उसे किस ने मारा- भाग 2: क्या हुआ था आकाश के साथ

‘स्वयं देख लीजिए सर.’

पैकेट खोला तो उस के अंदर रखी रकम देख कर आकाश का खून जम गया.

‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई, यह रकम मुझे पकड़ाने की.’

‘सर, आप नए हैं, इसलिए जानते नहीं हैं, यह आप का हिस्सा है.’

‘पर मैं इसे नहीं ले सकता.’

‘यह आप की मर्जी सर, पर ऐसा कर के आप बहुत बड़ी भूल करेंगे. आखिर घर आई लक्ष्मी को कोई ऐसे ही नहीं लौटाता है.’

‘अब तुम यहां से जाओ वरना मैं पुलिस को बुलवा कर तुम्हें रिश्वत देने के आरोप में गिरफ्तार करवा दूंगा.’

‘ऐसी गलती मत कीजिएगा. यह आरोप तो मैं आप पर भी लगा सकता हूं,’ निर्लज्जता से मुसकराते हुए वह बोला.

अगले दिन आकाश ने अपने सहयोगी से बात की तो वह बोला, ‘इस में तुम या मैं कुछ नहीं कर सकते. यह तो वर्षों से चला आ रहा है. जो भी इस में अड़ंगा डालने का प्रयत्न करता है उस का या तो स्थानांतरण करवा देते हैं या फिर झूठे आरोप में फंसा कर घर बैठने को मजबूर कर देते हैं, वैसे भी घर आई लक्ष्मी को दुत्कारना मूर्खता है.’

उस ने उसी समय निर्णय लिया था कि लोग चाहे जो भी करें पर वह इस पाप की कमाई को हाथ नहीं लगाएगा. वैसे भी पहली बार नौकरी पर जाने से पहले जब वह पिताजी से आशीर्वाद लेने गया था, तो उन्होंने कहा था, ‘बेटा, जिंदगी की डगर बड़ी कठिन है, जो कठिनाइयों को पार कर के आगे बढ़ता जाता है निश्चय ही सफल होता है. कामनाओं की पूर्ति के लिए ऐसा कोई काम मत करना जिस के लिए तुम्हें शर्मिंदा होना पड़े. जितनी चादर हो उतने ही पैर फैलाना.’

वह उन की बातों को दिल में उतार कर जीवन की नई डगर पर नई आशाओं के साथ चल पड़ा था. अपनी पत्नी दीपाली को अपना फैसला सुनाया तो उस ने भी उस की बात का समर्थन कर दिया. तब उसे लगा था कि जीवनसाथी का सहयोग जीवन की कठिन से कठिन राहों पर चलने की प्रेरणा देता है.

काम को आकाश ने बोझ समझ कर नहीं बल्कि अपनी जिम्मेदारी समझ कर अपनाया था, इसलिए काम को संपूर्ण करने के लिए वह ऐसे जुट जाता था कि न दिन देखता न ही रात, इस के लिए उसे अपने परिवार से भी भरपूर सहयोग मिला.

सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. ऊंचा ओहदा, सम्मान, सुंदर पत्नी, पल्लव और स्मिता जैसे प्यारे 2 बच्चे, बूढ़े मांबाप का सान्निध्य. अपने काम के साथ मातापिता की जिम्मेदारी भी वह सहर्ष निभा रहा था. आखिर उन्होंने ही तो उसे इस मुकाम पर पहुंचने में मदद की थी.

दीपाली और वसुधा साथसाथ पढ़ी थीं. यही कारण था कि विवाह हो जाने के बाद भी हमेशा वे एकदूसरे के संपर्क में रहीं. यहां तक कि वर्ष में एक बार दोनों परिवार मिल कर एकसाथ कहीं घूमने चले जाते. वसुधा के पति सुभाष को भी आकाश का साथ अच्छा लगता. जी भर कर बातें होतीं. लगता, समय यहीं ठहर जाए पर समय कभी किसी के लिए रुका है?

जैसेजैसे खर्चे बढ़ने लगे दीपाली अपने वादे से मुकरने लगी. महीने का अंत होता नहीं था कि हाथ खाली होने लगता था, उस पर बूढ़े मातापिता के साथ 2 बच्चों का खर्चा अलग से बढ़ गया था. दीपाली अकसर अपनी परेशानी का जिक्र वसुधा से करती तो वह उसे संयम से काम लेने के लिए कहती, पर उस पर तो जैसे कोई जनून ही सवार हो गया था, आकाश की बुराई करने का.

यह वही दीपाली है जो एक समय आकाश की तारीफ करते नहीं थकती थी और अब बुराई करते नहीं थकती है. इनसान में इतना परिवर्तन कब, क्यों और कैसे आ जाता है, समझ नहीं पा रही थी वसुधा. आखिर कोई औरत अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए पति से वह सबकुछ क्यों करवाना चाहती है जो वह करना नहीं चाहता. दीपाली और आकाश के बीच की दूरी बढ़ती जा रही थी और वसुधा चाह कर भी कुछ कर नहीं पा रही थी.

दीपाली कहती, ‘वसुधा, आखिर इन की ईमानदारी से किसी को क्या फर्क पड़ता है. जो इन की सचाई पर विश्वास करते हैं वह इन्हें गलत प्रोफेशन में आया कह कर इन का मजाक बनाते हैं और जो नहीं करते वे भी कह देते हैं कि भई, हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और. भला आज के जमाने में ऐसा भी कहीं हो सकता है.’

बाहर तो बाहर आकाश घर में भी शिकस्त खाने लगा था. पत्नी और बच्चों के चेहरे पर छाई असंतुष्टि अकसर सोचने को मजबूर करती कि कहीं वह गलत तो नहीं कर रहा है, पर आकाश के अपने संस्कार उस को कुछ भी गलत करने से सदा रोक देते.

वह बच्चों की किसी मांग को अगले महीने के लिए टाल देने को कहता तो उस की 5 वर्षीय बेटी स्मिता ही कह देती, ‘इस का मतलब आप खरीदवाओगे नहीं. अगले महीने फिर अगले महीने पर टाल दोगे.’

आकाश कभी दीपाली को उस का वादा याद दिलाता तो वह कह देती,  ‘वह तो मेरी नादानी थी पर अब जब दुनिया के रंगढंग देखती हूं तो लगता है कि तुम्हारे इस खोखले दंभ के कारण हम कितना सफर कर रहे हैं. तुम्हारे जैसे लोग जहां आज नई गाड़ी खरीदने में जरा भी नहीं सोचते, वहीं हमें रोज की जरूरतों को पूरा करने के लिए अगले महीने का इंतजार करना पड़ता है. कार भी खरीदी तो वह भी सेकंड हैंड. मुझे तो उस में बैठने में भी शर्म आती है.’

‘दीपाली, इच्छाओं की तो कोई सीमा नहीं होती. वैसे भी घर सामानों से नहीं उस में रहने वालों के आपसी प्यार और विश्वास से बनता है.’

‘प्यार और विश्वास भी वहीं होगा, जहां व्यक्ति संतुष्ट होगा, उस की सारी इच्छाएं पूरी हो रही होंगी.’

‘तो क्या तुम सोचती हो जिन्हें तुम संतुष्ट समझ रही हो, उन में कोई असंतुष्टि नहीं है. वहां जा कर देखो तो पता चलेगा कि वे हम से भी ज्यादा असंतुष्ट हैं.’

‘बस, रहने भी दीजिए…कोरे आदर्शों के सहारे दुनिया नहीं चलती.’

‘अगर ऐसा है तो तुम आजाद हो, अपनी नई दुनिया बसा सकती हो, जैसे चाहे रह सकती हो.’

तब तिलमिला कर उस ने कहा था, ‘बस, अब यही तो सुनने को रह गया था.’

यह कह कर दीपाली तो चली गई पर आकाश वहीं बैठाबैठा अपने सिर के बाल नोंचने लगा. उस बार उन दोनों के बीच लगभग हफ्ते भर अबोला रहा. उन के झगड़े अब इतने बढ़ गए थे कि बच्चे भी सहमने लगे थे, कभीकभी लगता कहीं इन दोनों की तकरार के कारण बच्चे अपना स्वाभाविक बचपन न गंवा बैठें.

सुभा: भाग 3- देवी की मूर्ति हटाने की बात पर क्या हुआ सुभा के साथ

किंतु न जाने कब नियति ने उन के मनमंदिर में सुभा का अनाधिकार प्रवेश करा  दिया था. देवेन जान भी नहीं पाए थे और उन के अभेद संयम दुर्ग में प्रेम नामक एक सर्प घुस आया था. वह तो क्या संसार का संयमी से संयमी पुरुष भी होता तो वह भी उस चंचल और सुंदर किशोरी का हाथ थामते ही दुस्साहसी बन जाता. 2 वर्षों के अमूल्य साथ ने जाति विभेद के अस्तित्व को ही मिटा दिया था.

उन के दाएंबाएं, दामिनी सी दमकती वह दुस्साहसिनी लड़की उन्हें उंगुलियों पर नचा रही थी. जिस के परिवार के दुश्चरित्रता की दिगंत्व्यापी दंतकथाओं को वे सुनते आ रहे  थे और जिस से उन्हें नफरत होनी चाहिए थी, उसी को पाने के लिए वे स्वप्नों के शून्याकाश में बांहें फैलाने लगे थे.

‘‘तेरे जैसी मूर्खा से प्रेम कर बैठा हूं, बस शंभू तेरी इस बुद्धि और हमारे इस प्रेम को दुनिया की नजरों से बचा कर रखे.’’

यह सुनते ही सुभा उस के गले में बांहें डाल कर झल पड़ी थी. पर शंभू में युगल प्रेमियों की इस प्रणयकिलोल में सहयोग देने का धैर्य नहीं रहा और देवेन के पिता को सब पता चल गया.

न्यायधीश के सामने जब देवेन की पेशी हुई, झठ नहीं बोल पाए थे वे.

‘‘ब्राह्मण हो कर शूद्र की लड़की से प्रेम तुम्हें शोभा नहीं देता,’’ पंडितजी ने भीतर कठिनाई से दबाए जाने वाले क्रोध को बड़ी कठिनाई से रोक कर कहा.

‘‘और फिर ऐसी मति भ्रष्ट, चरित्रहीन और विप्लवी लड़की के साथ क्या तुम्हारा निबाह हो पाएगा?’’ कभी किसी भी रूप में अपना मत न प्रकट करने वाली माता भी आज बोली थी. इस के पीछे का कारण पुत्र प्रेम था अथवा सौतिया डाह इस की मीमांसा का भार स्वयं उन्हीं पर था.

यों रुकावट पड़ती देख पंडितजी ने अपने वृषभ स्कंधों को थोड़ा ऊंचा उठा कर फैसला सुना दिया, ‘‘तुम कल सुबह ही चाचा के पास चले जाओगे, आगे की पढ़ाई वहीं से करो यही अच्छा है.’’

‘‘बा… बा… बूजी..’’ देवेन ने एक दुर्बल प्रयास किया था.

‘‘ऐसी स्त्रियां विवाह योग्य कदापि नहीं होतीं. गंदे नाले का पानी पीने के लिए इस्तेमाल नहीं करते, यह बात तुम जितनी जल्दी समझ जाओ तुम्हारे लिए अच्छा हैं,’’ अनकही बातें पिता की आंखों ने पुत्र को समझ दी थीं.

इतने दिनों से प्रेम की जिस पतवार को थामे वे चल रहे थे, उस में दरारें आ गई थीं.  सुभा उस के लिए एक ऐसा जंगली गुलाब बन गई थी जिसे हवा में झमते देखना किसी भी प्रकृति प्रेमी मन को रुच सकता था, उसे तोड़ कर सूंघा भी जा सकता था, परंतु ऐसे फूल को देवता के चरणों में नहीं चढ़ाया जा सकता था.

अस्पृश्यता को विस्मृत भी कर दें तो, ऐसी मुंहजोर, स्वच्छंद और विदग्ध स्त्री से प्रेम तो किया जा सकता है, परंतु ऐसी स्त्रियां विवाह के लिए सर्वथा उपयुक्त नहीं हैं? ऐसा निश्चय कर वे अगले ही दिन सुभा से मिले बिना दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे.

वह मानिनी अपना मान त्याग बीच रास्ते उन्हें रोकने भी आई थी, परंतु देवेन के एक छोटे से वाक्य ने उस के सुंदर चेहरे को निस्तेज कर दिया था.

‘‘सुभी, पहाड़ के जलप्रपात को घर में लाने की कुचेष्ठा मैं नहीं कर सकता. मेरा रास्ता …’’

उन की बात पूरी होने के पहले ही सुभा हिरणी सी कुलांचें भरती हुई उन के जीवन से गायब हो गई थी.

‘‘क्षमा कीजिएगा, थोड़ी देर हो गई. कुछ ही दिन रह गए हैं समारोह में, तो प्राभ्यास में लगे हुए हैं हम सब,’’ सामने आ कर बैठ गई थी सुभा.

वह क्या 24 वर्ष पूर्व की सुभा थी. तब का गोल चेहरा लंबोतरा हो कर और भी आकर्षक बन गया था. 16 वर्ष की वह किशोरी 40 वर्ष की स्त्री बन गई थी. सुघड़ जूड़े में मंडित घने केशपाश की गरिमा आज भी वैसी ही थी. उन अधरों की स्वाभाविक लालिमा को देवेन ने बहुत निकट से देखा था. आज स्वामिनी ने उन्हें हलके गुलाबी रंग के पीछे ढक रखा था.

देवेन को देख कर उस के मुख पर एक अपरिचित स्मित की रेखा सहसा उज्ज्वल हो उठी थी. बदल तो देवेन भी गए थे. एक युवक अब जीवन के 50 वसंत देख कर प्रौढ़ हो गया था. वह सुभा के मुख के भाव पड़ने की चेष्टा करने लगा था.

‘‘जी,’’ सुभा की आंखों में अब भी अजनबीपन ही था.

‘‘मैं नवल का पिता हूं.’’

‘‘मैं जानती हूं,’’ सुभा ने कहा परंतु उस का चेहरा अभी भी भावहीन ही था.

‘‘जानती थी, फिर तुम ने ऐसा क्यों किया? कहीं, मुझ से प्रतिशोध लेने के लिए तो…’’ प्रश्न के कंठ से छूटते ही देवेन को पसीना छूटने लगा. किंतु सुभा उसी प्रकार शांत बैठी रही.

उच्छावास के बाद, एक गंभीर और सशक्त आवाज में उस ने उत्तर दिया, ‘‘देवेन, भारतीय समाज को पितृसत्ता की व्यवस्था के तहत ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज कहा जाता है. इस के पीछे कारण हैं कि यहां का समाज जाति व्यवस्था पर आधारित है, परंतु इस की भी एक खास बात है, महिलाओं पर चाहे वह किसी भी जाति या वर्ग की हो पितृसत्ता का उत्पीड़न बना रहता है.’’

‘‘मेरी बात से इस बात का औचित्य? मैं समझ नहीं पा रहा,’’ देवेन झंझला पड़े थे.

सुभा ने हंस कर अपनी बात जारी रखी, ‘‘इस बात का ही तो औचित्य है. आप को लगता है कि यदि आप किसी स्त्री को त्याग देते हैं, तो उस के पास कुछ ही विकल्प शेष रह जाते हैं. मृत्य को अंगीकार करना, विरह की अग्नि में जलना अथवा प्रतिकारस्वरूप उसी अग्नि में एक दिन उसी पुरुष को जलाने की मंत्रणा करना.

आप की ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक सोच आपको यह सोचने ही नहीं देती कि हर नायिका विप्रलब्धा नहीं होती, कुछ नायिकाएं स्वयंसिद्धा भी होती हैं.’’

देवेन उस के बुधिदिप्त चेहरे को देखते रह गए. बोले, ‘‘वह मैं ने सुना था कि तुम…’’ देवेन ने अपने दांतों से जीभ काट कर बात पूरी की, ‘‘आप ने विवाह नहीं किया.’’

सुभा व्यंग्यात्मक मुसकान के साथ बोली, ‘‘और आप ने यह सोच लिया कि मैं ने आप की विरह में आजीवन कौमार्य का प्रण ले रखा है.’’

देवेन का सर झक गया था.

‘‘मैं ने विवाह नहीं किया क्योंकि मु?ो कोई अपने जैसा नहीं मिला और मैं श्रेष्ठ से नीचे कुछ चाहती नहीं थी. वैसे भी पुरुष एक सशक्त, विप्लवी और प्रारब्धवान स्त्री से डरते हैं. मैं अपनी स्वतंत्रता के साथ समझता नहीं कर सकती. विवाह कोई अनिवार्यता नहीं वरन व्यक्तिगत चुनाव है और आप की जानकारी के लिए बता दूं, मैं अविवाहित अवश्य हूं, परंतु अकेली नहीं.’’

‘देवेन तू मूर्ख है. तू क्या इस स्वाभिमानी स्त्री को नहीं जानता. संसार का कौन सा मूर्ख पुरुष होगा जो इस पूजनीय प्रतिमा के सामने नतमस्तक नहीं होगा. नवल तो फिर भी एक बालक हैं,’ उन के विवेकशील अंत:करण ने उन्हें चाबुक की मार से तिलमिला दिया.

देवेन के मानसिक यंत्रणा से अनभिज्ञ सुभा ने अपनी बात जारी रखी, ‘‘आज से  पहले मैं नहीं जानती थी कि नवल आप का पुत्र है. उस के विचार भी तो आप से मेल नहीं खाते. न पुरुष होने का दंभ और न ही अपनी जाति की झठी सर्वोचता का घमंड,’’ सुभा की आवाज में तलखी थी.

एक लंबी सांस ले कर वह आगे बोलने लगी, ‘‘खैर, आज प्रात: उस ने अपने दिल की बात मेरे सामने रखी. एक पल में मैं समझ गयी थी कि यह प्रेम नहीं, मात्र आदरणीय और अपरिपक्व आकर्षण है, जो इस उम्र में आम बात है. किसी से प्रेम होना गलत भी नहीं है, बात धर्म, जाति, लिंग और उम्र की नहीं. बात प्रेम की परिपक्वता की है. मैं ने उसे समझया, प्रेम का मात्र एक ही रूप नहीं है.

‘‘आप अत्यंत आदरणीय से भी तो प्रेम करते हैं. मु?ो भी उस से प्रेम हैं, परंतु एक शिशु के समान. जहां स्वार्थ नहीं है, प्रेम वहीं है. मेरी बातें सुन कर उस की आंखें भर आई थीं. समझदार बच्चा है, धीरेधीरे समझ जाएगा. मैं उस के मार्गदर्शन के लिए सदा रहूंगी, आप की अनुमति हो अथवा न हो.’’

अब देवेन से कुछ न कहा गया, गला रुध आया था. इस स्त्री के सामने वे स्वयं को कमजोर तो हमेशा महसूस करते थे, आज परास्त भी हो गए थे. उन के सामने जो नारी खड़ी थी उस ने उन्हें पिघला दिया था. उन्होंने मन ही मन कहा कि आप जो चाहोगी वही होगा. इस संसार में नवल का भला आप से ज्यादा कोई नहीं सोच सकता.

अपने जुड़े हुए हाथ उन की तरफ करते हुए सुभा खड़ी हो गई थी. देवेन भी खड़े हो गए. नि:शब्द दोनों ने विदा ली.

Ileana D’cruz से फैंस ने पूछा ये सवाल, एक्ट्रेस ने कर दी बोलती बंद

बॉलीवुड एक्ट्रेस इलियाना डिक्रूज बेहद कमाल की अदाकारा है. जो एक बेटे की मां बन चुकी है. इसी साल अगस्त में एक्ट्रेस ने अपने बेटे की तस्वीर शेयर करके गुड न्यूज दी थी. जिसके बाद हक कोई उनके लाइफ पार्टनर के बारे में पूछने लगा था और इलियाना ने फैंस के इन सवालों के जवाब  भी दिए थे. अभिनेत्री इलियाना काफी समय से ऑस्ट्रेलियन ब्वॉयफ्रेंड एंड्रयू नीबोन को डेट किया, जिसके बाद दोनों ने इसी साल शादी रचाई. वहीं, अब एक फैन ने भी इलियाना से उनके पति और बेबी के पिता के बारे में पूछा, जिसका जवाब एक्ट्रेस ने एक फोटो से दे दिया.

इलियाना डिक्रूज ने पति संग शेयर की तस्वीर

बॉलीवुड एक्ट्रेस इलियाना डिक्रूज ने अभी हाल ही में अपने इंस्टाग्राम पर फैंस से खास बातचीत की. एक्ट्रेस से फैंस ने कई तरह के अलग-अलग सवाल किए. इसी दौरान एक फैन ने इलियाना से उनके पार्टनर के बारे में पूछते हुए एक सवाल किया. इलियाना से पूछा गया कि वह अकेले अपने बेबी का ध्यान कैसे रखती हैं? इस सवाल का जवाब इलियाना ने अपने पति एंड्रयू नीबोन के साथ एक फोटो शेयर की. इस फोटो में इलियाना और एंड्रयू नीबोन एक दूसरे की आंखों में खोए हुए हैं. इस फोटो के साथ इलियाना ने लिखा, ‘मैं नहीं हूं…’ इस पोस्ट के जरिए इलियाना ने बताया है कि वह सिंगल नहीं हैं और अपने पति के साथ मिलकर अपने बेबी का ध्यान रख रही हैं. इस दौरान एक फैन ने यह भी पूछा, ‘क्या उनकी प्रेग्नेंसी में उनकी मां उनके साथ रही थीं?’ इस पर एक्ट्रेस ने अपनी मां संग एक फोटो शेयर की और बताया था कि उनकी मां उनकी प्रेग्नेंसी के पूरे प्रोसेस में साथ रही थी.

Ileana D'Cruz with husband

इलियाना ने कब की शादी?

बता दें कि एक्ट्रेस इलियाना डिक्रूज ने माइकल डोलन से 13 मई 2023 को शादी की थी. एक्ट्रेस ने माइकल से अपनी प्रेग्नेंसी न्यूज सुनने के चार हफ्तों के अंदर ही शादी कर ली थी, जिसका खुलासा उन्होंने एक इंटरव्यू में किया. शादी के कुछ समय बाद ही इलियाना ने अपने पति का चेहरा दुनिया को दिखाया था. दरअसल, एक्ट्रेस ने अपने बेटे का नाम कोआ फीनिक्स डोलन रखा गया है, जिसका पूरा चेहरा इलियाना ने काफी कम ही दिखाया है.

 

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मेरा बच्चा बहुत उदास रहता है, मुझे बताएं क्या बच्चों में भी डिप्रैशन होता है?

सवाल

मेरा 11 साल का बेटा पिछले कुछ समय से बहुत उदास रहता है. मैं जानना चाहती हूं क्या बच्चों में भी डिप्रैशन होता है?

जवाब

बच्चों में ऐंग्जाइटी और डिप्रैशन दोनों के मामले बहुत होते हैं जो उन की पूरी जिंदगी पर प्रभाव डालते हैं और इन के कारण उन का शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित होता है. उन की समझ पूरी तरह विकसित नहीं हुई होती है इसलिए वे समझ नहीं पाते कि उन के साथ समस्या क्या है. न ही अपनी परेशानी किसी से साझा कर पाते हैं. बचपन का समय तो बहुत बेफिक्री का होता है. उस में उदासी और परेशानी जैसी समस्याएं सामान्यत: नहीं होती हैं. अगर घर और स्कूल में कोई समस्या नहीं है फिर भी आप का बच्चा उदास है और उस का व्यवहार सामान्य नहीं है तो तुरंत किसी साइकोलौजिस्ट या साइकिएट्रिस्ट को दिखाएं.

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सवाल

मेरे पति पिछले 2 सालों से डिप्रैशन के शिकार हैं. डाक्टर ने उन्हें काउंसलिंग के साथ कुछ दवाइयां भी दी थीं, लेकिन कुछ दिनों से वे मैडिसिन नहीं ले रहे हैं. क्या करूं?

दवाइयां बीच में बिलकुल नहीं रोकनी चाहिए. उपचार पूरा न कराने से बहुत ज्यादा नुकसान होता है. डिप्रैशन के लक्षण गंभीर हो जाते हैं और दूसरे मानसिक विकारों का खतरा भी बढ़ जाता है. दवाइयां छोड़ने के कुछ दिन बाद तक तो मरीज सामान्य महसूस करता है लेकिन फिर से उस में घबराहट, बेचैनी, रोने का मन करना और आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ना जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं. अपने पति को दवाइयां लेने के लिए समझाएं. अगर वे आप की बात नहीं मानें तो उन की फिर से काउंसलिंग कराएं.

सवाल

मैं 38 वर्षीय घरेलू महिला हूं. 2-3 महीनों से मेरा घर से बाहर निकलने का मन ही नहीं करता. मैं हंसना और खुश रहना चाहती हूं, लेकिन ऐसा कर नहीं पा रही हूं. कृपया कोई हल बताएं?

अधिकतर लोगों का अपनी भावनाओं पर काबू नहीं होता, यह बहुत सामान्य है. लेकिन थोड़े से प्रयास से अपने व्यवहार में बदलाव लाना संभव होता है. अगर आप का अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं है तो व्यवहार में बदलाव लाएं. व्यवहार बदलने से भावनाओं को बदलना संभव होता है. आप एक अनुशासित जीवनशैली का पालन करें, नियत समय पर सोएं, उठें और खाएं, पीएं. रोज 20-30 मिनट अपना मनपसंद वर्कआउट करें. इसे घर में करने के बजाय पार्क या अपने घर के टैरेस पर करें. वीकएंड पर गैजेट्स का इस्तेमाल न करें या बहुत जरूरी हो तभी करें. अपने परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताएं.

डा. जया सुकुल

क्लीनिकल साइकोलौजिस्ट, हैडस्पेस हीलिंग, नोएडा 

पाठक अपनी समस्याएं इस पते पर भेजें : गृहशोभा, ई-8, रानी झांसी मार्ग, नई दिल्ली-110055.

स्रूस्, व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या 9650966493 पर भेजें.

धर्म हर जगह रखवाला क्यों

समलैंगिक जोड़े सुप्रीम कोर्ट से मुंह लटका कर चले आए हैं कि उन्हें विवाह कर के विवाह जैसे एकदूसरे से, समाज से व सरकार से वह कानूनी प्रोटैक्शन नहीं मिला जो वैवाहिक स्त्रीपुरुष जोड़ों को मिलता है.

सदियों से विवाह पर सरकार और धर्म ने इस तरह का फंदा बुन रखा है कि उस के बाहर विवाह की कल्पना की ही नहीं जा सकती और यही सुप्रीम कोर्ट ने किया जबकि दुनिया के कितने ही देशोें में समलैंगिक विवाह न केवल कानूनी हो गए हैं, उन से न कोई विशेष विवाद उठ रहे हैं और न समाज की चूलें हिल रही हैं.

धर्म हर जगह रखवाला बन कर खड़ा हो जाता है. कहने को वह संरक्षण देता है पर असल में वह रंगदारी करता है कि मुझे पहले पैसे दो फिर विवाह करो, संतान करो, घर बनाओ, घर में घुसो, कार खरीदो, नाम रखो, स्कूल पढ़ने जाओ, रोज का खाना खाओ. हर मामले में पहले धर्म को याद करो, उसे रंगदारी देने का वादा करो या दो और तभी आगे बढ़ो.

धर्मों ने अभी तक सेम सैक्स मैरिज को नहीं स्वीकारा क्योंकि यहां रंगदारी ज्यादा से ज्यादा एक बार मिलेगी. शादी के समय. ऐसे जोड़े आपस में खुश रह सकते हैं, 40-50 साल साथ जी सकते हैं, पर चूंकि उन्हें बच्चे नहीं होंगे उन्हें बच्चों के जन्म, नामकरण या विवाह जैसे संस्कारों में घुसने का मौका नहीं मिलेगा, वे सेम सैक्स मैरिज का विरोध कर रहे हैं.

सेम सैक्स संबंध को मैरिज के कानूनी रूप की मांग सिर्फ इसलिए की जा रही है कि धर्म के इशारों पर सरकारों ने शादी के बाद बहुत से अधिकार पतिपत्नी को एकदूसरे पर दिए हैं. पति के न होने पर पत्नी संपत्ति की मालिक  स्वत: बन जाती है, बच्चों को अपनेआप मांबाप का नाम मिल जाता है, एक साथी दूसरे वैवाहिक साथी को रिप्रैजेंट कर सकता है, अस्पतालों में नैक्स्ट औफ किन वैवाहिक साथी ही होता है, अविवाहित साथ नहीं.

लिव इन रिलेशन में रह रहे जोड़े भी इस तरह की कानूनी बातों के पचड़े में पड़ते हैं. लिव इन जोड़े के एक साथी के कैद होने पर दूसरे को पैरवी का हक स्वत: नहीं मिलता. वह केवल फ्रैंड बन कर रह जाता है. बैंक में गया पैसा स्पाउस को मिल जाता है जो समलैंगिक या लिव इन वाले जोड़े को नहीं मिलता, पैंशन का हकदार नहीं है.

पत्नी को पति के मकान का किराया पति के चले जाने के बाद भी मिलता रहता है जबकि समलैंगिक जोड़ीदार को नहीं मिलता.

आमतौर पर बहुत से कौंट्रैक्टों में लीगल ईयर की बात लिखी होती है. इन में समलैंगिक साथी नहीं आता क्योंकि उन का धार्मिक माफिया का रंगदारी टैक्स दे कर विवाह नहीं हुआ होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने 5-0 से फैसला देते हुए कहा कि भई, चाहो तो रजाई में साथ रहो पर कानूनी रूप से हक नहीं देंगे. वह तो स्त्रीपुरुष जोड़े के लिए रिजर्व है वह भी तब जब सरकार के बनाए कानूनों के हिसाब से विवाह हुआ हो.

समलैंगिकों को वैवाहिक स्तर देने से भूकंप नहीं आ जाता. यह प्रेम कुछ को होता है पर जिन को होता है उन्हें किसी चिडि़याघर का प्राणी नहीं मान लेना चाहिए. समलैंगिकता किसी तीसरे को नुकसान नहीं पहुंचाती. यह 2 जनों का आपसी मामला है. कोई नई बात भी नहीं. कैथोलिक चर्च जो सेम सैक्स मैरिज का कड़ा विरोध कर रहा है, हर साल करोड़ों रुपए उन लड़कों को मुंह बंद रखने के लिए देता है जिन के साथ चर्च के पादरियों ने समलैंगिक संबंध बनाए. पोप की अपीलों के बावजूद सेमिनारी में रह रहे लड़कों को फादरों को समलैंगिक संबंध बना कर खुश करना पड़ता है.

जब धर्म की छत के नीचे ये संबंध हो सकते हैं, तो जब यही बच्चे वयस्क हो जाएं तो उन्हें अपने फैसले लेने और कानूनी संरक्षण पाने में क्या आफत आ जाएगी?

यह पक्का है कि  सुप्रीम कोर्ट के नकारने के बावजूद ये जोड़े साथ रहेंगे. ये वसीयतों, पावर औफ अटौर्नी से काम चलाएंगे, ये संयुक्त नामों से प्रौपर्टी खरीदेंगे. ये आपसी कौंट्रैक्टों पर निर्भर होंगे. इन के परिवार इन्हें अपनाने को मजबूर होेंगे क्योंकि अपने तो अपने होते हैं. किसी अपने के दोस्त को चाहे कानूनी पतिपत्नी मानो या न मानो, अपनानाकोई कठिन काम नहीं है.

जो होना है, जिस से किसी को नुकसान न होगा उसे कानूनी संरक्षण न देना संवैधानिक कोर्ट की नैरो माइंडेडनैस, दकियानूसीपन दर्शाता है. भारत का सुप्रीम कोर्ट कोई क्रांतिवीर नहीं है. वह यथास्थिति बनाए रखना चाहता है. उस में तो जवाहरलाल नेहरू जैसी हिम्मत भी नहीं जिन्होंने 1955-56 हिंदू मैरिज ऐक्ट, हिंदू सक्सैशन ऐक्ट बना कर हिंदू धर्म की चूलें हिला दी थीं.

 

उसे किस ने मारा- भाग 1: क्या हुआ था आकाश के साथ

आज आकाश चला गया…लोग कहते हैं, उस की मौत हार्ट अटैक से हुई है पर मैं कहती हूं कि उसे जमाने ने मौत के आगोश में धकेला है, उसे आत्महत्या के लिए मजबूर किया है. हां, आत्महत्या… आप लोग समझ रहे होंगे कि आकाश की मृत्यु के बाद मैं पागल हो गई हूं…हां…हां मैं पागल हो गई हूं…आज मुझे लग रहा है, इस दुनिया में जो सही है, ईमानदार है, कर्मठ है, वह शायद पागल ही है…यह दुनिया उस के रहने लायक नहीं है.

आज भी ऐसे पागल इस दुनिया में मौजूद हैं, जो अपने उसूलों पर चलते हुए शायद वे भी आकाश की तरह ही सिसकतेसिसकते मौत को गले लगा लें, इस से दुनिया को क्या फर्क पड़ने वाला है. वह तो यों ही चलती जाएगी. सिसकने के लिए रह जाएंगे उस बदनसीब के घर वाले.

दीपाली का प्रलाप सुन कर वसुधा चौंकी थी. दीपाली उस की प्रिय सखी थी. उस के जीवन का हर राज उस का अपना था. यहां तक कि उस के घर अगर एक गमला भी टूटता तो उस की खबर भी उसे लग ही जाती. उन में इतनी अंतरंगता थी.

लेकिन क्या आकाश की हालत के लिए वह स्वयं जिम्मेदार नहीं थी. वह आकाश की जीवनसाथी थी. उस के हर सुखदुख में शामिल होने का हक ही नहीं, उस का कर्तव्य भी था पर क्या वह उस का साथ दे पाई? शायद नहीं, अगर ऐसा होता तो इतनी कम उम्र में आकाश का यह हश्र न होता.

आकाश एक साधारण किसान परिवार से था. पढ़ने में तेज, धुन का पक्का, मन में एक बार जो ठान लेता उसे कर के ही रहता था. अच्छा खातापीता परिवार था. अभाव था तो सिर्फ शिक्षा का…उस के पिताजी ने उस की योग्यता को पहचाना. गांव में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने अपने घर वालों के विरोध के बावजूद बेटे को उच्च शिक्षा के लिए शहर भेजा, तो शहर की चकाचौंध से कुछ पलों के लिए आकाश भ्रमित हो गया था.

यहां की तामझाम, गिटरपिटर अंगरेजी बोलते बच्चों के बीच उसे लगा था कि वह सामंजस्य नहीं बिठा पाएगा पर धीरेधीरे अपने आत्मविश्वास के कारण अपनी कमियों पर आकाश विजय प्राप्त करता गया और अव्वल आने लगा. जहां पहले उस के शिक्षक और मित्र उस के देहातीपन को ले कर मजाक बनाते रहते थे, अब उस की योग्यता देख कर कायल होने लगे. हायर सेकंडरी में जब वह पूरे राज्य में प्रथम आया तो पेपर में नाम देख कर घर वालों की छाती गर्व से फूल उठी.

उसी साल उस का इंजीनियरिंग कालिज इलाहाबाद में चयन हो गया. पिता ने अपनी सारी जमापूंजी लगा कर उस का दाखिला करवा दिया. बस, यही बात उस के बड़े भाइयों को खली, कुछ सालों से फसल भी अच्छी नहीं हो रही थी. भाइयों को लग रहा था, मेहनत वे करते हैं पर उन की कमाई पर मजा वह लूट रहा है.

कहते हैं न कि ईर्ष्या से बड़ा जानवर कोई नहीं होता. वह कभीकभी इनसान को पूरा निगल जाता है. उस के भाइयों का यही हाल था और उन के वहशीपन का शिकार उस के मातापिता बन रहे थे. छुट्टियों में जब आकाश घर गया तो उस की पारखी नजरों से घर में फैला विद्वेष तथा मां और पिताजी के चेहरे पर छाई दयनीयता छिप न सकी. मां ने अपने कुछ जेवर छिपा कर उसे देने चाहे तो उस ने लेने से मना कर दिया.

एक दृढ़ निश्चय के साथ आकाश इलाहाबाद लौट गया था. कुछ ट्यूशन कर ली, साथ ही इंजीनियरिंग के प्रथम वर्ष में प्रथम आने के कारण उसे स्कालरशिप भी मिलने लगी. अब उस का अपना खर्चा निकलने लगा. इंजीनियरिंग करते ही उसे सरकारी नौकरी मिल गई.

नौकरी मिलते ही वह अपने मातापिता को साथ ले आया. भाइयों ने भी चैन की सांस ली. पर पानी होते रिश्तों को देख कर आकाश का मन रोने लगा था.

सरकारी नौकरी मिली तो शादी के लिए रिश्ते भी आने शुरू हो गए. वैसे आकाश अभी कुछ दिन विवाह नहीं करना चाहता था पर मां की आंखों में सूनापन देख कर उस ने बेमन से ही विवाह की इजाजत दे दी.

मातापिता के साथ रहने की बात जान कर कुछ लोगों ने आगे बढ़ अपने कदम पीछे खींच लिए थे. रिश्तों में आती संवेदनहीनता को देख कर उस का मन बहुत आहत हुआ था. मातापिता को इस बात का एहसास हुआ तो वे खुद को दोषी समझने लगे, तब आकाश ने उन को दिलासा देते हुए कहा था, ‘आप स्वयं को दोषी क्यों समझ रहे हैं, यह तो अच्छा ही हुआ कि समय रहते उन की असलियत खुल गई, जो रिश्तों का सम्मान करना नहीं जानते. वे भला अन्य रिश्ते कैसे निभा पाएंगे. रिश्तों में स्वार्थ नहीं समर्पण होना चाहिए.’

आखिर एक ऐसा परिवार मिल ही गया. मातापिता के साथ में रहने की बात सुन कर लड़की का भाई विवेक बोला, ‘हम ने मातापिता का सुख नहीं भोगा. पर मुझे उम्मीद है कि आप के सान्निध्य में मेरी बहन को यह सुख नसीब हो जाएगा.’

विवेक और दीपाली के मातापिता बचपन में ही मर गए थे. उन के चाचाचाची ने उन्हें पाला था पर धीरेधीरे रिश्तों में आती कटुता ने उन्हें अलग रहने को मजबूर कर दिया. विवेक ने जैसेतैसे एक नौकरी तलाशी तथा बहन को ले कर अलग हो गया. नौकरी करतेकरते ही उस ने अपनी पढ़ाई जारी रखी, बहन को पढ़ाया और आज वह स्वयं एक अच्छी जगह नौकरी कर रहा था.

दीपाली आकाश को अच्छी लगी. अच्छे संस्कारिक लोग पा कर विवाह के लिए वह तैयार हो गया. दीपाली ने घर अच्छी तरह से संभाल लिया था. मातापिता भी बेहद खुश थे. घर में सुकून पा कर आफिस के कामों में भी मन रमने लगा. अभी तक तो उसे काम सिखाया जा रहा था पर अब स्वतंत्र विभाग उस को दे दिया गया.

आकाश ने जब अपने विभाग की फाइलों को पढ़ा और स्टोर में जा कर सामान का मुआयना किया तो सामान की खरीद में हेराफेरी को देख कर वह सिहर उठा. पेपर पर दिखाया कुछ जाता, खरीदा कुछ और जाता. कभीकभी आवश्यकता न होने पर भी सामान खरीद लिया जाता. सरप्लस स्टाक इतना था कि उस को कहां खपाया जाए, वह समझ नहीं पा रहा था. अपने सीनियर से इस बात का जिक्र किया तो उन्होंने कहा, ‘अभी नएनए आए हो, इसलिए परेशान हो. धीरेधीरे इसी ढर्रे पर ढलते जाओगे. जहां तक सरप्लस सामान की बात है, उसे पड़ा रहने दो, कुछ नहीं होगा.’

एक दिन आकाश अपने आवास पर आराम कर रहा था कि एक सप्लायर आया और उसे एक पैकेट देने लगा. उस ने पूछा, ‘यह क्या है?’

Wedding Special: डस्की ब्यूटी का है जमाना

अक्सर हम सांवली रंगत को खूबसूरत नहीं मानते. लड़कियां और महिलाएं गोरी रंगत पाने के लिए बाजार से वे तमाम ब्यूटी प्रोडक्ट्स खरीदती फिरती हैं जो रंग निखारने के ?ाठे दावे करते हैं. मगर वे यह भूल जाती हैं कि सांवली रंगत में एक अलग ही आकर्षण और सुंदरता होती है. बस जरूरत होती है थोड़ा प्रयास करने की. कुछ मेकअप टिप्स अपना कर और अपनी स्किन का खयाल रख कर वे अपनी सांवली रंगत के साथ भी बेहद खूबसूरत दिख सकती हैं.

आइए, जानते हैं ऐक्सपर्ट्स से सही मेकअप करने के कुछ टिप्स: इस संदर्भ में प्रोफैशनल मेकअप ट्रेनर ऐंड आर्टिस्ट शिवानी गौड़ डस्की मेकअप के विभिन्न स्टैप्स और उस दौरान ध्यान देने वाली बातों के बारे में बता रही हैं:

क्लीनिंग: अपने मेकअप की शुरुआत एक माइल्ड क्लींजर से करें. माइल्ड यानी ऐसा क्लींजर जो आप की स्किन को नुकसान न पहुंचाए. वैसे तो डस्की कौंप्लैक्शन देखने मेंबहुत अच्छा लगता है, लेकिन अगर आप का मेकअप सही तरीके से न किया जाए या स्किन का खयाल नहीं रखा जाए तो स्किन फीकी, रूखी या पैची दिख सकती है. इसलिए स्किनको अच्छी तरह साफ कर मेकअप की शुरुआत करें.

मौइस्चराइजिंग: सुनिश्चित करें कि आप अपनी त्वचा के प्रकार के अनुसार सही मौइस्चराइजर चुन रही हैं. मौइस्चराइजर जैल वाले भी होते हैं और क्रीमी भी. आप त्वचा के हिसाब से हाइड्रेटिंग मौइस्चराइजर चुनें. मौइस्चराइजर मेकअप को आप की त्वचा के साथ पूरी तरह से ब्लैंड करने में मदद करता है. फिर अगले चरण से पहले अपनी त्वचा को प्राइम करें. प्राइमिंग आप के मेकअप को लंबे समय तक टिके रहने में मदद करता है. अगर आप प्राइमर लगा रही हैं तो मेकअप पूरी तरह से फिट बैठता है.

कंसीलिंग: अगर आप की स्किन पर डार्क स्पौट्स, डार्क सर्कल्स या पिगमैंटेशन हैं तो उन्हें कंसीलर की मदद से छिपाएं और चेहरे को बेदाग बनाएं. सही जगह के लिए सही कंसीलर का चुनाव करने से आप के धब्बे गायब हो जाते हैं और आप को और भी इवन फिनिश मिल सकता है.

फाउंडेशन: फाउंडेशन मेकअप का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण हिस्सा है. सुनिश्चित करें कि आप अपने स्किन टोन के हिसाब से सही कलर के फाउंडेशन का चुनाव कर रही हैं. यही वह जगह है जहां ज्यादातर महिलाओं को समस्याओं का सामना करना पड़ता है. सही फाउंडेशन चुनना आप के अच्छे मेकअप के लिए महत्त्वपूर्ण है. इसलिए सुनिश्चित करें कि आप को वह फाउंडेशन मिल जाए जो आप की त्वचा की रंगत से मेल खाता हो. यदि आप के पास ऐसा फाउंडेशन नहीं है तो फिर ऐसा फाउंडेशन इस्तेमाल करें जिस का शेड आप के स्किन टोन के सब से करीब हो. अगर आप अपनी त्वचा की रंगत से हलका रंग चुनती हैं तो यह आप की स्किन को फीका और धब्बेदार बना सकता है. एक बार बेस पूरा हो जाने के बाद फिर इसे ट्रांसलूसेंट पाउडर से फिक्स करना होता है.

आई मेकअप: इस के बाद आंखों का मेकअप किया जा सकता है. गहरे रंग वाली महिलाओं की अकसर आंखें बहुत गहरी और पलकें काली होती हैं. आप इसे अपने मेकअप के हाईलाइट के रूप में उपयोग कर सकती हैं. अपने ब्लशर के लिए रोज, डीप औरेंज और कोरल जैसे शेड्स चुनें. आप स्मोकी आईलाइनर और ज्यादा मात्रा में मसकारा लगाएं जिस से आंखें ज्यादा उभरी हुई और शार्प लगेंगी.

लिप कलर: मैट और ग्लौसी लिप कलर सांवली रंगत पर अच्छे लगते हैं. वैसे तो डस्की स्किन के लिए न्यूड लुक बैटर होता है, मगर यदि आप डार्क कलर्स यूज करना चाहती हों तो वाइन, बेरी या बरगंडी टोंस ट्राई कर सकती हैं. ऐल्प्स ब्यूटी क्लीनिक की फाउंडर डाइरैक्टर डा. भारती तनेजा ने डस्की स्किन के कुछ खास मेकअप टिप्स दिए: सब से महत्त्वपूर्ण बात है कि मेकअप आप की स्किन के कौंप्लैक्शन के हिसाब से किया जाए. सांवली स्किन के मामले में अंडरस्किन टोन पिंक भी हो सकता है और यलो भी. यानी सांवली स्किन थोड़ी पिंकिश रंगत लिए भी हो सकती है या यलोइश भी. सांवली स्किन के अनुसार मेकअप करते वक्त सही मेकअप फाउंडेशन का चयन करना जरूरी है. आप की स्किन गुलाबीपन में है या पीलेपन पर है, उस के अनुसार अगर आप फाउंडेशन यूज करेंगी तो मेकअप बहुत ही नैचुरल लगेगा.

ज्यादातर महिलाएं चाहती हैं कि थोड़ी गोरी लगें. इस के लिए सांवली रंगत के अनुसार यलो या औरेंज कलर से पूरी स्किन के ऊपर एक बेस बना दिया जाता है. अगर स्किन ज्यादा डार्क है तो औरेंज से और कम डार्क है तो यलो कलर से पूरे में बेस बना देते हैं. बेस बनाने के लिए हम कलर करैक्टर यूज करते हैं. इस के बाद इस के ऊपर थोड़े लाइट कलर का फाउंडेशन भी यूज कर सकती हैं. इस से आप गोरी भी दिखती हैं और ओवर मेकअप भी नहीं दिखेगा. आप की स्किन नैचुरली गोरी दिखेगी.

स्किन का जितना भी हिस्सा दूसरों को दिखाई देता है यानी चेहरे के आसपास शरीर के जो हिस्से खुले रहते हैं, उन हिस्सों पर भी मेकअप करना जरूरी है. जैसे गरदन, फेस, कानों के आगे और कानों के पीछे, बाजू आदि पर भी आप को वैसा ही मेकअप करना होगा.

सांवली लड़की को मेकअप करते समय अपने लिए डार्क कलर की लिपस्टिक और आईशैडो लगाना चाहिए. महिलाएं सोचती हैं कि सांवली लड़की को लाइट कलर की चीजें यूज करनी चाहिए, मगर वास्तव में इस का उलटा है. सांवली को डार्क कलर का आईशैडो या लिपस्टिक वगैरह यूज करनी चाहिए. उदाहरण के लिए अगर आईशैडो की बात करें तो पिंक आईशैडो न लगाएं. आप के ऊपर ग्रीन, ब्लू, ब्राउन सुंदर लगेगा. औरेंज भी चल सकता है, मगर लाइट पिंक भूल कर भी न लगाएं. इसी तरह जब ब्लशर लगाना हो तो डार्क पीच या ब्राउन कलर का चयन करें. पिंक ब्लशर न लगाएं. लिपस्टिक की बात करें तो यह भी डार्क कलर शेड की लगाएं. पर्पल, ब्राउन, मैरून या बेरीज वाले शेड लगाएं. डस्की स्किन पर पिंक कलर की लिपस्टिक भी अच्छी नहीं लगती.

आई मेकअप: आई मेकअप कलर से ज्यादा आईज की शेप पर निर्भर करता है.

आईलाइनर: डस्की स्किन वाली लड़कियों पर डार्क ग्रीन या डार्क ब्लू कलर का आईलाइनर बहुत जंचता है. यह देखें कि आंखें कैसी हैं. आंखें बहुत बड़ी हैं तो स्मोकी मेकअप भी कर सकती हैं. स्मोकी ग्रीन, स्मोकी ब्लू मेकअप भी अच्छा लगता है.

इसी तरह आईलिड्स पर थोड़ा लाइटर शेड लगा सकती हैं. पिंक न लगाएं. बेज, ब्राउन, ग्रीन जैसे शेड्स लगाएं. इसी तरह आईब्रोज के नीचे सिल्वर कलर कभी इस्तेमाल न करें. इसे डार्क गोल्ड या ब्रौंज गोल्ड से हाईलाइट करें. मसकारा के 2 कोट लगाएं ताकि आंखें बहुत बड़ी और सुंदर दिखें. काजल अच्छी तरह लगाएं. कजरारी आंखें अच्छी लगती हैं आजकल स्मज्ड काजल ट्रैंड में है. इस से आंखें बहुत सुंदर और बड़ी दिखती हैं. मसकारा के 2 कोट लगाने के बाद आईलैशेज कर्लर से कर्ल कर लें. इस से आंखें बहुत प्यारी और बड़ी लगती हैं. अगर लैशेज छोटी हैं तो आईलैशेज बाजार में मिलती हैं. वे लगा लें. परमानैंट आईलैशेज भी लगा सकती हैं.

बालों का कलर

सांवली लड़की को अपने बाल कलर कराने हों तो ब्राउन या बरगंडी या फिर चोकलेट कलर कराएं. ऐश कलर या गोल्ड कलर कभी भी न कराएं. इस बारे में ग्रुशा खन्ना कुछ टिप्स दे रही हैं:

-डस्की स्किन टोन पर ट्रांसलूसेंट नहीं बल्कि बनाना पाउडर यूज करना बेहतर होता है वरना फेस बहुत ज्यादा व्हीटिश लगेगा.

-डस्की स्किन टोन पर डार्क सर्कल्स और पिगमैंटेशन छिपाने के लिए औरेंज कलर करैक्टर की जगह स्किन टोन से 2 शेड डार्क कंसीलर यूज करना चाहिए.

-औरेंज कलर का ब्लश ज्यादा हाईलाइटिंग करता है.

-हाईलाइटिंग कंसीलर हमेशा स्किन से एक टोन लाइट होना चाहिए ताकि वह आप को ज्यादा व्हीटिश लुक न दे.

– हमेशा क्रीम कंटूर के ऊपर पाउडर कंटूर यूज करना चाहिए ताकि वह लौक हो जाए और लौंग लास्टिंग रहे.

-लिपस्टिक हमेशा आउटफिट के कौंप्लिमैंटरी हो. अगर ऐसा नहीं है तो आप को डार्क पिंक रैड या औरेंज शेड यूज करने चाहिए.

– स्किन के साथ ग्लिटर आईज मेकअप भी काफी अच्छा लगता है. इस से आंखें और खूबसूरत लगती हैं. आंखों पर ग्लिटर का प्रभाव डस्की स्किन को और निखार देता है.

सुभा: भाग 2- देवी की मूर्ति हटाने की बात पर क्या हुआ सुभा के साथ

उस के प्रेम की निजता तभी तक थी जब तक उस की खबर किसी और को नहीं लगती. परंतु हाय, उस की आंखों ने चुगली कर दी थी. माता को इन दिनों पुत्र का खोयाखोया रहना नहीं भा रहा था. बात पिता तक पहुंची, व्यावहारिक तथा इंद्रियगम्य देवेन को पुत्र के दिल का हाल समझते ज्यादा देर नहीं लगी.

कुमाऊं के छोटे से गांव के एक धर्मपरायण परिवार में उन का जन्म हुआ था. पिता थे एक शिव मंदिर के पुजारी और माता थी सरल गृहिणी जिन्हें मुंह खोलने की स्वतंत्रता भोजन के समय ही थी. पहाड़ के मोटे चावल और मडुवे की रोटी को निगल वे झल के तीखे उतारचढ़ाव पार कर स्कूल पढ़ने जाते थे. उन के पिता इच्छा के अनुरूप कई पुत्रों के पिता तो अवश्य बने, परंतु जीवित एकमात्र देवेन ही रह पाए थे.

उस गांव के प्रजातंत्र में भी इतना साहस नहीं था कि वह पंडित श्री सूर्यनारायण की बात काट दे. परंतु फिर भी पिता के विरोध के बावजूद अपने ही पौरुष की बैसाखियों को टेकते वह मेधावी छात्र एक दिन छलांग लगा कर देहरादून का प्रसिद्ध हीरा व्यवसायी बन गया था.

स्वयं के अनुभवों ने उन की सोच को आधुनिक और प्रगतिशील बना दिया था. उन का अपने पुत्र के साथ व्यवहार भी मित्रवत ही था. इसलिए अपने पुत्र के पास जा कर उस की प्रेयसी के बारे में पूछने में उन्हें कोई संकोच नहीं हुआ. परंतु प्रेयसी की उम्र जान कर उन का प्रगतिशील हृदय भी धिक्कार उठा था. वे जानते थे नवल की उम्र में विमोह होना प्राकृतिक है. इसलिए क्रोध उन्हें उस प्राध्यापिका पर आ रहा था. बड़ी ही चतुराई से उन्होंने नवल को नानी से मिलने के लिए भेज दिया और स्वयं उस मोहिनी से मिलने पहुंच गए.

अभी देवेन की गाड़ी वहां पहुंची ही थी कि उन्होंने नवल को वहां से निकलते हुए  देख लिया. जाने से पहले अपनी प्रेयसी से अनुमति लेने आया होगा, यह सोचते ही क्रोध से उन का चेहरा तमतमा हो उठा. वे क्रोध में पैर पटकते हुए प्राभ्यास भवन के अंदर चले गए.

‘‘लोगों को अपनी भंगिमाओं पर घुमाना खूब आता है आप को, ‘‘सुभा अभी कलाकारों को निर्देश दे ही रही थी पीछे से किसी की अनाधिकार टिप्पणी ने उसे अचंभित कर दिया.

वह स्वर की दिशा की तरफ पलटी और देवेन को उन के जीवन का एक बहुत बड़ा झटका मिला.

‘यह कैसे आ गई यहां? क्या मेरी ही इच्छाशक्ति इसे खींच लाई?’ मन ही मन देवेन सोचने लगे थे. इतने वर्षों बाद भी इस अलौकिक नारी की उपस्थिति उन्हें सम्मोहित कर रही थी.

‘‘आप भीतर कमरे में जा कर बैठें, मैं आती हूं,’’ सुभा सामान्य ही थी.

स्मृतियों के जलप्रपात पर यत्न से बनाया गया बांध किसी अदृश्य शक्ति द्वारा तोड़ दिया गया था और वे तीव्र फुहार के साथ देवेन के मन और मस्तिष्क को भिंगोती चली गई.

गांव की खूबसूरत यादों में सब से मोहक याद उसी की तो थी. प्रशस्त ललाट, तीखी नासिका, भुवनमोहिनी सुभा स्वभाव से विप्लवी और जाती से अश्पृश्य थी. उस के विप्लवी स्वभाव और निर्दोष चेहरे को देख कर ही उस का नाम उस के पिता ने महाकाली के कई नामों में से चुन कर रखा था, सुभा, अर्थात् वह जो सौभाग्यशाली है. परंतु उस के नाम की शुभता भी उस की जाति की अस्पृश्यता का दमन नहीं कर पाई थी.

‘‘छोटे पंडित, शंभू की पूजा का समय हो गया,’’ कहती हुई वह प्रतिदिन सुबह देवेन के शयनकक्ष की खिड़की की सांकल खड़खड़ा जाती और वे झंझला कर खून का घूंट पी कर रह जाते थे.

एक दिन रात बीतने को ही थी कि खुसरफुसर सुन सब ने सोचा मंदिर में कोई जानवर घुस आया है, जिसे भगाने का भार देवेन पर डाला गया. देवेन ने लाठी उठाई, परंतु जब वहां पहुंचे तो देखा कि कोई दूसरी ही छाया अपनी अपावन उपस्थति से शिवालय को अपवित्र कर रही थी. शिवलिंग के सम्मुख घुटने टेके आंखें मूंदे करुण स्वर में गा रही थी-

ईट की दीवारों में बंदी,

यह प्रभू नहीं उस की मूरत है.

जो जीव प्रेम की चुनरी ओढ़े,

उस मानव में उस की सूरत है.

प्रभु नाम को जपने वालो,

सुन लो यह कथन भी मेरा.

तुम जिस को पूजते रहे,

अस्पृश्य है वह प्रभु भी तुम्हारा.

देवेन का सम्मोहन उस के पिता की कर्कश ध्वनि ने तोड़ा, ‘‘ऐ लड़की सुबहसुबह मंदिर को अपवित्र कर रही है, चल निकल भाग. अभागन प्रभु को अस्पृश्य कहती है.

क्यों न कहूं. स्पर्श किया है कि तुम ने अपने प्रभु को? जिस का स्पर्श नहीं कर सकते वह तो अस्पृश्य ही हुआ न? अपने प्रश्न का उत्तर स्वयं दे कर बाबूजी को अंगूठा दिखा कर भाग गई थी वह आनंदी.

बाबूजी चाहते तो सुभा और उस के परिवार को भगाने में उन्हें क्षणिक भी समय नहीं लगता, परंतु सुभा की विधवा बूआ की अनन्य भक्ति आड़े आ जाती थी. अस्पृश्यता की कालिख रात्रि के अंधेरों में मिल जाती थी, इसलिए बाबूजी की शिक्षा उस बेचारी को रात में ही नसीब होती थी. विद्यालय में भी सुभा को प्रवेश मेरे प्रभुतुल्य पिता की अनुशंसा पर ही मिला था.

जो अपनी दर्पोंक्ति से गांव के मनचलों को तिलमिला कर कर स्तब्ध कर दिया करती थी, उस की बातों का मर्म समझने की सामर्थ्य किसी में भी नहीं थी, स्वयं देवेन में भी नहीं.

देवेन से 10 वर्ष छोटी होने के बावजूद समझदारी में सुभा उस से बहुत बड़ी थी.

एक दिन ऐसे ही मंदिर में आ कर देवी की मूर्ति हटाने की बात करने लगी.

‘‘पागल हो गई है क्या?’’ देवेन की आंखों में भय था.

‘‘क्यों? 5 दिनों के लिए जब सभी स्त्रियां अस्पृश्य हो जाती हैं, तो यह देवी बारहों महीने अंदर मंदिर में कैसे बैठ सकती हैं?’’ यह कह वह पुन: अंदर जाने का प्रयास करने लगी. देवेन उस का दुसाहस देख कर दंग रह गया था.

‘‘पगली, ये तो देवी हैं,’’ उस प्रज्ञात्मक कन्या को देवेन ने समझने का असफल प्रयास किया.

‘‘देवी हैं तो क्या औरत नहीं हैं? क्या ये योनिविहीन हैं? क्या इन के पास अंडाशय नहीं है?’’ बड़ी मुश्किल से उस दिन उसे वहां से खींच कर ला पाए थे वे. पता नहीं वह सिरफिरी उस दिन क्या कर बैठती.

‘‘अच्छा तो क्या तू ईश्वर को भी स्वीकार नहीं करती?’’ एक बार देवेन ने उस से पूछा.

सुभा ने हंस कर जवाब दिया था, ‘‘इतना डरडर कर क्यों पूछ रहे हो? इस में भय की कोई  बात नहीं. कह नहीं सकती, अभी तो उसे ले कर असमंजस की स्थिति में हूं. परंतु कालांतर में शायद उस के अस्तित्व को नकार दूं,’’ उस किशोरी की इन बातों से देवेन डर जाते और मन ही मन उस लड़की की छाया से भी दूर रहने के वादे करते थे.

 

यों ही अचानक: भाग 3- अकेले पड़ गए मुकुंद की जिंदगी में सारिका को क्या जगह मिली

सुदेश के दोस्त ने उन दोनों को सुदेश के बनारस के उस फ्लैट की चाबी दी जहां सुदेश अकसर यहां आने पर किराए पर रहता था. बात हुई कि दोस्त बाद में इस फ्लैट में आ कर उन्हें सारी बातें बताएगा और बिजनैस के मामले में सारिका को जानकारी देगा. दोनों होटल से अपना सामान ले कर यहां पहुंचे.

2 कमरों का यह फ्लैट सारी सुविधाओं से लैस था. कमरों में सामान अस्तव्यस्त था. दोनों मिल कर उसे समेटते रहे. अचानक दोनों एकदूसरे को देख झेंपने लगे. नशे से ले कर अश्लील वस्तुएं उधरउधर पड़ी मिल रही थीं. वैसे तो सारिका के लिए यह नई बात नहीं थी, मगर पत्नी होने का एहसास सारिका की आंखों से झरने लगा. मुकुंदजी ने उसे आवाज दी. उसे आंसू पोंछते देख वे उस के नजदीक आ गए.

झिझक को परे करते मुकुंदजी ने सारिका का हाथ धीमे से पकड़ लिया. कुछ एहसास यूं साझ हो गए कि सारिका अनजाने ही उन के करीब आ गई. 2 सांसें एकदूसरे की आहट को अपने में जज्ब करते कुछ देर यों ही खड़े रहे, फिर जैसे दोनों को अपनीअपनी शर्म और झिझक की फिक्र हो आई.

डाक्टर साहब परे हटते हुए बोले, ‘‘चलो गीजर औन है, नहा लो, फिर लंच के बाद अस्पताल चलना है न.’’

4 दिन और ऐसे ही अस्पताल तक दौड़ लगाते बीतते रहे. इस दलदल भरे जीवन में आखिर कब तक रुके रहते मुकुंदजी. उधर निलय भी अब पापा के लिए परेशान था. फिर उन के अपने मरीज. उन्हें भी डाक्टर साहब की जरूरत थी.

शाम को मुकुंदजी वापस आए तो सारिका से कहा, ‘‘निलय के बारे में सोच रहा हूं,  मुझे अब जाना होगा, मेरे मरीज भी परेशान हैं, मैं ने सुदेश के दोस्त को अच्छी तरह समझ दिया है. वह तुम्हें पूरी तरह मदद देगा. उस का फोन नंबर तो तुम्हारे पास है, अब सुदेश के सामने दोस्त की मदद से बिजनैस आदि की बातें अच्छी तरह समझ लो. घर से रिश्तेदारों को बुला लेना सही रहेगा.’’

सारिका फफक पड़ी. मुकुंदजी को वास्तविकता का ज्ञान था. उन्होंने बात जारी रखी, ‘‘मेरे रहते रिश्तेदार आएं तो तुम्हारे और मेरे बारे में बातें दूसरी निकल आएंगी. फिर तुम्हें मदद मिलनी मुश्किल होगी. मैं कल सुबह ही ट्रेन से वापस जा रहा हूं. तुम कल घर वालों को और ननदों को फोन कर के बुला लो. बिजनैस या पैसे के मामले में तुम्हें अपना हक समझना होगा. हार नहीं मानोगी, तुम्हें अपने बच्चे के साथ खुशी से जीना है, जिस ने जो किया, उसे वह मिला, यही सच है.’’

सुबह 5 बजे बगल के कमरे का दरवाजा ठेल वापसी को तैयार मुकुंदजी सारिका से मिलने आए. जाने की इत्तला देनी थी.

मद्धम नाइट लैंप की रोशनी में उन्होंने सारिका को देखा. आकर्षण का सुख मुकुंदजी की आंखों में लबालब भर गया. छरहरी परी सी काया बिस्तर पर जैसे मूक आमंत्रण दे रही थी.

किसी अनजाने लोक की रहस्यमयी स्त्री जैसे उन के संयम पर मंदमंद मुसकरा रही थी. वे उसे जानने को आतुर हो गई. भूल गए कि वे किसलिए अभी यहां आए थे, क्या कहना था उन्हें. मुकुंदजी सारिका के करीब आ गए थे. गुलाबी चुन्नी को सरकाया तो फिसल कर बदन से परे हट गई. उस के गोरे चेहरे पर और उस के रसभरे होंठों पर उन की दृष्टि निबद्ध हो गई. ‘एक पिता,’ ‘एक पति,’ ‘एक डाक्टर’ के परिचय में कैद मुकुंदजी आज अचानक अपने पिंजरे का दरवाजा खोलने को बेचैन से दिखे. रुके हुए स्रोत का बांध जैसे आज अचानक किसी ने खोल दिया था. शिला टूट गई थी, चाहत बह निकली थी.

अपने अंदर के एक अनजाने व्यक्ति से रूबरू होते हुए मुकुंदजी ने सारिका  को अपने हृदय में समेट उस के होंठों पर अपना होंठ रख दिया. एक पल को जैसे विश्व का स्पंदन थम गया. सारी ऊहापोह, नीलिमा को खोने का दुख, उस के प्रति अपराध भावना, खुद के गांभीर्य के प्रति सजग भाव सबकुछ खत्म हो गया पल में. सिर्फ 2 प्राण एक मन रह गए थे जैसे. सारिका जग चुकी थी. कुछ देर जगी हुई शांत सी पड़ी रही, फिर धीमे से दोनों हाथों से उन्हें बांध लिया. मुकुंदजी को सारिका के दिल का पता मिल गया था. वे उठ कर खड़े हो गए. कहा, ‘‘जा रहा हूं, मगर तुम्हारे लिए एक ही जगह ठहरा मिलूंगा, हां, अपना कर्तव्य पहले रखना. आज वह बीमार है, उस की दिल से सेवा करना, अगर स्वस्थ हो जाए तो उस का साथ निभाना, मेरी शुभकामनाएं हमेशा साथ रहेंगी तुम्हारे.’’ मुकुंदजी अपना बैग ले कर निकल गए. सारिका बोझिल और असहाय सी उन्हें जाते देखती रही. अब आगे क्या?

साल बीत रहे थे. निलय आज अपनी 10वीं कक्षा की परीक्षा के लिए गया था. अच्छे इलाज, देखरेख और बड़ा हो जाने की वजह से अब पहले से ज्यादा बेहतर था वह. स्कूलवालों की ओर से उसे अच्छी सुविधा दी गई थी और सैंटर से परीक्षा दिलवा कर उसे घर पहुंचाने की जिम्मेदारी स्कूल वालों ने ही ले रखी थी. मुकुंदजी की तबीयत आज कुछ ज्यादा ही खराब थी. बुखार ज्यादा चढ़ा हुआ था. 5 दिनों से वायरल हो रहा था उन्हें. अचानक उन्हें अपने सिरहाने किसी की आहट महसूस हुई. कौन हो सकता है? बेटे के निकलने के बाद आज वे दरवाजा लगाना भूल गए थे. आंखें खोलीं.

3 साल बाद अचानक कैसे. बोले, ‘‘सारिका? ’’ डाक्टर साहब व्याकुल हो उठे.

‘‘तुम कैसे आ पाई? कहां थी अब तक?’’

‘‘मायके में.’’

‘‘आओ, मेरे पास बैठो.’’

‘‘इतना बुखार है आप को?’’

‘‘तुम अपनी कहो सारिका.’’

आप के जाने के बाद महीनाभर मैं वहां रुकी रही. बेटे को मेरे मायके के ही पास स्कूल में भरती करवा दिया गया था. मेरी मां संभालती थी उसे. सभी रिश्तेदारों को खबर की गई थी, ननदें उन के बेटे और मेरे भाई आए थे.’’

‘‘उस के बाद?’’

‘‘बाद में मायके में ही आ गई मैं.’’

‘‘और सुदेश?’’

‘‘महीनेभर में ही वे चल बसे.’’

‘‘उड़ती खबर मैं ने भी सुनी थी, पर महीनेभर में ही?’’

‘‘ननदों ने अपने बेटों के लिए भी बिजनैस से हिस्सा निकाला. मुझे एक करोड़ थमाए, मैं संतुष्ट हूं, ज्यादा हिसाब नहीं मिलाती.’’

‘‘बेटा कहां है?’’

वह मायके में ही है, वहीं रम गया है. इस घर को मैं ने बेच दिया है और इसी शहर में दूसरा घर ले लिया है. आप की मरजी हो तो हम दोनों…’’

डाक्टर साहब ने उस के हाथों को अपने हाथों में ले कर पूछा, ‘‘आगे कहो.’’

‘‘आप कहें तो…’’

‘‘कहो.’’

सारिका ने सिर झका लिया. ढेरों बातें उस के दिल में छटपटाने लगीं. झिझक की वह बारीक झिल्ली बड़ी मजबूत सी लग रही थी जो तोड़े न टूटती थी.

मुकुंदजी उठ कर बैठ गए, कहा, ‘‘कालोनी वालों की नजरों के सामने तुम इस घर में साथ नहीं रहना चाहती न? ठीक है हम वहीं चले जाएंगे, जहां तुम कहो. पर अच्छी तरह सोचा तुम ने कि हम दोनों के बीच उम्र का फासला… तुम कितना सह पाओगी? और फिर निलय?’’

उन के कंधे पर सारिका ने अपना माथा टिका लिया और शांति से बोलती रही, ‘‘नीलिमा दीदी की अब पूरी जिम्मेदारी मेरी, निलय अगर मुझे अपना ले और आप ने उम्र की बात छेड़ी ही क्यों? मैं ने बताया नहीं आप को कि मैं इतना हिसाबकिताब नहीं देखती.’’

मुकुंदजी मुसकरा पड़े.

‘‘हां, अब वही बातूनी सारिका मुझे वापस मिल गई है. निलय की फिक्र न करो. जरा सा प्यार मिला नहीं कि पिघला.’’

फिर तो छोटे से कमरे में बड़ेबड़े सतरंगी सपनों के हजारों फूल खिलते रहे. सारिका बोलती रही. डाक्टर मुकुंद प्रधान

इस चपलाचंचला को मंत्रमुग्ध से सुनते रहे.

Winter Special: कड़कड़ाती ठंड में ये सुपरफूड्स बनेंगे आपका सुरक्षा कवच

सर्दियों का मौसम और कड़कड़ाती ठण्ड अपने साथ कई तरह की बिमारी साथ लेकर आती है. इस मौसम में अपना सेहत का विशेष ख्याल रखने की जरूरत होता है. हाथपैर और पूरा शरीर ठण्ड की चपेट में आकर ठिठुरने लगता है ऐसे में आप गर्म कपड़ो का सहारा लेती हैं. लेकिन क्या आप जानती है कि कुछ ऐसे फूड्स होते हैं जो सर्दियों की कड़कड़ाती ठंड में भी आपके शरीर को गर्म रखने का काम करते हैं.

ये फूड्स न सिर्फ शरीर का तापमान बढ़ाकर सर्दी-खांसी जैसी बीमारियों से हमारा बचाव करते हैं बल्कि इनका सेवन करने से हमारे शरीर की इम्यूनिटी भी बढ़ती है. इसलिए कड़कड़ाती ठण्ड में गर्म कपड़े ही नहीं बल्कि हरी भरी सब्जियां भी आपका सुरक्षा कवच है.

आज हम आपको ऐसे ही कुछ फूड्स की खासियत के बारें में बताने जा रहे हैं जिन्हें सर्दियों का सुपरफूड कहा जा सकता है.

बादाम

बादाम आपको सर्दियों में काफी गर्म रखते हैं. यह आपके इंसुलिन सेंसिटीविटी को सुधारने तथा आपके दिल को सेहतमंद रखने में भी मदद करता है. आप बादाम और अन्य नट्स जैसे अखरोट और खुबानी आदि का मिश्रण बनाकर स्नैक्स के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं. रोजाना इसका सेवन आपको ठण्ड से बचाकर रखता है.

फूलगोभी

फूलगोभी सर्दियों के लिए बेहतर फूड है और इसमें विटामिन K (के) भरपूर मात्रा में पाया जाता है. आप इसे उबालकर, तलकर या फिर सूप बनाकर इसका सेवन कर सकती हैं. यह आपको ठण्ड से बचाने के साथ हा आपकी सेहत का पूरा ध्यान रखता है.

हरा मटर

हरे ताजे मटर का सेवन सर्दियों में बेहद फायदेमंद होता है. यह विटामिन E (ई) , ओमेगा 3 फैटी एसिड्स और बीटा कैरोटिन का बेहतरीन स्रोत होता है. इसमें कोमेस्ट्राल पाया जाता है जो पेट के कैंसर को रोकने में मदद करता है.

अनार

वैसे तो अनार खाना हर मौसम में अच्छा होता है पर सर्दियों में यह आपकी सेहत का खास ख्याल रखता है. अनार तमाम तरह के पोषक तत्वों और एंटी-आक्सीडेंट्स से भरपूर होता है. अनार आपकी उम्र बढ़ाने की भी क्षमता रखता है. इसमें मौजूद एंटी-आक्सीडेंट्स दिल संबंधी बीमारियों और प्रोस्टेट कैंसर के खतरे को कम करने का काम करते हैं. इसके अलावा यह दिल, बालों और त्वचा की सेहत के लिए भी बेहद लाभदायक फल होते हैं.

शकरकंद

इम्यूनिटी बढ़ाने, कब्ज दूर करने तथा सूजन संबंधी समस्याओं को दूर करने में शकरकंद बहुत लाभदायक है. पोटैशियम, विटामिन ए और फाइबर इसमें भरपूर मात्रा में उपलब्ध है. पोषक तत्वों से भरपूर शकरकंद में बहुत कम कैलोरी पाई जाती है और अपने इन्हीं गुणों की वजह से इसे सर्दियों का सुपरफूड कहा जाता है.

साइट्रस फल

सर्दियों में साइट्रस फल खाने के बड़े फायदे होते हैं. ये विटामिन सी और पोटैशियम के अच्छे स्रोत होते हैं. इनमें कैलोरी की माक्त्रा बेहद कम होती है. हमारे हार्मोन्स को दुरुस्त रखने में भी यह मदद करती है.

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