हेल्दी टिफिन हेल्दी किड्स कॉम्पटीशन

हेल्दी टिफिन बच्चों को हेल्दी रखने में सहायक होते हैं. हालांकि खाने में स्वाद और स्वास्थ्य दोनों को संतुलित करना मुश्किल है. ये एक ऐसी समस्या है, जिसका मदर्स हमेशा से समाधान निकालने की कोशिश में लगी रहती हैं. टिफिन सिर्फ हेल्दी फूड सर्व करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसे साफ हेल्दी लंच बौक्स में परोसना भी जरूरी होता है. एंटी बैक्टीरियल एक्सो, सिर्फ सफाई नहीं करता, बल्कि गंदे बर्तनों पर 10 सेकंड में 700 पर्सेंट बढ़ने वाले बैक्टीरिया का खात्मा भी करता है और लंच बौक्स को साफ करके टिफिन बौक्स को भी हेल्दी बनाता है.

आइए आपको बताते हैं कुछ मजेदार रेसिपीज के बारे में…

1. दलिया बौल्स

1/2 कप मूंग दाल को धो कर पानी में भिगोए.1 कप दलिया में उबला आलू, 1 प्याज कटा,1/2 शिमला मिर्च कटी, थोड़ी गाजर कटी, हरीमिर्च व नमक मिलाकर छोटी बौल्स बनाकर 2 बड़े चम्मच कॉर्न फ्लोर में डस्ट करें और फिर गर्म तेल में सुनहरा होने तक तल लें. दाल में नमक डाल कर उसे उबालें फिर उसके बाद मिक्सी में पीस लें. बाउल में निकालकर नींबू रस मिला लें. इसमे दलिया बौल्स डाल कर सर्व करें.

2. मखनी पनीर रोल

1 कप मैदे में थोड़ा सा नमक और मक्खन डाल कर पानी के साथ गूंध लें. कड़ाही में घी गरम कर 2 कटे टमाटर भूनें. इन में थोड़ी कटी शिमलामिर्च, हरीमिर्च व नमक डाल कर भून लें. भुनने पर 1 कप मैश पनीर डालकर अच्छी तरह मिलाकर, पका कर ठंडा होने दें. मैदे के छोटे पेड़े बना कर चौकोर बेलें. इन में पनीर की फिलिंग डाल कर रोल कर लें. गरम ओवन में 10-15 मिनट तक बेक कर सौस के साथ गरमगरम परोसें.

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EXO
रेसिपी भेजने की अंतिम तिथि: 25 नवंबर 2023

चयनित रेसिपीज को पत्रिका में प्रकाशन और 1000/- का अमेजन गिफ्ट वाउचर जीतने का मौका.

तोहफा: भाग 2- रजत ने सुनयना के साथ कौन-सा खेल खेला

‘‘इस में बुराई ही क्या है विदेशों में इस का बहुत चलन है. शादी अब ओल्ड फैशन और आउटडेटेड हो गई. किसी से प्यार हो गया तो साथसाथ रहने लगे. जब एक का दूसरे से मन भर जाए गया तो अलग हो गए. न किसी तरह खिचखिच न और किसी तरह का बखेड़ा.’’

‘‘और यदि बच्चे हुए तो?’’

‘‘तो बात अलग है. बच्चों की खातिर और उन्हें जायज करार देने के लिए विवाह बंधन में बंधा जा सकता है.’’

सुनयना सोच में पड़ गई. उस के माथे पर बल पड़ गए.

‘‘अगर तुम मानों तो हम दोनों कल से ही साथसाथ रह सकते हैं. मेरा खुद का फ्लैट है पाली हिल, बांद्रा में. हम वहां शिफ्ट हो सकते हैं,’’

‘‘नहीं,’’  सुनयना ने एक उसांस भरी, ‘‘मेरे मांबाप पुराने खयालात के हैं. वे इस बात के लिए कतई राजी नहीं होंगे.’’

‘‘तो एक और विकल्प है.’’

‘‘वह क्या?’’

‘‘क्यों न हम एक कौंट्रैक्ट मैरिज कर लें

1-2 साल के लिए. उस के बाद हमें ठीक लगे तो कौंट्रैक्ट को बढ़ा लेंगे. नहीं तो दोनों अलग हो जाएंगे. क्यों क्या खयाल है?’’

‘‘नहीं,’’ सुनयना ने आंसू बहाते हुए कहा, ‘‘मुझे यह ठीक नहीं लगता. मुझ में और एक कालगर्ल में फिर फर्क ही क्या रह जाएगा? आज इस के साथ तो कल किसी और के साथ, इस में बदनामी के सिवा और कुछ हासिल होने वाला नहीं है. इस सौदे में लड़की घाटे में ही रहेगी. वह एक असुरक्षा के भाव से घिरी रहेगी. लड़के का कुछ नहीं बिगड़ेगा.’’

‘‘डार्लिंग हम 21वीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं. तुम इतनी पढ़ीलिखी हो कर भी गंवारों जैसी बातें करती हो. खैर, अब इस पब्लिक प्लेस में यों रो कर एक तमाशा तो न खड़ा करो. चलो घर चलते हैं.’’

गाड़ी में सुनयना ने कहा, ‘‘रजत, तुम्हारे विचार जान कर मुझे बड़ा डर लग रहा है. शादी तुम करना नहीं चाहते और तुम्हारे दूसरे प्लान से मैं सहमत नहीं हूं. तब हमारा क्या होगा?’’

रजत ने उसे अपनी बांहों में ले लिया और बोला, ‘‘फिक्र क्यों करती हो, क्या तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं? 4 साल से हम दोनों साथसाथ हैं. क्या यह तुम्हारे लिए कुछ माने नहीं रखता? हम दोनों एकदूसरे के कितने करीब हैं. 2 तन 1 जान हैं. मैं तो कहता हूं कि हम यों ही भले हैं. जैसा चल रहा है चलने दो.’’

‘‘तुम्हारे लिए यह कहना आसान है पर मेरी तो शादी की उम्र बीती जा रही है. तुम्हारा क्या बिगड़ेगा, तुम तो रोज लड़की से दिल बहला सकते हो. पर हम स्त्रियों की तो हर तरह से मुसीबत है. हम पर बदनामी का ठप्पा लगते देर नहीं लगती. शादी के बिना तुम्हारे साथ घर बसाऊंगी तो आवारा बदचलन कही जाऊंगी और अगर तुम से कौंट्रैक्ट मैरिज की और अवधि

खत्म होने पर तुम ने मुझे फटी जूती की तरह निकाल फेंका, तो मैं कहां जाऊंगी? कौन शरीफजादा मुझे अपनाएगा?’’

सुनयना रात में अपने कमरे में रोती रही. उसे अपना भविष्य अंधकारमय नजर आता था. उस की आशाओं का महल धराशायी हो गया था. उस ने अपने मन की गहराइयों से रजत से प्यार किया था. उस के साथ घर बसाने के सपने देखे थे. पर उस ने एकबारगी ही उस के सपने चकनाचूर कर दिए थे. अब वह क्या करे? रजत से मिलना छोड़ दे? उस से नाता तोड़ ले? रजत से बिछड़ने की कल्पना से ही उस का मन उसे कचोटने लगा, लेकिन उसे पाना भी अब एक मृग मरीचिका के समान था. इतने दिन वह अपनेआप को छलती आई थी. वह भलीभांति जानती थी कि रजत एक प्लेबौय है. वह ऐयाश फितरत का था, इसलिए भौंरे के समान कलीकली का रसपान करना चाहता था. यानी स्वच्छंद रहना चाहता था और किसी भी तरह की जिम्मेदारी से बचना चाहता था. इसीलिए वह शादी के बंधन में भी नहीं बंधना चाहता था.

सुबह सुनयना की मां ने उस के चेहरे पर अपनी सवालिया नजरें गड़ा दीं. पर उस की सूजी आंखें और चेहरा देख कर वे वस्तुस्थिति भांप गईं.

2 दिन बाद रजत का फोन आया,‘‘कल क्या कर रही हो? मुझे अपने व्यापार के सिलसिले में रशिया जाना पड़ रहा है. मैं चाहता था कि जाने से पहले तुम से मिल लूं.’’

‘‘कल तो मैं फ्री नहीं हूं. मेरी होटल में ड्यूटी लगी है.’’

‘‘मैं 3 हफ्ते के लिए जा रहा हूं. इतने दिन तुम्हें देखे बिना कैसे रह पाऊंगा?’’

सुनयना पिघलने लगी, लेकिन फौरन उस ने अपना मन कठोर कर लिया,‘‘क्या किया जाए मजबूरी है. नौकरी जो ठहरी.’’

‘‘तुम्हारी ड्यूटी कितने बजे खत्म होगी?’’

‘‘रात को 2 बजे.’’

रजत ना सुनने का आदी न था, बोला, ‘‘ठीक है,  मैं तुम्हें लेने आऊंगा. बाहर गाड़ी में बैठा तुम्हारा इंतजार करूंगा.’’

सुनयना ने चुपचाप फोन रख दिया.

सुनयना हमेशा चहकती रहती थी पर आज चाहने पर भी वह हंसबोल नहीं रही थी उस का मन अवसाद से भरा था.

रजत ने कहा, ‘‘आज तुम जरूरत से ज्यादा गंभीर हो.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है,’’ सुनयना ने सफाई दी, ‘‘आज मैं बहुत थकी हुई हूं.’’

‘‘चलो आज थोड़ी देर के लिए मेरे फ्लैट पर चलो.’’

जीवनसाथी: भाग 2- विभोर को अपनी पत्नी वसु से नफरत क्यों हुई

शुरू में तो वसु ने सोचा शांत रहेगी तो विभोर का ग़ुस्सा कम हो जाएगा. लेकिन वसु का शांत मृदु स्वभाव भी विभोर में कोई परिवर्तन नहीं ला पा रहा था.

रोज अपने और विभोर के बीच स्नेहसूत्र पिरोने का प्रयास करती लेकिन विभोर किसी पत्थर की तरह अपने विचारों पर अडिग रहता. वसु औफिस जाने के पहले सारे काम निबटा रही होती और विभोर आराम से टीवी पर नित्य नए बाबाओं की बेमानी बातें बड़े ध्यान से सुनता जो उस के मानसपटल पर अंकित हो उस के पुरुष अहम को पोषित करतीं. हर बात में सुनीसुनाई उन्हीं बातों को करता. कभी वसु कोई काम

कहती भी तो गुस्से में चिल्ला कर उस का अपमान करता. आज वसु सुबह जल्दी उठ गई थीप्त उसे औफिस जल्दी जाना था. उस ने अपने साथ सब की चाय बना ली और विभोर को देते हुए कहा, ‘‘विभोर, मैं ने दीदी की चाय भी बना दी है. मैं नहाने जा रही हूं. मुझे आज औफिस जल्दी जाना है. दीदी उठे तो आप उन्हें गरम कर के दे देना.’’

वसु की ननद भी अपने छोटे बच्चे के साथ रहने आई हुई थी.

इतना सुनते ही विभोर का मूड उखड़ गया. चिल्ला कर बोला, ‘‘वसु, मैं देख रहा

हूं, तुम मां को इगनोर कर रही हो, मां का नाश्ता तुम बना कर केसरोल में रख दोगी और आज तो तुम्हें छुट्टी लेनी चाहिए थी, सुमन आई हुई है.’’

‘‘मैं शाम को जल्दी आने की कोशिश करूंगी विभोर मगर छुट्टी नहीं ले सकती. मेरी प्रमोशन डियू है और विभोर आप चिल्ला क्यों रहे हो? शांति से भी तो कह सकते हो. अच्छा नहीं लगता जब आप चिल्लाते हो वह भी सब के सामने.’’

‘‘क्यों सब के सामने की क्या बात है? यहां बाहर का है ही कौन? मां हैं, मेरे भाईबहन हैं.’’

‘‘नहीं विभोर बात करने का तरीका होता है, इस विषय पर सोचना,’’ कह कर वसु औफिस निकल गई.

जब भी वसु औफिस को निकलती विभोर कुछ काम जरूर बता देता. वसु को कर के जाना होता, जिस वजह से अकसर औफिस के लिए देर हो जाती और फिर बौस की डांट पड़ती.

वसु की हमेशा कोशिश होती कि बात को समझ कर सुलझा लिया जाए, वह वैसे भी मुसकराती रहती थी. सोचती थी, पिता के असमय जाने से शायद स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ गया है, प्यार से धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा. आशा की किरण उस के होंठों पर मुसकान बिखेर देती. कितनी भी बात हो वसु कभी मुंह बना कर नहीं घूमती. लेकिन इन कोशिशों में विभोर की स्त्री के प्रति अवमानना उस के रिश्ते में जहर घोल रही थी.

मार्च का महीना था. काम ज्यादा ही होता है, रात के 8 बजने को आए, वसु जल्दीजल्दी काम निबटाने में लगी हुई थी तभी फोन बज उठा, ‘‘क्या बात है अभी तक घर नहीं पहुंची?’’ विभोर कठोर स्वर में बोला.

‘‘बस निकल ही रही हूं विभोर.’’

‘‘क्या 8 बजे भी तुम औफिस में हो? खाने का समय हो रहा है, कब बनेगा? मैं कुछ करने वाला नहीं, जल्दी घर आओ.’’

‘‘मैं अभी बाहर से और्डर कर देती हूं.’’

‘‘नहीं बाहर का नहीं खाएंगे, तुम अभी चल दो, आ कर बनाओ,’’ कहते हुए विभोर फोन पर ही चिल्ला उठा,

वसु ने आसपास नजर घुमा कर देखा, साथ में काम कर रहे कुलीग ने विभोर की आवाज सुन ली थी. वसु की आंखों में अपमान के आंसू आ गए. वैसे विभोर जब चाहे बाहर से खाना मंगवा लेता लेकिन अगर वसु कहती तो कभी नहीं मंगवाता.

थकीहारी वसु घर में घुसी तो सब बैठे आराम से टीवी पर बाबाओं के प्रवचन सुन रहे थे. उस के घुसते ही सब ने ऐसी उदासीन सी नजर डाली जैसे वह घूम कर आ रही हो. फिर पुन: टीवी देखने लगे, जिस में अकसर चर्चा होती कि आजकल ये स्त्रियां जो घर से बाहर काम करने निकलती हैं वे सिर्फ एक बहाना है कि स्वतंत्रता से घूम सकें और काम से बच जाए, फैशन कर सकें. इसीलिए बाहर काम का बहाना ले कर जाती हैं. ये सब बातें सुन कर विभोर वसु के काम करने से चिढ़ा रहता था.

आज विभोर का पारा 7वें आसमान पर था क्योंकि उस की बहन आई हुई थी. वसु ने लैपटौप का बैग रख कर जल्दी से हाथमुंह धो कर चाय चढ़ा दी. थकान इतनी थी कि खाना बनाने की हिम्मत नहीं हो रही थी. लेकिन बनाना तो था ही. चाय पी कर वसु खुद को थोड़ा फ्रैश फील करती थी. फिर सोचा जा कर सब से पूछ ले कोई अगर चाय पीना चाहे तो.

‘‘मांजी, विभोर दीदी आप लोग चाय पीओगे क्या? मैं अपने लिए बना रही हूं,’’ उस ने पूछा.

‘‘अरे शाम के 7 बज रहे हैं यह कोई टाइम है चाय पीने का? जल्दी खाना बनाओ और हां मां ने अभी तक दवा नहीं ली है, वह भी ला कर दे दो,’’ विभोर बोला.

थकान और पति का आदेशात्मक स्वर वसु को तोड़ गया. जानती थी पति नहीं चाहता है वह औफिस में काम करे, उस के हिसाब से तो घर में ही स्त्री को कार्य करना चाहिए. बाहर निकल कर स्वच्छंद हो जाएगी. वसु चुप रही. उसे पता था नौकरी किसी भी कीमत पर नहीं छोड़नी है. उस ने ला कर मां को दवाई और पानी दे दिया. फिर चाय बनाने के साथ ही खाने की तैयारी शुरू कर दी. अभी बात को बढ़ाना ठीक नहीं समझ. शारीरिक थकान और विभोर की बातें मन को परेशान कर रही थीं.

समय अपनी रफ्तार से बढ़ने लगा. वसु शांत रहने की कोशिश करती, सब को मुसकरा कर ही जवाब देती. जब भी उस के चेहरे पर मुसकराहट होती जाने क्यों विभोर अजीब सी प्रतिक्रिया देता और अकसर ढीठ की संज्ञा से विभूषित करते, आज वसु खाना बनाते हुए गुनगुनाने लगी, गाना गाते हुए वसु की बोरियत दूर होती थी, मन भी हलका भी हो जाता था.

विभोर ने सुना तो बोला, ‘‘अम्मां, देखना कैसी ढीठ है, अभी डांट पड़ी है, अब गा रही है… जरा भी लिहाज नहीं.’’

असल में थोड़ी देर पहले विभोर उस को कपड़ों के लिए चिल्ला चुका था, उसे वही शर्ट पहननी थी जो गंदी थी, जबकि वसु इतवार को ही वाशिंगमशीन चलाती थी.

वसु ने सुन लिया. रसोई से आ कर बोली, ‘‘क्या मुंह बना कर घूमती रहूं, वह भी तो आप को अच्छा नहीं लगेगा.’’

वैसे भी 3 भाइयों में सब से छोटी वसु चंचल, खिलखिलाने वाली हंसमुख लड़की थी.

शादी के 4 साल बाद भी विभोर में कोई बदलाव नहीं था. अब वसु को लगने लगा था, उस से कहीं भूल तो नहीं हो गई. उस ने सोचा था पिता कि अनुपस्थिति ने विभोर को शालीन, जिम्मेदार बनाया होगा, पर वसु की सोच उसे झूठा साबित कर रही थी.

छुट्टी का दिन था, सास के पैर में दर्द था विभोर औफिस गया था, थोड़ी देर में विभोर आ गया और आते ही बोला, ‘‘अरे वसु, तुम ने अम्मां के सामने सिर पर पल्ला नहीं किया? सिर झुका सास के पैरों को तल्लीनता से दबाती वसु को ये भी पता नहीं चला विभोर औफिस से कब आ गया और जाने कब उस के सिर से पलला सरक गया.’’

अचानक विभोर ने एक तमाचा वसु के गाल पर मार दिया.

कराह उठी वसु, ‘‘तुम्हारी ढीठता को तो

2 मिनट में ठीक कर दूंगा, मां के सामने सिर पर पल्ला नहीं है, इतनी छोटी बात भी बतानी पड़ेगी.’’

वसु ने आंखों में आश्चर्यमिश्रित प्रश्न समेटते हुए पति की ओर देखा, शादी के इतने समय बाद सिर पर पल्ले की बात कही है पहले कभी कही ही नहीं थी. वह खुद ही सिर पर पल्ला रख रही थी और अगर सिर से हट भी गया तो उस के लिए तमाचा, उस का सारा अस्तित्व ही हिल गया.

वसु ने दर्द को पीते हुए सास की ओर  देखा, शायद सास ही बोल दे कि सेवा कर रही थी, पल्ला हट भी गया तो क्या हुआ? लेकिन वहां निस्तब्धता पसरी थी. ऐसा लग रहा था जैसे सास वहां हैं ही नहीं. वसु को इतने पराएपन की उम्मीद नहीं थी.

गालों पर छपी उंगलियां जैसे उस के दिल पर अंकित हो गई थीं. चुपचाप उठ कर अपने कमरे में आ गई. आज उसे अपनी हर कोशिश नाकामयाब लग रही थी.

वसु का मन विद्रोह कर उठा कि न जाने क्यों विभोर कुछ सम?ाना ही नहीं चाहता है. उस से भी ज्यादा बुरा लगा. सास का चुप रह जाना. अगर बड़े पहली ही बार में सम?ा दें तो शायद बच्चे आगे गलती न करें. वसु ने महसूस किया मां कभी किसी भी बात पर विभोर को कुछ नहीं कहती हैं. उस के लिए यह थोड़ा अजीब था.

मुझे एतराज नहीं: क्यों शांत थी वह महिला

social story in hindi

कंगना की प्रकाश राज और दीपा मेहता से सोशल मीडिया पर तूतूमैंमैं

2006 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘गैंगस्टर’ से अभिनय कैरियर की शुरूआत करने वाली कंगना रानौट ने अब तक लगभग चालिस फिल्मों में अपने अभिनय का जलवा दिखाया है.2014 तक उन्होने ‘गैंगस्टर’,‘तनु वेड्स मनू’,‘क्वीन’ और ‘तनु वेड्स मनु रिर्टन’ सहित कुछ बेहतरीन फिल्मों में अभिनय कर अपने आपको  उत्कृष्ट अदाकारा के रूप में स्थापित किया.लेकिन उसके बाद वह धीरे धीरे वर्तमान सरकार की चापलूसी करने लगी.दक्षिणपंथी विचारधाराओं के साथ जुड़कर समय समय पर उन्होंने जो राय व्यक्त की है,उसके चलते उनके व्यक्तिगत और व्यावसायिक संबंधों में लगातार टकराव ने विवादों को जन्म दिया है.पर वह खुद को बिंदास व धाकड़ साबित करने के लिए हर किसी को जवाब देत रहती हैं.फिल्म ‘तेजस’ से उन्होने खुद को देशभक्त व आतंकवादी के सफाए के लिए मर मिटने वाली नारी के रूप में स्थापित करने का असफल प्रयास किया है.फिल्म ‘तेजस’ पूरी तरह से एक नकली फिल्म नजर आती है.

बहरहाल,कंगना रानौट ने  अपनी फिल्म ‘तेजस’ का प्रचार करते हुए मीडिया से दूरी रखकर इजराइल के राजदूत से मिली.रक्षामंत्री राजनाथ सिंह सहित कई भाजपा नेताओं का अपनी फिल्म दिखायी.दशहरे पर दिल्ली में ‘लव कुश रामायण’ पांडाल जाकर रावण दहन किया.उसके बाद अयोध्या जाकर श्रीराम लाल के दर्शन भी किए. लेकिन अति घटिया फिल्म ‘तेजस’ को दर्शक नही मिले.तब कंगना ने दर्शकों के नाम माफीनामानुमा एक वीडियो संदेष जारी किया. जिसमें कंगना ने कोविड के बाद सिनेमाघरों में कम दर्शकों की संख्या के बारे में बात करते हुए अपने दर्शकों से सिनेमाघर जाकर फिल्म ‘तेजस’ को देखने व आनंद लेने का आग्रह किया.मगर कंगना रानौट की घटिया फिल्म ‘‘तेजस’’ देखने के लिए दर्शक नही आए.साठ करोड़ की लागत वाली फिल्म ‘तेजस’ तीन दिन में महज साढ़े तीन करोड़ ही कमा सकी.इससे वह बौखला गयी हैं.

ऐसे वक्त में जब कंगना के वीडियो पर अभिनेता प्रकाश राज ने कंगना के वीडियो को रीट्वीट करते हुए व्यंग्यात्मक टिप्पणी में लिखा, ‘भारत को हाल ही में 2014 में आजादी मिली है…कृपया इंतजार करें.. इसमें तेजी आएगी…’तब कंगना ने विरोधी फिल्म समीक्षकों ,प्रकाश राज और खुद को ट्रोल करने वालों पर कंगना ने एक लंबे पोस्ट के जरिए पलटवार करते हुए लिखा है, ‘वे सभी जो मेरे लिए शुभकामनाएं दे रहे हैं, उनका जीवन हमेशा के लिए दुखी रहेगा क्योंकि उन्हें जीवन भर हर दिन मेरी महिमा देखनी होगी. 15 साल की उम्र में बिना कुछ लिए घर छोड़ने के बाद से मैं लगातार अपने भाग्य को संवार रही हूं और इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि महिला सशक्तीकरण और अपने देश भारत के लिए महत्वपूर्ण काम करना मेरी किस्मत में है….अपने स्वयं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए मैं उनसे मेरे फैन क्लबों में शामिल होने का अनुरोध करती हूं, इस तरह वे बड़ी सार्वभौमिक योजना के साथ जुड़ जाएंगे, मैं चाहती हूं कि मेरे शुभचिंतक उनके प्रति दयालु हों और उन्हें रास्ता दिखाएं.‘

दीपा मेहता पर प्रहार करते हुए कंगना ने सारी मर्यादाएं तोड़ बकी गाली

‘तेजस’ के प्रचार के क्रम में कंगना ने इजराइल के राजदूत नाओर गिलॉन से अपनी मुलाकात का कंगना ने वीडियो जारी किया है.जिसमे कंगना ने कहा है-‘‘“एक हिंदू राष्ट्र के रूप में, सदियों से जारी हिंदू नरसंहार, हम यहूदियों के साथ बहुत पहचान रखते हैं और हम दृढ़ता से मानते हैं कि हम हिंदुओं को समर्पित भारत के हकदार हैं, यहूदी भी एक राष्ट्र के हकदार हैं और वे हमें वह भूमि नहीं दे सकते बल्कि इस्लामी दुनिया बहुत ही अमानवीय और कंजूस है, जहां पूरी दुनिया में उनके पास दूसरे सबसे बड़े देश हैं, जिन पर मुख्य रूप से ईसाई देशों का वर्चस्व है.इसलिए मुझे लगता है कि आप लोग जिसके लिए लड़ रहे हैं, वह सही मायनों में आपका है और हम एक हिंदू राष्ट्र के रूप में इजराइल के समर्थन में खड़े हैं.‘‘

फिल्म सर्जक दीपा मेहता ने इजराइल-हमास युद्ध पर दिए गए कंगना के बयान से असहमत नजर आ रही हैं. उन्होंने इजराइल के राजदूत नाओर गिलॉन के साथ कंगना की मुलाकात का एक वीडियो फिर से साझा किया, साथ ही एक टिप्पणी भी की, ‘ओएमजी, किसने उन्हें खुला छोड़ दिया.‘’

इससे कंगना विफर गयी कंगना ने दीपा मेहता पर उनके निजी विचारों पर टिप्पणी करने के लिए पलटवार किया है. एक्स को संबोधित करते हुए, कंगना ने लिखाः “उसे खुला किसने छोड़ दिया? तुमको क्या औरंगजेब की आत्मा ने अपने हरम में जंजीरों में जकड़ा हुआ गुलाम बनाकर रखा है? मैडम लगता है आज कल रातों में कुछ ज्यादा बीडीएसएम हो रहा है..सुधर जाओ!!”

अब कंगना रानौट के इस कृत्य को ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ कहें या ‘सैंयां भए कोतवाल को डर काहे का…’’ कहा जाए.

नास्तिक बहू: भाग 1- नैंसी के प्रति क्या बदली लोगों की सोच

नलिनी शीशे के सामने खड़ी हो स्वयं को निहारने लगी. खुले गले का ब्लाउज, ढीला जुड़ा, खुला पल्लू, माथे पर अपनी साड़ी के रंग से मिलता हुआ बड़ी सा बिंदी, पिंक कलर की लिपिस्टिक और गले में लंबा सा मंगलसूत्र… इन सब में नलिनी बेहद ही आकर्षक लग रही थी. कल रात ही उस ने तय कर लिया था कि उसे क्या पहनना है और कीर्तन में जाने के लिए किस तरह से तैयार होना है.

सुबह होते ही उस ने अपनी बहू नैंसी से कहा, “नैंसी, जरा बेसन, हलदी और गुलाबजल मिला कर कर लेप तैयार कर लेना, बहुत दिनों से मैं ने लगाया नहीं है. पूजापाठ, भजनकीर्तन और प्रभु चरणों में मैं कुछ इस तरह से लीन हो जाती हूं कि मुझे अपनी ओर ध्यान देने का वक्त ही नहीं मिल पाता.”

नलिनी की बातें सुन नैंसी मंदमंद यह सोच कर मुसकराने लगी कि हर सोमवार मम्मीजी यही सारी बातें दोहराती हैं जबकि वह सप्ताह में 2-3 बार अपने चेहरे पर निखार के लिए लेप लगाती ही हैं और भजनकीर्तन से ज्यादा वह खुद के लुक पर ध्यान देती हैं.

नैंसी होंठों पर मुसकान लिए हुए बोली,”मम्मीजी, इस बार आप यह इंस्टैंट ग्लो वाला पील औफ ट्राई कर के देखिए.”

नैंसी के ऐसा कहते ही नलिनी आश्चर्य से बोली,”क्या सचमुच इंस्टैंट ग्लो आता है?”

“आप ट्राई कर के तो देखिए मम्मीजी…” नैंसी ने प्यार से कहा. वैसे दोनों सासबहू के बीच कोई तालमेल नहीं था. एक पूरब की ओर जाती, तो दूसरी पश्चिम की ओर. नलिनी को खाने में जहां चटपटा, मसालेदार पसंद था, वहीं नैंसी डाइट फूड पर जोर देती. नलिनी चाहती थी कि कालोनी की बाकी बहुओं की तरह नैंसी भी घर पर साड़ी ही पहने लेकिन वह ऐसा नहीं करती क्योंकि उसे काम करते वक्त साड़ी में असुविधा महसूस होती इसलिए वह घर पर सलवार सूट पहन लेती ताकि घर पर शांति बनी रहे और बात ज्यादा न बढ़े लेकिन यह भी नलिनी को नागवार ही गुजरता.

नैंसी की एक और बात नलिनी की आंखों में चुभती और वह थी नैंसी का भजनकीर्तन से दूर भागना. इस बात को ले कर कालोनी की सभी औरतें नलिनी को तानें भी दिया करती थीं कि कैसी बहू ब्याह कर लाई हो, जो पूजापाठ और भजनकीर्तन में भाग लेने के बजाय वहां से भाग लेती है. नलिनी की घनिष्ठ सहेली सुषमा तो उस से क‌ई बार यह कहने से भी नहीं चूकती कि तेरी बहू तो बिलकुल भी संस्कारी नहीं है. यह सुन कर नलिनी का पारा चढ़ जाता और वह नैंसी पर दबाव डालती कि वह भी बाकी बहुओं की तरह सजधज कर पूजाअर्चना में अपनी सक्रिय भूमिका निभाए लेकिन नैंसी साफ मना कर देती क्योंकि वह किसी के भी दबाव में आ कर ऐसा कोई काम नहीं करना चाहती थी जिसे करने का उस का अपना मन न हो. इसी वजह से क‌ई बार दोनों के मध्य कहासुनी भी हो जाती.

नैंसी का मानना था कि कर्म ही पूजा है और हर इंसान को अपना काम पूरी ईमानदारी से करना चाहिए. नैंसी की इसी सोच की वजह से वह अपना समय औरों की तरह पूजापाठ में नहीं गंवाती, जो कालोनी की महिलाओं को बुरा लगने का एक बहुत ही बड़ा कारण था.

नलिनी और नैंसी के बीच लाख अनबन हो लेकिन जहां फैशन की बात आती दोनों एक हो जातीं और नलिनी, नैंसी के फैशन टिप्स जरूर फौलो करती क्योंकि नैंसी का फैशन सैंस कमाल का था. उस के ड्रैससैंस, मेकअप और हेयरस्टाइल के आगे सब फीका लगता.

नलिनी फेस पैक का डब्बा नैंसी से लेते हुई बोली,”आज कालोनी की सभी औरतें कीर्तन में आएंगी न, इसलिए मुझे भी थोड़ा ठीकठाक तैयार हो कर तो जाना ही पड़ेगा. वैसे तो मैं बाहरी सुंदरता पर विश्वास नहीं रखती, मन की सुंदरता ही मनुष्य की असली सुंदरता होती है लेकिन तुम तो जानती ही हो कि यहां की औरतों को खासकर वह शालिनी न जाने अपनेआप को क्या समझती है. उसे तो ऐसे लगता है जैसे उस से ज्यादा सुंदर इस कालोनी में कोई है ही नहीं और जब से दादी बनी है इतराती फिरती है. हर किसी से कहते नहीं थकती है कि मेरी त्वचा से किसी को मेरी उम्र का पता ही नहीं चलता. जब तक मैं किसी को न बताऊं कि दादी बन गई हूं, कोई जान ही नहीं पाता. भला कोई जान भी कैसे पाएगा… चेहरे पर इतना मेकअप जो पोत कर आती है. भजन में आती है या फैशन शो में कौन जाने…

नैंसी बिना कुछ कहे नलिनी की बातें सुन कर केवल मुसकरा कर वहां से चली गई क्योंकि नैंसी भलीभांति जानती है कि स्वयं नलिनी भी कालोनी की उन्हीं औरतों में से एक है जो लोगों के सामने खुद को खूबसूरत दिखाने में कोई भी कसर नहीं छोड़ती. भजनकीर्तन, पूजापाठ, व्रतअनुष्ठान यह सब इस सोसाइटी की ज्यादातर महिलाओं के लिए एक मनोरंजन और टाइमपास का साधन मात्र ही है जिस में दिखावा और ढोंग से ज्यादा कुछ नहीं है. असल में यहां की ज्यादातर महिलाएं केवल सजसंवर कर मंदिर प्रांगण में खुद को सुसंस्कृत साबित करने में लगी रहती हैं. अपनी भव्यता महंगी साड़ियों और गहनों का प्रर्दशन करना ही उन का मुख्य उद्देश्य होता है. आस्था, श्रद्धा जैसे बड़ेबड़े शब्द तो सिर्फ दिखावा व स्वांग मात्र ही है. इस बात से नैंसी पूर्ण रूप से अवगत थी.

हर सोमवार की तरह आज भी दुर्ग शहर के पौश कालोनी साईं परिसर में शाम को सोसाइटी कंपाउंड के मंदिर प्रांगण में भजनकीर्तन का आयोजन रखा गया था. इसलिए नलिनी सुबह होते ही अपने चेहरे पर निखार लाने में जुट गई थी और सारा दिन शाम की तैयारी में ही लगी रही. निर्धारित समय पर पूरी तरह से सजसंवर कर इतराती हुई बुदबुदाई,’आज कीर्तन में सब की नजरें सिर्फ मुझ पर और मुझ पर ही होंगी,’ तभी नलिनी का फोन बजा,”हैलो… नलिनी, भजन संध्या के लिए तैयार हुई या नहीं? मैं और मेरी बहू निकल रहे हैं,” नलिनी की खास सहेली सुषमा बोली जो उसी सोसाइटी की रहने वाली थी.

“हां, बस निकल ही रही हूं. तुम दोनों सासबहू निकलो मैं तुम्हें गेट पर ही मिलती हूं,” नलिनी अपने मेकअप का टच‌अप करती हुई बोली.

“अरे…क्या तुम अकेले ही कीर्तन में आ रही हो, नैंसी क्यों नहीं आ रही है?”

मां- भाग 3 : क्या बच्चों के लिए ममता का सुख जान पाई गुड्डी

‘‘हां, छोड़ रखा है क्योंकि आप का यह आश्रम है ही गरीब और निराश्रित बच्चों के लिए.’’

‘‘नहीं, यह तुम जैसों के बच्चों के लिए नहीं है, समझीं. अब या तो बच्चों को ले जाओ या वापस जाओ,’’ सुमनलता ने भन्ना कर कहा था.

‘‘अरे वाह, इतनी हेकड़ी, आप सीधे से मेरे बच्चों को दिखाइए, उन्हें देखे बिना मैं यहां से नहीं जाने वाली. चौकीदार, मेरे बच्चों को लाओ.’’

‘‘कहा न, बच्चे यहां नहीं आएंगे. चौकीदार, बाहर करो इसे,’’ सुमनलता का तेज स्वर सुन कर गुड्डी और भड़क गई.

‘‘अच्छा, तो आप मुझे धमकी दे रही हैं. देख लूंगी, अखबार में छपवा दूंगी कि आप ने मेरे बच्चे छीन लिए, क्या दादागीरी मचा रखी है, आश्रम बंद करा दूंगी.’’

चौकीदार ने गुड्डी को धमकाया और गेट के बाहर कर दिया.

सुमनलता का और खून खौल गया था. क्याक्या रूप बदल लेती हैं ये औरतें. उधर होहल्ला सुन कर जमुना भी आ गई थी.

‘‘मम्मीजी, आप को इस औरत को उसी दिन भगा देना था. आप ने इस के बच्चे रखे ही क्यों…अब कहीं अखबार में…’’

‘‘अरे, कुछ नहीं होगा, तुम लोग भी अपनाअपना काम करो.’’

सुमनलता ने जैसेतैसे बात खत्म की, पर उन का सिरदर्द शुरू हो गया था.

पिछली घटना को अभी महीना भर भी नहीं बीता होगा कि गुड्डी फिर आ गई. इस बार पहले की अपेक्षा कुछ शांत थी. चौकीदार से ही धीरे से पूछा था उस ने कि मम्मीजी के पास कौन है.

‘‘पापाजी आए हुए हैं,’’ चौकीदार ने दूर से ही सुबोध को देख कर कहा था.

गुड्डी कुछ देर तो चुप रही फिर कुछ अनुनय भरे स्वर में बोली, ‘‘चौकीदार, मुझे बच्चे देखने हैं.’’

‘‘कहा था कि तू मम्मीजी से बिना पूछे नहीं देख सकती बच्चे, फिर क्यों आ गई.’’

‘‘तुम मुझे मम्मीजी के पास ही ले चलो या जा कर उन से कह दो कि गुड्डी आई है…’’

कुछ सोच कर चौकीदार ने सुमनलता के पास जा कर धीरे से कहा, ‘‘मम्मीजी, गुड्डी फिर आ गई है. कह रही है कि बच्चे देखने हैं.’’

‘‘तुम ने उसे गेट के अंदर आने क्यों दिया…’’ सुमनलता ने तेज स्वर में कहा.

‘‘क्या हुआ? कौन है?’’ सुबोध भी चौंक  कर बोले.

‘‘अरे, एक पागल औरत है. पहले अपने बच्चे यहां छोड़ गई, अब कहती है कि बच्चों को दिखाओ मुझे.’’

‘‘तो दिखा दो, हर्ज क्या है…’’

‘‘नहीं…’’ सुमनलता ने दृढ़ स्वर में कहा फिर चौकीदार से बोलीं, ‘‘उसे बाहर कर दो.’’

सुबोध फिर चुप रह गए थे.

इधर, आश्रम में रहने वाली कुछ युवतियों के लिए एक सामाजिक संस्था कार्य कर रही थी, उसी के अधिकारी आए हुए थे. 3 युवतियों का विवाह संबंध तय हुआ और एक सादे समारोह में विवाह सम्पन्न भी हो गया.

सुमनलता को फिर किसी कार्य के सिलसिले में डेढ़ माह के लिए बाहर जाना पड़ गया था.

लौटीं तो उस दिन सुबोध ही उन्हें छोड़ने आश्रम तक आए हुए थे. अंदर आते ही चौकीदार ने खबर दी.

‘‘मम्मीजी, पिछले 3 दिनों से गुड्डी रोज यहां आ रही है कि बच्चे देखने हैं. आज तो अंदर घुस कर सुबह से ही धरना दिए बैठी है…कि बच्चे देख कर ही जाऊंगी.’’

‘‘अरे, तो तुम लोग हो किसलिए, आने क्यों दिया उसे अंदर,’’ सुमनलता की तेज आवाज सुन कर सुबोध भी पीछेपीछे आए.

बाहर बरामदे में गुड्डी बैठी थी. सुमनलता को देखते ही बोली, ‘‘मम्मीजी, मुझे अपने बच्चे देखने हैं.’’

उस की आवाज को अनसुना करते हुए सुमन तेजी से शिशुगृह में चली गई थीं.

रघु खिलौने से खेल रहा था, राधा एक किताब देख रही थी. सुमनलता ने दोनों बच्चों को दुलराया.

‘‘मम्मीजी, आज तो आप बच्चों को उसे दिखा ही दो,’’ कहते हुए जमुना और चौकीदार भी अंदर आ गए थे, ‘‘ताकि उस का भी मन शांत हो. हम ने उस से कह दिया था कि जब मम्मीजी आएं तब उन से प्रार्थना करना…’’

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं, बाहर करो उसे,’’ सुमनलता बोलीं.

सहम कर चौकीदार बाहर चला गया और पीछेपीछे जमुना भी. बाहर से गुड्डी के रोने और चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं. चौकीदार उसे डपट कर फाटक बंद करने में लगा था.

‘‘सुम्मी, बच्चों को दिखा दो न, दिखाने भर को ही तो कह रही है, फिर वह भी एक मां है और एक मां की ममता को तुम से अधिक कौन समझ सकता है…’’

सुबोध कुछ और कहते कि सुमनलता ने ही बात काट दी थी.

‘‘नहीं, उस औरत को बच्चे बिलकुल नहीं दिखाने हैं.’’

आज पहली बार सुबोध ने सुमनलता का इतना कड़ा रुख देखा था. फिर जब सुमनलता की भरी आंखें और उन्हें धीरे से रूमाल निकालते देखा तो सुबोध को और भी विस्मय हुआ.

‘‘अच्छा चलूं, मैं तो बस, तुम्हें छोड़ने ही आया था,’’ कहते हुए सुबोध चले गए.

सुमनलता उसी तरह कुछ देर सोच में डूबी रहीं फिर मुड़ीं और दूसरे कमरों का मुआयना करने चल दीं.

2 दिन बाद एक दंपती किसी बच्चे को गोद लेने आए थे. उन्हें शिशुगृह में घुमाया जा रहा था. सुमन दूसरे कमरे में एक बीमार महिला का हाल पूछ रही थीं.

तभी गुड्डी एकदम बदहवास सी बरामदे में आई. आज बाहर चौकीदार नहीं था और फाटक खुला था तो सीधी अंदर ही आ गई. जमुना को वहां खड़ा देख कर गिड़गिड़ाते स्वर में बोली थी, ‘‘बाई, मुझे बच्चे देखने हैं…’’

उस की हालत देख कर जमुना को भी कुछ दया आ गई. वह धीरे से बोली, ‘‘देख, अभी मम्मीजी अंदर हैं, तू उस खिड़की के पास खड़ी हो कर बाहर से ही अपने बच्चों को देख ले. बिटिया तो स्लेट पर कुछ लिख रही है और बेटा पालने में सो रहा है.’’

‘‘पर, वहां ये लोग कौन हैं जो मेरे बच्चे के पालने के पास आ कर खडे़ हो गए हैं और कुछ कह रहे हैं?’’

जमुना ने अंदर झांक कर कहा, ‘‘ये बच्चे को गोद लेने आए हैं. शायद तेरा बेटा पसंद आ गया है इन्हें तभी तो उसे उठा रही है वह महिला.’’

‘‘क्या?’’ गुड्डी तो जैसे चीख पड़ी थी, ‘‘मेरा बच्चा…नहीं मैं अपना बेटा किसी को नहीं दूंगी,’’ रोती हुई पागल सी वह जमुना को पीछे धकेलती सीधे अंदर कमरे में घुस गई थी.

सभी अवाक् थे. होहल्ला सुन कर सुमनलता भी उधर आ गईं कि हुआ क्या है.

उधर गुड्डी जोरजोर से चिल्ला रही थी कि यह मेरा बेटा है…मैं इसे किसी को नहीं दूंगी.

झपट कर गुड्डी ने बच्चे को पालने से उठा लिया था. बच्चा रो रहा था. बच्ची भी पास सहमी सी खड़ी थी. गुड्डी ने उसे भी और पास खींच लिया.

‘‘मेरे बच्चे कहीं नहीं जाएंगे. मैं पालूंगी इन्हें…मैं…मैं मां हूं इन की.’’

‘‘मम्मीजी…’’ सुमनलता को देख कर जमुना डर गई.

‘‘कोई बात नहीं, बच्चे दे दो इसे,’’ सुमनलता ने धीरे से कहा था और उन की आंखें नम हो आई थीं, गला भी कुछ भर्रा गया था.

जमुना चकित थी, एक मां ने शायद आज एक दूसरी मां की सोई हुई ममता को जगा दिया था.

हिंदी सिनेमा से उत्सव त्योहार और लोक संस्कृति गायब: कौन है दोषी….?

हमेशा से माना जाता रहा है कि सिनेमा समाज का दर्पण होता  है.यही वजह है कि जब भारतीय सिनेमा बनना शुरू हुआ, तब से भारतीय सिनेमा में भारतीय लोक संस्कृति, होली,दशहरा,दीवाली,ईद व बकरीद आदि को सिनेमा में उत्सव की तरह चित्रित किया जाता रहा है.लेकिन नब्बे के दशक के ही दौरान सिनेमा में अचानक बदलाव नजर आने लगा.और अब सिनेमा से उत्सव या लोक संस्कृति पूरी तरह से लुप्त हो चुकी है.सह धर्मिता,समाज की लोकसंस्कृति व उत्सव धर्मिता से वर्तमान का सिनेमा दूर जा रहा है.‘सिनेमा’ से ‘रस’ खत्म हो गया है.इसके लिए कुछ हद तक कारपोरेट व राजनेता ही दोषी हैं!!

सिर्फ सिनेमा ही क्यों? जीवन के दूसरे आयामों से भी ‘रस’ गायब होता जा रहा है.पहले यही ‘रस’ देश की आत्मा हुआ करती थी.संगीत,नाट्य शास्त्र,कला संस्कृति, साहित्य,लोक कला से भी ‘रस’ गायब हो चुका है.आज हर रीति रिवाज का बाजारीकरण धर्म के रूप में सिनेमा में बेचा जा रहा है.

भारतीय सिनेमा कीश्षुरूआत के साथ हिंदी सिनेमा में दीपावली की अभिव्यक्ति पर्व की विविधता और परंपरा को दर्शाती थी.तब गीतों में मिट्टी के दीपकों के बीच जगमगाते चेहरों की रंगत अलग ही चमकती थी. 1961 पं.नरेंद्र शर्मा लिखित व लता मंगेशकर आवाज में लय बद्ध गीत ‘‘ज्योति कलश छलके हुए गुलाबी लाल सुनहरे रंग दल बादल के ज्योति कलश छलकेघर आंगन वन उपवन उपवन करती ज्योति अमृत के सिंचन मंगल घट ढलके, ज्योति कलश छलके..’,जब आज भी सुनाई देते हैं,तो दीपावली की रोशनी जैसे मनप्राण आलोकित कर देती है.क्योकि उस वक्त दीपावली का मतलब खरीदारी नहीं, रोशनी का त्योहार होता था.तब यह धर्म का प्रचार नहीं था. बिजली की झालरें नहीं लगाई जाती थीं, दीपकों में तेल-बाती रख रोशनी की जाती थी.किसी के बताए बगैर भी हमें पता होता था कि दीपावली भगवान श्रीराम के अयोध्या लौट आने की खुशी में मनाई जाती है.वह समय था जब गांव, समाज, परिवार, रिश्ते कहानियों भर में नहीं थे. उन्हें हम जीते थे, उनसे सीखते थे.मां-बुआ से दीपावली के अवसर पर लीपना और रंगोली बनाना सीखा जाता था, तो चाचा से कंदील बनाकर रोशन करना.बहनों के साथ कच्ची मिट्टी के घरकुंडे बनाने का अलग ही सुख था.बुजुर्गों को लक्ष्मी पूजन करते देखा जाता था और उसी तरीके से उसी परंपरा का निर्वहन आगे तक करने की कोशिश की जाती थी. गांव, समाज समय के साथ छूट जाता था, लेकिन परंपराएं साथ रहती थीं, हमारे साथ चलती थीं.

जयंत देसाई की 1940 में प्रदर्शित फिल्म ‘दीवाली’,गजानन जागीरदार ने 1955 मंे ‘घरघर आयी दीवाली’,दीपक आषा 1956 में ‘दीवाली की रात’ आदि में दीवाली का त्योहार उत्सव की तरह चित्रित किया गया था.1972 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘अनुराग’’ में समूहता,आपसी भरोसे व विश्वास को प्रदर्शित करने के लिए सभी पड़ोसी ‘दीवाली’ का त्योहार कैंसर के बच्चों की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए मनाता है.             गोविंदा की फिल्म ‘आमदनी  अठन्नी खर्चा रूपया’’ में भी ‘‘आई है दीवाली,सुनो जी घर वाली’’ था.

लेकिन जैसे-जैसे परिवार, समाज और गांव से दूर शहरों में सिमटते गए, हमारे त्योहार भी परंपरा से दूर होते गए. त्योहारों में क्या करना चाहिए, की बातें कम होने लगी, क्या नहीं करना चाहिए, चर्चा में वह रहने लगा.तो वहीं दीपावली के उत्साह में हिंदी सिनेमा ने शामिल होना ही छोड़ दिया है. दीपावली ही क्यों, बीते कई वर्षों में शायद ही कोई फिल्म हो, जिसमें त्योहार को उसके पारंपरिक अंदाज में दिखाया गया हो. 2001 में करण जोहर ने बाजार को समर्पित फिल्म ‘कभी खुशी कभी गम’ बनाकर हमें दीपावली का एक नया तरीका समझाया. स्टाइलिश कपड़े पहनो, स्टाइलिश जेवर पहनो, स्टाइलिश मोमबत्ती जलाओ, स्टाइल से खडे़ हो जाओ, स्टाइल से पूजा कर लो, बस हो गई ‘सभ्य’ लोगों की दीपावली.इसमंे न कोई उत्साह न कोई उमंग.. कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कामरूप तक ‘एलिट’ में शामिल होना चाहते हैं तो बस यही तरीका स्वीकार करना होगा दीपावली का.मतलब त्योहारों मंे विविधता व उत्साह खत्म हो गया.

वास्तव में 1992 में जब सुभाष चंद्र गोयल ने सेटेलाइट चैनल ‘‘जीटीवी’’ की शुरूआत की,तो उन्होने भारतीय लोक संस्कृति,उत्सव,त्यौहार आदि से परे जाकर आधुनिकता परोसना शुरू किया.(खैर,अब कर्ज तले दबे जीटीवी /जी नेटवर्क को सोनी टीवी द्वारा खरीदने की बातीत चल रही है.)तब फिल्मकारों, लेखकों, निर्देशकों व कलाकारों की एक नई पौध विकसित हुई.मसलन-दिया टोनी सिंह,विंटा नंदा,रमण कुमार वगैरह वगैरह…

दिया टोनी सिंह ने आधुनिकता के नाम पर अपने टीवी सीरियल ‘‘बनेगी अपनी बात’’ में चार लड़कियों के छोटे शहर से बड़े शहर पहुॅचने के बाद की कहानी पेश की.दिया टोनी सिंह ने समुद्री बीच व स्वीमिंग पुल संस्कृति के साथ अर्ध  नग्न दृश्यांे से लेकर चंुबन दृश्य तक  जमकर परोसे.इस सीरियल से पहले किसी भी फिल्म में तब तक ख्ुालकर चंुबन दृश्य नही दिखाए गए थे.इससे उस वक्त फिल्मकारों के बीच हंगामा मचना स्वाभाविक था.पर जीटीवी या दिया टोनी सिंह शर्मिंदा नहीं थे.‘बनेगी अपनी बात’ में कहीं भी भारतीय लोक संस्कृति,भारतीय त्यौहार व उत्सव का आनंद,सामूहिता ,भारतीयता का दूर दूर तक नामोनिशां नही था.

इसके बाद फिल्म ‘‘साथ साथ’’ के निदशर््षक रमण कुमार ने बतौर निर्माता व निर्देशक जीटीवी पर टीवी सीरियल ‘‘तारा’’ लेकर आए.और जिन मूल्यांे की वकालत उन्होने 1982 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘साथ साथ’’ में की थी,1993 में टीवी सीरियल ‘‘तारा’’ में उन सभी की धज्जियां उड़ाते हुए उन्होने रिश्ते नातों के साथ साथ ही अति आधुनिक,अति भ्रष्ट,बिगड़ैल, विद्रोही युवा पीढ़ी को पेश किया.रमण कुमार ने इस सीरियल में युवा पीढ़ी के जिस रूप का चित्रण किया,उसकी कल्पना उस वक्त के समाज में नही की जा रही थी.मगर उस वक्त रमण कुमार ने स्वीकार किया था कि उनके सीरियल की सह निर्देशक व सह लेखक विंटा नंदा ने होस्टल की जिंदगी जीते हुए जो अनुभव हासिल किए थे,वही सब उनके सीरियल ‘तारा’ का हिस्सा है.

सीरियल ‘‘साथ साथ’’ का नायक अविनाश वर्मा (फारुख शेख ) अपने अमीर पिता के विचारों से असहमत होकर समाजवाद की विचार धारा की सोच के साथ अलग राह अपनाता है.अविनाश को साथ मिलता है गीतांजली (दीप्ति नवल) का.गीतांजली भी अपने उद्योगपति पिता के विचारों से असहमत होकर अविनाश का साथ पकड़ती है.फिल्म में दो पीढ़ियों का टकराव सैद्धांतिक है.यह आधुनिक पीढ़ी आधुनिक होते हुए भी समानता व सामाजिक न्याय  की बात करती है.अपने पिता के साथ विद्रोही बनकर गाली गलौज नहीं करती.यह पीढ़ी मटेरियालिस्टिक  सोच के खिलाफ है.जबकि ‘तारा’ में  एक भी किरदार भारतीय नजर नही आता.इस सीरियल की हर महिला शराब व सिगरेट का सेवन करने के  साथ अवैध शारीरिक संबंध बनाने से पीछे नहीं रहतीं.मजेदार बात यह कि इसे काफी अच्छी टीआरपी मिली थी और यह सीरियल पूरे पांच वर्ष तक प्रसारित हुआ था.इस पूरे पांच सौ एपीसोड के सीरियल में एक भी उत्सव नजर नही आता.

उस वक्त सीरियल ‘तारा’ में तारा की सौतेली टीन एजर बेटी देवयानी ( ग्रुशा कपूर) का किरदार लोगों की समझ से परे थे,यह अलग बात है कि वर्तमान समय में समाज में देवयानी जैसी टीन एजर लड़कियां नजर आती हैं..अब यह सीरियल ‘तारा’ का असर है या….? देवयानी टीन एजर है,जो कि अपने माता पिता से गाली गलौज व अपशब्द करने के साथ ही अपनी उम्र से कई गुना बड़े पुरूष से प्यार करती है.इतना ही नहीं इस सीरियल में तारा (नवनीत कौर) और दीपक सेठ (आलोक नाथ) के बीच लंबे दृश्य फिल्माए गए,जिन्हे विंटा नंदा ने ही निर्देशित किया था.‘मी टू’ के वक्त विंटा नंदा ने आलोक नाथ पर अपना शारीरिक शोषण करने के साथ कई गंभीर आरोप लगाए थे.

सेटेलाइट टीवी चैनल ‘‘जीटीवी’’ पर ‘‘तारा’’ को लगातार पांच वर्षों तक जिस तरह की शोहरत मिली थी,और इसमें जिस तरह से भारतीयता,भारतीय संस्कृति,फोक कल्चर,उत्सव,त्योहार आदि का उपहास उड़ाया गया था,उसे धीरे धीरे हिंदी फिल्मों के फिल्मकारों ने भी आत्मसात करना शुरू कर दिया.इसकी मूल वजह यह भी रही कि सिनेमा से फिल्मकारों,लेखकों व कलाकारांे की वह पौध जुड़ रही थी,जिनकी जिंदगी ‘सार विहीन‘ थी.

वास्तव में ‘जीटीवी’ के साथ ही कारपोरेट जगत ने सिनेमा जगत/ कला जगत में कदम पसारने शुरू किए.एमबीए की पढ़ाई अथवा विदेशो से उच्च शिक्षा हासिल कर सीमेंट या कार वगैरह बेचने का काम करने वाले लोग सिनेमा बनाने लगे थे.इनकी अपनी जिंदगी में कोई सार नहीं था.यह सभी एकाकी जीवन जीने में यकीन करने वाले लोग थे,ऐसे में इनमें परिवार,उत्सव, लोक संस्कृति की समझ कहां से आती?तो फिर हम यह कैसे उम्मीद कर ले कि ऐसी पीढ़ी सिनेमा या टीवी जगत में उत्सव/लोकसंस्कृति भाईचारा आदि को परोसे.इस वजह से भी टीवी/सिनेमा से लोकसंस्कृति, उत्सव,त्योहार आदि गायब होते गए.जबकि टीवी व सिनेमा में धर्म को ज्यादा बेचा जाता रहा.आज भी टीवी सीरियलों,वेब सीरीज या सिनेमा में  त्यौहार या उत्सव नहीं परोसे जा रहे हैं,मगर धर्म को बेचकर दर्शको को लुभाने के प्रयास खुलेआम जारी है.

जब सिनेमा के निर्माण व वितरण पर कारपोरेट कल्चर हावी होने लगा,तो फिल्म की कहानी से लेकर हर चीज का बाजारीकरण हो गया.फिल्म के कलाकारांे ने त्योहारो पर कब्जा कर लिया.यह तय हो गया कि ईद पर किस कलाकर की फिल्म आएगी.दीवाली पर किस कलाकार की फिल्म आएगी.15 अगस्त के अवसर पर किस कलाकार की फिल्म आएगी.क्रिसमस पर किस कलाकर की फिल्म आएगी? इस बंटवारे ने भी उत्सव को दफनाने का काम किया.इतना ही नही अब तो राजनीतिज्ञों ने भी त्योहारों पर कब्जा कर ‘त्योहार’ को ‘उत्सव’ की बजाय‘वोट बैंक’ और ‘धर्म का बाजार’ बना डाला.

इन दिनों मुंबई सहित पूरे महाराष्ट् राज्य में ‘‘गणेशोत्सव’’ के दौरान पूरे ग्यारह दिन जिस तरह का माहौल नजर आता है,उसे देखकर 1893 में इस उत्सव की शुरूआत करने वाले स्व.बाल गंगाधर तिलक भी खुद को कोस रहे होंगे कि उनके उत्सव को लोगों ने क्या बना डाला.बाल गंगाधर तिलक के लिए ‘गणेशोत्सव’ में धार्मिक पूजा कम,  जन जागृति व शिक्षा के प्रचार प्रसार का उत्सव था.बाल गंगाधर तिलक की सोच वाला उत्सव नब्बे के दशक तक हिंदी व मराठी फिल्मों में नजर आता रहा है.

इतना ही नही 2000 से पहले तक मुंबई में ‘गणेशोत्सव’ को मनाने वाले हर पंडाल में उत्सव व लोकसंस्कृति को महत्व दिया जाता था.उन दिनों पांडाल की गणेषमूर्ति के आगे परदा नही होता था,कोई भी इंसान चाहे जितनी दूर खड़े होकर दर्शन कर सकता था.हर पांडाल में लोेक गीत संगीत व लोक नृत्य को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम आयोजित होते थे.मुझे याद है कि 1990 से 197 तक हर वर्ष मुझे ‘लालबाग चा राजा’ के आयोजक मुझे बुलाया करते थे,पर हम समयाभाव के चलते जा नही पाते थे.पर अब हालात यह है कि आम इंसान को सिर्फ ‘मुख दर्शन’ करने के लिए आठ से दस घंटे कतार में खड़ा होना पड़ा है,पांडाल के स्वयंसेवकों की डांट व लाट खानी पड़ती है.अब यह महत्वपूर्ण हो गया है कि गणेष मूर्ति पर कौन कितना चढ़ावा चढ़ाता है.अब धर्म के ठेकेदारों,राजनीतिज्ञों,पांडाल के आयोजकों और फिल्मी हस्तियों ने ‘गणेषोत्सव’ को ‘उत्सव’ की बजाय ‘बाजार’ का रूप दे दिया है.गणेशोत्सव का यही बाजारू रूप सिनेमा में भी नजर आने लगा है.अब सिनेमा में ‘गणेशोत्सव’,उत्सव या त्योहार नजर नही आता.

इतना ही नही बिहार में लोग दीवाली के छठे दिन ‘छठ पूजा’ का त्योहार मनाते हैं.पहले यह त्योहार सूर्य को जल देने की पूजा अर्चना के साथ मेला/उत्सव की षक्ल में मनाया जाता था.मतलब यह कि पहले ‘छठ पूजा’ पूरी तरह से सामाजिक मेला व सामाजिक उत्सव नजर आता था.लेकिन जब पत्रकार से राजनेता बने संजय निरूपम व कुछ भोजपुरिया कलाकारों का मंुबई में एक गठजोड़ बना,तब ‘छठ पूजा’ भी एक सास्कृतिक उत्सव या त्योहार की बजाय धार्मिक बाजार बन गया.और ‘छठ पूजा’ का यही आधुनिक रूप अब भोजपुरी सिनेमा में भी नजर आने लगा है. अब छठ पूजा का यह तीन दिवसीय मेला मंुबई के ‘जुहू बीच’ पर देखकर लोग सोचते है कि क्या यही भारतीय त्यौहार है? क्या यही भारतीय उत्सव है? क्योंकि संजय निरूपम और भोजपुरी फिल्म कलाकारों द्वारा मनाए जाने वाले इस ‘छठ पूजा’ मेले में कान फोड़ू शोरगुल, अश्लील नृत्य व गानों के बोलबाला के साथ नेतागण और कलाकार अपने आपको ही महान बताते हुए नजर आते हैं.मैं पिछले दस पंद्रह वर्षों से ‘छठ पूजा’ के जिस रूप को देख रहा हॅॅूं,उसकी मैंने कभी सपने मंे भी कल्पना नही की थी.तो वहीं समाज में जो कुछ हो रहा है,उसे फिल्मकार अपनी फिल्मों में पेश करने से बाज नही आते.

कारपोरेट राजनीतिज्ञों का संस्कृति या उत्सव से कभी संबंध नहीं रहा

कारपोरेट का संस्कृति ,भावनाआंे या उत्सव से कभी संबंध नहीं रहा.कारपोरेट का काम है चीजें बेचना.बाजार को बढ़ाना.धन कमाना.अफसोस अब सिनेमा के दीवानों के हाथ में सिनेमा रहा नही.सिनेमा जगत में कारपोरेट की घुसपैठ के बाद अब सीमेंट बेचने वाला तय कर रहा है कि दर्शक सिनेमा व टीवी सीरियल में क्या देखेगा? कारपोरेट ने ही रीयालिस्टिक षो  के नाम पर ‘बिगबौस’ जैसा कार्यक्रम परोसा है.

कारपोरेट की ही तरह राजनीतिज्ञों  या राजनेता का भी दूर दूर तक लोकसंस्कृति, उत्सवधर्मिता सहधर्मिता या ‘रस’ से रिष्ता नही है.

नवरात्रोत्सव पर राजनेताओं का कब्जा

नब्बे के दशक के बाद या यूं कहे कि फाल्गुनी पाठक के उत्कर्ष के साथ ही ‘नवरात्रोत्सव’ का बाजारीकरण हो गया था.लेकिन इस बार मुंबई के नवरौत्सव  पर ‘बाजार वाद’ के साथ ही ‘धर्म’ कुछ ज्यादा ही हावी नजर आ रहा है और यह पूर्णरूपेण राजनेता और कारपोरेट की मिली भगत का नतीजा है.पहली बार नवरात्रौत्सव मडल/ पंडालों में गणेषोत्सव की तरह ‘दुर्गादेवी’ की बड़ी बड़ी मुर्तियां स्थापित की गयी हैं..इनमें से ज्यादातार पांडाल राजनेता समर्थित हैं. इन पांडालों गरबा खेलने के लिए प्रति दिन दस रूपए से लेकर दस हजार रूपए तक वसूले गए.हर दिन हर पांडाल में किसी फिल्मी हस्ती को बुलाया गया.इतना ही नही सरकार ने उत्सव की इस दुकान पर खुद को बेचने मंे कोई कोताही नही बरती.धर्म के प्रचार,दुर्गा पूजा व भारतीय संस्कृति के प्रचार व प्रसार के नाम पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की जमकर धज्जियां उड़ायी गयी. शुक्रवार,शनीवार व रवीवार के दिन गरबा व डांडिया रास खेलने और दुर्गा पूजा के नाम पर कानफोड़ू संगीत बजाने शोरगुल करने के लिए रात साढ़े दस की बजाय रात  बारह बजे तक का समय तय कर दिया गया.मेट्रो की सेवाएं देर रात तक बढ़ा दी गयीं. यानी कि ‘नवरात्रोत्सव’ भी लोक संास्कृतिक उत्सव की बजाय धर्म का ऐसा बाजार बन गया,जहां हर राजनेता अपनी रोटी सेकने के लिए मौजूद नजर आता है.यानी कि उत्सव भी धर्म का बाजार के साथ ही वोट बैंक बनकर रह गए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लिखे गरबा गीत

जब देश का प्रधानमंत्री गरबा गीत लिखेगा तो किस तरह की संस्कृति/ उत्सव का बाजार लहलहाएगा? इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो गरबा गीत लिखे, जिन्हें नामचीन गायकांे से गवाकर फिल्म निर्माता वासु भगनानी और जैकी भगनानी की संगीत कंपनी ने आम लोगों तक पहुॅचाया.हम लोगों को याद दिला दें कि वासु भगनानी और जैकी भगनानी ने ही अक्षय कुमार के अभिनय से सजी डेढ़ सौ करोड़ की लागत वाली फिल्म ‘मिषन रानीगंज’ तथा टाइगर श्राफ व कृति सैनन के अभिनय से सजी फिल्म ‘‘ गणपत’ का निर्माण किया है.बाक्स आफिस पर बुरी तरह से असफल इन दोनों फिल्मों में फूहड़ तरीके से धर्म को ही बेचा गया है.जबकि फिल्म की कहानी व अन्य पक्षों की पूरी तरह से अनदेखी की गयी है.

कारपोरेट जगत में ऐसे तीरंदाज बैठे हुए हैं,जिनमें न संजीदगी,न रस,न संवेदना,न समझ है.इनके अंदर उत्सव व लोक संस्कृति को समझने की योग्यता भी नही है.कलात्मकता से तो इनका दूर दूर तक कोई नाता नही.आर्थिक उदारीकरण के चलते यह एनआरआई सिनेमा बनाकर आम दर्षक को लूटने व मूर्ख बनाने के साथ ही सिनेमा व कारपोरेट दोनों को बर्बादी के कगार पर ले जा रहे हैं.एमबीए व विदेष से षिक्षा लेकर आयी जमात ने ही ‘ईरोज इंटरनेषनल’, ‘अष्टविनायक’, ‘यूटीवी’ सहित कई कंपनियांे को डुबा दिया.

यश चोपड़ा सहित कुछ फिल्मकारों ने जिस तरह से ‘उत्सव’ का बाजारीकरण किया,उसके चलते समाज में ‘करवा चैथ’ का चलन तेजी से बढ़ा है.इसे भी सही नही माना जा सकता. क्योंकि  पहले हर महिला ‘करवा चैथ’ साधारण तरीके से मानती रही हैं.पर अब तो बहुत बड़ा बाजार बन चुका है.अब ‘करवा चैथ’ के नाम पर महंगी साड़ियां व गहने तक खरीदे जाते हैं.

दीपावली जैसे त्योहार भारतीय जीवन में इस तरह गुंथे रहे कि उसके बगैर हमारे सुख-दुख की अभिव्यक्ति ही संभव नहीं थी.यह त्योहार किसी न किसी रूप में हमारी संवेदना, हमारी सामाजिकता को प्रदर्शित करते थे. यदि बड़े पर्दे पर हर्ष का चरम दिखाना था, तो दीपावली जैसे त्योहार ही बहाने बनते थे, चाहे वह ‘खजांची’ में राजेंद्र कृष्ण के शब्द में कुछ ऐसे सुनाई दे-‘आई दीवाली आई, कैसे उजाले लाई घर-घर खुशियों के दीप जले, सूरज को शरमाए ये, चरागों की कतारें,रोज रोज कब आती हैं, उजाले की ये बहारें.’

उत्सव या त्योहार का अर्थ होता है समाज के हर तबके को एकता के सूत्र में पिरोना,लोगों को जोड़ना. नब्बे के दशक तक तो सिनेमा में इसी तरह से त्योहार चित्रित किए जाते थे.फिर चाहे वह होली का त्योहार हो या दीवाली का.फिल्म ‘‘शोले’’ के होली गीत को याद कीजिए.यह गीत और इस गीत के दृष्य समाज को एकजुट करने का का ही संदेश देता है.अब तो भारतीय सिनेमा में ‘होली का उत्सव’ और ‘होली गीत’ ही गायब हो गए हैं.फिल्म ‘ये जवानी हे दीवानी’ के होली गीत ‘बलम पिचकारी..’ देखकर क्या कहेंगें? वर्तमान पीढ़ी को तो पात ही नही होगा कि हारे हिंदी सिनेाम ने ही ‘होली आई रे’ जैसा होली गीत दिया था. वास्तव में पहले फिल्मों में त्योहार या उत्सव के गीत ‘समूहता’ के प्रतीक होते थे.सिर्फ त्योहार या उत्सव ही क्यों विवाह के बाद लड़की का ‘विदाई गीत’ भी ‘समूहता’ का ही प्रतीक होता था. अब इस तरह के विदाई गीत भी फिल्मों से गायब हो चुके हैं.

आजादी के बाद भारतीय सिनेमा पर मुस्लिम समुदाय ही हावी रहा.फिल्म के निर्माता,गीतकार, पटकथा लेखक सभी मुस्लिम ही होते थे.तब फिल्मों में मुस्लिम किरदार भी सही अनुपात में नजर आते थे.मगर अब तो फिल्मों से मुस्लिम किरदार गायब हो चुके हैं.हिंदू किरदारों में उच्च व ब्राम्हण वर्ग के किरदार ही नजर आते हैं.

हिंदी फिल्मों में होली व दीवाली के चित्रण में जमीन आसामान का अंतर आ चुका है.पहले फिल्मों में यह सभी त्योहार उत्सव की तरह नजर आते थे.ऐसे उत्सव जो समाज के हर तबके,वर्ग व धर्म के लोगों को जोड़ने का काम करते थे.नब्बे के दषक तक फिल्मों में चित्रित होने वाले होली व दीवाली के त्योहारों को हिंदू, मुस्लिम,सिख व ईसाई सभी धर्मावलंबी एक साथ मिलकर मनाते थे.पर अब पहले तो किसी फिल्म में यह त्योहार/ उत्सव नजर ही नही आते और अगर नजर भी आते हैं,तो इन्हे फूहड़ तरीके से ही चित्रित किया जाता है.

अब त्योहार /उत्सव कैसे मनाया जाए,इस पर पूरी तरह से कारपोरेट जगत का कब्जा हो चुका है.परिणामतः सिर्फ फिल्मों में ही नही बल्कि समाज में भी इन त्योहारो को  मनाने के तरीके /अंदाज बदल गए हैं.सिर्फ कारपोरेट जगत ही नहीं बल्कि राजनेता भी समाज पर अपने  अंदाज में दबाव बनाते हैं कि किसी भी त्योहार को,फिर चाहे वह ‘दही हांडी’ हो या ‘होली’ हो या ‘दीवाली’ हो या गणेषोत्सव या नवरात्रोत्सव हो या ईद का त्योहार ही क्यों न हो,यह सारे उत्सव च त्योहार कारपोरेट जगत व राजनेताओं की सोच के अनुसार ही मनाए जाने लगे हैं.

फिल्मों में गणेशोत्सव में शम्मी कपूर का नृत्य करना या संजय दत्त का नृत्य करना या रितेश देषमुख या सिद्धार्थ मल्होत्रा का नृत्य करने में जो बदलाव आया है,वह इसी बात की ओर इषारा करता है कि सिनेमा में उत्सव,त्योहार,लोकसंस्कृति  का विनाष ही हो रहा है.अब इन उत्सवों में ‘समूहता’ या सहउत्सव धर्मिता’ का घोर अभाव नजर आ रहा है.क्योंकि एमबीए पढ़कर या विदेशों में शिक्षा लेकर आने वालों की जिंदगी में ‘रस’ का अभाव होता है.यह सब ‘समूहता’ में यकीन करने की बजाय ‘एकल’ जीवन में यकीन करते हैं. यह लोग मटेरियालिस्टिकता को ही अपनाते हैं.और अपनी इसी सोच को सिनेमा के माध्यम से वह समाज पर देष पर थोपने का कम कर रहे है.अब हम याद दिला दें कि रमण कुमार ने अपने निर्देषन में बनी फिल्म ‘‘साथ साथ’’ में बाजारवाद व मटेरियालिस्टिक संसार के खिलाफ बात की थी.लेकिन इन्ही रमण कुमार  ने जब 1993 में सीरियल ‘तारा’ बनाया तो रिष्तों,संबंधों,उत्सव, ‘समूहता’ को तोड़ने की वकालत की.इसी सीरियल के बाद धीरे धीरे  फिल्मों में भी इसी का चलन हो गया.मसलन-फरहान अख्तर की फिल्म ‘दिल चाहता है’ में भी संबंध तोड़ने की ही बात है. ज्ञातब्य है कि रमण कुमार को ऐसा कारपोरेट के दबाव में करना पड़ा था.क्योंकि ‘तारा’ का प्रसारण सेटेलाइट चैनल ‘जीटीवी’ पर हुआ था, जिसके मालिक उद्योगपति सुभाषचंद्र गोयल हैं.

यदि हम बहुत गहराई से अवलोकन करे तो पता चलता है कि भारतीय सिनेमा में अमिताभ बच्चन की यंग्री यंग मैन के रूप में षोहरत मिलने के साथ ही कहानी, पटकथा ,संगीत व नृत्य सहित हर स्तर पर बदलाव आना षुरू हुआ था.फिर धीरे धीरे हिंसा के दृष्य बढ़ते गए तथा फिल्म से ‘लोक जीवन’ और ‘उत्सव’ खत्म होता गया.कई फिल्मकारों के अनुसार अमिताभ बच्चन के आगमन के दस साल बाद से उनके द्वारा मंुहमांगी पारिश्रमिक राशि मांगने के साथ ही बौलीवुड पर व्यावसायिकता हावी होने लगी थी,जिसे बाद में शाहरुख खान व अक्षय कुमार सहित दूसरे कलाकारों ने हवा दे दी.तों वही जीटीवी निर्मित फिल्म ‘गदरः एक प्रेम कथा’ से बौलीवुड पूरी तरह से कारपोरेट के चंगुल में फंसता चला गया. यह वह दौर था जब पहली बार कारपोरेट यानी कि अनिल अंबानी की कंपनी ‘रिलायंस इंटरटेनमेंट ’ ने अमिताभ बच्चन को पंद्रह सौ करोड़ रूपए में दस फिल्मों के लिए अनबंधित किया था.तब पहली बार एक कारपोरेट ने अक्षय कुमार को एक फिल्म के लिए 135 करोड़ रूपए दिए थे.

आश्चर्य की बात यह है कि यह सभी बड़े स्टार निजी जीवन में पारिवारिक संबंधों को अहमियत देते हैं,उत्सवधर्मिता में यकीन करते हैं,मगर फिल्म में परिवार, त्योहार,उत्सव ,समूहता की खिलाफत करने वाले किरदार निभाते हैं.यह उसी तरह से है,जैसे कि दक्षिण का हर कलाकार सेवा भावी व अति विनम्र है,पर फिल्म में हमेशा खॅूखार किरदार निभाते हुए अति लाउड आवाज में बात करते नजर आता है.यह सच्चाई है कि सिनेमा के परदे पर जिस तरह का जीवन जिया जा रहा है,जिस तरह के संबंध नजर आते हैं,उस तरह का जीवन /संबंध निजी जीवन मे नजर नही आता.सिनेमा से रिश्तेदार,हीरो का परिवार ,हीरो के दोस्त आदि भी गायब हो गए हैं.जब रिश्तेदार नही,सगा संबंधी नही,तो फिर ‘उत्सव’ या ‘समूहता’ या त्योहार या लोक संस्कृति कैसे होगी? हकीकत में हम सारे सांस्कृतिक त्योहार,उत्सव भूल रहे हैं,पर हर त्योहार पर धार्मिकता का रंग कुछ ज्यादा ही चढ़ गया है.धार्मिक तत्व हावी हो गए हैं.अब ‘होली गीत’ या ‘दीवाली’ गीत की जगह ‘पब’ संगीत की परंपरा ने ली है. यह गिरावत हिंदी फिल्मों मे ही ज्यादा है.भाषायी सिनेमा में आज भी संस्कृति/उत्सव का आधार नजर आता है.

अतीत में फिल्मों में त्योहार भारतीय संस्कृति के लिए उत्प्रेरक की भूमिका निभाते रहे हैं.मिसाल के तौर पर 1976 में आई फिल्म ‘जीवन ज्योति’ में लता मंगेशकर की स्वरबद्ध गीत है,जिसमें गाय, तुलसी, मंदिर, रंगोली, परिवार भारतीय संस्कृति के तमाम प्रतीक खूबसूरती से झलकते हैं- ‘जिस गैया घर की बहू यूं तिलक लगाती है,वो गैया घर की मां बनकर,दूध पिलाती है…जिस द्वारे घर की बहू रंगोली सजाती है उस द्वारे घर के अंदर लक्ष्मी आती है.’ फिल्म ‘‘हम आपके हैं कौन’’ को भी याद किया जाना चाहिए.इसमें धर्म का प्रार नही किया गया,पर दिखाया गया कि त्योहारों का आयोजन और पारिवारिक उत्सव प्रत्येक व्यक्ति के लिए बाध्यकारी इकाइयों के रूप में कार्य करते हैं, जिनमें वफादारी, त्याग, प्रेम और समझौते की आवश्यकता होती है.फिल्म में परिवार में एक नए बच्चे के आगमन के साथ रोशनी के त्योहार का हर्षोल्लास मनाया जाता है.

वास्तव में सिनेमा में उत्सव को लेकर जो बदलाव नजर आ रहा है,उसका संबंध समाज से भी है.राष्ट्रीय संस्कृति के निर्माण प्रक्रिया का अंतद्र्वंद भी एक मूल वजह है.तो वहीं सिनेमा का अपना आंतरिक संघर्ष भी है.इतना ही नहीं हमारी शिक्षा भी लोगों के जीवन से ‘रस’ को खत्म करती है.तो वहीं हमारे देष की राजनीति ऐसे ब्यूरोक्रेट्स पैदा कर रही है,जिनका उत्सव/त्योहार,लोक संस्कृति से कोई लेना देना नही है.हमारे देष की वर्तमान राजनीति तो ब्यूरोक्रेट्स को धर्म, वह भी धार्मिक कट्टरता की वकालत करना सिखा रही है.

जहां तक फिल्मकारों का सवाल है,तो क्षमता,साहस,संवेदना की कमी के चलते यह फिल्मकार नकलची हो गए हैं और भारतीय फिल्मों को विष्व पटल पर पहुंचाने के नाम पर हौलीवुड फिल्मों की नकल करते हुए हिंदी फिल्में न सिर्फ बना रहे हैं,बल्कि उसी तरह के दृष्य भी पिरो रहे हैं.

क्या आज सिनेमा में जिस तरह से उत्सव,त्योहार,लोकसंस्कृति गायब हुई है,उसके लिए पूरी तरह से सिनेमा दोषी है.जी नहीं..क्योंकि सिनेमा समाज को नही बदलता,बल्कि समाज सिनेमा को बदलता है.जिस तरह से कारपोरेट और राजनेताओं की सोच बदल रही हे,जिस तरह से यह सभी समूह धर्मिता,उत्सव धर्मिता व संस्कार भूल रहे हैं और जिस तरह का धार्मिक उन्माद,धार्मिक कट्टरता समाज के अंदर फैला रहे हैं,वही सब सिनेमा में प्रतिबिंबित हो रहा है.यह राजनेता या कारपोरेट में कार्यरत लोग कहां से आए? यह सब भी हमारे देष का ही हिस्सा है. कमी हमारे अंदर है.हम हमारी युवा व भविष्य की पीढ़ी को  अच्छे संस्कार देने में विफल रहे हैं.हमने अपने बच्चों को एमबीए करा दिया या विदेश पढ़ने भेज दिया,पर उनके अंदर सहधर्मिता,उत्सवधर्मिता, समूहता आदि के बीज नही भरे.हमने उन्हे लोगों को साथ लेकर चलना नहीं सिखाया.हमने उन्हे उत्सव के सही मायने नहीं सिखाए.ऐसे में उन्होने जो कुछ सीखा,वही वह कर रहे हैं.तो जरुरत सिनेमा को बदलने स पहले समाज को व खुद को बदलने की है.

क्या आज की फिल्मों में ‘रक्षा बंधन’ का त्योहार नजर आता है.नहीं..रक्षा बंधन तो भाई बहन के प्यार व अपनत्व को मनाने का उत्सव है.पहले गीत बनते थे-‘‘भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना..’’

कुछ फिल्मकार तर्क देते है कि उन्होने बौलीवुड की फिल्मों को पूरे विष्व तक पहुॅचाने के लिए ‘उत्सव धर्मिता’ की बजाय आधुनिकता को फिल्मों में महत्व दे रहे हैं.जी हाॅ!  फिल्मकार अनीस बजमी कहते हैं-‘‘अब भारतीय सिनेमा वैष्विक दृष्टिकोण से बन रहा है.हर फिल्मकार कुछ नया करना चाहता है.ऐसे में सिनेमा में लोक संस्कृति, उत्सव, त्योहार आदि तलाषना ही गलत है.’’ पर वह भूल जाते हैं कि पूरे विश्व में प्रष्श्ंसित स्वय सत्यजीत रे की फिल्म ‘‘पाथेर पांचाली’ ग्रामीण भारत में खतरों की बात करने के साथ ही फिल्म के दो प्रमुख पात्रों दुर्गा व अप्पू के बीच भाई बहन के संबंधो की भी बात करती है.राज कपूर की फिल्म ‘बूट पाॅलिा’ समाज के वंचित तबके के सषक्तिकरण के साथ बेबी नाज और नरेंद्र रूपाणी की भी कहानी है.ष्षादी विवाह भी ‘समूहता’ व उत्सव ही है.फिल्म ‘‘सच्चा झूठा’’ में राजेष खन्ना का गीत ‘‘मेरी प्यााी बहनिया बनेगी दुल्हनिया’..फिल्म ‘हरे राम हरे कृष्णा ..’ का गाना-‘‘फूलों का तारा..सबका कहना है..’

भारतीय समाज हमेशा से समूह में रहना पसंद करता आया है.हमें नदियां,मेले,तमाषे,उत्सव,सावन के झूले हमेशा पसंद रहे हैं.क्यांेकि भारतीय समाज का आधर हमेषा से ‘आनंद’ ही रहा है.भारतीय समाज हर त्योहार को उत्सव की तरह मनाते हुए आनंद का अनुभव लेना चाहता है,जिसे अब सिनेमा से गायब कर दिया गया है.यदि अपनी पहचान, अपनी संस्कृति, अपने परिवार और अपने आपको बचाना है,तो अपनी दीपावली भी वापस लानी ही होगी.

पोट्स एंड पैन्स: चांदी से लोहे तक विभिन्न धातुओं में पकाए गए भोजन का आपके संपूर्ण स्वास्थ्य पर प्रभाव

कुक वेयर का चुनाव हमारे स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है. खाना पकाने के दौरान कुछ धातुएं भोजन में घुल सकते हैं जो संभावित रूप से हमारी सेहत को प्रभावित कर सकते  हैं. इस लेख में हम विभिन्न कुकवेयर धातुओं के स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों का पता लगाएंगे और स्वस्थ खाना पकाने के अनुभव को बढ़ावा देने के लिए सर्वोत्तम विकल्पों की पहचान करेंगे.

ट्रिपली स्टेनलेस स्टील: सुरक्षित और विश्वसनीय विकल्प

ट्रिप्ली स्टेनलेस स्टील कुकवेयर उपलब्ध सबसे सुरक्षित विकल्पों में से एक है. इसकी गैर प्रतिक्रियाशील प्रकृति यह सुनिश्चित करती है कि खाना पकाने के दौरान यह अम्लीय या क्षारीय खाद्य पदार्थों के साथ संपर्क न करे जिस से आपके भोजन में हानिकारक पदार्थों के स्थानांतरण को रोका जा सके. निकल जैसे विषाक्त तत्वों की अनुपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए फूड ग्रेड डेजिग्नेशन के साथ हाई क्वालिटी वाले स्टेनलेस स्टील कुकवेयर का विकल्प चुनें. समान ताप वितरण और उत्कृष्ट स्थायित्व के साथ स्टेनलेस स्टील कुकवेयर स्वास्थ्य के प्रति जागरूक व्यक्तियों के लिए एक शीर्ष विकल्प है.

मेयर ट्रिवेंटेज का परिचय

यह रेवोलुशनरी, टोक्सिन फ्री कुकवेयर अनुभव देता है. नॉन टॉक्सिक फूड ग्रेड स्टेनलेस स्टील और थ्री लेयर्ड कंस्ट्रक्शन के साथ, ट्रिवेंटेज निकल-फ्री खाना पकाने और लंबे समय तक चलने का वादा करता है. यह हीट को समान रूप से वितरित करता है, कुशल खाना पकाने के लिए हॉट स्पॉट्स को खत्म करता है. कूल हैंडल और शेटर रेसिस्टेंट ग्लास लिड की वजह से सुविधा होती है. जबकि कास्ट आयरन कुकवेयर भारी हो सकता है और रखरखाव की आवश्यकता होती है. स्टेनलेस स्टील में नॉन-स्टिक खाना पकाने के लिए तेल की आवश्यकता हो सकती है जबकि ट्रिवेंटेज एक सुरक्षित विकल्प प्रदान करता है. बेहतर खाना पकाने के अनुभव के लिए ट्रिवेंटेज चुनें जो आपके स्वास्थ्य और संतुष्टि को प्राथमिकता देता है.

कास्ट आयरन: टाइम टेस्टेड और नुट्रिएंट्स बूस्टिंग

कास्ट आयरन कुकवेयर का उपयोग सदियों से किया जा रहा है और यह अपने उल्लेखनीय हीट रिटेंशन और डिस्ट्रीब्यूशन प्रॉपर्टीज के लिए जाना जाता है. जब ठीक से सीजन किया जाता है, तो यह रासायनिक कोटिंग्स की आवश्यकता के बिना एक प्राकृतिक नॉन-स्टिक सतह विकसित करता है. यह इसे नॉन-स्टिक कुकवेयर का एक स्वस्थ विकल्प बनाता है.

मेयर कास्ट आयरन का परिचय

यह खाना पकाने के शौकीनों के लिए आदर्श साथी है. अपनी असाधारण विशेषताओं और विश्वसनीय निर्माण के साथ मेयर कास्ट आयरन कुकवेयर किसी भी रसोई के लिए एक वैलुएबल एडिशन है. सिंथेटिक कोटिंग के बिना बनाया गया, यह पूरी तरह से टोक्सिन फ्री खाना पकाने का अनुभव सुनिश्चित करता है. 100त्न वनस्पति तेल के साथ प्री सीजनड यह समय के साथ एक प्राकृतिक नॉन-स्टिक सतह विकसित करता है. अपने हीट रिटेंशन और ट्रांसमिशन के साथ इवन कुकिंग और उत्तम ब्राउनिंग पाएं. इसका स्थायित्व अत्यधिक तापमान परिवर्तन को झेलता है और बुरी तरह जंग लगने पर भी इसे वापस प्रयोग किया जा सकता है.

यह सभी कुकटॉप्स के लिए उपयुक्त है और यह उच्च तापमान पर खाना पकाने और सीधे आंच के संपर्क को संभाल सकता है जो इसे आउटडोर उपयोग के लिए परफेक्ट बनाता है. ऑथेंटिक टच और रिच फ्लेवर के साथ प्रैक्टिकल कुकिंग का अनुभव करें जो पारंपरिक भारतीय व्यंजनों के लिए बिलकुल उपयुक्त है. एक उल्लेखनीय खाना पकाने के अनुभव के लिए मेयर कास्ट आयरन चुनें जो विश्वसनीयता और स्वाद को जोड़ता है.

सिरेमिक: नॉन टॉक्सिक और वर्सटाइल

सिरेमिक कुकवेयर अपनी नॉन रिएक्टिव और नॉन टॉक्सिक प्रकृति के कारण लोकप्रियता हासिल कर रहा है. प्राकृतिक खनिजों से निर्मित यह उच्च तापमान पर भी हानिकारक गैसें या गंध नहीं छोड़ता है. सिरेमिक कुकवेयर की गैर-छिद्रपूर्ण सतह स्वाद, गंध और दाग के अवशोषण को रोकती है. यह न्यूनतम तेल के साथ खाना पकाना संभव बनाता है. एक हेल्दी कुकिंग स्टाइल को बढ़ावा देता है. सबसे सुरक्षित विकल्प के लिए ऐसे सिरेमिक कुकवेयर की तलाश करें जो सीसा, कैडमियम और अन्य भारी धातुओं से मुक्त हो.

पेश है मेयर एन्जेन सिरेमिक कुकवेयर

नॉन-स्टिक कुकवेयर का एक सुरक्षित और भरोसेमंद विकल्प. सिलिकॉन और ऑक्सीजन से बनी इसकी सिरेमिक जेल सतह न्यूनतम तेल के उपयोग के साथ नॉन-स्टिक खाना पकाने का अनुभव सुनिश्चित करती है. प्राकृतिक खनिजों से निर्मित यह उच्च तापमान पर भी हानिकारक गैसों या गंधों के न निकलने की गारंटी देता है. अपनी गैर-छिद्रपूर्ण सतह के साथ यह स्वाद, गंध और दाग के अवशोषण को रोकता है जिससे आपके व्यंजनों की शुद्धता बरकरार रहती है. अपने खूबसूरत डिजाइन से अपनी रसोई को निखारें. इसका हल्का वजन और आसान रखरखाव इसे एक सुविधाजनक विकल्प बनाता है. मेयर एंजेन सिरेमिक कुकवेयर की वर्सेटिलिटी का अनुभव करें क्योंकि यह उच्च तापमान में भी अच्छा काम करता है और खाना पकाने के विभिन्न तरीकों को अपनाता है. मन की शांति के साथ स्वस्थ खाना पकाने को अपनाएं और मेयर एंजेन सिरेमिक कुकवेयर के साथ अपने पाक अनुभव को बढ़ाएं.

युवाओं की आजादी पर क्यों है पाबंदी

अकेलापन और युवा, बात कुछ अजीब सी जरूर लगती है पर है यह आज की सचाई. नाचतीथिरकती यह बेफिक्र दिखती युवा पीढ़ी अंदर से कितनी अकेली है, यह जानने के लिए आइए मिलाते हैं आप को आज के कुछ युवाओं से:

उदय छोटे से शहर में जन्मा, पला, बढ़ा. यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही बड़े शहर में बसने के सपने देखने लगा. अपने लिए एक अच्छी जिंदगी का सपना देखना क्या गलत है? इस सपने को पूरा करने के लिए उस ने एड़ीचोटी का जोर लगा दिया. नौकरी मिलते ही लगा जैसे नए पंख लग गए. आ गया बड़े शहर. नई नौकरी, नया शहर, खूब रास आया. नए दोस्त बने पर थोड़े ही दिनों में नए शहर का जादू उड़न छू हो गया.

अपनों का प्यार, अपनेपन की कमी, इस नए मिले सुख को कम करने लगी. औफिस से घर आने पर अकेलापन काटने को दौड़ता. दोस्तों का खोखलापन दिखाई देने लगा. दोस्तों की महफिल में भी ‘जो दारूबाज नहीं उस के लिए यह महफिल नहीं’ की अलिखित तख्ती टंगी रहती. मातापिता की दी संस्कारों की गठरी शराब जैसी चीजों को छूने नहीं देती. बचपन के संगीसाथी जाने कब अनजाने में छूट गए पता ही नहीं चला. महानगर में मिले इस अकेलेपन से निराश तो होना ही था. सो उदय अवसाद में चला गया.

अवसाद दे रहा अकेलापन

अब आइए आप को मिलाते हैं अपने दूसरे मित्र मदन से. यह मातापिता के साथ ही रहता है. उसी शहर में नौकरी मिल गई. मातापिता बहुत खुश हैं, खुश तो यह भी है पर मायूसी भी हैं. आजादी जो नहीं मिली. आप पूछेंगे कौन सी आजादी? कैसी आजादी? तो जवाब है अपनी मनमरजी करने की आजादी.

हांहां, आप कहेंगे कौन से मातापिता आजकल टोकाटाकी करते हैं. तो साहब कुछ चीजें हमें घुट्टी में पिला दी जाती हैं, मातापिता कुछ बोलें या न बोलें, पर हम तो जानते हैं कि वे क्या चाहते हैं. बचपन से पाला ही ऐसे है कि अपने मन की नहीं कर पाते हम युवा. अब देखिए न दोस्तों को घर बुलाओ तो खुल कर बात नहीं कर सकते. जो मित्र खानापीना चाहते हैं, नहीं खिलापिला सकते क्योंकि घर में बुजुर्ग हैं.

खुद मित्रों के घर जाओ तो बीच महफिल उठना पड़ता है कि मातापिता प्रतीक्षा कर रहे होंगे. दोस्त मजाक बनाते हैं सो अलग. मदन अपनों के बीच अकेला है. इस भी अब अकेलापन अवसाद दे रहा है.

और यह है हमारी तीसरी मित्र मातापिता की लाडली, सपनों में जीने वाली अवनि. जब तक जिंदगी का अर्थ सम  झ अपने भविष्य के बारे में कुछ सोचती एक आईपीएस. अधिकारी की ब्याहता बन विदा हो गई. आखिर आईपीएस अधिकारी की बेटी जो थी. बराबरी की शादी थी. तुनकमिजाज, गुस्सैल पति के न तो गुस्से से उसे डर लगा न ही ओहदे से. छोड़ कर आ गई पिता के घर.

अब मातापिता पछता रहे हैं और अवनि अपने अकेलेपन से लड़ने के लिए छूटी पढ़ाई का सिरा फिर से पकड़ने की जद्दोजहद में लगी है. सब दोष अवनि को ही दे रहे हैं. पर कोई पूछे शादी से पहले अवनि की इच्छा जानने की जरूरत क्यों नहीं समझी थी उस के मातापिता ने?

दोष किस का

यह है पिंकी, एक प्रोफैसर की बेटी, जिसे मौडलिंग का शौक चढ़ा परंतु पढ़ाईलिखाई के इस माहौल में उस की इस चाहत को सम  झने वाला कोई न था. मगर पिंकी को तो आकाश छूना था. हिम्मत की भी कहां कमी थी, युवा जो ठहरी. उस ने निर्णय लिया और चल दी मुंबई. पर कुदरत ने ऐसी मार लगाई कि उसे कौल गर्ल का खिताब मिल गया.

काश उस के सपनों को उस के मातापिता ने सम  झा होता, उस का साथ दिया होता तो आज वह अपनी मंजिल पाने के लिए प्रयास कर रही होती और एक न एक दिन पा भी लेती. न पाती तो कम से कम इस बुरी नियति से तो बच जाती. पर दोष हमेशा युवाओं को ही दिया जाता है.

पिंकी की इस दुर्दशा के लिए क्या सिर्फ पिंकी का घर से भागने का निर्णय ही दोषी है? हां, एक हद तक है, लेकिन उसे यह निर्णय लेने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा? इस का जवाब तो आप को या हमारे समाज को ही देना होगा. हमारा समाज युवा होती बेटी को उस की पसंद का कार्य करने से कब तक रोकेगा और अगर रोकेगा तो बहुत बार परिणति ऐसी या इस से भी बुरी होगी.

ऐसे में जरूरत है हर बात में युवाओं को दोष देना बंद करने की. समाज हम युवाओं के मन में भी तो   झांक कर देखे कि हमारे सपने हैं, हमारी चाहते हैं और उन्हें पाने के लिए हम कुछ भी करना चाहते हैं. उदय हो, मदन हो, अवनि हो या फिर पिंकी खुल कर जीने का अधिकार सब को है.

खुल कर जीने की आजादी

आज का युवा पूछ रहा है कि सम्मान के नाम पर युवाओं से उन के मन की बात कहने का हक कब तक समाज छीनता रहेगा? बालिग हो गए अपने बच्चे से कब मातापिता बालिग की तरह बात और व्यवहार करना सीखेंगे? युवा हो गए बच्चों के मातापिता के लिए भी जरूरी है कि वे प्रौढ़ मातापिता की तरह व्यवहार करना सीखें.

अकेलेपन से जू  झते, अवसादग्रस्त युवाओं की बढ़ती संख्या बारबार चेतावनी दे रही है. अपने युवाओं को बचाने के लिए उन को उन के अकेलेपन से बाहर लाने के लिए मातापिता को खुद उन का दोस्त बन कर उन्हें अपने मन की कहने और करने की आजादी देनी ही होगी. उन के साथ खड़ा होना ही होगा.

हम युवाओं की खुशी के लिए समाज एक बार कोशिश तो करे. हमें खुल कर जीने की आजादी दे और हमारा साथ दे तो हम अपने इस अवसाद से बाहर आ पाएं.

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