सोशल मीडिया और डीपफेक

सोशल मीडिया पर डीपफेक्स बना कर अपलोड करने वाले प्लेटफौर्मों के बारे में अब सरकार कानून बना रही है. आर्टिफिशियल इंटैजिलैंस टैक्निक से अब किसी का धड़ व किसी का चेहरा जोड़ कर फोटो ही नहीं, फिल्म भी एडिट कर बनाई जा सकती है. देखने वालों को यह सच लगेगी. कानून के अनुसार, संबंधित प्लेटफौर्म को शिकायत मिलने के 36 घंटों के भीतर उसे हटाना होगा और सब्सक्राइबर को कंटैंट वैरिफिकेशन टूल्स को डाउनलोड करने की सुविधा दी जाएगी.

आर्टिफिशियल इंटैजिलैंस टैक्निक जहां बहुत से काम आसान करने वाली है वहीं कंटैंट क्रिएशन से यूजर्स और व्यूअर्स के लिए यह परेशानियां खड़ी करने वाली भी है. डीपफेक्स उन्हीं में से एक है जिस में किसी पौर्न आर्टिस्ट के चेहरे को हटा कर किसी और का चेहरा लगाया जा सकता है जिसे एक्सपर्ट भी नहीं पकड़ सकते.

यह टैक्निक रिवेंज (किसी से किसी तरह का बदला लेने) के लिए खूब इस्तेमाल की जाएगी तो वहीं यह यूट्यूब और रील्स की फैक्चुएलिटी पर सवालिया निशान खड़े कर देगी. मुफ्त के यूजर्स तो इसे सम?ा ही नहीं पाएंगे, न ही फैक्ट चैक कर पाएंगे. जैसे व्हाट्सऐप मैसेज, जिन में जानकारी का दावा किया जाता था, अब भरोसे के लायक नहीं रह गए और फौरवर्ड करने वाले कतरा रहे हैं वैसे ही अब यूट्यूब, इंस्टाग्राम, पिंटरेस्ट, फेसबुक रील्स की असलियत पर निशाने लगाए जाने शुरू हो जाएंगे. लोगों को पता ही नहीं रहेगा कि वे जो देख रहे हैं क्या वह सही है, फैक्ट है या बनावटी है.

सदियों से लोग किस्सों को इतिहास सम?ाते रहे हैं. आज भी रामायण और महाभारत को इतिहास में घुसाने की कोशिश वही सरकार कर रही है जो फैक्ट चैक टूल्स से डीपफेक्स को जंचवाना चाहती है. रामायण और महाभारत काल का अभी तक कहीं कोई आर्कियोलौजिकल एविडैंस नहीं मिला है, कहीं कोई महल, मकान, रथ, धनुष, लाशों का अंबार नहीं दिखा है. जो भी जहां मिलता है वह कार्बनडेटिंग टैक्निक से पता चलता है कि वह 400-500 साल पुराना भी नहीं है.

जो सरकार धर्म के डीपफेक्स को सच मानती है वह आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस के बारे में केवल सरकार को नुकसान पहुंचाने वाले डाउट्स/फैक्ट्स को चैक करेगी, यह पक्का है. मोदी, शाह और भाजपा सरकार अपने देवीदेवताओं राम, कृष्ण आदि के बारे में कुछ भी किया जाएगा तो उस पर ऐक्शन लेंगे, वहीं अगर दीपिका पादुकोण के बारे में कोई डीपफेक तैयार होगा तो उसे छेड़ेगी भी नहीं.

मौजूदा भगवा सरकार के शासन के दौरान ही व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी ने हिंदू व मुसलिम भेदभाव को जम कर परोसा, इतिहास को तोड़मरोड़ कर पेश किया. हैरानी यह है कि ऐसा करने वाले खुलेआम घूम रहे हैं जबकि जिन्होंने सरकार की किसी भी नीति के खिलाफ कुछ किया उन्हें 24 घंटे के भीतर पकड़ लिया गया. डीपफेक कानून का भी सिर्फ मिसयूज किया जाएगा, इस की सौ फीसदी गारंटी है.

आंखों के नीचे हो गाए हैं डार्क सर्कल, तो इसे ऐसे करें कम

आंखों के नीचे डार्क सर्कल यानी काला घेरे होने से हमारा चेहरा देखने में खराब लगता है. इन डार्क सर्कल की वजह से व्यक्ति थका हुआ और उम्रदराज भी नजर आता है. यह दिक्कत कई वजहों जैसे शरीर में पोषक तत्वों की कमी होना, नींद न आना, मानसिक तनाव या फिर बहुत ज्यादा देर तक कंप्यूटर सिस्टम पर काम करने के कारण भी हो सकती है, इसलिए जरूरी है कि आप इनसे छुटकारा पाने की तरकीब जान लें. तो आइये जानते हैं इस समस्या से छुटकारा पाने के उपाय.

खीरा और आलू

खीरे या आलू को क्रश करके आंखो के ऊपर रखें. कुछ देर तक आंखें बंद रखने के बाद डार्क एरिया पर इसे हल्के-हल्के से घुमाएं. इससे आंखों के आसपास का थुलथुलापन कम होगा साथ ही कालापन भी घटेगा.

टमाटर का पेस्‍ट

1 टामटर लें, 1 चम्‍मच नींबू का रस और चुटकीभर बेसन और हल्‍दी ले कर मिक्‍सी में पीस लें. इस गाढे पेस्‍ट को अपनी आंखों के चारों ओर लगाएं और 20 मिनट के बाद चेहरे को धो लें. ऐसा हफ्ते में 3 बार जरुर करें.

ठंडी टी बैग

डार्क सर्कल्स पर प्रयोग किए गए ठंडे टी-बैग्स का इस्तेमाल भी किया जा सकता है. टी-बैग्स में मौजूद तत्व टैनिन आंखों के आसपास की सूजन और छाई डार्कनेस को कम करता है.

बादाम तेल

आंखों के आस पास की संवेदनशील त्‍वचा पर आप बादाम तेल लगा कर रात को सो सकती हैं. दूसरी सुबह ठंडे पानी से मुंह धो लें.

गुलाब जल

बंद आंखों पर गुलाब जल से भिगोई हुई रूई को आंखों पर रखें. ऐसा केवल 10 मिनट तक करें. ऐसा करने से आंखों के आस पास की त्‍वचा चमक उठेगी.

संतरे का रस और ग्‍लीसरीन

संतरे का रस और ग्‍लीसरीन को एक साथ मिला कर रोजाना आंखों और आस पास के एरिया पर लगाएं. यह बहुत ही प्रभावशाली है और डार्क सर्कल से निजात भी दिलाता है.

पानी पियें

अगर आप कम पानी पीती होंगी तो भी डार्क सर्कल हो सकते हैं. कम पानी पीने से शरीर में ब्‍लड सर्कुलेशन सही से नहीं हो पाता और आंखों के नीचे की नसों को पूरा खून नहीं मिल पाता, जिससे डार्क सर्कल हो जाते हैं. तो, इसलिये खूब सारा पानी और फ्रेश फ्रूट जूस पीजिये.

इन देशों में अगर घूमने जाएं तो कभी न करें ये काम

आपने दुनिया के अजीबों-गरीब कानूनों के बारे में जरूर सुना होगा. इनके बारे में सुनकर आपको बेशक हंसी आए या अजीब महसूस हो लेकिन इन कानूनों के पीछे कोई न कोई वजह जुड़ी होती है. कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि अजीबों-गरीब नियम या कानून के बारे में जानकर कई पर्यटकों की दिलचस्पी उस देश को जानने के बारे में और भी बढ़ जाती है और वो वहां घूमने की प्लानिंग भी करने लगते हैं. आइए, जानते हैं कुछ ऐसे ही देशों के बारे में.

सोमालिया में बैन है समोसा

समोसा भारत का एक मुख्य स्नैक्स है. जिसे पार्टी या टी टाइम में चाय-कौफी के साथ परोसा जाता है. शायद ही कोई ऐसा भारतीय हो, जिसने कभी समोसा न खाया हो. लेकिन अगर आप सोमालिया जाएंगे तो आपको समोसा कहीं दिखाई नहीं देगा. यहां के उग्रवादी समूह अल-शबाब ने यहां समोसा बनाना, खाना और बेचना सिर्फ इसलिए बैन करवा दिया क्योंकि उन्हें लगता है कि इसके तीन नुकीले हिस्से ईसाइयों का पवित्र चिन्ह है.

travel in hindi

पाकिस्तान में डांस नहीं

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में डांस करना बहुत अनैतिक माना जाता है. यहां की अथौरिटी ने स्कूल में बच्चों तक के डांस करने पर बैन लगा रखा है. इस प्रांत के सभी स्कूलों को नोटिस जारी किया है कि बच्चों को डांस न करने दिया जाए.

सिंगापुर में चुइंगम है बैन

यहां 1992 जब किसी व्यक्ति ने पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर चुइंगम चिपका दिया था, जिससे पब्लिक ट्रांसपोर्ट कई घंटों के लिए बाधित हो गया था. तब से यहां चुइंगम चबाना मना है, इतना ही नहीं इसे एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट करना भी मना है. अगर आप सिंगापुर जाएं, तो भूलकर भी चुइंगम न लेकर जाएं.

travel in hindi

मलेशिया में पीले रंग से फोबिया!

इस देश की सरकार ने पीले रंग को बैन किया हुआ है. असल में 2015 में मलेशिया के प्रधानमंत्री का विरोध करने वाले समूहों ने पीले रंग की टी-शर्ट पहनी थी, जिस कारण यहां की सरकार ने इस ग्रुप को नियंत्रित करने के लिए किसी भी सरकारी जगह पर पीले रंग के कपड़ों पर बैन लगा दिया था.

बुरुन्डी में जौगिंग है बैन

अफ्रीकी देश बुरुन्डी में कुछ वक्त पहले जातिवाद का फैलाव था. आलम यह था कि, उस दौरान नागरिक जौगिंग करते समय विद्रोह की रणनीतियां बनाते थे. जिस वजह से यहां के प्रेसिडेंट ने 2014 में देश में इस तरह के विद्रोहों पर रोक लगाने के लिए जौगिंग पर बैन लगा दिया था.

travel in hindi

सर्दियों में फिट रहने के लिए फॉलो करें ये टिप्स

इस मौसम में व्‍यायाम पर थोड़ा ध्‍यान देकर आप स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी मामूली समस्‍याओं से भी बच सकते हैं. लेकिन अगर आपको हृदय संबंधी समस्‍या है, तो आपको अतिरिक्‍त सुरक्षा की आवश्‍यकता होती है. ऐसे में अगर आप अच्‍छा स्‍वास्‍थ्‍य चाहते हैं, तो यह मौसम सबसे अच्‍छा है. सर्दियों में स्‍वस्‍थ रहने के टिप्‍स –

1. पानी खूब पियें 

लम्बे सैर पर जाने से पहले खूब पानी पीयें ,इससे बहुत ठंड होने पर भी शरीर के अन्दर की वायु श्वास नली तक जाने तक गर्म रहेगी. गर्म श्वास में अत्यधिक नमी बनाये रखने की क्षमता होती है. फीज़िकल एक्टिविटी के साथ भारी ब्रीथिंग होने पर शरीर से अत्यधिक मात्रा में उष्मा निकलती है जिससे कि श्वास नली ड्राई हो जाती है . ड्राई एयर पैसेज से सांस लेने और व्यायाम करने में परेशानी होती है. ड्राई एयर पैसेज की परेशानी से बचने के लिए सैर से पहले पानी पीना बहुत ही अच्छा उपाय है.

2. गरम पेय पदार्थों से बचें

गरम पेय पदार्थ या अल्कोहल लेने के बाद बाहर ना जायें. इनसे हमारी रक्त वाहीनियां शिथिल हो जाती हैं और स्किन से उष्मा निकलने लगती है.

3. शरीर को थोड़ा आराम दें 

व्यायाम से नार्मल स्थिति की तुलना में शरीर से दस गुना ज़्यादा उष्मा निकलती है. मेहनत करने से वातावरण में उष्मा फैलती है जिससे कि रक्त वाहीनियों की पेशियां फैलती हैं और हृदय पर दबाव भी पड़ता है इसलिए सर्दियों में अधिक व्यायाम करने से बचना चाहिए.

4. सर्दियों में वाटर स्पोर्टस से बचें

सर्दियों के मौसम में ठंडे स्वीमिंग पूल में स्वीमिंग करने से बचें. पानी उष्मा का अच्छा संचालक है. इससे अत्यधिक उष्मा निकलती है और हमारे शरीर को इस उष्मा को दोबारा उत्पन्न करने में थोड़ा समय लग जाता है.

5. ठंडी हवाओं से बचें

ठंडी हवाओं में टहलने से एन्जीना होने का खतरा बढ़ जाता है. अगर आप तेज़ हवा में टहल रहे हैं तो धीरे टहलें. धीरे टहलने से भी आपकी सेहत को उतना ही लाभ मिलेगा जितना कि तेज़ टहलने से मिलता है. टहलने के बाद कुछ देर रूक कर घर के अन्दर जायें जिससे कि शरीर से पसीना निकल जाये.

6. सावधानियां हैं जरूरी   

1-व्‍यायाम के लिए जाने से पहले, एक कप गर्म चाय या गर्म दूध पीयें

2-व्‍यायाम के लिए ऐसे वस्‍त्रों का प्रयोग करें, जो ढीले-ढाले हों और उनसे शरीर

में हवा भी ना लगे.

3-व्‍यायाम करने के कम सेक म 30 मिनट बाद ही स्‍नान करें.

4-व्‍यायाम के तुरंत बाद कपड़े ना बदलें, ना ही खुले स्‍थान पर जायें.

दुश्मन: रिश्तों की सच्चाई का विजय ने जब सोमा को दिखाया आईना

‘‘कभी किसी की तारीफ करना भी सीखो सोम, सुनने वाले के कानों में कभी शहद भी टपकाया करो. सदा जहर ही टपकाना कोई रस्म तो नहीं है न, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी सदा निभाया ही जाए.’’टेढ़ी आंख से सोम मुझे देखने लगा.

‘‘50 के पास पहुंच गई तुम्हारी उम्र और अभी भी तुम ने जीवन से कुछ नहीं सीखा. हाथ से कंजूस नहीं हो तो जबान से ही कंजूसी किस लिए?’’ बड़बड़ाता हुआ क्याक्या कह गया मैं.

वह चुप रहा तो मैं फिर बोला, ‘‘अपने चारों तरफ मात्र असंतोष फैलाते हो और चाहते हो तुम्हें संतोष और चैन मिले, कभी किसी से मीठा नहीं बोलते हो और चाहते हो हर कोई तुम से मीठा बोले. सब का अपमान करते हो और चाहते हो तुम्हें सम्मान मिले…तुम तो कांटों से भरा कैक्टस हो सोम, कोई तुम से छू भर भी कैसे जाए, लहूलुहान कर देते हो तुम सब को.’’

शायद सोम को मुझ से ऐसी उम्मीद न थी. सोम मेरा छोटा भाई है और मैं उसे प्यार करता हूं. मैं चाहता हूं कि मेरा छोटा भाई सुखी रहे, खुश रहे लेकिन यह भी सत्य है कि मेरे भाई के चरित्र में ऐसा कोई कारण नहीं जिस वजह से वह खुश रहे. क्या कहूं मैं? कैसे समझाऊं, इस का क्या कारण है, वह पागल नहीं है. एक ही मां के शरीर से उपजे हैं हम मगर यह भी सच है कि अगर मुझे भाई चुनने की छूट दे दी जाती तो मैं सोम को कभी अपना भाई न चुनता. मित्र चुनने को तो मनुष्य आजाद है लेकिन भाई, बहन और रिश्तेदार चुनने में ऐसी आजादी कहां है.

मैं ने जब से होश संभाला है सोम मेरी जिम्मेदारी है. मेरी गोद से ले कर मेरे बुढ़ापे का सहारा बनने तक. मैं 60 साल का हूं, 10 साल का था मैं जब वह मेरी गोद में आया था और आज मेरे बुढ़ापे का सहारा बन कर वह मेरे साथ है मगर मेरी समझ से परे है.

मैं जानता हूं कि वह मेरे बड़बड़ाने का कारण कभी नहीं पूछेगा. किसी दूसरे को उस की वजह से दर्द या तकलीफ भी होती होगी यह उस ने कभी नहीं सोचा.

उठ कर सोम ऊपर अपने घर में चला गया. ऊपर का 3 कमरों का घर उस का बसेरा है और नीचे का 4 कमरों का हिस्सा मेरा घर है.

जिन सवालों का उत्तर न मिले उन्हें समय पर ही छोड़ देना चाहिए, यही मान कर मैं अकसर सोम के बारे में सोचना बंद कर देना चाहता हूं, मगर मुझ से होता भी तो नहीं यह कुछ न कुछ नया घट ही जाता है जो मुझे चुभ जाता है.

कितने यत्न से काकी ने गाजर का हलवा बना कर भेजा था. काकी हमारी पड़ोसिन हैं और उम्र में मुझ से जरा सी बड़ी होंगी. उस के पति को हम भाई काका कहते थे जिस वजह से वह हमारी काकी हुईं. हम दोनों भाई अपना खाना कभी खुद बनाते हैं, कभी बाजार से लाते हैं और कभीकभी टिफिन भी लगवा लेते हैं. बिना औरत का घर है न हमारा, न तो सोम की पत्नी है और न ही मेरी. कभी कुछ अच्छा बने तो काकी दे जाती हैं. यह तो उन का ममत्व और स्नेह है.

‘‘यह क्या बकवास बना कर भेज दिया है काकी ने, लगता है फेंकना पड़ेगा,’’ यह कह कर सोम ने हलवा मेरी ओर सरका दिया.

सोम का प्लेट परे हटा देना ही मुझे असहनीय लगा था. बोल पड़ा था मैं. सवाल काकी का नहीं, सवाल उन सब का भी है जो आज सोम के साथ नहीं हैं, जो सोम से दूर ही रहने में अपनी भलाई समझते हैं.

स्वादिष्ठ बना था गाजर का हलवा, लेकिन सोम को पसंद नहीं आया सो नहीं आया. सोम की पत्नी भी बहुत गुणी, समझदार और पढ़ीलिखी थी. दोषरहित चरित्र और संस्कारशील समझबूझ. हमारे परिवार ने सोम की पत्नी गीता को सिर- आंखों पर लिया था, लेकिन सोम के गले में वह लड़की सदा फांस जैसी ही रही.

‘मुझे यह लड़की पसंद नहीं आई मां. पता नहीं क्या बांध दिया आप ने मेरे गले में.’

‘क्यों, क्या हो गया?’

अवाक् रह गए थे मां और पिताजी, क्योंकि गीता उन्हीं की पसंद की थी. 2 साल की शादीशुदा जिंदगी और साल भर का बच्चा ले कर गीता सदा के लिए चली गई. पढ़ीलिखी थी ही, बच्चे की परवरिश कर ली उस ने.

उस का रिश्ता सोम से तो टूट गया लेकिन मेरे साथ नहीं टूट पाया. उस ने भी तोड़ा नहीं और हम पतिपत्नी ने भी सदा उसे निभाया. उस का घर फिर से बसाने का बीड़ा हम ने उठाया और जिस दिन उसे एक घर दिलवा दिया उसी दिन हम एक ग्लानि के बोझ से मुक्त हो पाए थे. दिन बीते और साल बीत गए. गीता आज भी मेरी बहुत कुछ है, मेरी बेटी, मेरी बहन है.

मैं ने उसे पीछे मुड़ कर कभी नहीं देखने दिया. वह मेरी अपनी बच्ची होती तो भी मैं इसी तरह करता.

कुछ देर बाद सोम ऊपर से उतर कर नीचे आया. मेरे पास बैठा रहा. फिर बोला, ‘‘तुम तो अच्छे हो न, तो फिर तुम क्यों अकेले हो…कहां है तुम्हारी पत्नी, तुम्हारे बच्चे?’’

मैं अवाक् रह गया था. मानो तलवार सीने में गहरे तक उतार दी हो सोम ने, वह तलवार जो लगातार मुझे जराजरा सी काटती रहती है. मेरी गृहस्थी के उजड़ने में मेरी तो कोई भूल नहीं थी. एक दुर्घटना में मेरी बेटीबेटा और पत्नी चल बसे तो उस में मेरा क्या दोष. कुदरत की मार को मैं सह रहा हूं लेकिन सोम के शब्दों का प्रहार भीतर तक भेद गया था मुझे.

कुछ दिन से देख रहा हूं कि सोम रोज शाम को कहीं चला जाता है. अच्छा लगा मुझे. कार्यालय के बाद कहीं और मन लगा रहा है तो अच्छा ही है. पता चला कुछ भी नया नहीं कर रहा सोम. हैरानपरेशान गीता और उस का पति संतोष मेरे सामने अपने बेटे विजय को साथ ले कर खडे़ थे.

‘‘भैया, सोम मेरा घर बरबाद करने पर तुले हैं. हर शाम विजय से मिलने लगे हैं. पता नहीं क्याक्या उस के मन में डाल रहे हैं. वह पागल सा होता जा रहा है.’’

‘‘संतान के मन में उस की मां के प्रति जहर घोल कर भला तू क्या साबित करना चाहता है?’’ मैं ने तमतमा कर कहा.

‘‘मुझे मेरा बच्चा वापस चाहिए, विजय मेरा बेटा है तो क्या उसे मेरे साथ नहीं रहना चाहिए?’’ सफाई देते सोम बोला.

‘‘आज बच्चा पल गया तो तुम्हारा हो गया. साल भर का ही था न तब, जब तुम ने मां और बच्चे का त्याग कर दिया था. तब कहां गई थी तुम्हारी ममता? अच्छे पिता नहीं बन पाए, कम से कम अच्छे इनसान तो बनो.’’

आखिर सोम अपना रूप दिखा कर ही माना. पता नहीं उस ने क्या जादू फेरा विजय पर कि एक शाम वह अपना सामान समेट मां को छोड़ ही आया. छटपटा कर रह गया मैं. गीता का क्या हाल हो रहा होगा, यही सोच कर मन घुटने लगा था. विजय की अवस्था से बेखबर एक दंभ था मेरे भाई के चेहरे पर.

मुझे हारा हुआ जुआरी समझ मानो कह रहा हो, ‘‘देखा न, खून आखिर खून होता है. आ गया न मेरा बेटा मेरे पास…आप ने क्या सोचा था कि मेरा घर सदा उजड़ा ही रहेगा. उजडे़ हुए तो आप हैं, मैं तो परिवार वाला हूं न.’’

क्या उत्तर देता मैं प्रत्यक्ष में. परोक्ष में समझ रहा था कि सोम ने अपने जीवन की एक और सब से बड़ी भूल कर दी है. जो किसी का नहीं हुआ वह इस बच्चे का होगा इस की भी क्या गारंटी है.

एक तरह से गीता के प्रति मेरी जिम्मेदारी फिर सिर उठाए खड़ी थी. उस से मिलने गया तो बावली सी मेरी छाती से आ लगी.

‘‘भैया, वह चला गया मुझे छोड़ कर…’’

‘‘जाने दे उसे, 20-22 साल का पढ़ालिखा लड़का अगर इतनी जल्दी भटक गया तो भटक जाने दे उसे, वह अगर तुम्हारा नहीं तो न सही, तुम अपने पति को संभालो जिस ने पलपल तुम्हारा साथ दिया है.’’

‘‘उन्हीं की चिंता है भैया, वही संभल नहीं पा रहे हैं. अपनी संतान से ज्यादा प्यार दिया है उन्होंने विजय को. मैं उन का सामना नहीं कर पा रही हूं.’’

वास्तव में गीता नसीब वाली है जो संतोष जैसे इनसान ने उस का हाथ पकड़ लिया था. तब जब मेरे भाई ने उसे और बच्चे को चौराहे पर ला खड़ा किया था. अपनी संतान के मुंह से निवाला छीन जिस ने विजय का मुंह भरा वह तो स्वयं को पूरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहा होगा न.

संतोष के आगे मात्र हाथ जोड़ कर माफी ही मांग सका मैं.

‘‘भैया, आप क्यों क्षमा मांग रहे हैं? शायद मेरे ही प्यार में कोई कमी रही जो वह…’’

‘‘अपने प्यार और ममता का तिरस्कार मत होने दो संतोष…उस पिता की संतान भला और कैसी होती, जैसा उस का पिता है बेटा भी वैसा ही निकला. जाने दो उसे…’’

‘‘विजय ने आज तक एक बार भी नहीं सोचा कि उस का बाप कहां रहा. आज ही उस की याद आई जब वह पल गया, पढ़लिख गया, फसल की रखवाली दिनरात जो करता रहा उस का कोई मोल नहीं और बीज डालने वाला मालिक हो गया.’’

‘‘बच्चे का क्या दोष भैया, वह बेचारा तो मासूम है…सोम ने जो बताया होगा उसे ही मान लिया होगा…अफसोस यह कि गीता को ही चरित्रहीन बता दिया, सोम को छोड़ वह मेरे साथ भाग गई थी ऐसा डाल दिया उस के दिमाग में…एक जवान बच्चा क्या यह सच स्वीकार कर पाता? अपनी मां तो हर बेटे के लिए अति पूज्यनीय होती है, उस का दिमाग खराब कर दिया है सोम ने और  फिर विजय का पिता सोम है, यह भी तो असत्य नहीं है न.’’

सन्नाटे में था मेरा दिलोदिमाग. संतोष के हिलते होंठों को देख रहा था मैं. यह संतोष ही मेरा भाई क्यों नहीं हुआ. अगर मुझे किसी को दंड देने का अधिकार प्राप्त होता तो सब से पहले मैं सोम को मृत्युदंड देता जिस ने अपना जीवन तो बरबाद किया ही अब अपने बेटे का भी सर्वनाश कर रहा है.

2-4 दिन बीत गए. सोम बहुत खुश था. मैं समझ सकता था इस खुशी का रहस्य.

शाम को चाय का पहला ही घूंट पिया था कि दरवाजे पर दस्तक हुई.

‘‘ताऊजी, मैं अंदर आ जाऊं?’’

विजय खड़ा था सामने. मैं ने आगेपीछे नजर दौड़ाई, क्या सोम से पूछ कर आया है. स्वागत नहीं करना चाहता था मैं उस का लेकिन वह भीतर चला ही आया.

‘‘ताऊजी, आप को मेरा आना अच्छा नहीं लगा?’’

चुप था मैं. जो इनसान अपने बाप का नहीं, मां का नहीं वह मेरा क्या होगा और क्यों होगा.

सहसा लगा, एक तूफान चला आया हो सोम खड़ा था आंगन में, बाजार से लौटा था लदाफंदा. उस ने सोचा भी नहीं होगा कि उस के पीछे विजय सीढि़यां उतर मेरे पास चला आएगा.

‘‘तुम नीचे क्यों चले आए?’’

चुप था विजय. पहली बार मैं ने गौर से विजय का चेहरा देखा.

‘‘मैं कैदी हूं क्या? यह मेरे ताऊजी हैं. मैं इन से…’’

‘‘यह कोई नहीं है तेरा. यह दुश्मन है मेरा. मेरा घर उजाड़ा है इस ने…’’

सोम का अच्छा होने का नाटक समाप्त होने लगा. एकाएक लपक कर विजय की बांह पकड़ ली सोम ने और यों घसीटा जैसे वह कोई बेजान बुत हो.

‘‘छोडि़ए मुझे,’’ बहुत जोर से चीखा विजय, ‘‘बच्चा नहीं हूं मैं. अपनेपराए और अच्छेबुरे की समझ है मुझे. सभी दुश्मन हैं आप के, आप का भाई आप का दुश्मन, मेरी मां आप की दुश्मन…’’

‘‘हांहां, तुम सभी मेरे दुश्मन हो, तुम भी दुश्मन हो मेरे, तुम मेरे बेटे हो ही नहीं…चरित्रहीन है तुम्हारी मां. संतोष के साथ भाग गई थी वह, पता नहीं कहां मुंह काला किया था जो तेरा जन्म हुआ था…तू मेरा बच्चा होता तो मेरे बारे में सोचता.’’

मेरा बांध टूट गया था. फिर से वही सब. फिर से वही सभी को लहूलुहान करने की आदत. मेरा उठा हुआ हाथ विजय ने ही रोक लिया एकाएक.

‘‘रहने दीजिए न ताऊजी, मैं किस का बेटा हूं मुझे पता है. मेरे पिता संतोष हैं जिन्होंने मुझे पालपोस कर बड़ा किया है, जो इनसान मेरी मां की इज्जत करता है वही मेरा बाप है. भला यह इनसान मेरा पिता कैसे हो सकता है, जो दिनरात मेरी मां को गाली देता है. जो जरा सी बात पर दूसरे का मानसम्मान मिट्टी में मिला दे वह मेरा पिता नहीं.’’

स्तब्ध रह गया मैं भी. ऐसा लगा, संतोष ही सामने खड़ा है, शांत, सौम्य. सोम को एकटक निहार रहा था विजय.

‘‘आप के बारे में जो सुना था वैसा ही पाया. आप को जानने के लिए आप के साथ कुछ दिन रहना बहुत जरूरी था सो चला आया था. मेरी मां आप को क्यों छोड़ कर चली गई होगीं मैं समझ गया आज…अब मैं अपने मांबाप के साथ पूरापूरा न्याय कर पाऊंगा. बहुत अच्छा किया जो आप मुझ से मिल कर यहां चले आने को कहते रहे. मेरा सारा भ्रम चला गया, अब कोई शक नहीं बचा है.

‘‘सच कहा आप ने, मैं आप का बच्चा होना भी नहीं चाहता. आप ने 20 साल पहले भी मुझे दुत्कारा था और आज भी दुत्कार दिया. मेरा इतना सा ही दोष कि मैं नीचे ताऊजी से मिलने चला आया. क्या यह इतना बड़ा अपराध है कि आप यह कह दें कि आप मेरे पिता ही नहीं… अरे, रक्त की चंद बूंदों पर ही आप को इतना अभिमान कि जब चाहा अपना नाम दे दिया, जब चाहा छीन लिया. अपने पुरुष होने पर ही इतनी अकड़, पिता तो एक जानवर भी बनता है. अपने बच्चे के लिए वह भी उतना तो करता ही है जितना आप ने कभी नहीं किया. क्या चाहते हैं आप, मैं समझ ही नहीं पाया. मेरे घर से मुझे उखाड़ दिया और यहां ला कर यह बता रहे हैं कि मैं आप का बेटा ही नहीं हूं, मेरी मां चरित्रहीन थी.’’

हाथ का सामान जमीन पर फेंक कर सोम जोरजोर से चीखने लगा, पता नहीं क्याक्या अनापशनाप बकने लगा.विजय लपक कर ऊपर गया और 5 मिनट बाद ही अपना बैग कंधे पर लटकाए नीचे उतर आया.

चला गया विजय. मैं सन्नाटे में खड़ा अपनी चाय का प्याला देखने लगा. एक ही घूंट पिया था अभी. पहले और दूसरे घूंट में ही कितना सब घट गया. तरस आ रहा था मुझे विजय पर भी, पता नहीं घर पहुंचने पर उस का क्या होगा. उस का भ्रम टूट गया, यह तो अच्छा हुआ पर रिश्ते में जो गांठ पड़ जाएगी उस का निदान कैसे होगा.

‘‘रुको विजय, बेटा रुको, मैं साथ चलता हूं.’’

‘‘नहीं ताऊजी, मैं अकेला आया था न, अकेला ही जाऊंगा. मम्मी और पापा को रुला कर आया था, अभी उस का प्रायश्चित भी करना है मुझे.’’

अपना घर: फ्लैट में क्या हुआ जिया के साथ

औफिस की घड़ी ने जैसे ही शाम के 5 बजाए जिया जल्दी से अपना बैग उठा तेज कदमों से मैट्रो स्टेशन की तरफ चल पड़ी. आज उस का मन एकदम बादलों की तरह उड़ रहा था. उड़े भी क्यों न, आज उसे अपनी पहली तनख्वाह जो मिली थी. वह घर में सब के लिए कुछ न कुछ लेना चाहती थी. रोज शाम होतेहोते उस का मन और तन दोनों थक जाते थे पर आज उस का उत्साह देखते ही बनता था. आइए अब जिया से मिल लेते हैं…

जिया 23 वर्षीय आज के जमाने की नवयुवती है. सांवलासलोना रंग, आम की फांक जैसी आंखें, छोटी सी नाक, बड़ेबड़े होंठ. सुंदरता में उस का कहीं कोईर् नंबर नहीं लगता था पर फिर भी उस का चेहरा पुरकशिश था. घर में सब की लाडली, जीवन से अब तक जो चाहा वह मिल गया. बहुत बड़े सपने नहीं देखती थी. थोड़े में ही खुश थी.

वह तेज कदमों से दुकानों की तरफ बढ़ी. अपने 2 साल के भतीजे के लिए उस ने एक रिमोट से चलने वाली कार खरीदी. पापा के लिए उन की पसंद का परफ्यूम, मम्मी व भाभी के लिए सूट और साड़ी और भैया के लिए जब उस ने टाई खरीदी तो उस ने देखा कि बस उस के पास अब कुछ ही पैसे बचे हैं. अपने लिए वह कुछ न खरीद पाई. अभी पूरा महीना पड़ा था. बस उस के पास कुछ हजार ही बचे थे. उसे उन में ही अपना खर्चा चलाना था. मांपापा से वह कुछ नहीं लेना चाहती थी.

जैसे ही वह शोरूम से निकली, बाजू

वाली दुकान में उसे आसमानी और फिरोजी रंग के बहुत खूबसूरत परदे दिखाई दिए. बचपन से उस का अपने घर में इस तरह के परदे लगाने

का मन था. दुकानदार से जब दाम पूछा तो

उसे पसीना आ गया. दुकानदार ने मुसकराते हुए कहा कि ये चंदेरी सिल्क के परदे हैं, इसलिए दाम थोड़ा ज्यादा है पर ये आप के कमरे को एकदम बदल देंगे.

कुछ देर तक खड़ी वह सोचती रही. फिर उस ने वे परदे खरीद लिए. जब वह दुकान से निकली तो बहुत खुश थी. बचपन से वह ऐसे परदे अपने घर में लगाना चाहती थी, पर मां के सामने जब भी बोला उस की इच्छा घर की जरूरतों के सामने छोटी पड़ गई. आज उसे ऐसा लगा जैसे वह वाकई में स्वतंत्र हो गई है.

जब वह घर पहुंची तो रात हो चुकी थी. सब रात के खाने के लिए उस का इंतजार कर रहे थे. भतीजे को चूम कर उस ने सब के उपहार टेबल पर रख दिए. सब उत्सुकता के साथ उपहार देखने लगे. अचानक मां बोली, ‘‘तुम, अपने लिए क्या लाई हो?’’

जिया ने मुसकराते हुए परदों का पैकेट उन की तरफ बढ़ा दिया. परदे देख कर मां बोलीं, ‘‘यह क्या है…? इन्हें तुम पहनोगी?’’

जिया मुसकुराते हुए बोली, ‘‘मेरी प्यारी मां इन्हें हम घर में लगाएंगे.’’

मां ने परदे वापस पैकेट में रखे और फिर बोलीं, ‘‘इन्हें अपने घर लगाना.’’

जिया असमंजस से मां को देखती रही. उस की समझ में नहीं आया कि इस का क्या मतलब है. उस की भूख खत्म हो गई थी.

भाभी ने मुसकरा कर उस के गाल थपथपाते हुए कहा, ‘‘मैं आज तक नहीं समझ पाई, मेरा घर कौन सा है? जिया तुम अपना घर खुद बनाना,’’ और फिर भाभी ने बहुत प्यार से उस के मुंह में एक निवाला डाल दिया.

आज पूरा घर पकवानों की महक से महक रहा था. मां ने अपनी सारी पाककला को निचोड़ दिया था. कचौरियां, रसगुल्ले, गाजर का हलवा, ढोकले, पनीर के पकौड़े, हरी चटनी, समोसे और करारी चाट. भाभी लाल साड़ी में इधर से उधर चहक रही थीं. पापा और भैया पूरे घर का घूमघूम कर मुआयना कर रहे थे. कहीं कुछ कमी न रह जाए. आज जिया को कुछ लोग देखने आ रहे थे. एक तरह से जिया की पसंद थी, जिस पर आज उस के घर वालों को मुहर लगानी थी. अभिषेक उस के औफिस में ही काम करता था. दोनों में अच्छी दोस्ती थी जिसे अब वे एक रिश्ते का नाम देना चाहते थे.

ठीक 5 बजे एक कार उन के घर के

सामने आ कर रुकी और उस में से 4 लोग

उतरे. सब ने ड्राइंगरूम में प्रवेश किया. जिया ने परदे की ओट से देखा. अभिषेक जींस और

लाइट ब्लू शर्ट में बेहद खूबसूरत लग रहा था.

उस की मां लीला आज के जमाने की आधुनिक महिला लग रही थीं. छोटी बहन मासूमा भी बेहद खूबसूरत थी. पिता अजय बेहद सीधेसादे व्यक्ति लग रहे थे.

जिया, अभिषेक की मां और बहन के सामने कहीं भी नहीं ठहरती थी पर उस का भोलापन, सुलझे हुए विचार और सादगी ने अभिषेक को आकर्षित कर लिया था. जिया के किरदार में कहीं भी कोई बनावटीपन नहीं था. जहां अभिषेक को अपनी मां में प्लास्टिक के फूलों की गंद आती थी, वहीं जिया से उसे असली फूलों की महक आती थी.

अपने पिता को उस ने हमेशा एडजस्टमैंट करते हुए देखा था. वह खुद ऐसा नहीं करना चाहता था, इसलिए हर हाल में अपनी मां का लाड़ला, हर बात मानने वाला अभिषेक किसी भी कीमत पर अपनी जीवनसाथी के चुनाव की बागडोर मां को नहीं देना चाहता था.

जिया ने कमरे में प्रवेश किया. जहां अभिषेक प्यारभरी नजरों से उस की तरफ देख रहा था, वहीं लीला और मासूमा उस की तरफ अचरज से देख रही थीं. उन्हें जिया में कोई खूबी नजर नहीं आ रही थी. अजय को जिया एक सुलझे विचारों वाली लड़की नजर आई जो उन के परिवार को संभाल कर रख सकेगी. लीला ने अभिषेक की तरफ देखा पर उस के चेहरे पर खुशी देख कर चुप हो गईं.

जिया को लीला ने अपने हाथों से हीरे

का सैट पहना दिया पर उन के चेहरे पर कहीं कोईर् खुशी नहीं थी. जिया को यह बात समझ आ गई थी कि वह बस अभिषेक की पसंद है. अपने घर में जगह बनाने के लिए उसे बहुत मेहनत करनी पड़ेगी.

2 माह बाद उस के विवाह की तारीख तय हो गई. दुलहन के लिबास में जिया बेहद खूबसूरत लग रही थी. अभिषेक और उस की जोड़ी पर लोगों की नजरें ही नहीं ठहर रही थीं. लीला भी आज बहुत खुश लग रही थीं. कन्यादान करते हुए जिया के मां और पापा के आंखों में आंसू थे. वह उन के घर की रौनक थी. बिदाई पर अजय ने हाथ जोड़ कर कहा, ‘‘बहू नहीं बेटी ले कर जा रहे हैं.’’

जिया ने कुछ दिनों में यह तो समझ लिया था कि इस घर में बागडोर लीला के

हाथों में है. यह घर लीला का घर है और वह घर उस के मांपापा का घर था पर उस का घर कहां है? इस सवाल का जवाब उसे नहीं मिल पा रहा था.

अभी कल की ही बात थी, जिया ने ड्राइंगरूम में थोड़ा सा बदलाव करने की कोशिश करी, तो लीला ने मुसकरा कर कहा, ‘‘जिया,

तुम अभिषेक की बीवी हो, इस घर की बहू हो, पर इस घर को मैं ने बनाया है, इसलिए अपने फैसले और अपने अधिकार अपने कमरे तक सीमित रखो.’’

जिया चुपचाप खड़ी सुनती रही. अभिषेक से जब भी उस ने इस बारे में बात करनी चाही, उस ने हमेशा यही जवाब दिया कि जिया उन्हें थोड़ा समय दो. उन्होंने सब कुछ हमारी खुशी के लिए ही करा है.

जिया अपने मनोभावों को चाह कर भी न समझा पाती थी. खुश रहना उस की आदत थी और हारना उस की फितरत में नहीं था.

देखते ही देखते 1 साल बीत गया. आज जिया की शादी की पहली वर्षगांठ थी. उस ने अभिषेक के लिए घर पर पार्टी करने का प्लान बनाया. उस ने अपने सभी दोस्तों को निमंत्रण भेज दिया. तभी दोपहर में जिया ने देखा, लीला की किट्टी पार्टी का गु्रप आ धमका.

जिया ने लीला से कहा, ‘‘मां, आज मैं ने अपने कुछ दोस्तों को आमंत्रित किया है.’’

लीला ने जवाब में कहा, ‘‘जिया तुम्हें पहले मुझ से पूछ लेना चाहिए था…’’ मैं तो अब कुछ नहीं कर सकती हूं. तुम अपने दोस्तों को कहीं और बुला लो.’’

जिया उठ खड़ी हुई. अपने अधिकारों की सीमा रेखा समझती रही. मन ही मन उस ने एक निर्णय ले लिया.

जिया ने शाम की पार्टी के लिए घर के बदले होटल का पता अपने सभी दोस्तों को व्हाट्सऐप कर दिया. अभिषेक को भी वहीं बुला लिया. अभिषेक ने जिया को पीली व लाल कांजीवरम साड़ी और बेहद खूबसूरत झुमके उपहार में दिए, जिया जैसी सुलझे विचारों वाली जीवनसाथी पा कर अभिषेक बेहद खुश था.

जिया को अपनी जिंदगी से कोई शिकायत नहीं थी पर फिर भी कभीकभी वह चंदेरी के परदे उसे मुंह चिढ़ाते थे. अभिषेक उसे हर तरह से खुश रखता था पर वह कभी जिया की अपनी घर की इच्छा को नहीं समझ पाया था.

जिया को अपने घर को अपना कहने का या महसूस करने का अधिकार नहीं था. वह उस की जिंदगी का वह खाली कोना था जिसे कोई भी नहीं समझ पाया था. न उस के अपने मातापिता, न अभिषेक और न ही उस के सासससुर. जिया ने धीरेधीरे इस घर में सभी के दिल में जगह बना ली थी. लीला भी अब उस से खिंचीखिंची नहीं रहती थीं. मासूमा की मासूम शरारतों का वह हिस्सा बन गई थी.

आज चारों तरफ खुशी का माहौल था. दीवाली का त्योहार वैसे भी अपने

साथ खुशी, हर्षोल्लास और अनगिनत रंग ले कर आता है. पूरे घर में पेंट चल रहा था, जब अभिषेक परदे बदलने लगा तो अचानक जिया बोली कि रुको और फिर भाग कर चंदेरी के परदे ले आई.

इस से पहले कि अभिषेक कुछ बोलता, लीला बोल उठीं, ‘‘जिया ऐसे परदे मेरे घर पर नहीं लगेंगे.’’

जिया प्रश्नसूचक नजरों से अभिषेक को देख रही थी. उसे लगा वह कुछ बोलेगा कि मां यह जिया का भी घर है पर अभिषेक कुछ न बोला. जिया का खराब मूड देख कर बोला, ‘‘इतना क्यों परेशान हो. परदे ही तो हैं.’’

पहली बार जिया की आंखों में आंसू आए. अभिषेक आंसुओं को देख कर और चिढ़ गया.

आजकल जिया का ज्यादातर समय औफिस में बीतता था. अभिषेक ने महसूस किया कि वह अपने फोन पर ही लगी रहती है और उसे देखते ही घबरा कर मोबाइल रख देती है. अभिषेक जिया को सच में प्यार करता था, वह जिया से पूछना चाहता था पर उसे डर था कहीं सच में जिया के जीवन में उस की जगह किसी और ने तो नहीं ले ली है.

एक शाम को अभिषेक ने जिया से कहा, ‘‘जिया, चलो तुम शुक्रवार की छुट्टी ले लो, कहीं आसपास घूमनेफिरने चलते हैं.’’

जिया ने अनमने से कहा, ‘‘नहीं अभिषेक बहुत काम है औफिस में.’’

चाह कर भी अभिषेक जिया के व्यवहार में जो बदलाव आया है उसे समझ नहीं पा रहा था. वह रात को भी घंटों लैपटौप पर बैठ कर न जाने क्या करती रहती. अभिषेक जैसे ही उसे आवाज देता, वह घबरा कर लैपटौप बंद कर देती. अभिषेक जितना उस के करीब जाने की कोशिश करता वह उतना ही उस से दूर जा रही थी.

न जाने वह क्या था जिस के पीछे जिया पागल हो रही थी. जिया के भाई ने भी उस दिन अभिषेक को फोन पर कहा, ‘‘आजकल जिया घर पर फोन ही नहीं करती. सब ठीक है न?’’

अभिषेक ने कहा, ‘‘नहीं आजकल औफिस में बहुत काम है.’’

देखते ही देखते 2 साल बीत गए. अब अभिषेक और जिया दोनों के मातापिता की इच्छा थी कि वे अपने परिवार को आगे बढ़ाएं.

आज फिर से उन की शादी की सालगिरह का जश्न था पर आज लीला ने खुद दावत रखी थी. जिया ने एक बहुत ही खूबसूरत प्याजी रंग की स्कर्ट और कुरती पहनी हुई थी. अभिषेक की नजरें उस से हट ही नहीं रही थी. सब लोग उन्हें छेड़ रहे थे कि वे खुशखबरी कब दे रहे हैं.

रात को एकांत में जब अभिषेक ने जिया से कहा कि जिया मेरा भी मन है, तो जिया

ने अनमने ढंग से कहा कि वह तैयार नहीं है.

रात में भी अभिषेक को ऐसा लगा जैसे उस के पास बस जिया का शरीर है. अभिषेक रातभर सो नहीं पाया.

आज वह हर हाल में जिया से बात करना चाहता था, पर जब वह सुबह उठा, जिया औफिस के लिए निकल चुकी थी. अभिषेक को कुछ समझ नहीं आ रहा था. ऐसा लगता था, जिया उस के साथ हो कर भी उस के साथ नहीं है, वह हर हफ्ते उस के साथ कोई न कोई प्लान बनाता पर जिया को तो रविवार में भी कोई न कोई औफिस का काम हो जाता था. उन दोनों के बीच एक मौन था, जिसे वह चाह कर भी नहीं तोड़ पा रहा था. अभिषेक को अपनी वह पुरानी जिया चाहिए थी पर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था.

देखते ही देखते फिर दीवाली आ गई. पूरा शहर रोशनी से जगमगा रहा था. आज अभिषेक को बहुत दिनों बाद जिया का चेहरा रोशनी से खिला दिखा.

जिया ने अभिषेक से कहा, ‘‘अभिषेक, आज मुझे तुम से कुछ कहना है और कुछ दिखाना भी है.’’

अभिषेक उस की तरफ प्यार से देखते हुए बोला, ‘‘जिया, कुछ भी बोलना बस यह मत बोलना तुम्हें मुझ से प्यार नहीं है.’’

जिया खिलखिला कर हंस पड़ी और फिर बोली, ‘‘तुम पागल हो क्या, तुम ने ऐसा सोचा

भी कैसे?’’

अभिषेक मुसकरा दिया. बोला, ‘‘लेकिन तुम मुझे पिछले 1 साल से नैगलैक्ट कर रही हो, हम एकसाथ कहीं भी नहीं गए.’’

जिया बोली, ‘‘पता नहीं तुम्हें समझ आएगा या नहीं पर मैं पिछले 1 साल से अपनी पहचान और अपने वजूद, अपनी जड़ें ढूंढ़ रही थी?’’

अभिषेक को कुछ समझ नहीं आ रहा था. जिया ने गुलाबी और नारंगी चंदेरी सिल्क की साड़ी पहनी हुई थी. साथ में कुंदन का मेल खाता सैट, हीरे के कड़े और ढेर सारी चूडि़यां. आज उस के चेहरे पर ऐसी आभा थी कि सब लोग उस के आगे फीके लग रहे थे. रंगोली

बनाने के बाद जिया ने अभिषेक को उस के साथ चलने को कहा, तो अभिषेक कार की चाबी उठा चल पड़ा.

जिया हंस कर बोली, ‘‘आज मैं तुम्हें अपने साथ अपनी कार में ले कर चलना चाहती हूं.’’

अभिषेक चल पड़ा. थोड़ी ही देर में कार हवा से बातें करने लगी और कुछ देर बाद कार नई बस्ती की तरफ चलने लगी. कार ड्राइव करते हुए जिया बोली, ‘‘अभिषेक, आज मैं तुम से कुछ कहना चाहती हूं. तुम ने हमेशा हर तरह से मेरा खयाल रखा पर बचपन से मेरा एक सपना था जो मेरी आंखों में पलता रहा. मांपापा ने कहा कि तुम्हारा घर वह होगा, जहां तुम जा कर एक घर बनाओगी. तुम मिले, तो लगा मेरा सपना पूरा हो गया, पर अभिषेक कुछ दिनों बाद समझ आ गया कि कुछ सपने होते हैं जो साझा नहीं होते. शादी का मतलब यह नहीं कि तुम्हारे सपनों का बोझ तुम्हारा जीवनसाथी भी उठाए. मुझे तुम से या किसी से भी कोई शिकायत नहीं है. पर अभिषेक आज मेरा एक सपना पूरा हुआ है,’’ यह कह उस ने एक नई बनी सोसाइटी के सामने कार रोक दी. अभिषेक चुपचाप उस के पीछे चल पड़ा. एक नए फ्लैट के दरवाजे पर उस के नाम की नेमप्लेट लगी थी.

अभिषेक हैरानी से देख रहा था. छोटा पर बेहद खूबसूरती से सजा हुआ प्लैट. तभी हवा का झोंका आया तो चंदेरी के फीरोजी परदे जिया के अपने घर में लहराने लगे, जहां पर उस का अधिकार घर पर ही नहीं वरन उस की आबोहवा पर भी था.

स्पाइसी फ्राइड बेबीकौर्न बनाना ओर भी आसान

घर पर बनाएं स्पाइसी फ्राइड बेबीकौर्न

सामग्री

8 बेबीकौर्न

-1 कप वड़ा पाउडर

-तलने के लिए पर्याप्त रिफाइंड औयल.

विधि

बेबीकौर्न को उबलते पानी में 2 मिनट रखें. फिर पानी निथार दें. प्रत्येक बेबीकौर्न को लंबाई में 2 भागों में काटें. वड़ा पाउडर में पानी डाल कर पकौड़ों लायक घोल तैयार करें. प्रत्येक बेबीकौर्न के टुकड़े को घोल में डुबो कर गरम तेल में धीमी आंच पर सुनहरा तल कर चटनी या सौस के साथ सर्व करें.

प्रियंका-परिणीति की बहन मीरा चोपड़ा 40 की उम्र में बनेंगी दुल्हन

बौलीवुड में प्रियंका चोपड़ा, परिणीति चोपड़ा, मीरा चोपड़ा और मन्नारा चोपड़ा ये चार चचेरी बहने कार्यरत हैं. इनमें से प्रियंका चोपड़ा ने 2018 में निक जोनस संग विवाह रचाया था, इस विवाह समारोह में मन्नारा को छोड़कर सभी बहने शामिल हुई थीं. फिर इस वर्ष 24 सितंबर 2023 को परिणीति चोपड़ा ने राघव चड्ढा संग विवाह रचाया. मगर परिणीति की शादी में प्रियंका, मीरा व मन्नारा कोई शामिल नहीं हुआ. बहरहाल, अब मीरा चोपड़ा ने भी अपने लिए दूल्हा ढूढ़ लिया है.

यह सच है. इसमें कोई संदेह नही है. मीरा चोपड़ा ने अपने लिए बौलीवुड या दक्षिण भारत की फिल्म इंडस्ट्री से किसी को नहीं चुना है. पर फिलहाल वे अपने होने वाले पति का नाम और उनकी पहचान को गोपनीय रखे हुए हैं. मगर फरवरी 2024 में परिणीति चोपड़ा अपने प्रेमी संग झीलों की नगरी उदयपुर में विवाह के बंधन में बंधेगी. अब मीरा चोपड़ा की शादी में कौन-सी बहने शामिल होंगी, यह तो वक्त ही बताएगा.

हाल ही में मीरा चोपड़ा से मुलाकात होने पर हमने उनसे प्यार को लेकर उनकी सोच पर सवाल किया, तो मीरा चोपड़ा ने कहा- ‘‘मेरे लिए प्यार का मतलब है भरोसा, एक-दूसरे को समझना और एक-दूसरे को सेफ महसूस करना, क्योंकि आजकल रिलेशनशिप बहुत शैलो हो गई है. अगर तुम रिलेशनशिप में एक दूसरे को भरोसा दे सकते हो, एक दूसरे को समझ सकते हो, एक दूसरे को सेफ सेफ फील करा सकते हो, तो आजकल वही प्यार है. आजकल वही बड़ी मुश्किल से मिलता है.’’

जब हमने कहा कि आपको ऐसा प्यार मिल गया है, तभी तो फरवरी में आपकी शादी की चर्चा है। इस पर मीरा चोपड़ा ने कहा- ‘‘हां जी! फरवरी में हमारी शादी होगी. हमें हमारा प्यार मिल गया है.बिल्कुल जैसा चाहती थी वैसा ही मिला है.’’

मीरा चोपड़ा ने 2005 में अपने अभिनय कैरियर की शुरूआत तमिल फिल्म से की थी. 2016 में उन्होंने विक्रम भट्ट की फिल्म ‘‘1920 लंदन’’ से बौलीवुड में कदम रखा. अब 29 दिसंबर से उनकी फिल्म ‘सफेद’ स्रीरखम हो रही है. इसके अलावा वह एलजीबीटीक्यू समुदाय पर आधारित एक फिल्म ‘‘सुपर वुमन’’ की भी शूटिंग पूरी कर चकी हैं.

जागरूक वेतनभोगी मांएं

पेरैंट्स टीचर मीटिंग में अपनी बारी का इंतजार करती मैं टीचर पेरैंट्स संवाद सुनने लगी. अभिभावकों में अधिकांश महिलाएं ही थीं. मेरे कानों में पति महाशय के शब्द अट्टहास करने लगे, ‘‘तुम महिलाओं जितना कहनेसुनने का धैर्य हम बेचारे पुरुषों में कहां. हम बेचारे तो शौफर ही भले.’’

‘‘मैम, मेरा बच्चा दूध नहीं पीता. टिफिन भी रोजाना बचाकर ले आता है,’’ एक मां का शिकायती स्वर कानों में पड़ा तो मैं अपनी चेतना सहित क्लासरूम में लौट आई.

‘‘जी, इस में मैं क्या कर सकती हूं?’’ टीचर ने अपनी असमर्थता जाहिर की.

‘‘क्यों, सर्कुलर तो आप के स्कूल की तरफ से ही आया है न कि बच्चों को टिफिन में सब्जीपरांठा, पुलाव आदि हैल्दी फूड ही भेजा जाए?’’ शिकायत करती मां ने अचानक तीरकमान निकाल लिए तो सब भौंचक्के से उन्हें देखने लगे.

मैडम बेचारी इस अप्रत्याशित आक्रमण से थोड़ा सहम गई. बोली, ‘‘ठीक है, मैं

मैनेजमैंट तक आप की बात पहुंचा दूंगी… वैसे यश के हमेशा की तरह इस बार भी मार्क्स काफी कम आए हैं. आप को उस की पढ़ाई की ओर ज्यादा ध्यान देना होगा.’’

‘‘यह हुई न मंजे हुए राजनीतिज्ञों जैसी बात. जब भी जनता किसी बात पर बवाल मचाने लगे ध्यान बंटाने के लिए तुरंत दूसरा मुद्दा खड़ा कर दो,’’ मैं ने मन ही मन टीचर को दाद दी.

‘‘पढ़ाने की जिम्मेदारी तो आप की है. नंबर अच्छे नहीं आ रहे तो इस के लिए तो मुझे आप को जिम्मेदार ठहराना चाहिए. उल्टा चोर कोतवाल को डांटे.’’

पंक्ति में खड़े अभिभावक द्वंद्व युद्ध का मजा लेते हुए मंदमंद मुसकरा उठे. मुफ्त का मनोरंजन किसे नहीं सुहाता.

तभी मेरा नंबर आ गया. बेटे पुनीत ने क्लास में टौप किया है, जान कर मैं खुशी से झूम उठी. मैडम ने मुझे बधाई दी तो आसपास खड़ी महिलाओं को भी मजबूरन मुझे बधाई देनी पड़ी.

क्लास से बाहर निकल कर मैं भी अन्य महिलाओं की तरह अपने शौफर महाशय का इंतजार करने लगी. पर बेटा तो कूदता हुआ खेलते हुए बच्चों के संग खेलने चला गया.

‘‘हुंह, इस बेवकूफ को तो अपने स्टेटस की कद्र ही नहीं है. फिसड्डी बच्चों के साथ खेल रहा हैं,’’ मैं अपना स्टेट्स मैंटेन रखते हुए अलगथलग खड़ी रही. हालांकि कान कुछ दूर खड़ी महिलाओं की बातों की ओर ही लगे थे.

‘‘हमारे राजस्थान की लड़की मिस इंडिया बन गई,’’ यश की मां का गर्वीला स्वर उभरा.

‘‘हुंह इतनी गर्वीली मुसकान तो मिस इंडिया की मां के चेहरे पर भी नहीं आई होगी. चलो बेटे पर नहीं किसी पर तो गर्व करे बेचारी,’’ मैं ने मुंह बिचकाया.

जवाब भी तो कितना लागलपेट वाला दिया था, ‘‘भई, मिस इंडिया का ताज पहनना हो तो मोरल साइंस की किताब रट कर चले जाओ,’’ दूसरी महिला ने तंज कसा.

‘‘क्यों क्या गलत कहा उस ने? मां की सेवाएं अनमोल नहीं होतीं क्या?’’ यश की मां ने यहां भी तलवार उठा ली.

‘‘इस महिला को पक्का चुनाव में खड़ा होना चाहिए. हर जगह भिड़ जाती है,’’ मैं बुदबुदाई.

‘‘अरे अनमोल, अतुल्य जैसे विशेषणों से नवाजनवाज कर ही बरसों से हम से बेगार करवाई जा रही है,’’ एक स्वर उभरा.

‘‘क्या मतलब?’’ एक अनाड़ी ने पूछा.

मेरे लिए अपना स्टेटस लैवल मैंटेन करना मुश्किल होता जा रहा था. खिसकतेखिसकते मैं इस ?ांड में शामिल हो ही ली थी.

‘‘इस का मतलब यह है मुहतरमा कि शब्दों का जामा मात्र पहना देने से न पाजामा जुटता है न पिज्जा. खाली तारीफ से न हम मांएं अच्छा पहन सकती हैं और न अच्छा खा सकती हैं. बरसों से हम ऐसे ही बेवकूफ बनती आ रही हैं,’’ सब प्रभावित लगीं तो अपनी बेसिरपैर की तुकबंदी पर मु?ो भी गर्व हो आया.

अब तो हर महिला अपना मत बेबाकी से सब के सामने रखने लगी. नारी सुधार आंदोलन अपने शबाब पर आ चुका था.

‘‘अपने काम का वेतन हम कैश में मांगने लग जाएं न, तो उसे चुकाने में ये पुरुष बिक ही जाएं,’’ एक ने मत रखा.

‘‘और क्या? 3 वक्त गरम खाना बनाना और वह भी भरेपूरे कुनबे का…’’

‘‘हाय दैया, इन का तो महीने का लाख से ऊपर का वेतन खाना पकाने, खिलाने का ही बन जाता है,’’ हमेशा होटल या मैस से खाना और्डर करने वाली एक नवविवाहिता ने पूरी सहानुभूति दर्शाई.

दूर खेल रहे बच्चों को देख कर मुझे खयाल आया, ‘अरी बहनो, हम अपना सब से महत्त्वपूर्ण टास्क और उस की सैलरी तो भूल ही रहे हैं. इन बच्चों को रखना, उन की देखभाल, होमवर्क, परीक्षा की तैयारी…’’

‘‘सखियो, हमें अपनीअपनी कार्यसूची और उस के अनुसार अपना वेतन तय करना है.’’

‘‘सिर्फ तय नहीं वसूल भी करना है.’’

अंतत: सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पास हुआ कि घर जा कर हम अपनेअपने काम की सूची और उस का अनुमानित वेतन और वह भी कैश में लिख कर अपनेअपने घरवालों को सौंप देगीं तथा जब तक हमें लिखित में अपना वेतन मिलने की स्वीकृति नहीं मिल जाती है हम घर के कार्यों से हाथ खींचे रहेंगी. मिस इंडिया तो क्या कोई भी हमें अब और इमोशनल फूल नहीं बना सकता. सब के नाम और मोबाइल नंबर डाल कर मैं ने फटाफट एक व्हाट्सऐप ग्रुप भी बना डाला-जागरूक वेतनभोगी मांएं. एडमिन के रूप में मैं स्वयं को बहुत गौरवान्वित महसूस कर रही थी.

‘‘मैं इस के बारे में ट्विटर और फेसबुक पर डाल कर ज्यादा से ज्यादा मांओं को इस ग्रुप से जोड़ूंगी,’’ सब का जोश देखने लायक था.

तभी बच्चों के संग खेलता मेरा बेटा पुनीत भागता हुआ मेरी ओर आया, ‘‘ममा देखो, पापा क्या लाए. मेरे लिए इतनी बड़ी चौकलेट. पापा कह रहे थे मुझे पहले से पता था कि मेरा बेटा फर्स्ट आएगा,’’ उस ने गर्व से बताया, ‘‘और ममा, पापा आप की फैवरिट बटरस्कौच आइसक्रीम का बड़ा सा पैक भी लाए हैं. कह रहे थे तुम्हारे साथ पूरा साल मेहनत कौन करता है? हर साल तुम इतना अच्छा रिजल्ट ममा की बदौलत ही तो ला पाते हो. इसलिए तुम्हारी चौकलेट खरीदने से पहले मैं ने तुम्हारी गुरु की पसंदीदा आइसक्रीम खरीदी.’’

‘‘सच, उन्होंने ऐसा कहा?’’ मैं आइसक्रीम की मानिद पिघलने लगी. पुनीत के पीछे आते

उस के पापा मुझे धुंधले दिखाई देने लगे. मुझे लगा चश्मा लगाना भूल गई हं. पर इस की

वजह तो खुशी के आंसू थे. अंतत: उन के हाथ में पकड़े बड़े से आइसक्रीम पैक से मैं ने उन्हें पहचान लिया. मैं ने पैक पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि पीछे से सम्मिलित बुलंद स्वर गूंज उठा, ‘‘नो.’’

मैं ने घबरा कर हाथ पीछे खींच लिया तो सभी ने हंसते हुए आगे बढ़ कर पैक लपक लिया.

‘‘हम तो अकेले खाने के लिए नो कह रही थीं.’’

सब के संग आइसक्रीम उड़ाते मैं सोच रही थी मिस इंडिया का जवाब वाकई मिस वर्ल्ड बनने लायक था.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें