रोज मेरे छोटेमोटे कामों में हाथ बंटाने के लिए आने लगा. उस की गाड़ी पर बैठतेउतरते समय जब कभी मेरा हाथ उस से टच होता तो वह बड़ी ही शरारत से मुसकरा उठता. मन ही मन उस की यह शरारत मुझे अच्छी लगती, पर ऊपर से मैं उसे बनावटी गुस्से से देखती तो झट से सौरी बोल कर अपना मुंह घुमा लेता. धीरेधीरे मुझे उस के साथ की आदत पड़ गई.

उधर ऋ षभ की प्राइवेट जौब थी. वे देर रात घर आते थे. कई बार तो उन्हें औफिस के काम से शहर के बाहर भी रहना होता था. वैसे भी ऋ षभ मेरे लिए एक बोरिंग इंसान थे, जिन्हें मेरी खूबसूरती से ज्यादा औफिस की फाइलों से प्यार था. हां, मेरी और खुशी की जरूरतों का वे पूरा ध्यान रखते थे.

पर उम्र का जोश कहें या वक्त की कमजोरी, मेरा चंचल मन इतने भर से संतुष्ट नहीं था या यों कह लें कि मयंक ने किसी शांत झील की तरह पड़ी मेरी सोई हुई कामनाओं को अपने आकर्षण के जादू का पत्थर फेंक जगा दिया था. मयंक की छेड़छाड़, जानेअनजाने उस का छू जाना, उस का जोशीला साथ अब मुझे रोमांचित करने लगा था. मयंक तो पहले से ही बेपरवाह और दुस्साहसी किस्म का इंसान था,

मेरे मौन में उस ने मेरी रंजामंदी शायद महसूस कर ली थी. अब अधिकतर वह मेरे साथ ही रहने लगा.

खुशी को स्कूल छोड़ना व लाना, जब मैं पार्लर में व्यस्त रहूं तो उसे पार्क घुमाना, मेरे पार्लर का सामान लाना, शौपिंग में मेरी मदद करना आदि काम वह खुशीखुशी करता था. ऋ षभ के शहर से बाहर रहने पर भी वह हमारा बहुत खयाल रखता था. मैं उस जगह नई थी और ऋषभ किसी से सीधे मुंह बात भी नहीं करते थे, इसलिए लोगों की निगाहें हमें देख कर भी अनदेखा करती थीं. हालांकि पार्लर में कई महिलाएं हमारे बीच क्या चल रहा है, इस खबर को जानने के लिए उत्सुक नजर आती थीं, लेकिन मैं मस्त हो कर अपना काम करती थी. लेकिन इतना तय था कि मैं और खुशी दोनों ही मयंक के मोहपाश में बंधी जा रही थीं. खुशी तो बच्ची थी पर मैं बड़ी हो कर भी बहुत नादान.

ऐसी ही एक शाम ऋ षभ चेन्नई में थे. मैं और मयंक पार्लर का कुछ सामान लेने गए थे. खुशी को मैं ने ऋ षभ की रिश्ते में लगने वाली एक मौसी (जो हमारे घर के पास ही रहती थीं) के यहां छोड़ दिया था. बाजार से लौटते हुए हमें देर हो चुकी थी. बारिश और हलकी फुहारों ने हमें कुछ भिगो भी दिया था. उस की गाड़ी से उतरते समय तेज ब्रेक लगने के कारण मैं उस से जा चिपकी और मेरे दोनों हाथ उस के कंधों पर जा टिके. वाकई यह बहुत खूबसूरत सुखानुभूति थी, जिस ने मुझे रोमांचित कर दिया. बहरहाल ताला खोल कर हम अंदर आ गए. ‘‘मयंक अब तुम जाओ. काफी देर हो चुकी है. मैं खुशी को ले कर आती हूं,’’ मेरे कहने पर भी वह सोफे पर बैठा रहा.

‘‘अगर रात यहीं रुक जाऊं तो?’’ उस की आंखों में फिर वही शरारत थी. चाह कर भी उसे इनकार न कर सकी. मौसम की खुमारी कहें या गीले तन की खुशबू, हम दोनों ही बहकने लगे. मयंक ने मेरा हाथ खींच कर मुझे सोफे पर बैठा लिया. पूरी रात न मुझे खुशी की याद रही न अपने पत्नीधर्म की.

रात के उस व्यभिचार के बाद भी मैं सुबह बड़े ही सहज भाव से उठी और खुद को तरोताजा महसूस किया. मयंक के साथ ने जैसे जीवन में एक उमंग भर दी थी. उस वक्त मेरे मन में कोई अपराधबोध या आत्मग्लानि नहीं थी. मैं बहुत खुश थी और खुशी को मौसी के घर से यह बहाना कर के ले आई कि रात बहुत हो चुकी थी तो मैं ने आप को डिस्टर्ब करना ठीक नहीं समझा. मौसी ने फौरन मेरी बात पर विश्वास भी कर लिया. अपने सभी काम समय पर निबटा कर पार्लर खोलते वक्त मैं यही सोचने लगी कि ऋ षभ तो कल आने वाले हैं यानी आज रात भी… और मैं सुर्ख होने लगी. जल्दी से सारे काम निबटाने के बाद उम्मीद के मुताबिक अंधेरा होते ही मयंक आ गया. खुशी को सुला कर हम दोनों एक बार फिर प्यार में डूब गए. मुझे पता नहीं था कि मेरी यह खुमारी आगे क्या गुल खिलाने वाली है.

जिंदगी की उजली भोर: भाग 3- रूना को जब पता चला समीर का राज?

इस से आगे रूना से सुना नहीं गया. वह लौटी और बिस्तर पर औंधेमुंह जा पड़ी. तकिए में मुंह छिपा कर वह बेआवाज घंटों रोती रही. आखिरी वाक्य ने तो उस का विश्वास ही हिला दिया. समीर ने कहा था, ‘परसों मैं होटल पैरामाउंट में आप से मिलता हूं. वहीं हम आगे की सारी बातें तय कर लेंगे.’

यह जिंदगी का कैसा मोड़ था? हर तरफ अंधेरा और बरबादी. अब क्या होगा? वह लौट कर चाचा के पास भी नहीं जा सकती. न ही इतनी पढ़ीलिखी थी कि वह नौकरी कर लेती और न ही इतनी बहादुर कि अकेले जिंदगी गुजार लेती. उस का हर रास्ता एक अंधी गली की तरह बंद था.

एक दिन पापा की तबीयत खराब होने का फोन आया. दोनों आननफानन गांव पहुंचे. पापा बहुत कमजोर हो गए थे. गांव का डाक्टर उन का इलाज कर रहा था. उन्हें दिल की बीमारी थी. समीर ने तय किया कि दूसरे दिन उन्हें अहमदाबाद ले जाएंगे. अहमदाबाद के डाक्टर से टाइम भी ले लिया. दिनभर दोनों पापा के साथ रहे, हलकीफुलकी बातें करते रहे.

उन की तबीयत काफी अच्छी रही. रूना ने मजेदार परहेजी खाना बनाया. रात को समीर सोने चला गया. रूना पापा के पास बैठी उन से बातें कर रही थी कि एकाएक उन्हें घबराहट होने लगी. सीने में दर्द भी होने लगा. उस का हाथ थाम कर उन्होंने कातर स्वर में कहा, ‘बेटी, जो हमारे सामने होता है वही सच नहीं होता और जो छिपा है उस की भी वजह होती है. मैं तुम से…’ फिर उन की आवाज लड़खड़ाने लगी. उस ने जोर से समीर को आवाज दी, वह दौड़ा आया, दवा दी, उन का सीना सहलाने लगा. फिर उस ने डाक्टर को फोन कर दिया. पापा थोड़ा संभले, धीरेधीरे समीर से कहने लगे, ‘बेटा, सारी जिम्मेदारियां अच्छे से निभाना और तुम मुझे…मुझे…’

बस, उस के बाद वे हमेशा के लिए चुप हो गए. डाक्टर ने आ कर मौत की पुष्टि कर दी. समीर ने बड़े धैर्य से यह गम सहा और सुबह उन के आखिरी सफर की तैयारी शुरू कर दी. बूआ, बेटाबहू के साथ आ गईं. कुछ रिश्तेदार भी आ गए. गांव के लोग भी थे. शाम को पापा को दफना दिया गया. 2 दिन बाद बूआ और रिश्तेदार चले गए. गांव के लोग मौकेमौके से आ जाते. 10 दिन बाद वे दोनों लौट आए.

वक्त गुजरने लगा. अब समीर पहले से ज्यादा उस का खयाल रखता. कभी

चाचाचाची का जिक्र होता तो वह उदास हो जाती. ज्यादा न पढ़ सकने का दुख उसे हमेशा सताता रहता. लेकिन समीर उसे हमेशा समझाता व दिलासा देता. जब कभी वह उस के मांपापा के बारे में जानना चाहती, वह बात बदल देता. बस यह पता चला कि समीर अपने मांबाप की इकलौती औलाद है. 3 साल पहले मां बीमारी से चल बसीं. पढ़ाई अहमदाबाद में और उसे यहीं नौकरी मिल गई. शादी के बाद फ्लैट ले कर यहीं सैट हो गया.

रूना को ज्यादा कुरेदने की आदत न थी. जिंदगी खुशीखुशी बीत रही थी. कभीकभी उसे बच्चे की किलकारी की कमी खलती. वह अकसर सोचती, काश उस के जल्द बच्चा हो जाए तो उस का अकेलापन दूर हो जाएगा. उस की प्यार की तरसी हुई जिंदगी में बच्चा एक खुशी ले कर आएगा. उम्मीद की डोर थामे अपनेआप में मगन, वह इस खुशी का इंतजार कर रही थी.

सीमा ने जो कल बताया कि समीर किसी खूबसूरत औरत के साथ खुशीखुशी शौपिंग कर रहा था, मुंबई के बजाय बड़ौदा में था, उस का सारा सुखचैन एक डर में बदल गया कि कहीं समीर उस खूबसूरत औरत के चक्कर में तो नहीं पड़ गया है. उसे यकीन न था कि समीर जैसा चाहने वाला शौहर ऐसा कर सकता है. सीमा ने उसे समझाया था, अभी कुछ न कहे जब तक परदा रहता है, मर्द घबराता है. बात खुलते ही वह शेर बन जाता है.

समीर दूसरे दिन लौट आया. वही प्यार, वही अपनापन. रूना का उतरा हुआ

चेहरा देख कर वह परेशान हो गया. रूना ने सिरदर्द का बहाना बना कर टाला. रूना बारीकी से समीर की हरकतें देखती पर कहीं कोई बदलाव नहीं. उसे लगता कि समीर की चाहत उजली चांदनी की तरह पाक है, पर ये अंदेशे? बहरहाल, यों ही 1 माह गुजर गया.

एक दिन रात में पता नहीं किस वजह से रूना की आंख खुल गई. समीर बिस्तर पर न था. बालकनी में आहट महसूस हुई. वह चुपचाप परदे के पीछे खड़ी हो गई. वह मोबाइल पर बातें कर रहा था, इधर रूना के कानों में जैसे पिघला सीसा उतर रहा था, ‘आप परेशान न हों, मैं हर हाल में आप के साथ हूं. आप कतई परेशान न हों, यह मेरी जिम्मेदारी है. आप बेहिचक आगे बढ़ें, एक खूबसूरत भविष्य आप की राह देख रहा है. मैं हर अड़चन दूर करूंगा.’

अपनी अपनी खुशियां: शिखा का पति जब घर ले आया अपनी प्रेमिका

‘कौन कहता है कि एक म्यान में दो तलवारें नहीं समा सकतीं? आदमी में समझ होनी चाहिए,’ रूपेश ने दिल ही दिल में कहा. फिर उस ने अर्चना के सुंदर मुखड़े की ओर ताका व उस के बाद उस की नजरें अपनी पत्नी शिखा के चेहरे पर पड़ीं. शिखा अपनी प्लेट में धीरेधीरे उंगलियां चला रही थी. अर्चना से रूपेश की मुलाकात अपने एक मित्र के कार्यालय में हुई थी, जो उसे इंतजार करने को कह कर खुद कहीं चला गया था. एकडेढ़ घंटे की बातचीत के बाद अर्चना और रूपेश में इतनी घनिष्ठता हो गई थी कि रूपेश को अर्चना के बगैर रहना कठिन महसूस होने लगा था. कुछ दिनों तक सिनेमाघरों, पार्कों और होटलों में मुलाकातों के बाद रूपेश उसे अपने घर लाने की लालसा को न दबा पाया. शिखा को रूपेश ने जब यह कहा कि वह अर्चना को भी अपने घर में रहने दे तो शिखा पर मानो बिजली गिर पड़ी थी. वह काफी चीखीचिल्लाई थी किंतु रूपेश ने उस को समझाया था कि जब हम अपने हर रिश्तेदार, मित्रों और जानपहचान वालों की खुशियों के लिए सबकुछ करने को तैयार रहते हैं, तब यह कितनी अजीब बात है कि पतिपत्नी, जिन का रिश्ता संसार में सब से बड़ा और गहरा होता है, एकदूसरे की खुशियों का खयाल न रखें.

रूपेश ने शिखा से कहा कि अर्चना पर और घर पर उसे पूरा अधिकार होगा. उस को अपनी हर इच्छा को पूरा करने का अधिकार होगा. बस, वह अर्चना को उस के साथ इस घर में रहने पर आपत्ति न उठाए. पड़ोसियों को वह यही बताए कि अर्चना उस की मामी की या चाची की लड़की है और वह, यहां पर नौकरी करने आई है तथा अब उन लोगों के साथ ही रहेगी. आखिर जब शिखा ने देखा कि रूपेश को समझानेबुझाने का अब कोई फायदा नहीं है तो एक हफ्ते की खींचतान के बाद उस ने रूपेश की इच्छा के आगे सिर झुका दिया. रूपेश के पांव धरती पर न टिकते थे. वह उसी दिन जा कर अर्चना को अपने घर ले आया. पड़ोसियों से कहा गया कि वह शिखा की बहन है. रिश्तेदारों ने आपत्ति उठाई तो रूपेश ने यह कह कर मुंह बंद कर दिया कि जब मियांबीवी राजी तो क्या करेगा काजी. शिखा ने अर्चना का खुले दिल से स्वागत किया. उस के रहने की व्यवस्था रूपेश के कमरे में कर दी गई. अर्चना को नहानेधोने के लिए शिखा स्नानघर में खुद ले गई. अपने हाथों से तौलिया, साबुन, तेल वहां पहुंचाया. बाथरूम स्लीपर खुद अर्चना के पांव के पास रख दिए. रूपेश मानो खुशियों के हिंडोलों में झूल रहा था. नहाने के बाद नाश्ते की मेज पर बड़े आग्रह के साथ शिखा ने अर्चना को खिलायापिलाया. शिखा से ऐसे बरताव की आशा रूपेश को कभी न थी.

रूपेश मन ही मन मुसकरा रहा था और अपने सुंदर जीवन की कल्पना में डूबतैर रहा था. औटोरिकशा की भड़भड़ाहट से उस की कल्पना में सहसा विघ्न पड़ा. औटोरिकशा से एक लंबाचौड़ा खूबसूरत युवक उतरा और ‘हैलो शिखा’ बोलते हुए घर में घुस गया. शिखा एकाएक उस की तरफ बढ़ी. किंतु फिर थोड़ा रुक गई. उस नौजवान ने आगे बढ़ कर शिखा के कंधे पर अपनी बांह रख दी.

‘‘रूपेश भैया, जरा औटोरिकशा से सामान तो उतार लाना,’’ उस नवयुवक ने रूपेश की तरफ मुंह फेर कर कहा. कुछ न समझते हुए भी रूपेश ने औटोरिकशे वाले से उस नवयुवक का सामान अंदर रखवाया और उसे पैसे दे कर चलता किया. शिखा और वह युवक सोफे पर पासपास बैठे बातों में मग्न थे जैसे जिंदगीभर की सारी बातें आज ही खत्म कर के दम लेंगे.

‘‘आप की तारीफ,’’ रूपेश ने शिखा से पूछा. शिखा थोड़ा सा मुसकराई और शर्म से सिमटसिकुड़ गई. फिर उस ने एक बार उस नवयुवक के सुंदर मुखड़े की ओर ताका. ‘‘यह संजय है. तुम्हें शायद याद होगा कि एक बार तुम्हारे बहुत जोर देने पर मैं ने स्वीकार किया था कि शादी से पहले मैं भी किसी से प्यार करती थी. मेरी अधूरी प्रेमकहानी का हीरो यही है.’’ रूपेश को झटका सा लगा. उस की आंखें फैल गईं.

‘‘जब मैं ने अर्चना को साथ रखने की बात सुनी और तुम ने मेरा पूरा हक और मेरी खुशियां मुझे देने का वचन दे दिया, तब मैं ने संजय को अपने साथ रखने का फैसला कर लिया,’’ शिखा ने अपनी आंखों को नचाते हुए कहा, ‘‘अपने मिलनेजुलने वालों से हम यही कहेंगे कि संजय आप के मामाजी, फूफाजी या चाचाजी का बेटा है और यह नौकरी के सिलसिले में यहां आया हुआ है और अब हमारे साथ ही रहेगा.’’ ‘‘अरे, शिखा डार्लिंग, पहले तो मुझे यकीन ही नहीं आया. किंतु जब तुम ने बताया कि तुम लोग एकदूसरे की खुशियों के लिए झूठे रस्मोरिवाज तोड़ रहे हो तब मैं ने उस महान आदमी के दर्शन करने के लिए यहां आने का निश्चय कर ही लिया,’’ संजय बोला.

‘‘अब तुम इन से खुद पूछ लो,’’ शिखा ने संजय की तरफ देखा और फिर वह अपने पति की तरफ घूम गई, ‘‘क्यों जी, है न यही बात? आप मेरी खुशियों के आगे दीवार तो नहीं बनेंगे? प्यार की जिस प्यास से मैं आज तक तड़पती रही हूं, अब उसे बुझाने में आप मुझे पूरा सहयोग देंगे न?’’ ‘‘हांहां.’’ रूपेश आगे कुछ न कह सका.

‘‘डार्लिंग, तुम थकेहारे आए हो. आओ, नहाधो लो ताकि थकावट दूर हो जाए.’’

‘‘स्नानघर किधर है?’’ संजय ने पूछा. ‘‘जाइए जी, इन को स्नानघर बताइए,’’ शिखा ने कहा, ‘‘और हां, यह तौलिया और साबुन वहां रख दीजिएगा.’’ रूपेश ने तौलिया और साबुन हाथ में ले लिया और स्नानघर की ओर मुड़ा. संजय उस के पीछेपीछे चल पड़ा.

‘‘अरे हां, यह बाथरूम स्लीपर भी साथ ले जाइए.’’ शिखा ने संजय का ब्रीफकेस खोल कर उस में से बाथरूम स्लीपर निकाले. संजय बाथरूम से स्लीपर लेने के लिए पलटा.

‘‘अरे, नहीं. आप चलिए. ये ले कर आते हैं.’’ शिखा ने बाथरूम स्लीपर रूपेश की तरफ बढ़ा दिए. रूपेश ने कंधे उचकाए और फिर बाथरूम स्लीपर पकड़ कर आगे बढ़ गया.

स्नानघर से पानी गिरने की आवाज आ रही थी और संजय मग्न हो कर गुनगुना रहा था. ‘‘यह क्या मजाक है?’’ रूपेश ने शिखा से कमरे में लौटते ही कहा.

‘‘कैसा मजाक, क्या आप को संजय का यहां आना अच्छा नहीं लगा?’’ शिखा ने पूछा. ‘‘नहीं, यह बात नहीं, मैं पूछता हूं कि संजय के बाथरूम स्लीपर मुझ से उठवाना क्या तुम्हें शोभा देता है?’’

‘‘डार्लिंग, मैं आप की खुशी के लिए अर्चना बहन की दिल से सेवा कर रही हूं. आप मेरी खुशी के लिए माथे पर बल न डालिए. कहीं ऐसा न हो कि संजय के दिल को चोट पहुंचे. वह बहुत भावुक है,’’ शिखा ने कहा. रूपेश मन ही मन ताव खाए कंधे हिला कर रह गया.

‘‘अब ऐसा करिए, दो?पहर के खाने के लिए कुछ सब्जी वगैरह लेते आइए. आप डब्बों में बंद सब्जी ले आइए.’’ रूपेश ने अर्चना की तरफ देखा.

‘‘यदि अर्चना बहन आराम करना चाहती हैं तो आराम करें या आप के साथ जाना चाहती हैं तो बाजार घूम आएं. मैं रसोई की तैयारी करती हूं.’’ ‘‘नहीं, अर्चना यहीं रहेगी,’’ रूपेश ने जल्दी से कहा.

‘‘क्या आप मुझे संजय के साथ अकेले छोड़ते हुए डरते हैं?’’ शिखा ने तीखी नजरों से रूपेश की तरफ देखा. ‘‘नहीं, मैं ऐसा तंगदिल नहीं हूं. मैं तो इसलिए कह रहा हूं कि यह काम में तुम्हारी मदद करेगी,’’ रूपेश ने जल्दी से कहा और फिर थैला उठा कर बाहर निकल गया.

रूपेश ताव खाते हुए बाजार की ओर जा रहा था. उस के घर में उस की पत्नी उस से किसी के जूते उठवाए, यह कहां तक ठीक था. शिखा ने यदि अर्चना के लिए तौलिया, साबुन, स्लीपर स्नानघर में पहुंचा दिए तो अपनी खुशी से. उस ने उसे मजबूर तो नहीं किया था? संजय को बुलाने से पहले वह उस से पूछ तो लेती, सलाह तो कर लेनी चाहिए थी. और अब नौकर की तरह थैला थमा कर उसे बाजार की ओर ठेल दिया है. यह ठीक है कि शिखा को उस ने घर में पूरा हक देने का वादा जरूर किया था, मगर उसे एकदूसरे की बेइज्जती करने का तो अधिकार नहीं है.

इस की कुछ न कुछ सजा जरूर संजय और शिखा को मिलनी चाहिए. वे दोनों फूड पौयजन से बीमार हो जाएं तो कैसा रहे? रूपेश के दिमाग में एकदम विचार उभरा. हां, यह ठीक रहेगा. उस के कदम एक डिपार्टमैंटल स्टोर की ओर बढ़े.

‘‘आप के यहां कोई ऐसी डब्बाबंद सब्जी है जिस से फूड पौयजन होने का खतरा हो?’’ उस ने सेल्समैन से सीधा सवाल किया. ‘‘क्या मजाक करते हैं, साहब? हमारे यहां तो बिलकुल ताजा स्टौक है,’’ सेल्समैन ने दांत निकालते हुए कहा.

‘‘एकआध डब्बा भी नहीं?’’ ‘‘क्या आप स्वास्थ्य विभाग से आए हैं?’’ सेल्समैन ने सतर्क हो कर पूछा.

‘‘नहीं, डरो नहीं. हां, यह बताओ कि कोई ऐसा डब्बा…’’ ‘‘जी नहीं. हम इमरजैंसी से पहले और इमरजैंसी के बाद भी अच्छा ही माल बेचते रहे हैं,’’ सेल्समैन ने कहा.

‘‘अच्छा, कोई ऐसी दुकान का पता बता दो जहां ऐसी डब्बाबंद सब्जी मिल जाए.’’ अपनी बेइज्जती के बाद की भावना से पागल हो रहे रूपेश ने 500 रुपए का नोट सेल्समैन की तरफ सरकाया. ‘‘क्रांति बाबू, जरा पुलिस को फोन करना. यह पागल आदमी किसी की हत्या करना चाहता है,’’ सेल्समैन ने टैलीफोन के करीब बैठे एक नौजवान से कहा.

पुलिस का नाम सुन कर रूपेश उड़नछू हो गया. 500 रुपए का नोट काउंटर से उठाने की भी उसे सुध न रही, संजय व शिखा को बीमार कर देने का विचार भी उस के दिमाग से उड़ गया. अब तो वह उन दोनों की सेहत ठीक रहने की ख्वाहिश कर रहा था. उस के डरे हुए मस्तिष्क में यह विचार उभरा कि संजय व शिखा को कुछ हो गया तो सेल्समैन की गवाही पर वह पकड़ लिया जाएगा. रात को खाने के बाद कौफी का दौर चला. वे चारों बैठक में बैठे थे. संजय अपने चुटकुलों से सब को हंसाता रहा.

‘‘क्या बात है, डार्लिंग, तुम कुछ नहीं बोल रहे हो?’’ अर्चना ने रूपेश के करीब सरकते हुए कहा. ‘‘मैं तो कहता हूं, रूपेशजी, यदि सब लोग आप की तरह समझदार हो जाएं तो प्रेम के कारण होने वाली सारी समस्याएं समाप्त हो सकती हैं,’’ संजय ने कहा.

‘‘और प्रेम में निराश हो कर आत्महत्याएं भी कोई न करे,’’ अर्चना बोली. ‘‘मानव जाति को कितना अच्छा सुझाव दिया है रूपेशजी ने,’’ शिखा

ने कहा. ‘‘मगर पहले तो तुम अडि़यल घोड़े की तरह दुलत्तियां झाड़ रही थीं, मरनेमारने की धमकियां दे रही थीं,’’ रूपेश ने शिखा की तरफ देख कर कहा.

‘‘तब मैं तुम्हारे दिल की गहराई नाप नहीं पाई थी.’’ ‘‘अच्छा भई, तुम दिल की गहराइयां नापो. हम तो नींद की गहराइयों में उतरने चले,’’ संजय उठ खड़ा हुआ, ‘‘शिखा डार्लिंग, सोने का कमरा किधर है?’’

‘‘वह बाएं कोने वाला इन का है और दाएं वाला हमारा.’’ ‘‘अच्छा भई, गुडनाइट,’’ स्लीपिंग गाउन सरकाता हुआ संजय दाईं ओर के सोने के कमरे की ओर बढ़ गया.

संजय के चले जाने के बाद कुछ देर तक अर्चना अंगरेजी पत्रिका के पन्ने पलटती रही. फिर वह भी अंगड़ाई ले कर उठ खड़ी हुई.

‘‘सोना नहीं है, रूपेश डार्लिंग?’’ ‘‘तुम चलो, मैं थोड़ी देर और बैठूंगा.’’ रूपेश ने अनमने स्वर में कहा.

‘‘ओके, गुडनाइट.’’ ‘‘गुडनाइट,’’ रूपेश कुछ नहीं बोला लेकिन शिखा ने स्वेटर पर सलाई चलाते हुए कहा.

फिर बैठक में खामोशी छा गई. घड़ी की टिकटिक और शिखा की सलाइयों की टकराहट इस खामोशी को तोड़ देती. रूपेश अनमना सा कुरसी पर बैठा रहा.

‘‘अब सो जाइए, 1 बजने को है, मुझे तो नींद आ रही है,’’ शिखा ऊन के गोलों में सलाइयां खोंसती हुई बोली. शिखा ने स्वेटर और ऊन के गोलों को कारनेस पर टिका कर एक अंगड़ाई ली, रूपेश की तरफ देखा और और फिर पलट पड़ी दाएं कोने वाले सोने के कमरे की ओर.

‘‘रुक जाओ, शिखा,’’ रूपेश तड़प कर शिखा और कमरे के दरवाजे के बीच बांहें फैला कर खड़ा हो गया, ‘‘बेशर्मी की भी हद होती है.’’ ‘‘बेशर्मी, कैसी बेशर्मी? रूपेश डार्लिंग, तुम ने मुझे जो हक दिया है मैं उसी का इस्तेमाल कर रही हूं. हट जाओ, मेरी वर्षों से मुरझाई हुई खुशियों के बीच दीवार न बनो. मुझे खुशियों का रास्ता दिखा कर राह में कांटे न बिछाओ.’’

‘‘अपने पति के सामने ऐसा कदम उठाते हुए तुझे डर नहीं लगता? शर्म नहीं आती?’’ ‘‘डर, शर्म आप से? क्यों? यह तो बराबरी का सौदा है. रात काफी हो चुकी है, सो जाइए. आप का कमरा उधर है,’’ शिखा ने बाएं कोने में कमरे की ओर इशारा किया, ‘‘छोडि़ए, मेरा रास्ता.’’

‘‘बेशर्म, मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था कि तुम इतनी गिर सकती हो. तुम्हारी इस हरकत से एक पति के दिल पर क्या गुजर सकती है, यह तुम ने कभी सोचा है?’’ रूपेश की आंखें क्रोध से जल उठीं. ‘‘मर्द जब दूसरी पत्नी ब्याह कर लाता है तब क्या अपनी पहली पत्नी के दिल में उठने वाली चीखों की शहनाइयों के शोर को सुनता है? रातरातभर कोठों पर ऐश की शमाएं जलाने वाले पति कभी अपनी पत्नी के दिल के अंधेरों में झांक कर देखते हैं? हर जवान लड़की पर लार टपकाने वाला पति कभी यह भी सोचता है कि उस की पत्नी के गालों पर आंसू के निशान क्यों बने रहते हैं? आप ने जब अर्चना को लाने की तजवीज पेश की थी, तब मैं भी रोईचिल्लाई थी. अब मैं संजय के पास जा रही हूं तो आप क्यों चीख उठे?’’

‘‘मैं उस का सिर तोड़ दूंगा,’’ रूपेश कमरे की तरफ बढ़ा. ‘‘अरे, रुको तो,’’ शिखा ने उस की बांह पकड़ ली.

‘‘मैं कुछ सुनना नहीं चाहता. उसे इसी वक्त चलता कर दो.’’ ‘‘और अर्चना?’’

‘‘वह भी जाएगी. मेरा फैसला गलत था. मैं अंधे जज्बात की धारा में बह गया था,’’ रूपेश ने हथियार डाल दिए. ‘‘अंधे जज्बात नहीं, वासना ने तुम्हें अंधा कर दिया था. रूपेश भैया,’’ संजय पूरे कपड़े पहन अतिथिकक्ष के दरवाजे पर खड़ा था.

रूपेश कभी सोने के कमरे की तरफ और कभी अतिथिकक्ष के दरवाजे पर खड़े संजय की ओर देख रहा था. ‘‘जी हां, आप का खयाल ठीक है. मैं सोने के कमरे में स्लीपिंग सूट पहन कर गया जरूर था. किंतु दूसरे दरवाजे से बाहर निकल गया था,’’ संजय ने कहा, ‘‘आप को फिर कोई शो करना हो तो याद कीजिएगा. यह रहा मेरा कार्ड.’’

‘नितिन…निर्देशक तथा स्टेज आर्टिस्ट,’ रूपेश कार्ड की पहली पंक्ति पर अटक गया. ‘‘आगे हमारे ड्रामा क्लब का पता भी लिखा है. नोट कर लीजिए,’’ नितिन मुसकरा दिया.

रूपेश मुंह फाड़ कभी कार्ड को तो कभी उस युवक को देख रहा था, जो संजय से नितिन बन गया था.

‘‘यह नितिन है, हमारे शहर के माने हुए कलाकार और भैया के जिगरी दोस्त. जब मैं ने भैया को आप की अर्चना को साथ रखने की जिद के बारे में लिखा तब उन्होंने नितिन की सहायता से यह सारा नाटक रचवाया,’’ शिखा ने सारी बात समझाते हुए कहा. ‘‘ओह,’’ रूपेश ने एक लंबी सांस ली और धम से सोफे पर बैठ गया.

जिंदगी की उजली भोर: भाग 2- रूना को जब पता चला समीर का राज?

सुबह वह तेज बुखार से तय रही थी. समीर ने परेशान हो कर छुट्टी के लिए औफिस फोन किया.  उसे डाक्टर के पास ले गया. दिनभर उस की खिदमत करता रहा. बुखार कम होने पर समीर ने खिचड़ी बना कर उसे खिलाई. उस की चाहत व फिक्र देख कर रूना खुश हो गई पर रात की बात याद आते ही उस का दिल डूबने लगता.

दूसरे दिन तबीयत ठीक थी. समीर औफिस चला गया. शाम होने से पहले उस ने एक फैसला कर लिया, घुटघुट कर मरने से बेहतर है सच सामने आ जाए, इस पार या उस पार. अगर दुख  को उस की आखिरी हद तक जा कर झेला जाए तो तकलीफ का एहसास कम हो जाता है. डर के साए में जीने से मौत बेहतर है.

उस दिन समीर औफिस से जल्दी आ गया. चाय वगैरह पी कर, फ्रैश हुआ. वह बाहर जाने को निकलने लगा तो रूना तन कर उस के सामने खड़ी हो गई. उस की आंखों में निश्चय की ऐसी चमक थी कि समीर की निगाहें झुक गईं, ‘‘समीर, मैं आप के साथ चलूंगी उन से मिलने,’’ उस के शब्द चट्टान की मजबूती लिए हुए थे, ‘‘मैं कोई बहाना नहीं सुनूंगी,’’ उस ने आगे कहा.

समीर को अंदाजा हो गया, आंधी अब नहीं रोकी जा सकती. शायद, उस के बाद सुकून हो जाए. समीर ने निर्णयात्मक लहजे में कहा, ‘‘चलो.’’

रास्ता खामोशी से कटा. दोनों अपनीअपनी सोचों में गुम थे. होटल पहुंच कर कैबिन में दाखिल हुए. सामने एक खूबसूरत औरत, एक बच्ची को गोद में लिए बैठी थी. रूना के दिल की धड़कनें इतनी बढ़ गईं कि  उसे लगा, दिल सीना फाड़ कर बाहर आ जाएगा, गला बुरी तरह सूख रहा था. रूना को साथ देख कर उस के चेहरे पर घबराहट झलक उठी. समीर ने स्थिर स्वर में कहा, ‘‘रोशनी, इन से मिलो. ये हैं रूना, मेरी बीवी. और रूना, ये हैं रोशनी, मेरी मां.’’

रूना को सारी दुनिया घूमती हुई लगी. रोशनी ने आगे बढ़ कर उस के सिर पर हाथ रखा. रूना शर्म और पछतावे से गली जा रही थी. कौफी आतेआते उस ने अपनेआप को संभाल लिया. बच्ची बड़े मजे से समीर की गोद में बैठी थी. समीर ने अदब से पूछा, ‘‘आप कब जाना

चाहती हैं?’’

‘‘परसों सुबह.’’

‘‘कल शाम मैं और रूना आ कर बच्ची को अपने साथ ले जाएंगे,’’ समीर ने कहा.

वापसी का सफर दोनों ने खामोशी से तय किया. रूना संतुष्ट थी कि उस ने समीर पर कोई गलत इल्जाम नहीं लगाया था. अगर उस ने इस बात का बतंगड़ बनाया होता तो वह अपनी ही नजरों में गिर जाती.

घर पहुंच कर समीर ने उस का हाथ थामा और धीरेधीरे कहना शुरू किया, ‘‘रूना, मैं

बेहद खुश हूं कि तुम ने मुझे गलत नहीं समझा. मैं खुद बड़ी उलझन में था. अपने बड़ों के ऐब खोलना बड़ी हिम्मत का काम है. मैं चाह कर भी तुम्हें बता नहीं सका. करीब 4 साल पहले, पापा ने रोशनी को किसी प्रोग्राम में गाते सुना था. धीरेधीरे उन के रिश्ते गहराने लगे. उस वक्त मैं अहमदाबाद में एमबीए कर रहा था.

‘‘मेरी अम्मी हार्टपेशैंट थीं. अकसर ही बीमार रहतीं. पापा खुद को अकेला महसूस करते. घर का सारा काम हमारा पुराना नौकर बाबू ही करता. ऐसे में पापा की रोशनी से मुलाकात, फिर गहरे रिश्ते बने. रोशनी अकेली थी. रिश्तों और प्यार को तरसी हुई लड़की थी. बात शादी पर जा कर खत्म हुई. अम्मी एकदम से टूट गईं. वैसे पापा ने रोशनी को अलग घर में रखा था. लेकिन दुख को दूरी और दरवाजे कहां रोक पाते हैं.

‘‘जब मुझे पता लगा, मैं गांव गया. बूआ भी आईं, काफी बहस हुई. पापा ने अपना पक्ष रखा, बीवी की बीमारी, उन के कहीं न आनेजाने की वजह से वे भी बहुत अकेले हो गए थे. जिंदगी बेरंग और वीरान लगती थी. एक तरह से अम्मी का साथ न के बराबर था. ऐसे में रोशनी से हुई उन की मुलाकात.

‘‘जरूरत और हालात ने दोनों को करीब कर दिया. उस का भी कोई न था, परेशान थी. वह प्रोग्राम में गाने गा कर जिंदगी बसर कर रही थी. दोनों की उम्र में फर्क होने के बाद भी आपस में

अच्छा तालमेल हो गया तो शादी ही बेहतर थी.

‘‘पापा अपनी जगह सही थे. यह भी ठीक था कि बीमारी से अम्मी चिड़चिड़ी और रूखी हो गई थीं. वे किसी से मिलना नहीं चाहती थीं. पर अम्मी का गम भी ठीक था. जो हो गया उसे तो निभाना था. बूआ का बेटा बाहर पढ़ने गया था. बूआ अकसर अम्मी के पास रहतीं. पापा दोनों घरों का बराबरी से खयाल रखते. लेकिन अम्मी अंदर ही अंदर घुल रही थीं. जल्दी ही वे सारे दुखों से छुटकारा पा गईं. मैं एक हफ्ता रुक कर वापस आ गया.

‘‘पापा रोशनी को घर ले आए. बूआ और गांव के मिलने वाले पापा से नाराज से थे. मगर रोशनी ने पापा व घर को अच्छे से संभाल लिया. वह मेरा भी बहुत खयाल रखती. रोशनी बहुत कम बोलती. एक अनकही उदासी उस की आंखों में तैरती रहती. मुझ से उम्र में वह 5-6 साल ही बड़ी होगी पर उस में शोखी व चंचलता जरा भी न थी. इसी तरह 1 साल गुजर गया.

‘‘एमबीए के बाद मुझे अहमदाबाद में अच्छी नौकरी मिल गई. अकसर गांव चला जाता. एक बार मैं ने रोशनी में बड़ा फर्क देखा, वह खूब हंसती, मुसकराती, गुनगुनाती, जैसे घर में रौनक उतर आई. पापा भी खूब खुश दिखते. फिर मैं 3-4 माह गांव न जा सका. फिर तुम से शादी तय हो गई. मैं शादी के लिए गांव गया. पर बहुत सन्नाटा था. बस, पापा और बाबू ही घर पर थे. पापा बेहद मायूस टूटेबिखरे से थे. घर में रोशनी नहीं थी. दिनभर पापा चुपचुप रहे. रात जब मेरे पास बैठे तो उदासी से बोले, ‘रोशनी चली गई. मैं ने ही उसे जाने दिया. वह और उस का सहपाठी अजहर बहुत पहले से एकदूसरे को चाहते थे. पर अजहर के मांबाप उस से शादी करने के लिए नहीं माने. वह नाराज हो कर बाहर चला गया. आखिर मांबाप इकलौते बेटे की जुदाई सहतेसहते थक गए. उसे वापस बुलाया और रोशनी से शादी

पर राजी हो गए. अजहर आ कर मुझ से मिला, सारी बात बताई. मैं रोशनी की खुशी चाहता था. सारी जिंदगी उसे बांध कर रखने का कोई फायदा न था.

‘‘‘मुझे पता था कि उस ने अकेलेपन और एक सहारा  पाने की मजबूरी में मुझ से शादी की थी. मुझ से शादी के बाद भी वह बुझीबुझी ही रहती थी. बस, जब अजहर ने उसे आने के बारे में बताया तब ही उस के चेहरे पर हंसी खिल उठी. फिर मेरी व उस की उम्र में फर्क भी मुझे ये फैसला करने पर मजबूर कर रहा था. मैं ने उसे अजहर के साथ जाने दिया. बस, एक दुख है, उस की कोख में मेरा अंश पल रहा था. मैं ने उस से वादा किया, बच्चा होने के बाद मैं तलाक दे दूंगा. फिर वह अजहर से शादी कर ले. उसे यह यकीन दिलाया कि बच्चे की पूरी जिम्मेदारी मैं उठाऊंगा. अब बेटा, यह जिम्मेदारी मैं तुम्हें सौंपता हूं कि रोशनी की शादी के पहले तुम उस से बच्चा ले लेना और उस की परवरिश तुम ही करना.  यह मेरी ख्वाहिश और इल्तजा है.’

‘‘रूना, मैं ने उन्हें वचन दिया था कि यह जिम्मेदारी मैं जरूर पूरी

करूंगा. अभी तक अजहर ने रोशनी को अलग फ्लैट में बड़ौदा में रखा है. वहीं उस ने बच्ची को जन्म दिया. पापा ने तलाक दे दिया. बस, वह बच्ची के जरा बड़े होने का इंतजार कर रही है ताकि वह बच्ची को हमें सौंप कर अजहर से शादी कर के नई जिंदगी शुरू कर सके. मैं बच्ची के सिलसिले में ही रोशनी से मिलने जाता था. उस की जरूरत का सामान दिला देता था. अजहर ने अपने घर में रोशनी की शादी और बच्ची के बारे में नहीं बताया है. जब हम इस बच्ची को ले आएंगे तो वे दोनों नवसारी जा कर शादी के बंधन में बंध जाएंगे.’’

यह सब सुन कर वह खुशी से भर उठी और इतना समझदार और जिम्मेदार पति पा कर

उसे बहुत गर्व हुआ. उसे याद आया, सीमा ने उसे बताया था कि बड़ौदा मौल में समीर एक खूबसूरत औरत के साथ था. तो वह औरत रोशनी थी. अच्छा हुआ, उस ने इस बात को ले कर कोई बवाल नहीं मचाया.

समीर ने रूना का हाथ थाम कर प्यार से कहा, ‘‘रूना, मेरी इच्छा है कि हम रोशनी की बच्ची को अपने पास ला कर अपनी बेटी बना कर रखेंगे, इस में तुम्हारी इजाजत की जरूरत है.’’ समीर ने बड़ी उम्मीदभरी नजरों से रूना को देखा, रूना ने मुसकरा कर कहा, ‘‘मां खोने का दुख मैं उठा चुकी हूं. मैं बच्ची को ला कर बहुत प्यार दूंगी, अपनी बेटी बना कर रखूंगी. मैं बहुत खुशनसीब हूं कि मुझे आप जैसा शौहर मिला. आप एक बेमिसाल बेटे, एक चाहने वाले शौहर और एक जिम्मेदार भाई हैं. हम कल ही जा कर बच्ची को ले आएंगे. मैं उस का नाम ‘सवेरा’ रखूंगी क्योंकि वह हमारी जिंदगी में एक उजली भोर की तरह आई है.’’

समीर ने खुश हो कर रूना का माथा चूम लिया. उसे सुकून महसूस हुआ कि उस ने पापा से किया वादा पूरा किया. समीर और रूना के चेहरे आने वाली खुशी के खयाल से दमक रहे थे.

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