नास्तिक बहू: भाग 2- नैंसी के प्रति क्या बदली लोगों की सोच

“अब क्या बताऊं सुषमा, तुम तो जानती ही हो नैंसी को, उस का मन कहां लगता है इन सब में, उस से तो बस फैशन करवा लो, बिना मिर्चमसाला के खाना बनवा लो या फिर इधरउधर घूमने को कह दो, एक पैर में खड़ी रहती है,” नलिनी दुखी और शिकायती अंदाज में बोली “अच्छा छोड़ इन सब बातों को, ठीक ही है जो वह नहीं आ रही है. वैसे भी मुझे तुम्हें बहुत जरूरी बात बतानी है, जो मैं उस के सामने तुम्हें बता नहीं पाऊंगी. अब तुम जल्दी बाहर मिलो मैं फोन रखती हूं,” अपनी सारी बातें रहस्यमय तरीके से कहने के बाद सुषमा ने फोन रख दिया.

सोसाइटी के मंदिर प्रांगण में मेला सा लगा हुआ था. खूब धूम मची हुई थी, यह एक प्रकार का साप्ताहिक मेला का आयोजन जैसा ही था. हफ्ते में 1 दिन भजनकीर्तन सभी महिलाओं के मनोरंजन के साथ ही साथ सुसंस्कारी होने का परिचायक भी था.

आसपास के सोसाइटी की औरतें भी पूरे मेकअप में इतना सजधज कर आई थीं जैसे शादीब्याह में आई हों या फिर कोई फैशन शो चल रहा हो. छोटेछोटे समूह बना कर सभी औरतें एकदूसरे से गुफ्तगू करने में लगी हुई थीं. उन में से कोई अपने कान का न‌या झुमका दिखा रही थी, तो कोई अपनी साड़ी पर इतरा रही थी, कोई अपनी सास की दुष्टता के कर्मकांड बयां कर रही थी. कोई अपनी बहू के आतंक पर रो रही थी, तो कोई अपने ही घर की कहानी सुना रही थी. सभी अपनीअपनी गाथाएं सुनाने में लगी हुई थीं.

नलिनी भी अपनी संगी सुषमा और उस की बहू के संग प्रांगण में पहुंची. वहां पहुंचते ही सुषमा की बहू रमा अपनी सास को छोड़ कर कर अपनी हमउम्र और अपनी सहेलियों के पास खिसक ली. खूब ढोल, ताशे और मंजीरे बजे, भक्ति गीतों से पूरा परिसर गुंजायमान हो उठा. कुछ बुजुर्ग महिलाएं वहां पर उपस्थित महिलाओं को भजनकीर्तन, पूजाअर्चना का जीवन में महत्त्व समझा कर अपनेअपने घरों का पोथापुराण ले कर बैठ गईं और फिर बाकी महिलाएं भी इधरउधर की बेकार की बातें ले कर शुरू हो गईं. यह सब हर सप्ताह का दृश्य था.

नलिनी और सुषमा दोनों भजन के बाद अलगथलग एक कोने में जा बैठीं तब नलिनी ने कहा,”तुम फोन पर कह रही न कि तुम मुझे कुछ बताना चाहती हो तो अब बताओ तुम क्या बताना चाहती हो.”

सुषमा ठंडी सांसें भरती हुई बोली,”देखो नलिनी, मैं तुम से जो कहने जा रही हूं उसे धैर्य और ध्यान से सुनना. तुम्हारी बहू नैंसी संस्कारी नहीं है यह बात तो तुम जानती ही हो लेकिन यह नहीं जानतीं कि अब वह इस बात को पूरी तरह से सिद्ध करने जा रही है. जिस बहू के पास भजनकीर्तन के लिए समय नहीं है, उस के पास अपने सासससुर और परिवार के लिए समय कहां से होगा,” यह सुन नलिनी आश्चर्य से सुषमा का हाथ थामती हुई बोली,”तुम क्या कह रही हो मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, तुम साफसाफ कहो न तुम्हें जो भी कहना है.”

तभी सुषमा धीरे से बोली,”नैंसी, तुम्हें और तुम्हारे पति को वृद्धाश्रम भेजने की तैयारी कर रही है, मेरी बहू रमा ने उसे वृद्धाश्रम से बाहर निकलते हुए देखा था और उस के हाथों में कुछ कागज भी थे, शायद वृद्धाश्रम के फौर्म होंगे…”

सुषमा का इतना कहना था कि नलिनी की आंखें भर आईं, उस के और नैंसी के बीच विचारों का मदभेद अवश्य था लेकिन इतना भी नहीं था कि नैंसी उन्हें ओल्ड‌ऐज होम भेजने की सोचे. नलिनी की आंखों में पानी देख सुषमा बोली,”मैं ने तो तुझे पहले ही कहा था कि नैंसी को सत्संग और भजनकीर्तन में अपने साथ जबरदस्ती ले कर आया कर तभी तो वह संस्कारी बन पाएगी लेकिन तुम ऐसा कर नहीं पाई, यह उसी का नतीजा है. मेरी बहू को देख सुबहशाम ईश्वर आराधना करती है, मन लगा कर भजनकीर्तन करती है तभी तो संस्कारी है, धर्मकर्म, पापपुण्य सब जानती है इसलिए परिवार को साथ ले कर चलती है.”

सुषमा और नलिनी की बातें अभी समाप्त नही हुई थीं लेकिन धीरेधीरे अब मंदिर परिसर खाली होने लगा था. सब अपनेअपने घर की ओर जाने लगे थे. तभी सिर पर पल्लू ओढ़े रमा भी वहां आ गई और सुषमा से बोली,”मम्मीजी, चलिए अब हम भी चलते हैं.”

सुषमा उठ खड़ी हुई और नलिनी से बोली,”चलो नलिनी.”

नलिनी शांत रही फिर बोली,”तुम दोनों चलो मैं थोड़ी देर रुक कर जाऊंगी.”

नलिनी के ऐसा कहने पर सुषमा और उस की बहू चले गए. नलिनी काफी देर तक अकेली बैठी रही फिर मन में कुछ निश्चय कर घर लौट आई. नलिनी देर से लौटी है यह देख नैंसी दौड़ कर उस के करीब आ कर बोली,”मम्मीजी, आज आप को आने में बहुत देर हो गई, मैं कब से आप की राह देख रही थी.”

नलिनी ने कोई जवाब नहीं दिया और अपने कमरे की ओर मुड़ गई. तभी उस की नजर टेबल पर रखे कागज पर पड़ी जिस में बड़ीबड़ी अक्षरों में वृद्धाश्रम लिखा था, जिसे पढ़ने के लिए नलनी को चश्मे की जरूरत नहीं थी. नलिनी समझ गई कि सुषमा जो कह रही थी वह सही है.

नलिनी की आंखों से लुढ़कते हुए आंसू उस के गालों पर आ गए और वह फौरन अपने कमरे में चली गई और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. नैंसी ने बहुत आवाज लगाई लेकिन नलिनी ने दरवाजा नहीं खोला, बस इतना कहा कि कुछ देर के लिए मैं अकेले रहना चाहती हूं. नैंसी चुपचाप दरवाजे से लौट ग‌ई, उसे कुछ समझ नहीं आया.

उस रात नलिनी ने किसी से कोई बात नहीं की. नैंसी के लाख मनुहार के बाद भी नलिनी ने खाना भी नहीं खाया. नलिनी के पति सौरभ ने पूरी कोशिश की कि नलिनी कुछ बोले लेकिन वह कुछ नहीं बोली जैसे उस ने न बोलने का प्रण कर लिया हो इस प्रकार मौन रही. इसी प्रकार 4 दिन बीत ग‌ए 5वें दिन नलिनी अपना और अपने पति का सामान पैक करने लगी. यह देख सौरभ बोले,”यह सब तुम क्या कर रही हो?”

नलिनी बिना जवाब दिए पैकिंग में लगी रही तभी वहां नैंसी और उस के पति अमन भी आ गए. नलिनी को इस प्रकार सामान पैक करता देख नैंसी से रहा नहीं गया और वह जोर से बोली,”मम्मीजी, यह सब क्या है, न आप ठीक से खाना खा रही हैं, न किसी से कुछ बोल रही हैं और अब यह पैकिंग… जब तक आप हमें बताएंगी नहीं कि प्रौब्लम क्या है हमें पता कैसे चलेगा… आप बताइए तो सही कि आखिर बात क्या है?”

Diwali Beauty Tips: पर्मानेंट ग्लो के लिए घर पर ट्राई करें हर्बल फेशियल

दीवाली फेस्टिवल नजदीक आ गया है इस त्योहार में संदुर और नेचुरल ग्लो पाने के लिए आमतौर पर महिलाएं काफी पैसा स्किन केयर प्रोडक्ट में खर्च कर देती है. कैमिकल बेस्ड प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करने से स्किन ग्लो तो करती है लेकिन बाद में वहीं त्वचा डल, रुखी और बेजान नजर आती है. ऐसे में कई लोग चेहरे पर चमक लाने के लिए पर्लर में जा कर फेशियल करवाना पसंद करते है. हालांकि कैमिकल बेस्ड फेशियल से कुछ समय निखार रहता है उसके बाद स्किन बेहद डल और बेजान दिखने लगती है. ऐसे में दीवाली पर पर्मानेंट ग्लो पाने के लिए आप हर्बल फेशियल ट्राई कर सकते है.

निखरी और खूबसूरत त्वचा पाने के लिए फेशियल अच्छा ऑप्शन हो सकता है लेकिन कैमिकल युक्त फेशियल का असर चेहरे पर कुछ समय तक ही रहता है जिसके बाद चेहरे पर निखार गायब हो जाता है. ऐसे में नेचुरल ग्लो कैरी करने के लिए हर्बल फेशियल सबसे बेस्ट है. तो आइए जानते है स्किन केयर में हर्बल फेशियल करने के तरीके..

ऐसे बनाएं हर्बल फेशियल

सामग्री

घर पर हर्बल फेशियल करने के लिए 2-3 चम्मच शहद, 2-3 चम्मच चावल या ओट्स का आटा, 1 चम्मच घिसा आलू, आधा कप नारियल का पानी या दूध, आधा कप संतरे का रस, 3 ग्रीन टी बैग, ¼ कप पपीता, 4 स्ट्रॉबेरी, आधा कप केला, 2 चम्मच जैतून का तेल, 2 चम्मच बादाम का तेल और कुछ आइस क्यूब या ठंडा पानी रख लें.

कैसे करें फेशियल

  1. फेस क्लीन करें

सबसे पहले आप साफ पानी से फेस वॉश करें. इसके बाद घिसे आलू को फेस पर लगाकर सर्कुलर मोशन में घुमाते हुए 5 मिनट तक मसाज करें. इससे आपके चेहरे की गंदगी साफ हो जाएगी. इसके बाद चेहरे को साफ गीले कपड़े से पोछ लें.

2. चेहरे पर स्क्रब करें

दूसरा स्टेप फॉलो करने के लिए पपीते को पीस कर चावल या ओट्स के आटे में मिला लें. अब इस पेस्ट से 2 मिनट तक चेहरे की मसाज करें. फिर 5 मिनट बाद टिशू पेपर को भिगो कर चेहरा पोछ लें.

3. हर्बल टोनर लगाएं

ग्रीन टी का टोनर फेस के लिए सबसे बेस्ट हो सकता है. इसके लिए आप ग्रीन टी को पानी में उबालें. अब इस पानी से चेहरे पर स्टीम लें. इससे आपके चेहरे के डर्ट पार्टिकल्स, ब्लैकहेड्स और बैक्टीरिया आसानी से निकल जाएंगे. वहीं स्टीम लेने के बाद 5 मिनट तक फेस पर आइस क्यूब रब करें. इससे चेहरे के ओपेन पोर्स बंद हो जाएंगे.

4. हर्बल मॉइश्चराइजर चेहरे पर लगाएं

सबसे पहले आप मॉइश्चराइजर का इस्तेमाल करने के लिए शहद, केला, संतरे का जूस और नारियल के दूध या पानी को मिक्स करके पेस्ट बना लें. अब इस मिक्सचर से 10 मिनट तक चेहरे की मसाज करें. इसके साथ ही मसाज के बीच-बीच में जैतून या बदाम का तेल लगाते रहे. इसके बाद चेहरे को साफ गीले कपड़े से पोछ लें.

5. हर्बल फेस पैक ट्राई करें

फेशियल के अतिंम स्टेप में हर्बल पैक बनाने के लिए स्ट्रॉबेरी को मैश करके इसमें चावल का आटा और शहद मिलाकर चेहरे पर लगाएं. अब आप चेहरे को ठंडे पानी से धो लें. इसके साथ ही फेशियल के बाद चेहरे पर लाइट मॉइश्चराइजर लगाना न भूले.

11 टिप्स: टीनऐज युवा से दोस्ती के

टीनऐज युवा बहुत सारे बदलावों से गुजरते हैं. इस का सब से बड़ा कारण है हारमोंस. एक तरफ जहां शरीर में तेजी से बदलाव आते हैं, वहीं ये हारमोंस उन की फीलिंग्स और भावनाओं में भी कई तरह के बदलाव लाते हैं. प्यार, अट्रैक्शन, गुस्सा, हर्ट होने जैसी फीलिंग्स अब युवाओं में बढ़ने लगती हैं. जहां एक तरफ वे इन फीलिंग्स और बदलावों को सम  झने की कोशिश कर रहे होते हैं, वहीं स्कूल में पढ़ाई का प्रैशर भी बढ़ने लगता है. यह प्रैशर और हारमोंस बच्चे के बदलते स्वभाव के लिए जिम्मेदार होते हैं.

सकारात्मक रिश्ता बनाए रखने के लिए इन टिप्स को अपनाएं:

  1. जानकारी रखें

भले ही युवा चाहते हैं कि उन पर भरोसा रखा जाए और उन्हें आजादी भी दी जाएं, लेकिन मांबाप इस बात की जानकारी जरूर रखें कि युवा या किशोर कहां जा रहे हैं, किस से मिल रहे हैं, क्या कर रहे हैं या दोस्त कौन हैं.

2. लक्ष्य तक पहुंचने में करें मदद

हर टीनऐजर अपना एक लक्ष्य बनाता है और उसे पूरा करना चाहता है. ऐसे में मांबाप उस की मदद चाहता है और उसे बताया जाए कि उस के इस लक्ष्य को प्राप्त करने में बड़े उस के साथ हैं, साथ ही असफल होने पर उस के आत्मविश्वास को बनाए रखने में हरसंभव उस की मदद भी करेंगे.

3.दोस्त बनें

टीनऐजरों की बेहतर परवरिश के लिए पेरैंट्स बनने के साथसाथ एक दोस्त का रिश्ता भी बनाना होगा जिस से किशोर व युवा अपनी परेशानियां या हर तरह की बातें उन के साथ खुल कर सा  झा कर सकें ताकि वे किसी तरह की गलत चीजों में फंसने से बचे रहें. उन का दोस्ताना व्यवहार टीनऐजरों को करीब रखेगा तभी बड़े उन्हें सहीगलत की जानकारी बेहतर तरीके से बता सकेंगे.

4.कुछ समय साथ में गुजारें

यह जरूरी है कि बड़े दिनभर में कम से कम 1 घंटा जरूर साथ गुजारें. यह समय साथ खाना खाने का, कुकिंग का या सफाई का हो सकता है या कुछ और. रात में सोने से पहले आप साथ में 20-25 मिनट की वाक कर सकते हैं और दिनभर की बातों को सा  झा कर सकते हैं. टीनऐजरों के साथ वीडियो गेम्स, बोर्ड गेम्स खेले जा सकते हैं. उन से राजनीति पर गंभीर चर्चा की जा सकती है. बुक्स या पत्रिकाओं में लिखी बातों की चर्चा की जा सकती है.

5.धैर्य रखें

टीनऐजरों को एक बेहतर परवरिश देने का तरीका है कि मांबाप धैर्य रखें. टीनऐजर खुद इतने बदलावों से गुजर रहा है कि बड़ों से सहयोग की जरूरत होती है. यहां बड़े सम  झें कि उन का बच्चा या बच्ची अजीब तरीके से व्यवहार क्यों कर रहा है. उस के मूड स्विंग्स को ले कर उस पर चिल्लाएं नहीं. ऐसे में एक पेरैंट होने के नाते बड़े उस की परेशानियों को अच्छी तरह से सम  झें. इस के लिए थोड़ा धैर्य रखें. डांटडपट और गुस्सा न करें. याद रखें कि टीनऐज तक आतेआते टीनऐजर खुद जोर से बोलना, गुस्सा करना सीख चुके होते हैं. उन्हें बहुत सी ऐसी बातें भी मालूम होती हैं जो बड़ों को नहीं मालूम होती.

टीनऐजरों से उस के मन का हाल पूछें. लेकिन अगर वह बड़ों को अपनी कोई बात नहीं बताना चाहता तो उस पर जवाब देने की जबरदस्ती न की जाए. बस उसे यह भरोसा दिलाएं कि बड़े उस के साथ हैं. जब भी वह बात करने के लिए आए तो बड़े उसे पूरा समय दें. उसे कुरेदने के बजाय खुद बोलने का मौका दें. इस से वह किसी भी तरह का दबाव का प्रैशर महसूस नहीं करेगा और बड़ों से खुल कर अपनी बात कह पाएगा.

6. सिखाएं बड़ों का आदरसम्मान करना 

कई बार अपने गुस्से और   झुं  झलाहट में टीनऐजर अपनी हदें पार कर जाते हैं और मातापिता को भलाबुरा बोल देते हैं. ऐसे में बड़े संयम बनाए रखें. मां उन से कहे कि वह उन का गुस्सा या परेशानी सम  झ सकते हैं, लेकिन फिर भी उन्हें मां से इस तरह से बात नहीं करनी चाहिए.

उन्हें प्यार से सम  झाया जाए कि उन के शरीर और मन में जो बदलाव आ रहे हैं बड़े उन्हें अच्छी तरह से सम  झ रहे हैं. लेकिन फिर भी कुछ चीजें हैं जिन्हें बिलकुल बरदाश्त नहीं किया जाएगा जैसे   झूठ बोलना, गालीगलौच, बड़ों की बेइज्जती, बड़ों से तेज आवाज में बात करना. यदि किशोर या युवा ये चीजें करता है तो बड़े उसे बिना डांटे उस की गलती का एहसास दिलाएं और आगे से ध्यान रखने के लिए कहें.

7. उन पर भरोसा करें

इस उम्र में किशोर व युवा अपने दोस्तों के बहुत करीब होते हैं. वे परिवार वालों से ज्यादा अपने दोस्तों को अपनी पर्सनल बातें बताते हैं. ऐसे में बड़े टीनऐजरों के दोस्तों के बारे में बातें करें, पर उन की गलतियां जानने की कोशिश न करें. बस, यह जानने की कोशिश करें कि कहीं उन की कोई सहेली या दोस्त ऐसा तो नहीं जो कुछ गलत करने के लिए उकसा रहा हो?

यदि बड़ों को ऐसा लगता है तो युवा को आगाह करें और समझाएं. अगर युवा इस आयु में नई बातें जानने में उत्सुक होते हैं कि वह कोई गलत काम नहीं कर रहा है, तो उस की जासूसी न की जाए उस पर भरोसा किया जाए. कई बार वे खुद गलतियां करने के बाद ही सीखते हैं इसलिए उन्हें हक है अपनी गलतियों से सीखने का एक मौका जरूर मिले.

8. तुलना न करें

किशोर युवाओं को कोई भी गलत काम करते हुए देख कर मांबाप तुरंत उसे उस की क्लास के टौपर, अपने दोस्त के बच्चे या किसी पड़ोस के बच्चे से कंपेयर करने लगते हैं, ‘देखो, मडानाजी का लड़का तुम्हारी क्लास में ही है और स्कूल और कोचिंग दोनों जगह टौप करता है,’ ‘तुम से अच्छा तो तुम्हारा छोटा भाई है, खेलने पर कम और पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान लगाता है’ जैसी बातें लगभग सभी मातापिता जानेअनजाने में करते ही हैं. ऐसा भूल कर भी न कहें. उस में हीनभावना भी आ सकती है जो उस के लक्ष्य में आगे बढ़ने में बाधा बन सकती है. इस से आप अपने बच्चे को खुद से दूर कर लेंगे.

मांबाप को भी सम  झना होगा कि हर टीनऐजर अपनी अलग खासीयत और क्षमता के साथ बिलकुल अलग होते हैं. टीनऐजर मांबाप का पैदा किया होता है पर वह इंडीपैंडेंट ईकाई है, यह समझ लें. जरूरी नहीं है कि हरकोई टौप ही करे क्योंकि कोई बच्चा पढ़ाई में अच्छा होता है, कोई ड्राइंगपेंटिंग में, कोई खेलकूद में तो कोई और किसी फील्ड या गतिविधि में. इसीलिए बड़े हरेक की खासीयत यानी उस का टेलैंट पहचानें और उसे उसी की गति और सुविधा से आगे बढ़ने दें.

9.खुश रहें

यदि कोई किशोर युवा अपनी समस्याएं ले कर मांबाप के पास आता है तो उन को खुश होना चाहिए कि वह चाहता है कि उस की बात ध्यान से सुनी जाए. इस के लिए पर्याप्त समय दिया जाए. यह कह कर पीछा न छुड़ाया जाए कि अभी नहीं बाद में बताना, यह क्या बारबार तुम अपनी हर समस्या को ले कर आ जाते हो, अपनी समस्या खुद हल करना सीखो वगैरहवगैरह.

10. बनाएं कुछ रूल्स

हो सकता है कि वे ओवर स्मार्ट बनने के चक्कर में आप को या आप की बोली हुई चीजों को नजरअंदाज करने लगे. घर में बहुत ज्यादा सख्ती अच्छी नहीं लगती है, लेकिन पूरी तरह ढील देना भी ठीक नहीं है. घर में माहौल को बैलेंस बनाए रखने के लिए कुछ रूल्स बनाए जाएं तो युवा सहर्ष उन्हें अपना लेंगे. अगर रूल्स बताने के साथसाथ इन्हें बनाए जाने की वजह भी बताएं साथ ही इस से क्या फायदा होगा यह भी बताएं. ऐसे में वह यह सम  झ पाएगा कि उसे कब और कहां, कैसे, क्यों व्यवहार करना है.

11. हर सिचुएशन में रहें शांत

टीनऐजर खुद स्मार्ट होते हैं पर उन्हें लगता है कि पेरैंट्स का दिया हुआ ज्ञान पुराने जमाने का है. वे अपनी हर परेशानी या समस्या या कोई भी जानकारी मातापिता से पूछने के बजाय अपने दोस्तों या गूगल से पूछते हैं. तब कई बार पेरैंट्स और बच्चे का ईगो बीच में आने लगता है और यह   झगड़े या नैगेटिविटी का कारण बनने लगता है. इस सिचुएशन में आप को एक मैच्योर पर्सन की तरह व्यवहार करना चाहिए. शांत रह कर सिचुएशन को संभालने की कोशिश करें.

टीनऐज पेरैंट्स और टीनऐजर दोनों के लिए  एक कठिन दौर है लेकिन एक अच्छे मातापिता बन कर निश्चित रूप से वे जीवन के उम्र के इस पड़ाव को आसान बनाने में आप मदद कर सकते हैं. अपने व्यवहार और आदतों में बदलाव से यदि वे कूल पेरैंट्स रहेंगे तो इस बात की बहुत संभावना है कि किशोर व युवा मांबाप की बात मानें या सुनें और उन्हें बड़ों के साथ कुछ भी शेयर करने में किसी तरह की हिचक या संकोच न हो.

इसीलिए टीनऐजर को एक समझदार पेरैंट की सख्त जरूरत होती है. उस के साथ ही बड़ों को भी अपने व्यवहार में बदलाव लाने की जरूरत है.

त्योहार है खास तो डिश भी खास

त्योहारों को मौसम हमारे दिलदिमाग पर ऐसा छाता है कि हर तरफ से सकारात्मक ऊर्जा आने के साथ-साथ हमारी एपेटाइट भी बढ़ जाती है. हम याद करने लगते हैं वो दिन जब मां किचन में तरह-तरह के पकवान बनाती थी और हम पकवानों की खुशबू से बेचैन हो कर   झट से उनका स्वाद चखने को बेकरार रहते थे. स्वाद के गलियारों से एक ऐसी डिश निकर कर आती है, छानार कौफ्ता लेकिन सवाल वही कि क्या वो मां के हाथ वाला जादू अब इस डिश में जग पाएगा.

छानार कोफ्ता डिश में मसालों का सही मिश्रण होना बहुत जरूरी है और इस सही मिश्रण और संतुलन के साथ आता है सनराइज़ का शाही गरममसाला. जब यह सनराइज़ का शाही गरममसाला ग्रेवी में घुलता है तो देता है वही मां के हाथों के स्वाद का एहसास, तो आइए, त्योहार को छानार कोफ्ता के साथ और भी स्पेशल बनाते हैं.

छानार कोफ्ता

सामग्री छेना बॉल्स की

1/2 किलो सूखा छेना या पनीर, 1 चम्मच बेसन, थोड़ा सा लालमिर्च पाउडर, थोड़ी सी हरी मिर्चें बारीक कटीं, नमक स्वादानुसार, तलने के लिए तेल.

सामग्री करी की

1 कप प्याज का पेस्ट, 1 कप टमाटर का पेस्ट, 1 छोटा चम्मच अदरक-लहसुन का पेस्ट, 2 चम्मच काजू, पॉपी सीड्स का पेस्ट, 5-6 किशमिश, 1 चम्मच सनराइज़ शाही गरममसाला, 2 हरी मिर्चें कटीं, 1 छोटा चम्मच चीनी, नमक स्वादानुसार, 1 चम्चम घी, जरूरतानुसार तेल.

विधि छेना बॉल्स की

तेल छोड़ कर छेना बॉल्स की सारी सामग्री एक साथ अच्छी तरह मिक्स कर लें और 15 मिनट तक रेस्ट करने के लिए ढक कर रखें. अब कड़ाही में तेल गरम करें और मिश्रण की बॉल्स या पैटीज बना कर सुनहरा होने तक तल कर निकाल लें.

विधि ग्रेवी की

कड़ाही में तेल और घी को गरम कर एक के बाद एक प्याज, टमाटर और अदरक-लहसुन का पेस्ट भून लें. अब सनराइज़ शाही गरम मसाला मिला कर धीमी आंच पर चलाते हुए अच्छी तरह भूनें. काजू पॉपी सीड्स  का पेस्ट मिला कर कुछ देर भूनें. जरूरतानुसार पानी और चीनी व नमक मिला कर एक उबाल आने दें. अब छेना बॉल्स और किशमिश मिला दें. धीमी आंच पर बॉल्स ग्रेवी में सोक होने दें. तैयार हो जाने पर हरी धनिया से सजा कर राइस के साथ सर्व करें.

मंदिर के नाम पर झूठों का सहारा

हिंदूमुसलिम, हिंदूमुसलिम करतेकरते हिंदूसिख, हिंदूसिख होना ही था. जो पत्नी अपने पति को भाइयों की संपत्ति को हड़पने को उकसाएगी उस के भाईबहन उसी की संपत्ति हड़पने की प्लानिंग कर रहे हों तो गलत नहीं होगा. जब आप बेमतलब के झगड़ों के लिए कीकर के बीज बोएंगे तो कीकर का जंगल ही उगेगा, उस में से आम नहीं निकलेंगे.

आज भारत में औरतें अपने पिता की संपत्ति में से हक के लिए जब लड़ती हैं तो उन्हें यह याद रखना होगा कि उन की ननदें भी ऐसा करेंगी. या तो समस्या को प्यार और दुलार से न्यायोचित ढंग से सुलझा लो वरना एक जगह लगी आग की चिनगारियां दूसरी की साड़ी पर भी छेद करेंगी.

भारत के हिंदू कट्टरवादियों ने दिल खोल कर खुशी जाहिर की आखिर मुसलमानों, दलितों, शूद्रों को सबक सिखाने वाली सरकार मंदिर के नाम पर झूठों का सहारा ले कर बन ही गई और शायद पुरानी पौराणिक परंपरा फिर आ जाएगी जिस में नीची जातियां सेवा के लिए तैयार रहेंगी. इन कट्टरवादियों की औरतों ने साथ दिया पर ये औरतें भूल गईं कि इस का असर होगा कि उन्हें घरों में बिना तालों के बंद कर दिया जाएगा. इन के टेलैंट का इस्तेमाल सिर्फ तंबोला खेलने में बरबाद कर दिया जाएगा.

ये भूल गईं कि हिंदूमुसलिम से शुरू हुई आग अन्य धर्मों तक तो पहुंचेगी ही और कनाडा में बसे लाखों सिख जो मजदूरी करने गए थे पर अब सैकड़ों एकड़ जमीन के मालिक हैं, अपनी खालिस्तान की बेहूदा मांग को उसी तरह खड़ा करेंगे जैसे हर तार्किक को भारत में पाकिस्तानी उग्रवादी, नक्सली, देशद्रोही कह दिया जाता है.

पंजाब में खालिस्तान की मांग अंदरअंदर ही सुलग रही हो तो पता नहीं पर इतना साफ है कि भारतीय जनता पार्टी का सफाया हो चुका है और उस के साथ प्रकाश सिंह बादल की पार्टी अकाली दल धूल में जा चुकी है जो हिंदूमुसलिम विवाद को शह दे रही थी. पंजाब ने फ्रस्टे्रशन में ड्रग्स का रास्ता चुना है और भारत से बाहर बसे सिखों ने खुल्लमखुल्ला खालिस्तान का. भारतकनाडा संबंध बेहद खराब हो चुके हैं और अमेरिका, इंगलैंड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड अपने भाई कनाडा के साथ हैं. खालिस्तानी नारे इन देशों में भी गूजेंगे, यह दिख रहा है.

इस का हल फालतू में तूतू, मैंमैं करने से नहीं होगा. जिस से मतभेद हैं उस के साथ किचन में बैठ कर मामले को ठंडा करने से होगा. पर लट्ठ मारने की आदी हो चुकी हिंदूमुसलिम करने वाली जनता और उस की समर्थक सरकार से इस की कोई उम्मीद नहीं है. जो भी पार्टी में, किट्टी में, व्हाट्सऐप पर हिंदूमुसलिम कर रहा है, वह सोच ले कि वह देश के समाज को तारतार कर रहा है, वह दीवाली के पटाखों से पड़ोसियों के घर जला रहा है.

मेरे घुटनों में दर्द होता है, कहीं मुझे गठिया तो नहीं हैं?

सवाल

मेरी उम्र 38 साल है. दरअसल मेरे घुटनों में अकसर दर्द बना रहता है. हलका चलने पर ही दर्द शुरू हो जाता है. क्या यह गठिया के लक्षण हैं? इस से कैसे छुटकारा पाया जा सकता है?

जवाब

अगर घुटने में दर्द और जकड़न हो और चलनेफिरने पर घुटनों में आवाज आए तो गठिया की शुरुआत हो चुकी है. इस के बढ़ने पर घुटनों को मोड़ने में कठिनाई होती है. घुटनों में विकृतियां भी हो सकती हैं. घुटनों की दिक्कतों की जल्दी शुरुआत का एक और कारण मोटापा और खराब पोषण है. करीब 90त्न की कमी है जो बोन मैटाबोलिज्म को नियंत्रित करने के लिए जरूरी है. समस्या से छुटकारा पाने के लिए व्यायाम करें, सैर करें और वजन को संतुलित रखें. इस के साथ ही अस्पताल जा कर समस्या की जांच कराएं वरना आप की लापरवाही आप पर भारी पड़ सकती है.

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मेरी उम्र 28 साल है. जब मैं भारी चीजें उठाता हूं या ऐक्सरसाइज करता हूं तो मेरे जोड़ों में दर्द होने लगता है. कभी यह दर्द हलका होता तो कभी तेज हो जाता है. इस दर्द का क्या कारण है और इस से छुटकारा पाने का इलाज क्या है?

आप जिन लक्षणों का जिक्र कर रहे हैं वे अवैस्कुलर नैक्रोसिस की बीमारी की ओर इशारा करते हैं. यह एक ऐसी स्थिति है जिस में बोन टिशू मरने लगते हैं जिस के कारण हड्डियां गलने लगती हैं. बीमारी का समय पर इलाज जरूरी है अन्यथा एक समय के बाद जब बीमारी गंभीर हो जाती है तो हड्डियां पूरी तरह गलने लगती हैं. इस के बाद आप को गंभीर आर्थ्राइटिस की बीमारी हो सकती है.

-डा. अखिलेश यादव

वरिष्ठ प्रत्यारोपण सर्जन, जौइंट रिप्लेसमैंट, सैंटर फौर नी ऐंड हिप केयर, गाजियाबाद. 

पाठक अपनी समस्याएं इस पते पर भेजें : गृहशोभा, ई-8, रानी झांसी मार्ग, नई दिल्ली-110055.

स्रूस्, व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या 9650966493 पर भेजें.

पिएं ये तीन जूस, तेजी से कम होगा आपका वजन

जिस तरह की लोगों की जीवनशैली बन गई है वजन का बढ़ना लोगों की सबसे बड़ी समस्या बन गई है. वजन कम करने के लिए लोग वर्क आउट, एक्सरसाइज, जिम, डाइटिंग जैसी ना जाने कौन कौन सी चीजें करते हैं. पर उससे उन्हें मनमुताबिक फायदा नहीं होता. वजन कम करने के लिए बेहद जरूरी है कि आप किसी भी खाद्य पदार्थ से परहेज ना करें. इस खबर में हम आपको कुछ जूसों के बारे में बताएंगे जिसे अपनी डाइट में शामिल कर आप अपने वजन को कम कर सकती हैं.

गाजर का जूस

गाजर में फाइबर की मात्रा काफी अधिक होती है. फाइबर के पाचन में काफी वक्त लगता है और इसे खाने से ज्यादा भूख भी नहीं लगती. अगर आप जल्दी अपना वजन कम करना चाहती हैं तो आज ही अपनी टेली डाइट में गाजर को शामिल करें. 100 ग्राम गाजर में करीब 41 कैलोरी और 3 ग्राम फाइबर होता है. गाजर और चुकंदर के जूस में आंवला का रस भी मिला सकते हैं.

टमाटर का जूस

वजन कम करने के में टमाटर काफी लाभकारी होता है. आपको बता दें कि टमाटर में बहुत कम कैलोरी और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा होती है. 100 ग्राम टमाटर में करीब 18 कैलोरी और 3.86 ग्राम कार्बोहाइड्रेट होता है. अगर आप वजन कम करना चाहती हैं तो अभी से टमाटर के जूस का सेवन शुरू कर दें. इसमें पानी की खूब मात्रा होती है. टमाटर के साथ चुकंदर का रस मिलकार भी पी सकते हैं.

सेब का जूस

सेब सेहत के लिए काफी लाभकारी होता है. ये एक लो कौलोरी वाला फल है. आपको बता दें कि 100 ग्राम सेब में 50 कैलोरी होती है. वजन कम करने के लिए इसे अपनी डाइट में शामिल करना एक अच्छा आइडिया है.

धन्नो: जब अनु की सहायता से बदली भानुमती की किस्मत

भानुमती नाम था उन का. निम्नमध्य- वर्गीय परिवार, परिवार माने पूरे डेढ़ दर्जन लोग, कमाने वाला इकलौता उन का पति और वे स्वयं राजस्थान के एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका.

‘‘जब देखो तब घर में कोहराम छिड़ा रहता है,’’ वे अकसर अनु से कहती थीं. अनु उन से आधी उम्र की थी. उस की नियुक्ति प्रिंसिपल के पद पर हुई थी. भानुमती अकसर देर से स्कूल आतीं और जब आतीं तो सिर पर पट्टी बंधी रहती. सिर में उन के सदैव दर्द रहता था. चिड़चिड़ा स्वभाव, स्कूल आती थीं तो लगता था किसी जंग के मैदान से भाग कर आई हों.

उन्हें अनुशासन में बांधना असंभव था. अनु उन से एक सुहृदया बौस की तरह पेश आती थी. यही कारण था कि सब की अप्रिय, भानुमतीजी अपने जीवन की पोथी उस के सामने खोल कर बैठ जाती थीं.

एक दिन प्रार्थना सभा में वे चक्कर खा कर गिर पड़ीं. तुरंत चिकित्सा आदि की गई तो पता चला कि पिछले 24 घंटे से उन्होंने एक बूंद पानी भी नहीं पिया था. वे 7 दिन से व्रत कर रही थीं. स्कूल आना बेहद जरूरी था क्योेंकि परीक्षा चल रही थी. समय ही नहीं जुटा पाईं कि अपना ध्यान रख सकें. जब उन्हें चाय आदि पिला कर स्वस्थ किया गया तो एकदम से फफक पड़ीं.

‘‘आज घर में 10 रुपए भी नहीं हैं. 7 अपने बच्चे, 2 हम, सासससुर, 1 विधवा ननद व 4 उस के बच्चे. सब के तन पर चादर तानतेतानते चादर ही फट गई है, किसकिस का तन ढकूं? किसकिस के पेट में भोजन डालूं? किसकिस के पैरों को पत्थरकंकड़ चुभने से बचाऊं? किस को पढ़ाऊं, किस को नहीं? सब जरूरी हैं. एक का कुरता सिलता है तो दूसरे की सलवार फट जाती है. एक की रोटी सिंकती है तो दूसरे की थाली खाली हो जाती है. और ये लक्ष्मीमाता मेरे घर के दरवाजे की चौखट से कोसों दूर…वहां विष्णु के पैर दबा रही हैं. खुद तो स्वर्णजडि़त ताज पहने, कमल के फूल पर विराजमान हैं और यहां उन के भक्तों को कांटों के गद्दे भी नसीब नहीं होते…’’

न मालूम क्याक्या बड़बड़ा रही थीं. उस दिन तो जैसे किसी वेगवती नदी का बांध टूट गया हो. उन्होंने किसी को नहीं छोड़ा. न ऊपर वाले को न नीचे वाले को….

थोड़ा स्वस्थ होने पर बोलीं, ‘‘चाय का यह घूंट मेरे गले में दिन भर बाद उतरा है पर किसी को फिक्र है मेरी? पति तो इस भीड़ में ऐसे खो गए हैं कि मेरी शक्ल देख कर भी मुझे पहचान नहीं पाएंगे. बस, बच्चे पैदा कर डाले, वह भी 7. आज के जमाने में जहां लोगों के घर 1 या 2 बच्चे होते हैं, मेरे घर में दूसरों को देने लायक ऐक्स्ट्रा बच्चे हैं. 6 बेटियां हैं, परंतु उन्हें तो बेटा चाहिए, चाहिए तो बस चाहिए, आखिर 7वां बेटा हुआ.

‘‘सच पूछो तो मैडम, मुझे अपनी कोखजनों से कोई लगाव नहीं है, कोई ममता नहीं है. आप कहेंगी कि कैसी मां हूं मैं? बस, मैं तो ऐसी ही हूं…रूखी. पैसे का अभाव ब्लौटिंग पेपर की तरह समस्त कोमल भावनाओं को सोख गया है. पानी सोख लेने वाला एक पौधा होता है, ठीक उसी तरह मेरे इस टब्बर ने पैसों को सोख लिया है,’’ वे रोती जा रही थीं और बोलती जा रही थीं.

‘‘जीवन में कुछ हो न हो, बस पैसे का अभाव नहीं होना चाहिए. मुझे तो आजकल कुछ हो गया है, पेड़ों पर लगे पत्ते रुपए नजर आते हैं. मन करता है, उन्हें तोड़ लाऊं. सड़क पर पड़े ईंट के टुकड़े रुपयों की गड्डी नजर आते हैं और नल से पानी जब खाली लोहे की बालटी में गिरता है तो उस में भी पैसों की खनक जैसी आवाज मुझे सुनाई देती है.’’

उस दिन उन की यह दशा देख कर अनु को लगा कि भानुमतीजी की मानसिक दशा बिगड़ रही है. उस ने उन की सहायता करने का दृढ़ निश्चय किया. मैनेजमैंट के साथ मीटिंग बुलाई, भानुमतीजी की सब से बड़ी लड़की जो कालेज में पढ़ रही थी, उसे टैंपोररी नौकरी दिलवाई, दूसरी 2 लड़कियों को भी स्कूल के छोटे बच्चों के ट्यूशन दिलवाए.

अनु लगभग 8 साल तक उस स्कूल में प्रिंसिपल रही और उस दौरान भानुमतीजी की समस्याएं लगभग 50 फीसदी कम हो गईं. लड़कियां सुंदर थीं. 12वीं कक्षा तक पढ़ कर स्वयं ट्यूशन करकर के उन्होंने कुछ न कुछ नौकरियां पकड़ लीं. सुशील व कर्मठ थीं. 4 लड़कियों की सहज ही बिना दहेज के शादियां भी हो गईं. 1 बेटी डाक्टरी में निकल गई और 1 इंजीनियरिंग में.

ननद के बच्चे भी धीरेधीरे सैटल हो गए. सासससुर चल बसे थे, पर उन का बुढ़ापा, भानुमतीजी को समय से पहले ही बूढ़ा कर गया था. 47-48 साल की उम्र में 70 साल की प्रतीत होती थीं भानुमतीजी. जब कभी कोई बाहर से सरकारी अफसर आता था और शिक्षकों का परिचय उन से करवाया जाता था, तो प्राय: कोई न कोई अनु से प्रश्न कर बैठता था :

‘‘आप के यहां एक टीचर काफी उम्र की हैं, उन्हें तो अब तक रिटायर हो जाना चाहिए.’’

उन की उम्र पता चलने पर, उन के चेहरे पर अविश्वास के भाव फैल जाते थे. जहां महिलाएं अपनी उम्र छिपाने के लिए नईनई क्रीम, लोशन व डाई का प्रयोग करती हैं वहीं भानुमतीजी ठीक इस के विपरीत, न बदन पर ढंग का कपड़ा न बालों में कंघी करना. लगता है, वे कभी शीशे में अपना चेहरा भी नहीं देखती थीं. जिस दिन वे मैचिंग कपड़े पहन लेती थीं पहचानी नहीं जाती थीं.

‘‘महंगाई कितनी बढ़ गई है,’’ वे अकसर कहती रहती थीं. स्टाफरूम में उन का मजाक भी उड़ाया जाता था. उन के न मालूम क्याक्या नाम रखे हुए थे… उन्हें भानुमतीजी के नाम से कोई नहीं जानता था.

एक दिन इंटरस्कूल वादविवाद प्रतियोगिता के सिलसिले में अनु ने अपने नए चपरासी से कहा, ‘‘भानुमतीजी को बुला लाओ.’’

वह पूरे स्कूल में ढूंढ़ कर वापस आ गया. तब अनु ने उन का पूरा नाम व क्लास लिख कर दिया, तब कहीं जा कर वे आईं तो अनु ने देखा कि चपरासी भी हंसी को दबा रहा था.

अनु ने वादविवाद का विषय उन्हें दे दिया और तैयारी करवाने को कहा. विषय था : ‘टेलीविजन धारावाहिक और फिल्में आज साहित्य का स्थान लेती जा रही हैं और जिस प्रकार साहित्य समाज का दर्पण होता जा रहा है वैसे ही टेलीविजन के धारावाहिक या फिल्में भी.’

वादविवाद प्रतियोगिता में बहुधा टीचर्स की लेखनी व वक्ता का भावपूर्ण भाषण होता है. 9वीं कक्षा की नीति प्रधान, भानुमतीजी की क्लास की थी. उस ने ओजपूर्ण तर्क रखा और समस्त श्रोताओं को प्रभावित कर डाला. उस ने अपना तर्क कुछ इस प्रकार रखा था :

‘टेलीविजन धारावाहिक व फिल्में समाज का झूठा दर्पण हैं. निर्धन किसान का घर, पांचसितारा होटल में दिखाया जाता है. कमरे में परदे, सोफासैट, खूबसूरत पलंग, फर्श पर कालीन, रंगीन दीवारों पर पेंटिंग और बढि़या स्टील के खाली डब्बे. भारी मेकअप व गहनों से लदी महिलाएं जेवरात की चलतीफिरती दुकानें लगती हैं.’

व्यंग्यात्मक तेवर अपनाते हुए नीति प्रधान पुरजोर पौइंट ढूंढ़ लाई थी, टेलीविजन पर गरीबी का चित्रण और वास्तव में गरीबी क्या होती है?

‘गरीब के नए कपड़ों पर नए कपड़ों का पैबंद लगाया दिखाते हैं. वे तो अकसर ऐसे लगते हैं जैसे कोई बुटीक का डिजाइन. गरीबी क्या होती है? किसी गरीब के घर जा कर देखें. आजकल के युवकयुवतियां घुटनों पर से फटी जीन्स पहनना फैशन मानते हैं, तब तो गरीब ही सब से फैशनेबल हैं. बड़ेबड़े स्टेटस वाले लोग कहते हैं :

‘आई टेक ब्लैक टी. नो शुगर प्लीज.’

‘अरे, गरीब के बच्चे सारी जिंदगी ब्लैक टी ही पीते रहे हैं, दूध और शक्कर के अभाव में पलतेपलते वे कितने आधुनिक हो गए हैं, उन्हें तो पता ही नहीं चला. आजकल अकसर लोग महंगी होलव्हीट ब्रैड खाने का ढोल पीटते हैं. अरे, गरीब तो आजीवन ही होलव्हीट की रोटियां खाता आया है. गेहूं के आटे से चोकर छान कर रोटियां बनाईं तो रोटियां ही कम पड़ जाएंगी. और हां, आजकल हर वस्तु में रिसाइक्ंिलग शब्दों का खूब इस्तेमाल होता है, गरीब का तो जीवन ही रिसाइकल है. सर्दी की ठिठुरती रातों में फटेपुराने कपड़ों को जोड़ कर जो गुदड़ी सिली जाती है उसे कोई फैशनेबल मेमसाहब अपना बटुआ खाली कर खरीद कर ले जाएंगी.’

धन के अभाव का ऐसा आंखोंदेखा हाल प्रस्तुत करने वाला और कौन हो सकता था? प्रतियोगिता में नीति प्रथम घोषित हुई थी.

अनु को दिल्ली आए अब 10-12 वर्ष हो गए थे. अब तो वह शिक्षा मंत्रालय में, शिक्षा प्रणाली के योजना विभाग में कार्य करने लगी थी. अत: उस स्कूल के बाद छात्रों व अध्यापकों के साथ उस की नजदीकियां खत्म हो गई थीं. अकसर अनु को वहां की याद आती थी. उस स्कूल की लगभग सभी अध्यापिकाएं….सब के जीवन में कहीं न कहीं कोई न कोई कमी तो थी ही. कोई स्वास्थ्य से परेशान तो कोई अपने पति को ले कर दुखी. कोई समाज से तो कोई मकान से.

जहां सब सुख थे, वहां भी हायतौबा. मिसेज भंडारी बड़े हंसमुख स्वभाव की महिला थीं, संपन्न, सुंदर व आदरणीय. उन्हें ही अनु कार्यभार सौंप कर आई थी. वे अकसर अपनी सास के बारे में बात करती और कहती थीं, ‘‘मेरी सास के पास कोई दुख नहीं है, फिर भी वे दुख ढूंढ़ती रहती हैं, वास्तव में उन्हें सुखरोग है.’’

एक दिन अनु दिल्ली के एक फैशनेबल मौल में शौपिंग करने गई थी. वहां अचानक उसे एक जानापहचाना चेहरा नजर आया. करीने से कढ़े व रंगे बाल, साफसुथरा, मैचिंग सिल्क सलवार- सूट, हाथों में पर्स. पर्स खोल कर रुपयों की गड्डी निकाल कर काउंटर पर भुगतान करते हुए उन के हाथ और हाथों की कलाइयों पर डायमंड के कंगन.

‘‘भानुमतीजी, आप…’’अविश्वास के बीच झूलती अनु अपलक उन्हें लगभग घूर रही थी.

‘‘अरे, अनु मैडम, आप…’’

दोनों ने एकदूसरे को गले लगाया. भानुमती के कपड़ों से भीनीभीनी परफ्यूम की खुशबू आ रही थी.

अनु ने कहा, ‘‘अब मैं मैडम नहीं हूं, आप सिर्फ अनु कहिए.’’

अनु ने देखा 4-5 बैग उन्हें डिलीवर किए गए.

‘‘आइए, यहां फूडकोर्ट में बैठ कर कौफी पीते हैं,’’ अनु ने आग्रह किया.

‘‘आज नहीं,’’ वे बोलीं, ‘‘बेटी आज जा रही है, उसी के लिए कुछ गिफ्ट खरीद रही थी. आप घर आइए.’’

अनु ने उन का पता और फोन नंबर लिया. मिलने का पक्का वादा करते हुए दोनों बाहर निकल आईं. अनु ने देखा, एक ड्राइवर ने आ कर उन से शौपिंग बैग संभाल लिए और बड़ी सी गाड़ी में रख दिए. अनु की कार वहीं कुछ दूरी पर पार्क थी. दोनों ने हाथ हिला कर विदा ली.

भानुमतीजी की संपन्नता देख कर अनु को बहुत खुशी हुई. सोचने लगी कि बेचारी सारी जिंदगी मुश्किलों से जूझती रहीं, चलो, बुढ़ापा तो आराम से व्यतीत हो रहा है. अनु ने अनुमान लगाया कि बेटा होशियार तो था, जरूर ही अच्छी नौकरी कर रहा होगा. समय निकाल कर उन से मिलने जरूर जाऊंगी. भानुमतीजी के 3-4 फोन आ चुके थे. अत: एक दिन अनु ने मिलने का कार्यक्रम बना डाला. उस ने पुरानी यादों की खातिर उन के लिए उपहार भी खरीद लिया.

दिए पते पर जब अनु पहुंची तो देखा बढि़या कालोनी थी. गेट पर कैमरे वाली सिक्योरिटी. इंटरकौम पर चैक कर के, प्रवेश करने की आज्ञा के बाद अनु अंदर आई. लंबे कौरीडोर के चमकते फर्श पर चलतेचलते अनु सोचने लगी कि भानुमतीजी को कुबेर का खजाना हाथ लग गया है. वाह, क्या ठाटबाट हैं.

13 नंबर के फ्लैट के सामने दरवाजा खोले भानुमतीजी अनु की प्रतीक्षा में खड़ी थीं. खूबसूरत बढि़या परदे, फर्नीचर, डैकोरेशन.

‘‘बहुत खूबसूरत घर है, आप का.’’

कहतेकहते अचानक अनु की जबान लड़खड़ा गई. वह शब्दों को गले में ही घोट कर पी गई. सामने जो दिखाई दिया, उसे देखने के बाद उस में खड़े रहने की हिम्मत नहीं थी. वह धम्म से पास पड़े सोफे पर बैठ गई. मुंह खुला का खुला रह गया. गला सूख गया. आंखें पथरा गईं. चश्मा उतार कर वह उसे बिना मतलब पोंछने लगी. भानुमतीजी पानी लाईं और वह एक सांस में गिलास का पानी चढ़ा गई. भानुमतीजी भी बैठ गईं. चश्मा उतार कर वे फूटफूट कर रो पड़ीं.

‘‘देखिए, देखिए, अनुजी, मेरा इकलौता बेटा.’’

हक्कीबक्की सी अनु फे्रम में जड़ी 25-26 साल के खूबसूरत नौजवान युवक की फोटो को घूर रही थी, उस के निर्जीव गले में सिल्क के धागों की माला पड़ी थी, सामने चांदी की तश्तरी में चांदी का दीप जल रहा था.

‘‘कब और कैसे?’’

सवाल पूछना अनु को बड़ा अजीब सा लग रहा था.

‘‘5 साल पहले एअर फ्रांस का एक प्लेन हाइजैक हुआ था.’’

‘‘हां, मुझे याद है. अखबार में पढ़ा था कि पायलट की सोच व चतुराई के चलते सभी यात्री सुरक्षित बच गए थे.’’

‘‘जी हां, ग्राउंड के कंट्रोल टावर को उस ने बड़ी चालाकी से खबर दे दी थी, प्लेन लैंड करते ही तमाम उग्रवादी पकड़ लिए गए थे परंतु पायलट के सिर पर बंदूक ताने उग्रवादी ने उसे नहीं छोड़ा.’’

‘‘तो, क्या वह आप का बेटा था?’’

‘‘हां, मेरा पायलट बेटा दुष्यंत.’’

‘‘ओह,’’ अनु ने कराह कर कहा.

भानुमतीजी अनु को आश्वस्त करने लगीं और भरे गले से बोलीं, ‘‘दुष्यंत को पायलट बनने की धुन सवार थी. होनहार पायलट था अत: विदेशी कंपनी में नौकरी लग गई थी. मेरे टब्बर का पायलट, मेरी सारी जिंदगी की जमापूंजी.’’

‘‘उस ने तो बहुत सी जिंदगियां बचा दी थीं,’’ अनु ने उन के दुख को कम करने की गरज से कहा.

‘‘जी, उस प्लेन में 225 यात्री थे. ज्यादातर विदेशी, उन्होंने उस के बलिदान को सिरआंखों पर लिया. मेरी और दुष्यंत की पूजा करते हैं. हमें गौड तुल्य मानते हैं. भूले नहीं उस की बहादुरी और बलिदान को. इतना धन मेरे नाम कर रखा है कि मेरे लिए उस का हिसाब भी रखना मुश्किल है.’’

अनु को सब समझ में आ गया.

‘‘अनुजी, शायद आप को पता न होगा, उस स्कूल की युवा टीचर्स, युवा ब्रिगेड ने मेरा नाम क्या रख रखा था?’’

अस्वस्थ व अन्यमनस्क होती हुई अनु ने आधाअधूरा उत्तर दिया, ‘‘हूं… नहीं.’’

‘‘वे लोग मेरी पीठ पीछे मुझे भानुमती की जगह धनमती कहते थे, धनधन की माला जपने वाली धन्नो.’’

अनु को उस चपरासी की शरारती हंसी का राज आज पता चला. ‘‘कैसी विडंबना है, अनुजी. मेरे घर धन आया तो पर किस द्वार से. लक्ष्मी आई तो पर किस पर सवार हो कर…उन का इतना विद्रूप आगमन, इतना घिनौना गृहप्रवेश कहीं देखा है आप ने?’’

तंत्र मंत्र का खेला: बाबा के जाल से निकल पाए सुजाता और शैलेश

‘‘यह क्या है शैलेश? तुम्हें मना किया था न कि अगली बार लेट होने पर क्लास में एंट्री नहीं मिलेगी,’’ प्रोफैसर महेंद्र सिंह गुस्से से चीख उठे.

‘‘सौरी सर, आज आखिरी दिन था मजार में हाजिरी लगाने का, आज 40 दिन पूरे हो गए हैं, कल से मैं समय से पहले ही हाजिरी दर्ज करा लूंगा.’’

‘‘यह क्या मजार का चक्कर लगाते रहते हो? इतना पढ़नेलिखने के बाद भी अंधविश्वासी बने हो,’’ प्रोफैसर ने व्यंग्य किया.

‘‘सर, ऐसा न कहिए,’’ एक छात्र बोल उठा. ‘‘सर, आप को रेलवे स्टेशन पर बनी मजार की ताकत का अंदाजा नहीं है,’’ दूसरे छात्र ने हां में हां मिलाई. ‘‘सर, आप ने देखा नहीं, मजार 2 प्लेटफौर्म्स के बीच में बनी है, तीसरे, चौथे, 5वें प्लेटफौर्म्स जगह छोड़ कर बनाए गए हैं,’’ एक कोने से आवाज आई.

‘‘सर, अंगरेजों के जमाने से ही इस मजार का बहुत नाम है, 40 दिनों की नियम से हाजिरी लगाने पर हर मनोकामना पूरी हो जाती है,’’ किसी छात्र ने ज्ञान बघारा.

आज भौतिकी की क्लास में मजार का पूरा इतिहासभूगोल ही चर्चा का विषय बना रहा. प्रोफैसर भी इस वार्त्तालाप को सुनते रहे.

महेंद्र सिंह का पूरा छात्रजीवन व नौकरी के शुरू के वर्ष भोपाल में बीते हैं. पिछले वर्ष उन्हें इस छोटे से जिले से प्रोफैसर का औफर आया तो वे अपनी पत्नी को ले कर इस कसबेनुमा जिले परसिया में चले आए, जहां सुविधा व स्वास्थ्य के मूलभूत साधन भी उपलब्ध नहीं हैं. इस कसबे को जिले में बदलने के 5 वर्ष ही हुए हैं, इसलिए विकास के नाम पर तहसील, जिला अस्पताल व सड़कों का विस्तार कार्य अभी पूरा नहीं हुआ है.

सरकारी अस्पताल में जरूरी उपकरण और विशेषज्ञ डाक्टर्स की कमी बनी हुई है. बेतरतीब तरीकों से बने मकानों के बीच में, कहींकहीं सड़कें बन गई हैं तो सीवर और नाली का अभी कोईर् अतापता नहीं है.

आसपास के गांवों के समर्थ लोग इस शहर में मकान बना कर रहने तो लगे हैं पर मानसिकता और आचरण से वे

अभी भी गंवई विचारधारा से जुड़े हैं. केवल 3 से 4 किलोमीटर के दायरे में इस कसबेनुमा शहर की हद सिमट कर रह गई है. इस दायरे से बाहर नदी है, जंगल हैं और हैं शुद्ध प्राकृतिक हवा के संग हरेभरे खेतखलिहान के नजारे. जो भी बैंक, तहसील व दूसरे विभागों से ट्रांसफर हो कर, दूरदराज से यहां आते हैं, वे अच्छे बाजार, संचार साधनों की असुविधा, यातायात के साधनों की कमी से उकता कर जल्दी ही इस जगह से भाग जाना चाहते हैं.

नए खुले आईटीआई में महेंद्र सिंह को उन के अनुभव के आधार पर प्रोफैसर के पद का औफर मिला, तो वे मना न कर सके और भोपाल के अपने संयुक्त परिवार को छोड़ कर अपनी पत्नी को साथ लिए यहां चले आए. पत्नी सुजाता बेहद आधुनिक व उच्च शिक्षित है, इसीलिए कभीकभार वह भी कालेज में गैस्ट फैकल्टी बन क्लास लेने आ जाती.

सुजाता जब भी कालेज में आती, छात्रों की बांछें खिल जातीं. वैसे तो यह कोएड इंस्टिट्यूट है किंतु लड़कियों की संख्या उंगलियों में गिनी जा सकती है. लड़कियां साधारण ढंग से तैयार हो कर कालेज आती हैं. फैशन से उन का दूरदूर तक कोई नाता नहीं हैं. बस, बालों की खजूरी चोटी या पफ उठा बाल बना भर लेने से उन का शौक पूरा हो जाता है.

नीले कुरते और सफेद सलवारदुपट्टा डाले 18 से 20 वर्षीया सहपाठिनों के सामने 35 वर्षीया सुजाता भारी पड़ती. नाभि दिखने वाली साड़ी, खुले और करीने से कटे बाल, गहरी लिपस्टिक से सजे होंठ और आंखों में गहरा काजल सजाए वह जब भी क्लास लेने आती, लड़कों में मैम को प्रभावित करने की होड़ मच जाती. वे उसे फिल्मी हीरोइन से कम न समझते.

महेंद्र सिंह अपने साथी शिक्षकों के बीच गर्व से गरदन अकड़ा कर घूमते, मानो चुनौती सी देते हों कि मेरी बीवी से बढ़ कर तुम्हारी बीवियां हैं क्या. साथी शिक्षक पीठ पीछे सुजाता और महेंद्र का मजाक बनाते, मगर उन के सामने उन की जोड़ी की तारीफ में कसीदे काढ़ते.

उस दिन महेंद्र जब घर लौटे तो चाय पीते हुए, दिनभर की चर्चा में मजार का जिक्र करना न भूले. यह सुनते ही निसंतान सुजाता की आंखें एक आस से चमक उठीं कि हो सकता है कि इसीलिए ही समय उसे यहां परसिया खींच लाया है.

सुजाता जितनी वेशभूषा से  आधुनिक थी उतनी ही धार्मिक  थी. आएदिन घर में महिलाओं को बुला कर धार्मिक कार्यक्रम करवाना उस की दिनचर्या में शामिल था. इसी वजह से वह अपने महल्ले वालों में काफी लोकप्रिय हो गईर् थी.

आसपास के मकानों में ज्यादातर नजदीकी गांव से आ कर बसने वाले परिवार थे. वे दोचार सालों के भीतर ही परसिया में अपने छोटेबड़े बच्चों को पढ़ाने के लिए घर बना कर रहने आ गए थे. उन में से कुछ पंडित, कुछ पटेल तो एकदो राठौर परिवार थे.

कुछ परिवारों की महिलाएं अंगूठाछाप हैं तो कुछ 10वीं या 12वीं तक पढ़ी हैं किंतु इस के बाद विवाह हो जाने के कारण वे आगे न पढ़ सकीं. अभी तक यहां 16-17 वर्ष में शादी और 20-21 वर्ष में गौना कर देने का चलन रहा है.

ऐसे परिवारों के बीच सुजाता को कार्यक्रम करवाने के लिए इन महिलाओं से बढ़ कर कौन मिलता. ये महिलाएं, जो गांव में दिनभर किसी न किसी कार्य में व्यस्त रहती थीं, यहां परसिया में घर से बाहर, कुरसियां डाले, दिनभर गाउन पहन कर बतियाती रहतीं. गाउन पहनना उन के लिए आधुनिकता की निशानी है. बस, इतना ही फैशन करना आता है इन को.

सुजाता का शुरू में तो यहां बिलकुल मन नहीं लगता था मगर धीरेधीरे उस ने अपनेआप को साथी महिलाओं के साथ सामूहिक कार्यक्रम में व्यस्त कर लिया. उसे रहरह कर भोपाल याद आता. वहां की चमचमाती सड़कों की लौंग ड्राइव, किट्टी पार्टी, बड़े ताल का नजारा, क्लब और अपनी आधुनिक सखियों का साथ.

शादी के 10 वर्षों बाद सारी शारीरिक जांचों के परिणामों से उसे मालूम हो गया था कि वह कभी मां नहीं बन सकती. वह अपने खाली समय को किसी न किसी तरह व्यस्त रखती ताकि खाली दिमाग में कोई खुराफात न पैदा हो जाए.

जहां भोपाल में वह किट्टी, क्लब और सोशल वर्क में बिजी थी वहीं यहां के माहौल में वह पूरी तरह रम गई थी. हां, मगर नियम से, वह यहां के एकलौते ब्यूटीपार्लर में जाना न भूलती. यहां की ब्यूटीशियन से ज्यादा तो उसे ब्यूटी नौलेज थी, इसीलिए उसे भी वह तरहतरह के ब्यूटी टिप्स देती रहती.

ब्यूटीशियन रमा जबलपुर में अपनी मौसी के घर रह कर,  6 महीने का कोर्स कर के परसिया में अपना पार्लर खोल कर बैठ गई थी. यहां युवतियां थ्रेडिंग और फेशियल खूब करवाती थीं. उस का पार्लर चल निकला. परंतु सुजाता के आने के बाद रमा को वैक्ंिसग, मैनीक्योर, पैडिक्योर, हेयर कटिंग के नए तरीके जानने को मिले. वह सुजाता को देखते ही खिल उठती और सोचती, कितनी उच्चशिक्षित है मगर स्वभाव उतना ही सरल है.

इधर, सुजाता का मन मजार के चक्कर लगाने को मचलने लगा. वह सोचती सारे वैज्ञानिक तरीके अपना कर देख ही लिए हैं, कोई परिणाम नहीं मिला. अब इस मजार के चक्कर लगा कर भी देख लेती हूं. जब इस विषय में महेंद्र की राय लेनी चाही तो उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया, शायद उन्होंने भी सुजाता की आंखों में आशा की चमक को देख लिया था. महेंद्र से कोई भी जवाब न पा कर सुजाता सोच में पड़ गई. उस ने अपने पड़ोसियों से इस विषय में बात करने का मन बना लिया.

दूसरे दिन हमेशा की तरह दोपहर में जब सारी महिलाएं अपने चबूतरे पर या प्लास्टिक की कुरसियां डाल कर गपों में मशगूल हो गईं, सुजाता ने मजार का जिक्र छेड़ दिया. फिर क्या था, सभी के पास तर्क निकल आए कि मजार इतनी महत्त्वपूर्ण क्यों है? सभी सवर्र्ण और पिछड़े वर्ग के परिवारों की महिलाओं में वैसे तो पूजापाठ के नियमों में बहुत अंतर था मगर मजार के विषय में वे सभी एकमत थीं.

लगेहाथ महिलाओं ने सुजाता की दुखती रग पर हाथ रखते हुए उसे भी संतान की मनौती मांगने के लिए 40 दिन मजार का फेरा लगाने का सुझाव दे ही दिया. कुछ का तो कहना था कि 40 दिन पूरे होने से पहले ही उस की गोद हरी हो जाएगी. जितने मुंह उतनी बातें सुन कर सुजाता ने तय कर लिया कि वह कल सुबह से ही मजार जाने लगेगी. महेंद्र उस के इस फैसले से खुश तो नहीं हुआ, किंतु उस ने उसे उस के विश्वास के साथ फैसला लेने को स्वतंत्र कर दिया.

मजार का रास्ता रेलवे स्टेशन के ओवरब्रिज से गुजर कर 2 प्लेटफौर्म्स के बाद है. छोटा सा  स्टेशन होने के कारण, बहुत ही कम यात्रीगाड़ी के फेरे लगते हैं. दिनभर पास के अंचल से कोयला खदानों का कोयला लाद कर गुजरने वाली मालगाडि़यों का ही तांता लगा रहता है, जो ज्यादातर तीसरे प्लेटफौर्म से गुजरती हैं.

दूसरे और तीसरे प्लेटफौर्म के बीच में ही मजार है, जिसे चारों तरफ से घेर कर ओवरब्रिज की सीडि़यों से जोड़ दिया गया है. जिस से लोगों की मजार में आवाजाही से रेलवे स्टेशन के सुरक्षा प्रबंधन पर कोई असर नहीं पड़ता. लोगों का आनाजाना एक ओर से लगा ही रहता.

जब से यह जगह जिले में परिवर्तित हुई है तब से भीड़ बढ़ने लगी और एक बाबा की मौजूदगी भी. वह हफ्ते में 3 दिन मजार में, शेष 4 दिन स्टेशन के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे बैठा मिलता. कोई कहता कि बाबा मुसलिम है तो कोई उस के हिंदू होने का दावा करता. मगर बाबा से जाति पूछने की हिम्मत किसी में नहीं थी. बाबा से लोग अपनी परेशानियां जरूर बताते जिन्हें वह अपने तरीके से हल करने के उपाय बताता.

बाबा बड़ा होशियार था, वह शाकाहारियों को नारियल तोड़ने तो मांसाहारियों को काला मुरगा काट कर चढ़ाने का उपाय बताता. लोगों के बुलावे पर उन के घर जा कर भी झाड़फूंक करता. जो लोग उस के उपाय करवाने के बाद मनमांगी मुराद पा जाते, वे खुश हो उस के मुरीद हो जाते. लेकिन जो लोग सारे उपाय अपना कर भी खाली हाथ रह जाते, वे अपने को ही दोषी मान कर चुप रहते. इसीलिए, बाबा का धंधा अच्छा चल निकला.

सुजाता सुबह के समय जब घर से निकली उस समय जाड़े के मौसम के कारण कोहरा छाया हुआ था. वह तेज कदमों से स्टेशन की ओर निकल गई. उस के घर और स्टेशन के बीच एक किलोमीटर का ही फासला तो था.

अभी मजार में अगरबत्ती सुलगा कर पलटी ही थी कि बाबा से सामना हो गया. उस ने प्रणाम करने को झुकना चाहा पर उस की मंशा भांप कर बाबा दो कदम पीछे हट गया. मेरे नहीं, इस के पैर पकड़ो, वह जो इस में समाया है. उस ने उंगली से मजार की तरफ इशारा करते हुए कहा, जिस मंशा से यहां आई हो, वह जरूर पूरी होगी. बस, अपने मन में कोई शंका न रखना.

सुजाता गदगद हो गई. आज सुबह  इतनी सुहावनी होगी, उस ने  सोचा न था. उसे पड़ोसिनों ने बताया तो था यदि मजार वाले बाबा का आशीर्वाद भी मिल जाए तो फिर तुम्हारी मनोकामना पूरी हुई ही समझो.

खुश मन से सुजाता ने जब घर में प्रवेश किया, तो उस का पति चाय की चुस्की के साथ अखबार पढ़ने में तल्लीन था. सुजाता गुनगुनाते हुए घर के कार्यों में व्यस्त हो गई. महेंद्र सब समझ गया कि वह मजार का चक्कर लगा कर आई है, मगर कुछ न बोला.

वह सोचने लगा कितने सरल स्वभाव की है उस की पत्नी, सब की बातों में तुरंत आ जाती है, अब अगर मैं वहां जाने से रोकूंगा तो रुक तो जाएगी मगर उम्रभर मुझे दोषी भी समझती रहेगी कि मैं ने उस के मन के अनुसार कार्य न कर के, उसे संतान पाने के आखिरी अवसर से भी वंचित कर दिया. आज जा कर आई है तो कितनी खुश लग रही है वरना कितनी बुझीबुझी सी रहती है. चलो, कोई नहीं, 40 दिनों की ही तो बात है, फिर खुद ही शांत हो कर बैठ जाएगी. मेरे टोकने से इसे दुख ही पहुंचेगा.

दिन बीतते देर नहीं लगती, 40 दिन क्या 4 महीने बीत गए, मगर सुजाता का मजार जाना न रुका. अब वह गैस्ट फैकल्टी के कार्य में भी रुचि नहीं लेती, न ही आसपड़ोस की महिलाओं के संग कार्यक्रम में मन लगाती. अपने कमरे को अंदर से बंद कर, घंटों न जाने कैसे तंत्रमंत्र अपनाती. इन सब बातों से बेखबर एक दिन अचानक रमा उस महल्ले से गुजरी. उस ने सोचा, सुजाता भाभी की खबर भी लेती चलूं, अरसा हो गया उन्हें, वे पार्लर नहीं आईं.

दोपहर का समय, दरवाजे की घंटी सुन सुजाता को ताज्जुब हुआ कि इस समय कौन है? दरवाजा खोलते ही रमा को देख कर खुशी से चहक उठी. उसे लगभग खींचते हुए भीतर ले गई.

मगर रमा उसे देख कर हैरान थी कि क्या यह वही सुजाता है जो कितनी सजीसंवरी रहती थी. सामने मैलेकुचैले गाउन में, कालेसफेद बेतरतीब बालों की खिचड़ी के साथ, न मांग में सिंदूर, न मंगलसूत्र, न चूडि़यां, न बिंदी पहने सुजाता किसी सड़क पर घूमती पगली से कम नहीं लगी. ‘‘भाभी, आप को क्या हो गया है? तबीयत तो ठीक है न आप की? भाईसाहब ठीक तो हैं न?’’ रमा ने हैरानी से पूछा.

‘‘अब आई है, तो बैठ. तुझे सब बताती हूं. मेरी तबीयत को कुछ नहीं हुआ बल्कि मेरे चारों तरफ भूतों का डेरा हो गया है. कोई मेरी बात का विश्वास नहीं करता. यहां देख मैं इसे सोफे पर रातभर जाग कर टीवी देखती रहती हूं. अगर झपकी आई तो सो गई वरना पूरी रात यों ही कट जाती है. ये भूत दिनरात मेरे चारों तरफ मंडराते रहते हैं. दिन में भी कभी महल्ले के बच्चे के रूप में तो कभी पड़ोसिन के रूप में आ कर बैठ जाते हैं. फिर चाय बनाने या कुछ लेने भीतर जाओ, तो गायब हो जाते हैं.’’

‘‘भाभी, ऐसी बातें कर के मुझे मत डराओ?’’ रमा घबरा गई.

‘‘यह मेरी जिंदगी की सचाई बन गई है. ये देखो, मेरे हाथ में ये निशान. अगर मैं चूड़ी, बिंदी, कुछ भी पहनती हूं तो ऐसे निशान बन जाते हैं. सजनेसंवरने पर मुझे ये भूत बहुत परेशान करते हैं, इसीलिए मैं अब सादगी से रहती हूं, बाल भी नहीं रंगती, मेहंदी भी नहीं लगाती,’’ सुजाता बोली.

‘‘भाईसाहब, आप को कुछ समझाते नहीं हैं क्या?’’ रमा सुजाता की बातें सुन कर उलझन में पड़ गई.

‘‘मेरे पति के अंदर तो खुद ही आत्मा आती है. जब वह आत्मा आती है तो उन की आवाज भर्रा जाती है, चेहरा सर्द हो जाता है, उसी आत्मा ने मुझे सादगी से रहने का आदेश दिया है.’’

‘‘मैं चलती हूं भाभी, बेटे के स्कूल से लौटने का समय हो गया है,’’ कह कर रमा उठ खड़ी हुई. सुजाता की बातें सुन कर रमा के रोंगटे खड़े हो गए. उस ने वहां से निकलने में ही अपनी भलाई समझी.

रमा अपनी स्कूटी स्टार्ट कर ही रही थी कि सामने से शैलेश आता दिखा. शैलेश उसी की गांवबिरादरी का है, रिश्ते में उस का चचेरा भाई लगता है. उसे देख कर वह रुक गई. उसी ने तो 2 महीने पहले उसे स्कूटी चलानी सिखाई थी. उस ने सुजाता के दरवाजे पर नजर डाली. सुजाता ने अपनेआप को फिर से घर में कैद कर लिया था. उस ने शैलेश को अपने पीछे बैठने का इशारा किया और वहां से सीधा अपने घर को चल पड़ी.

शैलेश ने जो बताया उसे सुन कर रमा हैरान रह गई. ‘‘सुजाता जब पहली बार मजार में गई थी तो उसी दिन बाबा ने उस के बारे में पूरी जानकारी उस से जुटा ली. सुजाता धीरेधीरे बाबा की कही बातों का आंख मूंद कर विश्वास करने लगी थी. किंतु 40 दिन बीतने के बाद भी जब कोई परिणाम न मिला तो बाबा ने उसे समझाया कि यह सब तुम्हारे पति की शंका करने की वजह से हो रहा है. जब तक वे भी सच्चे मन से इस ताकत को नमन नहीं करेंगे, तब तक तुम अपने लक्ष्य को नहीं पा सकतीं. यह सुन कर सुजाता ने अपने पति को भी मजार लाने का फैसला किया और रोधो कर, गिड़गिड़ा कर, उसे यहां तक लाने में सफल हो ही गई. लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या, शैलेश? रमा की उत्सुकता चरम पर थी.’’

‘‘लेकिन जब मैं ने महेंद्र सर से कहा तो वे गुस्से से लालपीले हो कर कहने लगे, ‘ये सारी बातें बकवास हैं, ये फेरे लगाने से कुछ नहीं होता बल्कि अब तो सुजाता घरेलू कार्य में भी रुचि नहीं लेती. बीमारों की तरह पूरे दिन वह लेटी रहती है. चलो, मैं भी वहां का नजारा देख कर आता हूं.

‘‘उस दिन बाबा स्टेशन से पहले पीपल के पेड़ के नीचे बैठे आसपास से आए आदिवासियों को घेर कर बैठे थे. उस दिन मजार का मेला भी था जो मजार पर न लग कर बाहर पास के मैदान में लगता है. उस दिन की भीड़ को देखते हुए किसी को भी स्टेशन की सुरक्षा के लिहाज से मजार तक जाने नहीं दिया जाता. इसलिए जो भी भक्त, चादर, अगरबत्ती, धूप जो भी चढ़ाना चाहे, वह बाबा को सौंप देता है. इसीलिए बाबा के चारों तरफ भीड़ जुटी थी. जिस में गरीब आदिवासी महिलाएं, उन की बेटियां बहुत श्रद्धा के साथ हाथ जोड़ लाइन से आगे बढ़ती जा रही थीं.’’

‘‘सर, उन सब को बड़े ध्यान से देख रहे थे. थोड़ी देर में जब बाबा की नजर मेरे साथ खड़े सर पर पड़ी तो वे समझ गए कि ये सुजाता मैम के पति होंगे. उन्होंने उन्हें दूसरे दिन आ कर बात करने को कहा. सर मेरे साथ वापस आ गए.

‘‘तब तक तो मैं भी नहीं जानता था कि मैं खुद बाबा के हाथों का मोहरा बन कर रह गया हूं. वह एकतरफ सुजाता मैम को बच्चे के ख्वाब दिखा कर बरगला रहा था तो दूसरी तरफ प्रोफैसर को दूसरी शादी के सब्जबाग दिखाने लगा. इन दोनों को अपनी बातों का विश्वास दिलाने को, बाबा जब न तब, मुझे और मेरे दोस्तों को बुला कर हमारी मनोकामनाओं के पूरी होने के उदाहरण देता. हम भी उस की बात में हां में हां मिलाते, क्योंकि हमें बाबा की ताकत पर भरोसा भी था और डर भी.’’

‘‘धीरेधीरे उस ने मैम के दिमाग में यह बात भर दी कि उस का रहनसहन, पहनावा आकर्षक होने के कारण, पीपल के पेड़ के भूत, उस पर आसक्त हो गए हैं. इसलिए उसे सब से पहले अपने आप को सादगी में रखना होगा. दूसरी तरफ, प्रोफैसर को दूसरी शादी के लिए रिश्ते दिखाने लगा. उन्हीं में से एक रिश्ते में 16 साल की एक गरीब की लड़की का रिश्ता भी था, जो प्रोफैसर को बहुत ही भा गया.

‘‘आजकल सर के बहुत चक्कर लग रहे हैं उस लड़की के गांव के. यहां से 15 किलोमीटर पर ही तो है वह गांव. वहां आदिवासी परिवार हैं. उन के वहां अभी भी बालविवाह, बहुविवाह का चलन है. अब क्या है, सर की पांचों उंगलियां घी में हैं. वे भी बस लगता है अपनी बीवी के पूरी पागल होने के इंतजार में हैं ताकि उसे पागलखाने भेज कर, उस की सहानुभूति भी बटोर लें और फिर उस कन्या से विवाह कर संतान भी पैदा कर लें.

‘‘मेरी गलती, बस, यही है कि मैं बाबा और सर की चालों को पहले समझ ही नहीं पाया वरना मैम की कुछ मदद कर देता. मगर अब उन की मानसिक स्थिति को केवल किसी मानसिक रोग विशेषज्ञ से मिल कर ही संभाला जा सकता है.’’

लेकिन मानसिक रोग विशेषज्ञ इस शहर में मौजूद ही नहीं हैं और दूसरे बड़े शहर में ले जा कर इलाज कराने के मूड में प्रोफैसर हैं ही नहीं. शैलेश के मुख से यह सब सुन रमा घोर चिंता में आ गई.

बेचारी सुजाता भाभी, यह मक्कार बाबा जब प्रोफैसर को अपनी बातों में न उलझा पाया तो उस ने दूसरा जाल फेंका जिस में बड़ेबड़े ऋ षिमुनि न पार पा पाए. तो फिर उस जाल में यह प्रोफैसर कैसे बच पाता. वह दूसरी शादी करने के लिए अपनी पहली पत्नी को भूल गया, मौकापरस्त आदम जात. यह सोच कर रमा अपना सिर पकड़ कर बैठ गई.

कर ले तू भी मुहब्बत- भाग 1

यह कहानी है दिल्ली के प्रसिद्ध लेडी श्रीराम कालेज की, जहां मुसकान अपनी 3 सीनियर्स के साथ गर्ल्स होस्टल में रहती थी. उस का पहली मेरिट लिस्ट में ही एडमिशन हो गया था. वह बहुत ऐक्साइटेड थी, क्योंकि लाखों युवा दिलों की तरह उस का भी सपना था कि वह इस कालेज में पढ़ कर अपने सपने पूरे कर पाए. वह मेरठ से थी.

शुरू में तो उसे महानगर की चकाचौंध का हिस्सा बनने में वक्त लगा था, पर उस की रूममेट्स के अत्यधिक कूल होने के कारण जल्दी ही उस की तीनों के साथ अच्छी जमने लगी थी. कौफी बनाना, बाजार से छोटेमोटे सामान लाना, यहां तक कि अपनी दीदी के कपड़े धोना तक के काम उस के ही हिस्से में थे. वे उस की मेंटर, गाइड और बड़ी बहनें थीं. उन की गाइडेंस में ही उस की फुल जींस घुटनों तक की शार्ट्स और टौप्स की साइज कटते हुए क्रॉप टौप पर और आस्तीन तो गायब ही हो गई थी.

सालभर में ही वह अपने नए हैयरस्टाइल और स्वैग के साथ अपनी घरेलू और डेढ़ फुटी इमेज से बाहर निकल कर एक बेहद ही खूबसूरत दोशीजा में बदल गई थी… जिसे देखते ही किसी के भी मुंह से अनायास ही ‘सो क्यूट’ निकल जाया करता था. ऊपर वाले ने उसे बला की खूबसूरती से नवाजा
था. वह सिर्फ जबान से ही नहीं बोलती थी… उस की बोलती तीखी आंखों के साथ उस के कानों में पहनी जाने वाली बड़ीबड़ी बालियां भी उस के बोलने पर, मुसकराने पर चहक उठती थीं. वह अन्य लड़कियों से बिलकुल अलग थी. लड़कों से कतराने वाली, कालेज कैंपस की रंगीन चकाचौंध से अलगथलग रहने वाली और हर वक्त किताबों में डूबी रहने वाली.

उस दिन कालेज की फेयरवैल पार्टी थी. वहां की फिजाओं में मानो एक नशा सा घुल गया था. कालेज कैंपस में उस की तीनों सीनियर्स की आखिरी रात थी. मौसम में जुदाई की एक कसक सी थी, पर उदास हो कर कोई भी इस पल को खोना नहीं चाहता था. पार्टी के बाद हग्ज और किसेज की बौछारें हो रही थीं. कुछ फिर से मिलने की… तो कुछ सोशल मीडिया से जुड़े रहने की… तो कुछ जिंदगीभर एकदूसरे का साथ निभाने का वादा किए बिछुड़ रहे थे. रूम में आ कर भी पार्टी की खुमारी उतरने का नाम नहीं ले रही थी.

मुसकान ने मोबाइल की घड़ी पर नजर डाली. रात के एक बज रहे थे. पर तीनों में से कोई भी सो कर अपना वक्त जाया नहीं करना चाहती थीं. वो तीनों एक ही पलंग पर औंधे पड़े आपस में कोई वीडियो शेयर कर रही थीं और एकदूसरे से इशारों में बातें कर रही थीं और कभी मुंह पर हाथ लगा कर जोर से हंस पड़तीं. जैसे ही मुसकान उन के पास कौफी के मग ले कर आई और उस ने वीडियो के बारे में उत्सुकता दिखाई, “आप लोग क्या देख रहे हो?”

“बेबी… ये पोर्नवोर्न तेरे बस की बात नहीं है… तू टीवी पर डोरेमोन देख,” कहते हुए तीनों हाई फाइव देते हुए जोर से हंस पड़ीं.

‘इस में इतना हंसने वाली कौन सी बात है?’ वह मन ही मन बुदबुदा उठी. इस बीच फ्रेंच किस… वाइल्ड सैक्स, फक, क्रश जैसे शब्द उस के कान से टकराए थे, जो उस की डिक्शनरी में बिलकुल नए थे. उन शब्दों का अर्थ गूगल पर सर्च कर उन का मतलब जान लेने के बाद उस के दिल की बगिया में भी खुशबूदार फूल खिलने लगे थे.

‘बस, अब बहुत हो गया जिंदगी को सीधी चाल से चलते हुए… अब मैं भी सब को दिखा दूंगी कि मैं भी बड़ी हो गई हूं.’

बस यह खयाल बारबार उस के मन को छूने लगा था. फेसबुक और इंस्टा पर तो उस का अकाउंट था ही… इस बार उस ने टिंडर पर अपना अकाउंट बनाने की सोची, जिस में उस की साथ वाली लड़कियों ने तो महारत हासिल कर रखी थी. वह सेल्फी स्टिक उठा लाई और अलगअलग पोज और आउटफिट्स में कम से कम सौ क्लिक्स ले डालीं. फिर उन में से सब से अच्छी फोटो पसंद कर टिंडर पर अपनी प्रोफाइल बनाई और लौगइन कर दिया. इस के साथ ही उस की स्क्रीन पर कई प्रोफाइल उभरे… प्रोफाइल्स काफी इंट्रेस्टिंग थी. उस ने थोड़ी हिम्मत कर, ऊपर वाले का नाम ले उस ने एक प्रोफाइल पर राइट स्वाइप कर उसे सुपर लाइक कर दिया. उस का दिल जोरों से धकधक करने लगा. डर के मारे उस ने अपनी आंखें भींच लीं. कुछ ही पलों में ‘इट्स अ मैच’ का नोटिफिकेशन उस की मोबाइल स्क्रीन पर उभरा और अगले ही पल एक मैसेज आ गया, “व्हाट अ ब्यूटीफुल स्माइल… इट परफेक्ट मैचेस विद योर नेम सैक्सी.”

सैक्सी विशेषण उस के लिए बिलकुल नया था. वह एक बार को तो घबराई, पर फिर एक स्माइली के साथ रिप्लाई किया, ” थैंक्स…”

“मुझे थैंक्स नहीं, कुछ और चाहिए …” मुसकान की स्क्रीन पर फिर से एक मैसेज पौपअप हुआ.

“क्या…?”

“मुसकान… तो फिर कौफीहाउस पर मिलते हैं स्वीटहार्ट.”

“मिलना… डूड, आप शायद भूल रहे हैं… इट्स अवर फर्स्ट चैट… कुछ सेकंड पहले तो हम जुड़े हैं और आप मिलने की बात कर रहे हैं.”

“जान, आप भी शायद भूल रही हैं. आप टिंडर पर हैं और यह एक डेटिंग ऐप है.”

‘ज्ज्ज्जान…’ उसे लगा, यह शब्द सुन कर तो उस की जान ही निकल जाने वाली है, पर उस ने कुछ हिम्मत दिखाते हुए रिप्लाई किया, “क्यों ना हम पहले एफबी पर फ्रेंडशिप करते हैं… फिर डेटिंग करेंगे…”

“क्या बेबी… तुम भी… ओके. एनीथिंग फोर यू, पर मेरी एक शर्त है.”

“क्या शर्त है…?”

“तुम मुझे वीडियो काल कर एक किस करोगी.”

मुसकान को समझ नहीं आ रहा था कि वह कैसे रीऐक्ट करे? वह बड़ी असमंजस में थी… घबराहट के मारे उस के हाथ कांपने लगे थे. उस ने बाय कह कर फोन डिसकनेक्ट कर दिया. पर उस के बाद दोनों के बीच फेसबुक पर चैट का सिलसिला चल पड़ा, जो एक हफ्ते तक चला. पर आकाश ने 8वें दिन उसे मिलने के लिए राजी कर ही लिया.

उस ने अपनी जिंदगी की पहली डेटिंग के लिए पिंक ट्यूनिक पसंद की थी. आकाश पहले से ही कैफे में बैठा उस का इंतजार कर रहा था. उस पर नजर पड़ते ही अपने होंठों के बीच दबी सिगरेट को निकाल जूतों से मसल दी और लपक कर उसे बांहों में भर कानों पर… गालों पर किस करने लगा.

सिगरेट की असहनीय बदबू के भभके ने उसे आकाश से खुद को अलग करने के लिए मजबूर कर दिया. वैसे भी वो इन सब के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थी.

“तुम हर लड़की से इसी तरह मिलते हो क्या?”

“हर लड़की से नहीं. तुम तो मेरी गर्लफ्रेंड हो… तो मेरा तुम पर हक है,” कहते हुए वह फिर से उस के होंठों को चूमने लगा.

मुसकान ने धीरे से खुद को अलग किया और ठगी हुई सी आकाश की ओर ताकने लगी. उस की आंखों में आंसू थे, जिन्हें देख कर आकाश को भी कुछ झुंझलाहट सी होने लगी थी.

“तुम इन सब में इंट्रेस्टेड नहीं थी, तो डेटिंग पर आई ही क्यों?”

“मुझे फर्स्ट डेटिंग पर ये सब एक्सपेक्टेड नहीं था.”

“और मुझे भी लेडी श्रीराम कालेज की लड़की से इतना दकियानूसीपन और पिछड़ापन एक्सपेक्टेड नहीं था,” कहते हुए उस ने अपनी बाइक स्टार्ट की और तेजी से वहां से निकल गया, मुसकान को और उस की भीगी पलकों को बहुत पीछे छोड़ कर.

पर दूसरी तरफ, पूरे 2 दिन लगे थे मुसकान को इन सब से उबरने में.

2 दिन बाद जब वह सामान्य हुई, तो उस ने अपना टिंडर का अकाउंट खोल आकाश को मैसेज करना चाहा, तो उसे पता चला कि वो आकाश द्वारा ब्लौक कर दी गई थी.

उस ने पहली बार ब्रेकअप के बाद की उदासी का स्वाद चखा था.

 

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