अब बनाइये अपने लिपिस्टि‍क को लौंग लास्टिंग

लिपिस्‍टिक लगाना भी अपने आप में एक कला है. लिपिस्टिक को होठों पर लगाना कोई कठिन कार्य नहीं है, पर इसे लगाते समय कई तरह की सावधानियां बरतने की जरूरत होती है, साथ ही इसके लिए थोड़ी खास तैयारी भी करनी पड़ती है. होठों को खूबसूरत और आकर्षक दिखाने के लिए जरूरत है कि हमारे होठ फटे न हो और साथ ही जिस लिपिस्टिक को हम इस्तेमाल कर रहें हैं, वह किसी अच्छी कंपनी का हो. ध्यान रखें कि लोकल लिपिस्टिक का इस्तेमाल करने से बचें, क्योंकि इसमें इस्तेमाल होने वाले सस्ते कैमिकल आपके होठों की शोभा को बिगाड़ सकते हैं.

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कई बार ऐसा होता है कि हम किसी पार्टी में जाने के लिए घर से अच्छे से तैयार होकर और होठों पर एक अच्छी सी लिपिस्टिक लगाकर निकलते हैं पर पार्टी में पहुंचते पहुंचते यह हल्की हो जाती है.

अगर आप के साथ भी ऐसा ही होता हो तो अब आपको फिक्र करने की जरूरत नहीं है क्योंकि हम यहां कुछ ऐसे टिप्स आपको दे रहे हैं, जिन्हें अपनाकर आप लिपिस्टिक को लंबे समय तक के लिए अपने होठों पर लगाकर रख सकती हैं.

सबसे पहले आपको इस बात के लिए सुनिश्चित होना होगा कि आपके होठ पर कोई मृत त्वचा तो नहीं है. अगर ऐसा है तो इसे हटाने के लिए किसी अच्छे प्रोडक्ट का इस्तेमाल कर पहले होठों पर स्क्रब करें. अब इसके बाद ऐसे लिप बाम का इस्तेमाल करें जिसमें तैल न हो.

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लिपिस्टिक लगाने से पहले अपने होठों के ऊपर थोड़ा सा क्लिंजर लगा कर साफ करें और बाद में फाउंडेशन का प्रयोग करें. ये आपके लिपिस्टिक के सही रंग को निखारने में मदद करती है.

सीधा लिपिस्टिक का उपयोग करने के बजाय इसे लगाने के लिए हमेशा एक ब्रश का इस्तेमाल करें.

अगर आप किसी बोल्ड या गहरे रंग का लिपिस्टिक इस्तेमाल करना चाहती हैं, तो कंसीलर की मदद से अपने होठों पर आउटलाइन करें. ऐसा करने से आपके लिपिस्टिक का रंग बाहर की तरफ नहीं फैलेगा.

लिप लाइनर का भी इस्तेमाल करें. यह लिपिस्टिक की अपेक्षा थोड़ा ड्राय होता है, जो लंबे समय तक आपकी लिपिस्टिक को बनाये रखने में मदद करता है.

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अब इन लाइन्स के अंदर लिपिस्टिक को लगाएं. लिपिस्टिक लगाने के बाद एक टिश्यु लेकर इसे अपने होठों के ऊपर रखें और इसके ऊपर कोई मेकअप पाउडर लगा लें. ये तरीका अक्सर फैशन शो में मौडल्स अपनाया करती हैं. ये तरीका आपके लिपिस्टिक के रंग को लंबे समय के लिए सेट करता है.

अब इसके ऊपर थोड़ा और लिपिस्टिक लगा लें. इसके बाद कोई अच्छा सा लिप-ग्लौस लगाएं और इसे फिनिशिंग टच दें.

तपस्या: अचानक क्यों हुई थी मंजरी से समीर की शादी

सागर विश्वविद्यालय का एम.ए. फाइनल का आखिरी परचा दे कर मंजरी हाल से बाहर आई. वह यह परीक्षा प्राइवेट छात्रा के रूप में दे रही थी. 6 महीने पहले एक दुर्घटना में उस के मातापिता का देहांत हो गया था और उस के बाद वह अपने चाचा के यहां रहने लगी थी. हाल से बाहर आते ही उसे अपनी पुरानी सहेली सीमा दिखाई दी. दोनों बड़े प्यार से मिलीं.

‘‘मंजरी, आज कितना हलका लग रहा है. है न? तेरे परचे कैसे हुए?’’

‘‘अच्छे हुए, तेरे कैसे हुए?’’

‘‘पास तो खैर हो जाऊंगी. तेरे जैसी होशियार तो हूं नहीं कि प्रथम श्रेणी की उम्मीद करूं. चल, मंजरी, छात्रावास में चल कर जी भर कर बातें करेंगे.’’

‘‘नहीं, सीमा, मुझे जल्दी जाना है. यहीं पेड़ की छांव में बैठ कर बातें करते हैं.’’

दोनों छांव में बैठ गईं.

‘‘मंजरी, तुम्हारे मातापिता की मृत्यु इतनी अकस्मात हो गई कि आज भी सच नहीं लगता. चाचाजी के यहां तू खुश तो है न?’’

मंजरी की आंखों में आंसू छलक आए. वह आंसू पोंछ कर बोली, ‘‘चाचाजी के यहां सब लोग बड़े अच्छे स्वभाव के हैं. वहां पैसे की कोई कमी नहीं है. सब ठाटबाट से आधुनिक ढंग से रहते हैं. लेकिन सीमा, मुझे वहां रहना अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘क्यों भला?’’

‘‘देखो, सीमा, मेरे पिताजी साधारण लिपिक थे और चाचाजी प्रखर बुद्धि के होने के कारण आई.ए.एस. हो गए. दोनों भाइयों की स्थिति में इतना अंतर था कि मेरे पिताजी हमेशा हीनभावना से पीडि़त रहते थे. फिर भी वह स्वाभिमानी थे. इसीलिए उन्होंने हमें चाचाजी के घर से यथासंभव दूर रखा था.

‘‘उन्हें बहुत दुख था कि बचपन में उन्होंने पढ़ाई की तरफ ध्यान नहीं दिया. अपनी यह कमी वह मेरे द्वारा पूरी करना चाहते थे. आर्थिक स्थिति कमजोर थी, फिर भी उन्होंने शुरू से ही मुझे अच्छे स्कूल में पढ़ाया. हर साल मुझे प्रथम श्रेणी में पास होते देख वह फूले नहीं समाते थे.’’

‘‘जाने दे ये दुखद बातें. चाचाजी के घर के बारे में बता.’’

‘‘चाचाजी के 2 बच्चे हैं. बड़ी लड़की रश्मि मेरी उम्र की है और वह भी एम.ए. फाइनल की परीक्षा दे रही है. छोटा कपिल कालिज में पढ़ता है. सीमा, तुझे यह सुन कर आश्चर्य होगा कि रश्मि और मैं चचेरी बहनें हैं, फिर भी हमारी शक्लसूरत एकदम मिलतीजुलती है.’’

‘‘तो इस का मतलब यह कि रश्मि बहन भी तुझ जैसी सुंदर है. है न?’’

‘‘रंग तो उस का इतना साफ नहीं, पर अच्छे कपड़ेलत्तों और आधुनिक साजशृंगार से वह काफी आकर्षक लगती है. तभी तो उस की शादी समीर जैसे लड़के से तय हुई है. आज 5 तारीख है न, 20 तारीख को दिल्ली में उन की शादी है.’’

‘‘अच्छा, यह तो बड़ी खुशी की बात है. पर यह समीर है कौन और करता क्या है?’’

‘‘समीर चाचाजी के पुराने मित्र रामसिंहजी का बेटा है. रामसिंहजी मथुरा में ऊंचे पद पर हैं. उन की 2 लड़कियां हैं और एक बेटा. लड़कियों की शादी हो चुकी है. समीर भी आई.ए.एस. है और आजकल सरगुजा में अतिरिक्त कलक्टर के पद पर कार्य कर रहा है. देखने में सुंदर, हंसमुख और स्वस्थ है.’’

‘‘तो क्या यह प्रेम विवाह है?’’

‘‘प्रेम विवाह तो नहीं कह सकते, लेकिन दोनों एकदूसरे को जानते हैं.’’

‘‘मंजरी, अपने चाचाजी से कहना कि तेरे लिए भी ऐसा ही लड़का ढूंढ़ दें.’’

‘‘हट, कैसी बातें करती है? कहां रश्मि और कहां मैं. पगली, समीर सरीखा पति पाने के लिए मांबाप का रईस होना आवश्यक है और मेरे तो मांबाप ही नहीं हैं. मैं तो शादी की बात सोच भी नहीं सकती. पास होते ही मैं नौकरी तलाश करूंगी. चाचाजी पर मैं और ज्यादा बोझ नहीं डालना चाहती.’’

रहस्यमय ढंग से हंसते हुए सीमा बोली, ‘‘अरे, तू शादी नहीं करना चाहती, तो अपने चाचाजी से मेरे लिए लड़का ढूंढ़ने के लिए कह दे.’’ दोनों हंसने लगीं.

‘‘अरे सीमा, एक बात तो तुझे बताना भूल ही गई. रसोई में चाचीजी की मदद करतेकरते मैं भी रईसी खाना, नएनए व्यंजन बनाना सीख गई हूं. अगर किसी आई.ए.एस. अधिकारी से ब्याह करने की तेरी इच्छा पूरी हो जाए तो अपने पति के साथ मेरे घर अवश्य आना, खूब बढि़या खाना खिलाऊंगी.’’

एकदूसरे से हंसीमजाक करते उन्हें आधा घंटा बीत गया. जब वे तपती धूप से परेशान होने लगीं तो जाने के लिए उठ खड़ी हुईं. मंजरी ने एक कागज पर चाचाजी का पता और अपना रोल नंबर लिख कर सीमा को दे दिया.

‘‘सीमा, परिणाम निकलते ही मुझे खबर करना.’’

‘‘जरूर…जरूर. अब कब मुलाकात होगी?’’ कह कर सीमा मंजरी के गले लगी. फिर दोनों भारी मन से एकदूसरे से विदा हुईं.

रश्मि और मंजरी के परचे अच्छे होने पर चाचाचाची खूब खुश थे.

‘‘चाचीजी, अब मैं घर का काम संभालूंगी, आप निश्चिंत हो कर बाहर का काम करिए,’’ मंजरी ने कहा.

शादी का दिन आया, लेकिन घर में कोई होहल्ला नहीं था. दोनों तरफ के मेहमानों के लिए एक अच्छे होटल में कमरे ले लिए गए थे. शादी और खानेपीने का प्रबंध भी होटल में ही था. मेहमान भी सिर्फ एक दिन के लिए आने वाले थे.

रश्मि के मातापिता मेहमानों की अगवानी के लिए सवेरे से ही होटल में थे. बराती सुबह 10 बजे पहुंच गए थे. सब का उचित स्वागतसम्मान किया गया. दोपहर 1 बजे खाना हुआ. खाने के बाद रश्मि के मातापिता थोड़ी देर के लिए आराम करने अपने कमरे में आ गए. 4 बजे फिर तैयार हो कर रिश्तेदारों और बरातियों के पास चले गए. जातेजाते रश्मि से बोल गए कि वह जल्दी मेकअप कर के वक्त पर तैयार हो जाए.

मांबाप के जाते ही रश्मि ने मंजरी को अपने पास बुलाया और बोली, ‘‘मंजरी, मैं मेकअप के लिए जा रही हूं. लेकिन यदि मुझे देर हो गई तो पिताजी को अलग से बुला कर ठीक 6 बजे यह लिफाफा दे देना, भूलना नहीं.’’

‘‘नहीं भूलूंगी. लेकिन तुम 6 बजे तक आने की कोशिश करना.’’

रश्मि हाथ में छोटा सा सूटकेस ले कर चली गई, होटल के ग्राउंड फ्लोर पर ब्यूटी पार्लर में जाने की बात कह कर.

जब शाम को 6 बज गए और रश्मि नहीं आई तो मंजरी ने चाचाजी को कमरे में बुला कर वह लिफाफा उन के हाथ में दे दिया.

‘‘चाचाजी, यह रश्मि ने दिया है.’’

‘‘अब बिटिया की कौन सी मांग है?’’ कहतेकहते उन्होंने लिफाफा खोला और अंदर का कागज निकाल कर जैसेजैसे पढ़ने लगे, उन का चेहरा क्रोध से लाल हो गया.

‘‘मूर्ख, नादान लड़की,’’ कहतकहते वह दोनों हाथों में सिर पकड़ कर बैठ गए.

‘‘चाचाजी, क्या हुआ?’’

‘‘अब मैं क्या करूं, मंजरी?’’ कह कर उन्होंने वह कागज मंजरी को दे दिया और आंखों में आए आंसू पोंछ कर उन्होंने मंजरी से कहा, ‘‘जा बेटी, अपनी चाची को जल्दी से बुला ला. मैं रामसिंहजी को फोन कर के बुलाता हूं.’’

चिट्ठी पढ़ कर मंजरी सकपका गई और झट से चाची को बुला लाई. रश्मि के पिता ने वह चिट्ठी अपनी पत्नी के हाथ में पकड़ा दी. पढ़ते ही रश्मि की मां रो पड़ीं. चिट्ठी में लिखा था :

‘‘पिताजी, मैं जानती हूं, मेरी यह चिट्ठी पढ़ कर आप और मां बहुत दुखी होंगे. लेकिन मैं माफी चाहती हूं.

‘‘मैं मानती हूं कि समीर लाखों में एक है. मुझे भी वह अच्छा लगता है, लेकिन मैं रोहित से प्यार करती हूं और जब आप यह पत्र पढ़ रहे होंगे तब तक आर्यसमाज मंदिर में मेरी उस से शादी हो चुकी होगी. आप को पहले बताती तो आप राजी न होते.

‘‘मैं यह भी जानती हूं कि शादी के दिन मेरे इस तरह एकाएक गायब हो जाने से आप की स्थिति बड़ी विचित्र हो जाएगी. लेकिन मैं दिल से मजबूर हूं. हां, मेरा एक सुझाव है, मंजरी का कद मेरे जैसा ही है और रंगरूप में तो वह मुझ से भी बेहतर है. आप समीर से उस की शादी कर दीजिए. किसी को पता तक नहीं लगेगा. मैं फिर आप से क्षमा चाहती हूं. रश्मि.’’

इतने में रामसिंहजी भी अपनी पत्नी के साथ वहां आ गए. उन्हें देख कर रश्मि के पिता ने बड़े दुखी स्वर में कहा, ‘‘मेरे दोस्त, क्या बताऊं, इस रश्मि ने तो हमें कहीं का नहीं छोड़ा,’’ और यह कह कर उन्होंने वह चिट्ठी उन्हें पकड़ा दी.

पत्र पढ़ कर समीर के माता और पिता दोनों ही हतप्रभ रह गए. फिर समीर के पिता ने मंजरी की तरफ देख कर कहा, ‘‘बेटी, तुम जरा बाहर जा कर देखो, कोई अंदर न आने पाए.’’

मंजरी बाहर चली गई. फिर कुछ देर उन लोगों में बातचीत हुई. इस के बाद रश्मि के पिता ने मंजरी को अंदर बुला कर कहा, ‘‘बेटी, हम सब की इज्जत अब तेरे हाथ में है. तू इस शादी के लिए हां कर दे तो हम लोग अभी भी बात संभाल लेंगे.’’

‘‘आप जो भी आज्ञा देंगे मैं करने को तैयार हूं,’’ मंजरी ने धीरे से कहा.

‘‘शाबाश, बेटी, तुझ से यही उम्मीद थी.’’

मंजरी ने सब के पैर छुए. सब ने राहत की सांस ले कर उसे आशीर्वाद दिया और आगे की तैयारी में लग गए.

शादी धूमधाम से हुई. किसी को कुछ पता नहीं चला. खुद समीर को भी इस हेरफेर का आभास न हुआ.

मथुरा में शानदार स्वागत आयोजन हुआ. जब सब रिश्तेदार वापस चले गए तो रामसिंहजी ने अपने पुत्र को बुला कर सब बात बता दी. सुन कर समीर ने अपने को बेहद अपमानित महसूस किया. उस के मन को गहरी ठेस लगी थी और उसे सब से अधिक अफसोस इस बात का था कि उस से संबंधित इतनी बड़ी बात हो गई और मांबाप ने कोई कदम उठाने से पहले उस से सलाह तक नहीं ली. मांबाप पर जैसे दुख का पहाड़ गिर पड़ा.

बेचारी मंजरी कमरे में ही दुबकी रहती. उसे समझ में नहीं आता था कि अब वह क्या करे. रश्मि की नादानी ने सब का जीवन अस्तव्यस्त कर दिया था. वह सोचती, रश्मि को समीर सरीखे भले लड़के के जीवन में इस तरह कड़वाहट भरने का क्या अधिकार था. मंजरी का मन सब के लिए करुणा से भर गया.

एक दिन मंजरी के सासससुर ने उसे बुला कर कहा, ‘‘मंजरी, हमारे इकलौते बेटे का जीवन सुखी करना अब तुम्हारे हाथ में है. समीर बहुत अच्छा लड़का है लेकिन उस के मन पर जो गहरा घाव हुआ है उसे भरने में समय लगेगा. तुम उस के मन का दुख समझने का प्रयास करो. हमें विश्वास है कि तुम्हारी सूझबूझ से उस का घाव जल्दी ही भर जाएगा. लेकिन तब तक तुम्हें सब्र से काम लेना होगा. किसी प्रकार की जल्दबाजी घातक सिद्ध हो सकती है.’’

‘‘आप निश्चिंत रहिए. मुझे उम्मीद है कि आप के आशीर्वाद और मार्गदर्शन से मैं सब ठीक कर लूंगी,’’ मंजरी बोली.

समीर को फिर से ड्यूटी पर जाना था. समीर के मातापिता ने सोचा, कहीं समीर सरगुजा जाते समय मंजरी को साथ ले जाने से मना न कर दे. इसलिए समीर के पिता ने लंबी छुट्टी ले ली और वह भी सरगुजा जाने के लिए सपत्नीक नवदंपती के साथ हो लिए.

जिन दिनों समीर के मातापिता सरगुजा में थे, उन दिनों मंजरी सब से पहले उठ कर नहाधो कर नाश्ते की तैयारी करती. खाना समीर की मां बनाती थीं. वह इस काम में भी अपनी सास का हाथ बंटाती. सासससुर के आग्रह से उसे सब के साथ ही नाश्ता और भोजन करना पड़ता.

एक दिन उस की सास अपने पति से बोलीं, ‘‘कुछ भी हो, लड़की सुंदर होने के साथसाथ गुणी भी है. मेरी तो यही प्रार्थना है कि जल्दी ही उसे पत्नी के योग्य सम्मान मिलने लगे.’’

‘‘मुझे तो लगता है, तुम्हारी इच्छा जल्दी ही पूरी होगी. बदलती हवा का रुख मैं महसूस कर रहा हूं,’’ मंजरी के ससुर बोले. और यही आशा ले कर उस के सासससुर वापस मथुरा चले गए.

एक रात खाने पर समीर ने मंजरी से कहा, ‘‘मैं जानता हूं, तुम्हें अकारण ही इस झंझट में फंसाया गया. मुझे इस बात का बहुत अफसोस है.’’

‘‘मैं जानती हूं, आप कैसी कठिन मानसिक यंत्रणा से गुजर रहे हैं. आप मेरी चिंता न करें. लेकिन कृपया मुझे अपना हितैषी समझें.’’

शादी के बाद दोनों में यह पहली बातचीत थी. फिर दोनों अपनेअपने कमरे में चले गए.

दूसरे दिन नाश्ते के समय मंजरी को लगा कि समीर उस से नजर चुरा कर उस की तरफ देख रहा है. वह मन ही मन खुश हुई. उसी शाम को कमलनाथ और आनंद सपत्नीक मिलने आए.

‘‘मंजरीजी, दिन में आप अकेली रहती हैं, कभीकभी हमारे यहां आ जाया कीजिए न,’’ कमलनाथजी की पत्नी निशाजी बोलीं.

‘‘जरूर आऊंगी, लेकिन कुछ दिन बाद. अभी तो मैं दिन भर उलझी रहती हूं.’’

‘‘किस में?’’ निशाजी ने पूछा. समीर ने भी आश्चर्य से उस की तरफ देखा.

‘‘यों ही, यह नमक, तेल, मिर्च का मामला अभी जम नहीं पाया. कभी तेल ज्यादा, कभी नमक ज्यादा तो कभी मिर्च ज्यादा,’’ मंजरी ने कहा.

सब लोग सुन कर हंस पड़े.

‘‘शुरूशुरू में खाना बनाते समय ऐसा ही होता है,’’ फिर आनंदजी की पत्नी रामेश्वरी ने आपबीती सुनाई.

मंजरी ने मेज पर नमकीन, मिठाई और चाय रखी. कमलनाथ कह रहे थे, ‘‘तो  समीर कल का पक्का है न? भाभीजी, कल सवेरे 7 बजे पिकनिक पर चलना है आप दोनों को. 30-40 मील की दूरी पर एक बहुत सुंदर जगह है. वहां रेस्ट हाउस भी है. सब इंतजाम हो गया है. मैं आप दोनों को लेने 7 बजे आऊंगा.’’

समीर और मंजरी ने एकदूसरे की तरफ देखा. फिर उसी क्षण समीर बोला, ‘‘ठीक है, हम लोग चलेंगे.’’

थोड़ी देर बाद जब सब चले गए तो समीर ने मंजरी से कहा, ‘‘तुम इतना अच्छा खाना बनाती हो, फिर भी सब  के सामने झूठ क्यों बोलीं?’’

‘‘आप को मेरा बनाया खाना अच्छा लगता है?’’

‘‘बहुत,’’ समीर ने कहा.

दोनों की नजरें एक क्षण के लिए एक हो गईं. फिर दोनों अपनेअपने कमरे में चले गए.

लेकिन थोड़ी ही देर बाद तेज आंधी के साथ मूसलाधार बारिश होने लगी. बिजली चली गई. समीर को खयाल आया कि मंजरी अकेली है, कहीं डर न जाए.

वह टार्च ले कर मंजरी के कमरे के सामने गया और उसे पुकारने लगा. मंजरी ने दरवाजा खोला और समीर को देख राहत की सांस ले बोली, ‘‘देखिए न, ये खिड़कियां बंद नहीं हो रही हैं. बरसात का पानी अंदर आ रहा है.’’

समीर ने टार्च उस के हाथ में दे दी और खिड़कियां बंद करने लगा. खिड़कियों के दरवाजे बाहर खुलते थे. तेज हवा के कारण वह बड़ी कठिनाई से उन्हें बंद कर सका.

‘‘तुम्हारा बिस्तर तो गीला है. सोओगी कैसे?’’

‘‘मैं गद्दा उलटा कर के सो जाऊंगी.’’

‘‘तुम्हें डर तो नहीं लगेगा?’’

मंजरी कुछ नहीं बोली. समीर ने अत्यंत मृदुल आवाज में कहा, ‘‘मंजरी.’’ और उस ने उस की तरफ बढ़ने को कदम उठाए. फिर अचानक वह मुड़ा और अपने कमरे में चला गया.

दूसरे दिन सवेरे 7 बजे दोनों नहाधो कर पिकनिक के लिए तैयार थे. इतने में कमलनाथ भी जीप ले कर आ पहुंचे. समीर उन के पास बैठा और मंजरी किनारे पर. मौसम बड़ा सुहावना था. समीर और कमलनाथ में बातें चल रही थीं. मंजरी प्रकृति का सौंदर्य देखने में मगन थी.

अब रास्ता खराब आ गया था और जीप में बैठेबैठे धक्के लगने लगे थे.

‘‘तुम इतने किनारे पर क्यों बैठी हो? इधर सरक जाओ,’’ समीर ने कहा.

लज्जा से मंजरी का चेहरा आरक्त हो उठा. उसे सरकने में संकोच करते देख समीर ने उस का हाथ अपने हाथ में ले लिया और धीरे से उसे अपने पास खींच लिया. मंजरी ने भी अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश नहीं की.

शाम 7 बजे घर लौटे तो दोनों खुश थे. पिकनिक में खूब मजा आया था. दोनों ने आ कर स्नान किया और गरमगरम चाय पीने हाल में बैठ गए. समीर बातचीत करने के लिए उत्सुक लग रहा था. ‘‘रात के खाने के लिए क्या बनाऊं?’’ मंजरी ने पूछा तो उस ने कहा, ‘‘बैठो भी, जल्दी क्या है? आमलेटब्रेड खा लेंगे.’’ फिर उस ने अचानक गंभीर हो कर कहा, ‘‘मंजरी, मुझे तुम से कुछ पूछना है.’’

‘‘पूछिए.’’

‘‘मंजरी, इस शादी से तुम सचमुच खुश हो न?’’

‘‘मैं तो बहुत खुश हूं. खुश क्यों न होऊं, जब मेरे हाथ आप जैसा रत्न लगा है.’’

खुशी से समीर का चेहरा खिल उठा, ‘‘और मेरे हाथ भी तो तुम जैसी लक्ष्मी लगी है.’’

दोनों ही आनंदविभोर हो कर एकदूसरे को देखने लगे. शंका के

सब बादल छंट चुके थे. तनाव खत्म हो गया था.

इतने में कालबेल बजी. समीर उठ कर बाहर गया.

मंजरी सोच रही थी कि अगले दिन सवेरे वह सासससुर को फोन कर के यह खुशखबरी देगी.

‘‘मंजरी…मंजरी,’’ कहते हुए खुशी से उछलता समीर अंदर आया.

‘‘इधर आओ, मंजरी, देखो, तुम्हारा एम.ए. का नतीजा आया है.’’

दौड़ कर मंजरी उस के पास गई. लेकिन समीर ने आसानी से उसे तार नहीं दिया. मंजरी को छीनाझपटी करनी पड़ी. तार खोल कर पढ़ा :

‘‘हार्दिक बधाई. योग्यता सूची में द्वितीय. चाचा.’’

खुशी से मंजरी का चेहरा चमक उठा. तिरछी नजर से उस ने पास खड़े समीर की तरफ देखा.

समीर ने आवेश में उसे अपनी ओर खींच लिया और मृदुल आवाज में कहा, ‘‘मेरी ओर से भी हार्दिक बधाई. तुम जैसी होशियार, गुणी और सुंदर पत्नी पा कर मैं भी आज योग्यता सूची में आ गया हूं, मंजरी.’’

इस सुखद वाक्य को सुनते ही मंजरी ने अपना माथा समर्पित भाव से समीर के कंधे पर रख दिया. उस की तपस्या पूरी हो गई थी.

मायूस मुसकान- भाग 1- आजिज का क्या था फैसला

‘‘मुझेअब मां की हालत देख कर दुख भी नहीं होता है. मैं स्वयं जानती हूं कि वे परेशान हैं,

तन व मन दोनों से. फिर भी न जाने क्यों मु  झे उन से मिलने, उन का हालचाल जानने की कोई इच्छा नहीं होती,’’ मुसकान आज फिर अपनी मां के बरताव को याद कर क्षुब्ध हो उठी थी. ‘‘पर फिर भी तुम्हारी मां हैं वे, उन्होंने तुम्हें पालपोस कर बड़ा किया है, तुम्हे जन्म दिया है, तुम्हारा अस्तित्व उन्हीं से है,’’ ऐशा बोली.

मैं जानती थी कि मेरी बात सुन कर तुम यही कहोगी, मैं मानती हूं मेरे मातापिता ने मु  झे जन्म दिया, मां ने मु  झे नौ माह अपनी कोख में रखा, मु  झे पालपोस कर बड़ा किया, मु  झे इस लायक बनाया कि मैं अपने पैरों पर खड़ी हो सकूं. आत्मनिर्भर बन सकें. मैं सम  झती हूं मु  झ पर उन का उपकार है कि लड़कालड़की में भेद नहीं किया, हम भाइबहिन दोनों को एकसमान पाला. कि…’’ कह कर वह चुप हो गयी थी और एकटक जमीन से अपने पैर के अंगूठे से जैसे कुछ कुरेदने की कोशिश कर रही थी.

ऐशा उसके चेहरे पर आए भावों को पढ़ने की कोशिश कर रही थी. उस के होंठ जैसे कुछ कहना चाहते हों किन्तु आंखों का इरादा हो कि चुप ही रहो.

वह अंदर ही अंदर जैसे सुलग रही थी, उस की आंखें आंसुओं से चमक उठी थीं और नथुने फूले से दिखाई पड़ रहे थे. चेहरे के भाव दर्शा रहे थे जैसे अंतस में दबे पुराने जख्म हरे हो रहे हों. वह आंखों में चमके आंसू अपने हलक में उतार रही थी.

पिछले 1 वर्ष से एक ही दफ्तर में कार्यरत उन दोनों सहेलियों ने अपार्टमेंट शेयर किया हुआ है,ऐशा ने मुसकान को इतना उदास पहले कभी नहीं देखा था.

समझ में नहीं आ रहा उस से आगे बात करूं या नहीं, ऐशा असमंजस में थी सो वह चुप ही रही. तभी मुस्कान का मोबाइल फिर से रिंग हुआ. उस ने स्क्रीन पर देखा और नजरें घुमा लीं. फोन रिंग होता ही रहा. उस ने कौल पिक नहीं की. लेकिन उस की आंखों से आंसू बह रहे थे, जिन्हें वह शायद ऐशा से छिपाने की कोशिश कर रही थी. उस की नजरें लैपटौप में गड़ी थीं, किंतु ध्यान लैपटौप स्क्रीन पर नहीं था. वह अंदर ही अंदर जैसे घुल रही थी. ऐशा चादर में आधा सा मुंह ढके उसे देखे जा रही थी.

ऐशा उठी और उस के पास गई. उस का हाथ अपने हाथों में थामा तो वह फफक कर रो पड़ी, ‘‘मैं क्या करूं, तुम ही बताओ तुम कहती हो मेरा भी मां के प्रति कुछ फर्ज होता है. मैं सभी फर्ज पूरे करना भी चाहती हूं, किंतु मेरा छत्तीस का आंकड़ा है अपनी मां से.’’

‘‘कैसी बात कर रही हो तुम मुसकान? भला ऐसे कोई बोलता है अपनी मां के लिए?’’

‘‘क्या किया मां ने मेरे लिए? मु  झे जन्म दिया, खानाकपड़ा दिया, बड़ा किया बस. उन्होंने अपना फर्ज ही तो पूरा किया.’’

‘‘और क्या कर सकते हैं मातापिता इन सब के सिवा? तुम कहना क्या चाहती हो?’’

‘‘बच्चों के लिए खानाकपड़ा, रहने को मकान ही सबकुछ नहीं होता, उन्हें प्यार भी तो चाहिए होता है. सोशल सिक्योरिटी क्या आवश्यक नहीं बच्चों के लिए?’’

‘‘पर तुम ये सब क्यों कह रही हो? ऐसा क्या हो गया?’’

‘‘हुआ, बहुत कुछ हुआ. हम 2 भाइबहिन हमेशा अपने मातापिता के प्यार को तरसते रहे. उन दोनों के आपसी   झगड़े कभी खत्म ही नहीं होते, आज तक भी नहीं. सम  झ नहीं आता, कैसी शादी थी उन की. शायद उन्होंने एकदूसरे से प्रेम तो कभी किया ही नहीं.

‘‘पापा अपने मातापिता, छोटे भाइबहिन की जिम्मेदारियों में व्यस्त रहे. मां ब्याह कर पापा के घर में तो आ गई, किंतु पापा ने उन का कोई खयाल नहीं रखा. घर में सिर्फ 24 घंटों की नौकरानी की तरह खटती रहीं.

‘‘संयुक्त परिवार था हमारा, दादादादी, चाचाबूआ, पापा, मां, मैं और मेरा बड़ा भाई. हम सभी साथ ही रहते थे. कहने को तो भरापूरा, हंसताखेलता परिवार, लेकिन सिर्फ दुनिया के सामने, वहां आपसी प्रेम और सच्ची खुशी तो कभी नजर ही नहीं आई. मैं ने अपनी मां को पापा के साथ कभी मुसकरा कर बात करते नहीं देखा. दोनों के आपसी तनातनी भरे वार्त्तालाप घर में अकसर तनाव का माहौल बनाए रखते.

‘‘मां अकसर पिताजी को हर बात आज तक भी घुमाफिरा कर बताती हैं. न जाने अपने 25 वर्ष के विवाह में भी वे पिताजी के साथ सहज व्यवहार क्यों न कर पाईं. पापा को ऐसा महसूस होता है जैसे मां उन के मांपिताजी व पूरे परिवार का मजाक बना रही हैं. न जाने कैसी कैमिस्ट्री है दोनों की आपस में. तेरा परिवार मेरे परिवार से ऊपर ही नहीं उठे अभी तक. 5 वर्ष की थी मैं तभी से मां को दादी के साथ विभिन्न रीतिरिवाजों को ढोते देखा.

‘‘दादी को सब रीतिरिवाज अपने हिसाब से करवाने होते और मां अकसर कुछ न कुछ चूक कर ही देतीं. बस फिर क्या था दादी उन्हें खूब ताने देती. बस यही सिखाया तेरी मां ने, कोई तौरतरीका तो आता नहीं, बस बांध दी हमारे गले.

‘‘मां सबकुछ सुन कर मन मसोस कर रह जाती. कभी पलट कर जवाब भी न दिया. पलटवार करती भी किस के भरोसे. पापा ने तो जैसे उन्हें मायके के खूंटे से खोला और ससुराल के खूंटे से बांध दिया.

‘‘विवाह का पवित्र बंधन पुरुष व स्त्री का आपसी रिश्ता होता है जो प्रेम की कलियों से गुंथा होता है, जिस में भरोसे की महक  होती है जो जीवन को महका देती है, किंतु उन दोनों के बीच यह रिश्ता तो आज तक बना ही नहीं. मां व पिताजी अन्य रिश्ते निभातेनिभाते अपने रिश्ते को तो जैसे कहीं पीछे ही छोड़ आए. उन्होंने शायद ही कभी एकदूसरे के मन की सुध ली हो.

‘‘मां को ससुराल में प्यार मिला ही नहीं. आज तक वे अपने मायके के प्रति प्रेम से बंधी हैं. मैं यह नहीं कहती कि उन्हें अपने मातापिता को भूल जाना चाहिए, किंतु वे पापा के परिवार को अपना न सकीं.

‘‘पापा को महसूस होता है कि जिस तरह आज भी वे अपने मायके के रिश्तेदारों के प्रेम में बंधी है, वैसे ही पापा के परिवार से क्यों नहीं मिल जाती.’’

‘‘लेकिन कोई भी संबंध एकतरफा तो नहीं हो सकता न?’’ ऐशा ने कहा.

‘‘हमारे रीतिरिवाज, परंपराएं जो जोड़ने और खुशियां बढ़ाने का एक माध्यम होती हैं, किंतु यहां तो परंपराओं ने दोनों परिवारों को कभी एक न होने दिया. पापा के परिवार ने सदा ही मां के परिवार को कमतर सम  झा व मां का बारबार अपमान किया.

‘‘दादी जबतब मां को उन के मायके का उलाहना देती रहतीं. मां कभीकभी पापा से शिकायत भी करतीं, किंतु वे कुछ कर ही न पाते. एक तरफ मां व दूसरी तरफ पापा का पूरा परिवार.

‘‘जब मैं छोटी थी शायद पांच या छ: साल की. मां मु  झे खूब मारतींपीटतीं. मु  झे सम  झ ही न आता कि मेरी गलती क्या है. बस पिट जाती, रोतीचीखती. जाती भी कहां फिर अपनी ही मां के पास ही जा कर चिपक जाती,’’ मुसकान फिर से सिसकने लगी थी.

‘‘क्यों बात का बतंगड़ बना रही हो मुसकान. ये सब बातें तो बहुत मामूली सी हैं. शायद हर घर में होती हैं. वह जमाना ऐसा ही था. लोग रीतिरिवाज, रिश्तेनाते और परंपराओं को निभाते थे. इस में तुम्हारी मां का क्या दोष? क्यों  तुम उन से किनारा कर बैठी हो?’’ ऐशा ने कड़क लहजे में कहा.

‘‘होगा जमाना ऐसा. मेरी मां तो अपना घर छोड़ आईं और पापा के परिवार से रिश्ता जोड़ा, किंतु उन्होंने मां को दिल से अपनाया भी तो नहीं, सिर्फ इस्तेमाल किया.

‘‘लेकिन मेरी मां पढ़ीलिखी थीं उस जमाने में भी. नौकरी भी करती थीं विवाहपूर्व.

नथनी: भाग 2- क्या खत्म हुई जेनी की सेरोगेट मदर की तलाश

शादी का बोझ बढ़ जाने के साथ ही घर से अलग होना कुछ ज्यादा ही महंगा पड़ा. जल्द ही एक नन्ही सी बेटी ने खर्च और बढ़ा दिया. 1-2 बार तो सलमा ने अपने बाप से पैसे मंगवा कर कमल की मदद भी की पर हालात बिगड़ने लगे तो सलमा ने अपनी पड़ोसिन रोमी से किसी काम के लिए राय मांगी तो उस ने सिलाईकढ़ाई का काम भी सिखाया और कमाई का जरिया भी बनवा दिया.

सलमा बहुत खुश थी कि अब वह गृहस्थी का बोझ संभालने में कमल की अच्छीखासी मदद कर सकेगी पर फिर भी ऐसा हो नहीं सका, क्योंकि जैसेजैसे सलमा ने आर्थिक स्थिति मजबूत करनी शुरू की कमल ने दारू पीना शुरू कर दिया.

सलमा ने जल्द ही महसूस किया कि उस ने कमल से शादी कर के बहुत बड़ी भूल कर डाली थी. जो आदमी एक मामूली सी नथनी का वादा पूरा नहीं कर सका वह जिंदगी भर का साथ कैसे निभा पाएगा. बजाय आमदनी बढ़ाने के उस ने दारू पीनी शुरू कर के एक और चिंता बढ़ा दी थी, मायके व ससुराल दोनों के रास्ते पहले ही बंद हो चुके थे.

सलमा का सहारा बनने के बजाय कमल उस पर और अधिक कमाने के लिए दबाव बनाने लगा.

जैसेजैसे कमल पर दारू का नशा तेज होने लगा, सलमा के प्यार का नशा उतरने लगा. वह अधिक से अधिक कमाई करने की होड़ में अपनी सेहत और खूबसूरती खोने लगी. कमल दिन भर इधरउधर मटरगश्ती करता, देर रात आता और सुबह फिर कुछ पैसे ले कर ठेला लगाने का बहाना कर के गायब हो जाता.

पहली बेटी एक साल की मुश्किल से हुई होगी कि एक और हो गई. मुश्किलें और बढ़ गईं. सलमा ने कमल को कई बार विश्वास में ले कर समझाना चाहा पर वह एक ही बात कहता कि वह बड़े धंधे की कोशिश में लगा हुआ है. सलमा चुप हो जाती. फल का ठेला कम ही लग पाता. जो कमाई होती वह दारू के लिए कम पड़ जाती. मकान का किराया चढ़ने लगा. सलमा परेशान रहने लगी.

एक दिन सलमा घर पर बैठी यही सब सोच रही थी कि उस की पड़ोसिन रोमी ने उसे एक अजीब खबर दे कर उस का ध्यान बंटा दिया कि अखबार में ‘सेरोगेट मदर’ की मांग हुई है.

सलमा ने पूछा, ‘‘यह क्या होती है?’’

‘‘इस में किसी मियांबीवी के बच्चे को किसी अन्य औरत को अपने पेट में पालना होता है. बच्चा होने पर उस जोड़े को वह बच्चा देना होता है, इस के एवज में काफी पैसे मिल सकते हैं.’’

सलमा ने हंस कर पूछा, ‘‘रोमी, तू इस के लिए तैयार है?’’

‘‘नहीं, यही तो गम है कि मेरे पति ने मना कर दिया है.’’

‘‘और मेरे पति मान जाएंगे?’’ सलमा ने उलाहना दिया.

‘‘देखो, यह मानने न मानने की बात नहीं है, हालात की बात है. तुम्हारे 2 बच्चे हो चुके हैं, तुम्हारी आर्थिक स्थिति खराब चल रही है. तुम्हारी उम्र भी कम है. अगर तुम तैयार हो जाओ तो वारेन्यारे हो सकते हैं. सारी मुसीबत एक झटके में ठीक हो सकती है.’’

‘‘कितने पैसे मिल सकते हैं कि वारेन्यारे हो जाएंगे?’’

‘‘मामला लाखों का है, 2-3 से बात शुरू होती है, तयतोड़ करने पर अधिक तक पहुंचा जा सकता है.’’

‘‘सच? तू मजाक तो नहीं कर रही है? किसी पराए आदमी के साथ हमबिस्तर तो नहीं होना पड़ता है?’’

‘‘कतई नहीं, ऐसा भी हो सकता है कि तुम उस आदमी को देख भी न पाओ.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘वह ऐसे कि उस जोड़े के साथ एक वकील एक डाक्टर और कुछ नर्सें भी होंगी. डाक्टर तुम्हें सिर्फ एक इंजेक्शन देगा. वकील एक एग्रीमेंट लिखाएगा. उस के बाद 9 महीने तक नर्सें और डाक्टर तुम्हारी जांच करते रहेंगे, तुम्हें अच्छी से अच्छी खुराक और दवाएं भी मिला करेंगी. कुछ रुपए एडवांस भी मिलेंगे. शेष बच्चा उन को सौंपने पर मिलेंगे. एक गोद भरने का संतोष मिलेगा वह अलग से. उस की तो कीमत ही नहीं आंकी जा सकती.’’

सलमा बेसब्री से कमल के आने का इंतजार करने लगी. वह काफी दिनों से उदास भी चल रही थी पर रोमी के इस सुझाव ने उस की आंखों में चमक सी ला दी थी. उस के मन में एक बवंडर सा उठ खड़ा हुआ था. काश, 3 लाख का भी इंतजाम हो जाए तो अपना एक घर हो जाए. कमल को कोई अच्छा सा धंधा शुरू करवा दे, बेटियों के भविष्य के लिए कुछ पैसा जमा कर दे, थोड़ा सा पैसा बाप को भेज दे, क्योंकि उन्होंने भी आड़े वक्त में साथ दिया था.

सुबह राशन लाने को कह कर कमल दिनभर गायब रहा था. देर रात जब कमल आया तो नशे में धुत. उस ने देखा कि सलमा बच्चियों को सुला चुकी थी. उस ने धीरे से दरवाजा खोला, अंदर गया, कपड़े बदले और सलमा की चादर में जा पहुंचा. कमल के हाथ जब सलमा के शरीर पर रेंगने लगे तो वह सकपका कर जाग उठी, ‘‘कमल…खाना खा लिया…’’

‘‘खा के आया हूं, इधर मुंह करो,’’ कमल ने उसे अपनी तरफ करवट लेने के लिए कहा.

‘‘कुछ राशन लाए हो क्या…’’ सलमा ने उस की ओर मुड़ते हुए सवाल दाग दिया.

कमल ने उस के सवाल का कोई जवाब न देते हुए उस की ओर से अपना मुंह दूसरी ओर कर लिया और चादर से मुंह को पूरी तरह से ढक लिया.

फिर सलमा को रात भर नींद नहीं आई. वह सारी रात अपने और अपनी बेटियों के भविष्य के बारे में सोचती रही.

सुबह सलमा ने जब कमल के लिए चाय बनाई तब वह बिस्तर से उठा. मुंहहाथ धो कर आया तो बजाय चाय पर बैठने के उस ने सलमा को बांहों में भर लिया, ‘‘मेरी प्यारी सलमा…’’

सलमा ने किसी प्रकार की कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, न ही सहमति और न विरोध.

सलमा के इस रुख से कमल आहत हुआ.

‘‘क्या बात है? बहुत गुस्से में दिखाई पड़ रही हो. कहीं मुझे छोड़ने तो नहीं जा रही हो? तुम्हारी कसम…दरिया में कूद कर जान दे दूंगा,’’ कहते हुए कमल ने चाय का कप उठा लिया.

‘‘बात बीच में मत काटना, पूरी सुन लेना तब जो कहोगे मैं मानूंगी,’’ कहते हुए सलमा ने रोमी की बात पूरी विस्तार से कमल को बताई तो उस की आंखों में चमक सी आ गई. उस ने सलमा को बांहों में भरते हुए कहा, ‘‘मेरे खयाल से इस में कोई बुराई नहीं है, बल्कि मैं एक गलत धंधे में पड़ने वाला था. अच्छा हुआ तुम ने मेरी आंखें खोल दीं. पर सुनो, तुम मेरे प्यार में कमी तो नहीं आने दोगी न?’’

‘‘तुम्हारे एक इशारे पर सबकुछ छोड़ दिया. बिना तुम को विश्वास में लिए मैं कोई काम नहीं करूंगी. यह भी तुम अच्छी तरह सोचसमझ लो. अगर मना कर दोगे तो नहीं करूंगी,’’ सलमा की आंखों में कुछ लाल डोरे से दिखाई पड़े.

बात आगे बढ़ी. न्यूजर्सी से चल कर जेनी और डेविड मय अपने वकील के हिंदुस्तान आए. कमल के साथ कई बैठकें हुईं. सारी शर्तें ठीक से समझाई गईं. रोमी उन सब में शामिल रही. तमाम शंकाओं के समाधान के बाद मामला 4 लाख पर तय हुआ. कमल व सलमा ने, समझौते पर अपने दस्तखत किए. वादे के अनुसार 50 हजार रुपए का भुगतान पहले कर दिया गया.

सलमा को केवल जेनी ने ही देखा, डेविड ने नहीं. 3  लाख 50 हजार बाद में देने का करार हुआ. यह 9 महीने के दौरान चेकअप, दवाओं व खुराक के खर्च के अलावा था. शहर के एक बड़े नर्सिंग होम पर यह जिम्मा छोड़ा गया कि वह एक फोन पर सेवाएं मुहैया कराया करेगा. 1 महीने बाद आने को कह कर डेविड और जेनी अमेरिका चले गए.

तोहफा: भाग 1- रजत ने सुनयना के साथ कौन-सा खेल खेला

जब सुनयना 5 वर्ष की थी तभी उसे पता लग गया था कि वह बहुत सुंदर है. जब भी वह अपने मातापिता के साथ कहीं जाती, तो लोग उस के रंगरूप की तारीफ करते जैसे, ‘मोहन आप की बेटी कितनी प्यारी है. जब इस उम्र में ही इतनी सुंदर है तो आगे चल कर गजब ढाएगी.’

ऐसी बातें सुन कर उस के मातापिता की छाती गर्व से चौड़ी हो जाती. वे अपनी बेटी को बहुत ज्यादा लाड़प्यार देते और उस के नाजनखरे उठाने को तैयार रहते. सुनयना बातबात पर ठुनकती, मचलती. वह जान गई थी कि उस का रूप एक ऐसा औजार है जिस के जरीए वह जिस से जो चाहे करा ले. उस की एक मुसकान पर लोग निहाल हो जाते हैं और उस के माथे पर आई शिकन से उन के होश फाख्ता हो जाते हैं.

स्कूल में भी लड़के उस के आगेपीछे डोलते. कोई उस के लिए नोट्स कौपी कर रहा होता, तो कोई उस का स्कूल बैग लादे फिर रहा होता और कोई उसे अपना टिफिन खिला रहा होता. उस के ऐसे बहुत से दिलफेंक आशिक थे, जो उस की एक झलक के लिए लालायित रहते और उसे देख कर आहें भरते. सुनयना यह जान कर मन ही मन इतराती.

उस के मातापिता चौकन्ने हो गए थे. उन्होंने उस पर पहरा बैठा दिया था. उन के घर में काम करने वाली एक बूढ़ी औरत हमेशा उस के साथ कालेज भेजी जाती, जो उस की जासूसी कर के उस की हर एक गतिविधि की खबर उस के मांबाप को देती.

कालेज में जल्दी ही उस की कुछ अंतरंग सहेलियां बन गईं. सब की सब चुलबुली और नटखट थीं. उन के गुट को लोग चांडाल चौकड़ी के नाम से पुकारते. उन्हें जब पढ़ाई से फुरसत मिलती तो वे बैठ कर सोचतीं कि आज किसे बुद्धू बनाया जाए. इस खेल में उन सब को बड़ा आनंद आता था. कभी वे आवाज बदल कर किसी लड़के को फोन करतीं. उसे किसी होटल या पार्क में आ कर मिलने का निमंत्रण देतीं. और जब लड़का उस जगह पर पहुंच कर बेवकूफों की तरह इधरउधर ताकता और पलपल अधीर होता, तो वे छिप कर देखतीं और हंसी से लोटपोट होतीं. कभी वे सिनेमा का एक ऐक्स्ट्रा टिकट खरीद कर किसी बुद्धू लड़के को पकड़ाती और कहतीं ‘‘यह टिकट फालतू है. आप चाहें तो ले सकते हैं.’’

और जब वह लड़का उन की बातों में आ कर टिकट ले कर ले कर उन के पास आ बैठता तो वे सब उस से चुहल करतीं.

एक दिन कालेज में एक सुंदर नौजवान आया. उसे देखते ही कालेज में एक हलचल मच गई. लड़कियों में उत्तेजना की एक लहर दौड़ गई. वे अपने क्लासरूम से निकल कर उस की एक झलक पाने को उतावली हो उठीं. उन सब में उस लड़के से पहचान बनाने की होड़ सी लग गई. सुनयना भी उस पर फिदा हो गई.

उस का नाम रजत था. वह शहर के मशहूर उद्योगपति दिवाकर लाल का बेटा था और उस ने इस कालेज में ऐडमिशन लिया था. वह अपनी हाईफाई कार से कालेज आता. बढि़या से बढि़या डिजाइनर कपडे़ पहनता. लेकिन पढ़ाई के नाम पर मस्ती करता. अधिकांश समय वह क्लास कट कर के कैंटीन में अपने यारदोस्तों से घिरा बैठा रहता और आनेजाने वाली लड़कियों पर फबती कसता. लेकिन लड़कियां उस की दीवानी थीं.

सुनयना ने नाकभौं सिकोड़ कर सब को सुना कर यह कहा कि उसे रजत में कोई दिलचस्पी नहीं, लेकिन मन ही मन वह यह सोच कर जरा असहज हुई कि उस के रूप का जादू रजत पर अभी तक क्यों नहीं चल पाया था? पर वह किसी भी हालत में पहल करने को तैयार न थी. अगर रजत पैसे की घमंड से भरा था तो वह भी अपने रूप के मद में चूर थी.

एक दिन कालेज में एक फैशन शो का आयोजन किया गया, जिस में  सुनयना और उस की सखियों ने भी भाग लिया. सुनयना ने सब से आखिर में स्टेज पर प्रवेश किया. उस ने एक भड़कीली जरदोजी के काम वाली घाघराचोली पहन रखी थी और उस के माथे पर मांगटीका सजा था, जो उस की खूबसूरती में चार चांद लगा रहा था.

उसे देख लोग सीटी बजाने लगे. सारा हौल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. उस ने स्टेज पर बलखाती चाल चलते हुए कनखियों से नोट किया कि दर्शकों की पहली कतार में रजत अपने दोस्तों से घिरा बैठा था और उस की ओर एकटक देख रहा था. सुनयना का दिल जोर से धड़क उठा. अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे उस ने मन ही मन मुसकरा कर सोचा.

कार्यक्रम समाप्त हुआ और जैसे ही सुनयना कपड़े बदल कर ग्रीनरूम से बाहर निकली तो देखा कि बाहर रजत खड़ा था.

‘‘कौंग्रैट्स,’’ उस ने बड़ी आत्मीयता से कहा, ‘‘आप तो कमाल की मौडलिंग करती हैं. मेरे पिता हमारे मिल की बनी साडि़यों की लिए आप के साथ अनुबंध करना चाहते हैं. मैं ने उन से बात की है. आप को मुंहमांगे पैसे मिलेंगे.’’

इस तरह उन की दोस्ती की शुरुआत हुई. सुनयना रजत के रईसी ठाठ से प्रभावित हुई, तो उस के आकर्षक व्यक्तित्व ओर भी खिंचती चली गई. सुनयना उस के साथ बड़ीबड़ी गाडि़यों में सफर करने लगी और फाइव स्टार होटलों में खाने लगी. हर दिन एक नया प्रोग्राम बनता. कभी मड आइलैंड की सैर कर रहे हैं तो कभी गोवा घूमने या जुहू बीच में तैरने जा रहे हैं. हर शनिवार को किसी डिस्को में उन की शाम गुजरती.

दिन पर दिन बीतते गए. एक दिन उस ने पाया कि एकएक कर के उस की सब सहेलियों की शादी हो चुकी है. वह अकेली बची है, जो अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी है और समय काटने के लिए नौकरी करने के लिए बाध्य है. थोड़े दिनों बाद उस ने नरीमन प्वाइंट में एक होटल में नौकरी कर ली और उस के मातापिता दिनरात उस से शादी के लिए तकाजा कर रहे थे.

‘‘ऐसे कितने दिन चलेगा बिट्टो?’’ उस की मां चिंतित हो कर कहतीं, ‘‘तू 25 साल पार कर चुकी है. कब तक इस रजत के भरोसे बैठी रहेगी? माना कि वह बहुत अच्छा लड़का है. उस से अच्छा रिश्ता हम तेरे लिए ढूंढ़ ही नहीं सकते. पर बेटी क्या तू ने कभी उस का दिल टटोलने की कोशिश की है? उस के मन में क्या है यह कौन जाने? इन रईसजादों का क्या ठिकाना. तुझ से शादी भी करेगा या यों ही अटकाए रखेगा? तेरी उम्र ज्यादा हो जाएगी तो ढंग का लड़का मिलना मुश्किल हो जाएगा. फिर तू न इधर की रहेगी न उधर की.’’

‘‘हम तेरे भले के लिए ही कहते हैं,’’ उस के पिता ने समझाया, ‘‘रजत से मिल कर किसी नतीजे पर आना तेरे लिए बहुत जरूरी है. ऐसा न हो कि आगे चल कर वह तुझे टरका दे. हमें तेरी फिक्र लगी है.’’

सुनयना सही मौके की तलाश में थी. उस रोज उस का जन्मदिन था. रजत उसे एक शानदार होटल में खाना खिलाने ले गया और उसे एक सुंदर सी डिजाइनर साड़ी भेंट की. फिर जब वह उसे घर छोड़ने जाने लगा तो सुनयना मुसकरा कर बोली, ‘‘इस बेहतरीन शाम के लिए शुक्रिया, मुझे यह शाम हमेशा याद रहेगी.’’

‘‘तुम्हारा अगला जन्मदिन हम और धूमधाम से मनाएंगे’’

‘‘पता नहीं अगले साल हम कहां होंगे.’’

‘‘क्यों?’’ रजत ने उस की आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘तुम्हारा कहीं जाने का इरादा है क्या?’’

‘‘मेरे मातापिता  हाथ धो कर मेरे पीछे पड़े हैं कि मैं शादी कर लूं. मेरी वजह से उन की रातों की नींद हराम हो गई है.’’

‘‘तुम क्या चाहती हो?’’

‘‘तुम तो जानते हो रजत मेरे दिल का हाल फिर भी यह सवाल करते हो. पिछले 4 सालों से हम दोनों साथसाथ हैं. हमारे सब दोस्त जानते हैं कि मैं तुम्हारी गर्लफ्रैंड हूं. तुम्हारे बिना मेरा कोई वजूद नहीं है.’’

‘‘मैं जानता हूं,’’ रजत ने उस का हाथ अपने हाथों में ले कर प्यार से चूमा, ‘‘मैं भी तो तुम्हारा दीवाना हूं. आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई है.’’

‘‘लेकिन इस प्यार का अंजाम क्या होगा?’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘क्या हम दोनों हमेशा यों ही गर्लफ्रैंडबौयफ्रैंड बने रहेंगे? क्या हम शादी नहीं करेंगे?’’

‘‘अरे यार शादी में क्या रखा है. जहां तक मैँ ने देखा है 2 प्रेमियों की शादी हुई नहीं कि उन का प्यार काफूर हो जाता है. अब मेरे मम्मीडैडी को ही ले लो. उन का प्रेम विवाह हुआ था. पर अब एक ही घर में अजनबियों की तरह रहते हैं. मैं ने कभी उन्हें एकदूसरे से प्यार जताते नहीं देखा. दोनों अपनीअपनी राह चलते हैं. सच पूछो तो मेरी शादी की संस्था में बिलकुल आस्था नहीं है.’’

‘‘इस का मतलब है कि तुम कभी शादी नहीं करोगे?’’ वह परेशान हो उठी.

‘‘रिलैक्स यार, बेकार टैंशन मत लो लेकिन सुनो मेरे दिमाग में एक बात आई है. शादी करने के बजाय क्यों न हम साथसाथ रहने लगें?’’

‘‘साथसाथ तुम्हारा मतलब बिना शादी के?’’ उस की आंखें फैल गईं.

चुनाव मेरा है

सर्जिकल वार्ड में शाम का राउंड लगाने के बाद डा. प्रशांत और सिस्टर अंजलि ड्यूटी रूम में आ बैठे. एक जूनियर सिस्टर उन दोनों के सामने चाय का कप रख गई.

‘‘आज का डिनर मेरे साथ करोगी?’’ प्रशांत ने रोमांटिक अंदाज में अंजलि की आंखों में झांका.

‘‘मेरे साथ डिनर करने के बाद घर देर से पहुंचोगे तो रीना मैडम को क्या सफाई दोगे?’’ अंजलि की आंखों में शरारत भरी चमक उभरी.

‘‘कह दूंगा कि एक इमरजेंसी आपरेशन कर के आ रहा हूं.’’

‘‘पत्नी से झूठ बोलोगे?’’

‘‘झूठ क्यों बोलूंगा?’’ प्रशांत मेज के नीचे अपने दाएं पैर के पंजे से अंजलि की पिंडली सहलाते हुए बोला, ‘‘डिनर के बाद तुम्हारे रूम पर चल कर ‘इमरजेंसी’ आपरेशन करूंगा न मैं.’’

‘‘बीमारी डाक्टर को हो और आपरेशन कोई और कराए, ऐसा इलाज मेरी समझ में नहीं आता,’’ और अपने इस मजाक पर अंजलि खिलखिला कर हंसी तो उस के व्यक्तित्व का आकर्षण प्रशांत की नजरों में और बढ़ गया.

अविवाहित अंजलि करीब 30 साल की थी. रंगरूप व नैननक्श खूबसूरत होने के साथसाथ उस में गजब की सेक्स अपील थी. उस के चाहने वालों की सूची में बडे़छोटे डाक्टरों के नाम आएदिन जुड़ते रहते थे. अपनी जिम्मे- दारियों को निभाते समय उस की कुशलता भी देखते बनती थी.

प्रशांत के मोबाइल की घंटी बजने से उन के बीच चल रहा हंसीमजाक थम गया. उस ने कौल करने वाले का नंबर देख कर बुरा सा मुंह बनाया और अंजलि से बोला, ‘‘कबाब में हड्डी बनाने वाली छठी इंद्री कुदरत ने सब पत्नियों को क्यों दी हुई है?’’

‘‘पत्नी के साथ बेईमानी करते हो और ऊपर से उसे ही भलाबुरा कह रहे हो. यह गलत बात है जनाब, चलो, प्यारीप्यारी बातें कर के रीना मैडम को खुश करो,’’ अंजलि बिलकुल सामान्य व सहज बनी रही.

‘‘तुम मेरी गर्लफ्रैंड हो कर मेरी पत्नी से ईर्ष्याभाव नहीं रखती हो क्या?’’

‘‘जिस पर हंसने की उस के पति ने ही ठान रखी हो, उस से क्या जलना?’’ यह जवाब दे कर अंजलि एक बार और खिलखिला कर हंसी और फिर अपने काम में जुट गई.

अपनी पत्नी रीना से प्रशांत ने 5-7 मिनट बातें कीं, फिर अपना मोबाइल चार्जर पर लगाने के बाद वह अंजलि से गपशप करने लग गया.

‘‘सोचती हूं तुम्हारे साथ डिनर पर चली ही चलूं,’’ अंजलि शरारत भरे अंदाज में मुसकराई, ‘‘बोलो, कहां ले चलोगे?’’

‘‘जहन्नुम में,’’ प्रशांत भन्ना उठा, ‘‘तुम ने सुन लिया न कि रीना ने रात वाले शो के टिकट ले कर आने की बात अभीअभी फोन पर मुझ से की है. मुझे किलसाने को तुम अब डिनर पर चलने की बात नहीं करोगी तो कब करोगी?’’

‘‘यों क्यों गुस्सा हो रहे हो जानेमन,’’ अंजलि ने प्रशांत की आवाज की बढि़या नकल उतारी, ‘‘आज रात बीवी को खुश करो और कल प्रेमिका का नंबर लगाना. कितने लकी हो तुम. पांचों उंगलियां घी में हैं तुम्हारी.’’

‘‘हां, ठीक कह रही हो,’’ प्रशांत बोला, ‘‘जिस दिन रीना को इस चक्कर का पता लगेगा, उसी दिन मेरा सिर कड़ाही में भी होगा.’’

‘‘देखो रोमियो, तुम क्या समझते हो कि मैडम को इस बारे में पता नहीं है. अरे, ऐसे चक्करों की खबर दुनिया वाले फटाफट पत्नी तक पहुंचा देते हैं. मैडम जिस तरह से मुझे मुलाकात होने पर पहली बार देखती हैं, उन नजरों में समाए कठोरता और चिढ़ के क्षणिक भावों को मैं खूब पहचानती हूं.’’

‘‘पर मैं ने तो तुम दोनों को सदा आपस में खूब हंसहंस कर बातें करते ही देखा है.’’

‘‘वह हंसना झूठा है, जानेमन.’’

‘‘किसी दिन वह तुम से लड़ पड़ी तो क्या होगा?’’

‘‘वैसा कुछ नहीं होगा क्योंकि जिंदगी के प्रति मेरा जो नजरिया है… जो मेरी फिलौसफी है वह मैं ने उन्हें कई बार समझाई है.’’

‘‘मुझे भी बताओ न जो तुम ने रीना से कहा है.’’

‘‘फिलहाल मेरी उस फिलौसफी को तुम नहीं समझोगे…और न ही उसे तुम्हें समझाने का सही समय अभी आया है,’’ रहस्यमयी अंदाज में अंजलि मुसकराई और फिर दोनों का ध्यान एक मरीज के तीमारदार की तरफ चला गया जो उन से कुछ कहना चाहता था.

प्रशांत को उस व्यक्ति के साथ एक मरीज को देखने जाना पड़ा. उस की गैरमौजूदगी में उस के मोबाइल की घंटी बज उठी और जो नंबर उस में नजर आ रहा था उसे अंजलि ने पहचाना. उस की आंखों में पहले सोचविचार के भाव उभरे और फिर उस की मुखमुद्रा कठोर होती चली गई.

प्रशांत के लौटने तक उस ने खुद को पूरी तरह सहज बना लिया था. उस ने आ कर ‘मिस्ड’ कौल का नंबर पढ़ा और फिर बाहर कोरिडोर में चला गया.

वहां उस ने 10 मिनट किसी से फोन पर बातें कीं. अंजलि को वह इधर से उधर घूमता ड्यूटी रूम से साफ नजर आ रहा था.

‘यू बास्टर्ड,’ अंजलि होंठों ही होंठों में हिंसक लहजे में बुदबुदाई, ‘‘अगर मेरे साथ ज्यादा चालाकी दिखाने की कोशिश की तो वह सबक सिखाऊंगी कि जिंदगी भर याद रखोगे.’

प्रशांत के वापस लौटने तक अंजलि  ने अपनी भावनाओं पर पूरी तरह नियंत्रण कर के उस से मुसकराते हुए पूछा, ‘‘किस से यों हंसहंस कर बातें कर रहे थे?’’

‘‘एक पुराने दोस्त के साथ,’’ प्रशांत ने टालने वाले अंदाज में जवाब दिया.

‘‘रीना मैडम से मेरे सामने बात करते हो तो इस पुराने दोस्त से बातें करने बाहर क्यों गए?’’

‘‘यों ही कुछ व्यक्तिगत बातें करनी थीं,’’ प्रशांत हड़बड़ाया सा नजर आने लगा.

‘‘सौरी, जानेमन.’’

‘‘सौरी क्यों कह रही हो? तुम सोचती हो कि मैं किसी दोस्त से नहीं बल्कि किसी सुंदर लड़की से बातें कर रहा था? उस पर लाइन मार रहा था?’’ प्रशांत अचानक ही चिढ़ा सा नजर आने लगा.

‘‘अरे, मैं ऐसा कुछ नहीं सोच रही हूं क्योंकि मुझ जैसी सुंदर प्रेमिका के होते हुए तुम किसी दूसरी लड़की पर लाइन मारने की बेवकूफी भला क्यों करोगे?’’ अपना चेहरा उस के चेहरे के काफी पास ला कर अंजलि ने कहा और फिर रात वाली सिस्टर को चार्ज देने के काम में व्यस्त हो गई.

कुछ देर बाद ड्यूटी समाप्त कर के प्रशांत चला गया. अंजलि जानती थी कि उसे घर पहुंचने में आधे घंटे से कम  समय लगेगा.

आधे घंटे के बाद उस ने प्रशांत के घर फोन किया. उस की पत्नी रीना ने उखड़े मूड़ में उसे खबर दी कि प्रशांत घर पर नहीं है. इमरजेंसी आपरेशन आ जाने के कारण वह देर तक आपरेशन थिएटर में रुकेगा.

यह खबर सुनते ही अंजलि की आंखों में गुस्से और नाराजगी के भाव एकदम से बढ़ गए. वह अस्पताल से बाहर आई और रिकशा कर के शास्त्री नगर पहुंची.

उस का शक सही निकला था.

डा. प्रशांत की लाल मारुति कार सिस्टर सीमा के घर के सामने खड़ी थी. उस के मोबाइल पर उस ने सीमा के घर के फोन का नंबर शाम को पढ़ लिया था.

उस ने रिकशे वाले को अपने घर की तरफ चलने की हिदायत दी. सारे रास्ते वह क्रोध व ईर्ष्या की आग में सुलगती रही.

सीमा और वह कभी अच्छी सहेलियां हुआ करती थीं. दोनों बेइंतहा खूबसूरत थीं. उन की जोड़ी को साथ चलते देख कर लोग अपनी राह से भटक जाते थे.

सीमा का बौयफ्रैंड उन दिनों रवि होता था और उस के साथ जरा खुल कर हंसनेबोलने के कारण सीमा को शक हो गया और वह अंजलि से एक दिन बुरी तरह से लड़ी थी.

तब से उन के बीच कभी सीधे मुंह बातें नहीं हुईं. दोनों डाक्टरों के बीच बराबर की लोक प्रियता रखती थीं. यह भी सच था कि जो व्यक्ति एक के करीब होता वह दूसरी को फूटी आंख न भाता.

‘‘कमीनी, जान- बूझ कर मेरा दिल दुखाने के लिए प्रशांत पर जाल फेंक रही है. इस बेवकूफ डाक्टर को जल्दी ही मैं ने तगड़ा सबक नहीं सिखाया तो मेरा नाम अंजलि नहीं.’’

घर पहुंचने तक अंजलि का पारा सातवें आसमान तक पहुंच गया था.

अगली सुबह अपने असली मनोभावों को छिपा कर उस ने प्रशांत से मुसकराते हुए पूछा, ‘‘कैसी थी कल की फिल्म?’’

पहले प्रशांत उलझन का शिकार बना और फिर जल्दी से बोला, ‘‘कोई खास नहीं… बस, ठीक ही थी.’’

‘‘गुड,’’ अंजलि दवाओं की अलमारी की तरफ चल पड़ी.

‘‘सुनो, आज शाम डिनर पर चल रही हो?’’

‘‘सोचूंगी,’’ लापरवाह अंदाज में जवाब दे कर वह अपने काम में व्यस्त हो गई.

उस दिन उस ने डा. प्रशांत से सिर्फ काम की बातें बड़ी औपचारिक सी मुसकान होंठों पर सजा कर कीं. शाम तक वह समझ गया कि उस की प्रेमिका उस से नाराज है.

प्रशांत के कई बार पूछने पर भी अंजलि ने अपने खराब मूड का कारण उसे नहीं बताया. ड्यूटी समाप्त करने के समय तक प्रशांत का मूड भी पूरी तरह से बिगड़ चुका था.

अगले दिन भी जब अंजलि ने अजीब सी दूरी उस से बनाए रखी तब प्रशांत गुस्सा हो उठा.

‘‘तुम्हारी प्राबलम क्या है? क्यों मुंह फुला रखा है तुम ने कल से?’’ और अंजलि का हाथ पकड़ कर प्रशांत ने उसे अपने सामने खड़ा कर लिया.

‘‘मेरे व्यवहार से तुम्हें तकलीफ हो रही है, मेरे हीरो?’’ भौंहें ऊपर चढ़ा कर  अंजलि ने नाटकीय स्वर में पूछा.

‘‘बिलकुल हो रही है.’’

‘‘और तुम्हें मेरे बदले व्यवहार का कारण भी समझ में नहीं आ रहा है?’’

‘‘कतई समझ में नहीं आ रहा है,’’ प्रशांत कुछ बेचैन हो उठा.

‘‘इस बारे में रात को बात करें?’’

‘‘इस का मतलब तुम डिनर पर चल रही हो मेरे साथ,’’ प्रशांत खुश हो गया.

‘‘डिनर मेरे फ्लैट में हो तो चलेगा?’’

‘‘चलेगा नहीं दौड़ेगा,’’ प्रशांत ने उस का हाथ जोशीले अंदाज में दबा कर छोड़ दिया.

ड्यूटी समाप्त करने के बाद दोनों साथसाथ प्रशांत की कार में अंजलि के फ्लैट में पहुंचे.

अंदर प्रवेश करते ही प्रशांत ने उसे अपनी बांहों के घेरे में ले कर चूमना शुरू किया. अंजलि के खूबसूरत जिस्म से उठने वाली मादक महक उस के अंगअंग में उत्तेजना भर रही थी.

अंजलि ने उसे जबरदस्ती अपने से अलग किया और संजीदा लहजे में बोली, ‘‘मैं तुम्हें अपने बारे में कुछ बताने के लिए आज यहां लाई हूं. शांति से बैठ कर पहले मेरी बात सुनो, रोमियो.’’

‘‘बातें क्या हम बाद में नहीं कर सकते हैं?’’

‘‘बाद में तुम कुछ सुनने की स्थिति में कभी रहते हो?’’

‘‘देखो, मैं ज्यादा देर बातें कहनेसुनने के मूड में नहीं हूं, इस का ध्यान रखना,’’ प्रशांत पैर फैला कर सोफे पर बैठ गया.

कुछ पलों तक अंजलि ने प्रशांत के चेहरे को ध्यान से देखा और फिर बोली, ‘‘तुम्हें 3 महीने पुरानी वह रात याद है जब मैं अपनेआप बिना किसी काम के तुम से मिलने डाक्टरों के आराम करने वाले कमरे में पहुंची थी?’’

‘‘जिस दिन किसी इनसान की लाटरी खुले उस दिन को वह भला कैसे भूल सकता है?’’

‘‘अपने प्रेमी के रूप में तुम्हें चुनने के बाद उस रात तुम्हारे साथ सोने का फैसला मैं ने अपनी खुशी व इच्छा को ध्यान में रख कर लिया था और अब तक सैकड़ों पुरुषों ने मुझ से शादी करने की इच्छा जाहिर की है पर

कभी शादी न करने का चुनाव भी मेरा अपना है.’’

‘‘ऐसा कठिन फैसला क्यों किया है तुम ने?’’

‘‘अपने स्वभाव को ध्यान में रख कर. मैं उन औरतों में से नहीं हूं जो किसी एक पुरुष की हो कर सारा जीवन गुजार दें. मेरी जिंदगी में प्रेमी सदा रहेगा. पति कभी नहीं.’’

‘‘तुम्हारी विशेष ढंग की सोच ही शायद तुम्हें और औरतों से अलग कर तुम्हारी खास पहचान बनाती है, जानेमन. मैं तुम्हारी जैसी आकर्षक स्त्री के संपर्क में पहले कभी नहीं आया हूं. प्रशांत की आंखों में उस के लिए प्रशंसा के भाव उभरे.’’

‘‘शायद कभी आओगे भी नहीं,’’ अंजलि उठ कर उस के पास आ बैठी, ‘‘क्योंकि अपने व्यक्तित्व को पुरुषों की नजरों में गजब का आकर्षक बनाने के लिए मैं ने खासी मेहनत की है. अपने प्रेमी के शरीर, दिल और दिमाग तीनों को सुख देने की कला मुझे आती है न?’’

अंजलि ने झुक कर प्रशांत का कान हलके से काटा तो उस के पूरे बदन में करंट सा दौड़ गया. अंजलि ने उसे अपने होंठों का भरपूर चुंबन लेने दिया. प्रशांत की सांसें फिर से उखड़ गईं.

प्रशांत के आवारा हाथों को अपनी गिरफ्त में ले कर अंजलि ने आगे कहा, ‘‘अपने प्रेमी मैं बदलती आई हूं और बदलती रहूंगी, फिर भी मैं खुद को बदचलन नहीं समझती हूं क्योंकि एक वक्त में मेरा सिर्फ एक प्रेमी होता है जिस के प्रति मैं पूरी तरह से वफादार रहती हूं. और ऐसी ही आशा मुझे अपने प्रेमी से भी रहती है.’’

‘‘तब यह बताओ कि मेरे जैसे शादीशुदा प्रेमी की पत्नी से तुम्हें चिढ़ नहीं होती है, ऐसा क्यों, अंजलि? तुम्हें उस पत्नी की अपने प्रेमी के जीवन में मौजूदगी क्यों स्वीकार है? वफादारी महत्त्वपूर्ण है तो तुम अविवाहित पुरुषों को ही अपना प्रेमी क्यों नहीं चुनती

हो?’’ अंजलि के मनोभावों को समझने की उत्सुकता प्रशांत के मन में बढ़ गई.

‘‘प्रेमी चुनते हुए मैं विवाहित- अविवाहित के झंझट में न पड़ कर सिर्फ अपने मन की पसंद को ध्यान में रखती

हूं. जनाब, जो विवाहित पुरुष मेरा होने को तैयार है वह अपनी पत्नी के प्रति बेवफा या उस से ऊबा हुआ तो साबित हो ही गया. जो पत्नी अपने पति को अपने आकर्षण में बांध कर रखने में अक्षम है, उस से मुझे भला

क्यों ईर्ष्या होगी. लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या?’’ प्रशांत ने साफ देखा कि अंजलि की आंखों में कठोरता के भाव पैदा हो गए थे.

‘‘लेकिन मैं अपने वर्तमान प्रेमी के प्रति सदा वफादार रहती हूं, इसलिए उस का पत्नी के अलावा कहीं इधरउधर मुंह मारना भी मुझे पसंद नहीं. मैं ने आज तक किसी पुरुष के सामने उस के प्रेम को पाने के लिए हाथ नहीं फैलाए हैं. अपने प्रेम संबंधों को शुरू भी मैं करती हूं और उन का अंत भी.

‘‘अपनी जीवनशैली मैं ने खुद चुनी है. पापपुण्य, सहीगलत व नैतिकअनैतिक को नहीं बल्कि अपनी खुशियों को मैं ने अपने जीवन का आधार बनाया है और अपने जीवन से मैं पूरी तरह से संतुष्ट व सुखी हूं,’’ आवेश भरे अंदाज में बोलते हुए अंजलि का मुंह लाल हो उठा.

‘‘यों तनावग्रस्त हो कर तुम यह सब बातें मुझे क्यों सुना रही हो?’’ प्रशांत ने माथे पर बल डाल कर पूछा.

‘‘तुम्हें यह एहसास कराने के लिए कि तुम कितने खुशकिस्मत हो,’’ अंजलि की आवाज और सख्त हो गई, ‘‘मैं तुम्हें खुश रखने में एक्सपर्ट हूं, डाक्टर प्रशांत. मेरा रूप और जिस्म अनूठा है. तुम्हारे मन को समझ कर उसे सुखी रखने की कला मुझे बखूबी आती है. लोग तुम से इस कारण ईर्ष्या करते हैं कि मैं तुम्हारी प्रेमिका हूं…चाहे मुंह से वह मुझे चरित्रहीन कहें पर दिल से वे भी मुझ पर लट्टू हुए रहते हैं. इतना सबकुछ पा कर भी तुम ने सिस्टर सीमा के प्रेमजाल में फंसने की मूर्खतापूर्ण इच्छा को अपने मन में क्यों पनपने दिया?’’

‘‘तुम्हें जबरदस्त गलतफहमी…’’

‘‘डा. प्रशांत, अगर तुम इस वक्त झूठ बोलोगे, तो तुम्हारी मुझ से जुडे़ रहने की सारी संभावना समाप्त हो जाएगी,’’ अंजलि ने साफ शब्दों में उसे धमकी दी.

‘‘सीमा के साथ थोड़ाबहुत हंसी- मजाक करने का यों बुरा मत मानो जानेमन. तुम चाहोगी तो मैं उस से बिलकुल बात करना छोड़ दूंगा,’’ अंजलि  का गुस्सा कम करने के लिए प्रशांत ने फौरन सुलह का प्रयास शुरू किया.

कुछ देर गंभीरता से उस का चेहरा निहारने के बाद अंजलि ने उसे चेतावनी दी, ‘‘आज पहली और आखिरी वार्निंग मैं तुम्हें दे रही हूं. मुझे ‘डबलक्रौस’ करने की कोशिश कभी की तो फिर मुझे सदा के लिए भूल जाना. अपनी पत्नी से जितनी खुशियां पा सकते हो पा लेना लेकिन किसी सीमा जैसी की तरफ आंख उठा कर देखा तो पछताओगे.’’

‘‘मैं तुम्हारी बात समझ गया और अब तुम ये किस्सा समाप्त भी करो,’’ प्रशांत ने पास आ कर उसे अपनी बांहों में भर लिया.

अंजलि का मूड फौरन बदला. उस ने गर्मजोशी के साथ प्रशांत की इस पहल का स्वागत किया.

चंद मिनटों का आनंद देने के बाद अंजलि ने उसे कठिनाई से अलग कर के हलकेहलके अंदाज में कहा, ‘‘टे्रलर यहीं खत्म होता है जानेमन. पूरी फिल्म कल रात पर छोड़ो.’’

‘‘क्या मतलब?’’ प्रशांत चौंका.

‘‘मतलब यह कि अब तुम रीना मैडम के पास अपने घर चले जाओ.’’

‘‘पर क्यों?’’

‘‘क्योंकि मैं तुम्हें सोचने का समय दे रही हूं. अगर कल मेरे आगोश में लौटने की इच्छा तुम्हारे मन में हो तो मेरी शर्तों को ध्यान रखना नहीं तो गुडबाय.’’

अंजलि की बात सुन कर एक बार तो प्रशांत की आंखों में तेज गुस्सा झलका लेकिन जब अपने दिल को टटोला तो पाया कि जादूगरनी अंजलि से दूर वह नहीं रह सकता.

‘‘कम से कम एक कप चाय तो पिला कर विदा करो,’’ प्रशांत की बेमन वाली मुसकान में उस की हार छिपी थी और अपनी जीत पर अंजलि दिल खोल कर हंसने लगी.

अंतर्भास: भाग 1- आखिर क्या चाहती थी कुमुद

घर पर अकसर मैं अकेला होता… अकेला होने पर एक भी पल ऐसा न गुजरता जब मेरे दिमाग में कुमुद न होती. मैं यह निरंतर समझने की कोशिश करता रहता कि आखिर कुमुद जैसी सुंदर, युवा, पढ़ीलिखी और सरकारी नौकरी में लगी, बुद्धिमान लड़की ने जयेंद्र जैसे बदसूरत, अपने से दोगुनी उम्र वाले 2 बच्चों के पिता से शादी कैसे कर ली? जयेंद्र को इस महल्ले में लोग सब से बेवकूफ, प्रतिभाहीन, खब्ती आदमी मानते थे.

लोभी इतना कि बीमार बीवी का उस ने ठीक से इलाज इसलिए नहीं कराया क्योंकि इलाज में पैसा ज्यादा खर्च होता जबकि शहर में उस के पास 2-3 बड़े गोदाम थे, जिन का अच्छाखासा किराया आता था. उस का अपना निजी टैंट हाउस भी था. बच्चे पढ़ने में कमजोर थे इसलिए कुमुद उन्हें ट्यूशन पढ़ाने आया करती थी. जयेंद्र के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी पर अखबार वह खरीदता नहीं था. उस के घर में बच्चों की किताबकापियों के अलावा और कोई किताब कहीं दिखाई नहीं देती थी.

कुमुद से मेरा परिचय कुछ इस तरह हुआ कि एक दिन पड़ोस में दांतों के एक नकली डाक्टर के गलत इंजेक्शन लगाने से मरीज की मृत्यु हो गई जिस के कारण उस के घर वालों ने डाक्टर की दुकान पर हमला कर दिया. लड़ाईझगड़ा, गालीगलौज और मारपीट के समय कुमुद वहीं से गुजर रही थी. वह घबरा कर मेरे चबूतरे पर चढ़ आई. मैं ने उस को आतंकित और कांपते देखा तो उस से कह दिया कि आप भीतर घर में चली जाएं. यहां झगड़ा बढ़ सकता है. कुछ सकुचा कर वह अंदर चली आई और फिर बातें हुईं.

वह शहर के डिगरी कालिज से एम.ए. कर रही थी और पड़ोस के जयेंद्र के बच्चों को पढ़ा रही थी. ‘‘चाय बना कर लाता हूं,’’ मैं यह कह कर चाय बनाने चला गया और इस दौरान उस ने मेरे कमरे में रहने वाले का जीवन और चरित्र समझने की कोशिश की थी. साफ लगा, लड़की तेज है, बेवकूफ नहीं. बातों से पता चला कि वह नौकरी ढूंढ़ रही थी…पर किसी नौकरी के लिए कोशिश करो तो सब से पहले यही पूछा जाता है कि कंप्यूटर आता है? इंटरनेट का ज्ञान है? ईमेल कर लेते हो? पर शहर में जो अच्छे सिखाने वाले संस्थान हैं, उन की फीस बहुत है. वह उस के वश की नहीं और घटिया संस्थानों में कुछ सिखाया नहीं जाता.

‘‘आप कहें तो मैं अपने उस संस्थान के मालिक से बात करूं जहां मैं सीखता हूं…शायद मेरे कहने पर वह कम फीस में सिखाने को राजी हो जाए,’’ मैं ने कह तो दिया पर सोच में पड़ गया कि अगर वह राजी न हुआ तो? व्यापारी है. बाजार में पैसा कमाने बैठा है. मेरे कहने पर किसी को ओबलाइज क्यों करेगा? हां, उस की एक कमजोर नस मैं ने दबा रखी है. इंटरनेट पर वह साइबर कैफे चलाता है और कम उम्र के लड़के- लड़कियों को अश्लील वेबसाइट पर सर्फिंग करने देता है…पुलिस को इस की जानकारी है. 1-2 बार पुलिस ने उस पर छापा डालने की योजना भी बनाई, पर चूंकि एक अखबार में पार्टटाइम क्राइम रिपोर्टर होने के कारण मेरा परिचय पुलिस विभाग में बहुत हो गया है, हर कांड जिसे पुलिस खोलती है, उस की बहुत अच्छी रिपोर्टिंग मैं करता हूं और अकसर पुलिस वालों को उन की तसवीरों के साथ खबर में छापता हूं, इसलिए वे बहुत खुश रहते हैं मुझ से.

यही नहीं क्राइम होने पर मुझे वे तुरंत सूचित करते हैं और अपने साथ तहकीकात के वक्त ले भी जाते हैं. जबजब कंप्यूटर कैफे पर छापा डालने की पुलिस ने योजना बनाई, मैं ने पुलिस को या तो रोका या कंप्यूटर मालिक को पहले ही सूचित कर दिया जिस से वह लड़केलड़कियों को पहले ही अपने कैफे से हटा देता.

अगले दिन जब वह पड़ोसी जयेंद्र के घर बच्चों को सुबह ट्यूशन पढ़ाने जा रही थी, मैं ने उसे अपने चबूतरे पर से आवाज दी, ‘‘कुमुदजी…’’ वह ठिठक गई. बिना हिचक चबूतरे पर चढ़ आई. अपनी कुरसी से उठ कर मैं खड़ा हो गया और बोला, ‘‘मैं ने आप की कंप्यूटर सिखाने के लिए अपने संस्थान के मालिक से बात कर ली है. शाम का कोई वक्त निकालें आप…’’ ‘‘कितनी फीस लगेगी?’’ उस का प्रश्न था. ‘‘आप उस की चिंता न करें. वह सब मैं देखूंगा, हो सकता है, मेरी तरह आप भी वहां फ्री सीखें…’’

मैं ने बताया तो वह कुछ सकुचाई. शायद सुंदर लड़कियों को सकुचाना भी चाहिए. आज की दुनिया लेनदेन की दुनिया है. कैश न मांगे, कुछ और ही मांग बैठे तो? संकोच ही नहीं, उस के भीतर चल रहे मानसिक द्वंद्व को भी मैं ताड़ गया था. कहानियों, उपन्यासों का पाठक हूं… आदमी की, उस के मन की, उस के भीतर चल रही उथलपुथल की मुझे बहुत अच्छी समझ है. और यह समझ मुझे हिंदीअंगरेजी के उपन्यासों ने दी है. आदमी को समझने की समझ, किसी आदमी का बहुआयामी चित्रण जितनी अच्छी तरह किसी अच्छे उपन्यास में होता है, शायद किसी अन्य विधा में नहीं. इसीलिए आज के युग का उपन्यास महाकाव्य कहलाता है.

कुमुद का संकोच मेरी समझ में आ गया था सो मुसकरा दिया, ‘‘आप पर आंच नहीं आने दूंगा…यह विश्वास रखें.’’ ‘‘मेरे लिए आप भी यह सब क्यों करेंगे…’’ कुमुद कहने के बाद हालांकि मुसकरा दी थी. ‘‘मैं आप के कहने का आशय समझ गया,’’ हंस कर बोला, ‘‘किसी और लालच में नहीं, सिर्फ एक अच्छी दोस्त के लिए और उस से दोस्ती की खातिर…हालांकि इस छोटे शहर में स्त्री व पुरुष के बीच दोस्ती का एक ही मतलब निकाला जाता है, पर आप विश्वास रखें, बीच की सीमा रेखा का अतिक्रमण भी नहीं करूंगा…हालांकि आप का रूपसौंदर्य मुझे परेशान जरूर करेगा, क्योंकि सौंदर्य की अपनी रासायनिक क्रिया होती है…

‘‘आप ने बाहर हो रहे झगड़े के दौरान जब हमारी बैठक में बैठ कर चाय पी और हमारा परिचय हुआ तो आप से सच कहता हूं, मन में अनेक भाव आए, रात को भी ठीक से नींद नहीं आई, आप बारबार सपनों में आती रहीं पर मैं ने अपने मन को समझा लिया कि हर सुंदर लगने वाली चीज हमें जीवन में मिल जाए, यह जरूरी नहीं है…फिल्मों की तमाम हीरोइनें हमें बहुत अच्छी लगती हैं पर हम सब जानते हैं, वे आकाश कुसुम हैं…कभी मिलेंगी नहीं…’’ खिलखिला कर हंस दी कुमुद. हंसी तो उस के गोरे, भरे गालों में प्रीति जिंटा जैसे डिंपल बने जिन्हें मैं अपलक देखता रहा देर तक.

अंतर्भास: भाग 2- आखिर क्या चाहती थी कुमुद

वह बोली, ‘‘कुछ भी हो, आप दिल के एकदम साफ व्यक्ति हैं. जो मन में होता है, उसे कह देते हैं.’’ ‘‘कुमुद, तुम ने अंगरेजी विषय ही क्यों चुना एम.ए. के लिए?’’ एक दिन उस से पूछा. वह हिंदी और अंगरेजी के उपन्यास समान रूप से ले जा कर पढ़ने लगी थी. ‘‘कई कारण हैं. एक तो यह कि यहां के महिला महाविद्यालय में प्राचार्या ने वचन दिया है कि यदि एम.ए. में मेरी प्रथम श्रेणी आई तो बी.ए. की कक्षाओं को पढ़ाने के लिए फिलहाल वह मुझे रख लेंगी. दूसरा कारण, अपने महाविद्यालय में अंगरेजी के जो विभागाध्यक्ष हैं वह मुझे बहुत मानने लगे हैं. कह रहे थे, शोध करा देंगे. यदि पीएच.डी. करने का अवसर मिल गया तो एक प्रकार से मेरी शिक्षा पूरी हो जाएगी और कहीं ठीकठाक जगह नौकरी मिल जाएगी. तीसरा कारण, अंगरेजी पढ़ी लड़की को नौकरी आसानी से मिल जाती है.’’ ‘‘असली कारण तो तुम ने बताया ही नहीं,’’ भेद भरी मुसकान के साथ मैं बोला. ‘‘कौन सा?’’ उस की आंखों में भी शरारत थी. ‘‘अंगरेजी पढ़ी लड़की को अच्छा घर और वर भी मिल जाता है,’’ कह कर मैं हंस दिया. झेंप गई वह.

कुमुद कंप्यूटर सीखने जाने लगी थी. कई बार वह फीस के बारे में पूछ चुकी थी, पर उसे फीस न संस्थान मालिक ने बताई, न मैं ने. वह पढ़ती रही. काफी सीख भी गई. एक दिन बोली, ‘‘अगर कहीं से आप सेकंड हैंड कंप्यूटर दिलवा दें तो मैं घर पर कुछ जौब वर्क कर सकती हूं.’’ अगले दिन अपने संस्थान से ही एक नया असंबल किया हुआ कंप्यूटर ले कर उस के घर पहुंच गया, ‘‘तुम्हारे जन्मदिन का तोहफा, कुमुद.’’ वह एकदम खिल सी गई, ‘‘आप को कैसे पता चला कि आज मेरा जन्मदिन है?’’

‘‘कंप्यूटर संस्थान में तुम ने अपना फार्म भरा था, उस में तुम्हारा बायोडाटा देखा था.’’ ‘‘आप सचमुच जासूस किस्म के व्यक्ति हैं…क्राइम रिपोर्टर हैं, कहीं कोई क्राइम तो नहीं करेंगे?’’ वह हंसतीहंसती एकदम चुप हो गई थी क्योंकि उस की मां वहां आ गई थीं. उस ने कंप्यूटर अपनी मां को दिखाया. फिर मेरे लिए चाय बनाने चली गई. कुमुद की मां वहां रह गई थीं. संकोच भरे स्वर में कुछ हिचकती सी बोलीं, ‘‘आप की बहुत तारीफ करती है कुमुद. सचमुच आप ने उसे बहुत सहारा दिया है. हम आप का अहसान हमेशा मानेंगे.’’

मैं समझ रहा था, यह किसी अन्य बात को कहने की भूमिका है. यों ही कोई किसी की प्रशंसा नहीं करता. हर बात, हर व्यवहार आदमी बहुत चालाकी से, अपने मतलब के अनुसार करता है. अखबारी दुनिया में रहने से आदमी को अच्छी तरह समझने लगा हूं. पहले यह समझ नहीं थी. कुछ रुक कर चेहरा झुकाए हुए वह बोलीं, ‘‘कुमुद जहां बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने जाती है, आप की गली वाले जयेंद्रजी के घर…’’ इतना कहती हुई वह हिचकीं फिर बोलीं, ‘‘एक दिन वह यहां आए थे… बड़े आदमी हैं…आप भी जानते होंगे उन्हें…2 बच्चे हैं. पत्नी की बीमारी से मृत्यु हो गई है. मुझे कुछ खास उम्र नहीं लगी उन की…बस, शक्लसूरल जरा अच्छी नहीं है पर पैसे वाले आदमी की शक्लसूरत कहां देखी जाती है…कुमुद का हाथ मांग रहे थे…कह रहे थे कि बच्चे कुमुद से बहुत हिलमिल गए हैं…अगर कुमुद राजी हो जाए तो वह उस से शादी कर लेंगे…इस बारे में आप की क्या राय है?’’

मैं सन्नाटे में आ गया था. लगा, जैसे किसी ने चहकती चिडि़यों वाले बेर के विशाल पेड़ पर पूरी ताकत से बांस जड़ दिया है और सारी चिडि़यां एकाएक फुर्र हो गई हैं. बाहरभीतर का सारा चहकता शोर एकदम थम गया है. मैं भौचक्का उन की तरफ ताकता रह गया. मन हुआ, कंप्यूटर उठा ले जाऊं और कुमुद चाय ले कर आए उस से पहले ही इस घर से बाहर निकल जाऊं, पर ऐसा किया नहीं. काठ बना ज्यों का त्यों बैठा रहा. कुमुद चहकती चिडि़या की तरह खुश थी. उसे कंटीला ही सही एक ऊंचा बेर का वृक्ष मिल गया था. वह बेखौफ उस घने वृक्ष पर अपना घोंसला बना सकती थी. घर आ कर सारी स्थितियों पर मैं ने गंभीरता से सोचाविचारा. कुमुद ने मेरी अपेक्षा जयेंद्र को क्यों पसंद किया?

मैं अपनी असफलता पर बहुत दुखी ही नहीं, एक तरह से अपनेआप से क्षुब्ध और असंतुष्ट भी था. एक बार को मन हुआ कि बाजार से सल्फास की गोलियां ले आऊं और रात को खा कर सो जाऊं. फिर लगा कि यह तो कायरता होगी. आखिर इतना पढ़ालिखा हूं, समझ है, क्या इस तरह की बातें मुझे सोचनी चाहिए? इस में कुमुद का दोष कहां है? उस ने जो किया, जो सोचा, उस में उस की गलती कहां है? कोई भी चतुर और समझदार लड़की यही करती जो उस ने किया. आखिर जयेंद्र की तुलना में वह मुझे क्यों चुनती?

फिर मैं ने अपने मन की बात उस से कभी खुल कर कही भी नहीं. हो सकता है, वह सिर्फ एक दोस्त के रूप में ही मुझे देखतीमानती और समझती रही हो. जरूरी कहां है कि जो दोस्त है, उसे वह अपने जीवन का साथी भी बनाए? क्यों बनाए? सिर्फ दोस्त भी तो मान सकती है. कभी उस ने अपना ऐसा मन भी जाहिर नहीं किया कि वह मुझे इस रूप में पसंद करती है.

फिर कुमुद के इस फैसले से मैं खिन्न क्यों हूं? गुस्से से क्यों भभक रहा हूं? गलती खुद मुझ से हुई है. अगर दोस्ती से आगे बढ़ कर उसे चाहने लगा था तो मुझे उस से अपने मन की बात कहनी चाहिए थी. चूक उस से नहीं, मुझ से हुई है. उस से कहा क्यों नहीं? संकोच था, झिझक थी कि अगर इनकार कर दिया तो? और इनकार करने के कारण भी थे… 2 हजार की अखबार में क्राइम रिपोर्टर की मामूली नौकरी. 3 कमरों का साधारण घर. किराए पर उठी 3 दुकानें. मेरी आर्थिक हैसियत क्या है? मन की बात कहने पर अगर वह इनकार कर देती तो बहुत संभव था, मैं अपनेआप को रिजेक्टिड मान कर क्रोध में भड़क उठता और कोई गलत फैसला कर बैठता.

कुमुद मुझे बहुत अच्छी लगती है. मैं उस का बहुत सम्मान करता हूं. अच्छी दोस्त है वह मेरी. उस की एक झलक पाने के लिए, उस की एक मुसकान देखने के लिए, उस के गालों पर प्रीति जिंटा जैसे डिंपलों को देखने के लिए, मैं चकोर बना उस की ओर ताकता रहता हूं. ‘‘क्यों, चिडि़या हाथ नहीं आई?’’ कंप्यूटर संस्थान के मालिक ने मेरी स्थिति से असली मामला भांप लिया. कंप्यूटर के सामने चुप और उदास बैठा रहा. कुछ बोला नहीं. कुछ देर के मौन के बाद उस ने कहा, ‘‘बरखुरदार… मैं ने तुम से ज्यादा दुनिया देखी है. जयेंद्र जो एकएक पैसा दांत से पकड़ता है, तुम्हारी कुमुद पर फिदा हो गया था. कुमुद ने उस से नौकरी के लिए कहा तो एक अफसर की बेटी की शादी में मुफ्त टैंट लगा शादी का पूरा इंतजाम किया.

अंतर्भास: भाग 3- आखिर क्या चाहती थी कुमुद

बदले में कुमुद के लिए उस अफसर से उस ने सरकारी दफ्तर में कंप्यूटर क्लर्क की नौकरी मांग ली. इस तरह कुमुद को वहां फिट करवा दिया. इस अहसान के बदले कुमुद की मां से अपने लिए उस का हाथ मांग लिया. जयेंद्र कहां गलत है इस में? सौदों की दुनिया में हर कोई नफा का सौदा करना चाहता है. तुम ठहरे नासमझ और कल्पनाओं की दुनिया में जीने वाले.’’ इतना कह कर वह बेशर्मी से मुसकराया और बोला, ‘‘जिस दिन तुम कुमुद के लिए कंप्यूटर ले जा रहे थे, उस दिन मैं तुम से कहना चाहता था कि कुमुद तुम्हारे हाथ नहीं आएगी, बेकार उस पर अपना वक्त और पैसा बहा रहे हो पर तुम्हें बुरा लगेगा, इसलिए चुप रह गया था. आखिर तुम हमारे साइबर कैफे को पुलिस से बचाने में मेरी मदद करते हो, मैं तुम्हें नाराज क्यों करता?’’

‘‘तुम्हारी इस सिलसिले में कुमुद से कभी बात हुई क्या?’’ मैं ने कुछ सोच कर पूछा. मैं जानना चाहता था, आखिर कुमुद ने उस बदसूरत आदमी को क्यों पसंद कर लिया, जबकि मैं अपनेआप को उस से हजार गुना बेहतर समझता हूं. ‘‘वह तुम्हें सिर्फ एक अच्छा दोस्त मानती है. तुम्हारी इज्जत करती है. एक भला और सही आदमी मानती है. पढ़ालिखा और समझदार व्यक्ति भी मानती है. पर इस का मतलब यह तो नहीं कि वह तुम्हें अपना जीवनसाथी भी मान ले? वह जानती है कि तुम्हारा अर्थतंत्र टूटा हुआ है. तुम इस शहर को छोड़ कर कहीं बाहर जाने का जोखिम नहीं लेना चाहते. कुछ नया और अच्छा करने का हौसला तुम में नहीं है. आजकल पैसा बनाने के लिए आदमी क्या नहीं कर रहा? गलाकाट प्रतिस्पर्धा का जमाना है मित्र. लोग अपने हित के लिए दूसरे का गला बेहिचक काट रहे हैं.’’

मैं कसमसाता चुप बना रहा तो कंप्यूटर मालिक कुछ संभल कर फिर बोला, ‘‘चींटियां वहीं जाती हैं जहां गुड़ होता है. जरा सोच कर देखो, उस का फैसला कहां गलत है? तुम्हारे साथ जुड़ कर उसे क्या वह सबकुछ मिलता जो जयेंद्र से जुड़ कर मिला है…सरकारी नौकरी, 10 लाख उस के नाम बैंक में जमा. अच्छा- खासा सारी सुखसुविधाओं से युक्त मकान…तुम उसे क्या दे पाते यह सब?’’

एक दिन अचानक कुमुद मेरे चबूतरे पर चढ़ आई. उस के स्वागत में मुसकरा कर खड़ा हो गया, ‘‘आओ, कुमुद…अब तो तुम ने इधर आना ही छोड़ दिया,’’ स्वर में शिकायत भी उभर आई. ‘‘नौकरी की व्यस्तता समझिए इसे और कुछ नई जिम्मेदारियां भी,’’ उस का इशारा संभवत: अपने विवाह की तरफ था. उस के बैठने के लिए भीतर से कुरसी ले आया. ‘‘चाय पीना पसंद करोगी मेरे साथ?’’ मुसकरा रहा था. पता नहीं चेहरे पर व्यंग्य था या रोष.

‘‘चाय पीना ही पसंद नहीं करती बल्कि आप से बातचीत करना भी बहुत पसंद करती हूं पर आज चाय आप नहीं, मैं बनाऊंगी आप के किचन में चल कर,’’ वह बेहिचक घर में आई. उसे किचन बताना पड़ा. सारा सामान चाय के लिए निकाल कर उस के सामने रखना पड़ा. चाय के दौरान उस ने सधे स्वर में कहा, ‘‘मेरी एक बात मानेंगे?’’ ‘‘तुम अच्छी तरह जानती हो कि मैं तुम्हारी किसी बात को इनकार नहीं कर सकता,’’ मैं ने सिर झुका लिया. ‘‘हां, इस का एहसास है मुझे. इसी विश्वास के बल पर आज आई हूं आप से कुछ कहने के लिए,’’ उस ने कहा. ‘‘कहो,’’ मैं ने उस की तरफ देखा.

‘‘अपने अफसर को राजी किया है. वह आप को अखबार के कारण जानता है. हालांकि हिचक रहा था, अखबार में काम करते हो, कहीं सरकारी दफ्तर के जो ऊंचेनीचे काम होते हैं उन की पोल तुम कभी अखबार में न खोल डालो. पर मैं ने उन्हें तुम्हारी तरफ से विश्वास दिला दिया है कि तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे, चुपचाप अपनी नौकरी करोगे.’’

‘‘मतलब यह कि तुम ने मेरी नौकरी की बात पक्की कर ली वहां. वह भी बिना मुझ से पूछे? बिना यह सूचना दिए कि मुझे वह नौकरी रास भी आएगी या नहीं? मैं कर भी पाऊंगा या नहीं? निभा भी सकूंगा सरकारी दफ्तरों के भ्रष्टाचार के साथ या नहीं?’’ मैं सवाल पर सवाल दागता चला था. ‘‘हां, बिना आप से पूछे. बिना आप को सूचित किए ही यह बात कर ली मैं ने, और मुझे इस के लिए उस अफसर को थोड़ीबहुत छूटें भी देनी पड़ीं, इतनी नहीं कि मेरी अस्मिता पर आंच आती पर किसी से हंसबोल लेना, दिखावटी थोड़ाबहुत फ्लर्ट कर लेना…अपना काम निकालने के लिए बुरा नहीं मान पाई मैं… और वह भी अपने इतने अच्छे दोस्त के लिए, अपनी दोस्ती के लिए इतना तो कर ही सकती थी न मैं,’’ वह मुसकरा रही थी.

फिर बोली, ‘‘मेरा मन कह रहा था कि मैं तुम से कहूंगी तो तुम मना नहीं करोगे. मैं जानती हूं तुम्हारे मन को…और न जाने क्यों, इतना हक भी मानती हूं तुम पर अपना कि मैं कहूंगी तो तुम मेरी बात मानोगे ही.’’ चुप रह गया मैं और दंग भी. अपलक उस के मुसकराते और गर्व से चमकते चेहरे की तरफ देखता रहा. ‘‘सरकारी दफ्तरों में हर काम गलत नहीं होता जनाब, हर आदमी भ्रष्ट नहीं होता. ऐसे बहुत से लोग हैं जो पूरी ईमानदारी और मेहनत से अपना काम करते हैं. इतने दिन काम कर के मैं भी कुछ समझ पाई हूं उस तिलिस्म में घुस कर,’’ वह बोलती जा रही थी

‘‘क्या करना होगा मुझे?’’ मैं ने उस से पूछा. ‘‘टे्रजरी दफ्तर में तमाम बिल कंप्यूटरों पर तैयार होते हैं. वेतन बिल, पेंशन बिल, सरकारी खर्चों के लेनदेन के हिसाबकिताब…उन की टे्रनिंग चलेगी आप की 6 महीने…उस के बाद स्थायी पद दिया जाएगा. शुरू में 10 हजार रुपए मिलेंगे, इस के बाद क्षमता के आधार पर संविदा पर नियुक्ति की जाएगी.’’

‘‘संविदा का मतलब हुआ, अगर काम ठीक से नहीं कर पाया तो बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा,’’ मैं ने शंका जाहिर की. ‘‘हमेशा हर काम को करने से पहले आप उस के बुरे पक्ष के बारे में ही क्यों सोचते हैं? यह क्यों नहीं मानते कि 6 महीने की टे्रनिंग में आप जैसा प्रतिभावान और होनहार व्यक्ति बहुतकुछ सीख लेगा और संविदा पर ही सही, अच्छा काम कर के अफसरों को अपनी उपयोगिता सिद्ध करा देगा…आप की 2 हजार रुपए की नौकरी से तो यह हजारगुनी बेहतर नौकरी रहेगी…अगर नहीं कर पाएंगे तो अखबार तो आप के लिए हमेशा रहेंगे. पत्रकारिता आप को आती है, वह कहीं भी कर लेंगे आप…परेशान क्यों हैं?’’

उम्मीद नहीं थी कि कुमुद इतनी समझदार और संवेदनशील होगी. मैं चकित, अचंभित उस के चेहरे को देखता रह गया, उसे इनकार करता तो किस मुंह से और क्यों?

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