मायूस मुसकान: भाग 3- आजिज का क्या था फैसला

मुसकान फफकफफक कर रो रही थी. ऐशा भी आज उसे खुल कर रो  लेने देना चाहती थी. फिर भी यह चाहती थी कि वह अपनी मां से बात करे, उस की खामियां न खोजे. ‘‘तुम तो उफनती नदी सी हो गई हो, जिस का बहाव सिर्फ तबाही मचा सकता है. मुसकान एक बार शांत हो जाओ वरना न जाने अपनी मां से क्या भलाबुरा कह बैठोगी आज. फिर मुंह से निकली बात कभी वापस तो नहीं ली जाती न? तुम्हारे अंदर के ज्वार को एक बार शांत हो जाने देना जरूरी है. मुसकान तुम कहती जाओ मैं सुनती जाऊंगी बगैर कोई उपदेश दिए,’’ ऐशा बोली.

मुसकान जब रो कर थक जाती फिर कहने लगती. अंत में जब वह खास मुद्दे पर आई तो ऐशा गहरे सोच में पड़ गई.

‘‘मुसकान पर यह तो हर मांबाप की ख्वाहिश होती है कि वह अपने बच्चों को विवाहित देखे, उन की संतान को देखे. तुम क्यों ताउम्र कुंआरी रहना चाहती हो? क्यों संतान पैदा नहीं करना चाहती? तुम तो अपने प्यार की बगिया सजा सकती हो. देखो रोहित है न तुम्हारे जीवन में, तुम्हारी हां होने की राह देख रहा है बस, उस के मातापिता भी तुम से मिल चुके हैं, तुम्हें कितना पसंद करते हैं. उस से विवाह कर तुम दोनों रोज साथ में दफ्तर आनाजाना प्रेम की फुहारों का आनंद लेना. यह तो तुम्हारा प्रेमविवाह होगा. न कोई बंदिश न ही कोई घुटन.’’

‘‘हां लेकिन अपनी मां का क्या करूं? कहती हैं अरेंज्ड मैरिज करनी है वरना लोग क्या कहेंगे? आज भी उन्हें रिश्तेदारों और समाज की पड़ी है, मु  झ से कोई वास्ता नहीं. भैया की तो अरेंज्ड मैरिज ही थी, क्या परिणाम निकला? पापा व हमारी विधवा बूआ ने उसे व उस की पत्नी को कभी एक न होने दिया. भैया और भाभी उन्हें अपने साथ कैसे रखते जब वे बातबात पर भाभी पर कोई न कोई तोहमत लगाते. हम दोनों भाईबहन कभी उन के सामने अपनी बात तो रख ही न पाए. आखिर भाभी ने ही भैया से तलाक ले लिया. अब भैया ने अपने साथ काम करने वाली लड़की से दूसरी शादी कर ली है और मेरे मातापिता से अलग घर ले कर रह रहे हैं.

‘‘अब भी मां नहीं सम  झीं. जो जिंदगी स्वयं जी, वही हमें देना चाहती हैं. सिर्फ    झूठे दिखावे और मानप्रतिष्ठा को बचाने के लिए मेरी अरेंज्ड मैरिज कर देना चाहती हैं, सारे रिश्तेदारों को जमा कर रीतिरिवाजों को ढोना चाहती हैं और उन का बो  झ मु  झ पर भी लाद देना चाहती हैं, जबकि हमारे स्वयं के परिवार और रिश्तेदारों में ही एका नहीं. फिर दूसरी तरफ से रोहित के रिश्तेदार होंगे. आज ब्याह के गवाह बनेंगे कल से आरोपप्रत्यारोप और फिर हम

दोनों की सारी जिंदगी तेरे रिश्ते मेरे रिश्ते करते बीत जाएगी.

‘‘आज भी मां पापा को सपोर्ट कर रही हैं, हमें नहीं. जबकि दोनों कभी सुख से न रह सके, कभी एकदूसरे को देख कर मुसकराए नहीं. ऐसा महसूस होता है कि हम प्रेम की पैदाइश नहीं, एक बलात्कार का प्रतिफल हैं. स्वयं बीमार रहती हैं, मु  झे भी शायद मानसिक रूप से बीमार कर देंगी. स्वयं तो अपने लिए आवाज उठा न पाईं, जब देखो पापा की शिकायत  मु  झ से करती हैं, मैं क्या करूं किस रिश्ते को छोड़ूं और किस को निभाऊं?’’

‘‘उफ तो यह बात है, फिर तुम क्या चाहती हो?’’

‘‘मैं अविवाहित रहना मंजूर करूंगी, किंतु अपने मातापिता की तरह विवाहित नहीं. यदि मैं विवाह करूं तो हमारा विवाह हमारे लिए होगा,’’ मुसकान की उंगलियां लैपटौप के कीबोर्ड पर चल रही थीं और आंखें स्क्रीन पर कुछ ढूंढ़ रही थीं.

करीब 5 मिनट बाद उस ने लैपटौप शट डाउन किया और मुसकरा कर बोली, ‘‘मां को फोन कर अपना फैसला सुनाने जा रही हूं, शादी अपने हिसाब से और जब, जहां मेरा मन चाहेगा वहां करूंगी.’’

ऐशा ने उसे मुसकरा कर देखा. मुसकान भी मुसकराई शायद आज बरसों की मायूसी दूर हुई थी.

उस ने मां को फोन किया, ‘‘मां मैं और रोहित कोर्ट मैरिज कर रहे हैं, हमें आप के और आप के रिश्तेदारों, रीतिरिवाजों में कोई दिलचस्पी नहीं. मेरे दोस्त इस विवाह के गवाह बन अपने हस्ताक्षर कर देंगे.’’

‘‘यह तुम बहुत गलत कर रही हो. एक तो हमें अपने हिसाब से लड़का देखने न दिया, विवाह की सूचना भी नहीं दी और न ही हमें आमंत्रित किया. क्या इसीलिए तुम्हें बेटे के समान पालापोसा, पढ़ायालिखाया?’’

‘‘आप और पापा ने सिर्फ अपना फर्ज निभाया, मेरे लिए स्पैशली कुछ नहीं किया. इसलिए मु  झ पर एहसान जताने की कोशिश मत करो. जकड़ी रहो पापा और दादी द्वारा दी गई रूढि़यों में. मैं चाहती थी कि तुम अब तो अपनी बेटी को सपोर्ट कर घर में और स्वयं में बदलाव लाओ. आखिर अब आप को किस का डर है? आप के बच्चे आप के साथ हैं. लेकिन नहीं आप को तो उन्हीं ढकोंसलों में जीने की आदत हो चुकी है. लेकिन मैं आप सभी के इस बंधन में और ज्यादा रहने वाली नहीं, बाय.’’

‘‘पर मुसकान सुनो तो…’’ दूसरी तरफ से आवाज आई, लेकिन मुसकान फोन काट चुकी थी.

मां ने कई बार उसे फोन किया, लेकिन मुसकान ने उठाया ही नहीं और न ही वह अपनी मां के व्हाट्सऐप संदेशों के जवाब दे रही थी.

15 दिन मानो पलक   झपकते ही बीत गए, मुसकान ने यह पूरा समय शौपिंग में बिताया.

आखिर वह दिन आ ही गया जब उसे कोर्ट में दुलहन के लिबास में पहुंचना था. वह पहले से ही बुक्ड ब्यूटीपार्लर गई. ब्यूटीशियन उस का मेकअप कर रही थी. मुसकान मन ही मन अति प्रसन्न महसूस कर रही थी मानो बरसों की गुलामी से नजात पाई हो. उस के मन की खुशी चेहरे पर परीलक्षित हो रही थी. कभीकभी वह सामने लगे आईने में स्वयं को देख मुसकरा उठती. उसे बेसब्री से इंतजार था कि कब वह और रोहित एक हो जाएं और प्यार की दुनिया बसाएं. जहां सिर्फ वह और रोहित हों, मीनमेख, खामियां देखने और ढूंढ़ने वाला कोई न हो.

‘‘आप की आखों में आई लाइनर बहुत उभर कर आया है मुसकान मैम. जरा अपनी आंखें आईने में देखिए तो,’

’ ब्यूटीशियन ने अपने हाथ से आंखों का मेकअप पूरा करते हुए कहा.

जैसे ही उस ने आईना देखा, सुर्ख लिपस्टिक लगे उस के होंठ मुसकरा उठे. उसे तो मालूम ही न था कि वह कभी इतनी सुंदर भी दिखाई दे सकती है.

‘‘सचमुच मन की खुशी चेहरे की रंगत निखार देती है,’’ वह धीरे से बुदबुदाई.

‘‘जी मैम, आप ने कुछ कहा?’’

‘‘नहीं कुछ नहीं, तुम अपना काम जारी रखो.’’

बीच में उस का फोन बज उठा. शायद रोहित का फोन होगा, सोचते हुए उस ने फोन   की स्क्रीन को देखा. स्क्रीन पर ‘मौम’ ब्लिंक हो रहा था. उसने फोन स्विचऔफ कर दिया. फिर से ब्यूटीशियन से अपना मेकअप करवाने लगी.

3 घंटे में मुसकान दुलहन के लिबास में तैयार हुई. ऐशा सैलून से बाहर उस की प्रतीक्षा कर रही थी.

‘‘वाऊ, लवली… कितनी सुंदर लग रही हो तुम मुसकान,’’ ऐशा ने मोबाइल से उस की तसवीरें खींच ली.

थोड़ी ही देर में रोहित दूल्हा बना कुछ दोस्तों के साथ गाड़ी से वहां पहुंचा.

कोर्ट तक पहुंचते हुए दोनों के करीब 25 मित्र जमा हो चुके थे.

रजिस्ट्रार औफिस में जैसे ही उन का नंबर एवं नाम पुकारा गया दोनों कमरे के अंदर गए. कुछ कागजों पर दोनों ने दस्तखत किए. विवाह अधिकारी ने भी उन घोषणापत्रों पर दस्तखत किए और 3 गवाहों के भी दस्तखत लिए गए जो उन के दफ्तर के कलीग एवं मित्र ही थे.

अब मुसकान एवं रोहित कानूनन पतिपत्नी बन चुके थे. विवाह अधिकारी समेत उन के मित्रों ने उन्हें खूब बधाइयां एवं शुभकामनाएं दीं.

वहां से रवाना हो कर दोनों नए घर में पहुंचे जहां उन्होंने सब से अलग अपनी नई दुनिया बसाई थी. हां, रोहित ने विवाहपूर्व एक छोटा सा सेमीफर्निश्ड फ्लैट खरीद लिया था. सभी मित्र उन्हें वहां छोड़ अपने घरों को विदा हो गए थे. रोहित और मुसकान आलिंगनबद्ध हो एकदूसरे को निहार रहे थे. कमरे में मधुर संगीत बज रहा था. नए घर और विवाह की खुशी में रात कब बीत गई मालूम ही न हुआ. सुबह की चाय बना मुसकान ने बाल बांध कर काम के लिए कमर कस ली थी. रोहित भी उस के काम में हाथ बंटाने लगा था. दोनों को मिलजुल कर उस मकान को आशियाना जो बनाना था.

26 January Special: परंपराएं- भाग 3- क्या सही थी शशि की सोच

प्रवेश करने पर स्वागत करने वालों की छोटी सी टोली दिखाई दी, जो अपनेआप में महत्त्वपूर्ण नहीं थी, परंतु जो वहां हुआ वह बड़ा नाटकीय था. स्वागतियों का सरदार एक लंबा, तगड़ा पहरेदार लगता था. उस ने लाल रंग की सुगठित वरदी पहनी हुई थी और वह प्रत्येक मेहमान के आगमन की घोषणा कर रहा था. अभी मैं इस दृश्य को अपनी आंखों में भर ही रही थी कि घोषणा सुनाई दी, ‘सावधान, सर्वमान्य श्रीमती और श्री मजूमदार पधार रहे हैं.’ उस घोेषणा में लयबद्धता थी, एकरूपता थी, यदि आप मेहमान हैं तो अवश्य ही माननीय होंगे.

जिस परिसर में मेहमान एकत्र हो रहे थे वह भोजकक्ष से सटा था. वहीं पर सब के लिए अल्पाहार और पेय आदि की व्यवस्था थी. उस की छत से लटकता, तराशे कांच से बना हुआ विशाल झाड़फानूस अपने चारों ओर एक भव्य आभा बिखेर रहा था. वे प्रकाशपुंज सचमुच एक विचित्र विलासमय गरिमा से भरे थे. जूली और उस का पति कीथ, मेहमानों का स्वागत बड़ी तन्मयता से कर रहे थे. जब जूली की नजर मुझ पर पड़ी, वह उस विशाल कमरे में एकत्र लगभग 300 मेहमानों को लांघ कर मेरी ओर लपकी. उस ने मुझे अपने बाहुपाश में जकड़ लिया और बोली, ‘‘मैं तुम्हें बता नहीं सकती कि तुम्हें यहां देख कर मुझे कितनी प्रसन्नता हो रही है.’’

फिर वह मुझे अपनी बचपन की सहेली डौरिस की ओर खींच कर ले गई, ‘‘मैं ने तुम दोनों को एक ही मेज पर रखा है. मुझे विश्वास है कि तुम दोनों एकदूसरे से बात करने में नहीं थकोगी.’’

जूली ने ठीक ही कहा था. डौरिस  जूली की बचपन की सहेली  थी. प्राथमिक शिक्षा से ले कर विश्वविद्यालय तक वे साथ ही पढ़ी थीं. बिना किसी भूमिका के डौरिस ने मुझ से कहा, ‘‘क्या तुम मेरे हैट के बारे में नहीं पूछोगी?’’

पुआल से बना, डौरिस के कंधों पर पूरी तरह छाया वह हैट मुझे कुछ पुराना सा लगा. मेरी समझ में नहीं आया कि क्या कहूं.

‘‘हां, अवश्य बताइए. एकदम बिरला लगता है,’’ मैं बोली.

‘‘वह तो है. यह हैट मैं ने जूली के विवाह पर पहना था.’’

‘‘क्या कहा, 40 साल पुराना, मैं नहीं मानती.’’

‘‘मेरा विश्वास करो. चाहो तो बाद में जूली से पूछ लेना. लेकिन इस हैट की कहानी यहीं समाप्त नहीं हो जाती. जब जूली की शादी हुई, मैं फैशन के मामले में बिलकुल नादान थी. विवाह के अवसर पर जब मैं चर्च पहुंची तो मैं ने देखा कि मेरे अलावा सभी स्त्रियों ने हैट लगाए हुए थे. मेरे असमंजस को मेरी दादी ने भांप लिया और अपना हैट उतार कर मेरे सिर पर रख दिया.’’

‘‘अविश्वसनीय, इस का मतलब यह हुआ कि न केवल तुम ने इसे 40 वर्ष पूर्व जूली के विवाह में पहना बल्कि यह उस से भी पुराना है.’’

‘‘हां, इस के किनारों पर लगी पाइपिंग के अतिरिक्त यह वैसा का वैसा है, जैसा मेरी दादी ने मुझे दिया था.’’

धीरेधीरे सभी मेहमानों से मेरी दुआसलाम हो गई. जूली की मौसी की पुत्री अपने पति पाम्पडूस के साथ ग्रीस से आई थी. जूली के पति के भाई विलियम और उस की पत्नी न्यूयार्क से आए थे. पीटर आस्ट्रेलिया से, डेविड हौंगकौंग से. आयरलैंड, जरमनी, स्पेन और इटली से भी रिश्तेदार आए थे. इंगलैंड और स्कौटलैंड से आए मेहमानों की संख्या अधिक थी.

स्पष्ट था कि उस पार्टी में परिवार और घनिष्ठ मित्रों के अलावा कोई और व्यक्ति नहीं था. जूली ने मुझे इतना निकट समझा, इस के लिए मुझे स्वयं पर गर्व हुआ.

मेहमानों के इस जमावड़े में एक थी जूली की भांजी, कैथरीन. वह विकलांग थी और ह्वील चेयर पर आई थी. सभी रिश्तेदार उस से मिलने के लिए होड़ लगाते मालूम हो रहे थे. 23 वर्षीय कैथरीन के पैरों की बनावट कुछ ऐसी थी कि कुछ देर के लिए खड़ी तो अवश्य हो सकती थी परंतु अधिक चलफिर नहीं सकती थी. वह आयकर विभाग में काम करती थी और अपनी अपंगता के होते हुए भी एक विचित्र प्रकार के आत्मविश्वास से भरी लगती थी.

जब हम भोज के लिए अपनी पूर्वनिर्धारित मेज पर पहुंचे तो उस पर तैनात वेटर ने मेरा विशेष स्वागत किया. ‘‘निश्ंिचत रहिए, आप दोनों के लिए शाकाहारी भोजन की विशेष व्यवस्था की गई है. आशा है आप को हमारा व्यंजन चुनाव पसंद आएगा.’’

‘‘ओह, धन्यवाद, हम ने तो इस बारे में सोचा भी नहीं था. मुझे विश्वास है कि सबकुछ स्वादिष्ठ ही होगा.’’

हमारी मुख्य तश्तरियों पर व्यंजन सूची के अतिरिक्त एक पुस्तिका रखी थी. मैं ने उसे उठाया, तो जाना कि वह एक व्यंजन नुस्खा पुस्तक थी. डौरिस ने मेरे कान में कहा, ‘‘इस पुस्तक को जूली के वृहत परिवार ने तैयार किया है, सभी ने उस के लिए कुछ न कुछ लिखा है. पुस्तक तो एक बहाना है जिस के माध्यम से उन लोगों ने 1 लाख पाउंड एकत्र किए जिस से एक घर खरीद कर उसे आधुनिक सुविधाओं से संपन्न कर कैथरीन को सौंप दिया. मेरा अनुमान है कि वृहत परिवार के प्रत्येक वयस्क सदस्य ने औसतन 1 हजार पाउंड इस काम के लिए दिए थे.’’

उस कल्पनातीत उदारता की बात सुन कर मेरे मन में जूली के परिवार के प्रति एक विशेष आदरभाव उभर आया. कोई दिखावा नहीं, कोई आडंबर नहीं. एक पारिवारिक समस्या थी, जिस का आकलन किया गया और फिर सभी ने यथासामर्थ्य उस के लिए योगदान किया. न दया, न भावनाओं का अतिरेक और न ही कृत्य के लिए प्रशंसा की चाह.

भोज की समाप्ति और चायकौफी परोसे जाने के बीच एक परदे पर जूली और कीथ के वैवाहिक जीवन की झलकियां छायाचित्रों के माध्यम से प्रस्तुत की गईं. पृष्ठभूमि में आवाज शायद मार्क की थी. हरेक चित्र एक पूरी कहानी था. उस चित्रमाला में उन के पहले मकान का चित्र था. पालतू बिल्ली थी. कीथ के मातापिता, भाईबहन और उन के बच्चों को यथोचित स्थान दिया गया था. मार्क और फियोना के बापटाइज होने, उन के प्रथम दिन स्कूल जाने आदि महत्त्वपूर्ण दिनों की यादें गुथी थीं. वरौनिका का पहली बार घुड़सवारी करने का प्रयत्न, 3 टांग की दौड़ और तैराकी में जीते पुरस्कार, सभी दर्ज थे. और अंत में कीथ के साथ जूली का चित्र उस पोशाक में जिसे पहन कर वह पहली बार कीथ से मिली थी.

इस के बाद सारी रोशनियां बंद कर दी गईं. भोजकक्ष पूरी तरह अंधेरे में डूब गया था. और तब 2-3 क्षण के अंतराल के बाद मंच रोशनियों से जगमगा गया. उस चमकीले प्रकाशपुंज में स्नान करती एक कन्या खड़ी थी. समझने और पहचानने में सभी को कठिनाई हुई. वह जूली नहीं, 15 वर्षीया वरौनिका थी, वही पोशाक पहने हुए जिसे पहन कर जूली पहली बार कीथ से मिली थी. लाल रंग की उस लंबी पोशाक में व्याप्त सफेद रंग की वृत्ताकार बुंदकियां छठे दशक के फैशन की प्रदर्शनी करती जान पड़ती थीं. सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से भर गया था.

कुछ क्षण उस कृत्रिम ज्योत्स्ना में स्नान करने के बाद वरौनिका मंच से नीचे उतर आई. वह बारीबारी से हरेक मेज पर गई और वहां बैठे लोगों के साथ उस ने बड़े चाव से छायाचित्र खिंचवाए. जब वह मेरे पास पहुंची तो मैं ने उस से कहा, ‘‘वरौनिका, तुम इस ड्रैस में बहुत सुंदर लग रही हो.’’

वह इतरा कर खड़ी हो गई, ‘‘हां, ठीक अपनी दादी की तरह.’’

मैं ने उस का माथा चूमा. मैं कल्पना की अपनी दुनिया में चली गई और सोचने लगी कि क्या मेरी अपनी पौत्री मेरी किसी पोशाक को इतने गर्व से पहनेगी?

26 January Special: परंपराएं- भाग 1- क्या सही थी शशि की सोच

जूली से मेरी पहली मुलाकात वर्षों  पहले तब हुई थी जब मैं ने इंगलैंड के एक छोटे शहर से स्थानीय जल आपूर्ति कंपनी के मरम्मत एवं देखभाल विभाग में काम करना शुरू किया था. हमारे विभाग का अध्यक्ष ऐरिक, मुझे एकएक कर के सभी कर्मियों के पास ले गया और उन से मेरा परिचय कराया. पहले परिचय में इतने नाम और चेहरे कैसे याद हो सकते थे, परंतु वह एक अनिवार्य औपचारिकता थी, जिसे ऐरिक निभा रहा था.

जब हम एक महिला के पास पहुंचे, वह दूरभाष पर किसी व्यक्ति का संदेश ले रही थी. दूसरी ओर से कोई चिल्लाए जा रहा था, और वह ‘जी हां’ और ‘हूं’ आदि से अधिक कुछ कह नहीं पा रही थी. ऐरिक और मैं थोड़ा हट कर प्रतीक्षा में खड़े हो गए थे. आखिरकार वह एकतरफा वार्त्ता समाप्त हुई.

‘‘ये हैं जूली, हमारे विभाग की मणि. ये न हों तो हम न जाने क्या करें,’’ ऐरिक ने परिचय कराया, ‘‘जूली यहां आने वाली सभी शिकायतें एकत्र करती हैं.’’

‘‘पहले तो इतनी शिकायतें नहीं आती थीं. जो आती थीं उन का समाधान ढूंढ़ना भी कठिन नहीं होता था. परंतु अब तो जैसे लोगों को शिकायत करने का शौक ही हो गया है,’’ जूली मुसकराई.

‘‘ये हैं शशि मजूमदार. आशा है मैं ने उच्चारण ठीक किया,’’ ऐरिक ने कहा, ‘‘ये आप के और इंजीनियरों की टोलियों के बीच कड़ी का काम करेंगी. आशा है आप दोनों महिलाएं एकदूसरे का काम पसंद करेंगी.’’

जूली मेरी ही तरह छोटे कद की,    इकहरे बदन वाली थी. आयु में   मुझ से 7-8 वर्ष अधिक थी, परंतु दूर से दिखने वाले कुछ अंतरों के बावजूद हमारी रुचियों में बहुत समानता थी. हम ने न केवल एकदूसरे को पसंद किया बल्कि शीघ्र ही मित्र भी बन गईं. यद्यपि जूली की मेज इमारत की पहली मंजिल पर थी और मैं बैठती थी तीसरी मंजिल पर, फिर भी चाहे मिनट दो मिनट के लिए ही सही, हम दिन में 1-2 बार अवश्य मिलती थीं. लंच तो सदैव ही साथ करती थीं और खूब गपें मारती थीं.

जूली दिन में प्राप्त हुई शिकायतों का सारांश तैयार कर के मेरे पास भेज देती थी. उन में से अधिकांश बिल की भरपाई या आपूर्ति काटे जाने आदि से संबंधित होती थीं, जिन्हें मैं सीधे वित्त विभाग को भेज देती थी. कुछ पत्रों का उत्तर ‘असुविधा के लिए क्षमायाचना’ होता, जिन्हें जनसंपर्क विभाग के लोग संभालते थे. शेष मरम्मत और रखरखाव की समस्याओं से जुड़े होते थे. उन्हें मैं ऐरिक के इंजीनियरों की टोलियों के पास भेज देती ताकि उपयुक्त कार्यवाही की जा सके.

बहुधा जूली शिकायत करने वालों के चटपटे किस्से सुनाती. ऐसे ही टैलीफोन पर मुआवजे के लिए गरजने वाले एक आदमी की नकल करते हुए जूली ने कहा, ‘‘पिछले 4 सालों में 2 बार बरसात का पानी मेरे घर में घुस चुका है. दोनों बार सारे कालीन खराब हुए और फर्नीचर भी बरबाद हुआ.’’

फिर जरा रुक कर उस ने आगे कहा, ‘‘अब अगर मौसम बदल जाने के कारण बरसात अधिक होने लगे तो वह बेचारा क्या करे जल आपूर्ति कंपनी से खमियाजा लेने के अतिरिक्त. घर की ड्योढ़ी 4-5 इंच ऊंची करना या बरसात होने से कुछ समय पहले रेत से भरी 3-4 बोरियां अपने दरवाजे के सामने रखना तो बड़े झंझट का काम था, जो उस की सोच से बाहर भी था.’’

‘‘बेचारा,’’ हम दोनों के मुंह से एक साथ निकला.

इसी प्रकार एक दिन जूली ने एक स्त्री की करुण गाथा सुनाई. उस दिन वाटर सप्लाई कंपनी के लोग आ कर उस के घर का पानी का कनैक्शन बंद कर गए थे. वह नाराजगी से भरी सीधी टैलीफोन पर थी, ‘मेरे परिवार में 2 छोटे बच्चे हैं, एक पति. कैसे उन का पालन करूं? आप लोग मनमानी करते हो. किसी की सुविधाअसुविधा का तनिक भी ध्यान नहीं. बस, उठे और टोंटी बंद कर डाली,’ सुबकतेसुबकते वह स्त्री मुझे संबोधित कर के बोली, ‘मिस, यदि मेरी जगह आप होतीं तो क्या करतीं?’ जूली ने मुझे बताया कि उस ने उस स्त्री से कुछ नहीं कहा. फिर बड़े नाटकीय ढंग से मेरे अति निकट आ कर बोली, ‘‘मैं अपना बिल अवश्य चुकाती और यह नौबत आने ही न देती.’’

एक व्यक्ति के गरजनेभड़कने की कथा जूली अकसर सुनाती थी. उस दिन वह बड़े उत्साह से आ कर बोली, ‘‘आज वही आदमी फिर फोन पर था. वही, जो पहाड़ी पर बने एक मकान की छठी मंजिल पर बने एक फ्लैट में रहता है. आज वह फिर भड़का, ‘गरमियां शुरू हो गई हैं और बरसात भी कई दिनों से नहीं हुई है. बताओ कि किस दिन से पानी का राशन शुरू होगा?’ मैं ने कहा, ‘श्रीमानजी, हमारी कोई नीति पानी का राशन करने की नहीं है. सूखे की स्थिति में पानी का प्रैशर घट जाने के कारण कुछ ऊंचे स्थानों में पानी घंटे दो घंटे के लिए नहीं पहुंच पाता. लेकिन बताइए कि क्या पानी आज भी बंद है?’ उस ने कहा कि आज तो बंद नहीं है. इस पर मैं थोड़ा झुंझला गई और मैं ने कहा, ‘तो आज क्यों फोन कर रहे हो?’ उस ने तुरंत फोन रख दिया.’’

मैं ने जूली को सलाह दी, ‘‘यदि वह व्यक्ति दोबारा फोन करे तो उस से कहना कि उस के लिए यह अच्छा है कि वह इस शहर में रहता है. यदि वह भारत जैसे देश के किसी शहर में जा कर एक पहाड़ी पर बने मकान की ऊंची मंजिल में फ्लैट ले कर रहे तो जितने समय यहां पानी नहीं आता उतने समय आए पानी से उसे काम चलाना पड़ेगा.’’

‘‘तुम जानती हो शशि, मैं ऐसा नहीं कह सकती,’’ जूली ने कहा, ‘‘और यदि कहा, तो तुम जानती हो कि मुझे क्या उत्तर मिलेगा. तुम्हारा बस चले तो इस देश में भी वैसा ही हो जाए.’’

इस के बाद हम दोनों के लिए काम करना कठिन हो गया. हम दोनों उस काल्पनिक उत्तर के बारे में सोचसोच कर बहुत देर तक हंसती रहीं.

हमारी गपशप सहकर्मियों या शिकायत करने वालों की चर्चा तक ही सीमित नहीं रहती थी. हम लोग अकसर हर विषय पर बातें करते थे. कंपनी की गपशप पर कानाफूसी, अखबारों में छपी चटपटी खबरें, पारिवारिक गतिविधियां, सभी कुछ. जूली के 2 बच्चे थे. 1 बेटा और  1 बेटी. बेटे का नाम मार्क था. वह विवाह के बाद अपनी पत्नी फियोना के साथ रहता था. बेटी सिमोन का विवाह तो अवश्य हुआ परंतु 1 ही वर्ष के भीतर तलाक हो गया था. उस के बाद वह वापस अपने मातापिता के साथ रहने लगी थी. एक दिन जब जूली काम पर आई तो उस के चेहरे को देख कर मैं समझ गई कि अवश्य ही कुछ बात है. पूछने पर उस ने बताया कि वह मार्क से तंग आ गई है. जूली के अनुसार मार्क और फियोना पिछले बृहस्पतिवार उस के घर आए थे. उन्होंने केवल इतना बताया कि वे लंबे सप्ताहांत के लिए प्राग जा रहे हैं और अपनी पुत्री, वरौनिका को हमारे पास छोड़ गए.

‘‘यह तो ठीक है कि वरौनिका हमें प्रिय है,’’ जूली ने बताया, ‘‘और उस की देखभाल करना कुछ कठिन नहीं परंतु उन्हें यह तो सोचना चाहिए कि हमारी भी अपनी जिंदगी है. हम पूरे सप्ताह वरौनिका के साथ ही लगे रहे. कहीं भी नहीं जा पाए.’’

मायूस मुसकान: भाग 2- आजिज का क्या था फैसला

विवाह के साथ ही शहर बदल गया. पापा का परिवार थोड़ा पुराने खयालों का था, सो मां कभी उस में सामंजस्य ही नहीं बैठा पाईं. शायद अंदर ही अंदर घुटती रही, पापा से कभी खुल कर बात ही नहीं की और पापा ने भी कभी यह नहीं जानना चाहा कि मां क्या चाहती हैं. बस अपने पूरे परिवार की जिम्मेदारियां मां पर डाल दीं. कहने को तो संयुक्त परिवार, किंतु वहां सब जैसे एकदूसरे के दुश्मन, सभी जैसे अपनाअपना फायदा देख रहे थे.’’

‘‘हां तो इस में गलती तुम्हारे पापा की भी तो है, तुम मां को ही क्यों दोषी बता रही हो?’’ ऐशा ने उग्र स्वर में पूछा.

‘‘तुम्हारा सवाल भी ठीक है. कहते हैं न अन्याय सहने वाला अन्याय करने वाले से भी ज्यादा दोषी होता है इसीलिए.

‘‘मां कभी अपने मन की न कर पाईं. मन ही मन जलती रहीं और पापा को कोसती रहीं. खुल कर कभी बोल ही न पाईं, किंतु इन सब में मेरा व मेरे भाई का क्या दोष?

‘‘हमें इतना मारतीं जैसे सारी गलती हमारी ही हो. पूरे परिवार का गुस्सा हम दोनों भाइबहिनों पर उतारतीं.’’

‘‘तो तुम्हारे पापा ने कभी तुम्हारे बचाव के लिए कुछ नहीं किया?’’

‘‘किसे फुरसत और फिक्र थी हमारी लिए जो कुछ करते? उन्हें तो सिर्फ  अपनेअपने ईगो सैटिस्फाई करने होते थे. यह दिखाना होता था कि वे ही सर्वश्रेष्ठ हैं, मां सोचती कि इतनी पढ़ीलिखी हो कर भी गृहस्थी की चक्की में पिस रही हैं वे. पापा सोचते कि घर बैठ कर करती ही क्या है, पढ़ीलिखी है पर व्यवहार करना भी नहीं आता. एकदूसरे के लिए उन की आपसी खीज ने हमारे बचपन को नर्क बना दिया था. बच्चे तो आपसी प्रेम की पैदाइश और पहचान होते हैं, लेकिन उन के आपसी   झगड़ों ने हमारी मुसकराहट छीन ली थी.

‘‘नहीं निभती तो छोड़ क्यों न दिया था उस परिवार को मां ने या पापा से अलग हो जातीं. स्वयं कमा कर हम 2 बच्चों को अच्छी परवरिश तो दे ही सकती थीं.’’

‘‘इतना आसान नहीं होता मुसकान ये सब, जितना तुम सोच रही हो,’’ ऐशा ने कहा, ‘‘तलाक लेना या अपने पति से अलग हो जाना बहुत जटिल प्रक्रिया होती है, लोग क्या कहेंगे, कहां रहूंगी, क्या मातापिता पुन: स्वीकार करेंगे? न जाने कितने सवाल होते हैं एक महिला के समक्ष, सिर्फ रुपए कमा लेना ही सबकुछ नहीं होता मुसकान. हमारी संस्कृति परिवार से इस अलगाव को मान्यता नहीं देती और वह भी एक पीढ़ी पहले?’’

‘‘और बच्चों के साथ दुर्व्यवहार, उन के साथ मारपिटाई, हर जगह उन्हें मुहरा बना कर पतिपत्नी का एकदूसरे से बदला लेना उचित है? किंतु उन बच्चों को इन सब से बचाने वाला कोई नहीं?

‘‘शायद तुम ने ऐसा माहौल न देखा हो ऐशा, किंतु मैं ने जब से होश संभाला मां की मार और ताने देखे और सहे. जब कभी वे पापा या परिवार के किसी भी सदस्य से गुस्सा होतीं, उन्हें पलट कर कुछ न कहतीं, बलि का बकरा मैं और मेरा भाई बन जाते. कभी बेलन से तो कभी चप्पल जो मां के हाथ में आता, हम पिट जाते. मां अपने ससुराल वालों से जुड़े सब ताने हमें देतीं,’’ जैसे औलाद किस की हो तुम, बड़ा ही जिद्दी परिवार है, तो तू कैसे सुधरी रह सकती है, घर का असर तो आएगा ही न. बाप पर गया है, उस ने किसी की सुनी जो तू सुनेगा.’’

‘‘मैं कहती हूं बच्चे अपने मांबाप पर न जाएं तो और किस पर जाएंगे, आसपास के वातावरण और जींस का असर तो आएगा ही न उन पर, पर इस में बच्चों का दोष क्या है?’’

‘‘क्यों नहीं स्वीकार पाते ये अपने ही बच्चों को? क्यों ढूंढ़ लेना चाहते हैं हम ही में सारी खूबियां, जबकि उन्होंने कभी घर का वातावरण और आपसी व्यवहार अच्छा रखने की कोशिश ही न की हो,’’ मुसकान के चेहरे पर न जाने कितने प्रश्न चिह्न अंकित हो गए थे.

‘‘ऐसा थोड़े न होता है मुसकान. हर इंसान खुश ही रहना चाहता है, कौन जानबू  झ कर अपने घर में आग लगाएगा भला? पर कई बार परिस्थितियां ऐसी होती हैं कि हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते. तुम्हारी मां का हाल भी ऐसा ही रहा होगा, क्या करतीं बेचारी? पूरे परिवार से कैसे सामना करतीं, जबकि तुम्हारे पापा का कोई सहयोग न था.

मैं मानती हूं तुम्हारी बात सही है, क्या करती बेचारी वह? पर क्या हम दोनों बच्चों के  साथ बुरा व्यवहार कर के समस्या हल हो गयी?

‘‘वे पढ़ीलिखी थी इतना तो सोचना चाहिए था कि वे हमें क्या जिंदगी दे रही हैं? हम तो उन्हें प्यार करते थे, था ही कौन हमारा उन के सिवा इस दुनिया में.

‘‘एक बार तो मां को चाचा ने कुछ भलाबुरा कहा और बाहर चले गए, मां ने पापा को सब बताया तो पापा ने भी कह दिया कि मैं तंग आ गया हूं रोजरोज की शिकायतों से. तुम या तो साथ रह लो या मेरे घर से निकल जाओ. मां ने मेरे भाई को उस दिन खूब मारा, उस के हाथ में स्टिक थी और भाई डाइनिंग टेबल के चारों ओर डर के मारे चक्कर लगा रहा था. मां की गुस्से में भरी सूरत, मैं शायद 6 वर्ष की थी उस वक्त. मैं डर के मारे चीख रही थी. बस इसी तरह बड़े हुए हम.

‘‘मगर उस समय क्या तुम तीनों घर में अकेले थे? तुम्हारे दादादादी कहा थे मुस्कान?’’

‘‘सब वहीं थे, लेकिन किसी को हम से मतलब नहीं था. मां पर उन सब का दबाव तो था ही ऊपर से पिताजी का भी और किसी पर मां का बस तो चलता नहीं था सो ले दे कर सभी का गुस्सा हम पर उतार देतीं. भाई को पिटते देख कर मैं सहम जाती. जब कभी मां मु  झे कुछ जोर से बोलतीं, मैं उन के सामने हाथ जोड़ लेती ताकि किसी भी तरह से पिटाई से बच सकूं.

‘‘फिर भी मां को हम पर तरस न आता. मु  झे हाथ जोड़े देख कर और जोर से चीखतीं और कहतीं क्यों जोड़ती है हाथ, यह दुनिया तु  झे भी नहीं छोड़ने वाली, सारी जिंदगी हाथ ही जोड़ने पड़ेंगे सब के आगे.’’

‘‘फिर कभी प्यार नहीं करती थी तुम्हारी मां?’’ ऐशा ने उस की आंखों में   झांक कर पूछा.

‘‘जब मारपीट लेतीं, गुस्सा शांत होता तो आइस क्यूब ले कर मेरे चेहरे व पीठ पर उन की मार से पड़े निशानों पर लगातीं और खूब रोतीं. मु  झे सौरी भी बोलतीं, किंतु फिर जब कभी गुस्सा आता, वही सब करतीं,’’ मुसकान की आंखें भर आई थीं. उन के चेहरे की उदासी उन के गुलाबी होंठों को बदरंग कर रही थी.

‘‘इस का मतलब वह तुम्हें प्यार तो करती थी तभी तो स्वयं भी रोती थी, किंतु वह भी तो इंसान है जिसे इंसान सम  झा ही नहीं गया तो उस से इंसानियत की उम्मीद भी क्यों?’’

‘‘हो सकता है तुम सही हो, किंतु वह अपने अंदर की कुढ़न को रोक न पातीं और आग में सुलगती अपने होश खो बैठती थीं. हमारे साथ जानवरों जैसा व्यवहार करती थीं. कारण कोई भी हो, किंतु मैं साधारण इंसान भी न बन पाई. बस मां के हुक्म की गुलाम बनी रही. हर वक्त यह डर सताता कि मां नाराज न हो जाएं वरना पीटेंगी. मैं अपने मन की कब करती? अपनी इच्छाअनिच्छा किस को बताती?’’

नथनी: भाग 3- क्या खत्म हुई जेनी की सेरोगेट मदर की तलाश

50 हजार रुपए के लिए दोनों मियांबीवी तमाम योजनाएं बना ही रहे थे कि तभी किसी साथी ने कमल को आवाज लगाई. कमल बाहर गया तो उस ने साथ चलने को कहा. कमल ने बिना कुछ सोचेसमझे उस के साथ जाने से मना कर दिया और साथ में यह भी साफ कर दिया कि अब वह अपने पैसों से नया धंधा शुरू करने जा रहा है.

इस बात की भनक लगते ही उस के साथियों में खलबली मच गई कि कहीं कमल उन लोगों के बारे में पुलिस को न बतला दे. वे लोग उसे धमकी दे कर चले गए. उस ने सब से पहले 40 हजार रुपए की एक जर्मन पिस्तौल खरीद डाली और 5 हजार की एक बढि़या सी सोने की नथनी.

यह बात जब उस के गैंग वालों को पता चली तो उन्होंने खतरे को भांपते हुए कमल से मिल कर यह आश्वासन लेना चाहा कि वह धंधा छोड़ दे तो कोई बात नहीं, पर उन के राज किसी और को न बताए, वरना अंजाम सभी के लिए खराब होगा. कमल राजी हो गया. चलतेचलते किसी ने पलट कर यह कह दिया, ‘‘तुझ को अपनी बीवी सलमा का वास्ता है.’’

‘‘तुम सब को मालूम है कि मैं सलमा को कितना प्यार करता हूं. मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि मैं तुम्हारे रास्ते में नहीं आऊंगा, पर यह याद रखना कि तुम भी मेरा राज कभी किसी से नहीं खोलोगे,’’ कहते हुए कमल ने खुशीखुशी सब को विदा कर दिया पर पिस्तौल तो वह खरीद ही चुका था.

सलमा ने सोचा था कि उस पैसे से वह कमल को कोई धंधा करा देगी, पर यह सब जान कर उस को एक सदमा लगा और वह चुप रह गई.

सलमा अब उस नर्सिंग होम के संरक्षण में आ चुकी थी. उस के पेट में जेनी का बच्चा आ चुका था. उस के खानेपीने व दवाओं का बढि़या इंतजाम हो गया था. एक नर्स उस की दोनों बेटियों की देखरेख के लिए भी रख दी गई थी. पर कमल नहीं बदला.

5वें महीने जेनी ने खुशी से झूमते हुए डेविड को बताया, ‘‘मैं ने सलमा के पेट में अपने बच्चे के दिल की धड़कनें सुन ली हैं. मैं बता नहीं सकती, मैं कैसा महसूस कर रही हूं.’’

यह सुन कर डेविड से भी नहीं रहा गया. उन्होंने भी उन धड़कनों को सुनने की इच्छा जाहिर कर दी.

जेनी ने सलमा से पूछा, ‘‘अगर तुम्हें एतराज न हो तो डेविड भी अपने बच्चे के दिल की धड़कनें सुन लें.’’

सलमा पसोपेश में पड़ गई कि कहीं उस के इजाजत दे देने पर कमल बुरा न मान जाए. पर जेनी और डेविड को रोतेगिड़गिड़ाते देख वह भावुक हो उठी. उसे वह दिन याद आ गया जब कमल ने भी पहली बार अपने बच्चे की धड़कनें सुनने के लिए उस के पेट पर अपने कान लगा दिए थे. काफी देर इंतजार के बाद भी जब कमल नहीं आया तो वे दोनों काफी उदास हो गए और प्रस्ताव रखा कि इस इजाजत के वे 25 हजार रुपए और देंगे. सलमा लालच की गिरफ्त में आ गई और इजाजत दे दी.

सलमा की खूबसूरती देख डेविड दंग रह गए. फिर उन्होंने जैसे ही सलमा के पेट पर कान लगाए वैसे ही वहां कमल आ पहुंचा और यह नजारा देख कर वह आगबबूला हो गया. उस के मुंह से बरबस निकल पड़ा, ‘‘तो यह राज है इतने पैसे मिलने का. जो अपने मांबाप की न हुई, आदमी की क्या होगी?’’

मारे गुस्से के कमल का हाथ भरी पिस्तौल तक पहुंच गया और उस ने एक गोली डेविड पर दाग दी. डेविड को गिरते देख, कमल भाग लिया. गोली की आवाज सुन कर बगल के कमरे में बैठी नर्स कमरे की तरफ दौड़ी और उन्हें संभालने की कोशिश की. नर्सिंग होम को फोन किया गया. डेविड को वहां पहुंचाया गया.

सभी की गोटियां एकदूसरे से ऐसी फंसी थीं कि कोई भी कुछ करने से पहले काफी सोचसमझ लेना चाहता था. पुलिस केस होने पर कमल फंस रहा था, जिस का सीधा असर सलमा पर पड़ता और घुमाफिरा कर उस का असर होने वाले बच्चे पर पड़ता.

जेनी को वह शर्त याद आई कि सलमा को सिर्फ जेनी ही देखेगी, डेविड नहीं. यों पुलिस रिपोर्ट में डेविड भी फंस रहे थे. नर्सिंग होम वालों को इतना पैसा मिला कि उन्होंने इलाज तो चुपचाप शुरू कर दिया था पर फिर भी घबराए हुए थे. डेविड को खतरे से बाहर बताए जाने के बाद ही सारे लोगों की सांस में सांस आई.

सारा खुशी का माहौल गमगीन और तनावपूर्ण हो चुका था. कमल के आरोप पर सलमा तड़प उठी थी. उस ने ही खामोशी तोड़ी, ‘‘मुझे आप लोगों से कोई पैसेवैसे नहीं चाहिए, मुझे मेरा आदमी वापस चाहिए. मैं तो इस के लिए तैयार ही नहीं हो रही थी,’’ कहतेकहते वह रो पड़ी.

इस पर जेनी ने डेविड की आंखों में कुछ झांका और फिर सलमा से कहा, ‘‘डेविड कमल का दर्द समझते हैं. उन के दिल में बदले की कोई भावना नहीं है. कमल को किसी भी कीमत पर वापस लाया जाएगा.’’

तभी नर्सिंग होम से एक फोन आया, ‘‘देखिए, यह मामला कहीं से लीक हो चुका है, पुलिस केस होने जा रहा है, सतर्क रहें.’’

इस बात से सामान्य होता वातावरण फिर गरम हो उठा. खैर, जेनी की आंखों में काफी संतोष दिख रहा था, शायद वह हिंदुस्तान के बारे में सबकुछ जान गई थी कि यहां पैसे से सबकुछ मुमकिन हो जाता है. लिहाजा, सलमा को धीरज बंधाया और खुद अपने डाक्टर के साथ नर्सिंग होम जा पहुंची.

क ाफी पैसे खर्च करने के बावजूद मामला रफादफा करने में कई दिन लग गए पर जेनी को इस से बड़ा धक्का तब लगा जब उसे यह पता चला कि कमल चोरी की पिस्तौल खरीदने के मामले में कहीं पकड़ा जा चुका था. यह सभी के लिए बहुत खराब खबर थी. फिर भी जेनी ने सलमा को धीरज बंधाया कि उस के पास पैसों की कोई कमी नहीं है. वह किसी भी हद तक और कितना भी पैसा खर्च करने को तैयार था.

लेदे कर वह भी मामला निबटाया गया, तब जा कर सलमा सामान्य हो पाई. कमल की जमानत की काररवाई पूरी की गई. उसे जमानत पर छुड़वा कर लाया गया पर इस दौरान उसे पुलिस वालों को अपने पुराने साथियों के नाम बताने पड़े. उस के जमीर को इस से काफी धक्का लगा था. उसे एक बार तो यह लगा जैसे वह सलमा को खोने जा रहा हो.

लाख न चाहते हुए सलमा को इस कांड का काफी सदमा लगा था पर वह और डेविड दोनों ही अच्छे इलाज की बदौलत तेजी से सुधार की ओर अग्रसर थे. इस से भी बड़ी तसल्ली की बात यह थी कि कमल ने डेविड को अपनी मनोस्थिति बताते हुए माफी मांग ली थी.

समय कितनी तेजी से बीता, पता ही नहीं चला. जेनी और डेविड को, जिस सुखद घड़ी का बेसब्री से इंतजार था, वह आ ही गई. पर सलमा के लिए यह एक बड़े दुख का सबब था, क्योंकि उसे जो सुविधाएं, डेविड ने इस दौरान मुहैया कराई थीं, सब खत्म होने जा रही थीं. कमल पर चोरी की पिस्तौल के अलावा भी 2 मुकदमे दायर हो चुके थे. वह फिर बहुत उदास रहने लगी थी. भविष्य में आने वाली मुसीबतों के बारे में सोचसोच कर वह सहम सी उठती थी. उस का दिल बैठा जाता था.

अत: तमाम मेडिकल सुविधाओं के बावजूद आखिरी दिनों में उस का ब्लडप्रेशर काफी नीचे रहने लगा. प्रसव के समय वह काफी घबराई हुई सी लगी. बच्चे को जन्म देने के 12 घंटे बाद ही उस ने दम तोड़ दिया.

जेनी और डेविड जो एक तरफ बेहद खुश थे, दूसरी तरफ सलमा की मौत से इतने दुखी हुए कि अपने आंसुओं को रोक नहीं पाए, बरबस रो पड़े. उन का मन था कि बच्चे की पहले 1 माह की परवरिश के लिए उसे सलमा के साथ ही रहने दिया जाता, पर नर्स ने उन्हें यह कह कर तसल्ली दिलानी चाही कि फिर मोह के कारण सलमा से उसे छुड़ाना अधिक दुखद हो जाता.

नर्सिंग होम से कमल जब सलमा का निष्प्राण शरीर ले कर निकला तो उस के परिवार के अलावा सलमा के परिवार के लोग भी आ चुके थे. पिता के कहने पर लाश को कमल अपने पिता के घर ले गया. इस दुखद और अकाल मौत पर जो सुनता दौड़ पड़ता. अंतिम संस्कार के लिए श्मशान तक जाने वाली विकराल भीड़ में जेनी और डेविड सब से आगे थे. कमल की छोटी बेटी तो नर्सिंग होम में नर्स के ही पास थी. बड़ी बेटी को कमल अपने सीने से चिपकाए दहाड़ें मारमार कर रोए जा रहा था.

जिन धर्म के ठेकेदारों ने इन की शादी के चक्कर में पड़ना उचित नहीं समझा था वे इस भीड़ को कैश कराने की गरज से वहां पहुंच चुके थे. सलमा की लाश पर राजनीति शुरू कर दी कि वह मुसलमान थी, इसलिए दफनाया जाना चाहिए. विरोधियों का कहना था कि वह हिंदू से शादी कर के हिंदू हो चुकी थी इसलिए जलाया जाना चाहिए. एक मत और उभर रहा था कि ईसाई बच्चे को जन्म देने के कारण उस को ईसाइयों के रीतिरिवाज से दफनाया जाए.

आखिरी फैसला यह हुआ कि हिंदू रीति ही अपनाई जाए. इस फैसले पर हिंदू पंडों की बाछें खिल उठीं. भीड़ देख कर उन के भाव बढ़ गए. मुखाग्नि के वक्त बोले, ‘‘बिना स्वर्ण दान के आत्मा नहीं तरती है.’’ कमल ने वह नथनी जो सलमा को देने के लिए बहुत संभाल कर रखी हुई थी, आखिरकार उसे दे दी.

बौयफ्रैंड को बेटा सौंपना

मुंबई में एक 42 साल की मां को गिरफ्तार किया गया है क्योंकि उस के 13 वर्ष के बेटे ने शिकायत की कि उस की मां और उन का बौयफ्रैंड उसे सैक्सुअली एब्यूज करते थे और इस दौरान उसे बुरी तरह टौर्चर भी कर रहे थे. मां अपने पति से अलग रह रही थी और लड़के का पिता मुंबई से पूना चला गया. बेटे की शिकायत पर वह मुंबई आया और पुलिस से कंपलेंट की.

इस कहानी में बहुत से पेंच लगते हैं पर सैक्स के उन्माद में क्या नहीं हो सकता, यह भी जानकार जानते हैं. बौयफ्रैंड को खुश करने के लिए 42 वर्षीया औरत, जिस का पति छोड़ गया हो, अगर बेटे को बौयफ्रैंड के हवाले कर दे तो कोई बड़ी बात नहीं. 13 साल का कोई बेटा सिर्फ बहकावे में आ कर मां की शिकायत करे, यह कम संभव है. वह मां के बौयफ्रैंड की तो ईर्ष्या में शिकायत कर सकता है पर फिर भी मां को बचाने की ही कोशिश करेगा.

मां का बेटोंबेटियों को बलिदान कर देने की कहानियां कम नहीं हैं. सैक्स बाजार में आमतौर पर औरतें नशे, सैक्स, पैसे की कमी, कर्ज, बीमारी आदि से इस कदर परेशान हो जाती हैं कि वे बेटियों को उसी बाजार में धकेल देती हैं और बेटों को भी अनैतिक काम करनेकरवाने को प्रेरित करती हैं.

मुंबई पुलिस का कहना है कि मुंबई में हर रोज औसतन 3 लड़कों की शिकायत आती है कि उन के साथ सैक्सुअल एब्यूज हुआ और करने वाला निकट संबंधी या परिचित ही था. इन मामलों में मांएं आमतौर पर चुप रह जाती हैं क्योंकि वे सिर्फ बेटे की खातिर घर का बैलेंस बिगड़ने से डरती हैं. वैसे भी, हमारे यहां औरतों की सुनता कौन है.

मां को आज अपने बचाव की चिंता ज्यादा होने लगी है क्योंकि अगर पति या बौयफ्रैंड छोड़ गया तो उस के पास कोई ढंग का सहारा नहीं होता. मुंबई जैसे शहर में हजारों युवतियां मांबाप को सैकड़ों मील दूर गांवकसबेशहर में छोड़ कर आती हैं. उन्हें जो भी सहारा मिलता है, उस पर चाहे जितनी ग्रीस लगी हो, चाहे जितने कांटे हों, उसे पकड़े रहना चाहती हैं और अनचाहे पैदा हुए बच्चों को बलिदान करने से कतराती नही हैं.

यह अफसोस की बात है कि ऐसे मामलों में जानकारी सतही ही रहती है. ये औरतें खुल कर सामने नहीं आतीं और इन के मन में क्या होता है, यह कम ही पता चलता है. सामाजिक व धार्मिक दबाव कितना होता है, यह आम लोगों को पता ही नहीं चलता.

चिल्ली पनीर रेसिपी

सामग्री:-

– पनीर (250 ग्राम)

– प्याज (1 कटा हुआ )

– हरा मिर्च  (4 काट ले)

– शिमला मिर्च (1 काट ले)

– हरा प्याज (2 काट ले )

– अदरक लहसुन (बारीक़ कटी हुई)

– अदरक लहसुन पेस्ट (2 टेबलस्पून)

– मैदा(50 ग्राम)

– मक्का का आटा (2 चम्मच)

– मिर्च सौस (1 चम्मच)

–  टोमैटो सौस (1 चम्मच)

– सोया सौस (1 चम्मच)

– काली मिर्च पाउडर (1/2 चम्मच)

– तेल (आवश्यकतानुसार)

– नमक(स्वादानुसार)

– हल्दी

– गरम मशाल/सब्जी मसाला(पर्याप्त मात्रा में)

बनाने की विधि :-

– सबसे पहले एक कटोरे में मैदा, मक्के का आटा, मिर्च और नमक डालकर उसमे थोड़ा सा पानी डालकर उसे मिलाये.

– फिर पनीर को उसमे डाल दें.

– पनीर को उस उसमे जाने के बाद पनीर वो इसके जैसा गढ़ा दिखाना चाहिए.

– अब गैस पे पैन रखे और उसमे तेल गरम होने के लिए डाल दें.

– तेल गरम होने के बाद चम्मच के सहारे पनीर को डाल दें और जो भी पनीर को छानने के लिए दाल दें.

– और हो भी ग्रेवी बच उसे कटोरे में ही छोड़ दें (उसे हम लास्ट में इस्तेमाल कर लेंगे)

– अब इसे माध्यम आंच पे छान लें.

– फिर उसी तेल में अदरक लहसुन बारीक़, प्याज, मिर्च, और शिमला मिर्च को डाल के भुनें.

– थोड़ी देर भुनने के बाद उसमे सोया सौस, टोमेटो सौस, ग्रीन चिल्ली सौस,मिर्ची पाउडर, अदरक लहसुन   पेस्ट डाल दें और भुनें.

– थोड़ी देर भुनने के बाद उसमे थोड़ा सा पानी डाले और वो जो पनीर का ग्रेवी बचा था उसे डाल दे और   थोड़ी  देर पकाये.

– फिर उसमे पनीर डाल दें और फिर उसे थोड़ी डेडर के लिए पकाये.

– फिर गैस को बंद कर दे और और ऊपर से थोड़ा सा वो हरा प्याज डाल दे.

– और अब आपकी पनीर चिली तैयार है इसे किसी करोडे में निकल ले और उसे गरमा -गरम परोसें.

 

होमकेयर टिप्स: गुलाब के फूलों की ऐसे करें देखभाल

गुलाब के फूलों से आपके घर की खूबसूरती में चार चांद लग जाती है. जी हां ये फूल आपके घर की खूबसूरती को  बढ़ाते है.

गुलाब के फूल का इस्तेमाल आप कई सारे कामों में करती हैं. जैसे- घर सजाने में, खुशबू के लिए आदि कामों में. ऐसे में आपको इस पौधें की केयर भी उसी तरह करनी चाहिए जैसे आप इनका इस्तेमाल करती हैं,  आइए बताते हैं, आप कैसे इनका देखभाल कर सकती हैं.

1.गुलाब के पौधे बहुत ही नाजुक होते हैं. उन्हें सबसे ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है. अगर आपके घर में गुलाब के पौधे के पास गंदगी या सूखी पत्तियां हो, तो उसे वहां से हटा दें इससे गुलाब के पौधें को संक्रमण सबसे ज्यादा लगता है.

2.गुलाब के पौधे को गमले में लगाएं जिससे आप उसे घर के अंदर रख सकें. आप चाहें तो घर के अंदर भी इनडोर गार्डनिंग कर सकते हैं और वैसे आजकल इंडोर प्लांट्स का फैशन अधिक है.

3. गमले में पौधा लगाते समय ध्यान दें कि पानी की निकासी का उचित प्रबंध होना चाहिए. गमले के छेद से अतिरिक्त पानी का बाहर निकलना जरूरी है.

4. गुलाब को कभी भी ओस में खुला न छोडें और सर्द हवाओं से इनका बचाव करें. सर्दियों के दिन में रात के वक्त ठंडी हवाएं चलने पर गुलाब के पौधे को किसी पौलीथीन के थैले से ढक दें. जिससे गुलाब को बचया जा सके.

60 सेकेंड के इस एक्सरसाइज से कम करिए पेट की चर्बी

पेट पर आई चर्बी को कम करना बेहद मुश्किल काम होता है. ज्यादातर लोगों के पेट से ही मोटापे की शुरुआत होती है. पर लाख कोशिशों के बाद भी ये चर्बी कम नहीं होती. इस खबर में हम आपको एक ऐसी एक्सर्साइज बताएंगे जिससे आप आसानी से पेट की चर्बी कम कर सकेंगी. इसका नाम है प्लैंक.

कैलोरी बर्न करने के लिए एक कामगर एक्सरसाइज है प्लैंक. आपको बता दें कि इसे करने में शरीर की बहुत सी मांसपेशियां एक साथ एक्टिव हो जाती हैं, इसका असर पुरे शरीर पर होता है. देखने में बेहद आसान सा दिखने वाला ये एक्सरसाइज करने में काफी मुश्किल होता है. इसे करने के लिए सबसे अधिक जरूरी होता है कि आप संतुलन ना छोड़ें. जितना ज्यादा समय आप खुद को प्लैंक के पोजिशन में रख सकेंगी आपकी सेहत के लिए अच्छा होगा. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर आप 60 सेकेंड तक प्लैंक 3 बार करते हैं तो इससे बेली फैट कम करने में मदद मिलती है.

एक्सपर्ट्स की माने तो 60 सेकेंड तक प्लैंक होल्ड करना सेहत के लिए काफी असरदार होता है. शुरुआत में आपके लिए 60 सेकेंड तक प्लैंक करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है लेकिन धीरे-धीरे अभ्यास के साथ आप इस एक्सरसाइज को कर सकेंगे.

प्लैंक को करते वक्त ये ध्यान दें कि आपकी पोजिशन सही रहे. आपका शरीर बिल्कुल सीधा होना चाहिए. अगर आपके पोजिशन में अंतर है तो इसका असर नहीं होगा.

अब बनाइये अपने लिपिस्टि‍क को लौंग लास्टिंग

लिपिस्‍टिक लगाना भी अपने आप में एक कला है. लिपिस्टिक को होठों पर लगाना कोई कठिन कार्य नहीं है, पर इसे लगाते समय कई तरह की सावधानियां बरतने की जरूरत होती है, साथ ही इसके लिए थोड़ी खास तैयारी भी करनी पड़ती है. होठों को खूबसूरत और आकर्षक दिखाने के लिए जरूरत है कि हमारे होठ फटे न हो और साथ ही जिस लिपिस्टिक को हम इस्तेमाल कर रहें हैं, वह किसी अच्छी कंपनी का हो. ध्यान रखें कि लोकल लिपिस्टिक का इस्तेमाल करने से बचें, क्योंकि इसमें इस्तेमाल होने वाले सस्ते कैमिकल आपके होठों की शोभा को बिगाड़ सकते हैं.

beauty

कई बार ऐसा होता है कि हम किसी पार्टी में जाने के लिए घर से अच्छे से तैयार होकर और होठों पर एक अच्छी सी लिपिस्टिक लगाकर निकलते हैं पर पार्टी में पहुंचते पहुंचते यह हल्की हो जाती है.

अगर आप के साथ भी ऐसा ही होता हो तो अब आपको फिक्र करने की जरूरत नहीं है क्योंकि हम यहां कुछ ऐसे टिप्स आपको दे रहे हैं, जिन्हें अपनाकर आप लिपिस्टिक को लंबे समय तक के लिए अपने होठों पर लगाकर रख सकती हैं.

सबसे पहले आपको इस बात के लिए सुनिश्चित होना होगा कि आपके होठ पर कोई मृत त्वचा तो नहीं है. अगर ऐसा है तो इसे हटाने के लिए किसी अच्छे प्रोडक्ट का इस्तेमाल कर पहले होठों पर स्क्रब करें. अब इसके बाद ऐसे लिप बाम का इस्तेमाल करें जिसमें तैल न हो.

beauty

लिपिस्टिक लगाने से पहले अपने होठों के ऊपर थोड़ा सा क्लिंजर लगा कर साफ करें और बाद में फाउंडेशन का प्रयोग करें. ये आपके लिपिस्टिक के सही रंग को निखारने में मदद करती है.

सीधा लिपिस्टिक का उपयोग करने के बजाय इसे लगाने के लिए हमेशा एक ब्रश का इस्तेमाल करें.

अगर आप किसी बोल्ड या गहरे रंग का लिपिस्टिक इस्तेमाल करना चाहती हैं, तो कंसीलर की मदद से अपने होठों पर आउटलाइन करें. ऐसा करने से आपके लिपिस्टिक का रंग बाहर की तरफ नहीं फैलेगा.

लिप लाइनर का भी इस्तेमाल करें. यह लिपिस्टिक की अपेक्षा थोड़ा ड्राय होता है, जो लंबे समय तक आपकी लिपिस्टिक को बनाये रखने में मदद करता है.

beauty

अब इन लाइन्स के अंदर लिपिस्टिक को लगाएं. लिपिस्टिक लगाने के बाद एक टिश्यु लेकर इसे अपने होठों के ऊपर रखें और इसके ऊपर कोई मेकअप पाउडर लगा लें. ये तरीका अक्सर फैशन शो में मौडल्स अपनाया करती हैं. ये तरीका आपके लिपिस्टिक के रंग को लंबे समय के लिए सेट करता है.

अब इसके ऊपर थोड़ा और लिपिस्टिक लगा लें. इसके बाद कोई अच्छा सा लिप-ग्लौस लगाएं और इसे फिनिशिंग टच दें.

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