जब बाल झड़ने लगें

शादी की पहली रात. कमरा रंगबिरंगे फूलों से सजा मंदमंद खुशबू से महक रहा था. दुलहन के जोडे़ में बैठी नेहा काफी डरीसहमी सी थी क्योंकि जिस राज को उस ने अब तक अपने होने वाले पति से छिपाए रखा था आज वह खुल जाएगा तो क्या होगा? कहीं शादी की पहली रात ही उस की जिंदगी में तूफान न ला दे. यह राज और कुछ नहीं नेहा का गंजा सिर था जिसे अब तक उस ने विग से छिपा रखा था. अब क्या होगा?

गंजापन को ऐलोपेसिया भी कहते हैं. जब असामान्य रूप से बहुत तेजी से बाल ?ाड़ने लगते हैं तो नए बाल उतनी तेजी से नहीं उग पाते या फिर वे पहले के बालों से अधिक पतले या कमजोर उगते हैं और उन का कम होना शुरू हो जाता है.

ऐसी हालत में बालों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए क्योंकि स्थिति गंजेपन की ओर जाती है. अपोलो हौस्पिटल के सीनियर कंसल्टैंट (प्लास्टिक कौस्मैटिक ऐंड रिकंस्ट्राक्टिव सर्जरी) डाक्टर कुलदीप सिंह के अनुसार, गंजेपन के प्रकार ये हैं-

ऐंड्रोजेनिक ऐलोपेसिया- यह स्थाई किस्म का गंजापन है और एक खास ढंग से खोपड़ी पर उभरता है. इस किस्म के गंजेपन के लिए मुख्यतया टेस्टेस्टेरौन नामक हारमोन संबंधी बदलाव और आनुवंशिकता जिम्मेदार होती है.

यह महिलाओं से ज्यादा पुरुषों में होता है. यह कनपटी और सिर के ऊपरी हिस्से से शुरू हो कर पीछे की ओर बढ़ता है और यह जवानी के बाद किसी भी उम्र में शुरू हो सकता है और व्यक्ति को पूरी तरह या आंशिक रूप से गंजा कर सकता है.

ऐलोपेसिया ऐरीटा: इस में सिर के अलगअलग हिस्सों में जहांतहां के बाल गिर जाते हैं, जिस से सिर पर गंजेपन का पैच लगा सा दिखता है. यह स्थिति शरीर की रोग प्रतिरोधी शक्ति कम होने के कारण होती है.

टैक्शन ऐलोपेसिया: यह लंबे समय तक बालों को एक ही स्टाइल में बांधने के कारण होता है लेकिन हेयरस्टाइल बदल देने से बालों का ?ाड़ना रुक जाता है.

हारमोन परिवर्तन से: यह किसी खास चिकित्सीय कारण जैसे कैंसर कीमोथेरैपी, अत्यधिक विटामिन ए के प्रयोग से, इमोशनल या फिजिकल स्ट्रैस की वजह से या गंभीर रूप से बीमार पड़ने या फिर बुखार होने की वजह से होता है.

महिलाओं में गंजेपन के कारण: आजकल स्ट्रैस भरे समय, गलत खानपान के कारण कम उम्र में बाल झड़ने व गंजेपन की समस्या आम हो गईर् है. महिलाओं में एकदम से कभी गंजापन नहीं होता है. पहले उन के बाल झड़ते हैं, पतले होते हैं और बाद में गंजापन होता है. एक बार बाल झड़ने शुरू हो जाते हैं, तो उन्हें रोकना मुश्किल होता है.

एक अध्ययन के मुताबिक हर बाल एक छेद पर उगता है. उसे फौलीसाइल कहते हैं जैसेजैसे फोलीसाइल सिकुड़ते हैं तो बाल झड़ते हैं और वहां गंजापन हो जाता है.

गंजेपन की शुरुआत

पुरुषों में गंजेपन की शुरुआत कनपटी से होती है तो महिलाओं में गंजेपन की शुरुआत बीच की मांग से होती है.

समय से पहले झड़ते बाल: बालों के समय से पहले ही एक अन्य आनुवंशिक समस्या को ऐंड्रोजेनिक ऐलोपेसिया कहा जाता है. जिसे आमतौर पर पैटर्न बाल्डनैस के रूप में जाना जाता है. महिलाओं और पुरुषों दोनों में ही बाल गिरने का यह सामान्य रूप है. लेकिन गंजेपन की शुरुआत होने का समय और पैटर्न लिंग के अनुसार अलगअलग होता है.

पुरुषों के झड़ते बाल: पुरुषों में बाल गिरने की समस्या किशोरावस्था से ही हो जाती है और इस समस्या को सामान्य रूप से मेल पैटर्न बाल्डनैस के नाम से जाना जाता है. इस में हेयर लाइन पीछे हटती है और ऊपरी हिस्सा साफ हो जाता है.

महिलाओं के झड़ते बाल: महिलाओं में ऐंड्रोजेनिक ऐलोपेसिया को फीमेल पैटर्न बाल्डनैस के नाम से जाना जाता है. इस समस्या से पीडि़त महिलाओं में पूरे सिर के बाल कम हो जाते हैं लेकिन हेयर लाइन पीछे नहीं हटती. महिलाओं में ऐंड्रोजेनिक ऐलोपेसिया से शायद ही कभी पूरी तरह से गंजेपन की समस्या होते हैं. मेनोपौज के बाद करीब दोतिहाई महिलाओं को सिर के किसी विशेष हिस्से में गंजेपन का सामना करना पड़ता है.

इस के अलावा गंजेपन की समस्या हारमोंस असंतुलन के कारण होती है. मेनोपौज के समय महिलाओं में सब से ज्यादा हारमोन परिवर्तन होता है, जिस से गंजेपन की समस्या होती है. बालों की जड़ों का कमजोर हो जाना. पिट्यूटरी ग्लैंड में ज्यादा रूसी होना, बालों की जड़ों को जरूरी पोषक तत्त्व न मिलना, पर्याप्त नींद न लेना, ज्यादा टैंशन लेने आदि के कारण महिलाएं गंजेपन का शिकार होती हैं.

गंजापन दूर करने के उपाय: इस के कई तरीके हैं. आप प्रोफैशनल काउंसलिंग करवा लें. डाक्टर से बेहतर इलाज के बारे में पूछें.

हेयर ट्रांसप्लांट के वैज्ञानिक तरीके: यह गंजेपन के इलाज के लिए सब से अच्छा और आसान तरीका है. इस तकनीक के जरीए शरीर के एक हिस्से से हेयर फौलिकल्स को ले कर सिर में ट्रांसप्लांट किया जाता है. यह 2 तरह से किया जाता है- स्ट्रिप तकनीक, फौलिकुलर यूनिट ट्रांसप्लांट.

वैज्ञानिकों ने स्टेम सैल के जरीए बालों को उगाने का तरीका खोज निकाला है. इस तकनीक में त्वचा के नीचे पाए जाने वाले फैट सैल से बालों को नए सिरे से उगाया जा सकता है. इस में मौजूद स्टेम सैल बालों को उगाने में मदद करेंगे. इस तरीके से उगाए गए बाल न सिर्फ स्थाई होंगे बल्कि देखभाल के हिसाब से भी आसान साबित होंगें.

लेजर ट्रीटमैंट: इस ट्रीटमैंट से सिर की ब्लड कोशिकाएं ऐक्टिव हो कर रक्तसंचार तेज कर देती हैं जिस से बालों को उगाने में मदद मिलती है.

हेयर वीविंग: इस तकनीक में सामान्य बालों को या सिंथैटिक हेयर को खोपड़ी के उस भाग पर लगा दिया जाता है जहां गंजापन होता है. इस के लिए आमतौर पर हेयर वीविंग कराने के बाद जो बाल मिलते उन को हेयर मैन्युफैक्चरर के जरीए वीविंग के बाल में योग किया जाता है.

उपचार की प्रचलित विधियां

ऐलोपेसिया का उपचार: इस के लक्षणों के आधार पर इसे पहचानते हैं. इस में मरीज की मैडिकल हिस्ट्री का पूरा ब्योरा लिया जाता है.

इस दौरान गंजेपन का पैटर्न, सूजन या संक्रमण का परीक्षण, थायराइड और आयरन की कमी की पहचान के लिए ब्लड टैस्ट और हारमोनल टैस्ट आदि की मदद से इस की जांच हो सकती है. इस के उपचार के लिए दवाओं और विधियों का इस्तेमाल स्थिति की गंभीरता के आधार पर किया जाता है.

मिनोक्सिडिल: इस दवा को हाई ब्लडप्रैशर के उपचार के लिए तैयार किया था लेकिन इस का असर कई शोधों में गंजेपन के उपचार में प्रभावी माना गया है फूड ऐंड ड्रग्स ऐसोसिएशन ने इस दवा को महिलाओं में गंजेपन के उपचार के लिए प्रभावी माना है.

ऐंड्रोजन प्रतिरोधी दवाएं: ऐलोपेसिया के अधिकतर मामलों में शरीर ऐंड्रोजन हारमोन की अधिकता एक प्रमुख कारण है इसलिए इसे कम करने की दवाओं का इस्तेमाल भी उपचार के लिए किया जाता है. कुछ मामलों में इन दवाओं से उन महिलाओं को फायदा मिला है जिन पर मिनोक्सिडिल का प्रभाव नहीं हुआ है.

आयरन की पूर्ति: कुछ मामलों में बाल ?ाडऩे की रोकथाम महज आयरनयुक्त सप्लिमैंट से ही हो जाती है. विशेष रूप से महिलाओं में गंजेपन के उपचार के लिए आयरन की गोलियां अधिक प्रभावी हैं.

प्लेटलेट रिच प्लाज्मा थेरैपी

इस थेरैपी के दौरान सर्जरी की मदद से शरीर के रक्त की ही प्लेटलेट्स से उपचार किया जाता है. जिस से त्वचा को ऐलर्जी का रिस्क नहीं रहता और बाल उगने शुरू हो जाते हैं.

मैसोथेरैपी: इस थेरैपी के दौरान स्कैल्प की त्वचा पर विटामिन और प्रोटीन को सूई की मदद से डाला जाता है. इस से हेयर फौलिकल्स को ठीक कर दोबारा बाल उगाने की कोशिश की जाती है.

लेजर लाइट: कम पावर की लेजर लाइट की मदद से बालों की जड़ों में ऊर्जा का संचार बढ़ाते हैं, जिस से बाल मजबूत हों और दोबारा उग सकें.

हेयर ट्रांसप्लांट क्या है: साकेत सिटी हौस्पिटल के कंसल्टैंट (प्लास्टिक सर्जरी) डा. रोहित नय्यर के अनुसार, हेयर ट्रांसप्लांट आज के समय में सुरक्षित, सरल और सब से अधिक प्रचलित कौस्मैटिक सर्जरी की प्रक्रिया है. यह चिकित्सीय रूप से प्रमाणित है और दुनियाभर में कौस्मैटिक सर्जनों तथा डर्मैटो सर्जनों द्वारा की जाती है. यह केवल ऊपरी त्वचा से संबंधित है.

हेयर ट्रांसप्लांट में हम सिर के पिछले हिस्से के बाल लेते हैं और उन्हें सिर की गंजी जगह पर लगा देते हैं. ट्रांसप्लांट किए गए बाल सिर के पिछले हिस्से के इसलिए लिए जाते है क्योंकि ये स्थाई बाल होते हैं और ये कभी झड़ते नहीं और फिर जब हम इन बालों को सिर के अगले हिस्से में लगाते हैं तो इन के गुण पीछे वाले बालों जैसे रहते हैं और वे कभी नहीं ?ाड़ते. इसलिए ट्रांसप्लांट किए गए बाल जीवनभर आप के साथ रहते हैं.

हेयर ट्रांसप्लांट की 2 बेसिक तकनीकें हैं:

  1. फौलिकुलर यूनिट ऐक्स्ट्रैक्शन (एफयूई)
  2. फौलिकुलर यूनिट ट्रांसप्लांट (एफयूटी)

एफयूई तकनीक: इस तकनीक में हम 1-1 कर के सारे कूप हटाते हैं. इस में कोई टांका, निशान, चीरा और दर्द नहीं होता है. एक चरण में हम 300 तक कूप हटा सकते हैं. बाल निकालने के बाद आप पता नहीं लगा सकते कि इन्हें ट्रांसप्लांट किया गया है.

एयूटी तकनीक: इस में हम हेयर ब्रेकिंग स्किन की एक स्ट्रिप लेते हैं और पीछे से टांके लगाते हैं. जिन्हें 2 हफ्ते बाद हटा देते हैं. इस में एयूई तकनीक से ज्यादा दर्द होता है. मगर इस में आप के सिर के पिछले हिस्से में निशान नहीं रहता क्योंकि यह बालों से छिप जाता है.

इन दोनों तकनीकों से नतीजे एकजैसे मिलते हैं. इन में केवल कूप में बाल लगाने के तरीकों का अंतर है.

परिणाम दिखेंगे: ट्रांसप्लांट किए गए बाल 6 से 8 हैं तो बाल बढ़ने लगते हैं. इन के बढ़ने की दर 1 से 1.5 सैंटीमीटर प्रतिमाह होती है. इसलिए यदि आप लंबे बाल चाहती हैं तो आप को 9 माह से ले कर 1 साल तक का इंतजार करना पड़ सकता है.

बिना साइड इफैक्ट व निशान के: जहां बाल लगाए गए हैं वहां पर कोई निशान नहीं रहता और न ही कोई साइड इफैक्ट. यह बहुत ही आसान प्रोसीजर है. इस में क्लांइट चल कर आता है और उसी दिन वापस जा सकता है, गाड़ी चला सकता है खाना खा सकता.

इस में किसी दवा की जरूरत नहीं पड़ती है. आईब्रोज, पलकों, दाढ़ी और मूंछों के लिए हेयर ट्रांसप्लांट कराया जा सकता. यदि आप के बाल जलने या दुर्घटना के कारण गिर गए हैं तो आप दोबारा ट्रांसप्लांट आसानी से करा सकते हैं.

सफल सर्जरी के कारण

शानदार परिणाम, आसान प्रोसीजर, अस्पताल में भरती होने की जरूरत नहीं, महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए की जा सकती है. उम्र की कोई सीमा नहीं. आप इन्हें सामान्य बालों की तरह करवा सकते हैं, शैंपू और कलर कर सकते हैं. यकीनन ये सामान्य बाल हैं और कोई भी व्यक्ति सामान्य और ट्रांसप्लांट किए गए बालों के बीच फर्क नहीं बता सकता.

सावधानी: ट्रांसप्लांट वाले भाग में कभीकभी खून निकलने व पपड़ी पड़ने की संभावना होती है पर वह कुछ ही दिनों में ठीक हो जाती है. अगर ज्यादा समस्या हो तो ऐक्सपर्ट को दिखाएं.

 प्रमोशन: भाग 2- क्या बॉस ने सीमा का प्रमोशन किया?

प्रमोशन होने के कारण सीमा को लखनऊ जाना पड़ेगा, यह बात चंद मिनटों में ही घर के हर सदस्य को राजीव से मालूम पड़ गई. सब की आंखों में उत्साह व खुशी की चमक के बजाय तनाव और परेशानी के भाव नजर आने लगे.

रात का खाना सभी ने बु?ोबु?ो से अंदाज में खाया. उस के बाद सभी ड्राइंगरूम में आ कर बैठ गए. प्रमोशन को ले कर आपस में चर्चा का आरंभ रमाकांत ने किया.

‘‘शांति से सोचविचार करो, तो हर समस्या का हल मिल जाता है,’’ उन्होंने गंभीर लहजे में बोलना शुरू किया, ‘‘प्रमोशन का 2 साल को टलना सीमा के कैरियर के हित में नहीं होगा. दूसरी तरफ उस के लखनऊ जाने से कई समस्याएं पैदा होंगी. अब सवाल यह उठता है कि क्या हम उन समस्याओं का उचित समाधान ढूंढ सकते हैं या नहीं?’’

‘‘मेरे लिए अकेले लखनऊ जा कर रहना बिलकुल संभव नहीं है,’’ सीमा की आवाज में गहरी उदासी व निराशा के भाव साफ ?ालके.

‘‘भाभी, आप को यों हिम्मत नहीं हारनी चाहिए. शादी से पहले आप ने होस्टल में अकेले रह कर एमबीए भी तो किया था. लखनऊ में अकेले रहना कठिन तो होगा, पर इस काम को आप असंभव न सम?ों,’’ संजीव ने जोशीले अंदाज में सीमा का हौसला बढ़ाया.

‘‘सब से दूर रहने की बात सोचते ही मेरा मन कांपने लगता है. यहां सब का कितना सहारा है मु?ो. दफ्तर से लौटती हूं, तो खाना तैयार मिलता है. बीमार पड़ने पर देखभाल करने वालों की कमी नहीं है यहां. न कपड़े धोने की फिक्र है, न उन्हें प्रैस कराने की. औफिस में 10-12 घंटे काम करने के बाद वहां इन सभी कामों को करने की हिम्मत व ताकत मु?ा में कहां से आएगी?’’ सीमा की आंखों में आंसू ?िलमिला उठे.

‘‘जरूरत पड़ने पर हिम्मत और ताकत कुदरत देती है,’’ सुचित्रा ने प्यार भरे लहजे में अपनी बहू को सम?ाया, ‘‘बहू तुम सुबह का नाश्ता व दोपहर का खाना सुबह बना लेना और रात को टिफिन मंगवा लिया करना. शनिवारइतवार की छुट्टी में सप्ताहभर के कपड़े तैयार कर सकती हो. औफिस में तुम्हारे साथ काम करने वाले लोग किसी तरह की बीमारी में क्या तुम्हारा साथ नहीं निभाएंगे?’’

‘‘और रही बात अकेले रहने कि तो सप्ताह की 2 छुट्टियों में कभी तुम मिलने आ जाना, कभी मैं और रोहित लखनऊ आ जाया करेंगे. ऐसा करने से तुम्हें अकेलापन कभी ज्यादा महसूस नहीं देगा,’’ राजीव ने एक और समस्या का समाधान सु?ाया.

राजीव उस की तरफ से नहीं बोल रहा है, यह देख कर सीमा पहले हैरान हुई और फिर नाराज नजर आने लगी. उस की नाराजगी बाकी लोगों से छिपी नहीं रही.

‘‘भाभी, जिंदगी में तरक्की करने के लिए इंसान को तकलीफें उठानी ही पड़ती है,’’ सविता अचानक चिड़े से अंदाज में बओली, ‘‘प्रमोशन का मतलब है ज्यादा बड़ी पगार जब पास हो

तभी इंसान अपने सपने पूरे कर सकता है. आप क्या रोहित को अच्छे बोर्डिंग स्कूल में भेजने

की इच्छुक नहीं हैं. कल को आप अपना घर, कार, जेबर, कपड़े क्या अपने पास देखना नहीं चाहेंगी? अगर छोटीबड़ी तकलीफों के डर से आप यह प्रमोशन नहीं लेंगी तो कैसे पूरे होंगे आप के सपने?’’

‘‘रोहित की पढ़ाई को छोड़ कर बाकी सब चीजों के बिना मैं आसानी से रह सकती हूं,’’ सीमा ने धीमी आवाज में सफाई दी.

‘‘इंसान को ज्यादा स्वार्थी नहीं होना चाहिए. आज आप के द्वारा हमारी जरूरतें व शौक पूरे होंगे, तो कल हम भी आप के साथ हर जरूरत के समय अवश्य खड़े होंगे. इस वक्त घर में ज्यादा पैसा आने की जरूरत है. अपनी सब तकलीफों को नजरअंदाज कर आप को सिर्फ इसी वजह से लखनऊ जाना स्वीकार कर लेना चाहिए,’’ काफी उत्तेजित हो जाने के कारण संजीव का चेहरा लाल हो गया.

‘‘संजीव बिलकुल ठीक कह रहा है बहू पूरे परिवार के हित को ध्यान में रखोगी तो लखनऊ जाने का फैसला करना तुम्हारे लिए एकदम आसान होगा,’’ रमाकांत की इस बात से घर का हर सदस्य सहमत नजर आया.

‘‘प्रमोशन के इस मौके को हाथ से निकल जाने देना नादानी होगी,’’ राजीव अपनी पत्नी की तरफ देख कर मुसकराया, ‘‘अपने कैरियर के प्रति तुम पूरी तरह से समर्पित हो. छोटीमोटी परेशानियों के कारण आगे खूब तरक्की करने की राह में रुकावटें खड़ी मत करो, सीमा.’’

सीमा को अपने पति सहित सभी लोग स्वार्थी नजर आए. उस ने क्रोधित लहजे में सब को सुना कर कहा, ‘‘जिन परेशानियों का जिक्र मैं कर रही हूं. उन की फिक्र किसी को भी नहीं है. अपने पति और बेटे से दूर मैं क्यों रहूं? क्या मेरे मन की सुखशांति और खुशियों की कीमत और महत्त्व 40-50 हजार रुपयों से कम है? क्यों

मु?ो परदेश में अकेला भेजने को उतारू हैं आप सब के सब?’’

‘‘आप तो बेकार में इतनी ज्यादा भावुक और परेशान हो रही हो, भाभी. आजकल सिफारिश और पैसे से सबकुछ हो जाता है. आप भी जल्दी से जल्दी वापस यहीं तबादला करवाने की कोशिश करती रहना,’’ संजीव का स्वर रूखा व चिड़चिड़ा हो गया.

‘‘तुम ऐसा इसलिए कह रहे हो क्योंकि तुम्हें मेरी नहीं बल्कि अपनी मोटरसाइकिल पाने की चिंता ज्यादा है,’’ सीमा ने चुभते स्वर में जवाब दिया.

यहां से सारा माहौल बिगड़ गया. संजीव नाराजगी दर्शाता उसी पल वहां से उठ

कर अपने कमरे में चला गया. सुचित्रा रसोई में जा घुसी और रमाकांत व सविता सीमा की उपेक्षा करते हुए टीवी देखने लगे.

आंसू बहाने को तैयार सीमा उठ कर अपने शयनकक्ष में आ गई. उसे उम्मीद थी कि राजीव उस के पीछेपीछे आएगा, पर ऐसा नहीं हुआ.

पति भी उस का साथ नहीं दे रहा है, इस बात

की पीड़ा महसूस करती सीमा अकेले में आंसू बहाने लगी.

करीब घंटेभर बाद राजीव शयनकक्ष में आया. तब तक रोहित सो चुका था. सीमा ने लखनऊ जाने से जुड़ी अपनी परेशानियों को शांत लहजे में उसे फिर से एक बार सम?ाने का प्रयास आरंभ किया.

कुछ मिनटों के बाद ही राजीव ने उसे टोकते हुए कहा, ‘‘तुम ने प्रमोशन न लेने का एकतरफा फैसला कर ही लिया है तो अब इस विषय पर कुछ भी कहनेसुनने की क्या जरूरत है. खुद भी सो जाओ और मु?ो भी सोने दो.’’

‘‘तुम यों नाराज नजर आओगे तो मु?ो

कैसे नींद आएगी?’’ सीमा रोंआसी हो उठी.

‘‘तुम मेरी या किसी और की फिक्र मत करो.’’

‘‘मु?ा पर लखनऊ जाने का यों दबाव बनाना ठीक नहीं है.’’

‘‘सम?ादारी की बातें तुम्हें दबाव बनाना लग रही हैं तो कोई क्या कर सकता है?’’

‘‘मेरे दिल का हाल तुम भी नहीं सम?ोगे, मु?ो ऐसी उम्मीद नहीं थी,’’ सीमा का स्वर शिकायती हो गया.

‘‘अब बेकार में मेरा सिर मत खाओ,’’ राजीव ने अचानक उसे ?िड़का और फिर आंखें मूंद कर खामोश हो गया.

सीमा भी राजीव और उस के घर वालों के स्वार्थी व्यवहार को देख कर मन ही मन नाराज हो उठी. नींद आने से पहले वह सोमवार का प्रमोशन अस्वीकार करने का मन में पक्का फैसला कर चुकी थी.

छुट्टी वाले दिन बैड टी पीने के बाद सीमा कुछ देर और नींद की ?ापकी ले लेती थी. अगले दिन शनिवार को उसे बैड टी देने न सविता आई और न ही उस की सास.

सीमा कुछ देर बाद खुद ही चाय बना कर राजीव व अपने लिए ले आई. कालेज जाने की तैयारी कर रही सविता उसे देख कर न मुसकराई और न ही कुछ बोली. पैर छूने पर सुचित्रा ने उसे बु?ो से अंदाज में आशीर्वाद दिया.

उन दोनों के बदले व्यवहार की चर्चा सीमा राजीव से करना चाहती थी लेकिन उस के बारबार उठाने पर भी वह नहीं उठा. कुछ देर बाद गिलास की चाय भी डंडी हो गई.

‘‘क्यों तंग कर रही हो बारबार उठने को कह कर? मु?ो चैन से सोने दो, प्लीज,’’ राजीव ने गुस्से से उस का हाथ ?ाटका, तो सीमा सम?ा गई कि वह अभी भी उस से खफा है.

कपड़े धोने की मशीन लगाने में उस दिन उस की सास ने सीमा का जरा भी हाथ नहीं बंटाया. अपने व रमाकांत के लिए ब्रैडमक्खन का नाश्ता तैयार कर सुचित्रा वापस अपने शयनकक्ष में जा घुसी. जब रोहित अपने दादादादी के कमरे में घुसा तो उसे सुचित्रा ने ?िड़क कर भगा दिया.

सीमा को अपने पति व बेटे के लिए खुद नाश्ता तैयार करना पड़ा. जब वह नाश्ता तैयार कर रही थी तभी संजीव नौकरी पर जाने के लिए अपने कमरे से बाहर आया. सीमा उसे अवाज देती रह गई, पर वह नाश्ता करने के लिए नहीं रुका. उस के हावभाव साफ दर्शा रहे थे कि उस का मूड पूरी तरह से उखड़ा हुआ है.

राजीव ने भी बड़े अनमने भाव से नाश्ता किया. सीमा ने काफी कोशिश करी, पर वह अपने पति के साथ कैसा भी वार्त्तालाप आरंभ करने में असफल रही.

रमाकांत भी घर में मुंह फुला कर घूमे. फिर 11 बजे के आसपास बैंक में कुछ काम कराने चले गए. राजीव 12 बजे के करीब स्कूल में पढ़ाने चला गया.

सीमा ने उस के जाने के बाद उस का लंच बौक्स डाइनिंग टेबल पर ही रखा देखा. राजीव जानबू?ा कर लंच बौक्स नहीं ले गया है, यह देख कर सीमा का मन बहुत दुखा.

सुचित्रा ने ना सीमा से बात करी न रोहित से. उन का पोता जब भी उन के कमरे में घुसता वह उसे फौरन बाहर निकाल देती.

‘‘दादी मु?ो आज इतना क्यों ज्यादा डांट रही है?’’ अपने बेटे के इस सवाल के जवाब में सीमा ने रोहित को अपनी छाती से जोर से लगा लिया और आंसू न बहाने का प्रयास करने लगी.

दोपहर का खाना सास और बहू ने हमेशा की तरह साथसाथ न खा कर अपनेअपने कमरे में खाया. सीमा का कई बार मन हुआ कि सास के पास जा कर अपने मनोभावों को व्यक्त कर दे, पर उस के कदम सुचित्रा के कमरे तक नहीं बढ़े.

‘ये सब मेरे दुखदर्द व परेशानियों को सम?ा सकते होते, तो सम?ा ही लेते… मैं फैसला कर चुकी हूं और अब किसी को सम?ाने या मनाने की कोशिश कतई नहीं करूंगी,’ मन ही मन ऐसा निश्चिय कर परेशान सीमा अपने पलंग पर पूरी दोपहर करवटें बदलती रही.

जीवन लीला: भाग 2- क्या हुआ था अनिता के साथ

लेखकसंतोष सचदेव

पोते का ध्यान आते ही उन की आंखों में एक चमक सी आ जाती, पर वह मेरी तरह पत्थर के दिल वाली नहीं थीं. कुछ ही दिनों में चल बसीं. मेरे ससुर ने भी चारपाई पकड़ ली.

6-7 महीने बीते होंगे कि एक दिन उन्होंने पास बैठा कर कहा, ‘‘बेटा, तुम से एक खास बात करनी है. मैं ने अपने छोटे बेटे अरुण से बात कर ली है. मैं तुम्हारे नाम मकान की वसीयत करना चाहता था. उसे इस में कोई ऐतराज नहीं है. लेकिन उस का कहना है कि वसीयत में कभीकभी परेशानियां खड़ी हो जाती हैं, खास कर ऐसे मामलों में, जब दूसरे वारिस कहीं दूर दूसरे देश में रह रहे हों. उस की राय है कि वसीयत के बजाय यह संपत्ति अभी तुम्हारे नाम कर दूं.’

अरुण मेरे पति का छोटा भाई था, जो जर्मनी में रहता था. उस का कहना था कि यह संपत्ति मेरे नाम हो जाएगी तो मेरे मन में एक आर्थिक सुरक्षा की भावना बनी रहेगी. ससुर ने कोठी मेरे नाम पर कर दी. कुछ दिनों बाद ससुर भी अपने मन का बोझ कुछ हल्का कर के स्वर्ग सिधार गए. इस के बाद मैं अकेली रह गई. कहने को नौकर राजू था, लेकिन वह इतना छोटा था कि उस की सिर्फ गिनती ही की जा सकती थी.

जब वह 5 साल का था, तब उस की मां उसे साथ ले कर हमारे यहां काम करने आई थी. उस की मां की मौत हो गई तो राजू मेरे यहां ही रहने लगा था. कुछ दिनों तक वह स्कूल भी गया था, लेकिन पढ़ाई में उस का मन नहीं लगा तो उस ने स्कूल जाना बंद कर दिया. इस के बाद मैं ने ही उसे हिंदी पढ़नालिखना सिखा दिया था.

जिंदगी का एकएक दिन बीतने लगा. लेकिन अकेलेपन से डर जरूर लगता था. ससुरजी की मौत पर देवर अरुण जर्मनी से आया था. मेरे अकेले हो जाने की चिंता उसे भी थी. इसी वजह से कुछ दिनों बाद उस ने फोन कर के कहा था कि उस के एक मित्र के पिता सरदार नानक सिंह अपनी पत्नी के साथ दिल्ली रहने आ रहे हैं. अगर मुझे आपत्ति न हो तो मकान का निचला हिस्सा उन्हें किराए पर दे दूं. वह सज्जन पुरुष हैं. उन के रहने से हमें सुरक्षा भी मिलती रहेगी और कुछ आमदनी भी हो जाएगी.

मुझे क्या आपत्ति होती. मैं मकान के ऊपर वाले हिस्से में रहती थी, नीचे का हिस्सा खाली पड़ा था, इसलिए मैं ने नीचे वाला हिस्सा किराए पर दे दिया. सचमुच वह बहुत सज्जन पुरुष थे. अब मैं नानक सिंह की छत्रछाया में रहने लगी.

जितना स्नेह और अपनापन मुझे नानक सिंहजी से मिला, शायद इतना पिताजी से भी नहीं मिला था. पतिपत्नी अपने लंबे जीवनकाल के अनुभवों से मेरा परिचय कराते रहते थे. मैं मंत्रमुग्ध उन्हें निहारती रहती और अपनी टीस भरी स्मृतियों को उन के स्नेहभरे आवरण के नीचे ढांप कर रख लेती.

समय बीतता रहा. हमेशा की तरह उस रविवार की छुट्टी को भी वे मेरे पास आ बैठे. इधरउधर की थोड़ी बातें करने के बाद नानक सिंहजी ने कहा, ‘‘आज तुम से एक खास बात करना चाहता हूं. मेरा बेटा जर्मनी से यहां आ कर रहने के लिए कह रहा है. वैसे भी अब हम पके आम हैं, पता नहीं कब टपक जाएं. बस एक ही बात दिमाग में घूमती रहती है. तुम्हें बेटी माना है, इसलिए अब तुम्हें अकेली नहीं छोड़ सकता, इतने बड़े मकान में अकेली और वह भी यहां की लचर कानूनव्यवस्था के बीच. इसी उधेड़बुन में मैं कई दिनों से जूझ रहा हूं.

पलभर रुक कर वह आगे बोले, ‘‘अपने काम से मैं अकसर स्टेट बैंक जाया करता हूं. वहां के मैनेजर प्रेम कुमार से मेरी गहरी दोस्ती हो गई है. एक दिन बातोंबातों में पता चला कि उन की पत्नी का स्वर्गवास हो गया है. उस के बाद से उन्हें अकेलापन बहुत खल रहा है. कहने को उन के 3 बच्चे हैं, लेकिन सब अपनेअपने में मस्त हैं. बड़ी बेटी अपने पति के साथ जापान में रहती है. बेटा बैंक में नौकरी करता है. उस की शादी हो चुकी है. तीसरी बेटी संध्या थोड़ाबहुत खयाल रखती थी, लेकिन उस की भी शादी हो गई है. उस के जाने के बाद से वह अकेले पड़ गए हैं. एक दिन मैं ने कहा कि वह शादी क्यों नहीं कर लेते? लेकिन 3 जवान हो चुके बच्चों के बाप प्रेम कुमार को मेरा यह प्रस्ताव हास्यास्पद लगा.

मैं सुनती रही, नानक सिंहजी कहते रहे, ‘‘मैं विदेशों में रहा हूं. मेरे लिए यह कोई हैरानी की बात नहीं थी. पर भारतीय संस्कारों में पलेबढ़े प्रेमकुमार को मेरा यह प्रस्ताव अजीब लगा. मैं ने मन टटोला तो लगा कि अगर कोई हमउम्र मिल जाए तो शेष जीवन के लिए वह उसे संगिनी बनाने को तैयार हो जाएंगे. मैं ने उन से यह सब बातें तुम्हें ध्यान में रख कर कही थीं. क्योंकि मेरा सोचना था कि तुम बाकी का जीवन उन के साथ उन की पत्नी के रूप में गुजार लोगी. क्योंकि औरत का अकेली रह कर जीवन काटना कष्टकर तो है ही, डराने वाला भी है.’’

इस के बाद एक दिन नानक सिंहजी प्रेम कुमार को मुझ से मिलवाने के लिए घर ले आए. बातचीत में वह मुझे अच्छे आदमी लगे, इसलिए 2 बार मैं उन के साथ बाहर भी गई. काफी सोचने और देवर से सलाह कर के मैं ने नानक सिंहजी के प्रस्ताव को मौन स्वीकृति दे दी.

इस के बाद प्रेमकुमारजी ने अपने विवाह की बात बच्चों को बताई तो एकबारगी सभी सन्न रह गए. बड़ी बेटी रचना विदेशी सभ्यता संस्कृति से प्रभावित थी, इसलिए उसे कोई आपत्ति नहीं थी. संध्या अपने पिता की मन:स्थिति और घर के माहौल से परिचित थी, इसलिए उस ने भी सहमति दे दी. पर बेटा नवीन और बहू शालिनी बौखला उठे. लेकिन उन के विरोध के बावजूद हमारी शादी हो गई.

शादी के 3-4 दिनों बाद नवीन अपना सामान ले कर शालिनी के साथ किराए के मकान में रहने चला गया. मुझे यह अच्छा नहीं लगा. मैं सोच में पड़ गई, अपने अकेलेपन से छुटकारा पाने के लिए मैं ने एक बेटे को उस के पिता से अलग कर दिया. मुझे अपराधबोध सा सताने लगा. लगता, बहुत बड़ी गलती हो गई. इस बारे में मैं ने पहले क्यों नहीं सोचा? अपने स्वार्थ में दूसरे का अहित करने की बात सोच कर मैं मन मसोस कर रह जाती. भीतर एक टीस सी बनी रहती.

पर मैं ने आशा का दामन कभी नहीं छोड़ा था, फिर अब क्यों चैन से बैठ जाती. मैं ने एक नियम सा बना लिया. स्कूल से छुट्टी होने के बाद मैं शालिनी से मिलने उस के घर जाती. एक गाना है ना ‘हम यूं ही अगर रोज मिलते रहे तो देखिए एक दिन प्यार हो जाएगा…’ शालिनी एक सहज और समझदार लड़की थी. कुछ ही दिनों में उस ने मुझे अपनी सास के रूप में स्वीकार कर लिया.

मुझे ले कर उन पत्नी पति के बीच संवाद चलता रहा, नतीजतन धीरेधीरे नवीन ने भी मुझे अपनी मां का दर्जा दे दिया. एक भरेपूरे परिवार का मेरा सपना साकार हो गया. मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा. प्रेमकुमारजी के रिश्तेदारों की कानाफूसी से मुझे पता चला कि इतना अपनापन तो प्रेमकुमारजी की पहली पत्नी भी नहीं निभा पाई, जितना मैं ने निभाया है. मैं आत्मविभोर हो उठती.

अपनी हृदय चेतना से निकली आकांक्षाओं को मूर्तरूप में देख कर भला कौन आनंदित नहीं होता. जो कभी परिवार में नहीं रहे, वे इस पारिवारिक सुख आह्लाद की कल्पना भी नहीं कर सकते. हर दिन खुशियों की सतरंगी चुनरी ओढ़े मैं पूरे आकाश का चक्कर लगा लेती. दिनों को जैसे पंख लग गए, 3 साल कैसे बीत गए पता ही नहीं चला.

आगे पढें- एसटीडी पर फोन बुक किया. कई…

वैलेंटाइन वीक में Jahnvi Kapoor ने डीपनेक ड्रेस में दिखाया बोल्ड अवतार

बॉलीवुड डेब्यू के बाद से ही जाह्नवी कपूर अपना बेस्ट फैशन लेकर आती हैं. चाहे अवार्ड समारोह, रेड कार्पेट इवेंट, फिल्म प्रमोशन, या कोई उत्सव का अवसर हो, अपने स्टाइलिश लुक से फैशन में जलवा बिखरेती है. हाल ही में जाह्नवी ने फेमस डिजाइनर कपड़ों के ब्रांड रासारियो के कॉर्सेट गाउन पहनकर इंटरनेट पर धूम मचा दी.

सिजलिंग लुक में दिखीं जाह्नवी कपूर

जाह्नवी कपूर इन दिनों अपनी अपकमिंग फिल्म ‘देवरा’ को लेकर काफी सुर्खियों में हैं. जाह्नवी कपूर इस फिल्म के साथ साउथ में डेब्यू करने जा रही हैं. एक्ट्रेस का इस फिल्म से लुक भी सामने आ गया है. इन सब के बीच जाह्नवी कपूर ने अपनी नई फोटोज शेयर की हैं. इन फोटोज में जाह्नवी कपूर बोल्ड डीपनेक ड्रेस पहने दिखाई दीं. जाह्नवी कपूर का ये बोल्ड डीपनेक लुक सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है. जाह्नवी कपूर के बोल्ड अवतार को देखने के बाद फैंस देखते ही रह गए.

 

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वैलेंटाइन डे वीक में जाह्नवी कपूर लाल कॉर्सेट गाउन में नजर आई

जाह्नवी कपूर ने हाल ही में इंस्टाग्राम पर लाल लेस कोर्सेट मैक्सी ड्रेस पहने अपनी तस्वीरें साझा कीं. एक्ट्रेस ने पोस्ट को कैप्शन दिया, “वी डे एनर्जी.” इन फोटोज में देख सकते हैं जाह्नवी को खूबसूरत गाउन में कैमरे के लिए पोज़ देते हुए दिख रहा है.

यह डैस फेमस कपड़ों के ब्रांड लेबल, रासारियो में से एक है. आकर्षक डीपनेक और ऑफशोल्डर गाउन में जाह्नवी ग्लैमरस दिख रहीं है. जाह्नवी कपूर अपनी कातिलाना निगाहों से लोगों के दिलो पर जादू चला रही हैं. जाह्नवी कपूर की इस तस्वीर को देखने के बाद फैंस देखते रह गए. इन वायरल तस्वीरों में जाह्नवी अपनी कर्वी फिगर फ्लॉट करती नजर आ रही है.

 

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Teddy Day Wishes: तुम हंसते रहो टेडी बियर की तरह… इन मैसेजेस से अपनों को कहें हैप्पी टेडी डे

Teddy Day Wishes 2024 In Hindi: वैलेंटाइन वीक के चौथे दिन टेडी डे मनाया जाता है. हर साल 10 फरवरी को लोग इसे सेलिब्रेट करते हैं. यह दिन किसी भी प्रेमी जोड़े के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. इस दिन कपल एक-दूसरे को टेडी बियर गिफ्ट कर अपने प्यार का इजहार करते हैं. यह तोहफा बहुत ही मुलायम और क्यूट होता है. कहा जाता है कि तोहफा रिश्ते को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाता है. आप अपने क्रश या पार्टनर से प्यार का इजहार करना चाहते हैं, तो प्यारा-सा टेडी बियर देकर अपनी भवनाएं जाहिर कर सकते हैं और इन प्यारे मैसेजेस के साथ हैप्पी टेडी डे भी जरूर कहें.

दिन ऐसे ही गुजरते चले जाएंगे,

हम तेरी याद में जिंदगी गुजारते चले जाएंगे.

Happy Teddy Day 2024

तुम हंसते रहो टेडी बियर की तरह, मुस्कुराते रहो हमेशा छलकती बियर की तरह, बस गए हो दिल में किसी डिअर की तरह…

Happy Teddy Day 2024

काश इस दुनिया पर मेरा थोड़ा बस चलता,

तुझे टेडी बीयर बनाकर हमेशा अपने पास रखता.

Happy Teddy Day 2024

टेडी-टेडी पास तो आओ, उनको भी अपने साथ ले आओ, बैठे हैं हम तन्हा कब से, उनको हमारी याद दिलाओ.

Happy Teddy Day 2024

जानें उस शख्स को ये कैसा हुनर आता है, रात होती है तो आंखों में उतर आता है.

हैप्पी टेडी डे 2024

जब भी तुम्हारी याद आती है, तुम्हारे दिए टेडी को गले लगा लेती हूं.

हैप्पी टेडी डे 2024

मेरे टेडी को बहुत संभाल के रखना, ये आपसे बहुत प्यार करता है, हम होते हैं जब जब आपसे दूर, तो यही आपके साथ होता है.

Happy Teddy Day

कली जैसी कोमल टेडी बियर जैसी प्यारी हो

आज कह ही देता हूं तुम दुनिया से न्यारी हो.

Happy Teddy Day

चॉकलेट की खुशबू, आइसक्रीम की मिठास, प्यार की मस्ती और होंठों का स्वाद हंसी के गुब्बारेऔर तुम्हारा साथ मुबारक हो आपको टेडी बीयर का त्योहार….

Happy Teddy Day

आजकल हम हर एक टेडी को देखकर मुस्कुराते हैं, कैसे बताएं उन्हें कि हमें तो हर एक टेडी में वो ही नजर आते हैं.

हैप्पी टेडी डे

भेज रहा हूं मैं तुम्हें एक teddy बहुत प्यार से रखना तुम इसे हमेशा संभाल के, हो अगर मोहब्बत मुझसे तो.

हैप्पी टेडी डे

जस को तस: दीनानाथ की कैसे खुली पोल

 

‘‘धन्य हो पंडितजी, आप के समधीजी भी हमारे जजमान हैं. उन के पूरे कुल खानदान के बारे में हम जानते हैं,’’ चुलबुल नाई की बात सुन पंडित दीनानाथ शुक्ल ठगे से रह गए. कहावत है कि ‘एक दिन घूरे के भी दिन फिरते हैं’, फिर भला पंडित दीनानाथ शुक्ल के दिन क्यों न फिरते. आखिर एक दिन उन की मनोकामना का सूरज अनायास ही चमक उठा. लेकिन चुलबुल नाई ने राज की जो परतें उखाड़ीं उस से दीनानाथ शुक्ल की सारी खुशी काफूर हो गई.

कोयला उद्योग की इस नगरी में कोयला की दलाली में हाथ काले नहीं होते, बल्कि सुनहले हो जाते हैं. यह यथार्थ यत्रतत्रसर्वत्र दृष्टिगोचर होता हैं. ऐसे ही सुनहले हाथों वाले पंडित दीनानाथ शुक्ल के चंद वर्षों में ही समृद्ध बन जाने का इतिहास जहां जनचर्चाओं का विषय रहता है वहीं दीनानाथ से पंडित दीनानाथ शुक्ल बनने की उन की कहानी भी कहींकहीं कुछ बुजुर्गों द्वारा आपस में कहीसुनी जाती है और वह भी दबी जबान व दबे कान से. दरअसल, पंडित दीनानाथ शुक्ल सिर्फ समृद्ध ही नहीं हैं, बल्कि प्रभावशाली भी हैं. क्षेत्र एवं प्रदेश की बड़ी से बड़ी राजनीतिक हस्तियों तक उन की पहुंच है. ऐसी स्थिति में भला किस की मजाल कि उन से पंगा ले कर अपनी खाट खड़ी करवाए.

इन सब के बावजूद, क्षेत्र का कट्टर ब्राह्मण समाज उन से सामाजिक संबंध बनाने में एक दूरी रख कर ही चलता है. कट्टर बुजुर्ग ब्राह्मण परस्पर चर्चा करते हुए कभीकभी बड़बड़ा कर कह ही उठते हैं, ‘ससुर कहीं के, न कुलगोत्र का पता न रिश्तेदारी का, न जाने कइसे ये दीनानथवा बन बइठा पंडित दीनानाथ शुकुल.’ जबकि पंडित दीनानाथ शुक्ल बराबर इस प्रयास में रहते कि वे और उन का परिवार इस क्षेत्र के अधिक से अधिक प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवारों एवं ब्राह्मण समाज में घुलमिल जाए.

पंडित दीनानाथ शुक्ल इस क्षेत्र के हैं नहीं. काफी अरसे पहले जब इस क्षेत्र में कोयला उद्योग ने अपना पैर जमाना शुरू किया था तभी पंडित दीनानाथ शुक्ल इस क्षेत्र से काफी दूर के किसी गांव से आ कर कोयला लोडिंग में प्रयुक्त होने वाली झिब्बी यानी बांस की बनी बड़ी टोकरी की सप्लाई किया करते थे. समय के साथ तेजी से चलते हुए कोयला उद्योग में प्रयुक्त होने वाली ऐसी सभी सामग्रियों, जिन की खरीद कोल उद्योग द्वारा टैंडर के माध्यम से की जाती थी, की वे सप्लाई करने लग गए.

उच्च अधिकारियों को हर तरह से खुश करने की कला उन्हें खूब आती थी जिस के फलस्वरुप वे कोयला उद्योग में बतौर प्रतिष्ठित गवर्मैंट सप्लायर छा गए. फिर कुछ समय बाद जब उन्हें कोल ट्रांसपोर्ट के व्यवसाय के माध्यम से कोयले की दलाली का राज पता चला तो बस फिर क्या था, कोयले की दलाली करतेकरते उन के दिन सुनहले और रातें रुपहली हो गईं. धनसंपत्ति, समृद्धि, आनबानशान सबकुछ उन्होंने येनकेनप्रकारेण अर्जित कर ली. अब, उन का एकमात्र अरमान यह था कि किसी तरह उन के इकलौते पुत्र का विवाह उच्चकुल के ब्राह्मण परिवार की कन्या से हो जाए. उन का पुत्र उच्चशिक्षा प्राप्त कर उन के राजनीतिक प्रभाव के फलस्वरूप अच्छी सरकारी नौकरी कर रहा था. उन्हें अपनी इस अभिलाषा की शीघ्र पूर्ति की आशा भी थी. लेकिन जब भी उन के पुत्र के किसी उच्चकुल के ब्राह्मण परिवार में रिश्ते की बात चलती तो उच्चकुल के कट्टर ब्राह्मण परिवार से बातचीत के दौरान वे अपने कुलगोत्र, अपनी ब्राह्मण परिवारों की रिश्तेदारी के बाबत संतोषप्रद जवाब न दे पाते और बात बनतेबनते रह जाती.

दरअसल, काफी अरसे पहले इस कोयला उद्योग क्षेत्र से काफी दूर एक छोटे से गांव में उन के पिता रामसुजान रहते थे तथा उन का पुश्तैनी व्यवसाय बांस से बनने वाली सामग्रियों के कुटीर उद्योग से जुड़ा हुआ था. उसी बांस के कर्मगत उद्योग से ही उन का जातिनाम भी उस ग्राम में संबोधित किया जाता था. उसी जातिनाम को वे कई पुश्तों से स्वीकार भी रहे थे. लेकिन उन के पुत्र दीनानाथ ने अपने इस पुश्तैनी व्यवसाय के स्वरूप में जहां बदलाव किया वहीं वे अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को भी संवारने में लग गए. अध्ययन के दौरान ही उन्होंने अपने संबोधित किए जाने वाले जातिनाम को ‘वंश फोर शुक्ला’ रख लिया था तथा अपने इस जातिनाम के इतिहास की एक कथा भी गढ़ ली कि उन के ब्राह्मण पूर्वज, बांस फोड़ कर पैदा हुए थे. सो, उन के वंशज ‘वंश फोर शुक्ला’ संबोधित किए जाते हैं. स्कूल एवं कालेज में भी उन्होंने अपना यही जातिनाम लिखवाया था. जब वे अपने पुश्तैनी ग्राम से निकल कर इस कोयला उद्योग क्षेत्र में आए तो ‘वंश फोर शुक्ला’ जातिनाम से ही कुछ समय तक व्यवसाय करते रहे. लेकिन कुछ समय बाद उन्हें अपने जातिनाम में ‘वंश फोर’ शब्द उन के प्रतिष्ठित ब्राह्मण साबित होने में बाधक प्रतीत हुआ तो उन्होंने अपने जातिनाम से ‘वंश फोर’ शब्द हटा कर अपना जातिनाम सिर्फ ‘शुक्ला’ कर लिया तथा अपने नाम के आगे पंडित जोड़ लिया. अब, उन का यही अरमान था कि किसी भांति उन के पुत्र का विवाह किसी खानदानी उच्चकुल के ब्राह्मण परिवार में हो जाए और उन का वंश वृक्ष, वर्ण व्यवस्था के मस्तक समझे जाने वाले ‘ब्राह्मण वर्ण’ की भूमि पर स्थापित हो जाए. इसी प्रयास में वे निरंतर लगे रहते और अपने परिचितों से अपने पुत्र के लिए उच्चकुल के ब्राह्मण परिवार के रिश्ते की बाबत बात करते रहते.

कहावत है कि ‘एक दिन घूरे के भी दिन फिरते हैं,’ फिर भला पंडित दीनानाथ शुक्ल के दिन क्यों न फिरते. आखिर एक दिन उन की मनोकामना का सूरज अनायास ही उस समय चमक उठा जब उन के ही कोयला उद्योग क्षेत्र के ब्राह्मण समाज में अत्यंत प्रतिष्ठित माने जाने वाले पंडित चंद्रकिशोर चतुर्वेदी ने उन के पुत्र हेतु अपनी पुत्री के रिश्ते की बात उन से की. अंधा क्या चाहे, दो आंखें. पंडित दीनानाथ शुक्ल तो अच्छे प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में पुत्र का विवाह करना ही चाहते थे. ऐसी स्थिति में पंडित चंद्रकिशोर चतुर्वेदी, जोकि अन्य किसी जिले से आ कर इस कोयला उद्योग क्षेत्र में बतौर ‘सिविल कौंट्रैक्टर’ का कार्य कर रहे थे तथा हर मामले में उन से बीस थे, का यह रिश्ते का प्रस्ताव उन्हें अनमोल खजाना अनायास मिल जाने जैसा सुखद लगा. सब से बड़ी बात तो यह थी कि पंडित चंद्रकिशोर चतुर्वेदी क्षेत्र के ब्राह्मण समाज में अत्यंत प्रतिष्ठित स्थान पर थे.

पंडित दीनानाथ शुक्ल ने पलभर की भी देर न की और पंडित चंद्रकिशोर चतुर्वेदी के इस प्रस्ताव पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी. बस, फिर क्या था. पंडित दीनानाथ शुक्ल के पुत्र का विवाह ऐसे ठाटबाट से हुआ कि क्षेत्र के ब्राह्मण समाज ने दांतों तले उंगली दबा ली. कल तक उन के कुलगोत्र, नातेरिश्तेदारी को शक की निगाहों से देखने वाले कट्टर ब्राह्मण समाज ने भी सब शंका दूर कर उन्हें बेहिचक श्रेष्ठ ब्राह्मण स्वीकार लिया. इस रिश्ते के बाद से ही ब्राह्मण समाज में वे शान से सिर उठा कर चलने लगे. लेकिन कभीकभी उन्हें यह विचित्र बात लगती कि पंडित चंद्रकिशोर चतुर्वेदी की पुत्री की शादी में उन का कोई भी रिश्तेदार न आया था. पंडित चंद्रकिशोर चतुर्वेदी ने इस का कारण यह बतलाया था कि उन के सब रिश्तेदार अन्य प्रांत के ग्रामीण अंचलों में इस उद्योग क्षेत्र से इतनी दूर रहते हैं कि उन का आना संभव न था.

समय की गति के साथ अतीत धुंधलाता चला गया. वर्तमान में पंडित दीनानाथ शुक्ल एवं पंडित चंद्रकिशोर चतुर्वेदी दोनों ही क्षेत्र के ब्राह्मण समाज के गौरव हैं. पूरे ब्राह्मण समाज में उन का नाम सम्मान से लिया जाता है क्योंकि हर सामाजिक कार्य में वे तनमनधन से सहयोग करते हैं. उन के धन के सहयोग का प्रतिशत सर्वाधिक रहता है.

सबकुछ बढि़या चल रहा था लेकिन अचानक एक दिन न जाने कहां से पूछतेपाछते पंडित दीनानाथ शुक्ल के पुश्तैनी ग्राम में रहने वाला  चुलबुल नाई उन के पास आ पहुंचा. ग्रामों में शादी के रिश्ते नाई एवं ब्राह्मण ही तलाशा एवं तय किया करते हैं, सो समाज में उन का महत्त्वपूर्ण स्थान रहता है. चुलबुल नाई के सिर्फ उन के ग्राम ही नहीं, बल्कि आसपास के 2-3 जिलों में भी जजमान थे. चुलबुल अपने नाम के अनुरूप काफी चुलबुला तो था ही, साथ ही उसे बातों की अपच की बीमारी भी थी. कोई भी बात उस के कानों में पहुंचती तो जब तक वह उस बात को दोचार लोगों को बतला न देता, उस के पेट में मरोड़ उठती रहतीं.

पंडित दीनानाथ का माथा उसे देख कर ठनका, कुछ अनहोनी न हो जाए, मानसम्मान, प्रतिष्ठा में कोई आंच न आ जाए की शंका से उन का दिल लरजा. वे स्थिति को संभालते हुए कुछ बोलना ही चाह रहे थे कि चुलबुल नाई चुलबुलाते हुए बोला, ‘‘वाह दीनानाथजी, वाह…आप के तो यहां बड़े ठाट हैं. आप तो एकदम से यहां ब्राह्मण बन गए, शुकुलजी. वाह, क्या चोला बदला है.’’ दीनानाथ शुक्ल ने जेब से 100-100 रुपए के 2 करारे नोट निकाल कर उस की जेब में रखते हुए बोले, ‘‘अरे, चुप कर, चुप कर. खबरदार, जो यह बात किसी से कही. रख यह इनाम और जब भी मेरे लायक कोई काम हो, तो बतलाना.’’

चुलबुल हाथ जोड़ कर चापलूसी से बोला, ‘‘अरे नहीं पंडितजी, हम काहे किसी से कुछ कहेंगे. आप तो हमारे मालिक हैं. आप का सब राज हमारे सीने में दफन.’’ फिर 100-100 रुपए के नोट उन्हें दिखाते हुए बोला, ‘‘लेकिन मालिक, ये तो 2 ही हैं, 3 और दीजिए तब तो बात बने. अरे, आप ने बेटवा का काज भी तो किसी बड़े ब्राह्मण खानदान में किया है, उस का भी तो नजराना बनता है न, मालिक.’’ दीनानाथ ने मनमसोस कर 300 रुपए और चुलबुल को यह कहते हुए दिए कि खबरदार, जो यह बात किसी से कही, वरना खाल में भूसा भरवा कर टांग दूंगा. जवाब में खीसें निपोरते हुए चुलबुल बोला, ‘‘आप निश्ंिचत रहिए, यह चुलबुल का वचन है. लेकिन यह तो बतलाइए कि बेटे को आप ने किस ब्राह्मण परिवार में ब्याहा है?’’ जवाब में जब दीनानाथ ने पंडित चंद्रकिशोर चतुर्वेदी का नाम बतलाया तो चुलबुल कुछ सोचते हुए बोला, ‘‘अरे, पंडितजी, आप के समधी पंडित चंद्रकिशोर चतुर्वेदी फलां जिले के फलां गांव वाले हैं क्या?’’ दीनानाथ शुक्ल के सहमति व्यक्त करने पर वह कुछ व्यंग्यात्मक स्वर में बोला, ‘‘धन्य हो पंडितजी, धन्य हो. आप के समधीजी भी हमारे जजमान हैं. उन के पूरे कुल खानदान के बारे में हम जानते हैं. बस, यह समझ लीजिए कि जइसे आप वंश फोर शुक्ला हैं न, बस वइसे ही पंडित चंद्रकिशोर चतुर्वेदी भी चर्मफाड़ चतुर्वेदी हैं. समझे न?’’  चुलबुल तो उन्हें प्रणाम कर वहां से चला गया लेकिन पंडित दीनानाथ यह जान कर हतप्रभ रह गए.

दूसरे दिन दीनानाथ रोष से कांपते हुए पंडित चंद्रकिशोर चतुर्वेदी के बंगले के अंदर प्रवेश कर रहे थे, तभी उन्हें पंडित चंद्रकिशोर चतुर्वेदी चुलबुल के कंधे पर हाथ रख कर बाहर निकलते हुए दिखाई पड़े. चुलबुल अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में था, शायद यहां से उसे और भी तगड़ा इनामनजराना मिला था. एकाएक दोनों पंडितों को आमनेसामने देख कर चुलबुल मुसकराते हुए लगभग दंडवत कर दोनों ही पंडितों को पायलागी कह कर प्रस्थान कर गया. जबकि दोनों ही तथाकथित पंडित ‘भई गति सांपछछूंदर केरी ना उगलत बने ना लीलत’ वाली हालत में एकदूसरे के सामने एक पल को खड़े रह गए. फिर दूसरे ही पल पंडित दीनानाथ शुक्ल व्यंग्य से पंडित चंद्रकिशोर चतुर्वेदी से बोले, ‘‘चर्मफाड़ चतुर्वेदीजी, प्रणाम.’’

जवाब में पंडित चंद्रकिशोर चतुर्वेदी उपहास से हंसते हुए बोले, ‘‘प्रणाम, वंश फोर शुकुलजी, प्रणाम.’’ फिर दोनों ही एकदूसरे से विमुख हो कर अपनेअपने घर की ओर बढ़ गए. किसी की भी इज्जत की चादर उघाड़ने से दूसरे को भी तो नंगा होना ही पड़ता, इसलिए दोनों को ही एकदूसरे को ढके रहने में ही समझदारी दिख रही थी.

Valentines’s Day 2024: लव है या प्यार

Valentines’s Day 2024: आजकल के नौजवानों को प्यार बहुत जोर से आता है. रोज डे, प्रोपोज़ डे, किस डे, हग डे से होता हुआ आधुनिक लव कुछ ही दिनों में ओयो रूम तक जा पहुंचता है. हालांकि कार्बाइड डालकर पकाया हुआ यह लव अमूमन 11 महीने से अधिक नहीं टिकता है. कई बार तो ग्यारह दिन में ही ‘माई बॉडी, माई चॉइस’ कहते हुए “टाटा,बाय-बाय और फिर सब कुछ खत्म” हो जाता है. अगले ही दिन से नए ‘लव’ की तलाश भी शुरू हो जाती है.

‘लव’ तो नहीं लेकिन ‘प्यार’ मनु-सतरूपा के समय से लोगों को होते आया है. हमारे जमाने मे भी लोगों को होता ही था. कामदेव के बाण से सभी लोग कभी न कभी बिंधे ही है. लेकिन तब प्यार का फल बड़े हौले -हौले पकाया करते थे लोग. तब के प्रेमी बड़े स्लो होते थे. समझो कि आज सूरज और चंदा में नजरें टकराई. दिलों में कुछ सिहरन, गुदगुदी सी हुई. मन को कुछ अच्छा सा लगा , मौसम कुछ बसंती सा हुआ. प्यार की कोमल कोंपलें उगी, रेगिस्तानी धरती पर मानो बारिश की बूंद सी गिरी.

अब एक आध महीना सूरज आसमान वाले ‘चंदा’ में अपनी ‘चंदा’ की सूरत बनाता बिगाड़ता रहेगा. एक दो महीने बाद जब चंदा का सचमुच का नाम और पता मालूम हो जाएगा तो दो चार दिन उस गली में ऐसे ही घुर- फिर करेगा. कभी सायकिल का चेन उसके घर के सामने उतारेगा और इस उम्मीद से चढ़ाएगा कि उस के चेन चढ़ाते -चढ़ाते, चंदा छत पर आ आएगी, उसे दिख जाएगी. उसके ख्वाबों को हकीकत में बदल जाएगी.

फिर किसी दिन सचमुच ऐसा हो जाएगा. चंदा, सूरज को देखकर हौले से मुस्करा भर देगी. ग्रीन सिग्नल मिलते ही प्यार की गाड़ी फर्राटे भरने लगेगी. अब सूरज दो चार महीने धरती पर पांव न रखेगा. उड़ता सा फिरेगा, मनमौजी सा झूमेगा. उसका मन मयूर यूँ नाचता रहेगा मानो तपती जेठ में मनभावन सावन बरस पड़ा हो. मानो शुष्क पतझड़ में एकदम से चारों तरफ फूल ही फूल खिल गए हों.

इसके कुछ महीने बाद बड़ी हिम्मत करके सूरज , चंदा की किसी सहेली रोशनी के माध्यम से “दुनिया मांगे अपनी मुरादें, मैं तो मांगू चंदा” लिखकर और गुलाबी दिल को लाल रंग के तीर से चीरकर प्रेम पत्र भेज देगा. उस समय बहादुर प्रेमी अपने खुद के खून से और नाजुक प्रेमी खून से मिलते रंग से अपनी प्रेमिका को खत लिखा करते थे. चंदा को गुलाबी दिल की सुर्खियत बूझने और खून से लिखी शायरी का अर्थ समझने में अमूमन एक आध-महीना लग ही जाता था. फिर चंदा भी हिम्मत करके रोशनी के ही द्वारा-

” लिखती हूँ मैं भी खून से , स्याही न समझना, मरती तुम्हारी याद में, जिंदा न समझना”टाइप का रूमानी जवाब भेजती थी.

अब गांव के किसी शादी-ब्याह में एक दूसरे को देखकर वे मुस्कराते. किसी मेला, बाजार में एक दूसरे को देखकर खुश हो लेते. थोड़ा हिम्मत करके चंदा और सूरज किसी नदी-पोखर किनारे, किसी बाग में मिलने का कार्यक्रम बना ही रहे होते कि चंदा की शादी किसी राहु (ल) से तय हो जाती थी और जब तक सूरज इस ग्रहण से बाहर निकलता तब तक चंदा के दो छोटे छोटे उपग्रह सूरज को मामा बोलने आ जाते.

जा रे जबाना!!

Happy Chocolate Day 2024: चॉकलेट डे पर इजहार-ए-इश्क करने के लिए भेजें ये प्यार भरा मैसेज

Chocolate Day Wishes 2024 In Hindi: वैलेंटाइन वीक के तीसरे दिन यानी 9 फरवरी को चॉकलेट डे मनाया जाता है. यह दिन कपल्स के लिए काफी खास है. किसी रूठे को मनाना हो, गिफ्ट देना हो या किसी से प्यार जाहिर करना हो, तो चॉकलेट से अच्छा कोई ऑप्शन नहीं है. पोषक तत्वों से भरपूर चॉकलेट रिश्ते में मिठास घोलने का भी काम करती है. अगर आप भी इस दिन को यादगार बनाना चाहते हैं, तो अपने चाहने वालों को चॉकलेट जरूर दें, इसके अलावा ये प्यार भरे मैसेज भी आप उन्हें भेजकर चॉकलेट डे विश कर सकते हैं.

कुछ मीठा हो जाए कुछ प्यारा हो जाए, मोहब्बत अपनी बेशुमार हो जाए, दिन आज चॉकलेट डे है, तो क्यों न आज मीठे में कुछ खास हो जाए.
Happy Chocolate Day 2024

मीठा तो होना ही चाहिए, मीठे से ज्यादा मीठा प्यार होना चाहिए, दुनिया में कुछ ना हो इतना मीठा, जितना मीठा अपना साथ होना चाहिए.
हैप्पी चॉकलेट डे 2024

आपके जीवन में भरी रही खुशियां अपार, जैसे भरी होती है चॉकलेट में मिठास.
Happy Chocolate Day 2024

हर रिश्ते में विश्वास रहे, जुबान पर हर वक्त मिठास रहे, यही जिंदगी जीने का है अंदाज, न खुद रहो, न दूसरों को रहने दो उदास.
Happy Chocolate Day 2024

तेरा ये प्यार, लाया है बहार,प्यार की मिठास से सजा मेरा संसार चॉकलेट डे पर मैं करती हूं प्यार का इजहार.
Happy Chocolate Day 2024

चॉकलेट प्यार से भरी ला दो मुझको, आज अपने ही हाथों से तुम खिला दो मुझको, रिश्ता जो अपना है मोहब्बत का, आज मीठा और बना दो उसको.
Happy Chocolate Day 2024

किसने कहा पगली तुझसे कि हम तेरी खूबसूरती पर मरते हैं, हम तो उस चॉकलेटी अदा पर मरते हैं. जिस अदा से तू हमें देखती है.
Happy Chocolate Day 2024

Five Star की तरह दिखते हो, Munch की तरह शरमाते हो, Cadbury की तरह जब तुम मुस्कुराते हो, Kit Kat की कसम, तुम बहुत सुंदर नजर आते हो!
हैप्पी चॉकलेट डे

Chocolate Day 2024: आखिर प्यार करने वालों के लिए चॉकलेट डे का क्या है महत्व

Chocolate Day 2024: हर तरफ वैलेंटाइन वीक का जश्न मनाया जा रहा है. यह हफ्ता प्यार करने वालों के लिए बहुत ही खास होता है. इस हफ्ते में कई दिल जुड़ते हैं, तो वहीं कई दिल टूटते भी हैं. कल यानी 9 फरवरी को चौकलेट डे मनाया जाएगा. जैसा कि आप जानते हैं, किसी रिश्ते की शुरुआत करने में चौकलेट अहम भूमिका निभाता है. इसकी मिठास प्यार को और बढ़ा देती है.

वैलेंटाइन वीक के तीसरे दिन को मीठी चौकलेट के नाम से भी जाना जाता है.आपने पहले दिन अपने पार्टनर को गुलाब दे दिया, दूसरे दिन उसे अपना हाल-ए-दिल बता कर प्रपोज कर डाला, तो तीसरे दिन तो मीठा खाना बनता है न. इसके लिए चौकलेट से बेहतर कोई औप्शन नहीं हो सकता.

क्या आप जानते हैं चौकलेट खाने से लोग इतने खुश क्यों होते हैं, रिसर्च के अनुसार, चौकलेट में थियोब्रोमाइन और कैफीन होते हैं और इसे खाने से दिमाग में एंडोरफिन रिलीज होता है, जिस से हम आराम महसूस करते हैं. यह स्वाद में मिठास भरने के साथसाथ हमें रिलैक्स भी करती है. रिलैक्स होने का सीधा सा संबंध रिश्ते में नई ऊर्जा घोलना है.

चौकलेट की मिठास प्रेमी जोड़ों के रिश्ते को और ज्यादा मजबूत करती है. तो देर किस बात की आप अपने प्यार का दिल जीतना चाहते हैं, तो उन्हें गिफ्ट में चौकलेट जरूर दें, इससे आप दोनों एक-दूसरे के काफी करीब महसूस करेंगे.

चौकलेट का इतिहास

ऐसा कहा जाता है कि साल 1828 में एक डच कैमिस्‍ट कौनराड जोहान्‍स वान हौटन ने कोको प्रैस का आविष्‍कार किया था. इस मशीन की मदद से कोको बीज से कोको बटर को अलग किया गया था और इस के पाउडर से चौकलेट बनी थी. इस के बाद साल 1848 में एक ब्रिटिश चौकलेट कंपनी जेएस फ्राई एंड संस ने पहली बार कोको लिकर में कोको बटर और चीनी मिला कर इसे खाने लायक चौकलेट बनाया था.
आज तो न जाने कितने ब्रांड और स्वाद की चौकलेट बाजार में उपलब्ध हैं. जरूरी नहीं है कि महंगी ही चौकलेट खरीदी जाए, पर इस दिन अपने महबूब का चौकलेट से मुंह मीठा जरूर कराएं, क्योंकि यह मिठास आप के इस दिन के हर पल को खुशनुमा जो बना देगी.

क्या शादी के बाद गर्भ ठहर जाए तो अबौर्शन करवाएं या नहीं 

आज के कपल सेक्सुअल प्लेजर को लेकर एक्सपेरिमेंट करना तो पसंद करते हैं , उन्हें लगता है कि अगर कोई उच्च नीच हो भी गई तो क्या फर्क पड़ता है. वो कई बार जोशजोश में सावधानी बरतना भी भूल जाते हैं. और अगर एक पार्टनर दूसरे पार्टनर को याद भी दिलवाता है तो यही बोल दिया जाता है कि यार सारा मज़ा ख़राब मत कर, अभी तो मजे ले. लेकिन जब उनकी ये नासमझी एक बड़ी जिम्मेदारी का रूप लेने लगती है तो वे कतराने लगते हैं और बिना परिवार की सलाह के एबॉर्शन का फैसला ले लेते हैं. जो भले ही अभी उन्हें अपने पक्ष में नजर आता है, लेकिन ये उनके लिए बड़ी मुसीबत का कारण बन सकता है.

आकड़ों के हवाले से बताते हैं कि विकसित देशों में 45 पर्सेंट एबॉर्शन असुरक्षित तरीके से किए जाते हैं , जिसके कारण या तो महिलाओं की जान पर बन जाती हैं या फिर ये आगे चलकर इनफर्टिलिटी का कारण बनता है, जो उनकी जेब पर भारी पड़ने के साथसाथ उनकी हैल्थ पर भी गंभीर प्रभाव डालने का काम करता है . इसलिए जरूरी है समझदारी से फैसला लेने की. ताकि आपका अभी मां बनने का फैसला टालना आप पर भारी न पड़े. इस संबंध में जानते हैं फरीदाबाद के एशियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैडिकल साइंसेज की सीनियर कंसलटेंट एंड एचओडी गाइनाकोलोजी की डाक्टर पूजा ठकुराल से.

 क्या है अबौर्शन 

गर्भाश्य में भूर्ण का अपने आप अंत हो जाना या फिर उसे समाप्त करवा देना अबौर्शन या एबॉर्शन कहलाता है. ये आमतौर पर गर्भावस्था के 20 हफ्ते से पहले होता है, क्योंकि इससे बाद इसे करवाने की इजाजत नहीं होती है . अभी इसकी अवधि को बढ़ाकर 24 हफ्ते करने पर विचार चल रहा है. दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि परिपक्वता अवधि से पूर्व गर्भ के समापन की अवस्था है, जिसमें गर्भाश्य से भूर्ण खुद से निष्काषित हो जाता है या फिर कर दिया जाता है. इसके परिणामस्वरूप गर्भावस्था की समाप्ति हो जाती है. लेकिन  अबौर्शन चाहे खुद से हो या करवाया जाए , काफी तकलीफदेह होता है. ये मानसिक व शारीरिक रूप से आपको पूरी तरह से प्रभावित कर देता है. डाक्टर भी  अबौर्शन करवाने की सलाह नहीं देते हैं. उसी स्तिथि में  अबौर्शन करवाने को कहते हैं जब अल्ट्रासाउंड के माध्यम से बच्चे में किसी तरह की विकलांगता या दोष दिखाई देता है. ऐसे में जरूरी है आपके लिए जानना कि  अबौर्शन आपके लिए कितना नुकसानदेह साबित हो सकता  है.

अबौर्शन दो तरीके से होते हैं , पिल्स के जरिए या फिर डीएनसी , जिसे dilation एंड curretage , जिसे सर्जिकल प्रक्रिया कहा जाता है. जो डाक्टर की देखरेख में किया जाता है. लेकिन जब भी पिल्स के जरिए खुद से  अबौर्शन करवाया जाता है तो  जानलेवा  साबित होता है. क्योंकि भले ही दवाई से आपने बच्चे को तो गिरा दिया, लेकिन कई बार टिश्यू अंदर रह जाते हैं , जिससे आप अनभिक रहते हैं ,  जो गर्भाश्य में इंफेक्शन फैलाने के कारण आपकी मृत्यु का भी कारण बन सकता है. इसलिए भूलकर भी खुद से पिल्स न खाएं , बल्कि बहुत आवश्यक होने पर ही डाक्टर की देखरेख में इसे करवाएं, ताकि प्रोपर चेकउप , अल्ट्रासाउंड से पूरी स्तिथि के बारे में पता लग सके. और समय पर आपको सही इलाज मिल सके.

जानलेवा है असुरक्षित अबौर्शन  

भले ही आपको मेडिकल स्टोर से एबॉर्शन पिल्स आसानी से व सस्ते में मिल जाती हैं , लेकिन क्या आप जानते हैं कि बिना सोचे समझे इसका सेवन जानलेवा भी साबित हो सकता है. बता दें कि भारत में हर रोज 13 महिलाएं असुरक्षित तरीके की वजह से अबौर्शन करवाने के कारण अपनी जान से हाथ धोती हैं.  ये  असुरक्षित अबौर्शन भारत में मैटरनल डैथ का तीसरा बड़ा कारण है. देश में  हर साल 6.4 मिलियन प्रेग्रेंसीज़ टर्मिनेट होती हैं, जो बहुत बड़ा आकड़ा है.

रिसर्च में यह भी पता चला है कि 80 पर्सेंट महिलाएं इस बात से अंजान हैं कि भारत में एबॉर्शन लीगल है. जिस कारण वे अनट्रेंड लोगों से  अबौर्शन करवा कर अपनी जान को खतरे में डालने के साथसाथ लुटती भी हैं.

क्या हैं नुकसान 

1. अधिक ब्लीडिंग का कारण 

एबॉर्शन पिल्स को लेने के बाद ये शरीर में बनने वाले प्रेग्रेंसी हार्मोन प्रोजोस्ट्रोन को रोक देती है, जिससे भूर्ण यूतरस से बाहर आने लगता है. और जैसे जैसे उतेरुस पहले जैसे अपने साइज में आने लगता है, तो हैवी ब्लीडिंग होनी शुरू हो जाती है. जो कई बार महीने तक भी चलती है. जिससे कई बार शरीर में कमजोरी इतनी अधिक बढ़ जाती है कि जान पर आ बनती है.

2. पेट में दर्द 

एबॉर्शन पिल्स पेट में भारी दर्द का कारण बनती हैं . क्योंकि जब रक्त व टिश्यू निकलते हैं तो पेट में दर्द, जलन महसूस होती है. और कई बार रक्त निकलने के बाद भी जब मसल्स रिलैक्स नहीं हो पाती हैं तो पेट के निचले हिस्से में इतना अधिक दर्द होता है कि चलनाफिरना भी दुर्लभ हो जाता है. ऐसे में अगर तुरंत डाक्टर की सलाह नहीं ली जाती तो आपकी जान भी जा सकती है.

3. आधा अधूरा अबौर्शन 

बहुत से मामले ऐसे देखे गए हैं , जिसमें गोली पूरी तरह से असर नहीं करती है , जिसके परिणामस्वरूप टिश्यू पूरा बाहर नहीं निकल पाता  है. जिससे इंफेक्शन के कारण आपकी जान को भी खतरा हो सकता है. इसलिए डाक्टर की सलाह लेकर ही जरूरी होने पर ही करवाए अबौर्शन .

4. चक्कर आना 

अनचाहे गर्भ को समाप्त करने वाली दवाओं के सेवन से उलटी व चक्कर की समस्या का भी सामना करना पड़ता है. और तब यह स्तिथि और अधिक मुश्किल हो जाती है जब भी डाक्टर की सलाह के बिना इनका जरूरत से ज्यादा सेवन कर लेते हैं तो चक्कर व उलटी की समस्या ज्यादा बढ़ जाती है, जो संभाले नहीं संभलती. इसलिए आपके साथ ऐसा न हो , इसलिए डाक्टर की सलाह जरूर लें.

5. योनि से डिस्चार्ज 

कई महिलाओं को इन दवाओं के सेवन के बाद  योनि से डिस्चार्ज की भी समस्या का सामना कई महीनों तक करना पड़ता है. जो दवा का एक साइडइफ़ेक्ट है. जो अंदर होने वाले इंफेक्शन को दर्शाता है. ऐसे में अगर ये डिस्चार्ज लंबे समय तक चले तो तुरंत डाक्टर को दिखाएं ताकि स्तिथि को बिगड़ने से रोका जा सके.

अबौर्शन करवाने के और भी है नुकसान 

1. बांझपन की समस्या 

बारबार अबौर्शन करवाने से आपको बांझपन की समस्या हो सकती है. क्योंकि ये पिल्स इतनी इफेक्टिव होती हैं कि इन्हें बारबार लेने से ये आपके ूट्रेस को कमजोर बना देती है , जिससे भले ही आपकी उम्र छोटी हो फिर भी आपको मां बनने में मुश्किल होती है. इसलिए बारबार एबॉर्शन न करवाएं.

2. ज्यादा ब्लीडिंग से खून की कमी 

सलाह दी जाती है कि अगर आपमें खून की कमी है तो आप भूलकर भी एबॉर्शन पिल्स का सहारा न लें. क्योंकि इन दवाओं के सेवन से ज्यादा ब्लड निकलता है, जिससे आपमें खून की कमी होने के साथसाथ कई बार कमजोरी इतनी अधिक बढ़ जाती है कि आपके लिए उठना बैठना भी काफी मुश्किल हो जाता है. इसलिए अगर आपमें खून की कमी है तो पिल्स न लें.

3. मासिक धर्म का  डिस्टर्ब होना 

बार बार अबौर्शन करवाने से  मासिक धर्म डिस्टर्ब हो जाता है. क्योंकि हॉर्मोन्स का संतुलन जो बिगड़ जाता है और उसे वापिस आने में 2 – 3 महीने का समय लगता है. ऐसे में अगर बारबार अबौर्शन करवाया जाता है तो  हॉर्मोन्स का बैलेंस बिगड़ने से अंडों की क्वालिटी खराब हो सकती है, आपको ओवलूशन पीरियड को ट्रैक करने में भी मुश्किल हो सकती है. यही नहीं अगर इसी बीच आपको कोई गंभीर बीमारी भी लग गई तो फिर आपका मां बनना काफी मुश्किल सा हो जाता है.

4. पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज 

पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज, जिसे महिलाओं के रिप्रोडक्टिव ओर्गन में इंफेक्शन को कहते हैं. इसका कारण एबॉर्शन भी होता है. क्योंकि दवाई को या फिर मेडिकल इंस्ट्रूमेंट जो जब सर्विक्स के माध्यम से अंदर डाला जाता है तो उससे बैक्टीरियल आसानी से रिप्रोडक्टिव ओर्गन में प्रवेश कर जाते हैं. जो  पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज का कारण बनते हैं.  इसमें बच्चेदानी में सूजन होने के कारण आपको दर्द के साथ आगे कंसीव करने में दिक्कत हो सकती है.

5. बच्चेदानी का कमजोर पड़ना 

बारबार  अबौर्शन करवाने से  बच्चेदानी कमजोर पड़ने लगती है, जिससे आगे आपको मां बनने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. अगर आपने खुद से कंसीव भी कर लिया है तो आपका खुद से ही अबौर्शन हो जाता है , जो आपको मानसिक व शारीरिक दोनों तरह से कमजोर बना देता है. इसलिए अगर आप इस पीड़ा से बचना चाहती हैं तो  अबौर्शन न ही करवाएं.

6. लौंग टर्म डिजीज 

चाहे आप बारबार मेडिकल एबॉर्शन करवाएं या फिर सर्जिकल, ये दोनों ही नुकसानदायक होते हैं. इससे आपको इंफेक्शन होने के साथसाथ दवाओं के सेवन के कारण आपका वजन काफी बढ़ सकता है, जो ढेरों बीमारियों को न्यौता देने का काम करता है. साथ ही पेट दर्द,  उलटी की समस्या या आंत में सूजन होना, हार्मोन्स का संतुलन बिगड़ना की समस्या को भी झेलना पड़ सकता है. इसलिए  लौंग टर्म डिजीज से बचने के लिए एबॉर्शन से बचें.

हो पहले से तैयार 

अगर आप अपने कैरियर को लेकर बहुत ज्यादा कोस्कुइस हैं, और आप शादी के तुरंत बाद बच्चा नहीं चाहते तो उसके लिए पहले से पूरी तरह से तैयार रहें , जब भी सैक्स करें तो जोश में होश न खोएं, क्योंकि उस समय का उतावलापन आपको बाद में मुश्किल में लाए, इससे बेहतर है कि आप पहले से तैयार रहें. जब  करें तो वो सेफ सैक्स हो, ताकि बाद में आपको डॉक्टर्स के चक्कर न लगाने पड़े. आप इसके लिए काउंसलिंग भी ले सकते हैं . जिसमें आप अपनी प्रोब्लम्स बताएं , ताकि आपको उनसे बाहर निकलने के बेहतर ऑप्शंस मिलने के साथसाथ आपको फैमिली प्लानिंग के बारे में भी सही तरीके से गाइड करके आपके माइंड को सेट किया जा सके.

फ़ाइनेंशियल प्रोब्लम होने पर ही टाले फैसला

कई बार न चाहते हुए व एतियात बरतने के बावजुद भी गर्भ ठहर जाता है. ऐसे में अगर आप अभी फ़ाइनेंशियल तरीके से स्ट्रौंग नहीं हैं और आप मन ही मन बस यही सोच रहे हैं कि इतनी बड़ी जिम्मेदारी के साथ कैसे चीजों को मैनेज कर पाएंगे. कहीं इस वजह से और भी कई चीजें खराब न हो जाए. उसी स्तिथि में बस आपके लिए इस फैसले को टालना उचित होगा.  क्योंकि  फ़ाइनेंशियल प्रोब्लम आपको इस फैसले  साथ आगे बढ़ने पर मुश्किल में डाल सकती है. लेकिन आप डाक्टर के सलाह मशवरा के बाद ही ये निर्णय लें. क्योंकि कई बार उम्र ज्यादा होने पर आगे चलकर इससे बड़ी दिक्कत में भी आप फंस सकते हैं.

बरतें लापरवाही 

क्या आप परिचित हैं एक्टोपिक या ट्यूब प्रेग्रेंसी के बारे में, जिसमें आपका बच्चा ूट्रेस में न होकर फॉलोपियन ट्यूब में हो जाता  हैं. इसका मतलब फर्टीलिज़ेड अंडा ूट्रेस की मैन कैविटी के बाहर बड़ा होता है. आमतौर पर  फॉलोपियन ट्यूब में ही होता है. भारत में इसका आंकड़ा 100  में से एक प्रेग्रेंसी ट्यूब में होती है . जिसमें पेट के निचले हिस्से में दर्द के साथ हैवी ब्लीडिंग भी होती है . जिसमें जान को खतरा होता है. ऐसी स्तिथि में डॉक्टर को ट्यूब को रिमूव करने की भी जरूरत होती है. आप ही सोचिए अगर आप बिना डाक्टर की सलाह लिए ऐसी स्तिथि में पिल्स का सहारा ले लें, तो क्या होगा. इसलिए इस अहम निर्णय में डाक्टर का परामर्श जरूर लें.

ज्यादा उम्र में लें अबौर्शन का फैसला 

एक तो देरी से शादी होने और ऊपर से कैरियर बनाने के चक्कर में हम फैमिली प्लानिंग के बारे में सोचते नहीं हैं और अगर गलती से हो गया तो एबॉर्शन करवा लेते हैं.  लेकिन क्या आप जानती हैं कि बढ़ती उम्र में अंडों व स्पर्म की क्वालिटी प्रभावित होती है, जिससे मां बनना थोड़ा मुश्किल हो जाता है. ऐसे में अगर आप देरी करें या फिर एबॉर्शन करवा लें और फिर जब आपको जरूरत हो तब खुद से आपको कंसीव करने में दिक्कत हो , तो आपको लाखों रुपए खर्च करने पड़ सकते हैं. उसके बाद भी गारंटी नहीं कि आप मां बन ही सकती हैं. क्योंकि इसके लिए आपको आईवीएफ का सहारा लेना पड़ेगा. जिसके नाम पर अच्छीखासी दुकानदारी चलाई जा रही है. बता दें कि आपको  आईवीएफ के लिए लाखों खर्च करना पड़ेगा. साथ ही शारीरिक व मानसिक पीड़ा अलग झेलनी पड़ेगी. इसलिए एबॉर्शन के फैसले को सोचसमझ कर ही लें.

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