यों ही अचानक: भाग 2- अकेले पड़ गए मुकुंद की जिंदगी में सारिका को क्या जगह मिली

अच्छी कदकाठी और तीखे नैननक्श वाली सारिका उन के इतना नजदीक आ  खड़ी हुई तो वे घबरा गए. स्वभाव से अंतर्मुखी और अपनेआप में सिमटे हुए से डाक्टर साहब, ‘‘नहीं… नहीं… बिलकुल भी नहीं, मैं अभी जल्दी में हूं,’’ आदि कह कर उसे जाने का विचलित सा संदेश देते रहे.

मगर सारिका ने कहा, ‘‘मैं अकेला रहना बिलकुल पसंद नहीं करती. मगर क्या बताऊं हमेशा अब अकेले रहना होगा. क्या हुआ जो अगर हम आपस में कभी थोड़ी बात कर लिया करें?’’

‘‘कर लेंगे पर आज मुझे देर हो रही है,’’ मुकुंदजी अब भी टका सा जवाब दे कर हटने के प्रयास में थे.

‘‘आप को देर नहीं होगी, आप बस तैयार हो कर मेरे घर आ जाइए… अपना टिफिन मुझे दे दीजिए… इस में मैं ‘न’ नहीं सुनूंगी.’’

डाक्टर साहब ने आखिर हार मानी और मुसकरा कर बोल पड़े, ‘‘बड़ी जिद्दी हो.’’

‘‘लाइए पहले टिफिन दीजिए,’’ और इस तरह सारिका को दीवारों से बेहतर सुनने वाला मिल गया था.

‘‘आज बाजार में दुकानदार ने मुझे ढंग लिया, आज स्कूल में टीचर को खूब खरीखरी सुना आई. मेरा पति तो इधर पटक कर मुझे भूल ही गया, आप ही बताएं क्या मैं अकेले उम्र बिताने को ब्याही गई?’’

डाक्टर साहब अपने बेटे को शाम को पढ़ा रहे होते या फिर उस की पढ़ाई के वक्त पास बैठते, सारिका इन दिनों अपने बच्चे को उस की पढ़ाई के लिए मुकुंदजी के घर ले आती. दोनों बच्चे पढ़ते और वे दोनों थोड़ी दूरी पर बैठे होते. मुकुंदजी तो कई तरह की किताबें और अखबार पढ़ते और सारिका ताबड़तोड़ अपने दिल की बात मुकुंदजी को बताती. उम्र का फासला सारिका में जरा भी झिझक पैदा नहीं कर पाता.

मुकुंदजी अब सारिका की बातों के आदी हो रहे थे. उन की झिझक कुछ कम हो रही थी. अब संग वे थोड़ा हंसते, थोड़ा मजाक भी कर लेते जैसेकि नहीं, उम्र बिताने की अब फिक्र कहां. अब तो सिलसिला चल ही पड़ा है.

सारिका भौचक उन की ओर ताकती, फिर कहती, ‘‘मैं चलती हूं. आप के बेटे को पढ़ने में दिक्कत हो रही होगी, मेरी बातों की वजह से.’’

डाक्टर साहब कहते, ‘‘चलो दूसरे कमरे में बैठें.’’

सारिका अवाक होती. पहले तो मुकुंदजी भगाने की फिराक में रहते, अब क्या? मुकुंदजी वाकई उसे ले कर अपने बैडरूम में आते. उसे बिस्तर पर बैठने का इशारा कर के खुद बगल में रखे चेयर पर बैठ जाते.

सारिका को फिर से इतिहास के खंडहरों से ले कर भविष्य के टाइम मशीन में सवार यों ही बोलतेबतियाते छोड़ देते.

सात 17 बोलते वह जब कभी मुकुंदजी से कोईर् जवाब मांगती तो वे भौचक से उस की ओर ताकते.

कई दिनों से मुकुंदजी को ले कर सारिका के दिल में एक  कचोट पैदा हो रही थी. एक दिन वह इस तरह विफर पड़ी कि डाक्टर साहब अवाक उसे देखते रह गए.

‘‘फिर क्या फर्क रह गया आप में और सुदेश में? मैं तो अपने घर में बैठी अकेली इसी तरह बकबक कर सकती हूं. सुदेश जब भी घर आते पैसा पकड़ाने और देह की भूख मिटाने के सिवा मुझ से कोई वास्ता न रखते और आजकल तो वह रस्म भी जाने कैसे खत्म हो गई. मैं हूं या नहीं, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता ठीक इसी तरह जैसे आप…’’

डाक्टर साहब शर्म से सिहर उठे. अवाक हो पहले तो सारिका को देखते रहे, फिर शर्म से गड़ने लगे.

अनर्गल बोलती सी सारिका अचानक ठिठक गई. महीना भर ही तो  हुआ है डाक्टर साहब से घुलतेमिलते, जाने क्याक्या वह बोल जाती है. उसे बहुत बुरा लग रहा था, वह चुप हो गई. डाक्टर साहब ऐसे ही शरमीले, इन बातों से वे शर्म से गड़ कर अखबार में ही धंस गए. उन दोनों की चुप्पी अब न जाने क्याक्या बोल उठी. डाक्टर साहब भी सुन रहे थे और सारिका भी. सारिका धीरे से उठी, नींद से बोझिल अपने बेटे को स्कूल बैग के साथ लिया और घर चली गई. 2 दिन वह नहीं आई. डाक्टर साहब ने भी कोई खबर नहीं ली.

चौथे दिन सारिका शाम 7 बजे उन के घर आई. कुछ ज्यादा ही अस्तव्यस्त, आंखें रोरो कर सूजी हुईं.

सारिका आते ही बोली, ‘‘कोई खोजखबर नहीं… मैं मुसीबत में पड़ूं तो क्या करूं. घर वाले इतनी दूर.’’

नर्मदिल डाक्टर साहब चिंतित से बोल पड़े, ‘‘क्यों क्या हुआ?’’

‘‘सुदेश बनारस गए हुए हैं, वहीं अचानक उन की तबीयत बहुत बिगड़ी… वे अस्पताल में हैं.’’

‘‘अरे क्या हुआ अचानक?’’

‘‘शायद लिवर में तकलीफ थी और अब तो बताया गया… और सारिका ने आंखें झका लीं, फिर तुरंत आगे कहने को उतावली सी डाक्टर साहब की ओर अपनी नजरें टिका दीं.

डाक्टर साहब ने उसे प्रेरित किया, ‘‘हां कहो और क्या बताया गया?’’

‘‘सैक्सट्रांसमिटेड डिजीज.’’

सारिका के कहते ही डाक्टर साहब की नजरें झक गईं. उन्हें सारिका पर बड़ा तरस आया कि बाकई दुखी स्त्री है.

डाक्टर साहब के साथ तो नीलिमा का प्यार और भरोसा हमेशा कायम है, लेकिन यह तो पति के रहते भी आज बहुत गरीब है.

डाक्टर साहब ने उसे अंदर ले जा कर कमरे में बैठाया. पूछा, ‘‘बनारस जाओगी?’’

‘‘मैं जाना चाहती हूं, मेरी जिंदगी यों मंझधार में…’’

सारिका को आंसू पोंछते देख डाक्टर साहब खुद को रोक नहीं पाए और आगे बढ़ उस के कंधे पर हाथ रखा. कहा, ‘‘ मैं ले जाऊंगा बनारस तुम्हें. अपने बेटे निलय को उस की बूआ के घर छोड़ दूंगा. तुम अंकित को…’’

सारिका उत्साहित सी बोल पड़ी, ‘‘मायके से कोई आ कर ले जाएगा, कहा था उन्होंने, अगर मैं बनारस जाऊं तो…’’

3 दिन बाद वे बनारस के एक होटल में थे. दोनों ने अगलबगल 2 कमरे लिए थे. तय हुआ दूसरे दिन वे अस्पताल सुदेश को देखने चलेंगे.

रात वे दोनों अपनेअपने कमरे में रहे. सुबह सारिका की  नींद खुली तो उसे बड़ी घबराहट हुई. वह तैयार हो कर मुकुंदजी के कमरे के दरवाजे पर गई. आवाज दी, सन्नाटे के सिवा कुछ भी हासिल नहीं हुआ उसे. फोन लगाया उस ने मुकुंदजी को. पता चला वे अलसुबह ही बनारस के घाट चले गए हैं.

सारिका उन्हें वहां अपने आने की इत्तला दे कर जल्दी बनारस घाट पहुंची. दूर से ही एकाकी कोने में बैठे मुकुंदजी सारिका को दिख गए. उगते सूरज को एकटक देख रहे थे वे.

सारिका कुछ देर उन के सामने खड़ी रही, फिर खुद ही बोल पड़ी, ‘‘आप मुझे छोड़ कर क्यों चल आए? अनजाने शहर में मेरी फिक्र नहीं की?’’

मुकुंदजी ने शांत भाव से सारिका को देखा और बोले, ‘‘फिक्र करता हूं तभी तो अनुमति लेने आया था.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘आगे की जिंदगी में न जाने कहां तक तुम्हारी फिक्र करनी पड़े, नीलिमा से कहे बिना कैसे तुम्हारा साथ दूं? मेरा मन कचोट रहा था, आज नीलिमा से अकेले में अपने मन की ऊहापोह…’’

एक बच्चे सी जिज्ञासा लिए सारिका पूछ बैठी, ‘‘नीलिमा दीदी से अनुमति मिल गई न?’’

डाक्टर साहब सिर झकाए बैठे रहे. क्या सारिका के प्रति वे दुर्बल हो रहे हैं? क्या उन के मन में सारिका को ले कर मोह और आकर्षण पैदा हो गया है?

और सारिका? क्या वह सिर्फ अपने हालात से जूझ रही या छोटी सी दूब उस की भी अनुभूतियों और कामनाओं की जमीन पर उग आईर् है? मुकुंदजी सारी असमंजस को एकतरफ ढकेल उठ खड़े हुए, ‘‘चलो तुम्हें अस्पताल चलना है न?’’ सारिका भी बिन कुछ कहे उठ खड़ी हुई. एक संतोष था कि शायद मुकुंदजी उस की परेशानी में साथ निभाएंगे.

सुदेश लंबा, स्मार्ट, गोराचिट्टा युवक जिसे अपने पैसे, औकात और व्यक्तित्व पर बड़ा घमंड था, जो किसी की सुनना अपनी तौहीन समझता था. अपने ऊंचे कांटेक्ट के बल पर वक्त को मुट्ठी में बांध सकता है, वह सोचता.

सुदेश जिस की पहली बीवी ने दुख झेला, बिन सहे चली गई, मगर दुख ले कर. दूसरी बीवी सहने की हद से गुजर गई तड़पती हुई. अनजाने ही दोनों की आहें लग गईं थी उसे. उस की बिंदास लापरवाह जिंदगी जीने के अंदाज ने उसे इस मरणखाट पर ला पटका था.

सुदेश से मिलने के बाद नर्स उन्हें अपने चैंबर में ले गईं. बोली, ‘‘मैं ने सुदेशजी से आप का फोन नंबर ले कर आप को फोन किया था. इन के दोस्त का नंबर मेरे पास है, वही इन का सबकुछ देख रहे हैं. कुछ देर में वे आ जाएंगे, इन के बिजनैस पार्टनर भी हैं. आप लोग उन से सारी बातें कर लें. सुदेशजी का लिवर सत्तर फीसदी खराब हो चुका है. साथ ही ट्रांसमिटेड डिजीज भी बहुत बढ़ा हुआ है, इन्फैक्शन अंदर तक फैल चुका है.’’

इस पूरे हालात में सारिका बहुत कमजोर सी पा रही थी खुद को. मुकुंदजी साथ न होते तो क्या होता… रहरह उस के दिमाग में यही खयाल आते.

नथनी: क्या खत्म हुई जेनी की सेरोगेट मदर की तलाश

मैं परेशान हूं क्योंकि सर्दियों में स्किन बहुत ड्राई हो जाती है, मैं क्या करुं?

सवाल-

सर्दियां शुरू हो गई हैं, मैं परेशान हूं क्योंकि सर्दियों में मेरी स्किन बहुत ड्राई हो जाती है. मौइस्चराइजर लगाने के बाद कुछ समय तक ठीक लगती है पर फिर ड्राई होने लगती है. बताएं क्या करूं?

जवाब-

सर्दियों में स्किन ज्यादा ड्राई हो जाती है. ऐसे में सामान्य मौइश्चराइजर लगाने से फायदा नहीं होता क्योंकि इस में पानी ज्यादा और औयल कम होता है. अत: आप को कोई औयल बेस्ड मौइश्चराइजर लगाना चाहिए. नहाने के बाद बौडी को पोंछ कर आमंड औयल या शिया बटर से भी पूरी बौडी की मसाज कर सकती हैं. वैसे भी हफ्ते में एक बार बौडी मसाज करना अच्छा रहता है.

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जैसे ही सर्दियां शुरू होती हैं वैसे ही ड्राई व रफ स्किन की समस्या भी शुरू हो जाती है. सर्दियों में स्किन की ऊपरी परत में पानी कम हो जाता है और इसलिए आप की स्किन बाहर से बहुत इरिटेट हो जाती है व बहुत ड्राई व बेजान लगने लगती है. यदि आप अपनी स्किन को हेल्दी बनाना चाहतीं हैं तो आप को अपनी डाइट भी हेल्दी रखनी होगी.

अपनी डाइट मे नट्स, एवोकाडो व सीड्स आदि को ज्यादा से ज्यादा शामिल करें. आप को हरी सब्जियां भी ज्यादा से ज्यादा खानी चाहिए. स्किन को हेल्दी रखने के लिए आप को स्किन केयर की भी आवश्यकता होती है. इसलिए पपीता पल्प का प्रयोग कर सकते हैं. यह आप की स्किन को हाइड्रेट करता है और आप इस को मिल्क क्रीम में मिला कर भी स्किन पर प्रयोग कर सकतीं हैं.

यदि आप की बहुत ज्यादा ड्राई स्किन है तो आप को उसे हाइड्रेट करने के लिए कई लेयर्स लगानी पड़ेगीं. स्किन केयर के पहले स्टेप के लिए आप को हर सुबह व शाम किसी अच्छे क्लींजर की मदद से अपने फेस को धोना पड़ेगा.

इसके बाद आप एक माइल्ड हाइड्रेटिंग क्रीम का प्रयोग कर सकते हैं. इसके ऊपर विटामिन सी सीरम को अप्लाई करे. सर्दियों में यह सब चीजें आप की स्किन के लिए बहुत अच्छी रहती हैं.

आप अपनी स्किन को मॉइश्चराइज करने के लिए रोसेहिप ऑयल व एक्स्ट्रा वर्जिन कोकोनट ऑयल का प्रयोग कर सकती हैं. यह एंटी आक्सिडेंट्स से भरपूर होते हैं जो आप की स्किन को नरिश करते हैं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

Winter Special: जाड़े में भी स्वस्थ रहेंगे अस्थमा के रोगी

15 साल की अनुरिमा अस्थमा की शिकार है. बचपन से ही उसे अस्थमा के अटैक आते थे, जो बाद में उम्र के हिसाब से ओर बढ़ते गए. इस के लिए उसे नियमित दवा लेनी पड़ती है. दरअसल, यह बीमारी सर्दी के दिनों में और अधिक बढ़ जाती है, क्योंकि सर्द मौसम की वजह से श्वासनली में बलगम जल्दी जमा हो जाता है, जो श्वासनली को अवरुद्ध कर देता है, जिस से मरीज को सांस लेने में कठिनाई होने लगती है. फलस्वरूप सांस फूलने लगती है. कुछ लोगों को यह बीमारी उन्हें ठंड की ऐलर्जी होने की वजह से भी बढ़ जाती है.

इस बारें में मुंबई के एसआरवी हौस्पिटल की चैस्ट फिजिशियन डा. इंदु बूबना बताती है, ‘‘स्ट्रैस और धूम्रपान अस्थमा के ट्रिगर पौइंट हैं. इन से सब से अधिक अस्थमा बढ़ती है. इस के अलावा नींद की कमी व प्रदूषण भी इस के जिम्मेदार हैं. जाड़े के मौसम में इस बीमारी के बढ़ने का खतरा अधिक रहता है. लेकिन सही लाइफस्टाइल से इस खतरे को कम किया जा सकता है. मेरे पास कई मरीज ऐसे आते हैं, जो अस्थमा रोग का नाम सुन कर ही घबरा जाते हैं, जबकि यह बीमारी जानलेवा नहीं है.’’

डा. इंदु के अनुसार ये सावधानियां जाड़े  के मौसम में अस्थमा के रोगियों को अवश्य रखनी चाहिए:

– सब से पहले घर को साफसुथरा रखें. वैंटिलेशन सही हो.

–  सांस हमेशा नाक से लें इस से हवा गरम हो कर छाती तक पहुंचती है, जिस से ठंड कम लगती है. मुंह से सांस लेने की कोशिश कम करें.

–  फ्लू का वैक्सिन अवश्य लगा लें. इस से 70% व्यक्ति ठंड की ऐलर्जी से बच सकता है.

–  घर में अगर रूमहीटर का प्रयोग करते हैं, तो समयसमय पर उस के फिल्टर की सफाई अवश्य करें, ताकि उस पर धूलमिट्टी न जमें.

–  घर के पैट्स, टैडी बियर, फर वाले खिलौने, प्लांट्स आदि को बैड से दूर रखें.

–  ठंड से बचने के लिए अधिकतर लोग आग या रूमहीटर के पास बैठते हैं, जो ठीक नहीं, क्योंकि इस से ऊनी कपड़े के रेशे जल जाते हैं. उन से निकलने वाला धुआं अस्थमा के रोगी के लिए खतरनाक होता है. इसलिए रूमहीटर से घर को गरम जरूर करें, पर दूरी बनाए रखें. साथ ही घर की नमी को भी बनाए रखें.

–  पुराने सामान को घर में न रखें. डस्टिंग के वक्त धूल न उड़ाएं. घर की सफाई गीले कपड़े से  करें.

–  खाना खाने से पहले हाथों को अच्छी तरह धो लें. इस से किसी भी प्रकार के वायरस से आप दूर रहेंगे.

–  सर्दियों में भी वर्कआउट अवश्य करें, लेकिन पहले अपनेआप को वार्मअप करना न भूलें.

–  ठंड में तरल पदार्थों का सेवन अधिक करें. घर पर बना कम वसायुक्त खाना खाएं. ताजे फलसब्जियां अधिक लें. खट्टे पदार्थ खाने से अस्थमा नहीं बढ़ता. हां जिन्हें ऐलर्जी हो, वे न खाएं.

–  कपड़े हमेशा साफसुथरे ही पहनें. कौटन के कपड़े पहन कर ही ऊपर ऊनी कपड़े पहनें.

–  अगर छोटे बच्चे अस्थमा के शिकार हैं तो जाड़े में उन्हें हैल्दी, न्यूट्रिशन वाला भोजन दें.

–  दवा का सेवन नियमित करें.

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दृष्टि रावत 34 साल की है. वह फरीदाबाद में रहती है. देखने में ब्यूटीफुल और कौन्फिडैंट दृष्टि एक वौइस आर्टिस्ट है. 4 साल पहले उस ने विक्रम संवत के साथ लव मैरिज की थी. विक्रम एक बिजनेसमैन है. उस का क्रौकरी का बिजनैस है. बिजनैसमैन होने के नाते विक्रम बहुत बिजी रहता है. लेकिन इस के बावजूद वह घर और बाहर दोनों के काम में दृष्टि की हैल्प करता है.

कभीकभी तो वह खुद अकेले ही घर का सारा काम कर लेता है तो कभीकभी मार्केट जा कर राशन ले आता है. इतना ही नहीं विक्रम कई बार अकेले ही लंच और डिनर भी बना लेता है क्योंकि वह सम?ाता है कि असल माने में पार्टनर की यही परिभाषा है कि वह अपने पार्टनर की हर समय सपोर्ट करे.

दृष्टि और विक्रम दोनों हाउस होल्ड प्रौडक्ट भी साथ जा कर लाते हैं. चाहे घर के कामों से जुड़े टूल्स हों या फिर होम गैजेट हों दृष्टि और विक्रम उन्हें खरीदने साथ ही जाते हैं. इस का एक फायदा यह रहता है कि ये टूल्स और गैजेट कैसे काम करते हैं यह वे दोनों एकसाथ जान लेते हैं. ऐसे में जब दृष्टि घर में नहीं होती या अपने औफिस के काम में बिजी होती है तो विक्रम इन  टूल्स और गैजेट की हैल्प से घर को अच्छी तरह मैनेज कर लेता है.

एक लड़की क्या चाहती है

एक अच्छे हसबैंड की सारी खूबी विक्रम के अंदर है. किस तरह पार्टनर को खुश रखा जा सकता है, किस तरह अपने काम और मैरिड लाइफ को बैलेंस किया जाता है. इन सब बातों से विक्रम पूरी तरह अवगत है. तभी तो उस की मैरिड लाइफ में वे दिक्कतें नहीं हैं जो उन कपल्स के बीच होती हैं जहां घर के कामों को वाइफ या हसबैंड में से सिर्फ कोई एक संभाल रहा होता है.

जब विक्रम दृष्टि की हैल्प करता है तो वह बहुत खुश हो जाती है. यह सच भी है कि एक लड़की यही चाहती है कि उस का पार्टनर उस के सभी कामों में मदद करे. वह सही मानों में उस का हमसफर हो न सिर्फ कहने भर को.

क्लाउड किचन चलाने वाली रति अग्निहोत्री रिलेशनशिप पर अपनी राय देते हुए कहती है, कोई भी रिलेशन बिना केयर के नहीं चलता. ‘‘आप का पार्टनर भी आप से यही केयर चाहता है. आजकल हसबैंडवाइफ दोनों ही वर्किंग हैं. ऐसे में उन्हें अपने लिए बिलकुल समय नहीं मिलता है क्योंकि वाइफ औफिस के साथसाथ घर भी संभालती है. इस की वजह से वह हर वक्त थकान में चूर रहती है. ऐसे में उस में चिड़चिड़ापन आना स्वाभाविक है. लेकिन वहीं जहां आप का पार्टनर भी काम का कुछ भार अपने ऊपर ले ले तो यह भार कुछ कम हो सकता है. मैं भी अपना बिजनैस इसलिए कर पा रही हूं क्योंकि मेरे पार्टनर मेरे घर के कामों में मेरी हैल्प करते हैं.’’

ऐसे निभाएं रिश्ता

आंकड़े भी यही बताते हैं कि हैल्पिंग पार्टनर वाली मैरिज ज्यादा समय तक टिकती है. वहीं उन की रोमांटिक लाइफ भी उन कपल्स के मुकाबले ज्यादा हैप्पी होती है जहां सिर्फ फीमेल पार्टनर ही घर के सभी कार्यों का बोझ उठाती हैं.

अगर आप भी अपनी वाइफ या पार्टनर की हैल्प करना चाहते हैं लेकिन आप के पास इन सब के लिए बहुत कम समय है तो आप कुछ स्मार्ट होम ऐप्लायंसिस और गैजेट की हैल्प ले सकते हैं. इन के इस्तेमाल से आप कम समय में ही अपने घर के कामों को जल्दी निबटा पाएंगे और अपने पार्टनर के साथ समय बिता पाएंगे. आप की छोटी सी हैल्प से आप की रिलेशनशिप खुशियों से भर जाएगी.

मार्केट में ऐसे बहुत से प्रौडक्ट्स हैं जिन की हैल्प से आप अपने काम को जल्दी से जल्दी निबटा सकते हैं. इस के बाद बाकी बचे समय में आप अपने पार्टनर के साथ समय बिता सकते हैं. आप चाहे तो अपने रिलेटिव्स और फ्रैंड्स को उन के घर जा कर सरप्राइज भी दे सकते हैं.

अगर बात करें गैजेट की तो एक गैजेट है स्मार्ट रोबोट वैक्यूम क्लीनर. इस क्लीनर का इस्तेमाल फ्लोर की साफसफाई के लिए किया जाता है. इस का इस्तेमाल कर के आप चंद मिनटों में झड़ूपोंछा का काम निबटा सकते हैं. आप इसे अपने फोन से भी कनैक्ट कर सकते हैं.  इसी तरह आप ढो मेकर और रोटी मेकर का यूज कर के भी कम समय में रोटियां बना सकते हैं.

इसी तरह दही मेकर है जो आप को दही जमाने के झंझट से छुटकारा दिलाता है. इन कामों से बचे हुए टाइम को आप अपने क्वालिटी टाइम के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं. इस तरह से आप की फीमेल पार्टनर भी आप का साथ पा कर खुश हो जाएंगी.

सोचो अगर आप और आप की पार्टनर डिनर के बाद साथ में कुछ क्वालिटी टाइम स्पैंड करना चाहते हैं लेकिन सिंक में बरतन धोने के लिए पड़े हुए हैं. सुबह आप दोनों को औफिस जाने की जल्दी होती है ऐसे में आप डिशवौशर का इस्तेमाल कर के क्वालिटी टाइम स्पैंड कर सकते हैं.

वहीं अगर आप के रिश्ते में किसी कारणवश खटास आ गई है तो आप उसे अपने पार्टनर की हैल्प और उन की केयर कर के दूर कर सकते हैं. यही वह समय है जब आप अपने उलझे रिश्ते को शेयरिंग और केयरिंग के जरीए सुलझ सकते हैं.

जब फीमेल पार्टनर घर का बोझ उठाएं

अगर बात करें उन लोगों की मैरिड लाइफ कैसी होती है जहां सिर्फ फीमेल पार्टनर ही घर का सारा भार उठाती हैं. यह बात हम श्रेया और अंकुश की कहानी से जानेंगे.

श्रेया और अंकुश दोनों ही वर्किंग हैं. ऐसे में श्रेया घर और औफिस दोनों का काम संभालती है. वहीं अंकुश सोफे पर बैठेबैठे और्डर देता रहता है. इतना ही नहीं अंकुश खाने में भी नुक्स निकालता है. अकसर खाने में वैराइटी और घर के कामों को ले कर उन के बीच बहस होती रहती है. श्रेया इन सब से बहुत परेशान हो गई है. वह इस रिश्ते से अब थक गई है. उस का ऐसा फील करना गलत भी नहीं है. जब एक ही पर्सन जिम्मेदारियों का निर्वाह कर रहा हो तो वह एक समय बाद तंग हो ही जाता है. ऐसा ही अभी श्रेया के साथ हो रहा है.

असल में जब एक ही व्यक्ति घर और बाहर दोनों के ही काम करता है तो वह फ्रस्ट्रेटिंग फील करता है. उसे बातबात पर गुस्सा आता है. इस से उस की रिलेशनशिप में भी प्रौब्लम होती है. वहीं अगर दोनों पार्टनर मिल कर सारी जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हैं तो उन का रिलेशन खुशनुमा रहता है.

ऐसे बनाएं खुशहाल जिंदगी

ऐसा नहीं है कि पार्टनर के साथ मिल कर काम करने से आप सिर्फ उन की हैल्प कर रहे हैं. पार्टनर के साथ मिल कर काम करने से आप अपनी मैरिड लाइफ को ज्यादा समय दे पाते हैं. इस से मनमुटाव भी नहीं होता है और आप की लाइफ स्मूथली मूव करती है, साथ ही आप मैंटली और फिजिकली हैप्पी भी फील करती हैं.

अगर दोनों पार्टनर मिल कर घर और बाहर दोनों के काम को संभालते हैं तो यह किसी एक पर बोझ नहीं बनता. ऐसा करने से दोनों ही अपने वर्क और स्किल्स पर ध्यान दे पाते हैं, साथ ही उन की लव लाइफ भी अच्छी और खुशहाल रहती है. दोनों पार्टनर के साथ मिल कर काम करने से आप अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को भी ज्यादा समय दे पाते हैं. वहीं किसी एक को भी ऐसा नहीं लगता कि उसे अपना रिश्ता बचाने के लिए ऐक्स्ट्रा ऐर्फ्ट करना पड़ रहा है न ही उस का पार्टनर उसे टेक फौर गरांटेड ले रहा है.

कोई भी रिश्ता तभी बेहतर होता है जब आप अपने पार्टनर और उस की फैमिली को रिस्पैक्ट देते हैं. यहां यह बात समझनी बहुत जरूरी है कि सिर्फ मेल पार्टनर या हसबैंड के मांबाप को मांबाप न समझ जाए बल्कि फीमेल पार्टनर या वाइफ के मांबाप को भी मांबाप समझ जाए. आप अपनी फीमेल पार्टनर या वाइफ के मांबाप को भी वह सम्मान दें जो आप अपनी पार्टनर से अपने मांबाप के लिए चाहते हैं.

आखिर इज्जत का हक सिर्फ लड़के के मां बाप तक ही क्यों सीमित रहे. जब 2 लोग 1 रिश्ते में आ रहे हों तो सम्मान भी तो दोनों के मांबाप का होना चाहिए.

अगर आप भी अपने रिश्ते में शांति और सुकून चाहते हैं तो अपने पार्टनर की पूरी मदद करें, साथ ही उस के मां बाप को भी पूरा सम्मान दें. वहीं अगर आप के रिश्ते में तनाव या मनमुटाव चल रहा है तो इस बार अपने रिश्ते को केयरिंग से रिपेयर करें.

रिश्ते पर हावी कुंडली मिलान

रमा और मनोज के रोजरोज के ?ागड़े से पासपड़ोस के लोग भी तंग आने लगे थे. दोनों की शादी को महज 3 साल ही हुए हैं और इन 3 सालों में दोनों के बीच प्यार कम फालतू के मुद्दों पर बहस ज्यादा देखने को मिलती है. रमा पब्लिक स्कूल में टीचर और मनोज सरकारी बैंक में मैनेजर. दोनों को काम से जल्दी छुट्टी मिल जाती है, फिर भी दोनों साथ में समय नहीं बिता पाते.

दरअसल, मनोज जल्दी आ कर भी घर नहीं आता. अपने दोस्तों के साथ बाहर ही समय बिताता है. उस की यह आदत रमा को बिलकुल पसंद नहीं है. इसलिए रोज रात को दोनों की बीच तीखी नोकझोंक होती है. रविवार के दिन भी दोनों बाहर कम जाते हैं, जिस वजह से दोनों के बीच दूरी बढ़ने लगी थी. छोटीछोटी बातों से शुरू हुआ झगड़ा उन के जीवन पर हावी होता जा रहा था.

एक दिन रमा ने स्कूल से छुट्टी ले ली लेकिन मनोज के टिफिन के लिए वह सुबह जल्दी उठ गई. रमा रसोई में नाश्ता बना रही थी तभी मनोज रमा के पास आ कर कहने लगा, ‘‘मैं आज नाश्ता ले कर नहीं जाऊंगा.’’

इस बात पर रमा को बहुत गुस्सा आया. उस ने मनोज से कहा, ‘‘जब तुम बाहर ही रहते हो, बाहर ही खातेपीते हो तो मेरे साथ हो ही क्यों? मैं सुबह जल्दी उठ कर नाश्ते की तैयारी में लगी हुई हूं. अगर नाश्ता नहीं ले जाना था तो रात को ही बता देते,’’ इतना बोल कर रमा गुस्से में रसोई से अपने कमरे में चली गई.

तभी मनोज भी कमरे में आया और रमा पर चिल्लाने लगा, ‘‘तुम्हें छोटी सी बात समझ नहीं आती. पता नहीं मैं ने शादी क्यों की.’’

शादी का नाम सुनते ही रमा ने भी पलट कर जवाब देना शुरू कर दिया, ‘‘सही कहा तुम ने, न जाने वह कैसा पंडित था जिस ने हमारी कुंडली देख कर 36 में से 32 गुण मिला दिए थे. गुण तो अब देखने को मिल रहे हैं.’’

हावी रहता है अंधविश्वास

रमा आज भी उस दिन को कोसती है जब मनोज की कुंडली के साथ उस की कुंडली का मिलान हो रहा था. पंडित ने दोनों की कुंडलियां देख कर तारीफों के पुल बांध दिए थे.

पंडित ने रमा की मां से कहा था, ‘‘आप

की बेटी बहुत ही खुश रहेगी. दोनों के 32 गुण मिले हैं. इस आधार पर दोनों की आपस में

खूब बनेगी.’’

मगर क्या ऐसा हुआ कि दोनोें में से किसी ने भी कभी एकदूसरे को सम?ा ही नहीं? धर्र्म कोई भी हो शादीविवाह का एक अलग ही महत्त्व होता है. मगर हिंदू धर्म में कुंडली मिलान को ले कर जीतने पाखंड होते हैं उतने शायद ही कहीं होते हों.

दरअसल, जब 2 परिवार रिश्ते में जुड़ने वाले होते हैं तो सिर्फ बात करने से ही रिश्ते नहीं जुड़ जाते. इस में अंधविश्वास भी हावी रहता है, ऐसा कहा जाता है कि यदि ज्योतिष या पंडित को लड़के या लड़की की कुंडली नहीं दिखाई गई, दोनों के गुण नहीं मिलते तो उन्हें आगे चल कर काफी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. दरअसल, यह सब पंडितों का फैलाया हुआ भ्रमजाल है, जिस में फांस कर वे जजमान और मेजबान दोनों ही की जेबें ढीली करते हैं.

कुंडली की आड़ में टूटते रिश्ते

पंडितों के अनुसार कुंडली दिखाने से रिश्ते जुड़ते हैं, 2 परिवारोें का मिलान होता है. लेकिन क्या कुंडली दिखाने से सच में रिश्ते जुड़ते हैं? कुंडली मिलाने पर रिश्ते टूट जाते हैं, 2 परिवारों का मिलन अधूरा भी तो रह जाता है. एक लड़कालड़की दोनों ही कितने भी पढ़ेलिखे क्यों न होें, एकदूसरे के लिए परफैक्ट क्यों न हों, अगर उन की कुंडली में गुण नहीं मिलते या कोई दोष पाया जाता है तो वह रिश्ता वहीं टूट जाता है.

हिंदू धर्म के अनुसार, यदि किसी लड़के या लड़की के 18 से कम गुण मिलते हैं तो वे एकदूसरे के लिए परफैक्ट नहीं होते. उन के वैवाहिक जीवन में हमेशा कष्ट रहता है. इसलिए ज्योतिष और पंडित ऐसे रिश्ते में बंधने के लिए मना करते हैं या दोषों के निवारण के लिए तरहतरह के उपाय बताते हैं या यों कहें कि अपने भ्रमजाल में फंसाते हैं. दोषोें और ग्रहों के नाम पर ये पेड़पौधे से शादी करने को बोलते हैें और पूजापाठ के नाम पर मोटा पैसा वसूल कर अपनी जेबें भरते हैं.

बिग बौस के ऐक्स कंटैंस्टैंट रह चुके और राजनीतिक परिवार से संबंध रखने वाले राहुल महाजन को तो सभी जानते हैं. राहुल तीसरी बार दूल्हा बने हैं. उन की पहली शादी 2006 में श्वेता सिंह से पूरे हिंदू रीतिरिवाज के साथ हुई थी. लेकिन उन की पहली शादी 2 साल बाद ही तलाक में बदल गई. उस के बाद राहुल ने 2010 में रिऐलिटि शो ‘राहुल दुलहनिया ले जाएंगे’ में डिंपी गांगुली से नैशनल टैलीविजन पर दूसरी शादी की थी.

लेकिन उन की यह शादी भी बस 4 साल चली. राहुल ने अब तीसरी शादी कर ली है. 20 नवंबर, 2018 को राहुल ने अपने से 18 साल छोटी कजाकिस्तानी मौडल नताल्या इलीना के साथ शादी की. नताल्या से शादी करते वक्त राहुल के पास कोई कुंडली नहीं थी. ऐसे में राहुल की यह शादी चल जाती है तो पंडितों के मुंह पर यह जोरदार तमाचा होगा. लेकिन सवाल यहां पर राहुल की तीसरी शादी से नहीें है बल्कि उन की पहले की 2 शादियों से है.

राहुल की पहली और दूसरी शादी हिंदू रीतिरिवाज से हुई, जहां पंडितों को बुलाया गया, कुंडली मिलान किया गया, मंत्र पढ़े गए. लेकिन इन सब का राहुल और उन की पूर्व पत्नियों के जीवन में कोई सकारात्मक असर नहीं पड़ सका और उन का रिश्ता कुंडली के पन्नों तक ही सीमित रह गया.

ग्रंथों के अनुसार

हिंदू धर्म मेें रामायण बहुत पढ़ा जाता है बल्कि उसे पूजा भी जाता है. लेकिन जिस रामायण को लोग पूजते हैं उसी रामायण में क्यों सीता और राम अधूरे रह गए? क्यों दोनों के जीवन में इतना कष्ट आया? जबकि राम और सीता की शादी तो ऋषिमुनियों और ब्राह्मणों के देखरेख में हुई थी. दोनों का कुंडली में 36 के

36 गुण मिल भी गए थे फिर भी सीता का जीवन शुरू से ले कर अंत तक कष्टों से भरा हुआ ही रहा. सीता को कभी पति का साथ नहीं मिल पाया. सच तो यह है कि कुंडली मिलान पंडितों और ज्योतिषों द्वारा रचाया गया एक मायाजाल है, जिस में हरकोई फंसता जा रहा है. जब मांबाप अपने बच्चों के लिए रिश्ता ढूंढ़ते हैं तो लड़कालड़की के साथ वे खुद परिवार वालों से मिलते हैं. जब रिश्ता पसंद आ जाता है तब लड़कालड़की को बात करने दी जाती है.

यहां तक तो सब ठीक है. लेकिन इस के आगे की प्रक्रिया किसी भी नए रिश्ते के लिए कठिन हो जाती है. आगे की प्रक्रिया में कुंडली मिलान के लिए पंडित को बुलाया जाता है. यदि कुंडली मिल गई, गुण मिल गए तो दोनों परिवार विवाह की तैयारियों में जुट जाते हैं. लेकिन कुंडली नहीं मिली, कोई दोष पाया गया तो

क्या होगा?

जब लड़कालड़की और उन का परिवार एकदूसरे को पसंद कर लेता है फिर यह कुंडली का ?ामेला क्योें? जरा सोचिए, इतने दिन बात करने के बाद लड़कालड़की एकदूसरे के प्रति जुड़ाव महसूस करने लगते हैं. ऐसे में रिश्ता टूट जाए तो उन के मानसिक स्तर पर क्या असर पड़ेगा?

हालांकि पंडितों के अनुसार हर दोष का उपाय है. लेकिन गारंटी किसी चीज की नहीं है. इसी डर के कारण रिश्ते टूट जाते हैं. अगर कोई मांगलिक है तो उसे मांगलिक दोष वाले व्यक्ति से ही शादी करनी चाहिए. ऐसा करने से दोनों का जीवन सुखी रहता है. लेकिन कोई लड़की मांगलिक है और लड़का नहीं तो ऐसा कहा जाता है कि शादी के बाद पति की मृत्यु पहले हो जाती है. इस के लिए पंडितों ने कई उपाय बताएं हैं जैसे जानवर से शादी, केले या पीपल के पेड़ से शादी. शादी से पहले लड़की को इन से शादी करनी होती है. ऐसा करने से मांगलिक दोष दूर हो जाता है. क्या पेड़पौधे से शादी करने से सच में पति का जीवन बढ़ जाता है?

आज लोगों के अंदर इन सब बातों का इतना डर बैठ गया है कि उन का खुद पर से भरोसा ही उठता जा रहा है. तभी तो सब पंडितों की उंगलियों पर नाचते नजर आ रहे हैं. ऐसा नहीं है कि इन बातों पर सिर्फ गांवदेहात के लोग ही भरोसा करते हैं बल्कि पढ़ेलिखे लोग भी इस अंधविश्वास को उतना ही मानते हैं.

मांगलिक दोष में कितनी सचाई

आज लोग मौडर्न तो होते जहां रहे हैं लेकिन सिर्फ पहनावे से. दिमागीरूप से लोग अभी भी अंधविश्वास के जाल में फंसे हुए हैं. तभी तो अपने दिन की शुरुआत राशिफल देखने से करते हैं. कोई भी काम करने से पहले भगवान को याद करते हैं, ज्योतिषी से हाथों की रेखा दिखाते हैें. यही कारीण है कि आज धर्म के नाम पर इन का धंधा फूलताफलता जा रहा है.

बौलीवुड अभिनेत्री ऐश्वर्या राय और अभिनेता अभिषेक बच्चन की शादी ने तब खूब सुर्खियां बटोरी थी. यह शादी भले ही 2 नामचीन हस्तियों के बीच थी पर शादी ज्यादा मशहूर इसलिए भी हुई क्योंकि शादी में अंधविश्वास ग्रहोें को ले कर चर्चाएं हुई थीं.

दरअसल, ऐश्वर्या की कुंडली में मांगलिक दोष था. दोनों की सगाई के बाद जब पंडित ने कुंडली मिलान किया तो ऐश्वर्या की कुंडली में मांगलिक दोष निकला. ऐश्वर्या का मांगलिक दोष पूरे देशभर में फैल गया था. ज्योतिषियों और पंडितों का कहना था यह शादी सफल नहीं हो सकती. इस के लिए ऐश्वर्या को मांगलिक दोष का उपाय करना होगा. अगर वे अभिषेक से शादी करना चाहती हैं तो उन्हें पीपल या केले के पेड़ से शादी रचानी होगी. ज्योतिषियों का तो यहां तक कहना था कि यदि ऐश्वर्या इन उपायों के बिना शादी करती हैं तो उन का शादीशुदा जीवन में दुर्भाग्य और अपशगुन आ जाएगा, जिस का असर अभिषेक पर पड़ेगा.

इस पूरे विषय पर फेमस ज्योतिषी चंद्रशेखर स्वामी ने एक न्यूज पेपर को बताया था, ‘‘अभिषक और ऐश्वर्या दोनों मेरे पास सलाह लेने आए थे. मैं ने दोनों को सलाह दी कि दोनों को प्राचीन शिव मंदिर में पूजा करानी चाहिए.’’

इन सब विवादों के बाद ऐश्वर्या और अभिषेक की शादी हो गई. हालांकि ऐश्वर्या की पेड़ से शादी होने की बात साबित नहीं हो पाई. एक इंटरव्यू में जब अमिताभ बच्चन से पूछा गया कि क्या सच में ऐश्वर्या का मांगलिक दोष हटाने के लिए पेड़ से शादी की थी का कहना था, ‘‘कहां है वह पेड़. कृपया मुझे दिखाइए. ऐश्वर्या ने एक ही बार शादी की है और वह व्यक्ति मेरा बेटा अभिषेक बच्चन है. अगर अभिषेक को एक पेड़ सम?ाते हैं तो यह बात अलग है.’’

अमिताभ के इस बयान से यह साफ हो गया था कि ऐश्वर्या ने मांगलिक दोष हटाने के लिए किसी भी प्रकार के पेड़ से शादी नहीं की थी.

इस का मतलब यह है कि मांगलिक दोष होने के बावजूद भी ऐश्वर्या और अभिषक अपनी शादीशुदा जिंदगी में बेहद खुश हैं. जिस तरह ज्योतिषयों ने दोनों की शादी के समय अपशुगन होने की बात कही थी अभी तक तो ऐसा कुछ नहीं हुआ हैं.

इसका एक ही अर्थ निकलता है कि मांगलिक होना कोई दोष या अपशगुन नहीं है. यह एक ऐसा डर है जिस के तले लोग दबे जा रहे हैं और इस डर का धर्म के व्यापारी फायदा उठाने में लगे हुए हैं.

धर्म की आड़ में चलता कारोबार

एक हिंदू अपनी कुंडली पंडित या ज्योतिषी को दिखाता है. लेकिन जरा सोचिए वह पंडित किसी दूसरे मजहब को मानने वाला हुआ तो? धर्म के नाम पर धंधा इतना बढ़ता जा रहा है कि लोग अपनी असली पहचान छिपा कर इस धंधे में घुस रहे हैं. आज लोग इतने अंधविश्वासी होते जा रहे हैं कि जिंदगी को बेहतर और सरल बनाने के लालच में ऐसे लालची पाखंडियों का सहारा ले रहे हैं.

कुछ साल पहले दिल्ली के हौजखास में ऐसे ही एक बाबा का धंधा चौपट हुआ. दरअसल, यह बाबा लोगों का भविष्य और कुंडली देखता था. आप को यह जान कर हैरानी होगी कि इस बाबा का असली नाम युसुफ खान था. यह आदमी नाम बदल कर कई सालों से यह धंधा चला रहा था.

ऐसे कई बाबा मिलेंगे जिन्हें पढ़नालिखना भले ही न आता होे लेकिन कुंडली और भविष्य पढ़ना बखूबी आता है.

कुंडली दिखाना और मिलाना सिर्फ हिंदू धर्म में ही होता है बाकी किसी भी धर्म, समाज, समुदाय, संगठन, जाति में ऐसा कोई रिवाज है ही नहीं. तभी दूसरे धर्म के लोग भी इस धंधे में शामिल होते जा रहे हैं. आज के समय में ऐसे नाम बदलू पंडित और कुंडली पर भरोसा करना एक बराबर है.

क्या है स्लीप टूरिज्म

कोविड अब ओवर हो चुका है, इस के बाद से लोगों ने स्वास्थ्य पर ध्यान देना शुरू कर दिया है. इस में सब से जरूरी सुकून भरी नींद लेने को माना जाने लगा है और इस में विकसित हुआ है स्लीप टूरिज्म, जिस में व्यक्ति रात के 8 बजे सोने चला जाता है. वहां उसे शहर की भागदौड़ और शोरशराबे से दूर शांत जगह मिलती है. इतना ही नहीं इस पर्यटन में काम से थोड़े दिन की छुट्टी ले कर अकेले कहीं घूमने का शौक पूरा होने के साथसाथ तरोताजा होने का भी अवसर मिल जाता है.

दरअसल, यह स्लीप टूरिज्म रिलैक्स होने की एक तकनीक है, जो विदेशों में अधिक पौपुलर है. इस में शांत वातावरण होने की वजह से स्ट्रैस को कम करने में मदद मिलती है, साथ ही स्लीप क्वालिटी को बूस्ट करने का भी अवसर मिलता है क्योंकि ऐसा माना गया है कि अगर व्यक्ति की नीद पूरी होती है, तो उस का स्ट्रैस लैवल भी कम हो जाता है.

इस का क्रेज अधिकतर बड़े शहरों में रहने वालों में बड़ा है, जहां काम के प्रैशर के साथसाथ ट्रैवलिंग भी अधिक होती है. इसलिए स्लीप टूरिज्म का विकास भी तेजी से होने लगा है. अधिकतर होटल्स और रिजोर्ट्स स्लीप टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए तरहतरह के लुभावने औफर आजकल टूरिस्ट को देने लगे हैं.

महाराष्ट्र के तपोला के ओंकार रिजोर्ट के गणेश उतंकर कहते हैं कि टूरिज्म के लिए लोग हर जगह से आते हैं, लेकिन वही भीड़, वही आवाज, शोर सब होता है. वे घूमने तो जाते हैं, लेकिन उन्हें शांति नहीं मिलती है. ऐसे में आजकल लोग केवल सोने के लिए भी मेरे पास आते हैं, जिस में दिन में 2 वक्त का खाना खाने के बाद खुद को रिलैक्स करना होता है. वे अधिकतर अकेले आते हैं. इस में मूड को अच्छा बनाने के लिए वे वैली व्यू, रिवर व्यू, घने जंगल आदि को अधिक महत्त्व देते हैं क्योंकि वहां केवल एक चिडि़या की आवाज से ही उन की नींद खुलती है. वहां उन्हें पूरी शांति मिलती है.

ऐसी जगह नियमित आने वाली पुणे की लीना कहती है, ‘‘मैं हर साल यहां रिलैक्स के लिए आती हूं. यहां बहुत शांति है. व्यस्त जीवनशैली से यहां आ कर खाना खा कर मैं सिर्फ 2 घंटे सोने के बाद खुद को तरोताजा महसूस कर रही हूं. मेरी नींद इतनी गहरी थी कि मेरी सारी थकान दूर हो चुकी है.’’

40 वर्षीय विजय धूमा कहते हैं, ‘‘मुझे तपोला बहुत पसंद आता है, मुझे जब भी समय मिलता है, मैं कही शांत जगह जाता हूं.’’

आईटी सैक्टर में काम करने वाली 26 वर्षीय रोमा भी हर साल स्लीप टूरिज्म के लिए शांत जगह जाती है, जिस में उसे हिल स्टेशन पर जाना अधिक पसंद है जहां वह हर दिन 8-9 घंटे सोती है.

पुराने समय में लोग एक पेड़ के नीचे सो कर सुकून भरी नींद लेते थे. आजकल वैसा ही टूरिज्म हो चुका है क्योंकि आज किसी भी क्षेत्र में काम में मानसिक तनाव अधिक होता है और उन्हें नीद की कमी की शिकायत रहती है.

स्लीप टूरिज्म के फायदे

  •  ग्लोबलाइजेशन की वजह से रातभर जाग कर काम करने वालों के लिए स्लीप टूरिज्म फायदे का होता है.
  • अधिक तनाव लेने वालों के लिए यह एक बेहतर औप्शन है, व्यक्ति मानसिक रूप से बना मजबूत होता है.
  • सही नींद लेने से बारबार बीमार पड़ने में कमी आती है.
  • वजन बढ़ने का खतरा कम रहता है.

जाएं कहां

स्लीप टूरिज्म पर जाने से पहले कुछ बातों पर ध्यान देना जरूरी है जैसे स्लीप टूरिज्म के लिए प्रौपर हिल स्टेशन पर सही रिजोर्ट में जाएं. वहां आसपास 200 से 300 मीटर्स में कोई रिजोर्ट, होटल या किसी भी प्रकार की ऐक्टिविटीज नहीं होनी चाहिए.

रिजोर्ट के आसपास पेड़पौधे होने की जरूरत है ताकि व्यक्ति को रिलैक्स महसूस हो. महाराष्ट्र में ऐसे बहुत सारे रिजोर्ट्स हैं, जो वैली और रिवर साइड में उपस्थित हैं. वहां का वातावरण स्लीप टूरिज्म के लिए बहुत पौपुलर है. इन में महाबलेश्वर, पंचगनी, तापोला आदि ऐग्रोबेस्ड टूरिज्म हैं, जहां अधिकतर शांत वातावरण मिलता है.

अवौइड करें

  •   खुद को मोबाइल से दूर रखें या फिर साइलैंट मोड पर रखें.
  • आप की सवारी रखने की जगह थोड़ी दूर हो.
  • कम से कम तकनीकी सुविधाओं वाले स्थान पर जाएं. इस से रिलैक्सेशन अधिक होता है.
  • डाइट में पारंपरिक भोजन अधिक लें क्योकि लग्जरी फूड से नीद में कमी आती है.

ज्वाइंट फैमिली में रहने के कारण मैं परेशान हो गई हूं?

सवाल-

मैं 26 वर्षीय विवाहिता हूं. हमारा संयुक्त परिवार है. शादी से पहले ही हमें यह बता दिया गया था कि मु झे संयुक्त परिवार में रहना है. वैसे तो यहां किसी चीज की दिक्कत नहीं है पर ससुराल के अधिकतर लोग खुले विचारों के नहीं हैं, जबकि मैं काफी खुले विचार रखती हूं. इस वजह से मु झे कभीकभी उन की नाराजगी भी सहनी पड़ती है और खुलेपन की वजह से मेरी ननदें व जेठानियां मु झे अजीब नजरों से भी देखती हैं. पति को कहीं और फ्लैट लेने को नहीं कह सकती. बताएं मैं क्या करूं?

जवाब-

घरपरिवार में कभीकभी कलह, वादविवाद,  झगड़ा आम बात है. मगर परिवार फेसबुक अथवा व्हाट्सऐप की तरह नहीं है जिस में आप ने सैकड़ों लोगों को जोड़ कर तो रखा है, मगर आप को कोई पसंद नहीं है तो आप उसे एक ही क्लिक में एक  झटके में बाहर कर दें.

इस बात की कतई परवाह न करें कि परिवार के कुछ सदस्य आप को किन नजरों से देखते हैं और कैसा व्यवहार करते हैं. अच्छा यही होगा कि अपनेआप को इस तरीके से व्यवस्थित करें कि आप हमेशा खूबसूरत इंसान बनी रहें. कोई कैसे देखता है यह उस पर है.

आजकल जहां ज्यादातर लोग एकल परिवारों में रहते हुए तमाम वर्जनाओं के दौर से गुजरते हैं, वहीं आज के समय में आप को संयुक्त परिवार में रहने का मौका मिला है, जिस में अगर थोड़ी सी सू झबू झ दिखाई जाए तो आगे चल कर यह आप के लिए फायदेमंद ही साबित होगा.

बेहतर यही होगा कि छोटीछोटी बातों को नजरअंदाज करें और सब को साथ ले कर चलने की कोशिश करें. धीरेधीरे ही सही पर वक्त पर घर के लोग आप को हर स्थिति में स्वीकार कर लेंगे और आप सभी की चहेती बन जाएंगी.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

मायूस मुसकान: आजिज का क्या था फैसला

लेखिका- रोचिका अरुण शर्मा

 

यों ही अचानक: भाग 1- अकेले पड़ गए मुकुंद की जिंदगी में सारिका को क्या जगह मिली

होता,बहुत कुछ यों ही होता है अचानक, वरना 46 साल के सीधे से बिलकुल चुपचुप रहने वाले मुकुंद प्रधान की एक प्रेम कहानी नहीं बनती और वह भी पत्नी की मृत्यु के बाद.

मुकुंद प्रधान तो ऐसे व्यक्ति हुए कि वे सरेआम किसी लड़की को चूम भी रहे हों तो लोग अपनी आंखों को गालियां देते निकल जाएंगे, लेकिन अपनी आंखों पर भरोसा कभी न करेंगे.

बच्चों के डाक्टर उम्र तो बता ही दी, कदकाठी मध्यम. देखनेभालने की बात निकल ही आती है जब प्रेम प्रसंग की बात छिड़े. तो अपने मुकुंद प्रधान यद्यपि देखने में उतने बुरे भी नहीं थे, फिर भी कमसिन स्त्रियों की नजर उन पर कम ही पड़ती. गेहुंए वर्ण का एक सामान्य सा दिखने वाला व्यक्ति, मूंछें नदारद और आंखें. शायद जबान का काम करती.

बच्चों के मैडिसिन के डाक्टर थे. आए दिन गरीब बच्चों का मुफ्त इलाज करते. रविवार अपने बेटे के साथ समय बिताते. नीलिमा यद्यपि डाक्टर साहब की आगे की जिंदगी में भले ही न हों, मगर उन्हें भुलाया भी नहीं जा सकता.

नीलिमाजी डाक्टर साहब की सिर्फ अर्द्धांगिनी ही नहीं थीं, बल्कि वे डाक्टर साहब के साथसाथ पूरी कालोनी की आंखों का तारा भी थीं. गांव की सरल सी स्त्री, सीधीसादी, सूरत भोली सी. महल्ले भर में किसी को कोई तकलीफ हो नीलिमा दौड़ी जातीं. डाक्टर साहब की तो हर वक्त सेवा में मुस्तैद.

हां डाक्टर साहब और उन की पत्नी के दिल में तब चुभन सी हो जाती जब उन के इकलौते बेटे निलय की बात छिड़ जाती. 12 साल का यह बच्चा सैरेब्रल पैलेसी का शिकार था. कमर से लाचार था निलय और चलनेफिरने में उसे बहुत तकलीफ थी. नीलिमाजी इस बच्चे के उपचार के लिए आए दिन बड़ेबड़े डाक्टरों और विशेषज्ञों के चक्कर लगातीं, घर पर भी ज्यादा वक्त उसे व्यायाम करवाती रहतीं.

दूसरे शहर से खबर आई थी कि नीलिमाजी के ननदोई की तबीयत ज्यादा खराब है  और उन्हें अस्पताल में भरती करवाया गया है. नादान और सारी स्थितियों को संभालने में अक्षम. नीलिमा दौड़ी गईं ननद के पास. 3 दिन बाद वहां स्थिति कुछ सही हुई और ननद के जेठजेठानी ने आने की खबर दी तो वे वहां से वापसी का मन बना पाईं. ननद के घर से बसस्टैंड 5 किलोमीटर था. ननद के बेटे को सुबह 5 बजे स्कूटर से उन्हें बसस्टैंड तक छोड़ने को कहा गया. 2 रातों से सोई नहीं थीं नीलिमा, और उन का बीपी भी हाई रहता था. स्कूटर के पीछे बैठी नीलिमा कब नींद से बोझिल हो सड़क पर लुढ़क गईं और किस तरह अचानक सबकुछ खत्म हो गया, कोई कुछ समझ ही नहीं पाया.

एकाएक जैसे दुनिया चलती सी रुक गई थी. डाक्टर साहब जैसे बीच समंदर में फेंक दिए गए थे. दिनोंदिन उदास, चुपचुप और खुद में ही वे सिकुड़ते चले गए. निलय बीचबीच में दहाड़ें मार कर रोता और डाक्टर साहब के चुप कराने पर भी चुप नहीं होता. 3 महीने हुए थे उन की जिंदगी वीरान हुए और करीब 6 महीने पहले वे आईर् थी, ठीक उन के घर के सामने इस मकान में. वह सारिका थी, सुदेश की नई सी दिखने वाली 7 साल पुरानी 27 वर्षीय पत्नी. इन का एक 5 साल का बेटा अंकित भी साथ था.

सुदेश के कई तरह के व्यवसाय थे. 6 महीने पहले ये लोग डाक्टर साहब के घर के सामने वाला मकान खरीद कर यहां आ बसे थे.

36 साल के सुदेश महोदय की यह दूसरी शादी है. उन की पहली शादी टिकी नहीं. पत्नी ज्यादा सहनशील नहीं थी. जैसाकि आमतौर पर भारतीय महिलाओं के असंख्य गुणों में से एक माना जाता है.

सुदेश को बिजनैस ट्रिप पर जा कर नशा करने और खूबसूरत लड़कियों को बिस्तर की संगिनी बनाने का बेहद शौक था. पहली पत्नी इन की कुछ तेज किस्म की थीं. उन की खोजी दृष्टि से सुदेश बच न पाए और बीवी ने भी इस तरह घुटघुट कर जीने से बेहतर अलग हो जाना ही ठीक समझ.

सारिका बड़े परिवार और सीमित आय वाले घर की है. पैसे वाले 2 बहनों पर इकलौते लड़के का रिश्ता आते ही 21 साल की सारिका किसी भी कीमत पर बख्शी न जा सकी, ‘हर मर्द ऐसा ही होता है,’ ‘पहली पत्नी ने बदनाम करने के लिए ऐसा कहा’ आदि तर्कों से सारिका की अनिच्छा को खारिज करते हुए उसे सुदेश को सौंप दिया गया. हां यह शादी सौंप कर मुक्त हो जाने जैसी ही थी.

जिंदगी से सम?ौता तो कर लिया था सारिका ने, लेकिन अंदर की घुटन बातबात पर फूट पड़ती. पहले से ही वह ज्यादा बात करने वालों में से थी, तिस पर अब जब जिंदगी के फैसलों के आगे उस की एक न चली तो छोटीछोटी बातों पर ही वह खाने को दौड़ती.

सुदेश 2-4 दिन घर आता और निकल जाता. सारिका महसूस करती कि बिजनैस के साथसाथ उस की निजी जिंदगी के गहराए रहस्य उस के पति को बाहर दौड़ाते रहते.

आज भी वह अकेले ही बड़बड़ाती, भुनभुनाती बच्चे को स्कूल के लिए तैयार कररही थी.

बच्चा लगातार रो रहा था. सारिका को लगा बाहर स्कूल वैन आ चुकी है. वह दौड़ती गेट पर आई, वैन तो आई नहीं थी, लेकिन वह वहीं खड़े चिल्ला पड़ी, ‘‘सुबह से दहाड़ें मार रहा लड़का. पता नहीं चुप क्यों नहीं होता?’’

पास ही सामने गेट पर डाक्टर साहब अपने मुकुंद प्रधान खड़े निलय के स्कूल की गाड़ी का इंतजार कर रहे थे. उधर आंगन में बैठा निलय आधे घंटे से रोता हुआ अभी भी मां की याद में सुबुक रहा था.

सारिका के इस तरह कहने पर डाक्टर साहब बड़े लज्जित हुए. सैरेब्रल पैलेसी का शिकार निलय अपनी भावनाओं को बड़ी मुश्किल से दबा पाता है. वैसे तो पढ़ने में बड़ा होशियार है, ज्यादा शांत बैठ कर ड्राइंग आदि करता रहता है, लेकिन स्कूल जाते वक्त उसे मां की याद बड़ी सता जाती है. वह रोक नहीं पाता खुद को. डाक्टर साहब भी थोड़ी देर सहला कर छोड़ देते हैं. जितना ही वे उसे चुप कराते हैं, उस का दुख बढ़ ही जाता.

मुकुंदजी ने सारिका की ओर पलट कर देखा. आंखों में उन की मूक दर्द सा था. सारिका की उन पर नजर पड़ी. अभी तक 6 महीने बीत चुके थे, पर कभी भी उन से बातचीत नहीं हुई थी उस की. नीलिमाजी से परिचय होतेहोते ही वे चल बसीं. फिर सारिका की उन लोगों में दिलचस्पी नहीं रही. बेटे के स्कूल जाने के बाद वह घर के कामकाज और सिलाईबुनाई में व्यस्त हो जाती.

सारिका को महसूस हुआ कि उस का कहना डाक्टर साहब ने अपने बेटे के लिए समझ है. अभी वह बहुत जल्दी में थी, निलय की स्कूल वैन आ गई थी, वह जा चुका था, लेकिन सारिका का अपने बेटे को स्कूल वैन में बैठाना टेढ़ी खीर लग रहा था. लड़का कुछ ज्यादा ही अड़ गया.

डाक्टर साहब अचानक आगे आए और बच्चे को गोद में ले लिया. उसे पता नहीं कैसे बहलायाफुसलाया, लड़का स्कूल वैन में आराम से बैठ गया. उस के जाने के बाद सारिका मुकुंदजी की ओर बढ़ आई. कहा, ‘‘मैं ने अपने बेटे के बारे में कहा था कि दहाड़ें मार रहा है.’’

‘‘कोई बात नहीं,’’ डाक्टर साहब कह कर अंदर जाने लगे तो सारिका को अपनी बात पर अफसोस हो रहा. वह उन के पीछेपीछे अंदर तक आ गई.

डाक्टर साहब ने अचानक पीछे मुड़ कर उसे देखा तो ठिठक गए.

‘‘मुकुंदजी आज चाय मैं आप को पिलाती हूं,’’ सारिका मनुहार सी करने लगी.

‘‘चाय मैं पी चुका हूं, अब टिफिन तैयार कर क्लीनिक के लिए निकलूंगा,’’ डाक्टर साहब पिघलने को तैयार नहीं थे.

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