40 की उम्र में शादी का लहंगा, मेकअप और वार्डरोब के 18 टिप्स

रागिनी की 2 माह बाद शादी होने वाली है. अपने परिवार में सबसे बड़ी रागिनी पर पिता के जाने के बाद घर की सारी जिम्मेदारी आन पड़ी. छोटे भाई बहनों की पढाई फिर शादी करते करते कब वह 42 की हो गयी उसे ही पता नहीं चला. कुछ दिनों पूर्व जब रोहित उसकी जिन्दगी में आया तो कुछ दिनों की डेटिंग के बाद दोनों ने शादी के बंधन में बंधने का फैसला ले लिया. जब से उसकी शादी तय हुई है वह अपनी शादी की शोपिंग को लेकर परेशान है कि शादी वाले दिन के लिए कैसा लहंगा खरीदे,  कि उसकी पर्सनेलिटी पर अच्छा भी लगे और ऐसा भी हो कि उसे आगे भी पहना जा सके, साथ ही अब इस उम्र में वह कैसा मेकअप करवाये कि उसकी उम्र भी छिप जाए और वह सुंदर भी लगे.

45 साल की सिमोना दूसरी बार शादी के बंधन में बंधने जा रही है. 22 वर्ष की उम्र में उसकी शादी माता पिता ने कर दी थी परन्तु शादी के 3 साल बाद ही एक सड़क दुर्घटना में उसके पति का देहांत हो गया. सास ससुर ने उसे ही अपनी बेटी माना और उसे आगे पढने के लिए प्रेरित किया. जब बैंक में उसकी नौकरी लग गयी तो अब वे उसके हाथ पीले करना चाहते हैं. रागिनी की तरह ही सिमोना के सामने अपनी वार्डरोब, मेकअप और शादी के जोड़े को लेकर अनेकों समस्याएं हैं कि वह उनका चयन कैसे करे.

यह केवल सिमोना और रागिनी की ही नहीं बल्कि ऐसी अनेकों महिलाओं की समस्या है जिनकी किसी कारण से शादी की उम्र निकल गयी और वे 40 के दशक को पार कर गईं क्योंकि पहले के मुकाबले आज लडकियाँ आत्मनिर्भर होकर शादी करना चाहतीं हैं इसके अतिरिक्त कई बार मनचाहा केरियर बनाते बनाते ही उनकी उम्र चालीस के पार कब हो जाती है उन्हें ही पता नहीं चल पाता. कई बार कुछ घरेलू और विषम परिस्थितियों के कारण भी आजकल 40 की उम्र के बाद लडकियों की शादी होती है. ऐसे में वे कैसे वे अपने लहंगे  का चयन करें, कैसे तैयार हों और कैसे तैयार करें अपनी फ्यूचर वार्डरोब को. आपकी इस समस्या को काफी हद तक सॉल्व करने में निम्न टिप्स मददगार साबित होंगे-

कैसा हो लहंगा

-लहंगे का चयन करते समय सबसे जरूरी है आपकी स्किन और बॉडी टोन. यदि आपकी बॉडी टोन हैवी है तो टिश्यू, ऑरगेंजा, जैसे फूलने वाले फेब्रिक के स्थान पर बनारसी, सिल्क, क्रेप जैसे कम फूलने वाले फेब्रिक के लहंगे का चुनाव करें. दुबली पतली बॉडी पर किसी भी प्रकार के फूलने वाले फेब्रिक वाले लहंगे का चयन किया जा सकता है ताकि शरीर कुछ हैवी दिखे.

-अब 40 की उम्र में हल्के रंग कैसे पहनूं वाली पुरातन सोच को त्यागकर मेजेंटा, गोल्डन और व्हाइट, शिमरी ब्लैक जैसे ब्राइट रंगों को प्राथमिकता दें इससे आपकी उम्र कम दिखेगी.

-बहुत अधिक महंगे लहंगे के स्थान पर मध्यम रेंज का ऐसा लहंगा खरीदें जिसे आप भविष्य में किसी भी प्रोग्राम में आसानी से केरी कर सकें और जिसका रखरखाव आसान हो.

-लहंगा खरीदने से पहले अपनी और अपने मंगेतर की हाइट जरूर चैक करें कि आपको फुटवेयर  में हील पहननी है या फ्लैट उसके अनुसार ही लहंगे की लंबाई रखवाएं.

-बहुत अधिक भारी और हैवी वर्क वाले लहंगे की जगह हैवी चुन्नी और कम वर्क वाला लहंगा खरीदें ताकि आप आसानी से इसे कैरी कर पाएं और चुन्नी को भविष्य में आप किसी भी प्लेन सूट के साथ और लहंगे को स्कर्ट के रूप में प्रयोग कर सकतीं हैं.

कैसी हो वार्डरोब

-इस उम्र तक आते आते आप अपनी बॉडी को काफी कुछ एक्सप्लोर कर चुके होते हैं यानी आपको यह पता हो चुका होता है कि आपकी बॉडी को क्या सूट करता है और क्या नही इसलिए अपनी वार्डरोब में ऐसे कपड़ों को प्राथमिकता दें जिन्हें पहनकर आप खुद को कम्फर्टेबल फील करतीं हों.

-नेट और साटन के 2 पीस ब्राइट रंग की नाईट वीयर खरीदें जिनका रंग आप पर फबता हो और आप आकर्षक दिखतीं हों.

-रेगुलर वीयर और कैजुअल वीयर के लिए अलग अलग कपड़े खरीदें. रेगुलर वीयर के लिए कुछ हल्की फुल्की कढ़ाही वाले सूट्स और लोअर टीशर्ट आदि को प्राथमिकता दें.

-आजकल अजरख, पटोला, बांधनी, टाई एंड डाई जैसे ट्रेडिशनल प्रिंट बहुत फैशन में हैं और बाजार में इनसे बने सूट्स, ड्रेसेज, साड़ी आदि आसानी से उपलब्ध हैं यदि सम्भव हो तो इन्हें अपनी वार्डरोब का हिस्सा जरूर बनाएं ये आपकी वार्डरोब को क्लासी लुक देंगे.

-शिफॉन, बनारसी, जॉर्जेट, हैंडलूम जैसे फेब्रिक की हल्की फुल्की, लाल, मैरून, पीले रंग की कुछ साड़ियां अवश्य खरीदें ताकि पूजा अन्य किसी फेमिली गेदरिंग में आवश्यकता पड़ने पर आप इन्हें पहन सकें.

-शॉर्ट्स, मिडी, जीन्स, स्विमिंग सूट जैसे परिधानों को भी अपनी वार्डरोब का हिस्सा बनाना न भूलें क्योकि इस तरह की ड्रेसेज आपको हनीमून ट्रिप के समय बहुत काम आएंगी.

-अपनी वार्डरोब को तैयार करते समय एकदम बहुत सारे कपड़ों का ढेर लगाने की जगह चुनिंदा, क्लासी और कम कपड़ों को तरजीह दें ताकि पहनते समय आपको कोई कन्फ्यूजन न हो.

कैसा हो मेकअप

-उम्र के साथ साथ मेकअप की आवश्यकताएं भी बदल जातीं हैं इस उम्र में आँखों के नीचे, होठों के आसपास तथा माथे पर झुर्रियां अपनी दस्तक देने लगतीं है इसलिए इस उम्र में ऐसे मेकअप की आवश्यकता होती है जो आपकी फाइन लाइन्स को छिपाकर आपको जवां दिखा सकें.

-होठों के आसपास की झुर्रियों को छिपाने के लिए अपनी स्किन टोन के अनुसार लिप लाइनर अवश्य लगायें क्योंकि लिप लाइनर के बिना लगाई गयी लिपस्टिक कुछ देर बाद फैलने लगती है. लिप लाइनर लिपस्टिक को होठों पर फैलने नहीं देता.

-ब्लशर को आमतौर पर गालों के ऊपर लगाया जाता है परन्तु उम्र बढने पर इसे चिक्बोन के ऊपर इस तरह लगाना चाहिए जिससे आपके चिक के आसपास की झुर्रियां कवर हो जायें. ब्लश का रंग अपनी स्किन टोन से मैच करता हुआ चुनें ताकि वह आपकी स्किन में समा जाये.

-बढती उम्र में पाउडर वाले प्रोडक्ट चेहरे की झुर्रियों को और अधिक उभार देते हैं इसलिए इस उम्र में मेकअप के लिए तरल और मोइश्चराइजर युक्त सौन्दर्य उत्पादों का प्रयोग करना चाहिए साथ ही बहुत भडकीले मेकअप के स्थान पर हल्के फुल्के मेकअप को प्राथमिकता दें.

-उम्र बढने के साथ साथ त्वचा की नमी समाप्त हो जाती है जिससे होठ भी रूखे से हो जाते हैं. मेट लिपस्टिक से होंठ जहां और अधिक सूखे लगने लगते हैं वहीँ न्यूड लिपस्टिक आपकी उम्र को और अधिक बढ़ा देते हैं इसलिए ब्राईट और ग्लॉसी लिपस्टिक का चयन करें जिससे आप जवां और खूबसूरत दिखेंगी.

-आई लाइनर और काजल का प्रयोग अवश्य करें इससे आपकी आँखें काफी सुंदर और युवा दिखेंगी. परन्तु लॉन्ग लास्टिंग काजल और आई लाइनर का ही प्रयोग करें ताकि वह लम्बे समय तक भी फैले नहीं.

जीवनसाथी: भाग 1- विभोर को अपनी पत्नी वसु से नफरत क्यों हुई

‘‘तुम से खाना तक तो ठीक से बनता नहीं और क्या करोगी?’’ कहते हुए विभोर ने खाने की थाली उठा कर फेंक दी.

सकपका कर सहमती वसु सिर्फ मूक सी थाली को देखती रह गई. थाली के साथ उस का सम्मान भी जाने कितने बल खाता जमीन पर दम तोड़ रहा था.

वसु ने अपने घर में कभी ऐसा अपमान खाने का नहीं देखा था न ही कभी पिता को मां से इस तरह व्यवहार करते देखा था. आश्चर्य और दुख से पलकें भीग गईं. उस ने भीगी पलकें

छिपा मुंह घुमा लिया. मन चीत्कार कर उठा अगर नमक कम तो सवाल, उस से ज्यादा तो सवाल. कौन सा पैरामीटर है जो नाप ले… उस का बस चलता तो किसी को शिकायत का मौका ही नहीं देती. घर और औफिस में तालमेल बैठाती अब वसु ख़ुद को थका हुआ महसूस करने लगी थी. थके होने पर भी बहुत लगन से विभोर का मनपसंद खाना बनाती.

उस का प्रयास रहता कि कभी तो विभोर के मन को छू सके. पर हर बार उस की आशाओं पर तुषारापात हो जाता.

वसु को लगने लगा था कि विभोर पूर्वाग्रह से ग्रस्त उस का प्रयास विफल कर देता है. जब भी सम?ाने का प्रयास करती टीवी पर बाबाओं के द्वारा दिखाए जाने वाले उपदेश विभोर के मानसपटल पर आच्छादित रहते और वह उन की परिधि से 1 इंच भी टस से मस न होता. जब कोई धारणा मनोविकार का रूप ले ले तब उसे छोड़ना आसान नहीं होता है. विभोर के साथ भी यही हो रहा था. सामाजिक व्यवस्था जिस में स्त्री सिर्फ भोग्या व पुरुष की दासी मानी जाती है. यह बात विभोर के मानसपटल पर कहीं गहरे बैठ गई थी. इस से आगे जाने या कुछ समझने को वह तैयार ही नहीं होता.

पति की फेंकी इडलीसांभर की प्लेट उठाती वसु बहुत कुछ सोच रही थी. अंतर्द्वंद्व ने उस के तनमन को व्यथित कर दिया था. किसी बात को कहने के लिए झल्लाना आवश्यक तो नहीं. प्रेमपूर्ण वचनों से सुलझाए मसले उचित फलदाई होते हैं.

मन के किसी कोने में रत्तीभर भी जगह हो तो इंसान कुछ भी कहता है तो प्यार से या सम?ाने के लिए न कि अपमान के लिए. वसु को लगता जैसे विभोर जलील करने का बहाना ढूंढ़ता है

और वसु मुंह बाए बात की तह तक जाने की कोशिश करती रह जाती है. क्यों हर बात को चिल्ला कर कहना? आज उस ने निश्चय किया कि विभोर से बात करेगी. जीवन इस तरह से तो नहीं जीया जा सकता.

‘‘विभोर आपसे एक बात कहनी है,’’ वसु

ने पूछा.

‘‘बोलो.’’

विभोर के स्वर में अनावश्यक आक्रोश था, फिर भी वसु ने अपने को सामान्य बनाते हुए कहा, ‘‘आप जैसा कहते हो मैं वैसा ही करने की कोशिश करती हूं. औफिस के जाने के पहले पूरा काम कर के जाती हूं, आ कर पूरा करती हूं, लेकिन आप की शिकायतें कम ही नही होती हैं.’’

‘‘मैं तो दुखी हो गया तुम्हारे कामों से, कोई काम ढंग से करती नहीं हो और जो ये घर के काम कर रही हो कोई एहसान नहीं है, तुम्हें ही करने हैं. सुना नहीं पूज्य नीमा बाबा कह रहे थे कि स्त्रियों का धर्म है पति की सेवा करना, घर को सुचारु रूप से चलाना यही तुम्हारे कर्तव्य हैं. परिवार में किसी को शिकायत का मौका न मिले… न ही घर से बाहर नौकरी करना.’’

‘‘और पुरुषों के लिए क्या कर्तव्य हैं? यह भी बताओ विभोर.’’

‘‘तुम तो बस हर बात में कुतर्क करती हो. जो कहता हूं वह तो मानती नहीं, फिर चाहती हो प्यार से बात करूं,’’ उपेक्षाभरे वचनों का उपदेश सा दे कर विभोर निकल गया.

वसु के आगे के शब्द उस के गले में घुट गए. कितने विश्वास से आज उस ने सम?ाने की कोशिश की थी.

वसु सोचने लगी कि क्या दुख की सिर्फ इतनी परिभाषा है कि सब्जी में नमक कम या ज्यादा हो और दुखी हो इंसान तड़प उठे. यह तो ऐसा लगता है कि दुख का उत्सव सा मना रहे हैं. बहुत अजीब व्यवहार है और ये जो प्रवचन देते रहते हैं, नित्य नए बाबा बनाम ढोंगी, कभी पंडालों में, कभी वीडियो बना जिन का सिर्फ एक ही मत है कि स्त्रियों को कैद कर दो.

एक भी सांस अपनी मरजी से न ले पाएं. क्या अन्य विषय ही खत्म हो गए हैं? बातें भी

सिर्फ स्त्री विरोधी. वैसे देवी की संज्ञा से विभूति करते नहीं थकते.

वसु का मन करता इसे काश पति को समझ पाती. हार कर वह खुद को ही समेट लेती. आखिर चुनाव भी तो उस का ही था.

पापा ने कहा था, ‘‘बेटा, देख ले विभोर के पिता नही हैं, जीवन में कठिनाइयां अधिक होंगी, उन लोगों को तेरा औफिस में काम करना पसंद नहीं, फिर भी मैं ने उन्हें मना लिया है. आगे तुझे ही संभालना है.’’

‘‘पापा मुझे पैसे की लालसा नहीं है  आप भी जानते हैं, समझदार, सुलझा जीवनसाथी हो तो जीवन खुशियों से भर हो जाता है.’’

तब आदर्श विचारों से भरी बिन देखे ही विभोर के प्रति अनुरक्त हो उठी थी और मन में सोचा था, पिता नहीं हैं तो जीवन की समझ अवश्य आ गई होगी, समझदार इंसान होगा, परेशानियां इंसान को अनुभवी जो बना देती हैं.

पापा ने एक बार फिर दोहराया था कि एक बार फिर सोच ले बेटा और भी रिश्ते हैं. लेकिन भावुक वसु ने अपना मन विभोर को सौंप दिया था और फिर दोनों की शादी हो गई. तब कहां जानती थी 21वीं सदी में भी कोई स्त्री स्वतंत्रता के इतने खिलाफ हो सकता है. सुबहशाम टीवी पर आने वाले बाबाओं को सुन मानसिक विकृति पाल सकता है, अपना समय जो व्यायाम आदि में लगाना चाहिए उसे इस तरह नष्ट कर सकता है. कोई बुजुर्ग हो तो समझ भी ले लेकिन इस तरह काम छोड़ नकारा बन अर्थरहित बातों के लिए समय नष्ट करना वसु को मूर्खता लगती.

पढ़ेलिखे विभोर का बाबाओं के प्रवचन सुनना वसु को आश्चर्यजनक भी लगता था. आज के समय में जब स्त्री के आर्थिक सहयोग के बिना घर की व्यवस्था सुचारु रूप से चलाना संभव नहीं वहां ये बातें महज कुत्सित मानसिकता या पुरुष के बीमार अहम का हिस्सा भर हैं.

मम्मियां: आखिर क्या था उस बच्चे का दर्द- भाग 3

‘‘मैं ने तो सुना था कि किसी के साथ भाग…’’ वाक्य पूरा नहीं कर पाई तनूजा. ‘नहीं बहनजी, यह बात सरासर गलत है. अर्चना सीधे हमारे पास आई थी. वह ऐसी लड़की नहीं है.’’

‘‘पर आसपास के सभी लोग यही कहते हैं.’’

‘‘अर्चना पार्ट टाइम इंटीरियर डैकोरेटर का काम करती है. हर्षद चोपड़ा ने अपने नए औफिस के इंटीरियर के सिलसिले में ही उसे मिलने के लिए बुलाया था. बस वही एसएमएस देख लिया उत्तम ने, तो बिना कुछ जाने, बिना कुछ पूछे मेरी बेटी को जानवरों की तरह पीटा,’’ सुबकने लगीं अर्चना की मां.

तनूजा ने उन्हें गाड़ी में बैठा लिया. शांत होने पर वे बोलीं, ‘‘शरीर से अधिक मन घायल हो गया था अर्चना का. हमारे पास न आती तो कहां जाती? ऊपर से आसपड़ोस के लोगों ने जिस प्रकार चरित्रहनन किया है उस का, वह असहनीय बन गया है उस के लिए.’’

‘‘देखिए, मैं अर्चना की मनोदशा को सम?ा सकती हूं, किंतु वहां एक छोटा बच्चा भी है. रोज उस को उदास देखती हूं तो बहुत दुखी और असहाय महसूस करती हूं स्वयं को. दोनों पक्ष के बड़ेबुजुर्ग बातचीत कर इस को सुल?ाएं. आखिर पिता के दुर्व्यवहार का प्रतिफल एक छोटा बच्चा क्यों भुगते? वह तो निर्दोष है न,’’ कह कर तनूजा ने गाड़ी स्टार्ट की तो वे महिला गाड़ी से उतर गईं और वह चल दी.

मन ही मन लगता था कि अर्चना इस तरह का कार्य नहीं कर सकती और वह ठीक ही निकला सोच रही थी तनूजा. समाज किसी के भी चरित्र हनन में समय नहीं लगाता, इस का जीवंत उदाहरण थी अर्चना. हर व्यक्ति चटखारे लेले कर उस के विषय में बात करता.

चोपड़ा दंपती बहुत ही सभ्य, सुसंस्कृत थे. उन के बेटे हर्षद ने हाल ही में नया व्यवसाय शुरू किया था. उन के परिवार का कोई सदस्य नीचे दिखाई नहीं दे रहा था पिछले कई दिनों से. कारण अब सम?ा आया तनूजा को. दूसरी ओर अर्चना के पति उत्तम एक व्यवसायी थे. औटो पार्ट्स का पारिवारिक व्यवसाय, अपने पिता के साथ ही चलाते थे. सुशिक्षित थे या नहीं पर अपने गुस्सैल स्वभाव के चलते आएदिन उन की
ऊंची आवाज सुनाई दे जाती.

गरमी की छुट्टियां खत्म हो चली थीं. गले के संक्रमण से तनूजा अस्वस्थ थी, इसलिए कुछ दिन बच्चों के साथ नीचे नहीं जा पाई. ‘‘तन्मयी, मैं बालकनी में बैठी हूं. आज कुछ ठीक महसूस कर रही हूं,’’ चाय का कप
थामे तन्मयी से कहा तनूजा ने.

‘‘हां मम्मी, बहुत दिनों से आप ने बच्चों के खेल भी नहीं देखे. मिस कर रही होंगी न आप,’’ हंसतेहंसते तन्मयी बोली.

‘‘हां भई हां.’’

सभी बच्चे नीचे खेल रहे थे. कई दिनों बाद उन्हें देख कर अच्छा लगा. जरा गौर से देखा तो अक्षय को अपने मित्र चिरायु, नंदीश और वेनू के साथ मिट्टी का घर बनाते पाया. चिरायु को जाने क्या सू?ा उस ने ठोकर मार कर अक्षय का घर तोड़ दिया. फिर वह हुआ जो एक लंबे समय से नहीं हो रहा था. अक्षय ने दोनों मुट्ठियों में रेत भर चिरायु पर फेंक दी और उस के मिट्टी के घर को ठोकर लगा दी.

‘‘अरे वाह. वैरीगुड, वैरीगुड,’’ तनूजा खुशी से ताली बजा रही थी.

‘‘क्या हुआ मम्मी? किस बात पर क्लैप कर रही हो?’’ तन्मयी बालकनी में आ गई.
‘‘अरे कुछ नहीं बेटा, ऐसे ही बच्चों का खेल…’’

‘‘क्या मम्मी आप भी…’’ आश्चर्यमिश्रित हंसी के साथ बोली वह.

सब कुछ हलकाहलका लग रहा था तनूजा को. सिरदर्द, गलादर्द जैसे छूमंतर हो गया था. बुखार मानो हुआ ही नहीं था. अगली सुबह सब के मना करने पर भी तनूजा बच्चों के साथ नीचे आ गई. फिर वही चिरपरिचित चेहरे क्रमानुसार दिखने लगे. कुछ परिवर्तन भी हुए थे. बिल्लू अपना बैग स्वयं ला रहा था, तो भांतिभांति के धब्बों से सजे अपने गाउन को शायद हेमा ने तिलांजलि दे दी थी. नया लाल गाउन पहने थी जो साइड से कटा नहीं था और अभी तक किसी भी प्रकार के धब्बों से वंचित था.

डिवाइन बड्स की बस खड़ी थी. अरे यह क्या? सामने से चमकतादमकता और फुदकता अक्षय अर्चना की उंगली थामे चला आ रहा था.

हर्षातिरेक में एक ही स्थान पर खड़ी रह गई तनूजा. अक्षय के पास आने पर उस की पीठ थपथपाते हुए कहा, ‘‘मम्मी आ गईं. अब तो खुश है न?’’ तो पहले की तरह शरमा गया वह.

मांबेटे को साथ देख तनूजा को जो सुखद अनुभूति हुई वह शब्दों में बयां नहीं की जा सकती. उसे लग रहा था जैसे वही लौटी थी किसी वनवास से. आज दोगुने उत्साह से वाक कर रही थी, तभी देखा अर्चना अपनी संयत चाल से उसी की ओर आ रही थी. अपनी गति कुछ कम कर दी तनूजा ने. पास आ कर कुछ क्षण सिर ?ाकाए खड़ी रही फिर प्रयास सा करते हुए बोली, ‘‘सौरी मैं ने…’’

बीच में ही उस की हथेली अपने हाथों में थाम बोली तनूजा, ‘‘ऐसा कुछ न कहो. आज मैं जितनी खुश हूं उतनी शायद पहले कभी नहीं थी.’’

तनूजा की खुशी छिपाए नहीं छिप रही थी, इसलिए वह जैसे ही घर पहुंची सलिल ने सीधे ही पूछ लिया, ‘‘क्या बात है, कल से बहुत चहक रही हो… हमें भी तो बताओ.’’
‘‘वह अक्षय की मम्मी हैं न, वापस आ गई हैं.’’

‘‘कौन अक्षय? कहां गई थीं उस की मम्मी? और उन के वापस आने से तुम्हारे इतना खुश होने से क्या लेनादेना?’’

‘‘छोड़ो, तुम नहीं सम?ोगे.’’

‘‘क्यों भाई, क्यों नहीं सम?ांगा?’’

‘‘तुम मम्मी नहीं हो न,’’ कह कर मुसकरा दी तनूजा.  जिस नन्हे बच्चे अक्षय की बालमन की शैतानियों को देख कर तनूजा खुश होती थी, उसे गुमसुम, उदास देख कर परेशान हो उठी थी वह.

आखिर क्या था उस बच्चे का दर्द? क्या तनूजा इस राज को समझ पाई…

‘गड़करी’ और ‘टू जीरो वन फोर’ तो अब फिल्मों के माध्यम से राजनीतिक वार होंगें…?

राजनीति और सिनेमा अलग अलग ध्रुव हो ही नही सकते. क्योंकि दोनों का संबंध आम जनता से है.आम लोग ही जेब से पैसे खर्च कर फिल्म देखकर फिल्म को सफल बनाते हैं,एक कलाकार को स्टार बनाते हैं,तो दूसरी तरह आम लोग ही अपना कीमती वोट देकर किसी को भी नेता चुनकर उसे मंत्री या प्रधानमंत्री तक बनाते हैं.2014 से पहले तक समाज का दर्पण होते हुए भी सिनेमा मनेारंजन का साधन ही ज्यादा रहा है.राजनीति से जुड़े लोग ‘शह’ और ‘मात’ की लड़ाई में सिनेमा को हथियार के तौर पर उपयोग नही करते थे.मगर 2014 के बाद हालात इस कदर बदले कि अब कयास लगाए जा रहे हैं कि 2024 के लोकसभा चुनाव में केंद्र सरकार अपनी केंद्रीय एजंसियो के साथ ही कुछ दिग्गज नेता अपने प्रतिद्वंदी को मात देने के लिए ‘सिनेमा’ का उपयोग कर सकते हैं.इस धारणा को उस वक्त बल मिला,जब केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी की बायोपिक फिल्म ‘‘गड़करी’’ का ट्रलेर गड़करी के ही गृहनगर नागपुर,जहां आर एस एस का मुख्यालय है,उसी शहर में सार्वजनिक किए जाने के साथ फिल्म केे प्रदर्शन की तारीख तक घोषित की गयी.

जी हाॅ! केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी की मराठी भाषा में बनी बायोपिक फिल्म ‘गडकरी‘ का अचानक नागपुर में ट्रेलर रिलीज के साथ ही फिल्म के 27 अक्टूबर को पूरे देश में प्रदर्शित होने के ऐलान से राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी शुरू हो चुकी है. फिल्म के ट्रेलर लॉन्च ईवेंट में स्वयं नितिन गड़करी मोजूद नही थे,मगर इस ईवेंट में नागपुर के विदर्भ के सभी शीर्ष भाजपा नेताओं के साथ महाराष्ट् राज्य के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस भी मौजूद रहे. इन नेताओं ने दावा कि उनका एकमात्र इरादा युवा फिल्म निर्माताओं को प्रोत्साहित करना है.मजेदार बात यह है कि फिल्म ‘गड़करी’ मराठी भाषा में है,मगर ट्रेलर से अहसास होता है कि इसमें ज्यादातर संवाद हिंदी में हैं.

यह पहला मौका है,जब प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में किसी बीजेपी नेता और वह भी उनकी ही कैबिनेट के किसी मंत्री की बायोपिक बन गई और रिलीज भी होने वाली है.ऐसे में सवाल यह भी है कि गडकरी पर बायोपिक के मायने क्या हैं? क्या राजनीति में उनका कद बड़ा करने की तैयारी है या फिर कुछ फिल्मकारों की एक फिल्म बनाने की दिलचस्पी भर?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की शुरूआत

यूं तो किसी जीवित राजनेता पर फिल्म बनना कोई नई बात नही है.पर इस परंपरा की नींव तो 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ही डाली थी. 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले 24 मई 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक फिल्म ‘‘पी एम नरेंद्र मोदी’ प्रदर्शित हुई थी, जिसे मैरी काॅम पर बनी बायोपिक फिल्म निर्देशत करने वाले उमंग कुमार ने निर्देशित किया था और नरेंद्र मोदी का किरदार अभिनेता विवेक ओबेराय ने निभाया था. इस फिल्म ने बाक्स आफिस पर पानी नही मांगा था.पर अब इसे एमएक्स प्लेअर पर मुफ्त में देखा जा सकता है.

जबकि दो भागों में उन पर वेब सीरीज ‘‘मोदीः जर्नी आफ ए काॅमन मैन’ भी 2019 में ही आयी थी. उमेश शुक्ला निर्देशित इस वेब सीरीज के पहले हिस्से में नरेंद्र मोदी का किरदार अभिनेता अशीश शर्मा ने निभायी थी,जो कि इससे पहले सीरियल ‘सिया के राम’’ में राम का किरदार निभा चुके हैं. यह सीरीज दो भागों में बनी थी. इसे दर्शक नही मिले.कुछ दिन पहले हमसे बात करते हुए अशीश शर्मा ने कहा था कि उन्हे इसमें अभिनय करने के एवज में पूरे पैसे अब तक नहीं मिले.दूसरे सीजन में प्रधानमंत्री मोदी का किरदार महेश ठाकुर ने निभाया.अब इस सीरीज के दोनों भाग ‘टाइम्स नाउ’ के यूट्यूब चैनल पर मुफ्त में देखा जा सकता है.

कहने का अर्थ यह कि अब तक माना जा रहा था कि जिंदा रहते हुए सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मांदी पर ही फिल्म बन सकती हैं.हम याद दिला दें कि नरेंद्र मोदी पर दो अन्य फिल्में बनी हुई हैं.इनमें से एक फिल्म श्रवण तिवारी निर्देशित ‘‘टू जीरो वन फोर’’ और दूसरी पवन नागपाल निर्देशित फिल्म ‘ बाल नरेन’ है.ज्ञातब्य है कि अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनी जो फिल्में सामने आयी हैं,उन सभी के निर्माता या निर्देशक का संबंध गुजरात राज्य से ही है.

फिल्म ‘‘टू जीरो वन फोर’ क्या है?

इस फिल्म की कहानी गुजरात से दिल्ली तक के सियासी सफर की तरफ इषारा करती है.जनवरी 2014 से शुरू होती है.जब गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यरत नरेंद्र मोदी अपने भाजपा दल पर खुद को 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री के रूप में लड़ाने का दबाव बना रहे थे.भाजपा के लाल कृष्ण अडवाणी सहित कई वरिष्ठ नेता मोदी जी के खिलाफ थे.उसी पृष्ठभूमि में श्रवण तिवारी ने फिल्म ‘‘टू जीरो वन फोर’ का लेखन,निर्माण व निर्देशन किया है. फिल्म ‘टू जीरो वन फोर’ में सवाल उठाया गया है कि क्या 2014 में देश के प्रधानमंत्री बढ़ने की तरफ अग्रसर राजनीतिक शख्सियत के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय साजिश रची गई थी? क्या इस शख्सियत को एक राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर ही समेट देने की कोई योजना बनी थी?

जी हाॅ! श्रवण तिवारी द्वारा लिखित और निर्देशित फिल्म की कहानी का प्लॉट बहुत ही दिलचस्प हैं.फिल्म की कहानी शुरू होती हैं 2014 में, जब देश के एक राज्य के मुख्यमंत्री को देश के आगामी प्रधानमंत्री में रूप में देखा जा रहा है. फिल्म के मुताबिक, देश के दुश्मन साजिश करके उन्हें रोकना चाहते हैं.और, विदेशी एजेंसियों की इन साजिशों को रोकने का बीड़ा उठाता है एक रिटायर्ड कैप्टन खन्ना (जैकी श्राफ ). जानकारी के मुताबिक सेवानिवृत्त सेना अधिकारी कैप्टन खन्ना की इस कहानी का मुख्य आधार वह खबरें हैं, जो 2014 के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले खूब चर्चा में रहीं. कैप्टन के जीवन में तब बदलाव आता है,जब उसे एक प्रमुख पाकिस्तानी आतंकवादी फिरोज मसानी से पूछताछ का काम सौंपा जाता है. यह पूछताछ भारतीय और विदेशी गुप्त एजेंटों से जुड़ी एक बड़ी साजिश को उजागर करता है.जैसे ही खन्ना साजिश के इस जाल को उजागर करता है,वह खुद एक नई मुसीबत में फंस जाता है.

फिल्म ‘‘बाल नरेन’ क्या है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘‘स्वच्छ भारत अभियान’’ पर आधारित इस फिल्म का निर्माण दीपक मुकुट ओर निर्देशन पवन नागपाल ने किया है.इसमें बाल कलाकार यज्ञ भसीन के अलावा बिदिता बाग,रजनीश दुग्गल,गोविंद नामदेव,विंदू दारा सिंह,लोकेश मित्तल ने अभिनय किया है.

क्या है फिल्म ‘गड़करी

नितिन गड़करी की बायोपिक फिल्म ‘‘गड़करी’’ के लेखक, निर्माता व निर्देशक अनुराग राजन भुसारी हैं.राहुल चोपड़ा ने  गडकरी और ऐश्वर्या डोर्ले ने गड़करी की पत्नी कंचन गडकरी का किरदार निभाया है.फिल्म की कहानी नागपुर में नितिन गड़करी के बचपन से शुरू होती है.फिर आएसएस से,जुड़ना,पार्टी कार्यकर्ता के रूप मंे काम करना,आपातकाल में जेल जाना, चुनाव जीतना,मंत्री बनने से लेकर एक्सप्रेस वे बनवाने से लेकर अब तक के उनके जीवन व कृतित्व की पूरी कहानी है.

शह और मात का खेलः

सूत्रों पर यकीन करने के साथ ही पिछले दिनों राजनीतिक गलियारों में जो कुछ हुआ,उसके अनुसार 2024 के लोकसभा चुनाव और पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव से ठीक पहले तीन नवंबर को श्रवण तिवारी निर्देशित फिल्म ‘‘टू जीरो वन फोर’ के प्रदर्शन का ऐलान कर दिया.सूत्रों पर यकीन किया जाए तो ऐसे में नितिन गड़करी ने भी अपनी बायोपिक फिल्म ‘गड़करी’ का ट्रलेर रिलीज करवाने के साथ ही प्रधानमंत्री मोदी पर बनी फिल्म ‘‘टू जीरो वन फोर’’ से एक सप्ताह पहले 27 अक्टूबर को ही निर्माताओं से अपनी फिल्म ‘गड़करी’ को प्रदर्शित करने का ऐलान करवा दिया. (गडकरी के एक सहयोगी का दावा है कि पहले नितिन गडकरी इस तरह की फिल्म के पक्ष में नही थे. पर कुछ लोगों की सलाह पर वह तैयार हुए.) इससे राजनीतिक गलियारों में गजब का माहौल पैदा हो गया है. पर अब फिल्म ‘‘टू जीरो वन फोर’ को मार्च 2024 में रिलीज किया जाएगा.खुद इस फिल्म के निर्देशक श्रवण तिवारी कहते हैं-‘‘हमारी फिल्म ‘टू जीरो वन फोर’ की कहानी जासूसी थ्रिलर है,जो जासूसी की रिस्क वाली दुनिया की एक झलक भी पेश करती है.यह साहस, साजिश और न्याय की कभी भी खत्म  नहीं होने वाली कहानी है, एक दिलचस्प रहस्य, जासूसी और अंतरराष्ट्रीय साजिश पर आधारित हमारी यह फिल्म मार्च 2024 में रिलीज होने वाली है.हम इसे तीन नवंबर 2023 को कभी भी रिलीज नहीं करने वाले थे.’’

उधर भाजपा से जुड़े कुछ लोग दावा कर रहे है कि इस फिल्म की परिकल्पना और निर्माण 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले ही कर लिया गया था.इसे अस्पष्ट कारणों से रोक दिया गया था.कुछ भाजपा नेताओं का मानना है कि गडकरी की फिल्म को राजनीति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए.जबकि कुछ नेताओ की राय में यह फिल्म एक ऐसे समूह का ईमानदार काम है,जो गडकरी के जीवन की बारीकियों को पकड़ना चाहता था.‘‘

क्या आरएसएस ने मोदी से दूरी बना गड़करी पर दांव खेलने का लिया है फैसला

बहरहाल,केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के गृह नगर नागपुर में फिल्म ‘गड़करी’ के ट्रेलर की रिलीज ने कई सवालों के जवाब दे दिए. महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस के नेतृत्व में और स्थानीय पार्टी विधायकों सहित नागपुर से भाजपा की स्टार ब्रिगेड बड़ी संख्या में मौजूद थी.सर्वविदित है कि देवेंद्र फड़नवीस भी अंदर ही अंदर अमित शाह से नाराज चल रहे हैं.क्योकि वह बार बार कहते रहे हैं कि वह उपमुख्यमंत्री नही बनेंगे,पर सूत्रो के अनुसार उन्हे अमित शाह के आदेश पर उप मुख्यमंत्री की शपथ लेनी पड़ी.तो दूसरी तरफ वह भी विदर्भ से ही आते हैं.लेकिन न तो गडकरी, न ही कोई अन्य नागपुर यानी कि विदर्भ से बाहर का भाजपा नेता मौजूद नही हुआ.लोगों की राय में मोदी-अमित शाह जगत में गडकरी की हैसियत को देखते हुए, कई लोगों के लिए सभी संकेत, कहानी में एक मोड़ की ओर इशारा करते हैं.

वैसे खुद पर बनी फिल्म ‘‘गडकरी’ के ट्रलेर लांच से कुछ दिन पहले एक कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी ने पार्टी नेतृत्व से अपनी दूरी का एक संकेत देते हुए सामान्य गुप्त शैली में टिप्पणी कहा था-‘‘इस लोकसभा चुनाव के लिए,मैंने फैसला किया है कि कोई बैनर या पोस्टर नहीं होंगे.लोगों को चाय नहीं दी जाएगी. मुझे दृढ़ता से लगता है कि जो लोग वोट देना चाहते हैं वह वोट देंगे, जो नहीं करना चाहते वह नहीं करेंगे.” उसी दिन से महाराष्ट् के राजनीतिक गलियारों में चर्चा हो रही है कि नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दूरी बनाते हुए नितिन गड़करी पर हाथ रख दिया है.

देवेंद्र फड़नवीस ने राज कपूर से की नितिन गड़करी की तुलना

नागपुर में फिल्म ‘गड़करी’ के ट्रेलर लॉन्च पर बोलते हुए नितिन गड़कर की तुलना राज कपूर से करते हुए देवेंद्र फड़नवीस ने कहा-“गडकरी राज कपूर की तरह हैं.वह बड़े सपने देखते हैं, और वह अपने सपनों को उनके तार्किक अंत तक पूरा भी करते हैं… उनका नवोन्वेषी और दूरदर्शी नेतृत्व हमारे लिए प्रेरणा है.‘‘

फड़नवीस ने लोगो को याद दिलाया कि गडकरी ने मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे के लिए रिलायंस के 3,600 करोड़ रुपये के टेंडर को खारिज कर इस परियोजना को 1,600 करोड़ रुपये में पूरा किया था.

देवेन्द्र फड़णवीस ने आगे कहा -‘‘केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की बायोपिक में दिखाया गया है कि एक नेता कैसे बनता है और एक ‘कार्यकर्ता‘ (पार्टी कार्यकर्ता) कैसे काम करता है और नई पीढ़ी को ‘दूरदर्शी और अभिनव‘ भारतीय जनता पार्टी नेता, महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री के बारे में अधिक जानने के लिए प्रेरित करेगा.जीवन में किसी भी संघर्ष की बात आने पर गडकरी का कभी न हार मानने वाला रवैया है, जो हम जैसे कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा है. वह एक दूरदर्शी नेता हैं और सिर्फ एक मंत्री नहीं बल्कि एक प्रवर्तक हैं.‘‘

यूं भी नितिन गडकरी पिछले कुछ महीनों में खरी-खरी बातें कहने के लिए सुर्खियों में रहे हैं.करीब एक पखवाड़े पहले ही लोकसभा चुनाव को लेकर उनके दिये गए बयान ने काफी सुर्खियाँ बटोरी थीं.

गत वर्ष गड़करी ने एक कार्यक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जमकर तारीफ करते हुए कहा था-‘‘उदार अर्थव्यवस्था के कारण देश को नई दिशा मिली, उसके लिए देश मनमोहन सिंह का ऋणी है.मनमोहन सिंह के द्वारा शुरू किए गए आर्थिक सुधारों की वजह से ही मैं महाराष्ट्र में मंत्री रहते हुए सड़कों के निर्माण के लिए धन जुटा सका था.’’नितिन गड़करी का यह बयान  भाजपा में किसी को भी पसंद नहीं आया.

लोग तो अब यह भी कह रहे हैं कि इस बार लोकसभा चुनाव से पहले कई फिल्में आने वाली हैं.तो क्या अब फिल्मों के माध्यम से राजनीतिक दल और राज नेता अपने प्रतिद्वंदियों का मात देने का प्रयास करेंगें ? क्या अब सिनेमा का यही उपयोग होना बाकी रह गया है?..खैर,हमें जिस तरह की सूचना मिल रही है,उसके अनुसार कई राजनीतिक फिल्में बन रही हैं और हो सकता है कि फिल्म ‘गड़करी’ के प्रदर्शन के बाद कई दूसरे नेता भी अपने जीवन व कृतित्व पर फिल्में बनवा सकते हैं.वैसे भी कहा जाता है कि अपने उपर लगे सभी कीचड़ों को आपन अपने जीवन पर फिल्म बनवा कर धेा सकते हैं… कम से कम कई क्रिकेटर अब तक ऐसा कर चुके हैं,यह अलग बात है कि अब तक गलत मकसद से बनी एक  भी क्रिकेट आधारित फिल्म को दर्शक सिरे से खारिज करते आए हैं.

जब अमिताभ बच्चन ने फिल्म एक रिश्ता से जुड़ने के लिए निर्देशक सुनील दर्शन को किया था फोन

कोई भी इंसान यूं ही बड़ा नही बन जाता. बड़ा व सफल इंसान बनने के लिए इंसान के अंदर विनम्रता होनी चाहिए. दूसरो का सम्मान करना आना चाहिए.इसी के साथ अपने आत्म सम्मान को बरकरार रखते हुए अपने लिए उपयुक्त काम की तलाश और उसे पाने का प्रयास भी करना चाहिए.यदि आप किसी से काम मांगते हैं,तो उसमें कोई बुराई नही है.बशर्ते ऐसा करते समय आपके आत्मसम्मान को ठेस न पहुॅच रही हो.

आज 81 वर्ष की उम्र में भी अमिताभ बच्चन लगातार अभिनय कर रहे हैं.उन्हे सुपर स्टार से लेकर सदी का महानायक तक कई उपाधियों से नवाजा जा चुका है.वह पद्मश्री, पद्मभूषण,पद्मविभूषण,दादा साहेब फालके अर्वाड सहित कई पुरस्कार अपनी झोली में डाल चुके हैं.मगर यह सब उन्हे सहजता या आराम से नही मिला.यह सब पाने के पीछे उनकी अपनी मेहनत, इमानदारी,किसी भी फिल्म निर्देशक से काम मांगने में शर्म का ना होना,समय के अनुसार अपने आपको ढाल लेना भी रहा है. अमिताभ बच्चन ने 1969 में बौलीवुड में कदम रखा था.उनके 55 वर्ष के अभिनय कैरियर में कई पड़ाव आए. जब उनका अभिनय कैरियर उंचाईयों पर था,तब भी अमिताभ बच्चन अच्छे किरदार व अच्छी कहानी की तलाश में लगे रहते थे.और जब उन्हे पता चलता था कि कोई फिल्मकार किसी अच्छी कहानी पर काम कर रहा है,तो वह उसे फोन कर फिल्म से जुड़ने की इच्छा व्यक्त करने से पीछे नहीं रहते थे.

सन 2000 की बात है.उस वक्त तक मशहूर व सफलतम फिल्म निर्माता व निर्देशक सुनील दर्शन ‘इंतकाम’, ‘लुटेरे’, ‘अजय’ व ‘जानवर’ जैसी सफलतम फिल्में दे चुके थे. और अपनी नई फिल्म ‘‘एक रिश्ताः द बौंड आफ लव’’ पर काम कर रहे थे.पिता पुत्र के रिश्तों पर आधारित इस फिल्म में बेटे अजय कपूर के किरदार के लिए अक्षय कुमार को अनुबंधित कर चुके थे.पर व्यवसायी पिता विजय कपूर के किरदार के लिए वह कलाकार की तलाश में थे और किसी निर्णय पर नहीं पहुॅच पा रहे थे.

अचानक एक दिन जब सुनील दर्शन खुद कार चलाते हुए अपने घर से अपने आफिस की तरफ जा रहे थे,तभी उनके पास अमिताभ बच्चन का फोन आया और अमिताभ बच्चन ने उनके साथ काम करने की इच्छा जाहिर की.अब अपनी फिल्म के साथ महान कलाकार जुड़ने के लिए तैयार हो,तो सुनील दर्शन को और क्या चाहिए था.बात बन गयी.इस तरह अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार ने एक साथ पहली बार फिल्म ‘‘एक रिश्ता’’ में अभिनय किया था.

यह फिल्म 18 मई 2001 को प्रदर्शित हुई थी और इसने सफलता के नए मापदंड बनाए थे.फिल्म ‘एक रिश्ता’ एक ऐसी प्रेरक व विचारोत्तेजक कहानी थी कि इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद लोग सुनील दर्शन के पैर छूकर इस तरह की फिल्म बनाने के लिए उनका धन्यवाद अदा करते नजर आए थे.लंदन सहित कई पश्चिमी देशों के कई शहरों,जहां लोग अत्याधुनिक जीवन जीने में यकीन करते हैं,वहां भी इस फिल्म को देखने के लिए लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा था.

अमिताभ बच्चन के फोन करने का वाकिया खुद निर्देशक सुनील दर्शन ने हमें बताया.सुनील दर्शन ने बताया-‘‘फिल्म ‘जानवर’ की सफलता के बाद मेरा आत्म विश्वास काफी बढ़ चुका था. मेरे पास अपनी लिखी हुई कुछ कहानियां थीं,मगर मैने सोचा नहीं था कि अब किस कहानी पर काम किया जाए.जबकि अक्षय कुमार को जल्दी थी. वह चाहता था कि मैं उसके साथ नई फिल्म जल्द शुरू करुं. एक दिन उसने मुझे अपने घर खाने पर बुलाया और पूछा कि अब मैं नया करने वाला हॅूं.हम दोनों एक दूसरे के आमन सामने बैठे हुए थे.मैने यूं ही उसे ‘एक रिश्ता’ की कहानी सुनानी शुरू कर दी.वह कहानी सुनते सुनते धीरे धीरे सोफे से खिसकते हुए नीचे जमीन पर आ गया और उसकी निगाहें मुझ पर टिकी हुई थीं.

मैने कहानी खत्म की और अक्षय ने कहा कि फिल्म कब शुरू होगी? मैने कहा कि यह तो कहानी का पहला ड्राफ्ट है. इस पर काम करना बाकी है.उसने कहा कि वह बेटे अजय का किरदार करना चाहेगा.फिर उसने पूछा कि पिता का किरदार कौन कर रहा है? मैने कहा कि अभी तक मैंने इस बारे में कुछ सोचा ही नही है. उसके बाद मैने कुछ लोगों से इस बारे में जिक्र किया कि वह मुझे पिता के किरदार के लिए कलाकार के नाम सुझाए.एक सप्ताह बाद एक दिन सुबह मैं अपने घर से आफिस की तरफ आ रहा था.मेरा फोन बजा तो मैने फोन उठा लिया. फोन पर अमिताभ बच्चन जी की आवाज थी.मैं उनकी आवाज तीस साल से सुनता आ रहा था,वही आवाज जब मेरे कान मंे गॅूंजी,तो मुझे कैसा लगा होगा,इसका अदाजा लगा सकते हैं.अचानक मेरा एक्साइटमेंट बढ़ गया.मैने अपनी कार सड़क के किनारे खड़ी की और उनसे बात की.अमिताभ बच्चन जी ने कहा कि, ‘क्या आपकी फिल्म में मेरे योग्य कोई किरदार होगा?’ मैने उनसे कहा कि सर,मैं आकर आपसे मिलता हॅूं.तब उन्होने मुझसे पूछ दिया कि मैं अभी कहां हूं? मैने बताया कि मैं घर से आफिस जा रहा हूॅं.तब उन्होने कहा कि रास्ते में ही उनका घर पड़ेगा.मैं उनसे मिलते हुए अपने आफिस जा सकता हूं.मैं अमिताभ बच्चन जी से मिला,उन्हे कहानी सुनायी.उन्होने उसी वक्त इस फिल्म में काम करने के लिए हामी भर दी.इस तरह मेरी फिल्म ‘एक रिश्ता’ का जन्म हुआ था.’’

फिल्म ‘‘एक रिश्ता’’ में अमिताभ बच्चन की बेटी और अक्षय कुमार की बड़ी बहन प्रीति का अति महत्वपूर्ण किरदार था,जिसके लिए सुनील दर्शन ने जुही चावला को साइन किया था.फिल्म की शूटिंग शुरू होने से एक दिन पहले पता चला कि जुही चावला गर्भवती हो गयी है.इस फिल्म को आठ माह के अंदर कई शिड्यूल में फिल्माया जाना था.इसलिए अब सुनील दर्शन को जल्द से जल्द जुही चावला के सारे दृश्य फिल्माने थे.मगर अमिताभ बच्चन ने अपनी सारी तारीखें करण जौहर को फिल्म ‘कभी खुशी कभी गम’ के लिए दे रखी थीं.

इस समस्या का निदान खोजने के लिए सुनील दर्शन, अमिताभ बच्चन के पास पहुॅचे.सारी बात सुनने के बाद अमिताभ बच्चन ने कहा-‘‘मैं करण जोहर के साथ सुबह नौ बजे से शाम छह बजे तक रहूंगा.आप शाम सात बजे से रात दो बजे तक मेरे साथ शूटिंग कर सकते हो.’’अमिताभ बच्चन की बातें सुनकर सुनील दर्शन आश्चर्य में पड़ गए थे कि कोई कलाकार अच्छा काम करने के लिए इस कदर मेहनत कर सकता है.खैर,सुनील दर्शन ने फिल्म की शूटिंग शुरू की और चार माह के अंदर फिल्म पूरी कर ली. फिल्म जब प्रदर्शित हुई तो इसे आपेक्षा से अधिक सफलता मिली. लोग एअरपोर्ट या किसी पार्टी में मिलते,तो वह सुनील दर्शन के पैर छूकर धन्यवाद अदा करते हुए कहते कि उसने ‘एक रिश्ता’ को देखने के बाद अपने पिता या बेटे के साथ अपने रिष्ते सुधार लिए.

मां- भाग 2 : क्या बच्चों के लिए ममता का सुख जान पाई गुड्डी

‘‘ऐसा कर, बच्चों के साथ तू भी यहां रह ले. तुझे भी काम मिल जाएगा और बच्चे भी पल जाएंगे,’’ सुमनलता ने कहा.

‘‘मैं कहां आप लोगों पर बोझ बन कर रहूं, मम्मीजी. काम भी जानती नहीं और मुझ अकेली का क्या, कहीं भी दो रोटी का जुगाड़ हो जाएगा. अब आप तो इन बच्चों का भविष्य बना दो.’’

‘‘अच्छा, तो तू उस ट्रक ड्राइवर से शादी करने के लिए अपने बच्चों से पीछा छुड़ाना चाह रही है,’’ सुमनलता की आवाज तेज हो गई, ‘‘देख, या तो तू इन बच्चोें के साथ यहां पर रह, तुझे मैं नौकरी दे दूंगी या बच्चों को छोड़ जा पर शर्त यह है कि तू फिर कभी इन बच्चों से मिलने नहीं आएगी.’’

सुमनलता ने सोचा कि यह शर्त एक मां कभी नहीं मानेगी पर आशा के विपरीत गुड्डी बोली, ‘‘ठीक है, मम्मीजी, आप की शरण में हैं तो मुझे क्या फिक्र, आप ने तो मुझ पर एहसान कर दिया…’’

आंसू पोंछती हुई वह जमुना को दोनों बच्चे थमा कर तेजी से अंधेरे में विलीन हो गई थी.

‘‘अब मैं कैसे संभालूं इतने छोटे बच्चों को,’’ हैरान जमुना बोली.

गोदी का बच्चा तो अब जोरजोर से रोने लगा था और बच्ची कोने में सहमी खड़ी थी.

कुछ देर सोच में पड़ी रहीं सुमनलता फिर बोलीं, ‘‘देखो, ऐसा है, अंदर थोड़ा दूध होगा. छोटे बच्चे को दूध पिला कर पालने में सुला देना. बच्ची को भी कुछ खिलापिला देना. बाकी सुबह आ कर देखूंगी.’’

‘‘ठीक है, मम्मीजी,’’ कह कर जमुना बच्चों को ले कर अंदर चली गई. सुमनलता बाहर खड़ी गाड़ी में बैठ गईं. उन के मन में एक अजीब अंतर्द्वंद्व शुरू हो गया कि क्या ऐसी भी मां होती है जो जानबूझ कर दूध पीते बच्चों को छोड़ गई.

‘‘अरे, इतनी देर कैसे लग गई, पता है तुम्हारा इंतजार करतेकरते पिंकू सो भी गया,’’ कहते हुए पति सुबोध ने दरवाजा खोला था.

‘‘हां, पता है पर क्या करूं, कभीकभी काम ही ऐसा आ जाता है कि मजबूर हो जाती हूं.’’

तब तक बहू दीप्ति भी अंदर से उठ कर आ गई.

‘‘मां, खाना लगा दूं.’’

‘‘नहीं, तुम भी आराम करो, मैं कुछ थोड़ाबहुत खुद ही निकाल कर खा लूंगी.’’

ड्राइंगरूम में गुब्बारे, खिलौने सब बिखरे पडे़ थे. उन्हें देख कर सुमनलता का मन भर आया कि पोते ने उन का कितना इंतजार किया होगा.

सुमनलता ने थोड़ाबहुत खाया पर मन का अंतर्द्वंद्व अभी भी खत्म नहीं हुआ था, इसलिए उन्हें देर रात तक नींद नहीं आई थी.

सुमनलता बारबार गुड्डी के ही व्यवहार के बारे में सोच रही थीं जिस ने मन को झकझोर दिया था.

मां की ममता…मां का त्याग आदि कितने ही नाम से जानी जाती है मां…पर क्या यह सब झूठ है? क्या एक स्वार्थ की खातिर मां कहलाना भी छोड़ देती है मां…शायद….

सुबोध को तो सुबह ही कहीं जाना था सो उठते ही जाने की तैयारी में लग गए.

पिंकू अभी भी अपनी दादी से नाराज था. सुमनलता ने अपने हाथ से उसे मिठाई खिला कर प्रसन्न किया, फिर मनपसंद खिलौना दिलाने का वादा भी किया. पिंकू अपने जन्मदिन की पार्टी की बातें करता रहा था.

दोपहर 12 बजे वह आश्रम गईं, तो आते ही सारे कमरों का मुआयना शुरू कर दिया.

शिशु गृह में छोटे बच्चे थे, उन के लिए 2 आया नियुक्त थीं. एक दिन में रहती थी तो दूसरी रात में. पर कल रात तो जमुना भी रुकी थी. उस ने दोनों बच्चों को नहलाधुला कर साफ कपडे़ पहना दिए थे. छोटा पालने में सो रहा था और जमुना बच्ची के बालों में कंघी कर रही थी.

‘‘मम्मीजी, मैं ने इन दोनों बच्चों के नाम भी रख दिए हैं. इस छोटे बच्चे का नाम रघु और बच्ची का नाम राधा…हैं न दोनों प्यारे नाम,’’ जमुना ने अब तक अपना अपनत्व भी उन बच्चों पर उडे़ल दिया था.

सुमनलता ने अब बच्चों को ध्यान से देखा. सचमुच दोनों बच्चे गोरे और सुंदर थे. बच्ची की आंखें नीली और बाल भूरे थे.

अब तक दूसरे छोटे बच्चे भी मम्मीजीमम्मीजी कहते हुए सुमनलता के इर्दगिर्द जमा हो गए थे.

सब बच्चों के लिए आज वह पिंकू के जन्मदिन की टाफियां लाई थीं, वही थमा दीं. फिर आगे जहां कुछ बडे़ बच्चे थे उन के कमरे में जा कर उन की पढ़ाईलिखाई व पुस्तकों की बाबत बात की.

इस तरह आश्रम में आते ही बस, कामों का अंबार लगना शुरू हो जाता था. कार्यों के प्रति सुमनलता के उत्साह और लगन के कारण ही आश्रम के काम सुचारु रूप से चल रहे थे.

3 माह बाद एक दिन चौकीदार ने आ कर खबर दी, ‘‘मम्मीजी, वह औरत जो उस रात बच्चों को छोड़ गई थी, आई है और आप से मिलना चाहती है.’’

‘‘कौन, वह गुड्डी? अब क्या करने आई है? ठीक है, भेज दो.’’

मेज की फाइलें एक ओर सरका कर सुमनलता ने अखबार उठाया.

‘‘मम्मीजी…’’ आवाज की तरफ नजर उठी तो दरवाजे पर खड़ी गुड्डी को देखते ही वह चौंक गईं. आज तो जैसे वह पहचान में ही नहीं आ रही है. 3 महीने में ही शरीर भर गया था, रंगरूप और निखर गया था. कानोें में लंबेलंबे चांदी के झुमके, शरीर पर काला चमकीला सूट, गले में बड़ी सी मोतियों की माला…होंठों पर गहरी लिपस्टिक लगाई थी. और किसी सस्ते परफ्यूम की महक भी वातावरण में फैल रही थी.

‘‘मम्मीजी, बच्चों को देखने आई हूं.’’

‘‘बच्चों को…’’ यह कहते हुए सुमनलता की त्योरियां चढ़ गईं, ‘‘मैं ने तुम से कहा तो था कि तुम अब बच्चों से कभी नहीं मिलोगी और तुम ने मान भी लिया था.’’

‘‘अरे, वाह…एक मां से आप यह कैसे कह सकती हैं कि वह बच्चों से नहीं मिले. मेरा हक है यह तो, बुलवाइए बच्चों को,’’ गुड्डी अकड़ कर बोली.

‘‘ठीक है, अधिकार है तो ले जाओ अपने बच्चों को. उन्हें यहां क्यों छोड़ गई थीं तुम,’’ सुमनलता को भी अब गुस्सा आ गया था.

Diwali Special: मेहमानों को परोसें कश्मीरी पनीर टिक्का

फैस्टिव सीजन के मौके पर अगर आप मेहमानों और अपनी फैमिली के लिए स्टार्टर में पनीर की डिश परोसना चाहते हैं तो कश्मीरी पनीर टिक्का की आसाना रेसिपी ट्राय करना ना भूलें.

सामग्री

800 ग्राम पनीर

10 हरीमिर्चें

1/2 छोटा चम्मच कालानमक

1 बड़ा चम्मच अदरकलहसुन का पेस्ट

100 ग्राम प्रौसैस्ड चीज

1 कप क्रीम

100 ग्राम काजू

2 छोटे चम्मच केसर का पानी

1 बड़ा चम्मच तेल

कालीमिर्च स्वादानुसार

नमक स्वादानुसार.

विधि

पनीर को 2 इंच के क्यूब्स में काट लें और अदरकलहसुन के पेस्ट, कालीमिर्च और नमक के मिश्रण से मैरिनेट करें. फिर चीज, काजू, क्रीम को ग्राइंड कर मिश्रण तैयार कर लें. इस मिश्रण में स्वादानुसार कालीमिर्च और नमक भी डालें. फिर इस मिश्रण में पनीर के टुकड़ों को मैरिनेट करें और ऊपर से केसर का पानी भी डालें. इस के बाद पनीर के टुकड़ों को स्कीवर्स में लगा कर तंदूर में रोस्ट कर सर्व करें.

मां- भाग 1 : क्या बच्चों के लिए ममता का सुख जान पाई गुड्डी

‘‘मम्मीजी, पिंकू केक काटने के लिए कब से आप का इंतजार कर रहा है.’’

बहू दीप्ति का फोन था.

‘‘दीप्ति, ऐसा करो…तुम पिंकू से मेरी बात करा दो.’’

‘‘जी अच्छा,’’ उधर से आवाज सुनाई दी.

‘‘हैलो,’’ स्वर को थोड़ा धीमा रखते हुए सुमनलता बोलीं, ‘‘पिंकू बेटे, मैं अभी यहां व्यस्त हूं. तुम्हारे सारे दोस्त तो आ गए होंगे. तुम केक काट लो. कल का पूरा दिन तुम्हारे नाम है…अच्छे बच्चे जिद नहीं करते. अच्छा, हैप्पी बर्थ डे, खूब खुश रहो,’’ अपने पोते को बहलाते हुए सुमनलता ने फोन रख दिया.

दोनों पत्रकार ध्यान से उन की बातें सुन रहे थे.

‘‘बड़ा कठिन दायित्व है आप का. यहां ‘मानसायन’ की सारी जिम्मेदारी संभालें तो घर छूटता है…’’

‘‘और घर संभालें तो आफिस,’’ अखिलेश की बात दूसरे पत्रकार रमेश ने पूरी की.

‘‘हां, पर आप लोग कहां मेरी परेशानियां समझ पा रहे हैं. चलिए, पहले चाय पीजिए…’’ सुमनलता ने हंस कर कहा था.

नौकरानी जमुना तब तक चाय की ट्रे रख गई थी.

‘‘अब तो आप लोग समझ गए होंगे कि कल रात को उन दोनों बुजुर्गों को क्यों मैं ने यहां वृद्धाश्रम में रहने से मना किया था. मैं ने उन से सिर्फ यही कहा था कि बाबा, यहां हौल में बीड़ी पीने की मनाही है, क्योंकि दूसरे कई वृद्ध अस्थमा के रोगी हैं, उन्हें परेशानी होती है. अगर आप को  इतनी ही तलब है तो बाहर जा कर पिएं. बस, इसी बात पर वे दोनों यहां से चल दिए और आप लोगों से पता नहीं क्या कहा कि आप के अखबार ने छाप दिया कि आधी रात को कड़कती सर्दी में 2 वृद्धों को ‘मानसायन’ से बाहर निकाल दिया गया.’’

‘‘नहीं, नहीं…अब हम आप की परेशानी समझ गए हैं,’’ अखिलेशजी यह कहते हुए उठ खडे़ हुए.

‘‘मैडम, अब आप भी घर जाइए, घर पर आप का इंतजार हो रहा है,’’ राकेश ने कहा.

सुमनलता उठ खड़ी हुईं और जमुना से बोलीं, ‘‘ये फाइलें अब मैं कल देखूंगी, इन्हें अलमारी में रखवा देना और हां, ड्राइवर से गाड़ी निकालने को कहना…’’

तभी चौकीदार ने दरवाजा खटखटाया था.

‘‘मम्मीजी, बाहर गेट पर कोई औरत आप से मिलने को खड़ी है…’’

‘‘जमुना, देख तो कौन है,’’ यह कहते हुए सुमनलता बाहर जाने को निकलीं.

गेट पर कोई 24-25 साल की युवती खड़ी थी. मलिन कपडे़ और बिखरे बालों से उस की गरीबी झांक रही थी. उस के साथ एक ढाई साल की बच्ची थी, जिस का हाथ उस ने थाम रखा था और दूसरा छोटा बच्चा गोदी में था.

सुमनलता को देखते ही वह औरत रोती हुई बोली, ‘‘मम्मीजी, मैं गुड्डी हूं, गरीब और बेसहारा, मेरी खुद की रोटी का जुगाड़ नहीं तो बच्चों को क्या खिलाऊं. दया कर के आप इन दोनों बच्चों को अपने आश्रम में रख लो मम्मीजी, इतना रहम कर दो मुझ पर.’’

बच्चों को थामे ही गुड्डी, सुमनलता के पैर पकड़ने के लिए आगे बढ़ी थी तो यह कहते हुए सुमनलता ने उसे रोका, ‘‘अरे, क्या कर रही है, बच्चों को संभाल, गिर जाएंगे…’’

‘‘मम्मीजी, इन बच्चों का बाप तो चोरी के आरोप में जेल में है, घर में अब दानापानी का जुगाड़ नहीं, मैं अबला औरत…’’

उस की बात बीच में काटते हुए सुमनलता बोलीं, ‘‘कोई अबला नहीं हो तुम, काम कर सकती हो, मेहनत करो, बच्चोें को पालो…समझीं…’’ और सुमनलता बाहर जाने के लिए आगे बढ़ी थीं.

‘‘नहीं…नहीं, मम्मीजी, आप रहम कर देंगी तो कई जिंदगियां संवर जाएंगी, आप इन बच्चों को रख लो, एक ट्रक ड्राइवर मुझ से शादी करने को तैयार है, पर बच्चों को नहीं रखना चाहता.’’

‘‘कैसी मां है तू…अपने सुख की खातिर बच्चों को छोड़ रही है,’’ सुमनलता हैरान हो कर बोलीं.

‘‘नहीं, मम्मीजी, अपने सुख की खातिर नहीं, इन बच्चों के भविष्य की खातिर मैं इन्हें यहां छोड़ रही हूं. आप के पास पढ़लिख जाएंगे, नहीं तो अपने बाप की तरह चोरीचकारी करेंगे. मुझ अबला की अगर उस ड्राइवर से शादी हो गई तो मैं इज्जत के साथ किसी के घर में महफूज रहूंगी…मम्मीजी, आप तो खुद औरत हैं, औरत का दर्द जानती हैं…’’ इतना कह गुड्डी जोरजोर से रोने लगी थी.

‘‘क्यों नाटक किए जा रही है, जाने दे मम्मीजी को, देर हो रही है…’’ जमुना ने आगे बढ़ कर उसे फटकार लगाई.

नशा: भाग 2- क्या रेखा अपना जीवन संवार पाई

क्लब का अंदर का दृश्य देख कर वह दंग रह गई थी. रंगीन जोड़े फर्श पर थिरक रहे थे. लोग जाम पर जाम लगा रहे थे यानी शराब पी रहे थे. सब नशे में चूर थे. ऐसा तो उस ने फिल्मों में ही देखा था. वह एकटक सब देख रही थी. दीपा के कहने पर उस ने शराब पी थी और वह भी पहली दफा. फिर तो हर दिन उस का औफिस में बीतता, तो शाम क्लब में बीतती.

दीपा शुरू में तो उस को अपने पैसे से पिलाती थी, बाद में उसी के पैसे से पीती थी. शनिवार और इतवार को वे दोनों रेखा के घर में ही पीतीं. रेखा जानती है कि वह गलत कर रही है, वहीं वह यह भी जानती है कि उस को अपने को रोक पाना अब उस के वश में नहीं है. शाम होते ही हलक सूखने लगता है उस का.

कई बार फूफी कह चुकी है- ‘इस दीपा का अपना घरबार नहीं है, यह दूसरों का घर बरबाद कर के ही दम लेगी. अरे, रेखा बीबी, इस औरत का साथ छोड़ो. बड़ी बुरी लत है शराब की. मेरा पति तो शराब पीपी के दूसरी दुनिया में चला गया. तभी तो मुझ फूफी ने इस घर में उम्र गुजार दी. बड़ी बुरी चीज है शराब और शराबी से दोस्ती.’

फूफी के ताने रेखा को न भाते. जी करता धक्के मार कर घर से बाहर निकाल दे. लेकिन नहीं कर सकती ऐसा. यह चली गई तो घर कौन संभालेगा.

आज उसे घबराहट हो रही है, जब से अम्माजी ने सब बताया कि वे रिटायर होने वाली हैं. व्याकुल मन के साथ बड़ी देर तक बिस्तर पर करवटें बदलती रही. न जाने कब सोई, पता ही नहीं लगा. उधर, देवेश को जब से रेखा के बारे में पता लगा है, उस की व्याकुलता का अंत नहीं है. वहां जरमनी में स्त्रीपुरुष सब शराब पीते हैं, ठंडा मुल्क है. पर हिंदुस्तान में लोग इसे शौकिया पीते हैं. स्त्रियों का यों क्लबरैस्त्रां में पीना दुश्चरित्र माना जाता है.

देवेश को अम्मा ने जब से रेखा के बारे में बताया है, जरमनी में हर स्त्री उसे रेखा सी दिखती है. वह रैस्त्रां के आगे से गुजरता है तो लगता है, रेखा इस रैस्त्रां में शराब पी रही होगी. दूसरे ही क्षण सोचता- यहां रेखा कैसे आ सकती है?

औफिस में भी देवेश बेचैन रहता है. दिनरात सोतेजागते ‘रेखा शराबी’ का खयाल उस से जुड़ा रहता है. देवेश का जी करता है, अभी इंडिया के लिए फ्लाइट पकड़े और पत्नी के पास पहुंच जाए, बांहों में भर कर पूछे, ‘रेखा, तुम्हें जीवन में कौन सा दुख है जो शराब का सहारा ले लिया.’ देवेश कितनी खुशियां ले कर आया था जरमनी में. इंडिया में घर खरीदेंगे, मियांबीवी ठाट से रहेंगे. फिर बच्चे के बारे में सोचेंगे. मां भी साथ रहेंगी. किंतु क्यों? ये सब क्या हुआ, कैसे हुआ? किस से पूछे वह? जरमनी में तो उस का अपना कोई सगा नहीं है जिस से मन की बात कह भी सके.

वह इतना मजबूर है कि न तो रेखा से कुछ पूछ सकता है और न ही अम्मा से. बस, मन की घायल दशा से फड़फड़ा कर रह जाता है. उसे लग रहा है कि वह डिप्रैशन में जा रहा है. दोस्तों ने उस की शारीरिक अस्वस्थता देख उसे अस्पताल में भरती करा दिया था.

कुछ स्वस्थ हुआ तो हर समय उसे पत्नी का लड़खड़ाता अक्स ही दिखाई देता. घबरा कर आंखें बंद कर लेता. और, अम्माजी, उस दिन बेटे से बात करने के बाद ऊपर से तो सामान्य सी दिख रही थीं किंतु अंदर से उन को पता था वे कितनी दुखी हैं. पूरी रात सो न सकी थीं. बेचारी क्या करतीं. आज सुबह वे हमेशा की तरह जल्दी न उठीं.

रेखा जब औफिस चली गई तो बेमन से उठीं और स्टोर में घुस गईं. स्टोर कबाड़ से अटा पड़ा था. किताबें, कौपियां, न्यूजपेपर्स और न जाने क्याक्या पुराना सामान था. कबाड़ी को बुला कर सारा सामान बेच दिया सिर्फ एक बंडल को छोड़ कर. इसे फुरसत में देखूंगी क्या है.

सब काम खत्म कर के बंडल को झाड़झूड़ कर खोला. उन्हें लगता था किसी ने हाथ से कविताएं लिखी हैं. शायद यह रेखा की राइटिंग है. कविताएं ही थीं. देखा एक नहीं, 30-35 कविताएं थीं. उन्हें पढ़ कर वे स्तब्ध थीं.

सुंदर शब्दों के साथ ज्वलंत विषयों पर लिखी कविताएं अद्वितीय थीं. यानी, बहू कविताएं भी लिखती है. इस बंडल मे 2-3 पुस्तकें भी थीं. सभी रेखा की कृतियों का संग्रह थीं. अम्माजी कभी कविता संग्रह पढ़तीं, तो कभी हस्तलिखित रचनाओं को. इतनी गुणी है उन की बहू और वे इस से अब तक अनजान रहीं.

झाड़पोंछ कर उन्हें कोने में टेबल पर रख दिया. सोचा, शाम को बात करूंगी. क्यों बहू ने इस गुण की बात हम से छिपाई? कभीकभी हम अपने टेलैंट को छोड़ कर इधरउधर भटकते हैं. दुर्गुणों में फंस कर जीवन को दुश्वार बना लेते हैं.

रेखा के घर आने से पहले उन्होंने कई जगह फोन किए. दोपहर को बेटे देवेश का फोन आ गया, ‘‘कैसी हो अम्मा?’’

‘‘ठीक हूं.’’

‘‘और रेखा?’’

‘‘वह अभी औफिस से लौटने वाली है. आएगी तो बता दूंगी. तू परेशान है उस को ले कर, यह मैं जानती हूं.’’

‘‘नहीं अम्मा, मैं ठीक हूं. बस, आने के दिन गिन रहा हूं.’’

‘‘नहीं, मैं जानती हूं, तू झूठ बोल रहा है. पर वादा करती हूं तेरे आने तक घर को संभालने की पूरी कोशिश करूंगी.’’ अम्मा की आंखों में आंसू आ गए थे.

‘‘अम्मा, ऐसा तो मैं ने कभी नहीं सोचा था कि धन कमाने की होड़ में परिवार को ही खो बैठूंगा.’’

‘‘नहीं बेटा, ऐसा मत सोचो, सब ठीक हो जाएगा, धीरज रखो.’’ इस से आगे बात करना संभव न था. अम्माजी का गला आवेग से भर्रा गया था.

काम से रेखा लौट आई थी. चेहरे पर चिंता व परेशानी झलक रही थी. अम्माजी को रेखा की चिंता का विषयकारण पता था. अम्माजी ने बड़ी हिम्मत कर के कहा, ‘‘आज बहुत थक गई हो, काम ज्यादा था क्या?’’

‘‘नहीं अम्माजी, बस, वैसे ही थोड़ा सिरदर्द था. आराम करूंगी, ठीक हो जाएगा.’’

ऐसे में वे भला कैसे कहतीं कि आज इरा खन्ना से उन्होंने समय लिया है. वे हमारी राह देख रही होंगी.

‘‘अम्माजी, आप कहीं जाने के लिए तैयार हो रही हैं?’’

‘‘रेखा, आज मैं एक सहेली के पास जा रही थी, चाहती थी कि तुम भी साथ चलो.’’

‘‘नहीं, फिर कभी.’’

‘‘ठीक है जब तुम्हारा मन करे. पर वे तुम से ही मिलना चाहती थीं.’’

‘‘अच्छा? आप ने बताया होगा मेरे बारे में, तभी?’’

‘‘हां, मैं ने यही कहा था कि मेरी बहू लाखों में एक है. नेक, समझदार व दूसरों को सम्मान देने वाली स्त्री है. मेरी बहू से मिलोगी तो सब भूल जाओगी. है न बहू?’’ वह सास की बात पर मुसकरा रही थी, मन ही मन कहने लगी, यानी, अम्माजी को पता नहीं कि मैं दुश्चरित्रा हूं, मैं शराब पीती हूं, बुरी स्त्री हूं. यदि वे जान गईं तो घर से निकाल सकती हैं.

वैसे जो बात अभी अम्माजी ने अपनी सहेली से की थी, सुन कर उसे बहुत अच्छा लगा. मैं जरूर उन से मिलूंगी. पता नहीं, कब वह सो गई और अम्माजी, सोफे पर उसे सोया देख सोच रही थीं कि ये उठे तो मैं इस को साथ ले चलूं. फिर वे भी अंदर जा कर लेट गईं.

‘‘एक कप चाय बना दो, फूफी. सिरदर्द से फटा जा रहा है,’’ रेखा सोफे पर बैठी सोच रह थी कि उस की नजर कोने की मेज पर रखे एक बंडल पर पड़ी. बिजली सी चमक की तरह वह उछली, ‘‘फूफी, यह बंडल यहां क्यों रखा है? इसे मैं ने स्टोर में डाला था, क्यों निकाला?’’ वह लगभग चीख पड़ी.

‘‘क्या हुआ, बेटा? यह बंडल स्टोर में था. मैं ने आज स्टोर की सफाई की तो निकाल कर देखा, इस में कविताएं व कुछ और भी था…सारा झाड़कबाड़ बेच दिया, इस को फेंकने का मन न किया. सोचा, तुम आओगी तो तुम से पूछ कर ही कुछ सोचूंगी.’’

‘‘पूछना क्या है, इसे भी कबाड़ में फेंक देतीं. क्या करूंगी इन सब का? अब सब खत्म हो गया.’’

उस के स्वर में वितृष्ण से अम्माजी को समझते देर न लगी कि इस बंडल से जुड़ा कोई हादसा अवश्य है जिसे मैं नहीं जानती, पर जानना जरूरी है.

‘‘बेटा, बोलो, क्या बात है जो इतनी सुंदर रचनाओं को तुम ने रद्दी में फेंक दिया?’’ अम्मा ने फिर पुलिंदा मेज पर ला रखा.

‘‘छोड़ो अम्माजी, इस पुलिंदे को ले कर आप क्यों परेशान हैं? छोड़ो ये सब रचनावचना,’’ कहतेकहते उस की आंखें भर आई थीं.

‘‘बेटा, मैं तेरी सासूमां हूं. क्या बात है जो तू इतनी दुखी है और मुझे कुछ भी नहीं पता? क्या सबकुछ खुल कर नहीं बताओगी?’’

‘‘क्या कहूं अम्माजी. आप को यह तो पता ही है कि मेरे पापा बहुत बड़े साहित्यकार थे. परिवार में साहित्यिक माहौल था. मुझे पढ़ने व लिखने का जनून था. कितने ही साहित्यकारों से मेरे पिता व रचनाओं के जरिए परिचय था. मेरी शादी से पहले मेरे 3 कविता संग्रह व एक कहानी संग्रह छप चुके थे. मेरे काम को काफी सराहा गया था. एक पुस्तक पर मुझे अकादमी पुरस्कार भी मिला था. बहुत खुश थी मैं.’’

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