Social Story: नारीवाद- क्यों था विरोधाभास

Social Story: ‘‘अपने बच्चे को मां या सास के यहां छोड़ कर काम पर जाने वाली औरतें क्या अपना फर्ज नहीं निभाती हैं?’’ शंकर ने जननी से पूछा.

मैं पत्रकार हूं. मशहूर लोगों से भेंटवार्त्ता कर उन के बारे में लिखना मेरा पेशा है. जब भी हम मशहूर लोगों के इंटरव्यू लेने के लिए जाते हैं उस वक्त यदि उन के बीवीबच्चे साथ में हैं तो उन से भी बात कर के उन के बारे में लिखने से हमारी स्टोरी और भी दिलचस्प बन जाती है.

मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ. मैं मशहूर गायक मधुसूधन से भेंटवार्त्ता के लिए जिस समय उन के पास गया उस समय उन की पत्नी जननी भी वहां बैठ कर हम से घुलमिल कर बातें कर रही थीं. जननी से मैं ने कोई खास सवाल नहीं पूछा, बस, यही जो हर पत्रकार पूछता है, जैसे ‘मधुसूधन की पसंद का खाना और उन का पसंदीदा रंग क्या है? कौनकौन सी चीजें मधुसूधन को गुस्सा दिलाती हैं. गुस्से के दौरान आप क्या करती हैं?’ जननी ने हंस कर इन सवालों के जवाब दिए. जननी से बात करते वक्त न जाने क्यों मुझे ऐसा लगा कि बाहर से सीधीसादी दिखने वाली वह औरत कुछ ज्यादा ही चतुरचालाक है.

लिविंगरूम में मधुसूधन का गाते हुए पैंसिल से बना चित्र दीवार पर सजा था.

उस से आकर्षित हो कर मैं ने पूछा, ‘‘यह चित्र किसी फैन ने आप को तोहफे में दिया है क्या,’’ इस सवाल के जवाब में जननी ने मुसकराते हुए कहा, ‘हां.’

‘‘क्या मैं जान सकता हूं वह फैन कौन था,’’ मैं ने भी हंसते हुए पूछा. मधुसूधन एक अच्छे गायक होने के साथसाथ एक हैंडसम नौजवान भी हैं, इसलिए मैं ने जानबूझ कर यह सवाल किया.

‘‘वह फैन एक महिला थी. वह महिला कोई और नहीं, बल्कि मैं ही हूं,’’ यह कहते हुए जननी मुसकराईं.

‘‘अच्छा है,’’ मैं ने कहा और इस के जवाब में जननी बोलीं, ‘‘चित्र बनाना मेरी हौबी है?’’

‘‘अच्छा, मैं भी एक चित्रकार हूं,’’ मैं ने अपने बारे में बताया.

‘‘रियली, एक पत्रकार चित्रकार भी हो सकता है, यह मैं पहली बार सुन रही हूं,’’ जननी ने बड़ी उत्सुकता से कहा.

उस के बाद हम ने बहुत देर तक बातें कीं? जननी ने बातोंबातों में खुद के बारे में भी बताया और मेरे बारे में जानने की इच्छा भी प्रकट की? इसी कारण जननी मेरी खास दोस्त बन गईं.

जननी कई कलाओं में माहिर थीं. चित्रकार होने के साथ ही वे एक अच्छी गायिका भी थीं, लेकिन पति मधुसूधन की तरह संगीत में निपुण नहीं थीं. वे कई संगीत कार्यक्रमों में गा चुकी थीं. इस के अलावा अंगरेजी फर्राटे से बोलती थीं और हिंदी साहित्य का भी उन्हें अच्छा ज्ञान था. अंगरेजी साहित्य में एम. फिल कर के दिल्ली विश्वविद्यालय में पीएचडी करते समय मधुसूधन से उन की शादी तय हो गई. शादी के बाद भी जननी ने अपनी किसी पसंद को नहीं छोड़ा. अब वे अंगरेजी में कविताएं और कहानियां लिखती हैं.

उन के इतने सारे हुनर देख कर मुझ से रहा नहीं गया. ‘आप के पास इतनी सारी खूबियां हैं, आप उन्हें क्यों बाहर नहीं दिखाती हैं?’ अनजाने में ही सही, बातोंबातों में मैं ने उन से एक बार पूछा. जननी ने तुरंत जवाब नहीं दिया. दो पल के लिए वे चुप रहीं.

अपनेआप को संभालते हुए उन्होंने मुसकराहट के साथ कहा, ‘आप मुझ से यह  सवाल एक दोस्त की हैसियत से पूछ रहे हैं या पत्रकार की हैसियत से?’’

जननी के इस सवाल को सुन कर मैं अवाक रह गया क्योंकि उन का यह सवाल बिलकुल जायज था. अपनी भावनाओं को छिपा कर मैं ने उन से पूछा, ‘‘इन दोनों में कोई फर्क है क्या?’’

‘‘हां जी, बिलकुल,’’ जननी ने कहा.

‘‘आप ने इन दोनों के बीच ऐसा क्या फर्क देखा,’’ मैं ने सवाल पर सवाल किया.

‘‘आमतौर पर हमारे देश में अखबार और कहानियों से ऐसा प्रतीत होता है कि एक मर्द ही औरत को आगे नहीं बढ़ने देता. आप ने भी यह सोच कर कि मधु ही मेरे हुनर को दबा देते हैं, यह सवाल पूछ लिया होगा?’’

कुछ पलों के लिए मैं चुप था, क्योंकि मुझे भी लगा कि जननी सच ही कह रही हैं. फिर भी मैं ने कहा, ‘‘आप सच कहती हैं, जननी. मैं ने सुना था कि आप की पीएचडी आप की शादी की वजह से ही रुक गई, इसलिए मैं ने यह सवाल पूछा.’’

‘‘आप की बातों में कहीं न कहीं तो सचाई है. मेरी पढ़ाई आधे में रुक जाने का कारण मेरी शादी भी है, मगर वह एक मात्र कारण नहीं,’’ जननी का यह जवाब मुझे एक पहेली सा लगा.

‘‘मैं समझा नहीं,’’ मैं ने कहा.

‘‘जब मैं रिसर्च स्कौलर बनी थी, ठीक उसी वक्त मेरे पिताजी की तबीयत अचानक खराब हो गई. उन की इकलौती संतान होने के नाते उन के कारोबार को संभालने की जिम्मेदारी मेरी बन गई थी. सच कहें तो अपने पिताजी के व्यवसाय को चलातेचलाते न जाने कब मुझे उस में दिलचस्पी हो गई. और मैं अपनी पीएचडी को बिलकुल भूल गई. और अपने बिजनैस में तल्लीन हो गई. 2 वर्षों बाद जब मेरे पिताजी स्वस्थ हुए तो उन्होंने मेरी शादी तय कर दी,’’ जननी ने अपनी पढ़ाई छोड़ने का कारण बताया.

‘‘अच्छा, सच में?’’

जननी आगे कहने लगी, ‘‘और एक बात, मेरी शादी के समय मेरे पिताजी पूरी तरह स्वस्थ नहीं थे. मधु के घर वालों से यह साफ कह दिया कि जब तक मेरे पिताजी अपना कारोबार संभालने के लायक नहीं हो जाते तब तक मैं काम पर जाऊंगी और उन्होंने मुझे उस के लिए छूट दी.’’

मैं चुपचाप जननी की बातें सुनता रहा.

‘‘मेरी शादी के एक साल बाद मेरे पिता बिलकुल ठीक हो गए और उसी समय मैं मां बनने वाली थी. उस वक्त मेरा पूरा ध्यान गर्भ में पल रहे बच्चे और उस की परवरिश पर था. काम और बच्चा दोनों के बीच में किसी एक को चुनना मेरे लिए एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन मैं ने अपने बच्चे को चुना.’’

‘‘मगर जननी, बच्चे के पालनपोषण की जिम्मेदारी आप अपनी सासूमां पर छोड़ सकती थीं न? अकसर कामकाजी औरतें ऐसा ही करती हैं. आप ही अकेली ऐसी स्त्री हैं, जिन्होंने अपने बच्चे की परवरिश के लिए अपने काम को छोड़ दिया.’’

जननी ने मुसकराते हुए अपना सिर हिलाया.

‘‘नहीं शंकर, यह सही नहीं है. जैसे आप कहते हैं उस तरह अगर मैं ने अपनी सासूमां से पूछ लिया होता तो वे भी मेरी बात मान कर मदद करतीं, हो सकता है मना भी कर देतीं. लेकिन खास बात यह थी कि हर औरत के लिए अपने बच्चे की परवरिश करना एक गरिमामयी बात है. आप मेरी इस बात से सहमत हैं न?’’ जननी ने मुझ से पूछा.

मैं ने सिर हिला कर सहमति दी.

‘‘एक मां के लिए अपनी बच्ची का कदमकदम पर साथ देना जरूरी है. मैं अपनी बेटी की हर एक हरकत को देखना चाहती थी. मेरी बेटी की पहली हंसी, उस की पहली बोली, इस तरह बच्चे से जुड़े हर एक विषय को मैं देखना चाहती थी. इस के अलावा मैं खुद अपनी बेटी को खाना खिलाना चाहती थी और उस की उंगली पकड़ कर उसे चलना सिखाना चाहती थी.

‘‘मेरे खयाल से हर मां की जिंदगी में ये बहुत ही अहम बातें हैं. मैं इन पलों को जीना चाहती थी. अपनी बच्ची की जिंदगी के हर एक लमहे में मैं उस के साथ रहना चाहती थी. यदि मैं काम पर चली जाती तो इन खूबसूरत पलों को खो देती.

‘‘काम कभी भी मिल सकता है, मगर मेरी बेटी पूजा की जिंदगी के वे पल कभी वापस नहीं आएंगे? मैं ने सोचा कि मेरे लिए क्या महत्त्वपूर्ण है-कारोबार, पीएचडी या बच्ची के साथ वक्त बिताना. मेरी अंदर की मां की ही जीत हुई और मैं ने सबकुछ छोड़ कर अपनी बच्ची के साथ रहने का निर्णय लिया और उस के लिए मैं बहुत खुश हूं,’’ जननी ने सफाई दी.

मगर मैं भी हार मानने वाला नहीं था. मैं ने उन से पूछा, ‘‘तो आप के मुताबिक अपने बच्चे को अपनी मां या सासूमां के पास छोड़ कर काम पर जाने वाली औरतें अपना फर्ज नहीं निभाती हैं?’’

मेरे इस सवाल के बदले में जननी मुसकराईं, ‘‘मैं बाकी औरतों के बारे में अपनी राय नहीं बताना चाहती हूं. यह तो हरेक औरत का निजी मामला है और हरेक का अपना अलग नजरिया होता है. यह मेरा फैसला था और मैं अपने फैसले से बहुत खुश हूं.’’

जननी की बातें सुन कर मैं सच में दंग रह गया, क्योंकि आजकल औरतों को अपने काम और बच्चे दोनों को संभालते हुए मैं ने देखा था और किसी ने भी जननी जैसा सोचा नहीं.

‘‘आप क्या सोच रहे हैं, वह मैं समझ सकती हूं, शंकर. अगले महीने से मैं एक जानेमाने अखबार में स्तंभ लिखने वाली हूं. लिखना भी मेरा पसंदीदा काम है. अब तो आप खुश हैं न, शंकर?’’ जननी ने हंसते हुए पूछा.

मैं ने भी हंस कर कहा, ‘‘जी, बिलकुल. आप जैसी हुनरमंद औरतों का घर में बैठना गलत है. आप की विनम्रता, आप की गहरी सोच, आप की राय, आप का फैसला लेने में दृढ़ संकल्प होना देख कर मैं हैरान भी होता हूं और सच कहूं तो मुझे थोड़ी सी ईर्ष्या भी हो रही है.’’

मेरी ये बातें सुन कर जननी ने हंस कर कहा, ‘‘तारीफ के लिए शुक्रिया.’’

मैं भी जननी के साथ उस वक्त हंस दिया मगर उस की खुद्दारी को देख कर हैरान रह गया था. जननी के बारे में जो बातें मैं ने सुनी थीं वे कुछ और थीं. जननी अपनी जिंदगी में बहुत सारी कुरबानियां दे चुकी थीं. पिता के गलत फैसले से नुकसान में चल रहे कारोबार को अपनी मेहनत से फिर से आगे बढ़ाया जननी ने. मां की बीमारी से एक लंबी लड़ाई लड़ कर अपने पिता की खातिर अपने प्यार की बलि चढ़ा कर मधुसूधन से शादी की और अपने पति के अभिमान के आगे झुक कर, अपनी ससुराल वालों के ताने सह कर भी अपने ससुराल का साथ देने वाली जननी सच में एक अजीब भारतीय नारी है. मेरे खयाल से यह भी एक तरह का नारीवाद ही है.

‘‘और हां, मधुसूधनजी, आप सोच रहे होंगे कि जननी के बारे में यह सब जानते हुए भी मैं ने क्यों उन से ऐसे सवाल पूछे. दरअसल, मैं भी एक पत्रकार हूं और आप जैसे मशहूर लोगों की सचाई सामने लाना मेरा पेशा है न?’’

अंत में एक बात कहना चाहता हूं, उस के बाद जननी को मैं ने नहीं देखा. इस संवाद के ठीक 2 वर्षों बाद मधुसूदन और जननी ने आपसी समझौते पर तलाक लेने का फैसला ले लिया. द्य

इन्हें आजमाइए

? वर्क फ्रौम होम करते हुए कैरियर ग्रोथ के लिए अपनी टीम के साथ व्यक्तिगत रूप से समय गुजारें. अगर आप कम लोगों से संपर्क रखेंगे तो कैरियर में आगे बढ़ने वाले मौके में कमी रहेगी. इसलिए सब से मिलते रहें.

? आज के दौर में सफर के दौरान लैपटौप, टैबलेट, कैमरा जरूरी सामानों में शामिल हैं. ऐसे में पैकिंग के दौरान इन्हें चालू रखने के लिए सेल, चार्जर और पावरबैंक रखना न भूलें.

? किचन की सजावट के लिए साफसफाई के अलावा अच्छे और साफ कंटेनर्स की जरूरत होती है. मेहमानों का ध्यान सब से पहले किचन के कंटेनर्स पर जाता है. इसलिए किचन के लिए नए डिजाइन वाले कंटेनर्स खरीदें ताकि किचन परफैक्ट लगे.

? चेहरे की रफ स्किन को नीम और दही का मिश्रण मुलायम और निखार देता है नीम के पत्तों का बारीक पीस कर, फिर उन्हें दही मेें मिला कर बनाया गया फेसपैक स्किन से संबंधित कई बीमारियों को दूर करता है.

? वर्किंग कपल्स छुट्टी वाले दिन घर का काम मिल कर निबटा लें और एकसाथ कहीं बाहर घूमने का कार्यक्रम बनाएं. इस से बच्चों को अच्छा लगेगा और आप का  दिलोदिमाग भी तरोताजा रहेगा.

ये पति

मेरी शादी को कुछ साल हुए हैं. मेरे पति कई बार अपनी फरमाइश का खाना बनाने के लिए मुझे औफिस से एसएमएस करते तो मैं उसे अनदेखा कर देती और शाम को कह देती कि अरे, मैं ने तो आप का मैसेज देखा ही नहीं. बेचारे पति कुछ न कह पाते.

एक दिन पति ने मैसेज किया कि मेरी मां आने वाली हैं. मैं उन्हें लेने स्टेशन चली जाऊं. बस, फिर क्या था, मैं फटाफट स्टेशन चली गई. जिस गाड़ी से पति ने मां के आने को लिखा था, वह आई भी और चली भी गई, पर मां नहीं आईं.

मैं ने वहीं से पति को फोन किया तो वे बोले, ‘‘अरे, मैं तो यह देख रहा था कि तुम मैसेज पढ़ती भी हो या नहीं?’’

यह सुनते ही मैं ने अपना माथा पीट लिया. उफ, मेरे पति. इस के बाद मैं ने बहाना बनाना बंद कर दिया.

निधि अग्रवाल

मेरे पति हर बार करवाचौथ के व्रत के बाद मुझे छेड़ते हुए कहते, ‘आज मेरे औफिस में सभी लेडीज का व्रत था. उन्होंने पानी तक नहीं पिया.’ हमारे उत्तराखंड में तो यह व्रत चलन में नहीं है. जो शौक से रखना चाहें वही महिलाएं रखती हैं. मैं भी यह व्रत नहीं रखती. किंतु हर साल इन के टोकने से तंग आ कर मैं ने इस बार करवाचौथ से पहले इन से कहा, ‘‘क्या आप चाहते

हो मैं यह व्रत रखूं?’’ ये तुरंत बोल

पड़े, ‘‘बड़ा कठिन व्रत है, तुम से नहीं रखा जाएगा.’’

मैं जानती थी कि इन के परिवार में भी कभी किसी ने इस व्रत को नहीं रखा है. और ये भी इस के नियमकायदे कुछ भी नहीं जानते हैं. इसीलिए मैं ने कहा, ‘‘मैं यह व्रत इस बार से शुरू कर रही हूं. इसलिए तुम्हें मेरे लिए सिर से पैर तक के नए कपड़े और गहने लाने पड़ेंगे.’’

ये तुरंत बोले, ‘‘और क्या?’’

‘‘तुम्हें छुट्टी ले कर मेरी नजरों के सामने चांद निकलने तक रहना पड़ेगा, यह मेरा पहला करवाचौथ होगा न, तो तुम मेरी नजरों से ओझल नहीं हो सकते.’’

यह सुन ये बोल पड़े, ‘‘रहने दो, तुम्हें इस व्रत को रखने की कोई जरूरत नहीं.’’

मैं ने भी मुसकरा कर कहा, ‘‘अब आप ही व्रत रखने को मना कर रहे हैं तो मैं क्या कर सकती हूं.’’

Social Story

Short Story: भेडि़या और भेड़: क्या हुआ था रूबी के साथ

Short Story: ‘‘मां, मां…’’ लगभग चीखती हुई रूबी अपना बैग जल्दीजल्दी पैक करने लगी. मिसेज सविता उसे बैग पैक करते देख अचंभित हो बोलीं, ‘‘यह कहां जा रही है तू?’’

‘‘मां, बेंगलुरु में जौब लग गई है, वह भी 4 लाख शुरुआती पैकेज मिल रहा है. कल की फ्लाइट से निकल रही हूं.’’

सविता बोलीं, ‘‘अकेली कैसे रहेगी इतनी दूर? कोईर् और भी जा रहा है क्या?’’

रूबी मुसकराती हुई बोली, ‘‘पता है तुम क्या पूछना चाह रही हो. हां, रविश की जौब भी वहीं है. उस से बहुत सहारा मिलेगा मुझे.’’

इस पर सविता बोलीं, ‘‘तू रहेगी कहां? कोई फ्लैट या किराए का घर देख लिया है या नहीं?’’

अब रूबी की चंचल मुसकान गायब हो गई और मां को पलंग पर बैठाते हुए वह बोली, ‘‘मां, मैं और रविश वहां साथ ही रहेंगे.’’ यह सुन कर तो मां ऐसे उछल पड़ीं जैसे कि पलंग पर स्ंिप्रग रखी हो और उन के मुंह से बस यही निकला, ‘‘क्या? पागल तो नहीं हो गई तू, लोग क्या कहेंगे?’’

रूबी बोली, ‘‘जिन लोगों को तुम जानती हो, उन में से कोई बेंगलुरु में नहीं रहता, टैंशन नौट.’’

सविता ने कहा, ‘‘मति मारी गई है तेरी, भेडि़या और भेड़ कभी एक थाली में नहीं खा सकते. क्योंकि भेड़ के मांस की खुशबू आ रही हो तो भेडि़या घासफूस खाने का दिखावा नहीं करता.’’

इस पर रूबी बोली, ‘‘मां, इस भेड़ को भेडि़यों को काबू में रखना आता है. हम साथ रहेंगे अपनीअपनी शर्तों पर, शादी नहीं कर रहे हैं.’’

गुस्से में सविता बोलीं, ‘‘अरे नालायक लड़की, छुरी सेब पर गिरे या सेब छुरी पर, नुकसान सेब का ही होता है, जवानी की उमंग में तू यह क्यों नहीं समझ रही है?’’

रूबी बोली, ‘‘मां, मैं तुम से वादा करती हूं, जब तक उसे पूरी तरह समझ नहीं लेती, उस को हाथ भी नहीं लगाने दूंगी.’’

सविता ने कहा, ‘‘भाड़ में जा, ऐसी बातें तेरे मामा से तो कह नहीं सकती. काश, आज तेरे पिता जिंदा होते.’’

रूबी बोल पड़ी, ‘‘जिंदा होते तो गर्व करते कि बेटी ने दहेज की चिंता से मुक्त कर दिया.’’

रूबी बेंगलुरु पहुंची तो रविश ने उस का गर्मजोशी से स्वागत किया. रूबी मां को तो आश्वस्त कर आई मगर वह रविश के आचार, विचार और व्यवहार को बहुत ही बारीकी से तोल रही थी. रविश ने उसे छूने की तो कोशिश नहीं की मगर उस के उभारों पर उस की ललचाई नजर वह भांप सकती थी. उस दिन तो हद हो गई जब रविश अपने स्लो नैटवर्क के कारण टैलीकौम कंपनी की मांबहन भद्दीभद्दी गालियों के साथ एक कर दे रहा था.

चरित्र और आचार की परीक्षा को जब तक रूबी भुला पाती, रविश ने टीवी देखते हुए सनी लिओनी पर अपने विचार भी जाहिर कर दिए. अब तो रूबी के सपनों की दुनिया मानो ताश के पत्तों की तरह बिखर गई. दूसरे ही दिन रूबी अपना बोरियाबिस्तर बांध अपनी कलीग के घर जाने लगी, तो रविश ने उस का रास्ता रोकते हुए पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

रूबी ने उस के आचार, विचार और व्यवहार पर लंबाचौड़ा भाषण दे दिया. रविश ने सबकुछ शांति से सुना और बोला, ‘‘अरे, इतनी सी बात, यह तो मेरे अंदर का पुरुष जब मुझ पर हावी हो जाता है, तब होता है, हमेशा ऐसा नहीं होता.’’

रूबी ने कहा, ‘‘मगर रविश, मैं ने सोचा था कि तुम बाकी मर्दों से अलग होगे.’’

रविश ने कहा, ‘‘रूबी, जो पुरुष अपने को ऐसा दिखाते हैं वे झूठे होते हैं. सच तो यह है कि हर पुरुष सुंदर स्त्री को देखते ही लालायित हो उठता है. यह नैसर्गिक आदत है उस की. मैं भी पुरुष हूं, झूठ नहीं बोलूंगा. मगर मैं भी तुम्हें मन ही मन…लेकिन तुम्हारी मरजी के बिना नहीं. अब भी तुम अलग रहना चाहती हो तो मैं नहीं रोकूंगा.’’

रूबी उस की साफसाफ बोलने की आदत और नियंत्रण देख अपने कपड़े बैग से निकाल वापस अलमारी में रखने लगी. तभी लाइट चली गई और रविश बोल पड़ा, ‘‘इस को भी अभी जाना था.’’ रूबी के घूर कर देखने पर रविश जीभ दांतों में दबा उठकबैठक लगाने लगा. और रूबी ने इस बचकानेपन पर उसे चूम लिया. आज उस ने अपने अंदर की स्त्री के संयम के किनारे को भी तोड़ दिया क्योंकि आज वह भेडि़या और भेड़ की नैसर्गिकता को समझ चुकी थी.

Short Story

Emotional Story in Hindi: प्रतिकार

Emotional Story in Hindi: रात में मां का फोन आया था कि वह सुबह आ रही हैं. उन्हें स्टेशन से लेने के लिए वह निकल ही रही थी कि फोन की घंटी बज उठी. उस ने रिसीवर उठाया तो पता चला कि फोन अस्पताल के आपातकालीन विभाग से आया था और उसे जल्दी पहुंचने के लिए कहा गया था.

कई महीनों के बाद तो उस ने छुट्टी ली थी. मां उस से मिलने आ रही हैं. पिछली बार जब वह घर गई थी तब केवल 4 दिन की छुट्टियां ली थीं. मां ने उस से पूछा था, ‘अब फिर कब आओगी’ तो उस ने कहा था, ‘मां, अब तुम मुझ से मिलने आना. मेरा आना संभव नहीं हो पाएगा.’

तब मां ने कहा था, ‘तुम छुट्टी लोगी, तभी मैं वहां आऊंगी. स्टेशन से ले जा कर घर बिठा देती हो… अकेले घर में मन ही नहीं लगता. कम से कम उस दिन तो छुट्टी ले ही लिया करो.’

यही सोच कर उस ने मां को अपनी छुट्टी की खबर दी थी और मां आ रही थीं. पर अचानक अस्पताल से फोन आने के बाद उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. वह जानती थी कि अकेले भी मां को स्टेशन से घर आने में कितनी तकलीफ होगी. भैयाभाभी जानेंगे तो अलग गुस्सा होंगे कि यदि उस के पास मां के लिए इतना भी समय नहीं है तो वह उन्हें अपने पास बुलाती ही क्यों है.

जल्दी में कुछ और उपाय नहीं सूझा तो उस ने डा. कपिल के पापा से मां को स्टेशन से लाने के लिए अनुरोध किया. वह जानती थी कि मां को लाने और घर तक छोड़ने में कम से कम डेढ़ घंटा तो लग ही जाएगा. उधर अस्पताल से दूसरी बार फोन आ चुका था. मां पहली बार जब आई थीं तब कपिल के पापा से उन की मुलाकात

हुई थी इसलिए परेशानी की कोई बात नहीं थी.

ताला लगा कर चाबी उस ने कपिल के पापा को दे दी. उन की इस असुविधा के लिए उस ने पहले ही फोन पर उन से क्षमा मांग ली थी. तब उन्होंने फोन पर हंस कर कहा था, ‘‘तुम्हारी मां के आ जाने से मुझ बुड्ढे को भी कोई बात करने वाला मिल जाएगा.’’

उन की बात सुन कर वह भी खिलखिला कर हंस पड़ी थी.

अस्पताल पहुंचते ही वह डा. सिद्धांत के कमरे में गई. उन्होंने ही उसे फोन कर के बुलाया था. मरीज की प्राथमिक चिकित्सा कर दी गई थी पर आपरेशन की तुरंत आवश्यकता थी. समय पर आपरेशन न करने से मरीज की जान को खतरा था.

उस ने देखा कि आपरेशन थिएटर के बाहर एक औरत बुरी तरह से रोते हुए नर्स से कह रही थी, ‘‘सिस्टर, मैं अभी पूरे पैसे जमा नहीं करा सकती पर मैं जल्दी ही बिल चुका दूंगी.’’

सिस्टर ने झिड़कते हुए कहा था, ‘‘पैसा नहीं है तो किसी सरकारी अस्पताल में ले जाओ. इसे यहां क्यों ले कर आई हो?’’

‘‘यहां के डाक्टर योग्य हैं. मेरा इस अस्पताल पर विश्वास है. मैं जानती हूं कि डा. आराधना और डा. सिद्धांत मेरे पति को बचा लेंगे इसीलिए मैं यहां आई हूं. सिस्टर, मैं एकएक पैसा चुका कर ही यहां से जाऊंगी.’’

नर्स से बात करने के बाद वह औरत उस के पास आ कर रोतेरोते कह रही थी, ‘‘प्लीज, मेरे पति को बचा लीजिए. मुझे पता है कि आप मेरे पति को बचा सकती हैं. बचा लेंगी न आप?’’

उस ने उस औरत को सांत्वना दी, ‘‘देखिए, अपनी ओर से डाक्टर पूरा प्रयत्न करता है. यह उस का कर्तव्य होता है. आप चिंता न करें. सब ठीक हो जाएगा. क्या हुआ था आप के पति को?’’

‘‘पता नहीं डाक्टर, रात पेट में दाईं ओर दर्द होता रहा. सुबह उठते ही खून की उलटी हो गई. मैं घबराहट में कुछ कर ही नहीं सकी. जो रुपए घर में रखे थे उन्हें भी नहीं ला सकी. डाक्टर, आप इन का इलाज शुरू कीजिए, मैं घर जा कर पैसे ले आऊंगी.’’

नर्स ने फार्म पर हस्ताक्षर कराते समय उस औरत से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारे पति शराब पीते हैं?’’

‘‘हां, सिस्टर, बहुत अधिक पीते हैं. यह शराब ही इन्हें ले डूबी है. शराब के नशे में क्याक्या नहीं किया इन्होंने. सारी संपत्ति गंवा दी. अच्छाखासा कारोबार था, सब समाप्त हो गया. सासससुर बेटे के गम में ही चल बसे. मैं अकेली औरत क्याक्या करूं. कोई संतान भी नहीं हुई जो उस से मेरा जीवन अच्छा कट जाता,’’ कह कर वह औरत फिर रोने लगी.

वह उन की बातों को सुन रही थी लेकिन उस का ध्यान मरीज की ओर था जो अभी भी बेहोशी की हालत में था. डा. सिद्धांत भी आ गए थे. वह उन के साथ ही मरीज के पास आ गई. उस ने नब्ज देखी. ब्लडप्रेशर चेक किया. उस समय सबकुछ सामान्य था.

‘‘आपरेशन किया जा सकता है डा. सिद्धांत,’’ यह कह कर उस ने मरीज की ओर ध्यान से देखा. चेहरा कुछ जाना- पहचाना सा लग रहा था. उस चेहरे की प्रौढ़ता के पीछे वह मरीज की युवावस्था का चेहरा ढूंढ़ने लगी तो उस चेहरे को क्षणांश में ही पहचान गई. उस ने मरीज को फिर से देखा. उस की नजरें धोखा नहीं खा सकतीं. 20 बरसों के बाद भी वह उसे पहचान गई.

एक पल को उसे जोर का झटका लगा. उस के कदम आपरेशन थिएटर की ओर नहीं बढ़ सके. कमरे में जा कर वह कुरसी पर धम से बैठ गई. थोड़ा पानी पीने के बाद उस ने कुरसी के पीछे सिर टिका कर आंखें मूंद लीं.

तब वह 12-13 साल की थी और दीदी 17 की रही होंगी. वह 7वीं कक्षा में थी और दीदी 12वीं में, शिवांक सब से छोटा था. दोनों बहनें एक ही स्कूल में पढ़ने जाती थीं. स्कूल दूर नहीं था इसलिए दोनों पैदल ही जाया करती थीं. मां सुबह उठ कर नाश्ता तैयार करतीं. पापा कभीकभी उन को स्कूटर से भी स्कूल छोड़ आते थे.

दीदी पढ़ने में बहुत तेज थीं. पापा भी उन का पूरा ध्यान रखते थे. शाम को आफिस से आ कर दोनों की पढ़ाई के बारे में, स्कूल की अन्य गतिविधियों के बारे में पूछते रहते और जो भी कठिनाई होती उसे दूर करते थे. चूंकि पापा आफिस के साथसाथ दीदी को नियमित नहीं पढ़ा पाते थे अत: दीदी को विज्ञान पढ़ाने के लिए ट्यूशन लगा दी थी. वह चाहते थे कि दीदी अच्छे अंकों से पास हों क्योंकि पापा दीदी को डाक्टर बनाना चाहते थे.

दीदी भी पापा की इच्छाओं को समझती थीं. वह आज्ञाकारी बेटी बन उन की हर बात को मानती थीं. स्कूल में दीदी एक आदर्श विद्यार्थी मानी जाती थीं और परीक्षा में टौप करेगी ऐसी सभी आशा करते थे.

दीदी स्कूल से आ कर ट्यूशन के लिए जाती थीं. शाम को मां दीदी को अपने साथ लाती थीं. उस दिन शिवांक को बहुत तेज बुखार था. इसलिए मां ने उन दोनों बहनों को एकसाथ भेज दिया था ताकि वापसी में दोनों एकसाथ आ सकें.

जनवरी का महीना था. दोनों बहनें घर की ओर आ रही थीं कि वह अनहोनी हो गई जिस ने उस के घर को तिनकातिनका कर बिखेर दिया. उस अंधेरे ने जीवन में जो अंधकार भर दिया उस की पीड़ा वह आज भी महसूस करती है.

ट्यूशन पढ़ाने वाले अध्यापक के घर से निकल कर वे कुछ दूर ही पहुंची थीं कि एक कार तेजी से उन के पास आ कर रुकी और वे कुछ संभल पातीं कि कार खोल कर उतरे युवकों ने उन्हें कार में धकेल दिया. कार चल पड़ी तो उन दोनों युवकों ने अपनी हथेलियों से उन का मुंह जोर से बंद कर दिया ताकि वे चिल्ला न सकें.

तीनों युवकों ने उन्हें ले जा कर एक कमरे बंद कर दिया था. फिर कुछ देर बाद तीनों युवक दोबारा वहां आए. वह डरीसहमी कोने में दुबक  कर खड़ी देखती रही. उस के सामने ही उस की दीदी को नंगा कर दिया गया. एक ने दीदी के बाजू पकड़ लिए और दूसरे ने टांगें और फिर तीसरा…वह राक्षस, दीदी छटपटाती रहीं, चिल्लाती रहीं लेकिन उन के रोने को किसी ने नहीं सुना. वह दीदी को बचाने गई तो एक ने ऐसे जोर से धक्का दिया कि वह दीवार से जा टकराई और बेहोश हो गई.

जब होश आया तो सबकुछ समाप्त हो चुका था. वे तीनों दरिंदे कमरे से जा चुके थे. दीदी बेहोश पड़ी थीं. बाहर निकल कर उस ने देखा तो उस की समझ में नहीं आया कि कौन सी जगह है. सारी रात वह यह सोच कर रोती रही कि उस की मां और पापा कितने परेशान हो रहे होंगे.

सुबह होने पर वह कमरे से बाहर निकल कर आई और किसी तरह अपने घर पहुंच कर मां व पापा को सारी बात बताई. जब उन्हें यह सब पता चला तो उन के पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई. वे उसे ले कर वहां गए जहां दीदी को वह बेहोश छोड़ कर आई थी. दीदी अभी भी बेहोश पड़ी थीं. पापा दीदी को ले कर अस्पताल गए तो डाक्टरों ने इलाज से ही पहले ढेरों प्रश्न कर डाले. पापा ने जाने कैसेकैसे कह कर सिफारिश कर उस का इलाज शुरू करवाया था. लेकिन तब तक दीदी बहुतकुछ खो चुकी थीं. मानसिक रूप से विक्षिप्त दीदी थोड़ीथोड़ी देर बाद चीखने लगतीं, कपड़े फाड़ने लगतीं.

परीक्षाएं शुरू हुईं और समाप्त भी हो गईं. दीदी बेखबर थीं और फिर एक दिन इसी बेखबरी में दीदी चल बसीं. पापा ने ठान लिया था कि वह इस का बदला ले कर रहेंगे. उन्होंने अपने जीवन का जैसे उद्देश्य ही बना लिया था कि अपराधियों को उस के किए की सजा दिला कर रहेंगे. पुलिस में रिपोर्ट तो लिखाई ही थी. उस की पहचान पर पुलिस ने उन युवकों को पकड़ भी लिया. अदालत में मुकदमा चला, जज के सामने भी उस ने चिल्ला कर उस युवक के बारे में बताया था लेकिन उन लोगों ने ऐसेऐसे गवाह पेश कर दिए जिस से यह साबित हो गया कि वह तो घटना वाले दिन शहर में था ही नहीं. अमीर पिता का बिगड़ा बेटा था सो पैसे के बल पर छूट गया. बाकी दोनों युवकों को 3-3 माह की सजा हुई, बस.

पापा टूट तो पहले ही गए थे, फैसला आने के बाद तो जैसे बिखर ही गए. उन्होंने उस शहर से अपना ट्रांसफर करवा लिया लेकिन वहां भी वह संभल नहीं पाए. दीदी की मृत्यु वह सहन नहीं कर पाए और एक दिन उन्होंने हम सब को छोड़ कर आत्महत्या कर ली.

पापा ने एक मकान ले रखा था. मां उसी में आ कर रहने लगीं. उन्होंने एक कमरा अपने पास रखा और बाकी कमरे किराए पर चढ़ा दिए.

पापा और दीदी की मौत ने उसे कुछ ही समय में बड़ा कर दिया. वह शांत, चुप रहने लगी. पढ़ाई में उस ने मन लगाना शुरू कर दिया. चूंकि पापा दीदी को डाक्टर बनाना चाहते थे इसलिए उस ने ठान लिया था कि वह पापा की इच्छा को अवश्य पूरी करेगी. वह दीदी जैसी प्रतिभावान नहीं थी पर अपनी लगन और दृढ़ निश्चय के कारण वह सफलता की सीढि़यां चढ़ती गई और एक दिन उस ने डाक्टर बन कर दिखा ही दिया. आज वह एक सफल डाक्टर है और लोग उसे

डा. आराधना के रूप में जानते हैं. इस इलाके में उस का नाम है.

मां विवाह के लिए पिछले 5 सालों से जिद कर रही हैं लेकिन वह ऐसा सोच भी नहीं सकती. वह मानसिक रूप से इस के लिए खुद को तैयार नहीं कर पाती. शायद दूसरी वजह यही है कि बचपन में जो वीभत्स दृश्य उस ने देखा था उस कुंठा से वह निकल नहीं पाई है. हार कर मां ने शिवांक का विवाह कर दिया और उसी के पास वह रहती है.

आज जिस पुरुष को अभी देख कर वह आई है, वह कोई और नहीं बल्कि वही दरिंदा था जिस ने उस के सामने ही उस की दीदी की इज्जत से खेल कर उन्हें मौत के मुंह में धकेल दिया था और दीदी को न्याय नहीं दिला पाने की पीड़ा में पापा ने आत्महत्या कर ली थी.

उस के मन में उबाल उठ रहा था, जो न्याय दीदी को पापा नहीं दिला पाए थे वह दिलवाएगी. वह उस व्यक्ति से अवश्य प्रतिकार लेगी. तभी दीदी और पापा की आत्मा को शांति मिल सकेगी. वह उस का इलाज नहीं करेगी जो इस समय जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहा है.

वह निश्ंिचत हो कर वैसे ही कुरसी पर सिर टिकाए बैठी रही पर उस के मन को अभी भी कुछ कचोट रहा था. उसे लगा जैसे कुछ गलत हो रहा है.

जब वह कोई निर्णय नहीं ले पाई तो उस ने अपने घर आई मां को फोन किया. बड़ी देर तक फोन की घंटी बजती रही, किसी ने रिसीवर उठाया ही नहीं. फिर उस ने कपिल के घर फोन किया. फोन कपिल के पापा ने उठाया. उस ने छूटते ही पूछा, ‘‘अंकल, मां नहीं आईं क्या? घर पर फोन किया था. किसी ने रिसीवर उठाया ही नहीं.’’

‘‘च्ंिता न करो, बेटी, तुम्हारी मां मेरे घर में हैं. तुम थीं नहीं सो इधर ही उन्हें ले कर चला आया.’’

‘‘अंकल, मां से बात कराएंगे?’’

‘‘क्यों नहीं, अभी करवा देता हूं.’’

‘‘हैलो, मां कैसी हैं आप, सौरी, मैं आप को लेने नहीं आ सकी.’’

‘‘कोई बात नहीं, बेटी. मैं तुम्हारी मजबूरी को समझती हूं. तुम च्ंिता मत करो. चाय पी कर मैं घर चली जाऊंगी. तुम अपना काम कर के ही आना.’’

‘‘मां, आप अस्पताल में आ सकती हैं?’’

‘‘क्यों, क्या बात है, बेटी? तुम्हारी आवाज भर्राई हुई क्यों है?’’

‘‘कुछ नहीं, मां. बस, आप यहां आ जाओ,’’ उस ने छोटे बच्चों की तरह मचलते हुए कहा.

‘‘अच्छा, मैं अभी आ रही हूं,’’ कहते हुए उस ने फोन काट दिया.

मां जब अस्पताल पहुंचीं तब भी वह अपने कमरे में निश्चल बैठी थी. मां को देखते ही वह उन से लिपट कर रोने लगी. मां उसे भौचक देखती रहीं, सहलाती रहीं. थोड़ा मन शांत हुआ तो मां से अलग हो कर फिर से कुरसी पर आंखें मूंद कर बैठ गई. लग रहा था जैसे उस में खड़े होने की शक्ति ही नहीं रही.

मां ने च्ंितित स्वर में पूछा, ‘‘आराधना, क्या बात है. सबकुछ ठीक तो है न, बोल क्यों नहीं रही बेटी.’’

वह फिर से रोने लगी और रोतेरोते उस ने मां को उस व्यक्ति के बारे में सबकुछ बता दिया.

मां भी सकते में आ गईं. जरा संभलीं तो बोलीं, ‘‘मत करना उस का आपरेशन, मरने दे उसे. यही उस की सजा है. मेरा घर बरबाद कर के वह अभी तक जीवित है. हमें कानून से न्याय नहीं मिला, अब समय है, तू बदला ले सकती है. तभी साधना और तुम्हारे पिता की आत्मा को शांति मिलेगी. कुछ सोचने की जरूरत नहीं. चुपचाप घर चल, तू ने छुट्टी तो ले ही रखी है.’’

वह उसी तरह कुरसी पर सिर टिकाए बैठी रही. तभी नर्स ने कमरे में आ कर कहा, ‘‘डाक्टर, आपरेशन की तैयारी पूरी हो गई है. आप भी जाइए.’’

नर्स तो कह कर चली गई पर वह मां की ओर देखने लगी. मां ने उस से फिर कहा, ‘‘देख ले, आराधना, अच्छा अवसर मिला है. मत जा, कोई और यह आपरेशन कर लेगा.’’

‘‘मां, यह आपरेशन मैं ही कर सकती हूं, इसीलिए तो घर से बुलवाया गया था.’’

‘‘सोच ले.’’

‘‘मैं अभी आती हूं,’’ कह कर वह अपने कमरे से बाहर आ गई. मरीज के साथ आई औरत वहीं खड़ी थी. उस का दिल चाहा कि वह उस से सबकुछ बता दे कि उस के पति ने क्याक्या किया था. पर इस में उस औरत का क्या दोष है.

वह बिना कुछ बोले आपरेशन थिएटर में चली गई. देखा तो वह व्यक्ति अचेतावस्था में आपरेशन टेबल पर लेटा हुआ था. उस की मनोस्थिति से बेखबर यदि और थोड़ी देर उस का आपरेशन नहीं किया गया तो वह बच नहीं पाएगा. वह इस वहशी का अंत देखना चाहती है. वह पापा और दीदी की मृत्यु का बदला लेना चाहती है. लेकिन उस के मन की दृढ़ता पिघलने क्यों लगी है? कभी उस औरत का दारुण रुदन सुनाई देने लगता तो कभी उस का गिड़गिड़ाता हुआ चेहरा सामने आ जाता तो कभी दीदी और पापा सामने आ जाते. कभी मां के शब्द कानों में गूंजने लगते. यह कैसा अंतर्द्वंद्व है. वह बदला ले या अपना कर्तव्य निभाए. मन दीदी का साथ दे रहा था तो अंतरात्मा उस का.

वह थोड़ी देर खड़ी रही. खाली- खाली आंखों से उस व्यक्ति को देखती रही. उस के चेहरे पर भाव आजा रहे थे.

नर्स हैरानी से उसे देख रही थी. बोली, ‘‘डाक्टर, सब ठीक है न?’’

‘‘ठीक है,’’ कह कर वह ग्लव्स और ऐप्रेन पहनने लगी.

2 घंटे के अथक परिश्रम के बाद आपरेशन पूरा हो गया. वह निढाल सी हो कर बाहर आई. वह औरत उस की ओर बढ़ी पर उस से वह कुछ कह नहीं पाई. उस के कंधे पर हाथ रख वह अपने कमरे की ओर चली आई थी. मां अभी तक वहीं थीं. वह उन की गोद में सिर रख कर फफकफफक कर रो पड़ी. मां उस के सिर को सहलाते हुए खुद भी रो पड़ीं. उन दोनों की आंखों से अब आंसू के रूप में अतीत का दर्द बह रहा था.

Emotional Story in Hindi

Family Story: चाबी का गुच्छा

Family Story: रेवती जैसी बहू पा कर मनोरमाजी निहाल हो गई थीं. रूप, गुण, व्यवहार में अव्वल रेवती ने सहर्ष घर की बागडोर थाम ली थी. लेकिन उसे अपनी अलमारी की चाबी का गुच्छा देते हुए आखिर क्यों मनोरमाजी का दिल दहल उठता और दिल में तरहतरह के विचार उठने लगते थे?

मनोरमाजी अलसाई सी उठीं. एक जोरदार अंगड़ाई ली, हालांकि उठने में काफी देर हो गई थी जबकि वे भरपूर नींद सोई थीं. बेटे की शादी हुए 2 ही दिन हुए थे. महीनों से वे तैयारी में लगी थीं और अभी भी घर अस्तव्यस्त सा ही था. सोचा, उठ कर चाय बना लें. बहू को अपने हाथों से चाय पिलाने की इच्छा से जैसे उन के अंदर चुस्ती आ गई. वे किचन की ओर बढ़ी ही थीं कि ट्रे में चाय के कप को सजाए बहू आती दिखी. साथ में प्लेट में बिस्कुट भी रखे थे.

‘‘चलिए मम्मी, साथ बैठ कर चाय पीते हैं. कितनी थकीथकी सी लग रही हैं.’’

पलभर को तो मनोरमाजी अवाक् रह गईं. उन्हें उम्मीद नहीं थी कि शादी के

2 दिन बाद बहू स्वयं रसोई में जा कर चाय बना लेगी और उन्हें साधिकार पीने को भी कहेगी. चाय पीतेपीते उन्हें याद आया कि आज तो बहू पगफेरे के लिए मायके जाएगी.

‘‘बेटा, कितने बजे आएंगे तुम्हारे भाई तुम्हें लेने?’’

‘‘मम्मी, शाम तक ही आएंगे. आप बता दीजिए कि क्या बनाना है? और मम्मी, मायके भी तो कुछ ले कर जाना होगा.’’

‘‘ठीक है, देखते हैं. तुम चिंता मत करो. मैं सब तैयारी कर दूंगी. तुम जा कर तैयार हो जाओ. अभी 2 दिन हुए हैं तुम्हारी शादी को, अभी से काम की टैंशन मत लो. आसपड़ोस की औरतें और रिश्तेदार भी आएंगे तुम्हारी मुंह दिखाई करने. कम से कम हफ्तेभर तो यह सिलसिला चलेगा,’’ मनोरमाजी ने अपनी बहू रेवती से कहा.

थोड़ी देर बाद रेवती तैयार हो कर आ गई. ‘कितनी सुंदर लग रही है,’ मनोरमाजी ने मन ही मन सोचा. नैननक्श, गठन और स्वभाव सब नपेतुले हैं. लगता ही नहीं कि उसे 2 ही दिन हुए हैं इस घर में आए, कितनी जल्दी घुलमिल गई है सब से.

‘‘मम्मी, जरा चाबी तो देना. खाने का सामान, नई क्रौकरी वगैरह निकालनी है. मैं चाहती हूं कि भैया के आने से पहले ही सारी तैयारी कर लूं, ताकि फिर आराम से बैठ कर गपें मारी जा सकें,’’ रेवती ने बहुत ही सहजता से कहा.

सुनते ही मनोरमाजी का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया. आते ही उन के चाबी के गुच्छे पर अधिकार जमाना चाहती है पर प्रत्यक्ष में कुछ नहीं बोलीं. मना भी नहीं कर सकती थीं, इसलिए चाबी दे दी. जब से वे इस घर में ब्याह कर आई थीं, पहली बार उन्होंने किसी को चाबी दी थी. मन में तरहतरह के विचार आने तो स्वाभाविक थे.

‘‘अब आप निश्ंिचत हो कर बैठिए. मैं सब मैनेज कर लूंगी. शादी की वजह से कितनी थक गई हैं आप,’’ रेवती ने चाबी का गुच्छा उन से लेते हुए कहा.

रसोई से खटरपटर की आवाजें आती रहीं. बीचबीच में रेवती पूछती भी जाती कि फलां चीज कैसे बनेगी या फलां चीजें कहां रखी हैं. वे अपने कमरे में बैठीबैठी जवाब देती रहीं, पर जब देखा कि बहू की मदद करने बेटा भी रसोई में पहुंच गया है तो उन्हें वहां जाना ही पड़ा.

बहू ने 10-12 डिश बनाने के लिए सामान निकाला हुआ था. उन के सब से कीमती क्रौकरी और कटलरी सैट टेबल पर लगे हुए थे. यहां तक कि अपने सामान से उस ने टेबल मैट्स निकाल कर भी सजा दिए थे. उन का नया कुकर, कड़ाही और करछियां भी धोपोंछ कर करीने से रखे हुए थे. किचन के स्लैब पर भी सामान बिखरा हुआ था. इतना फैलाव देख कर उन्हें पलभर को कुढ़न तो हुई पर रेवती के चेहरे पर छाई खुशी और जोश को देख कर वे कुछ बोली नहीं.

चाबी का गुच्छा बहू की कमर में लटक रहा था. उन का मन हुआ कि वे उसे मांग लें, पर हिम्मत ही नहीं हो रही थी. इतनी सारी चीजें बनातेबनाते दोपहर के 3 बज गए थे.

‘‘मम्मी, अब आप जा कर थोड़ी देर आराम कर लीजिए और हां, ये आप की चाबियां,’’ रेवती ने जैसे ही उन्हें चाबियों का गुच्छा थमाया, उन्होंने उसे ऐसे पकड़ लिया मानो कोई बहुत कीमती चीज उन के हाथ में आ गई हो.

शाम को रेवती का भाई, भाभी, बच्चे, उस की छोटी बहन सब आए. हर थोड़ीथोड़ी देर बाद वह उन से चाबी मांगती, ‘‘मम्मी, जरा यह निकालना है, चाबी दीजिए न…फलां चीज तो निकाली ही नहीं, निकाल देती हूं. मेरी ससुराल में भैया पहली बार आए हैं, उन पर अच्छा इंप्रैशन पड़ना चाहिए.’’

वे चाबी का गुच्छा अवश्य उसे देतीं पर जब तक उन्हें वापस नहीं मिल जाता, उन का सारा ध्यान उसी पर अटका रहता.

सेवासत्कार में शाम हो चली थी. रेवती अपने भैया के साथ मायके के लिए प्रस्थान कर गई.

अगले दिन उन का बेटा नीरज रेवती को उस के मायके से ले आया. वह उन से गले लग कर ऐसे मिली मानो उन से पलभर की जुदाई बरदाश्त न हो. मनोरमाजी को रेवती का उन पर इस तरह स्नेह उड़ेलना बहुत अच्छा लग रहा था. पर भीतर से उन्हें यह बात भी तंग कर रही थी कि कहीं रेवती उन के चाबी के गुच्छे पर अधिकार कर उन की सत्ता को ही चुनौती न दे दे.

रेवती का यों खुले मन से इस घर को अपनाना उन्हें बहुत खुशी दे रहा था लेकिन एक तरफ जहां उन्हें रेवती का चुलबुलापन और उस की स्मार्टनैस अच्छी लग रही थी वहीं दूसरी ओर डरा भी रही थी. कितने ही घरों में वे ऐसा होते देख चुकी थीं कि बहू के आते ही बेटा तो पराया हो ही जाता है साथ ही, बहू सास को भी बिलकुल कठपुतली बना देती है.

मार्केट में उस दिन कांता ने भी तो उन्हें सतर्क किया था, ‘संभल कर रहना, मनोरमा, अब बहू आ गई है. आजकल की ये लड़कियां बिलकुल मीठी छुरी होती हैं, लच्छेदार बातों में फंसा कर सब हथिया लेती हैं. तुम तो वैसे ही इतनी सीधी हो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हें वह घर से ही बाहर कर दे.’

मनोरमाजी जब भी रेवती को देखतीं या उस के व्यवहार से खुश होतीं, उन का दिल यह सब मानने को तैयार नहीं होता था. रेवती उन का बहुत ध्यान रखती थी और उचित मानसम्मान देती थी.

‘‘मम्मी, आज शाम को घूमने चलेंगे,’’ सुबह ही रेवती ने उन्हें बता दिया था. उन्हें लगा कि कहीं पिक्चर वगैरह या डिनर का प्रोग्राम होगा इसलिए पिं्रटेड सिल्क की साड़ी पहन वे तैयार हो गईं.

‘‘अरे मम्मी, यह साड़ी नहीं चलेगी. हम लोग डिस्को जा रहे हैं. चलिए, मैं देखती हूं कौन सी साड़ी ठीक रहेगी.’’

‘‘लेकिन मैं डिस्को में जा कर क्या करूंगी. तुम लोग चले जाओ,’’ मनोरमाजी बोलीं.

‘‘ऐसे कैसे नहीं चलेंगी, मम्मी. एक बार चल कर तो देखिए, आप खूब ऐंजौय करेंगी.’’

‘‘हांहां, मम्मी, आप और पापा दोनों चलिए न. रेवती इतने प्यार से कह रही है तो मान लीजिए न,’’ नीरज ने भी जब कहा तो ना करने का सवाल ही नहीं उठता था.

‘‘देखिए, यह नैट वाली साड़ी ठीक रहेगी. लेकिन इस के ब्लाउज की फिटिंग तो सही नहीं लग रही है. जरा स्टोर की चाबी तो दीजिए, मैं सिलाई मशीन निकाल कर इसे ठीक कर देती हूं.’’

रेवती ने फटाफट ब्लाउज ठीक कर दिया. सचमुच फिटिंग एकदम बढि़या हो गई थी. मनोरमाजी को बहुत अच्छा लगा, पर उस ने चाबी वापस नहीं की है, यह बात उन्हें खटक गई. डिस्को में जाने का मनोरमाजी का हालांकि यह पहला अनुभव था पर उन्होंने ऐंजौय बहुत किया. बीचबीच में उन्हें यह खयाल परेशान करने लगता कि बहू के पर्स में चाबी है.

घर लौट कर भी दिमाग में इसी परेशानी को ले कर वे सोईं. सुबह का चायनाश्ता सब रेवती ने तैयार कर दिया और वह भी बिना किसी गलती या देरी के. वे लगातार यही सोचती रहीं कि आखिर चाबी का गुच्छा मांगें कैसे, पता नहीं बहू उन के बारे में क्या सोचेगी या कहीं बेटे के ही कान न भर दे. अगली सुबह उन के कमरे में आ कर रेवती उन की अलमारी खोल कर बैठ गई.

‘‘मम्मी, आप का आज वार्डरोब देखा जाए. जो बेकार साडि़यां हैं उन्हें हटा दें और जो ब्लाउज ठीक करने हैं वे भी ठीक कर के रख देती हूं.’’

मनोरमाजी उसे हैरानी से देखती रहीं. कहतीं भी तो क्या? कुछ देर खटरपटर करने के बाद वह बोली, ‘‘मम्मी, बहुत थक गई हूं, जरा चाय पिला दो.’’

चाय बना कर वे लौटीं और टे्र को कौर्नर टेबल पर रख दिया. चाबी का गुच्छा वहीं रखा हुआ था. उसे देखते ही उन की आंखों में चमक आ गई लेकिन सवाल यह था कि वे उसे उठाएं कैसे? तभी रेवती का मोबाइल बजा और वह बात करने के लिए अपने कमरे में चली गई. मनोरमाजी ने तुरंत चाबी का गुच्छा उठा लिया. अपनी अलमारी को ताला लगा दिया और निश्ंिचत हो काम में लग गईं. चाबी का गुच्छा हाथ में आते ही उन्हें लगा मानो जंग जीत ली हो.

उस के बाद से मनोरमाजी थोड़ा ज्यादा सतर्क हो गईं. रेवती चाबी मांगती तो वे चाबी देने के बजाय खुद वहां जा कर ताला खोल देतीं या उस के पीछेपीछे जा कर खड़ी हो जातीं और खुद आगे बढ़ कर ताला बंद कर देतीं. रेवती के प्यार और अपनेपन को देख मनोरमाजी का मन यह तो मानने को तैयार नहीं था कि वह उन का दिल दुखाने या अपमान करने का इरादा रखती है, इस के बावजूद जबजब वह उन से चाबी का गुच्छा मांगती, उन के अंदर एक अजीब सी बेचैनी शुरू हो जाती. फिर उसे मांगने का बहाना तलाशने लगतीं.

‘‘बेटा, स्टोर से कुछ सामान निकालना है, जरा चाबी देना.’’

रेवती झट से कहती, ‘‘मम्मी, आप क्यों तकलीफ करती हैं. बताइए, क्या निकालना है, मैं निकाल देती हूं.’’

वह इतने भोलेपन से कहती कि मनोरमाजी कुछ कह ही नहीं पातीं.

एक दिन मनोरमाजी को कुछ काम  से बाहर जाना पड़ा और जल्दीजल्दी में वे चाबी का गुच्छा अलमारी में ही लगा छोड़ आईं. सारा वक्त उन का दिल धड़कता रहा कि अब तो रेवती उसे निकाल कर अपने पास रख लेगी. जब वे घर लौटीं तो देखा अलमारी बंद थी और गुच्छा नदारद था. वे सोचने लगीं, न जाने मेरे पीछे से इस लड़की ने क्याक्या सामान निकाल लिया होगा? वैसे भी तो जबतब उन की ज्वैलरी निकाल कर वह पहन लेती थी.

‘‘मम्मी, शाम को क्या खाना बनेगा? मैं और नीरज तो आज डिनर पर जा रहे हैं. आप का और पापाजी का ही खाना बनेगा,’’ रेवती मुसकराती हुई उन के सामने खड़ी थी.

‘‘रोटी, सब्जी ही बनेगी. तुम परेशान मत हो, मैं बना लूंगी,’’ मनोरमाजी ने कहा. पर उन की आंखें चाबी के गुच्छे को ढूंढ़ रही थीं. उस की कमर पर तो नहीं लटका हुआ था. फिर कहां है? आखिरकार रख ही लिया न इस ने. उन के मन में विचारों का तांता चल रहा था. पति ने पानी मांगा तो वे रसोई में आईं. देखा, स्लैब पर चाबी का गुच्छा पड़ा हुआ है.

जैसे ही उन्होंने अलमारी खोली तो उसे देख कर वे दंग रह गईं. अलमारी पूरी तरह व्यवस्थित थी. 5-6 मौडर्न ड्रैस, 4 लेटैस्ट डिजाइन की साडि़यां व स्वरोस्की और जरदोजी वर्क के 3 सूट करीने से हैंगर पर टंगे हुए थे. उन के गहने के डब्बे लौकर में एक लाइन से रखे हुए थे. अलमारी में परफ्यूम और डियो व कौस्मेटिक्स की नई रेंज भी रखी हुई थीं. सब से नीचे की दराज खोली तो देखा 2 जोड़ी नई चप्पलें रखी हैं.

ऐसा लग रहा था कि रेवती ने अपनी महीनों की कमाई से ये सारा सामान खरीदा था और उन की अलमारी की कायापलट की थी.

मनोरमाजी वहीं बैठ कर फूटफूट कर रोने लगीं. सब लोग घबरा कर उन के पास दौड़े आए. वे रोए जा रही थीं. पर किसी को बता नहीं सकती थीं और रेवती उन से ऐसे चिपक गई, मानो उस से ही कोई भूल हो गई हो. वह समझ ही नहीं पा रही थी कि अलमारी ठीक कर के उस से ऐसी कौन सी भूल हो गई कि मम्मी रोए जा रही हैं.

‘‘मैं बता नहीं सकती, मैं बता नहीं सकती…’’ मनोरमाजी लगातार यही कह रही थीं और उन का चाबी का गुच्छा एक कोने में पड़ा था.

Family Story

Nose Makeup: नाक मोटी है, तो उस पर कैसा मेकअप करें कि वह पतली लगे

Nose Makeup: जबजब बात परफेक्ट चेहरे की आती है तो ऐसा माना जाता है कि लंबे बाल, बड़ी आंखें, डार्क पिंक लिप्स और तीखी और पतली नोज होना बेहद जरूरी है. अक्सर आपने देखा और सुना भी होगा कि लोग पतली और सुंदर नोज पाने के लिए, उसे सही शेप देने के लिए और तीखी दिखाने के लिए सर्जरी तक का सहारा ले लेती है पर रिजल्ट उतना अच्छा नहीं मिलता. ऐसे में आप अपनी नोज को सही लुक देने के लिए मेकअप का प्रयोग भी कर सकती हैं. इनके कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होते हैं. नोज को सही शेप देने के लिए आप इन तरीकों का सहारा ले सकते हैं.

नोज पर डौट लगाकर करें मेकअप

नोज पर जो भी मेकअप लगाएं उसके डौट लगाएं और फिर उन्हें आराम से थपककर एक समान ब्लेंड करें. इससे नोज भी पतली लगेगी.

नोज पर फाउंडेशन अप्लाई करें

अपने नेचुरल टोन से एक शेड डार्क फाउंडेशन चुनें. इस फाउंडेशन को एक पतली लाइन में अपनी नाक के ब्रिज के ऊपर, अपनी आंखों के बीच से शुरू करते हुए और टिप और नोस्ट्रिल (nostrils) के ठीक पहले खत्म करते हुए, लगाएं.

ये फाउंडेशन आपकी नोज की सेंटर लाइन को हाइलाइट करता है, जो आपके डार्क फाउंडेशन के द्वारा तैयार किए “शैडो” को और भी ज्यादा प्रभावी बना देता है. फाउंडेशन और कंसीलर को अच्छे तरह ब्लेंड करें और उसे स्किन टोन के साथ मिक्स कर लें. यह जरूर चेक करें कि आपकी स्किन टोन सभी जगह एक बराबर है या नहीं. ऐसा करने से आपकी त्वचा अधिक क्लीयर और नेचुरल लगेगी.

ब्रो बोन पर भी करें कंटूरिंग

कंटूरिंग के लिए एंगल्ड ब्रश का इस्तेमाल करते हुए अपनी ब्रो बोन से लेकर नोज की नोक तक लाइट सी कंटूर लाइन बनाएं. नोज की नोक तक लाइन बनाने के बाद नाक के कर्व के हिसाब से ही आगे की लाइन बनाएं और फिर लास्ट में लाइन को राउंड-राउंड ब्लेंड करें. कंटूर को अच्छे से ब्लेंड करने के लिए एक क्रीम कौंटूर चुनें.

हाइलाइटर से हाईलाइट करें नोज बौन को

नोज को पतला और नुकीला दिखाने के लिए सबसे पहले अपनी त्वचा की टोन से एक या दो शेड हल्का चमकीला हाइलाइटर लगाएं. हाइलाइटर को धीरे से ऊपर से नीचे की ओर एक पतली लाइन में अपनी नोज के बौल यानी नाक के आगे के हिस्से पर लगाएं.

हाइलाइटर लगाते वक्त याद रखें कि ये लाइन बहुत चौड़ी न हो, इससे लुक खराब हो सकता है. आप हाइलाइटर की जगह औफ-व्हाइट या न्यूड आईशैडो का भी इस्तेमाल कर सकती हैं.

अपनी नोज की साइड पर ट्रांस्लुसेंट पाउडर (translucent powder) लगाएं

एक लूज मैट पाउडर (matte powder) चुनें और उसे अपनी नोज की पूरी साइड पर फैला लें. ये लूज पाउडर आपके फाउंडेशन की किसी भी लाइन या उसमें रह गई किसी भी गड़बड़ी को ढंकने में मदद करेगा, जिससे आपका मेकअप कहीं ज्यादा नेचुरल नजर आएगा. ध्यान रखें कि आप मैट पाउडर का ही इस्तेमाल करें. शिमर पाउडर (Shimmer powders) अपनी तरफ अटेन्शन खींचकर ले आते हैं, इसलिए अगर आप आपकी नोज पर शिमर पाउडर लगा रही हैं, तो ये आपकी नोज को पहले से और भी ज्यादा उभार देगा.

मेकअप लाइट ही रखें हैवी नहीं

नोज की कंटूरिंग करने के बाद आप इसको मेकअप सेटिंग स्प्रे से सेट कर सकते हैं. दूसरा कंटूरिंग के बाद हैवी मेकअप चेहरे पर लगाना नहीं चाहिए. ऐसा करने से लुक पूरी तरह से खराब हो सकता है क्योंकि इसकी वजह से आपकी नोज मोटी दिखाई दे सकती हैं. इसके लिए आप आंखों पर लाइट मेकअप लगा सकते हैं. इस तरह का मेकअप पार्टी के लिए बेस्ट होता है. आईशैडो को लाइट रखना चाहिए ताकि आंखें ज्यादा हाईलाइट नहीं हो.

मोटी नाक को पतला दिखने के लिए सही मेकअप प्रोडक्ट चुने

कंटूर लाइन खींचने और ब्लेंड करने के लिए पतला और मुलायम ब्रश (आमतौर पर आईशैडो ब्लेंडिंग ब्रश या छोटा फ्लफी ब्रश) लें.

ब्यूटी ब्लेंडर का प्रयोग कंटूर और हाईलाइटर को प्राकृतिक रूप से ब्लेंड करने के लिए.

लूज पाउडर या कम्पैक्ट का यूज़ कंटूर करने के बाद मेकअप को सेट करने के लिए, किया जाता है खासकर औयली त्वचा पर.

Nose Makeup

Emotional Story: बनफूल- भोग की वस्तु बन गयी सुनयना

Emotional Story: अपने बारे में बताने में मुझे क्या आपत्ति हो सकती है? जेलर से आप के बारे में सुना है. 8-10 महिला कैदियों से मुलाकात कर उन के अनुभव आप जमा कर एक किताब प्रकाशित कर रहे हैं न? मैं चाहूं तो आप मेरा नाम पता गोपनीय भी रखेंगे, यही न? मुझे अपना असली नाम व पता बताने में कोई आपत्ति नहीं.

आप शायद सिगरेट पी कर आए हैं. उस की गंध यहां तक आ रही है. नो…नो…माफी किस बात की? मुझे इस की गंध से परहेज नहीं बल्कि मैं पसंद करती हूं. शंकर के पास भी यही गंध रचीबसी रहती थी.

अरे हां, मैं ने बताया ही नहीं कि शंकर कौन है? चलिए, आप को शुरू से अपनी रामकहानी सुनाती हूं. खुली किताब की तरह सबकुछ कहूंगी, तभी तो आप मुझे समझ सकेंगे. मेरे नाम से तो आप परिचित हैं ही सुनयना…जमाने में कई अपवाद…उसी तरह मेरा नाम भी…

बचपन में मेरे गुलाबी गालों पर मां चुंबनों की झड़ी लगा देतीं, मुझे भींच लेतीं. उन के उस प्यार के पीछे छिपे भय, चिंता से मैं तब कितनी अनजान थी.

सुनयना मुझे देख कर पलटती क्यों नहीं है? खिलौनों की तरफ क्यों नहीं देखती? हाथ बढ़ा कर किसी चीज को लेने के लिए क्यों नहीं लपकती? जैसे कई प्रश्न मां के मन में उठे होंगे, जिस का जवाब उन्हें डाक्टर से मिल गया होगा.

‘‘आप की बेटी जन्म से ही दृष्टिहीन है. इस का देख पाना असंभव है.’’

उस दिन मां के चुंबन में पहली वाली मिठास नहीं थीं. वह मिठास जाने कहां रह गई?

‘‘यह क्या हुआ कि बच्ची पेट में थी तो इस के पिता नहीं रहे. फिर इस के जन्म लेते ही इस की आंखे भी चली गईं,’’ यह कह कर मां फूटफूट कर रो पड़ी थीं.

बचपन से मैं देख नहीं पा रही हूं, ऐसा डाक्टर ने कहा था. देखना, मतलब क्या? मैं आज तक उन अनुभवों से वंचित हूं.

मुझे कभी कोई परेशानी आड़े नहीं आई. मां कमरे में हैं या नहीं, मैं जान सकती थी. किस तरफ हैं ये भी झट पहचान सकती थी. आप ही बताइए, मां से कोई शिशु अनजान रह सकता है भला? मैं घुटनों के बल मां के पास पहुंच जाती थी. बड़े होने पर मां ने कई बार मुझ से यह बात कही है. एक बार मां मुझे उठा कर बाहर घुमाने ले आई थीं. अनेक आवाजों को सुन मैं घबरा गई थी. मैं ने मां को कस कर पकड़ लिया था.

अरे, घबरा मत. कुत्ता भौंक रहा है. यह आटो जा रहा है. उस की आवाज है. वह सुन, सड़क पर बस का भोंपू बज रहा है. वहां पक्षियों की चहचहाहट…सुनो, चीक…चीक की आवाज…और कौवे की कांव…कांव…

तब से ध्वनि ने मेरे नेत्रों का स्थान ले लिया था.

चपक…चपक, मामाजी की चप्पल की आवाज. टन…टन घंटी की आवाज. टप…टप नल में पानी…

मेरी एक आंख ध्वनि तो दूसरी उंगलियों के पोर…स्पर्श से वस्तुओं की बनावट पहचानने लगी. अपनी मां को भी छू कर मैं देख पाती. उन के लंबे बाल, उन की भौंहें, उन का ललाट…उन की नाक उन की गरमगरम सांसें…मामाजी की मूंछों से भी उसी तरह परिचित थी. मैं  मामी के कदमों की आहट, उन के जोरजोर से बात करने के अंदाज से समझ जाती कि मामी पास में ही हैं. अक्षरों को भी मैं छू कर पहचान लेती.

मां मुझे रिकशे में बैठा कर स्कूल ले जातीं. स्कूल उत्साह व उमंग का स्थान, मेरे लिए ध्वनि स्थली थी. मैं खुश थी बेहद खुश…दृष्टिहीन को उस के न होने का एहसास आप कैसे दिला सकोगे कहिए?

एक दिन घर के आंगन में अजीब सी आवाजों का जमघट था. उन आवाजों को चीरते हुए मैं भीतर गई. पांव किसी से टकराया तो मैं गिर पड़ी. मैं एक शरीर के ऊपर गिरी थी. हाथ लगते ही पहचान गई.

‘‘मां…मां, आज क्यों कमरे के बीचोंबीच जमीन पर लेटी हैं? मैं आप पर गिर पड़ी. चोट तो नहीं लगी न मां?’’

घबराहट में मैं ने उन के चेहरे पर उंगलियां फेरी, उन का माथा, बंद पलकें, नाक पर वह गरम सांसें जो मैं महसूस करती थी आज न थीं. मेरी उंगलियां वहीं स्थिर हो गईं.

मां…मां. मैं ने उन के गालों को थपथपाया. कान पकड़ कर खींचे. पर मां की तरफ से कोई प्रत्युत्तर न पा कर मैं ने मामी को पुकारा.

मामी मुझे पकड़ कर झकझोरते हुए बोलीं, ‘‘अभागन, मां को भी गंवा

बैठी है.’’

मामाजी ने मुझे गले लगाया और फूटफूट कर रोने लगे.

मैं ने मामाजी से पूछा, ‘‘मां क्यों जमीन पर लेटी थीं? मां को क्या हुआ? उन का चेहरा ठंडा क्यों पड़ गया था? उठ कर उन्होंने मुझे गले क्यों नहीं लगाया?’’

मामाजी की रुलाई फूट पड़ी, ‘‘हे राम, मैं इसे क्या समझाऊं? बेटा, मां मर चुकी हैं.’’

मरना क्या होता है, मैं तब जानती

न थी.

दृष्टिहीन ही नहीं, शरीरविहीन हो कर किसी दूसरे लोक का भ्रमण ही मृत्यु कहलाता है, यह मुझे बाद में पला चला.

मैं करीब 12 साल की थी. मेरे शरीर के अंगों में बदलाव होने लगे.

मामी ने एक दिन तीखे स्वर में मामा से कहा, ‘‘वह अब छोटी बच्ची नहीं रही. आप उसे मत नहलाना.’’

मैं स्वयं नहाने लगी. अच्छा लगा. नया अनुभव, पानी का मेरे शरीर को स्पर्श कर पांव की तरफ बहना. उस की ठंडक मुझ में गुदगुदाहट भर देती.

एक दिन मैं कपड़े बदल रही थी. मामाजी के पांव की आहट…वे जल्दी में हैं, यह उन की सांसें बता रही थीं.

‘‘क्या बात है मामाजी?’’

वे मेरे सामने घुटनों के बल बैठे.

‘‘सुनयना,’’ उन की आवाज में घबराहट थी. कंपन था. उन्होंने मेरी छाती पर अपना मुंह टिकाया और मुझे भींच लिया. मेरी पीठ पर उन के हाथ फिर रहे थे. उंगलियों में कंपन था.

‘‘मामाजी क्या बात है?’’ उन के बालों को सहलाते हुए मैं ने पूछा. उन का स्पर्श मुझे भी द्रवित कर रहा था मानो चाशनी हो.

‘‘ओफ, कितनी खूबसूरत हो तुम,’’ कहते हुए उन्होंने मेरे होंठों को चूमा. उन्होंने अनेक बार पहले भी मुझे चूमा था पर न जाने क्यों उन के इस स्पर्श में एक आवेग था.

‘‘हाय…हाय,’’ मामी के चीखने की आवाज सुनाई दी. मामाजी छिटक कर मुझ से दूर हुए. मामी ने मुझे परे ढकेला.

‘‘कितने दिनों से यह सब चल रहा है?’’

‘‘पारो, चीखो मत, मुझे माफ करो. ऐसी हरकत दोबारा नहीं होगी.’’

मामा की आवाज क्यों कांप रही है? अब क्या हुआ जो माफी मांग रहे हैं? मेरी समझ में कुछ नहीं आया था.

‘‘चलो, मेरे साथ,’’ कहते हुए मामी मुझे खींच कर बाहर ले गईं. मुझे उसी दिन मदर मेरी गृह में भेज दिया गया.

खुला मैदान… हवादार कमरे, अकसर प्रार्थनाएं और गीत सुनाई पड़ते थे. फादर तो करुणा की कविता थे. स्नेह…स्नेह और स्नेह… इस के सिवा कुछ जानते ही नहीं थे. वे सिर पर उंगलियों का स्पर्श करते तो लगता फादर के  रूप में मुझे मेरी मां मिल गई हैं.

वहां के कर्म-चारी मेरे कमरे में आते तो कह उठते, ‘‘तुम कितनी खूब-सूरत हो,’’ मैं संकोच से घिर जाती थी.

आप भी शायद मुझे देख यही सोचते होंगे, है न? पर खूबरसूरती तो मेरे लिए आवाज, रोशनी व गहन अंधकार का पर्याय है. ध्वनि खूबसूरत वस्तु है पर सभी कहते हैं पहाड़, झरने, फूल, तितली, पेड़पौधे खूबसूरत होते हैं, उस का मुझे क्या अनुभव हो सकता है भला.

बिना देखे, बिना जाने मुझे खूबसूरत कहना क्या दर्शाता है? स्नेह को…है न?

जरा अपना हाथ तो बढ़ाइए. कस कर हाथ पकड़ने से क्या आप को महसूस नहीं होता कि हम दोनों अलगअलग नहीं एक ही हैं. कुछ प्रवाह सा मेरे शरीर से आप के भीतर व आप के शरीर से मेरे भीतर आता हुआ महसूस होता है न? मेरी आंखों से आंसू बहने लगते हैं. लगता है सांसें थम जाएंगी. देख रहे हैं न मेरी आवाज लड़खड़ा रही है? इस से खूबसूरत और कौन सी चीज हो सकती है मेरे लिए भला?

वहां के शांत और स्नेह भरे वातावरण में पलीबढ़ी मैं. कुछ लड़कियां मेरी खास सहेलियां बन गई थीं. वे अकसर कहतीं, ‘‘ओफ, तू बला की खूबसूरत है, तुम्हारी त्वचा चमकती रहती है, कितनी कोमल हो तुम. और होंठों के पास यह काले तिल…’’ वे सभी मुझे छूछू कर देखतीं और तृप्त होतीं.

मेरे पास कुछ है जो इन्हें संतुष्टि प्रदान कर रहा है, इस से बढ़ कर खुशी और क्या हो सकती है?

मैं जिसे अपनी उंगलियों से, ध्वनि, गंध से महसूस नहीं कर पा रही हूं वही दृष्टि नामक किसी चीज से ये जान लेते हैं, यह विचार मुझे तड़पा गया.

मैं ने अपनी तड़प का इजहार फादर से किया तो उन्होंने बड़े प्यार से मेरे बालों को सहलाते हुए समझाया, ‘‘माय चाइल्ड, जान लो कि दुनिया में रोशनी से बेहतर अंधेरा ही है. रोशनी में सब अलगथलग होते हैं, गोरी चमड़ी अलग नजर आएगी, इस की चमक अलग से दिखेगी, तिल की सुंदरता अलग, क्या इस में अहंकार नहीं? अंधेरे में सभी एकाकार हो जाते हैं. वहां चेहरा खूबसूरत, गोरी चमड़ी माने नहीं रखती. व्यक्ति का स्नेह ही सबकुछ होता है. सच्चा प्यार भी वैसा ही होता है सुनयना. वह खूबसूरत, चमकदमक का गुलाम नहीं होता. आंखों के होते हुए भी सच्चे प्रेम व प्रीत को लोग देख नहीं पाते, कितने अभागे होंगे वे? तुम्हारी दृष्टिहीनता कुदरत का दिया वरदान है.’’

माफ कीजिएगा, फादर के बारे में कहते समय मैं चाह कर भी अपने आंसू नहीं रोक पाती. उसी दिन समझ सकी स्नेह भेदरहित होता है और ये खुले हाथ बांटने की चीज हैं.

कालिज का आखिरी दिन था. फादर ने मुझे बुला भेजा.

‘‘सुनयना, इन से मिलो. मिस्टर शंकर…’’

शंकर का कद मुझ से अधिक है यह मैं उस की सांसों से पहचान गई. मेरे दोनों हाथों को पकड़ कर उस ने दबाया, उस दबाव में कुछ भिन्नता थी.

‘‘शंकर इलेक्ट्रानिक्स इंजीनियर है सुनयना, इस का बचपन गरीबी व तंगहाली में बीता था. अपनी मेहनत के बलबूते पर वह आज इस मुकाम पर पहुंचा है. उस ने अकसर तुम्हें देखा है. वह तुम्हें पसंद करता है, शादी करना चाहता है,’’ फादर ने बिना लागलपेट के पूरी बात साफसाफ कह दी.

शादी अर्थात शंकर मेरा जीवनसाथी बनेगा, जीवन भर मुझे सहारा देगा. मैं ने अभी तक स्नेह लुटाया है…शंकर का पहला स्पर्श कितनी ऊष्णता लिए हुए था. मुझे वह स्पर्श भा गया था.

मैं ने एकांत में शंकर से बातचीत करने की इच्छा जाहिर की. मुझे यह जानने की उत्सुकता थी कि इस ने मुझ दृष्टिहीन को क्यों अपनी जीवनसंगिनी चुना? शंकर की आवाज मधुरता लिए हुए थी. उस ने अपने जीवन का ध्येय बताया. खुद कष्टों को सहने के कारण किसी के काम आना, तकलीफ उठाने वालों की वह मदद करना चाहता था. मैं ने उसे छू कर देखने की इच्छा जाहिर की. उस ने मेरे हाथों को अपने चेहरे पर रख लिया.

शंकर का उन्नत ललाट, घनी भौंहें, लंबी नाक, घनी मूंछें और वे होंठ…मैं इन होंठों को चूम लूं?

शंकर ने मना कर दिया. कहने लगा, ‘‘सभी देख रहे हैं.’’

फादर से मैं ने अपनी सहमति प्रकट की. फादर ने अपनी तरफ से शंकर के बारे में जांचपड़ताल कर ली थी. ‘‘माई चाइल्ड, भले घर का बेटा है. तुम बहुत खुशकिस्मत हो,’’ उन्होंने कहा था.

हमारी शादी फादर के सामने हो गई.

‘‘शंकर, सुनयना बेहद भोली व नादान है. इसे संभालना. इस का ध्यान रखना,’’ फादर ने कहा, फिर मेरी तरफ मुड़ कर मेरे माथे को उन्होंने चूमा. मैं उन के कदमों पर गिर पड़ी. मां के बिछुड़ने पर जिस अवसाद से मैं अनजान थी, उस का अनुभव मुझे हो गया था.

शंकर के साथ मेरी जिंदगी सुचारु रूप से चल रही थी. सांझ ढले एक दिन मैं बिस्तर पर बैठी बुनाई कर रही थी. समीप पदध्वनि… यह शंकर नहीं कोई और है.

‘‘कौन है?’’ चेहरे को उस तरफ घुमा कर मैं ने पूछा.

‘‘सुनयना, मेरा मित्र है जय…जय आओ बैठो न.’’

जय बिस्तर पर मेरे पास आ कर बैठा. उस की सांसें तेजी से चल रही थीं.

‘‘सुनयना, जय का इस दुनिया में कोई नहीं है. मैं इसे अपने साथ ले आया हूं. कुछ समय तुम्हारे पास रहेगा तो अपने अकेलेपन को भूल जाएगा,’’ शंकर ने कहा और मेरा हाथ उठा कर उस के कंधे पर रखा.

मैं ने उस के कंधों को पकड़ा. तभी शंकर यह कह कर बाहर चला गया कि मैं एक जरूरी काम से जा रहा हूं.

जय के चेहरे को मैं ने अपने कंधे पर टिका लिया. उस ने मुझे सहलाया, प्यार पाने की कसक…अकेलेपन की वेदना. बेचारे इस जय का दुनिया में कोई नहीं, दुखी, पीडि़त, उपेक्षित है यह. मैं ने उसे गोदी में डाल सहलाया. कुत्ते व बिल्लियों को गोदी में डाल कर सहलाने में जो तृप्ति मुझे मिलती थी वही तृप्ति मुझे तब भी मिली थी. जय ने चुंबनों की झड़ी लगा दी.

जय कैसा दिखता होगा यह जानने की उत्सुकता हुई. मैं ने उस के चेहरे को सहलाया. होंठों को छूते समय मेरी उंगलियों को उस ने धीमे से काट लिया. मेरे उभारों पर उस के हाथ फिसलने लगे.

समीप आ कर उस ने मुझे कस कर भींच लिया. शादी होते ही शंकर ने भी मुझे ऐसे ही भींचा था न. वस्त्रविहीन शरीर पर उस ने हाथ फेरा था. कहा था कि स्नेह जाहिर करने का यह भी एक तरीका है. शायद शंकर की ही तरह जय भी है.

सिर से पांव तक एक विद्युत की लहर दौड़ पड़ी. क्या अजीब अनुभव था वह. वह भी मुझ में समा जाने के लिए बेकरार था.

शंकर के अलावा किसी और को मैं आज देख सकूंगी, यह विचार काफी रसदायक लगा.

अंधेरे में अहंकार नहीं होता. मैं का स्थान नहीं, सभी एकाकार हो जाते हैं. इन बातों को मैं ने केवल सुना था, अब इस का अनुभव भी प्राप्त हो गया. पहले शंकर से यह अनुभव मिला, अब जय से.

2 घंटे बाद शंकर लौटा.

‘‘मुझ से नाराज हो सुनयना?’’

‘‘नहीं तो, क्यों?’’

‘‘जय आ कर गया.’’

‘‘छी…छी…कैसी बातें करते हैं. मुझे संसार के सभी स्त्रीपुरुषों को देखने की इच्छा है. कितनी खुश हूं जानते हो, आज मैं ने जय को देखा…जाना.’’

फिर शंकर अकसर अपने नएनए मित्रों के साथ आने लगा. हर बार एक नए मित्र से मेरा परिचय होता.

‘तुम कितनी खूबसूरत हो,’ कह कर कुछ जनून भरा स्पर्श भी मैं ने महसूस किया. कुछ स्पर्श शरीर को चुभ जाते. कुत्ते या बिल्ली के साथ खेलते समय एकाध बार उस का पंजा या दांत चुभ ही जाता है न, उसी तरह का अनुभव हर एक बार एक नया अनुभव.

एक दिन मैं वैसा ही कुछ नया अनुभव प्राप्त कर रही थी तब वह घटना घटी. दरवाजे के उस तरफ जूतों की ध्वनि…दरवाजा खटखटाने की आवाज, ‘‘पुलिस,’’ दरवाजा खोलो.

‘‘राजू, जा कर दरवाजा खोलो न, पुलिस आई है,’’ मैं ने अंगरेजी में कहा. वह बंगाली था.

राजू गुस्से में मुझे परे ढकेल कर खड़ा हो गया. मैं ने ही जा कर दरवाजा खोला.

‘‘तुम शंकर की कीप हो न? तुम्हारा पति तुम्हें रख कर धंधा करता है, यह सूचना हमें मिली है. तुम्हें गिरफ्तार किया जाता है.’’

बाद में पता चला शंकर अपनी फैक्टरी का लाइसेंस पाने के लिए, अपने उत्पादों को बड़ीबड़ी कंपनियों में बेचने का आर्डर प्राप्त करने के लिए मेरा इस्तेमाल कर रहा था. लोगों की बातों से मैं ने जाना.

न जाने कौनकौन से सेक्शन मुझ पर लगे. मुझे दोषी करार दिया गया. शंकर ने अपनी गलती स्वीकार कर ली थी यह भी मुझे बाद में मालूम पड़ा.

‘‘भविष्य में सुधर कर इज्जत की जिंदगी बसर करोगी?’’ न्यायाधीश ने पूछा?

‘‘मुझे आजाद करोगे तो फिर से स्नेह को ही खोजूंगी,’’ मेरा उत्तर सुन न्यायाधीश ने अपना निर्णय स्थगित कर रखा है.

नहीं…नहीं जेल के भीतर मुझे कोई कष्ट नहीं. मैं यहां भी खुश हूं. अंधेरे में कहीं भी रहूं क्या फर्क पड़ता है या किसी के साथ भी रहूं क्या फर्क

पड़ता है?

बताइए तो आप मेरे बारे में क्या लिखने वाले हैं? आप का नाम? मैं तो भूल ही गई कुछ अनोखा नाम था आप का…हां, याद आया प्रजनेश…यस…कहिए आप की आवाज क्यों भर्रा रही है? आप की आंखों में आंसू?

प्लीज…मत रोइएगा. रोने के लिए थोड़ी न हम पैदा हुए हैं. आप के आंसुओं को रोकने के लिए मैं क्या करूं? आप को चूमूं?

Emotional Story

Short Hindi Story: कितनी रंजिश- मोनू को क्यों पाना चाहता था वह

Short Hindi Story: मेरा एक मित्र था गजलों का बड़ा शौकीन. हर जुमले पर वह झट से कोई शेर पढ़ देता या मुहावरा सुनाने लगता. मुझे कई बार हैरानी भी होती थी उस की हाजिरजवाबी पर. इतना बड़ा खजाना कहां सहेज रखा है, सोच कर हैरत होती थी. कभी किसी चीज को लेने की चाह व्यक्त करता तो अकसर कहने लगता, ‘‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी हर ख्वाहिश पे दम निकले…’’

‘‘ऐसी भी क्या ख्वाहिश पाल ली है यार, हर बात पर तुम्हारा प्रवचन मुझे पसंद नहीं,’’ मैं टोकता था.

‘‘चादर अनुसार पैर पसारो, बेटा.’’

‘‘कोई ताजमहल खरीदने की बात तो की नहीं मैं ने जो लगे हो भाषण देने. यही तो कह रहा हूं न, नया मोबाइल लेना है, मेरा मोबाइल पुराना हो गया है.’’

‘‘कहां तक दौड़ोगे इस दौड़ में. मोबाइल तो आजकल सुबह खरीदो, शाम तक पुराना हो जाता है. यह तो अंधीदौड़ है जो कभी खत्म नहीं हो सकती. पूर्णविराम या अर्धविराम तो हमें ही लगाना पड़ेगा न,’’ वह बोला.

उस की हाजिरजवाबी के आगे मेरे सार तर्क समाप्त हो जाते थे. बेहद संतोषी और ठंडी प्रकृति थी उस की. एक बार मेरी उस से कुछ अनबन सी हो गई. हमारे एक तीसरे मित्र की वजह से कोई गलतबयानी हुई जिस पर मुझे बुरा लगा. उस मामले में मैं ने कोई सफाई नहीं मांगी, न ही दी. बस, चुप रहा और उसी चुप्पी ने बात बिगाड़ दी.

आज बहुत अफसोस होता है अपनी इस आदत पर. कम से कम पूछता तो सही. उस ने कई बार कोशिश भी की थी मगर मेरा ही व्यवहार अडि़यल रहा जो उसे नकारता रहा. सहसा एक हादसे में वह संसार से ही विदा हो गया और मैं रह गया हक्काबक्का. यह क्या हो गया भला. ऐसा क्या हो गया जो वह चला ही गया. चला वह गया था और नाराज था मैं. रो नहीं पा रहा था. रोना आ ही नहीं रहा था. ऐसा बोध हो रहा था जैसे उसे नहीं मुझे जाना चाहिए था. आत्मग्लानि थी जिसे मैं समझ नहीं पा रहा था. जिंदा था वह और मैं नकारता रहा. और अब जब वह नहीं है तो कहां जाऊं मैं उसे मनाने. जिस रास्ते वह चला गया उस रास्ते का नामोनिशान है ही कहां जो पीछेपीछे जाऊं और उस की बात सुन, अपनी सुना पाऊं.

आज कल में बदल गया और जो कल चला गया वह कभी नहीं आता. गया वक्त बहुत कुछ सिखा गया मुझे. उन दिनों हम जवान थे, तब इतना तजरबा नहीं होता जो उम्र बीत जाने के बाद होता है. आज बालों में सफेदी छलकने लगी है और जिंदगी ने मुझे बहुतकुछ सिखा दिया है. सब से बड़ी बात यह है कि रंजिश हमारे जीवन से बड़ी कभी नहीं हो सकती. कोई नाराजगी, कोई रंजिश तब तक है जब तक हम हैं. हमारे बाद उस की क्या औकात. हमारी जिद क्या हमारी जिंदगी से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि उसे हम जिंदगी से ऊपर समझने लगें.

मन में आया मैल इतना बलवान कभी न हो कि रिश्ते और प्यारमुहब्बत ही उस के सामने गौण हो जाएं. प्रेम था मुझे अपने मित्र से, तभी तो उस का कहा मुझे बुरा लगा था न. किस संदर्भ में उस ने कहा था, जो भी कहा था, तीसरे इंसान ने उसे क्या समझा और मुझे क्या बना कर बताया होगा, कम से कम विषय की गहराई में तो मुझे ही जाना चाहिए था न. मेरा मित्र इतना भी बचकाना, इतना नादान तो नहीं था जो मेरे विषय में इतनी हलकी बात कर जाता जिस का मुझे बेहद अफसोस हुआ था. उसी अफसोस को मैं ने नाजायज नाराजगी का जामा पहना कर इतना खींचा कि मेरा प्रिय मित्र समय से भी आगे निकल गया और मेरे सफाई लेनेदेने का मौका हाथ से निकल गया.

हमारा जीवन इतना भी सस्ता नहीं है कि इसे बेकार, बचकानी बातों पर बरबादकर दिया जाए. रंजिश हो तो भी बात करने की गुंजाइश बंद कर देने की भला क्या जरूरत है. मिलो, कुछ कहो, कुछ सुनो, बात को समाप्त करो और आगे बढ़ो. गजल सम्राट मेहंदी हसन की गाई एक गजल मेरा मित्र बहुत गाया करता था-

‘‘रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ,

तू मुझ से खफा है तो जमाने के लिए आ,

आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ…’’

छोटेछोटे अहंकार, छोटेछोटे दंभ हमें कभीकभी उस रसातल पर ला कर पटक देते हैं जहां से ऊपर आने का कोई रास्ता ही नहीं होता. अगर हमें अपनी गलती का बोध हो जाए तो इतना अवश्य हो कि किसी और को समझा सकें. जिसे स्वयं भोग कर सीखा जाए उस से अच्छा तजरबा और क्या होगा. समझदार लोग अकसर समझाते हैं, या जान कर चलो या मान कर चलो.

जीवन पहले से ही फूलों की सेज नहीं है. हर किसी के मन पर कहीं न कहीं, कोई न कोई बोझ रहता है. जरा से बच्चे की भी कोई न कोई प्यारी सी, सलोनी सी समस्या होती है जिस से वह जूझता है. नन्हे, मेरा प्यारा पोता है. बड़ा उदास सा मेरे पास आया.

‘‘आज मोनू मेरे से बोला ही नहीं,’’ रोंआसा सा हो गया नन्हे.

‘‘तो आप बुला लेते बेटा. वैसे, बात क्या हुई थी? कोई झगड़ा हो गया था क्या?’’

‘‘उस ने मेरी कौपी पर लकीरें डाल दी थीं. मेरा इरेजर भी नीचे फेंक दिया. मेरी ड्राइंगशीट भी फाड़ दी.’’

‘‘वह तुम्हारा दोस्त है न. बैस्ट फ्रैंड है तो उस ने ऐसा क्यों किया. आप ने पूछा नहीं?’’

‘‘वह कहता है उस ने नहीं किया. वह तो लंचब्रैक में क्लास में आया ही नहीं था. झूले पर था.’’

‘‘और तुम कहां थे? तब तुम उस के साथ थे न?’’

‘‘हां, मैं उस के साथ था.’’

‘‘फिर तुम क्यों कहते हो? उसी ने सब किया है. तुम्हें किस ने बताया?’’

‘‘मुझे राशि ने बताया कि उस ने देखा था मोनू को मेरा बैग खोलते हुए.’’

‘‘राशि भी तुम्हारी फ्रैंड है, तुम्हारे साथ ही बैठती है.’’

‘‘नहीं, वह पीछे बैठती है. मोनू की उस से कट्टी है न, इसलिए मोनू उस से बोलता नहीं है,’’ नन्हे ने झट जवाब दिया.

सारा माजरा समझ गया था मैं. छोटेछोटे बच्चे भी कैसीकैसी चालें चल जाते हैं.

‘‘कल सुबह जब जाओगे न, मोनू को गले से लगा लेना, सौरी कह देना. झगड़ा खत्म हो जाएगा.’’

मेरे पोते नन्हे के चेहरे पर ऐसी मुसकान चली आई जिस में एक विश्वास था, एक प्यारा सा, मीठा सा भाव.

दूसरी दोपहर स्कूल से आते ही नन्हे झट से मेरे पास चला आया. ‘‘दादू, आज मोनू मेरे साथ बोला, हम ने खाना भी साथ खाया, झूला भी झूला. थैंक्यू दादू, आप ने मेरी समस्या हल कर दी. मैं ने मोनू को गले से भी लगाया, किस भी किया,’’ नन्हे ने खुश होते हुए बताया.

सारे संसार का सुख नन्हें की आंखों में था जिन में कल उदासी छाई थी. बच्चे का छोटा सा संसार उस का स्कूल, उस का मित्र और उस की मासूम सी चाह थी कि मोनू उस से बात करे. मोनू को नन्हे खोना नहीं चाहता था, वह उदास था. आज मोनू मिल गया तो उसे लग रहा है सारी कायनात की खुशी मोनू के मिलने से उसे मिल गई. मेरे चाचा मेरे अच्छे मित्र भी थे. उन्होंने समझाया था मुझे, कभी जीवन में एकतरफा फैसला न करो. फांसी पर चढ़ने वाले को भी कानून एक बार तो बोलने का अवसर देता है न. मैं अपने पोते नन्हे जैसा मासूम होता तो शायद चाचा का कहना मान लेता. बढ़ती उम्र शीशे से मन पर मैल के साथसाथ जिद भी ले आती है. धुंधले शीशे में कुछ भी साफ नहीं दिखता. क्यों जिद पर अड़ा रहा मैं और झूठा दंभ पालता रहा. आज सोचता हूं कि क्या मिला मुझे. हर पल कलेजे में एक फांस सी धंसी रहती है, बस.

Short Hindi Story

Drama Story: श्रीमतीजी जाएं मायके- पति की सजा या मजा

Drama Story: पति पत्नी में झगड़ा होता रहता है, परंतु यदि पत्नी रूठ कर मायके जा बैठे तो पति की क्या स्थिति होती है, जब हम ने इस पर विचार किया तो पाया कि 20-25 वर्ष पूर्व जो स्थिति थी वह आज नहीं है.

पहले लड़ाई का कारण बड़ा मासूम होता था जैसे हमें मिसेज शर्मा की साड़ी जैसी साड़ी चाहिए. यदि पति महोदय औफिस से डांट खा कर आए होते तो गुस्सा पत्नी पर निकलता, ‘‘चाहिए तो मंगा लो न अपने मायके से.’’

‘‘देखो मेरे मायके का नाम मत लेना,’’ और फिर वाकयुद्ध इतना बढ़ता कि श्रीमतीजी रूठ कर मायके जा बैठतीं और पति महोदय का वनवास शुरू हो जाता.

प्रात: दूध वाले से दूध ले कर फिर सो जाते. औफिस के लिए देर हो रही होती. उसी समय महरी आ धमकती. वह भी भद्दी, मैलीकुचैली सी. श्रीमतीजी ने छांट कर रखी ताकि उस की ओर देखने को भी मन न करे.

सो उसे वापस भेज स्वयं ही फ्रिज में कुछ पड़ा खा कर, बिना प्रैस किए कपड़े पहन कर, बिना पौलिश किए जूते पहन कर दफ्तर भागते. औफिस देर से जाने पर साहब से नजरें चुरानी पड़तीं.

दोपहर में सब अपनाअपना खाने का डब्बा खोलते तो विभिन्न प्रकार की

सब्जियों की महक भूख और बढ़ा देती. बेचारे पति महोदय कैंटीन की रूखी, फीकी थाली खाते हुए सोचते कि बेकार में श्रीमतीजी पर गुस्सा किया. उन्हें मायके जाने से रोक लेते तो ढंग का खाना तो मिलता.

घर पहुंच कर चाय बनाना चाहते तो वह फट जाती. ऐंटरटेनमैंट के नाम पर केवल दूरदर्शन. उस में कृषि दर्शन से मन बहलाते. खाने में सोचते खिचड़ी बना ली जाए. इस से अधिक की वे सोच भी नहीं सकते थे, क्योंकि मां और श्रीमतीजी ने कभी रसोई में जो घुसने नहीं दिया.

फिर क्या था. चावलदाल मिला कर कुकर में डाल दिए और पानी कम होने के कारण सेफ्टिवौल्व उड़ गया. बेचारे अब क्या करें? जनाब 3 तल्ले नीचे सीढि़यों से जाते और फिर स्कूटर को किक पर किक लगा बड़ी मुश्किल से स्टार्ट कर पास वाले ढाबे में जा कर छोलेभठूरे खाते. घर आ कर सोने लगते तो सुबह का भीगा तौलिया और कपड़े बिस्तर पर बिखरे मिलते. सब को किनारे रख कर सोने की कोशिश करते. उस समय श्रीमतीजी की बहुत याद आती. सोचते फोन कर लिया जाए पर तभी पुरुष अहं रोक देता कि वे गई हैं स्वयं और आएं भी स्वयं.

प्रात: कामवाली जल्दी आ गई. रसोई की हालत देख कर भड़क गई. जला कुकर देख कर तो और जलभुन गई.

बेचारे मिमियाते हुए उस से बोले, ‘‘वो न खिचड़ी जल गई थी,’’ मन ही मन सोच रहे थे कि अगर यह भाग गई तो झाड़ू, बरतन सब खुद करना पड़ेगा. नाश्ते के समय आलू के परांठे याद आते. सोचते कि क्या बुला लूं? पर फिर पुरुष अहं रोक देता.

उस दिन शाम को औफिस से घर लौटे तो तभी मिसेज शर्मा आ गईं, चीनी मांगने के बहाने यह टोह लेने की श्रीमतीजी कहां गईं और कब आएंगी.

बिना नाश्ता किए औफिस जाना, दूसरों का टिफिन देख ललचाना, होटल का खाना खाना, पेट खराब होना, दूरदर्शन और रेडियो पर किसी विशेष व्यक्ति की मृत्यु पर शोक मनाना, बिना प्रैस किए कपड़े और बिना पौलिश किए जूते पहन कर औफिस जाना और रात में विरह गीत रेडियो पर सुनना सब खलने लगा. मन लगाएं तो कहां?

औफिस में 1-2 महिलाएं हैं, जो शादीशुदा हैं. कहीं और जाएं तो किसी को पता चल जाए या फिर श्रीमतीजी को पता चल जाए तो समाज में क्या इज्जत रह जाएगी? बच्चों की भी याद आती. सब सहना कठिन होता.

सोचते मिसेज शर्मा का ‘भाभीजी कब आएंगी’, से आसान है मिसेज शर्मा की साड़ी जैसी साड़ी ले कर देना. 2 दिनों में अकल ठिकाने आ गई. श्रीमतीजी को लेने उन के मायके पहुंच गए. पहले की यानी पुराने जमाने की श्रीमतीजी भी विरह में आस लगाए बैठी होतीं कि कब संदेशा आए और वे वापस अपने श्रीमान के पास जाएं. सो हैप्पी ऐंडिंग.

आज के पति महोदय 33-34 वर्ष के एक बच्चे के पिता कैरियर की सीढि़यां चढ़ने में लगे हुए. अगर पत्नी मायके बैठ जाए तो? यह सौभाग्य तो किसी नसीब वाले को ही मिलता है. आजकल यदि मायका और ससुराल एक ही शहर में हैं तो महीने में एक बार श्रीमतीजी एक शाम के लिए मायके जाती ही हैं, क्योंकि वे भी काम करती हैं और साप्ताहिक छुट्टी में आउटिंग पर जाती हैं.

मायके की हर पल की खबर सोशल मीडिया पर मिलती रहती है और फिर फोन तो दिन भर होता ही रहता है तो फिर जाने की क्या आवश्यकता? हां, जब बच्चा छोटा था तो डेली उसे मायके छोड़ कर औफिस जाती थीं.

अब श्रीमतीजी के रूठ कर मायके जाने के फायदे देखिए. सुबहसुबह कोई अलार्म की तरह उठोउठो का राग नहीं अलापता. बच्चे को स्कूल बस तक छोड़ने को कोई नहीं कहता.

भीगा तौलिया बैड पर फेंकने पर कोई टोकने वाला नहीं. सुबहसुबह महकती स्टाइलिश कपड़ों में सजीसंवरी कामवाली को देख कर मन खिल जाता.

श्रीमती के सामने कनखियों से देख पाते थे अब खुली छूट. नाश्ता स्वयं बनाना आता है ब्रैडबटर, अंडाफ्राई और डिप वाली चाय. काम वाली तब तक घर साफ कर देती है. जनाब औफिस समय पर पहुंच जाते हैं.

मैडम मायके गई, सुन कर सब दोस्त जश्न मनाने लगते हैं, ‘‘तुम्हारे फोर्स्ड बैचलर होने की पार्टी तो बनती है.’’

औफिस की कुछ कुंआरियां, जिन की शादी की उम्र निकल रही होती है वे चांस लेने लगती हैं. घर का बना खाना औफर करने लगती हैं. आज के श्रीमान को फ्लर्ट करने का पूरा अवसर मिलता है. मजे ही मजे.

देर शाम तक औफिस में काम कर के घर 8 बजे पहुंचो या 9 बजे कोई कुछ कहने  वाला नहीं. रात का खाना किसी अच्छे रैस्टोरैंट में किसी लड़की मित्र के साथ खाओ या घर पर पिज्जा मंगा लो. विकल्प बहुत हैं. छुट्टी के दिन इंटरनैट से देख कर नईनई रैसिपीज बनाने का मजा ही अलग होता है.

आजकल श्रीमतियां (पत्नियां) समान अधिकार के कारण श्रीमान को भी किचन में हाथ बंटाने को कहती हैं. इसीलिए वे भी बहुत कुछ पकानाबनाना जानते हैं.

वाशिंग मशीन में कपड़े औटोमैटिक धुल जाते हैं. कुछ काम कामवाली से करा लिए जाते हैं. ऐंटरटेनमैंट की भी कमी नहीं. जो चाहो चैनल देखो टीवी में या फिर देर रात तक औफिस का काम करें लैपटौप पर अथवा स्मार्ट फोन में लगे रहें सोशल साइट्स पर सब अपनी मरजी से. कोई बैड पर सोने का इंतजार नहीं कर रहा. श्रीमतीजी घर में हैं या नहीं किसी पड़ोसी को इस से कोई मतलब नहीं.

बच्चों से रोज बात हो जाती है, पर श्रीमतीजी से नहीं. वे सोचतीं इतने दिन बीत गए कहीं कोई और तो नहीं ढूंढ़ ली और फिर अपने अधिकार से अपने घर अपने बच्चों के साथ लौट आती हैं तो सारे गिलेशिकवे दूर हो जाते हैं.

‘‘आप हमें छोड़ कर कभी मत जाना. हम तुम्हारे बिना नहीं रह सकते,’’ यह श्रीमानजी मुंह से तो कह देते हैं पर मन हीमन सोचते हैं श्रीमतीजी को कभीकभी मायके भी जाना चाहिए.

Drama Story

Romantic Story: अरेबियन दूल्हा- नसीबन और शकील के दिलों पर क्या बीती

Romantic Story: दीवान का भतीजा शकील 5-6 साल की उम्र से ही दीवान के साथ बंगले पर रोज हाजिरी देता. मैडम उसे कुछ अच्छा खाने के लिए या कभीकभी अठन्नी दे देती थीं जिस के लालच में वह अपने नन्हेमुन्हे हाथों से मैडम के पैर दबाने का काम बड़ी मुस्तैदी से करता था.

दीवान के जिम्मे फैक्टरी पर ड्यूटी देने के अलावा कई घरेलू काम भी थे जैसे मैडम के आदेश पर किसी महिला को बुलवाना या कोई सामान लाना आदि. जिस के बदले में वे दीवान को हर महीने फैक्टरी की तनख्वाह के अलावा 1 हजार रुपए किसी बहाने से पकड़ा देतीं. चूंकि वह मैडम का करीबी था इसलिए फैक्टरी के कर्मचारियों में उस की इज्जत थी. वह फैक्टरी के लोगों के छोटेमोटे काम साहब से करवाने में अकसर कामयाब हो जाता था.

दीवान के रास्ते पर चलतेचलते शकील भी जब 18 साल का हुआ तो मैडम ने खाली जगह पर उसे दिहाड़ी मजदूर के रूप में रखवा दिया. गांव वालों में वह भी अब हैसियत वाला माना जाने लगा. पहली वजह फैक्टरी में 2,500 रुपए का मुलाजिम, दूसरी, बड़े साहब के बंगले तक पहुंच. हर किसी को पक्का विश्वास था कि जल्द ही उसे पक्की नौकरी मिल जाएगी.

करीमन की इकलौती बेटी नसीबन 10वीं पास थी. 16 वसंत पार करतेकरते उस का झुकाव शकील की तरफ होने लगा. दोनों की जाति एक थी और उन में 2 साल का फर्क था. बिना कुछ लिएदिए काम चल जाए तो क्या हर्ज. उस की मां ने तो उसे उल्टे ढील दे रखी थी. हालांकि दीवान कभीकभी शकील को दिखावे के लिए डांटता.

नसीबन बड़ी समझदार थी. लड़के गांव में बहुत थे. झुकी तो सोचसमझ कर, हमउम्र, फैक्टरी का मुलाजिम, बचपन से मैडम का मुंहचढ़ा, गजब की कदकाठी. शकील का चौड़ा सीना…जब देखो, दिल सटने को चाहे. ताकत इतनी कि दीवान का एक बैल मर गया तो दूसरे का तब तक हल में साथ दिया जब तक कि उस ने दूसरा बैल खरीद न लिया. नसीबन को इस बात से कुछ लेना न था कि शकील सिर्फ चौथी तक पढ़ा है.

नसीबन के पिता कभी फरीदाबाद में राजमिस्त्री का काम कर के अच्छा पैसा कमा लेते थे. इकलौती बेटी को अच्छा पढ़ाते व पहनाते थे. फालिज की मार ऐसी पड़ी की वे चल बसे. आमदनी का जरिया जाता रहा तो मजबूर हो कर नसीबन की मां को खेतों में काम कर के गुजारा करना पड़ा.

एक दिन शकील के घर के सामने वाले आम के पेड़ से कईकई बार कूद कर भी नसीबन सिर्फ 2 कच्चे आम तोड़ पाई थी कि शकील ने उस की कलाई पकड़ कर कहा, ‘‘मांग के आम नहीं ले सकती थी. सिर्फ 2 आम के लिए अपनी प्यारीप्यारी टांगें तुड़वाती. ला, दबा दूं… चोट तो नहीं लगी.’’

नसीबन ने हाथ छुड़ाना जरूरी नहीं समझा. उसे शकील के पकड़ते ही करंट लग चुका था. फटी कमीज में यों ही नसीबन की जवानी फूट रही थी. धीरे से बोली, ‘‘टांगें दबानी हैं तो पहले निकाह पढ़.’’

उपयुक्त वातावरण देख कर शकील ने अंधेरे का फायदा उठा कर कहा, ‘‘आम क्या चीज है तू मेरी जान मांग के तो देख.’’

‘‘देख शकील, आगे न बढ़ना,’’ नसीबन के इतना कहते ही शकील ने पकड़ ढीली कर दी. फिर बोला, ‘‘किसी से कहना नहीं, मैं तेरे लिए आम लाता हूं. 2 मिनट चैन से यहीं बैठ कर दिल की बातें करेंगे,’’ उस के बाद शकील ने उसे गोद में लिटा कर एक आम खुद खाया और एक उसे अपने हाथ से खिलाया.

काफी देर दोनों अंधेरे में एकदूसरे में खोए रहे. वह शकील के बालों में उंगलियां फिराती बोली, ‘‘चचा से कहो न, मां से मेरा हाथ मांगें.’’

‘‘जल्दी क्या पड़ी है. देख, पहली पगार से तेरे लिए सोने की अंगूठी लाया हूं,’’ अंगूठी पहना कर शकील ने उस का गाल चूमा तो उस ने फटी कमीज की तरफ इशारा कर के कहा, ‘‘यहां.’’

शकील ने अपने होंठ उस के सीने के उभार पर रख दिए.

तभी नसीबन की मां की आवाज आई, ‘‘नसीबन? कहां है?’’

कपड़े ठीक कर के वह बोली, ‘‘मां, अभी आई.’’

सुबह बेटी की उंगली में सोने की अंगूठी देख कर मां बोलीं. ‘‘यह तुझे किस ने दी.’’

‘‘शकील ने,’’ खुश हो कर वह बोली.

‘‘4-5 हजार से कम की नहीं होगी. बेटी, लेकिन निकाह के पहले कमर के नीचे न छूने देना.’’

‘‘मां,’’ कह कर वह करीमन से लिपट गई.

शकील के प्रस्ताव पर दीवान ने भतीजे को समझा दिया कि वह करीमन से कहेगा कि वह बेटी की अभी कहीं जबान न दे. तुम्हारी पक्की नौकरी हो जाए. 1-2 कमरे बन जाएं तो निकाह पढ़वा लेंगे. शकील तब खुश हो गया.

दीवान ने अगले ही दिन करीमन से बात की, ‘‘करीमन, 4-6 महीने अपनी लौंडिया नहीं रोक सकती. शकील की पक्की नौकरी होने दे. 1-2 कमरे पक्के बनवा दूं. आखिर कहां रखेंगे. क्या शकील को घरदामाद बनाने का इरादा है और साफसाफ सुन ले, रात में बेटी को बगीचे में भेजेगी तो तू समझना, जवान लड़का है, मैं नहीं रोक पाऊंगा. कुछ ऊंचनीच हो गई तो, मुझे मत कहना.’’

‘‘दीवान भाई, मैं क्यों घरदामाद बनाती. मेरे बाद तो यह घर उसी का है. बात पक्की समझूं.’’

‘‘हां, पक्की.’’

एक बार किसी जरूरी काम से शकील को बुलाने के लिए मैडम  गाड़ी से खुद आई. गाड़ी की आवाज सुन कर नसीबन भी दरवाजे से बाहर निकल आई. शकील को मोटर की तरफ जाते देख कर नसीबन जोर से बोली, ‘‘शकील, सुन तो जरा, इधर आ.’’

वह गर्व से गरदन उठाए अपनी प्रेमिका के पास आया जैसे मोटर उसी की हो, ‘‘क्या है?’’

‘‘क्या मुझे भी अपने साहब का बंगला दिखाएगा?’’ नसीबन बोली.

‘‘आ चल,’’ इतना कह कर शकील ने बांह को इतने ऊपर से पकड़ा कि उस के हाथ नसीबन के वक्षों से छू गए.

‘‘हाथ छोड़, सीधा चल. मैं कोई अंधीलंगड़ी हूं.’’

‘‘मेम साहब, यह करीमन की बेटी नसीबन है. 10वीं पास है. कहने लगी तेरे साहब का बंगला देखूंगी तो साथ ले आया. मैडम ने मुसकराकर नसीबन के सिर पर हाथ रखा और बोली, ‘‘जा घुमा दे.’’

‘‘यह फ्रिज है,’’ खोल कर शकील ने उसे रसगुल्ला खिलाया और ठंडा पानी पिलाया.

‘‘यह ए.सी. है,’’ बैडरूम में ले गया. पलंग के गद्दे पर नसीबन बैठी तो धंस गई और कूद कर बोली, ‘‘शकील, तेरी मैडम तो रोज यहां धंस जाती होंगी.’’ नसीबन को बागबगीचा दिखा कर शकील वापस लाया तो मैडम ने उसे 500 रुपए कपड़े सिलवाने को दिए और बोलीं, ‘‘नसीबन भी खजूरी की?’’

‘‘जी मैडम, हम दोनों के घर पासपास हैं.’’

‘‘कभीकभी आ जाया कर,’’ मैडम बोलीं.

अब नसीबन का भी बंगले पर आनाजाना शुरू हो गया. मैडम के पांव दबाना और बाल सेट करना उस की खास ड्यूटी थी. उसे भी 1 हजार रुपए महीने के मिलने लगे थे. मां खुश थीं कि शकील ने बड़े घर की शरीफ औरत के पास काम दिला दिया, जहां किसी तरह का कोई खतरा न था.

साहब ने एक बार मैडम से कहा भी, ‘‘तुम अजीबअजीब हरकतें करती हो. यह आग और घी एकसाथ क्यों इकट्ठे कर लिए हैं?’’

‘‘शकील की हिम्मत है कि मेरी बिटिया की तरफ आंख भी उठा सके,’’ यह सच है कि सब पर मैडम का खौफ था.

एक दिन नसीबन ने लौन से गुलाब का फूल तोड़ लिया तो माली नातीराम ने डांटा, ‘‘मैडम, पता नहीं कहां से जंगली चिडि़या पकड़ लाई हैं.’’

नसीबन ड्राइंगरूम के सोफे पर बैठी तो नौकरानी ने हाथ पकड़ कर उठा दिया. मैडम के लिए तेल लगे हाथ से गाड़ी का दरवाजा खोला तो ड्राइवर ने डांटा, ‘‘हाथ धो कर गाड़ी छू.’’ वह कुछ ही दिन में बंगले के तौरतरीकों से वाकिफ हो गई.

मैडम की सख्त हिदायत थी कि उसे सूरज डूबने से पहले कार से रोज घर पहुंचवा दिया जाए और यह कि शकील को अगर जाना है तो साइकिल से जाए, साथ न बैठे.

वक्त गुजरता गया मैडम ने नसीबन को प्राइवेट इंटर और बी.ए. करवा कर कालोनी के प्राइमरी स्कूल में टीचर रखवा दिया. शकील की भी पक्की नौकरी हो गई. उसे ग्रेड भी मिलने लगा था. दोनों ही मैडम के कृतज्ञ थे और हमेशा की तरह उन की खिदमत में लगे रहते.

नसीबन पर जवानी क्या चढ़ी कि आईने के सामने अंगड़ाई लेते समय हाथ उठाते ही वह शर्मा जाती. उस का दिल चाहता कि वह शकील के पेड़ से आम चुराए और वह सजा के तौर पर उसे अपनी बाजुओं में भींच ले. शकील पढ़ालिखा न होने की वजह से हीनभावना में रहता और नसीबन से कटाकटा रहता.

मैडम ने बंगले पर रहने के लिए उसे अलग कमरा दिया था. बेचारा रातदिन मेहनत कर के खुद को नसीबन के योग्य बनाने की कोशिश करता उस ने भी हाई- स्कूल पास कर लिया था.

एक शाम मां ने यह कह कर नसीबन का चैन छीन लिया कि अरब से शमीम आया है. मुझ से भी मिलने यहां आया था. 50-60 हजार महीना कमाता है. तुझे देख कर मुझ से बोला कि नसीबन जवान हो गई है. जबरदस्ती 1 लाख की गड्डी आंचल में डाल गया और बोला 3 दिन में जाना है निकाह जल्दी पढ़वा दो.

‘‘मां, उन्हें शायद यह मालूम नहीं होगा कि हमारे ऊपर मैडम का हाथ है.’’

‘‘बेटी क्या हर्ज है. ऐश करेगी और यों भी ज्यादा उम्र के मर्द कम उम्र लड़कियों को सिर पर बिठाते हैं.’’

‘‘मां, साफ सुन लो, जितनी लड़कियां अरेबियन दूल्हों के साथ गईं, सब कैसे अपनी रात गुजारती हैं तुम्हें बताने की जरूरत नहीं. तुम उस के रुपए वापस कर दो वरना मैं जहर खा लूंगी. मैं शकील के अलावा किसी मर्द को अपना बदन नहीं छूने दूंगी. अगर तुम ने रुपए वापस नहीं किए तो मैं नोटों की इस गड्डी में आग लगा दूंगी.’’

मां समझ गईं कि बेटी के सिर पर शकील के इश्क का जनून सवार है. शमीम को 4 आदमियों के साथ तीसरे दिन उस ने नसीबन को ले जाने की इजाजत दे दी.

आधी पैंट और आधी शर्ट में शकील को अपने कमरे की ओर जाता देख कर नसीबन बोली, ‘‘शकील, मैडम से इजाजत ले कर अभी आती हूं. कुछ जरूरी बातें करनी हैं. प्लीज, कमरे ही में कुछ देर रहना.’’

‘‘आओ बेटी, बैठो,’’ मैडम बोलीं.

‘‘मैडम, गुस्ताखी माफ हो तो कुछ अर्ज करूं.’’ नसीबन बोली, ‘‘मैं बहुत सालों से आप के साथ हूं, आप मुझे अच्छी तरह जानती और मानती हैं. जब से मैं जवान हुई मुझे शकील से लगाव है. मेरी मां मुझ से 20 साल बड़े मर्द से, जो अरब में काम करता है, मेरी शादी के नाम पर 1 लाख रुपए ले चुकी हैं. जो लड़कियां इस तरह के लोगों से ब्याही गई हैं उन की हालत आप को मालूम है. मेरी मां रुपए देख कर अंधी हो गई हैं. मेरी जवानी का सौदा करना चाहती हैं. मेरी मदद कीजिए वरना मेरी जिंदगी खराब हो जाएगी. आप शकील के साथ मेरी शादी करवा दीजिए.’’

बेटी, अच्छा किया बता दिया. मैं खुद भी तुझ से यही कहना चाहती थी. हरगिज अरब की मुलाजमत देख कर शादी पर राजी न होना. ये लोग अकसर ऐयाश होते हैं. औरतों को इस्तेमाल कर के बेच देते हैं. यों भी 5-6 साल में लड़कियों की दिमागी और जिस्मानी हालत बदल जाती है. बेटी, मैं तेरी हर मुमकिन मदद करूंगी. जा तू खुल के शकील से बात कर ले.

अब नसीबन शकील के कमरे में गई और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. वह अभी भी फैक्टरी के कपड़ों  में उस के इंतजार में बैठा हुआ था.

वह पलंग पर उस से सट कर बैठ गई. अपना एक हाथ उस के हाथ पर रख कर बोली, ‘‘मैं जब से जवान हुई, तुम्हारे सिवा किसी मर्द का हाथ अपने बदन को नहीं लगने दिया. तुम्हारी ही मेहरबानी से यह दरवाजा देखा. मुझ से ख्ंिचेख्ंिचे क्यों रहते हो. आज भी मेरा दिल होता है कि तुम मेरे बाल खींचो, मुझे मारो, अपनी बांहों में कैद कर के मुझे सीने से सटाओ.’’

‘‘नसीबन, वह और वक्त था.’’ शकील बोला, ‘‘उस वक्त तुम्हें 2 आम दरकार थे, आज तुम पढ़ीलिखी हैसियतदार औरत हो. 50-60 हजार कमाने वाले अरेबियन दूल्हे का रिश्ता आ रहा है. सुना है शमीन तुम्हें लाखों के जेवर दे रहा है. 6,500 रुपए प्रतिमाह पाने वाला मैं कहां? क्या मैं तुम्हारी मां को रातोंरात दौलतमंद बनाने योग्य हूं.’’

‘‘शकील, आज मैं कल से ज्यादा गरीब हूं. अपना प्यार मुझे भीख में दे दो मैं तुम्हारे बगैर जिंदा नहीं रह सकती. पढ़ाईलिखाई अगर मेरेतुम्हारे बीच दीवार है तो मैं अपने प्रमाणपत्र अभी जलाने को तैयार हूं,’’ कह कर नसीबन उस के सीने पर सिर रख कर काफी देर तक रोती रही.

शकील ने उस के चेहरे को अपनी हथेलियों के बीच में ले कर पहली बार उस के होंठों को चूमा तो वह आंखें बंद कर के उस से लिपट गई और तेजतेज सांसें लेने लगी. शकील को पहली बार उस के बदन की गरमी का एहसास हुआ और उस के हाथ नसीबन के अंगों को आजाद करने में व्यस्त हो गए. नसीबन के सीने में मुंह धंसा कर शकील बोला कि तू मेरे दिल पर राज करेगी.

इस बीच नसीबन ने अपनेआप को पूरी तरह उसे सौंप दिया और जल्द ही नसीबन को यह एहसास हो गया कि क्यों औरत मर्द पर अपनी जान तक निछावर करने के लिए तैयार रहती है. शकील उस के लिए जो था वह वही जानती थी. वह सारी रात शकील को सीने से चिपटाए रही.

नसीबन के बालों में उंगलियां फिरा कर शकील बोला, ‘‘नसीबन, यह हम क्या कर बैठे.’’

वह मदहोश थी. गरदन में बाहें डाल कर बोली, ‘‘जानी, तौबा कर लेंगे और निकाह पढ़ लेंगे. मेरी जान, तू तो पूरा लोहा निकला. मुझे कहीं ले चल शकील जहां तू और मैं हों. मुझे सिर्फ तेरी नौकरी करनी है.’’

शारीरिक संबंध के बाद नसीबन को जाने शकील ने ऐसा क्या दे दिया, एक ही रात में वह उस की गुलाम और दीवानी हो गई.

‘‘मां, शमीम से मेरी शादी को साफ मना कर दो,’’ नसीबन बोली, ‘‘1 लाख रुपए शकील देने को तैयार है.’’

‘‘क्या कहीं डकैती डाल आया.’

‘‘उस ने कुछ भी किया हो पर कान खोल कर सुन लो मां, मैं रात भर शकील के साथ रह कर आ रही हूं.’’

मां बोलीं, ‘‘क्या शकील की जूठन शमीम 1 लाख रुपए में लेगा.’’

उत्तेजना के चलते नसीबन अपने आपे से बाहर थी. सामने किस से क्या बात कर रही थी उसे कुछ पता नहीं था. उस के दिमाग में 42 वर्षीय शमीम का थुलथुल शरीर घूम रहा था.

‘‘परसों निकाह है और आज गैर मर्द के साथ मुंह काला कर के आ रही है. किस बेशरमी से उस का बयान कर रही है. हाय, यह सब करने से पहले तू मर क्यों न गई?’’ मां बोली.

‘‘जिंदा रहने के लिए यह काम किया है,’’ नसीबन बोली.

‘‘आखिर तुम भी तो इसी काम के लिए 42 साल के अरबी दूल्हे से लाख रुपए लेने को मचल रही हो.’’

अब मां कुछ धीमी पड़ीं. ‘‘बेटा, और किसी को न बतलाना. चल डाक्टर को दिखा दूं. बेटी, मैं उसे राजी कर लूंगी. वह तुझे ले जाएगा.’’

‘‘और किसी अरब शेख को 10 लाख में बेच कर 9 लाख कमा लेगा फिर कोई दूसरी कुंआरी 2 लाख में खोजेगा जिस की मां घर पक्का कराने और लड़की को जेवर पहनाने की गरज से अरब के शेखों की खिदमत के लिए भेजने को तैयार हो जाएगी.’’

गुंडे जैसे 4-5 लोगों को साथ ले कर किराए की गाड़ी से शमीम आया. उन में से एक टोपी वाला काजी भी था. नसीबन ने शमीम को निकाह से पहले अंदर बुलाया और बोली, ‘‘आप मुझ से निकाह करने जा रहे हैं. मैं आप को धोखे में नहीं रखना चाहती. साफ कह दूं तो बेहतर है. मैं शकील के साथ रातभर सो चुकी हूं. अगर आप को यह गुमान हो कि आप का निकाह किसी कुंआरी लड़की से हो रहा है तो मेहरबानी कर के पैसा वापस ले सकते हैं.’’

‘‘बेगम आप कैसी बातें करती हैं,’’ उस ने बेहयायी से उस के गाल चूमे और जो होना था वही हुआ. नसीबन उस की दुलहन बनी मगर उस रात वह लाश की तरह पड़ी रही. उस का खयाल था कि लड़की की मां ने धोखा दिया. लड़की ठंडी है. यों शमीम भी उसे बीवी बनाने योग्य साबित न हो सका था.

शकील ने नसीबन से शादी का इरादा छोड़ दिया था. वह अपने काम में मगन था. कमरे में नसीबन की तसवीर लगी थी मगर उस ने उस पर परदा डाल दिया था. नसीबन से बहुत कम बात करता और मिसेज शमीम कह कर उस से मुखातिब होता.

नसीबन ने मां को सही हालात बतला दिए थे और यह कि अगले 6 महीने में पासपोर्ट बनाने की जिद होगी और वही हुआ. सबकुछ बताए अनुसार होता देख मां रास्ते पर आ गईं. मां की भी आंखें खुलीं, जब उन्हें सचाई पता चली.

‘‘बेटी, ‘खुला’ ले ले. जमीर भाई के 3 बेटे सऊदी में हैं. उन्होंने बताया कि शमीम के साथ दरभंगा की एक औरत भी रहती है. अरब शेख के बरतन धोने के लिए शौहर व 4 बच्चों को छोड़ कर आई थी. बाद में उस की रखैल बन गई. हुकूमत ने वीजा खत्म होने पर निकालना चाहा तो शमीम से निकाह पढ़ कर वहीं की हो ली.’’

शमीम के बारे में सबकुछ सुन कर नसीबन बोली, ‘‘तुम ने मुझे किस दलदल में फेंक दिया. मेरी और शकील दोनों की जिंदगी खराब कर दी. सच बतलाओ मां, मैं तुम्हारे पेट से हूं भी या नहीं.’’

मां के आंसू निकल पड़े. गले लगा कर बोली, ‘‘बेटी, माफ कर दे.’’

मां जी.एम. साहब के पास ‘तलाक’ दिलाने में मदद के लिए गई थीं. बेटी को कहा कि किसी तरह शकील को राजी कर ले.

नसीबन तड़प कर बोली, ‘‘मां तुम्हारी ख्वाहिश के लिए मेरी जवानी का सौदा हुआ था. अगर दोबारा शकील से शादी के लिए मुझे मजबूर किया गया तो मैं जहर खा लूंगी.’’

उसे रोज उदास देख कर साहब ने नसीबन के मना करने के बावजूद सऊदी अरब दूतावास के प्रथम सेके्रटरी से मुलाकात की और हालात बतला कर शमीम का सऊदी से देश निकाला करवा के ‘खुला’ लिखवाया. जिस पर सब से ज्यादा शकील खुश था. बंगले के खास लोगों को छिप कर उस ने मिठाई भी बांटी थी. नसीबन को घर जा कर दी तो वह बोली, ‘‘इतने दिनों बाद खुशीखुशी  लड्डू खिला रहे हो, किस बात के हैं? क्या कहीं शादी तय हो गई?’’

‘‘यों ही समझ लो.’’

उस ने लड्डू खा तो लिया मगर चेहरा उदास हो गया.

मांसिर पर हाथ फिरा कर कमरे से यह कह कर चली गईं, ‘‘शकील बेटा, रात का खाना खा कर जाना. बहुत दिनों के बाद आए हो.’’

‘‘बोलो न, आज बड़े खुश हो, कोई खास बात हो गई?’’ नसीबन ने उत्सुकता के चलते पूछा.

‘‘पहले एक लड्डू मेरे हाथ से खाने का वादा करो तो बताऊंगा.’’

नसीबन समझ तो गई मगर अनजान बन कर बोली, ‘‘बहुत खुश हो तो तुम्हारी खुशी में शरीक होना भी जरूरी है, आखिर जिंदगी के बेहतरीन क्षण तुम्हारे साथ ही तो गुजारे थे.’’

शकील एक हाथ से नसीबन के बालों में उंगलियां फिरा रहा था दूसरे से लड्डू खिला रहा था. नसीबन के आंसू जारी थे फिर भी उस के हाथ का लड्डू शौक से खा रही थी.

नसीबन को पलंग पर लिटा कर अपना सीना उस के सीने पर रख कर शकील बोला, ‘‘अच्छा, एक बात बतलाओ कि तुम्हारे साथ मेरी शादी हो गई होती और कोई डाकू तुम्हारी इज्जत जबरदस्ती लूट लेता तो क्या तुम मेरे योग्य न रहतीं?’’

वह उत्तर न दे सकी.

‘‘जान, खामोशी को रजामंदी समझूं और कल बरात ले कर आऊं.’’

नसीबन ने शकील के गले में बांहें डाल कर उसे सख्ती से भींच लिया. लिपट कर दिल से दिल मिला और सारे शिकवे- शिकायतें गायब.

‘‘मां, शकील का खाना.’’

यह आवाज नसीबन के मुंह से रात के 3 बजे निकली. वह अब भी उस के ऊपर लेटी, उसे प्यार भरी नजरों से देखे जा रही थी.

‘‘बेटी, 4 बार गरम कर चुकी हूं.’’

दोनों ने एकदूसरे को निवाले खिलाए. सुबह मसजिद के इमाम साहब ने निकाह पढ़ा दिया.

गांव के लोगों ने करीमन के दरवाजे पर जम कर बकरे के मांस की दावत की.

…रात हसीन थी.

‘‘अब हटो, मेरी हड्डीपसली तोड़ दी. कौन सी दुश्मनी निकाल रहे हो. सुबह हो गई, अब तो पीछा छोड़ो.’’

सुन कर शकील ने हटना चाहा तो नसीबन ने फिर उसे सीने से लिपटा लिया.

Romantic Story

Long Hindi Story: बड़ा चोर- प्रवेश ने कैसे जीता मां का दिल?

Long Hindi Story: मौल की सीढि़यां उतरते वक्त मैं बेहद थक गई थी. अंतिम सीढ़ी उतर कर खड़ेखड़े ही थोड़ा सुस्ताने लगी. तभी पीछे से एक मोटरसाइकिल तेजी से आई. उस पर पीछे बैठे नवयुवक ने झपट्टा मार कर एक झटके से मेरे गले से सोने की चेन तोड़ ली और पलक झपकते ही मोटरसाइकिल गायब हो गई.

मेरे मुंह से कोई बोल फूट पाते, इस से पहले ही एकदो प्रत्यक्षदर्शी ‘चोरचोर’ कहते मोटरसाइकिल के पीछे भागे पर 5 मिनट बाद ही मुंह लटकाए वापस लौट आए. चिडि़या उड़ चुकी थी. मेरे चारों ओर भीड़ जमा होने लगी. कोलाहल बढ़ता ही जा रहा था. थकान और घुटन के मारे मुझे चक्कर से आने लगे थे. इस से पहले कि मैं होश खो कर जमीन पर गिरती, 2 मजबूत बांहों ने मुझे थाम लिया.

‘‘हवा आने दीजिए आप लोग…पानी लाओ,’’ बेहोश होने से पहले मुझे ये ही शब्द सुनाई दिए. मैं ने पलकें झपकाते हुए जब फिर से आंखें खोलीं तो भीड़ छंट चुकी थी. एकदो लोग कानाफूसी करते खड़े थे. मैं मौल की अंतिम सीढ़ी पर लेटी थी और मेरा सिर एक युवक की गोद में था. हौलेहौले एक फाइल से वह मुझ पर हवा कर रहा था.

‘‘कैसी तबीयत है, मांजी?’’ उस ने पूछा.

‘‘मैं ठीक हूं,’’ कहते हुए मैं ने उठने का प्रयास किया तो उस ने सहारा दे कर मुझे बिठा दिया.

‘‘माताजी, चेन पहन कर मत निकला कीजिए. अब तो पुलिस में रिपोर्ट लिखाने से भी कुछ नहीं होना…वह तो शुक्र मनाइए कि चेन ही गई, गरदन बच गई…’’ आसपास खड़े लोग राय दे रहे थे. मेरे पास चुप रहने के सिवा कोई चारा न था, जबकि मन में आक्रोश फूटा पड़ रहा था. ‘यही है आज की जेनरेशन…देश का भविष्य. हट्टेकट्टे नौजवान बुजुर्गों का सहारा बनने के बजाय उन्हें लूट रहे हैं? भारतीय संस्कृति का मखौल उड़ा रहे हैं.’

‘‘कहां रहती हैं आप? मैं छोड़ देता हूं,’’ युवक अब तक खड़ा हो गया था.

‘‘यहीं मौल के पीछे वाली गली में.’’

‘‘बाइक पर बैठ जाइए आप? मुझे पीछे से मजबूती से पकड़ लीजिएगा.’’

मैं ने कहना तो चाहा कि मैं पैदल चली जाऊंगी पर चंद कदमों का फासला मीलों का सफर लगने लगा था. इसलिए मैं ने उस युवक की बात मान लेने में ही भलाई समझी. बाइक चली तो ठंडी हवा के झोंके से तबीयत और भी संभल गई. पुराने दिनों की यादें ताजा हो उठीं जब रीना और लीना को ले कर उन के पापा के संग स्कूटर पर पिक्चर देखने और खरीदारी करने जाती थी. रीना आगे खड़ी हो जाती थी और लीना मेरी गोद में. स्कूटर के स्पीड पकड़ते ही संयुक्त परिवार की सारी जिम्मेदारियां, चिंताएं पीछे छूट जाती थीं और खुली हवा में मन एकदम हल्का हो जाता था. कभीकभी तो बिना किसी विशेष काम के ही मैं दोनों बच्चियों को लाद कर इन के संग निकल पड़ती थी. जिंदगी की उन छोटीछोटी खुशियों का मोल अब समझ में आता है.

‘‘बस, यहीं नीले गेट के बाहर,’’ मिनटों का फासला सैकंडों में ही तय हो गया था.

‘‘अरे, यहां तो ताला लगा है?’’ युवक ने चौंक कर पूछा.

मैं ने हंसते हुए चाबी निकाल ली. चेन जाने का गम काफी हद तक अब कम हो गया था.

‘‘वह इसलिए कि मैं अकेली ही रहती हूं. आओ, अंदर आओ,’’ ताला खोल कर मैं उसे अंदर ले गई. फ्रिज से पानी की बोतल निकाली. खुद भी पिया और उसे भी पिलाया. युवक बैठक में सजी तसवीरें देख रहा था, ‘‘ये मेरे पति हैं, जो अब नहीं रहे. और ये दोनों बेटियां और उन का परिवार. दोनों यूरोप में सैटल हैं. 2 बार मुझे भी वहां ले जा चुकी हैं पर मैं महीने भर से ज्यादा वहां नहीं रह पाती.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘बस, ऐसे ही…मन ही नहीं लगता. दामाद मां जैसा ही स्नेह और सम्मान देते हैं, पर मेरा मन तो यहां इंडिया में ही अटका रहता है. पता नहीं ये मेरे अंदर छिपे दकियानूसी भारतीय संस्कार हैं या कुछ और…वैसे यहां मेरा वक्त बहुत अच्छे से गुजर जाता है. पूजापाठ, आसपास की औरतों, बहूबेटियों से गपशप…कभी वे आ जाती हैं, कभी मुझे बुला लेती हैं… लो, मैं भी क्या अपनी ही गाथा ले कर बैठ गई. चाय पिओगे या शरबत?’’

‘‘बस, कुछ नहीं. अस्पताल जा रहा…’’

‘‘अस्पताल क्यों? कोई बीमार है?’’ मैं बीच में ही बोल पड़ी.

‘‘अरे, नहीं. मैं डाक्टर हूं. ड्यूटी पर जा रहा था. यहां से तीसरी गली में नालंदा स्कूल के पास रहता हूं. कभी फुरसत में आऊंगा आप की चाय पीने.’’

‘‘अच्छा बेटा, मदद के लिए बहुतबहुत धन्यवाद.’’

‘‘क्या मांजी, आप भी बेटा कहती हैं और धन्यवाद देती हैं,’’ वह मुसकराया और किक लगा कर चलता बना.

अंदर आ कर चाय के कप समेटते मुझे खयाल आया कि मैं ने उस का नाम तो पूछा ही नहीं. अजीब भुलक्कड़ हूं. अपनी सारी रामायण बांच दी और भले आदमी का नाम तक नहीं पूछा. इसीलिए तो रीना व लीना को हमेशा मेरी चिंता लगी रहती है. मैं अपने ही खयालों की दुनिया में खोई सोचने लगी, ‘मां, आप बहुत सीधी और सरल हैं. ठीक है, आसपड़ोस अच्छा है, रिश्तेदार भी संभालते रहते हैं. पर आप हमारे पास आ कर रह जाएं तो हम निश्ंिचत हो जाएं.’

‘मैं यहां बहुत खुश और मजे से हूं मेरी बच्चियों. मुझे अपनी जड़ों से मत उखाड़ो वरना मैं मुरझा जाऊंगी. जब तुम मेरी उम्र की होओगी तभी मेरी भावनाओं को समझ पाओगी,’’ दोनों बेचारी मायूसी में विदा हो जातीं.

दोनों दामादों के साथ दोनों बेटियां भी अच्छी नौकरी में हैं. किसी चीज की कमी नहीं है. मैं जब भी कुछ देना चाहती हूं, वे नम्रता से अस्वीकार कर देते हैं. बस, नातीनातिनों को ही दे कर मन को संतुष्ट कर लेती हूं. पिछली बार जब दोनों आईं तो मैं बैंक से अपने सारे गहने निकाल लाई.

‘तुम दोनों ये बराबरबराबर बांट लो. मुझ पके आम का क्या भरोसा? कब टपक जाऊं?’ दोनों ने पिटारी समेटी और फिर से मेरी झोली में रख दी.

‘हमारे तो शादी वाले गहने भी यहां इंडिया में ही पड़े हैं, मां. वहां इन सब का कोई काम नहीं है आप ही इन्हें बदलबदल कर पहना करें. थोड़ी हवा तो लगेगी इन्हें.’ मेरी पिटारी ज्यों की त्यों वापस लौकर में पहुंचा दी गई थी. दोनों दामाद भी मेरी बराबर परवा करते थे. अभी कल ही छोटे दामाद ने याद दिलाया था, ‘मम्मी, आप के रुटीन चैकअप का वक्त हो गया है. कल करवा आइएगा. मलिक को बोल दिया है न?’ मलिक हमारा विश्वासपात्र आटो वाला है. कभी भी, कहीं भी फोन कर के बुला लो, मिनटों में हाजिर हो जाएगा. यही नहीं, पूरे वक्त बराबर साथ भी बना रहेगा. घर का ताला खोल कर, सामान सहित अंदर पहुंचा कर ही वह लौटेगा.

अगले दिन वह वक्त पर आ गया था लेकिन ड्यूटी पर डाक्टर नदारद था. मुझे बैंच पर बैठा कर वह डाक्टर का पता करने गया. तभी सफेद कोट पहने, गले में स्टेथेस्कोप लटकाए वही युवक मुझे नजर आ गया.

‘‘अरे, मांजी? आप यहां? सब ठीक तो है?’’

‘‘हां, रुटीन चैकअप के लिए आई थी. लेकिन डाक्टर सीट पर नहीं है.’’

‘‘कौन? खुरानाजी? वे तो आज छुट्टी पर हैं. दिखाइए, कौनकौन से टैस्ट, चैकअप आदि हैं?’’

वह कुछ देर परची पढ़ता रहा था, ‘‘हूं, इन में से 2 तो मैं ही कर दूंगा और बाकी भी करवा दूंगा. चलिए, आप मेरे साथ…’’

तभी मलिक भी डाक्टर के छुट्टी पर होने की खबर ले कर लौट आया था. मैं ने मलिक को पूरी बात बताई और बोली, ‘‘बेटे, तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘प्रवेश शर्मा.’’

‘‘तो प्रवेश, इसे कितनी देर बाद बुलाऊं?’’

‘‘आप इसे रवाना कर दीजिए. टैस्ट होने तक लंच टाइम हो जाएगा. मैं घर जाऊंगा तो आप को भी छोड़ दूंगा.’’

घर लौट कर खाना खा कर मैं लेटी तो देर तक प्रवेश के ही बारे में सोचती रही. ‘कितना अच्छा लड़का है. दिल का जितना अच्छा है, उतना ही प्रोफेशनली साउंड भी है. पूरे वक्त मांजीमांजी ही पुकारता रहा. अस्पताल में तो सब मुझे उस की सगी मां ही समझ कर ट्रीट कर रहे थे…पर अब तक भी मैं ने उस के घरपरिवार के बारे में नहीं पूछा. शादीशुदा तो क्या होगा, कुंआरा ही लगता है. चलो, कल उस के घर हो कर आती हूं. पता बताया तो था उस ने.’

अगले दिन ही मैं ढूंढ़तेढूंढ़ते उस के घर पहुंच गई. वह अस्पताल से लौटा ही था.

‘‘अरे, मांजी आप? मैं तो अभी आप के पास ही आ रहा था. ये आप की 2 रिपोर्टें तो आ गई हैं. ठीक हैं. एक कल आएगी, मैं पहुंचा दूंगा. आप बैठिए न,’’ उस ने कुरसी पर फैले कपड़े समेटते हुए जगह बनाई.

‘‘अकेला हूं तो घर ऐसे ही फैला रहता है.’’

‘‘क्यों? घर वाले कहां गए?’’

‘‘मम्मीपापा और बड़े भैया, बस ये 3 ही लोग हैं परिवार के नाम पर. बड़े भैया एक दुस्साध्य बीमारी से पीडि़त हैं. मेडिकल टर्म में आप समझ नहीं पाएंगी. साधारण भाषा में अपने दैनिक कार्यों के लिए भी वे मम्मीपापा पर आश्रित हैं. पापा रिटायर हो चुके हैं. बड़ी उम्मीदों से वे मकान बेच कर, पैसा जुटा कर भैया को इलाज के लिए विदेश ले गए हैं. वे तो चाहते हैं कि मैं भी वहीं सैटल हो जाऊं. जितना पैसा मैं वहां कमा सकता हूं उतना यहां जिंदगी भर नहीं कमा पाऊंगा, लेकिन मैं अपनी प्रतिभा का लाभ अपने ही देश के लिए करना चाहता हूं. जहां पैदा हुआ, पलाबढ़ा, शिक्षा पाई, उसे जब कुछ देने का वक्त आया तो छोड़ कर चला जाऊं?…पर मांबाप और बड़े भैया के प्रति भी मेरा कर्तव्य बनता है. मैं यहां एक किराए के कमरे में गुजारा कर रहा हूं. अस्पताल के अलावा प्राइवेट क्लीनिक में भी काम कर के पैसा जुटाता हूं और उन्हें भेजता हूं. मैं किसी पर कोई एहसान नहीं कर रहा. बस, देश और बड़ों के प्रति अपना फर्ज पूरा कर रहा हूं.’’

प्रवेश ने मेरा विश्वास जीत लिया था. यदि मेरे कोई बेटा होता तो निश्चित रूप से प्रवेश जैसा ही होता. वही सोचने का अंदाज, वही संस्कार मानो मुझ से घुट्टी पी कर बड़ा हुआ हो. मैं अकसर कुछ न कुछ खास बना कर उसे फोन कर देती. उस के उधड़े कपड़े मरम्मत कर देती. कभी जा कर उस का कमरा ठीक कर आती. वह भी बेटे की तरह मेरा खयाल रखता था. मेरे बुखार में वह पूरी रात मेरे सिरहाने बैठा पानी की पट्टियां बदलता रहा. 2-3 दिन प्रवेश नहीं आया तो मैं व्याकुल हो गई. खीर बना कर मैं ने उसे फोन किया. फोन उस के दोस्त सकल ने उठाया. उस ने बताया कि प्रवेश आपरेशन थियेटर में है.

‘‘वह काफी दिनों से आया नहीं, उस की तबीयत तो ठीक है?’’ मैं अपनी व्यग्रता छिपा नहीं पा रही थी.

‘‘हां, ठीक ही है. वह तो मोना वाले कांड को ले कर अपसेट चल रहा है.’’

‘‘मोना? कौन मोना?’’

‘‘उस ने आप को बताया नहीं? मुझ से तो कह रहा था हम एकदूसरे से सब बातें शेयर करते हैं. तो फिर रहने दीजिए. वह मुझ पर गुस्सा होगा.’’

‘‘नहीं, तुम्हें मेरी कसम. मुझे पूरी बात बताओ.’’

‘‘मोना हमारे बौस की बेटी है. बौस उस की शादी प्रवेश से कर के प्रवेश को आगे की पढ़ाई के लिए विदेश भेजना चाहते हैं. पर वह अपने आदर्शों पर अड़ा है. न तो वह मोना जैसी आधुनिका से शादी के लिए तैयार है और न विदेश में बसने के लिए.’’

‘‘फिर…’’ मेरी सांस अटकने लगी थी.

‘‘बौस ने उसे किसी बिगड़े हुए केस में फंसा दिया. एकाध दिन में उस के सस्पैंशन के आर्डर आने वाले हैं. हम लोग तो समझा रहे हैं कि बदनाम होने से अच्छा है पहले ही रिजाइन कर दो और अपना एक छोटा सा नर्सिंगहोम खोल लो.’’

‘‘सही है,’’ मैं सकल की बातों से सहमत थी.

‘‘पर आंटी, पैसे की समस्या है. प्रवेश जैसा खुद्दार लड़का किसी के आगे हाथ भी तो नहीं फैलाएगा.’’

‘‘अच्छा, उसे शाम को घर भेज देना. मैं ने उस के लिए खीर बनाई है.’’

शाम को उदास चेहरे और पपड़ाए होंठों के साथ प्रवेश कमरे में प्रविष्ट हुआ तो मैं समझ गई, वह रिजाइन कर के आ रहा है. मैं ने उस के हाथमुंह धुलाए और खीर की कटोरी पेश कर दी. वह चुपचाप खाने लगा. मुझे उस पर बेहद लाड़ आ रहा था. उस के बालों में उंगलियां फिराते हुए मैं ने कहा, ‘‘तुम रिजाइन कर आए?’’

‘‘हूं…आप को किस ने बताया?’’ वह बेतरह चौंक उठा.

‘‘परेशान होने की जरूरत नहीं है. अपनी इतनी बड़ी परेशानी तुम ने मुझ से, अपनी मां से छिपाई? तुम अपना नर्सिंगहोम खोलो. पैसा मैं दूंगी. कैश कम होगा तो गहने दूंगी.’’

‘‘नहीं, मांजी, नहीं मैं आप से पैसे…’’

‘‘क्यों? क्या मुझे अपनी मां नहीं मानते? यह मांजीमांजी की पुकार ढोंग है? वह रातरात भर पलक झपकाए बिना मेरे सिरहाने बैठना, दवाइयां लाना, देना, बुखार नापना दलिया खिलाना…’’

‘‘पर मैं यह सब…कैसे चुका पाऊंगा?’’

‘‘चुकाने की जरूरत भी नहीं…’’

‘‘नहींनहीं, फिर मैं यह सब नहीं लूंगा.’’

‘‘अच्छा, उधार समझ कर ले लो. धीरेधीरे चुकता कर देना. तुम जैसा खुद्दार आदमी कभी नहीं झुकेगा, मुझे मालूम था. मैं कल ही बैंक से सारा रुपया निकलवाती हूं. अब मुसकराओ और एक कटोरी खीर और लो.’’

अगले दिन प्रसन्नचित्त मन से बैंक से गहनों की पिटारी और ढेर सारा कैश ले कर मैं बाहर निकली. प्रवेश आएगा तो कितना खुश होगा. अगले ही पल मुझे खयाल आया, प्रवेश तो रिजाइन कर चुका है. फिर तो वह घर पर ही होगा. मैं ने मलिक से आटो उधर मोड़ने को कहा. दरवाजा खुला था. बैग लिए दरवाजे के समीप पहुंचते ही मेरे कदम ठिठक गए. प्रवेश और सकल का वार्तालाप साफ सुनाई दे रहा था :

‘क्या फांसा है तू ने बुढि़या को, कल सारा पैसा, गहने ले कर तू विदेश रफूचक्कर हो जाएगा और वहां माइकल के साथ नर्सिंगहोम की पार्टनरशिप में करोड़ों कमाएगा. क्याक्या कहानियां गढ़ी और कैसेकैसे नाटक किए तुम ने बुढि़या को इमोशनली ब्लैकमेल करने के लिए. मेरे लिए भी कोई ऐसी बुढि़या फांस दे तो मैं भी वहां आ कर तुझे ज्वाइन कर लूं. आखिर तुम्हारे कहे अनुसार मोना वाली कहानी सुना कर मैं ने भी तुम्हारी हैल्प की है.’

‘श्योर, श्योर व्हाइ नौट,’ प्रवेश की खुशी में डूबी लड़खड़ाती आवाज उभरी. शायद उस ने पी रखी थी, ‘वैसे यही मुरगी क्या बुरी है? मेरे भाग जाने के बाद तुम इस के आंसू पोंछना. मुझे खूब गालियां देना कि वह तो भेड़ की खाल में भेडि़या निकला…बुढि़या के पास खजाना है. बेटियों के भी गहने रखे हैं. बहुत जल्दी भावनाओं में बह जाती है. तुझे थोड़ा वक्त लग सकता है, क्योंकि दूध का जला छाछ को भी फूंकफूंक कर पीता है…’ दोनों का सम्मिलित ठहाका मेरे कानों को बरछी की तरह बींध गया. मेरे कदम जो मुड़े तो फिर आटो तक आ कर ही रुके.

‘‘मलिक, वापस बैंक चलो,’’ बैग को मजबूती से थामे हुए मैं ने दृढ़ता से कहा. मेरा सबकुछ लुटतेलुटते बालबाल बच गया था. मुझे खूब खुश होना चाहिए था लेकिन मेरी आंखों से निशब्द अनवरत आंसू टपक रहे थे. इतना दुख तो मुझे सोने की चेन छिन जाने पर भी नहीं हुआ था.

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