बच्चों को अंधविश्वासी बनातीं दादी नानी की कहानियां

रवीना अपने 6 वर्षीय बेटे प्रख्यात के साथ शाम को घूम रही थी कि तभी उसके सामने से एक काली बिल्ली निकली जिसे देखकर प्रख्यात एकदम डर गया और घबराते हुए अपनी मां से बोला, “मां अब क्या होगा हमारे सामने से तो काली बिल्ली रास्ता काटकर चली गयी.”

“होगा क्या कुछ नहीं बिल्ली के निकल जाने से क्या होता है.”

“अरे आपको नहीं पता दादी कहतीं हैं कि यदि काली बिल्ली सामने से रास्ता काट जाती है तो बहुत अपशकुन होता है.”

प्रख्यात की ये बातें सुनकर रवीना एकदम परेशान हो गयी क्योंकि वह बिल्कुल भी नहीं चाहती थी कि इतनी कम उम्र में प्रख्यात किसी भी अंधविश्वास के चक्कर में पड़े. घर आकर उसने प्रख्यात को तो समझाया ही साथ ही अपनी सास को भी प्रख्यात को किसी भी तरह के अंधविश्वास वाली कहानियां न सुनाने को कहा.

वास्तव में क़िस्से कहानियां हमारे जीवन के अभिन्न अंग होते हैं मोबाइल और टी वी के आगमन से पहले कहानियां बच्चों को जीवन के मूल्यों को सिखाने और मनोरंजन का एक सशक्त माध्यम हुआ करतीं थीं, रात्रि को सोने से पहले अपनी दादी नानी से कहानी सुनना हर रात का बहुत महत्वपूर्ण काम होता था परंतु जैसे जैसे तकनीक का विकास होता गया वैसे वैसे क़िस्से कहानियों का अस्तित्व भी कम होता गया आज इस सबका स्थान मोबाइल फ़ोन और टी वी ने ले लिया है बच्चे से लेकर बड़े तक सभी लगभग ६ इंच के इस जादुई पिटारे में घुसे ही नज़र आते हैं जिससे न केवल उनकी आँखें बल्कि शरीर और मानसिक क्षमता भी बहुत अधिक प्रभावित हो रही है, बच्चों की क्रियाशीलता और रचनात्मक क्षमता ख़त्म होती जा रही है बच्चों के समुचित विकास के लिए उन्हें क़िस्से कहानियों से परिचित कराना तो अत्यंत आवश्यक है परन्तु सबसे जरूरी है कि उन्हें जो भी कहानियां सुनाई जाएं उनमें किसी भी अंधविश्वास, धार्मिक कुरीतियां, कपोल कल्पनाएं  और ढकोसले न हों क्योकि जो बच्चे आज सुनेगें वही आगे चलकर अपनाएंगे भी. अक्सर कहानियां सुनाते समय हम उन्हें धार्मिक, ऐतिहासिक पात्रों की कहानियां सुनाते हैं जिनमें कपोल कल्पनाएं और अनेकों अतार्किक घटनाएं होतीं हैं, बच्चे बहुत भोले और नादान होते हैं जिससे इन कहानियों के पात्र उनके मानस पटल पर अंकित हो जाते हैं और वे इन्हें ही सच मानना प्रारम्भ कर देते हैं इसलिए आवश्यक है कि उन्हें तार्किक वास्तविक घटनाओं पर देशभक्ति, विज्ञान और तकनीक पर आधारित ऐसी कहानियां सुनाई जाएं जो उनके व्यक्तित्व का विकास तो करें ही साथ ही समाज और धर्म के प्रति उनके दृष्टिकोण को भी तार्किक रूप से विकास करे.

बच्चों को कहानी सुनाने के  फ़ायदे

 1. रचनात्मक प्रतिभा का विकास

6 साल के अबीर को उसकी दादी हर दिन एक कहानी सुनातीं हैं, बचपन से अपनी दादी से कहानी सुनता आ रहा अबीर किसी भी घटना के आने से पूर्व ही क़यास लगाकर अपनी दादी को बताना शुरू कर देता है कि अब क्या होगा. वास्तव में बच्चे जब किसी भी कहानी को सुनते हैं तो वे मानसिक रूप से उसमें डूब से जाते हैं, उन्हें लगने लगता है कि मानो अमुक घटना बिल्कुल उनके सामने ही घटित हो रही है, यही नहीं कई बार वे स्वयं को ही उस घटना का पात्र भी समझने लगते हैं, सुनते समय वे कहानी के आगे आने वाले घटनाक्रम की कल्पना भी करने लगते हैं जिससे उनकी रचनात्मक प्रतिभा का विकास होता है और यही रचनाशीलता आगे चलकर उनके व्यक्तित्व और उनके स्टडी में भी परिलक्षित होती है.

2. वोकेबलरी होती है मज़बूत

“अरे तुम लोगों को नहीं पता कि आगरा का ताजमहल किसने बनवाया था, मैं बताता हूँ शाहजहाँ जो आगरा का राजा था वह अपनी पत्नी मुमताज़ महल को बहुत प्यार करता था और इसी की याद में उसने ताजमहल को बनवाया था जिससे उसका प्यार हमेशा ज़िंदा रहे।“ 1० साल का प्रवीर अभी कुछ दिनों पूर्व ही आगरा घूमने गया था जहां उसने अपने पापा से ताजमहल के बारे में सुना था और वही कहानी वह आज उसी शैली में अपने दोस्तों को सुना रहा था  वास्तव में कहानी एक ऐसा माध्यम है जिसे सुनते समय बच्चे अनेक शब्दों से परिचित होते हैं और कहीं न कहीं वे शब्द उनके अवचेतन मन में समा जाते हैं और फिर अक्सर बच्चे उन शब्दों का प्रयोग करते भी नज़र आते हैं कहानी से न केवल उनके शब्द ज्ञान बढ़ता है बल्कि वे वाक्यों को बनाना और यथोचित स्थान पर उनका प्रयोग करना भी सीखते हैं.

3. अच्छे श्रोता बनते हैं

दिन भर उछल कूद मचाने वाला, 1 मिनट भी कहीं पर चैन से न बैठ सकने वाला अमोल जब अपने पापा से हर रात कहानी सुनता है तो पूरी कहानी के दौरान अपनी जगह से हिलता तक नहीं है साथ ही कहानी के दौरान वह किसी को बीच में बोलने तक नहीं देता. वास्तव में जाने अनजाने कहानियां हमें एक अच्छा श्रोता बना देतीं हैं.  चूंकि कहानी सुनने के दौरान बच्चा बोलता कम और सुनता अधिक है इससे उसमें बचपन से ही एक अच्छे श्रोता के गुणों का विकास हो जाता है जो भविष्य में उसके व्यक्तित्व लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है कहानी को ध्यानपूर्वक सुनने के कारण उनमें चीजों पर ध्यान देने की क्षमता का विकास होता है.

 4. जीवन मूल्यों का विकास

किसी भी कहानी के ज़रिए हम बच्चों को विभिन्न धार्मिक, नाश्ते रिश्ते और देशभक्ति जैसे पात्रों से परिचित करा पाते हैं जिससे वे उनके केरेक्टर की अच्छाइयों से परिचित होते हैं और कहीं कहीं उनके केरेक्टर को जीने की भी कोशिश करते हैं कहानियों के ज़रिए हम अपने बच्चों को मनचाहे जीवन मूल्य और नैतिक शिक्षा देने में सफल हो पाते हैं.

 5. इतिहास और संस्कृति का ज्ञान

बच्चों के पास आजकल अपना कोर्स ही इतना अधिक होता है कि उनके पास अलग से कुछ भी पढ़ने का समय ही नहीं होता परंतु कहानियों के माध्यम से हम उन्हें इतिहास और संस्कृति से भली भाँति परिचित करा सकते हैं. इतिहास की घटनाएं बताते समय उन्हें धार्मिक भेदभाव वाली कहानियां सुनाने से बचने का प्रयास करें.

 6. अध्ययन में मददगार

कहानियाँ बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में सहायक तो होती ही हैं साथ ही वे उनके अध्ययन में भी बहुत अधिक मददगार होतीं हैं वे इनके माध्यम से वे निबंध, और विभिन्न प्रश्नों के उत्तरों को अपनी कल्पनाशीलता, वाक्य विन्यास और रचनात्मक क्षमता से लिखने में सक्षम हो पाते हैं.

 7. ज्ञान में वृद्धि

कहानियों के विषय चूंकि मानव, पशु पक्षी, जीव जन्तुओं आदि से सबंधित होते हैं और कहानी सुनते समय बच्चे इनसे परिचित हो जाते हैं जिससे उनके विविध विषयों के ज्ञान में वृद्धि होती है और यह ज्ञान उन्हें उनकी शिक्षा और जीवन में काम आता है.

रखें इन बातों का भी ध्यान

1-बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार कहानियां सुनाने का प्रयास किया जाना चाहिए उदाहरण के लिए 5 वर्ष तक के बच्चों के लिए अमर चित्र कथा, चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट की पुस्तकें और चंपक जैसी विविध चित्रों वाली पत्र पत्रिकाओं का चयन करें और इन्हें दिखाकर बच्चों को कहानियां सुनाने का प्रयास करें चित्रों के माध्यम से बच्चों को पुस्तकों से लगाव तो उत्पन्न होगा ही साथ ही उन्हें कहानी सुनना भी रुचिकर लगेगा.

2-यदि आप बिना किसी पत्र पत्रिका की मदद के भी बच्चों को कहानी सुना रहे हैं तो ध्यान रखें कि कहानी छोटी और मनोरंजक हो जिससे बच्चा आपसे बार बार कहानी सुनना चाहे.

3- किसी भी उम्र के बच्चे को कहानी सुनाते समय मोबाइल और टी वी को स्वयं से दूर रखें जिससे बच्चे के साथ आपका भावनात्मक जुड़ाव भली भाँति हो सके.

4-बच्चे से बीच बीच में कहानी में आगे क्या होगा, या अमुक पात्र ने ऐसा क्यों किया, क्या उसे ऐसा करना चाहिए था जैसे प्रश्न अवश्य पूछें जिससे आप बच्चे की मानसिकता को समझ सकें.

5-कहानी के अंत में बच्चे से यह अवश्य पूछें कि इस कहानी से उसने क्या सीखा जिससे आप यह जान सकें कि कहानी को बच्चा कितना समझ पा रहा है.

6-आजकल विभिन्न प्लेटफॉर्म हैं जहां पर कहानियां सुनाई जातीं हैं..और कुछ अभिभावक अपने मोबाइल में कहानी चलाकर बच्चों के समक्ष रख देते हैं परन्तु इस तरह कहानी सुनाने की अपेक्षा आप स्वयं बच्चों को कहानी सुनाएं जिससे बच्चों से आपकी भावनात्मक बॉन्डिंग तो मजबूत होगी ही साथ ही आप बच्चों को उचित शिक्षा भी समझा पाएंगे.

भले ही आज मोबाइल, टी वी और सोशल मीडिया जैसे अनेकों साधन आम जनमानस के समक्ष मौजूद हों परन्तु कहानियों के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता. बच्चों की मोबाइल पर बढ़ती निर्भरता को कम करने के लिए और उनके व्यक्तित्व के समुचित विकास के लिए  उन्हें किस्से कहानियों से जोड़ना तो अत्यंत आवश्यक है परन्तु साथ ही उन्हें धार्मिक रूप से अंधविश्वासी बनने से बचाना  भी आवश्यक है.

AI टैक्नोलौजी का भविष्य भरोसेमंद नहीं

पिछले कई सालों से आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस पर चर्चा हो रही है. इंटरनैट देश और दुनिया में तेजी से तरक्की कर रहा है जिस के साथसाथ नईनई टैक्नीकों का भी तेजी से विकास हो रहा है. आजकल एआई का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर भी जोरोशोरों से हो रहा है. कंटैंट बनाना, आर्टिकल लिखना, कहानियां लिखना, किसी घटना विशेष के बारे में बताना. सब एआई से पौसिबल है.

इंस्टाग्राम रील और यूट्यूब वीडियोज बनाने में भी एआई का इस्तेमाल किया जा रहा है. आप वैब सर्च में एआई वीडियो या रील मेकल डाल कर देखिए, कितने ही रिजल्ट आ जाएंगे एआई की मदद से रील बनाने के.

एआई प्रोग्राम मिडजर्नी की सहायता से ऐसी तसवीरें तैयार की जा सकती हैं जिन का विश्वास करना मुश्किल है क्योंकि वह एक फोटोग्राफ की तरह ही लगती है. जौस एवरी जोकी एक फोटोग्राफर हैं, ने मिडजर्नी की सहायता से कितने लोगों को बेवकूफ बनाया.

एआई की मदद से किसी के चेहरे पर किसी का चेहरा लगाया जा रहा है. टैक्नीक इंप्रूवमैंट में शामिल कंपनियां आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस की मदद से आएदिन कोई न कोई नई तकनीक बाजार में उतार देती हैं. आइए जानते हैं इस के बारे में.

क्या है आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस

यह तकनीक किसी मनुष्य की तरह आप के सवालों के जवाब देती है और काम करती है. आप ने कंप्यूटर पर शतरंज का खेल तो खेला ही होगा. उस में भी आप की एक चलने के बाद जो चाल कंप्यूटर चलता है वह आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस का ही एक हिस्सा है. ऐसे ही गूगल असिस्टैंट, ऐलैक्सा और सिरी वाइस असिस्टैंट भी इस के अच्छे उदाहरण हैं.

सन 1955 में अमेरिकी कंप्यूटर वैज्ञानिक जौन मैकार्थी ने मशीनों को स्मार्ट बनाने की इस टैक्नीक को आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस का नाम दिया था. तब से इंसानों की जरूरतों को पूरा करने की सम?ा लगातार मशीनों में विकसित करने की कोशिश की जा रही है. यूके स्थित इंजीनियर्ड आर्ट्स द्वारा बनाया गया ह्यूमनौइड रोबोट अमेका एआई तकनीक का सब से बड़ा उदाहरण है, जिस में मानव जैसे गुण डाले जा रहे हैं और ये सब से एडवांस रोबोट में से आता है.

एआई की दुनिया

आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस दुनिया की श्रेष्ठ तकनीकों में से एक है ऐसा कहा जाता है परंतु हर तकनीक के फायदे और नुकसान होते हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

80 के दशक में आई जेम्स कैमरून द्वारा निर्देशित हौलीवुड फिल्म ‘द टर्मिनेटर’ (1984) जिस में अर्नोल्ड श्वार्जनेगर ने एक रोबोट की भूमिका अदा की थी जो दुनिया को बचाने के लिए भविष्य से आता है.

यह फिल्म मशीनों से मशीनों की लड़ाई पर केंद्रित है जिस में इंसान एक असहाय पीडि़त सा दिखाई देता है. आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस मशीनों को इंसान बनाने के काम कर रहा है. यह समस्या अभी दूर है लेकिन आने वाले भविष्य में मशीनें इंसान की जगह ले लेंगी इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता.

इसी दिशा में काम कर रहे वैज्ञानिकों द्वारा मशीनों का दिमाग विकसित किया जा रहा है. मानव रोबोट अमेका जिस का जिक्र ऊपर किया गया है, डब्ड अल्टर 3, ्नक्त्ररू्नक्त्र-6 को ही ले लीजिए.

वर्तमान में भी मशीनें इंसानों की जगह ले रही हैं, जिस में आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस सब से बड़ा सहायक बन कर सामने आता है. मशीनों से जो बड़ी मात्रा में उत्पादन संभव हुआ है वह इस की वजह से ही है. सहयोगात्मक रोबोट, जिन्हें कोबोट भी कहा जाता है – मानव के साथ हाथों के एक अतिरिक्त सैट के तौर पर काम करते हैं.

फायदे हैं तो नुकसान भी

एआई के आने के बाद धीरेधीरे नौकरियों की संख्या लगातार गिरने लगी है और ऐसा आने वाले समय मे भी जारी रहेगा. संभावना है कि आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस टैक्नीक और भी नौकरियों की संख्या में कमी करने वाली है. जैसे कंटैंट क्रिएशन, फिल्म मेकिंग, ग्राफिक डिजाइनिंग आदि.

बड़ीबड़ी कंपनियां अब इस के लिए एआई के एक्सपर्ट को रखने लगे हैं जिस से सालों का अनुभव रखने वाले कलाकारों का रोजगार खतरे में पड़ गया है. आप जो भी बोलें जैसे भी तस्वीर या लेख चाहें केवल आप के सवाल टाइप कर देने भर से इंटरनैट पर मौजूद सैकड़ों एआई वैबसाइट्स मिनटों में आप को इस के परीणाम दे देंगी.

इस से आने वाले समय में नौकरियां और भी कम हो जाएंगी. इसी खतरे को देखते हुए इसी साल 2023 की शुरूआत में हौलीवुड में हजारों एक्टर्स एआई के खतरे के खिलाफ एसएजी-एएफटीआरए द्वारा रखे गए विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए क्योंकि अभिनेता बिना अनुमति के एआई की मदद से अपनी तसवीरों का उपयोग करने के हौलीवुड के प्रयासों के खिलाफ थे और लेखक स्क्रीनप्ले लिखने में एआई के इस्तेमाल के खिलाफ पहले से ही हड़ताल पर थे.

आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस का दुरूपयोग भी उतने ही आसान तरीके से किया जा सकता है जितने आसान तरीके से इस का उपयोग. इस पर कोई सैंसरशिप नहीं है जो इस पर निगरानी रखता हो.

यह किसी तरह की गाइडलाइंस का पालन नहीं करता. इस्तेमाल करने वाले को जो भी चाहिए यह अलादिन के चिराग कि तरह उसे दे देता है. चाहे वह सही हो या गलत.

स्कूलों में एआई का इस्तेमाल हो रहा है नौर्मल सी बात है. यह बच्चों के सोचने और सम?ाने की ताकत पर असर डालेगी. बच्चों की क्रिएटीविटी पर इस से असर पड़ेगा. आजकल कितने ही ऐप प्लेस्टोर पर उपलब्ध हैं, जैसे चैटजीपीटी, बिंग, एआई चैटबोट जो किसी भी विषय के बारे में आप को पैराग्राफ से ले कर आर्टिकल तक लिख कर दे देंगे.

एआई की सहायता से साइबर क्राइम बढ़ने की संभावनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता. आजकल एक नागरिक की सारी जानकारी को एआई की सहायता से ढूंढ़ना कोई बड़ी बात नहीं है. किसी के चेहरे पर किसी का चेहरा लगा कर दस्तावेजों में गड़बड़ी की जा सकती है. उन तसवीरों का गलत और आपराधिक इस्तेमाल में लिया जा सकता है.

एआई कामों को आसान तो बना ही सकती है लेकिन इस के नैगेटिव असर को नकारा नहीं जा सकता. इस के लिए इस पर नजर रखना भी जरूरी है ताकि यह भविष्य में इंसानों के सिरर्दद का कारण न बन जाए.

सांप काटने से आखिर मौत अधिक क्यों होती है, जाने डॉक्टर दम्पति से

पिछले साल की आंकड़े इस दिशा में चौकाने वाले है, जब भारत में सांप के काटने से हर साल 64000 व्यक्तियों की मृत्यु हो जाती है. खासतौर पर वेस्टर्न घाट्स के एरिया में कई जहरीले प्रजाति के सापों की भरमार है, ऐसे में वहां काम करने जाने वाले आदिवासियों और ग्रामीणों जिनमे खासकर महिलाये और बच्चे होते है, उन्हें कई बार विषैले सांप काट लेते है, ऐसे में उन्हें जितनी जल्दी हो सके डॉक्टर के पास जाना जरुरी होता है. असल में सांप के काटने पर अधिकतर मौतें डर से होती है, लेकिन अगर इसका सही इलाज़ मिल जाए तो व्यक्ति पूरी तरह स्वस्थ हो जाता है.

इसी मकसद को ध्यान में रखते हुए महाराष्ट्र के नारायण गांव के डॉक्टर सदानंद राउत और उनकी पत्नी डॉक्टर पल्लवी राउत ने जहरीले सांप के काटने के इलाज आज से 35 साल पहले अपने गांव में शुरू किया और आज उनके गांव में सांप के काटने से मृत्यु दर शून्य हो चुका है, जो काबिलेतारीफ है, जिसके लिए उन्हें कई पुरस्कार भी मिला है, कैसे उन्होंने इस पर विजय पाई है. आज तक दोनों ने 6000 से अधिक लोगों की जान सांप के जहर उतारकर बचाई है. कैसे करते है वे आइये जानें.

सांप काटने के इलाज के बारें में पूछने पर डॉक्टर सदानंद कहते है कि मैं वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाईजेशन (WHO) और नेशनल प्रोटोकोल ट्रीटमेंट गाइडलाइन्स के आधार पर इलाज करता हूँ, इसमें ‘एंटी स्नेक वेनम’ जितनी जल्दी हो सके रोगी को देता हूँ, इसके अलावा बाकी जो भी इमरजेंसी लक्षण रोगी में दिखते है, उसके आधार पर इलाज करता हूँ. न्यूरोटोक्सिक स्नेक बाईट में अधिकतर वेंटिलेटर,  शॉक मेनेजमेंट, आदि देना पड़ता है. इसमें रोगी की हार्ट बीट स्लो हो जाती है और पूरे शारीर में ब्लीडिंग होने लगती है. कई बार आँखों में भी ब्लीडिंग होती है.

इस संकल्प को लेने के बारें में उनका कहना है कि मैं एक कंसलटेंट फिजिशियन हूँ, पुणे के ‘केइएम्’ हॉस्पिटल में मैंने पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. इसके बाद मैंने साल 1992 में नारायण गांव में प्रैक्टिस शुरू किया. आदिवासी बहुल कस्बे में  उनकी सेवा करने के मकसद से मैंने उस इलाके को चुना था. पहले वहां किसी प्रकार की क्रिटिकल बीमारी की इलाज़ की कोई साधन नहीं था. शुरू में किसी भी क्रिटिकल पेशेंट को सिटी हॉस्पिटल पुणे या सरकारी अस्पताल में रेफर करना पड़ता था, क्योंकि कोई आप्शन नहीं था. तब सरकारी अस्पताल भी ऐसे सांप के काटने वाले रोगी का इलाज नहीं करते थे. फिर उन रोगी को पुणे ले जाना पड़ता था, जो यहाँ से करीब 80 किलोमीटर पर है. यहाँ पर अधिकतर 50 से 100 किलोमीटर की परिधि में आदिवासी और दूर – दराज क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिको को सांप काटते है और वहां से उन्हें अस्पताल पहुँचने में 3 से 4 घंटे लगते थे. तब सड़के ठीक नहीं थी, आवगमन के साधन नहीं थे, रोगी को जीप या खुद किसी वाहन पर ले जाना पड़ता था. जिससे अधिकतर मरीज अस्पताल पहुँचने के पहले ही दम तोड़ देते थे. फिर लोगों ने मुझे ऐसे क्रिटिकल मरीजों की इलाज़ के बारें में पूछने लगे. मैंने पहले 5 साल इंटेंसिव केयर यूनिट पुणे में काम कर चुका था, इसलिए मैंने इस दिशा में काम करने का मन बनाया.

बहुत कम तकनिकी संसाधन

डॉक्टर सदानंद आगे कहते है कि उस समय मॉडर्न यंत्रों की बहुत कमी थी, इसमें मेरी पत्नी डॉक्टर पल्लवी राउत भी हाथ बटाने लगी. ट्रेंड स्टाफ की कमी होने की वजह से हम दोनों दिन – रात मरीजों की देखभाल करने लगे. वहां सांप के काटने से परेशान मरीज़ भी आने लगे, लेकिन इतने कम तकनिकी संसाधन में काम करना मुश्किल हो रहा था. तब एंटी स्नेक वेनम भी केवल सरकारी अस्पतालों में मिलता था. बिजली बहुत कम समय तक रहती थी, ऐसे में हम दोनों को मरीज के पास लगातार बैठना पड़ता था और उनके कंडीशन को मोनिटर करना पड़ता था. मैंने सारी समस्याओं के साथ ही स्नेक बाईट के रोगी का इलाज़ करने लगा.

मिली प्रेरणा  

इस काम को करने का उद्देश्य दोनों को तब मिला, जब एक दिन एक 8 साल की लड़की को उसके परिवारजन लेकर आये, जिसे कोबरा सांप ने काटा था और 20 मिनट के बाद ही वह मुझ तक पहुंची थी, लेकिन उसकी मृत्यु हो चुकी थी. इसके बाद से उन्होंने स्नेक बाईट के रोगी को सीरियसली इलाज करने का संकल्प लिया, जिसमे ऑक्सीजन सिलिंडर और मिनिमम उपकरणों जो भी उनके पास थे, उससे इलाज शुरू किया, लेकिन ग्रामीण इलाकों में अन्धविश्वास बहुत अधिक है, ग्रामवासी उनके इलाज को सही नहीं समझते थे, वे तांत्रिक और झांड- फूंक वाले को अस्पताल में छुपाकर लाने लगे थे. वे कहते है कि ऐसे में अगर रोगी ठीक हो जाता था तो उसकी क्रेडिट तांत्रिक को और अगर कुछ गलत हुआ तो उसका खामियाजा मुझे भोगना पड़ता था, लेकिन मैंने उस बात पर बिना ध्यान दिए ही इलाज़ करता रहा.

किये जागरूकता अभियान

इसके बाद मैंने गांव के लोगों को प्रशिक्षित करने के लिए वर्कशॉप करने लगा.करैत सांप के काटने पर रोगी 2 सप्ताह तक डीप कोमा में जा सकता है और रोगी को वेंटिलेटर पर रखना पड़ता है, लेकिन ग्रामवासी सोचते थे कि मैं पैसे बनाने के लिए वेंटिलेटर पर रख रहा हूँ, इसलिए ग्रामीण युवा को शिक्षित करना जरुरी था. फिर मैंने मशीन पर उनके पल्स रेट को दिखाकर उन्हें समझाता रहा. धीरे – धीरे अन्धविश्वास में कमी आई, जब उन्होंने लाइफ सपोर्ट को अपनी आँखों से देखा. मुझे भी स्नेक बाईट के प्रोटोकोल को सीखना पड़ा. इसके लिए मैंने इंटरनेशनल डिगनेटरीज के साथ संपर्क किया और इन्टरनेट के सहारे उन्हें स्नेक बाईट के सारे क्लिनिकल डिटेल को बताता रहा. ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट प्रमुख सर डॉक्टर डेविड वारेन ने उन क्लिनिकल डिटेल के आधार पर  इलाज के लिए एडवाइस करते रहे और ऐसा करीब 2 से 3 साल तक चला. फिर वे मेरे अस्पताल में भी आये और मैंने स्नेक बाईट से ठीक हुए 150 लोगों के समूह को इकट्ठा किया, उनसे मिलकर सभी खुश हुए. सभी ने उनसे स्नेक बाईट के बाद किसी की मृत्यु न हो, उसके बारें में जानना चाहा,क्योंकि इसमें प्रिवेंटिव वर्क को जानना काफी जरुरी होता है.

क्या कहती है आंकड़े

वर्ष 2000 से 2019 के आंकड़े बताती है कि विश्व में 50 से 60 लाख स्नेक बाईट हर साल होते है, जिसमे 28 लाख लोग बच जाते है. 80 हज़ार से एक लाख हर साल मृत्यु हो जाती है. भारत में 20 से 25 लाख स्नेक बाइट्स होते है, जिसमे 12 लाख की मृत्यु हो जाती है. 80 प्रतिशत ग्लोबल डेथ मध्य प्रदेश, उड़ीसा, झाड़खंड, बिहार, राजस्थान ,गुजरात, आंध्र प्रदेश महाराष्ट्र आदि में होता है. वर्ल्ड हेल्थ ओर्गानाईजेशन (WHO)  ने 2017 से स्नेक बाईट को सबसे अधिक नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिसीज माना है

पूरे विश्व में 4 लाख लोगों को कोबरा और रसेल वाइपर स्नेक बाईट से ठीक होने के बाद कृत्रिम अंग लगाना पड़ता है, इसके अलावा क्रोनिक बीमारी जिसमे किडनी फैल्योर, पैरालिसिस, महिलाओं में हार्मोनल समस्या आदि होती है. मेरे अस्पताल में मैंने प्रिवेंशन के द्वारा कम किडनी फेल और किसी का भी अंग ख़राब नहीं हुआ. नार्थ ऑफ़ पुणे के 13 रीजन, पुणे, अहमद नगर और ठाणे जिला के ये फार्म लेबरर्स, जो सालभर सोयाबीन, मूंगफली और गन्ने के फसलों की खेती में काम करते है, ये आदिवासी श्रमिक बच्चे और महिलाएं जिनकी आयु 20 से 40 तक होती है. उन्हें स्नेक बाईट का अधिक शिकार होना पड़ता है.

समस्या अन्धविश्वास की

शुरू में 10 साल का एक बच्चा जब डॉक्टर सदानंद के पास करैत सांप के काटने पर कोमा की स्थिति में आया, तो उसे 6 दिनों वेंटिलेटर में रखने के बावजूद उसे होश नहीं आया. उसके दादा और गांव के बड़े बुजुर्ग उस बच्चे को मृत समझ रहे थे और अस्पताल से ले जाना चाहते थे. डॉक्टर ने उसके परिवार के युवा को बुलाकर मोनिटर दिखाया और समझाया कि बच्चे का हार्ट चल रहा है और वह जीवित है. 10 दिन बाद बच्चे की आँखों की पुतली हिली और 13 दिन में वह बच्चा ठीक हो गया. सदानंद कहते है कि मैने कभी भी झाड़ – फूंक करने वालों को नहीं रोका, उन्हें करने दिया और मैं मेडिकल ट्रीटमेंट करता रहा, क्योंकि गांववालों को समझाना मुश्किल था और अधिक मना करने पर वे रोगी को उठा ले जा सकते थे, जिससे मेरा इलाज नहीं हो पाता. आज वे इसे समझ चुके है.

‘जीरो स्नेक बाईट डेथ’ मिशन

डॉक्टर आगे कहते है कि इसके बाद छोटे – छोटे ट्राइबल गांवों में स्कूल्स, कॉलेजेस, युवाओं और संस्थाओं के सारे हेड को स्नेक बाईट जागरूकता अभियान में शामिल किया. लोग भी इसमें सहयोग देने लगे, क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि ये लाइफ सेविंग मूवमेंट है. अब वे मेरे इलाज पर विश्वास करने लगे थे. उन्हें समझ में आ गया था कि सांप कितना भी जहरीला हो काटने के तुरंत बाद में अस्पताल ले आने पर उन्हें बचाया जा सकता है. इसके बाद मैंने ‘जीरो स्नेक बाईट डेथ मिशन शुरू किया. इसमें मेरे ज्ञान और लोगों की जागरूकता से ये सफल हो गया है. इस तरह से जुन्नर और अम्बेगांव आदिवासी क्षेत्र में अब सांप के काटने से किसी की मृत्यु नहीं होती. अभी मैंने इलाज में जरुरत के उपकरण अस्पताल में शामिल कर लिया है. धीरे – धीरे अब मेरे पास एक स्नेक बाईट की यूनिट तैयार हो चुकी है.

जागरूकता अभिनयान के अलावा पूरे देश में डॉक्टर्स के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम भी मैंने शुरू किया है. पुणे जिले के 3500 आशा वर्कर्स, कम्युनिटी हेल्थ वर्कर्स,  पब्लिक आदि को मैंने जागरूकता की ट्रेनिंग दिया है. इसमें विषैले और गैर विषैले सांप काटने के लक्षणों के बारें में जानकारी, स्नेक बाईट की रोकथाम, प्राइमरी इलाज, क्या करें और क्या न करें आदि की जानकारी देता हूँ.

जाने साँपों की प्रजाति

हमारे देश में करीब 270 प्रजाति की सांप है, उनमें केवल 4 अधिक जहरीले होते है, जबकि बाकी सांप गैर जहरीले होते है. इन 4 सापों को बिग फ़ोर्स कहा जाता है.

इसमें इंडियन कोबरा और कॉमन करैत न्युरोटोक्सिक होते है, जो बहुत अधिक विषैले होते है, ये अधिकतर नर्वस सिस्टम को प्रभावित करते है, कोबरा बाईट में लक्षण 2 से ढाई घंटे बाद दिखता है, इससे रोगी को पता नहीं चलता और तुरंत उसकी मृत्यु हो सकती है.

कोबरा बाईट के लक्षण

  • धुंधला दिखना
  • डबल विजन
  • स्नेक के काटे हुए स्थान पर बहुत दर्द होना,
  • निगलने, बात करने और साँस लेने में कठिनाई
  • पूरे शरीर में लकवा मार जाना, शरीर में ऐठन, गैंग्रीन का होना आदि

करैत बाईट अधिकतर रात के 12 बजे से सुबह 5 बजे तक के बीच में होता है, जब लोग रात को नीचे जमीन पर सो रहे होते है, ऐसे में अपने शिकार की तलाश में ये सांप बेड पर चढ़ जाता है और काटता है. इसमें पहले लक्षण पता नहीं चलता, ब्लीडिंग और सूजन न होने की वजह से व्यक्ति चीटीं या चूहा काटने को समझते है और ध्यान नहीं देते. 2 से 3 घंटे बाद रोगी के पेट में दर्द के साथ उलटी और पसीना छूटने लगता है. फिर धीरे – धीरे साँस लेने में कठिनाई के साथ – साथ रोगी कोमा में चला जाता है, जिससे मृत्यु हो जाती है. ये अधिकतर बच्चों और महिलाओं के साथ होता है.

रसेल वाइपर और सॉ स्केल्ड वाइपर ये दोनों भी बहुत ही विषैले होते है.

लक्षण

  • सांप काटने के स्थान पर बहुत अधिक दर्द का होना,
  • काटे हुए स्थान के अलावा पूरे शारीर में सूजन और छाले का बनना
  • पूरे शरीर के अंदर में ब्लीडिंग का होना,
  • किडनी फैल्योर का होना आदि

इसके अलावा थोडा कम जहरीला सांप ‘बांबू पिट वाइपर’ है, ये अधिकतर वेस्टर्न घाट में पाया जाता है. इसमें स्नेक बाईट वाले स्थान पर सूजन के अलावा ब्लीडिंग डिस्टरबेंसेस भी होते है. इसके इलाज में एंटी स्नेक वेनम अधिक उपयोगी नहीं होता, लक्षण के आधार पर ऐसे मरीज का इलाज किया जाता है.

एक – एक सेकंड हैं महत्वपूर्ण  

डॉक्टर सदानंद कहते है कि विषैले सांप के काटने से अधिकतर कार्डिएक अरेस्ट होता है, जो एक मिनट के अंदर ही हो जाता है. ऐसे मरीज को जल्द से जल्द डॉक्टर तक पहुँचाने और इलाज शुरू होना चाहिए. अधिकतर लोगों की मृत्यु अस्पताल पहुँचने से पहले ही हो जाती है, इसलिए किसी तांत्रिक या झाड़ – फूंक वाले के पास न जाकर तुरंत उन्हें पास के किसी भी अस्पताल और डॉक्टर के पास ले जाने की जरुरत होती है. यही हमारी जागरूकता अभियान का विषय होता है, जिसमे मैंने आसपास के सभी डॉक्टर्स को ट्रेनिग दी है, ताकि वे अपने पास के डॉक्टर से प्राथमिक इलाज लेकर ही मेरे पास आये. मैं फ़ोन पर डॉक्टर्स को गाइड करता हूँ.

सांप के काटने पर क्या करें

सांप के काटने पर देखे कि वह विषैला है या नहीं,

  • व्यक्ति के डर को भगाए,
  • रोगी को एक निश्चित स्थान पर बैठाकर रखे,
  • स्नेक बाईट वाले स्थान की स्थिति हार्ट के लेवल से नीचे हो इसका ध्यान रखें,
  • जितनी जल्दी हो रोगी को डॉक्टर तक किसी भी साधन से पहुंचाएं,

डॉक्टर के पास पहुँचने से पहले उन्हें इसकी जानकारी फ़ोन पर दें ताकि डॉक्टर पूरी तरह से इलाज के लिए तैयार रहे, क्योंकि उस वक्त एक सेकंड भी कीमती होता है,

क्या न करें

  • सांप को कभी न मारें,
  • स्नेक बाईट वाले स्थान को बंधे या काटे नहीं,
  • तांत्रिक या झाड़ – फूंक वाले के पास जाकर समय बर्बाद न करें,
  • सांप की तस्वीर मोबाइल में ले लें, अगर संभव न हुआ, तो लक्षणों के आधार पर इलाज किया जाता है,
  • ब्लड क्लोटिंग की जाँच पहले की जाती है और इसके लिए मरीज से खून लेकर 20 WBCT टेस्ट किया जाता है.

इलाज महंगा है, किसी प्रकार का फण्ड नहीं मिलता है, हम दोनों चैरिटेबल वर्क करते है, ये हमारा मिशन है. 30 साल की इलाज के बाद आज एक्सपोजर मिला है और उम्मीद है कुछ सहयोग मिलेगा ताकि अधिक अच्छा इलाज मैं इन गरीब ग्रामीण आदिवासियों को दे सकूँ.

जरुरी रोकथाम  

  • गम शूज पहनना,
  • पूरे शरीर ढके हुए कपडे पहनना,
  • घास पर काम करने से पहले छड़ी का प्रयोग करना,
  • सही रस्ते पर चलना, जंगल के बीच से नहीं,
  • रात में काम करते वक़्त बैटरी और स्टिक का करें प्रयोग करना,
  • जमीन पर न सोना,
  • मच्छरदानी का प्रयोग करना,
  • घरों को साफ रखना, ताकि चूहे अंदर न रहे,

आसपास के पेड़ों की छटाई करते रहना, ताकि खिड़की के पास की टहनियों से सांप कमरे में न आ सकें आदि.

सर्दियों में शरीर को गर्म रखेंगे ये हैल्दी सूप

सर्दियों का मौसम सेहत बनाने का मौसम होता है क्योंकि इन दिनों में हमारे पाचन तंत्र काफी दुरुस्ती से अपना कार्य करता है और हमारे द्वारा खाये जाने वाले भोजन को आराम से पचा देता है. इन दिनों में चूंकि ठंड बहुत होती है इसलिए शरीर को कुछ गर्म पदार्थों की आवश्यकता होती है जिससे हमारा शरीर गर्म रह सके इसी तारतम्य में हम आज आपको कुछ सूप बनाना बता रहे हैं जिन्हें घर की सामग्री से ही बड़ी आसानी से बनाया जा सकता है. सूप काफी सेहतमंद होते हैं क्योंकि इन्हें बनाने में मात्र 1 टीस्पून तेल का प्रयोग किया जाता है दूसरे भोजन से पूर्व इन्हें पी लेने से हमारी जठराग्नि जाग्रत हो जाती है जिससे खुलकर भूख लगती है तो आइए देखते हैं कि इन्हें कैसे बनाया जाता है.

  1. पम्पकिन सूप

कितने लोगों के लिए-    4

बनने में लगने वाला समय  –   20 मिनट

मील टाइप  –  वेज

सामग्री

पीला कद्दू  250 ग्राम

अदरक  1/4 टीस्पून

बारीक कटी मिर्च  2

काला नमक   1/4 टीस्पून

काली मिर्च पाउडर   1/4 टीस्पून

तेल 1 टीस्पून

मैथी दाना  1 चुटकी

चीनी 1 चुटकी

हल्दी पाउडर  1/8 टीस्पून

बारीक कटे पोदीना पत्ते   2-3

लाल मिर्च पाउडर 1/4 टीस्पून

विधि

गर्म तेल में मेथी दाना, हल्दी पाउडर डालकर कटा कद्दू डाल दें. नमक और 1/2 कप पानी डालकर ढककर कद्दू के गलने तक पकाएं. जब कद्दू गल जाए तो गैस बंद कर दें और इसे ठंडा होने दें. जब कद्दू पूरी तरह ठंडा हो जाये तो इसे मिक्सी में ग्राइंड कर लें. अब इस पिसे मिश्रण को पैन में डाल कर काली मिर्च पाउडर, काला नमक, चीनी डाल दें. 1 कप पानी मिलाकर 3-4 उबाल लें लें. नीबू का रस, कटा पुदीना और लाल मिर्च पाउडर  डालकर ब्रेड टोस्ट के साथ सर्व करें.

2. वेजिटेबल लेंटिल सूप

कितने लोगों के लिए  –  4

बनने में लगने वाला समय  -20 मिनट

मील टाइप  –  वेज

सामग्री

मूंग की धुली दाल   1 टेबलस्पून

लाल मसूर दाल  1 टेबलस्पून

बारीक कटी गाजर  1 टीस्पून

बारीक कटी शिमला मिर्च  1 टीस्पून

बारीक कटा टमाटर   1 टीस्पून

मटर के दाने  1 टीस्पून

हल्दी पाउडर   1/8 टीस्पून

नमक  स्वादानुसार

हींग 1 चुटकी

घी  1/2 टीस्पून

बारीक कटा हरा धनिया    1 टीस्पून

नीबू का रस  1/4 टीस्पून

पानी  डेढ़ ग्लास

बटर 1 टीस्पून

विधि

प्रेशर कुकर  में घी डालकर हींग और हल्दी भूनकर सभी सब्जियां डालकर अच्छी तरह चलाएं. अब दोनों दालों को धोकर कुकर में डाल दें. सभी सब्जियां और नमक डालकर ढक्कन लगा दें. एक सीटी फुल फ्लैम पर लेकर 2 सीटी धीमी आंच पर लेकर गैस बंद कर दें. प्रेशर निकल जाने पर चम्मच से सब्जियों को हल्का सा मैश करके नीबू का रस, कटा हरा धनिया और बटर डालकर सर्व करें.

एलजीबीटीक्यू की नई आवाज ट्रांसजैंडर एला

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक चेहरा छाया हुआ है जो एला देव वर्मा के नाम से फेमस है. एला देव वर्मा का जन्म 25 अगस्त, 1998 को दिल्ली में हुआ था. असल में, एला देव वर्मा की कहानी देव से शुरू होती है. वह देव जो भीतर ही भीतर एक जंग लड़ रहा था. एक ऐसी जंग जो उस की खुद की थी. यह जंग खोज की थी कि वह लड़का है या लड़की. शारीरिक रूप से तो वह लड़का था लेकिन वह खुद को लड़की ही फील करता था. इसी कारण वह खुद को लड़की की ही तरह संवारता था. लड़कियों की तरह उस की अदाएं थीं.

प्यूबर्टी के समय जब लड़के और लड़कियों की बौडी में चेंजेस हो रहे होते हैं तब एला देव वर्मा की बौडी में भी चेंजेस हो रहे थे. वे चेंज जो उस ने सोचे भी न थे. उस ने तो सोचा था कि वह बड़ा हो कर लड़की जैसा दिखेगा लेकिन अब तो उस की मूंछें आने लगी थीं. उस की आवाज भारी होने लगी थी. उस का शरीर उसे संकेत दे रहा था कि वह लड़का है लेकिन उस का मन यह मानने को तैयार नहीं था.

इसी कशमकश के बीच एला देव वर्मा की जिंदगी झुल रही थी. ‘जोश टौक’ को दिए अपने इंटरव्यू में वह अपनी जिंदगी के बारे में बताती है कि किस तरह लड़के से लड़की बनने का उन का सफर तमाम चुनौतियों से भरा रहा. साथ ही, एला ने अपने इंटरव्यू में ट्रांस लोगों को ले कर परिवार, समाज, औरतें, नीतियों की दिक्कतों का भी खुल कर जिक्र किया, जिन पर अभी बहुत काम होना बाकी है.

किसी ने समझा नहीं

अपनी कहानी में एला कहती हैं, ‘‘ट्रांस लोगों के लिए जिंदगी जीना बिलकुल भी आसान नहीं है. सोसाइटी उन्हें हर वक्त गलत ठहराने पर तुली रहती है. बातबात पर उन्हें समझया जाता है कि वे जो फील कर रहे हैं वह गलत है. वह बीमारी है और इस का इलाज कराना बहुत जरूरी है. लेकिन कोई उन्हें समझने की कोशिश नहीं करता है. बस, सब उन्हें समझने में लगे रहते हैं.’’

एला कहती हैं, ‘‘मुझे डांस, एक्टिंग, मेकअप और स्पोर्ट्स का बहुत शौक है. मैं ने हमेशा अपने स्कूल के ऐनुअल फंक्शन में पार्ट लिया है. स्कूल में होने वाले ड्रामे में मुझे हमेशा लीड रोल मिलता था. मैं भी खुशीखुशी अपने रोल को जीती थी. स्टेज पर मेरी ऐक्टिंग के लिए तालियां बजती थीं लेकिन कोने में कहीं न कहीं मेरे अस्तित्व को ले कर फुसफुसाहट होती रहती थी, जो कई बार मेरे कानों में भी पड़ी है. जब मुझ से यह सब सहन नहीं हुआ तो मैं ने ऐक्टिंग करना छोड़ दिया.

‘‘ऐसा ही मेरे डांस और खेल के साथ भी हुआ. मेरे डांस मूव को ले कर तरहतरह की बातें की जाती थीं, मुझे चिढ़ाया जाता था. हालांकि यह भी सच है कि मेरी डांस टीचर ने मेरा बहुत साथ दिया. उन्होंने हमेशा मुझे कंफर्टेबल फील कराया. एक हद तक ही मैं लोगों की बातें सुन सकती थी. इसलिए जब मुझ से उन की बातें सुनी नहीं गईं तो मैं ने डांस क्लास भी छोड़ दी.

स्कूल में भेदभाव

‘‘अगर मैं अपने खेल की बात करूं तो मुझे आज भी याद है कि खेल के पीरियड में मेरे साथ क्याक्या होता था. न सिर्फ मेरे साथ खेलने वाले मुझे चिढ़ाते थे बल्कि मेरे स्पोर्ट्स टीचर भी मुझे नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे. वे मुझे टोकते हुए कहते थे, ‘देव, ऐसे लहरालहरा के मत चलो. तुम लड़कियों की तरह शर्माना बंद करो.’ मैं बस उन की सारी बातें सुना करती थी. इन सब से भी उन का मन नहीं भरा तो उन्होंने मुझे सजा के तौर पर लड़कियों के साथ ऐक्सरसाइज करने को कहा. मैं ने उन की यह बात भी मान ली. लेकिन लड़कियों के साथ ऐक्सरसाइज करने पर मुझे सब ने बहुत ज्यादा चिढ़ाया. यहां भी थक कर मैं ने गिवअप कर दिया. अब मैं ने वे सारी चीजें छोड़ दीं जो मुझे पसंद थीं.’’

अपने साथ हुई एक घटना का जिक्र करते हुए एला कहती हैं, ‘‘एक दिन मैं ऐनुअल डे के लिए थिएटर में प्रैक्टिस कर रही थी. तभी एक लड़का वहां आया और उस ने मेरी पैंट खींच दी. मैं भी कुछ नहीं कर पाई. मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं. मैं अपना कौन्फिडैंस खो चुकी थी.’’

एला बताती है कि वह अंदर ही अंदर लड़ रही थी. खुद से, अपनी पहचान से. इन सब के अलावा उन्हें लोगों की बातें परेशान कर रही थीं. एक दिन हिम्मत कर के उन्होंने अपनी मम्मी से कहा,  ‘मम्मी, एक प्रौब्लम है. मुझे लड़कियां नहीं पसंद.’ उन की मम्मी ने पूछा, ‘क्या तुम गे हो?’ उस वक्त वे नहीं जानती थीं कि वे जो फील कर रही हैं वह क्या है. इसलिए उन्होंने हां में जवाब दे दिया. यह सुन कर उन की मां हैरान हो गई. लेकिन एला की मम्मी बाकियों की तरह नहीं थी. उस ने एला को समझ.

घरवालों का साथ

एला बताती हैं कि वह खुशनसीब है कि उन की फैमिली ने उन्हें घर से बाहर नहीं निकाला. उन्हें मारापीटा नहीं. ‘‘पेरैंट्स उस जेनरेशन के नहीं हैं जिस के हम और आप हैं, इसलिए उन के लिए भी इसे सम?ाना थोड़ा मुश्किल रहा.’’

एला जब देव की जिंदगी जी रही थीं. तब वे अपने घर का एकलौता बेटा थीं. उन के पापा ने उन्हें ले कर बहुत सपने देखे थे. लेकिन अब उन सपनों की शक्ल बदल गई थी. उन के पापा को लगा कि अगर वह लड़कों के साथ रहेगी तो लड़कों के जैसी हो जाएगी, इसलिए उन्होंने एला को अपनी बहन के घर भेज दिया. एला के कजिन जिम जाया करते थे. उन के पापा को लगा कि अगर वह भी जिम जाएगी, पुशअप करेगी तो लड़कों जैसा बिहेव करेगी. लेकिन यह सच था ही नहीं, इसलिए वह जैसी थी वैसी ही रही.

इन सब के बीच जब उन्हें डाक्टर के पास ले जाया जा रहा था तो डाक्टर मिल कर एला को ही सम?ाने लगे. वे कहने लगे कि एला, तुम्हारी वजह से तुम्हारे मम्मीपापा बहुत परेशान हैं. उन्हें कुछ ऐसे डाक्टर भी मिले जो उन के जेनेटल का वजन भी चैक करते थे. जिस की शायद कोई जरूरत भी नहीं थी. ऐसा कह कर वे डाक्टरी के पेशे को गलत नहीं कह रहीं. बस, उन के तरीकों पर सवाल उठा रही हैं.

ट्रांसफौर्मेशन का समय

इन सब घटनाओं के बाद उन्हें एक ऐसे डाक्टर मिले जिन्होंने उन्हें सम?ा. उस डाक्टर ने उन्हें और उन के मम्मीपापा को काउंसलिंग दी. काउंसलिंग के बाद एला को पता चला कि उन्हें जैंडर डिकोरिया है. काउंसलिंग के कई सैशन लेने के बाद वे सम?ा गईं कि वे कोई अलग नहीं हैं. बस, सोसाइटी को उन के जैसे लोगों के बारे में पता नहीं है. वहीं जिन्हें पता भी है तो वे बहुत कम हैं.

काउंसलिंग के बाद उन की फैमिली यह जान चुकी थी कि यह सब नौर्मल है. इसलिए उन्होंने एला को सर्जरी के लिए उस की मौसी के पास आस्ट्रेलिया भेजने का फैसला किया. लेकिन इस में भी एक प्रौब्लम आ गई. उस वक्त इंडिया में कोविड ने दस्तक दे दी और लौकडाउन लग गया. अब जब कि उन के पास जवाब था कि वह क्या है लेकिन फिर भी उन्हें घर में रहना पड़ा.

लौकडाउन के समय जब एला घर में कैद हुई तो वह एला नहीं देव था लेकिन जब लौकडाउन खत्म हुआ और जब वह घर से बाहर निकला, देव नहीं बल्कि एला थी. लौकडाउन में उन्होंने अपनी पर्सनैलिटी पर काम किया. उन्होंने अपनी सारी हौबीज फिर से शुरू कीं. फिर से डांस, गेम, मेकअप स्टार्ट किया और इंस्टाग्राम पर फोटोज व रील्स बनानी शुरू कर दीं. उन की खूबसूरती और टैलेंट को देख कर कई बड़े लोग उन से हाथ मिलाने आए लेकिन खुद को ले कर वे कौन्फिडैंट नहीं थीं, इसलिए वे सब को मना करती रहीं.

वे एक स्पीच में कहती हैं, ‘‘मैं अपने रास्ते में खुद अड़ंगा बनी थी क्योंकि मैं औफर्स को मना कर देती थी.’’ अपनी कुछ सर्जरी कराने के बाद धीरेधीरे उन में कौन्फिडैंस ने जन्म लिया. इस के बाद वे अपने पास आने वाले औफर्स को हां कहने लगीं. एला ने कई बड़े ब्रैंड्स के साथ कोलैबोरेशन किया है जिन में बजाज और लिवोन भी शामिल हैं. वे मौडल के तौर पर कई फेमस ब्रैंड्स के लिए रैंपवाक भी कर चुकी हैं. वे एक बढि़या मेकअप आर्टिस्ट, डांसर और मौडल हैं.

‘मिस ट्रांसक्वीन इंडिया 2023’ में पहली रनरअप बन कर वे देश व दुनिया में छा गईं. यह टाइटल जीतने के बाद उन के प्रशंसकों की संख्या काफी बढ़ गई. इस समय उन के इंस्टाग्राम पर 2 लाख 45 हजार फौलोअर्स हैं. अब वे मोटिवेशनल स्पीच देती हैं. साथ ही, एलजीबीटी कम्युनिटी के मुद्दों को भी दुनिया के सामने रखती हैं. यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि वे एलजीबीटी कम्युनिटी की एक आवाज हैं.

भीख नहीं हमारा हक

एला ट्रांस कम्युनिटी को संदेश देते हुए कहती हैं, ‘‘सब से पहले आप को ही खुद को अपनाना है, फिर समाज भी आप को अपनाएगा. आप अलग हैं या आप के पास कोई अधिकार नहीं है कुछ करने का, यह सोच ही गलत है. इस से निकलने, पढ़ने और आगे बढ़ने की जरूरत है. कोई मैडिकल ट्रीटमैंट या सर्जरी आप को ठीक नहीं कर सकती जब तक आप खुद अपनेआप को, अपने विचारों को सही करना नहीं चाहेंगे.’’

समाज में ट्रांस लोगों को ले कर लोगों की सोच पर एला कहती हैं, ‘‘हमें सिर्फ भीख मांगने वाले, लोगों के घर गानेबजाने वाले या सैक्सवर्कर न सम?ा जाए, क्योंकि ये हमारी चौइस नहीं है. समाज हमारे लिए बाकी के रास्ते बंद कर देता है, इसलिए हमें इस पर चलना पड़ता है. लेकिन यह हमारी कमजोरी या पहचान नहीं है. हम बहुतकुछ कर सकते हैं. बस, लोगों को हमें मौका देने की जरूरत है, प्यार से अपनाने की जरूरत है.’’

एला कहती हैं, ‘‘हमारे पास इन सब चीजों को ले कर कानून और प्रावधान बहुत हैं लेकिन कमी इस के इंप्लीमैंटेशन की है. औफिस में बैठे लोगों को पता ही नहीं है कि यह काम कैसे होता है, इस का प्रोसैस कैसा है. जिन्हें पता है, वे भी अपने ऊपर कोई बर्डेन नहीं लेना चाहते क्योंकि उन्हें लगता है कि जैंडर चेंज करवाना बहुत बड़ा इशू है. दस सवालों के साथ ही आप को सही से ट्रीट तक नहीं करते क्योंकि वे ट्रांस लोगों को अलग नजरिए से देखते हैं.’’

एला बेहद खूबसूरत और टैलेंटेड हैं. वे एलजीबीटी कम्युनिटी का समर्थन खुल कर करती हैं. लेकिन उन के व्यक्तित्व में अगर कुछ खटकता है तो बस यह कि उन के इंस्टाग्राम अकांउट पर उन के अतीत की एक भी तसवीर नहीं है. क्या उन्हें अपना अतीत या अपनी पुरानी पहचान जरा भी नहीं पसंद. क्या वे अपने पास्ट को ले कर इनसिक्योर हैं. इन सारे सवालों के जवाब ढूंढ़ने जाएं तो खाली हाथ लौटना पड़ेगा. उन का व्यक्तित्व संदेह पैदा करता है.

अनोखा रिश्ता- भाग 2: कौन थी मिसेज दास

जयशंकर के बुलाने पर मैं बरामदे से कमरे में पहुंचा और दरी पर पालथी मार कर बैठ गया. मिसेज दास सारा खाना कमरे में ही ले आईं और मेरे सामने अपने पैर पीछे की तरफ मोड़ कर बैठ गईं. जहां हम बैठे थे उस के ऊपर बहुत पुराना एक पंखा घरघरा रहा था. खाने के दौरान ही मिसेज दास ने कहना शुरू किया, ‘बेटा, हम तो गुवाहाटी में बस, अपनी इज्जत ढके बैठे हैं. 100-200 रुपए की सामर्थ्य भी हमारे पास नहीं है. मुझे दीदी को लिखना होगा. पैसे आने में शायद 8-10 दिन लग जाएं. तुम कल सुबह जयशंकर के साथ जा कर अपने घर पर एक टेलीग्राम डाल दो वरना तुम्हारे मातापिता चिंतित होंगे.’

मेरा मन भर आया. सहज होते ही मैं ने उन से कहा, ‘इतने दिनों में तो मेरे घर से भी पैसे आ जाएंगे. आप अपनी दीदी को कुछ न लिखें. मैं तो यह सोच कर परेशान हूं कि 8-10 दिन तक आप पर बोझ बना रहूंगा…’

‘तुम ऐसा क्यों सोचते हो,’ मिसेज दास ने बीच में ही मुझे टोकते हुए कहा, ‘जो रूखासूखा हम खाते हैं तुम्हारे साथ खा लेंगे.’

दूसरे दिन सुबह मैं जयशंकर के साथ पोस्टआफिस गया. मैं ने घर पर एक टेलीग्राम डाल दिया. जब हम वापस आए, मिसेज दास बरामदे में खाना बना रही थीं. मैं ने उन के हाथ पर टेलीग्राम की रसीद और शेष पैसे रख दिए. मैं इस परिवार में कुल 6 दिन रहा था. इन 6 दिन में एक बार मिसेज दास ने मीट बनाया था और एक बार मछली.

एक दिन शाम को जयशंकर ने ही मुझे बताया कि बाबा के गुजरने के बाद मेरे चाचा एक बार मां के पास शादी का प्रस्ताव ले कर आए थे पर मां ने उसे यह कह कर ठुकरा दिया कि मेरे पास जयशंकर है जिसे मैं बस, उस के बाबा के साथ ही बांट सकती हूं और किसी के साथ नहीं. जयशंकर को अगर आप मार्गदर्शन दे सकते हैं तो दें वरना मुझे ही सबकुछ देखना होगा. मैं अपने पति की आड़ में उसे एक ऐसा मनुष्य बनाऊंगी कि उसे दुनिया याद करेगी.

मिसेज दास का असली नाम मनीषा मुखर्जी था और उन के पति का नाम प्रणव दास. जब मैं उन से मिला था तब मेरी उम्र 21 साल की थी और वह 42 वर्ष की थीं. उन के कमरे की मेज पर पति की एक मढ़ी तसवीर थी. मैं अकसर देखता था कि बातचीत के दौरान जबतब उन की नजर अपने पति की तसवीर पर टिक जाती थी, जैसे उन्हें हर बात की सहमति अपने पति से लेनी हो.

यह गुवाहाटी में मेरा तीसरा दिन था. मिसेज दास स्कूल जा चुकी थीं. जयशंकर भी कालिज जा चुका था. मैं घर पर अकेला था सो शहर घूमने निकल पड़ा. घूमतेघूमते स्टेशन तक पहुंच गया. अचानक मेरी नजर एक होटल पर पड़ी, जिस का नाम रायल होटल था. कभी  बचपन में अपने ममेरे भाइयों से सुन रखा था कि बगल वाले गांव के एक बाबू साहब का गुवाहाटी रेलवे स्टेशन के समीप एक होटल है. मैं बाबू साहब से न कभी मिला था और न उन्हें देखा था. मैं तो उन का नाम तक नहीं जानता था. पर मुझे यह पता था कि शाहाबाद जिले के बाबू साहब अपने नाम के पीछे राय लिखते हैं.

होटल वाकई बड़ा शानदार था. मैं ने एक बैरे को रोक कर पूछा, ‘इस होटल के मालिक राय साहब हैं क्या?’

‘हां, हैं तो पर भैया, यहां कोई जगह खाली नहीं है.’

‘मैं यहां कोई काम ढूंढ़ने नहीं आया हूं. तुम उन से जा कर इतना कह दो कि मैं चिलहरी के कौशल किशोर राय का नाती हूं और उन से मिलना चाहता हूं.’

थोड़ी देर बाद वह बैरा मुझे होटल के एक कमरे तक पहुंचा आया, जहां बाबू साहब अपने बेड पर एक सैंडो बनियान और हाफ पैंट पहने नाश्ता कर रहे थे. गले में सोने की एक मोटी चेन पड़ी थी. बड़े अनमने ढंग से उन्होंने मुझ से कुछ पीने को पूछा और उतने ही अनमने ढंग से मेरे नाना का हालचाल पूछा.

मुझे ऐसा लग रहा था कि जग बिहारी राय को बस, एक डर खाए जा रहा था कि कहीं मैं उन से कोई मदद न मांग लूं. अब उस कमरे में 2 मिनट भी बैठना मुझे पहाड़ सा लग रहा था. संक्षेप में मैं अपने ननिहाल का हालचाल बता कर उन्हें कोसता कमरे से बाहर निकल आया.

जयशंकर के पास बस, 2 जोड़ी कपड़े थे. बरामदे के सामने वाले कमरे की मेज उस के पढ़नेलिखने की थी पर उस की साफसफाई मिसेज दास खुद ही करती थीं. मैं उन्हें मां कह कर भी बुला सकता था पर मैं उन की ममता का एक अल्पांश तक न चुराना चाहता था. वैसे तो जयशंकर थोड़े लापरवाह तबीयत का लड़का था पर उसे यह पता था कि उस की मां के सारे सपने उसी से शुरू और उसी पर खत्म होते हैं. मिसेज दास हमारी मसहरी ठीक करने आईं. मैं अभी भी जाग रहा था तो कहने लगीं. ‘नींद नहीं आ रही है?’

‘नहीं, मां के बारे में सोच रहा था.’

‘भूख तो नहीं लगी है, तुम खाना बहुत कम खाते हो.’

मैं उठ कर बैठ गया और बोला, ‘मिसेज दास, मेरा मन घबरा रहा है. मैं आप के कमरे में आऊं?’

‘आओ, मैं अपने और तुम्हारे लिए चाय बनाती हूं.’

फिर मैं उन्हें अपने और अपने परिवार के बारे में रात के एक बजे तक बताता रहा और बारबार उन्हें धनबाद आने का न्योता देता रहा.

अगले दिन गुवाहाटी के गांधी पार्क में मेरी मुलाकात एक बड़े ही रहस्यमय व्यक्ति से हुई. वह सज्जन एक बैंच पर बैठ कर अंगरेजी का कोई अखबार पढ़ रहे थे. मैं भी जा कर उन की बगल में बैठ गया. देखने में वह मुझे बड़े संपन्न से लगे. परिचय के बाद पता चला कि उन का पूरा नाम शिव कुमार शर्मा था. वह देहरादून के रहने वाले थे पर चाय का व्यवसाय दार्जिलिंग में करते थे. व्यापार के सिलसिले में उन का अकसर गुवाहाटी आनाजाना लगा रहता था.

2 दिन पहले जिस ट्रेन में सशस्त्र डकैती पड़ी थी, उस में वह भी आ रहे थे अत: उन्हें अपने सारे सामान से तो हाथ धोना ही पड़ा साथ ही उन के हजारों रुपए भी लूट लिए गए थे. उन्हें कुछ चोटें भी आईं, जिन्हें मैं देख चुका था. डकैतों का तो पता न चल पाया पर एक दक्षिण भारतीय के घर पर उन्हें शरण मिल गई जो गुवाहाटी में एक पेट्रोल पंप का मालिक था.

मैं ने उन की पूरी कहानी तन्मय हो कर सुनी. अब अपने बारे में कुछ बताने में मुझे बड़ी झिझक हुई. यह सोच कर कि जब मैं उन की बातों का विश्वास न कर पाया तो वह भला मेरी बातों का भरोसा क्यों करते? उन्हें बस, इतना ही बताया कि धनबाद से मैं यहां अपने एक दोस्त से मिलने आया हूं.

 

औरत की औकात: प्रौपर्टी में फंसे रिश्तों की कहानी

लेखक- आशीष दलाल

कल रात से ही वह अपनी सास से हुई बहस को ले कर परेशान थी. उस पर सोते वक्त पति के सामने अपना दुखड़ा रो कर मन हलका करना चाहा तो उस के मुंह से रमा सहाय का नाम सुन कर पति का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. सारी रात आंखों में ही कुछ समझते हुए और कुछ न समझ आने पर उस पर गहन विचार करते हुए उस ने गुजार दी.

सुबह उठी तो आंखें बोझिल हो रही थीं और सिर भारी हुआ जा रहा था. रात को सास और फिर पति के संग हुई बहस की वजह से आज उस का मन किसी से भी बात करने को न हो रहा था. न चाहते हुए भी भारी मन से पति के लिए टिफिन बना कर उन्हें नौकरी के लिए विदा किया और फिर आंखें बंद कर बैठ गई. वैसे भी इंसान को अपनी समस्याओं का कोई हल नहीं मिलता तो अंतिम सहारे के रूप में वह आंख बंद कर प्रकृति के बारे में सोचने लगता है.

“अब बंद भी कर यह नाटक और रसोई की तैयारी कर.” तभी उस के कानों में तीखा स्वर गूंजा.

अपनी सास की बात का कोई जवाब न दे कर वह हाथ जोड़ कर अपनी जगह से खड़ी हो गई. सास से उस की नजरें मिलीं. एक क्षण वह वहां रुकी और फिर चुपचाप रसोई में आ गई. उस के वहां से उठते ही उस की सास अपनी रोज की क्रिया में मग्न हो गई.

अभी भी कल वाली ही बात पर विचार कर वह अनमनी सी रसोई के प्लेटफौर्म के पास खड़ी हुई थी. तभी रसोई के प्लेटफौर्म की बगल वाली खिड़की से उस की नजर बाहर जा कर टिक गई. रसोईघर के बाहर खाली पड़ी जगह में पड़े अनुपयोगी सामान के ढेर पर कुछ दिनों से कबूतर का एक जोड़ा तिनकातिनका जोड़ कर घोंसला बनाने की कोशिश कर रहा था लेकिन थोड़े से तिनके इकट्ठे करने के बाद दोनों में न जाने किस बात को ले कर जोरजोर से अपने पंख फड़फड़ाते व सारे तिनके बिखर कर जमीन पर आ गिरते. जैसेतैसे आपस में लड़तेझगड़ते और फिर एक हो कर आखिरकार घोंसला तो उन्होंने तैयार कर ही लिया था और कबूतरी घोंसले में अपने अंडों को सेती हुई कई दिनों से तपस्यारत इत्मीनान से बैठी हुई थी. उसे आज घोंसले में कुछ हलचल नजर आई. अपनी जिज्ञासा मिटाने के लिए वह खिड़की के पास के दरवाजे से बाहर गई और अपने पैरों के पंजों को ऊंचा कर घोंसले में नजर डालने लगी. उस की इस हरकत पर घोंसले में बैठी हुई कबूतरी सहम कर अपनी जगह से थोड़ी सी हिली. 2 अंडों में से एक फूट चुका था और एक नन्हा सा बच्चा मांस के पिंड के रूप में कबूतरी से चिपका हुआ बैठा था. सहसा उस के चेहरे पर छाई उदासी की लकीरों ने खुदबखुद मुड़ कर मुसकराहट का रूप ले लिया. उस ने अपना हाथ बढ़ा कर कबूतरी को सहलाना चाहा लेकिन कबूतरी उस के इस प्रयास को अपने और अपने बच्चे के लिए घातक जान कर गला फुला कर अपनी छोटी सी चोंच से उसे दूर खदेड़ने का यत्न करने लगी.

एक छोटा सा नजारा उस के मन को अपार खुशी से भर गया. वह वापस अंदर रसोई में आने को मुड़ी और उस के होंठों से अनायस ही उस का पसंदीदा गाना, मधुर आवाज के साथ, निकल कर उस के मन के तारों को झंकृत करने लगा.

“न समय देखती है न बड़ों का लिहाज करती है. यह कोई समय है फिल्मी गाना गाने का? गाना ही है तो भजन गा तो मेरी पूजा भी सफल हो जाए,” सास का यह नाराजगीभरा स्वर सुन कर उस की आवाज बंद होंठों के अंदर सिमट गई और चेहरे पर कुछ देर पहले छाई हुई मुसकराहट को उदासी ने वापस अपनी आगोश में समा लिया. हाथ धो कर उस ने फ्रिज खोला और उस में रखा पत्तागोभी निकाल कर अनमने भाव से उसे काटने लगी.

तभी डोरबैल बजने पर उस ने जा कर दरवाजा खोला तो अपने सामने एक अपरिचित व्यक्ति को खड़ा पा कर अचरज से उस से कुछ पूछने जा ही रही थी कि तभी पीछे से आ कर उस की सास ने उस व्यक्ति को नमस्ते करते हुए अंदर आने को कहा. उस ने भगवा धोतीकुरता पहने उस व्यक्ति को गौर से देखा. उस के माथे पर लंबा तिलक लगा हुआ था और उस ने गले में रुद्राक्ष की माला पहन रखी हुई थी. उस की सास उस पंडितवेशधारी व्यक्ति से कुछ दूरी बना कर उस के साथ सोफे पर बैठ गई और उसे पानी लाने के लिए कहा.

पानी देने के बाद खाली गिलास ले कर वह अंदर जाने को हुई तो सास ने उसे टोका, “यहां पंडितजी के पास बैठ. ये बहुत बड़े ज्ञानी है और हाथ देख कर सारी समस्याओं का हल बता देते हैं.”

सास की बात सुन कर वह चौंक गई. उस ने मना करना चाहा लेकिन फिर कल रात परिवार में हुई अनबन को याद कर बात को और आगे न बढ़ाने के लिए वह पंडितजी से कुछ दूरी बना कर उन के पास बैठ गई. पंडितजी ने मुसकरा कर उस की तरफ देखा और उसे अपना सीधा हाथ आगे बढ़ाने को कहा. उस ने झिझकते हुए अपने सीधे हाथ की हथेली उन के आगे कर दी. पंडितजी ने उस की हथेली को छूते हुए उस पर हलका सा दबाव डाला. उस ने अपनी हथेली पीछे करनी चाही पर उस के ऐसा करने से पहले ही पंडित उस की हथेली पर अपनी उंगलिया फेरते हुए उस की सास से पूछने लगे, “तो यह आप की बहू है?”

“जी पंडितजी,” उस की सास हां में सिर हिलाते हुए जवाब दिया तो पंडितजी आगे बोले, “समय की बहुत बलवान है आप की बहू. इस के हाथ की रेखाएं बता रही हैं कि इसे अपने पिता की संपत्ति से बहुत बड़ी धनराशि प्राप्त हुई है और उसी धनराशि से आप सब के समय संवरने वाले हैं.”

उस ने पंडित पर एक नजर डाली. पंडितजी बड़े ही ध्यान से उस की हथेली की रेखाओं को देख कर उस का वर्तमान बता रहे थे.

“जी पंडितजी. आप तो ज्ञानी हैं. गांव में इस के पिता की कई एकड़ जमीन बुलेट ट्रेन के प्रोजैक्ट में सरकार ने ले ली है. इस का कोई भाई या बहन तो है नहीं, तो उसी के पैसे से इस के पिता ने इस के नाम 20 लाख रुपए की एफडी कर दी है,” उस की सास ने पंडितजी की बात का जवाब दिया तो उस ने अपनी सास की तरफ देखा. उसे अपनी सास का पंडितजी के सामने इस तरह अपनी निजी बातें शेयर करना पसंद नहीं आया लेकिन वह उन की उम्र का लिहाज कर कुछ भी न बोल पाई.

तभी पंडितजी ने कहा, “यह अपने पिता की इकलौती संतान है, इसी से इस के हाथ की रेखाएं बता रही हैं कि भविष्य में इसे अपने पिता से और भी बड़ी रकम मिलने की उम्मीद है.”

पंडितजी की बात सुन कर उस की सास के चेहरे पर मुसकान तैर गई और वह खुश होते हुए बोली, “यह तो बड़ी अच्छी बात बताई पंडितजी आप ने, लेकिन अब मैं ने जो समस्या आप से कही थी उस का समाधान भी तो बताइए.”

“समाधान तो एक ही है. उन पैसों को मिला कर जो घर आप का बेटा ले रहा है वह आप के बेटे की राशि और ग्रहों को देखते हुए आप के नाम ही होना चाहिए. अगर वह घर आप के बेटे के नाम हुआ तो उसे भविष्य में बहुत ज्यादा ही आर्थिक नुकसान होगा. यह सब साफसाफ मैं आप की बहू के हाथ की लकीरों में देख पा रहा हूं.”

पंडितजी की कही यह बात उस के लिए असहनीय थी. वह नहीं चाहती थी कि घर के निजी मामलों में बाहर का कोई भी इंसान दखलंदाजी करे. उस ने पंडितजी की बात सुन कर एक झटके से अपनी हथेली उन की पकड़ से छुड़ाई और गुस्से से बोली, “यह हमारे घर का निजी मामला है और इस में आप को कोई भी सलाहसूचन करने का कोई अधिकार नहीं है. मैं बिलकुल भी नहीं विश्वास करती हाथ की लकीरों पर.”

अपनी बहू का यह रवैया देख कर सास गुस्से से लाल हो गई और उस ने उसे डांटते हुए कहा, “बहू, माफी मांग पंडितजी से. मेरे कहने पर राकेश ने ही इन को घर आने का निमंत्रण दिया था.”

“मैं माफी चाहती हूं पंडितजी आप से. आप से मुझे कोई शिकायत नहीं है लेकिन मेरे पिता से मिली संपत्ति पर सिर्फ मेरा अधिकार है और उस के बारे में कोई भी फैसला लेने का हक़ सिर्फ मेरा ही है. आप तो क्या, घर के किसी भी सदस्य को इस बारे में बहस करने का कोई अधिकार नहीं है,” उस ने बड़े ही तीखे मिजाज से पंडितजी की तरफ देखते हुए कहा और फिर गुस्से से अंदर रसोई में आ कर वापस अपना काम करने लग गई.

उस की सास को अपनी बहू का इस तरह पंडितजी का अपमान करना और उन्हें पंडितजी की निगाहों में नीचा दिखाना बिलकुल भी पसंद न आया. पंडितजी के सामने तो वह उसे कुछ न बोल पाई लेकिन कुछ देर पंडितजी से बातें कर उन्हें तगड़ी फीस दे कर विदा करने के बाद वह खुद रसोई में आ गई.

“यह तूने ठीक नहीं किया बहू. पैसों की गरमी से अपनी धाक जमाना बंद कर दे, वरना बहुत पछताना पड़ेगा.”

अपनी सास की धमकीभरी आवाज सुन कर उस ने अपनी आंखों से बह रहे आंसुओं को पोंछते हुए जवाब दिया, “अपने हक की बात ही तो कर रही हूं. क्या बुरा कह दिया मैं ने जो नया मकान अपने नाम पर करवाने की बात कह दी तो? पैसा भी तो मेरा ही ज्यादा लग रहा है उसे खरीदने में. राकेश तो केवल 10 लाख ही दे रहे है और वह भी लोन ले कर.”

“हमारे खानदान में जमीनजायदाद पति के जीतेजी औरत के नाम नहीं की जाती है. जिस पैसे की तू बात कर रही है उस पर तेरा पति होने के नाते राकेश का भी बराबर का हक है तो एक तरह से वह पैसा भी राकेश का ही हुआ,” सास ने सख्ताई से जवाब देते हुए उस से कहा.

“यह तो किसी कानून में नहीं लिखा है कि पत्नी की संपत्ति पर पति का हक बिना कोई कानूनी कार्यवाही के होता है. पर फिर भी मैं ऐसा नहीं कह रही हूं कि मेरे पापा के दिए पैसों पर राकेश का कोई हक नहीं है. मैं, बस, नया मकान अपने नाम करवाना चाहती हूं क्योंकि इस में ज्यादा पैसा मेरा लग रहा है. शादी से पहले नौकरी का जो पैसा जमा किया था वह भी तो राकेश ने निकलवा कर नया मकान लेने में डलवा दिया. इस तरह तो मेरे नाम कोई आर्थिक संबल रहेगा ही नहीं,” उस ने अपनी बातों से सास को समझाने का यत्न किया.

उस की बात सुन कर सास ने मुंह बिगाड़ते हुए कहा, “उस रमा सहाय ने जाने क्या पट्टी पढ़ा दी तुझे जो मुझे कानूनी धौंस देने चली है. तेरी वकील चाहे जो कुछ कहे पर नया मकान तो तेरे नाम न ही होगा बहू.”

“ठीक है, आप अपने मन की कीजिए. मुझे जो ठीक लगेगा मैं वही करूंगी,” उस ने जवाब दिया और ज्यादा बहस में न पड़ते हुए चुपचाप सब्जी काटने लगी.

शाम को राकेश के औफिस से आने तक सासबहू के बीच कोई भी बातचीत न हुई लेकिन उस ने अपनी वकील रमा सहाय से फोन पर बात कर इस मामले में कानूनी सलाह ले कर मन ही मन एक फैसला ले लिया था.

शाम को राकेश के आने पर चायनाश्ता करते हुए नया मकान अपने नाम लेने के मुद्दे पर फिर उन तीनों के बीच बहस शुरू हो गई.

“आखिर तुम्हें मकान मेरे नाम पर लेने में परेशानी क्या है राकेश?” उस ने झुंझलाते हुए चाय का खाली कप टेबल पर रखते हुए राकेश से पूछा.

“बात परेशानी की नहीं है नेहा. आज तक हमारे खानदान में कभी भी पुरुष के रहते औरत के नाम पर जमीनजायदाद नहीं हुई है. यह परंपरा रही है हमारे खानदान की. पति के रहते पत्नी के नाम जमीनजायदाद करना शुभ नहीं माना जाता,” राकेश ने साफ शब्दों में न कहते हुए उसे जवाब दिया.

“शुभअशुभ कुछ नहीं होता राकेश. समय की नजाकत को समझते हुए गलत परंपराएं और जिद छोड़ी जा सकती है राकेश. तुम्हारे और मम्मीजी के कहने पर शादी के बाद मैं ने अपनी जिद छोड़ कर नौकरी छोड़ दी थी न, तो कम से कम अब तुम भी तो थोड़ा झुको,” पिछली बातें याद कर जवाब देते हुए उस की आंखें गीली हो रही थीं.

“बहू, खानदानी परंपरा तोड़ी नहीं जाती. बात अगर जिद छोड़ने की ही है तो झुकना तो तुझे ही चाहिए. पुरुष कभी औरत के आगे नहीं झुकता,” उस की बात सुन कर सास ने अपना मन्तव्य रखा.

“देखो नेहा, तुम पिछले 10 दिनों से इस बात को ले कर घर का माहौल तंग बनाए हुए हो. कल रात से तो हद ही कर दी है तुम ने. मेरे पूछे बिना तुम ने उस वकील …क्या नाम था… हां … विभा सहाय को अपने घर के मामले में डाला तब मैं ने कुछ नहीं कहा लेकिन अब तो पानी सिर से ऊपर जा रहा है. मम्मी कह रही थीं तुम ने आज सुबह पंडितजी को भी भलाबुरा कह कर उन की हाजिरी में मम्मी की इन्सल्ट की. अपनी औकात में रहना सीखो वरना मुझे भी अपनी उंगली टेढ़ी करना आती है,” राकेश ने जला देने वाली नजर उस की तरफ डाली तो एक पल को वह सहम गई लेकिन फिर अगले ही क्षण विभा सहाय की दी गई सलाह उस के जेहन में तैर गई और वह पूरे आत्मविश्वास से बोलने लगी, “ठीक है, मैं अपनी औकात में ही रहूंगी लेकिन मेरी औकात क्या है, यह मैं खुद तय करूंगी.”

“तुम्हारे कहने का मतलब क्या है? धमकी दे रही हो या समझौता कर रही हो?” राकेश ने उस का जवाब सुन कर शंकाभरी नजर उस पर डाली.

उस ने अब एक ठंडी आह भरी और आगे कहा, “जिंदगी में पैसा झगड़ा करवाता है. यह बात सुन रखी थी लेकिन अब अनुभव भी कर ली है. पापा के मुझे दिए गए पैसों को ले कर हमारे घर की सुखशांति भंग हो रही है, तो सोच रही हूं उन का दिया सारा पैसा उन्हें वापस कर दूं. इस से घर में शांति तो बनी रहेगी. नया मकान आज नहीं तो दसपन्द्रह साल बाद तुम खुद अपनी कमाई से ले ही लोगे.”

जैसे ही उस ने अपनी बात पूरी की, राकेश का चेहरा सफेद पड़ गया. वह हड़बड़ाता हुआ बोला, “तुम ऐसा हरगिज नहीं कर सकतीं.”

“क्यों नहीं कर सकती? मैं यह फैसला ले सकूं, इतनी तो औकात है मेरी राकेश,” जवाब देते हुए उस ने राकेश को घूरा तो उस के तेवर और आत्मविश्वास देख कर राकेश तुरंत कुछ नहीं बोल पाया. उस ने अपनी मम्मी की तरफ देखा और उन की आंखों से एक इशारा पा कर वह बिगड़ी हुई बात संभालते हुए उसे समझाने लगा, “यह समय आवेश में आ कर इस तरह का फैसला लेने का नहीं है. इस वक्त तुम गुस्से में हो, अपने परिवार का हित ध्यान में रख कर फिर से सोचो और हम फिर किसी दिन इस बारे में बात करेंगे.”

“वह दिन कभी नहीं आएगा राकेश. मैं अच्छी तरह से समझ गई हूं. मेरे नाम से संपत्ति कर देने से तुम खुद को इनसिक्योर या छोटा फील करोगे, इसी से तुम यह फैसला नहीं ले पा रहे हो लेकिन मैं अपने फैसले पर अडिग हूं या तो मकान मेरे नाम से होगा या फिर मैं अपने पापा का सारा पैसा उन्हें लौटा दूंगी.”

“तुम गलत समझ रही हो नेहा. बात खुद को छोटा फील करने वाली नहीं है. जब तक मैं हूं तब तक संपत्ति वगैरह जैसे लफड़ो में तुम्हें नहीं पड़ना चाहिए,” राकेश ने उस की बात का जवाब दिया तो नेहा ने अब विस्तार से कहा, “अगर तुम्हारा सोचना ऐसा ही है तो तुम गलत हो राकेश. अपने जीवनसाथी को जीवन की आवश्यक चीजों से दूर रख कर तुम उसे केवल औरत होने के नाम पर कमजोर बना रहे हो. याद करो वह दिन जब पापाजी के जाने के बाद गांव वाली जमीन को ले कर कितनी दिक्कतें हुई थीं. मम्मीजी को उस बारे में थोड़ा भी पता होता तो वह जमीन तुम्हारे ताऊजी हड़प न कर पाते.”

उस की बात सुनकर कुछ देर के लिए कोई कुछ नहीं बोला. वह अपनी जगह से उठ कर चायनाश्ते की खाली प्लेट्स ले कर रसोई में जाने लगी. तभी पीछे से उसे उस की सास की आवाज सुनाई दी, “राकेश, बहू की बात कुछ हद तक सही तो है. तेरे पापा ने मकान-संपत्ति के मामले में मुझे बिलकुल अनजान रखा था, इसी से आज जो कुछ हमारा होना था वह हमारे पास नहीं है. बहू को कम से कम अपने अधिकारों के बारे में तो पता है और अपने अधिकार को ले कर अगर वह अपनों से भी लड़ रही है तो कुछ गलत नहीं कर रही है.”

“लेकिन मम्मी…मकान उस के नाम…” राकेश ने कुछ कहना चाहा तो उन्होंने उसे टोकते हुए आगे कहा, “तुम दोनों एक ही गाड़ी के दो पहिए हो. क्या फर्क पड़ता है अगर घर बहू के नाम भी हुआ तो… आखिर मकान को घर तो उसे ही बनाना है.”

अपनी मम्मी के फैसले पर सहमति जताते हुए राकेश आगे कुछ नहीं बोला. नेहा ने पीछे पलट कर उसे देखा तो उस की तरफ देख कर वह मुसकरा दिया.

Wedding Special: इन 7 टिप्स से वेडिंग में बने और भी खूबसूरत

महिलाएं वेडिंग में अपने बैस्ट लुक में नजर आना चाहती हैं और स्किन पर मौजूद अनचाहे बालों की वजह से बिंदास हो कर कुछ भी नहीं पहन पाती हैं. ऐसे में वे इन्हें हटाने व फ्लौलेस स्किन पाने के लिए हर एक उपाय करती हैं. इतना ही नहीं हाथों व पैरों पर मौजूद बालों से छुटकारा पाने के लिए घंटो पार्लर में बैठ अपने पैसे व समय दोनों की बर्बादी करती हैं, लेकिन डाबर फेम फेयरनेस नेचुरल हेयर रिमूवल क्रीम आपके समय और पैसे दोनों की बचत करती है और अपना काम मिनटों में करती है. साथ ही यह हेयर रिमूवल क्रीम आपकी खूबसूरती घटाने वाले अनचाहे बालों की छुट्टी ही नहीं करती, बल्कि आपकी त्वचा को सौफ्ट और चमकदार भी बनाती है ताकि हर कोई आप की त्वचा का कायल बन जाए और आप की खूबसूरती को निहारता रह जाए.

1. हेयर रिमूविंग होम

उत्सवी माहौल में व्यस्त होने की वजह से स्किन को हेयर फ्री करना ध्यान ही नहीं रहता है. लेकिन अब टेंशन की नहीं है, क्योंकि डाबर फेम फेयरनेस नेचुरल हेयर रिमूवल है आपके पास, जिसने घर पर ही हेयर रिमूविंग को बना दिया है एकदम ईजी. ताकि आप हेयर क्लीन करें कभी भी कहीं भी. हेयर रिमूवल के तरीके तो बहुत हैं लेकिन हम कहेंगे कि हेयर रिमूवल क्रीम से बेहतर कोई नहीं है.

2. त्वचा निखारे

हेयर रिमूवल क्रीम आपके अनचाहे बालों को बड़े ही शानदार तरीके से साफ करती है साथ ही यह क्रीम आपकी त्वचा के लिए एकदम सुरक्षित है, क्योंकि यह डर्मैटोलौजिकली और क्लीनिकली टैस्टेड है और इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि यह हर स्किन टाइप के लिए बनी है. यह सिर्फ आपके बालों को ही नहीं हटाती, बल्कि स्किनटोन को निखारती भी है.

3. काम शुरु मिनटों में

फेम हेयर रिमूवल क्रीम बड़े ही निराले अंदाज से अपना काम करती है. यह क्रीम बालों में मौजूद प्रोटीन को तोड़ देती है और इससे बाल कमजोर हो कर आसानी से निकल जाते हैं साथ ही इसका त्वचा पर कोई नकारात्मक असर भी नहीं होता है. जहां वैक्स से हेयर रिमूव करने के लिए आप को वैक्स गरम करने का इंतजार करना पड़ता है वहीं इस क्रीम को खोला, लगाया और साफ कर दिया. यह अपना काम मात्र 3 से 6 मिनट में कर देती है और आपकी स्किन को फेयर व सौफ्ट बनाती है.

4. खोई रंगत लौटाए

महिलाएं वर्किंग हों या घरेलू अकसर धूप की चपेट में आ ही जाती हैं और टैनिंग का शिकार बन जाती हैं. ऐसे में उनकी त्वचा की सुंदरता कहीं खो जाती है और त्वचा बेजान व बेरंग सी नजर आने लगती है, लेकिन फेम हेयर रिमूवल क्रीम आपकी इन तीनों समस्याओं को दूर करती है और स्किन को सौफ्ट व ब्राइट बनाती है ताकि आप दिखें सबसे जुदा.

5. न कटने का डर न जलने का

पार्लर में काम करने वाले कई बार अनट्रेंड भी होते हैं जो हेयर रिमूव करते वक्त गरम वैक्स से आपका हाथ जला देते हैं तो वहीं रेजर से स्किन पर कट भी लग जाते हैं, ऐसे में अगर आपके लिए हेयर रिमूव करने का कोई सबसे सुरक्षित साधन है, तो वह सिर्फ डाबर फेम फेयरनेस नेचुरल क्रीम ही है. जिसे हर स्किन टाइप के लिए बनाया गया है साथ ही यह कैमिकल फ्री है.

6. हाईजीन में नंबर वन

जब हेयर रिमूव करते वक्त हाईजीन की बात आती है, तो ऐसे में डाबर फेम फेयरनेस नेचुरल हेयर रिमूवल क्रीम का जवाब नहीं है, क्योंकि पार्लर में भारी भरकम भीड़ होती है और ऐसे में जल्दीजल्दी क्लाइंट को निपटाने के चक्कर में वहां हाईजीन का उतना ध्यान नहीं रखा जाता है, जितना कि रखा जाना चाहिए, जबकि हेयर रिमूवल क्रीम को आप मनमुताबिक कभी भी कहीं भी इस्तेमाल कर सकती हैं और यह हाईजीन का भरपूर ख्याल रखती है.

7. कई गुणों से भरपूर

– यह क्रीम कई वैरिएंट्स में उपलब्ध है- रोज (सैंसिटिव स्किन टाइप), गोल्ड (सभी प्रकार की स्किन), सैंडल (ड्राई स्किन) और टरमरिक (औयली स्किन के लिए).

– केवल 3 से 6 मिनट में अपना काम करे साथ ही यह डर्मैटोलौजिकली और क्लीनिकली टैस्टेड है.

– इसमें है फेयरनेस प्रौपर्टीज, जो अंडरआर्म्स, बिकिनी लाइन व हाथों व पैरों  के लिए पूरी तरह सुरक्षित है.

रेत से फिसलते रिश्ते: दीपमाया को कौनसा सदमा लगा था

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तुम बहुत अच्छी हो: भाग 2- रीवा के बारे में भावेश क्या जान गया था

सब की नजरें रीवा की तरफ उठ गई थीं. उन की परवाह किए बगैर वह सीधे भावेश के पास आई और गले लग कर अपनत्व का परिचय दे दिया.

भावेश ने पूछा, ‘‘क्या लोगी ठंडा या गरम?’’

‘‘अभी ब्लैक कौफी चलेगी. बाद में सोचते हैं क्या लेना है.’’

भावेश ने कौफी और्डर की. दोनों साथ मिल कर उस का मजा लेने लगे.

भावेश बोला, ‘‘यहां कितने साल हो गए हैं?’’

‘‘3 साल. बाबूजी की मौत के बाद मैं शहर आ गई थी.’’

‘‘वे होते तो शायद तुम इतना बड़ा कदम नहीं उठा पाती.’’

‘‘उन के जाने के बाद घर की हालत ठीक नहीं थी. इसी वजह से मुझे शहर आना पड़ा.’’

‘‘मां से मिलने जाती होंगी?’’

‘‘अभी नहीं जा पाई. सोच रही हूं उन्हें यहां बुला लूं. पता नहीं आने के लिए तैयार होंगी भी या नहीं.’’

‘‘मां बच्चों की खातिर हर परिस्थिति में एडजस्ट हो जाती है तुम बुलाओगी तो जरूर आएंगी.’’

‘‘मुझे अब गांव का वातावरण रास नहीं आता. यहां की आदत हो गई है.’’

‘‘यहां कहां काम करती हो? कौन सी कंपनी जौइन की है?’’

‘‘तुम्हारी तरह बड़ी कंपनी नहीं है.’’

‘‘मैं ने तुम्हें अपनी कंपनी का नाम भी नहीं बताया.’’

‘‘मैं ने कल तुम्हारा विजिटिंग कार्ड देख कर तुम्हारे बारे में पता लगा लिया. जीने के लिए बहुत कुछ सीखना पड़ता है और साथ ही समझते भी करने पड़ते हैं,’’ बातें करते हुए काफी देर हो गई थी.

‘‘आज बातों से ही पेट भरने का इरादा है क्या?’’ रीवा बोली.

‘‘तुम बताओ क्या लोगी?’’

‘‘मुझे वाइन पसंद है और तुम्हें?’’

‘‘मैं बीयर ले लूंगा. खाना भी और्डर कर देते हैं. आने में टाइम लगेगा.’’

‘‘नौनवैज में कुछ भी चलेगा. वैसे मुझे फिश ज्यादा पसंद है.’’

रीवा की बात सुन कर भावेश बुरी तरह  चौंक गया. उसे ठीक से याद था कि उन का परिवार शुद्ध शाकाहारी था. रीवा की बातों में अतीत और वर्तमान की हर बात पर विरोधाभास देख कर वह बार बार चौंक रहा था. यह सब उस की समझ से परे था कि उस में इतना परिवर्तन कैसे आ गया?

‘‘किस सोच में डूब गए?’’

‘‘कुछ नहीं.’’

‘‘यह सब छोड़ो और लाइफ ऐंजौय करो,’’ रीवा बोली.

दोनों ने चियर्स कह कर ड्रिंक लेनी शुरू की. खाना खाने में काफी देर हो गई

थी. रीवा को थोड़ा नशा भी हो गया था फिर भी वह बहुत संतुलित हो कर बातें कर रही थी.

‘‘काफी रात हो गई है. चलो चलते हैं,’’ कह कर रीवा उठी.

भावेश उस के साथ बाहर चला आया. बोला, ‘‘मैं तुम्हें घर छोड़ दूं?’’

‘‘नहीं यार प्रवेश ने देख लिया तो गड़बड़ हो जाएगी.’’

‘‘यह प्रवेश कौन है?’’

‘‘मैं तुम्हें बताना भूल गई थी.’’

‘‘तुम्हारा बौयफ्रैंड?’’

‘‘मैं इस के साथ लिव इन रिलेशनशिप में हूं. इस के साथ ही रहती हूं.’’

‘‘तुम ने कहा था शादी नहीं की?’’

‘‘झूठ थोड़े ही कहा था. साथ रहते हैं

इस का मतलब यह तो नहीं कि हम ने शादी कर ली.’’

‘‘कब से चल रहा है यह सब?’’

‘‘2 साल हो गए. दरअसल, जब मैं गांव से आई थी तो उस ने मेरी यहां एडजस्ट होने में काफी मदद की थी. उस से दोस्ती हो गई और हम एक ही छत के नीचे साथ रहने लगे.’’

यह सुन कर भावेश का नशा उतर गया. रीवा को ले कर पिछले 2 दिन में उस ने बहुत सारी कल्पनाएं कर ली थीं जो एक झटके में जमीन पर आ गईं.

भावेश ने रीवा को घर से कुछ दूरी पर छोड़ दिया. लड़खड़ाती हुई रीवा घर की ओर बढ़ गई. भावेश भी किसी तरह अपनेआप को संभाल कर घर चला आया. रीवा की बात सुन कर वह बहुत परेशान हो गया था. आधुनिकता के नाम जो कुछ हो सकता था रीवा उस सब का जीताजागता उदाहरण थी. उस ने सोच लिया था कि वह उस के बारे में सबकुछ जान कर रहेगा.

दूसरे दिन दोपहर में रीवा का फोन आ गया, ‘‘मेरे बारे में जान कर लगता है तुम्हें बहुत ठेस लगी.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है.’’

‘‘झूठ मत बोलो. मैं सब समझती हूं. अगर यह सब तुम्हें पहले दिन ही बता देती तो तुम मुझ से मिलने न आते.’’

‘‘यह तुम्हारी गलतफहमी है. हमतुम बचपन के साथी हैं. इन सब बातों से हमारा रिश्ता थोड़े ही छूट जाएगा.’’

‘‘तुम्हारी बात सुन कर मुझे अच्छा लगा. इतनी बड़ी दुनिया में जीने के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है. बहुत मुश्किल से मैं ने भी अपनेआप को परिस्थितियों को झेलने के लिए तैयार किया है. मैं अपनी जिंदगी में खुश हूं.’’

‘‘मुझे अभी काफी काम है. बाकी बातें मिलने पर हो जाएंगी.’’

‘‘कब मिलोगे?’’

‘‘जब तुम कहो.’’

‘‘ठीक है. कल शाम मिलते हैं उसी जगह पर,’’ रीवा बोली. भावेश ने गुड बाय कर दिया.

रीवा को भी सुन कर अच्छा लगा कि भावेश ने उस की किसी बात का बुरा नहीं माना. भावेश के दिमाग में कई तरह की आंधियां चल रही थीं. एक ही सिक्के के दो पहलू देख कर वह उसे एकसाथ जोड़ नहीं पा रहा था और न ही उसे इस का कोई सूत्र मिल रहा था. वह समझ नहीं पा रहा था इस दोस्ती को आगे बढ़ाए या नहीं.

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