Social Story: स्टे ऑर्डर- सभी लोग वकील के पास क्यों पहुंचे

Social Story: नगर निगम के अतिक्रमण हटाओ दस्ते का सहायक अभियंता और अन्य कर्मचारी आखिरकार इस ब्लाक में भी आ गए. पिछले 3-4 दशकों से ब्लाक के फ्लैटों में रहने वाले निवासियों ने थोड़ाथोड़ा कर के अवैध निर्माणों का एक सिलसिला बना दिया था. ऊपरी आदेशों से इन की पहचान कर सब को गिराना था.

ज्यादातर अतिक्रमण भूतल पर था. एक फ्लैट के मकान मालिक ने अतिक्रमण किया तो देखादेखी दूसरों ने भी कर डाला. सरकारी प्रौपर्टी थी, कौन पूछता. मगर कभीकभी नगर निगम नींद से जाग जाता था. संबंधित अधिकारियों को अपनी और दूसरे कर्मचारियों की जेब गरम करने की जरूरत पड़ जाती तब दोचार दिन तक अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाया जाता. जब भेंटपूजा हो जाती तब अभियान ठंडा पड़ जाता था.

इसी घटनाक्रम में कई ब्लाकों के नवयुवा वकील बड़े वकीलों की मातहती में वकालत करने लगे. तब उन्होंने कभीकभी आ पड़ने वाली ऐसी आपदा का प्रबंध करने का एक तरीका सुझाया. सारे ब्लाक वाले मिल कर संयुक्त आवेदन करें और मजिस्ट्रेट के पास दलील दें कि ऐसा कब्जा काफी समय से चला आ रहा था. पूरी सुनवाई किए बिना नगर निगम को किसी निर्माण कार्य को इस तरह गिराने का अधिकार नहीं है. तब यथास्थिति यानी अदालत से ‘स्टे’ का आदेश मिल गया था. सभी ब्लाक वालों के जिम्मे मात्र 75 रुपए का खर्च आया था.

तब यह 75 रुपए वाला ‘स्टे आर्डर’ का फार्मूला यानी युक्ति अन्य चालू और भ्रष्ट वकीलों ने भी पकड़ ली थी. तब एक मिलीभगत के अंतर्गत थोड़ेथोड़े समय के अंतर पर नगर निगम कभी किसी ब्लाक में, कभी किसी कालोनी में अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाता. निवासी इकट्ठे हो, 75 रुपए वाला ‘स्टे आर्डर’ ले लेते थे. वकीलों को एकमुश्त भारी फीस मिल जाती. ‘स्टे आर्डर’ बरकरार रखने के साथ लंबी तारीख पड़ फाइल मुकदमों में लग जाती.

मजिस्ट्रेट भी एक रूटीन के तौर पर ऐसे मुकदमे निबटाता था. सरकारी पक्ष की ओर से कोई दबाव नहीं पड़ा था, इसलिए लंबे अरसे तक पैंडिंग लिस्ट में रह कर ऐसे मुकदमे या तो खारिज हो जाते या फिर कोई नया जोशीला विधायक या नगर पार्षद चुनावी वादों में ये मुकदमे खत्म करवा देता था.

इस बार का अतिक्रमण हटाओ अभियान जरा जोशीले उच्चाधिकारी द्वारा चलाया गया था. रिश्वत या सिफारिश की गुंजाइश नहीं थी. अतिक्रमण हटाना निश्चित था.

दीनदयालजी सूर्य परायणी ब्राह्मण थे. उन का भूतल पर 2 कमरों का एक प्लाट था. पूजापाठ करते थे. दूसरों की देखादेखी उन्होंने सरकारी जमीन पर अच्छाखासा कब्जा कर मंदिर बना डाला था और मंदिर में सर्वमंगलकारी हनुमान सहित दूसरे देवीदेवताओं की मूर्तियां स्थापित कर दीं थीं. पौ फटते ही श्रद्धालु भक्तों का जो तांता लगता उस से मंदिर में चढ़ावे के रूप में अच्छी आमदनी हो जाती थी.

मगर अब अतिक्रमण अभियान में यह मंदिर भी आ गया था. 75 रुपए वाला ‘स्टे आर्डर’ अब नहीं मिल सकता था. वैसे तो मंदिर का चढ़ावा हर रोज सैकड़ों में  था पर पर्वों में यह चढ़ावा हजारों में हो जाता था. मंदिर ढह जाता तो चढ़ावे की कमाई भी जाती रहती. मंदिर में आने वालों में नगर निगम के कर्मचारी भी थे. मगर सरकारी आदेश तो आखिर सरकारी आदेश ही था.

सरकारी दस्ता पहले ही आ कर पैमाइश कर गया था और लोगों को नोटिस थमा गया था. 7 दिन में अतिक्रमण हटा दें वरना बुलडोजर या जे.सी.बी. मशीन द्वारा नाजायज कब्जा ढहा दिया जाएगा.

दूसरे ब्लाक के लोगों के पास भी ऐसे नोटिस आए थे. 75 रुपए वाला जमाना अब नहीं था. तब जमीनजायदाद चंद सौ रुपए गज की थी, अब गज में नहीं प्रति वर्गफुट में कई हजार रुपए की कीमत थी.

फिर सरकारी जमीन या प्रौपर्टी सरकारी ही थी. कोई न कोई पंगा खड़ा हो सकता था. क्या करें? पंडितजी अकेले क्या कर लेते? अन्य किसी के पास अपने अवैध कब्जे को जायज ठहराने का कोई तर्क नहीं था.

लेदे कर उन्हीं के पास तर्क था कि इस मंदिर को सभी कालोनीवासियों ने अपने भगवान की पूजापाठ के लिए बनाया था, उसे न ढहाया जाए.

ब्लाक के सभी निवासी एकसाथ जमा हो पंडितजी के साथ एक नामी वकील के पास पहुंचे. ‘‘यों किसी निर्माण को नहीं हटाया जा सकता. सारी कार्यवाही पूरी करनी पड़ती है. सैकड़ों लोगों के आज और कल का सवाल है,’’ अधेड़ वकील ने रौब भरे स्वर में दलील दी.

‘‘मगर कल सुबह नगर निगम अपना बुलडोजर ले कर आ रहा है,’’ एक साहब ने कहा. ‘‘मजाल नहीं हो सकती किसी की. मेरे होते हुए आप को छूने की भी,’’ वकील ने तैश से कहा. ‘‘अब हम क्या करें?’’ सभी ने समवेत स्वर में कहा.

‘‘सब को ‘स्टे आर्डर’ लेना होगा.’’ ‘‘क्या खर्च पड़ेगा?’’ ‘‘हर एक के लिए 5 हजार रुपए, जमा खर्च अलग.’’ ‘‘मगर अब तक तो 75 रुपए था. एक  ‘स्टे आर्डर’ का.’’ ‘‘जनाब, वह 10-20 साल पहले का रेट है. तब जमीन 100 रुपए गज थी. अब प्रति वर्गगज नहीं प्रति वर्गफुट के हिसाब से भी जगह नहीं मिलती,’’ वकील साहब की दलील में दम था.

‘‘हमारे इन निर्माण कार्यों को कोई छुएगा तो नहीं?’’ एक साहब ने शंका भरे स्वर में पूछा. ‘‘आप तसल्ली रखें. मैं जिम्मेदारी लेता हूं,’’ वकील ने दृढ़ स्वर में कहा. थोड़ी देर में 5 हजार रुपए जमा व 1 हजार रुपए खर्च प्रति नाजायज कब्जे के हिसाब से 60 हजार रुपए वकील साहब को 10 वकालतनामों के साथ मिल गए थे. उस में से नगर निगम के कर्मचारियों को उन का तय हिस्सा पहुंच गया. 5 हजार रुपए वाला आम ‘स्टे आर्डर’ अब 50 हजारी हो गया था.

पंडितजी के मंदिर में आज ज्यादा भक्त आए थे. नगर निगम का कोई कर्मचारी अतिक्रमण हटाने जो नहीं आया था. ब्लाक के सभी लोग और मंदिर के पुजारी निश्चिंत थे. कभी 75 रुपए वाला ‘स्टे आर्डर’ अब 5 हजारी होने पर भी उन्हें अखर नहीं रहा था.

इस घटना के अगले दिन 10 बजतेबजते एक जे.सी.बी. मशीन और कुदाली, फावड़े लिए अनेक मजदूर और नगर निगम के कर्मचारी आ पहुंचे. कालोनी में जो लोग वकील के पास गए थे वे सभी उन को देख कर सकपका गए.

‘‘हम ने वकील से बात की थी. उन्होंने कहा था कि हम को ‘स्टे आर्डर’ मिल चुका है,’’ मंदिर और अन्य अवैध निर्माण को गिराने आए नगर निगम के कर्मचारियों से पंडितजी ने कहा.

‘‘दिखाइए, कहां है आप का ‘स्टे आर्डर’?’’ सहायक अभियंता ने स्थिर स्वर में कहा. ‘‘हमारे वकील साहब के पास है.’’ ‘‘ले कर आइए.’’‘‘थोड़ा समय लग सकता है.’’ ‘‘कोई बात नहीं, हम इंतजार कर सकते हैं. अभी 10 बजे हैं. आप दोपहर 3-4 बजे तक हमें ‘स्टे आर्डर’ दिखा दें,’’ सहायक अभियंता ने गंभीरता से कहा.

सभी ब्लाक निवासी समेत पंडितजी वकील साहब की कोठी में स्थित दफ्तर में पहुंचे. ‘‘आप कहते हैं कि ‘स्टे आर्डर’ मिल चुका है जबकि नगर निगम का अतिक्रमण दस्ता हमारे सिर पर आ चुका है,’’ पंडितजी ने तनिक गुस्से में कहा. ‘‘आप धैर्य रखें. मैं अपने मुंशी और सहायक वकील से पूछता हूं,’’ पुराने घाघ वकील ने कुटिलता से मुसकराते हुए कहा.

थोड़ी देर तक वकील साहब फोन पर अपने मुंशी और सहायक वकील से बात करते रहे. फिर उन्होंने मुसकराते हुए कहा, ‘‘ऐसा है, कोर्ट में कल काम थोड़ा ज्यादा था. जज साहब सुनवाई नहीं कर पाए. अब कल सुनवाई होगी और कल शाम को ‘स्टे आर्डर’ मिल जाएगा.’’

इस पर सब के चेहरे लटक गए. फिर शर्माजी बोले, ‘‘नगर निगम के कर्मचारी सिर पर खड़े हैं.’’ ‘‘उन से कह दो, कल शाम तक मोहलत दे दें.’’3 बजे सहायक अभियंता और दलबल फिर आ पहुंचा. ‘‘हमारे वकील साहब ने कहा है कि ‘स्टे आर्डर’ की कापी कल मिलेगी,’’ शर्माजी के स्वर में घबराहट थी.

सहायक अभियंता मुसकराया और बोला, ‘‘कल किस समय तक मिल जाएगा?’’ ‘‘शाम तक मिल जाएगा.’’ ‘‘ठीक है हम परसों सुबह आएंगे,’’ दलबल वापस चला गया. सभी ब्लाक निवासी सहायक अभियंता के व्यवहार से हैरान थे. यों कोई सरकारी काम में मोहलत नहीं देता था.

अगले दिन सुबह पंडितजी और ब्लाक के दूसरे निवासी कोर्ट परिसर में जा पहुंचे. उन में से कई पहली बार अदालत आए थे. अब तक 75 रुपए वाला ‘स्टे आर्डर’ बिन अदालत आए मिल जाता था. मगर अब 5 हजारी भी नहीं मिला था.

अदालत परिसर में वकील साहब अपने बैठने के स्थान पर पसरे थे. न्यायालय भी कई दर्जन थे. इमारत भी कई मंजिला थी. दोपहर बाद पेशी थी. सभी को उम्मीद थी कि आज पहली पेशी पर ‘स्टे आर्डर’ हो जाएगा. बाद की बाद में देखी जाएगी.

न्यायाधीश अंदर चैंबर में आराम फरमा रही थीं. रीडर फाइलें अंदर ले जाता था और संक्षिप्त आदेश ले आता. तारीख दे आसामी से 100-150 पाने का इशारा करता. अब 10-20 रुपए में कुछ नहीं होता था.

शर्माजी और ब्लाक निवासियों के मुकदमों की सुनवाई आरंभ हुई. मैडम कुरसी पर आ विराजीं. ‘‘आप का सरकारी जमीन पर कब्जा करने का आधार क्या है?’’ ‘‘जी, उस पर एक मंदिर बना हुआ है. पूजापाठ तो सब का मौलिक अधिकार है. उस को गिराना नाजायज है.’’

‘‘यह तो कोई कारण नहीं है. पूजापाठ निजी मामला है. घर में भी हो सकता है. अन्य सभी के पास क्या कारण हैं?’’ ‘‘जी, खुली जगह से अवांछित तत्त्व प्रवेश कर जाते हैं,’’ दूसरे ने कहा, ‘‘इसलिए, सुरक्षा के लिए किसी ने दरवाजा, बाड़ या जंगला लगा रखा है.’’

‘‘यह कोई कारण नहीं है. अपने घर या संपत्ति पर कोई बाड़, दरवाजा या जंगला लगाओ, सरकारी संपत्ति पर कब्जा किस बात का है,’’ मैडम के इस सवाल पर पुराना घाघ वकील भी सकपका गया. उस को कोई जवाब न सूझा. मुकदमा खारिज हो गया. 75 रुपए वाले ‘स्टे आर्डर’ के समान 5 हजारी ‘स्टे आर्डर’ नहीं मिल पाया. पहली ही पेशी में मुकदमा खारिज होने से सब हैरान थे.

नियत समय पर अतिक्रमण हटाओ दस्ता आ पहुंचा. ‘‘यह हनुमान मंदिर है,’’ पंडितजी की आमदनी का साधन जा रहा था. उन का बौखलाना स्वाभाविक था.‘‘कोई बात नहीं है,’’ सहायक अभियंता ने कहा, ‘‘हम भुगत लेंगे, आप मूर्तियां और अन्य सामान हटा लें.’’

चंद मिनटों में जे.सी.बी. मशीन ने अपना काम कर दिया. सारा ब्लाक फिर से साफसुथरा और खुला हो गया. ब्लाक के रहने वालों को यह समझ में नहीं आया था कि रिश्वत और पहुंच का सिलसिला कैसे असफल हो गया और महाबली हनुमान भी उन की रक्षा को आगे क्यों नहीं आए? अब उस जगह पर नगर निगम वालों की सुंदर पार्क और सामुदायिक केंद्र बनाने की योजना है.

Social Story

Crime Story: रक्षक-भक्षक

Crime Story: जीबी रोड दिल्ली की बदनाम जगहों में से एक है. रेड लाइट एरिया. तमाम कोठे, कोठा मालकिनें और देहव्यापार में लगी सैक ड़ों युवतियां यहां इस एरिया में रहती हैं. मैं सेन्ट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (सीआईएसएफ) में सब इंस्पेक्टर के तौर पर तैनात थी. ट्रेनिंग पूरी हुए अभी छह महीना ही हुआ था. नई ज्वाइनिंग थी. एक रोज दिल्ली मेट्रो में सफर के दौरान एक लड़की लेडीज कोच में बेहोश हो गई थी. रात नौ बजे का वक्त था. उस लड़की को संभालने के लिए जो दो लोग आगे बढ़े उनमें एक मैं थी और दूसरी वंदना. तब मैं वंदना को जानती नहीं थी. वह तो उस रोज उस मेट्रो मे मेरी सहयात्रि भर थी. उस बेहोश लड़की को लेकर हम कोच से बाहर आए. तब तक मेट्रो कर्मचारी भी पहुंच गए थे.

काफी देर बाद उस लड़की को होश आया. मैं और वंदना तब तक उसके साथ ही रहे. उसका पता पूछ कर हम रात के ग्यारह बजे ऑटो से उसके घर तक छोड़ने गए. वापसी में मैंने पहली बार वंदना से उसका नाम पूछा था और उसने मेरा. फिर पता चला कि वह एक पत्रकार है, आगरा से दिल्ली आयी है, किसी पत्रिका में काम करती है. वंदना मुझे बहुत कुछ अपनी तरह ही लगी. मेरी ही उम्र की थी. हिम्मती, बेखौफ, तेज, मददगार और मिलनसार. हमारी दोस्ती हो गई. फोन पर लम्बी-लम्बी बातें होतीं. छुट्टी मिलती तो दोनों साथ ही शॉपिंग भी करते और फिल्में भी देखते थे.

उस रोज हम रेस्त्रां में बैठे इडली-सांभर खा रहे थे कि अचानक वंदना ने मुझे जीबी रोड चलने का न्योता दे दिया. पुलिस में होते हुए भी मुझे एकबारगी झिझक लगी, मगर फिर मैंने हामी भर दी. पूछा, ‘किस लिए जाना है? क्या स्टोरी करनी है?’

उसने कहा, ‘वहां मेरा एक जासूस है, जब भी वहां कोई नई लड़की या लड़कियों का झुंड आता है, वह मुझे खबर दे देता है. पता चला है कल रात नेपाल से काफी लड़कियां आई हैं, जिनमें से बहुत सी नाबालिग हैं.’
‘अच्छा…’ मुझे आश्चर्य हुआ, ‘लोकल पुलिस को पता है?’ मैंने पूछा.

‘पता तो होगा, सब उनकी नाक के नीचे ही होता है.’ वंदना ने जवाब दिया. मुझे उसकी बात पर यकीन नहीं हुआ, उससे कोफ्त भी हुई कि क्या समझती है ये पुलिस को? मैंने गुस्से में कहा, ‘अगर वहां ऐसा कुछ हुआ है तो पुलिस अब तक कार्रवाई कर चुकी होगी.’

वंदना ने इडली खाते हुए इत्मिनान से जवाब दिया, ‘पुलिस कुछ नहीं करती है, कल चल कर देख लेना. मुझे भी बस स्टोरी करनी है, बौस ने कहा है इसलिए… मैं भी उन पर लिख कर क्या उखाड़ लूंगी, जब सिस्टम ही काम नहीं करता.’

वंदना की बातों ने मुझे खीज से भर दिया था. ये तो सरासर आरोप लग रहा है वर्दी पर. कैसे सहन होता. ट्रेनिंग के दौरान सत्य, न्याय, देशभक्ति, कानून, साहस, वीरता के ढेरों पाठ पढ़े थे, ये लड़की तो उनके पन्ने फाड़ने पर तुली है. बड़ी पत्रकार बनी फिर रही है, कल तो इसके साथ जाना ही होगा.

हम दूसरे दिन दोपहर में वहां पहुंच गए. वंदना के कहने पर मैंने सलवार-सूट और दुपट्टा ओढ़ा हुआ था, जबकि आमतौर पर मैं जींस टीशर्ट ही पहनती हूं, या वर्दी में रहती हूं. वंदना ने एक कोठे के नीचे पहुंच कर किसी को फोन किया. थोड़ी देर में एक दुबला-पतला आदमी आया और वंदना से बोला, ‘मुंह ढंक लीजिए, यहां आप मेरी रिश्तेदार हैं.’

वंदना ने तुरंत अपने दुपट्टे को मुंह पर लपेट लिया, बस आंखें खुली रखीं. मुझे इशारा किया तो मैंने भी वैसा ही किया. वह आदमी हमें लेकर ऊपर कोठे पर चढ़ गया. हम वहां काफी देर एक कमरे में जमीन पर बिछी दरी पर बैठे रहे. वहां तमाम लड़कियां थीं. हर तरफ पर्दे जैसे पड़े थे. ग्राहक आते और लड़कियां उनके साथ पर्दे के पीछे चली जातीं. काफी देर हो गई. मैं बैठे-बैठे उक्ता रही थी. शाम हो चुकी थी. वंदना धीरे-धीरे उस आदमी से बातें कर रही थी. वह इसी कोठे में रहता था. नाम था इदरीस. तभी मैंने छह लड़कियों को अंदर आते देखा. लड़कियां छोटी थीं. यही कोई बारह से पंद्रह वर्ष के बीच की. उनके साथ चार आदमी भी थे. वे सभी अंदर आते ही एक-एक लड़की के साथ पर्दे के पीछे लोप हो गए. दो लड़कियां बच गईं, जो मेरे सामने ही आकर बैठ गईं. मैं हैरानी से देख रही थी.

वंदना की बात बिल्कुल सच थी. लड़कियां वाकई नाबालिग थीं. नेपाली थीं. यहां इस कोठे के नीचे ही सटी हुई पुलिस चौकी है, क्या उन्हें अपने एरिया में आने वालों के बारे में पता नहीं लगा होगा? आखिर कैसे ये नाजायज काम यहां आराम से चल रहा है? यह सवाल मेरे मन में उथल-पुथल मचा ही रहा था कि दरवाजे से दो वर्दीधारी भीतर घुसे. कंधे पर चमचमाते बैच बता रहे थे कि दोनों सब इंस्पेक्टर रैंक के थे. मेरे शरीर में अचानक करेंट दौड़ गया. विजयी मुस्कान चेहरे पर आ गई. लो आ गए कानून के रखवाले छापा मारने…
वंदना ने मेरे हाथ पर हाथ रख कर दबाया. खामोश रहने का इशारा दिया. मेरे अंदर जैसे कुछ टूट गया. तड़ाक… तड़ाक… धम्म…. चेहरा निस्तेज हो गया… सामने बैठी दोनों नाबालिग बच्चियां उन दोनों वर्दी वालों के साथ पर्दे के पीछे लोप हो गईं.

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Hindi Love Story: सरिता- क्या पूरा हुआ देव का प्यार

Hindi Love Story: वह ठीक मेरे सामने से गुजरी. एकदम अचानक. मन में बेचैनी सी हुई. उस ने शायद देख लिया था मुझे. लेकिन अनदेखा कर के पल भर में बिलकुल नजदीक से निकल गई. जैसे अजनबी था मैं उस के लिए. कोई जानपहचान ही न हो. इस जन्म में मिले ही न हों कभी. मेरा कोई अधिकार भी न था उस पर कि आवाज दे कर रोक सकूं

और पूछूं कि कैसी हो? क्या चल रहा है आजकल? उस ने भी शायद बात करना नाजायज समझा हो. शायद इस तरह आमनेसामने से निकलने पर उसे लग रहा हो जैसे कोई गुनाह हो गया हो उस से. आज का दिन उस के लिए बुरा साबित हुआ हो. कहां से टकरा गए? क्यों, कैसे देख लिया?

यही वह लड़की थी. लड़की पहले थी अब तो वह महिला थी शादीशुदा. किसी की पत्नी. लेकिन जब मेरी पहली मुलाकात हुई थी उस समय वह लड़की थी. एक सुंदर लड़की, जो मुझ से मिलने के लिए बहाने तलाशती थी. मुझे देखे बिना उसे चैन न आता था.

हम कभी पार्क में, कभी रैस्टोरैंट में, कभी क्लब में तो कभी सिनेमाहाल में मिलते.

धीरेधीरे प्यार परवान चढ़ने लगा. प्रेम के पंख लगते ही हम उड़ने लगे. आसमान की सैर करने लगे. जब मौका मिलता मोबाइल पर बातें करते. एकदूसरे को एसएमएस करते रहते. दोनों दुनिया से बेखबर प्यार में डूबे रहते. बहुत थे उसे देखने वाले. बहुत थे उस के चाहने वाले. लेकिन वह केवल मेरे साथ थी, मेरी थी. वह मुझ से बेइंतहा प्रेम करती थी. देखता तो मैं उसे रहता था. लेकिन मेरे देखने से क्या होता है? ताजमहल को हजारों लोग देखते हैं. बात तो तब थी जब वह मुझे देखे.

कालेज शुरू हो चुका था. वह प्रथम वर्ष में थी और मैं द्वितीय वर्ष में. जैसाकि रिवाज चला आया है कालेजों में नए छात्रों की खिंचाई करना. उन्हें परेशान करना. अपमानित करना. प्रताडि़त करना. इसे परिचय का नाम देने वालों को पता नहीं था कि बाद में यह कुरीति बन कर गंभीर अपराध का रूप धारण कर लेगी.

जब सीनियर छात्रों ने उस से कहा कि वह आई लव यू कहे तो उस ने इनकार कर दिया. लड़कों ने उसे घेर कर बियर पीने को कहा. उस ने इनकार कर दिया. लड़कों ने कहा कि वह अपनी सलवार या कमीज दोनों में से कोई एक उतार दे. उस ने मना कर दिया. सीनियर छात्रों ने इसे अपना अपमान समझा. उन्होंने उस के गालों पर तमाचे मारना शुरू कर दिया. फिर तमाचों की चोट से वह तिलमिला कर चीखने लगी.

सभी सीनियर लड़के बारीबारी आते और जोरदार थप्पड़ मार कर हंसते हुए निकल जाते. उस की आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी. मेरा नंबर भी आया. मैं ठीक उस के सामने था. वह डर, क्रोध, अपमान से थरथरा रही थी. मैं उस के नजदीक से निकल गया बिना उसे तमाचा मारे. फिर सीनियर छात्रों ने उसे जबरदस्ती बियर पिला दी. उस के कपड़े फाड़ने की कोशिश की. वह अपमान व पीड़ा से बिलखती हुई वहीं बैठ कर रोने लगी. फिर बियर से उस का सिर भारी होने लगा. उस का चेहरा मेरी नजरों के सामने घूमा. मैं वापस वहीं पहुंचा, जहां उस की रैगिंग हो रही थी. वहां कोई नहीं था. वह बेसुध पड़ी हुई थी. मैं उसे अस्पताल ले गया. उस के मोबाइल से उस के घर का नंबर ले कर उन्हें इतला दी.

उस के पिता शहर के बड़े उद्योगपति थे. हालात मालूम होने पर उन्होंने पुलिस को इतला दी. लड़की के पिता के पास धनबल, राजनीतिक बल था. उन्होंने कालेज की ईंट से ईंट बजा दी. इस से पहले कि लड़कों पर कोई कानूनी काररवाई होती, उन्होंने लड़की से अस्पताल में जा कर माफी मांग ली. बात खत्म हो गई.

उस के पिता ने मेरा शुक्रिया अदा किया. जब छोटी औकात वाले का शुक्रिया अदा किया जाता है तो उसे शुक्रिया के रूप में कुछ रुपए दिए जाते हैं, यह कह कर कि रख लो प्यार से दे रहा हूं. मेरी मना करने की हिम्मत नहीं हुई. न चाहते हुए भी लेने पड़े. एक करोड़पति आदमी, आलीशान कोठी. गेट पर दरबान. लाइन से खड़ी महंगी चमचमाती गाडि़यां. मैं उन के व्यक्तित्व के आगे दब गया था. अगर कालेज के लड़कों को उस के पिता की औकात के बारे में पता होता तो भूल कर भी यह गलती न करते. अब सब उस से संबंध बनाने का प्रयास करने लगे. लेकिन उस ने मुझे देखा उस नजर से, जिस नजर से इस उम्र में हर कोई चाहता है कि उसे देखा जाए. वह मुझे कालेज कैंटीन में ले जाती. यदि मैं पहले से किसी दोस्त के साथ बैठा होता तो वह आ कर कहती ऐक्सक्यूजमी, क्या मैं बैठ सकती हूं? क्या आप हमें अकेला छोड़ सकते हैं? मेरे दोस्त शर्मिंदगी, गुस्से से उठ कर चले जाते.

‘‘हैलो, मैं सरिता,’’ उस ने हाथ बढ़ाया.

‘‘मैं, देव,’’ मैं ने हाथ बढ़ाया.

2 हाथ मिले. आंखें चार हुईं. धड़कनों की गति बढ़ी. कुछ और नजदीकियां बढ़ीं और पास आए. गले मिलने लगे तो धमनियों में रक्त का संचार बढ़ने लगा. कालेज की ओर से पिकनिक टूर हुआ. मैं अपनी आर्थिक स्थिति के चलते जाने को राजी न था. उस ने अपनी तरफ से मेरी फीस अदा की और मुझे यह कह कर ले गई कि पिकनिक तो बहाना है. हमें एकदूसरे के साथ समय बिताने का मौका मिलेगा.

सभी छात्र हिल स्टेशन का लुत्फ उठाते रहे. लेकिन हम दोनों बांहों में बांहें डाले

अपनी ही दुनिया में खोए रहे. प्यारमुहब्बत के वादे करते रहे. हम दोनों एकदूसरे के दिल की गहराइयों में उतर चुके थे.

उस ने कहा, ‘‘मैं तुम से प्यार करती हूं. तुम्हारे बिना जी नहीं सकती.’’

‘‘प्यार तो मैं भी तुम से करता हूं, लेकिन इस प्यार का अंजाम क्या होगा?’’ मैं ने कहा.

‘‘वही जो हर प्यार का होता है.’’

‘‘मैं गरीब हूं.’’

‘‘तो क्या हुआ?’’

‘‘अपने पिता से पूछ कर देखना.’’

‘‘यार, प्यार मैं ने किया. शादी मुझे करनी है. जीवन मेरा है. जीना मुझे है. इस में मेरे पिता का क्या लेनादेना?’’

‘‘यह भी पिता से पूछ कर देखना.’’

वह चिढ़ गई. मैं ने उसे मनाने का हर जतन किया. उसे फिल्मी शेरोशायरी सुनाई. प्रेम भरे गीत सुनाए. उस से लिपट गया. उस के गालों को चूमा. उस से माफी मांगी. वह खिलखिला पड़ी. स्वच्छ, पवित्र बहती नदी की तरह. अपने नाम की तरह.

हमारी मुलाकातें बढ़ती गईं. हमारा प्यार बढ़ता गया. कालेज में सब को पता था हमारे प्यार के बारे में. सब जलते थे हमारे प्यार से.

एक दिन सरिता ने कहा, ‘‘मुझे अपने घर के लोगों से मिलवाओ.’’

मैं डर गया. क्या सोचेगी? कहीं मेरी गरीबी का मजाक तो नहीं उड़ाएगी? किस से मिलवाऊं घर में? गरीब महल्ले में 1-2 कमरे का कच्चा मकान. जवानी की दहलीज लांघ चुकी कुंआरी बहन, जिस की शादी दहेज के कारण न हो सकी. विधवा बूढ़ी मां, जिस के मन में ढेरों बोझ, चेहरे पर झुंझलाहट और मुंह में कड़वे बोल थे. क्या कहेगी मां कि मेहनत, मजदूरी कर के पढ़ाने के लिए भेजा और बहन की शादी करने के बजाय खुद इश्क कर रहा है. अपनी शादी की योजना बना रहा है.

खैर, सरिता नहीं मानी. मैं उसे घर ले गया. वह बहन से मिली. मां से मिली. प्यार से बातें हुईं. चायनाश्ता भी. लेकिन सरिता के जाने के बाद मां ने मुझ से कुछ कहा तो नहीं, लेकिन खफाखफा सी नजर जरूर आईं. उन का अनकहा मैं समझ गया. मुझे नौकरी तलाश कर घर चलाना है. मुझे हर हाल में बहन की शादी करनी है. यह मेरा दायित्व है. बाकी सब बाद में. पढ़ाई के साथसाथ में नौकरी के फार्म भी भर रहा था. तैयारी भी कर रहा था नौकरी की. लेकिन हर जगह से नाउम्मीदी, असफलता. घर में घुटन सी होती. पढ़ाई से मन हटने लगा था. लेकिन मेरे हाथ में कुछ न था. मेरे पास एक सीधा रास्ता यह था कि सरिता से शादी कर के घरजमाई बन कर अपनी गरीबी से मुक्ति पा लेता. लेकिन आत्मसम्मान आड़े आता रहा.

सरिता करोड़पति पिता की इकलौती बेटी थी. वह प्यार के खुमार में महल से झोपड़े में आने को तैयार थी. वह मुझे झोपड़े से महल में ले जाने को भी राजी थी. लेकिन मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं और क्या न करूं? मैं कैसे एक कलकल बहती पावन, शुद्ध साफ नदी का रुख मोड़ कर उसे अपनी गरीबी के दलदल में ले आऊं? कितने दिन रह पाएगी? कैसे उन अभावों को सह पाएगी? क्यों लूं मैं उस से इतनी बड़ी कुरबानी? कैसे मैं उस के घर जा कर अपने जमीर को मार कर उस की अमीरी में अपना मुंह छिपा लूं? क्या सोचेगी मेरी बूढ़ी मां, जिस के पास पूंजी के नाम पर सिर्फ मैं था?

‘‘तुम्हारी समस्या क्या है?’’ सरिता ने पूछा, ‘‘मैं सब में राजी हूं. या तो तुम निकलो अपनी गरीबी से या फिर मुझे ले चलो अपनी गरीबी में. मुझे सिर्फ तुम्हारा साथ चाहिए. जगह जो भी हो. महल हो या झोंपड़ा. जहां तुम वहां मैं. तुम्हारे बिना मुझे महल स्वीकार नहीं.’’

मैं चुप रहा.

‘‘तुम बोलते क्यों नहीं?’’ सरिता ने झल्ला कर कहा.

‘‘मेरे पास बोलने को कुछ नहीं है. मुझे समय चाहिए.’’

समय का काम है गुजरना. समय गुजरता रहा. कालेज पूरा हो चुका था. मैं नौकरी के लिए प्रयास करता रहा. सफलता तो जैसे मेरी दुश्मन थी. सरिता मुझ से मिलती रहती. फोन पर बात करती रहती. गुजरते वक्त के साथ मैं टूट रहा था और सरिता शादी की जिद पर अड़ी थी, जोकि उस के प्यार का हक था.

सरिता का कालेज भी समाप्त हो चुका था. मेरी दुविधा को खत्म करने के लिए सरिता ने अपने पिता से बात की. एक दिन सरिता ने कहा, ‘‘पापा ने घर पर बुलाया है. उन्हें कुछ बात

करनी है.’’

मैं उस विशाल कोठी के सामने खड़ा था. दरबान ने हिकारत के भाव से गेट खोला. विदेशी कुत्ते भूंक रहे थे. मुझे लगा जैसे मेरी गरीबी को दुतकार रहे हों.

विशाल कोठी के बाहर सरिता के पिता बैठे चाय की चुसकियां ले रहे थे.

मैं पहुंचा. उन्होंने बैठने को कहा. उन्होंने नौकर को इशारा किया. नौकर फौरन चाय ले कर आ गया. उन्होंने नौकर को जाने को कहा. अब मैं इस विशाल व्यक्तित्व के सामने खौफ खाए बैठा था. मुझे डर नहीं था, लेकिन मैं अपनी औकात से वाकिफ था.

उन्होंने अपनी रोबदार आवाज में कहा, ‘‘क्या चाहते हो?’’

‘‘जी, कुछ भी तो नहीं,’’ मैं ने अचकचा कर कहा.

‘‘सरिता से शादी करने की हिम्मत है?’’

‘‘जी, नहीं.’’

‘‘घरजमाई बन सकते हो?’’

‘‘जी, नहीं.’’

‘‘फिर, आगे क्या सोचा है?’’

मैं चुप रहा.

‘‘शादी तुम कर नहीं सकते. नौकरी तुम्हें मिल नहीं रही. घर की जिम्मेदारियां निभाते जीवन गुजर जाएगा. मेरी बेटी का क्या होगा? उसे मना कर दो. क्यों उस का वक्त बरबाद मेरा मतलब जीवन खराब कर रहे हो?’’

मैं फिर चुप रहा.

‘‘तुम्हारा आत्मविश्वास डगमगा चुका है देव. चलो, एक समझौता करते हैं. सौदा चाहो तो सौदा समझ लो.’’

मैं नजरें झुकाए शांत बैठा था. एक नजर सरिता के पिता को देखता और फिर नजरें झुका लेता.

‘‘मैं अपने दोस्त की कंपनी में तुम्हें नौकरी दिलवा सकता हूं. सुपरवाइजर की पोस्ट खाली है. अच्छी तनख्वाह है. तुम्हारी बहन की शादी के लिए लोन भी दिलवा सकता हूं. बदले में तुम्हें सरिता को छोड़ना होगा.’’

मुझे नौकरी मिल गई. बहन की शादी के लिए पैसा भी. बूढ़ी मां का बोझ उतर गया.

सरिता ने अपने पिता से पूछा तो उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘उस ने अपनी जिम्मेदारी और प्यार में से जिम्मेदारी को चुन लिया है. तुम उसे भूल जाओ. न वह घरजमाई बन कर रहने लायक है और न ही वैसा दामाद जैसा मुझे चाहिए था, पूर्ण समर्पित तुम्हारे प्रति. वह वैसा नहीं है और न ही वह तुम्हें अपनी गरीबी में रखने को राजी है. तुम रह भी नहीं पाओगी. वह जानता है.’’

सरिता मेरे पास आई. उस ने अपना गुस्सा मुझ पर उतारा, ‘‘क्यों किया था

प्यार? क्यों किए थे झूठे वादे? तुम फरेबी निकले. मुझे नहीं पता था कि कालेज में मुझे थप्पड़ न मारने वाला लड़का मुझे बहोशी की हालत में अस्पताल ले जाने वाला वह दिलेर लड़का बेकारी और कर्त्तव्यों के बोझ से इतना दब जाएगा कि अपने प्यार से बच कर भाग निकलेगा.’’

मैं चुप रहा तो मेरी चुप्पी ने उसे तोड़ दिया. वह कलकल बहती पवित्र नदी का शुद्ध जल आज मेरे सितम, मेरी चुप्पी से रुक सा गया था. मानों किसी बड़े बांध में बंध कर उस का प्रवाह रुक गया हो. उस उमड़तीघुमड़ती नदी का पानी मटमैला सा हो चुका था.

‘‘तुम ने मेरा सौदा कर दिया. मुझे बेच दिया अपने कर्त्तव्यों की आड़ में. मुझे कालेज की रैगिंग के वे चांटे, वे कहकहे, वह अपमान उतना भारी नहीं लगा जितनी तुम्हारी खामोशी. तुम अपनी गरीबी, अपनी जिम्मेदारियों, अपनी बेकारी में अपने प्यार को हार चुके हो,’’ और वह चली गई.

आज वर्षों बाद जब सरिता इतने नजदीक से अचानक गुजरी तो यों गुजर गई मानों मैं उस के लिए दुनिया से गुजर गया हूं या शायद दुनिया का सब से गुजरा व्यक्ति था. तभी तो उस ने पल भर रुकना, मेरी तरफ देखना भी गंवारा न समझा.

उस के पीछे उस का पति था. मेरा कालेज का दोस्त. रैगिंग मास्टर.

समर मुझे देख कर रुक गया. बोला, ‘‘अरे देव, तुम यहां कैसे? कैसे हो?’’

‘‘मैं ठीक हूं अपनी कहो,’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं भी ठीक हूं. पर तुम यहां कैसे?’’ समर ने पूछा.

‘‘भाई समर मैं यहां कपाडि़या से मिलने आया था. पौलिसी के संबंध में वरना इस बड़े और महंगे होटल में मेरी क्या औकात आने की.’’

वह हंसा, ‘‘मैं ही कपाडि़या हूं. मैं ने ही बुलाया था.’’

मैं भौचक्का रह गया. कहा, ‘‘तुम तो समर राठी हो… क्यों मजाक…’’

उस ने मेरी बात काट कर, ‘‘चलो, कौफी पीते हुए बातें करते हैं.’’

मैं एजेंट था. क्लाइंट के पीछे चलना मेरी मजबूरी, मेरी रोजीरोटी थी.

समर ने कौफी मंगवाई. मैं ने फार्म निकाला. मैं उस के बताए अनुसार फार्म भरता गया. नौमिनेशन में सरिता कपाडि़या का नाम आते ही पल भर के लिए हाथ रुक गया.

उस ने हंसते हुए बताया, ‘‘तुम्हारी चुप्पी से सरिता कटी पतंग की तरह हो गई थी. मैं भी मध्यमवर्ग का था. मुझे भी पैसा, ऐशोआराम की जिंदगी चाहिए थी. यों समझ ले कि वह कटी पतंग मैं ने लूट ली. मैं उस के जीवन में आया. उसे प्रेम, दिलासा, अपनापन दिया. उस का दिल बहलाया. वह पहले से टूटी हुई थी. मुझ से जल्दी जुड़ गई. उस के पिता ने शर्त रखी कि तुम्हें घरजमाई बनना होगा. अपना सरनेम चेंज करना होगा. मैं जो चाहता था वह मुझे मिल गया. मैं पूरी तरह कपाडि़या हो कर सरिता और उस के पिता के कहने पर चला. आज मैं कपाडि़या सेठ हूं.’’

तभी सरिता आ गई. उस ने मुझे उचटती निगाह से देखा. मैं ने उसे देख कर पहलू बदला. उस ने कुछ भी पीने से इनकार कर दिया और समर से पूछा, ‘‘ये यहां कैसे?’’

‘‘बहुत दिनों से पौलिसी लेने के लिए फोन कर रहा था. यह मुझे नहीं पहचान पाया. मैं पहचान गया. मैं ने सोचा चलो दोस्त की मदद हो जाएगी.’’

सरिता ने व्यंग्य से कहा, ‘‘कैसे पहचान पाते. तुम ने अपनी जात ही बदल ली,’’ फिर हंसते हुए कहा, ‘‘प्रेम तो कोई तुम से करना सीखे. प्रेम में क्या जाति, क्या धर्म? पर कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनेआप को बदल ही नहीं पाते.’’

समर ने कहकहा लगाया. इस कहकहे में वह अपना अपमान छिपा गया. उस ने मुझ से पूछा, ‘‘देव, घर में सब कैसे हैं?’’

‘‘ठीक हैं.’’

‘‘मेरा मतलब तुम्हारी पत्नी, बच्चे?’’

‘‘मैं ने अपनी जिम्मेदारी के कारण शादी नहीं की. विधवा बहन के 2 बच्चों का पालनपोषण कर रहा हूं. सुपरवाइजरी की नौकरी छोड़ दी… वह नौकरी मुझे एहसान लगने लगी थी. किसी का कर्ज, कोई सौदा. फिर एलआईसी में एजेंट बन गया. अब दिनरात ग्राहक तलाशता हूं.’’

सरिता की आंखें भर आईं. फिर आंसुओं को रोकते हुए कहा, ‘‘जो लोग जीवन में सही समय पर सही निर्णय नहीं ले पाते, जो लोग जीवन में बड़े फैसले नहीं कर पाते, उन का कुछ नहीं हो सकता.’’

समर को लगा कि कहीं पुराना पे्रम फिर से हिलोरें न मारने लगे. अत: उस ने उठते

हुए कहा, ‘‘अच्छा देव, हमें चलना है. चलो सरिता.’’

देव अपनी फाइल व कागजात समेटने लगा. समर और सरिता बाहर निकल गए.

सरिता यों चल रही थी समर के साथ मानो अंत में हर नदी का अंजाम ही हो खारे सागर में मिल कर मरना. उस ने अपनी नियत स्वीकार ली थी.

देव की एक चुप्पी ने सरिता के जीवन में ऐसा बांध बना दिया कि उसे फिर से कलकल करते बहने के लिए किसी समर रूपी सागर में पनाह लेनी पड़ी. यह जानते हुए भी कि समर ने शादी उस की दौलत की खातिर की है. गंगोतरी की गंगा खारे पानी में मिल कर विलीन हो चुकी थी. उस की सरिता मर चुकी थी. सरिता के मरने में उस का भारी योगदान था. देव की सरिता, समर की सरिता. सागर में विलीन सरिता. उस की चुप्पी से अधूरी, अतृप्त, उदास सरिता.

Hindi Love Story

Romantic Story: मन बहुत प्यासा है:- क्या थी शेखर की गलती

Romantic Story: शाम बहुत उदास थी. सूरज पहाडि़यों के पीछे छिप गया था और सुरमई अंधेरा अपनी चादर फैला रहा था. घर में सभी लोग टीवी के सामने बैठे समाचार सुन रहे थे. तभी न्यूज ऐंकर ने बताया कि सुबह दिल्ली से चली एक डीलक्स बस अलकनंदा में जा गिरी है. यह खबर सुनते ही सब के चेहरे का रंग उड़ गया और टीवी का स्विच औफ कर दिया गया. मैं नवीन की कमीज थामे सन्न सी खड़ी रह गई. ढेर सारे खयाल दिलोदिमाग में हलचल मचाते रहे. क्या सचमुच नवीन इज नो मोर?

मां का विलाप सुन कर आंगन में आसपास की औरतें जुड़ने लगीं. उन में से कुछ रो रही थीं तो कुछ उन्हें सही सूचना आने तक तसल्ली रखने की सलाह दे रही थीं. बाबूजी ने मेरे डैडी को फोन किया और तुरंत घटनास्थल पर चलने को कहा. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं? क्या मैं सचमुच… इस के आगे सोचने से दिल घबराने लगा. 3 दिन तक जीनेमरने जैसी स्थिति रही. चौथे दिन हारे हुए जुआरी की तरह बाबूजी और डैडी वापस लौट आए. अलकनंदा में उफान के कारण लाशें तक निकाली नहीं जा सकी थीं. पता कर के आए मर्दों के चेहरों पर हताशा को पढ़ कर औरतें चीखचीख कर रोने लगीं. कुछ उस घड़ी को कोस रही थीं, जिस घड़ी नवीन ने घर से बाहर कदम निकाला था.

एक बूढ़ी औरत मेरे कमरे में आई और मुझे घसीटती हुई बाहर ले आई. कुछ औरतों ने आंखों ही आंखों में सरगोशियां कीं और मेरा चूडि़यों से भरा हाथ फर्श पर दे मारा. चूडि़यां टूटने के साथ खून की कुछ बूंदें मेरी कलाई पर छलक आईं पर इस की परवाह किस को थी. भरी जवानी में मेरे विधवा हो जाने से जैसे सब दुखी थीं और मुझे गले लगा कर रोना चाहती थीं. मैं पत्थर की शिला सी हो गई थी. मेरी आंखों में बूंद भर पानी भी नहीं था.

अपने विफल हो रहे प्रयासों से औरतों में खीज सी पैदा हो गई. कुछ मुझे घूरते हुए एकदूसरे से कुछ कह रही थीं, तो महल्ले की थुलथुली बहुएं, जो मेरी स्मार्टनैस से कुंठित थीं अपनी भड़ास निकालने की कोशिश कर रही थीं. मेरा लंबा कद, स्याह घने बाल, हिरनी जैसी आंखें और शादी में लाया गया ढेर सारा दहेज, जिस के कारण महल्ले की सासें अपनी बहुओं को ताने दिया करती थीं, आज बेमानी बन कर रह गया, तो मेरी सुंदर काया का मूल्य पल भर में कौडि़यों का हो गया.

मेरी उड़ती नजर आंगन के कोने में खड़ी मोटरसाइकिल पर गई. इसी मोटरसाइकिल के लिए मझे 4 दिन तक भूखा रखा गया था और 6 महीने तक मैं मायके में पड़ी रही थी. आखिर पापा ने अपने फंड में से पैसा निकाल कर नवीन को मोटरसाइकिल ले दी थी. अब कौन चलाएगा इसे? नवीन की मौत से हट कर मेरा

मन हर राउंड में लाई गई चीजों की फेहरिस्त बना रहा था.

कुल 2 साल ही तो हुए थे हमारी शादी को और हमारी बेट मिनी साल भर की है. खुद को कर्ज में डुबो कर बेटी का घर भर दिया था पापा ने. क्या मैं उस आदमी के लिए रोऊं जो हर वक्त कुछ न कुछ मांगता ही रहता था और हर चौथे दिन रुई की तरह धुन देता था. तभी औरतों की खींचातानी से मिनी रोई तो मेरी तंद्रा टूटी. मैं उसे औरतों की भीड़ से निकाल कर कमरे में ले आई.

औरतों का आनाजाना कई दिनों तक लगा रहा. कुछ मुझ कुलच्छनी बहू को घूरघूर कर एकदूसरे से बतियाती हुई आंसू बहातीं तो कुछ मेरे न रोनेधोने के कारण किसी रहस्य को सूंघने की कोशिश करतीं. पर मुझे उन की परवाह नहीं थी.

मां जो शेरनी की तरह दहाड़ती रहती थीं अब भीगी बिल्ली सी आंसू बहाती रहतीं. मेरी ननद गीता और उस के पति रजनीश भी आ गए थे. गीता मेरे कमरे के फेरे मारती रहती और एकएक कीमती चीज के दाम पूछती रहती. रजनीश की नजरमोटरसाइकिल पर थी.

गीता को वापस जाना था. रजनीश ने खिसियानी सी हंसी हंसते हुए कहा, ‘‘भाभी, अब इस मोटरसाइकिल का यहां क्या होगा? कहो तो मैं ले जाऊं. डीटीसी बसों में आतेजाते मैं तो तंग आ गया हूं. रोज देर हो जाती है तो बौस की डांट खानी पड़ती है.’’ फिर मोटरसाइकिल पर बैठ कर ट्रायल लेने लगा.

गीता भी पीछे नहीं रही, ‘‘भाभी, इस कौस्मैटिक बौक्स का अब आप क्या करेंगी? आप के लिए तो बेकार है. मैं ले जाती हूं इसे. कितने सारे तो परफ्यूम्स हैं. इतनी अच्छी चीजें इंडिया में कहां बनती हैं. आप के पापा का भी जवाब नहीं. हर चीज कीमती दी है आप को.’’

क्या संबंध स्वार्थ की कागजी नींव पर टिके होते हैं? यह सोचते हुए संबंधों पर से मेरी आस्था हटने लगी. यह वही गीता है, जो बारबार गश खा कर गिर रही थी और भाई की मौत को अभी 4 दिन भी नहीं गुजरे इस ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया.

गीता और रजनीश की नजर तो मेरे लैपटौप और महंगे मोबाइलों पर भी थी, क्योंकि बाबूजी ने कह दिया था कि मोटरसाइकिल वगैरह अभी यहीं रहने दो. बाद में देखेंगे. गीता ने एक बार झिझकते हुए कहा, ‘‘भाभी, आप के पास तो 2 मोबाइल हैं. वाऊ, कितने खूबसूरत हैं.’’

मैं ने जब कोई जवाब नहीं दिया तो वह बोली, ‘‘मैं तो ऐसे ही कह रही थी.’’

गीता और रजनीश के जाने के बाद घर में गहरा सन्नाटा छा गया. मां और बाबूजी दोनों ही शंकित थे कि कहीं मैं भी उन्हें छोड़ कर न चली जाऊं. पर अब कहां जाना था मुझे. हालांकि पापा ने मुझे साथ चलने को कहा था पर मैं ने मना कर दिया. बाबूजी का दुलार तो मुझे हमेशा ही मिलता रहा था पर मां और नवीन के सामने उन की चलती ही नहीं थी. पर अब कितना कुछ बदल गया था.

थोड़ी भागदौड़ के बाद मुझे नवीन की जगह नौकरी भी मिल गई. रसोईघर जहां मैं दिन भर खटती रहती थी, को मां ने संभाल लिया था. नौकरी पर आतेजाते मुझे लगता था कि कई आंखें मुझे घूर रही हैं. दरअसल, वे औरतें, जिन्हें मुझे ले कर निंदासुख मिलता था अब अजीब नजरों से मुझे देखती थीं.

एक अभी हुई विधवा रोज नईनई पोशाकें पहन कर दफ्तर जाए यह बात उन के गले से नहीं उतरती थी. मां का भी अब महल्ले की चौपाल पर बैठना लगभग बंद हो गया था, तो पड़ोसिनों का आनाजाना भी कम हो गया था.

मेरी नौकरी ने जैसे मुझे नया जीवन दे दिया था. ऐसा लगता था जैसे मरुस्थल में बरसाती बादल उमड़नेघुमड़ने लगे हों. इस से बेचैनी और भी बढ़ जाती, तो मैं सोचती कि मैं विधवा हो गई तो इस में मेरा क्या कुसूर? दहेज में मिली कई कीमती साडि़यों की तह अभी तक नहीं खुली थीं. मैं जब उन में से कोई साड़ी निकाल कर पहनती तो मां प्रश्नवाचक नजरों से चुपचाप देखती रहतीं और मैं जानबूझ कर अनजान बनी रहती. कालोनी की जवान लड़कियों को मेरा कलर कौंबिनेशन बहुत पसंद आता. वे प्रशंसनीय नजरों से मुझे देखतीं पर मैं इस सब से तटस्थ रहती. दफ्तर में मुझे सब से ज्यादा आकर्षित करता था शेखर. वह मेरे काम में मेरी मदद करता. फिर कभीकभी बाहर किसी रेस्तरां में कौफी पीने भी हम चले जाते. गपशप के दौरान कब वह मेरे करीब आता चला गया मुझे पता ही नहीं चला. धीरेधीरे हम दोनों एकदूसरे के इतने करीब आ गए कि साथ जीनेमरने की कसमें खाने लगे.

एक दिन इतवार को दोपहर के समय जब मैं मिनी को गोद में लिए बाहर निकली तो मां ने प्रश्नवाचक नजरों से मुझे देखा. मुझे लगा जैसे मैं कोई अपराध करने जा रही हूं. पर अब मैं ने नजरों की भाषा को पढ़ना छोड़ दिया था. मन में एक अजीब सी प्यास थी और मैं मृगतृष्णा के पीछे दौड़ रही थी. देर शाम को जब घर लौटी तो मां की नजर में कई सवाल थे. वे मिनी को उठा कर बाहर ले गईं और लौटीं तो पूछा, ‘‘यह शेखर अंकल कौन है?’’ मैं सन्न रह गई. मां मुझ से ऐसा सीधा सवाल करेंगी यह तो मैं ने सोचा ही नहीं था. मगर जल्दी ही मैं ने खुद को संभाला ओर बोली, ‘‘शेखर मेरे दफ्तर में काम करता है. मौल में मिल गया था.’’ मां ने हुंकार भरा और अपने कमरे में चली गईं. देर रात तक मां और बाबूजी की आवाजें कटकट कर मेरे कानों में आती रहीं और मैं दमसाधे सुनती रही. साथ में यह भी सोचती रही कि आखिर क्या चाहते हैं ये लोग? क्या मैं सारी उम्र यों ही गुजार दूं? मुझे अकसर औफिस से आतेआते देर हो जाती. तब बाबूजी मुझे बस स्टौप पर खड़े मिलते. मुझे देखते ही कहते, ‘‘मैं यों ही टहलता हुआ इधर निकल आया था. सोचा, तुम आ रही होगी.’’ फिर सिर झुकाए साथसाथ चलने लगते. मुझे ऐसा लगता जैसे मैं कांच के मकान में रह रही हूं, जरा सी ठोकर लगते ही टूट जाएगा.

मैं अपनी जिंदगी में आगे बढ़ना चाहती थी पर बाबूजी और मां का बुढ़ापा कैसे कटेगा यह सवाल मुझे सालता था. मैं शेयर के साथ अपनी तनहाई शेखर करना चाहती पर मां और बाबूजी का बुढ़ापा बीच में आ जाता था उन की आंखों का डर मुझे खुल कर जीने नहीं दे रहा था. शेखर कुछ दिनों की छुट्टी ले कर घर गया था. मैं सोच रही थी कि जब वह वापस आएगा तो उस से खुल कर बात करूंगी. उस ने वादा किया था कि वह अपने मांबाप को मना लेगा इसलिए मैं आश्वस्त थी. लेकिन एक दिन औफिस में मैं ने अपनी मेज पर एक लंबा लिफाफा रखा देखा. लिफाफा खुला ही था. अंदर से कागज निकाला तो देखा तो लगा छनाक से कुछ टूट गया हो. एक वैडिंग कार्ड था- शेखर विद सरोज. साथ में एक चिट्ठी भी थी जिस में लिखा था- मीरा, एक विधवा के साथ विवाह करने की बात मेरे मम्मीडैडी के गले नहीं उतरी. विधवा, उस पर एक बच्ची की मां. सच मानो मीरा मैं ने मम्मीडैडी को समझाने की बहुत कोशिश की पर अपने अविवाहित बेटे के लिए उन के दिल में बड़ेबड़े अरमान हैं. कैसे तोड़ दूं उन्हें… मुझे क्षमा कर देना, मीरा.

अगले दिन मैं ने निगाह घुमा कर देखा, शेखर मोटीमोटी फाइलों में गुम होने का असफल प्रयास कर रहा था. मैं ने खत सहित वैडिंग कार्ड को टुकड़ेटुकड़े कर डस्टबिन में डाला तो उस ने घूर कर मुझे देखा.मैं रोई नहीं. रोना मेरी आदत नहीं है. मैं तेजी से टाइप करती रही और मैं ने चपरासी को पंखा तेज करने को कहा, क्योंकि मन की तपिश और बढ़ गई थी.  शाम को जब औफिस से निकली तो खुली हवा के झोंके मन को सहलाने लगे मेरे कदम अपनेआप ही न्यू औप्टिकल स्टोर की ओर बढ़ गए. बाबूजी केलिए नया चश्मा बनवा कर जब निकली तो याद आया कि मां कई दिन से एक साड़ी लाने को कह रही थीं. एक ही क्षण में दुनिया कितनी बदल गई थी. बाबूजी डेढ़ महीने से नया चश्मा बनवाने को कह रहे थे पर उस ओर मेरा ध्यान ही नहीं जा रहा था. उन्हें पढ़नेलिखने में कितनी परेशानी हो रही थी, आज याद आया तो मन में अपराधबोध सा जागने लगा था. लगता है बाबूजी को शेखर के विवाह की बात पता चल गई थी. वे बस स्टौप पर भी नहीं आए. अगली सुबह देखा तो वे मोटरसाइकिल साफ कर रहे थे. मुझे लगा इसे बेचने की तैयारी है. मन में कसैलापन भर गया. पर तभी बोले, ‘‘बेटा, तुम्हें तो मोटरसाइकिल चलानी आती है न. चलो जरा डाक्टर की दुकान तक ले चलो. बसों में जाने में दिक्कत होती है.’’ मैं मुंह खोले उन्हें देखती रह गई और फिर उन के सीने से जा लगी, ‘‘बाबूजी…’’ मुझ से बोला नहीं जा रहा था. तभी मां की आवाज आई, ‘‘और हां, लौटते हुए बेकरी से एक केक लेती आना. आज तेरा जन्मदिन है न…’’

Romantic Story

Samajik Kahani: मेरे घर के सामने- कम्युनिटी हाल से क्यों परेशान थी वह

Samajik Kahani: मेरे घर के सामने एक कम्युनिटी हाल है, या अगर यों कहें कि कम्युनिटी हाल के सामने मेरा घर है तो भी घर की भौगोलिक स्थिति में कोई अंतर नहीं आएगा. कम्युनिटी हाल के सामने मेरा घर होना ही मेरी सब से बड़ी मुसीबत है. इस कम्युनिटी हाल में आएदिन ब्याहशादी, अन्य समारोह और पार्टियां आयोजित होती रहती हैं.

पर एक मुसीबत और भी है, वह यह कि मेरे घर के आंगन में एक आम का पेड़ भी है. बस, यों ही समझिए कि करेला और नीम चढ़ा जैसी स्थिति है. शुभकार्य हो और उस में आम के पत्तों का तोरण न बांधा जाए ऐसा हो ही नहीं सकता. कम्युनिटी हाल के सामने घर के आंगन में प्रवेशद्वार पर ही आम का पेड़ हो, इस का दर्द सिर्फ वही भुक्तभोगी जान सकता है जिस का घर कम्युनिटी हाल के सामने हो.

जैसे ही मेजबान कम्युनिटी हाल किराए पर ले कर अपना मंगलकार्य शुरू करता है, उस के कुछ देर बाद ही प्रभात वेला में मेरे दरवाजे की घंटी बजती है. संपन्न घर के कोई सज्जन या सजनी विनम्रता से पूछते हैं, ‘‘आप को कष्ट दिया. कुछ आम के पत्ते मिल सकेंगे क्या? बेटी की शादी है, मंडप में तोरण बांधना है. और सब सामान तो ले आए, पर देखिए, कैसे भुलक्कड़ हैं हम कि आम के पत्ते तो मंगाना ही भूल गए.’’

शायद उन्हें आम का पेड़ देख कर ही आम के पत्तों का तोरण बांधने की सूझती है. इनकार कैसे करना चाहिए, यह कला मुझे आज तक नहीं आई. हर बार यही होता है कि जरूरत से ज्यादा पत्ते तोड़ लिए जाते हैं. इन में से कुछ पत्ते मेरे साफसुथरे आंगन में इधरउधर बिखर कर बेमौसमी पतझड़ का आनंद देते हैं और कुछ पत्ते मेरे घर से कम्युनिटी हाल तक ले जाने में सड़क पर लावारिस से गिरते जाते हैं. जिन के घर विवाह हो रहा है, उन को इस की कोई चिंता नहीं होती. पर मुझे तो ऐसा महसूस होता है जैसे कोई मेरा रोमरोम मुझ से खींच कर ले जा रहा है. पर अपना यह दर्द मैं किस से कहूं? कैसे कहूं?

और यह तो इस दर्द की शुरुआत है. उस के बाद बड़ी देर तक ‘‘हैलो, माइक टेस्टिंग, हैलो’’ की मधुर ध्वनि के बाद फिल्मी गीतों के रिकार्ड पूरे जोर से बजने शुरू हो जाते हैं. उस पर तुर्रा यह कि माइक्रोफोन के भोंपू का मुंह हमेशा मेरे घर की ओर ही रहता है. ऐसा लगता है जैसे कि यह बहरों की बस्ती है. अगर धीमी आवाज में रिकार्ड बजता रहे तो हमें कैसे मालूम पड़ेगा कि सामने कम्युनिटी हाल में आज विवाह समारोह है? इस के बाद हमें दिन भर घर के अंदर भी एकदूसरे से चीख- चिल्ला कर बातचीत करनी पड़ती है, तभी एकदूसरे को सुनाई पड़ेगा.

इन रिकार्डों ने मेरे बच्चों की पढ़ाई का रिकार्ड बिगाड़ कर रख दिया है. धूमधाम और दिखावे के लिए ये लोग खूब खर्च करते हैं. पर एक बचत वे अवश्य करते हैं. पता चला कि इन सब के बिजली वाले इतने चतुर हैं कि इन की बचत के लिए बिजली का कनेक्शन गली के खंभे से ही लेते हैं ताकि कम्युनिटी हाल के मीटर के अनुसार बिजली का खर्च उन्हें नाममात्र ही अदा करना पड़े.

फिर आती है नगरनिगम की पानी की गाड़ी, जो ठीक मेरे घर के सामने आ कर खड़ी हो जाती है. इस गाड़ी से पानी अंदर पंडाल में पहुंचाने के प्रयत्न में जो पानी बहता है, वह ढलान के कारण मेरे आंगन में इकट्ठा हो जाता है. बस, सावनभादों सा सुहावना कीचड़भरा वातावरण बन जाता है. और फिर इस कीचड़ से सने पैरों के घर में आने के कारण घर का हर सदस्य मेरे कोप का भाजन बनता है. अकसर गृहयुद्ध छिड़ने की नौबत आ जाती है.

सामने शामियाने में जब भट्ठियां सुलगाई जाती हैं तब उन का धुआं हवा के बहाव के कारण बिन बुलाए मेहमान की तरह सीधा मेरे ही घर का रुख करता है. हवा भी मुझ से ऐसे समय न जाने किस जनम का बैर निकालती है. वनस्पति घी की मिठाई की खुशबू और तरहतरह के मसालों की महक से घर के सारे सदस्यों के नथने फड़क उठते हैं. परिणामस्वरूप सब की पाचन प्रणाली में खलबली मच जाती है.

आएदिन इस कम्युनिटी हाल में होने वाले ऐसे भव्य भोजों की खुशबू के कारण अब मेरे परिवार को मेरे हाथों की बनाई रूखीसूखी गले नहीं उतरती. रोज यही उलाहना सुनने को मिलता है, ‘‘क्या तुम ऐसा खाना नहीं बना सकतीं जैसा कम्युनिटी हाल में बनता है? कब तक ऐसा घासफूस जैसा खाना खिलाती रहोगी?’’ अब मुझे समझ नहीं आ रहा है कि सामने कम्युनिटी हाल में होने वाले समारोहों को बंद करा दूं या यह घर ही बदल लूं?

इस तरह सारा दिन तेज स्वर में बज रहे फूहड़ फिल्मी रिकार्डों से कान पकने लगते हैं और पकवानों की खुशबू से नाक फड़कती है. जैसेतैसे दिन गुजर जाता है. शाम को बरात आने का (यदि लड़की की शादी हो तो) या बरात विदा होने का (यदि लड़के की शादी हो तो) समय होता है, दिन भर में दिमाग की नसें तड़तड़ाने और कानों की फजीहत करने में जो कसर रह गई थी, उसे ये बैंडबाजे वाले पूरी करने में कोई कसर नहीं छोड़ते. ऐन दरवाजे पर डटे हुए बैंडमास्टर अपनी सारी ताकत लगा कर बैंड बजा रहे हैं.

कुछ ही देर में कुछ नई उम्र की फसलें लहलहा कर डिस्को और भंगड़ा का मिलाजुला नृत्य करने लगती हैं. फिर तो ऐसा लगने लगता है जैसे बैंड वालों और नृत्य करने वालों के बीच कोई प्रतियोगिता चल रही है. नोट पर नोट न्योछावर होते हैं. यह क्रम बड़ी देर तक चलता है. मैं यही सोचती हूं कि कितना अच्छा होता अगर ये कान कहीं गिरवी रखे जा सकते. मैं अपने डाक्टर को कैसे बताऊं कि मेरे रक्तचाप बढ़ने का कारण मेरा मोटापा नहीं, बल्कि मेरे घर के सामने कम्युनिटी हाल का होना है. पर मैं जानती हूं कि इस तथ्य पर कोई विश्वास नहीं करेगा.

बड़ी मुश्किल से बरात आगे रेंगती है. गाढ़े मेकअप में सजीसंवरी कुंआरियों और सुहागनों की फैशन परेड और उन के चमकीले और भड़कीले गहनों व कपड़ों की नुमाइश देख कर मेरी पत्नी के हृदय पर सांप तो क्या अजगर लोटने लगता है. हाय, कित्ती सुंदरसुंदर साडि़यां हैं सब के पास, नए से नए फैशन की. अब की बार पति से ऐसी साड़ी की फरमाइश जरूर करूंगी, चाहे जो भी हो जाए. और देखो तो सही सब की सब गहनों से कैसी लदी हुई हैं.

मेरी दूरबीन जैसी आंखें एकएक के गहनों और कपड़ों की बारीकियां परखने लगती हैं. उस कांजीवरम साड़ी पर मोतियों का सेट कितना अच्छा लग रहा है. उस राजस्थानी घाघरा चोली पर यह सतलड़ी सोने का हार कितना फब रहा है. और झीनीझीनी शिफान की साड़ी पर हीरों का सेट पहने वह महिला तो बिलकुल रजवाड़ों के परिवार की सी लग रही है. पर कौन जाने ये हीरे असली हैं या नकली.

इन बरातनियों के गहनों और कपड़ों में उलझी हुई मैं बड़ी देर तक अपने होश खोए रहती हूं. मेरे घर के सामने कम्युनिटी हाल होने का यह सब से हृदयविदारक पहलू है. जैसेजैसे बरात आगे बढ़ती है, देसीविदेशी परफ्यूम की झीनीझीनी लपटें आआ कर मेरी खिड़की से टकराने लगती हैं और इस खुशबू में रचबस कर मैं एकदूसरे ही लोक में पहुंच जाती हूं.

बरात आ जाने के बाद तो कम्युनिटी हाल में चहलपहल, दौड़भाग तथा चीखपुकार और बढ़ जाती है. उपहारों के पैकेट थामे, सजेसंवरे दंपती एक के बाद एक चले आते हैं. उन के स्कूटर, मोटर आदि मेरे घर के सामने ही खड़े किए जाते हैं. घर में आनेजाने के लिए मार्ग बंद हो जाता है. और मेरा घर किसी टापू सा लगने लगता है.

कुछ जोड़े ऐसे भी हैं जिन्हें मैं ने इस कम्युनिटी हाल में होने वाले हर समारोह में शामिल होते देखा है. वे इन समारोहों में आमंत्रित रहते हैं या नहीं, पर उन के हाथों में एक लिफाफा अवश्य रहता है. वे इस लिफाफे को वरवधू को थमाते हैं या नहीं, यह तो वे ही जानें. मैं तो बस, इतना जानती हूं कि वे हमेशा तृप्त हो कर डकार लेते हुए रूमाल से मुंह पोंछते बाहर निकलते हैं.

लिफाफे में 11 रुपए रख कर, सूट पहन कर, सजसंवर कर किसी भी विवाह समारोह में जा कर छक कर भोजन कर के आना तो किसी होटल में जा कर भोजन करने से काफी सस्ता पड़ता है. कन्या पक्ष वाला यह समझता है कि बरातियों में से कोई है और वर पक्ष समझता है कि यह कन्या पक्ष का आमंत्रित है. ऐसे में उन्हें कोई यह पूछने नहीं आता कि ‘‘श्रीमान आप यहां कैसे पधारे?’’

मेरे घर की ऊपरी मंजिल से इस कम्युनिटी हाल का पिछला दरवाजा बहुत अच्छी तरह दिखाई देता है. वहां का आलम कुछ निराला ही रहता है. जैसे मिठाई देखते ही उस पर मक्खियां भिनभिनाने लगती हैं, वैसे ही कहीं शादीब्याह के समारोह होते देख मांगने वाले, परोसा लेने वाले पहले से ही इकट्ठे हो जाते हैं. इन के साथ ही गाय, सूअर, कुत्ते आदि भी अपनी क्षुधा शांति के लिए पिछले दरवाजे पर ऐसे इकट्ठे होते हैं मानो उन सब का सम्मेलन हो रहा हो.

हर पंगत के उठने के बाद जब पत्तलदोनों का ढेर पिछवाड़े फेंका जाता है, उस के बाद वहां इनसान और जानवर के बीच जूठी पत्तलों के लिए हाथापाई और छीनाझपटी का जो दृश्य सामने आता है उसे देख कर इनसानियत और न्याय पर से विश्वास उठ जाता है.

यह दृश्य देखे बगैर कोई विश्वास नहीं कर सकता कि लोग जूठन पर भी कितनी बुरी तरह टूट सकते हैं. उस के लिए मरने और मारने पर उतारू हो जाते हैं. गाय की पूंछ मरोड़ कर या उसे सींगों से धकिया कर और कुत्तों को लतिया कर उन के मुंहमारी हुई जूठी पत्तलों में से खाना बटोर कर अपनी टोकरी में रखने में इनसान को कोई हिचक नहीं, कोई शर्म नहीं. घर ले जा कर शायद वह इसी जूठन को अपने परिवारजनों के साथ बैठ कर चटखारे ले कर खाएगा.

गृहस्वामी या ब्याहघर का प्रमुख केवल 2 ही जगह मिल सकता है, या तो प्रमुख द्वार पर, जहां वह सजधज कर हर आमंत्रित का स्वागत करता है या पिछवाड़े के दरवाजे पर जहां वह हाथों में मोटा डंडा लिए जूठन पर मंडराते जानवरों और इनसानों को एकसाथ धकेलता है. साथ ही जूते, हलवाई व उस के साथ आए कारीगरों पर निगाह रखता है.

जैसेजैसे विवाह समारोह यौवन पर आता है कुछ बराती सुरा की बोतलें खोलने के लिए लालायित हो जाते हैं. बरातों में जाना और पीना तो आजकल एक तरह से विवाह का आवश्यक अंग माना जाने लगा है. कुछ ब्याहघरों में, जहां सुरापान की अनुमति नहीं मिलती है, उन के बराती अंदर कम्युनिटी हाल में बोतलें ले कर मेरे ही घर की ओट ले कर नीम अंधेरे में बैठ कर यह शुभकार्य संपन्न करते हैं.

मैं जानती हूं कि जैसेजैसे यह सुरा अपना रंग दिखाएगी, वैसेवैसे उन की वाणी मुखर होती जाएगी. उन की वाणी मुखर हो उस के पहले ही मुझे अपनी खिड़कियां और दरवाजे सब बंद कर के अंदर दुबक जाना पड़ता है.

वह जमाना गया, जब बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना हुआ करता था. परंतु मेरे घर की तरह ही जिस का घर कम्युनिटी हाल के सामने हो, वह बेगानी शादी में अब्दुल्ला कैसे बन सकता है? वैसे विवाह संपन्न होने के बाद जब घरबाहर के सब लोग विदा हो जाते हैं, तो वे कभी सफाई करवाने का कष्ट नहीं करते. उस से जो सड़ांध उठती है, उस से अब्दुल्ला तो क्या हर अड़ोसीपड़ोसी दीवाना हो जाता है.

दूसरे दिन ब्याह निबटा कर जब सारा कारवां गुजर जाता है, तब मैं भी ऐसी ही शांति की सांस लेती हूं जैसे कि मैं अपनी ही बेटी का ब्याह कर के निवृत्त हुई हूं.

Samajik Kahani

Best Hindi Story: दुनिया नई पुरानी

Best Hindi Story: पदोन्नति के साथ जनार्दन का तबादला किया गया था. अब वे सीनियर अध्यापक थे. दूरदराज के गांवों में 20 वर्षों का लंबा सेवाकाल उन्होंने बिता दिया था. उन की पत्नी शहर आने पर बहुत खुश थी. गांव की अभावभरी जिंदगी से वह ऊब चुकी थी. अपने बच्चों को पढ़ानेलिखाने में जनार्दन व उन की पत्नी ने खूब ध्यान दिया था.

उन की 2 बेटियां और एक बेटा था. बड़ी का नाम मालती, मंझली मधु और छोटे बेटे का नाम दीपू था. मालती सीधीसादी मगर गंभीर स्वभाव की, तो मधु थोड़ी जिद्दी व शरारती थी, जबकि दीपू थोड़ा नटखट था.

मालती बीए की पढ़ाई कर रही थी, मधु 11वीं में पढ़ रही थी और दीपू तीसरी कक्षा में पढ़ रहा था. समय बीत रहा था.

वहां गांव में जनार्दन पैदल ही स्कूल जातेआते थे. यहां शहर में आ कर उन्होंने बाइक ले ली थी. जिस पर छुट्टी के दिन श्रीमतीजी को बैठा कर जनार्दन शौपिंग करने या घूमने जाते थे. उन की पत्नी दुपहिया वाहन में सैर कर फूले न समाती. कभीकभी दीपू भी जिद कर मांबाप के बीच बैठ कर सवारी का आनंद ले लेता था.

मधु विज्ञान विषय ले कर पढ़ रही थी. जनार्दन ने शहर के एक ट्यूशन सैंटर में भी अब उस का दाखिला करवा दिया था. वह बस से आयाजाया करती. दीपू को जनार्दन खुद स्कूल छोड़ जाया करते और लौटते समय ले आते. एक व्यवस्थित ढर्रे पर जीवन चल रहा था.

नई कालोनी में आ कर जनार्दन की पत्नी बच्चों के लालनपालन में तल्लीन थी. दिन के बाद रात, रात के बाद दिन. समय कट रहा था. बेहद घरेलू टाइप की महिला थी वह. एक ऐसी आम भारतीय महिला जिस का सबकुछ उस का पति, बच्चे व घर होता है. मां का यह स्वभाव बड़ी बेटी को ही मिला था.

मधु ट्यूशन खत्म होते ही बस से ही लौटती. कालोनी के पास ही बस का स्टौप था. ट्यूशन सैंटर के पास एक ढाबा था. शहर के लड़के और बाबू समुदाय अपने खाने का शौक पूरा करने वहां आते थे. एक दिन यहीं पर मधु सड़क पार कर बसस्टौप के लिए जा रही थी, एक कार टर्न लेते हुए मधु के एकदम पास आ कर रुकी. मधु घबरा गई थी. वह पीछे हट गई. कारचालक ने कार किनारे पार्क की और मधु के पास आया, बोला, ‘‘मैडम, सौरी, मैं जरा जल्दी में था.’’  दोनों की आंखें चार हुईं.

‘‘दिखाई नहीं देता क्या,’’ वह गुस्से से बोली.

‘‘अब एकदम ठीक दिखाई देता है मैडम.’’ उस ने मधु की आंखों में आंखें डालते हुए कहा.

‘‘नौनसैंस,’’ मधु ने उसे गुस्से से देख कर कहा.

फिर मधु बसस्टौप की तरफ बढ़ चली. वह उसे जाता हुआ देखता रहा. उस का नाम था शैलेश. शहर के एक कपड़े के व्यापारी का बेटा. अब तो शैलेश अकसर ट्यूशन सैंटर के पास दिखता- कभी ढाबे से निकलते हुए, कभी कार खड़ी कर इंतजार करते हुए. फिर वही हुआ जो ऐसे में होता है. एक शरारत पहचान में, पहचान दोस्ती में, और फिर दोस्ती प्यार में बदल गई.

बस की जगह अब मधु कार या कभी बाइक में ट्यूशन से लौटती. मधु के मातापिता इस बात से अनजान थे. लेकिन कालोनी के एक अशोकन सर को सबकुछ पता था. इधर अशोकन सर

शाम की चहलकदमी को निकलते और कालोनी से कुछ कदम दूर मधु कार से कभी बाइक से उतरती, दबेपांव धीरेधीरे घर की ओर जाती. इन की हायबाय उन्होंने कितनी ही बार देखी.

मां तो यही सोचती कि उस की बेटी सयानी है, विज्ञान की छात्रा है, एक दिन उसे डाक्टर बनना है. वह एक मौडर्न लड़की है. दुनिया में आजकल यही तो चाहिए. पिता को घर की जिम्मेदारियों से फुरसत कहां मिलती है भला.

लेकिन मधु के प्यार की भनक मालती को लग गई थी. उस के फोनकौल्स अब ज्यादा ही आ रहे थे. जब देखो मोबाइल फोन कान से लगाए रहती. एक शाम जब वह काफी देर बातें कर चुकी, तो मालती ने पूछा, ‘‘मधु, कौन था वह जिस से तुम इतनी हंसहंस कर बातें कर रही थी? तुम कहीं ऐसेवैसे के चक्कर में तो नहीं पड़ गईं. अपनी पढ़ाई का खयाल रखना.’’

मधु ने जवाब में कहा, ‘‘नहीं दीदी, ऐसीवैसी कोई बात नहीं है.’’

आखिर एक दिन उस ने दीदी को बता ही दिया कि वह शैलेश से प्यार करने लगी है. वह अच्छा लड़का है.’’

मालती ने मन में सोचा, ‘शायद यह सब सच हो.’

एक दिन अचानक मुख्यभूमि से

जनार्दन के पास फोनकौल आई.

उन्हें अपने पैतृक गांव जाना पड़ा. उन के मित्र वेंकटेश ने फौरन उन के विमान टिकट का बंदोबस्त किया. पापामम्मी दोनों को जाना था. ज्यों ही मम्मीपापा गए, मधु ने दीदी से कहा कि वह 2-3 दिनों के लिए चेन्नई जाना चाहती है. शैलेश 2-3 दिनों के लिए अपने बिजनैस के सिलसिले में चेन्नई जाएगा. वह उसे भी साथ ले जाना चाहता है.

‘‘दीदी, तू साथ दे दे. बस, 2-3 दिनों की ही तो बात है.’’

मालती अवाक रह गई. मगर वह क्या कर पाती भला. उस की ख्वाहिश और बारबार यह आश्वासन कि शैलेश बहुत अच्छा लड़का है, वह उस से शादी करने को राजी है. मालती ने उसे इजाजत दे दी. शैलेश के साथ विमान से मधु चेन्नई चली गई. मालती का जैसे दिन का चैन और रातों की नींद उड़ गई थी. पता नहीं क्या हो जाए. लेकिन चौथे दिन वह शैलेश के साथ लौट आई थी. टूरिस्ट सीजन की वजह से उन्हें किसी ने ज्यादा नोटिस नहीं किया था.

एक सप्ताह के बाद मम्मीपापा मुख्यभूमि से लौट आए थे. गांव की पुश्तैनी जमीन का उन का हिस्सा उन्हें मिलने वाला था. मम्मीपापा के लौट आने पर मालती का मन बेहद हलका हो गया था.

समय गुजरता जा रहा था. जनार्दन और उन की पत्नी बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए दिनरात एक कर रहे थे. मालती अब बीए पास कर चुकी थी. वह आगे पढ़ने की सोच रही थी. दीपू 7वीं कक्षा में पहुंच गया था और मधु अब कालेज में पढ़ रही थी.

आधुनिक खयाल की लड़की होने के कारण मधु के पहनावे भी आधुनिक थे. उस की सहेलियां अमीर घरों की थीं. उन लड़कियों के बीच एक नाम बहुत ही सुनाई देता था- बबलू. वैसे उस का सही नाम जसवंत था. बबलू कभी अकेला नहीं घूमता था, 3-4 चेले हमेशा उसे घेरे रहते. क्यों न हों, वह शहर के एक प्रभावी नेता का बेटा जो था. ऊपर से वह तबीयत का भी रंगीन था. उस ने जब मधु को देखा, तो देखता ही रह गया उस की गोरी काया और भरपूर यौवन को. पर मधु भला उस पर क्यों मोहित होती, वह तो शैलेश की दीवानी थी. जब कभी कक्षाएं औफ होतीं तो मधु अपना समय शैलेश के साथ ही बिताती, कभी किसी पार्क या किसी दूसरी जगह पर.

जर्नादन और वेंकटेश की दोस्ती अब पारिवारिक बंधन में बदलने जा रही थी. वेंकटेश के बेटे को मालती बहुत पसंद थी. पिछले बरस उस ने अपनी सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी और उस की सरकारी नौकरी भी लग गई थी.

एक सुबह वेंकटेश और उन की पत्नी अपने बेटे का रिश्ता मालती के लिए ले कर आ गए थे. और अगले फागुन में शादी की तिथि निकल आई थी. मालती शादी के बाद भी पढ़ाई करे, उन्हें एतराज नहीं था. मां यही तो चाहती थी कि उस की बेटी को अच्छी ससुराल मिले.

इधर, मधु कालेज में अपनी सहेलियों की मंडली में हंसतीखेलती व चहकती रहती. क्लास न होने पर कैंटीन में समय बिताती या लाइब्रेरी में पत्रिकाएं उलटतीपलटती. कभीकभार शैलेश उसे पार्क में बुला लेता. बबलू तो बस हाथ मसोस कर रह जाता. वैसे, बहुत बार उस ने मधु को आड़ेहाथों लेने की कोशिश की थी.

वह गांधी जयंती की सुबह थी. कालेज में हर वर्ष की तरह राष्ट्रपिता की जयंती मनाने का प्रबंध बहुत ही अच्छे तरीके से किया गया था. लड़कियां रंगबिरंगे कपड़ों में कालेज के कैंपस और पंडाल में आजा रही थीं. तभी, बबलू की टोली ने देखा कि मधु शैलेश की कार में बैठ रही है.

अक्तूबर का महीना. सूरज की किरणों में गरमी बढ़ रही थी. शहर से दूर समुद्र के किनारे एक पेड़ के तने से लगे मधु और शैलेश बैठे हुए थे. शैलेश का सिर मधु की गोद में था और मधु की उंगलियां उस के बालों से खेल रही थीं. जब भी दोनों को मौका मिलता तो शहर से दूर दोनों एकदूसरे की बांहों में समा जाते. तभी, शैलेश ने जमीन पर फैले पत्तों में किसी के पैरों की पदचाप सुनी और वह उठ गया, देखा कि सामने एक नौजवान खड़ा है और उस के पीछे 3 और लड़के. मधु ने देखा, वह बबलू था.

और अगले क्षण बबलू ने मधु को हाथों में जकड़ लिया. बब्लू ने मधु को उस की गिरफ्त से छुड़ाना चाहा और पूछा, ‘‘तुम लोग कौन हो और इस बदतमीजी का मतलब…’’ बात अभी पूरी भी न हो पाई थी कि बबलू के बूटों का एक प्रहार उस की कमर पर पड़ा. वह उठ कर भिड़ना ही चाहता था कि बबलू का एक सख्त घूंसा उस के गाल पर पड़ा.

बबलू के इशारे पर 2 लड़कों ने उसे पीटना शुरू कर दिया. शैलेश ने मधु को अपनी बलिष्ठ बांहों में उठा लिया और पास ही के जंगल की ओर बढ़ चला. मधु प्रतिवाद करती रही. बबलू का तीसरा सहायक भी उन के पीछे पहुंच गया था.

शाम तक मधु के न लौटने पर जनार्दन व उन के घर वाले घोर चिंता में घिर गए. उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा दी. मालती अनजाने भय से अंदर ही अंदर घबरा रही थी.

अगले दिन यह खबर जंगली आग की तरह फैल गई थी कि शहर से दूर जंगल में एक लड़की का शव और समुद्र के किनारे एक लड़का घायल अवस्था में मिला है. पुलिस हरकत में आई. उस ने शव को अस्पताल पहुंचा दिया और घायल लड़के को अस्पताल में भरती करा दिया.

जनार्दन को पुलिस ने अस्पताल बुला लिया था शिनाख्त के लिए. जब पुलिस अधिकारी ने शव के मुंह से कपड़ा हटाया, जनार्दन के मुंह से चीख निकल गई. वे वहीं गिर पड़े.

दोपहर तक शव कालोनी में लाया गया. कालोनी के लिए वह दिन शोक का था. सभी जनार्दन परिवार के दुख में शामिल थे. मां का रो कर बुरा हाल था, छोटे दीपू को जैसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था. मालती दहाड़ें मारमार कर रो रही थी. जर्नादन के लिए सबकुछ एक अबूझ पहेली की तरह था. उन के सपनों का महल धराशायी हो गया था. रोरो कर उन का भी बुरा हाल था.

मालती के सिवा कौन जानता था कि मधु के जीवन के ऐसे अंत के लिए मालती भी तो जिम्मेदार थी. काश, शुरू से उस ने उसे बढ़ावा न दिया होता और मांपिताजी को सबकुछ बता दिया होता.

दहाड़े मार कर रोती मालती को अड़ोसीपड़ोसी ढांढ़स बंधा रहे थे.

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Social Story: मेट्रो सिटी- श्रुति के साथ क्या हुआ

Social Story: यूट्यूब पर अपनी वीडियो क्लिप देख कर श्रुति के पसीने छूटने लगे. उस के मुंह से सहसा निकल पड़ा, “अब तो मैं किसी को मुंह दिखाने लायक भी नहीं रही.”

श्रुति ने मोबाइल फोन तकिए पर रखा और हाथ को आंखों पर रख कर सिसकने लगी. उस के दिमाग में परसों रात वाली बातें कौंधने लगीं.

रात के 11 बज रहे थे. टौपजींस पहने, आंखों पर चश्मा चढ़ाए, एक हाथ में पर्स लटकाए श्रुति किसी मौडल की तरह बनीठनी एक पुल के नीचे खड़ी थी. यही उस का इलाका था. 100-200 मीटर आगेपीछे की रेंज में वह रोजाना यहीं खड़ी होती थी.

यह जगह श्रुति के घर से 10-12 किलोमीटर की दूरी पर थी. वह घर में सब को खाना खिला कर नाइट ड्यूटी के बहाने 11 बजे घर से निकलती और बैटरी रिकशा पकड़ कर यहां आ जाती.

श्रुति एक प्राइवेट अस्पताल में नर्स का काम करती थी. उस अस्पताल की साख अच्छी नहीं थी. अस्पताल में न डाक्टर अच्छे थे, न सुविधाएं अच्छी थीं. वहां बस गिनती के ही मरीज आते थे. जो आते थे, वे भी कमीशन एजेंटों के दम पर आते थे. महज 3,000 रुपए महीना उस की तनख्वाह थी, जबकि उस के घर का खर्च 15,000 रुपए के आसपास था.

6 महीने पहले इसी अस्पताल की एक दूसरी नर्स ने श्रुति को यह शौर्टकट रास्ता सुझाया था. श्रुति अस्पताल जाती, हाजिरी लगाती, थोड़ी देर 1-2 मरीजों की देखभाल करती, फिर निकल जाती अपने ग्राहकों का इंतजार करने.

श्रुति का पति अरुण दिल्ली में एक बैटरी रिकशा चालक था, जो पिछले साल 3 बच्चों, पत्नी और मां को छोड़ कर कोरोना की भेंट चढ़ चुका था. अरुण से पहले अरुण के पिता रामेश्वर प्रसाद भी, जो लकवे के मरीज थे, कोरोना की भेंट चढ़ चुके थे.

5 साल पहले श्रुति के मांबाप ने खाताकमाता लड़का देख कर ही उस की शादी की थी. उस का पति अरुण अच्छे से परिवार का भरणपोषण करता भी था, लेकिन बुरा हो इस कोरोना वायरस का जिस की चपेट में अरुण आ गया और श्रुति के सिर पर जिम्मेदारियों का पहाड़ लाद कर चला गया.

श्रुति की बड़ी और मंझली बेटी एक प्राइवेट स्कूल में क्लास 3 और 2 में पढ़ती थीं. सब से छोटा एक साल का बेटा था. डायबिटीज के चलते अरुण की मां दामिनी की एक किडनी खराब हो चुकी थी. 4,000 रुपए बच्चों की फीस, 4,000 रुपए दवा का खर्च और महानगर में रहनेखाने के खर्च का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है.

जिस घड़ी श्रुति रात में घर से बाहर निकलती, उस की बूढ़ी बीमार सास दामिनी समझ जाती कि बहू गलत रास्ते पर जा रही है, लेकिन अपनी महंगी दवाओं का खर्च और परिवार की तंगहाली के चलते वह श्रुति को रोक पाने की हालत में नहीं थी.

श्रुति ने अपने हाथों को आंखों से हटाया और छत को घूरने लगी. आंसुओं से तकिए के दोनों किनारे भीग चुके थे. उसे क्या पता था कि ग्राहक के वेश में मोलभाव करने वाला वह नौजवान उस की वीडियो क्लिप बना रहा था.

उस नौजवान के हाथों में न मोबाइल फोन था, न कैमरा… फिर कैसे? शायद उस की कमीज के बटन में या जेब में टंगे पैन में छिपा कैमरा लगा हुआ था.

श्रुति ने एक बार फिर यूट्यूब खोला और उस वीडियो क्लिप को देखने लगी. वह नौजवान पूछ रहा था, ‘कितना लेती हो?’

‘2,000…’ श्रुति बोली थी.

‘2,000… 2,000 रुपए ज्यादा नहीं हैं…’

‘नहीं, ज्यादा नही हैं. मैं इतना ही लेती हूं.’

‘पूरी रात का कितना लेती हो?’

‘4,000.’

‘लेकिन 2 जने हैं हम लोग.’

‘फिर तो 6,000 लगेंगे.’

‘6,000 ज्यादा हैं. चलो, 4,000 दे देंगे.’

वीडियो क्लिप देखते हुए श्रुति कांपने लगी. यही संवाद परसों रात में उसे सहज लगे थे, जबकि वीडियो में बम धमाके की तरह लग रहे थे. वह घबरा कर उठ बैठी और जल बिन मछली की तरह तड़पने लगी.

तभी पूजा की घंटी बजने लगी. श्रुति ने खिड़की खोली. उस की सास दामिनी पूजा शुरू कर चुकी थी. वह उठ कर बाथरूम चली गई.

बाथरूम में भी श्रुति को चैन नहीं था. उस के दिमाग की सनसनाहट रोजमर्रा के कामों में रुकावट पैदा कर रही थी. कुछ देर बैठने के बाद वह उठ खड़ी हुई और बाहर निकल पड़ी. फिर किचन में जा कर चाय बनाने लगी.

“बहू, प्रसाद ले लो.”

श्रुति ने पास जा कर सास के हाथों से प्रसाद लिया. प्रसाद लेते समय उस के हाथ थरथरा रहे थे, जिसे दामिनी ने भी महसूस कर लिया.

“क्या हुआ बहू? तबीयत तो ठीक है न?”

“हां… ठीक है,” यह कहते हुए श्रुति किचन में घुस गई. चाय उबाल मार कर चूल्हे पर गिर रही थी. उस ने गैस बंद की और चाय कप में उड़ेलने लगी.

चाय कप में उड़ेलते हुए श्रुति ने महसूस किया कि सचमुच उस के हाथ कांप रहे थे. उस ने चाय का कप अपनी सास को थमाया.

दामिनी ने फिर महसूस किया कि श्रुति के हाथ कांप रहे थे. इस बार उस ने कहा तो कुछ नहीं, लेकिन श्रुति के चेहरे को गौर से देखा. श्रुति सास से नजरें नहीं मिला रही थी. वह चाय दे कर बच्चों को जगाने चली गई.

छोटा बेटा अपनी मां श्रुति के साथ सोता था, जबकि दोनों बेटियां अपनी दादी के साथ सोती थीं.

सब को नाश्तापानी दे कर श्रुति सोने चली गई. यह उस का रोज का काम था. रातभर जागने के चलते सुबह उसे नींद बहुत आती थी. लेकिन आज नींद आंखों से गायब थी.

श्रुति सोचने लगी कि इस समय लाखों लोग यूट्यूब पर उस की वीडियो क्लिप देख रहे होंगे. अब वह घर से बाहर कैसे निकलेगी? लोगों को क्या जवाब देगी? अभी तो बच्चों को बहला लेगी, लेकिन जब बड़े होंगे तब? क्या वे उस के अतीत की काली परछाईं से बच पाएंगे?

इस तरह के अनेक सवाल श्रुति परेशान कर रहे थे. लग रहा था कि उस की कनपटी की धमनियां फट जाएंगी. अगर यह दिल्ली नहीं कोई छोटी जगह रहती तो अब तक वीडियो क्लिप देख रहे लोग उसे तड़ीपार की सजा सुना चुके होते.

श्रुति इन्हीं खयालों में गुम थी कि मोबाइल फोन की घंटी बजने लगी. उस ने देखा कि पिताजी का काल था. उस का कलेजा मुंह को आने लगा. उस ने सोचा कि बात पिताजी तक पहुंच चुकी है. उस ने काल रिसीव नहीं की.

श्रुति का चेहरा पसीने से भीग गया. उस ने दुपट्टे से चेहरा पोंछा और मोबाइल फोन को किसी खतरनाक चीज की तरह देखने लगी.

घंटी फिर बजने लगी. श्रुति की मोबाइल फोन उठाने की हिम्मत नहीं हो रही थी. लेकिन मजबूरन उस ने कांपते हाथों से काल रिसीव की.

उधर से पिताजी रोते हुए कहने लगे, ‘श्रुति, तुम्हारी मां हमें छोड़ कर चली गई…’

श्रुति के हाथ से मोबाइल फोन छूट गया. वह फूटफूट कर रोने लगी. यूट्यूब वाली वीडियो क्लिप जो अंदर तूफान मचाए हुए थी, मां की मौत पर ज्वालामुखी की तरह फट पड़ी.

दामिनी भागीभागी आई. श्रुति को रोता देख बच्चे भी मां से लिपट कर रोने लगे. किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था, लेकिन श्रुति को चुप कराते हुए सब रो रहे थे.

श्रुति ने अपनी सास का कंधा पकड़ कर कहा, “मां हमें छोड़ कर हमेशा के लिए चली गई…”

दामिनी ने श्रुति को अपने सीने से चिपकाते हुए कहा, “बहू, सब्र करो. एक न एक दिन सब को जाना पड़ता है… और अभी मैं हूं न. एक मां चली गई तो क्या, दूसरी मां है न.”

श्रुति सोच रही थी कि काश, इसी गम में यूट्यूब क्लिप वाला दर्द भी फना हो जाता तो कितना अच्छा होता, लेकिन यह दर्द फना होने वाला कहां था. श्रुति के हालात का फायदा उठा कर पैसे कमाने वाला वह घटिया इनसान आज मुसकरा रहा होगा, जबकि श्रुति के साथसाथ कई जिंदगियां तबाही के कगार पर पहुंच चुकी हैं.

बस में सवार परिवार के साथ मायके जा रही श्रुति सोच रही थी कि काश, इस बस का ऐक्सिडैंट हो जाता और सारे मुसाफिर मर जाते तो उस के सारे दुखों का अंत हो जाता. वह अनजाने में ही सही, अपने दुखों के साथ दर्जनों जिंदगियों का अंत चाहने लगी थी, लेकिन अगर इनसान की हर सोच हकीकत का रूप लेने लगे, तो फिर कुदरत का क्या काम रह जाए…

मां के क्रियाकर्म से फारिग हो कर श्रुति मध्य प्रदेश से वापस अपनी ससुराल दिल्ली लौट आई. राहत की बात यह रही कि मायके में किसी ने भी उस की वीडियो क्लिप का जिक्र नहीं किया.

जब कहीं से कोई शिकायत नहीं आई तो श्रुति का मन स्थिर होने लगा. कलेजे की धड़कन सामान्य होने लगी. धीरेधीरे फिर हौसला बढ़ने लगा.

इस मैट्रो सिटी में कौनक्या कर रहा है, इस से दूसरों को कोई मतलब नहीं रहता. बगल के फ्लैट में लोग मर कर सड़ जाते हैं, फिर भी पड़ोस वालों को खबर नहीं होती, तो वीडियो क्लिप वाली लड़कियों को भला कौन ढूंढ़ता फिरे.

2 महीने बाद श्रुति फिर अपने पुराने काम पर लौट आई थी. आज वह नीली साड़ी में बिना चश्मे के उसी पुल के नीचे अपने ग्राहक के इंतजार में खड़ी थी.

Social Story

Men’s Makeup: पुरुषों में मेकअप का बढ़ता ट्रेंड

Men’s Makeup: कई बार ऐक्टर्स की इंटरव्यू के दौरान उन्हें पत्रकार तक पहुंचने में समय लगता है. पता चलता है कि उन्हें मेकअप लेने में देर हो गई, क्योंकि वे बिना मेकअप के आम जनता के आगे आना पसंद नहीं करते, फिर चाहे वे लिजेंड ऐक्टर अमिताभ बच्चन हों या शाहरुख खान, हमेशा मेकअप के साथ आम लोगों के बीच में दिखाई पड़ते हैं.

यह तो हुई कलाकारों की बात, आम जीवन में भी आज के लड़के मेकअप लेने से पीछे नहीं हटते, इस की वजह उन का हैंडसम या स्मार्ट दिखने के अलावा प्रभावशाली व्यक्तित्व का होना भी वे मानते हैं, जो उन के दैनिक जीवन में उन्हें अच्छा एहसास कराता है.

लड़कों में मेकअप ट्रेंड है पौपुलर

यह सही है कि मेकअप आमतौर पर करना लड़कियों का काम माना जाता है, मगर बदलते समय के साथ लड़कों में भी मेकअप का ट्रेंड बढ़ा है. अलगअलग तरह के परफ्यूम के अलावा अब लड़के मेकअप के सामान भी यूज करने लगे हैं.

मेकअप आर्टिस्ट ओजस राजानी कहती हैं कि लड़कों में मेकअप ट्रेंड आजकल काफी बढ़ा है, क्योंकि उन सभी पर हमेशा परफैक्ट दिखने का दबाव है. इस की वजह वे खुद में आत्मविश्वास का बढ़ना मानते हैं, क्योंकि किसी भी जौब में अगर आप क्लीन और फ्रेश दिखते हैं, अगर पर्सनैलिटी अच्छी है, तो उस लड़के को जौब पर रखने की कोशिश की जाती है, खासकर कारपोरेट वर्ल्ड, होटल्स, बैंक्स, कौल सेंटर्स, मार्केटिंग फील्ड्स आदि कई स्थानों पर अच्छी तरह से खुद को ग्रूम किए हुए लड़के ही अकसर जौब के हकदार होते हैं, क्योंकि वहां कस्टमर हैंडलिंग का काम होता है, जहां एक हैंडसम लड़के के पास कोई भी ग्राहक जाना पसंद करता है.

अगर आप कही भी जाते हैं और आप के सामने वाला लड़का क्लीन दिखने वाला न हो, तो आप को उस से बात करना भी पसंद नहीं आता. अच्छा दिखना आज की तारीख में हर किसी के वश में होता है. रंगरूप कैसा भी हो अगर आप ने खुद को अच्छी तरह ग्रूमिंग या स्टाइलिंग की है, तो लोग आप की तरफ आकर्षित अवश्य होते हैं और आप के बात करने का टोन भी उस व्यक्ति के साथ बदल जाता है.

बैंक हो या एअरपोर्ट, हर जगह पर एक गुडलुकिंग व्यक्ति से बात करना सभी को पसंद आता है और यह ह्यूमन नैचर है. यही वजह है कि कारपोरेट सैक्टर के अलावा बैंक में भी क्लीन लुक वाले व्यक्ति को ग्राहकों के साथ बात करने के लिए आगे रखते हैं, ताकि उन का व्यवसाय बढ़े. यह किसी अस्पताल से ले कर क्लिनिक में हर स्थान पर फौलो किया जाता है.

होती है अच्छी कमाई

ओजस कहती हैं कि आजकल लेडीज ब्यूटी पार्लर से अधिक कमाई जैंट्स सैलून में होती है, क्योंकि अगर कोई लड़का शैव करने भी जाता है, तो उस के साथ मसाज, स्टीम कराना, चेहरे पर पैक लगवाना, हेयर कलर या मेहंदी लगवाना आदि बजट के अनुसार करवाता रहता है.

हर रविवार को अगर आप किसी जेन्ट्स सैलून में जाते हैं, तो वहां पुरुषों की भीड़ लगी होती है. फिल्मों या टीवी पर सैकंड रो में काम करने वाले पुरुषों से ले कर, स्टूडैंट्स, प्रोफेशर्स आदि सभी अपना मेकओवर करते रहते हैं. इस में वे पैसे देने से कतराते नहीं, क्योंकि बाद में उन्हें गुड लुक मिलता है. इस के अलावा आज के लड़के पेडिक्योर या मेनीक्योर भी करवाते रहते हैं.

मेकअप का सहारा लेना नहीं गलत

ओजस कहती हैं कि मेरे हिसाब से लड़कों को नियमित पेडीक्योर, मेनिक्योर अपनी साफसफाई के लिहाज से करवाते रहना चाहिए, ताकि किसी प्रकार की बीमारी आप के पैरों में न हो. नौर्मल सैलून आजकल हमेशा कुछ न कुछ सस्ते पैकेज देती रहती है, जिस का फायदा लड़कों को होता है. इस के अलावा आईब्रोज को शैप देना, नाक या कान के बालों को साफ रखना आदि सभी पर ध्यान देना जरूरी है, ताकि आप का लुक आकर्षक रहे. यह गलत भी नहीं है. जरूरत पड़े तो कहीं पर मेकअप का भी सहारा ले लेने में कोई हरज नहीं है. केवल सेलिब्रिटी ही नहीं, आम इंसान भी हलका मेकअप अवसर के अनुसार ले सकता है.

चेहरे पर ब्यूटी प्रोडक्ट्स ट्राई करने से पहले जानें कुछ जरूरी बातें :

 

  • मेकअप करने से पहले चेहरे को साफ करना जरूरी है. किसी हर्बल क्लींजर से अपने चेहरे को साफ करें. इसके बाद ऐक्सफोलिएटिंग स्क्रब से चेहरे पर सर्कुलर मोशन में मसाज करें. इस से आप के चेहरे से मृत त्वचा कोशिकाएं हट जाएंगी और पोर्स खुल जाएंगे. इस के बाद कौटन से अपने चेहरे पर टोनर लगाएं. इस से त्वचा का पीएच लेवल बना रहता है.
  • अब कोकोनट मिल्क जैसे हलके मोइश्चराइजर को अपने चेहरे और गरदन पर लगाएं. इस से स्किन हाइड्रेट होती है और मेकअप के लिए तैयार होती है. यदि आप की स्किन ड्राई है, तो औयल बेस्ड मोइश्चराइजर लगाएं. औयली स्किन वाले लोगों को वाटर बेस्ड मोइश्चराइजर यूज करना चाहिए.
  • अब अपने चेहरे पर कंसीलर लगाएं. कंसीलर चेहरे के डार्क स्पौट और मुंहासों को छिपा देता है. आप को अपने स्किन टोन से मैच करता हुआ कंसीलर यूज करना चाहिए. आंखों के नीचे और नाक पर कंसीलर लगा कर इसे ब्लेंडर स्पंज से अच्छी तरह ब्लेंड करें.
  • अपने स्किनटोन से मैच करता हुआ लिक्विड फाउंडेशन लें. इसे ब्रश से अपने चेहरे पर लगाएं. इसे ब्लेंड करने के लिए आप ब्लेंडर स्पंज का यूज कर सकते हैं. यह पूरे चेहरे के लुक को यूनीफौर्म कर देता है.
  • अब लूज पाउडर से अपने मेकअप को सैट करें. चेहरे पर जहांजहां आप ने कंसीलर लगाया है, वहां ब्रश से लूज पाउडर लगाएं. यह आप के मेकअप को सैट करने में मदद करता है.
  • आइब्रो पेंसिल से अपने आइब्रो को सैट करें. इस के बाद अपने होंठों पर अच्छी क्वालिटी का लिपबाम लगाएं. इस से आप के होंठ सौफ्ट नजर आएंगे.

इस प्रकार गुडलुकिंग होना अब आप के वश में है. इसे अपना कर कोई भी पुरुष, फ्रैश और क्लीन लुक पा सकता है, जो उस के दैनिक जीवन में आत्मविश्वास को बढ़ाता है और वह सफलता की मंजिल आसानी से चढ़ सकता है.

Men’s Makeup

Mobile Addiction: कहीं आप भी तो इस के शिकार नहीं

Mobile Addiction: जब से लोगों ने मोबाइल को एंटरटेनमैंट के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया है, उन्हें इस की लत लग गई है. स्मार्टफोन की यह लत कब हमारी लाइफ का अहम पार्ट बन जाती है हमें पता भी नहीं चलता. दिन में 4 घंटे मोबाइल पर चिपके रहना लाइफस्टाइल का हिस्सा बन गया है.

स्मार्टफोन यूज करना अच्छा तो बहुत लगता है लेकिन इस की अच्छीखासी कीमत हमें अपनी सेहत के जरीए चुकानी पड़ती है. इस बारे में बता रही हैं जनरल फिजिशन डाक्टर रिया अग्रवाल :

रील्स देखनेसुनने के लिए घंटों ईयरफोन का यूज खतरनाक है

कहीं आप को भी तो रातों में जाग कर फोन पर रील्स देखनेसुनने की आदत तो नहीं? अब रात में मोबाइल स्पीकर पर भी नहीं कर सकते इसलिए कहीं आप भी तो इस के लिए ईयरफोन का यूज तो नहीं कर रहे. अगर ऐसा कर रहे हैं तो हम आप को बता दें कि हेडफोन या ईयरफोन लगातार लगाने से कानों में हीट पैदा होती है, जिस से ईयर इन्फैक्शन का खतरा बढ़ सकता है. ज्यादा समय तक ईयरफोन लगाने से कानों की नसों पर भी दबाव पड़ता है. उन में सूजन भी आ सकती है. कानों में वाइब्रेशन से हियरिंग सेल्स भी प्रभावित होती है. ईयरफोन सुनने की क्षमता ही नहीं सिरदर्द को भी बढ़ा सकता है. ईयर स्पेशलिस्ट का कहना है कि है कि ईयरफोन की 100 डीबी तक आवाज भी कानों को डैमेज कर सकती है.

टेक्स्ट नेक सिंड्रोम

टेक नेक वह स्थिति है, जब व्यक्ति लंबे समय तक मोबाइल या लैपटौप का उपयोग करते हुए गरदन झुका कर बैठता है. सामान्य स्थिति में सिर का वजन 4-5 किलोग्राम होता है, लेकिन जैसे ही हम सिर को आगे की ओर झुकाते हैं, यह वजन कई गुना बढ़ कर गरदन और रीढ़ पर अतिरिक्त दबाव डालता है. सिर्फ यही नहीं बल्कि घंटों सिर झुकाए रहने से स्पाइनल कौर्ड की डिस्क में खराबी आने लगती है, जिस से कंधा जाम हो जाता है और हाथ घुमाने, उठाने में तकलीफ हो जाती है.

गरदन झुका कर बैठने से सर्वाइकल डिस्क पर लगातार दबाव पड़ता है. यह स्थिति डिस्क बल्ज या हर्निएशन का कारण बन सकती है. लंबे समय तक स्क्रीन पर झुक कर बैठने से गरदन की मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं, जिस से अकड़न और दर्द होता है. गरदन पर तनाव बढ़ने से सिरदर्द, आंखों में थकान और हाथों में झनझनाहट या कमजोरी भी महसूस हो सकती है.

डिजिटल आई स्ट्रेन या कंप्यूटर विजन सिंड्रोम की प्रौब्लम हो सकती है

मोबाइल ऐडिक्शन से आंखों में थकान, सूखापन, सिरदर्द, धुंधली दृष्टि, आंखों में जलन और लालिमा जैसी दिक्कतें हो सकती हैं, जिसे डिजिटल आई स्ट्रेन या कंप्यूटर विजन सिंड्रोम कहते हैं. इस के मुख्य कारण स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट और कम पलकें झपकाना हैं, जिस से आंखों में तनाव आता है.

एक ताजा रिसर्च में खुलासा हुआ है कि रोजाना सिर्फ 1 घंटे मोबाइल, टैबलेट या स्मार्टफोन जैसी डिजिटल स्क्रीन का इस्तेमाल करने से मायोपिया (नजदीक की चीजें साफ दिखना, दूर की चीजें धुंधली लगना) का खतरा 21% तक बढ़ सकता है. सामान्यतया 1 मिनट में 12 से 14 बार पलक झपकनी चाहिए, लेकिन लगातार मोबाइल स्क्रीन पर नजरें गड़ाने से यह कम हो जाती है, जिस से आंखों की नमी खत्म होती है और जलन, खुजली व लालिमा जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं. आंखों पर पड़ने वाले तनाव के कारण चीजें धुंधली दिखाई देने लग सकती हैं.

डिजिटल डिमेंशिया तो नहीं हो गया आप को

लगातार मोबाइल को देखना अपनेआप में एक गंभीर बीमारी है. इस कंडीशन में दिमाग में ब्लड सप्लाई कम हो जाती है जिस से सेल्स को नुकसान पहुंचता है और वे डैमेज होने लगते हैं. इस से आप चीजें भूलने लगते हैं. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि फोन पर घंटो स्क्रोल करने पर ढेरों फोटोज, एप्स, वीडियोज सामने आते हैं जिस से आप के दिमाग के लिए सबकुछ याद रखना मुश्किल हो जाता है. परिणामस्वरूप आप की याद्दाश्त, कंसंट्रेशन और सीखने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है.

अगर आप का बच्चा याद किया हुआ भूल जाए या फिर किसी चीज पर फोकस न कर पाए या फिर उस की परफौर्मेंस घटने लगे, तो उसे डांटने से कुछ नहीं होगा बल्कि आप समझ लीजिए कि वह डिजिटल डिमेंशिया से जूझ रहा है.

डिजिटल डिमेंशिया सिर्फ बच्चों पर ही नहीं बल्कि बड़ों पर भी अटैक कर रहा है.

ब्रिटेन में हुई स्टडी के मुताबिक, दिन में 4 घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम से वैस्कुलर डिमेंशिया और अल्जाइमर का जोखिम बढ़ जाता है. सिर्फ यही नहीं बल्कि इस से न्यूरोडीजैनेरेशन का रिस्क भी हो जाता है.

दरअसल, 18-25 साल की उम्र में ज्यादा स्क्रीन पर देखते रहने से  दिमाग की सब से बाहरी परत सेरेब्रल कौर्टेक्स पतला हो सकता है. यही परत मेमोरी, कौग्निटिव फंक्शंस को बेहतर बनाने में मदद करता है. जब यह पतली होती जाती है तो समस्याएं भी बढ़ती जाती हैं.

टेक्स्टिंग टेंडनाइटिस भी हो सकता है

घंटों मोबाइल चलाने से कलाई, हाथ और उंगलियों में दर्द और अकड़न महसूस हो सकती है, जिसे टेक्स्टिंग टेंडनाइटिस कहा जाता है. घंटों तक स्मार्टफोन का इस्तेमाल शारीरिक दर्द और थकान को बढ़ा सकता है. यह स्थिति लंबे समय तक रह सकती है और यदि उचित उपचार न लिया जाए तो यह स्थायी समस्या बन सकती है. जैसेकि मोबाइल चलाने में लगातार अंगूठे का इस्तेमाल करने से कापल टर्नल सिंड्रोम भी हो सकता है जिस में अंगूठे में इतना दर्द रहने लगता है कि आप उसे हिला भी नहीं पाते, काम करना तो दूर की बात है.

दरअसल, लंबे समय तक मोबाइल के इस्तेमाल से कलाई की मेडियन नस पर दबाव पड़ सकता है, जिस की वजह से दर्द, झनझनाहट, सुन्नपन और कमजोरी जैसे लक्षण दिखते हैं.

सिर्फ यही नहीं बल्कि ज्यादा स्मार्टफोन का इस्तेमाल करने से टेंडन में सूजन हो सकती है, जिस में कलाई में दर्द और स्टिफनैस भी होती है, जिस से हाथ हिलाना कठिन हो जाता है, जिसे टेंडिनाइटिस कहते हैं. बारबार उंगली का इस्तेमाल करने से टेंडन डिस्टल पाम के पास चिपक सकती है, जिस से डिसकंफर्ट होने के साथ ही आप का मूवमैंट भी प्रभावित हो सकता है. इसे ट्रिगर फिंगर भी कहते हैं. यह सब दिक्कतें मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल करने से होती हैं.

मोबाइल ऐडिक्शन से ओबेसिटी

मोबाइल ऐडिक्शन से ओबेसिटी हो सकती है क्योंकि यह शारीरिक गतिविधियों को कम करती है, नींद की कमी पैदा करती है और अस्वस्थ खानपान की आदतों को बढ़ावा देती है. लोग घंटों फोन पर बैठे रहते हैं, जिस से बैठने का जीवनशैली बढ़ती है और शारीरिक गतिविधियां जैसे व्यायाम या खेलकूद छूट जाते हैं, जो वजन बढ़ने का एक प्रमुख कारण है.

मोबाइल देखने के चलते हम देर रात तक जागते हैं और इस से नींद की कमी हो जाती है और भूख को नियंत्रित करने वाले हार्मोन प्रभावित होते हैं, जिस से हम अनहैल्दी चीजों जैसे चिप्स, नमकीन, बिस्कुट जैसे क्रेविंग बढ़ती है और हमें पता भी नहीं चलता कि हम कितना और कब खा रहे हैं. यह मोटापे का कारण बन सकता है.

Mobile Addiction

Oil or Serum: क्या है आपके खूबसूरत बालों का राज, जानें

Oil or Serum: सभी लड़कियों को लंबे और शाइनी केश पसंद आते हैं, लेकिन आज की भगदौड़ भरी जिंदगी में उन के बढ़ते स्ट्रेस, असंतुलित डाइट, कम नींद आदि ने उन के हेयर ग्रोथ को काफी हद तक प्रभावित किया है. कम उम्र में ही वे गंजेपन का शिकार हो रही हैं. ऐसा देखा गया है कि जिन लड़कियों के पेरैंट्स के हेयर ग्रोथ उम्र हो जाने के बाद भी अच्छे हैं, लेकिन उन की बेटी के हेयर लौस अधिक मात्रा में है, इस की वजह वे असंतुलित लाइफस्टाइल, स्ट्रेस और डाइट को मानती हैं.

इन लड़कियों ने दादीनानी के नुसखों से ले कर आज के महंगे सैलून ट्रीटमैंट्स तक, सबकुछ अपना लिया है, लेकिन हेयर ग्रोथ में फर्क नहीं आया है. कुछ लड़कियों को तो हमेशा इस बात की चिंता रहती है कि केशों के झड़ने की वजह हेयर औयल लगाना है या नहीं, क्योंकि आजकल बाजार में कई प्रकार के हेयर औयल, कंडिशनर, सीरम आदि मिलते हैं, जिसे ले कर वे बहुत कन्फ्यूज्ड रहती हैं. बालों में औयल लगाना कितना सही है या नहीं, इसे ले कर अलगअलग लोगों के अलगअलग मत हैं.

आइए, जानते हैं ऐक्सपर्ट की राय क्या है और हेयर औयल का हेयर ग्रोथ में कितना हाथ होता है.

स्कैल्प का क्लीन होना जरूरी

इस बारें में डर्मेटोलौजिस्ट डा. सोमा सरकार कहती हैं कि आमतौर पर मैं हेयर औयल लगाने से पहले उन के स्कैल्प क्लीन होने चाहिए, डैंड्रफ न हों, जिस में औयल अधिकतर रूट्स पर नहीं आगे के हेयर पर लगाने की सलाह देती हूं.

असल में उंगली के पोरो से औयल मसाज करने पर स्कैल्प का ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है, जिस से फीलगुड फैक्टर काम करता है. इस का हेयर ग्रोथ या हेयर फौल से कोई मतलब नहीं होता. यदि किसी को औयल लगाने की इच्छा होती है, तो औलिव, आलमंड या मस्टर्ड औयल बालों के लिए अच्छा माना जाता है.

किसी प्रकार की कैमिकल युक्त औयल हमेशा ही केशों के लिए नुकसानदायक होता है. बाजार में आजकल कई प्रकार के प्रोडक्ट्स विटामिन और मिनरल युक्त औयल मिलते हैं. ये सब मार्केटिंग गिमिक हैं, जिन में अधिकतर कुछ खास कैमिकल या आयुर्वेदिक दवाओं के मिश्रण से हेयर को हैल्दी बनाने का नुसखा कहा जाता है, जिस का असर हेयर पर नहीं होता.

हेयर क्वालिटी और ग्रोथ अधिकतर जेनेटिक होता है, जो जींस और लाइफस्टाइल पर निर्भर करता है. इस के अलावा कुछ जगहों पर आज हेयरफौल की वजह केशों के साथ कई ऐक्सपेरिमैंट का करते रहना है, मसलन ब्लो ड्राई, कलरिंग, प्रदूषण, असंतुलित भोजन आदि जिम्मेदार हैं.

सप्लिमेंट्स का सहारा

डा. सोमा कहती हैं कि हेयर स्ट्रैंथ के लिए ऐनिमल प्रोटीन, जिस में खासकर एमीनो एसिड होता है, जिस में एग, मछली, चिकन आदि के साथ, ऐंटी औक्सीडैंट मसलन विटामिन सी, सिलेनियम, प्रोटीन, बायोटिन आदि डाइट में होने की आवश्यकता है. अगर आप की डाइट में कुछ कमी हो रही है तो डाक्टर की सलाह से सप्लिमैंट्स भी ले सकती हैं.

कई बार लोग शैंपू करने के बाद बालों में तेल लगा लेते हैं, ऐसा करने से बालों को नुकसान पहुंच सकता है. अकसर लोग यह सोचते हैं कि बालों में लंबे समय तक तेल लगा कर रखने से फायदे मिलते हैं, लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है.  बालों में 40 से 45 मिनट के लिए तेल लगा कर रखें. मसाज के बाद इसे छोड़ दें और 40 मिनट बाद बालों को हलके शैंपू से धो लें. बालों में तेल लगाने के बाद इन्हें गरम पानी से न धोएं.

1 घंटे से ज्यादा समय के लिए बालों में तेल लगा रहने से डैंड्रफ और गंदगी बढ़ने का खतरा रहता है. ऐसा करने से स्कैल्प के छिद्र बंद हो सकते हैं. इस से बालों को कई तरह के नुकसान पहुंच सकते हैं. अगर आप को ऐलर्जी या किसी अन्य तरह की समस्या है, तो बिना डाक्टर की सलाह के बालों की औयलिंग करने से बचना चाहिए.

सीरम कब लगाएं

हेयर सीरम एक सिलिकान बेस्ड लिक्विड प्रोडक्ट होता है. हेयर सीरम बालों की सतह पर कोटिंग करती है. हेयर सीरम बालों की ऊपरी सतह को ही पोषण दे कर मुलायम बनाता है. यह बालों के क्यूटिकल्स तक नहीं जाता. हेयर सीरम का इस्तेमाल करने से बालों की चमक को बढ़ावा मिलता है.

ऐक्सपर्ट के अनुसार, बालों में हेयर सीरम का इस्तेमाल हमेशा औयलिंग, शैंपू और कंडीशनर के बाद किया जाता है. इस के अलावा हेयर सीरम का कम पीएच लेवल बालों के स्ट्रैंड्स को एकसाथ रखता है, जो डैमेज को कम कर सकता है.

इस प्रकार सीरम और हेयर औयल दोनों बालों के लिए फायदेमंद होते हैं. अगर आप के केश ड्राई और डैमेज हैं, तो अपने लाइफस्टाइल में बदलाव करें. हेयर औयलिंग हमेशा बालों को शैंपू से धोने से पहले करनी चाहिए. वहीं, हेयर सीरम का इस्तेमाल शैंपू करने के बाद किया जाता है. जो लोग अकसर अपने बालों की स्टाइलिंग करते हैं, उन के लिए हेयर सीरम ज्यादा बेहतर औप्शन है.

ऐक्सपर्ट की मानें तो सप्ताह में 2 बार हेयर औयल लगाने के बाद शैंपू करना चाहिए. शैंपू के बाद बालों के नमी को सही तरीके से सुखा कर सीरम लगाना चाहिए. ऐसा करने से बालों को सही पोषण मिलता है और बालों का डैमेज कम हो सकता है.

Oil or Serum

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