गूगल लैंस एक क्लिक और सारी जानकारी सामने

गूगल लैंस एक विजुअल सर्च डिवाइस है जो बैठेबैठे आप को दुनिया के किसी भी शहर, राज्य और देश के प्रोडक्ट की जानकारी सिर्फ एक फोटो या स्कैन के जरिए आप के मोबाइल फोन पर ला कर देता है.

यह कैसे काम करता है, यह जानने के लिए मान लीजिए कि आप के पास एक पानी की बोतल है. आप नहीं जानते कि वह किस कंपनी की है क्योंकि उस बोतल पर लगा लेबल मिट चुका है. अब आप यह जानना चाहते हैं कि वह बोतल किस कंपनी की है? उस बोतल की कीमत क्या है? यह कहां से खरीदी जा सकती है वगैरहवगैरह. इन सारे सवालों के जवाब गूगल लैंस आप को देगा.

आप को करना सिर्फ यह है कि गूगल लैंस में जा कर उस बोतल को स्कैन करना है या फोटो खींचना है. गूगल लैंस चंद सैंकंडों में आप को उस बोतल से मिलतीजुलती बोतल आप के फोन की स्क्रीन पर दिखा देगा. इस के अलावा गूगल लैंस उस बोतल या उस के जैसी दिखने वाली बोतलों के बारे में भी जानकारी देगा.

सिर्फ इतना ही नहीं, गूगल लैंस पढ़ाई में भी आप की हैल्प करता है. जी हां पढ़ाई. यह सुन कर आधे बैकबैंचरों में मन में हिलोरें पड़ गई होंगी, क्योंकि इस का नाम सुनते ही बच्चे दूर भागने लगते हैं. गूगल लैंस इसे भी आसान बना देता है. कैसे? अपनी बुक के किसी प्रश्न या गणित के सवाल को गूगल लैंस में स्कैन करें या उस की फोटो खींचें. उस के बाद आप की स्क्रीन पर उस का जवाब आ जाएगा. है न कमाल की बात.

गूगल लैंस की भाषा

अभी गूगल लैंस हिंदी, इंग्लिश, रशियन, स्पैनिश, फ्रैंच, जरमन, जैपनीज, इटैलियन, पौर्चुगीज, कोरियन, चाइनीज, डैनिश, डच, इंडोनेशियन, पोलिश, स्वीडिश, थाई, टर्किश और वियतनामीज भाषाओं में उपलब्ध है.

मोबाइल फोन या टेबलेट में गूगल लैंस की सैंटिग कैसे करें, आइए जानते हैं :

स्टैप 1 : सब से पहले मोबाइल फोन की सैटिंग में जाएं.

स्टैप 2 : ऐप्स पर क्लिक करें.

स्टैप 3 : अब ऐप मैनेजमैंट पर क्लिक करें.

स्टैप 4 : इस के बाद लैंस या गूगल लैंस पर क्लिक करें.

स्टैप 5 : अब परमिशन पर क्लिक करें.

स्टैप 6 : अंत में कैमरे पर क्लिक करें. आप का गूगल लैंस.

अब यह आप की हैल्प करने के लिए तैयार है.

गूगल लैंस के फायदे

जानकारी का बेहतर स्रोत : अगर आप किसी जगह या प्रोडक्ट की जानकारी चाहते हैं तो गूगल लैंस पर उस की फोटो स्कैन या खींचें. फिर उसे गूगल लैंस पर सर्च औप्शन पर जा कर सर्च करें. इस के बाद आप को स्क्रीन पर उस से जुड़े कई प्रोडक्ट दिख जाएंगे. आप को उस प्रोडक्ट के बारे में जानना हो या उस की कीमत, सब जान सकते हैं.

गूगल लैंस दे प्लेस की जानकारी : इसी तरह अगर आप किसी मार्केट, हौस्पिटल, तीर्थस्थल की फोटो गूगल लैंस में स्कैन करते हैं तो आप के मोबाइल फोन की स्क्रीन पर उस प्लेस से जुड़े कई रिजल्ट देखने को मिल जाते हैं. अब आप को जो भी जानकारी चाहिए वह आप ले सकते हैं.

टैक्स्ट को करें ट्रांसलेट : मान लीजिए आप के हाथ गुजराती भाषा की कोई किताब लग गई है. उस के फोटो इतने अट्रैक्टिव हैं कि आप उसे पढ़े बिना रह नहीं पा रहे हैं लेकिन प्रौब्लम यह है कि आप को गुजराती भाषा नहीं आती है. गूगल लैंस के पास इस का भी उपाय है. गूगल लैंस किसी टैक्स्ट को किसी भी भाषा में ट्रांसलेट कर सकता है. टैक्स्ट ट्रांसलेट करने के लिए आप गूगल लैंस में जा कर टैक्स्ट को स्कैन करें. अब ट्रांसलेट के औप्शन में जा कर सर्च औप्शन पर क्लिक करें. फिर ट्रांसलेट पर जा कर क्लिक करें. अब भाषा सलैक्ट कर के क्लिक करें, आप का टैक्स्ट आप की भाषा में आ जाएगा. वहीं टैक्स्ट पर क्लिक करने से सारा टैक्स्ट कौपी भी हो जाता है.

सुनें ट्रांसलेटेड टैक्स्ट को : आप का दोस्त फ्रैंच लैंग्वेज सीख रहा है. वह आप को अपनी टैक्स्टबुक दिखाते हुए कहता है कि इस शब्द का मतलब ‘हैलो’ है. अब वह कहता है कि तुम बताओ इस दूसरे शब्द का क्या मतलब क्या है? तब आप उस शब्द को गूगल लैंस में स्कैन कर के ट्रांसलेट के औपशन में जा कर अपनी भाषा सलैक्ट कर के लिसन पर क्लिक करें. अब आप उस शब्द का क्या मतलब है, यह सुन सकते हैं. आप चाहें तो बीच में वौयस को रोक भी सकते हैं.

टैक्स्ट को फोल्डर में करें सेव : जानकारी लेना, ट्रांसलेट करना और सुनने के अलावा आप गूगल लैंस की हैल्प से टैक्स्ट को कौपी कर के किसी भी फोल्डर में पेस्ट भी कर सकते हैं. यहां तक कि आप इसे अपने दोस्तों के साथ सिर्फ एक क्लिक से शेयर भी कर सकते हैं.

इस तरह से आप गूगल लैंस के फीचर का इस्तेमाल अपनी जानकारी बढ़ाने और काम को जल्दी निबटाने में कर सकते हैं.

सप्ताह में 70 घंटे काम का औचित्य

देश में सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की एक बड़ी कंपनी इंफोसिस के मालिक नागवार रामाराव नारायणमूर्ति ने अपील की है कि अगर हमें भारत को चीन और जापान से बेहतर देश बनाना है तो हर युवा को सप्ताह में 30-40 घंटे वाली नौकरी नहीं, 70 घंटे काम करने वाली नौकरी ढूंढ़नी चाहिए. नारायणमूर्ति ने खुद इस से ज्यादा घंटे काम कर के इंफोसिस को बनाया, यह सच है. पर हर जना 70 घंटे काम करे, इस के लिए जो संस्कृति देश में चाहिए वह है कहां. नारायणमूर्ति अपनी असली संस्कृति के बारे में कुछ कहेंगे, यह असंभव है.

सब से बड़ी बात यह है कि हमारी संस्कृति तो निठल्ले बनाने का उपदेश देती है. सूरजपुर के भृगु ज्योतिष रिसर्च सैंटर से हर रोज दिन का पंचांग जारी होता है, जो साफ कहता है कि 70 घंटे काम न करो, पूजापाठ करो. 29 अक्तूबर, 2023 के पंचांग का उपदेश देखिएर्

  •  यह कार्तिक मास है जो पापनाशक है. इस का बड़ा दिव्य प्रभाव होता है. यह भगवान विष्णु की कृपा से मोक्षरूपी फल प्रदान करने वाला है. इस का अर्थ है, जब मास कार्तिक हो और मोक्ष मिल ही रहा हो, तो 70 क्या, 40 घंटे भी काम करने की जरूरत क्या है.
  •     कार्तिक मास के 5 नियम हैं- प्रतिदिन विष्णु के समीप रात्रि में जागरण, तुलसी सेवा, उद्यापन करना, दीपदान करना और फिर शास्त्रानुसार स्नान करना. ये सब तय हैं. सप्ताह के 72 घंटे काम में से 10-20 घंटे तो इसी में निकल जाएंगे, तो क्या कल्याण होगा?
  •   इस में कृच्छ व्रत करना होता है. इस व्रत के नाम का मतलब जो भी हो पर इस में एक दिन निराहार रहो, फिर पंचगव्य जिस में गौमूत्र आदि शामिल हैं, लो. अब भूखे पेट क्या इंफोसिस में काम कर पाओगे? नारायणमूर्ति संस्कारों के समर्थक हैं तो इस को भी मानते होंगे. वे तय करें कि जो एक दिन भूखा रहेगा और दूसरे दिन गौमूत्र आदि का पंचगव्य ग्रहण करेगा, वह उन के दफ्तर में क्या काम करेगा. 70 घंटे यानी 10-20 घंटे रोज तो भूल जाओ, ऐसे में तो 2 घंटे भी काम रोज नहीं हो पाएगा.
  •    इस पूरे माह कौपर के यूटैंसिल वर्जित हैं. अब किचन में किस बरतन में लोहे के साथ कौपर भी है, यह भी ढूंढ़ें और फिर शुद्ध लोहे या मिट्टी के बरतनों में पका खाना खाएं. यह निर्देश है. पत्नी या स्त्री के साथ पूरे माह सोने पर भी पाबंदी है. ज्योतिषीजी बिस्तर में भी.
  •   मुख्य काम इस माह जो करना होता है वह ब्राह्मणों को पृथ्वीदान होता है. अब इस पृथ्वी को दान में कैसे दिया जाता है, यह तो सनातनी संस्कारी लोग जानते हैं पर जो लोग 70 घंटे सप्ताह में काम करना चाहते हैं, वे अपने पर खर्च करेंगे, ब्राह्मणों पर नहीं.
  •    इस माह का संस्कारी निर्देश यह भी है कि ब्राह्मण पतिपत्नी को भोजन कराएं, उन्हें कंबल, बिछौना, रत्न, वस्त्र, जूते, छाते भी दान करें. 70 घंटों के काम के जो पैसे मिलेंगे वे इस दान को पूरा कर पाएंगे, इस में संदेह है.
  • तुलसीपूजन भी करें. यह भी सैकंडों का काम नहीं होता. हिंदू विधि के अनुसार तुलसी पूजा की प्रक्रिया में घंटों लग सकते हैं. पता नहीं नारायणमूर्ति 70 घंटों में इन घंटों को गिनते हैं या नहीं, पर वे हैं संस्कारी, यह मालूम है.
  •   व्हाट्सऐप मैसेज के माध्यम से ये निर्देश दिए गए हैं जिन में यह भी कहा गया है कि अतुल लक्ष्मी, रूप, सौभाग्य व संपत्ति प्राप्त करनी है तो संध्या में भगवान श्रीहरि के नाम से तिल के तेल का दीया जलाएं. इस के लिए आप को संध्या के समय दीपदान के निकट रहना होगा. अगर घर में नहीं, तो दफ्तर में कंप्यूटरों की जगह तीनों की व्यवस्था की सलाह नारायणमूर्ति ने दी है या नहीं, हम नहीं जानते पर 70 घंटे सप्ताह में काम करना है तो संस्कार छोड़ने होंगे ही.

बातें तो और भी बहुत हैं पर ये कुछ नमूने हैं उन सनातनी संस्कारों के जिन की पोलपट्टी इंफोसिस कंपनी के संस्थापक को पहले खोलनी चाहिए और फिर 70 घंटे काम करने की सलाह देनी चाहिए. देश निकम्मा है, निठल्ला है, गरीब है, पिछड़ा है, भूखा है, बेकार है तो इसलिए कि हम इन संस्कारों के पीछे पड़े हैं. नरेंद्र मोदी से ले कर नारायणमूर्ति तक वैज्ञानिक बातें करते हैं पर फिर पाखंड भरे पूजापाठ में लग जाते हैं. जनवरी में नरेंद्र मोदी देश की जनता के काम के हजारोंलाखों घंटे बरबाद करने वाले एक और तीर्थ रामलला के मंदिर के उद्घाटन से करेंगे.

सप्ताह में 70 घंटे काम करने का माहौल तब बनेगा जब युवा ही नहीं, प्रौढ़ और वृद्ध भी अपना समय काम में लगाएं, निर्माण में लगाएं, उत्पादन में लगाएं, खोजबीन में लगाएं, धर्म की उपरोक्त फालतू बातों में न लगाएं. पर न तो प्रधानमंत्री न ही प्रधान कंपनी के प्रधान संचालक इस पाखंड के खिलाफ कुछ कहेंगे, उलटे, वे इसे प्रोत्साहित कर असल काम को बेकार ही सिद्ध करेंगे.

सर्दी में फ्लू या इन्फ्लुएंजा वायरस की वैक्सीन को न करें नज़रंदाज़

सर्दियाँ आते ही खासकर फ्लू और इन्फ्लुएंजा की बीमारी बच्चों और वयस्कों में अधिक देखी जाती है. इसकी संख्या में सालों साल बढ़ोत्तरी होती जा रही है. जिस व्यक्ति को फ्लू या इन्फ्लुएंजा होता है, उसकी दशा एक सप्ताह के लिए समस्या युक्त हो जाती है, जिसमे सिरदर्द, बदन दर्द, तेज बुखार, थकान आदि कई समस्या होने लगती है.

इस मौसम में छोटे बच्चे और वयस्क, जिन्हें अस्थमा या किसी प्रकार की क्रोनिक बीमारी हो, वे फ्लू से सम्बंधित किसी भी वायरस के शिकार हो सकते है, क्योंकि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है. उन्हें ये वैक्सीन्स लेना सही होता है. फ्लू से कई बार उन्हें इतनी अधिक परेशानी हो जाती है कि उन्हें अस्पताल में भी भर्ती करवाना पड़ता है. समय पर इलाज़ न मिलने पर रोगी की मृत्यु तक हो सकती है.

फ्लू या इन्फ्लुएंजा है क्या

असल में फ्लू, इन्फ्लुएंजा वायरस से होता है, जो बहुत अधिक संक्रामक होता है. फ़्लू कई प्रकार के होते हैं, लेकिन मनुष्यों के लिए सबसे खतरनाक आमतौर पर टाइप ए होता है. ये वे वायरस हैं, जो महामारी का कारण बनते हैं, जिसमें 1918 की महामारी और कोविड 19 भी शामिल है, जिसने दुनिया भर में लाखों लोगों की जान ली. इन्फ्लूएंजा ए और बी वायरस संयुक्त राज्य अमेरिका में लगभग हर सर्दियों में लोगों में बीमारी की मौसमी महामारी का कारण बनते हैं इसे वहां पर फ्लू का मौसम भी कहा जाता है. इन्फ्लूएंजा ए वायरस एकमात्र इन्फ्लूएंजा वायरस है, जो फ्लू महामारी का कारण बनता है.

वैक्सीन की प्रक्रिया   

इस पर रोकथाम के लिए कई प्रकार के वैक्सीन भी वैज्ञानिक निकालते रहते है, जिसमे दो खास वैक्सीन का प्रयोग अधिक होता है, वन शॉट यानि इंजेक्शन या नेजल स्प्रे. इंजेक्शन में डेड इन्फ्लुएंजा वायरस को शामिल कर बनाए जाने की वजह से इसे 4 अलग – अलग स्ट्रेन्स के लिए प्रभावकारी होता  है. जबकि नेजल स्प्रे लाइव वायरस से बनता है, जो किसी भी फ्लू के वायरस को कमजोर कर शरीर के अंदर प्रवेश करने से रोकती है. इन्फ्लुएंजा के वायरस हर साल बदलता रहता है, इसलिए वैज्ञानिक भी हर साल फ्लू सीजन के लिए शोध के द्वारा नए वैक्सीन को लोगों तक उपलब्ध करवाते रहते है. दोनों ही वैक्सीन शरीर में एंटी बॉडी तैयार करती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाती है, जिससे फ्लू या इन्फ्लुएंजा के वायरस शारीर में प्रवेश न कर सकें.

हर साल में एक बार इंजेक्शन लगाना या फिर नेजल स्प्रे को अधिक प्राथमिकता दी जा रही है. वर्ष 2023 – 2024 सीज़न के लिए सभी नेज़ल स्प्रे इन्फ्लूएंजा (फ्लू) टीके, चार फ्लू वायरस से बचाने के लिए बनाए गए है.

  • इन्फ्लूएंजा ए (एच1एन1) वायरस,
  • इन्फ्लूएंजा ए (एच3एन2) वायरस
  • और दो इन्फ्लूएंजा बी वायरस (विक्टोरिया और यामागाटा वंश)

इस बारें में मायलैब डिस्कवरी सॉल्यूशंस के आर एंड डी हेड डॉ. गौतम वानखेड़े कहते है कि फ्लू सभी को कभी न कभी होता रहता है, लेकिन जिन लोगों को बार – बार सर्दी – जुकाम या अस्थमा होता है, उम्र बहुत अधिक होती है, उन्हें इम्युनिटी कम होने से फ्लू, जो आम व्यक्ति को साधारणतः एक या दो बार साल में होता और चला जाता है, लेकिन अतिसंवेदनशील व्यक्ति को वही फ्लू फैलकर बाद में निमोनिया का रूप ले लेती है और अंत में कई बार मृत्यु भी हो जाती है. हमारे देश में एक स्टडी में ये पता चला है कि इन्फ्लुएंजा से निमोनिया होकर सवा लाख लोगों की मृत्यु एक साल में हो चुकी है. भारत में उपलब्ध विशेष सुई-मुक्त, नेजल फ्लू वैक्सीन के रूप में नेसोवेक – एस 4 (NASOVAC-S4) इन्फ्लूएंजा वायरस की रोकथाम में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली नेजल स्प्रे है. सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया का भागीदारी बनने की वजह से इसमें कामयाबी अधिक मिली है.

पर्यावरण प्रदूषण भी है जिम्मेदार

आज कल पर्यावरण प्रदूषण की वजह से श्वास सम्बन्धी बीमारियाँ अधिक हो रही है, ऐसे में भी वैक्सीन कुछ हद तक काम करती है, इसलिए इसे लेने से परहेज नहीं करना चाहिए. असल में इन्फ्लुएंजा के वायरस हर साल थोड़े बदलाव के साथ ह्युमन शरीर में प्रवेश करती है और ये संक्रामक होती है.  इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन और नेशनल सेंटर फॉर कम्युनिकेबल डिसीज हर साल स्टडी कर बताते है कि इस साल 4 से 5 वायरस के किस वैरिएंट के आने की उम्मीद है, फिर सभी वैज्ञानिक हर साल उसी का शोध कर नया वैक्सीन निकालते है और ये हर वैक्सीन के बॉक्स पर नए वर्ष के साथ लिखा होता है, ताकि उस वैक्सीन का प्रयोग उसी साल हो सके. इसमें इंडिया की स्थिति यानि उत्तरी गोलार्द्ध भी लिखा होता है, क्योंकि हर क्षेत्र के फ्लू के वायरस अलग होते है, इसलिए वैक्सीन भी उसी क्षेत्र के आधार पर बनाई जाती है. हर साल में एक बार वैक्सीन लेना जरुरी होता है.

सावधानियां   

वैज्ञानिक और डॉ. गौतम आगे कहते है कि नेजल स्प्रे को कम से कम 2 साल के बच्चे ले सकते है, लेकिन अपर लिमिट का अभी तक किसी प्रकार का निर्देश नहीं मिला है. 2 साल से अधिक उम्र के कोई भी नेजल स्प्रे का प्रयोग कर सकते है, इसके प्रयोग से किसी प्रकार का कंट्राडिक्शन या प्रतिरोध अभी तक नहीं दिखा है, लेकिन जैसा किसी भी वैक्सीन के साथ होता है, इसका भी वैसी ही सावधानियां है, मसलन

  • अंडे से एलर्जी,
  • लगातार एस्परिन लेने वाले 17 साल से कम उम्र के बच्चे,
  • अधिक जुकाम सर्दी खांसी होने पर भी नेजल स्प्रे लेने से परहेज करना चाहिए,
  • जिस किसी को पिछले फ़्लू शॉट या नेज़ल स्प्रे से गंभीर प्रतिक्रिया हुई हो,
  • बुखार के साथ मध्यम से गंभीर बीमारी वाले लोग, ठीक होने के बाद उन्हें टीका लगाया जाना चाहिए.

प्रेग्नेंट वुमन को लेकर भी किस प्रकार का प्रतिरोध सामने नहीं आया है, लेकिन इस स्प्रे को लेने से पहले डॉक्टर या हेल्थ केयर की सलाह अवश्य लें. यह टीका सुई और मसल्स पेन की आवश्यकता को समाप्त करता है, जिससे सभी उम्र के रोगियों के लिए दर्द रहित और तनाव मुक्त टीकाकरण अनुभव सुनिश्चित होता है. इसे प्रयोग में लेना बहुत आसान है. इसे कोई भी खुद ले सकता है, लेकिन डॉक्टर के ऑब्जरवेशन में लेना अच्छा होता है. ये स्प्रे वैक्सीन है, इसलिए दिए गए निर्देश के अनुसार हर एक नासिका छिद्र में 0.25 मिलीलीटर ड्राप डालना पड़ता है. पूरी मात्रा 0.50 मिलीलीटर होती है. ड्राप डालने के बाद 10 से 15 मिनट रेस्ट करने की जरुरत होती है. ये वैक्सीन सभी सरकारी अस्पताल और हेल्थ केयर सेंटर पर उपलब्ध है.

Wedding Special: 4 फेवरेट लुक्स बाय मेकअप आर्टिस्ट

शायद ही कोई महिला ऐसी हो , जिसे मेकअप करना पसंद न हो. खासकर के जब बात हो वेडिंग
सीजन की. ऐसे में हमेशा एक जैसा मेकअप या फिर एक जैसा लुक जहां उबाऊ लगने लगता है, वहीं
इससे हमारे डिज़ाइनर आउटफिट्स की भी गेटअप नहीं बढ़ पाती है. ऐसे में जरूरी है हर ओकेजन
पर आउटफिट्स के साथसाथ खुद को मेकअप से अपटूडेट रखने की, ताकि देखने वाले बस आपको ही
देखते रह जाएं. तो आइए जानते हैं इस संबंध में  मेकअप आर्टिस्ट एंड एंटरप्रेन्योर वीनी धमिजा से.
जो मेकअप में एक्सपर्ट होने के साथसाथ वे अब तक कई सेलेब्रिट्रीज़ का मेकअप कर चुकी हैं. साथ ही
कई मूवीज व नेटफ्लिक्स सीरीज में मेकअप आर्टिस्ट की भूमिका भी निभा चुकी हैं. यही नहीं बल्कि
कई लोकल फैशन शोज में सेलिब्रिटी जज भी बन चुकी हैं. ऐसे में खास दिन के लिए मेकअप आर्टिस्ट
के टिप्स से आप भी खास दिख सकते हैं.

– मेहंदी एंड हलदी लुक

 
अगर आप एक्सपेरिमेंट करना पसंद करती हैं और आप खास दिन पर लोगों को अपने चकाचौंध
करने वाले कट क्रीज़ मेकअप लुक से हैरान करना चाहती हैं तो ये लुक आपको बहुत पसंद आएगा.
कट क्रीज़ एक तरह का आई मेकअप होता है. इसमें डबल शेड्स यूज़ किए जाते हैं, ताकि आईज की
क्रीज़ को ज्यादा हाईलाइट किया जा सके. इस मेकअप में आईज पर आईशैडो की अलगअलग लेयर्स
अलग से हाईलाइट होती है. अकसर आपने देखा होगा कि ब्राइडल या फिर फैमिली की और गर्ल्स या
लेडीज इस दिन पिंक, ग्रीन, ऑरेंज या फिर येलो आउटफिट्स पहनना ही पसंद करती हैं. क्योंकि ये
आउटफिट्स इस दिन कलर के हिसाब से परफेक्ट होने के साथसाथ काफी ऐलीगैनस लुक भी देते हैं.
लेकिन अगर आप इस दिन मैचिंग एक्सेसरीज के साथ कट क्रीज़ मेकअप लुक करवा लें तो आपका
दिन बनने के साथसाथ आपके चांद से चेहरे पर से किसी की नजर ही नहीं हटेगी. फिर चाहे आप
होने वाली ब्राइडल हो या फिर उसकी फ्रेंड या फिर फैमिली मेंबर. ये लुक देखकरआप भी खुद को
निहारती रह जाएंगी.

– शिमर लुक


चाहे हलदी फंक्शन हो या फिर मेहंदी की रात, सजना तो बनता है. अब वो दिन गए जब आप हलदी
व मेहंदी में जैसे मर्जी कपड़े पहन कर बैठ जाएं. अब तो इनका प्रोपर फंक्शन होने के साथसाथ सभी
इन फंक्शंस के लिए भी खास आउटफिट्स पहनने के साथसाथ खास मेकअप करवाना पसंद करते हैं ,
ताकि हर फंक्शन में अलग दिख सकें. ऐसे में जब दिन इतना खास है तो आउटफिट के साथसाथ
मेकअप भी खास होना चाहिए. ऐसे में इस दिन के लिए शिमरी ट्विस्ट के साथ मिनिमम मेकअप
लुक देने की कोशिश की जाती है. इसमें पिंक, पीच या फिर गोल्ड मेकअप लुक के साथ आपके दिन
को अलग , अट्रैक्टिव व खास बनाने की कोशिश की जाती है. आउटफिट्स के साथ में मैचिंग की गोटा
पट्टी वाली फ्लोरल ज्वेलरी आपकी ब्यूटी में और चारचांद लगाने का काम करती है. तो फिर है न
रेडी फोर शिमर लुक.

– पार्टी लुक


पार्टी के लिए पीच आउटफिट तो रेडी हो गए, जिस की होट सी स्लीव्स और चोली पर हैवी वर्क है,
साथ में गोल्डन कलर की मैचिंग एक्सेसरीज़ के साथ मांगटिक्का आपको पार्टी के लिए रेडी कर रहा
है. लेकिन अगर ओसम सी ड्रेस व एक्सेसरीज़ के साथ मेकअप बढ़िया न हो, तो सारी मेहनत पर
पानी फिरने के साथसाथ न तो आपका दिन खास बन पाता है, साथ ही लुक भी फीकाफीका सा
लगता है. लेकिन अगर इस कलर के आउटफिट के साथ लाइट मेकअप के साथ रोजी चीक्स या फिर
पिंक वाइब चीक्स के साथ मेकअप को फाइनल टच दिया जाए , साथ में कम से कम शिमर का यूज़
करने के साथ न्यूड लिप्स रखे जाए तो पार्टी लुक रेडी होने के साथ इस खूबसूरत से लुक के सब
कायल हो जाएंगे. और यकीन मानिए ये लुक आपको पूरी पार्टी में कॉम्प्लिमेंट्स दिलवाने का काम
करेगा. और यही तो हर लड़की या हर महिला की चाहा होती है कि उसके लुक की सब तारीफ करते
न थकें.

–  ब्राइडल लुक


शादी का दिन हर लड़की के लिए खास होता है. क्योंकि इस दिन के लिए हर लड़की ढेरों सपने
संजोए रहती है कि ऐसा लहंगा पहनेंगी, उसके साथ यूनिक ज्वेलरी और साथ में परफेक्ट मेकअप.
आजकल ब्राइडल ज्यादातर रेड से हटकर इस दिन अलग व खास दिखने के लिए पिंक, डीप पर्पल
और ग्रीन कलर का लहंगा ज्यादा पहनना पसंद करती हैं , जिसके कारण इस कलर के ब्राइडल लहंगे
आजकल काफी ट्रेंड में हैं. ऐसे में अगर पिंक कलर के लहंगे के साथ स्मूथ बेस, शिमरी कलरफुल
आईलिड्स के साथ फ़्लटरी लैशेस से ब्राइडल लुक को कम्पलीट किया जाता है, तो लुक काफी
अट्रैक्टिव लगने के साथ हर किसी की निघाएं आपके मुखड़े पर टिकी की टिकी रह जाती हैं. आजकल
ब्राइडल के लुक को एन्हांस करने के लिए लाइट ज्वेलरी के साथ लाइट मेकअप का काफी ट्रेंड है. तो
फिर वेडिंग सीजन के लिए खुद को हटकर रेडी करें और बने सेंटर ओफ अट्रैक्शन

दोस्ती: अनिकेत के समझौते के खिलाफ क्या था आकांक्षा का फैसला

आकांक्षाखुद में सिमटी हुई दुलहन बनी सेज पर पिया के इंतजार में घडि़यां गिन रही थी. अचानक दरवाजा खुला, तो उस की धड़कनें और बढ़ गईं.

मगर यह क्या? अनिकेत अंदर आया.

दूल्हे के भारीभरकम कपड़े बदल नाइटसूट पहन कर बोला, ‘‘आप भी थक गई होंगी. प्लीज, कपड़े बदल कर सो जाएं. मुझे भी सुबह औफिस जाना है.’’

आकांक्षा का सिर फूलों और जूड़े से पहले ही भारी हो रहा था, यह सुन कर और झटका लगा, पर कहीं राहत की सांस भी ली. अपने सूटकेस से खूबसूरत नाइटी निकाल कर पहनी और फिर वह भी बिस्तर पर एक तरफ लुढ़क गई.

अजीब थी सुहागसेज. 2 अनजान जिस्म जिन्हें एक करने में दोनों के परिवार वालों ने इतनी जहमत उठाई थी, बिना एक हुए ही रात गुजार रहे थे. फूलों को भी अपमान महसूस हुआ. वरना उन की खुशबू अच्छेअच्छों को मदहोश कर दे.

अगले दिन नींद खुली तो देखा अनिकेत औफिस के लिए जा चुका था. आकांक्षा ने एक भरपूर अंगड़ाई ले कर घर का जायजा लिया.

2 कमरों का फ्लैट, बालकनी समेत अनिकेत को औफिस की तरफ से मिला था. अनिकेत एअरलाइंस कंपनी में काम करता है. कमर्शियल विभाग में. आकांक्षा भी एक छोटी सी एअरलाइंस कंपनी में परिचालन विभाग में काम करती है. दोनों के पिता आपस में दोस्त थे और उन का यह फैसला था कि अनिकेत और आकांक्षा एकदूसरे के लिए परफैक्ट मैच रहेंगे.

आकांक्षा को पिता के फैसले पर कोईर् आपत्ति नहीं थी, पर अनिकेत ने पिता के दबाव में आ कर विवाह का बंधन स्वीकार किया था. आकांक्षा ने औफिस से 1 हफ्ते की छुट्टी ली थी. सब से पहले किचन में जा कर चाय बनाई, फिर चाय की चुसकियों के साथ घर को संवारने का प्लान बनाया.

शाम को अनिकेत के लौटने पर घर का कोनाकोना दमक रहा था. जैसे ही अनिकेत ने घर में कदम रखा, करीने से सजे घर को देख कर उसे लगा क्या यह वही घर है जो रोज अस्तव्यस्त होता था? खाने की खुशबू भी उस की भूख को बढ़ा रही थी.

आकांक्षा चहकते हुए बोली, ‘‘आप का दिन कैसा रहा?’’

‘‘ठीक,’’ एक संक्षिप्त सा उत्तर दे कर अनिकेत डाइनिंग टेबल पर पहुंचा. जल्दी से खाना खाया और सीधा बिस्तर पर.

औरत ज्यादा नहीं पर दो बोल तो तारीफ के चाहती ही है, पर आकांक्षा को वे भी नहीं मिले. 5 दिन तक यही दिनचर्या चलती रही.

छठे दिन आकांक्षा ने सोने से पहले अनिकेत का रास्ता रोक लिया, ‘‘आप प्लीज 5 मिनट

बात करेंगे?’’

‘‘मुझे सोना है,’’ अनिकेत ने चिरपरिचित अंदाज में कहा.

‘‘प्लीज, कल से मुझे भी औफिस जाना है. आज तो 5 मिनट निकाल लीजिए.’’

‘‘बोलो, क्या कहना चाहती हो,’’ अनिकेत अनमना सा बोला.

‘‘आप मुझ से नाराज हैं या शादी से?’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘आप जानते हैं मैं क्या जानना चाहती हूं?’’

‘‘प्लीज डैडी से बात करो, जिन का

फैसला था.’’

‘‘पर शादी तो आप ने की है? आकांक्षा को भी गुस्सा आ गया.’’

‘‘जानता हूं. और कुछ?’’ अनिकेत चिढ़ कर बोला.

आकांक्षा समझ गई कि अब सुलझने की जगह बात बिगड़ने वाली है. बोली, ‘‘क्या यह शादी आप की मरजी से नहीं हुई है?’’

‘‘नहीं. और कुछ?’’

‘‘अच्छा, ठीक है पर एक विनती है आप से.’’

‘‘क्या?’’

‘‘क्या हम कुछ दिन दोस्तों की तरह रह सकते हैं?’’

‘‘मतलब?’’ अनिकेत को आश्चर्य हुआ.

‘‘यही कि 1 महीने बाद मेरा इंटरव्यू है. मुझे लाइसैंस मिल जाएगा और फिर मैं आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका चली जाऊंगी 3 सालों के लिए. उस दौैरान आप को जो उचित लगे, वह फैसला ले लीजिएगा… यकीन मानिए आप को परेशानी नहीं होगी.’’

अनिकेत को इस में कोई आपत्ति नहीं लगी. फिर दोनों साथसाथ

नाश्ता करने लगे. शाम को घूमने भी जाने लगे. होटल, रेस्तरां यहां तक कि सिनेमा भी. आकांक्षा कालेजगर्ल की तरह ही कपड़े पहनती थी न कि नईनवेली दुलहन की तरह. उन्हें साथ देख कर कोई प्रेमी युगल समझ सकता था, पर पतिपत्नी तो बिलकुल नहीं.

कैफे कौफीडे हो या काके दा होटल, दोस्तों के लिए हर जगह बातों का अड्डा होती है और आकांक्षा के पास तो बातों का खजाना था. धीरेधीरे अनिकेत को भी उस की बातों में रस आने लगा. उस ने भी अपने दिल की बातें खोलनी शुरू कर दी.

एक दिन रात को औफिस से अनिकेत लेट आया. उसे जोर की भूख लगी थी. घर में देखा तो आकांक्षा पढ़ाई कर रही थी. खाने का कोई अतापता नहीं था.

‘‘आज खाने का क्या हुआ?’’ उस ने पूछा.

‘‘सौरी, आज पढ़तेपढ़ते सब भूल गई.’’

‘‘वह तो ठीक है… पर अब क्या?’’

‘‘एक काम कर सकते हैं, आकांक्षा को आइडिया सूझा,’’ मैं ने सुना है मूलचंद फ्लाईओवर के नीचे आधी रात तक परांठे और चाय मिलती है. क्यों न वहीं ट्राई करें?

‘‘क्या?’’ अनिकेत का मुंह आश्चर्य से खुला रह गया.

‘‘हांहां, मेरे औफिस के काफी लोग जाते रहते हैं… आज हम भी चलते हैं.’’

‘‘ठीक है, कपड़े बदलो. चलते हैं.’’

‘‘अरे, कपड़े क्या बदलने हैं? ट्रैक सूट में ही चलती हूं. बाइक पर बढि़या रहेगा… हमें वहां कौन जानता है?’’

मूलचंद पर परांठेचाय का अनिकेत के लिए भी बिलकुल अलग अनुभव था.

आखिर वह दिन भी आ ही गया जब आकांक्षा का इंटरव्यू था. सुबहसुबह घर का काम निबटा कर वह फटाफट डीजीसीए के लिए रवाना हो गई. वहां उस के और भी साथी पहले से मौजूद थे. नियत समय पर इंटरव्यू हुआ.

आकांक्षा के जवाबों ने एफआईडी को भी खुश कर दिया. उन्होंने कहा, ‘‘जाइए, अपने दोस्तों को भी बताइए कि आप सब पास हो गए हैं.’’

आकांक्षा दौड़ते हुए बाहर आई और फिल्मी अंदाज में टाई उतार कर बोली, ‘‘हे गाइज, वी औल क्लीयर्ड.’’ फिर क्या था बस, जश्न का माहौल बन गया. खुशीखुशी सब बाहर आए. आकांक्षा सोच रही थी कि बस ले या औटो तभी उस का ध्यान गया कि पेड़ के नीचे अनिकेत उस का इंतजार कर रहा है. आकांक्षा को अपने दायरे का एहसास हुआ तो पीछे हट कर बोली, ‘‘आप आज औफिस नहीं गए?’’

‘‘बधाई हो, आकांक्षा. तुम्हारी मेहनत सफल हो गई. चलो, घर चलते हैं. मैं तुम्हें लेने आया हूं,’’ अनिकेत ने मुसकराते हुए बाइक स्टार्ट की.

आकांक्षा चुपचाप पीछे बैठ गई. घर पहुंच कर खाना खा कर थोड़ी

देर के लिए दोनों सो गए. शाम को आकांक्षा हड़बड़ा कर उठी और फिर किचन में जाने लगी तो अनिकेत ने रोक लिया, ‘‘परेशान होने की जरूरत नहीं है. हम आज खाना बाहर खाएंगे या मंगा लेंगे.’’

‘‘ओके,’’ आकांक्षा अपने कमरे में आ कर अपना बैग पैक करने लगी.

‘‘यह क्या? तुम कहीं जा रही हो?’’ अनिकेत ने पूछा.

‘‘जी, आप के साथ 1 महीना कैसे कट गया, पता ही नहीं चला. अब बाकी काम डैडी के पास जा कर ही कर लूंगी. और वहीं से 1 हफ्ते बाद अमेरिका चली जाऊंगी.’’

‘‘तो तुम मुझे छोड़ कर जा रही हो?’’

‘‘जी नहीं. आप से जो इजाजत मांगी थी, उस की आखिरी रात है आज, आकांक्षा मुसकराते हुए बोली.’’

‘‘जानता हूं, आकांक्षा मैं तुम्हारा दोषी हूं. पर क्या आज एक अनुरोध मैं तुम से कर सकता हूं? अनिकेत ने थोड़े भरे गले से कहा.’’

‘‘जी, बोलिए.’’

‘‘हम 1 महीना दोस्तों की तरह रहे. क्या अब यह दोस्ती प्यार में बदल सकती है? इस

1 महीने में तुम्हारे करीब रह कर मैं ने जाना कि अतीत की यादों के सहारे वर्तमान नहीं जीया जाता… अतीत ही नहीं वर्तमान भी खूबसूरत हो सकता है. क्या तुम मुझे माफ कर सकती हो?’’

उस रात आकांक्षा ने कुछ ही पलों में दोस्त से प्रेमिका और प्रेमिका से पत्नी का सफर तय कर लिया, धीरधीरे अनिकेत के आगोश में समा कर.

मेरी सास हमेशा हम पर दबाव बनाए रखती हैं, मैं क्या करुं?

सवाल-

मैं 32 वर्षीय विवाहिता हूं. संयुक्त परिवार में रहती हूं. मेरे सासससुर के अलावा विवाहयोग्य देवर भी है. मेरी एक ननद भी है, जो विवाहिता है. समस्या यह है कि मेरी सास हमेशा हम पर दबाव बनाए रखती हैं कि हम ननद के लिए वक्तबेवक्त उपहार देते रहें. और तो और मेरी ससुराल वाले मेरे मायके से भी लेने का कोई मौका नहीं छोड़ते. घर का सारा खर्च हमें ही उठाना पड़ता है. ससुर रिटायर्ड हैं. देवर नौकरी करता है पर घरखर्च के लिए 1 रुपया नहीं देता. कभी कहो तो सुनने को मिलता है कि शादी के बाद वह भी जिम्मेदारी समझने लगेगा. इतनी महंगाई में एक व्यक्ति पर सारी गृहस्थी का बोझ डालना क्या वाजिब है? पति अपने मांबाप के सामने कभी जबान नहीं खोलते. ऐसे में मेरा उन से इस बारे में कुछ कहना क्या उचित होगा? पति को परेशान होते देखती हूं तो दुखी हो जाती हूं. बताएं क्या करूं?

जवाब-

आप के सासससुर को जीवन का लंबा अनुभव है. जब आप का देवर भी कमा रहा है, तो उस पर भी घरखर्च की जिम्मेदारी डालनी चाहिए. दोनों भाई मिल कर खर्च उठाएंगे तो किसी एक को परेशान नहीं होना पड़ेगा. इस के अलावा ननद पर भी खास मौके पर और अपनी हैसियत के अनुसार ही खर्च करें. सासससुर विशेषकर अपनी सास से शालीनता से बात कर सकती हैं कि वे देवर से भी घर की थोड़ीबहुत जिम्मेदारी उठाने को कहें. पूरे परिवार का एक व्यक्ति पर निर्भर रहना सही नहीं है. प्यार से बात करेंगी तो वे अवश्य इस विषय पर विचार करेंगी. भले ही शुरू में उन्हें आप का हस्तक्षेप अखरे और आप को आलोचना भी सुननी पड़े पर पति के भले के लिए आप इतना तो सुन ही सकती हैं.

सास और बहू का बेहद नजदीकी रिश्ता होते हुए भी सदियों से विवादित रहा है. तब भी जब महिलाएं अशिक्षित होती थीं खासकर सास की पीढ़ी अधिक शिक्षित नहीं होती थी और आज भी जबकि दोनों पीढि़यां शिक्षित हैं और कहींकहीं तो दोनों ही उच्चशिक्षित भी हैं. फिर क्या कारण बन जाते हैं इस प्यारे रिश्ते के बिगड़ते समीकरण के.

संयुक्त परिवारों में जहां सास और बहू दोनों साथ रह रही हैं वहां अगर सासबहू की अनबन रहती है तो पूरे घर में अशांति का माहौल रहता है. सासबहू के रिश्ते का तनाव बहूबेटे की जिंदगी की खुशियों को भी लील जाता है. कभीकभी तो बेटेबहू का रिश्ता इस तनाव के कारण तलाक के कगार तक पहुंच जाता है.

हालांकि भारत की महिलाओं का एक छोटा हिस्सा तेजी से बदला है और साथ ही बदली है उन की मानसिकता. उस हिस्से की सासें अब नई पीढ़ी की बहुओं के साथ एडजैस्टमैंट बैठाने की कोशिश करने लगी हैं. सास को बहू अब आराम देने वाली नहीं, बल्कि उस का हाथ बंटाने वाली लगने लगी है. यह बदलाव सुखद है. नई पीढ़ी की बहुओं के लिए सासों की बदलती सोच सुखद भविष्य का आगाज है. फिर भी हर वर्ग की पूरी सामाजिक सोच को बदलने में अभी वक्त लगेगा.

बहुत कुछ बदलने की जरूरत

भले ही आज की सास बहू से खाना पकाने व घर के दूसरे कामों की जिम्मेदारी निभाने की उम्मीद नहीं करती, बहू पर कोई बंधन नहीं लगाती और न ही उस के व्यक्तिगत मसलों में हस्तक्षेप करती है. पर फिर भी कुछ कारण ऐसे बन जाते हैं जो अधिकतर घरों में इस प्यारे रिश्ते को बहुत सहज नहीं होने देते. अभी भी बहुत कुछ बदलने की जरूरत है क्योंकि आज भी कहीं सास तो कहीं बहू भारी है.

हरिनूर

‘‘अरे, इस बैड नंबर8 का मरीज कहां गया? मैं तो इस लड़के से तंग आ गई हूं. जब भी मैं ड्यूटी पर आती हूं, कभी बैड पर नहीं मिलता,’’ नर्स जूली काफी गुस्से में बोलीं.

‘आंटी, मैं अभी ढूंढ़ कर लाती हूं,’’ एक प्यारी सी आवाज ने नर्स जूली का सारा गुस्सा ठंडा कर दिया. जब उन्होंने पीछे की तरफ मुड़ कर देखा, तो बैड नंबर 10 के मरीज की बेटी शबीना खड़ी थी.

शबीना ने बाहर आ कर देखा, फिर पूरा अस्पताल छान मारा, पर उसे वह कहीं दिखाई नहीं दिया और थकहार कर वापस जा ही रही थी कि उस की नजर बगल की कैंटीन पर गई, तो देखा कि वे जनाब तो वहां आराम फरमा रहे थे और गरमागरम समोसे खा रहे थे.

शबीना उस के पास गई और धीरे से बोली, ‘‘आप को नर्स बुला रही हैं.’’

उस ने पीछे घूम कर देखा. सफेद कुरतासलवार, नीला दुपट्टा लिए सांवली, मगर तीखे नैननक्श वाली लड़की खड़ी हुई थी. उस ने अपने बालों की लंबी चोटी बनाई हुई थी. माथे पर बिंदी, आंखों में भरापूरा काजल, हाथों में रंगबिरंगी चूडि़यों की खनखन.

वह बड़े ही शायराना अंदाज में बोला, ‘‘अरे छोडि़ए ये नर्सवर्स की बातें. आप को देख कर तो मेरे जेहन में बस यही खयाल आया है… माशाअल्लाह…’’

‘‘आप भी न…’’ कहते हुए शबीना वहां से शरमा कर भाग आई और सीधे बाथरूम में जा कर आईने के सामने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया. फिर हाथों को मलते हुए अपने चेहरे को साफ किया और बालों को करीने से संवारते हुए बाहर आ गई.

तब तक वह मरीज, जिस का नाम नीरज था, भी वापस आ चुका था. शबीना घबरा कर दूसरी तरफ मुंह कर के बैठ गई.

नीरज ने देखा कि शबीना किसी भी तरह की बात करने को तैयार नहीं है, तो उस ने सोचा कि क्यों न पहले उस की मम्मी से बात की जाए.

शबीना की मां को टायफायड हुआ था, जिस से उन्हें अस्पताल में भरती होना पड़ा था. नीरज को बुखार था, पर काफी दिनों से न उतरने के चलते उस की मां ने उसे दाखिल करा दिया था.

नीरज की शबीना की अम्मी से काफी पटती थी. परसों ही दोनों को अस्पताल से छुट्टी मिलनी थी, पर तब तक नीरज और शबीना अच्छे दोस्त बन चुके थे.

शबीना 10वीं जमात की छात्रा थी और नीरज 11वीं जमात में पढ़ता था. दोनों के स्कूल भी आमनेसामने थे. वैसे भी फतेहपुर एक छोटी सी जगह है, जहां कोई भी आसानी से एकदूसरे के बारे में पता लगा सकता है. सो, नीरज ने शबीना का पता लगा ही लिया.

एक दिन स्कूल से बाहर आते समय दोनों की मुलाकात हो गई. दोनों ही एकदूसरे को देख कर खुश हुए. उन की दोस्ती और गहरी होती गई.

इसी बीच शबीना कभीकभार नीरज के घर भी जाने लगी, पर वह नीरज को अपने घर कभी नहीं ले गई.

ऐसे ही 2 साल कब बीत गए, पता ही नहीं चला. अब यह दोस्ती इश्क में बदल कर रफ्तारफ्ता परवान चढ़ने लगी.

एक दिन जब शबीना कालेज से घर में दाखिल हुई, तो उसे देखते ही अम्मी चिल्लाते हुए बोलीं, ‘‘तुम्हें बताया था न कि तुम्हें देखने के लिए कुछ लोग आ रहे हैं, पर तुम ने वही किया जो 2 साल से कर रही हो. तुम्हारी जोया आपा ठीक ही कह रही थीं कि तुम एक लड़के के साथ मुंह उठाए घूमती रहती हो.’’

‘‘अम्मी, आप मेरी बात तो सुनो… वह लड़का बहुत अच्छा है. मुझ से बहुत प्यार करता है. एक बार मिल कर तो देखो. वैसे, तुम उस से मिल भी चुकी हो,’’ शबीना एक ही सांस में सबकुछ कह गई.

‘‘वैसे अम्मी, अब्बू कौन होते हैं हमारी निजी जिंदगी का फैसला करने वाले? कभी दुखतकलीफ में तुम्हारी खैर पूछने आए, जो आज इस पर उंगली उठाएंगे? हम मरें या जीएं, उन्हें कोई फर्क पड़ता है क्या?

‘‘शायद आप भूल गई हो, पर मेरे जेहन में वह सबकुछ आज भी है, जब अब्बू नई अम्मी ले कर आए थे. तब नई अम्मी ने अब्बू के सामने ही कैसे हमें जलील किया था.

‘‘इतना ही नहीं, हम सभी को घर से बेदखल भी कर दिया था.’’

तभी जोया आपा घर में आईं.

‘‘अरे जोया, तुम ही इस को समझाओ. मैं तुम दोनों के लिए जल्दी से चाय बना कर लाती हूं,’’ ऐसा कहते हुए अम्मी रसोईघर में चली गईं.

रसोईघर क्या था… एक बड़े से कमरे को बीच से टाट का परदा लगा कर एक तरफ बना लिया गया था, तो दूसरी तरफ एक पुराना सा डबल बैड, टूटी अलमारी और अम्मी की शादी का एक पुराना बक्सा रखा था, जिस में अम्मी के कपड़े कम, यादें ज्यादा बंद थीं. मगर सबकुछ रखा बड़े करीने से था.

तभी अम्मी चाय और बिसकुट ले कर आईं और सब चाय का मजालेने लगे.

शबीना यादों की गहराइयों में खो गई… वह मुश्किल से 6-7 साल की थी, जब अब्बू नई अम्मी ले कर आए थे. वह अपनी बड़ी सी हवेली के बगीचे में खेल रही थी. तभी नई अम्मी घर में दाखिल हुईं. उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है. उस की अम्मी हर वक्त रोती क्यों रहती हैं?

जब नई अम्मी को बेटा हुआ, तो जोया आपा और अम्मी को बेदखल कर उसी हवेली में नौकरों के रहने वाली जगह पर एक कोना दे दिया गया.

अम्मी दिनभर सिलाईकढ़ाई करतीं और जोया आपा भी दूसरों के घर का काम करतीं तो भी दो वक्त की रोटी मुहैया नहीं हो पाती थी.

अम्मी 30 साल की उम्र में 50 साल की दिखने लगी थीं. ऐसा नहीं था कि अम्मी खूबसूरत नहीं थीं. वे हमेशा अब्बू की दीवानगी के किस्से बयां करती रहती थीं.

सभी ने अम्मी को दूसरा निकाह करने को कहा, पर अम्मी तैयार नहीं हुईं. पर इधर कुछ दिनों से वे काफी परेशान थीं. शायद जोया आपा के सीने पर बढ़ता मांस परेशानी का सबब था. मेरे लिए वह अचरज, पर अम्मी के लिए जिम्मेदारी.

‘‘शबीना… ओ शबीना…’’ जोया आपा की आवाज ने शबीना को यादों से वर्तमान की ओर खींच दिया.

‘‘ठीक है, उस लड़के को ले कर आना, फिर देखते हैं कि क्या करना है.’’

लड़के का फोटो देख शबीना खुशी से उछल गई और चीख पड़ी. भविष्य के सपने संजोते हुए वह सोने चली गई.

अकसर उन दोनों की मुलाकात शहर के बाहर एक गार्डन में होती थी. आज जब वह नीरज से मिली, तो उस ने कल की सारी घटना का जिक्र किया, ‘‘जनाब, आप मेरे घर चल रहे हैं. अम्मी आप से मुलाकात करना चाह रही हैं.’’

‘‘सच…’’ कहते हुए नीरज ने शबीना को अपनी बांहों में भर लिया. शबीना शरमा कर बड़े प्यार से नीरज को देखने लगी, फिर नीरज की गाड़ी से ही घर पहुंची.

नीरज तो हैरान रह गया कि इतनी बड़ी हवेली, सफेद संगमरमर सी नक्काशीदार दीवारें और एक मुगलिया संस्कृति बयां करता हरी घास का

लान, जरूर यह बड़ी हैसियत वालों की हवेली है.

नीरज काफी सकुचाते हुए अंदर गया, तभी शबीना बोली, ‘‘नीरज, उधर नहीं, यह अब्बू की हवेली है. मेरा घर उधर कोने में है.’’

हैरानी से शबीना को देखते हुए नीरज उस के पीछेपीछे चल दिया. सामने पुराने से सर्वैंट क्वार्टर में शबीना दरवाजे पर टंगी पुरानी सी चटाई हटा कर अंदर नीरज के साथ दाखिल हुई.

नीरज ने देखा कि वहां 2 औरतें बैठी थीं. उन का परिचय शबीना ने अम्मी और जोया आपा कह कर कराया.

अम्मी ने नीरज को देखा. वह उन्हें बड़ा भला लड़का लगा और बड़े प्यार से उसे बैठने के लिए कहा.

अम्मी ने कहा, ‘‘मैं तुम दोनों के लिए चाय बना कर लाती हूं. तब तक अब्बू और भाईजान भी आते होंगे.’’

‘‘अब्बू, अरे… आप ने उन्हें क्यों बुलाया? मैं ने आप से पहले ही मना किया था,’’ गुस्से से चिल्लाते हुए शबीना अम्मी पर बरस पड़ी.

अम्मी भी गुस्से में बोलीं, ‘‘चुपचाप बैठो… अब्बू का फैसला ही आखिरी फैसला होगा.’’

शबीना कातर निगाहों से नीरज को देखने लगी. नीरज की आंखों में उठे हर सवाल का जवाब वह अपनी आंखों से देने की कोशिश करती.

थोड़ी देर तक वहां सन्नाटा पसरा रहा, तभी सामने की चटाई हिली और भरीभरकम शरीर का आदमी दाखिल हुआ. वे सफेद अचकन और चूड़ीदार पाजामा पहने हुए थे. साथ ही, उन के साथ 17-18 साल का एक लड़का भी अंदर आया.

आते ही उस आदमी ने नीरज का कौलर पकड़ कर उठाया और दोनों लोग नीरज को काफी बुराभला कहने लगे.

नीरज एकदम अचकचा गया. उस ने संभलने की कोशिश की, तभी उस में से एक आदमी ने पीछे से वार कर दिया और वह फिर वहीं गिर गया.

शबीना कुछ समझ पाती, इस से पहले ही उस के अब्बू चिल्ला कर बोले, ‘‘खबरदार, जो इस लड़के से मिली. तुझे शर्म नहीं आती… वह एक हिंदू लड़का है और तू मुसलमान…’’ नीरज की तरफ मुखातिब हो कर बोले, ‘‘आज के बाद शबीना की तरफ आंख उठा कर मत देखना, वरना तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का वह हाल करेंगे कि प्यार का सारा भूत उतर जाएगा.’’

नीरज ने समय की नजाकत को समझते हुए चुपचाप चले जाना ही उचित समझा.

अब्बू ने शबीना का हाथ झटकते हुए अम्मी की तरफ धक्का दिया और गरजते हुए बोले, ‘‘नफीसा, शबीना का ध्यान रखो और देखो अब यह लड़का कभी शबीना से न मिले. इस किस्से को यहीं खत्म करो,’’ और यह कहते हुए वे उलटे पैर वापस चले गए.

अब्बू के जाते ही जो शबीना अभी तक तकरीबन बेहोश सी पड़ी थी, तेजी से खड़ी हो गई और अम्मी से बोली, ‘‘अम्मी, यह सब क्या है? आप ने इन लोगों को क्यों बुलाया? अरे, मुझे तो समझ में नहीं आ रहा है कि ये इतने सालों में कभी तो हमारा हाल पूछने नहीं आए. हम मर रहे हैं या जी रहे हैं, पेटभर खाना खाया है कि नहीं, कैसे हम जिंदगी गुजार रहे हैं. दोदो पैसे कमाने के लिए हम ने क्याक्या काम नहीं किया.

‘‘बोलो न अम्मी, तब ये कहां थे? जब हमारी जिंदगी में चंद खुशियां आईं, तो आ गए बाप का हक जताने. मेरा बस चले, तो आज मैं उन का सिर फोड़ देती.’’

‘‘शबीना…’’ कहते हुए अम्मी ने एक जोरदार चांटा शबीना को रसीद कर दिया और बोलीं, ‘‘बहुत हुआ… अपनी हद भूल रही है तू. भूल गई कि उन से मेरा निकाह ही नहीं हुआ है, दिल का रिश्ता है. मैं उन के बारे में एक भी गलत लफ्ज सुनना पसंद नहीं करूंगी. कल से तुम्हारा और नीरज का रास्ता अलगअलग है.’’

शबीना सारी रात रोती रही. उस की आंखें सूज कर लाल हो गईं. सुबह जब अम्मी ने शबीना को इस हाल में देखा, तो उन्हें बहुत दुख हुआ. वे उस के बिखरे बालों को समेटने लगीं. मगर शबीना ने उन का हाथ झटक दिया.

बहरहाल, इसी तरह दिनहफ्ते, महीने बीतने लगे. शबीना और नीरज की कोई बातचीत तक नहीं हुई. न ही नीरज ने मिलने की कोशिश की और न ही शबीना ने.

इसी तरह एक साल बीत गया. अब तक अम्मी ने मान लिया था कि शबीना अब नीरज को भूल चुकी है.

उसी दौरान शबीना ने अपनी फैशन डिजाइन के काम में काफी तरक्की कर ली थी और घर में अब तक सब नौर्मल हो गया था. सब ने सोचा कि अब तूफान शांत हो चुका है.

वह दिन शबीना की जिंदगी का बहुत खास दिन था. आज उस के कपड़ों की प्रदर्शनी थी. वह तेजतेज कदमों से लिफ्ट की तरफ बढ़ रही थी, तभी लिफ्ट का दरवाजा खुला, तो सामने खड़े शख्स को देख कर उस के पैर ठिठक गए.

‘‘कैसी हो शबीना?’’ उस ने बोला, तो शबीना की आंखों से आंसू आ गए. बिना कुछ बोले भाग कर वह उस के गले लग गई.

‘‘तुम कैसे हो नीरज? उस दिन तुम्हारी इतनी बेइज्जती हुई कि मेरी हिम्मत ही नहीं हुई कि तुम से कैसे बात करूं, पर सच में मैं तुम्हें कभी भी नहीं भूली…’’

नीरज ने उस के मुंह पर हाथ रख दिया, ‘‘वह सब छोड़ो, यह बताओ कि तुम यहां कैसे?

‘‘आज मेरे सिले कपड़ों की प्रदर्शनी लगी है, पर तुम…’’

‘‘मैं यहां का मैनेजर हूं.’’

शबीना ने मुसकराते हुए प्यारभरी निगाहों से नीरज को देखा. नीरज को लगा कि उस ने सारे जहां की खुशियां पा ली हैं.

‘‘अच्छा सुनो, मैं यहां का सारा काम खत्म कर के रात में 8 बजे तुम से यहीं मिलूंगी.’’

आज शबीना का मन अपने काम में नहीं लग रहा था. उसे लग रहा था कि जल्दी से नीरज के पास पहुंच जाए.

शबीना को देखते ही नीरज बोला, ‘‘कुछ इस कदर हो गई मुहब्बत तनहाई से अपनी कि कभीकभी इन सांसों के शोर को भी थामने की कोशिश कर बैठते हैं जनाब…’’

शबीना मुसकराते हुए बोली, ‘‘शिकवा तो बहुत है मगर शिकायत कर नहीं सकते… क्योंकि हमारे होंठों को इजाजत नहीं है तुम्हारे खिलाफ बोलने की,’’ और वे दोनों खिलखिला कर हंस पड़े.

‘‘नीरज, तुम्हें पता नहीं है कि आज मैं मुद्दतों बाद इतनी खुल कर हंसी हूं.’’

‘‘शायद मैं भी…’’ नीरज ने कहा. रात को दोनों ने एकसाथ डिनर किया और दोनों चाहते थे कि इतने दिनों की जुदाई की बातें एक ही घंटे में खत्म कर दें, जो कि मुमकिन नहीं था. फिर वे दोनों दिनभर के काम के बाद उसी पुराने गार्डन या कैफे में मिलने लगे.

लोग अकसर उन्हें साथ देखते थे. शबीना के घर वालों को भी पता चल गया था, पर उन्हें लगता था कि वे शादी नहीं करेंगे. वे इस बारे में शबीना को समयसमय पर हिदायत भी देते रहते थे.

इसी तरह साल दर साल बीतने लगे. एक दिन रात के अंधेरे में उन दोनों ने अपना शहर छोड़ एक बड़े से महानगर में अपनी दुनिया बसा ली, जहां उस भीड़ में उन्हें कोई पहचानता तक नहीं था. वहीं पर दोनों एक एनजीओ में नौकरी करने लगे.

उन दोनों का घर छोड़ कर अचानक जाना किसी को अचरज भरा नहीं लगा, क्योंकि सालों से लोगों को उन्हें एकसाथ देखने की आदत सी पड़ गई थी. पर अम्मी को शबीना का इस तरह जाना बहुत खला. वे काफी बीमार रहने लगीं. जोया आपा का भी निकाह हो गया था.

इधर शबीना अपनी दुनिया में बहुत खुश थी. समय पंख लगा कर उड़ने लगा था. एक दिन पता चला कि उस की अम्मी को कैंसर हो गया और सब लोगों ने यह कह कर इलाज टाल दिया था कि इस उम्र में इतना पैसा इलाज में क्यों बरबाद करें.

शबीना को जब इस बात का पता चला, तो उस ने नीरज से बात की.

नीरज ने कहा, ‘‘तुम अम्मी को अपने पास ही बुला लो. हम मिल कर उन का इलाज कराएंगे.’’

शबीना अम्मी को इलाज कराने अपने घर ले आई. अम्मी जब उन के घर आईं, तो उन का प्यारा सा संसार देख कर बहुत खुश हुईं.

नीरज ने बड़ी मेहनत कर पैसा जुटाया और उन का इलाज कराया और वे धीरेधीरे ठीक होने लगीं. अब तो उन की बीमारी भी धीरेधीरे खत्म हो गई. मगर अम्मी को बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती. नीरज उन की परेशानी को समझ गया.

एक दिन शाम को अम्मी शबीना के साथ बैठी थीं, तभी नीरज भी पास आ कर बैठ गया और बोला, ‘‘अम्मी, जिंदगी में ज्यादा रिश्ते होना जरूरी नहीं है, पर रिश्तों में ज्यादा जिंदगी होना जरूरी है. अम्मी, जब बनाने वाले ने कोई फर्क नहीं रखा, तो हम कौन होते हैं फर्क रखने वाले.

‘‘अम्मी, मेरी तो मां भी नहीं हैं, मगर आप से मिल कर वह कमी भी पूरी हो गई.’’

अम्मी ने प्यार से नीरज को गले लगा लिया, तभी नीरज बोला, ‘‘आज एक और खुशखबरी है, आप जल्दी ही नानी बनने वाली हैं.’’

अब अम्मी बहुत खुश थीं. वे अकसर शबीना के घर आती रहतीं. समय के साथ ही शबीना ने प्यारे से बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम शबीना ने हरिनूर रखा. शबीना ने यह नाम दे कर उसे हिंदूमुसलमान के झंझावातों से बरी कर दिया था.

चीयर गर्ल: फ्रैंड रिक्वैस्ट एक्सैप्ट करने के बाद क्या हुआ उसके साथ

Romantic Story in hindi

शाम के स्नैक्स में मैगी कटलेट हो जाए?

दो मिनट में न बनने वाली मैगी सबकी फेवरेट है. मैगी का टेस्ट बढ़ाने के लिए हम इसमें सब्जियां डालते हैं. ओरिगेनो भी मैगी का स्वाद दोगुना कर देता है. मैगी की सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें कुछ भी मिक्स कर सकते हैं. तो अगली बार ट्राई करें मैगी कटलेट.

कितने लोगों के लिए : 5

सामग्री :

– 200 ग्राम मैगी

– आधा कप सब्जियां (गाजर, पत्तागोभी, शिमला मिर्च)

– 3 आलू उबले हुए

– 2 प्याज बारीक कटी

– 2 टेबल स्पून पालक कटा हुआ

– 2 टेबल स्पून लहसुन का पेस्ट

– 1 टेबल स्पून बारीक कटा हरा धनिया

– 1 पैकेट मैगी मसाला

1/4 टी स्पून हल्दी पाउडर

– 1/2 टी स्पून लाल मिर्च पाउडर

– 1/2 टी स्पून चाट मसाला

– 1/2 टी स्पून अमचूर

– नमक स्वादानुसार

– तलने के लिए तेल

विधि :

मैगी में एक टी स्पून तेल डालकर बिना मसाला डाले उबाल लें. आलू को मैश करके उसमें प्याज, लहसुन पेस्ट, हरी मिर्च, मैगी मसाला और सभी सूखे मसाले डाल दें.

अब इसमें उबली हुई मैगी और बारीक कटी सब्जियां डाल दें. मैगी को मैश न करें, हल्के हाथों से मिश्रण में मिला दें.

अब इस मिश्रण के कटलेट बना लें. ध्यान रखें कि कटलेट ज्यादा मोटे न हो.

कड़ाही में तेल गरम कर कटलेट को दोनों तरफ से सुनहरा कर तल लें. गर्मागर्म कटलेट टॉमेटो सॉस के साथ सर्व करें.

तुम बहुत अच्छी हो: भाग 3- रीवा के बारे में भावेश क्या जान गया था

रीवा भावेश की भावनाओं से अनजान नहीं थी. सबकुछ देख और सुन कर भावेश की जगह कोई भी होता वह भी ऐसा ही विचलित हो जाता. किसी तरह दिन बीता. रीवा उस से मिलने समय से पहले आ गई थी. आज उस के चेहरे पर वह खुशी नहीं थी जो पिछली बार भावेश को दिखाई दी थी. आते ही उस ने भावेश को गले लगाया. भावेश को उस के लिपटने पर आज वह उत्तेजना  महसूस नहीं हुई जो पिछली 2 मुलाकातों में हुई थी.

‘‘मुझे देख कर खुश नहीं हो?’’

‘‘यह क्या कह रही हो रीवा? आज तुम्हारी आवाज में वह जोश नहीं है जो पिछली मुलाकातों में था.’’

‘‘तुम ठीक कह रहे हो.’’

‘‘तुम्हें देख कर मन में दबी हुई भावनाएं फिर से भड़क गई थीं लेकिन तुम्हारी बातों ने उन पर ठंडा पानी डाल दिया.’’

‘‘तुम्हें सुन कर अच्छा नहीं लगा. जिस ने भुगता होगा उसे कैसा लगा होगा उस की तुम कल्पना भी नहीं कर सकते.’’

‘‘तुम्हारी दुनिया इतनी कैसे बदल गई रीवा?’’

‘‘यहां तक पहुंचने के लिए बहुत संघर्ष किया मैं ने. अपनेआप से लड़ कर तब जा कर इस रूप में आई हूं जिस में मुझे सामने देख रहे हो.’’

‘‘अम्मांबाबूजी को सब पता है?’’

‘‘बाबूजी रहे नहीं. अम्मां को इस के बारे में कोई जानकारी नहीं है. हर महीने रुपए भेज देती हूं और साथ में एक प्यारी सी चिट्ठी जिसे वे बारबार पढ़ सकें. इसी में वे भी खुश हैं और मैं भी.’’

‘‘तुम्हें यह सब करने की जरूरत क्यों पड़ी?’’

‘‘बाबूजी के जाने के बाद घर की हालत बहुत खराब हो गई थी. अपने भी मदद के नाम पर मेरा शोषण करने पर उतर आए थे. घर की हालत देख कर मैं परेशान थी. समझ नहीं आ रहा था क्या करूं. मैं समझ गई वहां रह कर अपने हालात सुधरने वाले नहीं हैं. मुझे वहां से बाहर निकलना होगा. दिल्ली में मां के दूर के रिश्ते के भाई रहते थे. मैं ने सोच लिया उन के पास जा कर कोई काम ढूंढ़ लूंगी. मां को भी यह बात समझ आ गई थी. उन्होंने मुझे शहर जाने की इजाजत दे दी और मैं गांव छोड़ कर शहर चली आई.’’

‘‘फिर क्या हुआ?’’

‘‘जवान लड़की सभी की आंखों में खड़कती है. दूर के मामा भी इस के अपवाद नहीं थे. कुछ दिन तक  मैं ने वह सब सहन किया. नौकरी दिलाने के नाम पर उन्होंने भी मेरा इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था.’’

‘‘तुम्हारे भोलेपन का फायदा उठाया होगा उन्होंने?’’

‘‘तुम जो भी समझ लो लेकिन एक बात मेरी समझ में आ गई थी कि मुझे शहर में जीना है तो गांव का चोगा उतार कर फेंकना होगा. बस मैं ने वही किया. इस दौरान मेरी कुछ पुरुषों से दोस्ती हो गई. वे मेरे नखरे भी उठाते थे और मुझ पर पैसा भी लुटाते.

‘‘किसी तरह महानगर में मैं ने अपनेआप को व्यवस्थित कर लिया और मुंह बोले मामा को छोड़ कर अलग घर में रहने लगी. वहां कोई रोकटोक नहीं थी. मैं अपने हिसाब से जीने के लिए अपनेआप को ढालती चली गई. उस का परिणाम तुम सामने देख रहे हो.’’

‘‘जितनी आसानी से तुम कह रही हो करना उतना ही मुश्किल होता है रीवा.’’

‘‘मैं ने भी उस दौर को झेला है. लोहे को भी सांचे में ढालने के लिए आग में तप कर पीटा जाता है.’’

‘‘तुम्हारी कहानी बड़ी अजीब है. जब तुम अकेली रहने में सक्षम हो गई थी तो फिर प्रवेश तुम्हारी जिंदगी में कहां से आ गया?’’

‘‘बद अच्छा बदनाम बुरा. पुरुषों की दुनिया में मेरी छवि भी अच्छी नहीं थी. बदमाश मुझे परेशान करने लगे. बस उसी से बचने के लिए मैं ने प्रवेश को ढाल बना लिया. उस के साथ रहने से रात को कोई मुझे डिस्टर्ब नहीं करता. मैं जहां जाती हूं अपनी इच्छा से जाती हूं. प्रवेश को इस में कोई एतराज नहीं. वह भी दूध का धुला नहीं है. जैसी मैं हूं वैसा ही वह भी है. उसे मुफ्त में बहुत कुछ मिल जाता है और मुझे साथ रहने के बदले घर.’’

‘‘क्या तुम यह सब छोड़ कर पहली वाली सीधीसादी रीवा नहीं बन सकती?’’

भावेश की बात सुन कर रीवा हंस दी और बोली, ‘‘चोगा बदल देने से क्या हो जाएगा? मैं जिस रास्ते पर चल पड़ी हूं उसे छोड़ कर गांव की पगडंडी में नहीं भटक सकती.’’

‘‘तुम ऐसा क्यों कह रही हो?’’

‘‘सच बताना अगर मैं पहले जैसी बनने की कोशिश करूं तो क्या तुम मेरे अतीत को भुला कर मुझे अपना लोगे?’’

‘‘पिछले एक हफ्ते में मैं ने तुम्हें जाना ही कितना है रीवा? रोज तुम्हारे नए रूप सामने आते हैं. समझ नहीं आता इस में कौन असली है और कौन सा वक्त के साथ ओढ़ा हुआ.’’

‘‘मैं मजाक कर रही थी. मेरे बारे में इतना सब सोचना छोड़ दो. जब मैं ने अपने बारे में सोचना छोड़ दिया तब तुम क्यों सोचते हो? इतने वर्षों बाद मिले हैं. इन पलों को जीने की कोशिश करो बजाय भूत और भविष्य में भटकने के.’’

‘‘तुम ठीक कहती हो.’’

भावेश ने तुरंत वाइन और बीयर और्डर कर दी और साथ में खाना भी. दोनों चियर्स कर के उस का मजा लेने लगे.

रीवा के बारे में बहुत कुछ जानने के बाद भी भावेश की सहानुभूति उस के साथ थी. परिस्थितियों ने उसे ऐसा करने के लिए मजबूर किया वरना वह बहुत अच्छी लड़की थी.

नशे की हालत में वह बोली, ‘‘इतना सबकुछ जान लेने के बाद भी मुझ से मिलना चाहोगे भावेश?’’

‘‘हरेक का अपना एक अतीत होता है उस के बावजूद भी मेरे मन में तुम्हारी पुरानी छवि धूमिल नहीं हुई है.’’

‘‘तुम बहुत अच्छे हो,’’ कह कर वह उस के गले लिपट गई. भावेश ने उसे हौले से अपने से अलग किया और गाड़ी में बैठा कर घर छोड़ने चल पड़ा. घर से कुछ दूर पहले भावेश ने उसे संभल कर गाड़ी से उतारा.

‘‘तुम भी अच्छी हो रीवा. अपना खयाल रखना. गुड बाय,’’ कह कर उस ने मन में उस से फिर कभी न मिलने का संकल्प किया और आगे बढ़ गया.

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