Hindi Fictional Story: ‘‘बला की खूबसूरत लड़की थी जो मेरे ही घर के सामने रहती थी. खिड़की पर खड़ा हो कर मैं उसे घंटों निहारा करता. मेरे घर वालों के नाम पर कोई न था. जब से होश संभाला मामामामी ही मातापिता की जगह मिले. उन्होंने ही बताया कि सड़क दुर्घटना में मेरे मातापिता चल बसे थे और मैं कार सीटर में बंधा होने के कारण बच गया. कुदरत की मुझ पर खासी कृपा थी. मामाजी के घर कोई औलाद पैदा नहीं हुई तो मैं ही सब का लाडला बना रहा बल्कि दोनों परिवारों की संपत्ति का इकलौता वारिस मैं ही था ऊपर से इतनी खूबसूरत पड़ोसिन.
मेरा दिल बल्लियों उछलता रहता. मैं ने कई बार उस से बात करने की कोशिश भी की पर वह नाक पर मक्खी तक न बैठने देती थी. खैर, लड़कियां टीनेज में खामोश हो जाती हैं यही सोच कर मैं ने खुद को समझ लिया था. एमबीबीएस के बाद मास्टर्स के लिए एडिनबर्ग विश्वविद्यालय जाना चाहता था जहां दुनियाभर से लोग शोध के लिए पहुंचते हैं. रिजल्ट का इंतजार ही कर रहा था कि उन्हीं दिनों उस की 10वीं की बोर्ड परीक्षा का प्रवेशपत्र आया. सैंटर मेरे ही स्कूल में पड़ा. यह बात उस के पिता ने ही बताई और कहा कि मैं और आंटी जौब के लिए जाते हैं. तुम ही आएशा को परीक्षा देने के लिए सैंटर पर छोड़ आना. मैं ने उसी दिन उस का नाम जाना था. इतना प्यारा नाम आएशा हां.
वही तो मेरा आशियां सजाने वाली थी. अब एक नया काम मेरे हिस्से आ गया. अपने नाम के साथ उस का नाम जोड़ कर नोटबुक में लिखता रहता. आएशा, शिवम, नाम से ही लगता मानो हम एकदूजे के लिए ही बने थे. उम्र का वह दौर ऐसा ही होता है. पहले के लोग गलत नहीं करते थे जो आग और फूस के बीच दूरियां बना कर रखते थे. अब मैं अपनी बाइक से भी प्यार करने लगा था उस पर आएशा जो बैठने वाली थी. वह भी अजीब मिट्टी की बनी थी. चुपचाप आ कर बैठ जाती और सीधा स्कूल गेट के अंदर चली जाती. वापसी में भी वही स्थिति थी. ‘हां’ या ‘न’ के लिए सिर हिला कर जवाब देती.
मेरा बड़ा दिल करता कि एक बार उन हसीन लबों से अपना नाम ही सुन लूं. फिर खुद को समझबुझ लेता कि ज्यादा की लालच की तो जो मिला है वह भी न छूट जाए. इस तरह उस की हाई स्कूल की परीक्षाएं खत्म हुईं और मेरी यूनिवर्सिटी का एडमिट कार्ड आ गया. वीजा वगैरह कराते हुए समय निकल गया. फुरसत ही नहीं हुई कि अपनी मनमोहिनी से मन की बात कह सकूं. खिड़की के उस पार के इंतजार पर भरोसा था. निगाहों को निगाहों से आश्वासित कर मैं पढ़ने के लिए यहां आ गया. अब जब जौब लग गई है तो सोचता हूं मामामामी से मिल कर आएशा से रिश्ते की बात चला दूं.
आखिर उस के पिता ने मुझ में कुछ तो देखा होगा तभी तो किशोर उम्र में भरोसा कर सके थे. उम्रभर की जिम्मेदारी भी दे सकते हैं. कुदरत ने साथ दिया तो ले कर ही लौटूंगा.’’ मारिया जो अब तक दम साधे मेरी प्रेम कहानी सुन रही थी उस की आंखों में जैसे एक नई रोशनी आ गई. वह जब से यहां आया था वही तो एक दोस्त बनी थी. यूनिवर्सिटी में साथ थी जहां मैं मैडिकल और वह नर्सिंग की छात्रा थी. एक रोज बातों ही बातों में हिंदुस्तान देखने की उस की ललक ने हमारी दोस्ती करा दी. पहलेपहल एक विदेशी का अपने प्रति झकाव देख कर मैं डर गया मगर वह बस दोस्त थी और उस ने कभी अपनी सीमाएं नहीं लांघीं तो मैं भी आश्वस्त हो कर उस से अपना अतीत साझ कर बैठा जिसे सुन कर वह बेहद रोमांचित हो गई. उस का कुतुहल चरम पर था, ‘‘जीवन में एक न एक बार प्यार तो सब करते हैं. कुछ अपनी कहानियों को अंजाम दे पाते हैं तो कुछ की कहानियां अंतर्मन में ही दफन हो जाती हैं. तुम एक सच्चे आशिक हो. अपना मंजिल पा कर सफलतम बनो. मैं बेसब्री से तुम दोनो का इंतजार करूंगी…’’ उस शाम साथ बैठे तो बातों ही बातों में सुबह हो गई. जो कुछ मारिया ने कहा वह अंदर तक बैठ गया. उस की कत्थई आंखें पंजाबी पिता की देन थीं जिसे उस ने जन्म के पहले ही खो दिया था. तभी मेरे साथ बातें करती वह अकसर खो जाती.
मुझे अपनी मां के हाथों के व्यंजन खिलाती. हां, मुझ में अपने खोए हुए रिश्ते को ढूंढ़ रही थी. ‘‘माफ करना. मेरी कहानी तुम्हें दुखी कर देगी मुझे इस का जरा भी अंदाजा नहीं था.’’ ‘‘तुम्हें दुखी होने की जरूरत नहीं दोस्त. तुम ने तो हमेशा ही मेरे खालीपन को भरा है.’’ उस ने भरीभरी आंखों से कहा तो एहसास हुआ विदेशों में कितना अकेलापन है. उस के वालेट में सहेजी पिता की तसवीर देख कर एक स्वाभाविक अपनापन महसूस हुआ. हां, वह भारत के बाहर भारत की बेटी थी इस नाते वह भी मेरी ही जिम्मेदारी थी. उस से बातें खत्म कर के मैं ने दिल्ली की फ्लाइट ले तो ली पर सारे रास्ते उस के बारे में सोचता रहा. एक मैं ने ही मातापिता को नहीं खोया था बल्कि उस ने तो पिता की बस तसवीर ही देखी थी. उस के लिए पिता तो नहीं बन सकता था मगर एक दर्द का रिश्ता तो बन ही गया था और वह मित्र बन कर इस डोर को कभी नहीं टूटने देगा यही सोचता सफर कब कट गया पता नहीं चला.
दिल्ली की आबोहवा अब भी वैसी ही थी. शरीर को छूते ही सारी थकान हर ले गई. कैब ले कर चंडीगढ़ पहुंचा तो पूरे शरीर में झरझरी सी दौड़ गई. जोशीले कदम उठे तो सीधे उसी खिड़की के नीचे रुके. ‘‘तुम आ गए बेटा?’’ आएशा के पिता घर के बाहर ही खड़े मिल गए. उन्होंने बढ़ कर गले लगा लिया जैसे पहले से ही राह देख रहे हों. शायद मामाजी ने बता दिया होगा. घर में घुसते ही मामी ने सारी राम कहानी कह सुनाई, ‘‘दहेज के लोभियों के हाथों पड़ गई थी. पता नहीं कैसे उस के पड़ोसियों ने पिता को फोन कर दिया और ऐन वक्त पर न पहुंचते तो न जाने क्या हो जाता. चलो… बेचारी की जान बच गई, तब से यहीं रहती है.. कहते हैं ब्याह के नाम से ही नफरत हो गई है उसे.’’ इतनी बड़ी बात हो गई और मुझ से किसी ने बताया तक नहीं. मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था पर लगा कि मेरी पढ़ाई में बाधा न पड़े यही सोच कर मुझ से छिपाया होगा. भारी व धड़कते मन से आएशा के घर में प्रवेश किया.
सामने ही उसे देख बड़ी मुश्किल से खुद को संभाल पाया. खूबसूरत तो वह पहले ही थी, ऊपर से काली नागिन सी चोटी जो घुटनों तक लहराती थी वह छोटी हो स्टोल बन गले से लिपट गई थी. चेहरे पर अब भी वही तटस्थता जैसे कोई नाराजगी हो. ‘‘कैसी हो?’’ ‘‘क्यों पूछ रहे हो?’’ ‘‘हक से पूछ रहा हूं यार.’’ ‘‘तो हक दिया भी होता…’’ मेरी बेजबान गुडि़या बोल पड़ी तो एहसास हुआ कि अनजाने में एक अपराध तो हुआ है. उस से कुछ कहेसुने बिना चले जाना प्रेम से पलायन करना था. माना मुंह से न कहा था मगर निगाहों ने असीमित वादे किए थे. सोचा था कुछ बन कर ही लौटेगा मगर उसे अपने मंसूबों के बारे में न बता अंधेरे में रखने की गलती तो हुई थी. ‘‘अरे बेटा. चाय पी कर जाना,’’ कह कर आएशा की मां ने बैठा लिया. आशु के हाथों की चाय पीने की ललक ने रुकने पर मजबूर कर दिया था.
फिर अंकल ने बताया कि दहेज के भूखे भेडि़ए कैसे नकाब पहने घूमते हैं. पहचानने में भूल हो गई बेटा. खुद कहा, एक जोड़ी कपड़े में बच्ची को भेजिए. हमें कुछ भी नहीं चाहिए पर बच्ची को सताते रहे. मैं तो मौत के मुंह से निकाल कर लाया हूं इसे. केस ही ऐसा था कि तुरंत तलाक मिल गया है. चाय के साथ आशु सामने थी. खूबसूरत मेहंदी लगे हाथ जो अकसर ख्वाबों में आते और नींद से जगा कर चाय पिलाते थे. उस की जगह एक जले हुए हाथ का प्याला जब मुझ तक पहुंचा तो चाय हलक से न उतर पाई. रुंधे गले से बस इतना ही कहा, ‘‘आप लोगों को मंजूर हो तो मैं आएशा से शादी करना चाहता हूं.’’ ‘‘नहीं यह नहीं हो सकता.’’ आएशा बुदबुदा उठी तो लगा दोबारा गलती कर दी. आएशा की मरजी तो पूछी ही नहीं. फौरन घुटनों के बल बैठा और बोला, ‘‘मेरी हमसफर बनोगी?’’ ‘‘कहा न नहीं.’’ ‘‘मगर क्यों?’’ मेरे प्रश्न के जवाब में वह मुझे खींचती हुई अपने कमरे में ले आई.
उस के कमरे की उस खिड़की तक पहुंच कर खुद को धन्य महसूस कर रहा था जो हमारे प्रणय की सब से बड़ी साक्षी थी. एक मिनट को महसूस ही न हुआ कि इस बेहद निजी स्थान पर भला उसे क्योंकर लाई होगी. इतने सालों के प्रवास ने मुझे तो खुले दिमाग का बना दिया था मगर आएशा भी… पता नहीं क्या करेगी. आगे क्या कुछ घटने वाला है यह सोच कर मन ही मन रोमांचित था कि उस ने आवरण हटा दिया. आग ने उस खूबसूरत हिस्से को झलसा दिया था जिसे संवारते हुए स्त्री जीवन बीतता है. ‘‘इसे पाना चाहते हो. यहां क्या पाओगे? बिल्डिंग में आग लग जाए तो इंश्योरैंस वसूल कर नई इमारत खड़ी की जाती है तुम इस बिगड़ी इमारत का क्या करोगे?’’ उन आंखों में दुख और क्रोध के बादल थे. बादलों के पार मेरा चांद था जो दाग होते हुए भी बेहद खूबसूरत था.
सब से बड़ी बात यह कि सोतेजागते जिस की कल्पना की थी यह वही था. सफेद शरीर पर गुलाबी निशान मेरे लिए प्रेम के प्रश्नपत्र थे जिन में शतप्रतिशत अंक लाने हेतु मैं कटिबद्ध था. मैं उस आफताब के दागों से जरा भी विचलित नहीं हुआ तो वह चीख उठी. ‘‘पगली, मैं ने तुम से प्रेम किया है तुम्हारे शरीर से नहीं. तुम मेरा चांद हो और मैं चकोर बस बीच में कोई ग्रहण आ गया. प्रतीक्षा मेरी नियति है मैं और प्रतीक्षा कर लूंगा. मैं तुम में आशाओं के दीप जलाऊंगा. वादा है तुम से इसे वापस वैसा ही बना दूंगा ताकि तुम्हारा खोया विश्वास लौट आए.
तुम फिर से वैसी ही बन जाओगी जिसे पाने की ललक मैं सारा जीवन दांव पर लगा दूं. मुझे इस रिश्ते को उस मुकाम पर ले जाना है,’’ मैं ने नजरों से ही हौले से सहलाते हुए कहा, ‘‘प्रेम समर्पण है… शायद तुम्हारे लिए ही सर्जन बना हूं. इस संगमरमर में लगी काई को अपने हाथों साफ करूंगा और जब वापस इस में उतना ही गुरुर आ जाएगा तब हम नए जीवन में कदम रखेंगे…’’ दोनों की आंखों से बहते आंसू आएशा का मन भिगो गए. तन तो कब से भावावेश में आ कर उस के तन का चादर बन गया था. अपनेआप को उस से अलग कर बाहर निकला और घर वालों से कहा, ‘‘पंडितजी से विवाह की तिथि निकलवा लें. जितनी जल्दी हो सके शादी कर के लौटना चाहता हूं. आएशा के जले अंगों की प्लास्टिक सर्जरी अब इंगलैंड में होगी. मैं वीजा के लिए देखता हूं.’’ विवाह की तैयारियां शुरू हो गईं.
न जाने क्या था हम दोनों के बीच कि बगैर बोले ही मौन ने प्यार का संदेश पहुंचा दिया था. मेरे शब्दों की गंभीरता ने आएशा के पिता को यह भान करा दिया था कि जो दुख उन्होंने अपनी बेटी के हिस्से में लिखा था उसे हरने उस का मसीहा आ चुका है. खिड़की फिर से गुलजार हो गई. अब एक मधुरता आएशा के लावण्य को और बढ़ा रही थी. मैं उस की खूबसूरती में फिर से खो जाना चाहता था पर काम बहुत थे. शादी, सर्टिफिकेट, वीजा वगैरह, सब निबटा कर मैं ने मारिया को फोन किया और यह सारा वृत्तांत जब कह सुनाया तो खुशी के मारे वह रो पड़ी. मेरी प्रेम कहानी के पूरी होने की खुशी उस की आवाज से 7 समंदर पार तक आ रही थी. प्यार के पंछी जो मिल गए थे.
हमारे घोंसले को संवारने की जिम्मेदारी उस ने स्वयं ही ले ली और स्वागत की तैयारियों में जुट गई. उसे एक कुंआरे घर को नवयुगल के सपनों का संसार जो बनाना था. उस ने आएशा के इलाज के लिए डाक्टर से अपौइंटमैंट ले ली और डौक्यूमैंट्स भी तैयार करा दिए ताकि सर्जरी में देर न हो. हम सीधे अस्पताल पहुंचे और पति के रूप में कंसेट पर हस्ताक्षर करते हुए दिल वैसे ही धड़का जैसे वह पहली बार बाइक पर आ बैठी हो. आज अपने हाथों अपने प्रेम को संवारने की बरसों पुरानी ख्वाहिश पूरी करने जा रहा था.
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