Wedding Special: शादी के बाद तीर्थ नहीं यहां जाएं

दोपहर का रसोई का काम निबटा कर मैं अपने बैडरूम में बैड पर लेटी ही थी कि तभी मोबाइल बजने पर जाग गई. फोन की स्क्रीन पर अपनी बैस्टी निर्वीका का नाम देख मैं खुशी से उछल पड़ी.

‘‘इतने दिन लगा दिए यार अपने हनीमून में, एक बार फोन तक नहीं किया मुझे कि मेरी खैरखबर ले लेती. अब विहान जो तुझे मिल गया है. अब मैं कहां की बैस्टी, कैसी बैस्टी?’’ मैं ने निर्वी से कहा.

‘‘अरे मिनी गुस्सा मत कर यार. पिछले कुछ दिन इतने हैक्टिक बीते कि पूछ मत. फिर जो मैं ने पुष्कर जैसे तीर्थस्थल को अपने हनीमून स्पौट के तौर पर चुना, उस में भी बहुत जबरदस्त पंगा  हो गया. विहान को हनीमून के लिए पुष्कर बिलकुल रास नहीं आया. इस के चलते वह दोनों दिन मेरी जान खाता रहा कि तुम हनीमून के लिए आई हो या तीर्थ यात्रा के लिए? सच में हनीमून के लिए मेरा पुष्कर का चुनाव बहुत गलत रहा. कदमकदम पर मंदिर, पंडित, पुजारी, घंटियों, मंत्रों, पूजा की आवाज.

विहान तो कहने लगा, ‘‘हनीमून के लिए तुम्हें चप्पेचप्पे पर मंदिरों वाला यही शहर सू?ा? जहां मूड थोड़ा रोमांटिक होता वहीं कोई मंदिर दिख जाता और रोमांस का सारा मूड चौपट हो जाता.’’

निर्वी की ये बातें सुन मैं बेतहाशा ठठा कर हंस पड़ी, ‘‘मूर्ख लड़की, आखिर पुष्कर जैसे एक धार्मिक शहर को तू ने हनीमून डैस्टिनेशन के तौर पर चुना ही क्यों? पूरे राजस्थान में और भी तो बढि़या जगहें हैं. चित्तौड़, उदयपुर कहीं भी चली जाती. यह तेरी सूई आखिर पुष्कर पर ही क्यों अटक गई, आखिर मैं भी तो सुनूं जरा?’’

‘‘अरे मिनी, तुझे तो पता है झाल, दरिया, नदी मुझे बेहद फैसीनेट करते हैं. मैं ठहरी एक प्रकृति प्रेमी. इस की ब्यूटी मुझे सदा से लुभाती आई है. कुछ वर्षों पहले मैं पुष्कर गई थी. तब वहां गुलाबों के बड़ेबड़े खूबसूरत बगीचे और खूबसूरत झीलें देख मन में खयाल आया था कि अपने हनीमून के लिए पुष्कर जरूर जाऊंगी. मगर शादी की व्यस्तता में गूगल करना भूल ही गई कि ये 2-3 महीने वहां गुलाब खिलते भी हैं या नहीं? विहान से डांट अलग खाई कि तुम जैसा डफर आज तक नहीं देखा जो यह पता लगाए बिना कि वहां इस सीजन में गुलाब खिलते हैं या नहीं तुम ने वहां हनीमून का प्रोग्राम बना लिया,’’ निर्वी रोंआसे स्वर में बोली.

‘‘तुम ने एक बार भी यह नहीं सोचा

पुष्कर जैसी धार्मिक जगह पर मंदिरों की भरमार होगी और मंदिर और रोमांस का दूरदूर तक कोई रिश्ता नहीं.’’

‘‘यार, मेरी सासूमां और दादी सासूमां ने भी इस जगह को फाइनल करने में इंपौर्टैंट भूमिका निभाई. दोनों ने ही कहा, ‘‘जिंदगी की शुरुआत अगर किसी पवित्र जगह पर ईश्वर के आशीर्वाद के साथ हो तो इस से बेहतर कुछ नहीं. तो यह फैक्टर भी हनीमून के लिए पुष्कर के चुनाव में बेहद इंपौर्टैंट रहा.’’

‘‘तेरा कुछ नहीं हो सकता निर्वी, तू झल्ली की झल्ली ही रहेगी,’’ इस बार मैं ने मुसकराते हुए उसे छेड़ा.

‘‘हां यार, छुट्टियों के 2 महत्त्वपूर्ण दिन पुष्कर में जाया हो गए, साथ ही विहान की चिड़चिड़ाहट झली वह अलग. पुष्कर की तुलना में उदयपुर में हर दूसरे कदम पर रोमांटिक मूड

का कबाड़ा करने के लिए कोई मंदिर, घंटेघडि़याल नहीं थे. सो वहां हम ने अपना हनीमून बेहद ऐंजौय किया.’’

‘‘तू तो अब अनुभवी है. तू क्या सोचती है कि क्या हर विवाहित जोड़े को नईनई शादी के बाद हनीमून ट्रिप अवश्य प्लान करना चाहिए? क्या वाकई में हनीमून विवाहित दंपती के सुखद भविष्य की आधारशिला रखता है?’’ मैं ने निर्वी से पूछा.

इस पर निर्वी का कहना है-

परस्पर अंडरस्टैंडिंग का विकास

‘‘हनीमून जिंदगी की व्यस्तता से चुराया गया वह अनमोल समय होता है जब सर्वथा नए परिवेश में पलेबढ़े, बहुत हद तक एकदूसरे से अजनबी 2 इंसानों को एकदूसरे को अच्छी तरह से समझबूझ कर एकदूसरे के स्वभाव, आदत, जीवनमूल्य, जीवनशैली, जीवन के प्रति रवैए के अनुरूप अपनेआप को ढाल कर एक सर्वथा नूतन ढंग से जिंदगी को जीने की तैयारी की शुरुआत करनी पड़ती है.

‘‘मैं ने और विहान ने इस ट्रिप में और एकदूसरे के सामने अपने जीवन मूल्यों और सिद्धांतों का खुलासा किया. हनीमून ट्रिप के इस एकांत में हमें एकदूसरे की मानसिकता और शख्सीयत के बारे में गहराई से जानने का मौका मिला, जो हमारे बीच अंडरस्टैंडिंग विकसित कर भविष्य की साझा जिंदगी को पौजिटिव दिशा देने में निश्चित ही मददगार सिद्ध होगा.

एकदूसरे से अपेक्षाओं और उम्मीदों का जायजा

‘‘इस पीरियड में हमें एकदूसरे की एकदूसरे से अपेक्षाओं और उम्मीदों का जायजा लेने का मौका मिला. विहान एक पत्नी के तौर पर मुझ से किस तरह की मानसिक, भावनात्मक सपोर्ट की अपेक्षा रखता है उस ने मुझे से खुलासा किया. मैं एक पति के रूप में उस से क्या तमन्ना करती हूं, मैं ने उस से चर्चा की.

मानसिक तनाव से मुक्ति

‘‘शादी के 2-3 माह पहले से इस की तैयारियों में और इस के लिए बड़ी रकम का जुगाड़ करने में हम दोनों ही काफी मानसिक तनाव में आ गए थे, साथ ही विहान और उस के मातापिता व भाईबहन के साथ एक ही घर में एक जिम्मेदार बहू, भाभी और ननद के रूप में सफलतापूर्वक एडजस्टमैंट करने का तनाव भी कुछ हद तक मेरे दिमाग में था.

‘‘विहान को टैंशन थी कि वह एक पति के तौर पर हर पैमाने पर मेरी अपेक्षाओं पर खरा उतर पाएगा या नहीं. घरपरिवार से दूर उदयपुर जैसे शांत रमणीक स्थान पर हम दोनों को एकदूसरे के साथ बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के क्वालिटी टाइम बिता कर इस तनाव से बहुत हद तक मुक्ति मिली.

जीवन में आए खुशनुमा बदलाव पर फोकस

‘‘इस हनीमून के दौरान हम दोनों का ध्यान एकदूसरे पर पूरी तरह केंद्रित था जिस से हमें अपने नए रिश्ते से जीवन में आए सुखद बदलाव पर फोकस करने का मौका मिला और इस का अनुभव हम दोनों ने ही किया.

परस्पर अंतरंगता को नया आयाम

‘‘फिजिकल इंटिमेसी एक सफल विवाह की महत्त्वपूर्ण शर्त होती है. हनीमून के दौरान हम ने अपने बीच के कनैक्शन को खंगाला, अंतरंगता बनाई और परस्पर प्यार और इंटिमेसी के समीकरण का आकलन किया.

‘‘हमें एकांत में बिना किसी गतिरोध के एकदूसरे की कंपनी ऐंजौय करने का अवसर मिला. वक्त बीतने के साथ अमूमन घरगृहस्थी की सौ उल?ानें, दफ्तर और इन की जिम्मेदारियों के बो?ा तले नएनए कपल के लिए ये सब प्राथमिकता बनने लगते हैं और रोमांस बैक

सीट पर आ जाता है. हम दोनों ने अपने विवाहित जीवन के हर दौर में हर हाल में अपने मध्य रोमांस की चिनगारी को जिंदा रखने का प्रण लिया.

भावनात्मक बौंडिंग में मजबूती

‘‘घर, परिवार, मातापिता, भाईबहनों की अनुपस्थिति में एकदूसरे में डूब कर हम दोनों को एकदूसरे के प्रति अपनी चाहत का अंदाजा लगा, जिस से हमारे बीच की भावनात्मक बौंडिंग मजबूत हुई. मेरा मानना है कि यह भावनात्मक नजदीकी हमारे मध्य भरोसे और खुशी का भाव लाएगी जिस से हमारे रिश्ते में लौंगटर्म संतुष्टि पैदा होगी.

‘‘इस ट्रिप में हम ने एक सुखद साथ भविष्य के ख्वाब बुने और उन्हें पूरा करने की दिशा में आवश्यक ठोस प्लान की रूपरेखा बनाई.

‘‘एकांत में एकदूसरे के सान्निध्य में बिताए गए दिन और परस्पर संवाद से मुझे अपनी और विहान की जरूरतों जैसे एकदूसरे की कंपनी, अंतरंगता, रोमांच, साथ पौजिटिव अनुभव, पैशन एवं फन व रोमांस की आवश्यकताओं का एहसास हुआ और हम दोनों उन्हें पूरा करने की जरूरत के प्रति सचेत हुए तथा इस प्रकार हमारी परस्पर प्रतिबद्धता को एक नया आयाम मिला.

‘‘तो मेरी जान, समझ तुम? मैं अब दावे से कह सकती हूं कि विवाहित जीवन के सफर में हनीमून निश्चित तौर पर एक यादगार माइलस्टोन होता है, जो यकीनन नए शादीशुदा दंपती के सुनहरे साथ भविष्य की सशक्त फाउंडेशन साबित होता है.

तुम ने क्यों कहा मैं सुंदर हूं- भाग 3 : क्या दो कदम ही रहा दोनों का साथ

लेखक- मनोरंजन सहाय सक्सेना

‘‘ऐसे ही दिन, महीने बीतते हुए 5 साल बीत गए. पत्नी इलाज के साथसाथ वकील साहिबा की सेवा से धीरेधीरे काफी स्वस्थ हो गईं. मगर उन के स्वास्थ्य में सुधार होते ही उन्होंने सब से पहले कभी उन की कालेजमेट रही और अब बच्चों की मौसी वकील साहिबा के बारे में ही एक सख्त एन्क्वायरी औफिसर की तरह उन से मेरा परिचय कैसे बढ़ा, वह घर कैसे और क्यों आने लगी, बेटियों से वह इतना क्यों घुलमिल गई, मैं उन के घर क्यों जाता हूं आदि सवाल उठाने शुरू कर दिए तो मैं काफी खिन्न हो गया. मगर मैं ने अपनी खिन्नता छिपाए रखी, इस से पत्नी के शक्की स्वभाव को इतना प्रोत्साहन मिल गया कि एक दिन घर में मुझे सुनाने के लिए ही बेटी को संबोधित कर के जोर से बोली थी, ‘वकील साहिबा तेरे बाप की बीवी बनने के लिए ही तेरी मौसी बन कर घर में घुस आई. खूब फायदा उठाया है दोनों ने मेरी बीमारी का. मगर मैं अब ठीक हो गई हूं और दोनों को ठीक कर दूंगी.’

‘‘पत्नी का प्रलाप सुन कर बेटी कुढ़ कर बोली, ‘मम्मी, मौसी ने आप के गंदे डायपर तक कई बार बदले हैं, कुछ तो खयाल करो.’ यह कह कर अपनी मां की बेकार की बातें सुनने से बचने के लिए वह अपने कमरे में चली गई. वह अपनी मौसी की मदद से किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही थी.

‘‘इस के कुछ समय बाद बड़ी बेटी, जो ग्रेजुएशन पूरा होते ही वकील साहिबा के तन, मन से सहयोग के कारण बैंक सेवा में चयनित हो गई थी, ने अपने सहपाठी से विवाह करने की बात घर में कही तो पत्नी ने शालीनता की सीमाएं तोड़ते हुए अपनी सहपाठिनी वकील साहिबा को फोन कर के घर पर बुलाया और बेटी के दुस्साहस के लिए उन की अस्वस्थता के दौरान मेरे साथ उन के अनैतिक संबंधों को कारण बताए हुए उन्हें काफी बुराभला कह दिया.

‘‘इस के बावजूद भी बेटी के जिद पर अड़े रहने पर जब उन्होंने बेटी का विवाह में सहयोग करते हुए उस की शादी रजिस्ट्रार औफिस में करवा दी तब तो पत्नी ने उन के घर जा कर उन्हें बेहद जलील किया. इस घटना के बाद मैं ने ही उन्हें घर आने से रोक दिया. अब जब भी कोर्ट में उन से मिलता, उन का बुझाबुझा चेहरा और सीमित बातचीत के बाद एकदम खामोश हो कर ‘तो ठीक है,’ कह कर उन्हें छोड़ कर चले जाने का संकेत पा कर मैं बेहद खिन्न और लज्जित हो जाता था.

‘‘इस तरह एक साल गुजर गया. उस दिन भी हाईकोर्ट में विभाग के विरुद्ध एक मुकदमे में मैं भी मौजूद था. विभाग के विरुद्ध वादी के वकील के कुछ हास्यास्पद से तर्क सुन कर जज साहब व्यंग्य से मुसकराए थे और उसी तरह मुसकराते हुए प्रतिवादी के वकील हमारी वकील साहिबा की ओर देख कर बोले, ‘हां वकील साहिबा, अब आप क्या कहेंगी.’

‘‘जज साहब के मुसकराने से अचानक पता नहीं वकील साहिबा पर क्या प्रतिक्रिया हुई. वे फाइल को जज साहब की तरफ फेंक कर बोलीं, ‘हां, अब तुम भी कहो, मैं, जवान हूं, सुंदर हूं, चढ़ाओ मुझे चने की झाड़ पर,’ कहते हुए वे बड़े आक्रोश में जज साहब के डायस की तरफ बढ़ीं तो इस बेतुकी और अप्रासंगिक बात पर जज साहब एकदम भड़क गए और इस गुस्ताखी के लिए वकील साहिबा को बरखास्त कर उन्हें सजा भी दे सकते थे पर गुस्से को शांत करते हुए जज साहब संयत स्वर में बोले, ‘वकील साहिबा, आप की तबीयत ठीक नहीं लगती, आप घर जा कर आराम करिए. मैं मुकदमा 2 सप्ताह बाद की तारीख के लिए मुल्तवी करता हूं.’

‘‘उस दिन जज साहब की अदालत में मुकदमा मुल्तवी हो गया. मगर इस के बाद लगातार कुछ ऐसी ही घटनाएं और हुईं. एक दिन वह आया जब एक दूसरे जज महोदय की नाराजगी से उन्हें मानसिक चिकित्सालय भिजवा दिया गया. अजीब संयोग था कि ये सभी घटनाएं मेरी मौजूदगी में ही हुईं.

‘‘वकील साहिबा की इस हालत की वजह खुद को मानने के चलते अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानते हुए औफिस से ही समय निकाल कर उन का कुशलक्षेम लेने अस्पताल हो आता था. एक दिन वहां की डाक्टर ने मुझ से उन के रिश्ते के बारे पूछ लिया तो मैं ने डाक्टर को पूरी बात विस्तार से बतला दी. डाक्टर ने मेरी परिस्थिति जान कर मुलाकात का समय नहीं होने पर भी मुझे उन की कुशलक्षेम जानने की सुविधा दी. फिर डाक्टर ने सीधे उन के सामने पड़ने से परहेज रखने की मुझे सलाह देते हुए बताया कि वे मुझे देख कर चिंतित सी हो कर बोलती हैं, ‘तुम ने क्यों कहा, मैं सुंदर हूं.’ और मेरे चले आने पर लंबे समय तक उदास रहती हैं.

‘‘बेटा उच्चशिक्षा के बाद और बड़ी बेटी व दामाद किसी विदेशी बैंकिंग संस्थान में अच्छे वेतन व भविष्य की खातिर विदेश चले गए थे. छोटी बेटी केंद्र की प्रशासनिक सेवा में चयनित हो गई थी. मगर वह औफिसर्स होस्टल में रह रही थी. अब परिवार में मेरे और पत्नी के अलावा कोई नहीं था. उधर पत्नी के मन में मेरे और वकील साहिबा के काल्पनिक अवैध संबंधों को ले कर गहराते शक के कारण उन का ब्लडप्रैशर एकदम बढ़ जाता था, और फिर दवाइयों के असर से कईकई दिनों तक मैमोरीलेप्स जैसी हालत हो जाती थी.

‘‘इसी हालात में उन्हें दूसरा झटका तब लगा जब बेटे ने अपनी एक विदेशी सहकर्मी युवती से शादी करने का समाचार हमें दिया.

‘‘उस दिन मेरे मुंह से अचानक निकल गया, ‘अब मन्नू को तो वकील साहिबा ने नहीं भड़काया.’ मेरी बात सुन कर पत्नी ने कोई विवाद खड़ा नहीं किया तो मुझे थोड़ा संतोष हुआ. मगर उस के बाद पत्नी को हाई ब्लडप्रैशर और बाद में मैमोरीलेप्स के दौरों में निरंतरता बढ़ने लगी तो मुझे चिंता होने लगी.

‘‘कुछ दिनों बाद उन्हें फिर से डिप्रैशन ने घेर लिया. अब पूरी तरह अकेला होने कारण पत्नी की देखभाल के साथ दैनिक जीवन की जरूरतों को पूरा करना बेहद कठिन महसूस होता था. रिटायरमैंट नजदीक था, और प्रमोशन का अवसर भी, इसलिए लंबी छुट्टियां ले कर घर पर बैठ भी नहीं सकता था. क्योंकि प्रमोशन के मौके पर अपने खास ही पीठ में छुरा भोंकने का मौका तलाशते हैं और डाक्टर द्वारा बताई गई दवाइयों के असर से वे ज्यादातर सोई ही रहती थीं. फिर भी अपनी गैरहाजिरी में उन की देखभाल के लिए एक आया रख ली थी.

‘‘उस दिन आया ने कुछ देर से आने की सूचना फोन पर दी, तो मैं उन्हें दवाइयां, जिन के असर से वे कमसेकम 4 घंटे पूरी तरह सोईर् रहती थीं, दे कर औफिस चला गया था. पता नहीं कैसे उन की नींद बीच में ही टूट गई और मेरी गैरहाजिरी में नींद की गोलियों के साथ हाई ब्लडप्रैशर की दशा में ली जाने वाली गोलियां इतनी अधिक निगल लीं कि आया के फोन पर सूचना पा कर जब मैं घर पहुंचा तो उन की हालत देख कर फौरन उन्हें ले कर अस्पताल को दौड़ा. मगर डाक्टरों की कोशिश के बाद भी उन की जीवन रक्षा नहीं हो सकी.

‘‘पत्नी की मृत्यु पर बेटे ने तो उस की पत्नी के आसन्न प्रसव होने के चलते थोड़ी देर इंटरनैट चैटिंग से शोक प्रकट करते हुए मुझ से संवेदना जाहिर की थी, मगर दोनों बेटियां आईं थी. छोटी बेटी तो एक चुभती हुई खमोशी ओढ़े रही, मगर बड़ी बेटी का बदला हुआ रुख देख कर मैं हैरान रह गया. वकील साहिबा को मौसी कह कर उन के स्नेह से खुश रहने वाली और बैंकसेवा के चयन से ले कर उस के जीवनसाथी के साथ उस का प्रणयबंधन संपन्न कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निबाहने के कारण उन की आजीवन ऋ णी रहने की बात करने वाली मेरी बेटी ने जब कहा, ‘आखिर आप के और उन के अफेयर्स के फ्रस्टेशन ने मम्मी की जान ले ही ली.’ और मां को अपनी मौसी की सेवा की याद दिलाने वाली छोटी बेटी ने भी जब अपनी बहन के ताने पर भी चुप्पी ही ओढ़े रही तो मैं इस में उस का भी मौन समर्थन मान कर बेहद दुखी हुआ था.

अनोखा रिश्ता: कौन थी मिसेज दास

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पहचान: पति की मृत्यु के बाद वेदिका कहां चली गई- भाग 1

वेदिकाने उठ कर दीवारों की सरसराहट का मकसद जानने की कोशिश की, फिर धीरे से दरवाजा खोल कर बाहर ?ांका. वहां कोई नहीं था. तभी हवा में तैरती एक तरंग उस का नाम ले कर आई तो वेदिका ने कान लगा कर सुनने की कोशिश की.

मम्मीजी के कमरे से जेठजी की आवाज आ रही थी, ‘‘अब उस का यहां क्या काम है? विदित चला गया…अब उस का यहां रहने का कोई हक नहीं बनता.’’

‘‘तो क्या करें घर से निकाल दें? उस के मांबाप ने तो विदित के जाने पर अफसोस करने आना भी जरूरी नहीं सम?ा…अब उसे उठा कर सड़क पर तो फेंक नहीं सकते,’’ यह मम्मीजी का स्वर था.

‘‘पर मम्मीजी जब उस के मातापिता तक उस से संबंध रखने को तैयार नहीं हैं, तो हम भला क्यों इस पचड़े में पड़ें? आज उसे और कल को उस के बच्चे को भी हम कब तक खिलाएंगे? हमारा खाएगी और कल को हम से ही हिस्सा मांगने खड़ी हो जाएगी. क्या हक बनता है उस का? मैं तो कहती हूं कि उसे अभी घर से निकाल दो. जहां जाना जाए. चाहे मांबाप के घर या और कहीं…यह तो विदित से भाग कर शादी करने से पहले सोचना था,’’ यह भाभी की आवाज थी. वही भाभी जो उस की और विदित की शादी से नाखुश हो कर भी विदित के साथ मुंह में मिस्री घोल कर बतियाती थीं. मगर आज मिस्री थूक कर दिल में इकट्ठा किया जहर को जबान पर ले आई थीं.

‘‘बस करो…तुम लोग बस एकतरफा सोचते और बोलते हो. ऐसे ही घर से निकाल दोगे तो जाएगी कहां? अभी विदित को गए महीना भी नहीं हुआ. थोड़ा धीरज धरो, फिर सोचेंगे कि क्या करना है?’’ बाबूजी ने कहा.

4 महीने पहले उस ने और विदित ने घर से भाग कर शादी कर ली थी. वेदिका एमबीए की मेधावी छात्रा थी और विदित एक मशहूर वकील. किसी सेमिनार में दोनों का परिचय हुआ तो पहली ही नजर में प्यार हो गया. 6 महीनों में स्थिति एकदूसरे के बिना न जीने की हो गई. परिवारों के मानने की संभावना नहीं के बराबर थी, इसलिए दोनों ने हां न के पचड़े में पड़ने की जरूरत नहीं सम?ा. हां, शादी कर के वे सब से पहले वेदिका के घर पहुंचे थे जहां पहले रिवाज के तौर पर उन के मुंह पर दरवाजा बंद कर दिया गया. वहां से निकलते ही वेदिका की रुलाई फूट पड़ी. ऐसी विदाई की तो उस ने कल्पना भी नहीं की थी. विदित देर तक उसे धैर्य बंधाता रहा. विदित के घर पहुंचने के पहले ही कोई यह खबर पहुंचा आया था. घर का दरवाजा नौकर ने खोला और आशीर्वाद के नाम पर सुनने को मिला कि तुम ने हमारी नाक कटवा दी…कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा.

विदित ने वेदिका के डूबते दिल को सहारा दिया. उस ने अगले ही दिन कश्मीर के टिकट बुक करा लिए. 15 दिन दोनों दीनदुनिया से दूर एकदूसरे में खोए दिलों के घाव को भरने में लगे रहे, जो उन के अपनों ने दिए थे.

वापस आने पर भी ज्यादा कुछ नहीं बदला था. विदित उस की ढाल बना रहा. मम्मीजी और भाभी का व्यवहार बेइज्जती की हद तक रूखा था, लेकिन वेदिका धीरज से सब सहती रही. उसे विश्वास था कि एक दिन वह सब का दिल जीत लेगी. पढ़ाई शुरू करने का विदित का प्रस्ताव भी उस ने इसीलिए टाल दिया था, क्योंकि अभी वक्त कच्चे रिश्तों को संवारने का था. रिश्ते संवरते उस के पहले ही एक दुर्घटना में विदित की जिंदगी की डोर कच्चे धागे की तरह टूट गई और इसी के साथ वेदिका की भी हर आस टूट गई.

15 दिनों तक मेहमानों का आनाजाना लगा रहा. जिन मेहमानों को दुलहन के रूप में मुंहदिखाई का अवसर नहीं मिला था, नियति ने आज उन्हें उस के जख्मों को कोचने का अवसर दे दिया था. वेदिका ने पथराए मन से सब ?ोला. वह भावनाओं से भीगे एक कोमल कंधे के सहारे के लिए छटपटाती रही.

8 दिन पहले सुबहसुबह वेदिका चक्कर खा कर गिर पड़ी. जब आंख खुली तो डाक्टर को यह कहते सुना, ‘‘प्रैगनैंसी कन्फर्म करने के लिए कुछ टैस्ट लिख रहा हूं जल्द ही करवा लें.’’

यह सुन सब के मुंह में जैसे कुनैन घुल गई और शायद सब ने यही कामना की होगी कि टैस्ट नैगेटिव आए. खुद वेदिका भी नहीं सम?ा पाई थी कि इस खबर पर खुश होए या रोए. बस पेट पर हाथ रखे सुन्न सी बैठी रही. हां, एक आस सी जरूर जागी थी कि शायद इस बच्चे की वजह से इस घर में उसे थोड़ी सी जगह मिल जाए.

उसे हर जगह सिर्फ वीरानगी ही नजर आई. एक अजीब सी तटस्थता जैसे वह बच्चा सिर्फ और सिर्फ वेदिका का है.

सारी रात वेदिका सिसकियां भरती रही. सुबह बिस्तर से उठने लगी तो टांगों ने सहारा देने से इनकार कर दिया. 10 मिनट लगे होंगे उसे व्यवस्थित होने में. कमरे से बाहर आई तो उस के पैर वहीं ठिठक गए. 4 महीनों में पहली बार किसी अपरिचित चेहरे पर उसे एक जोड़ी आंखों में करुणा नजर आई. उन आंखों की मालकिन को तो वह नहीं जानती थी, लेकिन संवेदना की डोर से वह उन फैली बांहों तक खिंची चली आई. उस की पीठ सहलाते हाथों के कोमल स्पर्श ने अनकही संवेदना को उस तक पहुंचा दिया. तभी घूरती कठोर नजरों ने उसे यथार्थ में ला पटका. वह छिटक कर अलग हो गई. काम करते भी कई बार उस ने उन नजरों की तरलता महसूस की. हालांकि उन का परिचय वह अब तक नहीं जान सकी थी. भाभी से पूछा भी था, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

आधी रात के लगभग वेदिका की नींद खुली. दरवाजे पर खटखट की आवाज हुई थी. दुविधा में उस ने दरवाजा खोला तो वही 2 आंखें नजर आईं. हाथों ने कोमलता से उसे धक्का दे कर अंदर किया और दरवाजा बंद हो गया. लाइट जलाने के लिए बढ़ते हाथों को दृढ़ता से रोक दिया गया. नाइट बल्ब के धीमे प्रकाश में उसे चुप रहने का इशारा करते हाथों ने हाथ थाम कर अपने पास बैठा लिया.

‘‘मैं विदित के मामा की बेटी राधिका हूं. विदित से बहुत क्लोज थी. तुम से शादी के बारे में विदित ने सिर्फ मु?ो बताया था. मैं हमेशा उस का साथ दूंगी, यह मेरा उस से वादा था. अब विदित तो रहा नहीं, लेकिन तुम तो हो, इसलिए अब तुम्हारे बुरे वक्त में तुम्हारी मदद कर के अपना वादा निभाना चाहती हूं. इसी के इंतजाम में लगी थी, इसलिए यहां 1 महीने बाद आई,’’ फुसफुसाते स्वर में उस ने अपने आने का मकसद बताया.

फिर कुछ देर चुप रहने के बाद आगे बोली, ‘‘तुम तो एमबीए कर रही थीं न? तुम्हारी मार्कशीट और बाकी सारे पेपर्स कहां हैं?’’

‘‘मेरे पास हैं,’’ वेदिका ने भी अपनी आवाज को भरसक धीमा करते हुए कहा.

‘‘विदित का अकाउंट और उस का एटीएम? कितने पैसे हैं उस के अकाउंट में?’’

‘‘मेरे पास है. लगभग 2 लाख रुपए होंगे,’’ उस के स्वर में उल?ान थी.

‘‘तुम्हारे गहने या और कुछ भी हैं?’’

‘‘एक सैट डायमंड का है…यही कोई 80-90 हजार रुपए का. उस के अलावा कुछ खास नहीं.’’

बिना शर्त: भाग 3- मिन्नी के बारे में क्या जान गई थी आभा

‘कोई बात नहीं. आप अपने मम्मीपापा का कहना मानो. वैसे भी शर्तों के आधार पर जीवन में साथसाथ नहीं चला जा सकता,’ उस ने दुखी मन से कहा था.

‘सोच लेना, आभा, सारी रात है. कल मु झे जवाब दे देना.’

‘मेरा निर्णय तो सदा यही रहेगा कि जो मु झे मेरी बेटी से दूर करना चाहता है उस के साथ मैं सपने में भी नहीं रह सकती.’ उस ने दृढ़ स्वर में कहा था.

कुछ देर बाद महेश उठ कर कमरे से बाहर निकल गया था.

विचारों में डूबतेतैरते आभा को नींद आ गई थी. सुबह आभा की आंख खुली तो सिर में दर्द हो रहा था और उठने को मन भी नहीं कर रहा था. रात की बातें याद आने लगीं. हृदय पर फिर से भारी बो झ पड़ने लगा. क्या महेश ऊपरी मन से मिन्नी को प्रेम व दुलार देता था? मिन्नी को बेटीबेटी कहना केवल दिखावा था. यदि वह पहले ही यह सब जान जाती तो महेश की ओर कदम ही न बढ़ाती. महेश भी तो मिन्नी को उस से दूर करना चाहता है.

नहीं, वह मिन्नी को कभी स्वयं से दूर नहीं करेगी. प्रशांत के जाने के बाद उस ने मिन्नी को पढ़ालिखा कर किसी योग्य बनाने का लक्ष्य बनाया था. पर जब महेश ने उस की ओर हाथ बढ़ाया तो वह स्वयं को रोक नहीं पाई थी.

दोपहर को आभा के मोबाइल की घंटी बजी. स्क्रीन पर महेश का नाम था. उस ने कहा, ‘‘हैलो.’’

‘‘आभा, आज आप औफिस नहीं आईं?’’ स्वर महेश का था.

‘‘हां, आज तबीयत ठीक नहीं है, औफिस नहीं आ पाऊंगी.’’

‘‘दवा ले लेना. मेरी जरूरत हो तो फोन कर देना. मैं डाक्टर के यहां ले चलूंगा.’’

‘‘ठीक है.’’

उधर से मोबाइल बंद हो गया. आभा मन ही मन तड़प कर रह गई. उस ने सोचा था कि शायद महेश यह कह देगा कि मिन्नी हमारे साथ ही रहेगी, पर ऐसा नहीं हुआ. अब वह एक अंतिम निर्णय लेने पर विवश हो गई. ठीक है जब महेश को उस की बेटी मिन्नी की जरा भी चिंता नहीं है तो उसे क्या जरूरत है महेश के बारे में सोचने की.

दोपहर बाद मांजी आभा के पास आईं और बोलीं, ‘‘अरे बेटी, आज तुम औफिस नहीं गईं?’’

‘‘मांजी, आज तबीयत कुछ खराब थी, इसलिए औफिस से छुट्टी कर ली.’’

‘‘क्यों, क्या हुआ? मु झे बता देती. मैं कमल से कह कर दवा मंगा देती. कहीं डाक्टर को दिखाना है तो मैं शाम को तेरे साथ चलूंगी.’’

‘‘नहींनहीं, मांजी. मामूली सा सिरदर्द था, अब तो ठीक भी हो गया है. आप चिंता न करें.’’

‘‘तू मेरी बेटी की तरह है. बेटी की चिंता मां को नहीं होगी तो फिर किसे होगी?’’ मांजी ने आभा की ओर देखते हुए कहा.

आभा मांजी की ओर देखती रह गई. ठीक ही तो कह रही हैं मांजी. बेटी की चिंता मां नहीं करेगी तो कौन करेगा. उस के चेहरे पर प्रसन्नता फैल गई. वह कुछ नहीं बोली.

‘‘बेटी, बहुत दिनों से एक बात कहना चाह रही थी, पर डर रही थी कि कहीं तुम बुरा न मान जाओ,’’ मांजी बोलीं.

‘‘मांजी, आप कहिए. मां की बात का बेटी भी कहीं बुरा मानती है क्या?’’

‘‘बेटी, तुम तो हमारे छोटे से घरपरिवार के बारे में जानती हो. कमल में कोई ऐब नहीं है. उस की आयु भी ज्यादा नहीं है. जब भी उस से दूसरी शादी की बात करती हूं तो मना कर देता है. उसे डर है कि दूसरी लड़की भी तेज झगड़ालू आदत की आ गई तो यह घर घर न रहेगा.’’

आभा सम झ गई जो मांजी कहना चाहती हैं लेकिन वह चुप रही.

मांजी आगे बोलीं, ‘‘बेटी, जब से तुम हमारे यहां किराएदार बन कर आई हो, मैं तुम्हारा व्यवहार अच्छी तरह परख चुकी हूं. राजू और मिन्नी भी आपस में हिलमिल गए हैं. तुम्हारे औफिस जाने के बाद दोनों आपस में खूब खेलते हैं. मैं चाहती हूं कि तुम हमारे घर में बहू बन कर आ जाओ. राजू को बहन और मिन्नी को भाई मिल जाएगा. कमल भी ऐसा ही चाहता है. मैं बहुत आशाएं ले कर आई हूं, निराश न करना अपनी इस मांजी को.’’

सुनते ही आभा की आंखों के सामने महेश और कमल के चेहरे आ गए. कितना अंतर है दोनों में. महेश तो अपने मम्मीपापा के कहने में आ कर बेटी मिन्नी को उस से दूर करना चाहता है जबकि मांजी मिन्नी को अपने पास ही रखना चाहती हैं. इस में तो कमल की भी स्वीकृति है.

‘‘क्या सोच रही हो, बेटी? मु झे तुम्हारा उत्तर चाहिए. यदि तुम ने हमारे राजू को अपना बेटा बना लिया तो मेरी बहुत बड़ी चिंता दूर हो जाएगी,’’ मांजी ने आभा की ओर देखा.

आभा कुछ नहीं बोली. वह चुपचाप उठी, साड़ी का पल्लू सिर पर किया और मुड़ कर मांजी के चरण छू लिए.

मांजी को उत्तर मिल गया था. वे प्रसन्नता से गदगद हो कर बोलीं, ‘‘मु झे तुम से ऐसी ही आशा थी, बेटी. सदा सुखी रहो. तुम अपने मम्मीपापा को बुला लेना. उन से भी बात करनी है.’’

‘‘अच्छा मांजी.’’

‘‘और हां, आज रात का खाना हम सभी इकट्ठा खाएंगे.’’

‘‘खाना मैं बनाऊंगी, मांजी. मैं आप की और कमल की पसंद जानती हूं.’’

‘‘ठीक है, बेटी. अब मैं चलती हूं. कमल को भी यह खुशखबरी सुनाना चाहती हूं. उस से कह दूंगी कि औफिस से लौटते समय मिठाई का डब्बा लेता आए क्योंकि आज सभी का मुंह मीठा कराना है,’’ मांजी ने कहा और कमरे से बाहर निकल गईं.

अगले दिन सुबह जब आभा की नींद खुली तो 7 बज रहे थे. रात की बातें याद आते ही उस के चेहरे पर प्रसन्नता दौड़ने लगी. रात खाने की मेज पर कमल, मांजी, वह, राजू और मिन्नी बैठे थे. खाना खाते समय कमल व मांजी ने बहुत तारीफ की थी कि कितना स्वादिष्ठ खाना बनाया है. हंसी, मजाक व बातों के बीच पता भी न चला कि कब 2 घंटे व्यतीत हो गए. उसे बहुत अच्छा लगा था.

वह आंखें बंद किए अलसाई सी लेटी रही. बराबर में मिन्नी सो रही थी.

अगली सुबह आभा नाश्ता कर रही थी. तभी मोबाइल की घंटी बज उठी. उस ने देखा कौल महेश की थी.

‘‘हैलो,’’ वह बोली.

‘‘अब कैसी हो, आभा?’’

‘‘मैं ठीक हूं.’’

‘‘मैं ने मम्मीपापा को मना लिया है. वे बहुत मुश्किल से तैयार हुए हैं. अब मिन्नी हमारे साथ रह सकती है.’’

‘‘आप को अपने मम्मीपापा को जबरदस्ती मनाने की जरूरत नहीं थी.’’

‘‘मैं कुछ सम झा नहीं?’’

‘‘सौरी महेश, आप ने थोड़ी सी देर कर दी. अब तो मैं अपनी मिन्नी के साथ काफी दूर निकल चुकी हूं. अब लौट कर नहीं आ पाऊंगी.’’

‘‘आभा, तुम क्या कह रही हो, मेरी सम झ में कुछ नहीं आ रहा है,’’ महेश का परेशान व चिंतित सा स्वर सुनाई दिया.

‘‘अभी आप इतना ही सम झ लीजिए कि मु झे बिना शर्त का रिश्ता यानी अपना घरपरिवार मिल गया है, जहां मिन्नी को ले कर कोई शर्त नहीं. मिन्नी भी साथ रहेगी. आप अविवाहित हैं, आप की शादी भी जल्द हो जाएगी. मैं आज औफिस आ रही हूं, बाकी बातें वहां आ कर सम झा दूंगी,’’ यह कह कर आभा ने मोबाइल बंद कर दिया और निश्चिंत हो कर नाश्ता करने लगी.

लेखक – रमेश चंद्र छबीला

5 साल छोटे लड़के से मैं प्यार करती हूं लेकिन इससे क्या शादी के बाद प्यार में अंतर आएगा

सवाल

लड़का उम्र में मुझ से 5 साल छोटा है. वह मुझ से बहुत प्यार करता है. मुझे भी वह बहुत पसंद है. मैं 32 साल की हूं तो वह 27 साल का है. वह लाइफ में पूरी तरह सैट भी हो चुका है. अच्छी जौब में है और इकलौती संतान है. सबकुछ अच्छा है लेकिन मेरे मन में यही बात बारबार आती है कि अभी तो वह मुझे बहुत पसंद कर रहा है, प्यार की दीवानगी दिखा रहा है लेकिन शादी के बाद उम्र का यही अंतर हमारे प्यार के आड़े न आ जाए.

जवाब

आप के केस में हम तो यही कहेंगे कि सच में प्यार है तो उम्र माने नहीं रखती. आज के समय में जब प्यार पाना ही मुश्किल हो गया है, ऐसे में अगर कोई आप से प्यार करता है और एक व्यक्ति की उम्र आप से छोटी है तो उम्र की बात को नजरअंदाज कीजिए. हां, सब से जरूरी बात यह है कि आप दोनों में प्यार, ईमानदारी और सामंजस्य होना चाहिए. साथ ही, एकदूसरे के प्रति जिम्मेदार होना जरूरी है.

जहां तक आप के मन में जो सवाल बारबार उठ रहा है कि शादी के बाद उम्र आड़े आ गई तो क्या होगा. यह अपने दिमाग से निकाल दीजिए. वैसे भी 5 साल का गैप कोई बहुत बड़ा नहीं है. आपस में प्यार और अंडरस्टैंडिंग होना जरूरी है. इस का यही जवाब है कि अगर संबंध टूटना होगा विवाह के बाद तो उस के लिए उम्र का फासला जिम्मेदार नहीं.

अधिकतर देखा गया है कि बड़ी उम्र की औरतें पुरुषों के जीवन में एक ठहराव, जिम्मेदारी और ईमानदारी विकसित करती हैं. ऐसे कई उदाहरण हैं जहां पर लड़कियां लड़कों से छोटी होते हुए भी दोनों आपस में एक अच्छी गृहस्थी नहीं बना पाते.

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मैं कालेज में पढ़ता हूं और एक लड़की को पसंद करता हूं. वह मेरे घर के पास रहती है. वह जब बाहर आती है तो बारबार मेरी तरफ देखती है. मैं उस से बात कैसे करूं और कैसे पता लगाऊं कि वह मुझ से प्यार करती है.

जवाब

यह उम्र का तकाजा है. इंसान का अपोजिट सैक्स की तरफ आकर्षण होना सहज है. आप हमेशा ही उस तरफ आकर्षण महसूस करोगे. यदि आप उस से बात करना चाहते हैं तो उस के काम या शौक से संबंधित किसी विषय को ढूंढ़ कर बात कर सकते हैं. उस की मदद का अवसर भी तलाश कर के बात की जा सकती है.

आप कह रहे हैं कि वह आप के घर के पास ही रहती है. यदि आप एक ही सोसाइटी या कालोनी में रहते हैं तो आजकल ज्यादातर सोसाइटी-कालोनी में कल्चर इवैंट, फैस्टिवल साथसाथ मनाए जाते हैं. सब लोग इकट्ठे होते हैं. ऐसे में उस लड़की से बात करने का कोई न कोई बहाना आप निकाल सकते हैं.

यह सब आप की सूझबूझ पर निर्भर करता है कि आप कैसे और क्या युक्ति निकालते हैं. उस की मदद का अवसर भी तलाश कर के बात की जा सकती है. जब तक आप उस से बात नहीं करेंगे तब तक आप उस के बारे में जानकारी कैसे हासिल करेंगे.

मिलेट से झटपट बनाएं ये स्वादिष्ट व्यंजन

मिलेट इस समय पूरी दुनिया के खानपान पर छाया हुआ है. मिलेट्स अर्थात् मोटा अनाज जिसके अंतर्गत बाजरा, रागी, ज्वार, सामा, कोदो, कुटकी और मक्का आदि आते हैं. वर्तमान समय में अधिकांश घरों में गेहूं के पैक्ड आटे का प्रयोग किया जाता है, जो बहुत अधिक महीन और बिना फाइबर वाला होता  जिसे पचाने के लिए हमारे पाचन तंत्र को बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ता है जिसके कारण अक्सर कब्ज, गैस जैसी बीमारियां हो जातीं हैं जब कि गेहूं और मैदा की अपेक्षा मोटे अनाज फ़ायबर, मिनरल्स और विटामिंस से भरपूर होते हैं जो काफ़ी सेहतमंद होते हैं.  कुछ वर्षों में फ़ास्ट और पेकेज़्ड फ़ूड के अत्यधिक प्रयोग के चलते मिलेट्स विश्व के खानपान से लुप्त प्राय से हो गये थे. मिलेट्स को पुन वैश्विक खानपान में महत्वपूर्ण बनाने के उद्देश्य से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2023को मिलेट्स ईयर घोषित किया है. इसी परिप्रेक्ष्य में हम आज आपको मिलेट्स से कुछ रेसिपी बनाना बता रहे हैं जिन्हें आप आसानी से घर पर बना सकते हैं तो आइए देखते हैं कि इन्हें कैसे बनाया जाता है.

  1. वेजिटेबल रागी सूप

कितने लोगों के लिए    4

बनने में लगने वाला समय   20  मिनट

मील टाइप  वेज

सामग्री

चुकंदर   1/2

गाजर   1 छोटी

बीन्स    4

प्याज़   1छोटा

लहसुन    4 काली

मक्खन    1 टीस्पून

नमक     1/4 टीस्पून

काली मिर्च पाउडर   1/4 टीस्पून

रागी का आटा    2 टेबलस्पून

क्रीम   1 टीस्पून

कश्मीरी लाल मिर्च   1 चुटकी

बारीक कटा हरा धनिया  1 टीस्पून

नींबू का रस 1/2 टीस्पून

विधि

चुकंदर, गाजर और बीन्स को एकदम बारीक बारीक काट लें. अब एक पैन में बटर गर्म करके लहसुन को सुनहरा होने तक भून लें. अब इसमें सब्जियां अच्छी तरह मिलाकर नमक डालें और ढक्कर सब्ज़ियों के गलने तक पकायें. रागी के आटे को 1 चम्मच पानी में अच्छी तरह घोल लें ताकि किसी भी प्रकार की गुठली न रहे. सब्ज़ियों में 1 कप पानी मिलाकर रागी का आटा मिला दें. 2-3 मिनट तक उबालकर काली मिर्च और नींबू का रस मिलायें. गरमा गरम सूप को कटा हरा धनिया और क्रीम डालकर सर्व करें.

2. बाजरा उत्तपम

कितने लोगों के लिए   4

बनने में लगने वाला समय   20 मिनट

मील टाइप  वेज

सामग्री

बाजरा आटा   1 कप

दही 1 कप

नमक  स्वादानुसार

बारीक कटी हरी मिर्च  2

बारीक कटा हरा धनिया  1 टीस्पून

बारीक कटा प्याज़  1

उबला मैश किया आलू     1

जीरा  1/4 टीस्पून

लाल मिर्च पाउडर  1/4 टीस्पून

तेल  1 टीस्पून

ऑरेगनो   1/2टीस्पून

चाट मसाला  1/2टीस्पून

विधि

बाजरे के आटे को दही और आधा कप पानी के साथ एक बाउल में अच्छी तरह मिक्स करके आधे घंटे के लिए रख दें. आधे घंटे के बाद इसमें मैश किया आलू, सभी सब्जियां, और मसाले मिलायें आवश्यकतानुसार पानी मिलाकर एक पकौड़े जैसा बैटर तैयार कर लें. एक नानस्टिक तवे पर चिकनाई लगाकर एक बड़ा चम्मच घोल डालकर ढक दें और धीमी आंच पर सुनहरा होने तक दोनों तरफ़ से सेंककर ऑरिगेनो और चाट मसाला बुरककर हरे धनिया की चटनी के साथ सर्व करें.

Wedding Special: वैवाहिक रिश्ते कभी प्यार कभी तकरार

रमोला और अक्षत के प्रेमविवाह को करीब 4 वर्ष हो चुके थे. दोनों की एक छोटी बेटी भी थी, पर ऐसा लगता था कि दोनों के बीच प्रेम कपूर बन उड़ गया हो. दोनों ही गरममिजाज थे. उन का झगड़ा कहीं भी कभी भी, किसी भी जगह शुरू हो जाता. जब दोनों गुस्से में होते तो उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहता कि वे किस के सामने झगड़ रहे हैं. जब वे एकदूसरे पर दोषारोपण कर रहे होते तो बेटी उन्हें सहमी सी देखती.

एक बार रमोला की मम्मी बेटीजमाई के घर गई हुई थी. आएदिन दोनों आदत के अनुसार उन के समक्ष भी बहस कर लेते. ज्यादातर बहस घरेलू कामों को ले कर होती थी. चूंकि रमोला भी नौकरी थी तो उसे लगता अक्षत उस की मदद करे. मगर अक्षत मनमौजी सा इंसान था. जब मन होता करता वरना हाथ नहीं बंटाता.

उन के घर के कलहयुक्त वातावरण से घबरा कर रमोला की मम्मी एक दिन बोल पड़ीं, ‘‘यदि नहीं पटती है तो दोनों अलग हो जाओ. जबरदस्ती साथ रह कर दुखी मत रहो. बच्ची पर भी इस का गलत असर पड़ रहा है.’’

‘‘पर पहले जरा यह सोचो कि एकदूसरे की किन खूबियों को देख कर तुम दोनों ने प्रेमविवाह किया था. हमें तो लगा था एकदूजे को पसंद करते होंगे पर तुम दोनों के व्यवहार से तो ऐसा नहीं लगता है. ऐसे में ?अच्छा है कि अलग ही हो जाओ.’’

फिर उन्होंने विपरीत मानसिकता से दोनों को हैंडल किया. कहना नहीं होगा कि उस के बाद दोनों के व्यवहार में एकदूसरे के प्रति संवेदनशीलता बढ़ी, दोनों एकदूसरे का ध्यान रखने लगे.

छोटीछोटी बातों पर झगड़ा

यहां तो खैर दोनों ही एक स्वभाव के थे और संयोग से बात बन गई पर कई बार एक नए जोड़े में कोई एक बहुत गुस्सैल स्वभाव का होता है. यह गुस्सैल व्यवहार किसी का भी हो सकता है. ऐसे व्यवहार वाले दूसरे पर हावी हो जाते हैं.  छोटीछोटी बातों पर उन का पारा गरम हो उठता है. ऐसे लोग अपने जीवनसाथी के प्रति बेहद कटु होते हैं. प्रेम, इज्जत, संवेदनशीलता इन के शब्दकोश से नदारद रहते हैं.

कई बार ऐसे पति या पत्नी दूसरों के समक्ष अच्छा व्यवहार करते हैं. दूसरों के प्रति भी उन का व्यवहार प्यारभरा रहता है. गुस्सैल जीवनसाथी 2 तरह के होते हैं. एक जो हमेशा अपने जीवनसाथी से नाराज रहते हैं और दूसरे वे जिन की नाराजगी अप्रत्याशित होती है. वे कभी भी तिल का ताड़ बनाने लगते हैं. माना कि जहां 2 बरतन रहेंगे वहां थोड़ीबहुत टकराहट तो होगी ही पर जब थोड़ी दोहराव कम हो और बहुत का ज्यादा तो बात चिंतनीय होती है.

रम्या और संदीप की शादी को 4-5 वर्ष होने को थे. रम्या पढ़ीलिखी युवती थी पर ससुराल वालों की इच्छा का सम्मान करते हुए उस ने नौकरी नहीं की और संयुक्त परिवार में तालमेल बैठाने की कोशिश करने लगी. संदीप की तो जैसे नाक पर गुस्सा बैठा रहता था. इकलौता होने के कारण बड़ा ही नकचढ़ा भी था. आएदिन खाने की थाली पटक देता तो कभी पार्टी में जाने को तैयार रम्या को बदसूरत कह देता. कभी औफिस की भड़ास निकाल देता. एकाध मौके पर संदीप ने रम्या पर हाथ भी उठा दिया था. उस पर रम्या की सास कहतीं, ‘‘मर्द है न, आखिर हक बनता है तुम पर. सहना तो हम स्त्रियों के हिस्से में लिखा है.’’

रम्या ने अपने व्यवहार से बहुत कोशिश की कि संदीप सम?ो कि वह उस के पैरों की जूती नहीं है पर संदीप पर इस का कोई असर नहीं होता. अंत रम्या ने चुपकेचुपके नौकरी के लिए आवेदन भेजना शुरू कर दिया और नौकरी लगने पर वह बिना किसी की आज्ञा लिए जाने लगी. आत्मविश्वास के साथसाथ उस ने प्रतिकार करना भी सीख लिया. अब खाने की थाली पटकने पर वह उसे साफ करना तो दूर दूसरा कुछ खाने के लिए भी नहीं पूछती और वहां से हट जाती.

विवाह की नींव

कुछ मनोरोगी ऐसे भी होते हैं जिन्हें क्षणिक आवेश में शक और नाराजगी का दौरा पड़ता है और फिर दूध के उफान की तरह उतर जाने पर पछतावा करते हैं और माफी भी मांगने लगते हैं. कई बार मैरिज काउंसलिंग या मनोचिकित्सकों से मिलने पर भी समस्या का समाधान मिल जाता है.

इस तरह हर जोड़े का अलग समीकरण होता है. हर की कहानी दूसरे से भिन्न होती है. कोई एक फौर्मूला नहीं है कि गुस्सैल जीवनसाथी से कैसे निबटा जाए. विवाहविच्छेद एक दुखद प्रक्रिया है. जहां तक संभव हो इसे टालना ही उचित है. मगर शादी के नाम पर जिंदगी को जहन्नुम बना कर ढोना भी बहुत गलत है.

विवाह की नींव आपसी प्यार और तालमेल पर टिकी होती है. 2 लोग चाहे वे पूर्वपरिचित हों या सर्वदा अपरिचित जब साथ रहने लगते हैं तो कुछ शुरुआती दिक्कतें आती ही हैं. कई बार शादी के कुछ सालों के बाद जब रोमांस का ज्वार उतरता है तो पार्टनर का एक अलग ही स्वरूप दिखने लगता है. इसीलिए कहा जाता है कि इतने कड़वे भी न बनो कि लोग थूक दें और इतने मीठे भी न बनो कि कोई निगल जाए.

क्या है डिप पाउडर मैनीक्योर? इसे घर पर ही कैसे करें?

हर महिला चाहती है की उसके हाथ काफी सुंदर और मेंटेन हुए दिखाई दें. हाथों की सुंदरता आपके नाखूनों पर निर्भर करती है. अगर आप नाखूनों को अच्छी शेप और अच्छी नेल पेंट से सजा कर रखती हैं तो आपके हाथों की लुक अपने आप ही पहले से थोड़ी अच्छी दिखने लगती है. इसके अलावा अगर आप मैनीक्योर की शौकीन हैं लेकिन हर महीने पार्लर में इतने सारे रुपए खर्चने से भी बचना चाहती हैं तो आपको घर पर ही डिप पाउडर के साथ मैनीक्योर करना सीख लेना चाहिए. यह पाउडर नेल पॉलिश के मुकाबले अधिक समय तक चलता है. आइए जानते हैं इसके बारे में.

क्या है डिप पाउडर मैनीक्योर?

इस तरह का मैनीक्योर एक रंगीन पाउडर और एक रेसिन के प्रकार की ग्लू के साथ किया जाता है. इससे आपका मैनीक्योर लंबे समय तक टिका रहता है. अगर आप गलती से अपने नाखूनों पर सोडा या ऐसी कोई चीज गिरा लेती हैं तो भी यह मैनीक्योर खराब नहीं होता है. यह मैनीक्योर आपको नाखूनों को अच्छे से साफ करता है और उन्हें मैनीक्योर होने के लिए तैयार करता है.

सबसे पहले आपके नाखूनों पर एक क्लियर बेस लगाया जाएगा. इसके बाद आपके नाखूनों को एक कलर पाउडर के डिब्बे में डुबोया जायेगा.

इससे निकालने के बाद आपके टेक्नीशियन आपके नाखूनों से एक्स्ट्रा पाउडर हटा कर उन पर रेसिन के जैसा ग्लू लगा देंगे. इस प्रक्रिया को आपके हर नाखून पर अलग अलग और कई बार लगाया जाता है.

इस मैनीक्योर में आपके नाखूनों को डैमेज करने वाले ज्यादा मजबूत केमिकल्स का प्रयोग नही किया जाता है. यह जेल मैनीक्योर के मुकाबले आपके नाखूनों के लिए ज्यादा अच्छा और लाभदायक रहता है.

क्या डिप पाउडर मैनीक्योर जेल मैनीक्योर से बेहतर है?

जेल और डिप पाउडर मैनीक्योर आपके नाखूनों को एक असली नाखून दिखने वाला लुक देते हैं जो एक्रेलिक नाखून नहीं दे पाते हैं. वैसे तो दोनों ही डिप और जेल नेल्स एक समान दिखते हैं लेकिन इनमें अंतर होता है.

जेल मैनीक्योर करवाने के बाद आपको एक बहुत भद्दी और तेज स्मेल आती है जो डिप पाउडर मैनीक्योर में नहीं आती है. डिप पाउडर मैनीक्योर में आपके नाखूनों को हार्ड करने के लिए यूवी एक्सपोजर नहीं दिया जाता है बल्कि आपके नाखून तुरंत सूख जाते हैं.

घर पर ही डिप पाउडर मैनीक्योर कैसे करें?

घर पर ही मैनीक्योर करने के लिए आपको निम्न सामान की जरूरत होती है :

नेल पॉलिश रिमूवर

क्यूटिकल पुशर

स्क्रैपर

नेल बफर

हैंड सैनिटाइजर और रबिंग अल्कोहल

नेल बेस कोट

डिप पाउडर मैनीक्योर किट जिसमें रेसिन ग्लू, कलर पाउडर और एक्टिवेटर हों.

प्रक्रिया

  • अपने नाखूनों को सबसे पहले नेल पॉलिश रिमूवर से साफ कर लें और क्यूटिकल्स को भी अन्दर की ओर पुश कर दें.
  • इसके बाद रबिंग अल्कोहल से अपने नाखूनों को सैनिटाइज कर लें.
  • इसके बाद अपने नाखूनों पर क्लियर बेस अप्लाई करें.
  • अब अपने नाखूनों पर रेसिन ग्लू लगाएं.
  • इसके बाद नाखूनों को पाउडर कंटेनर में डूबा कर रखें और कुछ समय बाद उंगलियों को निकाल कर अतिरिक्त पाउडर को साफ कर लें.
  • अब आप और अधिक रेसिन और कलर पाउडर का प्रयोग कर सकती हैं.
  • इसके बाद अब आप एक्टिवेटर का प्रयोग कर सकती हैं.
  • अब फ्रेश टॉप कोट का प्रयोग करें, अच्छे से नाखूनों को सूखने दें.

इसे मेंटेन करने के लिए आपको अपने नाखूनों की पॉलिश को हमेशा ठंडी हवा में ही सूखाना चाहिए. टॉप कोट को हमेशा बार बार अप्लाई करते रहना चाहिए.

जीडीपी में वृद्धि या आर्थिकअसमानता में

भारत सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ही नहीं, हमारे अर्थशास्त्री भी यह कहते नहीं अघाते कि भारत दुनिया की सब से तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है. इस में शायद संदेह न हो कि परसैंट यानी फीसदी में भारत तेजी से बढ़ रहा है पर यह आंकड़ा इस से समझ आ सकता है मान लीजिए एक कंपनी में एक मजदूर, जिसे 20 हजार रुपए महीना मिलता है, की वेतनवृद्धि 7 फीसदी होती है पर उस के मैनेजिंग डायरैक्टर, जिसे 14 लाख रुपए का मासिक वेतन मिलता है, की वेतनवृद्धि महज 2.5 फीसदी होती है, मजदूर से वही काम रुपयों में गिनेंगे तो मजदूर को हर माह में सिर्फ 1,400 रुपए मासिक ज्यादा मिलेंगे जबकि मैनेजिंग डायरैक्टर की आय 35 हजार रुपए बढ़ जाएगी. जो अंतर पहले 13 लाख 80 हजार रुपए का था वह बढ़ कर अब 14,13,600 रुपए का हो जाएगा.

भारत व चीन का उदाहरण सब से मौजूं है. कुल सकल उत्पादन को इंग्लिश में जीडीपी कहते हैं, वर्ष 2014 से 2015 के बीच चीन की जीडीपी भारत से 8,476 अरब डौलर से बढ़ कर 8,950 हो गई. वर्ष 1960 में दोनों देशों की जीडीपी का अंतर 22 अरब डौलर था. यह अंतर 1970 में बढ़ कर 30 अरब डौलर हो गया. वर्ष 1980 में यह अंतर किन्हीं कारणों से 5 अरब डौलर का रह गया पर वर्ष 1990 में यह अंतर 113 अरब डौलर का हो गया. वर्ष 2000 में यह अंतर 743 डौलर हो गया. और वर्ष 2010 में यह अंतर 4,412 अरब डौलर पहुंच गया. वहीं, वर्ष 2020 में भारत में ‘महान नेता’ के आगमन के बावजूद यह अंतर 12 हजार अरब डौलर का हो गया. और 2025, जबकि 5 ट्रिलियन डौलर की अर्थव्यवस्था का राग भारत में आलापा जा रहा है, में अनुमान है कि यह अंतर 18,282 अरब डौलर यानी 18 ट्रिलियन डौलर से ज्यादा का हो जाएगा.

यह है असल में ढोल की पोल. भारत तेजी से बढ़ रहा है पर यह गरीब की झोली में चंद रुपए ज्यादा आने से हो रहा है, जबकि, अमीरों को हजारों सिक्के एक्स्ट्रा मिल रहे हैं. क्या हम फालतू की बातें करना बंद करेंगे और फैक्ट्रियों के निर्माण की बात करेंगे, शायद नहीं.

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